Showing posts with label SHARAT JAIN. Show all posts
Showing posts with label SHARAT JAIN. Show all posts

Friday, October 2, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में आलोक गुप्ता का नाम जोड़ने के रिजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करने से लगातार इंकार करते आ रहे तथा आलोक गुप्ता के साथ बदतमीजी करते रहे जेके गौड़, रोटरी इंटरनेशनल से फटकार खाने के बाद अंततः हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हुए

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के बैंक अकाउंट में नए पदाधिकारियों के नाम/हस्ताक्षर जोड़ने की प्रक्रिया को पूरा करने में बाधा बने पूर्व गवर्नर जेके गौड़ को रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय से फटकार पड़ी, तो अकड़ ढीली करके वह रिजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हुए । रोटरी इंटरनेशनल से फटकार पड़ने पर जेके गौड़ इस कदर बौखलाए और खीजे कि उन्होंने आलोक गुप्ता को मैसेज करके कहा कि वह रिजोल्यूशन की मूल प्रति उन्हें भेजें, अन्यथा वह स्कैंड कॉपी पर ही हस्ताक्षर कर देंगे । जिस किसी ने भी जेके गौड़ का मैसेज देखा/पढ़ा है, उसे हैरानी हुई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रह चुकने तथा दो वर्ष से डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) का पद संभाले हुए जेके गौड़ को इतनी भी अक्ल नहीं है क्या कि बैंक के आधिकारिक काम में मूल प्रति पर हस्ताक्षर मान्य होते हैं, न कि स्कैंड कॉपी पर ? लोगों को हैरानी है कि जेके गौड़ आखिर किस आधार पर उक्त रिजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर रहे थे, और अंततः अपनी फजीहत करवा बैठे ?
जेके गौड़ के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि जेके गौड़ को रोटरी इंटरनेशनल से फटकार खिलवाने तथा उनकी फजीहत करवाने के पीछे पूर्व गवर्नर शरत जैन हैं । इस मामले में शरत जैन ने जेके गौड़ को कठपुतली की तरह नचाया और जेके गौड़ खुशी खुशी नाचे । शरत जैन की दरअसल मुकेश अरनेजा से निजी खुन्नस है; मुकेश अरनेजा को आलोक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया है - इसलिए मुकेश अरनेजा से अपनी खुन्नस निकालने के लिए उन्होंने आलोक गुप्ता को परेशान करने की चाल चली और डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में आलोक गुप्ता का नाम जुड़ने से रोकने के लिए जेके गौड़ को हस्ताक्षर न करने के लिए राजी कर लिया । इसके लिए बहाना बनाया गया पिछले रोटरी वर्ष में आई डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की इस्तेमाल न हो सकी रकम को । दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में मँगवा तो ली थी, लेकिन अपने नाकारापन व निकम्मेपन के चलते वह उक्त अकाउंट को अपडेट नहीं करवा सके, और इसलिए वह उक्त रकम को इस्तेमाल नहीं कर सके । 
शरत जैन ने पहले तो जेके गौड़ को अपनी कठपुतली बनाया, और फिर इन दोनों ने मिलकर निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता का उल्लू बनाया । इन्होंने दीपक गुप्ता को समझाया कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम वह अपनी जेब से दे दें, जिसे बाद में उन्हें 'दिलवा' दिया जायेगा - और डिस्ट्रिक्ट ग्रांट को अपने अपने स्वार्थ में इस्तेमाल कर लिया । इसके बाद झगड़ा शुरू हुआ कि बैंक में जमा रकम कैसे दीपक गुप्ता को मिले और या रोटरी फाउंडेशन को वापस जाए ? आलोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने के बाद उक्त अकाउंट में आलोक गुप्ता का नाम जुड़ना था और उनके हस्ताक्षर मान्य होने की प्रक्रिया पूरी होनी थी, जिसके रिजोल्यूशन में डीआरएफसी के रूप में जेके गौड़ के हस्ताक्षर होने थे । जेके गौड़ ने यह आरोप लगाते हुए रिजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया कि आलोक गुप्ता पिछले रोटरी वर्ष की डिस्ट्रिक्ट ग्रांट को रोटरी इंटरनेशनल को वापस नहीं करेंगे । असिस्टेंट रीजनल रोटरी कोऑर्डीनेटर के रूप में शरत जैन ने भी एक लंबी-चौड़ी ईमेल लिख मारी । शरत जैन और जेके गौड़ की जोड़ी ने बहुतेरी कोशिशें कीं कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में आलोक गुप्ता का नाम जोड़े बिना अकाउंट से पैसा निकल आए, लेकिन उनकी कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकी ।

रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को जब यह पता चला कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में पड़ी इस्तेमाल नहीं हुई रकम जेके गौड़ की मनमानी और बेवकूफीपूर्ण हरकत के कारण वापस नहीं आ रही है, तब उन्होंने जेके गौड़ को कसकर फटकार लगाई । रिजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करने से लगातार इंकार करते आ रहे तथा आलोक गुप्ता के साथ बदतमीजी करते रहे जेके गौड़, फटकार खाने के बाद अंततः हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हुए । हालाँकि तब भी वह अपनी बेवकूफी दिखाने से बाज नहीं आए । जेके गौड़ को क्या यह सचमुच नहीं पता है कि स्कैंड कॉपी पर हस्ताक्षर करने से काम नहीं चलेगा, उन्हें रिजोल्यूशन की मूल प्रति पर ही हस्ताक्षर करने होंगे । जेके गौड़ का मैसेज उसी कहावत को चरितार्थ करता है कि 'रस्सी जल गई, पर ऐंठन नहीं गई ।'

Friday, September 25, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट अशोक अग्रवाल के दाँव-पेचों ने मुकेश अरनेजा व जेके गौड़ के बीच जो लड़ाई छिड़वाई है, उसमें अशोक अग्रवाल का खुद का गवर्नर-वर्ष ही फजीहत का शिकार बनता नजर आ रहा है

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा और जेके गौड़ की तू तू मैं मैं ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट अशोक अग्रवाल की मुसीबतों को खासा बढ़ा दिया है । विडंबना और मजे की बात यह है कि मुसीबतों को बढ़ाने का काम खुद अशोक अग्रवाल ने ही किया है; इसी बिना पर उनके नजदीकियों को भी लग रहा है कि अशोक अग्रवाल ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है । दरअसल जेके गौड़ के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए जमा हुई रकम में हेराफेरी के आरोपों की जाँच के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता द्वारा गठित की गई स्टुअर्डशिप कमेटी को भंग करने की माँग करते हुए जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा को जिस तरह से निशाना बनाया है, उसके पीछे अशोक अग्रवाल का ही 'दिमाग' देखा/बताया जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट में चर्चा है कि जेके गौड़ ने जो मेल 'भेजी' है, उसे 'लिखा' पूर्व गवर्नर शरत जैन ने है - और शरत जैन से लिखवाने का आईडिया अशोक अग्रवाल का था । असल में, अशोक अग्रवाल की मुकेश अरनेजा के साथ ज्यादा खुन्नस है । अशोक अग्रवाल को उम्मीद थी कि शरत जैन विस्तार से मुकेश अरनेजा की पोल खोलेंगे, तो मुकेश अरनेजा दबाव में आयेंगे और चुप बैठेंगे । अशोक अग्रवाल लेकिन सामाजिक व्यवहार का वह सिद्धांत पूरी तरह भुला बैठे कि 'जो लोग खुद शीशे के घरों में रहते हैं, उन्हें दूसरों के ऊपर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए ।' मुकेश अरनेजा के जबावी हमले ने लेकिन मामले का रुख ही बदल दिया है, और जेके गौड़ को कई तरह से बेईमानियों के आरोपों के साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है ।
मुकेश अरनेजा ने जबावी हमले में भले ही जेके गौड़ को घेरा है, लेकिन उनके निशाने पर अशोक अग्रवाल भी रहे । उल्लेखनीय है कि रोटरी वरदान ब्लड बैंक के प्रोजेक्ट में 45 लाख रूपये डकारने की कोशिश करने का जो आरोप मुकेश अरनेजा ने लगाया है, उसमें जेके गौड़ के 'पार्टनर इन क्राइम' अशोक अग्रवाल ही थे । इस तरह, उस मामले को एकबार फिर हवा देकर मुकेश अरनेजा ने अशोक अग्रवाल को लेकर लोगों के बीच संशय पैदा कर दिया है । अशोक अग्रवाल के गवर्नर-वर्ष के क्लब्स-प्रेसीडेंट रोटरी वरदान ब्लड बैंक में 45 लाख रुपयों की घपलेबाजी की कोशिशों और उसमें जेके गौड़ तथा अशोक अग्रवाल की मिलीभगत की बात को जानते भी नहीं होंगे, लेकिन मुकेश अरनेजा ने उन्हें उक्त मामले से परिचित करवाने का काम कर दिया - और इस तरह अशोक अग्रवाल गवर्नर बनने से दस महीने पहले ही 'अपने' प्रेसीडेंट्स के बीच 'बेईमान' होने की पहचान पा बैठे हैं । ऐसे में, अशोक अग्रवाल के सामने यह तय करने की चुनौती पैदा हो गई है कि उनके प्रयासों से मुकेश अरनेजा व जेके गौड़ के बीच 'छिड़ी' लड़ाई को वह और भड़काने का काम करें, या उसे ठंडा करने के लिए प्रयास करें ? इनके बीच की लड़ाई असल में सिर्फ इन दोनों के बीच की ही लड़ाई नहीं है, बल्कि इसमें कई लड़ाईयाँ गुँथी हुई हैं - इसलिए इस लड़ाई का निपटारा होना आसान भी नहीं है । निपटारा न होने की स्थिति में और लोग तो अपनी अपनी खुन्नस निकालेंगे और मजे लेंगे, लेकिन नुकसान अशोक अग्रवाल को उठाना पड़ेगा ।

डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता के पास जाने से रोकने के लिए डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) के रूप में जेके गौड़ ने हस्ताक्षर करने से इंकार करने का जो रवैया अपनाया हुआ है, उसे दीपक गुप्ता व शरत जैन व ललित खन्ना के साथ-साथ अशोक अग्रवाल ने भी समर्थन भले ही दिया हुआ हो - लेकिन हर कोई समझ रहा है कि यह रवैया यदि जारी रहा तो यह आलोक गुप्ता के साथ-साथ अशोक अग्रवाल को भी अपनी चपेट में लेगा - और यह अनोखा मामला होगा, जिसमें अशोक अग्रवाल अपने आपको मुसीबत में फँसाते हुए देखे जा रहे होंगे । जेके गौड़, शरत जैन, अशोक अग्रवाल, ललित खन्ना की चौकड़ी अपने रवैये से डीडीएफ के मामले में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को पहले ही तगड़ा नुकसान पहुँचा चुकी है; इनका रवैया अब अशोक अग्रवाल को मुसीबत में फँसाता नजर आ रहा है । आरोप है कि जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल की जोड़ी ने दीपक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष में अपने क्लब के प्रोजेक्ट के लिए ग्रांट के रूप में मोटी रकम ऐंठने के लिए दीपक गुप्ता को डीडीएफ का पैसा अपने निजी अकाउंट से देने के लिए राजी किया, और फिर दीपक गुप्ता की मदद करने के नाम पर मामले को वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ दीपक गुप्ता की मोटी रकम फँसती दिख रही है । इससे जाहिर है कि जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल के दाँवपेंचों ने अभी तक उन्हें ही फजीहत का शिकार बनाया है, और इसीलिए लग रहा है कि उनकी हरकतें कहीं अशोक अग्रवाल के गवर्नर-वर्ष को भी चपेट में न ले लें । मुकेश अरनेजा और जेके गौड़ के बीच शुरू हुई तू तू मैं मैं में यह खतरा नजर भी आ रहा है । 

Thursday, September 3, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 का ग्रांट्स के मामलों में एक के बाद एक लगातार मुसीबतों व फजीहतों का शिकार बनने के लिए पूर्व गवर्नर शरत जैन की पनोती को जिम्मेदार माने/ठहराए जाने के साथ ही पूछा जा रहा है कि दीपक गुप्ता के बाद उनका अगला शिकार कौन होगा ?

नई दिल्ली । निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता डीडीएफ ग्रांट की रकम के मामले में कहीं पूर्व गवर्नर शरत जैन की पनोती के शिकार तो नहीं हो गए हैं ? डीडीएफ ग्रांट की रकम के मामले में दीपक गुप्ता के साथ जो तमाशा हुआ है, और जिसके चलते वह करीब 70 लाख रुपये गँवाते नजर आ रहे हैं, वह दीपक गुप्ता का बड़ा बेवकूफीपूर्ण काम है - और इसे लेकर दीपक गुप्ता का डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में खासा मजाक बन रहा है । हर किसी को हैरानी है कि दीपक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में अपने हस्ताक्षर जुड़वाने जैसा मामूली काम आखिर क्यों नहीं करवा सके ? इसी हैरानी में लोगों का ध्यान इस बात पर गया है कि कहीं शरत जैन की पनोती की 'हवा' ने तो दीपक गुप्ता पर असर नहीं कर दिया, जिसके चलते दीपक गुप्ता एक सामान्य सी प्रक्रिया को भी पूरा नहीं कर सके - और अपनी जेब भी ढीली करवा बैठे तथा मजाक का विषय भी बन गए । इस बात पर लोगों का ध्यान दरअसल इसलिए गया, क्योंकि रोटरी फाउंडेशन की ग्रांट के जिस भी मामले में शरत जैन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े, उसका अंततः कबाड़ा ही हुआ है ।
उल्लेखनीय है कि शरत जैन खुद अपने गवर्नर-वर्ष में डीडीएफ ग्रांट का पैसा प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल नहीं कर पाए थे । प्रोजेक्ट्स तैयार करने/करवाने में उनकी तरफ से हुई लापरवाही के चलते प्रोजेक्ट्स के लिए आवेदन देने का समय निकल गया, और डीडीएफ ग्रांट की रकम से प्रोजेक्ट्स नहीं हो पाए । शरत जैन ने डीडीएफ ग्रांट का पैसा पोलियो में देकर ठिकाने लगाया । शरत जैन ने अपने गवर्नर-वर्ष में रोटरी क्लब ई मैग्नम को दो ग्लोबल ग्रांट मंजूर करवाई थीं, जिनमें लेकिन एक धेले का काम नहीं हुआ और रकम हड़पने के आरोप लगे । रोटरी फाउंडेशन ने ग्रांट्स के रूप में दी गई रकम वापस पाने के लिए सख्ती दिखाई, तब वह रकम वापस की/करवाई गई । मजे की बात यह है कि वापस की गई रकम का एक बड़ा हिस्सा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता द्वारा दिए जाने की चर्चा है, लेकिन काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि दीपक गुप्ता ने आखिर कौन से अकाउंट से रकम दी है । इन मामलों के चलते कुछेक लोगों ने मजाक में कहा भी था कि रोटरी की ग्रांट्स के मामले में शरत जैन की पनोती डिस्ट्रिक्ट व क्लब्स के लिए मुसीबत बन गई ।

किसे पता था कि रोटरी की ग्रांट्स के मामले में शरत जैन की पनोती दीपक गुप्ता के लिए भी फजीहत का कारण बन जायेगी । मजे की बात यह रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता किसी भी मामले में शरत जैन पर निर्भर नहीं थे, लेकिन डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस से पहले पता नहीं किस घड़ी में उन्होंने शरत जैन को डिस्ट्रिक्ट एडवाईजर बना लिया । उसके बाद शरत जैन असिस्टेंट रीजनल रोटरी कोऑर्डीनेटर बन गए, जिसके चलते दीपक गुप्ता ने शरत जैन से निकटता और बढ़ा ली । लोगों को लग रहा है कि इस तरह शरत जैन की पनोती को दीपक गुप्ता ने खुद ही गले लगाया, और डीडीएफ ग्रांट की रकम को लेकर झमेले में फँस गए । शरत जैन के क्लब, रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के कुछेक सदस्यों को लगता है कि उनके क्लब में जो फूट हुई, उसके लिए भी शरत जैन की पनोती ही जिम्मेदार है - क्योंकि क्लब में झगड़े की शुरुआत ग्लोबल ग्रांट के इस्तेमाल के तरीके को लेकर ही हुई थी, जो क्लब को दोफाड़ करने का कारण बनी । लोगों को हैरानी लेकिन इस बात की है कि शरत जैन की पनोती से पूर्व गवर्नर सुभाष जैन आखिर कैसे बचे रह गए, जबकि शरत जैन तो उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर थे । लोगों को लगता है कि या तो सुभाष जैन की किस्मत शरत जैन की पनोती पर भारी पड़ी, और या सुभाष जैन डिस्ट्रिक्ट के कामकाज के लिए शरत जैन पर ज्यादा निर्भर नहीं रहे होंगे - और उन्होंने अपना काम अपने आप ही किया होगा । इन चर्चाओं के बीच देखना दिलचस्प होगा कि दीपक गुप्ता के बाद शरत जैन की पनोती का अगला शिकार कौन होता है ?

Tuesday, August 4, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता द्वारा अपने अकाउंट से दी गई डिस्ट्रिक्ट ग्रांट्स की रकम के फँसने के मामले में शरत जैन के कूद पड़ने से, इस चर्चा को हवा मिली है कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट्स कहीं शरत जैन को सीओएल का चुनाव जितवाने में तो इस्तेमाल नहीं हुई है ? 

नई दिल्ली । बैंक में अटकी/फँसी पड़ी डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम को लेकर लंबी-चौड़ी सफाई देती ईमेल लिख/भेज कर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन रोटेरियंस के बीच न सिर्फ मजाक का विषय बन गए हैं, बल्कि खासी फजीहत के शिकार हो बैठे हैं । एक तरफ लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि शरत जैन को दीपक गुप्ता के 'फटे में अपना पैर घुसाने' की जरूरत आखिर क्यों पड़ी, तो दूसरी तरफ उनके नजदीकियों का कहना/बताना है कि शरत जैन ने उक्त ईमेल इसलिए लिखी है ताकि दीपक गुप्ता अपनी जेब से खर्च की गई डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम उनसे लेने पर जोर न दें । शरत जैन के नजदीकियों का कहना है कि अपनी जेब से खर्च की गई रकम को डूबता देख कर दीपक गुप्ता ने शरत जैन से तकादा करना शुरू किया है कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट को चूँकि उन्हें सीओएल का चुनाव जितवाने के लिए 'खर्च' किया गया था, इसलिए वह रकम उन्हें चुकाना चाहिए । दीपक गुप्ता ने यहाँ तक ऑफर दिया है कि पूरी न सही, तो कम से कम आधी रकम तो शरत जैन को देना ही चाहिए । दीपक गुप्ता का तर्क है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने के लिए जिस तरह से ललित खन्ना ने मोटी रकम खर्च की है, वैसे ही शरत जैन को भी सीओएल प्रतिनिधि बनने की कुछ तो कीमत चुकाना ही चाहिए । दीपक गुप्ता ने भी कुछेक लोगों के बीच रोना रोया है कि शरत जैन के लिए वोट पक्के करने के लिए ही उन्हें डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम अपने अकाउंट से देने की जरूरत पड़ी थी, अन्यथा उन्हें क्या जरूरत थी कि वह डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम अपने अकाउंट से देते ?
दीपक गुप्ता की तरफ से होने वाली इस तरह की बातों ने शरत जैन को डरा दिया कि कहीं दीपक गुप्ता उनसे रकम बसूलने पर जोर न देने लगें - इसलिए वह दीपक गुप्ता की मदद करने के नाम पर बीच में कूद पड़े हैं । शरत जैन के नजदीकियों के अनुसार, शरत जैन ने देखा/जाना है कि दीपक गुप्ता ने ललित खन्ना से किस किस तरह से पैसे लिए/बसूले थे । हर काम के लिए पैसों का बोझ दीपक गुप्ता जिस तरह से ललित खन्ना के सिर पर डाल दिया करते थे, उसके कारण ललित खन्ना के नजदीकियों को कुछेक मौकों पर कहते हुए सुना गया था कि दीपक गुप्ता की डिमांड्स के चक्कर में ललित खन्ना को कहीं अपनी फैक्ट्री न बेचनी पड़ जाए ! दीपक गुप्ता को बड़ा अफसोस रहा कि शरत जैन को सीओएल का चुनाव जितवाने के ऐवज में वह शरत जैन से पैसे नहीं ले पाए । अब जब, दीपक गुप्ता को अपनी जेब से दिए गए डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के पैसे डूबते हुए दिख रहे हैं तो उन्हें यह जरूर लग रहा है कि उक्त पैसे शरत जैन को देने चाहिए । मजे की बात यह है कि शरत जैन के कुछेक नजदीकियों को दीपक गुप्ता की 'मांग' उचित भी लगती है; उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में 105 क्लब हैं, लेकिन शरत जैन के लिए वोट जुटाने के उद्देश्य से दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट ग्रांट की रकम कुल 18 क्लब्स में ही बाँट/निपटा दी - डिस्ट्रिक्ट ग्रांट का करीब 70 लाख रुपया भी दीपक गुप्ता ने अपनी जेब से दिया । शरत जैन के नजदीकियों का भी मानना और कहना है कि दीपक गुप्ता अब यदि यह चाहते हैं कि उक्त रकम पूरी न सही, कम से कम आधी तो शरत जैन दे हीं - तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है ।

शरत जैन ने लेकिन रकम देने से बचने के लिए दीपक गुप्ता के प्रति हमदर्दी दिखाती हुई ईमेल लिखने व तमाम लोगों को भेजने का 'रास्ता' पकड़ा है । शरत जैन की ईमेल ने दीपक गुप्ता की बेवकूफी के चलते गंभीर होते गए एक सामान्य से मामले को और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है, जिसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता से भी उन्हें लताड़ सुनने को मिली है । मामले की क्रोनोलॉजी बड़ी सामान्य सी है, जो शरत जैन ने भी अपनी ईमेल में बताई है - पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता ने कुछेक क्लब्स के लिए डिस्ट्रिक्ट ग्रांट्स के प्रस्ताव स्वीकार किए, जिन्हें रोटरी फाउंडेशन ने भी मंजूर कर लिया और ग्रांट्स का पैसा डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में आ गया; डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट से पैसे क्लब्स को दिए जाने थे, लेकिन दीपक गुप्ता ने चूँकि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में अपने हस्ताक्षर मान्य नहीं करवाए थे और न उक्त अकाउंट की केवाईसी प्रक्रिया पूरी करवाई थी - इसलिए डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट से पैसे ट्रांसफर नहीं हो सकते थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में इसे दीपक गुप्ता के निकम्मेपन की हद ही कहा जायेगा कि 365 दिन के अपने गवर्नर-काल में वह डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट में अपना नाम नहीं डलवा सके । विडंबना यह है कि जब यह बात सामने आई, तब भी दीपक गुप्ता ने बैंक अकाउंट में अपने हस्ताक्षर मान्य करवाने में दिलचस्पी नहीं ली । दरअसल उस समय वह शरत जैन की सीओएल की उम्मीदवारी के पक्ष में वोटों की सौदेबाजी करने में व्यस्त थे । रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय के पदाधिकारियों को झूठे ही 'अर्जेन्टली रिक्वायर्ड' का वास्ता देकर दीपक गुप्ता ने पैसों के ऐडजस्टमेंट का आश्वासन ले लिया था । लेकिन अब पोल खुल रही है कि उनके लिए 'अर्जेन्टली रिक्वायर्ड' दरअसल सीओएल के चुनाव के लिए वोटों का सौदा करना था, और वह बैंक अकाउंट को नियमानुसार लाने/बनाने में समय बर्बाद नहीं कर सकते थे । मामले में शरत जैन द्वारा गैरजरूरी रूप से दखल देने से लोगों को यह और 'नजर' आ रहा है कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट का पैसा उनके चुनाव में ही 'इस्तेमाल' हुआ है ।         

Friday, July 10, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में चुनावी फायदे के लिए दीपक गुप्ता द्वारा बनाया गया रोटरी क्लब गाजियाबाद तेजस्वी सभी सदस्यों के इस्तीफा देने के कारण छह महीने में ही बंद हुआ, और जो दीपक गुप्ता की नटवरलालरूपी कार्यप्रणाली का एक दिलचस्प उदाहरण बना है 

गाजियाबाद । निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने पिछले रोटरी वर्ष के अपने कार्यकाल में जो 12 नए क्लब बनाये/खोले थे, उनमें एक - रोटरी क्लब गाजियाबाद तेजस्वी - दीपक गुप्ता का कार्यकाल पूरा होते ही सभी सदस्यों के इस्तीफा दे देने के कारण बंद हो गया है । यह क्लब 11 दिसंबर 2019 को 66 सदस्यों के साथ खोला गया था, लेकिन ड्यूज जमा करने से बचने की सदस्स्यों की कार्रवाई के कारण छह महीने में ही बंद हो गया है । छह महीने के कार्यकाल में इस क्लब की एकमात्र 'महान उपलब्धि' यह रही कि इसके जो तीन वोट बने थे, वह सीओएल के चुनाव में शरत जैन को दो वोटों से जीत दिलवाने में मददगार रहे । वास्तव में यह क्लब शरत जैन की उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने के अभियान के तहत ही बना/बनाया गया था । 66 सदस्यों के साथ बने/बनाये गए इस क्लब के लिए दीपक गुप्ता को जोन 4 के रोटरी कोऑर्डीनेटर गुरजीत सिंह सेखों तथा असिस्टेंट रोटरी कोऑर्डीनेटर प्रियेश भंडारी की तरफ से शाबासी भी मिली थी - उन बेचारों को क्या पता था कि दीपक गुप्ता उन्हें ही नहीं, बल्कि रोटरी के उच्च आदर्शों को भी ठग रहे हैं - और वह उनकी ठगी को शाबासी दे रहे हैं । बात सिर्फ इतनी सी ही नहीं है कि एक क्लब खुला और छह महीने में ही बंद हो गया - कोई भी तर्क कर सकता है कि इसके लिए तो क्लब के सदस्यों और पदाधिकारियों को जिम्मेदार माना व जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की इसमें भला क्या गलती है ? लेकिन रोटरी क्लब गाजियाबाद तेजस्वी का किस्सा इतना सीधा/सरल नहीं है, यह किस्सा वास्तव में दीपक गुप्ता की नटवरलालरूपी कार्यप्रणाली का एक दिलचस्प उदाहरण है - जिसमें उक्त क्लब के सदस्य 'इस्तेमाल' किए गए और रोटरी तथा उसके वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ 'धोखा' किया गया ।
उल्लेखनीय है कि उक्त क्लब 15 डॉलर प्रति सदस्य के शुल्क के साथ 11 दिसंबर को खुला था; इसके चार्टर सदस्यों की संख्या 66 थी - लेकिन फरवरी तक इसकी सदस्यता घटकर 20/25 के करीब हो गई । इस बीच, रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय से करीब दो लाख का बिल आ गया - जिसे देख कर क्लब के पदाधिकारियों तथा सदस्यों का पारा गर्म हो गया; उनका कहना/बताना रहा कि उन्हें तो विश्वास दिलाया गया था कि जून तक उन्हें कोई बिल नहीं चुकाना होगा । इसके बाद, जैसी जो बातें सुनने को मिलीं - उससे साबित हो गया कि दीपक गुप्ता को लोगों ने 'रोटरी का नटवरलाल' नाम उचित ही दिया है । क्लब की तरफ से सुनने को मिला कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने क्लब के प्रमुख लोगों को फार्मूला सुझाया कि अभी 66 सदस्यों के साथ खोले जा रहे क्लब की सदस्यता जनवरी के अंत तक घटाकर 20/22 कर देना - जिससे कि 66 सदस्यों का शुल्क नहीं लगेगा - और क्लब आगे आसानी से बना/चलता रहेगा । क्लब के प्रमुख कर्ताधर्ताओं ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि दीपक गुप्ता जब एक/डेढ़ महीने के बाद सदस्यता एक तिहाई कर देने का सुझाव दे रहे हैं, तो क्लब की शुरुआत बड़ी सदस्य संख्या से करने की जरूरत भला क्या है ? उन्हें यह नहीं समझ में आया कि इसके पीछे दीपक गुप्ता की चालबाजी क्लब के तीन वोट बनवाने/पाने की है, जिन्हें सीओएल के चुनाव में शरत जैन के पक्ष में किया जायेगा । दीपक गुप्ता का इरादा यही था कि उनका काम बन जाये, उसके बाद सदस्यता घटा दी जाए । काम दीपक गुप्ता की योजना के अनुसार ही हुआ, लेकिन मामला तब बिगड़ गया - जब क्लब को रोटरी इंटरनेशनल से 66 सदस्यों का भारी-भरकम बिल मिला ।
क्लब के पदाधिकारियों ने कोशिश तो बहुत की कि क्लब के तीन वोटों का फायदा चूँकि शरत जैन को मिला है, इसलिए क्लब को मिले बिल का भुगतान वह करें - लेकिन शरत जैन ने अवसरवादी रवैया अपनाते/दिखाते हुए मामले में चुप्पी ही बनाये रखी । दीपक गुप्ता ने कुछ समय तक जरूर क्लब के पदाधिकारियों को झाँसा दिए रखा कि क्लब को मिले बिल के भुगतान को लेकर वह कुछ करेंगे - लेकिन क्लब के पदाधिकारियों को जल्दी ही समझ में आ गया कि रोटरी तथा रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों के साथ 'धोखा' करने वाले दीपक गुप्ता उनके साथ भी धोखा ही कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने रोटरी से ही तौबा कर लेने में अपनी भलाई देखी और इस्तीफा देकर क्लब से अलग हो गए - और जब क्लब में कोई बचा नहीं रह गया, तो क्लब स्वतः बंद हो गया । रोटरी में क्लब्स प्रायः ड्यूज जमा न करने के कारण बंद होते हैं; लेकिन रोटरी क्लब गाजियाबाद तेजस्वी सभी सदस्यों के इस्तीफा दे देने के कारण बंद हुआ है । डिस्ट्रिक्ट 3012 में अभी तक 23 क्लब बंद हुए हैं, जिनमें सबसे कम समय तक यही क्लब अस्तित्व में रहा है, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता की धोखाधड़ी का शिकार बने रोटेरियंस के रोटरी छोड़ जाने के कारण बंद हुआ है । विडंबना यह है कि रोटेरियंस के साथ धोखाधड़ी करने तथा रोटरी को बदनाम करने के बावजूद दीपक गुप्ता अभी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी के 'नशे' से बाहर नहीं निकल पाए हैं - भूतपूर्व हो चुकने के बाद भी दीपक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में न सिर्फ क्लब्स के प्रोजेक्ट में शामिल हो रहे हैं, बल्कि अभी भी रोटेरियंस को अवॉर्ड/सर्टीफिकेट घोषित कर रहे हैं तथा बाँट रहे हैं । इस तरह रोटरी से खिलवाड़ करना उनका अभी भी जारी है ।

Friday, April 24, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा और सुभाष जैन से एक साथ बदला लेने के उद्देश्य से, सीओएल के चुनाव में अशोक अग्रवाल द्वारा दिखाई जा रही अति-सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट में 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' जैसा माहौल बना दिया है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल ने सीओएल के चुनाव में शरत जैन को जीत दिलवाने के लिए जिस तरह की सक्रियता दिखाई हुई है, उसने लोगों को 'मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त' वाला मुहावरा याद दिलवा दिया है । लोगों का कहना है कि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने को लेकर खुद शरत जैन उतने सक्रिय नहीं हैं, जितने उनकी उम्मीदवारी को लेकर अशोक अग्रवाल जुटे हुए हैं । कहीं कहीं अशोक अग्रवाल ने कहा भी है कि सीओएल के चुनाव में मुकेश अरनेजा के खिलाफ शरत जैन नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वह लड़ रहे हैं । अशोक अग्रवाल तरह तरह से यह जताने/दिखाने/बताने का प्रयास कर रहे हैं कि वह वास्तव में शरत जैन को जितवाने के लिए नहीं, बल्कि मुकेश अरनेजा को हराने के लिए सीओएल के चुनाव में कूदे हुए हैं । मुकेश अरनेजा ने पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध किया था - अशोक अग्रवाल इस बात को लेकर मुकेश अरनेजा से बुरी तरह खफा हैं, और सीओएल के चुनाव में इसका बदला लेने की तैयारी में हैं । मजे की बात लेकिन यह है कि अशोक अग्रवाल सीओएल के चुनाव के जरिये सुभाष जैन को भी सबक सिखाना चाहते हैं, जबकि पिछले वर्ष अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी का सुभाष जैन ने खुल कर सहयोग और समर्थन किया था - और पिछले वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव का आकलन करने वाले लोगों ने माना था कि अशोक अग्रवाल की चुनावी जीत के लिए सुभाष जैन के समर्थन की ही निर्णायक भूमिका थी । मुकेश अरनेजा के प्रति अशोक अग्रवाल की नाराजगी तो लोगों को समझ में आती है, लेकिन लोगों के बीच हैरानी इस बात को लेकर है कि सुभाष जैन को सबक सिखाने की बातें वह क्यों करते रहते हैं - जबकि वह आज यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी हैं, तो सुभाष जैन के समर्थन के कारण ही हैं ।
अशोक अग्रवाल  के नजदीकियों के अनुसार, दरअसल इस 'कारण' के कारण ही वह सुभाष जैन को सबक सिखाना चाहते हैं । नजदीकियों के अनुसार, अशोक अग्रवाल को यह बात बिलकुल भी पसंद नहीं है कि उनके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने का श्रेय किसी भी तरह से सुभाष जैन को दिया जाए - या मिले । वास्तव में, अशोक अग्रवाल किसी को भी श्रेय नहीं देना चाहते हैं; उनका मानना और कहना है कि वह अपने दम पर अपना चुनाव जीते हैं, और उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने वाले लोगों ने तो उन्हें जीतता हुआ देख/समझ कर ही उनका समर्थन किया था । अशोक अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि वह तो चाहते हैं और तरह तरह से कोशिश करते रहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का 'एकछत्र नेता' उन्हें माना/समझा जाए - लेकिन हालात उन्हें अलग-थलग धकेल देते हैं । इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक अग्रवाल ने बहुत कोशिश की कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी का झंडा उनके हाथ में रहे, लेकिन ललित खन्ना ने उनका समर्थन तो ले लिया पर उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया । अशोक अग्रवाल के लिए झटके की बात यह रही कि वह तो बिना झंडे के रह गए, और सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी का झंडा सुभाष जैन को मिल गया । अनोखी बात यह रही कि सुनील मल्होत्रा यद्यपि चुनाव हार गए, लेकिन उन्हें मिले वोटों की संख्या के आधार पर डिस्ट्रिक्ट के नेता का खिताब सुभाष जैन को मिल गया । ललित खन्ना की जीत के लिए उनका चौथी/पाँचवीं बार उम्मीदवार बनना, सुनील मल्होत्रा की अनुभवहीनता तथा जल्दी चुनाव होने को कारण के रूप में देखा/पहचाना गया; इसके बावजूद, सुनील मल्होत्रा से ललित खन्ना को जो टक्कर मिली और वह उम्मीद के विपरीत कम अंतर से ही जीत पाए - उसके लिए सुभाष जैन के 'वोट बैंक' की ताकत को देखा/पहचाना गया । यह सुभाष जैन के लिए हार के बावजूद 'जीतने' वाला मामला रहा ।
यही कारण रहा कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी तैयारी में और सीओएल के चुनाव में सुभाष जैन की पक्षधरता तथा संलग्नता महत्त्वपूर्ण हो उठी; जबकि अशोक अग्रवाल को अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी तैयारी में एक बार फिर जोर का झटका लगा । शुरू में बड़े जोरशोर से चर्चा सुनी गई थी कि अशोक अग्रवाल अगले वर्ष  के चुनाव के लिए उम्मीदवार मैदान में उतार रहे हैं, लेकिन फिर वह चर्चा जल्दी ही बंद हो गई । अशोक अग्रवाल के नजदीकियों का कहना/बताना है कि अशोक अग्रवाल ने दो/एक लोगों को उम्मीदवार बनने के लिए राजी कर लिया था, लेकिन राजी हुए लोगों को जल्दी ही समझ में आ गया कि अशोक अग्रवाल अपनी राजनीति जमाने/दिखाने के लिए उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं, सो वह पीछे हट गए और अशोक अग्रवाल एक बार फिर अलग-थलग पड़ गए । ऐसे में, सीओएल का चुनाव अशोक अग्रवाल को संजीवनी बूटी की तरह मिल गया । सीओएल के चुनाव में सुभाष जैन चूँकि मुकेश अरनेजा की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं, इसलिए अशोक अग्रवाल को लगता है कि मुकेश अरनेजा को हरा/हरवा कर वह दोनों से एकसाथ बदला ले लेंगे और अपने आप को डिस्ट्रिक्ट की राजनीति का 'एकछत्र नेता' साबित कर देंगे । दिलचस्प नजारा यह है कि शरत जैन ने सीओएल के लिए होने वाले चुनाव के नतीजे को भाँप लिया है, और इसलिए वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ज्यादा उत्साहित और सक्रिय नहीं हैं - लेकिन अशोक अग्रवाल ने उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने को लेकर कमर कसी हुई है । उन्हें लगता है कि समय समय पर की गई मुकेश अरनेजा की हरकतों को लेकर लोगों के बीच जो नाराजगी रही है, उसे वह इस समय भुना सकते हैं तथा मुकेश अरनेजा के खिलाफ माहौल बना कर सीओएल के चुनाव में उन्हें हरा/हरवा सकते हैं । अशोक अग्रवाल की सक्रियता का सचमुच क्या नतीजा निकलेगा, यह तो नतीजा आने पर ही पता चलेगा - लेकिन सीओएल के चुनाव में अशोक अग्रवाल की अति-सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट में 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' जैसा माहौल जरूर बना दिया है ।

Wednesday, March 18, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रमेश अग्रवाल की बदनामी के कारण सीओएल के चुनाव में शरत जैन को अपने समर्थकों की मदद का ही टोटा पड़ता नजर आ रहा है, जिसके चलते मुकेश अरनेजा के मुकाबले उनकी स्थिति पतली ही दिख रही है  

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल के कहने/उकसाने पर शरत जैन सीओएल के लिए उम्मीदवार तो बन गए हैं, लेकिन मुकाबले पर मुकेश अरनेजा को देख कर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने जैसे मुसीबत आमंत्रित कर ली है । दरअसल रमेश अग्रवाल की हालत ही कुछ ऐसी बन गई है कि वह जिसे उम्मीदवार बनाते हैं, मुसीबतें उसे शुरू से ही दबोच लेती हैं । मौजूदा रोटरी वर्ष में रमेश अग्रवाल ने अशोक जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया, लेकिन अशोक जैन को जल्दी ही समझ में आ गया कि रमेश अग्रवाल की 'साढ़े साती' के कारण उनके लिए उम्मीदवारी का अभियान चला पाना मुश्किल ही होगा - सो, वह जिस पतली गली से उम्मीदवार बनने के लिए आगे बढ़े थे, उसी पतली गली से वापस लौट गए; और सुखी रहे । अब शरत जैन की भी हालत अशोक जैन जैसी ही है । मुकेश अरनेजा को मुकाबले में देख कर रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी ने यह तर्क देते हुए दाँव तो अच्छा चला था कि मुकेश अरनेजा एक बार सीओएल में रह चुके हैं, इसलिए अब उन्हें दूसरों के लिए मौका छोड़ देना चाहिए - लेकिन उनकी बदकिस्मती रही कि उनका यह दाँव चलते ही फुस्स हो गया । दरअसल किसी की भी समझ में नहीं आया कि रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानून यदि मुकेश अरनेजा को दोबारा सीओएल का सदस्य बनने का अधिकार देते हैं, तब फिर रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी मनमाने तरीके से उनसे यह अधिकार छीनने का प्रयास क्यों कर रही है ? और फिर, यदि इस तर्क को व्यवहार में लाना ही था, तो इसके लिए काउंसिल और गवर्नर्स की मीटिंग में बात होना चाहिए थी । यह दोनों डिस्ट्रिक्ट काउंसलर हैं, इन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को कह कर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलवाना चाहिए थी, और उसमें यह मुद्दा रखना चाहिए था । मजे की बात लेकिन यह है कि इसके लिए न तो इन दोनों ने कोई प्रयास किए और न दीपक गुप्ता ने ही कोशिश की ।
डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों और जानकारों का मानना और कहना है कि हो सकता है कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी रमेश अग्रवाल और शरत जैन की जोड़ी मुकेश अरनेजा को उम्मीदवार बनने से न रोक पाती; तब भी लेकिन लोगों को यह तो 'दिखता' कि वह प्रॉपर तरीके से अपनी बात कह रहे हैं - और उससे उन्हें लोगों के बीच सहानुभूति और समर्थन भी मिल सकता था । यह मौका लेकिन रमेश अग्रवाल और शरत जैन की जोड़ी ने खो दिया । इससे जाहिर है कि सीओएल का पद पाने के लिए शरत जैन को और उन्हें पद दिलवाने के लिए रमेश अग्रवाल को कायदे/कानून से कुछ करना नहीं है; और इसीलिए उनके संभावित सहयोगी/समर्थक भी उनके लिए कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । शरत जैन को उम्मीद रही है कि दीपक गुप्ता, अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करेंगे; लेकिन वह यह देख/जान कर निराश हैं कि यह तीनों ही कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । दीपक गुप्ता तो अपने स्वार्थ और अपनी बेवकूफी में कुछ नहीं कर रहे हैं; दीपक गुप्ता दरअसल उम्मीद कर रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना उनकी मदद पाने के लिए जिस तरह उनके आगे-पीछे रहते थे, और उनकी हर 'डिमांड' पूरी करते थे, शरत जैन भी वैसे ही करें - शरत जैन चूँकि वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं, इसलिए दीपक गुप्ता भी उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं समझ रहे हैं । 
अशोक अग्रवाल लगता है कि रमेश अग्रवाल के साथ हुए पुराने झगड़े को अभी नहीं भूले हैं, और शरत जैन को वह चूँकि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में ही देख/पहचान रहे हैं - इसलिए वह शरत जैन के लिए कुछ करने को प्रेरित नहीं हो पा रहे हैं । ललित खन्ना की समस्या बिलकुल अलग तरह की है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव वह खुद बड़ी मुश्किलों से - चौथी बार में जीते हैं; ऐसे में, उन्हें डर है कि वह शरत जैन के लिए वोट जुटाने की कोशिश में कहीं खुद का मजाक न बनवा बैठें, लिहाजा वह चुप ही बने हुए हैं । ललित खन्ना की इस चुप्पी ने सीओएल के चुनाव से अलग मामले में शरत जैन की दुविधा को बढ़ाने का काम किया है । शरत जैन को ललित खन्ना की तरफ से संकेत मिला है कि वह उन्हें अपने गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे; शरत जैन की आशंका है कि कहीं उस मामले में भी तो ललित खन्ना उन्हें झाँसा नहीं दे देंगे ? अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना के सामने एक और मुसीबत है - उन्हें आने वाले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ सँभालनी हैं, और इसके लिए उन्हें डिस्ट्रिक्ट में सभी का सहयोग/समर्थन चाहिए होगा - सीओएल के चुनाव के चक्कर में वह उस संभावित सहयोग/समर्थन को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे । यह मुसीबत वास्तव में इसलिए भी है, क्योंकि किसी को भी सीओएल के चुनाव में शरत जैन के जीतने की संभावना नहीं दिख रही है - इसलिए उनके सहयोगी/समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले नेता लोग भी उनके समर्थन में 'दिख' कर अपनी फजीहत नहीं करवाना चाहते हैं, और उनकी उम्मीदवारी से दूर ही रहना चाहते हैं । शरत जैन और मुकेश अरनेजा के बीच होते दिख रहे सीओएल के चुनाव को एक बेमेल चुनाव के रूप में देखा जा रहा है; मुकेश अरनेजा को चुनावी राजनीति का धुरंधर समझा जाता है, जबकि शरत जैन चुनावी राजनीति के बड़े कच्चे खिलाड़ी के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं । रही सही कसर रमेश अग्रवाल की बदनामी पूरी कर देती है । लोगों का मानना/कहना है कि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार होने के कारण शरत जैन की भी स्थिति वैसी ही होगी, जैसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद चुनाव के मामले में अशोक जैन की हुई थी । अशोक जैन तो हालात को समझ/पहचान कर जल्दी ही 'कट' लिए थे, देखना दिलचस्प होगा कि शरत जैन क्या करते हैं ? 

Tuesday, March 10, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए दीपक गुप्ता को सोनीपत से लेकर बाकी क्षेत्रों तक में समर्थन का जो टोटा पड़ रहा है, उसके चलते प्रियतोष गुप्ता के खिलाफ उम्मीदवार की तलाश में भटक रहे नेताओं/गवर्नर्स को भी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठाने में कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है

सोनीपत । दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान में तेजी लाने के लिए होली के मौके का फायदा तो खूब उठाया, लेकिन उन्हें इसका लाभ मिलता हुआ दिखा नहीं है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई है कि जिन नेताओं और गवर्नर्स के साथ उनकी नजदीकी रही है, और जिनके लिए उन्होंने बहुत काम किए हैं - वह भी उनकी उम्मीदवारी के समर्थन से उन्हें पीछे हटते हुए 'दिखाई' दिए हैं । सबसे तगड़ा झटका उन्हें अपने हमनाम मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता से लगा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के लिए सोनीपत वाले दीपक गुप्ता ने इस वर्ष भी बहुत काम किया, और उनके चुनाव में भी दिन-रात एक किया था - इस नाते उन्हें विश्वास था कि अब जब वह उम्मीदवार बन रहे हैं, तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता उनकी मदद करेंगे । लेकिन सोनीपत वाले दीपक गुप्ता को यह देख/जान कर तगड़ा झटका लगा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की बजाये किसी दूसरे (तीसरे) उम्मीदवार को तलाशने में लगे हुए हैं । सिर्फ इतना ही नहीं, सोनीपत में उन्हें लोगों से यह भी सुनने को मिला है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता उन्हें उनकी उम्मीदवारी के खिलाफ भड़का रहे हैं । यह बात सोनीपत वाले दीपक गुप्ता को इसलिए और हैरान करने वाली लगी है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता उनसे कहते/बताते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को जब सोनीपत में ही उचित समर्थन नहीं है, तो वह नाहक ही उम्मीदवारी के पचड़े में क्यों पड़ रहे हैं ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के इस दोहरे और अहसानफरामोशी वाले रवैये से सोनीपत वाले दीपक गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी का सारा ताना-बाना बुरी तरह बिखरता दिख रहा है ।
इसके अलावा, दीपक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा और शरत जैन का समर्थन जुटाने में भी असफल रहे हैं । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट में दीपक गुप्ता की कुल पहचान 'मुकेश अरनेजा के आदमी' के रूप में है; इसके बावजूद दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से सबसे पहले मुकेश अरनेजा ने दूरी बनाई । शरत जैन के गवर्नर-वर्ष में दीपक गुप्ता ने बहुत काम किया था; दीपक गुप्ता को विश्वास था कि शरत जैन ज्यादा उठा-पटक करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, इसलिए वह उनके द्वारा किए गए कामों को अवश्य ही याद रखेंगे - लेकिन शरत जैन भी उन्हें अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में दिलचस्पी लेते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । दीपक गुप्ता के लिए हैरानी और मुसीबत की बात यह हुई है कि जो नेता/गवर्नर्स प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में नहीं भी हैं, वह भी उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं हैं । दरअसल ऐसे नेताओं/गवर्नर्स को लग रहा है कि एक उम्मीदवार के रूप में प्रियतोष गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह का आधार बना लिया है, और उनकी उम्मीदवारी को लोगों के बीच जिस तरह का समर्थन मिलता दिख रहा है - उसका मुकाबला कर पाना दीपक गुप्ता के बस की बात नहीं है, इसलिए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ जुड़ना अपनी नाक कटवाना होगा । दीपक गुप्ता हालाँकि उन्हें समझा रहे हैं कि वह जब इस बात को जान/समझ रहे हैं कि एक उम्मीदवार के रूप में प्रियतोष गुप्ता ने लोगों के बीच अच्छा आधार बना लिया है और उन्हें उचित समर्थन मिल रहा है, तब फिर एक नया उम्मीदवार तो प्रियतोष गुप्ता के सामने और भी कमजोर साबित होगा - ऐसे में, नए उम्मीदवार के मुकाबले वह ही प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी को टक्कर देने वाले साबित होंगे; और इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत हुई प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध करने वाले नेताओं/गवर्नर्स को उनकी उम्मीदवारी का ही झंडा उठा लेना चाहिए ।
दीपक गुप्ता ने होली के मौके पर मिलने-जुलने के दौरान इस तर्क के सहारे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास तो खूब किया, लेकिन उनका काम बनता हुआ नजर नहीं आ रहा है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सक्रिय रहने तथा भूमिका निभाने वाले अधिकतर नेता और गवर्नर्स दीपक गुप्ता को उस तरह का ही उम्मीदवार मान/समझ रहे हैं, पिछले चुनाव में जिसे एक भी वोट नहीं मिला था । इसीलिए प्रियतोष गुप्ता के खिलाफ उम्मीदवार की तलाश में भटक रहे नेताओं/गवर्नर्स को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठाने में कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है । असल में, एक उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता की सोनीपत में ही बुरी स्थिति है । दीपक गुप्ता तो हालाँकि दावा कर रहे हैं कि सोनीपत के सभी क्लब्स उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में हैं, लेकिन सोनीपत के क्लब्स के प्रमुख लोगों के संपर्क में रहने वाले लोगों का कहना/बताना है कि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है; और सोनीपत में अलग अलग कारणों से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति विरोध का ही भाव और स्वर है । प्रियतोष गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन बनाने/जुटाने के उद्देश्य से जितनी बार भी सोनीपत पहुँचे हैं, सोनीपत के लोगों ने उतनी ही बार बढ़चढ़ कर उनके प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है । वास्तव में, यही सब देख/जान कर कोई भी नेता/गवर्नर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में दिलचस्पी दिखाता नजर नहीं आ रहा है । इसके चलते दीपक गुप्ता के लिए अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अभियान चलाना तक मुश्किल हो रहा है । होली के मौके पर लोगों से मिलने/जुलने के बहाने दीपक गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने की जो कोशिश की, उसमें भी उनके हाथ असफलता ही लगने की बातें सुनी/सुनाई जा रही हैं । 

Wednesday, October 30, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में होने वाले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान के नाम पर रमेश अग्रवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की 'राजनीति' करने का मौका देने तथा खर्च का बोझ क्लब्स पर डालने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता मुसीबत में फँसे   

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान में होने वाला कार्यक्रम क्लब्स से 50/50 हजार रुपए माँगने के कारण विवाद में फँस गया है । लोगों के बीच चर्चा सुनी जा रही है कि उक्त कार्यक्रम को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की राजनीति का जरिया बना कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता क्लब्स पर नाहक ही बोझ डाल रहे हैं और इस तरह रमेश अग्रवाल को क्लब्स के पैसों पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव लड़वाने की तैयारी कर रहे हैं । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि रमेश अग्रवाल ने अपने राजनीतिक स्वार्थ में दीपक गुप्ता को फँसा दिया है, और दीपक गुप्ता ने क्लब्स को फँसा दिया है । उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने पर सुशील गुप्ता का दिल्ली में जो स्वागत/सम्मान समारोह हुआ था, उसे डिस्ट्रिक्ट 3012 और डिस्ट्रिक्ट 3011 ने मिल कर किया था । उसी तर्ज पर दीपक गुप्ता के सामने इस वर्ष शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह को आयोजित करने का ऑफर था । दीपक गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, दीपक गुप्ता इसके लिए राजी भी थे; लेकिन रमेश अग्रवाल ने दीपक गुप्ता को समझा लिया कि उक्त समारोह अकेले करना ही उचित होगा । समझा जाता है कि रमेश अग्रवाल चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार होने की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए उन्हें लगा कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के जरिये वह अपनी डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के लिए 'माहौल' बना सकेंगे ।   
रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने के उद्देश्य से किए जा रहे शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के लिए दीपक गुप्ता ने क्लब्स से 50 हजार रुपए देने की माँग की है, जिसके बदले में क्लब को पाँच युगल्स के लिए समारोह में शामिल होने का अवसर देने की बात की गई है । उल्लेखनीय है कि रोटरी में इस तरह के आयोजनों के लिए पैसे जुटाने का काम व्यक्तिगत रजिस्ट्रेशन के जरिये किया जाता है; और या कुछेक सक्रिय रोटेरियंस से स्पॉन्सरशिप ली जाती है । पिछले रोटरी वर्ष में हुए समारोह में कुछेक लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया था, तथा कई लोगों को तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन द्वारा ली गई स्पॉन्सरशिप के बदले में प्रवेश मिला था । लोगों का कहना है कि सुभाष जैन की ही तरह दीपक गुप्ता को और रमेश अग्रवाल को समारोह का खर्च जुटाने के लिए स्पॉन्सरशिप लेना चाहिए; दीपक गुप्ता ने लेकिन क्लब्स पर बोझ डाल कर नाहक ही विवाद पैदा कर दिया है । इस 'व्यवस्था' के चलते समारोह में हिस्सा लेने के लिए क्लब के पाँच युगल्स का चयन करने को लेकर क्लब्स में झगड़े होने की आशंका व्यक्त की जा रही है । लोगों का कहना है कि शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के खर्च के लिए दीपक गुप्ता को पिछले वर्ष जैसी ही व्यवस्था अपनाना चाहिए थी - जिससे न कोई झंझट पैदा होता, न किसी झगड़े की आशंका होती और न क्लब पर कोई बोझ पड़ता ।
शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह का मुखिया रमेश अग्रवाल को बनाने के दीपक गुप्ता के फैसले पर पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा भी नाराज बताये/सुने जा रहे हैं । मुकेश अरनेजा चूँकि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं, इसलिए वह उम्मीद कर रहे थे कि दीपक गुप्ता उक्त समारोह के आयोजन की जिम्मेदारी उन्हें देंगे । मुकेश अरनेजा को यह उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि पिछले रोटरी वर्ष में सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में हुए स्वागत/सम्मान समारोह की जिम्मेदारी सुभाष जैन ने तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर शरत जैन को दी थी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता ने लेकिन उक्त समारोह की जिम्मेदारी के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने की बजाये रमेश अग्रवाल को चुना और मुकेश अरनेजा को निराश किया और झटका दिया । रमेश अग्रवाल को समारोह की जिम्मेदारी मिलने से शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान में होने वाला समारोह रमेश अग्रवाल का राजनीतिक तमाशा बन गया है, जिसके खर्च का बोझ क्लब्स पर डालने के कारण वह विवादपूर्ण भी बन गया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता के पिछले कार्यक्रम, खासतौर से डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों का अधिष्ठापन कार्यक्रम और फिर दीवाली मेला - लोगों से सहयोग न मिलने के कारण बुरी तरह से 'पिटे' और फ्लॉप रहे हैं; शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान के कार्यक्रम को लेकर दीपक गुप्ता की तैयारी जिस विवाद में फँस/पड़ गई है, उसके कारण डर पैदा हुआ है कि कहीं इस समारोह का हश्र भी उनके पिछले कार्यक्रमों जैसा तो नहीं होगा ? 

Sunday, August 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के ई-क्लब मैग्नम से पैसा वापस माँगने की रोटरी फाउंडेशन की कार्रवाई ने 'बताया' कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के खासमखास सुनील प्रकाश ने रवि सिंघल व नवनीत गुप्ता के साथ मिल कर सीएसआर, रोटरी फाउंडेशन व स्कूली बच्चों के साथ एक साथ धोखा किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों को रोटरी फाउंडेशन से मिले करीब 31 लाख रुपए वापस लौटाने के आदेश ने डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले को उजागर कर दिया है । इस मामले ने रोटरी फाउंडेशन के साथ-साथ सीएसआर (कॉपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी) के पैसों में भी रोटेरियंस की लूट की तरकीबों को सामने लाने का काम किया है । इस मामले ने डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों के गैर-जिम्मेदार रवैये को भी उद्घाटित किया है, जो उनकी मिलीभगत होने के भी संकेत देता है । ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों ने जिस ग्लोबल ग्रांट (जीजी 1755525) में घपला किया है, वह शरत जैन के गवर्नर वर्ष में मंजूर हुई थी, और उस दौरान मुकेश अरनेजा डीआरएफसी थे । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने वरदान अस्पताल में बनने वाले ब्लड बैंक की ग्रांट के मामले में तो बड़ा बबाल काटा था, लेकिन ई-क्लब मैग्नम की ग्लोबल ग्रांट बिना किसी चूँ-चपड़ के पास कर दी थी । विन्स इंडिया के सेक्रेटरी के रूप में रमेश अग्रवाल ने उक्त ग्रांट मिलने पर खासी खुशी जाहिर की थी । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने तो और भी कमाल किया है । रोटरी फाउंडेशन व सीएसआर के पैसों की लूट के उद्देश्य से स्कूलों और स्कूली बच्चों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराए जा रहे क्लब के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील प्रकाश को दीपक गुप्ता ने अपनी टीम में बेसिक एजुकेशन एंड लिट्रेसी कमेटी का जोन चेयरमैन बनाया हुआ है । इस तरह जाहिर होता है और देखने में आया है कि रोटरी फाउंडेशन, सीएसआर तथा स्कूली बच्चों के पैसों व उनकी सुविधाओं की लूट करने वाले ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट के कई बड़े पदाधिकारियों/नेताओं के चहेते हैं ।
सुनील प्रकाश को संबोधित रोटरी फाउंडेशन की तरफ से भेजे गए पाँच पृष्ठीय पत्र में विस्तार से बताया गया है कि हरियाणा के छह स्कूलों में शौचालय, पीने के पानी और शिक्षा सुविधाओं के स्तर में सुधार के उद्देश्य से ग्लोबल ग्रांट ली गई थी, जिसके तहत नए शौचालय बनने थे; नए कंप्यूटर लगने थे; विज्ञान की प्रयोगशालाओं के लिए टेबल व रैक्स व स्टूल तथा क्लास रूम्स के लिए नए डेस्क्स आने थे; इन्वर्टर व यूपीएस लगने थे; आदि-इत्यादि । प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद रोटरी फाउंडेशन की ऑडिट टीम ने मौके पर जा कर जो जाँच की, उसमें लेकिन घपलेबाजी की पोल खुली । ऑडिट टीम ने पाया कि प्रोजेक्ट के तहत जो कुछ भी किया जाना था, उसमें से कुछ भी नहीं किया गया । नए शौचालय बनवाने की जगह पुराने बने शौचालयों की ही मरम्मत/पुताई करवा दी गई; नए कंप्यूटर, इन्वर्टर व यूपीएस देने/लगाने की जगह पुराने कंप्यूटर्स, इन्वर्टर व यूपीएस की ही सर्विस करवा दी गई; डेस्क, टेबल, रैक्स, स्टूल आदि के मामले में भी यही रवैया अपनाया गया । प्रोजेक्ट के सलाहकार की फीस के नाम पर करीब साढ़े तीन लाख रुपए खर्च दिखाए गए । ऑडिट टीम का निष्कर्ष रहा कि प्रोजेक्ट में जो जो काम करने की बात की गई थी, उनमें से कोई भी काम करने के उदाहरण नहीं मिले हैं । ऑडिट टीम की रिपोर्ट के आधार पर रोटरी फाउंडेशन ने सुनील प्रकाश को फैसला सुनाया है कि चूँकि प्रोजेक्ट के तहत बताए गए कोई काम नहीं हुए हैं, इसलिए विभिन्न मदों में दिखाए गए कुल खर्च के 30,85,085 रुपए वह रोटरी फाउंडेशन को 31 अगस्त तक वापस भेजें ।
रोटरी फाउंडेशन के पैसों के साथ की गई इस लूट का और भी गंभीर व सनसनीखेज पक्ष यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जेको एयरकॉन लिमिटेड से सीएसआर के तहत पैसा लिया गया । जो तथ्य इस बात को गंभीर व सनसनीखेज बनाता है, वह यह है कि सुनील प्रकाश इस कंपनी में डायरेक्टर हैं । सुनील प्रकाश के साथ प्रोजेक्ट कमेटी में जो दूसरे लोग सदस्य हैं, उनमें रवि सिंघल इसी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और नवनीत कुमार गुप्ता इसी कंपनी में एक अन्य डायरेक्टर हैं । रवि सिंघल पिछले रोटरी वर्ष में क्लब के प्रेसीडेंट थे, और नवनीत कुमार गुप्ता प्रेसीडेंट इलेक्ट हैं । क्लब में कुल 16 सदस्य हैं । यानि क्लब कुल मिलाकर इन्हीं तीन-चार लोगों का क्लब है । इस तरह कहानी यह बनी कि इनकी कंपनी इनके क्लब को सीएसआर के तहत पैसे देती है, जिसे दिखा कर यह रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम ले लेते हैं - और उसे हजम कर जाते हैं । इस तरह यह एक साथ सरकार से, रोटरी फाउंडेशन से और स्कूली बच्चों से धोखा करते हैं । सुनील प्रकाश, रवि सिंघल, नवनीत कुमार गुप्ता आदि बड़े लोग हैं, बड़े पैसे वाले लोग हैं, बड़ी बड़ी बातें करते हैं; यह स्कूली डेस्क, स्टूल, रैक्स, कंप्यूटर और शौचालयों के पैसों में चोरी-चकारी जैसा काम करेंगे - यह किसी ने नहीं सोचा था । लेकिन रोटरी फाउंडेशन से सुनील प्रकाश को संबोधित और भेजा गया पत्र इनकी सारी कारस्तानी की पोल खोल देता है और इनके मामले में 'नाम बड़े और दर्शन छोटे' वाली कहावत को चरितार्थ करता है । 

Sunday, April 21, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल एकेएस सदस्यता को लेकर तो फजीहत का शिकार हैं ही, अपनी हरकतों से उन्होंने अपने ही क्लब के एक बड़े प्रोजेक्ट को भी मुसीबत में फँसा दिया है

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की हरकतों के चलते रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के बड़े प्रोजेक्ट की नींव खुदने के साथ ही क्लब में झगड़ों और विवादों की भी शुरुआत हो गई है, जिसके चलते उक्त प्रोजेक्ट के खतरे में पड़ने की आशंका पैदा हो गई है । रमेश अग्रवाल एकेएस (ऑर्च क्लम्प सोसायटी) की सदस्यता का पैसा न देने के बाद भी एकेएस सदस्य के रूप में जगह जगह अपना स्वागत करवाने को लेकर भी इन दिनों फजीहत का शिकार बन रहे हैं; ऐसे में क्लब में पैदा हुआ नया झगड़ा उनकी मुश्किलों को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली अशोका ने अभी हाल ही में 'रोटरी हेल्थ एंड वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर' नाम से एक बड़े प्रोजेक्ट की आधारशिला रखने का कार्यक्रम आयोजित किया । करीब सात करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के बारे में जिसने भी सुना, उसने क्लब और क्लब के पदाधिकारियों तथा सदस्यों की भूरि भूरि प्रशंसा की; लेकिन प्रशंसा के दौर के बीच ही उक्त प्रोजेक्ट को लेकर क्लब के सदस्यों के बीच विवाद और झगड़े के स्वर भी सुनाई देने लगे । पता चला कि क्लब के पदाधिकारी और सदस्य आधारशिला रखने की पूजा में यजमान के रूप में रमेश अग्रवाल के बैठने को लेकर खासे खफा हैं । उनका कहना है कि प्रोजेक्ट चूँकि क्लब का है, इसलिए उक्त अधिकार क्लब के मौजूदा प्रेसीडेंट और या प्रेसीडेंट इलेक्ट को मिलना चाहिए था । रमेश अग्रवाल ने लेकिन जिस मनमाने तरीके से प्रेसीडेंट और प्रेसीडेंट इलेक्ट को किनारे धकेल कर अपनी पत्नी के साथ मुख्य भूमिका हथिया ली, उसके कारण क्लब के पदाधिकारियों तथा सदस्यों के बीच भारी नाराजगी है । मजे की बात यह रही कि उक्त मौके पर रमेश अग्रवाल ने क्लब के सदस्य - दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन को भी कोई तवज्जो देने की जरूरत नहीं समझी ।
क्लब के सदस्यों का आपसी बातचीत में कहना है कि उक्त प्रोजेक्ट के लिए क्लब के प्रायः सभी सदस्यों ने पैसे दिए हैं या देने की घोषणा की है; कई सदस्यों ने तो रमेश अग्रवाल से ज्यादा पैसे दिए हैं या देने की घोषणा की है - और इस आधार पर आधारशिला रखने की पूजा में उन्हें और या प्रेसीडेंट या प्रेसीडेंट इलेक्ट को बैठना चाहिए था; रमेश अग्रवाल आखिर किस हैसियत से अपनी पत्नी के साथ पूजा में बैठ गए । क्लब के सदस्यों की तरफ से इस तरह की बातें सुनकर रमेश अग्रवाल ने तुनक कर कह दिया है कि क्लब के सदस्यों को उनसे यदि इतनी ही चिढ़ है, तो वह प्रोजेक्ट से अलग हो जाते हैं और प्रोजेक्ट में पैसे का कोई सहयोग नहीं करेंगे । रमेश अग्रवाल की इस तुनकमिजाजी ने क्लब के कुछेक सदस्यों को भड़काने का काम किया और उनकी तरफ से सुना गया कि आधारशिला की पूजा में बैठ कर रमेश अग्रवाल ने अपने आप को प्रोजेक्ट का मुख्य कर्ता-धर्ता 'दिखा' ही दिया है, तो अब वही इस प्रोजेक्ट को पूरा करें और इसका पूरा पैसा दें । इस तरह की बातें प्रोजेक्ट को लेकर क्लब के सदस्यों के उत्साह पर पानी फेरती नजर आ रही हैं; और क्लब के संजीदा सदस्यों को लग रहा है कि रमेश अग्रवाल की मनमानी तथा तुनकभरी हरकतें कहीं प्रोजेक्ट को न ले डूबें ? क्लब के कई एक सदस्यों का स्पष्ट कहना है कि रमेश अग्रवाल यदि अपनी हरकतों से बाज नहीं आए, और क्लब के सभी सदस्यों के सहयोग से बनने वाले प्रोजेक्ट का अकेले श्रेय लेने की कोशिश करते रहे, तो फिर क्लब के कई सदस्य प्रोजेक्ट में सहयोग करने की घोषणा से पीछे हट जायेंगे ।
रमेश अग्रवाल इन्हीं दिनों एकेएस सदस्यता को लेकर भी विवादों की चपेट में हैं । दरअसल रमेश अग्रवाल ने तीन वर्ष पहले जेके गौड़ और सुभाष जैन के साथ एकेएस सदस्य बनने की घोषणा की थी और संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत तीन रोटरी वर्षों में - यानि 30 मार्च 2019 तक उन्हें पूरी रकम रोटरी फाउंडेशन में जमा करना थी । जेके गौड़ और सुभाष जैन तो अपनी अपनी रकम जमा कर चुके हैं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने करीब एक लाख अमेरिकी डॉलर की रकम रोकी हुई है । तथ्य बल्कि यह है कि पिछले रोटरी वर्ष में तथा मौजूदा रोटरी वर्ष में रमेश अग्रवाल ने एकेएस की सदस्यता का कोई पैसा जमा नहीं कराया है । रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारी उनसे तकादा भी कर चुके हैं, लेकिन फिर भी रमेश अग्रवाल के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है । यह बात यूँ तो ऐसी बात नहीं है जिसके लिए रमेश अग्रवाल की फजीहत की जाए - किसी भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में ऊँच-नीच हो सकती है जिसके कारण उसके लिए पहले से की गई घोषणाओं और या वायदों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है; लेकिन रमेश अग्रवाल के मामले में शर्मनाक स्थिति और फजीहत की बात इसलिए है कि समय से पूरा पैसा न दे पाने के बाद भी रमेश अग्रवाल एकेएस सदस्य के रूप में जगह जगह अपना स्वागत करवाते रहे हैं । पिछले दिनों ही, मार्च के पहले सप्ताह में दिल्ली में रोटरी फाउंडेशन ट्रस्ट के चेयरमैन रॉन बुर्टन के सामने रमेश अग्रवाल ने एकेएस सदस्य के रूप में अपना स्वागत करवाया और उनके साथ फोटो खिंचवाई । उस समय रमेश अग्रवाल को यह तो पता था ही कि संकल्पित समय-सीमा में वह पूरा पैसा नहीं दे रहे हैं और इसलिए उन्हें अपने आपको एकेएस सदस्य कहने का 'हक' नहीं है - फिर भी रमेश अग्रवाल ने अपनी फजीहत करवाने वाला काम किया । इसके साथ ही, क्लब के प्रोजेक्ट में खुद को सर्वे-सर्वा दिखलाने की रमेश अग्रवाल की कोशिश के चलते क्लब में मचे बबाल ने रमेश अग्रवाल की मुसीबतों को बढ़ाने का ही काम किया है ।             

Friday, August 17, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा की बदनामी और कभी किसी के काम न आने वाली अपनी छवि/पहचान के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए अपने पहले ही कार्यक्रम पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप जुटाना मुश्किल हो रहा है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए पेम वन के रूप में किया जाने वाला अपना पहला कार्यक्रम ही भारी मुसीबत बन गया है । उल्लेखनीय है कि 23 सितंबर को प्रस्तावित पेम वन के आयोजन के लिए करीब एक महीने का ही समय बचा रह गया है, लेकिन दीपक गुप्ता अभी तक पेम वन को स्पॉन्सर करने वाले क्लब्स ही तय नहीं कर पाए हैं, और जो क्लब स्पॉन्सर करने के लिए जबर्दस्ती राजी भी हुए हैं - या राजी करवाए गए हैं, वह पूरे दो लाख रुपए देने में आना-कानी कर रहे हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का ही कहना है कि पेम वन की स्पॉन्सरशिप को लेकर माहौल सब्जी बाजार जैसा बना हुआ है, जहाँ पैसों को लेकर भारी बारगेनिंग हो रही है - अधिकतर क्लब्स दो लाख रुपए देने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं । कई लोगों का कहना/पूछना है कि दीपक गुप्ता एक तरफ तो यह कहते/बताते हैं कि वह अपने कार्यक्रमों में सुभाष जैन के कार्यक्रमों जैसी तड़क-भड़क नहीं करेंगे - लेकिन पेम वन के लिए पैसे उनकी तुलना में करीब तीन गुना ले रहे हैं । उल्लेखनीय है कि सुभाष जैन ने अपने पेम वन के आयोजन को स्पॉन्सर करने वाले क्लब्स से 75 हजार रुपए लिए थे । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता को जब अपना कार्यक्रम सुभाष जैन की तरह भव्य तरीके से नहीं करना है, तो उन्हें तो उनसे भी कम पैसे लेने चाहिए - लेकिन वह उल्टा कर रहे हैं । कुछेक लोगों को लगता है कि दो लाख रुपए की रकम डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता को सुझाई होगी, और इस तरह अपनी जेब भरने का जुगाड़ किया होगा - लेकिन जो अब दीपक गुप्ता के लिए परेशानी का सबब बन गई है ।
दीपक गुप्ता को इस मामले में सबसे बड़ा झटका रोटरी क्लब दिल्ली विकास के प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा से लगा है । सुनील मल्होत्रा से अपनी नजदीकी का वास्ता देकर मुकेश अरनेजा ने उन्हें आश्वस्त किया था कि उनसे तो स्पॉन्सरशिप एक बार कहने से ही मिल जाएगी । दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा की जोड़ी ने सुनील मल्होत्रा को अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाने और समर्थन देने का लालच भी दिया हुआ है । इसके बावजूद, सुनील मल्होत्रा से उन्हें स्पॉन्सरशिप मिलती नहीं दिख रही है । रोटरी क्लब दिल्ली विकास में दरअसल प्रथा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के कार्यक्रमों में जो भी पैसा देना होता है, वह प्रेसीडेंट और प्रेसीडेंट इलेक्ट आधा-आधा अपनी अपनी जेब से देते हैं । दीपक गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह हुई है कि पेम वन के लिए प्रेसीडेंट इलेक्ट अरुण गुप्ता भी अपने हिस्से के एक लाख रुपए देने को तैयार नहीं हो रहे हैं । अरुण गुप्ता और सुनील मल्होत्रा ने दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा को बता दिया है कि वह दोनों मिल कर एक लाख रुपए ही दे पायेंगे । रोटरी क्लब दिल्ली विकास को डिस्ट्रिक्ट के एक बड़े और अच्छे क्लब के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जो अपने कार्यक्रमों को तो खासी भव्यता के साथ आयोजित करता ही है, डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेता है । प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अपने विभिन्न कार्यक्रमों में मदद और सहभागिता के लिए सबसे पहले रोटरी क्लब दिल्ली विकास के पदाधिकारियों की तरफ ही देखता है । इस नाते भी, और प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा की सक्रियता तथा अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उनकी चाहत को देखते हुए और मुकेश अरनेजा के साथ उनकी नजदीकी के चलते दीपक गुप्ता को पूरा विश्वास था कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास से तो उन्हें पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप की पूरी रकम आराम से मिल ही जाएगी । लेकिन उसमें भी उन्हें अड़ंगा लगता दिख रहा है ।
रोटरी क्लब दिल्ली विकास से मिले इस झटके का असर यह होता दिख रहा है कि स्पॉन्सरशिप के लिए राजी हुए अन्य क्लब्स के पदाधिकारियों ने भी दो लाख रुपए देने में आनाकानी करना शुरू कर दिया है और कोई पचास हजार तो कोई पिचहत्तर हजार और कोई एक लाख रुपए ही देने की बात कर रहा है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्होंने जिन मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया है, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी छवि बहुत ही खराब है, और लोगों को लगता है कि मुकेश अरनेजा ने रोटरी को जैसे अपना धंधा बना लिया है । डीआरएफसी के रूप में उन पर क्लब्स से पैसे ऐंठने के गंभीर आरोप रहे हैं । मुकेश अरनेजा दूसरों से तो हिसाब-किताब माँगने और दूसरों के हिसाब-किताब जाँचने में खूब दिलचस्पी लेते हैं, लेकिन अपने हिसाब-किताब देने में बचते-छिपते हैं । मुकेश अरनेजा पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर थे; पिछले रोटरी वर्ष में शरत जैन के गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर तो मुकेश अरनेजा रोटरी इंटरनेशनल तक जा पहुँचे थे, लेकिन सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर वह चुप्पी साधे हुए हैं । पेम वन के स्पॉन्सरशिप के लिए दो लाख रुपए प्रति क्लब की रकम तय करने में भी मुकेश अरनेजा की मिलीभगत को देखा/पहचाना जा रहा है । दीपक गुप्ता को इस मामले में 'अपने' असिस्टेंट गवर्नर्स से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है । इसके अलावा, लोगों के बीच अपनी बुरी पहचान के चलते भी दीपक गुप्ता को स्पॉन्सरशिप जुटाना मुश्किल हो रहा है । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता खुद चूँकि कभी किसी के काम नहीं आए हैं, इसलिए उनकी मदद करने तथा उनके कार्यक्रमों में सहभागिता करने को लेकर किसी में कोई उत्साह नहीं है । पेम वन के रूप में अपने पहले ही कार्यक्रम को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता जिस तरह से मुसीबत में घिर गए हैं, उसे देखते हुए उनके गवर्नर-काल को लेकर उनके अपने ही नजदीकी और शुभचिंतक आशंकित हो गए हैं ।

Thursday, June 14, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन द्वारा चेरिटेबल फाउंडेशन में की गई 'घपलेबाजी' में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को भी लपेटने के उद्देश्य से ऑडीटर राजेश मंगला निशाने पर लिए जा रहे हैं क्या ?

नई दिल्ली । निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन की घपलेबाजियों में सहयोग करने और या उनकी तरफ से आँख मूँद लेने के कारण चार्टर्ड एकाउंटेंट राजेश मंगला मुसीबत में फँसते दिख रहे हैं । राजेश मंगला ने रोटरी 3010 चेरिटेबल फाउंडेशन के एकाउंट्स ऑडिट किए हैं, और उन पर आरोप है कि ऐसा करते हुए उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3012 के एकाउंट्स का या तो संज्ञान ही नहीं लिया, और यदि लिया भी तो उसमें हुई 'घपलेबाजी' को अनदेखा करने का काम किया । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3010 के दो डिस्ट्रिक्ट्स में विभाजित होने के बाद भी उसका चेरिटेबल फाउंडेशन अलग अलग नहीं हुआ है और वह पूर्ववत ही चल रहा है । ऐसे में उसका जो एकाउंट बनता है, उसमें विभाजन के बाद बने दोनों डिस्ट्रिक्ट्स के एकाउंट जोड़ लिए जाते हैं । आरोप है कि ऑडिटर के रूप में राजेश मंगला ने डिस्ट्रिक्ट 3012 के एकाउंट का संज्ञान ही नहीं लिया; उन्होंने संज्ञान ले लिया होता तो शरत जैन की घपलेबाजियाँ पहले ही पकड़ ली जातीं, और मामला रोटरी इंटरनेशनल तक नहीं जाता । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की लीपापोती के चलते शरत जैन तो किसी बड़ी सजा से बच गए हैं, लेकिन इस मामले को उठाने तथा बनाये रखने में दिलचस्पी रखने वाले लोगों द्वारा अब राजेश मंगला को लपेटने की तैयारी करते सुना जा रहा है । सुना जा रहा है कि रोटरी के पैसों में की गई घपलेबाजी में 'सहयोग' करने तथा अपने काम में लापरवाही बरतने के लिए राजेश मंगला की शिकायत चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में करने की तैयारी की जा रही है । राजेश मंगला को फँसाने के पीछे उद्देश्य दरअसल एक तीर से दो निशाने साधने का भी है; राजेश मंगला को फँसा कर शरत जैन के साथ साथ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को भी परेशान करने की तैयारी है । उल्लेखनीय है कि राजेश मंगला अभी कुछ समय पहले तक अपनी फर्म के साथ साथ विनोद बंसल की फर्म में भी पार्टनर थे, और समझा जाता है कि ऑडिट का यह काम उन्हें विनोद बंसल ने ही दिलवाया था; इसलिए राजेश मंगला के लिए मुसीबत खड़ी करने की तैयारी में लगे लोगों को लगता है कि इसके कुछ छीटें विनोद बंसल पर भी पड़ेंगे ही और उनकी भी किरकिरी होगी ही । 
राजेश मंगला की तरफ से हालाँकि दावा किया जा रहा है कि उन पर जो आरोप लगाया जा रहा है, वही इस बात का सुबूत है कि आरोप लगाने वालों को एकाउंटिंग व्यवस्था की जानकारी नहीं है; उनकी तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि उन्होंने जो एकाउंट हस्ताक्षर किए हैं, उनमें दोनों डिस्ट्रिक्ट के एकाउंट जोड़ दिए गए हैं तथा उन्होंने न कुछ छिपाया है और न कोई लापरवाही की है । उनकी तरफ से जो कुछ कहा/सुना जा रहा है, उसमें यह बात तो सामने आई है कि शरत जैन ने अपने एकाउंट देने में लेटलतीफी की और उन्हें बहुत छकाया, लेकिन उसके बावजूद ऑडीटर के रूप में उन्होंने अपना काम नियमानुसार किया है और इस मामले में उनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है । राजेश मंगला को निशाने पर लेने की तैयारी कर रहे लोगों का कहना लेकिन यह है कि ऑडीटर के रूप में राजेश मंगला ने अपना काम यदि ठीक से किया होता, तो रोटरी इंटरनेशनल को शरत जैन पर प्रतिकूल टिप्पणी करने की जरूरत नहीं पड़ती । रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से शरत जैन हालाँकि बड़ी सजा से तो बच गए हैं, लेकिन उनके एकाउंट पर रोटरी इंटरनेशनल ने जो प्रतिकूल टिप्पणी की है - उसके लिए राजेश मंगला अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं । आखिर शरत जैन के एकाउंट में जिस अनियमितता को रोटरी इंटरनेशनल ने 'पकड़ा' और रेखांकित किया है, उसे ऑडीटर के रूप में राजेश मंगला को पकड़ना व रेखांकित करना चाहिए था - जो काम में लापरवाही के चलते उन्होंने नहीं किया ।
डिस्ट्रिक्ट 3012 का चेरिटेबल फाउंडेशन का एकाउंट गाजियाबाद में पंजाब नेशनल बैंक की राजनगर शाखा में है । राजेश मंगला ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में लेकिन इस एकाउंट का कोई जिक्र नहीं किया है । उनकी तरफ से बताया गया है कि उन्होंने इस अकाउंट की रकम हिसाब में जोड़ ली है । उनका यह दावा लेकिन संदेह इसलिए पैदा करता है क्योंकि अपनी रिपोर्ट में जब वह बैंक ऑफ इंडिया तथा बैंक ऑफ बड़ौदा के चार एकाउंट्स का अलग अलग विवरण दे रहे हैं, तो फिर पंजाब नेशनल बैंक के एकाउंट का विवरण अलग से देने से क्यों बचा गया ? यह संदेह इसलिए और पुष्ट होता है, क्योंकि पंजाब नेशनल बैंक के ही एकाउंट में पैसों की घपलेबाजियाँ हैं और नियमविरुद्ध ट्रांसफर्स हैं, जिनके लिए शरत जैन को रोटरी इंटरनेशनल से लताड़ पड़ी है । इस मामले में ऑडीटर के रूप में राजेश मंगला पर आरोप इसीलिए बनता है कि यदि उन्होंने अपने काम में लापरवाही नहीं की होती और डिस्ट्रिक्ट 3012 के पंजाब नेशनल बैंक के एकाउंट को देख भर लिया होता, और उसका संज्ञान लिया होता तो शरत जैन की घपलेबाजी को वह शुरू में ही पकड़ लेते और मामला ऊपर तक जाने की नौबत नहीं आती ।

Friday, May 4, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन को घपलेबाजी के आरोपों से बचाने में सुशील गुप्ता की मदद ले पाने में रमेश अग्रवाल के विफल रहने के बाद डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सवाल गंभीर हुआ कि शरत जैन का भी हाल कहीं सतीश सिंघल जैसा ही तो नहीं होगा ?

नई दिल्ली । रोटरी फाउंडेशन के नाम पर इकट्ठा किए गए पैसों में हेराफेरी करने और फिर उनकी बंदरबाँट करने के आरोप में डिस्ट्रिक्ट 3012 के पिछले वर्ष के गवर्नर शरत जैन के खिलाफ जाँच पूरी हो गई है, और जाँच करने वाली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय को सौंप दी है - माना जा रहा है कि उक्त जाँच रिपोर्ट के आधार पर रोटरी इंटरनेशनल का फैसला जल्दी ही आ जायेगा । जाँच कमेटी के सामने जिन जिन लोगों को अपना अपना पक्ष रखने का मौका मिला, संभावित फैसले को लेकर उनकी राय बँटी हुई है, कुछ लोग यह मान रहे हैं कि कमेटी के सदस्यों ने रोटरी फाउंडेशन के पैसों को लेकर शरत जैन के पार्ट पर व्यवस्था संबंधी गड़बड़ियाँ तो पाई है और माना/कहा है कि पैसों का हिसाब-किताब रखने में शरत जैन ने न तो नियमितता रखी और न पारदर्शिता दिखाई, लेकिन बेईमानी होने/करने के कमेटी को कोई सुबूत नहीं मिले; जबकि अन्य कुछ लोगों का कहना/बताना है कि कमेटी के सदस्यों ने शरत जैन के हिसाब-किताब में जो अनियमितता तथा व्यवस्था संबंधी गड़बड़ियाँ पाई है, उन्हें बेईमानी करने के इरादे से ही 'की गई' गड़बड़ियों के रूप में देखा/पाया है । कमेटी के सामने चूँकि सबसे ज्यादा समय शरत जैन का लगा, लिहाजा उसे लेकर भी परस्पर विरोधी आकलन हैं । कुछेक लोगों का कहना है कि शरत जैन को कमेटी के सदस्यों के सामने ज्यादा समय इसीलिए लगा, क्योंकि उन्होंने एक एक मुद्दे पर अपनी सफाई दी और सुबूत रखे - जिन्हें देखने/सुनने में कमेटी के सदस्यों ने भी दिलचस्पी दिखाई; जबकि अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि शरत जैन को कमेटी के सदस्यों के सामने ज्यादा समय इसलिए लगा, क्योंकि उनके पास शरत जैन से पूछने के लिए बहुत सारे सवाल थे और शरत जैन को उनका जबाव देने में मुश्किल आ रही थी । इसी आधार पर कुछ लोगों को लगता है कि शरत जैन का कुछ नहीं होगा, और ज्यादा से ज्यादा एक नसीहत या एक फटकार देकर उन्हें छोड़ दिया जायेगा; लेकिन कुछ अन्य लोगों को लगता है कि शरत जैन का गुनाह सतीश सिंघल से भी गंभीर है, और इसलिए रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय उन्हें भी सतीश सिंघल के 'रास्ते' पर ही भेजेगा - और सख्त कार्रवाई करते हुए शरत जैन से भी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने का अधिकार छीन लिया जायेगा ।
इस बीच शरत जैन के मामले ने रोटरी के बड़े सर्कल में राजनीतिक रंग भी ले लिया है, जो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की बयानबाजी के चलते हुआ । दरअसल रमेश अग्रवाल ने यह कहते/बताते हुए शरत जैन और अपने लिए सहानुभूति जुटाने का प्रयास किया कि कुछ लोग रोटरी में उनके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए शरत जैन को बली का बकरा बना रहे हैं । रमेश अग्रवाल ने अपने कुछेक नजदीकियों को बताया है कि वह पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता से मिले संकेतों के आधार पर यह बात कह रहे हैं । सुशील गुप्ता के नजदीकियों का कहना/बताना है कि शरत जैन को बचाने/बचवाने में रमेश अग्रवाल ने सुशील गुप्ता की मदद लेने की कोशिश की थी, लेकिन सुशील गुप्ता ने यह कहते हुए इस पचड़े में पड़ने से साफ इंकार कर दिया कि इंटरनेशनल वाइस प्रेसिडेंट पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के चलते उनके लिए इस मामले में दिलचस्पी लेना उचित नहीं होगा । समझा जाता है कि इसी बातचीत में सुशील गुप्ता ने रमेश अग्रवाल से ऐसा कुछ कहा/बताया होगा, जिससे रमेश अग्रवाल को लगा है कि रोटरी में उनके आगे बढ़ने के रास्ते को रोकने के लिए कुछेक लोगों ने शरत जैन के मामले को एक मौके के रूप में देखा/पहचाना है - और शरत जैन के बहाने उन्होंने रमेश अग्रवाल का शिकार करने की तैयारी कर ली है । कुछेक लोगों को लगता है कि इस तरह की बातें करके रमेश अग्रवाल ने पहले से ही अपने बचाव की तैयारी शुरू की है । रमेश अग्रवाल को डर है कि शरत जैन को यदि 'सजा' हुई तो उसके छीटें उन पर भी पड़ेंगे, क्योंकि शरत जैन के गवर्नर-काल में वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर थे और उस नाते शरत जैन द्वारा की गई अनियमितताओं और बेईमानियों में उनकी भी मिलीभगत मानी जाएगी । 
मजे की बात यह है कि शरत जैन जिस मुसीबत में घिरे/फँसे हैं, उसे उन्होंने अपनी 'होशियारी' दिखाने के चक्कर में खुद ही आमंत्रित किया है । रोटरी फाउंडेशन के लिए फंड इकट्ठा करने हेतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन ने जो बॉल की, उसमें शुरू से ही शरत जैन की पैंतरेबाजी और बेईमानी देखी/पहचानी गई । शरत जैन ने फाउंडेशन बॉल का आयोजन वास्तव में किया ही नहीं; इसे उन्होंने रोटरी क्लब दिल्ली निरवाना के एक कार्यक्रम के साथ जोड़ दिया था । वह जो कार्यक्रम था, उसकी 'प्रकृति' फाउंडेशन बॉल के लिए उपयुक्त थी ही नहीं - लेकिन शरत जैन ने इस बात की परवाह ही नहीं की । आरोप लगा कि इस तरह शरत जैन ने कार्यक्रम आयोजित करने में होने वाले खर्च में हेराफेरी कर ली । इसके बाद शरत जैन के बड़बोलेपन ने उनकी मुसीबत बढ़ाने का काम किया । फाउंडेशन बॉल का तथाकथित आयोजन हो जाने के बाद शरत जैन ने बढ़चढ़ कर दावा किया कि उनकी बॉल में तीन हजार से ज्यादा लोग आए । उनके इस दावे के आधार पर लोगों ने गणना कर ली कि बॉल में शामिल होने के लिए चूँकि छह हजार रुपए का रजिस्ट्रेशन रखा गया था, इसलिए उनकी बॉल में एक करोड़ 80 लाख रुपए आ गए । लेकिन शरत जैन ने करीब 20 लाख रुपए ही दिखाए । बाकी रकम के लिए पूछा गया, तो शरत जैन अपने दावे से पलट गए और कहने/बताने लगे कि तीन हजार लोगों की गिनती तो उन्होंने कार्यक्रम में आये बच्चों को भी शामिल करके बताई थी, और रजिस्ट्रेशन वाले लोगों की संख्या तो तीन सौ के करीब ही थी । शरत जैन द्वारा गोलमोल बातें करने से लोगों का शक बढ़ा, तो कुछेक लोगों ने अपने अपने स्तर पर जाँच-पड़ताल की ।
जाँच-पड़ताल में शरत जैन के कारनामों का चौंकाने वाला खुलासा हुआ । आरोपों के अनुसार, रोटरी फाउंडेशन के लिए जो पैसा शरत जैन को 'रोटरी फाउंडेशन इंडिया' के नाम पर लेना था और या उसमें जमा करना था, वह पैसा पहले उन्होंने डिस्ट्रिक्ट ट्रस्ट में जमा कराया, वहाँ से वह पैसा उन्होंने एक गैर रोटरी ट्रस्ट में ट्रांसफर किया और वहाँ से फिर वह रोटरी फाउंडेशन इंडिया में गया । रोटरी फाउंडेशन के पैसे को इतनी चहल-कदमी करवाने के पीछे शरत जैन का क्या उद्देश्य रहा होगा, यह तो वही जानते होंगे; लोगों को लेकिन इसमें बड़ा गड़बड़झाला लगा । शरत जैन की तरफ से कुछेक जरूरी सरकारी नियमों के पूरा न होने को इसका कारण बताया गया । लोगों को यह कारण लेकिन हजम नहीं हुआ; उनका कहना रहा कि शरत जैन को उक्त जरूरी सरकारी नियमों को पूरा करवा लेना चाहिए था । आरोप के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन ने दोहरा अपराध किया - पहले तो उन्होंने जरूरी सरकारी नियमों को पूरा नहीं किया, और फिर इसका वास्ता देकर गड़बड़झाले को जस्टीफाई करने की कोशिश की । बॉल के लिए स्पॉन्सर्स से जो पैसे लिए गए थे, उनके रिकॉर्ड्स में भी हेराफेरी के आरोप लगे । रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत हुई, तो इंटरनेशनल पदाधिकारियों ने आरोपों को गंभीर माना और जाँच के योग्य पाया । जाँच के लिए कमेटी गठित की, और जैसा कि शुरू में ही बताया जा चुका है कि कमेटी ने अपनी रिपोर्ट रोटरी इंटरनेशनल को सौंप दी है । रमेश अग्रवाल ने इस मामले को जो राजनीतिक रंग दिया है, उसके चलते जाँच रिपोर्ट पर लिए जाने वाले फैसले का खास महत्त्व हो गया है । ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि शरत जैन बचते हैं, या सतीश सिंघल की 'दशा' को प्राप्त होते हैं ?

Friday, December 22, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा और शरत जैन की लड़ाई के चलते मुसीबत में फँसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल संगी-साथियों के किनारा कर लेने और या मजे लेने के कारण मुसीबत से निपटने के मामले में अकेले भी पड़े

नोएडा । मुकेश अरनेजा, जेके गौड़, दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता आदि की दोस्ती नोएडा रोटरी ब्लड बैंक के मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की मुसीबतों को अंततः बढ़ाने वाली साबित हुई है क्या ? मजे की बात यह है कि सतीश सिंघल के विरोधियों का ही नहीं, उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का भी मानना कहना है कि सतीश सिंघल की मौजूदा मुसीबत के लिए अलग-अलग कारणों से उनके यह दोस्त ही जिम्मेदार हैं । लोगों का कहना है कि सतीश सिंघल पर जिस तरह के आरोप हैं, जेके गौड़ पर रोटरी वरदान ब्लड बैंक के मामले में उसकी तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर आरोप थे - लेकिन जेके गौड़ को वैसी मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ा, जैसी मुसीबत में सतीश सिंघल फँसे हैं । कुछ लोगों का यह भी मानना और कहना है कि अपने आप को मुसीबत में घिरता देख जेके गौड़ ने जिस होशियारी से मामले को हैंडल किया, वैसी होशियारी सतीश सिंघल नहीं दिखा सके - और मुसीबत में घिर गए । एक दिलचस्प संयोग यह है कि जेके गौड़ को बेईमानी के कीचड़ में लथेड़ने की तैयारी मुकेश अरनेजा ने की थी, जिसमें उनके मददगार की भूमिका में सतीश सिंघल, दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता थे; और अब जब सतीश सिंघल नोएडा रोटरी ब्लड बैंक के मामले में आरोपों के घेरे में फँसे हैं - तो अलग अलग कारणों से मुकेश अरनेजा, जेके गौड़, दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता को जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है ।
सतीश सिंघल के खिलाफ सतीश सिंघल के क्लब के पदाधिकारियों और प्रमुख सदस्यों को 'चार्ज' करने के पीछे शरत जैन की तिकड़म को पहचाना गया है, जिन्होंने मुकेश अरनेजा से बदला लेने के लिए इसे रचा है । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा ने शरत जैन के गवर्नर-काल के एकाउंट्स को लेकर पंगा डाला हुआ है, जिसके चलते शरत जैन के गवर्नर-काल के एकाउंट्स विवाद में पड़ गए हैं और वह अभी तक पास नहीं हो पा रहे हैं । इस कारण से शरत जैन बदनामी के घेरे में हैं । इस घेरे से निकलने के लिए शरत जैन ने सतीश सिंघल से मदद की उम्मीद की थी, उनकी तरफ से सतीश सिंघल को संदेश भिजवाया गया था कि आप भी तो गवर्नर हो, आपके गवर्नर-काल के एकाउंट्स को भी तो पास करवाने की जरूरत पड़ेगी । शरत जैन की तरफ से दिए जा रहे इस संदेश में अप्रत्यक्ष रूप से धमकी वाला भाव रहा कि इस वर्ष एकाउंट्स पास होने में यदि हील-हुज्जत हुई, तो अगले रोटरी वर्ष में फिर 'देख लेना' । उल्लेखनीय है कि अगले रोटरी वर्ष में शरत जैन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर होंगे । शरत जैन की तरफ से मिले इस संदेश की सतीश सिंघल ने शायद यह सोच कर कोई परवाह नहीं की कि वह भला 'कहाँ' पकड़े जायेंगे और उन्हें भला कौन पकड़ सकेगा ? सतीश सिंघल को 'देख लेने' के लिए लेकिन शरत जैन को अगले वर्ष तक इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ी - क्योंकि सतीश सिंघल की बदकिस्मती से, सतीश सिंघल जिस नोएडा रोटरी ब्लड बैंक को अपना अजेय दुर्ग समझे बैठे थे, उसकी दीवारों में हलचल हो गई और उन्हें उस दुर्ग से बाहर कर दिया गया । बात वहीं तक रह गई होती, तो ज्यादा बबाल न होता; ब्लड बैंक के नाम पर जिस तरह जेके गौड़ द्वारा किए गए कुकर्मों पर पर्दा पड़ गया, वैसे ही सतीश सिंघल का किया-धरा भी दब-छिप जाता - यदि नोएडा रोटरी ब्लड बैंक की लड़ाई की आग की आँच सतीश सिंघल के क्लब तक न आती । इस काम को करने के पीछे शरत जैन की तिकड़म को देखा/पहचाना जा रहा है ।
शरत जैन के नजदीकियों का कहना है कि अभी हाल ही में हुई काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में शरत जैन की तरफ से मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल को समझाने के प्रयास हुए थे कि वह उनके गवर्नर-काल के एकाउंट्स को पास करने/करवाने के मामले में अड़ंगा न डालें, अन्यथा उनके लिए भी आगे का रास्ता आसान नहीं होगा । शरत जैन बेचारे की छवि कुछ ऐसी 'सॉफ्ट' सी है कि कोई उनकी धमकी को गंभीरता से लेता ही नहीं है; मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने भी नहीं ली - नहीं ली, तो शरत जैन ने अपनी धमकी को चरितार्थ कर दिखाया । सतीश सिंघल के लिए बदकिस्मती की बात यह है कि उनकी मुसीबत में मुकेश अरनेजा भी मजे ले रहे हैं । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल खेमे के लोगों का ही कहना/बताना है कि सतीश सिंघल को मुसीबत में फँसा/घिरा देख मुकेश अरनेजा ने इसलिए राहत महसूस की है कि अब डीआरएफसी के रूप में क्लब्स को ग्रांट्स अलॉट करने के मामले में वह खुली मनमानी और बेईमानी कर सकेंगे । उन्हें शिकायत रही कि इस मामले में सतीश सिंघल कुछ न कुछ अड़ंगा लगाए रखते हैं । मुकेश अरनेजा के लिए समस्या की बात यह रही कि डीआरएफसी के रूप में वह सतीश सिंघल के साथ वैसा रवैया भी नहीं दिखा पा रहे थे, जैसा उन्होंने शरत जैन के साथ दिखाया । ऐसे में, मुकेश अरनेजा के लिए यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी कि डीआरएफसी के रूप में मनमानी व अकेले ही लूटखसोट करने के लिए वह कैसे सतीश सिंघल को रास्ते से हटाएँ या किनारे करें ? इसलिए ही सतीश सिंघल का मुसीबत में फँसना मुकेश अरनेजा को वरदान की तरह लगा है । और यही कारण है कि मुसीबत के समय सतीश सिंघल के साथ खड़े होने और उनके बचाव के लिए प्रयास करने की बजाए, मुकेश अरनेजा मजे लेते देखे/सुने जा रहे हैं ।
जेके गौड़ तो मजा लेने के 'मोड' से आगे की दशा में हैं - सतीश सिंघल की मुसीबत में उन्हें जैसे अपना बदला मिल गया है । रोटरी वरदान ब्लड बैंक के मामले में जेके गौड़ जब मुकेश अरनेजा के हाथों फजीहत का शिकार बन रहे थे, तब सतीश सिंघल ने जो रवैया दिखाया हुआ था - उससे जेके गौड़ बुरी तरह आहत रहे हैं । दरअसल उस फजीहत के पीछे जेके गौड़ ने सतीश सिंघल को ही चिन्हित किया हुआ था । उल्लेखनीय है कि रोटरी वरदान ब्लड बैंक को लगाने/लगवाने के काम में जेके गौड़ ने शुरू में सतीश सिंघल की मदद ली हुई थी, लेकिन बाद में फिर उन्होंने सतीश सिंघल को अलग कर दिया । जेके गौड़ का कहना था कि इसी बात से चिढ़ कर सतीश सिंघल ने मुकेश अरनेजा को ऐसे तथ्य बताए, जिनकी आड़ में मुकेश अरनेजा ने उनके लिए परेशानियाँ खड़ी कीं तथा जो उनके लिए फजीहत के कारण बने । इसीलिए जेके गौड़ को लग रहा है कि सतीश सिंघल के साथ जो हो रहा है, उससे उनका बदला पूरा हो गया है । दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जितवाने के लिए की गई कार्रवाइयों से सतीश सिंघल ने जिन तमाम लोगों को अपना विरोधी बना लिया है, वह सभी सतीश सिंघल की मुसीबतों में चटखारे तो ले ही रहे हैं - उनकी मुसीबतों को भड़काने में भी लगे हुए हैं । सतीश सिंघल के लिए बदकिस्मती की बात यह है कि दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता भी उनकी मदद करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । दीपक गुप्ता तो कुछेक जगह यह कहते हुए भी सुने गए हैं कि सतीश सिंघल ने जो बोया है, वह तो उन्हें काटना ही पड़ेगा न । आलोक गुप्ता की समस्या दूसरी है : कुछेक लोगों का कहना है कि सतीश सिंघल की मुसीबत को बढ़ाने में जिस तरह से उनके विरोधी और साथी एक हो गए हैं, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट 3100 की तर्ज पर कहीं उनकी गवर्नरी खतरे में न पड़ जाए और उनके गवर्नर-वर्ष में हुआ चुनाव रद्द न हो जाए । इसलिए आलोक गुप्ता ने अपने आपको सतीश सिंघल के साथ और या उनके नजदीक 'दिखने' से बचना शुरू कर दिया है ।
पहले नोएडा रोटरी ब्लड बैंक में और फिर अपने ही क्लब में मुसीबतों के निशाने पर आए सतीश सिंघल के लिए चुनौती की बात यही है कि लगभग जिस तरह के आरोपों के बावजूद जेके गौड़ और शरत जैन बेदाग़ बने हुए हैं, वह भी कैसे अपने पर लगे दागों को मिटाएँ/छिपाएँ और अपनी इज्जत बचाएँ ?

Wednesday, July 12, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अवॉर्ड मिलने के जोश में 'अगले कदम' पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की घोषणा करके गायब हो जाने वाले प्रशांत माथुर ने ललित खन्ना को बड़ी राहत दी

नई दिल्ली । प्रशांत माथुर तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का शिगूफा छोड़ कर गायब हो गए हैं, लेकिन ललित खन्ना का काम बढ़ा गए हैं । ललित खन्ना के लिए यह काम और बढ़ गया है कि वह लोगों को बताएँ कि प्रशांत माथुर जिन नेताओं के भरोसे उम्मीदवार होने की सोच रहे थे, उन नेताओं का समर्थन चूँकि उनके साथ ही है - इसलिए प्रशांत माथुर की उम्मीदवारी की संभावना नहीं है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि दो खेमों के बीच होता है - इसलिए प्रशांत माथुर की उम्मीदवारी की घोषणा ने लोगों के बीच ललित खन्ना की उम्मीदवारी पर सवाल खड़े कर दिए थे । ललित खन्ना और प्रशांत माथुर चूँकि एक ही खेमे के साथ 'देखे/पहचाने' जाते हैं; और ललित खन्ना की उम्मीदवारी चूँकि पहले से ही चर्चा में है - इसलिए प्रशांत माथुर की अचानक घोषित हुई उम्मीदवारी से लोगों को आभास मिला कि जैसे खेमे के नेता ललित खन्ना की उम्मीदवारी की 'चाल' से खुश नहीं हैं और उनके ही कहने पर प्रशांत माथुर ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की है । इससे ललित खन्ना के सामने लोगों के बीच खेमे के नेताओं के समर्थन का भरोसा बनाए रखने की चुनौती पैदा हुई । घोषणा करने के बाद से प्रशांत माथुर चूँकि एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, इसलिए ललित खन्ना का काम आसान तो हुआ है - लेकिन प्रशांत माथुर की घोषणा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में उन्हें जो नुकसान पहुँचाया है, जल्दी से जल्दी उसकी भरपाई करना उनके लिए एक चुनौती की बात तो है ही ।
प्रशांत माथुर के रवैये ने भी लोगों को हैरान किया है । उन्हें एक जिम्मेदार व्यक्ति व रोटेरियन के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इसीलिए उन्होंने जब अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की तो उनकी घोषणा को लोगों ने गंभीरता से लिया - लेकिन फिर जल्दी ही देखा/पाया गया कि प्रशांत माथुर अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही गंभीर नहीं हैं । उनके कुछेक नजदीकियों ने हालाँकि दावा किया था कि वह चुनावी राजनीति की मुश्किलों से परिचित हैं, वह कॉर्पोरेट राजनीति में संलग्न रहते हैं और इसलिए भी राजनीति करने के तौर-तरीकों को जानते/समझते हैं - इस कारण से एक उम्मीदवार के रूप में वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में एक दमदार खिलाड़ी साबित होंगे । प्रशांत माथुर लेकिन उम्मीदवारी की घोषणा करके गायब ही हो गए हैं - इससे लोगों ने यही समझा है कि जोश जोश में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा तो कर दी, लेकिन जब यह देखा/समझा कि उम्मीदवारी को निभाना 'आग का दरिया है, जिसे तैर कर पार करना' है तो फिर वह तुरंत ही पीछे हट गए । लोगों ने यह भी माना/कहा कि प्रशांत माथुर ने जिस अचानक तरीके से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की थी, उससे भी लगा था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति की बुनियादी तासीर से वह जरा भी परिचित नहीं हैं और बस अवॉर्ड के जोश में आकर उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी ।
प्रशांत माथुर के कुछेक नजदीकियों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में शरत जैन से प्रशांत माथुर को 'सर्विस अबव सेल्फ' का जो अवार्ड मिला और उस पर जो तालियाँ बजीं - तो प्रशांत माथुर की आँखों में गवर्नर की कुर्सी चमक उठी । रोटरी में यह बड़ी आम घटना है : रोटरी की कार्यप्रणाली और इसमें का माहौल कई लोगों को खुद के महत्त्वपूर्ण होने का आभासी/झूठा अहसास कराता है; कुछ लोग इसे असली समझ बैठते हैं - और तब वह अपने आप को गवर्नर से कम समझने को राजी नहीं होते । लगता है कि प्रशांत माथुर भी इसी मृगमरीचिका का शिकार हुए और 'नेक्स्ट स्टेप इन रोटरी' के रूप में गवर्नर पद पर दावा कर बैठे । यह दावा करने के बाद वह दो-एक कार्यक्रमों में तो दिखाई दिए, लेकिन फिर पूरी तरह गायब ही हो गए । लोग उनके नजदीकियों से पूछ रहे हैं कि भई प्रशांत माथुर को गवर्नर बनना है, लेकिन वह हैं कहाँ ? नजदीकी परेशान हैं कि वह भला क्या जबाव दें ? प्रशांत माथुर के नजदीकियों से ज्यादा ललित खन्ना के लिए परेशानी खड़ी हुई है और उन्हें इस बात पर सफाई देनी पड़ रही है कि जिस खेमे का समर्थन उन्हें मिलने की बात हो रही है, उस खेमे की तरफ से प्रशांत माथुर कैसे और क्यों अपनी उम्मीदवारी की बात करने लगे हैं ? प्रशांत माथुर के सीन से गायब हो जाने के कारण ललित खन्ना को जबाव देने में आसानी तो हो गई है, लेकिन फिर भी प्रशांत माथुर की जोशबाजी के कारण ललित खन्ना पर जबाव देने का अतिरिक्त बोझ तो आ ही पड़ा है ।

Sunday, July 2, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डीडीएफ डोनेशन के लिए दीपक गुप्ता को वोट देने का सौदा करने वाले क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को मुकेश अरनेजा ने अंततः धोखा ही दिया

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा के कारण डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स रोटरी फाउंडेशन ट्रस्ट से मिलने वाले डीडीएफ डोनेशन से वंचित रह गए हैं और इस तरह तमाम क्लब्स द्वारा तैयार किए गए विभिन्न प्रोजेक्ट्स शुरू होने से पहले ही दम तोड़ गए हैं । मजे की और विडंबना की बात यह रही कि अधिकतर ऐसे क्लब्स भी डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन कमेटी चेयरमैन के रूप में मुकेश अरनेजा के कारण डीडीएफ डोनेशन पाने से वंचित हुए, जिन्होंने मुकेश अरनेजा के साथ दीपक गुप्ता को वोट देने की सौदेबाजी की थी । ऐसे क्लब्स के पदाधिकारी ही अब शिकायत करते सुने जा रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा ने उनसे वायदा किया था कि वह यदि दीपक गुप्ता को वोट देंगे, तो वह डीडीएफ डोनेशन के उनके आवेदनों को जल्दी से जल्दी क्लियर कर देंगे । ऐसे क्लब्स के पदाधिकारियों की शिकायत है कि लेकिन जब डीडीएफ डोनेशन के आवेदनों को क्लियर करने का समय आया, तो मुकेश अरनेजा तो अपने वायदे को भुला ही बैठे - दीपक गुप्ता ने भी यह कहते हुए उनसे मुँह मोड़ लिया कि तुम्हारे और मुकेश अरनेजा के बीच क्या 'सौदा' हुआ था, उसके बारे में मुझे भला क्या पता है ? अपना काम निकल जाने के बाद मुकेश अरनेजा और दीपक गुप्ता ने जिस तरह से क्लब्स के पदाधिकारियों से किए गए वायदे/सौदे से किनारा किया है, उससे क्लब्स के पदाधिकारियों ने अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है ।
आरोप सुने जा रहे हैं कि क्लब्स के डीडीएफ डोनेशन के आवेदन क्लियर करने के लिए मुकेश अरनेजा 'रिश्वत' चाहते थे, जिसके न मिलने पर उन्होंने आवेदनों को क्लियर नहीं किया । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा डीडीएफ डोनेशन को क्लब्स के पदाधिकारियों का खाने/कमाने का जरिया कहते/बताते रहे हैं; क्लब्स के पदाधिकारियों से वह कहते भी रहे हैं कि डीडीएफ डोनेशन को उन्हें मिल-बाँट कर खाना चाहिए - चर्चाओं के अनुसार, कुछेक क्लब्स के पदाधिकारी मुकेश अरनेजा को उनका 'हिस्सा' देने को तैयार भी हो गए थे, लेकिन लेना-देना व्यावहारिक रूप नहीं ले सका । दरअसल डीडीएफ डोनेशन लेने वाले क्लब्स दो खेमों में बँटते हैं - एक खेमे में ऐसे क्लब्स आते हैं, जो ईमानदारी से डीडीएफ डोनेशन का उपयोग करना चाहते हैं और करते भी हैं; दूसरे खेमे में ऐसे क्लब्स आते हैं जिनके प्रेसीडेंट डीडीएफ डोनेशन को जेब भरने का जरिया समझते हैं । चर्चाओं के अनुसार, पहले खेमे के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स मुकेश अरनेजा की डिमांड पूरी करने के लिए तैयार नहीं हुए; और दूसरे खेमे के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स ने डीडीएफ डोनेशन मिलने के बाद मुकेश अरनेजा को उनका हिस्सा देने की बात कही - मुकेश अरनेजा लेकिन उसके लिए तैयार नहीं हुए, वह डीडीएफ डोनेशन के आवेदन को क्लियर करने से पहले अपना हिस्सा ले लेना चाहते थे । इस चक्कर में मुकेश अरनेजा ने डीडीएफ डोनेशन के आवेदनों को क्लियर नहीं किया, और क्लब्स के प्रोजेक्ट बेमौत ही मर गए ।
रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ अधिकारियों ने हालाँकि व्यवस्था दी थी कि डीडीएफ डोनेशन के आवेदनों को डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन कमेटी का चेयरमैन मनमाने तरीके से नहीं रोक सकता है, वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का नुमाइंदा होता है और इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की हरी झंडी मिलने के बाद उसकी निर्णायक भूमिका ज्यादा नहीं रह जाती है; लेकिन अपनी बेशर्मी और निर्लज्जता के लिए कुख्यात मुकेश अरनेजा ने इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों की इस नसीहत की भी परवाह नहीं की, और तरह तरह की बहानेबाजियों से डीडीएफ डोनेशन के आवेदनों को क्लियर करने से इंकार कर दिया । रोटरी वर्ष के अंतिम दिनों में ग्लोबल ग्रांट के आवेदनों को उन्होंने जिस आनन-फानन में क्लियर किया है, उससे लोगों को यह कहने का मौका मिला है कि ग्लोबल ग्रांट वाले क्लब्स के पदाधिकारियों ने अंतिम दिनों में उनकी जेब गर्म कर दी होगी - जिसके चलते मुकेश अरनेजा ने उनके आवेदनों को क्लियर कर दिया ।
डीडीएफ डोनेशन के क्लब्स के आवेदन क्लियर न होने के लिए कुछेक लोगों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन के निकम्मेपन को भी जिम्मेदार ठहराया है । लोगों का कहना है कि लूट-खसोट के इरादे से की जा रही मुकेश अरनेजा की मनमानी पर रोक लगाने/लगवाने के लिए शरत जैन यदि समय रहते रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत करते तो मुकेश अरनेजा को मनमानी करने से रोका जा सकता था । लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर  में शरत जैन ने न तो मामले की गंभीरता को पहचाना/समझा और न उचित कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाई - जो हुआ, उसके लिए अब मुकेश अरनेजा को जिम्मेदार ठहरा कर शरत जैन अपने निकम्मेपन पर पर्दा डालने का ही प्रयास कर रहे हैं । कुछ लोग इस बात से खुश हैं कि जिन क्लब्स के प्रेसीडेंट ने डीडीएफ डोनेशन लेने के लिए दीपक गुप्ता को वोट देने का सौदा मुकेश अरनेजा से किया, उन्हें मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने का ठीक सबक मिला है । इन लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा जैसे धोखेबाज व्यक्ति पर जो लोग अभी भी भरोसा करने को तैयार हो जाते हैं, उन्हें मुकेश अरनेजा से धोखा मिलने की शिकायत नहीं करना चाहिए । इस मामले में बदकिस्मती की बात लेकिन यही है कि मुकेश अरनेजा की बेईमानीभरी धोखाधड़ी हो, चाहे शरत जैन का निकम्मापन हो, और चाहें क्लब्स के प्रेसीडेंट की सौदेबाजियाँ हों - कुलमिलाकर नुकसान तो डिस्ट्रिक्ट और रोटरी का ही हुआ है ।

Monday, April 24, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को धोखा देने की मुकेश अरनेजा की हरकत से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी परिदृश्य में हलचल मची

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए आशीष मखीजा की उम्मीदवारी का समर्थन करने का संकेत देकर आलोक गुप्ता को एक बार फिर बीच मँझधार में छोड़ देने का काम किया है । आशीष मखीजा के उम्मीदवार 'बनने' की घटना जिस गुपचुप तरीके से घटित हुई, उससे आभास मिलता है कि मुकेश अरनेजा की इस योजना में सतीश सिंघल भी शामिल हैं । सतीश सिंघल हालाँकि अभी यह भी दिखाने/जताने का प्रयास कर रहे हैं कि आलोक गुप्ता के प्रति उनके मन में बहुत प्यार और सम्मान है - लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक धोखे के तमाम उदाहरण प्यार और सम्मान की ओट में ही घटित हुए हैं । खुद सतीश सिंघल ही मीठी मीठी बातों के जाल में फँसा कर सुभाष जैन के साथ धोखा कर चुके हैं - और इस बात को घटित हुए कोई बहुत समय नहीं बीता है । सहज ही समझा जा सकता है कि सतीश सिंघल यदि सुभाष जैन के साथ रहने की बात करते करते उनके साथ धोखा कर सकते हैं, तो आलोक गुप्ता के प्रति अपना प्यार और सम्मान दिखाते दिखाते धोखा क्यों नहीं कर सकते हैं ? आशीष मखीजा का नाम पेट्स (प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार) के एसोसिएट ट्रेनर के रूप में जिस छिपाछिपी तरीके से जुड़ा - उससे ही संकेत और आभास मिलता है कि मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के साथ धोखा करने के लिए जो जाल बिछाया, उसे बिछवाने में सतीश सिंघल की पूरी पूरी मिलीभगत रही है ।
उल्लेखनीय है कि पेट्स की तैयारी में सतीश सिंघल के कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले खास पदाधिकारियों को भी इस बात की भनक नहीं मिली थी कि आशीष मखीजा के लिए एसोसिएट ट्रेनर जैसा नया पद ईजाद किया जा रहा है । ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में इस तरह के किसी पद की व्यवस्था नहीं है । हालाँकि यह कोई बड़ी बात नहीं है - नई बातें, नई चीजें होती ही हैं, होनी भी चाहिएँ; बड़ी बात लेकिन यह है कि आशीष मखीजा के लिए जो नई व्यवस्था हुई, वह गुपचुप तरीके से हुई । सतीश सिंघल के साथ पेट्स की तैयारी में दिन-रात एक करने वाले पदाधिकारियों का कहना रहा है कि सतीश सिंघल वैसे तो छोटी से छोटी बात भी पूछ/बता कर अंजाम देते रहे - लेकिन एसोसिएट ट्रेनर का पद ईजाद करने जैसी बड़ी बात वह ऐन मौके तक 'पिए' रहे; और पेट्स की तैयारी में जुटे लोगों को भी यह बात तब पता चली, जब संबंधित प्रिंटिंग सामग्री इस्तेमाल के लिए उन्हें मिली । सतीश सिंघल की यह भूमिका संकेत और आभास देती है कि आलोक गुप्ता के साथ धोखा करने की मुकेश अरनेजा की योजना में सतीश सिंघल की पूरी मिलीभगत है - वह अभी आलोक गुप्ता को कभी छोटा भाई तो कभी बेटा बता कर उनके साथ जो प्यार और सम्मान दिखा/जता रहे हैं, वह सिर्फ इसलिए कि उन्हें अभी आलोक गुप्ता से अपने काम में मदद लेनी है ।
 कई लोगों को हैरानी है कि आलोक गुप्ता के साथ तो मुकेश अरनेजा के वर्षों से अच्छे संबंध हैं, फिर मुकेश अरनेजा उनके साथ इस तरह से धोखा क्यों कर रहे हैं - और वह भी दूसरी बार । पहली बार, जेके गौड़ के सामने मुसीबत खड़ी करने के उद्देश्य से मुकेश अरनेजा ने पहले तो आलोक गुप्ता को उम्मीदवार बना/बनवा दिया था, लेकिन बाद में फिर वह आलोक गुप्ता को धोखा देकर जेके गौड़ से ही जा मिले थे । लेकिन यह हैरानी उन लोगों को ही हो रही है, जो मुकेश अरनेजा को जानते नहीं हैं - जो लोग उन्हें जानते हैं, उन्हें पता है कि मुकेश अरनेजा संबंधों/रिश्तों को ताश के पत्तों की तरह फेंटते रहते हैं और किसी के साथ भी धोखा कर देते हैं । इससे उन्हें जीवन में हासिल हालाँकि कुछ नहीं हुआ, उलटे नुक्सान ही हुआ है - लेकिन फिर भी वह बाज नहीं आते हैं । अपनी हरकतों के चलते वह अपने ही भाई/भतीजों द्वारा अपनी कंपनी से निकाले जा चुके हैं, और रोटरी में अपने क्लब से 'धकेले' जा चुके हैं - इसलिए आलोक गुप्ता के साथ धोखा करने के उनके फैसले से उन्हें जानने वालों को कोई हैरानी नहीं हुई है । लेकिन यह सवाल जरूर लोगों के बीच महत्त्वपूर्ण बना हुआ है, कि मुकेश अरनेजा ने अचानक से आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन से हाथ क्यों खींच लिया है ? 
मुकेश अरनेजा के नजदीकियों के अनुसार, मुकेश अरनेजा दरअसल आलोक गुप्ता और सतीश सिंघल के बीच बनती दिख रही नजदीकी से परेशान थे । आलोक गुप्ता चूँकि सतीश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्य हैं, इसलिए पेट्स और दूसरे कार्यक्रमों की तैयारी के सिलसिले में उनकी सतीश सिंघल के साथ ज्यादा उठ-बैठ रही - जिसे मुकेश अरनेजा ने पसंद नहीं किया; इस बात पर लेकिन वह यदि आलोक गुप्ता का साथ छोड़ते, तो उन्हें सतीश सिंघल का साथ नहीं मिलता । सतीश सिंघल का साथ लेने के लिए मुकेश अरनेजा ने उन्हें उम्मीदवार के रूप में आलोक गुप्ता की कमजोरी की पट्टी पढ़ाई । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों के अनुसार, उन्होंने सतीश सिंघल को समझाया कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी से निपटने के लिए दिल्ली से कोई उम्मीदवार चाहिए होगा, क्योंकि आलोक गुप्ता के जरिए ललित खन्ना से निपटना संभव नहीं होगा । मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल को यह भी समझाया कि अपने गवर्नर-काल में वह यदि 'अपने' उम्मीदवार को चुनाव नहीं जितवा सके, तो शरत जैन की तरह बड़ी बदनामी होगी । इस तरह की बातों से सतीश सिंघल को फुसलाते हुए मुकेश अरनेजा ने आशीष मखीजा के लिए रास्ता बनाने हेतु सतीश सिंघल को राजी कर लिया । मुकेश अरनेजा की इस हरकत से लेकिन एक मजेदार बात यह हुई कि आलोक गुप्ता के प्रति लोगों के बीच हमदर्दी सी पैदा हुई । जो लोग आलोक गुप्ता के साथ नहीं भी देखे/समझे जाते हैं, उन्हें भी आलोक गुप्ता के प्रति सहानुभूति दिखाते/जताते हुआ पाया/सुना जा रहा है । यानि मुकेश अरनेजा का समर्थन आलोक गुप्ता की उतनी मदद नहीं कर पाता, मुकेश अरनेजा द्वारा दिया गया धोखा उनकी जितनी मदद करता हुआ नजर आ रहा है । लोगों से मिल रही इस हमदर्दी को आलोक गुप्ता कैसे बचा कर और बढ़ाने का काम करते हैं - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Thursday, April 13, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ललित खन्ना के आयोजन में डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों व अन्य लोगों को उत्साह के साथ सक्रिय देख बौखलाए मुकेश अरनेजा ने आयोजन को खराब करने की जो कोशिश की, उसके कारण लोगों के बीच ललित खन्ना के लिए हमदर्दी और पैदा हुई

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से आयोजित हुए रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के आयोजन में जुटे लोगों की भीड़ देख कर बौखलाए मुकेश अरनेजा ने रंग में भंग डालने का जो प्रयास किया, उसके लिए उन्हें मौके पर ही लताड़ मिली और लोगों के बीच उनकी जम कर फजीहत हुई । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा दो वर्ष पहले तक इसी क्लब के सदस्य हुआ करते थे और कुछ वर्ष पहले तक ललित खन्ना उनके बड़े खास हुआ करते थे । ललित खन्ना के साथ खास संबंधों के साथ इस क्लब में रहते हुए मुकेश अरनेजा न सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने, बल्कि रोटरी की व्यवस्था और राजनीति में ऊँचाइयों तक पहुँचे - लेकिन अपनी घटिया और टुच्ची हरकतों के चलते दो वर्ष पहले उन्हें न सिर्फ बड़े बेआबरू होकर क्लब से निकलना पड़ा, बल्कि रोटरी की व्यवस्था व राजनीति में भी उनका ऐसा बुरा हाल हुआ कि रोटरी इंस्टीट्यूट जैसे प्रमुख आयोजन में उन्हें कोई जगह नहीं मिली । यहाँ इस तथ्य पर ध्यान देना प्रासंगिक होगा कि इसी क्लब के दो और सदस्य - एमएल अग्रवाल तथा केके गुप्ता भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने हैं, और मुकेश अरनेजा से बहुत पहले बने हैं तथा रोटरी की व्यवस्था और राजनीति में मुकेश अरनेजा से ज्यादा ऊँचाइयों पर पहुँचे और रहे हैं - और क्लब में भी बहुत सम्मान के साथ बने हुए हैं । मुकेश अरनेजा क्लब के पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ सदस्यों के साथ बदतमीजीपूर्ण व्यवहार के कारण पिछले कुछ वर्षों से लगातार क्लब से निकाले जाने की कार्रवाइयों के निशाने पर आते रहे थे, लेकिन हर बार वह माफी माँग कर बचते रहे थे - दो वर्ष पहले लेकिन हालात ऐसी स्थिति में आ पहुँचे थे कि फिर उनका माफी माँग कर बचना भी संभव नहीं हो सका ।
मुकेश अरनेजा जिस क्लब से दो वर्ष पहले बड़े बेआबरू होकर निकले थे, उस क्लब को उन्होंने घटती सदस्य-संख्या के लिए निशाना बनाया । अपने इस रवैये के लिए मुकेश अरनेजा को दोतरफा फजीहत झेलनी पड़ी - क्लब के लोगों ने तो यह कहते हुए मुकेश अरनेजा को लताड़ा कि क्लब की घटी सदस्य-संख्या का जिक्र करते हुए मुकेश अरनेजा इस तथ्य को छिपा बैठे कि इसके लिए वही तो प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं । पिछले कुछ वर्षों में मुकेश अरनेजा की कारस्तानियों के कारण ही कई लोग क्लब तथा रोटरी ही छोड़ गए, दो वर्ष पहले जब मुकेश अरनेजा बेआबरू होकर खुद क्लब से निकले तब उनके साथ उनके कुछ संगी-साथी भी क्लब से निकले । मुकेश अरनेजा इस तथ्य को भी छिपा गए कि उनके निकलने पर क्लब की जो सदस्य-संख्या थी, उनके निकलने के बाद उसमें इजाफा हुआ है । इन तथ्यों से अनभिज्ञ, आयोजन में मौजूद दूसरे क्लब के सदस्यों ने मुकेश अरनेजा को यह कहते हुए कोसा कि अतिथि के रूप में आयोजन में शामिल होने आए मुकेश अरनेजा को इस तरह का नकारात्मक व्यवहार नहीं करना चाहिए था । मुकेश अरनेजा के लिए बड़ी फजीहत की बात यह हुई कि उनके बाद बोलने आए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल ने क्लब की भूरि-भूरि प्रशंसा की । अन्य वक्ताओं के रूप में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ तथा मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन और अन्य वक्ताओं ने भी क्लब के कामकाज की जमकर तारीफ की । लोगों का कहना रहा कि क्लब में रहते हुए क्लब के दूसरे सदस्यों के साथ मुकेश अरनेजा के जो भी झगड़े रहे हों, जो भी खुन्नसे रही हों - क्लब छोड़ देने के साथ मुकेश अरनेजा को उन्हें भी छोड़ देना चाहिए । लेकिन जो लोग मुकेश अरनेजा को जानते हैं, उनका कहना है कि मुकेश अरनेजा अपने दुष्ट व्यवहार व सोच को छोड़ नहीं सकते हैं - जैसे कुत्ते की पूँछ को किसी भी तरह से सीधा नहीं किया सकता है, ठीक वैसे ही मुकेश अरनेजा को भी किसी भी तरह से दुष्टता से दूर नहीं किया जा सकता है ।
मुकेश अरनेजा ने अपने ही पूर्व क्लब के आयोजन को खराब करने की जो कोशिश की, उसे कई लोगों ने उनकी बौखलाहट के रूप में देखा/पहचाना । उक्त आयोजन दरअसल क्लब का आयोजन तो था ही, वास्तव में उसके पीछे का उद्देश्य ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रमोट करना था । ऐसे में, आयोजन में रोटेरियंस की जो भीड़ जुटी - उसे देख कर मुकेश अरनेजा को तगड़ा झटका लगा और वह बुरी तरह बौखला गए । मुकेश अरनेजा की कोशिश है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लोगों के बीच स्वीकार्यता न मिले । इसके लिए, अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को त्रिकोणीय बनाने के लिए मुकेश अरनेजा ने अशोक जैन को पुनः उम्मीदवार बनने के लिए प्रेरित करने के साथ साथ कुछेक और लोगों को भी उम्मीदवारी के लिए उकसाया, जिसमें अभी तक तो उनकी दाल नहीं गली है । इस मामले में असफल रहने का उनका फ्रस्ट्रेशन, ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से हुए आयोजन को सफल होता देख और भड़क गया । आयोजन में क्लब्स के प्रेसीडेंट-इलेक्ट की अच्छी-खासी उपस्थिति को देख कर तो मुकेश अरनेजा का माथा ऐसा चकराया कि फिर वह आयोजन में एक अतिथि के रूप में आमंत्रित और अपनी उपस्थिति की गरिमा को पूरी तरह भुला बैठे और अपनी बातों से आयोजन को खराब करने में - तथा आयोजन में उपस्थित दूसरे लोगों के रंग में भंग डालने में जुट गए । मुकेश अरनेजा की बदकिस्मती यह रही कि उनकी यह हरकत बैकफायर कर गई - उन्हें क्लब के पदाधिकारियों से भी लताड़ सुनने को मिली और दूसरे लोगों ने भी उन्हें लानत दी ।
मुकेश अरनेजा के इस रवैये और इस रवैये के चलते हुई उनकी फजीहत ने लोगों के बीच ललित खन्ना के लिए हमदर्दी पैदा करने और बनाने का काम किया । लोगों ने इस तथ्य को एक बार फिर याद किया कि कुछ समय पहले तक ललित खन्ना उनके बड़े नजदीक और खास हुआ करते थे - लेकिन जब से ललित खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के बारे में सोचा, मुकेश अरनेजा उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करने लगे हैं । यह मुकेश अरनेजा की घटिया सोच का ही सुबूत है कि वह अपने नजदीक के लोगों को सिर्फ इस्तेमाल करना चाहते हैं - उन्हें आगे बढ़ता देखते हैं तो उनके खिलाफ हो जाते हैं । दीपक गुप्ता जब पहली बार उम्मीदवार बने थे, मुकेश अरनेजा तब उनके खिलाफ थे । आलोक गुप्ता जब पहली बार उम्मीदवार बने थे, मुकेश अरनेजा ने तब उन्हें धोखा देकर जेके गौड़ का साथ दिया था । इस तरह, अपने नजदीकियों के साथ धोखा करने का मुकेश अरनेजा का पुराना इतिहास है । ललित खन्ना उनके नए शिकार हैं ।
मुकेश अरनेजा को दरअसल यह बात इसलिए ही हजम नहीं हुई कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से आयोजित हुए आयोजन में डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने खासी दिलचस्पी ली, और अपनी उपस्थिति दिखा कर उन्होंने अपनी दिलचस्पी को जाहिर भी किया । क्लब्स के प्रेसीडेंट-इलेक्ट के साथ-साथ खासतौर से उत्तरप्रदेश के क्लब्स के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों ने इस आयोजन में जिस उत्साह के साथ भागीदारी की, उसे देख कर मुकेश अरनेजा के पेट में कुछ ज्यादा ही दर्द हो गया । आयोजन में उपस्थित लोगों के अनुसार, ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से हुए आयोजन में 30 से अधिक क्लब्स के प्रेसीडेंट-इलेक्ट देखे गए और खासतौर से उत्तरप्रदेश के क्लब्स के पदाधिकारियों व प्रमुख लोगों को सक्रिय देखा गया - जो लोग नहीं दिखे, आयोजन में उपस्थित लोगों ने खुद से उन्हें फोन करके उनकी अनुपस्थिति के बारे में पूछा तो सभी से प्रायः यही सुनने को मिला कि अपनी निजी व्यस्तता के चलते वह आयोजन में नहीं आ पाए हैं, और उनकी अनुपस्थिति के अन्य कोई अर्थ न निकाले जाएँ । इस तरह की बातों से आयोजन का माहौल ललित खन्ना की उम्मीदवारी के संदर्भ में उत्साहजनक बना, जिसे देख कर मुकेश अरनेजा ने आपा खो दिया - लेकिन आपा खो देने के कारण किए गए उनके व्यवहार ने उनकी ही फजीहत की/कराई तथा लोगों के बीच ललित खन्ना के प्रति हमदर्दी पैदा की ।