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Tuesday, September 17, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में पिछले रोटरी वर्ष के प्रेसीडेंट्स के जरिये सुनील मल्होत्रा ने चुनावी राजनीति के समीकरणों को बदलने का जो प्रयास किया है, उससे सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के समर्थकों को प्रभावी माहौल बनने तथा उनकी उम्मीदवारी को खासी मजबूती मिलने का भरोसा हुआ है

नई दिल्ली । सुनील मल्होत्रा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के अभियान में क्लब्स के निवर्त्तमान प्रेसीडेंट्स (आईपीपी) की मदद लेने की जो कोशिश की है, उसने उनके नजदीकियों व शुभचिंतकों को आश्वस्त किया है कि इसका अवश्य ही प्रभावी व सकारात्मक नतीजा निकलेगा - जो उनकी उम्मीदवारी को मजबूती देगा । उल्लेखनीय है कि मौजूदा प्रेसीडेंट की रोटरी की सारी स्कूलिंग चूँकि पिछले प्रेसीडेंट की देखरेख में हुई होती है, इसलिए माना/समझा जाता है कि मौजूदा प्रेसीडेंट भावनात्मक रूप से पिछले प्रेसीडेंट के प्रभाव में ज्यादा होता/रहता है; इसी तथ्य को पहचानते हुए सुनील मल्होत्रा ने निवर्त्तमान प्रेसीडेंट्स पर खास ध्यान दिया है - पिछले रोटरी वर्ष में खुद प्रेसीडेंट होने के नाते सुनील मल्होत्रा का पिछले रोटरी वर्ष के प्रेसीडेंट्स के साथ नजदीक और विश्वास का संबंध वैसे भी है । निवर्त्तमान प्रेसीडेंट व मौजूदा प्रेसीडेंट के बीच बनने व रहने वाले भावनात्मक भरोसे को सुनील मल्होत्रा ने अपनी उम्मीदवारी के लिए 'अवसर' बनाया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में मौजूदा प्रेसीडेंट की ही ज्यादा पूछ-परख होती है, और निवर्त्तमान प्रेसीडेंट चुनावी राजनीति में अप्रासंगिक मान लिया जाता है - और इसलिए कोई भी उसे तवज्जो नहीं देता है । सुनील मल्होत्रा ने लेकिन निवर्त्तमान प्रेसीडेंट की महत्ता को समझा/पहचाना तथा अपने चुनाव अभियान में उन्हें खास तौर से जोड़ने की कोशिश की है ।
सुनील मल्होत्रा की इस कोशिश ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के अभियान के तौर-तरीकों को एक नया रूप दिया है; और अपनी इस कोशिश के जरिए उन्होंने निवर्त्तमान प्रेसीडेंट को जो सम्मान व महत्ता देने तथा दिलवाने का काम किया है, उसने चुनावी राजनीति के समीकरणों को बदलने का भी प्रयास किया है । सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि निवर्त्तमान प्रेसीडेंट्स के माध्यम से सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के पक्ष में अच्छा व प्रभावी माहौल बना है तथा उनकी उम्मीदवारी को खासी मजबूती मिली है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न क्लब्स के अधिष्ठापन समारोहों में सुनील मल्होत्रा को जो विशेष तवज्जो मिलते देखी गई, उसके पीछे भी क्लब के निवर्त्तमान प्रेसीडेंट की सक्रियताभरी भूमिका को ही देखा/पहचाना गया है । अधिष्ठापन समारोहों में सुनील मल्होत्रा को सिर्फ एक उम्मीदवार के रूप में ही नहीं देखा/पहचाना गया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के सबसे बड़े क्लब के प्रतिनिधि के रूप में भी 'देखा' गया है; क्लब के अधिष्ठापन समारोह में चूँकि निवर्त्तमान प्रेसीडेंट की मुख्य भूमिका होती है, इसलिए आयोजक क्लब का निवर्त्तमान प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा को फेलो प्रेसीडेंट के रूप में देखते/पहचानते हुए उनका स्वागत करता है, तो उससे समारोह में मौजूद लोगों के बीच सुनील मल्होत्रा की एक अलग पहचान बनी और उम्मीदवार के रूप में उन्हें इसका फायदा भी मिला ।
दरअसल इससे ही सुनील मल्होत्रा और उनके समर्थकों को निवर्त्तमान प्रेसीडेंट की 'भावनात्मक ताकत' का आभास हुआ और फिर उन्होंने इस भावनात्मक ताकत को एक अवसर में बदलने के लिए काम किया । यह काम सुनील मल्होत्रा वास्तव में इसलिए भी कर पाए क्योंकि उनका क्लब डिस्ट्रिक्ट का सबसे बड़ा क्लब है; प्रेसीडेंट के रूप में सुनील मल्होत्रा को एक बड़े क्लब का नेतृत्व करने का मौका मिला - जिससे उनकी नेतृत्व क्षमता का सुबूत लोगों को मिला । सहज ही समझा जा सकता है कि विभिन्न अनुभव, स्वभाव व विचार रखने वाले लोगों के क्लब को प्रेसीडेंट के रूप में नेतृत्व देना सुनील मल्होत्रा के लिए खासा चुनौतीपूर्ण रहा होगा । एक बड़े क्लब का नेतृत्व करना वास्तव में एक डिस्ट्रिक्ट का नेतृत्व करने जैसा ही चुनौतीपूर्ण मामला होता है - या शायद उससे भी मुश्किल । डिस्ट्रिक्ट में तो बहुत से क्लब्स तथा सदस्य इस बात पर ध्यान भी नहीं देते/रखते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका नेतृत्व आखिर कर क्या रहा है; लेकिन क्लब का प्रेसीडेंट हमेशा ही क्लब के हर सदस्य के 'राडार' पर होता है - इस बिना पर सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के समर्थक लगातार दावा करते रहे हैं कि एक बड़े क्लब का नेतृत्व करने - और खासी सफलता के साथ करने वाले सुनील मल्होत्रा डिस्ट्रिक्ट का नेतृत्व करने के लिए बिलकुल परफेक्ट हैं । एक बड़े क्लब से उम्मीदवार होने के नाते सुनील मल्होत्रा को वोटों की गिनती का भी फायदा होने की बात लोगों के बीच होती है । लोगों को लगता है कि उन्हें मिलने वाले वोटों की गिनती 25/30 से तो शुरू होती है - और यह तथ्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मुकाबले में सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को महत्त्वपूर्ण बना देता है । 

Tuesday, August 20, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सुनील मल्होत्रा के कार्यक्रम में आम व खास रोटेरियंस की जुटी भीड़ तथा उनके उत्साह को सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकी व समर्थक एक सकारात्मक संदेश के रूप में देख/पहचान रहे हैं

नई दिल्ली । सुनील मल्होत्रा की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी के प्रति समर्थन 'दिखाने' तथा जुटाने के उद्देश्य से आयोजित किए गए स्वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट करने के कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट के आम और खास रोटेरियंस की जुटी भीड़ ने सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकियों व समर्थकों को खासा उत्साहित किया है । दरअसल इस कार्यक्रम पर सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के अभियान का सारा दारोमदार टिका हुआ था और इस कार्यक्रम के जरिये सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकियों व समर्थकों को कई तरह के संदेश 'देने' थे । असल में, चुनावी राजनीति की एक बड़ी गहरी समस्या यह होती है कि उसमें उम्मीदवारों पर आरोप तो 'शब्दों' व बातों में लगते हैं, लेकिन उनके जबाव संकेतों व संदेशों के जरिये देने होते हैं । किसी भी उम्मीदवार के खिलाफ नकारात्मक माहौल तो शब्द-बाणों में व्यक्त किए जाने वाले आरोपों से बन जाता है, लेकिन उस नकारात्मक माहौल को पलटने तथा सकारात्मक माहौल बनाने का काम संकेतों व संदेशों में छिपे सुबूतों के माध्यम से देना होता है । संकेतों व संदेशों में छिपाकर सुबूत देने का काम जो उम्मीदवार प्रभावी तरीके से कर लेता है, चुनावी बाजी वही जीत ले जाता है । इसीलिए उम्मीदवारों की बॉडी-लैंग्वेज तथा उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों से मिलने वाले संकेतों व संदेशों का चुनावी राजनीति - खासतौर से रोटरी की चुनावी राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी व देखी जाती है । सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकियों व समर्थकों ने इसीलिए स्वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट करने का कार्यक्रम डिजाइन किया था और संकेतों व संदेशों के जरिए माहौल बनाने की तैयारी की थी । 
अपने पक्ष में माहौल बनाने तथा 'दिखाने' की तैयारी के नतीजे ने सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकियों व समर्थकों को खासा उत्साहित किया है । उनका कहना/बताना है कि खुद उन्हें भी उम्मीद नहीं थी कि उनके कार्यक्रम में इतने रोटेरियंस जुटेंगे और उन्हें डिस्ट्रिक्ट के आम व खास रोटेरियंस का ऐसा जोरदार समर्थन मिलेगा । दावा किया गया है कि कार्यक्रम में करीब छह सौ लोगों की उपस्थिति रही, जिनमें करीब 70 क्लब्स के प्रेसीडेंट्स थे । दिल्ली, सोनीपत, गाजियाबाद, नोएडा, हापुड़ क्षेत्र के साथ-साथ छोटे कस्बों के क्लब्स से भी रोटेरियंस कार्यक्रम में पहुँचे । सुनील मल्होत्रा ने यूँ तो पिछले दिनों विभिन्न क्लब्स के पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ रोटेरियंस के बीच संपर्क अभियान चलाया था, लेकिन उनके संपर्क अभियान के प्रभावी होने को लेकर खुद उनके नजदीकी व समर्थक ही सशंकित थे । सुनील मल्होत्रा के व्यक्तित्व में तथा उनके व्यवहार में चूँकि कोई तड़क-भड़क नहीं 'दिखती' है, इसलिए उनके नजदीकियों व समर्थकों को ही आशंका रही है कि उनके संपर्क अभियान का डिस्ट्रिक्ट के लोगों पर कोई प्रभावी असर हो भी रहा है या नहीं । स्वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट करने के लिए हुए कार्यक्रम में वास्तव में इस बात का 'रिजल्ट' भी मिलना था कि डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस ने सुनील मल्होत्रा के संपर्क अभियान को तथा उनकी उम्मीदवारी को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया भी है, या नहीं । इसीलिए कार्यक्रम की तैयारी करते हुए खुद सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकी व समर्थक थोड़ा आशंकित भी थे । लेकिन कार्यक्रम में जुटे रोटेरियंस की भीड़ तथा उनके उत्साह ने सुनील मल्होत्रा तथा उनके नजदीकियों व समर्थकों को राहत तो दी ही, साथ ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के प्रति उन्हें आश्वस्त भी किया ।
सुनील मल्होत्रा तथा उनकी उम्मीदवारी के समर्थक व शुभचिंतक असल में उन तथ्यों को लेकर तो आश्वस्त रहे हैं, जो किसी भी उम्मीदवार की ताकत होते हैं - लेकिन उक्त तथ्य सचमुच उनके काम आयेंगे, उन तथ्यों से सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को वास्तव में कोई फायदा पहुँचेगा; इसे लेकर उनके बीच एक संशय था । सुनील मल्होत्रा का क्लब डिस्ट्रिक्ट का सबसे बड़ा क्लब है; प्रेसीडेंट के रूप में सुनील मल्होत्रा को एक बड़े क्लब का नेतृत्व करने का मौका मिला - जिससे उनकी नेतृत्व क्षमता का सुबूत लोगों को मिला । सहज ही समझा जा सकता है कि विभिन्न अनुभव, स्वभाव व विचार रखने वाले लोगों के क्लब को नेतृत्व देना सुनील मल्होत्रा के लिए खासा चुनौतीपूर्ण रहा होगा । एक बड़े क्लब का नेतृत्व करना वास्तव में एक डिस्ट्रिक्ट का नेतृत्व करने जैसा ही चुनौतीपूर्ण मामला होता है - या शायद उससे भी मुश्किल । डिस्ट्रिक्ट में तो बहुत से क्लब्स तथा सदस्य इस बात पर ध्यान भी नहीं देते/रखते हैं कि नेतृत्व आखिर कर क्या रहा है; लेकिन क्लब का नेतृत्व हमेशा ही क्लब के हर सदस्य के 'राडार' पर होता है - इस बिना पर सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के समर्थक दावा तो करते रहे हैं कि एक बड़े क्लब का नेतृत्व करने - और खासी सफलता के साथ करने वाले सुनील मल्होत्रा डिस्ट्रिक्ट का नेतृत्व करने के लिए बिलकुल परफेक्ट हैं; लेकिन उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा था कि उनके इस दावे को डिस्ट्रिक्ट के लोग स्वीकार भी कर रहे हैं क्या ? स्वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट करने के कार्यक्रम में उपस्थित हुई रोटेरियंस की भीड़ को सुनील मल्होत्रा तथा उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों ने सकारात्मक जबाव के संकेत व संदेश के रूप में ही देखा/पहचाना है । संदर्भित समारोह में रोटरी को करीब सौ करोड़ रूपए का दान देने वाले रोटेरियन रवि शंकर दाकुजो को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करके सुनील मल्होत्रा व उनके क्लब के पदाधिकारियों ने यह भी दिखाया/जताया है कि कार्यक्रम के जरिये उनका उद्देश्य भले ही सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन देखने/ दिखाने / जताने का हो, लेकिन यह काम भी वह रोटरी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के साथ ही कर रहे हैं । इससे कार्यक्रम में उपस्थित न हो सके डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस के बीच भी सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर एक सकारात्मक संदेश गया है ।

Wednesday, August 7, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के सबसे बड़े क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली विकास के 16 अगस्त के कार्यक्रम के पीछे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच बने समर्थन को 'दिखाने' का उद्देश्य काम कर रहा है क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली विकास की तरफ से स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में 16 अगस्त को किए जा रहे कार्यक्रम की तैयारी के पीछे सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन दिखाने और जुटाने के उद्देश्य को देखे जाने से उक्त कार्यक्रम के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों की दिलचस्पी खासी बढ़ गई है । उक्त कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए क्लब के पदाधिकारी तथा वरिष्ठ सदस्य, खासकर क्लब के पूर्व प्रेसीडेंट्स जिस तरह से सक्रिय हैं, उससे कार्यक्रम की महत्ता तो बढ़ ही गई है - साथ ही सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के लिए क्लब के पदाधिकारियों व पूर्व प्रेसीडेंट्स सहित क्लब के वरिष्ठ सदस्यों की समर्थन जुटाने की कोशिशों का भी नजारा लोगों के सामने आया है । यह नजारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में दरअसल इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सुनील मल्होत्रा का क्लब एक बड़ा और पुराना क्लब है, जिसके कई वरिष्ठ सदस्य डिस्ट्रिक्ट में अपनी खास पहचान रखते हैं । पिछले कई वर्षों से यह देखने को मिलता रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के जो भी उम्मीदवार होते हैं, वह खुद और उनके समर्थक व शुभचिंतक पहले तो क्लब के कार्यक्रमों, विशेषकर क्लब के अधिष्ठापन समारोह का निमंत्रण प्राप्त करने के लिए और फिर वोट माँगने के लिए क्लब के वरिष्ठ सदस्यों से ही सिफारिश करते हैं । प्रत्येक वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के जो भी उम्मीदवार होते हैं, उनकी बड़ी हसरत होती है कि उन्हें रोटरी क्लब दिल्ली विकास के अधिष्ठापन समारोह में आमंत्रित कर लिया जाए । क्लब के जो वरिष्ठ सदस्य डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी लेते हैं, उनके पास जितने वोट होते हैं, उतने तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के महारथी समझे जाने वाले नेताओं के पास नहीं होते हैं । और इस तरह चुनावी राजनीति के लिहाज से रोटरी क्लब दिल्ली विकास के नेता बिना डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वाली 'हैसियत' में होते हैं । ऐसे में, क्लब के वरिष्ठ नेताओं के दिशा-निर्देशन में क्लब के पदाधिकारी सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से आयोजित होते देखे/समझे जा रहे 16 अगस्त के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए जिस तरह से जुटे हैं, उसने सुनील मल्होत्रा की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट के लोगों की निगाह में महत्त्वपूर्ण बनाने का काम किया है ।
सुनील मल्होत्रा को डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न क्लब्स के अधिष्ठापन समारोहों में जो विशेष तवज्जो मिलती देखी गई है, उसके पीछे भी क्लब के वरिष्ठ सदस्यों की सक्रियताभरी भूमिका को देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल अधिष्ठापन समारोहों में सुनील मल्होत्रा को सिर्फ एक उम्मीदवार के रूप में ही नहीं देखा/पहचाना गया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के सबसे बड़े क्लब के प्रतिनिधि के रूप में भी 'देखा' गया है; आयोजक क्लब के कई वरिष्ठ सदस्य सुनील मल्होत्रा के क्लब के कई वरिष्ठ सदस्यों से निजी रूप से परिचित होने के कारण सुनील मल्होत्रा को उन वरिष्ठ सदस्यों के प्रतिनिधि के रूप में भी देखते हैं, और इस नाते उन्हें खास अहमियत देते हुए देखे गए हैं । इसके अलावा, अधिष्ठापन समारोहों में सुनील मल्होत्रा को निवर्त्तमान प्रेसीडेंट होने का भी फायदा मिलता नजर आया है; अधिष्ठापन समारोह में चूँकि निवर्त्तमान प्रेसीडेंट की मुख्य भूमिका होती है, इसलिए आयोजक क्लब का निवर्त्तमान प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा को फेलो प्रेसीडेंट के रूप में देखते/पहचानते हुए उनका स्वागत करता है, तो उससे समारोह में मौजूद लोगों के बीच सुनील मल्होत्रा की एक अलग पहचान बनती है । इस तरह सुनील मल्होत्रा ने विभिन्न क्लब्स के अधिष्ठापन कार्यक्रमों में लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी को लेकर समर्थन का माहौल बनाया; और इसे अधिष्ठापन समारोहों के अलावा भी अपनी सक्रियता दिखा कर और मजबूत करने का काम किया है । माना/समझा जा रहा है कि 16 अगस्त के कार्यक्रम के जरिए वास्तव में सुनील मल्होत्रा की सक्रियता के चलते उनकी उम्मीदवारी को लेकर लोगों के बीच बने/पड़े समर्थन का आकलन किया जाएगा; और साथ ही इस कार्यक्रम के जरिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के प्रति बने समर्थन को 'दिखाने' का काम भी हो जाएगा ।
इसीलिए रोटरी क्लब दिल्ली विकास के पदाधिकारी तथा पूर्व प्रेसीडेंट्स सहित वरिष्ठ सदस्य 16 अगस्त के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए जोरशोर से लगे हैं । उन्हें विश्वास है कि अपने प्रयासों से वह उक्त कार्यक्रम को प्रभावी रूप देने में सफल होंगे । इस विश्वास का कारण भी है । दरअसल एक पुराना, बड़ा और अत्यंत सक्रिय क्लब होने के नाते डिस्ट्रिक्ट में जो कोई भी थोड़ा बहुत सक्रिय है, वह सुनील मल्होत्रा के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली विकास के किसी न किसी सदस्य के साथ गहरे से जुड़ा है; और जो नहीं भी जुड़ा है, वह क्लब के पुराने, बड़े और सक्रिय होने के तथ्य से प्रेरित होता है । बड़ा और संगठित व सक्रिय क्लब होने के कारण रोटरी क्लब दिल्ली विकास जिस जोन में होता है, उस जोन के बाकी क्लब्स भी उसके 'प्रभाव' में रहते हैं - और इस तरह उस जोन की डिस्ट्रिक्ट में एक अलग पहचान व भूमिका बन जाती है । ऐसे में, सुनील मल्होत्रा के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में बड़ी अनुकूल स्थिति यह बनी है कि वह रोटरी क्लब दिल्ली विकास के ही नहीं, बल्कि अपने जोन के क्लब्स के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं । असल में इसीलिए डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं के साथ-साथ दूसरे लोगों के बीच भी यह चर्चा रही है कि एक बड़े क्लब का सदस्य होने तथा उस बड़े क्लब के प्रभाव के चलते सुनील मल्होत्रा को मिलने वाले वोटों की गिनती 25/30 से तो शुरू होती है - और यह तथ्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मुकाबले में सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को महत्त्वपूर्ण बना देता है । समझा जा रहा है कि 16 अगस्त का कार्यक्रम में इसी महत्त्व को रेखांकित करने के साथ-साथ और पुख्ता व मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है ।

Tuesday, May 7, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के एक पुराने, बड़े और सक्रिय क्लब का सदस्य और मौजूदा वर्ष में प्रेसीडेंट होने का फायदा उठाते हुए सुनील मल्होत्रा ने अपनी उम्मीदवारी के अभियान को लोगों के बीच प्रभावी व विश्वसनीय रूप दिया

नई दिल्ली । सुनील मल्होत्रा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की तैयारी में हाल के दिनों में जो तेजी दिखाई है, उसके कारण उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से देखा/पहचाना जाने लगा है । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग एसेम्बली में सुनील मल्होत्रा फुल फॉर्म में दिखे और लोगों के बीच खासी सक्रियता व दिलचस्पी के साथ मिले/जुले । उनके क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली विकास के कुछेक वरिष्ठ सदस्यों व पूर्व प्रेसीडेंट्स ने उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बनाने की जो कोशिश की, उसका भी सुनील मल्होत्रा को अच्छा फायदा मिला । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग असेम्बली में चूँकि डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर सक्रिय सदस्य उपस्थित थे, जिनके रोटरी क्लब दिल्ली विकास के वरिष्ठ सदस्यों के साथ निकट के घनिष्ठ संबंध रहे हैं - इसलिए रोटरी क्लब दिल्ली विकास के वरिष्ठ सदस्यों व पूर्व प्रेसीडेंट्स की सक्रियता ने सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के अभियान को प्रचारित व प्रसारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास डिस्ट्रिक्ट का एक पुराना, बड़ा और अत्यंत सक्रिय क्लब है - डिस्ट्रिक्ट में जो कोई भी थोड़ा बहुत सक्रिय है, वह दिल्ली विकास के किसी न किसी सदस्य के साथ गहरे से जुड़ा है; और जो नहीं भी जुड़ा है, वह क्लब के पुराने, बड़े और सक्रिय होने के तथ्य से प्रेरित होता है । खासकर नए रोटेरियंस यह जानकार अचंभित होते हैं कि करीब 200 सदस्यों वाला क्लब कैसे तो लगातार एकजुट बना हुआ है और कैसे बिना किसी झगड़े-झंझट के अपना काम करता है ?
डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के लिए रोटरी क्लब दिल्ली विकास अक्सर ही एक 'स्कूल' की भूमिका भी निभाता नजर आता है । दरअसल विभिन्न क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के लिए यह बात एक बड़ी चुनौती की तरह होती है कि उनके लिए तो अपने छोटे से क्लब के सदस्यों को एकजुट व सक्रिय करना/रखना मुश्किल होता है; ऐसे में रोटरी क्लब दिल्ली विकास में कैसे काम होता है ? इसीलिए रोटरी क्लब दिल्ली विकास की डिस्ट्रिक्ट में और खास तौर से दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों के बीच विशिष्ट पहचान है । सुनील मल्होत्रा की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के अभियान को अपने क्लब की इस विशिष्ट पहचान का खासा फायदा मिल रहा है । बड़ा और संगठित व सक्रिय क्लब होने के कारण रोटरी क्लब दिल्ली विकास जिस जोन में होता है, उस जोन के बाकी क्लब्स भी उसके 'प्रभाव' में रहते हैं - और इस तरह उस जोन की डिस्ट्रिक्ट में एक अलग पहचान व भूमिका बन जाती है । ऐसे में, सुनील मल्होत्रा के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में बड़ी अनुकूल स्थिति यह बनी है कि वह रोटरी क्लब दिल्ली विकास के ही नहीं, बल्कि अपने जोन के क्लब्स के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं । सुनील मल्होत्रा के जोन के करीब 25 से 30 वोट होंगे, जिनमें किसी दूसरे उम्मीदवार के लिए सेंध लगाना मुश्किल ही होगा; जाहिर है कि सुनील मल्होत्रा जितने बड़े समर्थन-आधार से अपनी उम्मीदवारी की शुरुआत कर रहे हैं, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी को स्वाभाविक रूप से बढ़त मिलती दिखती है ।
डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग एसेम्बली में मौजूद लोगों के बीच सुनील मल्होत्रा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए जिस तरह का अभियान चलाया, उसके कारण वह डिस्ट्रिक्ट के आम और खास लोगों की निगाह में तो आए ही, अपनी उम्मीदवारी को उन्होंने ठोस विश्वसनीयता भी दी । दरअसल डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग असेम्बली में सुनील मल्होत्रा ने अपनी उम्मीदवारी के बाबत जो अभियान चलाया, उसने इसलिए भी विश्वसनीय रूप पाया - क्योंकि सुनील मल्होत्रा उससे पहले अधिकतर लोगों से वन-टू-वन लेबल पर मिल चुके थे । वन-टू-वन लेबल पर होने वाली बात/मुलाकात व्यक्तिगत स्तर पर तो संबंधों को बनाती/जोड़ती है, लेकिन राजनीतिक रूप से वह संबंध असरकारी तब होते हैं जब व्यक्तिगत रूप से बने संबंधों को सार्वजनिक पहचान मिलती है । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग असेम्बली में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चलाये गए सुनील मल्होत्रा के अभियान ने वास्तव में डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस के साथ व्यक्तिगत रूप से बने उनके संबंधों को सार्वजनिक पहचान देने का ही काम किया है । सुनील मल्होत्रा चूँकि इसी वर्ष अपने क्लब के प्रेसीडेंट हैं, इसलिए प्रेसीडेंट के रूप में उनकी सक्रियता, उनके कामों और उनकी उपलब्धियों से लोग ताजा ताजा वैसे ही परिचित हैं; जो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में उनके अभियान को और प्रभावी व विश्वसनीय रूप देता है । 

Wednesday, February 27, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर उनके अपने क्लब में मचा घमासान अंततः शांत हुआ और सर्वसम्मति से उनकी उम्मीदवारी घोषित हुई

नई दिल्ली । लंबी ऊहापोह के बाद, मुसीबत में घिरे/फँसे रोटरी क्लब दिल्ली विकास ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को हरी झंडी दे दी है । सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर क्लब में ही जो राड़ मची हुई थी, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच क्लब की भी काफी बदनामी हो रही थी । रोटरी क्लब दिल्ली विकास डिस्ट्रिक्ट का सिर्फ सबसे बड़ा क्लब ही नहीं है, बल्कि साख और प्रतिष्ठा के मामले में भी इसकी विशेष पहचान है । चूँकि बड़ा क्लब है, इसलिए विचारों और तौर-तरीकों के मामले में विभिन्नता व विविधता के कई कई रूप इसमें सहज ही देखने को मिलते हैं - जिनमें कई दफा टकराव होता भी नजर आता है; लेकिन क्लब की साख व प्रतिष्ठा इसीलिए बनी हुई है कि समय समय पर पैदा होने वाले टकरावों ने कभी भीषण रूप नहीं लिया, और जब कभी लगा कि मामला भीषण रूप लेने जा रहा है - तभी क्लब के संबद्ध सदस्यों ने क्लब की साख व प्रतिष्ठा के प्रति सम्मान दिखाते हुए मामले को यू टर्न दे दिया और हालात सामान्य बना दिए । इस बार भी ऐसा ही हुआ - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर क्लब में भारी खींचतान थी, जिसे देख/सुन कर लग रहा था कि इस बार क्लब अपनी साख व प्रतिष्ठा की पहचान को खो देगा - लेकिन एक बार फिर ऐसा हुआ कि मामला बिगड़ते बिगड़ते सँभल गया; और सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को उनके अपने क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली विकास की तरफ से सर्वसम्मति से हरी झंडी मिल गई ।
इस बार का फच्चर हालाँकि खासा गहरा फँसा था । दरअसल बड़ा क्लब होने के कारण, क्लब के कई सदस्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने/होने के आकाँक्षी हैं । समस्या लेकिन यह रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के सभी आकाँक्षी सिर्फ आकाँक्षा पाले रहे और इसे व्यावहारिक रूप देने में वास्तव में विफल रहे । इसके चलते क्लब में माहौल यह बन गया था कि क्लब में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का जो नया आकाँक्षी बनता, पुराने आकाँक्षी मिलकर उसकी टाँग खींचने लगते और उसे आगे बढ़ने से रोक देते । पिछले कुछेक वर्षों में रोटरी क्लब दिल्ली विकास के जिस किसी सदस्य ने भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की आकाँक्षा दिखाई, उसे क्लब में ही इतने विरोधों का सामना करना पड़ा कि उसकी आकाँक्षा को दम ही तोड़ना पड़ा । क्लब में हर वर्ष यह दिलचस्प नजारा देखने को मिलता कि शुरू में तो क्लब के वरिष्ठ सदस्य प्रेसीडेंट की तारीफ करने तथा उसे उत्साहित करने के लिए कहते कि वह तो गवर्नर मैटेरियल हैं, और उसे गवर्नर बनने की दिशा में बढ़ना चाहिए; इस तरह की बातें सुनकर प्रेसीडेंट बेचारा जब सचमुच गवर्नर बनने की दिशा में आगे बढ़ने लगता - तो उसे गवर्नर मैटेरियल बताने वाले लोग ही उसकी टाँग खींचने में जुट जाते । इसीलिए हर तरह से बड़ा, प्रमुख और समर्थ होने के बावजूद, रोटरी क्लब दिल्ली विकास अभी तक डिस्ट्रिक्ट को एक गवर्नर नहीं दे सका है । 
इस बार का नजारा भी पिछली बार के नजारों जैसा ही था - सुनील मल्होत्रा में पहले तो खूब हवा भरी गई, जिसके चलते सुनील मल्होत्रा ने क्लब के प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ एक भावी उम्मीदवार के रूप में भी अपनी सक्रियता को संयोजित किया; लेकिन जब उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी की तरफ सचमुच अपने कदम बढ़ाये, तो उनकी कमियों और कमजोरियों की बातें करके उन्हें हतोत्साहित करने का खेल शुरू हुआ । इस बार के नजारे में लेकिन एक ट्विस्ट भी था, और वह यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के नए आकाँक्षी के रूप में सुनील मल्होत्रा ने आसानी से हार मानने का रवैया नहीं दिखाया और क्लब में पैदा हुई प्रतिकूल स्थितियों का सामना करने का निश्चय प्रकट किया । सुनील मल्होत्रा को अपने इसी रवैये का फायदा भी मिला - मजे की बात यह हुई कि क्लब में जो लोग उनकी उम्मीदवारी को लेकर संदेह प्रकट करते हुए विरोध कर रहे थे, अंततः वही उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तावक व समर्थक बने । गौर करने की महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है कि सुनील मल्होत्रा को क्लब के प्रेसीडेंट का पद भी आसानी से नहीं मिला था; क्लब के प्रेसीडेंट का पद भी वह अपनी जिद भरी निरंतर सक्रियता, अपने उदार व्यवहार और किस्मत के भरोसे पा सके थे; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए क्लब के सदस्यों की सर्वसम्मत सहमति भी उन्हें अपनी जिद भरी निरंतर सक्रियता, अपने उदार व्यवहार व किस्मत के भरोसे ही प्राप्त हुई है । इस तथ्य ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को एक खास 'वजन' दे दिया है । सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को मिले इस वजन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है ।

Friday, February 22, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के उदाहरण के साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे जोर के चलते सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी की तैयारी के लिए संकट और गहरा गया लग रहा है

नई दिल्ली । अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को लेकर लगातार मुसीबत में घिरे/फँसे रोटरी क्लब दिल्ली विकास के प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा को ललित खन्ना की उम्मीदवारी की तैयारी की खबर से और बड़ा झटका लगा है । मजे की बात यह है कि ललित खन्ना को उम्मीदवार बनने की तैयारी करते 'देख' सुनील मल्होत्रा के विरोधियों की उनके अपने क्लब में संख्या और बढ़ गई है । उम्मीदवारी को लेकर क्लब में मचे घमासान को अभी तक चुपचाप बैठे तमाशा देख रहे कई एक वरिष्ठ सदस्यों ने भी कहना शुरू कर दिया है कि सुनील मल्होत्रा के लिए समय लगता है कि अनुकूल नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी उम्मीदवारी को लेकर जोर नहीं देना चाहिए । रोटरी क्लब दिल्ली विकास के कई वरिष्ठ सदस्यों को यह चिंता भी सताने लगी है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चुनाव लड़ कर सुनील मल्होत्रा कहीं क्लब की साख  और प्रतिष्ठा को चोट न पहुँचा दें । उनका कहना है कि अभी डिस्ट्रिक्ट का सबसे बड़ा क्लब होने के नाते डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में क्लब की एक अलग ही पहचान, साख और धमक है; लेकिन यदि सुनील मल्होत्रा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव हार गए तो क्लब की बनी चली आ रही पहचान, साख और धमक एक झटके में धूल में मिल जाएगी । क्लब में सुनील मल्होत्रा के विरोधी ही नहीं, बल्कि साथी/समर्थक भी ललित खन्ना के उम्मीदवार बनने की स्थिति में सुनील मल्होत्रा के लिए चुनावी मुकाबले को मुश्किल हुआ मान रहे हैं और इस कारण सुनील मल्होत्रा के समर्थन से पीछे हटते हुए नजर आ रहे हैं ।
इस बीच, क्लब में पर्दे के पीछे रह कर सुनील मल्होत्रा के खिलाफ मुहिम चला रहे पूर्व प्रेसीडेंट जवाहर गुप्ता भी कूद कर पर्दे के सामने आ गए हैं और सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के खिलाफ आमने-सामने की लड़ाई लड़ने के लिए पोजीशन ले चुके हैं । उनका कहना है कि क्लब की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार यदि प्रस्तुत किया जाना है, तो वरिष्ठ होने के नाते पहला मौका उन्हें मिलना चाहिए । क्लब के तथा क्लब की राजनीति की जानकारी रखने वाले डिस्ट्रिक्ट के लोगों का मानना/कहना है कि जवाहर गुप्ता को सचमुच में उम्मीदवार नहीं बनना है, उन्होंने तो बस सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी का रास्ता रोकने के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात उछाल दी है । दिलचस्प नजारा यह बना है कि क्लब में सुनील मल्होत्रा के नजदीकियों व समर्थकों की तरफ से कहा/सुना जा रहा है कि जवाहर गुप्ता वास्तव में ललित खन्ना के लिए रास्ता 'साफ करने' और सुनील मल्होत्रा को ललित खन्ना के 'रास्ते' से हटाने के लिए अपनी उम्मीदवारी का बुलडोजर लेकर आ गए हैं । मजे की बात यह है कि जवाहर गुप्ता जब क्लब के प्रेसीडेंट थे, तब उनके भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनने की बात जोरशोर से उठी थी, लेकिन उनके प्रेसीडेंट पद से उतरने के बाद उनके उम्मीदवार बनने की बात भी उतर गई और फिर खुद जवाहर गुप्ता ने खुद भी कभी अपनी उम्मीदवारी को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाई । क्लब में ही लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की 'जरूरतों' को पूरा कर पाना जवाहर गुप्ता के बस की बात नहीं है; इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का ख्बाव देखना उन्होंने छोड़ दिया है - लेकिन उन्हें यह भी मंजूर नहीं है कि क्लब से कोई और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन जाये; इसलिए उन्होंने सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को रोकने के लिए हर हथकंडा अपनाया हुआ है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए ललित खन्ना को तैयारी करता और डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों का समर्थन जुटाता देख जवाहर गुप्ता को अपना 'मकसद' पूरा होता हुआ लग रहा है । रोटरी क्लब दिल्ली विकास में ललित खन्ना की उम्मीदवारी का वास्ता देकर सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी का विरोध करने वालों की संख्या बढ़ी है, उससे जवाहर गुप्ता का काम आसान हो गया है और उन्हें लग रहा है कि सुनील मल्होत्रा के नजदीकियों और समर्थकों ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को जिस गंभीरता से लिया है, उसके चलते सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के चांस अब बहुत ही कम रह गये हैं । कुछेक लोग हालाँकि सुनील मल्होत्रा और ललित खन्ना की उम्मीदवारी से डरे उनके नजदीकियों व समर्थकों को समझा रहे हैं कि ललित खन्ना दो बार पहले भी उम्मीदवार रह चुके हैं और असफल रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है; इस समझाइस से सुनील मल्होत्रा को कुछ बल मिलता नजर आता है, कि तभी कोई न कोई उन्हें ध्यान दिला देता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने जा रहे दीपक गुप्ता भी तो तीसरी बार में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जा सके थे - इसलिए ललित खन्ना की तीसरी बार की उम्मीदवारी को हल्के में लेने की जरूरत नहीं है । अगले रोटरी वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति जिस तरह से थकी थकी सी लग रही है, उसमें ललित खन्ना की उम्मीदवारी को और जोर मिलता दिख रहा है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी को मिल रहे जोर के चलते सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के लिए संकट और गहरा गया है ।

Friday, August 17, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा की बदनामी और कभी किसी के काम न आने वाली अपनी छवि/पहचान के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए अपने पहले ही कार्यक्रम पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप जुटाना मुश्किल हो रहा है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए पेम वन के रूप में किया जाने वाला अपना पहला कार्यक्रम ही भारी मुसीबत बन गया है । उल्लेखनीय है कि 23 सितंबर को प्रस्तावित पेम वन के आयोजन के लिए करीब एक महीने का ही समय बचा रह गया है, लेकिन दीपक गुप्ता अभी तक पेम वन को स्पॉन्सर करने वाले क्लब्स ही तय नहीं कर पाए हैं, और जो क्लब स्पॉन्सर करने के लिए जबर्दस्ती राजी भी हुए हैं - या राजी करवाए गए हैं, वह पूरे दो लाख रुपए देने में आना-कानी कर रहे हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का ही कहना है कि पेम वन की स्पॉन्सरशिप को लेकर माहौल सब्जी बाजार जैसा बना हुआ है, जहाँ पैसों को लेकर भारी बारगेनिंग हो रही है - अधिकतर क्लब्स दो लाख रुपए देने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं । कई लोगों का कहना/पूछना है कि दीपक गुप्ता एक तरफ तो यह कहते/बताते हैं कि वह अपने कार्यक्रमों में सुभाष जैन के कार्यक्रमों जैसी तड़क-भड़क नहीं करेंगे - लेकिन पेम वन के लिए पैसे उनकी तुलना में करीब तीन गुना ले रहे हैं । उल्लेखनीय है कि सुभाष जैन ने अपने पेम वन के आयोजन को स्पॉन्सर करने वाले क्लब्स से 75 हजार रुपए लिए थे । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता को जब अपना कार्यक्रम सुभाष जैन की तरह भव्य तरीके से नहीं करना है, तो उन्हें तो उनसे भी कम पैसे लेने चाहिए - लेकिन वह उल्टा कर रहे हैं । कुछेक लोगों को लगता है कि दो लाख रुपए की रकम डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता को सुझाई होगी, और इस तरह अपनी जेब भरने का जुगाड़ किया होगा - लेकिन जो अब दीपक गुप्ता के लिए परेशानी का सबब बन गई है ।
दीपक गुप्ता को इस मामले में सबसे बड़ा झटका रोटरी क्लब दिल्ली विकास के प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा से लगा है । सुनील मल्होत्रा से अपनी नजदीकी का वास्ता देकर मुकेश अरनेजा ने उन्हें आश्वस्त किया था कि उनसे तो स्पॉन्सरशिप एक बार कहने से ही मिल जाएगी । दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा की जोड़ी ने सुनील मल्होत्रा को अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाने और समर्थन देने का लालच भी दिया हुआ है । इसके बावजूद, सुनील मल्होत्रा से उन्हें स्पॉन्सरशिप मिलती नहीं दिख रही है । रोटरी क्लब दिल्ली विकास में दरअसल प्रथा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के कार्यक्रमों में जो भी पैसा देना होता है, वह प्रेसीडेंट और प्रेसीडेंट इलेक्ट आधा-आधा अपनी अपनी जेब से देते हैं । दीपक गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह हुई है कि पेम वन के लिए प्रेसीडेंट इलेक्ट अरुण गुप्ता भी अपने हिस्से के एक लाख रुपए देने को तैयार नहीं हो रहे हैं । अरुण गुप्ता और सुनील मल्होत्रा ने दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा को बता दिया है कि वह दोनों मिल कर एक लाख रुपए ही दे पायेंगे । रोटरी क्लब दिल्ली विकास को डिस्ट्रिक्ट के एक बड़े और अच्छे क्लब के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जो अपने कार्यक्रमों को तो खासी भव्यता के साथ आयोजित करता ही है, डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेता है । प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अपने विभिन्न कार्यक्रमों में मदद और सहभागिता के लिए सबसे पहले रोटरी क्लब दिल्ली विकास के पदाधिकारियों की तरफ ही देखता है । इस नाते भी, और प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा की सक्रियता तथा अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उनकी चाहत को देखते हुए और मुकेश अरनेजा के साथ उनकी नजदीकी के चलते दीपक गुप्ता को पूरा विश्वास था कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास से तो उन्हें पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप की पूरी रकम आराम से मिल ही जाएगी । लेकिन उसमें भी उन्हें अड़ंगा लगता दिख रहा है ।
रोटरी क्लब दिल्ली विकास से मिले इस झटके का असर यह होता दिख रहा है कि स्पॉन्सरशिप के लिए राजी हुए अन्य क्लब्स के पदाधिकारियों ने भी दो लाख रुपए देने में आनाकानी करना शुरू कर दिया है और कोई पचास हजार तो कोई पिचहत्तर हजार और कोई एक लाख रुपए ही देने की बात कर रहा है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्होंने जिन मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया है, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी छवि बहुत ही खराब है, और लोगों को लगता है कि मुकेश अरनेजा ने रोटरी को जैसे अपना धंधा बना लिया है । डीआरएफसी के रूप में उन पर क्लब्स से पैसे ऐंठने के गंभीर आरोप रहे हैं । मुकेश अरनेजा दूसरों से तो हिसाब-किताब माँगने और दूसरों के हिसाब-किताब जाँचने में खूब दिलचस्पी लेते हैं, लेकिन अपने हिसाब-किताब देने में बचते-छिपते हैं । मुकेश अरनेजा पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर थे; पिछले रोटरी वर्ष में शरत जैन के गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर तो मुकेश अरनेजा रोटरी इंटरनेशनल तक जा पहुँचे थे, लेकिन सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर वह चुप्पी साधे हुए हैं । पेम वन के स्पॉन्सरशिप के लिए दो लाख रुपए प्रति क्लब की रकम तय करने में भी मुकेश अरनेजा की मिलीभगत को देखा/पहचाना जा रहा है । दीपक गुप्ता को इस मामले में 'अपने' असिस्टेंट गवर्नर्स से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है । इसके अलावा, लोगों के बीच अपनी बुरी पहचान के चलते भी दीपक गुप्ता को स्पॉन्सरशिप जुटाना मुश्किल हो रहा है । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता खुद चूँकि कभी किसी के काम नहीं आए हैं, इसलिए उनकी मदद करने तथा उनके कार्यक्रमों में सहभागिता करने को लेकर किसी में कोई उत्साह नहीं है । पेम वन के रूप में अपने पहले ही कार्यक्रम को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता जिस तरह से मुसीबत में घिर गए हैं, उसे देखते हुए उनके गवर्नर-काल को लेकर उनके अपने ही नजदीकी और शुभचिंतक आशंकित हो गए हैं ।

Wednesday, January 21, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ज्ञानचंद गुप्ता द्धारा सतीश सिंघल की मीटिंग का जिम्मा लेने के कारण रोटरी क्लब दिल्ली विकास में मचे घमासान ने क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता के लिए तो फजीहत खड़ी की ही है, साथ ही मीटिंग के मूल उद्देश्य को भी पृष्ठभूमि में धकेल दिया है

नई दिल्ली । ज्ञानचंद गुप्ता ने सतीश सिंघल की मीटिंग का 'जिम्मा' लेकर रोटरी क्लब दिल्ली विकास में खासा बबाल पैदा कर दिया है, और क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता के लिए फजीहत खड़ी कर दी है । दरअसल जो बबाल पैदा हुआ, उसके लिए जवाहर गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया गया; और फिर सतीश सिंघल के समर्थकों ने जवाहर गुप्ता पर दीवाली मेले का हिसाब न देने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया है । इस तरह, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के चलते डिस्ट्रिक्ट का एक प्रमुख क्लब न सिर्फ खासे विवाद में फँस गया है, बल्कि क्लब के लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के काम में भी लग गए हैं ।
रोटरी क्लब दिल्ली विकास में इस कीचड़-कीचड़ खेल की शुरुआत कराने का 'श्रेय' ज्ञानचंद गुप्ता को दिया जा रहा है । ज्ञानचंद गुप्ता क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य हैं और क्लब में उनके लिए अच्छा सम्मान है । यह सम्मान उन्होंने अपनी सक्रियता और निष्पक्षता के चलते कमाया है । उन्हें जानने वाले लोगों का कहना है कि क्लब में अपनी अच्छी सक्रियता और धाक रखने के बावजूद उन्होंने कभी भी अपनी चलाने और अपने फैसले थोपने का प्रयास नहीं किया, तथा हमेशा ही क्लब में सर्वानुमति बनाने/बनवाने का काम किया । 'ऐसी' पहचान रखने वाले ज्ञानचंद गुप्ता को जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक उम्मीदवार सतीश सिंघल की पार्टी करने/करवाने का जिम्मा लेते हुए देखा गया तो क्लब के लोगों के कान खड़े हुए । क्लब के कई वरिष्ठ सदस्यों को तो इस बात की हैरानी हुई कि ज्ञानचंद गुप्ता तो 'इस तरह' के काम में पड़ते नहीं हैं, अब ऐसा क्या हुआ कि उन्हें 'इस तरह' का काम करने के लिए आगे आना पड़ा; क्लब के कई दूसरे सदस्यों का कहना रहा कि ज्ञानचंद गुप्ता के इस कदम से क्लब का नाम खराब हुआ है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास में हमेशा ही इस बात का ध्यान रखा गया है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में क्लब 'खुलेआम' किसी एक पक्ष के साथ नहीं 'दिखेगा' । ज्ञानचंद गुप्ता ने लेकिन क्लब की इस नीति के खिलाफ काम किया और अपने इस काम से क्लब को बदनाम किया/करवाया है ।
क्लब में यह समझने की कोशिश हुई कि ज्ञानचंद गुप्ता ने क्लब को बदनाम करने/करवाने वाला यह काम आखिर क्यों किया ? क्लब में सभी ने समझा/माना कि इस मामले में ज्ञानचंद गुप्ता दरअसल इस्तेमाल हो गए हैं, और दूसरे लोगों ने उन्हें आगे करके अपना उल्लू सीधा कर लिया है । जाना/समझा यह गया कि उक्त मीटिंग के पीछे हैं तो दूसरे लोग, लेकिन वह खुद तो सामने आये नहीं, और उन्होंने ज्ञानचंद गुप्ता को मोहरा बना लिया । इस तरह क्लब में ज्ञानचंद गुप्ता को क्लब की बदनामी करने/करवाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा, तो ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों ने क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता को निशाने पर ले लिया । ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों को लगता है कि सतीश सिंघल की मीटिंग कराने का जो काम ज्ञानचंद गुप्ता ने किया है, वह जवाहर गुप्ता को पसंद नहीं आया है; और इसीलिए वह ज्ञानचंद गुप्ता को बदनाम तथा उक्त मीटिंग को खराब करने/करवाने में लगे हुए हैं । जवाहर गुप्ता को निशाने पर लेने वाले लोगों का कहना है कि लगता है कि जवाहर गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने का मन बनाया है और इसीलिए उन्हें यह बात पसंद नहीं आई है कि ज्ञानचंद गुप्ता ने सतीश सिंघल की मीटिंग कराई है । ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों का आरोप है कि दीवाली मेले के आयोजन में तो जवाहर गुप्ता ने सतीश सिंघल के क्लब के लोगों से स्पॉन्सरशिप ले ली और अब सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने में लगे हुए हैं ।
ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों ने जवाहर गुप्ता पर गंभीर हमला बोलते हुए आरोप यह लगाया है कि जवाहर गुप्ता ने दीवाली मेले के हिसाब-किताब में गड़बड़ी की है, और इसीलिए उन्होंने दीवाली मेले का हिसाब-किताब अभी तक भी नहीं दिया है । आरोप लगाने वाले लोगों का कहना है कि जवाहर गुप्ता यह तो कहते/बताते रहते हैं कि दीवाली मेले में उन्हें नुकसान हुआ है और उनके अपने बहुत से पैसे लग गए हैं, किंतु जब भी उनसे हिसाब देने/बताने को कहो तो वह कन्नी काटने लगते हैं । दीवाली मेले में कुछेक काम जिन लोगों ने यह सोच कर किए थे कि 'इस' काम में होने वाला खर्चा उन्हें दीवाली मेले के एकाउंट से मिलेगा, वह भी खर्चा मिलने का अभी तक इंतजार ही कर रहे हैं - क्योंकि जवाहर गुप्ता ने 'उस' काम का खर्चा चुकाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । इसी से लोगों को कहने का मौका मिला है कि जवाहर गुप्ता ने पैसे इकट्ठे करने में तो दिलचस्पी दिखाई, लेकिन भुगतान करने में बचने की कोशिश की - और इसी से यह आरोप आया कि उन्होंने हिसाब-किताब में गड़बड़ी की है । जो लोग दीवाली मेले के हिसाब-किताब में जवाहर गुप्ता द्धारा गड़बड़ी किए जाने की बात को नहीं भी मानते हैं, उनका भी कहना लेकिन यह है कि जवाहर गुप्ता को हिसाब-किताब तो देना/बताना ही चाहिए । क्लब के लोगों के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का यह जो सिलसिला चला है, उसमें यह बात भी आई कि सतीश सिंघल ने दीवाली मेले के लिए जितनी स्पॉन्सरशिप दिलाने का वादा जवाहर गुप्ता से किया था, उतनी स्पॉन्सरशिप चूँकि सतीश सिंघल ने नहीं दिलाई - इसीलिए जवाहर गुप्ता उनसे खफा हैं; और इसीलिए वह ज्ञानचंद गुप्ता द्धारा सतीश सिंघल की मीटिंग कराने की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं और ज्ञानचंद गुप्ता की कार्रवाई को क्लब को बदनाम करने/करवाने वाले काम के रूप में प्रचारित करने की कानाफूसियाँ कर रहे हैं ।
ज्ञानचंद गुप्ता द्धारा सतीश सिंघल की मीटिंग का जिम्मा लेने के कारण रोटरी क्लब दिल्ली विकास में मचे घमासान ने क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता के लिए तो फजीहत खड़ी की ही है, साथ ही मीटिंग के मूल उद्देश्य को भी पृष्ठभूमि में धकेल दिया है ।

Friday, September 19, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में जवाहर गुप्ता के रवैये से झटका खाए शरत जैन की उम्मीदवारी का झंडा थामे अरनेजा गिरोह के नेताओं ने जवाहर गुप्ता को यह कहते हुए बदनाम करना शुरू किया है कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन के जरिये उन्होंने वास्तव में अपनी उम्मीदवारी की तैयारी शुरू की है

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन की तैयारी में जुटे रोटरी क्लब दिल्ली विकास के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता को 'पटाने' में विफल रहने के बाद अरनेजा गिरोह के लोगों ने उन्हें अपने निशाने पर ले लिया है । क्लब के भीतर और क्लब के बाहर अरनेजा गिरोह के जो लोग हैं वह इस बात को प्रचारित करने में लगे हैं कि जवाहर गुप्ता दीवाली मेले के आयोजन की जिम्मेदारी निभाने की आड़ में दरअसल अगले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत की जाने वाली अपनी उम्मीदवारी की तैयारी कर रहे हैं । जवाहर गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन की जिम्मेदारी लेने के लिए जो 'प्रयत्न' किए, उसमें कई लोगों को रोटरी में आगे बढ़ने की उनकी महत्वाकांक्षा के संकेत तो छिपे दिखे थे - लेकिन इन संकेतों के सहारे/भरोसे 'उद्देश्य' घोषित करने का काम उनके क्लब के लोगों ने ही किया । दरअसल डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन की जिम्मेदारी जवाहर गुप्ता को मिलने से कई लोग खुश नहीं हैं । खुश न होने वाले लोगों में उनके अपने क्लब के लोग भी हैं और उनके अपने जोन के लोग भी हैं । क्लब के कई बड़े लोग तो इसलिए खुश नहीं हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दीवाली मेले के आयोजन से जवाहर गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट में पहचान और साख बढ़ेगी; जोन के लोग इसलिए खफा हैं क्योंकि दीवाली मेले की आड़ में राजनीति करने का मौका उनसे छिन गया ।
जवाहर गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन की जिम्मेदारी मिलने के साथ लेकिन अरनेजा गिरोह के नेता 'काम' पर लग गए और उन्होंने जवाहर गुप्ता को इस बात के फिलर्स भेजना शुरू कर दिया कि वह दीवाली मेले की तैयारी में उनकी हर तरह से मदद करने के लिए तैयार हैं । जवाहर गुप्ता को पटाने के लिए उन्हें सीधा-सीधा ऑफर भी दे दिया गया कि उन्हें शरत जैन से स्पॉन्सरशिप भी दिलवा दी जाएगी । जवाहर गुप्ता ने लेकिन उनके जब किसी भी फिलर्स के प्रति उत्साह नहीं दिखाया और स्पॉन्सरशिप के ऑफर को यह कहकर ठुकरा दिया कि दीवाली मेले की तैयारी में वह उम्मीदवारों को किसी भी रूप में शामिल नहीं करेंगे - तो अरनेजा गिरोह के लोगों ने जवाहर गुप्ता को बदनाम करने की चाल चली । इस चाल को चलाने में उन्हें जवाहर गुप्ता के क्लब के कुछेक ऐसे प्रमुख लोगों की मदद भी मिल गई, जो पहले से ही जले-भुने बैठे थे । रोटरी क्लब दिल्ली विकास के कुछेक लोग इस बात के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना की भी बुराई करने से परहेज नहीं कर रहे हैं कि दीवाली मेले जैसे डिस्ट्रिक्ट फंक्शन के आयोजन की जिम्मेदारी एक क्लब को देने की बजाए जोन को देना चाहिए था । दीवाली मेला क्लब को देने के फैसले से नाराज इन लोगों का असली दुःख वास्तव में यह है कि इन्हें डर हुआ है कि इससे डिस्ट्रिक्ट में जवाहर गुप्ता का 'कद' बढ़ेगा - और जवाहर गुप्ता का कद यदि बढ़ेगा, तो स्वाभाविक रूप से 'इनका' कद घटेगा ।
रोटरी क्लब दिल्ली विकास के इन्हीं लोगों ने कहना शुरू किया कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी से जवाहर गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी की तैयारी शुरू कर दी है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास में दरअसल कई लोग हैं जो अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए पूरी तरह परफेक्ट समझते हैं । उन्हें समस्या बस इस बात में लगती है कि डिस्ट्रक्ट गवर्नर बनने के लिए पहले उम्मीदवार बनना पड़ता है - उनसे लंबी-लंबी 'छुड़वा' तो लो, पर उम्मीदवार बनने की बात आती है तो उनका दम निकलने लगता है । इसलिए अपना दम उन्होंने उसका दम निकालने के लिए बचा कर रखा है, जो उन्हें क्लब में सिर उठाता हुआ दिखता है । उनका रवैया बिलकुल ऐसा है : हम तो गवर्नर बन न सकेंगे, तुम्हें भी न बनने देंगे । डिस्ट्रिक्ट में यह चर्चा प्रायः सुनने को मिल जाती है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास एक बड़ा क्लब है, अच्छा क्लब है, बहुत सक्रिय क्लब है, बहुत काम करने वाला क्लब है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट को लीडरशिप प्रदान करने के मामले में पिछड़ा रहता है । तमाम चर्चा में कारण यही निकलता है कि क्लब में जो लोग प्रमुख बने हुए हैं, वह न तो खुद आगे आते हैं - और जो कोई आगे आता हुआ दिखता है उसका दम पहले ही निकाल देते हैं । जवाहर गुप्ता के साथ भी यही सुलूक किया जा रहा है । जवाहर गुप्ता चूँकि खासे सक्रिय हैं और बिलकुल नए नए काम कर रहे हैं, इसलिए उनके ही क्लब के कुछेक लोगों ने यह कहते हुए उन्हें बदनाम करने का अभियान छेड़ दिया है कि वह तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की तैयारी में यह सब कर रहे हैं ।
अरनेजा गिरोह के नेताओं ने इस बात को 'लपक' कर और जोर-शोर से कहना शुरू कर दिया है । अरनेजा गिरोह के नेताओं को लगता है कि इस तरह से दबाव बना कर वह जवाहर गुप्ता को अपनी छतरी के नीचे ले आयेंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल ने रोटरी क्लब दिल्ली विकास के कुछेक सदस्यों के साथ जिस तरह की 'धोखाधड़ी' की, उसके चलते दिल्ली विकास के सदस्यों के बीच रमेश अग्रवाल के खिलाफ गहरी नाराजगी और विरोध है । रमेश अग्रवाल के खिलाफ दिल्ली विकास के लोगों की इस नाराजगी और विरोध को शरत जैन की उम्मीदवारी के लिए खतरे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । रमेश अग्रवाल हालाँकि दावा करते रहे हैं कि दिल्ली विकास में उनके कुछ एजेंट हैं जो हालात को सँभाल लेंगे - और अपने उन्हीं एजेंटों के भरोसे रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में अपनी और/या शरत जैन की भूमिका/भागीदारी बनाने की तिकड़म लगाई थी - जवाहर गुप्ता ने लेकिन उनकी तिकड़म को अभी तक तो कामयाब नहीं होने दिया है ।
रमेश अग्रवाल और अरनेजा गिरोह के दूसरे नेताओं की समस्या और चिंता दरअसल यह है कि वह शरत जैन की उम्मीदवारी को दिल्ली के क्लब्स में अच्छे समर्थन के दावे तो बहुत करते हैं, लेकिन अपने दावे को सच बनाने/बताने वाले तथ्य नहीं जुटा पा रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेला रोटरी क्लब दिल्ली विकास को मिला तो उन्हें अपने दावे को सच बनाने/बताने का मौका हाथ लगता हुआ दिखा । उन्हें लगा कि वह जवाहर गुप्ता को मदद का, स्पॉन्सरशिप का ऑफर पहुँचायेंगे तो जवाहर गुप्ता उनके पास दौड़े चले आयेंगे - और तब वह लोगों को बता/दिखा सकेंगे कि जब दिल्ली का सबसे बड़ा क्लब उनके साथ है तो छोटे-मोटे क्लब्स तो उनके साथ हो ही जायेंगे । जवाहर गुप्ता ने लेकिन उनकी सारी 'योजना' पर पानी फेर दिया । शरत जैन की उम्मीदवारी का झंडा उठाए अरनेजा गिरोह को इससे जो तगड़ा झटका लगा है, उससे उबरने की कोशिश में ही अरनेजा गिरोह के नेताओं ने तथा दूसरे लोगों ने जवाहर गुप्ता को यह कहते हुए बदनाम करना शुरू किया है कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन के जरिये जवाहर गुप्ता ने वास्तव में अगले वर्षों में प्रस्तुत की जाने वाली अपनी उम्मीदवारी की तैयारी शुरू की है ।
हालाँकि इस बात का उनके पास कोई जबाव नहीं है कि यदि यह सच भी है तो इसमें आरोप वाली बात भला क्या है ?  

Friday, July 25, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के विभाजित प्रस्तावित डिस्ट्रिक्ट 3012 में पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल, शरत जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन कार्यक्रम को सफल बनाने की मुस्तैदी में शरत जैन की मुख्य लक्ष्य तक पहुँचने की राह में रोड़े बिछाने का काम तो नहीं कर रहे हैं ?

नई दिल्ली । शरत जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन में कमी न छोड़ने की रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ की कोशिशों ने दूसरे क्लब्स में लेकिन खासे बबाल पैदा कर दिए हैं । रोटरी क्लब गाजियाबाद सिटी के 26 जुलाई को होने वाले अधिष्ठापन समारोह को इन्होंने जिस षड्यंत्रपूर्ण तरीके से स्थगित करवाया, उससे क्लब के सदस्यों में भारी रोष है; तो दूसरी तरफ रोटरी क्लब दिल्ली विकास में अपने प्रति नाराजगी को निष्प्रभावी करने के लिए रमेश अग्रवाल ने जो हथकंडा अपनाया उससे मामला और बिगड़ गया है । रोटरी की चुनावी राजनीति में उम्मीदवार के क्लब के अधिष्ठापन कार्यक्रम का एक महत्व निश्चित ही होता है - पर उम्मीदवार और उसके समर्थकों के लिए यह महत्व लोगों के बीच अपनी पहुँच और स्वीकार्यता को जानने/पहचानने तथा 'जताने' के साथ-साथ अपनी कमजोरियों और अपनी राह के 'रोड़ों' को पहचानने के संदर्भ में होता है । क्लब के अधिष्ठापन समारोह के आयोजित होने तक उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन को लेकर कुछ काम कर चुका होता है - अधिष्ठापन समारोह उसके लिए फाइनल एग्जाम से पहले होने वाले मंथली टेस्ट की तरह; और या किसी प्रोजेक्ट के सचमुच शुरू होने से पहले के 'ट्रॉयल रन' की तरह होता है - जहाँ वह अभी तक किए गए अपने प्रयासों के नतीजों को देखता/समझता/पहचानता और 'दिखाता' है - तथा अपनी कमियों/कमजोरियों को भी चिन्हित करता है । रमेश अग्रवाल ने लेकिन क्लब के अधिष्ठापन समारोह को शरत जैन की उम्मीदवारी का फाइनल एग्जाम ही बना दिया है । रमेश अग्रवाल जिस तरह दिन में चार-चार छह-छह बार ईमेल भेज कर 'आओ' 'आओ' की गुहार लगा रहे हैं, उसने लोगों को बुरी तरह पका दिया है ।
रमेश अग्रवाल दरअसल कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं और इसलिए पूरी मुस्तैदी से जुटे हैं -  मुस्तैदी में लेकिन वह इस बात को जैसे भूल रहे हैं कि उनका मुख्य लक्ष्य क्लब के अधिष्ठापन समारोह को सफल बनाना नहीं, बल्कि शरत जैन को प्रस्तावित डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट चुनवाना है; और अधिष्ठापन समारोह को सफल बनाने की मुस्तैदी में वह वास्तव में शरत जैन की मुख्य लक्ष्य तक पहुँचने की राह में रोड़े बिछाने का काम कर रहे हैं । सीओएल के अपने चुनाव में भी रमेश अग्रवाल ने बड़ी मुस्तैदी दिखाई थी, लेकिन नतीजा उन्हें पराजय के रूप में ही मिला । सीओएल के चुनाव के एक 'दृश्य' का जिक्र करना यहाँ प्रासंगिक होगा - सीओएल के लिए नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में रमेश अग्रवाल को जब आशीष घोष से बुरी तरह हारने की सूचना मिली तब रमेश अग्रवाल ने आशीष घोष को बधाई देते हुए कहा था कि अभी तो आप खुश हो लीजिये, लेकिन सीधे चुनाव में तो मैं ही जीतूँगा । सीधे चुनाव की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई थी, लेकिन रमेश अग्रवाल ने अपने उस प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार के सामने, जिससे वह अभी अभी ही 'पिटे' थे, दावा करना शुरू कर दिया कि सीधे चुनाव में तो वही जीतेंगे । सीओएल के चुनाव के संदर्भ में कई लोगों का मानना और कहना है कि रमेश अग्रवाल को आशीष घोष ने नहीं हराया, बल्कि रमेश अग्रवाल को उसके खुद के अहंकार ने, उसकी खुद की बेवकूफियों ने और उसके खुद के चीमड़पने ने हराया ।
शरत जैन की उम्मीदवारी के कई एक शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि शरत जैन को रमेश अग्रवाल से मदद तो अवश्य ही लेनी चाहिए और उनके अनुभवों व संपर्कों का फायदा निश्चित ही उठाना चाहिए, लेकिन साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि रमेश अग्रवाल की कारस्तानियाँ उन्हें फायदा पहुँचाने की बजाये कहीं नुकसान तो नहीं पहुँचा रही हैं ? करीब तीन वर्ष पहले जब रवि चौधरी उम्मीदवार थे तब उन्हें कई लोगों ने समझाया था कि उन्हें अपने 'समर्थकों' की हरकतों को नियंत्रित करना चाहिए या उनसे अपने आप को अलग दिखाना चाहिए । रवि चौधरी इस समझाइश पर गौर करने की बजाये अपने बड़बोले और तिकड़मों को ही हुनर समझने वाले 'समर्थकों' के रंग में रंग गए थे, जिसका नतीजा यह हुआ कि जिन संजय खन्ना से उन्हें चुनाव जीतना था उन संजय खन्ना से तीन वर्ष बाद उन्हें खुशामद करनी पड़ रही है कि इस वर्ष तो वह उन्हें गवर्नर नॉमिनी चुनवा दें । रवि चौधरी के 'समर्थकों' - उनके एक समर्थक रमेश अग्रवाल भी थे - ने उनका जैसा कबाड़ा किया था, शरत जैन के साथ भी रमेश अग्रवाल वैसी ही हरकत करते हुए 'दिख' रहे हैं ।
रमेश अग्रवाल ने अपने चेले जेके गौड़ की मदद से रोटरी क्लब गाजियाबाद सिटी के 26 जुलाई को होने वाले अधिष्ठापन समारोह को स्थगित तो करवाया शरत जैन को फायदा पहुँचवाने के इरादे से, लेकिन इसका असर उल्टा पड़ता दिख रहा है । क्लब के सदस्यों में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि अपने फायदे के लिए शरत जैन, रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ की तिकड़ी ने उनका आयोजन खराब करवा दिया । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब गाजियाबाद सिटी के पदाधिकारियों ने अधिष्ठापन समारोह की सारी तैयारी कर ली थी - फोन करके आमंत्रितों को निमंत्रित कर लिया गया था, निमंत्रण पत्र छपवा लिए गए थे; निमंत्रण पत्र बँटते उससे पहले शरत जैन, रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ की तिकड़ी को इसकी जानकारी मिली तो उन्हें लगा कि इस आयोजन के कारण उनके आयोजन में उपस्थिति कहीं कम न रह जाए, सो वह रोटरी क्लब गाजियाबाद सिटी के आयोजन को स्थगित करवाने की मुहिम में जुट गए । खास बात यह है कि यह क्लब इन्हीं लोगों के समर्थक क्लब के रूप देखा/पहचाना जाता है; इसके बावजूद क्लब के पदाधिकारियों ने उसी तारीख को अपना आयोजन करने का फैसला किया, जिस दिन शरत जैन की उम्मीदवारी का प्रमोशन कार्यक्रम है और इन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी । रोटरी क्लब गाजियाबाद सिटी कोई ऐसा बड़ा क्लब नहीं है कि वह शरत जैन के प्रमोशन कार्यक्रम को कोई नुकसान पहुँचा देता; और फिर शरत जैन को भी यह देखने/समझने का मौका मिलता कि ऐसे कौन हैं जो उनके यहाँ की बजाये गाजियाबाद सिटी के आयोजन में जाना ज्यादा जरूरी समझते हैं, और तब शरत जैन उन पर और काम कर सकते थे । रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ लेकिन यदि ऐसा होने देते तो फिर अपने टुच्चेपन को कैसे प्रकट करते ?
रोटरी क्लब दिल्ली विकास में तो और भी बड़ा तमाशा हुआ । दिल्ली विकास के लोग पीएचएफ बनाने के मामले में की गई रमेश अग्रवाल की कारस्तानी से बड़े नाराज हैं । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल ने अपने गवर्नर-काल में पीएचएफ की मैचिंग को लेकर जो फार्मूला घोषित किया था, दिल्ली विकास के कई लोगों ने उस मैचिंग के हिसाब से अपने हिस्से की रकम दे दी थी; किंतु रमेश अग्रवाल की चूँकि रोटरी के काम की बजाए रोटरी की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी थी, इसलिए वह उन लोगों को पीएचएफ बनाने की कार्रवाई पूरी नहीं करवा सके और एक से दूसरे और फिर दूसरे से तीसरे चुनाव में व्यस्त रहने के चलते इस काम को बराबर टालते रहे । फिर उनका खुद का सीओएल का चुनाव आ गया । रमेश अग्रवाल ने रोटरी के काम को भी और रोटरी की राजनीति को भी एक 'ब्लैकमेलर' के तरीके से अंजाम दिया है । सीओएल के चुनाव में पीएचएफ के मामले को उन्होंने रोटरी क्लब दिल्ली विकास को ब्लैकमेल करने के जरिये के रूप में देखा/पहचाना और उन्हें बता दिया कि पहले मुझे सीओएल के चुनाव में वोट दो, फिर पीएचएफ बनाऊँगा । सीओएल चुनाव लेकिन रमेश अग्रवाल हार गए और अपनी हार का ठीकरा उन्होंने दिल्ली विकास के लोगों के सिर पर भी फोड़ा । उन्होंने साफ कह दिया कि सीओएल के चुनाव में चूँकि दिल्ली विकास ने उन्हें वोट नहीं दिया, इसलिए वह दिल्ली विकास के लोगों को पीएचएफ नहीं बनवायेंगे । रमेश अग्रवाल से मिले इस दो-टूक जबाव के बाद दिल्ली विकास के लोगों ने विनोद बंसल से बात की, तो विनोद बंसल ने 'अपने एकाउंट' से उनकी सभी की पीएचएफ की मैचिंग करवा दी । क्लब के आगरा में हुए अधिष्ठापन समारोह में इस मामले को लेकर क्लब के लोगों ने विनोद बंसल का तो आभार जताया और रमेश अग्रवाल की जमकर थू-थू की । क्लब के लोगों ने रमेश अग्रवाल को सबक सिखाने जैसी बातें भी कीं । रमेश अग्रवाल लेकिन अभी भी बाज नहीं आ रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि दिल्ली विकास में उनके कई एजेंट हैं जो जरूरत पड़ने पर उनके काम आयेंगे । रमेश अग्रवाल का दावा है कि दिल्ली विकास में उनके जो एजेंट हैं वह शरत जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन कार्यक्रम में भी आयेंगे और शरत जैन को वोट भी देंगे/दिलवायेंगे । यह दावा करते हुए रमेश अग्रवाल लेकिन यह भूल जाते हैं कि दिल्ली विकास में के उनके एजेंट सीओएल के चुनाव में उन्हें वोट नहीं दिलवा सके थे, और वह चुनाव हार गए थे ।

Wednesday, November 7, 2012

अनूप मित्तल की चेयरमैनी में होने वाला डिस्ट्रिक्ट 3010 का दीवाली मेला झगड़ों और विवादों के कारण ज्यादा चर्चा में है

नई दिल्ली | रोटरी क्लब दिल्ली विकास के दीवाली मेले ने डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी में जुटे लोगों की फूट को सामने ला दिया है | उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की आयोजन समिति का एक प्रमुख सदस्य है; और प्रमुख सदस्य होने के नाते इस क्लब के अध्यक्ष शिव शंकर अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की आयोजन समिति में को-चेयरमैन के पद पर हैं | इस कारण से उम्मीद की जाती थी कि वह अपना समय, अपनी एनर्जी और अपने साधन डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में लगायेंगे - लेकिन शिव शंकर अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी में जुटने की बजाये अपने क्लब के दीवाली मेले को आयोजित करने में जुटे नज़र आये | इस बाबत, उनकी तरफ से लोगों को सफाई सुनने को मिली कि उनका क्लब बड़ा क्लब है, उनके क्लब के सदस्य डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाते हैं, उनके क्लब के लोग अपने ही कार्यक्रम करने पर जोर देते हैं, आदि-इत्यादि | लोगों को शिव शंकर अग्रवाल के यह तर्क हजम नहीं हुए हैं | हालाँकि एक तरह से देखें तो यह तर्क सही दीखते हैं; लेकिन लोगों का कहना है कि शिव शंकर अग्रवाल ने जब डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की आयोजन समिति का हिस्सा होना स्वीकार कर लिया था, तो उन्हें उसी की तैयारी में जुटना चाहिए था | अध्यक्ष होने के नाते वह क्लब के लीडर हुए और एक लीडर होने के नाते उन्हें अपने क्लब के लोगों को डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में शामिल होने के लिए ही प्रेरित करना चाहिए था | लोगों का कहना है कि इसके आलावा, उन्हें यदि अपने क्लब में दीवाली के नाम पर कुछ करना ही था, तो ऐसा कुछ करते या ऐसे समय करते जिससे कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी डिस्टर्ब न होती और उसकी तैयारी में उनकी पूरी सामर्थ्य लगती |
शिव शंकर अग्रवाल ने ऐसा कुछ नहीं किया, इससे लोगों को लगा कि बात दरअसल कुछ और है | डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी में चूँकि शुरू से ही खटपट देखी/सुनी जा रही थीं - इसलिए लोगों को और भी विश्वास हुआ कि शिव शंकर अग्रवाल का अपने क्लब का अलग से दीवाली मेला आयोजित करने के फैसले का उसी खटपट से संबंध है | बात निकलना शुरू हुई तो फिर निकलती ही चली गई और पता चला कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी को लेकर शुरू से ही झगड़े थे | पहली बार यह झगड़ा तब सामने आया जब रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के अध्यक्ष अनूप मित्तल को चेयरमैन चुन लिया गया | कुछेक अध्यक्षों ने आरोप लगाया कि अनूप मित्तल ने उन्हें धोखे में रखकर षड़यंत्रपूर्वक अपने आप को चेयरमैन चुनवा लिया और इस तरह दीवाली मेले को हाईजैक कर लिया | जबावी कार्रवाई  में, इस आरोप के पीछे शिव शंकर अग्रवाल को बताया गया और कहा गया कि वह चूंकि खुद चेयरमैन नहीं बन सके इसलिए इस तरह की बातें फैला रहे हैं | शिव शंकर अग्रवाल ने इसका जबाव यह कर दिया कि अनूप मित्तल चेयरमैन बने हैं, इस पर उन्हें आपत्ति नहीं है; उनकी आपत्ति लेकिन चेयरमैन चुने जाने के तरीके को लेकर है | शिव शंकर अग्रवाल की नाराजगी को दूर करने के लिए उन्हें को-चेयरमैन बना दिया गया | झगड़े लेकिन तब भी दूर नहीं हुए | एक बड़ा झगड़ा मेले के आयोजन स्थल को लेकर हुआ | शिव शंकर अग्रवाल और अन्य कुछेक लोगों की शिकायत रही कि मेला जहाँ हो रहा है, वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं होगा, इसलिए मेला किसी ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ लोग आसानी से पहुँच सकें | अनूप मित्तल का आरोप रहा कि मेला स्थल का चयन जब सभी लोगों की रजामंदी लेकर ही किया गया था, तब फिर उसका विरोध करने की जरूरत क्यों आ पड़ी - इससे ही समझा जा सकता है कि कुछेक लोगों का काम सिर्फ विरोध करना ही है | अनूप मित्तल ने यह आरोप भी लगाया है कि उन्हें सिर्फ दो-चार अध्यक्षों से ही मदद मिल रही है और बाकी लोग झगड़े पैदा करने की ही कोशिशों में ही लगे हुए हैं |
अनूप मित्तल से नाराज लोगों का कहना लेकिन यह रहा है कि अनूप मित्तल की कार्यशैली ने ही झगड़े पैदा करने के मौके बनाये हैं | मेले के आयोजन की तैयारी के लिए जब कमेटी बनी हुई है तो उन्हें सभी फैसले कमेटी के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श करके ही करने चाहिए - लेकिन वह मनमाने तरीके से फैसले कर लेते हैं और अपने फैसलों से वह बस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल को खुश करने का प्रयास करते हैं | एक सीधा आरोप यह लगा है कि अनूप मित्तल ने दीवाली मेले को अपने लिए 'बेस्ट प्रेसीडेंट' का अवार्ड लेने का जरिया मान/बना लिया है | इसी कारण से मेले की तैयारी में रमेश अग्रवाल का हस्तक्षेप बढ़ गया और झगड़े पैदा हुए | मेले की आयोजन समिति के लेटर पेड और मेले के निमंत्रण पत्र में किसके नाम छपेंगे या नहीं छपेंगे जैसी बातों पर झगड़ा रमेश अग्रवाल के हस्तक्षेप के कारण ही हुआ | समिति के सदस्यों का ही आरोप रहा कि चेयरमैन के रूप में अनूप मित्तल ने समिति के लोगों से बात न करके, रमेश अग्रवाल से बात की और रमेश अग्रवाल ने उन्हें लेटर पेड पर विनोद बंसल और संजय खन्ना के नाम न प्रकाशित करने की हिदायत दी | कुछेक अध्यक्षों ने इस पर बबाल मचा दिया | उनका कहना रहा कि पहली बात तो यह कि रमेश अग्रवाल होता कौन है यह तय करने वाला कि लेटर पेड पर किसका नाम छपेगा या नहीं छपेगा; और दूसरी बात यह कि अनूप मित्तल ने रमेश अग्रवाल से इस बारे में पूछा ही क्यों ? रमेश अग्रवाल और अनूप मित्तल ने पहले तो इस बबाल की अनदेखी करने और अपनी मनमानी करने की कोशिश की, लेकिन जब विरोध करने वाले अध्यक्षों ने खुली धमकी दी कि लेटर पेड पर विनोद बंसल और संजय खन्ना के नाम नहीं छपे तो वह दीवाली मेले के आयोजन से अलग हो जायेंगे, तब रमेश अग्रवाल का दिमाग ढीला हुआ और उन्होंने अनूप मित्तल को अनुमति दी कि वह वैसा कर लें जैसा दूसरे अध्यक्ष कह रहे हैं | इस झमेले में लेटर पेड छपने में काफी देर हो गई | मेले के निमंत्रण पत्र को लेकर तो रमेश अग्रवाल ने और तमाशा खड़ा कर दिया - मेले की तैयारी से जुड़े अध्यक्षों के यह देख/जान कर और बुरा लगा कि अनूप मित्तल भी उनकी हाँ में हाँ मिला रहे हैं | रमेश अग्रवाल ने फ़रमान जारी किया कि निमंत्रण पत्र पर सिर्फ उनका ही नाम होगा और आयोजन समिति के सदस्यों - यानि अध्यक्षों का नाम नहीं होगा | अध्यक्षों ने इस पर साफ कह दिया कि यदि ऐसा होगा तो फिर मेले का आयोजन रमेश अग्रवाल खुद ही कर लें | रमेश अग्रवाल को एक बार फिर वह करना पड़ा - मुहावरे की भाषा में जिसे 'थूक कर चाटना' कहते हैं |
इससे पहले रमेश अग्रवाल लेकिन दीवाली मेले की तैयारी में जुटे लोगों - यानि अध्यक्षों के बीच झगड़ा बढ़ा चुके थे | अधिकतर अध्यक्षों को विश्वास हो चला कि अनूप मित्तल दीवाली मेले को अपने प्रमोशन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं; और इसी विश्वास के चलते वह मेले की तैयारी में दिलचस्पी लेने से बचने लगे | शिव शंकर अग्रवाल ने अपने क्लब का अलग से दीवाली मेला आयोजित करने का फैसला किया तो यह साफ हो गया कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में अब उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं रह गई | ऐसे में डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन की जिम्मेदारी पूरी तरह अनूप मित्तल पर आ पड़ी | अनूप मित्तल ने मेले के आयोजन की जिम्मेदारी तो जैसी कि लोगों के बीच चर्चा है कि अच्छे से संभाली और निभाई है, लेकिन आयोजन समिति के लोगों को साथ रखने में वह जिस तरह से विफल रहे - उससे डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन में 'रोटरी' वाला जो तत्व होता है, वह गायब हो गया है | कहा/माना जा रहा है कि वह इवेंट तो मैनेज कर सकते हैं, लेकिन साथियों को साथ बनाये रखने का हुनर उन्हें अभी सीखना है | इस हुनर के अभाव के चलते ही, अनूप मित्तल की चेयरमैनी में होने वाला डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेला झगड़ों और विवादों के कारण ज्यादा चर्चा में है |