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Friday, July 19, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के अधिष्ठापन समारोह में प्रेसीडेंट्स, असिस्टेंट गवर्नर्स के साथ-साथ वरिष्ठ रोटेरियंस व गवर्नर्स की उत्साही उपस्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रभावी रूप से उत्साहित करने का काम किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के क्लब के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को और मजबूती देने का काम किया है । वास्तव में उक्त अधिष्ठापन समारोह को ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार की झलक पाने-दिखाने के रूप में ही डिजाईन किया गया था; और कह सकते हैं कि उसका नतीजा भी उनकी तैयारी के अनुरूप ही निकला/रहा । उल्लेखनीय है कि चुनावी राजनीति के चलते रोटरी में दरअसल यह प्रथा ही बन गई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह नए पदाधिकारियों की बजाये वास्तव में उम्मीदवार का 'शो' बन जाता है - और उसमें जुटे लोगों की पहचान के आधार पर उम्मीदवार की ताकत और कमजोरी का शुरुआती आकलन किया जाता है । संख्या के हिसाब से रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के - नहीं, ललित खन्ना के - समारोह में भीड़ तो अच्छी जुटी ही; उस भीड़ में प्रेसीडेंट्स और असिस्टेंट गवर्नर्स की अच्छी-खासी उपस्थिति ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के शुभचिंतकों को बम बम भी किया । समारोह में प्रायः सभी असिस्टेंट गवर्नर्स थे और प्रेसीडेंट्स की संख्या भी 70 के करीब सुनी/बताई गई । समारोह में डिस्ट्रिक्ट के प्रायः हर क्षेत्र - दिल्ली, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों तथा सोनीपत के क्लब्स के सदस्यों की अच्छी खासी संख्या थी; और कई क्लब्स के छोटे/बड़े समझे जाने वाले नेता लोग भी समारोह की रौनक बढ़ा रहे थे ।  गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों तथा सोनीपत के रोटेरियंस की उपस्थिति ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को खासा उत्साहित करने का काम किया ।
समारोह में मौजूद डिस्ट्रिक्ट के कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस ने इस मजेदार संयोग को भी रेखांकित किया कि जेके गौड़ और उनके बाद जिस उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह इस जगह पर हुआ है, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव उसी ने जीता है । उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना लेकिन संयोगों पर निर्भर नहीं हैं; और कई एक वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना रहा कि ललित खन्ना इस बार अपने चुनाव अभियान में कहीं कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं और हर तरफ ध्यान दे रहे हैं । पिछले महीनों में ललित खन्ना ने प्रेसीडेंट्स तथा वरिष्ठ रोटेरियंस के बीच काफी प्रभावी तरीके से संपर्क-अभियान चलाया है - समारोह में डिस्ट्रिक्ट के कई आम और खास लोगों की उपस्थिति को उनके उसी संपर्क-अभियान के नतीजे के रूप में देखा/समझा गया है । ललित खन्ना ने इस बार के अधिष्ठापन समारोह को इस तरह से डिजाईन किया कि उनका समारोह सिर्फ समारोह के रूप में ही नहीं था, बल्कि उसमें रोटरी के उद्देश्य व लक्ष्य भी थे - अधिष्ठापन समारोह में क्लब ने 17 नए प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की घोषणा की तथा दो ग्लोबल ग्रांट्स के प्रोजेक्ट्स घोषित हुए; ग्लोबल ग्रांट्स के तहत घोषित किए गए दो प्रोजेक्ट्स में एक में ललित खन्ना का क्लब एक विदेशी क्लब से मदद ले रहा है, तथा दूसरे में उनका क्लब एक अन्य विदेशी क्लब को मदद दे रहा है । समारोह में एक और खास बात यह रही कि इसमें इनरव्हील की एक पूर्व प्रेसीडेंट तथा दो पूर्व एसोसिएटेड प्रेसीडेंट तथा ललित खन्ना की पत्नी नीलु खन्ना के अलावा दो अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट चेयरपरसन उपस्थित हुईं - और उनकी उपस्थिति ने रोटेरियंस को, खासतौर से प्रेसीडेंट्स को रोटरी परिवार की अवधारणा से परिचित होने का मौका दिया और उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया ।
ललित खन्ना की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के संपर्क-अभियान के असर को जाँचने/परखने तथा उसे और गति देने के उद्देश्य से आयोजित हुए समारोह में कई गवर्नर्स के शामिल होने से भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को 'वजन' मिलता नजर आया । हालाँकि यह देखने की बात होगी कि 'समय' पर कौन उनकी उम्मीदवारी के सचमुच काम आता है, लेकिन कई एक गवर्नर्स ने जिस उत्साह के साथ ललित खन्ना की और उनकी लीडरशिप क्वालिटी की प्रशंसा की, उससे उपस्थित लोगों के बीच ललित खन्ना की 'पहचान' का रंग कुछ गाढ़ा तो हुआ ही - और यह बात उनकी उम्मीदवारी के अभियान को सुदृढ़ तो करती नजर आई भी । ललित खन्ना की उम्मीदवारी की नाव को पिछले दिनों कुछ हिचकोले खाने पड़े हैं, लेकिन क्लब के अधिष्ठापन समारोह को भव्यता तथा रोटेरियंस की व्यापक उपस्थिति के साथ आयोजित करके ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी की नाव को स्थिरता व मजबूती देने का जो काम किया है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को रोमांचक बना दिया है । 

Monday, May 21, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डीआरएफसी बनने की पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल की कोशिशों को भावी गवर्नर्स दीपक गुप्ता व आलोक गुप्ता के विरोध के चलते झटका लगता दिख रहा है, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता से मदद माँगने का उनका प्रयास भी सफल नहीं हो सका है

नई दिल्ली । डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) पद पाने की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की कोशिशें सफल होती हुई नहीं दिख रही हैं, और इस मामले में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने भी उनकी मदद करने में दिलचस्पी नहीं ली है । रमेश अग्रवाल के लिए राहत की बात सिर्फ यही है कि डीआरएफसी पद अपने ही पास बनाए रखने की मुकेश अरनेजा की कोशिशें भी पिटती दिख रही हैं । मजे की बात यह रही कि डीआरएफसी पद को लेकर मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के बीच खासी छीनाझपटी जैसी स्थिति बनी, जिसमें दोनों की ही पहली कोशिश तो उक्त पद खुद हथियाने की रही - और दूसरी कोशिश के रूप में उनका प्रयास यह रहा कि उन्हें नहीं, तो दूसरे को भी उक्त पद न मिले । उनके इस झगड़े के चलते डिस्ट्रिक्ट 3012 में डीआरएफसी के पद के लिए फैसला होना मुश्किल बना हुआ है, और फैसले की घड़ी लगातार टलती ही जा रही है । उनके इस झगड़े का फायदा लेकिन अब जेके गौड़ को मिलता नजर आ रहा है । डीआरएफसी का पद जेके गौड़ को मिलने की संभावना के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में अशोक अग्रवाल को अपने लिए भी मौके बनते दिख रहे हैं । अशोक अग्रवाल को अगले रोटरी वर्ष में यूँ तो डिस्ट्रिक्ट एडवाईजर जैसा महत्त्वपूर्ण पद मिला है, लेकिन उनके पास लोगों से मिलते रहने का कोई आधिकारिक 'बहाना' नहीं है । अशोक अग्रवाल को इस बात की बड़ी शिकायत रही है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार अमित गुप्ता को तो क्लब्स के प्रेसीडेंट्स तथा अन्य लोगों से संपर्क करने तथा संपर्क में रहने के बहुत मौके मिलेंगे, जबकि उन्हें नहीं मिलेंगे । लेकिन जेके गौड़ के डीआरएफसी बनने पर अशोक अग्रवाल को उम्मीद है कि वह अपनी उम्मीदवारी के लिए इसका फायदा उठा सकेंगे ।
रमेश अग्रवाल की डीआरएफसी पद पाने की कोशिशों का विफल होना रमेश अग्रवाल के लिए बड़े झटके की बात है । दरअसल डीआरएफसी पद पाने की उनकी कोशिशों की बातें रोटरी के बड़े नेताओं तक के बीच चर्चा का विषय रही हैं । यह इसलिए भी हुआ, क्योंकि इसके लिए उन्होंने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता तक की मदद लेने का प्रयास किया । सुशील गुप्ता के जरिये उन्होंने अपने डिस्ट्रिक्ट के दो भावी गवर्नर्स दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता का समर्थन जुटाने का प्रयास किया । वास्तव में इन दोनों के विरोध के चलते ही रमेश अग्रवाल को डीआरएफसी पद अपने से दूर जाता दिख रहा था, लिहाजा उन्होंने सोचा और प्रयास किया कि सुशील गुप्ता यदि इन दोनों को कहेंगे तो फिर यह विरोध की जगह उनका समर्थन करने लगेंगे । रमेश अग्रवाल की लेकिन बदकिस्मती रही कि जिन सुशील गुप्ता से उन्होंने मदद की उम्मीद की थी, उन सुशील गुप्ता ने उनकी मदद करने में दिलचस्पी ही नहीं ली । रमेश अग्रवाल ने सुशील गुप्ता का नाम लेकर दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता पर दबाव बनाने का भी प्रयास किया, लेकिन वह दोनों उनके झाँसे में आए नहीं । डीआरएफसी का पद पाना रमेश अग्रवाल को दरअसल इसलिए जरूरी लगा, ताकि रोटरी की बड़ी राजनीति में वह अपनी अहमियत बना/दिखा सकें । रमेश अग्रवाल तमाम कोशिशों के बावजूद रोटरी की बड़ी राजनीति में अपने लिए कोई जगह नहीं बना सके हैं । ले दे कर उनके पास विन्स का ही 'मंच' है, जिसे लेकिन रोटरी की बड़ी राजनीति में कोई गंभीरता से नहीं लेता है । रमेश अग्रवाल रोटरी की 'व्यवस्था' व राजनीति में आगे बढ़ना चाहते हैं; इसलिए उन्हें जरूरी लगा कि रोटरी में उनके पास जब कोई बड़ा असाइनमेंट नहीं है - तो कम से कम डिस्ट्रिक्ट में ही वह डीआरएफसी बन जाएँ ।
दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता लेकिन उनकी जरूरत के पूरा होने के आड़े आ गए । मुकेश अरनेजा ने भी भरसक प्रयास किया कि डीआरएफसी के रूप में अगले तीन वर्ष का टर्म उन्हें और मिल जाए, लेकिन डीआरएफसी के रूप में मौजूदा टर्म में उनकी भूमिका इतनी बेईमानीभरी रही कि किसी ने भी उनके नाम पर विचार करने की जरूरत तक नहीं समझी । डीआरएफसी के पद पर रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के सीन से बाहर होने पर जेके गौड़ की लॉटरी निकलती दिख रही है । एक विकल्प हालाँकि शरत जैन का भी है, लेकिन उन्हें शायद पता है कि उनकी दाल नहीं ही गलेगी, इसलिए उन्होंने अपने आपको इस दौड़ से अलग ही रखा है । ऐसे में एक अकेले जेके गौड़ ही बचे रह जाते हैं । उम्मीद की जा रही है कि न चाहते हुए भी तीनों भावी गवर्नर्स उन्हें ही डीआरएफसी चुन लेंगे । इससे जेके गौड़ की किस्मत का दरवाजा भी खुलता हुआ दिखा है, अन्यथा पिछले दो मौकों पर उन्हें फजीहत का ही सामना करना पड़ा था : पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए हुए चुनाव में उन्हें रमेश अग्रवाल के मुकाबले पराजय का सामना करना पड़ा, और फिर दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने का उनका मौका मुकेश अरनेजा ने उनसे छीन लिया । मजेदार संयोग है कि रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा से बारी बारी से झटका खा चुके जेके गौड़ को अब इन दोनों के झगड़े के चलते डीआरएफसी का पद मिलता नजर आ रहा है । जेके गौड़ के डीआरएफसी बनने में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अशोक अग्रवाल को अपना फायदा भी होता हुआ दिख रहा है । उन्हें लग रहा है कि जेके गौड़ के डीआरएफसी बनने से उन्हें भी क्लब्स के पदाधिकारियों के बीच पैठ बनाने तथा उन्हें प्रभावित करने का मौका मिलेगा ।

Monday, May 14, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद जेके गौड़ से छीनने की मुकेश अरनेजा की कोशिश की सफलता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव अभियान को भी रोमांचक बनायेगी

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता की तरफ से जेके गौड़ की बजाये मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाये जाने के मिल रहे संकेतों ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों में हलचल पैदा करने का काम किया है, और इस हलचल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अशोक अग्रवाल की स्थिति को झटका देने का काम किया है । अशोक अग्रवाल को जेके गौड़ के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है, ऐसे में जेके गौड़ को यदि आश्वस्त करने के बाद भी दीपक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर नहीं बनाते हैं - तो यह जेके गौड़ के साथ-साथ अशोक अग्रवाल के लिए भी झटके वाली बात तो है ही । जेके गौड़ अपने समर्थकों से हालाँकि दीपक गुप्ता पर दबाव डलवा रहे हैं कि वह जेके गौड़ को ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाएँ; और उन्हें विश्वास भी है कि उनके समर्थक उन्हें ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने के लिए दीपक गुप्ता को राजी कर लेंगे । हालाँकि मुकेश अरनेजा को भी कम नहीं समझा जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि वह एक बार जब डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद जेके गौड़ से छीनने में कामयाब हो गए हैं, तो अब वह उसे आसानी से वापस तो नहीं ही जाने देंगे । दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद को लेकर जेके गौड़ और मुकेश अरनेजा के बीच छिड़ी यह लड़ाई वास्तव में इसलिए भी दिलचस्प हो गई है, क्योंकि इससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के अभी बने हुए समीकरणों पर भी सीधा असर पड़ेगा - और यह लड़ाई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी सीन को विभाजित करके दो पक्षीय बनाने का काम करेगी ।
जेके गौड़ बेचारे दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की जिम्मेदारी संभालने की तैयारी कर चुके थे, इसलिए उन्हें जब संकेत मिले कि दीपक गुप्ता उनकी बजाये मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने जा रहे हैं - तो उनके तो तोते ही उड़ गए । यह संकेत उन्हें इस बात से मिले कि दीपक गुप्ता ने अपनी पेम वन की तैयारी शुरू कर दी, और उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगने दी; उन्हें तो भनक भी नहीं लगी, जबकि मुकेश अरनेजा उनकी तैयारी में मदद करते सुने/देखे गए । दरअसल दीपक गुप्ता ने पेम वन के स्पॉन्सर्स के रूप में जब कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों से बात करना शुरू की, और क्लब्स के पदाधिकारी बचते व पीछे हटते दिखे, तो वह परेशान हुए - और उनकी परेशानी को हल करने के लिए मुकेश अरनेजा आगे आए । मुकेश अरनेजा ने उन्हें आश्वस्त किया कि पेम वन की स्पॉन्सरिंग के लिए क्लब्स वह उन्हें दिलवायेंगे । मुकेश अरनेजा रोटरी में कुशल 'सौदेबाज' और 'व्यापारी' रोटेरियन हैं, समझा जाता है कि इस आश्वासन के बदले उन्होंने दीपक गुप्ता से डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के लिए सौदा कर लिया । मुकेश अरनेजा की बदकिस्मती दरअसल यह रही है कि उन्होंने सौदेबाजी करके दो बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद तो पाया, लेकिन वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए । अमित जैन ने उन्हें अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया था, लेकिन करीब महीने/डेढ़ महीने में ही उनकी हरकतों से तंग आकर उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद से हटा दिया था । रोटरी के इतिहास में शायद यह पहला मौका होगा, जब किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने एक-डेढ़ महीने में ही अपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर को पद से हटा दिया हो । मौजूदा रोटरी वर्ष में भी वह सतीश सिंघल द्वारा डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाए गए थे, लेकिन ब्लड बैंक में घपलेबाजी के आरोपों के चलते सतीश सिंघल की गवर्नरी गई, तो साथ-साथ मुकेश अरनेजा की ड्रिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी भी चली गयी । 
मुकेश अरनेजा जब दूसरी बार भी डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, तो उनकी नजर दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद पर पड़ी । दीपक गुप्ता हालाँकि जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने का संकेत दे चुके थे, लेकिन फिर भी मुकेश अरनेजा को विश्वास रहा कि अपनी चालबाजी से वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद जेके गौड़ से छीन लेंगे । पेम वन की तैयारी में मुकेश अरनेजा पर दीपक गुप्ता की निर्भरता देख कर लोगों को ऐसा लग रहा है कि मुकेश अरनेजा अपनी चालबाजी में सफल हो गए हैं । अभी लेकिन चूँकि आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद अपने पास ही बनाए रखने के लिए जेके गौड़ ने भी कमर कस ली है । इस होड़ में हालाँकि लोगों को मुकेश अरनेजा का पलड़ा ही भारी दिख रहा है । दरअसल दीपक गुप्ता ढीले ढाले से व्यक्ति हैं, और उनके साथ कोई काम करने वाला व्यक्ति भी नहीं है; इसलिए लोगों को भी लग रहा है - और शायद उन्हें भी लग रहा होगा कि एक तेज-तर्रार व्यक्ति का संग-साथ ही उनकी गवर्नरी की नैय्या को पार लगा सकेगा; और इस नाते जेके गौड़ की बजाए मुकेश अरनेजा ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में उनके सही मददगार साबित होंगे । सतीश सिंघल के साथ मिल कर मुकेश अरनेजा डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर काबिज होने की जो कोशिश कर रहे थे, उसे सतीश सिंघल के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से निलंबित होने से तगड़ा झटका लगा है । इस झटके से उबरने के लिए मुकेश अरनेजा को दीपक गुप्ता के गवर्नर काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की जरूरत महसूस हो रही है । अपनी अपनी जरूरतों के चलते मुकेश अरनेजा और दीपक गुप्ता यदि सचमुच साथ आए, तो यह साथ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में नए समीकरण बनने का प्रस्थान बिंदु भी बन सकता है । लोगों को लग रहा है कि यह स्थिति डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अभी तक अशोक अग्रवाल के लिए आसान दिख रहे माहौल में अड़चन डालने का काम कर सकती है । इस लिहाज से माना जा रहा है कि दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद जेके गौड़ से छीनने में मुकेश अरनेजा यदि सचमुच सफल रहे, तो इससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का अभी तक ठंडा-ठंडा सा चल रहा चुनाव अभियान रोमांचक हो उठेगा ।

Tuesday, April 18, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 से ऑर्च क्लम्प सोसायटी के पहले और अकेले सदस्य बनकर सुभाष जैन ने रोटरी की व्यवस्था में अपने खुद के नंबर तो बनाए/बढ़ाए ही हैं, साथ ही डिस्ट्रिक्ट के सदस्यों को भी गौरवान्वित होने का मौका दिया है

गाजियाबाद । ऑर्च क्लम्प सोसायटी (एकेएस) के नए बने सदस्यों के सम्मान में रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल के मुख्यालय में आयोजित हुए डिनर में सुभाष जैन की उपस्थिति ने डिस्ट्रिक्ट 3012 के सदस्यों को अनोखे किस्म के गौरव के अहसास से परिचित कराने का काम किया है । सुभाष जैन डिस्ट्रिक्ट 3012 के पहले और अकेले सदस्य हैं, जो ऑर्च क्लम्प सोसायटी के सदस्य बने हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी फाउंडेशन के रचयिता और संस्थापक ऑर्च सी क्लम्प के नाम पर स्थापित ऑर्च क्लम्प सोसायटी की सदस्यता रोटरी फाउंडेशन में ढाई लाख अमेरिकी डॉलर देने वाले व्यक्ति को मिलती है । इस सोसायटी के सदस्य बनने वाले का उसके जीवन साथी के साथ रोटरी इंटरनेशनल के अमेरिका स्थित मुख्यालय में आयोजित होने वाले इंडक्शन समारोह में सम्मान किया जाता है; और उसके परिचय के साथ उसकी और उसके जीवनसाथी की तस्वीर उसी मुख्यालय की अठारहवीं मंजिल पर स्थापित इंटरएक्टिव गैलरी में लगाई जाती है । ऑर्च सी क्लम्प रोटरी इंटरनेशनल के छठे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट थे, और उन्होंने ही 1917 में रोटरी फाउंडेशन की स्थापना की थी । इस सोसायटी के दुनिया भर में करीब ढाई सौ सदस्य हैं । सुभाष जैन के साथ, पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 के नवदीप चावला तथा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश जैन भी इस सोसायटी के सदस्य बने हैं ।
डिस्ट्रिक्ट 3012 से सुभाष जैन के ऑर्च क्लम्प सोसायटी के पहले और अकेले सदस्य बनने के तथ्य का दिलचस्प पहलू यह भी है कि पिछले दो वर्षों में डिस्ट्रिक्ट में रोटरी फाउंडेशन की जो मीटिंग्स हुई हैं, उनमें ऑर्च क्लम्प सोसायटी का सदस्य बनने की घोषणा करके रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और दीपक गुप्ता भी तालियाँ बटोर चुके हैं - लेकिन जब सोसायटी का सदस्य बनने के लिए पैसे देने का समय आया - तो यह तीनों ही पीछे हट गए हैं । डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में कई लोग इस तरह की धोखेबाजी करते हैं - तालियाँ बटोरने के लिए पीएचएफ बनने के लिए वह अपना नाम तो दे देते हैं, लेकिन जब उसके लिए पैसे देने की बात आती है तो मुँह छिपाते फिरते हैं; इस तरह की हरकत लेकिन रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और दीपक गुप्ता जैसे लोग भी कर सकते हैं - और वह भी रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों के सामने, यह किसी ने नहीं सोचा होगा । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3012 को ऑर्च क्लम्प सोसायटी की तरफ जाने वाला रास्ता दिखाने का श्रेय भी सुभाष जैन को ही है । पिछले रोटरी वर्ष में सुभाष जैन ने ही इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की उपस्थिति में हुए रोटरी फाउंडेशन के आयोजन में ऑर्च क्लम्प सोसायटी की सदस्यता के लिए दिलचस्पी दिखाई थी । रोटरी के बड़े नेताओं की निगाह में चढ़ने के लिए रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ ने भी सुभाष जैन का अनुसरण किया । सुभाष जैन के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव लड़ रहे दीपक गुप्ता को भी लगा कि वह भी उक्त सोसायटी का सदस्य बनने की घोषणा कर देंगे, तो चुनाव जीत जायेंगे - लिहाजा उन्होंने भी सुभाष जैन का अनुसरण किया और अपने लिए तालियाँ बजवा लीं । पिछले रोटरी वर्ष में उक्त सोसायटी का सदस्य बनने की घोषणा करने वाले रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और दीपक गुप्ता के लिए इस वर्ष जब सचमुच पैसे देने का मौका आया - तो यह रोटरी नेताओं व पदाधिकारियों से बचते/छिपते फिरे । दीपक गुप्ता ने तो कुछ ज्यादा ही ड्रामा फैलाया । दरअसल पिछले वर्ष की पराजय के चलते वह इतने सदमे में थे कि उन्हें लगा कि ऑर्च क्लम्प सोसायटी का सदस्य बनने के लिए हामी भरने के बाद भी वह यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव नहीं जीत सकते हैं, तो फिर रोटरी में पैसे खर्च करने का क्या फायदा ?
मजे की बात यह है कि ऑर्च क्लम्प सोसायटी का सदस्य बनने के लिए पूरी रकम एक साथ देने की जरूरत भी नहीं है । जरूरत सिर्फ एक एग्रीमेंट करने की है, जिसके तहत तीन वर्ष में रकम पूरी करना होगी । रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और दीपक गुप्ता लेकिन उक्त एग्रीमेंट करने से भी बचने के लिए भाग खड़े हुए । दिलचस्प बात यह है कि उक्त सोसायटी का सदस्य बनने के लिए जब तालियाँ बजी थीं - तब मंच पर सुभाष जैन के साथ रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और दीपक गुप्ता भी थे; किंतु उक्त सोसायटी की सदस्यता के लिए एग्रीमेंट करने का मौका आया तो सुभाष जैन अकेले रह गए । इसी का नतीजा रहा कि अभी जब रोटरी इंटरनेशनल के शिकागो स्थित मुख्यालय में नए बने सोसायटी सदस्यों के लिए डिनर का आयोजन हुआ, तो उसमें डिस्ट्रिक्ट 3012 से सिर्फ सुभाष जैन ही मौजूद थे । इस प्रसंग में मुकेश अरनेजा का रवैया भी ध्यान देने योग्य है । पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन के रूप में बीच समयावधि में उन्होंने एक सूची जारी की थी, जिसमें उन लोगों के नाम थे जिन्होंने रोटरी फाउंडेशन के लिए घोषणा करने के बावजूद पैसे नहीं दिए थे । पैसे देने का समय बीत नहीं गया था, लेकिन फिर भी मुकेश अरनेजा ने अपनी नीच सोच का परिचय देते हुए उक्त सूची जारी की थी - जिसके पीछे उनका वास्तविक उद्देश्य सुभाष जैन को नीचा दिखाना था; सुभाष जैन के चक्कर में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के और कई रोटेरियंस को अपमानित करने का प्रयास किया था । लेकिन अब जब उनके 'चेले' दीपक गुप्ता ने रोटरी फाउंडेशन को ठेंगा दिखा दिया है, तो डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन के रूप में मुकेश अरनेजा ने अपने मुँह पर ताला लगा लिया है । इस प्रसंग में मजेदार संयोग यह भी है कि दीपक गुप्ता के साथ रोटरी फाउंडेशन के साथ धोखाधड़ी करने वाले रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ भी रोटरी को मुकेश अरनेजा की ही देन हैं ।
उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में जब सुभाष जैन ने ऑर्च क्लम्प सोसायटी का सदस्य बनने की घोषणा की थी, तब मुकेश अरनेजा और दीपक गुप्ता ने उनकी इस घोषणा को चुनाव जीतने के उनके एक हथकंडे के रूप में प्रचारित किया था । फिर उन्होंने खुद भी इसी 'हथकंडे' को अपना लिया । लेकिन इसे जब पूरा करने का समय आया, तो मैदान से ही भाग खड़े हुए । सुभाष जैन ने लेकिन दिखाया और साबित किया कि उक्त सोसायटी का सदस्य बनने की उनकी घोषणा उनका कोई हथकंडा नहीं था, बल्कि रोटरी के लिए ईमानदारी और गहरी संलग्नता के साथ कुछ बड़ा करने के ज़ज्बे की अभिव्यक्ति था - जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया और पूरा किया है । इस तरह डिस्ट्रिक्ट 3012 के इतिहास में सुभाष जैन ने एक नई इबारत लिखी है, उन्होंने सिर्फ एक रिकॉर्ड ही नहीं बनाया है - उन्होंने लोगों के बीच कुछ अलग, कुछ खास करने का हौंसला पैदा किया है, उन्होंने दिखाया है कि पुराने ढर्रे पर या पुरानी लीक पर चलने की बजाये नए नए तरीकों से लोगों को प्रेरित किया जा सकता है, नए नए क्षेत्रों में संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं, और सचमुच ऐसा कुछ किया जा सकता है जिसके बारे में दूसरों ने कभी सोचा भी न हो । सुभाष जैन ने जो किया है - उससे रोटरी की व्यवस्था में उनके खुद के नंबर तो बने/बढ़े ही हैं, साथ ही डिस्ट्रिक्ट के सदस्यों को भी गौरवान्वित होने का मौका मिला है । इसीलिए सुभाष जैन की यह उपलब्धि सिर्फ एक रिकॉर्ड भर नहीं हैं - बल्कि उससे कहीं ऊँची और बड़ी बात है ।

Sunday, April 9, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन के रवैए ने रमेश अग्रवाल के लिए मुसीबत पैदा की

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन जिस तरह से रमेश अग्रवाल द्वारा तय की गई वोट-जुटाऊ योजना को क्रियान्वित करने से पीछे हटते दिख रहे हैं, उसके चलते रमेश अग्रवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव के लिए प्रस्तुत की गई अपनी उम्मीदवारी अभी से संकट में पड़ती नजर आ रही है । रमेश अग्रवाल ने क्लब के कुछेक सदस्यों को यह कहते/बताते हुए शरत जैन के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया है कि शरत जैन का यही रवैया रहा, तो क्लब को डिस्ट्रिक्ट में एक बार फिर से बदनामी का सामना करना पड़ेगा । अपनी जीत/हार को क्लब के मान/अपमान से जोड़ कर रमेश अग्रवाल ने शरत जैन पर मदद के लिए सक्रिय होने के लिए दबाव बनाने का काम शुरू तो किया है, लेकिन क्लब के ही कुछेक सदस्यों का कहना है कि शरत जैन को रमेश अग्रवाल को पूरी तरह बर्फ में लगा देने का जो मौका मिला है - उसे वह यूँ ही नष्ट नहीं होने देंगे । शरत जैन जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए यदि चुन लिए गए तो डिस्ट्रिक्ट तो छोड़िए, क्लब तक में उनकी स्थिति को दोयम दर्जे की बना देंगे । शरत जैन के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि शरत जैन को यह अच्छी तरह समझ में आ रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में और क्लब में अपनी स्थिति को सम्मानजनक बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव हार जाएँ । रमेश अग्रवाल को हरवाने के लिए तो शरत जैन कुछ नहीं कर सकते हैं, लेकिन वह इतना तो कर ही सकते हैं कि वह उन्हें चुनाव जितवाने के लिए कुछ न करें ।
रमेश अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि उन्होंने अपनी जीत का सारा ताना-बाना ही शरत जैन के भरोसे बुना है । रमेश अग्रवाल की डिस्ट्रिक्ट में वैसे ही खासी बदनामी है, जिसके चलते इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक जैन को बुरी तरह से हारना पड़ा । अशोक जैन की बुरी हार के लिए डिस्ट्रिक्ट में हर किसी ने 'रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार' की उनकी पहचान को ही जिम्मेदार माना/ठहराया । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच रमेश अग्रवाल के प्रति जो गुस्सा और नाराजगी है, उसका खामियाजा अशोक जैन को भुगतना पड़ा है । रमेश अग्रवाल को भी इस बात का अहसास तो है, और इसीलिए वह पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से दूर रहने में ही अपनी भलाई देख रहे थे । रमेश अग्रवाल के लिए रोटरी की राजनीति और व्यवस्था में लेकिन जीने/मरने वाले हालात बन गए हैं । रोटरी की राजनीति और व्यवस्था में अपने पुनर्जीवन के लिए उन्हें कुछ बड़ा करना जरूरी लग रहा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता में उन्हें ऐसा ही मौका दिख रहा है । रमेश अग्रवाल को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों में उनके प्रति जो गुस्सा और नाराजगी है, वह अशोक जैन का 'खून पीकर' काफी कुछ रिलीज हो चुकी है - बाकी जो थोड़ी/बहुत बची होगी, उसे वह शरत जैन की मदद से दूर कर लेंगे । शरत जैन के नजदीकियों के अनुसार, रमेश अग्रवाल ने शरत जैन को फार्मूला सुझाया है कि इस वर्ष के अवॉर्ड्स का लालच दिखा कर क्लब-प्रेसीडेंट्स के वोट खरीदे जा सकते हैं । रमेश अग्रवाल का विश्वास है कि क्लब्स के प्रेसीडेंट्स अवॉर्ड के लालची होते ही हैं - और शरत जैन के जरिए वह उनके इस लालच का फायदा उठा कर उनके वोट हासिल कर सकेंगे । रमेश अग्रवाल ने शरत जैन को जिम्मेदारी सौंपी कि क्लब-प्रेसीडेंट्स को अवॉर्ड का आश्वासन देकर वह उनके लिए वोट पक्के करने का काम करें ।
रमेश अग्रवाल लेकिन यह देख/जान कर हैरान और परेशान हैं कि शरत जैन इस काम में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं । हाल/फिलहाल के दिनों में अपनी उम्मीदवारी के सिलसिले में रमेश अग्रवाल ने जिन भी लोगों से बात की, उनसे उन्हें ऐसे कोई संकेत नहीं मिले जिनसे उन्हें आभास हुआ हो कि शरत जैन ने उनकी उम्मीदवारी के लिए तय की गई वोट-जुटाऊ योजना पर कुछ किया हो । यह जान कर रमेश अग्रवाल को अपनी उम्मीदवारी पर अभी से खतरा मँडराता दिखने लगा है, और उन्होंने शरत जैन की नकेल कसने के लिए क्लब में शरत जैन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है । रमेश अग्रवाल लोगों को बता रहे हैं कि उन्होंने ही शरत जैन को गवर्नर बनवाया और डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में उनकी गवर्नरी चलवाई, लेकिन अब जब उन्हें शरत जैन की मदद की जरूरत है - तो शरत जैन उनके साथ परायो जैसा व्यवहार कर रहे हैं, और इस तरह अहसानफरामोशी दिखा रहे हैं । क्लब के सदस्यों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने के लिए रमेश अग्रवाल क्लब की इज्जत का हवाला भी यह कहते हुए दे रहे हैं कि यदि वह चुनाव हारे तो क्लब की दोहरी बेइज्जती होगी । इस तरह की बातों का शरत जैन की तरफ से भी जबाव आ रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में क्लब का नाम यदि खराब है तो इसके लिए रमेश अग्रवाल की घटिया हरकतें जिम्मेदार हैं । शरत जैन की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि रमेश अग्रवाल की घटिया हरकतों के कारण ही अगले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल इतने पीड़ित हैं कि वह रमेश अग्रवाल को अपने किसी भी कार्यक्रम में कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं; सगे भाई जैसे पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला ने रमेश अग्रवाल को अपने डिस्ट्रिक्ट में 'घुसने' तक नहीं दिया था; अपने डिस्ट्रिक्ट में भी निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ उनकी कारस्तानियों से परेशान होकर उनके खिलाफ गए हैं; उनकी हरकतों का ही परिणाम निकला कि अशोक जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में बुरी तरह हार गए । शरत जैन की तरफ से कहा जा रहा है कि रमेश अग्रवाल उन पर मदद न करने का आरोप लगा कर दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में अपनी संभावित हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ने की अभी से तैयारी कर रहे हैं ।
रमेश अग्रवाल और शरत जैन के बीच की इस झींगामश्ती को स्वाभाविक घटनाचक्र के रूप में देख/पहचान रहे लोगों का मानना और कहना है कि रमेश अग्रवाल के बदतमीजीपूर्ण रवैए और स्वभाव को देखते हुए शरत जैन का असहयोगात्मक रुख उचित ही है । शरत जैन को डिस्ट्रिक्ट में और क्लब में यदि उचित सम्मान के साथ रहना है, तो यह जरूरी है कि रमेश अग्रवाल हारे हुए ही रहें - जीतने के बाद तो रमेश अग्रवाल फिर शरत जैन को कुछ समझेंगे ही नहीं । दरअसल रमेश अग्रवाल हैं ही ऐसे - वह किसी के लिए कुछ करना चाहेंगे, तो फिर खुशी के साथ उसके लिए बहुत कुछ करेंगे - लेकिन करने के साथ-साथ उसकी पूरी पूरी कीमत भी बसूलते चलेंगे और इस प्रक्रिया में उसके साथ बदतमीजी की सीमाएँ भी लाँघते जायेंगे । रमेश अग्रवाल ने यही कुछ जेके गौड़ के साथ किया । जेके गौड़ को गवर्नर बनवाने से लेकर उनकी गवर्नरी चलाने/चलवाने तक में रमेश अग्रवाल ने पूरी पूरी मेहनत की - लेकिन बदले में जेके गौड़ को उन्होंने ऐसा ऐसा 'निचोड़ा' कि आज वह जेके गौड़ के दुश्मन नंबर एक बन गए हैं । यही हाल उन्होंने शरत जैन का किया है - इसलिए ही शरत जैन जान/समझ रहे हैं कि रमेश अग्रवाल यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए चुन लिए गए, तो डिस्ट्रिक्ट में और क्लब में उनके लिए सम्मान के साथ रह पाना मुश्किल हो जाएगा । यह जान/समझ लेने के कारण ही शरत जैन ने रमेश अग्रवाल की वोट-जुटाऊ योजना से दूर रहने का निश्चय किया है । शरत जैन के इस निश्चय ने रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी के सामने शुरू में ही संकट खड़ा कर दिया है । इस संकट से उबरने के लिए ही रमेश अग्रवाल ने क्लब में शरत जैन की गर्दन पकड़ने और उन्हें रास्ते पर लाने की चालबाजियाँ तेज कर दी हैं - उन्होंने अपने नजदीकियों से कहा है कि किसी भी तरह उन्हें शरत जैन को 'रास्ते पर लाना' ही है । यह देखना दिलचस्प होगा कि शरत जैन किस तरह से रमेश अग्रवाल की चालबाजियों का मुकाबला करते हैं - कर भी पाते हैं, या नहीं ?

Tuesday, February 28, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध के 'मलहम' से सुभाष जैन को दिए गए धोखे का घाव भरने की जेके गौड़ की कोशिश सफल होगी क्या ?

गाजियाबाद । आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में तेवर दिखा कर जेके गौड़ कहीं सुभाष जैन को दिए गए धोखे का पश्चाताप करने तथा सुभाष जैन की 'गुड बुक' में फिर से शामिल होने का जुगाड़ तो नहीं बैठा रहे हैं ? यह सवाल लोगों के बीच दरअसल इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में आलोक गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी के विरोध में एक अकेले जेके गौड़ की आवाज ही सुनाई दे रही है - जिसे वास्तव में बेमतलब और फिजूल की कसरत के रूप में देखा/पहचाना गया है । अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है, और अभी संभावित उम्मीदवार अपनी अपनी योजना बनाने में ही लगे हैं; इस अवस्था में समर्थन और विरोध के कोई मतलब नहीं हैं । अगले रोटरी वर्ष के संभावित उम्मीदवारों में अभी तक आलोक गुप्ता और ललित खन्ना के नाम सामने आए हैं, जिनके समर्थन या विरोध की नेताओं ने अभी कोई घोषणा नहीं की है - हालाँकि चुनाव यदि सचमुच इनके बीच ही हुआ तथा और कोई तीसरा उम्मीदवार नहीं आया तो कौन नेता किसके साथ होगा, इसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं है । इस बीच लेकिन एक अकेले जेके गौड़ की आवाज ही जोर से सुनाई दी है, जिसमें आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध है । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हुआ है कि जेके गौड़ को अभी से अगले रोटरी वर्ष की आलोक गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी के विरोध में आवाज उठाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी है ?
जेके गौड़ के नजदीकियों का कहना है कि ऐसा करके जेके गौड़ ने दरअसल सुभाष जैन के 'नजदीक' आने की कोशिश की है । इस वर्ष के चुनाव में जेके गौड़ ने सुभाष जैन की 'पीठ में छुरा भौंकने' का जो काम किया है, आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में अभी से नजर आ कर, वास्तव में वह सुभाष जैन को दिए गए घाव को भरने की कोशिश कर रहे हैं । मौजूदा वर्ष जेके गौड़ के लिए यूँ तो 'उपलब्धियों' भरा रहा है, लेकिन उपलब्धियों के लिए उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है - जो उनके लिए आगे मुसीबत भरी साबित हो सकती है । आगे की संभावित मुसीबतों को कम करने के लिए ही जेके गौड़ को आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में खड़ा होने की जल्दबाजी करना पड़ी है । जेके गौड़ की इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के बड़े समझे जाने वाले नेता रमेश अग्रवाल की 'नाक काट' ली - और कुछ ज्यादा ही काट ली । उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार अशोक जैन को हरवाने में तो जेके गौड़ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ही, साथ ही इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में जाने की रमेश अग्रवाल की योजना को भी ध्वस्त करने में उन्होंने सफलता पाई । इन सफलताओं की बात तक तो मामला ठीक है, लेकिन समस्या हुई है कि इन सफलताओं को पाने के लिए जेके गौड़ को सुभाष जैन के साथ भी धोखा करना पड़ा, और सिर्फ धोखा ही नहीं करना पड़ा - मामला उनकी 'पीठ में छुरा भौंकने' जैसा हुआ ।
जेके गौड़ का रोटरी का इतिहास यूँ तो धोखे का ही भरापूरा उदाहरण है - ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब उन्हें मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता था; लेकिन जैसे ही उन्हें अहसास हुआ कि फायदा मुकेश अरनेजा के साथ नहीं, बल्कि रमेश अग्रवाल के साथ रहने में है तो वह झट से रमेश अग्रवाल की गोद में जा बैठे । रमेश अग्रवाल के साथ जब उनका पूरा काम निकल गया, तो वह झट से उनकी गोद से उतर भी गए और उन्हें बुरा-भला कहने लगे । रमेश अग्रवाल को सबक सिखाने के चक्कर में उन्होंने सुभाष जैन के साथ भी धोखा कर दिया - और जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि सुभाष जैन के साथ उन्होंने धोखा ही नहीं किया है, बल्कि उनकी पीठ में छुरा भौंकने का काम किया है । जेके गौड़ चाहते तो रमेश अग्रवाल से सीधे ही निपट सकते थे - लेकिन उस स्थिति में वह सफलता के प्रति खुद को ही आश्वस्त नहीं कर सके, और इसलिए सफलता तक पहुँचने के लिए उन्होंने सुभाष जैन को सीढ़ी बना लिया । सुभाष जैन के जरिए जेके गौड़ ने अशोक जैन को समर्थन देने का भरोसा दिया और बदले में उम्मीद की कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में पहुँचने के उनके रास्ते का रोड़ा नहीं बनेंगे । यह 'डील' कर लेने के बाद भी जेके गौड़ ने अशोक जैन का समर्थन नहीं किया । दरअसल अशोक जैन को हरवा कर ही जेके गौड़ का रमेश अग्रवाल से बदला पूरा हो पाता । रमेश अग्रवाल से पूरा बदला लेने के लिए लेकिन उन्होंने जिस तरह से सुभाष जैन की पीठ में छुरा भौंका, उससे उनके लिए मामला काफी मुसीबतभरा हो गया है ।
असल में, जेके गौड़ के क्लब के कुछेक प्रमुख सदस्य सुभाष जैन के निकटवर्तियों में हैं, और उन्हें भी जेके गौड़ का सुभाष जैन के साथ धोखा करना पसंद नहीं आया है । इसके अलावा, जेके गौड़ भी जानते/समझते हैं कि भले ही उन्होंने दीपक गुप्ता का समर्थन किया है - लेकिन दीपक गुप्ता इसका कोई अहसान नहीं मानेंगे और पहले की तरह ही उन्हें अपमानित और जलील करते रहेंगे । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल से उन्हें वैसे ही कोई उम्मीद नहीं है । ऐसे में, उन्हें भी लग रहा है कि सुभाष जैन से धोखा करके उन्होंने अपने लिए मुश्किलों को और बढ़ा लिया है । वास्तव में, इस वर्ष 'उपलब्धियों' को पाने के बाद भी - जेके गौड़ ने अपनी दशा ऐसी कर ली है, जिसमें कि वह न घर के रहे और न घाट के । डिस्ट्रिक्ट में ठीक-ठाक तरीके से बने रहने के लिए जे के गौड़ को सुभाष जैन के पास 'लौटने' का ही विकल्प सूझ रहा है । वह समझ रहे हैं कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद को लेकर जो भी राजनीतिक बिसात बिछेगी, उसमें सुभाष जैन किसी भी रूप में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ तो नहीं ही रहेंगे । इसलिए जेके गौड़ ने अभी से ही आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में झंडा उठा लिया है । जेके गौड़ को विश्वास है कि उनके हाथ में यह झंडा रहेगा, तो सुभाष जैन उनसे धोखा खाने के बावजूद उन्हें अपने यहाँ जगह दे देंगे । राजनीति में वैसे भी दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ ज्यादा दिन कहाँ चलती हैं ?

Tuesday, January 31, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी गवर्नर नॉमिनी चुनाव में अशोक जैन पर भारी पड़ी, और दीपक गुप्ता की जीत का प्रमुख कारण बनी

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर दीपक गुप्ता की जोरदार जीत पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल के लिए भारी मुसीबत बन गई है । हर कोई दीपक गुप्ता के सामने हुई अशोक जैन की करारी हार के लिए रमेश अग्रवाल को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है । मजे की बात यह है कि जीतने वाले पक्ष के साथ-साथ हारने वाले पक्ष के लोगों का भी एक स्वर से कहना है कि अशोक जैन को रमेश अग्रवाल की कारगुजारियों की सजा मिली है । दीपक गुप्ता लगातार दो बार हारने के बाद तीसरी बार उम्मीदवार बने थे, और इस नाते से लोगों के बीच उनके प्रति सहानुभूति थी - इस सहानुभूति को रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी ने और पुख्ता किया । अशोक जैन ने अपनी सक्रियता से लोगों के बीच पैठ तो अच्छी बनाई और दीपक गुप्ता तथा उनके समर्थकों की तरफ से बेवकूफियाँ भी खूब हुईं, लेकिन रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी का पलड़ा सब पर भारी रहा - और अंततः यही नाराजगी अशोक जैन पर भारी पड़ी । अशोक जैन की खासी बुरी पराजय के लिए जिस तरह से हर कोई रमेश अग्रवाल को जिम्मेदार ठहरा रहा है, उससे संकेत मिल रहा है कि इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव ने रमेश अग्रवाल पर खासी भारी चोट की है तथा उनके लिए आने वाला समय बहुत मुश्किल साबित होने जा रहा है ।
उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी तभी फूट पड़ी थी, जब दिल्ली का उम्मीदवार लाने का तर्क देकर उन्होंने अपने ही क्लब के अशोक जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी थी । रमेश अग्रवाल के क्लब के ही शरत जैन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का कार्यभार सँभाला और रमेश अग्रवाल के ही क्लब के अशोक जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत हो गई - इसकी लोगों के बीच काफी प्रतिकूल प्रतिक्रिया पैदा हुई । हालात बिगड़ते देख रमेश अग्रवाल ने अपने आप को पीछे तो कर लिया था; और उम्मीद की थी कि इससे लोगों की नाराजगी दूर करने में मदद मिलेगी । अशोक जैन और उनकी उम्मीदवारी के दूसरे समर्थकों ने तरकीब लगाई कि अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान से रमेश अग्रवाल को दूर रखा जायेगा, तो रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी से होने वाले नुकसान से बचा जा सकेगा - किंतु अब जब नतीजा आया तो पता चला कि उक्त तरकीब काम नहीं आई है । दरअसल तरकीब को फेल करने का काम भी रमेश अग्रवाल ने ही किया - अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान से दूर रह कर रमेश अग्रवाल ने लोगों के घाव भरने का काम तो किया; लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात चला कर उन घावों को फिर से हरा कर दिया । इससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यही संदेश गया कि रमेश अग्रवाल को यदि सबक नहीं सिखाया गया, तो यह तो डिस्ट्रिक्ट को अपनी जेब में ही रख लेगा । रमेश अग्रवाल को सबक सिखाने की लोगों की कोशिश ही अशोक जैन को ले बैठी ।
अशोक जैन के तरफदारों ने दरअसल रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी के 'तापमान' को पहचानने/समझने में चूक कर दी । वह दीपक गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं द्धारा की जाने वाली गलतियों और बेवकूफियों पर ही निर्भर रहे; इसके अलावा, उन्हें यह भी उम्मीद रही कि पिछले रोटरी वर्ष में दीपक गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का विरोध करने वाले लोग इस वर्ष भी उनके विरोध में रहेंगे; और इस तरह रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों की नाराजगी कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकेगी । लेकिन उनकी यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी । दरअसल अशोक जैन की उम्मीदवारी रमेश अग्रवाल की चौधराहट का प्रतीक बन गई थी । पिछले रोटरी वर्ष में मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की हरकतों के चलते दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध करने वाले कई लोग इस वर्ष शुरू से ही कह/बता रहे थे कि वह दीपक गुप्ता को पसंद तो नहीं करते हैं, लेकिन इस वर्ष उन्हें मजबूरी में उनका समर्थन करना पड़ेगा - अन्यथा रमेश अग्रवाल की मनमानियाँ व बदतमीजियाँ और बढ़ जायेंगी । जेके गौड़ ने जिस तरह से रमेश अग्रवाल के व्यवहार की शिकायतें करते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की, उसके कारण भी रमेश अग्रवाल के प्रति लोगों का रोष संगठित और निर्णायक बन गया । कई लोगों का कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने पिछले वर्ष मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की नेतागिरी को धूल चटाई थी, रमेश अग्रवाल उसे अपनी जीत के रूप में देखने लगे थे और अपने आप को डिस्ट्रिक्ट का चौधरी समझने लगे थे - इसलिए इस बार रमेश अग्रवाल को उनकी राजनीतिक 'औकात' दिखाना जरूरी था ।
दीपक गुप्ता ने इस बार एक होशियारी यह की कि अपने चुनाव अभियान से मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल को दूर रखने का भरसक प्रयास किया । जिन मौकों पर यह दोनों सक्रिय हुए/दिखे, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बनते और नुकसान पहुँचाते हुए ही नजर आए; इस कारण से दीपक गुप्ता इनके भरोसे रहने की बजाए अकेले ही जुटे । कई बार लोगों को लगा भी कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने जैसे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का साथ छोड़ दिया है; और इस 'लगने' ने दीपक गुप्ता की मदद ही की । पिछले वर्ष के और इस वर्ष के चुनावी नतीजे ने एक बात साफ कर दी है कि उम्मीदवार जिन नेताओं के भरोसे रहते हैं, उन नेताओं से उन्हें फायदा कुछ नहीं मिलता है - उलटे नुकसान ही उठाना पड़ता है : पिछले वर्ष दीपक गुप्ता को मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की करतूतों का खामियाजा भुगतना पड़ा था और सुभाष जैन की जीत किसी नेता की नहीं बल्कि सिर्फ उनकी अपनी जीत थी; इस बार अशोक जैन को रमेश अग्रवाल की हरकतों का शिकार होना पड़ा है और दीपक गुप्ता की जीत किसी नेता-फेता की नहीं बल्कि उनकी अपनी जीत है । चुनावी लड़ाई में नेताओं की भूमिका के अप्रासांगिक होने का यह संकेत डिस्ट्रिक्ट में नया माहौल बनाने में सहायक हो - शायद !

Saturday, January 21, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनावी नतीजा जेके गौड़ की झाँसाबाजी की पोल खोलते हुए उनकी शामत लाने का काम करेगा क्या ?

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए हो चुके चुनाव के आने वाले नतीजे को लेकर विश्लेषण के साथ जो जो कयास लगाए/सुने जा रहे हैं, उनसे एक बात बहुत साफ होती जा रही है कि नतीजा चाहें जो हो - चुनाव चाहे जो भी जीते, शामत लेकिन जेके गौड़ की आने वाली है । दिलचस्प नजारा यह है कि हर उम्मीदवार के समर्थकों को 'अपने' जीतने के पीछे जेके गौड़ का समर्थन 'दिख' रहा है; ऐसे में हारने वाले उम्मीदवार के समर्थकों का सारा नजला जेके गौड़ के सिर पर ही गिरने का खतरा मंडराता नजर आ रहा है । इस बार के चुनाव में जेके गौड़ के समर्थन को लेकर उम्मीदवारों के समर्थकों के बीच जैसी छीना-झपटी चली, उसने चुनावी माहौल को खासा असमंजसपूर्ण भी बनाया - जो न सिर्फ चुनाव 'होने' तक बना रहा, बल्कि जो नतीजा आने तक बना रहता दिख रहा है । इससे पहले शायद ही किसी चुनाव में किसी एक व्यक्ति/नेता की भूमिका को इतना असमंजसपूर्ण पाया/देखा गया हो ।
जेके गौड़ की इस भूमिका की नींव दरअसल तब पड़ी जब उन्हें रमेश अग्रवाल के खिलाफ खुल कर बातें करते हुए सुना/पाया गया । रमेश अग्रवाल की हरकतों के प्रति जेके गौड़ को नाराजगी व रोष प्रकट करता देख दीपक गुप्ता और उनके समर्थकों की बाँछे खिल गईं; फलस्वरूप उन्होंने जेके गौड़ पर डोरे डालने शुरू कर दिए । इसमें उन्हें सफलता मिलने में दिक्कत लेकिन इस कारण से हुई क्योंकि जेके गौड़ को दीपक गुप्ता से भी बहुत शिकायतें थीं । जेके गौड़ जब उम्मीदवार थे, तब दीपक गुप्ता ने उन्हें बहुत परेशान तो किया ही था - कई मौकों पर उन्हें अपमानित तक किया था । दीपक गुप्ता के उस रवैये को जेके गौड़ भूले नहीं थे । इस बीच इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव की चर्चा शुरू हो गई, जिसमें रमेश अग्रवाल की दिलचस्पी देखी/पहचानी गई । इसमें दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को अपना 'काम' बनता हुआ नजर आया; और उन्होंने जेके गौड़ को समझाया/भड़काया कि रमेश अग्रवाल की हरकतों का उन्हें यदि बदला लेना है, तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए उन्हें उम्मीदवार हो जाना चाहिए । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की यह तरकीब काम कर गई, और जेके गौड़ ने रमेश अग्रवाल के खिलाफ ताल ठोक दी । जेके गौड़ ने ताल तो ठोक दी, लेकिन दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में कूदे नहीं । उन्होंने इंतजार करने व यह देखने की रणनीति अपनाई कि रमेश अग्रवाल तथा खेमे के बाकी लोग उनकी उम्मीदवारी पर कैसे रिएक्ट करते हैं ? जेके गौड़ ने होशियारी/चालाकी से दोनों हाथों में लडडू पकड़ लिए । जेके गौड़ के इस 'रूप' ने अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को दबाव में लाने का काम किया ।
रमेश अग्रवाल ने भी चालाकी/होशियारी दिखाने की कोशिश की; उनकी शह पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन ने उक्त नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव की अधिघोषणा को टालने तथा उसमें देर करने का हथकंडा अपनाया । कोशिश शायद यह थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव हो जाने के बाद रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ से निपटेंगे । लेकिन जैसे जैसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव नजदीक आता गया, रमेश अग्रवाल को भी समझ में आने लगा कि अपनी होशियारी के चलते उनके लिए कहीं ऐसी स्थिति न हो जाए कि वह घर/घाट कहीं के न रहें । रमेश अग्रवाल ने समझ/पहचान लिया कि स्थितियाँ अभी जिस तरह से जेके गौड़ के पक्ष में हैं, उसमें उनकी किसी चालबाजी का सफल होना मुश्किल ही है । लिहाजा अशोक जैन की उम्मीदवारी के प्रति जेके गौड़ के समर्थन को पक्का बनाए रखने के लिए रमेश अग्रवाल उक्त नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अपनी उम्मीदवारी को छोड़ने की घोषणा करने के लिए मजबूर हुए । जेके गौड़ के सामने रमेश अग्रवाल के इस समर्पण के बाद अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक जेके गौड़ के समर्थन को लेकर आश्वस्त हो गए ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने हालाँकि तब भी उम्मीद नहीं छोड़ी - उन्होंने जेके गौड़ को यह कहते हुए उकसाना/भड़काना जारी रखा कि तुम तो अच्छी तरह जानते ही हो कि रमेश अग्रवाल भरोसे का आदमी नहीं है; अपना काम निकाल लेगा और फिर अपनी मनमानी करने लगेगा, इसलिए उसके जाल में मत फँसना । अपने इसी तर्क के भरोसे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को भरोसा है कि जेके गौड़ ने दीपक गुप्ता को ही समर्थन दिया है; जबकि अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थकों का दावा है कि रमेश अग्रवाल और उनके बीच की तनातनी में जिस तरह से खेमे के दूसरे नेताओं का समर्थन जेके गौड़ को मिला है, उसके चलते जेके गौड़ का खेमे को छोड़ने का कोई कारण नहीं बनता है - और इसलिए जेके का समर्थन अशोक जैन को ही मिला है । जेके गौड़ के पास तीन-चार क्लब हैं, जो 10/12 वोट बनाते/रखते हैं - इसलिए उनका समर्थन चुनाव में महत्त्वपूर्ण हो उठा है । जेके गौड़ का समर्थन वास्तव में किसको मिला, यह तो जेके गौड़ ही जानते होंगे; लेकिन उनके समर्थन को लेकर जिस तरह की छीना-झपटी देखने को मिली - उससे एक बात स्पष्ट है कि दोनों पक्षों को अपनी अपनी जीत के लिए जेके गौड़ का समर्थन जरूरी लगा है; और जेके गौड़ भी दोनों पक्षों को अपने समर्थन का झाँसा देने में सफल रहे हैं । उनके झाँसे की पोल चुनाव का नतीजा आने पर ही खुलेगी । ऐसे में, माना/समझा यही जा रहा कि जो भी उम्मीदवार हारेगा, उसके समर्थक हार का ठीकरा जेके गौड़ के सिर पर ही फोड़ेंगे । हारने वाले उम्मीदवार के समर्थक जेके गौड़ पर धोखाधड़ी का आरोप लगायेंगे - और इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनावी नतीजा जेके गौड़ के लिए शामत लाने वाला ही साबित होगा ।

Monday, January 9, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़ ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की सत्ता खेमे में फूट डालने की योजना को फेल करके दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को तगड़ा झटका देते हुए मुसीबत में फँसाया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में दीपक गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के समर्थक बड़े-छोटे नेताओं को ठंडा पड़ा देख उनके शुभचिंतकों को तगड़ा झटका लगा और वह कॉन्फ्रेंस से निराश होकर लौटे हैं । शुभचिंतकों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने प्रचार अभियान से अचानक से अपने अपने कदम पीछे क्यों खींच लिए हैं - क्या उन्हें इस बात का अहसास हो गया है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए कामयाब होने की इस बार भी कोई उम्मीद या संभावना नहीं है ? यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछली बार दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने अंतिम समय तक पूरी जी-जान लगाई हुई थी - पिछली बार भी अन्य लोगों को उनकी उम्मीदवारी के सफल होने की हालाँकि कोई उम्मीद नहीं थी, किंतु दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को अंतिम समय तक यह लगता रहा था कि अपनी तिकड़मों से वह 'लड़ाई' जीत लेंगे । चुनाव का नतीजा आया, तो पता चला कि उनकी कोई भी तिकड़म काम नहीं आई है । इसके बाद, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की लोगों के बीच भारी फजीहत हुई । लगता है कि उस फजीहत से मिला सबक समर्थक नेताओं की याद में बना हुआ है, और इसीलिए अब की बार भी उन्हें जैसे ही यह अहसास हुआ कि हालात दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में नहीं हैं - उन्होंने अपने आप को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने से रोक लिया । समर्थक नेताओं के ठंडे पड़ने से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान को जो जोर का झटका लगा है, उससे खुद उनके शुभचिंतकों को ही उनकी उम्मीदवारी की सफलता की उम्मीद व संभावना तेजी से घटती हुई लगी है ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का सारा खेल दरअसल जेके गौड़ के कारण बिगड़ गया । असल में, उन्हें उम्मीद थी कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के मुद्दे पर सत्ता खेमे में फूट पड़ेगी, और उक्त फूट के चलते जेके गौड़ उनके साथ आ जायेंगे और इसका फायदा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में उन्हें मिलेगा । उक्त फूट को संभव बनाने के लिए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने जेके गौड़ को समर्थन घोषित करके उकसाने का भरपूर प्रयास भी किया, लेकिन सत्ता खेमे के नेताओं ने खासी होशियारी से उक्त मुद्दे  कर लिया और फूट की संभावना को खत्म कर दिया । इसके चलते, जेके गौड़ के भरोसे चुनावी जीत का समीकरण बनाने बैठे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की सारी योजना बुरी तरह से पिट गई । सत्ता खेमे के नेताओं ने सीओएल के लिए केके गुप्ता की उम्मीदवारी की चर्चा चला कर रूपक जैन की उम्मीदवारी का रास्ता रोक कर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को दोहरा झटका दिया है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के साथ-साथ सीओएल के मामले में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को जो दोहरी चोट पड़ी, उससे उन्होंने समझ लिया है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उनकी हालत बहुत ही पतली है । लगता है कि 'राजनीतिक पिटाई' की और चोट से बचने के लिए ही वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान से पीछे हट गए हैं, और उन्होंने दीपक गुप्ता को अकेला छोड़ दिया है । हाल ही में संपन्न हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को या तो अनुपस्थित पाया गया, और या देर से आता देखा गया, और जो पूरे समय उपस्थित थे भी उन्हें भी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की बात करने से बचता हुआ देखा गया - जिससे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति वहाँ लोगों के बीच नकारात्मक माहौल बना । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक बड़े-छोटे नेताओं की चुनाव से पहले ही समर्पण वाली स्थिति ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के शुभचिंतकों को बुरी तरह निराश किया है - और उन्हें दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी खासी मुसीबत में फँसी दिखाई देने लगी है ।

Tuesday, September 15, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सतीश सिंघल से अपने बिगड़े संबंध सुधार कर डिस्ट्रिक्ट में अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने के लिए रमेश अग्रवाल ने क्या जेके गौड़ और शरत जैन को काम पर लगाया है

नोएडा । सतीश सिंघल अपने नजदीकियों को आजकल खुशी खुशी यह बताने में खूब व्यस्त हैं कि जो जेके गौड़ और शरत जैन पहले उन्हें कोई भाव नहीं देते थे, अब लगातार उनकी खुशामद में लगे हुए हैं । जेके गौड़ और शरत जैन के इस बदले रवैये को सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच तय होते दिख रहे मुकाबले के नतीजे के रूप में देख/पहचान रहे हैं । सतीश सिंघल का कहना है कि उनको दीपक गुप्ता का समर्थन करने से रोकने के लिए ही जेके गौड़ और शरत जैन ने उनके प्रति अपना रवैया बदला है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी खुद दीपक गुप्ता का कितना भला करेगी, यह तो अभी नहीं पता - किंतु दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी ने सतीश सिंघल का भला जरूर कर दिया है । उल्लेखनीय है कि सतीश सिंघल इस बात से बहुत परेशान और निराश रहे हैं कि जेके गौड़ और शरत जैन उन्हें उचित तवज्जो नहीं देते हैं, और उन्हें अलग-थलग करने/रखने में लगे रहते हैं । जेके गौड़ और शरत जैन का कहना रहा है कि सतीश सिंघल की समस्या यह रही है कि वह इस तथ्य को मानने/समझने को तैयार ही नहीं होते हैं कि वह डिस्ट्रिक्ट के प्रोटोकॉल में उनके एक जूनियर पार्टनर हैं, और उन्हें जूनियर पार्टनर के रूप में रहना है - वह उनके 'बाप' बनने की कोशिश करते हैं; अब 'बाप' उन्हें क्यों बनाएँ ? सतीश सिंघल के बारे में और भी कई लोगों की शिकायत रही है कि सतीश सिंघल को यदि ऊँगली पकड़ाओ तो वह पहुँचा पकड़ लेते हैं । सतीश सिंघल को लगता है, और वह समय समय पर लोगों के बीच इसे कहते भी रहे हैं कि उन्हें जेके गौड़ और शरत जैन से ज्यादा रोटरी आती है । यह बात मानने और कहने तक तो ठीक है, समस्या लेकिन तब होती है जब सतीश सिंघल इसे दिखाने/जताने पर उतर आते हैं । जेके गौड़ और शरत जैन का कहना रहा है कि कई मौकों पर उन्होंने जब देखा/पाया कि सतीश सिंघल ने इस बात को भूलकर कि रोटरी प्रोटोकॉल में वह उनके जूनियर हैं, उन पर हावी होने की कोशिश की - तो उन्होंने सतीश सिंघल से बच कर रहना शुरू कर दिया । सतीश सिंघल ने जेके गौड़ और शरत जैन के इस रवैये को यह कह कर राजनीतिक रंग दिया कि उन्हें अलग-थलग करने की इनकी कोशिश वास्तव में रमेश अग्रवाल का हुक्म बजाने की इनकी मजबूरी है । सतीश सिंघल ने रमेश अग्रवाल के प्रति अपने विरोध को हमेशा ही मुखर रूप में प्रकट किया है । रमेश अग्रवाल ने उनके चुनाव में चूँकि उनके प्रतिस्पर्द्धी प्रसून चौधरी का सहयोग/समर्थन किया था, इसलिए सतीश सिंघल का रमेश अग्रवाल के प्रति मुखर विरोध है और कई जगह उन्होंने कहा भी है कि रोटरी में उनकी राजनीति का एकमात्र उद्देश्य रमेश अग्रवाल की राजनीति की हवा बिगाड़ना ही है । रमेश अग्रवाल की राजनीति की हवा सतीश सिंघल जब बिगाड़ देंगे, वह तो तब देखेंगे - अभी तक तो लेकिन रमेश अग्रवाल ने सतीश सिंघल की हवा बिगाड़ी हुई है । सतीश सिंघल जब खुद मानते और कहते/बताते हैं कि जेके गौड़ और शरत जैन उन्हें जो उचित सम्मान नहीं देते हैं, उसके पीछे रमेश अग्रवाल हैं - तो यह एक तरह से सतीश सिंघल की स्वीकारोक्ति ही है कि डिस्ट्रिक्ट में इस समय रमेश अग्रवाल की ही तूती है । रमेश अग्रवाल की राजनीति की हवा बिगाड़ने की बातें करने वाले सतीश सिंघल को यूँ तो जेके गौड़ व शरत जैन जैसे रमेश अग्रवाल के घोषित 'आदमियों' से किसी भी तरह के अच्छे व्यवहार की उम्मीद भी नहीं रखना चाहिए; सतीश सिंघल लेकिन इनसे न सिर्फ अच्छे व्यवहार की उम्मीद करते रहे - बल्कि उम्मीद पूरी न होने पर शिकायत भी करते रहे हैं । जेके गौड़ और शरत जैन ने उनकी इस छटपटाहट का खूब मजा भी लिया । जेके गौड़ ने तो सतीश सिंघल की जैसी हालत की, उसकी सतीश सिंघल ने तो कल्पना भी नहीं की होगी । हालाँकि इसके लिए सतीश सिंघल ने ही उन्हें मजबूर किया । जेके गौड़ के साथ समस्या दरअसल यह हुई कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बन गए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ठसक नहीं बना पाए । उनकी बदकिस्मती यह रही कि मुकेश अरनेजा, रमेश अग्रवाल और अशोक अग्रवाल जैसे जिन लोगों पर वह निर्भर हुए, उन्होंने ही लोगों के बीच उनकी नकारात्मक छवि बनाई और तरह तरह से जेके गौड़ को 'शिकारपुर का' साबित करने की कोशिश की । उन्होंने तो ऐसा इसलिए किया, ताकि वह अपने आपको लोगों की नजरों में ऊँचा दिखा सकें; जेके गौड़ ने लेकिन उन्हें ऐसा करने दे कर अपना नुकसान किया । लोगों के बीच जेके गौड़ की जैसी नकारात्मक पहचान बनी, वैसी पहचान उनसे पहले शायद ही किसी गवर्नर की बनी हो । जेके गौड़ की इस पहचान का फायदा उठाने की सतीश सिंघल ने कोशिश की । सतीश सिंघल ने लेकिन मामले का एक ही पहलू देखा, दूसरे पहलू को उन्होंने अनदेखा ही कर दिया - उन्होंने यह तो देखा कि जेके गौड़ की छवि 'एक बेचारे गवर्नर' की है, लेकिन वह यह नहीं देख पाए कि जेके गौड़ उतने बेचारे हैं नहीं जितना कि उन्हें समझा जाता है । जेके गौड़ को बदला लेना भी खूब आता है । जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा जैसे तुर्रमखाँ को जिस तरह खुड्डे लाइन लगा दिया है, वह भी एक दिलचस्प नजारा है । सतीश सिंघल ने जेके गौड़ की बेचारगी देखी, तो तुरंत उन पर सवार होने के लिए तैयार हो गए । जेके गौड़ ने भी बदले में उन्हें ऐसी पटखनी दी कि फिर वह अपने नजदीकियों के बीच शिकायत करने लायक ही बचे कि जेके गौड़ उन्हें पर्याप्त इज्जत नहीं दे रहे हैं । किसी किसी से उन्हें सुनने को भी मिला कि जेके गौड़ गवर्नर हैं, पहले उन्हें उचित इज्जत दो तो फिर उनसे उचित इज्जत मिलने की उम्मीद करो । सतीश सिंघल ने रमेश अग्रवाल और उनके जेके गौड़ व शरत जैन जैसे 'आदमियों' से निपटने के लिए राजनीतिक तरीका अपनाया और मुकेश अरनेजा के साथ हाथ मिला लिया । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के बीच शक्ल ग्रहण करते देखा जा रहा है । रमेश अग्रवाल को सुभाष जैन की उम्मीदवारी के पीछे पहचाना जा रहा है, तो मुकेश अरनेजा को अशोक गर्ग-प्रवीन निगम-दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पीछे मौका खोजते/बनाते हुए देखा जा रहा है । मुकेश अरनेजा जब पूरी तरह अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के साथ थे, तब सतीश सिंघल भी अशोक गर्ग की वकालत कर रहे थे । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की वकालत के बावजूद अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच समर्थन जुटता हुआ जब नहीं दिखा, तब मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाया । सतीश सिंघल के लिए तुरंत से तो अशोक गर्ग का साथ छोड़ना मुश्किल हुआ, किंतु अशोक गर्ग को जब खुद अपनी ही उम्मीदवारी के प्रति उत्साह छोड़ते हुए देखा गया तो सतीश सिंघल के लिए भी फैसला करना जरूरी हुआ । रमेश अग्रवाल से निपटने की अपनी शपथ को याद करते हुए, सतीश सिंघल के सामने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन की तरफ ही आना था और वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की तरफ आते हुए दिखे भी हैं; हालाँकि अभी वह ज्यादा खुली वकालत करने से बच रहे हैं । अशोक गर्ग के खुद ही पीछे हटने से और प्रवीन निगम के ढीले-ढाले रवैये से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई जिस तरह सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच होते मुकाबले में तब्दील होती नजर आ रही है, उसमें सतीश सिंघल का यह दावा महत्वपूर्ण संकेत देता हुआ तो लग रहा है कि उनको दीपक गुप्ता का समर्थन करने से रोकने के लिए ही जेके गौड़ और शरत जैन ने उनके प्रति अपना रवैया बदला है । सतीश सिंघल को विश्वास है कि इन दोनों का उनके प्रति जो रवैया बदला है - वह अवश्य ही रमेश अग्रवाल के कहने से बदला है । इससे सतीश सिंघल को यह विश्वास तो हो चला है कि आखिरकार रमेश अग्रवाल ने भी उनकी राजनीतिक ताकत को पहचान लिया है और डिस्ट्रिक्ट में अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने के लिए उनकी शरण में आने के लिए मजबूर हुए हैं । हालाँकि यह अभी उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है कि रमेश अग्रवाल ने पिछले रोटरी वर्ष में उन्हें हरवाने के लिए जो काम किए थे, उसके लिए वह उनसे माफी माँगेंगे तो वह रमेश अग्रवाल को माफ़ कर देंगे या नहीं ?

Thursday, September 3, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा की अपनी अहमियत दिखाने की कोशिशों ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से बहुत मेहनत करके आयोजित किए गए कार्यक्रम पर पानी फेरा

गाजियाबाद । रोटरी क्लब गाजियाबाद के चार्टर दिवस कार्यक्रम में गैर-जरूरी भूमिका निभा कर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा ने न सिर्फ क्लब के लोगों को नाराज किया, बल्कि कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों को झिकाया भी - और मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में पधारे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता से खुद फटकार भी सुनी । कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों के रिएक्शन में एक यह बात प्रमुखता से रेखांकित हुई है कि बहुत मेहनत और तैयारी से आयोजित किए गए कार्यक्रम का मुकेश अरनेजा ने अपनी टुच्ची कारस्तानियों से नाश मार दिया । उल्लेखनीय है कि अन्य कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ मुकेश अरनेजा भी अतिथि के रूप में कार्यक्रम में आमंत्रित थे, और उनके अलावा अन्य बहुत से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भी कार्यक्रम में मौजूद थे - लेकिन एक अकेले मुकेश अरनेजा ही थे जो बार-बार अपनी कुर्सी से उठ खड़े होकर कभी एमओसी को तो कभी क्लब के दूसरे पदाधिकारियों को हिदायतें दे रहे थे; और अपनी इस हरकत से कार्यक्रम को वास्तव में डिस्टर्ब ही कर रहे थे । मुकेश अरनेजा की इस हरकत से खीझ रहे लोग तरह तरह की टिप्पणियाँ भी कर रहे थे - किसी को कहते सुना गया कि 'इसकी कुर्सी में चीटियाँ तो नहीं है जिनके काटने से यह कुर्सी से बार-बार उठ रहा है'; तो किसी ने फब्ती कसी कि 'इसने क्या रोटरी क्लब गाजियाबाद ज्वाइन कर लिया है' । मुकेश अरनेजा की हरकत से खीझ कर एक मौके पर तो मुख्य अतिथि की भूमिका निभा रहे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता तक ने मुकेश अरनेजा को फटकारा कि 'तुम मत बोलो, क्लब के पदाधिकारियों को जबाव देने दो ।' लेकिन अपनी बेशर्मी के लिए (कु)ख्यात मुकेश अरनेजा पर लोगों की फब्तियों और सुशील गुप्ता की फटकार का कोई असर नहीं पड़ा ।
मुकेश अरनेजा की हरकतों से रोटरी क्लब गाजियाबाद के पदाधिकारियों ने तो अपने आप को बहुत अपमानित तक महसूस किया । खासकर कार्यक्रम में एमओसी की भूमिका निभा रहे सचिन वत्स ने ! मुकेश अरनेजा द्वारा बार बार टोके जाने से क्षुब्ध और अपमानित महसूस कर रहे सचिन वत्स ने एक मौके पर तो क्लब के पदाधिकारियों से यहाँ तक कह दिया कि यह काम किसी और से करा लो - तब क्लब के वरिष्ठ सदस्य अनिल अग्रवाल ने हस्तक्षेप करके मामले को संभाला । दरअसल एमओसी के रूप में सचिन वत्स जो कुछ कह/कर रहे थे, उसमें कमियाँ/खामियाँ निकालते हुए मुकेश अरनेजा उनके कहे/किए को बार बार संशोधित कर रहे थे - और लोगों के सामने ऐसा जता/दिखा रहे थे कि सचिन वत्स को तो कुछ पता ही नहीं है और वह जो कुछ भी कह/कर रहे हैं, वह सब गलत-सलत है । मुकेश अरनेजा द्वारा बार-बार टोके जाने से अपमानित महसूस करते हुए सचिन वत्स ने एमओसी की जिम्मेदारी छोड़ देने की बात की, तो अनिल अग्रवाल आगे आए और उन्होंने लोगों को बताया कि सचिन वत्स की बातों में जो गलतियां हो रही हैं, वह वास्तव में स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं - यानि यह गलतियाँ जानबूझ कर की जा रही हैं, ताकि कार्यक्रम में लोगों की दिलचस्पी और संलग्नता को बनाए रखा जा सके । इस पर रोटरी क्लब गाजियाबाद के ही कुछेक लोगों को अनिल अग्रवाल से कहते हुए सुना गया कि यह बात मुकेश अरनेजा को बताओ और उससे कहो कि जैसे दूसरे लोग चुपचाप बैठे कार्रवाई देख/सुन रहे हैं, वैसे ही वह भी देखे/सुने और कार्यक्रम में बंदर की तरह उछल-कूद न करे ।
मुकेश अरनेजा ने बदतमीजी की हद तो लेकिन तब पार की जब चार्टर दिवस के मौके पर क्लब की उपलब्धियों व भावी योजनाओं को लेकर हो रही बातों में सवालों के जबाव देने से उन्होंने क्लब के पदाधिकारियों को रोका और खुद जबाव देने लगे । यह देख कर सुशील गुप्ता ने उन्हें कस कर फटकारा और कहा कि क्लब से जुड़े मामलों में क्लब के पदाधिकारियों को बोलने दो । इस फटकार का मुकेश अरनेजा पर थोड़ी देर के लिए तो असर दिखा, लेकिन जल्दी ही फिर वह अपनी 'औकात' पर आ गए । मुकेश अरनेजा की हरकतों से माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया था कि सुशील गुप्ता का जब बोलने का नंबर आया तो अपनी बात उन्होंने यह कहते हुए शुरू की कि मैं तो इस तरह के कार्यक्रमों में आता ही नहीं हूँ, क्योंकि अपने अनुभव से मैं जानता हूँ कि इस तरह के कार्यक्रमों में माहौल काम की कोई बात करने का होता ही नहीं है । सुशील गुप्ता ने चार्टर दिवस के कार्यक्रम को चुनावी मीटिंग बना देने के आईडिया की भी आलोचना की । कार्यक्रम का मुख्य अतिथि यदि इस तरह की बात करे, तो समझा जा सकता है कि कार्यक्रम का माहौल क्या बना/रहा होगा । कार्यक्रम में मौजूद रहे लोगों ने अच्छे भले और खासी मेहनत से तैयार किए गए कार्यक्रम को बर्बाद करने के लिए मुकेश अरनेजा को जिम्मेदार ठहराया है । मुकेश अरनेजा की जिन हरकतों ने कार्यक्रम को बर्बाद किया, वह हरकतें उन्होंने कोई बड़ा लक्ष्य पाने के लिए नहीं की - बल्कि अपने आप को ज्यादा 'होशियार' दिखाने तथा रोटरी क्लब गाजियाबाद के ज्यादा नजदीक 'दिखाने' के लिए कीं; और उनकी हरकतों ने रोटरी क्लब गाजियाबाद के पदाधिकारियों को ही अपमानित किया तथा उनके कार्यक्रम को बर्बाद किया ।
रोटरी क्लब गाजियाबाद के इस कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य क्लब के वरिष्ठ सदस्य दीपक गुप्ता की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी का प्रमोशन भी था - इस तरह मुकेश अरनेजा की हरकतों ने कार्यक्रम को ही बर्बाद नहीं किया, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रमोशन में ही पलीता लगा दिया । यह हाल तब हुआ, जबकि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाने में मुकेश अरनेजा का ही हाथ सुना/बताया जाता है । अधिकतर लोगों का शुरू से ही मानना और कहना रहा है कि मुकेश अरनेजा को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से कोई मतलब नहीं हैं; उन्होंने तो अपनी राजनीति के लिए मौका 'बनाने' खातिर दीपक गुप्ता को उम्मीदवारी के लिए उकसाया है और उनके मददगार होने का दिखावा कर रहे हैं । इस कार्यक्रम को मुकेश अरनेजा ने अपनी चालबाजी से कैसे बर्बाद किया, इसका एक उदाहरण तो क्लब के पदाधिकारियों ने ही दिया - उनके अनुसार, कार्यक्रम की तैयारी मुकेश अरनेजा के निर्देशन में ही तैयार हुई और आमंत्रितों की सूची मुकेश अरनेजा ने ही तैयार करवाई । सूची के हिसाब से ही हॉल चुना गया । मुकेश अरनेजा किंतु ऐन मौके तक सूची में आमंत्रितों के नाम जोड़ते गए और सूची बढ़वाते गए । इसका नतीजा यह हुआ कि जितने लोगों के लिए इंतजाम किया गया था, लोग उससे ज्यादा आ गए और कार्यक्रम में अव्यवस्था फैली । कार्यक्रम की जगह छोटी पड़ी, और आमंत्रितों को बैठने तक के लिए जगह नहीं मिली । कई लोगों ने खाना न मिलने की शिकायत की और बिना खाना खाए लौटने को लेकर अपना असंतोष व्यक्त किया । इससे क्लब की तो बदनामी हुई ही, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रमोशन की भी बुरी गत बनी । कुछ लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा ने आमंत्रितों की संख्या बढ़ाने का काम जानबूझ कर किया, जिससे कि अव्यवस्था फैले और दीपक गुप्ता की मेहनत पर पानी फिरे ।
मुकेश अरनेजा ने एक और 'बदमाशी' की - उन्होंने कार्यक्रम की तैयारी करते हुए ऐसे हालात बनाए कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ और डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रमेश अग्रवाल ने अपने आप को इस कार्यक्रम से अलग-थलग रखा और इसमें शामिल नहीं हुए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शरत जैन भी मुकेश अरनेजा के रवैये से इतने क्षुब्ध थे कि कार्यक्रम में अनमने से ही रहे । एक मौके पर उनकी उपस्थिति दिखाने के लिए उनका नाम पुकारा गया, किंतु वह दाएँ-बाएँ हो गए और मौके पर पहुँचे ही नहीं । डिस्ट्रिक्ट 3011 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला तथा कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यक्रम में खूब सक्रिय दिखे - जिस पर कई लोगों ने मुकेश अरनेजा से यह पूछ कर चुस्की भी ली कि 'दीपक को क्या डिस्ट्रिक्ट 3011 में चुनाव लड़वा रहे हो ?' दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लोगों की उपस्थिति को संभव बनवा कर मुकेश अरनेजा अपना 'जलवा' दिखलाने में तो कामयाब रहे - किंतु दीपक गुप्ता को इससे क्या फायदा हुआ ? जाहिर है कि दीपक गुप्ता की 'कीमत' पर मुकेश अरनेजा ने खुद को प्रमोट करने का अवसर पा लिया है । इस तरह यह आरोप एक बार फिर सच साबित होता हुआ दिखा है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उन्होंने अपना 'दूसरा' मकसद साधने के लिए उकसाया है और वह नहीं चाहते हैं कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी सचमुच में लोगों के बीच अपनी कोई जगह बनाए । अन्य कुछेक लोगों का कहना लेकिन यह भी है कि मुकेश अरनेजा दरअसल बहुत ही कन्फ्यूज किस्म का व्यक्ति है - वह कोई काम करता तो यह सोच कर है कि वह बड़ी अक्लमंदी कर रहा है, किंतु अंततः वह उसकी मूर्खता साबित होता है । ऐसा कहने वालों का तर्क है कि जो मुकेश अरनेजा अपनी तमाम तिकड़मों से अपना खुद का भला नहीं कर सका - और अपने क्लब में तथा अपने पारिवारिक बिजनेस में 'पिटा', वह भला दूसरे किसी का क्या फायदा करवा सकेगा ? रोटरी क्लब गाजियाबाद का कार्यक्रम क्लब के पदाधिकारियों की तमाम मेहनत के बावजूद - मुकेश अरनेजा की चालबाजी का शिकार बना, या उनकी मूर्खता का; इस पर बहस करके रोटरी क्लब गाजियाबाद व दीपक गुप्ता के हुए नुकसान की भरपाई तो नहीं की जा सकती - लेकिन इस बहस के चलते लोगों के बीच एक नसीहत जरूर चर्चा में आई है, और वह यह कि दीपक गुप्ता जितनी जल्दी मुकेश अरनेजा के चँगुल से बाहर निकलेंगे, उतना ही अपना खुद का भला करेंगे ।

Sunday, August 30, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ का बुरा हाल करने के उद्देश्य से ही मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रवीन निगम और दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसा कर उनका इस्तेमाल करने की चाल चली है क्या ?

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस में अपनी आधिकारिक यात्रा में जिस अपमान का सामना करना पड़ा था, उसकी स्क्रिप्ट मुकेश अरनेजा द्वारा लिखे जाने की जानकारी उन्हें मिली है । जेके गौड़ के नजदीकियों का कहना है कि क्लब के लोगों ने ही जेके गौड़ को यह बात बताई है । रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस की जीओवी में जेके गौड़ के साथ जो हुआ, उसके लिए क्लब के पदाधिकारियों ने सीधे-सीधे मुकेश अरनेजा को जिम्मेदार ठहराया है । मुकेश अरनेजा ने यह बात तो कुछेक जगह कही भी है ही कि वह जेके गौड़ का भी वैसा ही हाल करेंगे, जैसा कि उन्होंने अमित जैन का किया था । मुकेश अरनेजा दरअसल जेके गौड़ से बुरी तरह खफा हैं । पहले तो वह जेके गौड़ से इस बात पर खफा थे, कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी बजाए रमेश अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं; पिछले दिनों उनका पारा लेकिन तबसे और चढ़ गया है, जबसे जेके गौड़ ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण न करने की हिदायत दी है । उल्लेखनीय है कि जेके गौड़ को यह हिदायत मुकेश अरनेजा को तब देनी पड़ी, जब डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन के रूप में मुकेश अरनेजा ने एक ईमेल पत्र लोगों को लिखा/भेजा । जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा को स्पष्ट बताया कि इस तरह का कोई पत्र लिखने का अधिकार उन्हें नहीं है, और यह अधिकार सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को है । जेके गौड़ के नजदीकियों के अनुसार, जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा को स्पष्ट संकेत दे दिए कि इस तरह का पत्र लिखने की उन्होंने यदि दोबारा कोशिश की तो वह उन्हें डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन पद से हटा देंगे । पद छिनने के डर से मुकेश अरनेजा ने दोबारा पत्र लिखने की तो हिम्मत नहीं की, लेकिन जेके गौड़ को सबक सिखाने का फैसला उन्होंने जरूर कर लिया । रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस में जेके गौड़ के साथ जो हुआ, उसके जरिए मुकेश अरनेजा ने जेके गौड़ को दरअसल झाँकी दिखाई है - और उनका कहना है कि पूरी पिक्चर तो अभी बाकी है ।
रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस की जीओवी में जेके गौड़ को एक के बाद एक दो बड़े झटके लगे । पहला झटका तो उन्हें तब लगा, जब वह तो निर्धारित समय पर मीटिंग स्थल पर पहुँच गए - किंतु मीटिंग के आयोजकों के रूप में नोएडा एक्सीलेंस के पदाधिकारियों का वहाँ कोई अतापता नहीं था । किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ऐसी बेइज्जती शायद ही कहीं/कभी हुई होगी - कि किसी क्लब के पदाधिकारी जीओवी का कार्यक्रम तय करें, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को समय और जगह बताएँ; और समय पर पहुँचे ही नहीं तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को इंतजार करवाएँ । इसमें भी मजा यह रहा कि क्लब के पदाधिकारियों से जब किसी ने इस बारे में बात की तो 'उल्टा चोर कोतवाल को डांटे' वाले अंदाज में क्लब के पदाधिकारियों ने जबाव दिया कि गौड़ को समय से पहुँचने की जरूरत क्या थी, उन्हें क्या पता नहीं है कि कार्यक्रमों में आने/पहुँचने में देर हो ही जाती है । इस रवैये के चलते जेके गौड़ को अपमान का घूँट पी कर रह जाना पड़ा । खैर, देर-सवेर जीओवी हुई - जिसमें जेके गौड़ को दूसरा झटका तब लगा जब क्लब के पदाधिकारियों ने रोटरी फाउंडेशन के लिए एक भी पैसा देने से साफ इंकार कर दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ को ऐसा दो-टूक इंकार किसी भी क्लब में सुनने को नहीं मिला । हर क्लब में, मरे से मरे क्लब में भी रोटरी फाउंडेशन के लिए की गई जेके गौड़ की माँग का सम्मान रखा गया, और कुछ न कुछ रकम अवश्य ही दी गई । किंतु रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस की जीओवी में रोटरी फाउंडेशन के लिए इकन्नी देने से भी साफ इंकार कर दिया गया । क्लब के पदाधिकारियों का कहना रहा कि उन्हें जो पैसे खर्च करने हैं, उसे वह रोटरी फाउंडेशन में देने की बजाए अपने प्रोजेक्ट्स में खर्च करेंगे । बाद में, क्लब के अधिष्ठापन समारोह में क्लब के कुछेक बड़े और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स घोषित भी किए गए - जिनकी लोगों के बीच भारी प्रशंसा भी हुई । इस प्रशंसा के बीच लेकिन रोटरी फाउंडेशन के प्रति उनके नकारात्मक रवैये को लेकर आलोचना के स्वर भी रहे - और इस आलोचना को इसलिए भी तवज्जो मिली, क्योंकि इसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ के अपमान का भाव भी था । 
उल्लेखनीय है कि रोटरी फाउंडेशन को लेकर कई एक रोटेरियंस के बीच नकारात्मक भाव देखने/सुनने को मिलते रहते हैं । कई एक रोटेरियंस इस बात की वकालत करते देखे/सुने जाते रहे हैं कि रोटरी फाउंडेशन में पैसे देने का कोई फायदा नहीं होता है, और उसमें पैसे देने की बजाए उस पैसे को अपने प्रोजेक्ट्स में खर्च करना चाहिए । ऐसी बातें दरअसल इसलिए होती हैं, क्योंकि बहुत से रोटेरियंस के सामने रोटरी फाउंडेशन का कॉन्सेप्ट ही स्पष्ट नहीं होता है, और वह उस कॉन्सेप्ट को जानने/समझने की बजाए अपनी ही मनमानी करना चाहते हैं । ऐसे लोग दरअसल कन्फ्यूज्ड लोग होते हैं । ये रोटरी जैसे इंटरनेशनल ऑर्गेनाजेशन में भी सदस्य बनना चाहेंगे, किंतु उसके कॉन्सेप्ट को भी नहीं अपनायेंगे । ये लोग ऐसे लोग होते हैं जो अपनी पसंद और अपनी ही मर्जी से मिठाई खाने का फैसला करते हैं, और फिर शिकायत करते हैं कि इसमें नमक तो है ही नहीं ! इनकी शिकायत बहुत सही होती है, और नमक खाने की इनकी इच्छा इनका अधिकार भी होता है - बस इनका फैसला गलत होता है । खाने की हर चीज में जिसे नमक चाहिए ही, उसे मिठाई खाने का फैसला करना ही नहीं चाहिए । जो लोग अपने पैसे से अपने प्रोजेक्ट्स करना चाहते हैं, वह कोई गलत सोच नहीं रखते हैं; लेकिन अपनी सोच को क्रियान्वित करने के लिए उन्हें अपना एक एनजीओ खोलना/बनाना चाहिए, या किसी स्थानीय एनजीओ से जुड़ना चाहिए - रोटरी जैसे इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन में उन्हें शामिल ही नहीं होना चाहिए । इसीलिए रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस के पदाधिकारियों का रोटरी फाउंडेशन में एक भी पैसा न देने के फैसले को हैरानी और संदेह के साथ देखा गया । हैरानी इसलिए भी हुई क्योंकि इस क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य प्रवीन निगम डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की दौड़ में हैं । सवाल यह है कि प्रवीन निगम यदि गवर्नर बन गए, तो क्या तब भी वह रोटरी फाउंडेशन के प्रति वही रवैया रखेंगे/दिखायेंगे - जो अभी उनके क्लब के पदाधिकारी दिखा रहे हैं ?
उस समय तो बात सिर्फ हैरानी तक सिमट कर रह गई, लेकिन अब भेद खुला कि यह सब मुकेश अरनेजा की पढ़ाई/सिखाई का नतीजा था । क्लब के पदाधिकारियों ने ही जेके गौड़ को बताया है कि मुकेश अरनेजा ने ही उन्हें सलाह दी थी कि जीओेवी में देर से पहुँचोगे और जेके गौड़ को इंतजार करवाओगे । मुकेश अरनेजा का तर्क था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ क्लब के लोगों को कुछ समझ ही नहीं रहा है, और क्लब के लोगों को उपेक्षित कर रहा है - इसलिए उसे क्लब की ताकत दिखाने/बताने की जरूरत है । रोटरी फाउंडेशन को लेकर मुकेश अरनेजा ने उन्हें समझाया था कि रोटरी फाउंडेशन के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे इकट्ठे करके जेके गौड़ अपना रिकॉर्ड बनाना चाहता है, इसलिए उसमें पैसे देने से क्लब को कोई फायदा नहीं होगा और क्लब को रोटरी फाउंडेशन में एक पैसा देने की भी जरूरत नहीं है । मुकेश अरनेजा ने उन्हें पूरी पट्टी पढ़ाई कि रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे लेने खातिर जेके गौड़ उन्हें तरह तरह के लालच देगा और तरह तरह की बातें बनायेगा, लेकिन उसकी बातों में मत आना और बस एक ही तर्क देना कि हमें जो पैसे खर्च करने हैं, उन्हें हम अपने ही प्रोजेक्ट्स में करेंगे । मुकेश अरनेजा की इस पढ़ाई/सिखाई का एक ही मकसद था और वह यह कि वह जेके गौड़ को अपमानित करवाना चाहते थे । 
मुकेश अरनेजा ने जब दीपक गुप्ता से रोटरी फाउंडेशन में पैसे दिलवाए थे, तब भी जेके गौड़ को नीचा दिखाने का काम किया था । जेके गौड़ ने अलग अलग जगहों पर कई बार यह शिकायत की है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई को रोटरी फाउंडेशन के लिए ड्रॉफ्ट सौंपते समय दीपक गुप्ता ने उन्हें बिलकुल अलग-थलग और अँधेरे में रखा । जेके गौड़ ने इसे अपने अपमान के रूप में देखा/पहचाना है । लोगों के बीच की चर्चाओं में इसे मुकेश अरनेजा की खुराफात के रूप में समझा गया है । इस खुराफात के जरिए मुकेश अरनेजा ने जेके गौड़ को अपमानित करने का सुख भले ही प्राप्त कर लिया हो, किंतु दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम के लिए तो मुसीबत पैदा कर दी है । मुकेश अरनेजा की करनी के चलते जेके गौड़ इन दोनों की उम्मीदवारी के प्रति दुश्मनी का भाव रखने लगे हैं । रोटरी की चुनावी राजनीति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर यदि किसी उम्मीदवारी के प्रति दुश्मनी का भाव अपना ले, तो फिर उसे तो कदम कदम पर मुसीबतें ही खड़ी मिलती हैं । प्रवीन निगम और दीपक गुप्ता इन मुसीबतों का सामना कर भी रहे हैं । इनकी मुसीबतों का रोचक परिदृश्य यह है कि यह जिन मुकेश अरनेजा को अपनी अपनी उम्मीदवारी का खैवनहार समझ रहे हैं, वही मुकेश अरनेजा इनकी मुसीबतों के वास्तविक कारण हैं । इससे यह और साफ हुआ है कि प्रवीन निगम और दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसा कर मुकेश अरनेजा वास्तव में अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं; इनकी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन बढ़े इसके लिए प्रयास करने की बजाए मुकेश अरनेजा इनकी उम्मीदवारी को सीढ़ी बना कर अपने ही काम बनाने/निकालने में लगे हुए हैं और इस बात की भी परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं कि उनकी कारगुजारियों से इनकी उम्मीदवारी के समर्थकों की बजाए विरोधी बढ़ रहे हैं । ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दोनों मुकेश अरनेजा के झाँसे में कब तक फँसे रहते हैं ।

Sunday, July 26, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 की चुनावी राजनीति को अपनी कंपनी के झगड़ों/झंझटों से निपटने में इस्तेमाल करने की कोशिश के तहत मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाया है क्या

नई दिल्ली । अशोक गर्ग ने उम्मीदवार के रूप में अपनी सक्रियता को बनाए रख कर मुकेश अरनेजा के उनकी उम्मीदवारी से हाथ खींच लेने की खबरों से परेशान न होने का जो संकेत दिया है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए होने वाले चुनावी मुकाबले को खासा रहस्यपूर्ण और दिलचस्प बना दिया है । इस रहस्य और दिलचस्पी में प्रवीन निगम के नजदीकियों व समर्थकों ने यह बताते/कहते हुए और इजाफा किया है कि मुकेश अरनेजा ने प्रवीन निगम की उम्मीदवारी को प्रमुखता दिलाने के लिए उन्हें कई जरूरी सुझाव दिए हैं तथा अपनी मदद का भरोसा दिया है ।इन दो तथ्यों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मुकाबले को इसलिए रहस्यपूर्ण व रोचक बना दिया है, क्योंकि इस बीच मुकेश अरनेजा द्वारा दीपक गुप्ता को भी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए उकसाए जाने की चर्चा लोगों के बीच है । इससे लोगों के बीच चर्चा यह छिड़ी है कि मुकेश अरनेजा इस वर्ष आखिर कितने लोगों को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी 'चुनवायेंगे' ? विभिन्न मौकों पर लोगों के बीच छिड़ने/होने वाली इस चर्चा का निष्कर्ष प्रायः यह निकलता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव की आड़ में मुकेश अरनेजा वास्तव में अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास कर रहे हैं - और वह सचमुच में किसी भी उम्मीदवार के साथ गंभीरता के साथ जुड़े नहीं हैं ।सामान्य व्यवहार की बात है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर मुकेश अरनेजा यदि सचमुच में गंभीर होते, तो किसी एक उम्मीदवार का झंडा उठाते - वह तीन उम्मीदवारों को सलाह/सुझाव दे रहे हैं, और उन्हें मदद करने की बात कर रहे है; इससे साबित है कि वह तीनों को ही झाँसा दे रहे हैं ।
मुकेश अरनेजा के नजदीकियों के अनुसार, मुकेश अरनेजा इस समय अपनी कंपनी से निकाले जाने के मामले में बुरी तरह फँसे हुए हैं । कंपनी के प्रमोटर्स के रूप में उनके भाई-भतीजे और दूसरे प्रमुख शेयरहोल्डर्स जिस तरह उनके खिलाफ हो गए हैं, उसके चलते उनके सामने कंपनी मामलों से जुड़ी कई पेचीदगियाँ खड़ी हो गई हैं । कंपनी में अपनी शेयरहोल्डिंग को बचाने और/या उसे उचित रूप में सुरक्षित रखने या पाने के लिए उन्हें जूझना पड़ रहा है - और इसके लिए उन्हें एक्सपर्ट प्रोफेशनल सलाह व मदद की जरूरत है । समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है - एक्सपर्ट प्रोफेशनल सलाह व मदद के लिए उनके सामने मोटी फीस की व्यवस्था करने की भी चुनौती है । नजदीकियों के अनुसार, इस चुनौती से निपटने के लिए मुकेश अरनेजा रोटरी को और रोटरी में अपनी स्थिति को इस्तेमाल कर रहे हैं । कंपनी के झगड़ों/झंझटों में अशोक गर्ग से मदद मिलने की उम्मीद में ही मुकेश अरनेजा ने पहले अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का झंडा उठाया था । अशोक गर्ग पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं - इसलिए मुकेश अरनेजा को लगा कि वह अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का समर्थन करने के बदले में उनसे मुफ्त में प्रोफेशनल मदद ले लेंगे । जल्दी ही लेकिन उन्हें समझ में आ गया कि उनके जिस तरह के झमेले हैं, उनसे डील करना और उन्हें सँभालना अशोक गर्ग के बस की बात नहीं है । अशोक गर्ग से निराश होकर मुकेश अरनेजा, प्रवीन निगम की शरण में आए । 
प्रवीन निगम भी पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और कंपनी मामलों के एक्सपर्ट हैं । मुकेश अरनेजा को अपने कंपनी संबंधी झमेलों के लिए जिस तरह की प्रोफेशनल मदद की आवश्यकता है, उसे उपलब्ध करवाने की एक्सपर्टीज उन्होंने प्रवीन निगम में देखी/समझी । मुकेश अरनेजा की खुशकिस्मती यह रही कि प्रवीन निगम ने भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की हुई है । प्रवीन निगम के क्लब के एक प्रमुख सदस्य प्रशांत माथुर के साथ मुकेश अरनेजा के अच्छे संबंध पहले से ही हैं; इन्हीं संबंधों का ध्यान रखते हुए प्रवीन निगम ने प्रशांत माथुर के जरिए मुकेश अरनेजा से अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन पाने का प्रयास किया - तो मुकेश अरनेजा को प्रवीन निगम को फाँसने का अच्छा मौका अपने आप मिल गया । मुकेश अरनेजा ने समझ लिया कि प्रवीन निगम का समर्थन करने के बदले में उन्हें अपनी कंपनी के मामलों में प्रवीन निगम की एक्सपर्ट प्रोफेशनल मदद मुफ्त में मिल ही जाएगी । अशोक गर्ग और प्रवीन निगम की उम्मीदवारी को समर्थन दे रहे मुकेश अरनेजा ने अचानक जिस तरह से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को 'उकसाया', उसमें लोगों को दीपक गुप्ता को इस्तेमाल करने की उनकी चाल ही नजर आई है । लोगों को लग रहा है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाने के जरिए मुकेश अरनेजा ने दरअसल अशोक गर्ग और प्रवीन निगम को यह 'दिखाने' का काम किया है कि इससे सुभाष जैन का समर्थन-आधार कमजोर होगा - और 'उन्हें' फायदा होगा । दोनों को फायदा होने का वास्ता देकर मुकेश अरनेजा ने कंपनी मामलों के अपने झमेले में उनसे मिल सकने वाली मदद को दरअसल पक्का करने का इंतजाम किया है ।
मुकेश अरनेजा के सामने इस समय कंपनी मामलों के अपने झमेलों से निपटने के साथ-साथ रोटरी और डिस्ट्रिक्ट में अपनी भूमिका को बनाए रखने की भी चुनौती है । रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शरत जैन के साथ मिल कर जिस तरह मुकेश अरनेजा को किनारे/ठिकाने लगाया हुआ है, उससे रोटरी और डिस्ट्रिक्ट में मुकेश अरनेजा की राजनीति खतरे में पड़ी दिखाई दे रही है । इस खतरे से बचने/उबरने का मौका उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में ही मिल सकता है । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों के अनुसार, मुकेश अरनेजा इस मौके में भी अपने लिए अनुकूल अवसर नहीं देख/पा रहे हैं । मुकेश अरनेजा के अपने आकलन के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में सुभाष जैन का पलड़ा भारी दिख रहा है; लोगों ने जिस तरह से उनकी उम्मीदवारी को स्वीकार कर लिया है - उसे देखते/पहचानते/समझते हुए मुकेश अरनेजा को तोड़फोड़ का हथकंडा आजमाना जरूरी लगा है; और माना जा रहा है कि इसी हथकंडे के तहत उन्होंने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाया है । अशोक गर्ग ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की आहट पर चिंता करने की बजाये जिस तरह की खुशी सी जाहिर की है, उससे भी लोगों को विश्वास हुआ है कि मुकेश अरनेजा ने गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में क्लब्स के बीच फूट डाल कर राज पाने की कोशिश के तहत दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाया है । 

Monday, July 20, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी को मिल रहे व्यापक समर्थन को देख कर निराश/परेशान मुकेश अरनेजा ने गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की जो कोशिश शुरू की है, उससे अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान का बंटाधार होता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की खबरों ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को तगड़ा झटका दिया है । झटका इसलिए क्योंकि अभी तक अशोक गर्ग को मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है; लेकिन मुकेश अरनेजा अब यदि कोई और उम्मीदवार खोज रहे हैं - तो इसका मतलब है कि अशोक गर्ग में उन्होंने अपना विश्वास खो दिया है । अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा का बड़ा सहारा था - लेकिन अब इस सहारे के छिन जाने से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया है । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का कहना है कि मुकेश अरनेजा ने पाया/समझा है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह का समर्थन मिलता दिख रहा है, उसका मुकाबला करना अशोक गर्ग के बस की बात नहीं है; सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में अपने लिए समर्थन जुटाया है और इस समर्थन के भरोसे सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी पर बढ़त बना ली है - उससे मुकेश अरनेजा को यह भी लगा है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी का मुकाबला गाजियाबाद/नोएडा का कोई उम्मीदवार ही कर सकता है । इसीलिए वह गाजियाबाद/नोएडा में एक उपर्युक्त और समर्थ उम्मीदवार की तलाश में जुट गए हैं । मुकेश अरनेजा की तलाश का क्या नतीजा निकलता है और उनकी तलाश कहाँ/किस पर खत्म होती है, यह तो आगे पता चलेगा - उनकी इस तलाश ने लेकिन अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा संकट तो खड़ा कर ही दिया है । 
मुकेश अरनेजा की यह तलाश लेकिन कुछेक लोगों को मुकेश अरनेजा की चाल नजर आ रही है । उन्हें लग रहा है कि सुभाष जैन को खासतौर पर गाजियाबाद और आमतौर पर उत्तर प्रदेश में जो समर्थन मिल रहा है, उसे कमजोर करने के लिए उन्हें गाजियाबाद/नोएडा में एक उम्मीदवार 'पैदा' करना होगा - और इस फार्मूले से वह अशोक गर्ग की राह को आसान बना सकेंगे । मुकेश अरनेजा की इस 'चाल' को पहचानने का दावा करने वाले लोगों का कहना है कि तीन वर्ष पहले जेके गौड़ का रास्ता रोकने के लिए मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल के साथ मिल कर जिस तरह से आलोक गुप्ता का इस्तेमाल किया था, उसी तरह से अब वह सुभाष जैन का रास्ता रोकने के लिए गाजियाबाद/नोएडा में किसी को खोज रहे हैं । रंग बदलने की कला में गिरगिट को पीछे छोड़ते हुए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल बाद में जेके गौड़ की जीत का श्रेय लेने में भले ही कामयाब हो गए हों, लेकिन जेके गौड़ की उम्मीदवारी के साथ शुरू से जुड़े रहे लोगों को तो सच्चाई का पता है ही, दूसरे लोगों को भी जानकारी है कि इन दोनों ने कैसे कैसे जेके गौड़ को छकाया था । आलोक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल से मिले धोखे के कारण आज तक उन्हें माफ नहीं किया है । मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के साथ हुई धोखाधड़ी का सारा दोष रमेश अग्रवाल पर मढ़ कर आलोक गुप्ता से हालाँकि पुनः संबंध जोड़ लिए है - मुकेश अरनेजा में आलोक गुप्ता का भरोसा भी पुनः लौट आया है, यह यद्यपि अभी 'देखना' बाकी है । इस किस्से को जिन लोगों ने नजदीक से देखा है, वह उस अनुभव को याद करते बहुत ही विश्वास के साथ कहते हैं कि मुकेश अरनेजा गाजियाबाद/नोएडा में कोई उम्मीदवार नहीं, बल्कि 'बलि का बकरा' खोज रहे हैं - जिसका सहारा लेकर वह सुभाष जैन का शिकार कर सकें, और उन्हें कमजोर कर सकें । 
अब सच चाहें जो हो - मुकेश अरनेजा चाहें अशोक गर्ग की उम्मीदवारी की परफॉर्मेंस से निराश होकर वास्तव में एक ऐसा उम्मीदवार खोज रहे हों, जो सुभाष जैन को टक्कर दे सके; और या रणनीतिक चाल के रूप में 'बलि का बकरा' तलाश कर रहे हों - मुकेश अरनेजा की इस कार्रवाई से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए तो संकट खड़ा हो ही गया है । वह तो एक तर्क दिया जाता है न कि चाहे चाकू खरबूजे पर गिरे चाहे खरबूजा चाकू पर गिरे, कटना खरबूजे को ही है - उसी तर्ज पर मुकेश अरनेजा के किसी भी 'कारण' से किसी दूसरे उम्मीदवार की तलाश में जुटने का सीधा नुकसान अशोक गर्ग को ही होना है । यही हुआ भी है । अशोक गर्ग ने पिछले दिनों अपनी उम्मीदवारी के अभियान को जिस तरह से संयोजित किया था, उससे चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कई खिलाड़ी रोटेरियंस प्रभावित हुए थे और वह यह मानने/कहने लगे थे कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी का अभियान भले ही काफी बढ़त बनाए हुए दिख रहा हो, किंतु अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान से उसे कड़ी टक्कर मिलेगी । इस तरह की बातों से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का मोमेंटम बढ़ रहा था - जिसे लेकिन मुकेश अरनेजा की नई हरकत ने धूल में मिला दिया है । पिछले दिनों मुकेश अरनेजा का नाम लेकर कुछेक नए उम्मीदवारों के नाम जिस तरह से चर्चा में आए, उससे एक उम्मीदवार के रूप में अभी तक हासिल की गई अशोक गर्ग की उपलब्धियों पर पानी फिर गया है । मुकेश अरनेजा की यह कार्रवाई यदि सचमुच अशोक गर्ग की स्थिति से निराश होने के कारण प्रेरित है, तब तो यह अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा झटका है ही; यह कार्रवाई मुकेश अरनेजा की यदि एक चाल है तो भी मुकेश अरनेजा की इस चाल ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का कबाड़ा करने का ही काम किया है । 
उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा को एक बड़े चालबाज नेता/व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है - कुछेक लोग उनकी चालबाजियों के बड़े मुरीद भी हैं; किंतु यह तथ्य बहुत निराश करने वाला है कि अपनी तमाम चालबाजियों के बावजूद उन्हें अभी तक हासिल कुछ नहीं हुआ है - अपनी चालबाजियों के बावजूद वह अपने क्लब से, अपने परिवार से और अपने बिजनेस से खदेड़े ही गए हैं । क्लब में, परिवार में, बिजनेस पार्टनर्स में मनमुटाव होते ही हैं; मनमुटाव के कारण बँटवारे भी होते हैं - यह बड़ी स्वाभाविक सी स्थितियाँ हैं । मुकेश अरनेजा के अपने क्लब में, परिवार में और बिजनेस में झमेले रहे तो यह कोई बहुत बुरी बात नहीं है - यह स्वाभाविक सी बात है; पर जो बात स्वाभाविक नहीं है और बहुत बुरी है वह यह कि मुकेश अरनेजा हर जगह से खदेड़े गए हैं, भगाए गए हैं, निकाले गए हैं; और कहीं भी उनकी चालबाजी काम नहीं आई । इसी आधार पर माना जा रहा है कि मुकेश अरनेजा यदि सचमुच अशोक गर्ग की परफॉर्मेंस से निराश होकर किसी और उम्मीदवार की तलाश में जुटे हैं - तो सवाल यह है कि मुकेश अरनेजा जब अशोक गर्ग की उम्मीदवारी में दम नहीं भर सके तो किसी और उम्मीदवार को ही भला कैसे 'खड़ा' कर सकेंगे ? और यदि यह उनकी चाल है तो जैसे अभी तक मुकेश अरनेजा की हर चाल खुद उन्हें ही उल्टी पड़ी है, तो इस चाल के सीधी पड़ने की ही क्या गारंटी है - मुकेश अरनेजा अपनी चालबाजियों से जब अपने आप को न अपने क्लब में, न अपने परिवार में और न बिजनेस में बचा सके, तो दूसरे किसी को वह भला कैसे बचायेंगे ? जाहिर तौर पर मुकेश अरनेजा के गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की खबरों ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सुगबुगाहट तो पैदा की है, लेकिन अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान का बंटाधार कर दिया है । 

Tuesday, July 7, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 की डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में अपने आप को उचित जगह पर न पाकर गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख रोटेरियंस अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं; अमित अग्रवाल का मामला तो जेके गौड़ का अवसरवादी रूप सामने लाया

गाजियाबाद । जेके गौड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालते ही खास तौर पर गाजियाबाद और आमतौर पर उत्तर प्रदेश के रोटेरियंस को अपना असली 'रूप' दिखाने का जो काम किया है, उससे गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश के लोगों में भारी नाराजगी के स्वर तो पैदा हुए ही हैं - पर सबसे क्लासिक केस रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लेटिनम के वरिष्ठ सदस्य अमित अग्रवाल का सामने आया है । उल्लेखनीय है कि अमित अग्रवाल - उम्मीदवार जेके गौड़ के सबसे बड़े समर्थक थे, और नोमीनेटिंग कमेटी में उनकी भूमिका को जेके गौड़ की जीत में एक बड़े प्रेरक व कारण के रूप में अभी तक देखा जा रहा है । इस नाते से उम्मीद की जा रही थी कि जेके गौड़ जब गवर्नर बनेंगे, तब वह अमित अग्रवाल को अवश्य ही एक बड़ा और महत्वपूर्ण पद सौपेंगे । लेकिन अभी जब डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी सामने आई तो लोग यह देख कर हैरान रह गए कि अमित अग्रवाल को रोटरी वॉलंटियर्स जैसा मामूली पद देकर टरका दिया गया है । इसके अलावा जेके गौड़ ने उन्हें जोनल स्तर का एक पद और भी दिया है । अमित अग्रवाल के साथ किए गए जेके गौड़ के इस सुलूक की जिसे भी जानकारी मिली, उसे खासा तगड़ा झटका लगा । जो लोग जेके गौड़ को बहुत ही घटिया सोच व व्यवहार का व्यक्ति मानते हैं और उन्हें अवसरवादी बताते हैं, उनका भी कहना है कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अमित अग्रवाल के साथ जेके गौड़ इस तरह का 'व्यवहार' करेंगे । अमित अग्रवाल लेकिन थोड़ा खुशकिस्मत भी हैं, क्योंकि इस मौके पर जब गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के रोटेरियंस उनके प्रति हमदर्दी व्यक्त कर रहे हैं - उन्हें उन आलोक गुप्ता की सहानुभूति भी मिल रही है, जेके गौड़ के बरक्स जिनकी उम्मीदवारी को जीरो करने का उन्होंने अदम्य रवैया अपनाया था । 
यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि जेके गौड़ ने जब अपनी टीम बनाना शुरू ही किया था, तब अमित अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट मीट की चेयर मिलने की चर्चा सुनी गई थी; लेकिन बाद में इस चेयर पर रोटरी क्लब कैपिटल सिटी नई दिल्ली के आशीष माखीजा 'बैठे' हुए मिले/दिखे । उस समय यही सुनने को मिला था कि डिस्ट्रिक्ट मीट की चेयर अमित अग्रवाल से छिनवाने का काम रमेश अग्रवाल ने किया, और यह चेयर आशीष माखीजा को दिलवाने का काम मुकेश अरनेजा ने किया । चर्चा यह थी कि मुकेश अरनेजा के कानूनी झमेलों में आशीष माखीजा एक वकील के रूप में उनकी जो मदद करते रहते है, यह चेयर मुकेश अरनेजा ने उसकी फीस के रूप में उन्हें दिलवाई है । अमित अग्रवाल के लिए झटके की बात सिर्फ यही नहीं रही कि डिस्ट्रिक्ट मीट की चेयर उनसे छिन गई; इससे भी ज्यादा बड़ा झटका उनके लिए यह रहा कि उन्हें जेके गौड़ के कोर ग्रुप में भी कोई जगह नहीं मिली । और जैसे इतना ही काफी नहीं था - जेके गौड़ की तरफ से इस स्थिति के लिए अमित अग्रवाल को ही जिम्मेदार ठहरा दिया गया है । जेके गौड़ और उनकी छाया बने अशोक अग्रवाल से जब कुछेक लोगों ने अमित अग्रवाल के साथ नाइंसाफी होने की बात कही, तो उन्हें इनकी तरफ से सुनने को मिला कि अमित अग्रवाल जिस लायक हैं, उसके अनुरूप उन्हें उचित पद दिए गए हैं । जेके गौड़ व अशोक अग्रवाल ने लोगों से कहा/बताया कि अमित अग्रवाल एक नकारात्मक सोच के व्यक्ति हैं, इसलिए चुनावी राजनीति में तो उनकी मदद ली जा सकती है, किंतु डिस्ट्रिक्ट चलाने के लिए तो सकारात्मक सोच के व्यक्तियों की जरूरत होती है; और उसमें अमित अग्रवाल जैसे लोग फिट नहीं बैठते हैं । जेके गौड़ ने तो एक मजेदार बात और कही, और वह यह कि - नोमीनेटिंग कमेटी में अमित अग्रवाल ने जो किया था वह इसलिए नहीं किया, क्योंकि वह उनके समर्थक थे बल्कि इसलिए किया क्योंकि वह आलोक गुप्ता से बदला लेना चाहते थे और आलोक गुप्ता को नीचा दिखाना चाहते थे । जेके गौड़ का कहना है कि यह सच है कि नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग में की गई अमित अग्रवाल की इस कार्रवाई से उनकी उम्मीदवारी को फायदा हुआ; लेकिन यह तो अमित अग्रवाल ने आलोक गुप्ता से अपनी खुंदक निकालने के लिए किया था; इसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनके लिए अमित अग्रवाल को पुरस्कृत करना जरूरी क्यों होना चाहिए ?
जेके गौड़ की इस बात में दम तो है, लेकिन यह दम तब दम तोड़ देता है जब गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख रोटेरियंस डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में अपने आप को उचित जगह पर न पाकर अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में समर्थन पाने के लिए जेके गौड़ जिन प्रमुख रोटेरियंस के चक्कर काटा करते थे, और जिनकी खुशामद करते हुए नहीं थकते थे - डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उन्हें जेके गौड़ ने 'एरिया ऑफ फोकस' तथा 'गवर्नर्स स्पेशल ऐड्स' तथा और भी गई-गुजरी जगहों पर धकेल दिया है । इसी से लोगों को यह कहने का मौका मिला है कि जेके गौड़ ने जब वरिष्ठ रोटेरियंस की परवाह नहीं की, तो अमित अग्रवाल की ही परवाह वह क्यों करते भला ? अमित अग्रवाल से हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि वरिष्ठ रोटेरियंस ने तो अपनी अपनी सीमाओं में रह ही जेके गौड़ की मदद की, और इसके लिए जेके गौड़ से खुशामद भी करवाई; किंतु अमित अग्रवाल ने तो अपनी सीमा से पार जाकर उनकी मदद की थी और इसके लिए जेके गौड़ से खुशामद भी नहीं करवाई थी - इसलिए जेके गौड़ को अमित अग्रवाल के साथ तो अन्याय नहीं करना चाहिए था । पर अब जब अमित अग्रवाल के साथ किए गए व्यवहार को जेके गौड़ पूरी बेशर्मी के साथ उचित ठहरा रहे हैं, तो लोगों को यह कहने का मौका मिल रहा है कि अमित अग्रवाल को जेके गौड़ ने पहले तो इस्तेमाल किया और अब उन्हें उपयोगी न पाकर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया है । कुछेक लोगों का कहना है कि उन्होंने अमित अग्रवाल को बताया/समझाया था कि जेके गौड़ बहुत ही मतलबी और अवसरवादी किस्म का व्यक्ति है, इसके चक्कर में ज्यादा पड़ोगे तो अपनी ही फजीहत करवाओगे । इनका कहना है कि अमित अग्रवाल ने उस समय तो उनकी एक न सुनी, किंतु अब जेके गौड़ का रवैया देख कर पछता रहे हैं । 
मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में मिली अपनी अपनी जगहों से निराश, दुखी और नाराज वरिष्ठ रोटेरियंस की नाराजगियों की खबर जेके गौड़ को निरंतर मिल रही हैं, किंतु वह इसकी जरा भी परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं । यह खबरें देने वाले लोगों से उनका कहना रहता है कि वह इन वरिष्ठ रोटेरियंस को पहचान गए हैं; यह सिर्फ अपनी आपसी बातचीतों में ही नाराजगी व्यक्त कर सकते हैं - इससे ज्यादा कुछ कर पाना इनके बस की बात नहीं है । जेके गौड़ ने किसी किसी से यहाँ तक दावा किया कि जिन लोगों के नाम नाराज लोगों के रूप में लिए जा रहे हैं, उन्हें अपने घर या अपने स्कूल में मीटिंग करने आने के लिए एक फोन करूँ तो अभी दौड़े चले आयेंगे; इसलिए इनकी नाराजगी को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है । गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश के लोगों में जेके गौड़ के प्रति बढ़ रही नाराजगी आगे क्या गुल खिलायेगी - और खिलायेगी भी या जेके गौड़ का दावा ही सच साबित करेगी; यह तो आने वाले समय में पता चलेगा; किंतु अभी इस नाराजगी ने तरह तरह की दिलचस्प किस्म की चर्चाओं को जरूर हवा दी हुई है । 

Sunday, June 28, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस योगेश गर्ग तक के साथ धोखा और चालबाजी करने वाले जेके गौड़ का रवैया यदि अशोक गर्ग के प्रति भी बदला बदला सा है, तो इसमें आश्चर्य की भला क्या बात है ?

नई दिल्ली । जेके गौड़ के बदले-बदले से रवैये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार अशोक गर्ग को खासा हैरान भी किया है, और बुरी तरह परेशान भी । अशोक गर्ग के नजदीकियों के अनुसार, अशोक गर्ग उन दिनों को याद करके अपनी हैरानी व परेशानी को और बढ़ाते हुए भी दिखते हैं, जब जेके गौड़ खुद उम्मीदवार थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए जेके गौड़ उनकी कैसे कैसे और कैसी कैसी खुशामद किया करते थे, उसे याद करते हुए - और जेके गौड़ के अब के व्यवहार के साथ उसकी तुलना करते हुए अशोक गर्ग अचंभा करते हैं कि कोई व्यक्ति इतना भी बदल सकता है क्या ? पिछले रोटरी वर्ष में भी जेके गौड़ के साथ अशोक गर्ग के इतने घनिष्ट संबंध थे कि जेके गौड़ के कहने पर अशोक गर्ग ने अपने क्लब के वरिष्ठ सदस्य संजीव रस्तोगी को क्लब से ही निकाल/निकलवा दिया था । नजदीकियों के अनुसार, अशोक गर्ग को अब लगता है कि जेके गौड़ ने पिछले वर्षों में उन्हें तरह-तरह से इस्तेमाल किया, और अब जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में उन्हें जेके गौड़ से मदद की उम्मीद है, तो जेके गौड़ उनके साथ ऐसे पेश आते हैं कि जैसे उन्हें पहचानते ही नहीं हैं । अशोक गर्ग को चूँकि दूसरे रोटेरियंस से भी यह सुनने को मिलता है कि जेके गौड़ बहुत बदल गए हैं, अब वह पहले जैसे नहीं रह गए हैं और घमंडी व बदतमीज तक हो गए हैं, तो अशोक गर्ग को थोड़ी सांत्वना तो मिलती है किंतु उनका अचंभा खत्म नहीं होता है । गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस तक से की जा रही जेके गौड़ की बदतमीजियों की खबरें दरअसल अशोक गर्ग के अचंभे को खत्म नहीं होने दे रही हैं । 
गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस को जेके गौड़ की ताजा बदतमीजी का शिकार उस समय होना पड़ा, जब 30 जून को आयोजित हो रहे अपने 'संभव - टू मेक पॉसिबल' कार्यक्रम की तैयारियों के सिलसिले में उन्होंने अपनी तथाकथित कोर टीम की मीटिंग बुलाई । इस मीटिंग में उपस्थित लोगों से विचार-विमर्श करने व सलाह लेने की बजाए जेके गौड़ ने अपने फरमान सुनाने पर ही ज्यादा ध्यान दिया । हद तब हुई जब जेके गौड़ ने ऐलान किया कि 30 जून के उक्त कार्यक्रम के लिए वह 25 जून तक ही रजिस्ट्रेशन स्वीकार करेंगे । मीटिंग में मौजूद गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस राजीव वशिष्ठ, उमेश चोपड़ा, विनोद चावला आदि ने जेके गौड़ को समझाने का प्रयास किया कि अपने डिस्ट्रिक्ट की रोटरी में लोग ऐन कार्यक्रम के दिन तक रजिस्ट्रेशन करवाते हैं, इसलिए इस तरह का फैसला व्यवहारिक नहीं होगा - और यह फैसला लागू नहीं किया जाना चाहिए । जेके गौड़ ने लेकिन इनकी एक न सुनी और 25 जून तक रजिस्ट्रेशन करवाने के फैसले को लागू करने पर अड़े रहे । मीटिंग में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने उनके इस फैसले पर सहमति व्यक्त नहीं की, लेकिन जेके गौड़ फिर भी 'अपने' फैसले को लागू करने की जिद पूरी करके ही माने । मीटिंग में मौजूद लोगों के बीच नाराजगी भरे स्वर भी उभरे कि जेके गौड़ को जब किसी की सुननी/माननी ही नहीं है, तो फिर मीटिंग बुलाने का नाटक क्यों करता है ? इस किस्से में मजे की बात यह रही कि मीटिंग में जेके गौड़ को जो बात समझ में नहीं आ रही थी, और जिसे मानने के लिए वह हरगिज तैयार नहीं हुए - वह बात जेके गौड़ को तीन दिन बाद लेकिन समझ में आ गई; जब उन्होंने उक्त कार्यक्रम के लिए 25 जून तक रजिस्ट्रेशन कराने की शर्त को हटा लिया । इस पर कुछेक लोगों ने चुटकी भी ली कि जेके गौड़ की अक्ल का ताला धीरे-धीरे खुलता है क्या, जो उन्हें बात देर से समझ में आती है । 
इस मीटिंग की आड़ में जेके गौड़ ने गाजियाबाद के एक अन्य वरिष्ठ रोटेरियन योगेश गर्ग के साथ एक दूसरी किस्म की चाल खेली । इस मीटिंग में जेके गौड़ ने योगेश गर्ग को भी आमंत्रित किया । योगेश गर्ग ने मीटिंग में आने के लिए हामी भी भर दी - लेकिन ऐन मौके पर उन्हें पता चला कि जेके गौड़ ने इस मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे किसी संभावित उम्मीदवार को तो आमंत्रित किया ही नहीं है; संभावित उम्मीदवारों में एक अकेले उन्हीं को जेके गौड़ ने आमंत्रित किया है । यह जानकारी देने वाले ने योगेश गर्ग को यह जानकारी और दी कि उक्त मीटिंग में उनकी उपस्थिति को बना/दिखा कर जेके गौड़ ने उनकी संभावित उम्मीदवारी की राह के लिए रोड़ा तैयार करने की चाल चली है । समय रहते जेके गौड़ द्वारा रची गई साजिश की पोल खुल जाने से योगेश गर्ग ने उक्त मीटिंग में जाना तो स्थगित कर दिया, किंतु योगेश गर्ग को यह जानकर तगड़ा झटका लगा कि जेके गौड़ उनके साथ भी इस तरह की धोखाधड़ी कर सकता है ? जेके गौड़ की इस चालबाजी से सावधान होकर ही योगेश गर्ग ने जेके गौड़ का कामकाज देख रहे अशोक अग्रवाल को फोन करके एक बार फिर याद दिलाया कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उनका नाम किसी भी रूप में नहीं छपना चाहिए । योगेश गर्ग हालाँकि यह बात जेके गौड़ व अशोक अग्रवाल को पहले बता चुके थे; किंतु जेके गौड़ द्वारा रची गई चालबाजी के बेनकाब होने के बाद बाद योगेश गर्ग को डर हुआ कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में नाम छापने की हरकत कर सकता है, इसलिए उन्हें अशोक अग्रवाल को वह बात दोबारा से याद दिलाना जरूरी लगा ।
जेके गौड़ ने योगेश गर्ग के साथ जो चालबाजी खेली, उसके बारे में जानकर अशोक गर्ग की अपने प्रति जेके गौड़ के बदले रवैये से पैदा हुई निराशा शायद कुछ कम हुई होगी । उन्हें लगा होगा कि जेके गौड़ जब गाजियाबाद के योगेश गर्ग जैसे वरिष्ठ रोटेरियन को धोखा देने का काम कर सकते हैं और उनके साथ चालबाजी खेल सकते हैं, तो फिर उनके साथ अपना रवैया क्यों नहीं बदल सकते ? अशोक गर्ग के प्रति जेके गौड़ के बदले रवैये के पीछे हालाँकि मुकेश अरनेजा वाले ऐंगल को भी देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि अशोक गर्ग को मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अशोक गर्ग के समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि जेके गौड़ ने आजकल अपना 'आका' चूँकि रमेश अग्रवाल को बनाया हुआ है, और रमेश अग्रवाल तथा मुकेश अरनेजा के बीच छत्तीस का संबंध बना हुआ है - इसलिए जेके गौड़ को भी मुकेश अरनेजा से दूरी बनानी/दिखानी पड़ रही है; और इस चक्कर में अशोक गर्ग को 'पिसना' पड़ रहा है । कुछेक अन्य लोगों का कहना लेकिन यह भी है कि खेमेबाजी के कारण अशोक गर्ग को जेके गौड़ से जो चोट पड़ेगी, वह इतनी बुरी नहीं लगती; जितनी चोट अशोक गर्ग को जेके गौड़ के बदलते व्यवहार और उनके घमंडी हो जाने के कारण लग रही है । अशोक गर्ग के समर्थकों का कहना है कि जेके गौड़ यदि मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार होने के नाते भी अशोक गर्ग के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं, तो यह बात भी तो जेके गौड़ के अवसरवादी होने का सुबूत ही है - जेके गौड़ को क्या यह बात याद नहीं है कि रोटरी में आज वह जहाँ हैं, वहाँ तक उन्हें पहुँचाने में मुकेश अरनेजा का कितना और कैसा सहयोग रहा है ? अशोक गर्ग ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का अभियान जब शुरू किया था, तब उन्हें बड़ा भरोसा था कि मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार होने का जो लाभ उन्हें मिलेगा, उसके साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ की भी मदद उन्हें मिलेगी । यह भरोसा उन्हें इसलिए भी था, क्योंकि जेके गौड़ की उम्मीदवारी के समय उन्होंने जेके गौड़ की हर तरह से मदद की थी । अशोक गर्ग को यह देख/जान कर लेकिन खासा झटका लगा है कि जेके गौड़ पूरी तरह अहसानफरामोश निकले । जेके गौड़ की इस अहसानफ़रामोशी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में अशोक गर्ग की चुनौती को बढ़ा दिया है ।