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Monday, July 20, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी को मिल रहे व्यापक समर्थन को देख कर निराश/परेशान मुकेश अरनेजा ने गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की जो कोशिश शुरू की है, उससे अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान का बंटाधार होता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की खबरों ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को तगड़ा झटका दिया है । झटका इसलिए क्योंकि अभी तक अशोक गर्ग को मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है; लेकिन मुकेश अरनेजा अब यदि कोई और उम्मीदवार खोज रहे हैं - तो इसका मतलब है कि अशोक गर्ग में उन्होंने अपना विश्वास खो दिया है । अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा का बड़ा सहारा था - लेकिन अब इस सहारे के छिन जाने से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया है । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का कहना है कि मुकेश अरनेजा ने पाया/समझा है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह का समर्थन मिलता दिख रहा है, उसका मुकाबला करना अशोक गर्ग के बस की बात नहीं है; सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में अपने लिए समर्थन जुटाया है और इस समर्थन के भरोसे सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी पर बढ़त बना ली है - उससे मुकेश अरनेजा को यह भी लगा है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी का मुकाबला गाजियाबाद/नोएडा का कोई उम्मीदवार ही कर सकता है । इसीलिए वह गाजियाबाद/नोएडा में एक उपर्युक्त और समर्थ उम्मीदवार की तलाश में जुट गए हैं । मुकेश अरनेजा की तलाश का क्या नतीजा निकलता है और उनकी तलाश कहाँ/किस पर खत्म होती है, यह तो आगे पता चलेगा - उनकी इस तलाश ने लेकिन अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा संकट तो खड़ा कर ही दिया है । 
मुकेश अरनेजा की यह तलाश लेकिन कुछेक लोगों को मुकेश अरनेजा की चाल नजर आ रही है । उन्हें लग रहा है कि सुभाष जैन को खासतौर पर गाजियाबाद और आमतौर पर उत्तर प्रदेश में जो समर्थन मिल रहा है, उसे कमजोर करने के लिए उन्हें गाजियाबाद/नोएडा में एक उम्मीदवार 'पैदा' करना होगा - और इस फार्मूले से वह अशोक गर्ग की राह को आसान बना सकेंगे । मुकेश अरनेजा की इस 'चाल' को पहचानने का दावा करने वाले लोगों का कहना है कि तीन वर्ष पहले जेके गौड़ का रास्ता रोकने के लिए मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल के साथ मिल कर जिस तरह से आलोक गुप्ता का इस्तेमाल किया था, उसी तरह से अब वह सुभाष जैन का रास्ता रोकने के लिए गाजियाबाद/नोएडा में किसी को खोज रहे हैं । रंग बदलने की कला में गिरगिट को पीछे छोड़ते हुए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल बाद में जेके गौड़ की जीत का श्रेय लेने में भले ही कामयाब हो गए हों, लेकिन जेके गौड़ की उम्मीदवारी के साथ शुरू से जुड़े रहे लोगों को तो सच्चाई का पता है ही, दूसरे लोगों को भी जानकारी है कि इन दोनों ने कैसे कैसे जेके गौड़ को छकाया था । आलोक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल से मिले धोखे के कारण आज तक उन्हें माफ नहीं किया है । मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के साथ हुई धोखाधड़ी का सारा दोष रमेश अग्रवाल पर मढ़ कर आलोक गुप्ता से हालाँकि पुनः संबंध जोड़ लिए है - मुकेश अरनेजा में आलोक गुप्ता का भरोसा भी पुनः लौट आया है, यह यद्यपि अभी 'देखना' बाकी है । इस किस्से को जिन लोगों ने नजदीक से देखा है, वह उस अनुभव को याद करते बहुत ही विश्वास के साथ कहते हैं कि मुकेश अरनेजा गाजियाबाद/नोएडा में कोई उम्मीदवार नहीं, बल्कि 'बलि का बकरा' खोज रहे हैं - जिसका सहारा लेकर वह सुभाष जैन का शिकार कर सकें, और उन्हें कमजोर कर सकें । 
अब सच चाहें जो हो - मुकेश अरनेजा चाहें अशोक गर्ग की उम्मीदवारी की परफॉर्मेंस से निराश होकर वास्तव में एक ऐसा उम्मीदवार खोज रहे हों, जो सुभाष जैन को टक्कर दे सके; और या रणनीतिक चाल के रूप में 'बलि का बकरा' तलाश कर रहे हों - मुकेश अरनेजा की इस कार्रवाई से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए तो संकट खड़ा हो ही गया है । वह तो एक तर्क दिया जाता है न कि चाहे चाकू खरबूजे पर गिरे चाहे खरबूजा चाकू पर गिरे, कटना खरबूजे को ही है - उसी तर्ज पर मुकेश अरनेजा के किसी भी 'कारण' से किसी दूसरे उम्मीदवार की तलाश में जुटने का सीधा नुकसान अशोक गर्ग को ही होना है । यही हुआ भी है । अशोक गर्ग ने पिछले दिनों अपनी उम्मीदवारी के अभियान को जिस तरह से संयोजित किया था, उससे चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कई खिलाड़ी रोटेरियंस प्रभावित हुए थे और वह यह मानने/कहने लगे थे कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी का अभियान भले ही काफी बढ़त बनाए हुए दिख रहा हो, किंतु अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान से उसे कड़ी टक्कर मिलेगी । इस तरह की बातों से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का मोमेंटम बढ़ रहा था - जिसे लेकिन मुकेश अरनेजा की नई हरकत ने धूल में मिला दिया है । पिछले दिनों मुकेश अरनेजा का नाम लेकर कुछेक नए उम्मीदवारों के नाम जिस तरह से चर्चा में आए, उससे एक उम्मीदवार के रूप में अभी तक हासिल की गई अशोक गर्ग की उपलब्धियों पर पानी फिर गया है । मुकेश अरनेजा की यह कार्रवाई यदि सचमुच अशोक गर्ग की स्थिति से निराश होने के कारण प्रेरित है, तब तो यह अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा झटका है ही; यह कार्रवाई मुकेश अरनेजा की यदि एक चाल है तो भी मुकेश अरनेजा की इस चाल ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का कबाड़ा करने का ही काम किया है । 
उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा को एक बड़े चालबाज नेता/व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है - कुछेक लोग उनकी चालबाजियों के बड़े मुरीद भी हैं; किंतु यह तथ्य बहुत निराश करने वाला है कि अपनी तमाम चालबाजियों के बावजूद उन्हें अभी तक हासिल कुछ नहीं हुआ है - अपनी चालबाजियों के बावजूद वह अपने क्लब से, अपने परिवार से और अपने बिजनेस से खदेड़े ही गए हैं । क्लब में, परिवार में, बिजनेस पार्टनर्स में मनमुटाव होते ही हैं; मनमुटाव के कारण बँटवारे भी होते हैं - यह बड़ी स्वाभाविक सी स्थितियाँ हैं । मुकेश अरनेजा के अपने क्लब में, परिवार में और बिजनेस में झमेले रहे तो यह कोई बहुत बुरी बात नहीं है - यह स्वाभाविक सी बात है; पर जो बात स्वाभाविक नहीं है और बहुत बुरी है वह यह कि मुकेश अरनेजा हर जगह से खदेड़े गए हैं, भगाए गए हैं, निकाले गए हैं; और कहीं भी उनकी चालबाजी काम नहीं आई । इसी आधार पर माना जा रहा है कि मुकेश अरनेजा यदि सचमुच अशोक गर्ग की परफॉर्मेंस से निराश होकर किसी और उम्मीदवार की तलाश में जुटे हैं - तो सवाल यह है कि मुकेश अरनेजा जब अशोक गर्ग की उम्मीदवारी में दम नहीं भर सके तो किसी और उम्मीदवार को ही भला कैसे 'खड़ा' कर सकेंगे ? और यदि यह उनकी चाल है तो जैसे अभी तक मुकेश अरनेजा की हर चाल खुद उन्हें ही उल्टी पड़ी है, तो इस चाल के सीधी पड़ने की ही क्या गारंटी है - मुकेश अरनेजा अपनी चालबाजियों से जब अपने आप को न अपने क्लब में, न अपने परिवार में और न बिजनेस में बचा सके, तो दूसरे किसी को वह भला कैसे बचायेंगे ? जाहिर तौर पर मुकेश अरनेजा के गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की खबरों ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सुगबुगाहट तो पैदा की है, लेकिन अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान का बंटाधार कर दिया है । 

Sunday, June 28, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस योगेश गर्ग तक के साथ धोखा और चालबाजी करने वाले जेके गौड़ का रवैया यदि अशोक गर्ग के प्रति भी बदला बदला सा है, तो इसमें आश्चर्य की भला क्या बात है ?

नई दिल्ली । जेके गौड़ के बदले-बदले से रवैये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार अशोक गर्ग को खासा हैरान भी किया है, और बुरी तरह परेशान भी । अशोक गर्ग के नजदीकियों के अनुसार, अशोक गर्ग उन दिनों को याद करके अपनी हैरानी व परेशानी को और बढ़ाते हुए भी दिखते हैं, जब जेके गौड़ खुद उम्मीदवार थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए जेके गौड़ उनकी कैसे कैसे और कैसी कैसी खुशामद किया करते थे, उसे याद करते हुए - और जेके गौड़ के अब के व्यवहार के साथ उसकी तुलना करते हुए अशोक गर्ग अचंभा करते हैं कि कोई व्यक्ति इतना भी बदल सकता है क्या ? पिछले रोटरी वर्ष में भी जेके गौड़ के साथ अशोक गर्ग के इतने घनिष्ट संबंध थे कि जेके गौड़ के कहने पर अशोक गर्ग ने अपने क्लब के वरिष्ठ सदस्य संजीव रस्तोगी को क्लब से ही निकाल/निकलवा दिया था । नजदीकियों के अनुसार, अशोक गर्ग को अब लगता है कि जेके गौड़ ने पिछले वर्षों में उन्हें तरह-तरह से इस्तेमाल किया, और अब जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में उन्हें जेके गौड़ से मदद की उम्मीद है, तो जेके गौड़ उनके साथ ऐसे पेश आते हैं कि जैसे उन्हें पहचानते ही नहीं हैं । अशोक गर्ग को चूँकि दूसरे रोटेरियंस से भी यह सुनने को मिलता है कि जेके गौड़ बहुत बदल गए हैं, अब वह पहले जैसे नहीं रह गए हैं और घमंडी व बदतमीज तक हो गए हैं, तो अशोक गर्ग को थोड़ी सांत्वना तो मिलती है किंतु उनका अचंभा खत्म नहीं होता है । गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस तक से की जा रही जेके गौड़ की बदतमीजियों की खबरें दरअसल अशोक गर्ग के अचंभे को खत्म नहीं होने दे रही हैं । 
गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस को जेके गौड़ की ताजा बदतमीजी का शिकार उस समय होना पड़ा, जब 30 जून को आयोजित हो रहे अपने 'संभव - टू मेक पॉसिबल' कार्यक्रम की तैयारियों के सिलसिले में उन्होंने अपनी तथाकथित कोर टीम की मीटिंग बुलाई । इस मीटिंग में उपस्थित लोगों से विचार-विमर्श करने व सलाह लेने की बजाए जेके गौड़ ने अपने फरमान सुनाने पर ही ज्यादा ध्यान दिया । हद तब हुई जब जेके गौड़ ने ऐलान किया कि 30 जून के उक्त कार्यक्रम के लिए वह 25 जून तक ही रजिस्ट्रेशन स्वीकार करेंगे । मीटिंग में मौजूद गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस राजीव वशिष्ठ, उमेश चोपड़ा, विनोद चावला आदि ने जेके गौड़ को समझाने का प्रयास किया कि अपने डिस्ट्रिक्ट की रोटरी में लोग ऐन कार्यक्रम के दिन तक रजिस्ट्रेशन करवाते हैं, इसलिए इस तरह का फैसला व्यवहारिक नहीं होगा - और यह फैसला लागू नहीं किया जाना चाहिए । जेके गौड़ ने लेकिन इनकी एक न सुनी और 25 जून तक रजिस्ट्रेशन करवाने के फैसले को लागू करने पर अड़े रहे । मीटिंग में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने उनके इस फैसले पर सहमति व्यक्त नहीं की, लेकिन जेके गौड़ फिर भी 'अपने' फैसले को लागू करने की जिद पूरी करके ही माने । मीटिंग में मौजूद लोगों के बीच नाराजगी भरे स्वर भी उभरे कि जेके गौड़ को जब किसी की सुननी/माननी ही नहीं है, तो फिर मीटिंग बुलाने का नाटक क्यों करता है ? इस किस्से में मजे की बात यह रही कि मीटिंग में जेके गौड़ को जो बात समझ में नहीं आ रही थी, और जिसे मानने के लिए वह हरगिज तैयार नहीं हुए - वह बात जेके गौड़ को तीन दिन बाद लेकिन समझ में आ गई; जब उन्होंने उक्त कार्यक्रम के लिए 25 जून तक रजिस्ट्रेशन कराने की शर्त को हटा लिया । इस पर कुछेक लोगों ने चुटकी भी ली कि जेके गौड़ की अक्ल का ताला धीरे-धीरे खुलता है क्या, जो उन्हें बात देर से समझ में आती है । 
इस मीटिंग की आड़ में जेके गौड़ ने गाजियाबाद के एक अन्य वरिष्ठ रोटेरियन योगेश गर्ग के साथ एक दूसरी किस्म की चाल खेली । इस मीटिंग में जेके गौड़ ने योगेश गर्ग को भी आमंत्रित किया । योगेश गर्ग ने मीटिंग में आने के लिए हामी भी भर दी - लेकिन ऐन मौके पर उन्हें पता चला कि जेके गौड़ ने इस मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे किसी संभावित उम्मीदवार को तो आमंत्रित किया ही नहीं है; संभावित उम्मीदवारों में एक अकेले उन्हीं को जेके गौड़ ने आमंत्रित किया है । यह जानकारी देने वाले ने योगेश गर्ग को यह जानकारी और दी कि उक्त मीटिंग में उनकी उपस्थिति को बना/दिखा कर जेके गौड़ ने उनकी संभावित उम्मीदवारी की राह के लिए रोड़ा तैयार करने की चाल चली है । समय रहते जेके गौड़ द्वारा रची गई साजिश की पोल खुल जाने से योगेश गर्ग ने उक्त मीटिंग में जाना तो स्थगित कर दिया, किंतु योगेश गर्ग को यह जानकर तगड़ा झटका लगा कि जेके गौड़ उनके साथ भी इस तरह की धोखाधड़ी कर सकता है ? जेके गौड़ की इस चालबाजी से सावधान होकर ही योगेश गर्ग ने जेके गौड़ का कामकाज देख रहे अशोक अग्रवाल को फोन करके एक बार फिर याद दिलाया कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उनका नाम किसी भी रूप में नहीं छपना चाहिए । योगेश गर्ग हालाँकि यह बात जेके गौड़ व अशोक अग्रवाल को पहले बता चुके थे; किंतु जेके गौड़ द्वारा रची गई चालबाजी के बेनकाब होने के बाद बाद योगेश गर्ग को डर हुआ कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में नाम छापने की हरकत कर सकता है, इसलिए उन्हें अशोक अग्रवाल को वह बात दोबारा से याद दिलाना जरूरी लगा ।
जेके गौड़ ने योगेश गर्ग के साथ जो चालबाजी खेली, उसके बारे में जानकर अशोक गर्ग की अपने प्रति जेके गौड़ के बदले रवैये से पैदा हुई निराशा शायद कुछ कम हुई होगी । उन्हें लगा होगा कि जेके गौड़ जब गाजियाबाद के योगेश गर्ग जैसे वरिष्ठ रोटेरियन को धोखा देने का काम कर सकते हैं और उनके साथ चालबाजी खेल सकते हैं, तो फिर उनके साथ अपना रवैया क्यों नहीं बदल सकते ? अशोक गर्ग के प्रति जेके गौड़ के बदले रवैये के पीछे हालाँकि मुकेश अरनेजा वाले ऐंगल को भी देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि अशोक गर्ग को मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अशोक गर्ग के समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि जेके गौड़ ने आजकल अपना 'आका' चूँकि रमेश अग्रवाल को बनाया हुआ है, और रमेश अग्रवाल तथा मुकेश अरनेजा के बीच छत्तीस का संबंध बना हुआ है - इसलिए जेके गौड़ को भी मुकेश अरनेजा से दूरी बनानी/दिखानी पड़ रही है; और इस चक्कर में अशोक गर्ग को 'पिसना' पड़ रहा है । कुछेक अन्य लोगों का कहना लेकिन यह भी है कि खेमेबाजी के कारण अशोक गर्ग को जेके गौड़ से जो चोट पड़ेगी, वह इतनी बुरी नहीं लगती; जितनी चोट अशोक गर्ग को जेके गौड़ के बदलते व्यवहार और उनके घमंडी हो जाने के कारण लग रही है । अशोक गर्ग के समर्थकों का कहना है कि जेके गौड़ यदि मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार होने के नाते भी अशोक गर्ग के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं, तो यह बात भी तो जेके गौड़ के अवसरवादी होने का सुबूत ही है - जेके गौड़ को क्या यह बात याद नहीं है कि रोटरी में आज वह जहाँ हैं, वहाँ तक उन्हें पहुँचाने में मुकेश अरनेजा का कितना और कैसा सहयोग रहा है ? अशोक गर्ग ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का अभियान जब शुरू किया था, तब उन्हें बड़ा भरोसा था कि मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार होने का जो लाभ उन्हें मिलेगा, उसके साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ की भी मदद उन्हें मिलेगी । यह भरोसा उन्हें इसलिए भी था, क्योंकि जेके गौड़ की उम्मीदवारी के समय उन्होंने जेके गौड़ की हर तरह से मदद की थी । अशोक गर्ग को यह देख/जान कर लेकिन खासा झटका लगा है कि जेके गौड़ पूरी तरह अहसानफरामोश निकले । जेके गौड़ की इस अहसानफ़रामोशी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में अशोक गर्ग की चुनौती को बढ़ा दिया है ।

Sunday, April 26, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में नोएडा क्षेत्र के क्लब्स ने प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन व्यक्त करके अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों के चुनावी-प्रबंधन को गड़बड़ाने के साथ-साथ उनके सामने मुश्किलें खड़ी करने का काम तो किया ही है; चुनाव को खासा दिलचस्प भी बना दिया है

नोएडा । प्रवीन निगम की उम्मीदवारी को नोएडा के क्लब्स के पदाधिकारियों व प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति में जिस जोश के साथ प्रस्तुत किया गया और उनकी उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए काम करने की योजना पर जिस दिलचस्पी के साथ विचार-विमर्श किया गया, उसने अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के समीकरणों को बुरी तरह उलट-पलट दिया है । पिछले दिनों सुभाष जैन की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी से जो अशोक गर्ग अभी कल तक बहुत खुश दिख रहे थे, वही अशोक गर्ग अब प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के जोरशोर से प्रस्तुत होने की खबर सुनकर सकते में आ गए हैं । प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की चर्चा यूँ तो काफी दिनों से थी; लेकिन चूँकि उनकी कोई सक्रियता नहीं देखी जा रही थी, इसलिए प्रवीन निगम की उम्मीदवारी को लेकर संदेह बना हुआ था और कोई भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लेता दिख रहा था । पिछले कुछ दिनों में प्रवीन निगम किंतु जब लोगों के बीच सक्रिय होते हुए दिखना शुरू हुए, तो उनकी उम्मीदवारी की ठंडी पड़ती चर्चा एक बार फिर गर्म होने लगी, जिसका पारा नोएडा के क्लब्स की संयुक्त मीटिंग ने खासा ऊपर चढ़ा दिया । इस ऊपर चढ़े पारे ने दूसरे उम्मीदवारों, खासकर अशोक गर्ग की स्थिति को पिघलाने का खतरा पैदा कर दिया है । 
किसी भी चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार दूसरे उम्मीदवारों की स्थिति में डेंट करने की संभावना तो पैदा करता ही है, इसलिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने यदि प्रसून चौधरी के लिए तथा प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की सक्रियता ने अशोक गर्ग के लिए मुसीबत खड़ी की है, तो यह चुनावी राजनीति का एक स्वाभाविक सीन है । अशोक गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी के कारण प्रसून चौधरी की स्थिति पर पड़ सकने वाले प्रतिकूल प्रभाव का आकलन करते हुए वह अपने पक्ष में समीकरणों का जुगाड़ बैठाते, उससे पहले ही प्रवीन निगम ने उनकी उम्मीदों की जड़ों में मट्ठा डाल दिया । दरअसल अशोक गर्ग के कई समर्थकों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, जिनके अब प्रवीन निगम के साथ जुड़ने की संभावना है । प्रवीन निगम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रोफेशन में एक बड़ा नाम है, जिन्होंने प्रोफेशन के एकेडमिक पक्ष के साथ-साथ प्रोफेशन के प्रशासनिक व राजनीतिक पक्ष में भी अपनी प्रभावी पैठ बनाई हुई है । इस नाते अधिकतर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रवीन निगम के संपर्क में या तो हैं, और या उनके संपर्क में रहना/होना चाहते हैं । रोटरी की राजनीति में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स कोई अलग समूह तो नहीं बनाते हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से वह महत्वपूर्ण भूमिका जरूर ही निभाते हैं । चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के नाते अशोक गर्ग को व्यक्तिगत हैसियत में कई एक चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का सहयोग व समर्थन मिल रहा था - या मिलने का विश्वास था । प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के कारण उनका सहयोग व समर्थन लेकिन अब अशोक गर्ग से छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है । 
अशोक गर्ग के सामने एक और समस्या आन पड़ी है । अशोक गर्ग अभी जिन मुकेश अरनेजा के समर्थन का दावा करते हैं, और इस दावे के भरोसे अपनी उम्मीदवारी को परवान चढ़ते देख/मान रहे हैं - उन मुकेश अरनेजा के प्रवीन निगम के क्लब के प्रमुख सदस्य प्रशांत माथुर के साथ अच्छे संबंध बताये/सुने जाते हैं । ऐसे में अशोक गर्ग के लिए मुकेश अरनेजा के समर्थन को अपने साथ बनाये रखने की चुनौती पैदा हो गई है । अशोक गर्ग के लिए डर यह पैदा हुआ है कि प्रशांत माथुर यदि मुकेश अरनेजा का समर्थन प्रवीन निगम के लिए ले उड़े, तो उनका क्या होगा ?
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के जो उम्मीदवार नोएडा में अपने अपने लिए समर्थन खोज/बना रहे थे, उन्हें प्रवीन निगम की सक्रियता से और नोएडा के लोगों के उनके समर्थन में खड़ा होने से झटका लगा है । दूसरे उम्मीदवारों का हालाँकि कहना तो है कि नोएडा क्षेत्र के क्लब्स के लोगों ने अभी भले ही प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के प्रति विश्वास और समर्थन दिखाया हो, लेकिन जैसे जैसे अभियान आगे बढ़ेगा वैसे वैसे समर्थन की वास्तविकता सामने आयेगी और ऐसा नहीं होगा कि नोएडा क्षेत्र के सारे वोट प्रवीन निगम ही ले जायेंगे । दूसरे उम्मीदवारों का ऐसा सोचना और कहना हालाँकि कोई गलत नहीं है, किंतु एक तथ्य अवश्य ही ध्यान में रखने योग्य है और वह यह कि नोएडा क्षेत्र के क्लब्स का रोटरी के काम करने के मामले में अच्छा ट्रेक रिकॉर्ड है; और रोटरी के काम करने के इस रिकॉर्ड के चलते उनके बीच अच्छी बॉन्डिंग है । प्रवीन निगम और उनके क्लब ने जो कई प्रोजेक्ट्स किये हैं, तथा कई एक प्रोजेक्ट्स में जो सहभागिता की है - उसके कारण नोएडा के दूसरे क्लब्स के लोगों के साथ उनके गहरे संबंध बने हैं । प्रवीन निगम और उनके समर्थकों ने यदि व्यावहारिक तरीका अपनाया तो नोएडा की रोटरी में लोगों के साथ उनकी जो बॉन्डिंग बनी हुई है, वह चुनावी राजनीति में उनके काम अच्छे से आ सकती है ।
प्रवीन निगम की सक्रियता ने तथा नोएडा में जाहिर हुए उनकी उम्मीदवारी के समर्थन ने अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों के चुनावी-प्रबंधन को गड़बड़ाने के साथ-साथ उनके सामने मुश्किलें खड़ी करने का काम तो किया ही है; चुनाव को खासा दिलचस्प भी बना दिया है ।

Wednesday, March 11, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता, प्रसून चौधरी, अशोक गर्ग, प्रवीन निगम की बातों व कोशिशों और सक्रियताओं ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति के परिदृश्य की झलक बनाना/दिखाना तो शुरू कर दिया है

नई दिल्ली । अशोक गर्ग की अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत की जाने वाली उम्मीदवारी दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी की चर्चा और इस चर्चा में अरनेजा गिरोह की भूमिका के कारण हाँ / ना के पचड़े में फँसी हुई लग रही है । यूँ तो अशोक गर्ग किसी से भी मिलते हैं तो अपनी उम्मीदवारी की बात जरूर ही करते हैं, लेकिन इतने सब के बावजूद वह अपने नजदीकियों को भी अपनी उम्मीदवारी के प्रति आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं । उनके नजदीकियों और उनके क्लब के लोगों का ही मानना और कहना है कि अशोक गर्ग अपनी उम्मीदवारी के प्रति अभी तक बहुत जोश व दम नहीं दिखा पा रहे हैं । वह इसका कारण भी बताते हैं । उनका कहना है कि अशोक गर्ग को दरअसल अभी तक अपने नेताओं से पक्के तौर पर हरी झंडी नहीं मिली है । उल्लेखनीय है कि अशोक गर्ग को अरनेजा गिरोह के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अरनेजा गिरोह के नेता लेकिन अभी यह भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि अशोक गर्ग एक उम्मीदवार की 'जिम्मेदारियों' को अफोर्ड कर भी पायेंगे या नहीं ? इसीलिए वह अभी अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को हरी झंडी देने से बच रहे हैं और उन्हें 'काम करने' की सलाह दे रहे हैं । उनके इस रवैये से अशोक गर्ग को आशंका हो रही है कि जिन नेताओं के भरोसे वह उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं, वह नेता कहीं उन्हें धोखा तो नहीं देंगे ? इसी आशंका के चलते अशोक गर्ग अपनी उम्मीदवारी के प्रति बहुत जोश व दम नहीं दिखा पा रहे हैं ।
अशोक गर्ग उन सूचनाओं के चलते भी सशंकित हैं जिनमें बताया जा रहा है कि दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी भी अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए अरनेजा गिरोह के नेताओं का समर्थन जुटाने/पाने की जुगाड़ में हैं । उल्लेखनीय है कि इन दोनों की तरफ से भी अपनी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के दावे पेश किए गए हैं और इन्हें जहाँ जैसा मौका मिलता है वहाँ यह अपनी अपनी उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के प्रति लोगों को विश्वास दिलाने के प्रयत्न करते देखे/सुने गए हैं । हालाँकि इनके कॉमन फ्रेंड्स इनमें से किसी एक के उम्मीदवार बनने की वकालत करते हुए भी सुने गए हैं और चूँकि दोनों ही इस वकालत के प्रति 'ओपन' होने की बात करते हैं - इसलिए दोनों की उम्मीदवारी के प्रति संशय भी बना हुआ है । इस संशय के बावजूद लोगों के बीच एक स्ट्रांग फीलिंग यह भी है कि अरनेजा गिरोह के नेता इन्हीं दोनों में से किसी एक का समर्थन कर सकते हैं । लोगों के बीच की यह स्ट्रांग फीलिंग ही अशोक गर्ग को उम्मीदवारी के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ने से रोक रही है । अरनेजा गिरोह के नेताओं का समर्थन अशोक गर्ग को यदि नहीं मिल सकेगा, तब फिर अशोक गर्ग के लिए उम्मीदवार हो सकना मुश्किल ही क्या, असंभव ही होगा । अरनेजा गिरोह के नेताओं के समर्थन के बिना उम्मीदवार हो सकने की बात कम-अस-कम अशोक गर्ग नहीं सोच सकेंगे ।
अरनेजा गिरोह के उम्मीदवार का मुकाबला किस से होगा, यह भी अभी साफ नहीं हो रहा है । चुनावी संदर्भ में अरनेजा गिरोह के लिए इस वर्ष का मुकाबला बराबरी का रहा । वह शरत जैन को तो कामयाबी दिलवा सका, लेकिन प्रसून चौधरी के मामले में उसे गच्चा खाना पड़ा । अरनेजा गिरोह के विरोध के बावजूद सतीश सिंघल जीतने में कामयाब हुए, उससे यह बात तो साफ हो गई कि अरनेजा गिरोह के विरोध के बावजूद चुनाव जीता जा सकता है । सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट के दूसरे खेमे के नेता बनेंगे या नहीं, यह तो अभी नहीं पता; लेकिन इतना स्पष्ट है कि सतीश सिंघल अरनेजा गिरोह के नेताओं के पिटठू नहीं बनेंगे । यह स्पष्टता चाहे अनचाहे सतीश सिंघल के नेतृत्व में विरोधी खेमे के गठन की संभावनाओं का संकेत तो देती है - देखने की बात सिर्फ यह रह जाती है कि स्थितियाँ सतीश सिंघल को जो जिम्मेदारियाँ लेने की तरफ धकेल रही हैं, सतीश सिंघल उस जिम्मेदारी को उठा पाते हैं या नहीं ? दरअसल इसी कारण राजीव गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को लेकर चुप लगा गए लगते हैं । राजीव गुप्ता ने घोषणा की थी कि यदि सतीश सिंघल चुनाव जीते तो वह अगले रोटरी वर्ष में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । किंतु अब वह यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि सतीश सिंघल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करना ठीक रहेगा क्या ?
सतीश सिंघल की जीत ने डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में जो मौका दिखाया है, उसका फायदा उठाने के लिए प्रवीन निगम की तरफ से सुगबुगाहट सुनी गई है । उनके नजदीकियों का कहना है कि अपनी उम्मीदवारी की शुरुआत के लिए वह किसी शुभ मुहुर्त का इंतजार कर रहे हैं । प्रवीन निगम के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि दूसरे उम्मीदवार यदि अपने अपने गॉडफादर्स चुनने में ही व्यस्त रहेंगे और उनसे हरी झंडी मिले बिना अपनी अपनी सक्रियता से बचते रहेंगे, तो उससे पैदा हुई असमंजसता का फायदा उठाने का मौका उनके पास होगा । यह बात है तो ठीक, लेकिन इस फायदे को उठाने के लिए प्रवीन निगम को अपनी सक्रियता तो दिखानी पड़ेगी न - यह फायदा अपने आप तो नहीं मिलेगा न ।
इस तरह की बातों/चर्चाओं ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति के लिए माहौल बनाना तो शुरू कर दिया है । अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति का परिदृश्य अभी भले ही उलझा हुआ सा लग रहा हो, लेकिन इस तरह की बातों/चर्चाओं के चलते उसके जल्दी ही एक शक्ल ले लेने की संभावना भी बनती दिख रही है ।