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Monday, September 28, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3054 में अशोक गुप्ता की गुडबुक में होते हुए तथा शेखर मेहता के नजदीक होने की कोशिश करते हुए भरत पांड्या के नजदीकी जयप्रकाश व्यास को नोमीनेटिंग कमेटी की उम्मीदवारी के लिए प्रेरित करने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजेश अग्रवाल की कोशिशों ने डिस्ट्रिक्ट में गर्मी पैदा की

अहमदाबाद । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन/चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जयप्रकाश व्यास को उम्मीदवार 'बनाने' के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजेश अग्रवाल के प्रयासों ने जयप्रकाश व्यास तथा उनके नजदीकियों को गफलत में डाल दिया है । जयप्रकाश व्यास के नजदीकियों का कहना/बताना है कि राजेश अग्रवाल ने जिस अचानक तरीके से जयप्रकाश व्यास को उम्मीदवार बनने के लिए 'प्रेरित' करना शुरू किया है, उससे उन्हें यह समझने में मुश्किल हो रही है कि इसके पीछे राजेश अग्रवाल की मंशा आखिर क्या है, और जयप्रकाश व्यास को उम्मीदवार बना/बनवा कर वह आखिर अपना कौन सा 'स्वार्थ' पूरा करना चाहते हैं ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राजेश अग्रवाल लगातार यह दावा करते रहे हैं कि वह डिस्ट्रिक्ट में चुनावी राजनीति को किसी भी तरह से प्रश्रय नहीं देंगे, और कोशिश करेंगे कि चुनावी राजनीति के चक्कर में डिस्ट्रिक्ट का माहौल खराब न हो; लेकिन देखने/सुनने में आ रहा है कि राजेश अग्रवाल खुद चुनावी राजनीति में दिलचस्पी ले रहे हैं, और माहौल गर्म कर रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों को यह बात भी मजे की लग रही है कि राजेश अग्रवाल एक तरफ तो तरह तरह के करतबों से अपने आप को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट शेखर मेहता के नजदीक 'दिखाने' की कोशिश करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वह इंटरनेशनल डायरेक्टर भरत पांड्या के नजदीकी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले जयप्रकाश व्यास को डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में 'आगे बढ़ाने' की कोशिश कर रहे हैं । 
दरअसल इसीलिए जयप्रकाश व्यास के नजदीकियों को राजेश अग्रवाल की 'राजनीतिक नीयत' पर शक हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि राजेश अग्रवाल कहीं डबल गेम तो नहीं खेल रहे हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में पूर्व गवर्नर अशोक गुप्ता के इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार बनने की चर्चा है । अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी को मजबूती देने के उद्देश्य से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए पूर्व गवर्नर्स अजय काला व आशीष देसाई में से किसी एक के उम्मीदवार होने का अनुमान लगाया जा रहा है । इन तीनों - अशोक गुप्ता, अजय काला व आशीष देसाई को शेखर मेहता ग्रुप के सदस्यों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । डिस्ट्रिक्ट में कुछेक पूर्व गवर्नर्स विरोधी खेमे के नजदीक तो देखे/पहचाने जाते हैं, लेकिन अभी तक उनमें से किसी को अशोक गुप्ता के रास्ते में काँटे बोने का काम करते हुए नहीं देखा/सुना गया है । जैसे जयप्रकाश व्यास ही हैं; उन्हें भले ही भरत पांड्या वाले खेमे के नजदीक देखा/पहचाना जाता हो, लेकिन अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने वह कोई मुश्किल खड़ी करते हुए नहीं देखे/सुने गए हैं । असल में, जैसा कि जयप्रकाश व्यास के नजदीकियों का कहना/बताना है कि जयप्रकाश व्यास आगे आने वाले वर्षों में खुद इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार होना चाहते हैं, इसलिए वह कोई ऐसा उदाहरण नहीं बनना/बनाना चाहते हैं जिससे कि उनकी बदनामी हो तथा आगे उनके सामने 'विरोध के नाम पर विरोध' की स्थिति पैदा हो ।
लेकिन राजेश अग्रवाल उन्हें समझा रहे हैं कि उन्हें अभी नोमीनेटिंग कमेटी के लिए उम्मीदवार बनना चाहिए, ताकि आगे आने वाले वर्षों में जब वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करें, तो उन्हें भावनात्मक फायदा मिले । जयप्रकाश व्यास के कुछेक नजदीकियों को राजेश अग्रवाल का यह तर्क समझ में आ रहा है, लेकिन उनके अन्य कुछेक नजदीकियों का मानना और कहना है कि जयप्रकाश व्यास यदि सचमुच आगे आने वाले वर्षों में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार होना चाहते हैं, तो उन्हें अभी नोमीनेटिंग कमेटी की उम्मीदवारी के पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए । इन नजदीकियों का यह भी कहना है कि नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में जयप्रकाश व्यास यदि हार गए, तो और किरकिरी होगी । जयप्रकाश व्यास के नजदीकियों को इस बात की भी हैरानी है कि राजेश अग्रवाल आखिरकार जयप्रकाश व्यास को नोमीनेटिंग कमेटी के लिए उम्मीदवार बनाने/बनवाने में दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं ? उन्हें यह हैरानी इसलिए भी है, क्योंकि वह जानते हैं कि राजेश अग्रवाल खुद अशोक गुप्ता के नजदीक रहे हैं । तीन वर्ष पहले, वह अशोक गुप्ता के सहयोग/समर्थन के बल पर ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी 'चुने' गए थे । उनके क्लब के तथा कोटा के नेता लोग विक्रांत माथुर की उम्मीदवारी के पक्ष में थे, लेकिन राजेश अग्रवाल ने तीन-तिकड़म करके अपनी उम्मीदवारी की चर्चा चला दी, और गलतफहमियाँ पैदा करके अशोक गुप्ता का समर्थन जुटा लिया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन गए । अशोक गुप्ता के इस अहसान का बदला चुकाने के लिए राजेश अग्रवाल ने उनके क्लब के सदस्य पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर भी बनाया हुआ है और उन्हें पूरा मान-सम्मान देते हैं । जयप्रकाश व्यास के नजदीकियों को इसीलिए यह सवाल परेशान कर रहा है कि अशोक गुप्ता की गुडबुक में होते हुए, शेखर मेहता के नजदीक होने की कोशिश करते हुए राजेश अग्रवाल आखिरकार जयप्रकाश व्यास को नोमीनेटिंग कमेटी की उम्मीदवारी के लिए प्रेरित क्यों कर रहे हैं ? 

Saturday, May 9, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों को करने के नाम पर महज खानापूर्ति करने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को उम्मीद है कि रोटरी फाउंडेशन जूम सेमीनार में रमेश अग्रवाल एकेएस सदस्यता का अपना बकाया चुकाने की घोषणा जरूर कर देंगे

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को पूरा यकीन है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल 16 मई को होने वाले रोटरी फाउंडेशन जूम सेमीनार में एकेएस (आर्च क्लम्प सोसायटी) सदस्यता की बकाया रकम मौजूदा रोटरी वर्ष में ही चुकाने की घोषणा कर देंगे, और अब की बार गच्चा नहीं देंगे ? उल्लेखनीय है कि एकेएस सदस्यता के लिए दी जाने वाली रकम का बकाया रमेश अग्रवाल को पिछले रोटरी वर्ष में ही चुकाना था, लेकिन जो उन्होंने नहीं चुकाया था । आधिकारिक रूप से तो रमेश अग्रवाल ने इसका कोई कारण नहीं बताया था, लेकिन अनौपचारिक रूप से उनकी तरफ से सुनने को मिला था कि एकेएस सदस्यता की रकम का बकाया यदि वह अब देंगे, तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुभाष जैन के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन में ज्यादा रकम जमा होने का रिकॉर्ड बनेगा - इसलिए वह इस वर्ष की बजाये अगले वर्ष, यानि दीपक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष में बकाया रकम चुकायेंगे । दीपक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष के भी दस महीने बीत चुके हैं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने एकेएस सदस्यता की बकाया रकम चुकाने का नाम नहीं लिया है । रमेश अग्रवाल द्वारा बकाया चुकाये जाने को लेकर दीपक गुप्ता को दो कारणों के चलते दिलचस्पी है - एक तो इसलिए, क्योंकि रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों की तरफ से उन पर भी दबाव है कि बकाया रकम देने में आनाकानी कर रहे रमेश अग्रवाल से बकाया रकम दिलवाएँ; दीपक गुप्ता को लगता है कि रमेश अग्रवाल इस वर्ष यदि उक्त बकाया चुका देते हैं, तो रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों के बीच उनका भी रौब बनेगा। दूसरा कारण यह कि रमेश अग्रवाल बकाये की जो रकम चुकायेंगे, वह रोटरी फाउंडेशन के लिए इस वर्ष जमा होने वाली रकम में जुड़ेगी और इस तरह दीपक गुप्ता का रिकॉर्ड बनेगा ।
उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल ने वर्ष 2016 में एकेएस की सदस्यता के लिए फार्म भरा था । रमेश अग्रवाल के अलावा डिस्ट्रिक्ट के दो और सदस्य - जेके गौड़ तथा सुभाष जैन भी एकेएस सदस्य हैं । इन दोनों की तरफ से लेकिन एकेएस सदस्यता की पूरी रकम जमा हो चुकी है, और एक अकेले रमेश अग्रवाल पर ही सदस्यता राशि का बकाया बचा हुआ है । यूँ तो, एकेएस सदस्यता के लिए रोटरी फाउंडेशन के बड़े पदाधिकारियों के सामने दीपक गुप्ता ने भी सहमति दी हुई है, लेकिन उन्होंने इसके लिए चूँकि फार्म नहीं भरा है - इसलिए एकेएस सदस्यता का पैसा न चुकाने का आरोप उन पर नहीं लगाया जा सकता है । उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों के सामने रोटरी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और अपनी अमीरी की शान दिखाने के लिए उन्होंने एकेएस सदस्यता के लिए सहमति तो दे दी, लेकिन जब सचमुच पैसे देने की बारी आई तो मुँह छिपाने लगे । हालाँकि यह कोई अनोखी और हैरान करने वाली बात नहीं है - रोटरी में इस तरह की 'गालबजाने' वाली हरकतें बहुत से रोटेरियंस करते हैं, और दीपक गुप्ता तो इस 'कला' में बड़े एक्सपर्ट हैं ।
एकेएस सदस्यता के बकाये का मामला दरअसल 16 मई को 'डूइंग गुड इन द वर्ल्ड' शीर्षक से आयोजित होने  रहे रोटरी फाउंडेशन जूम सेमीनार के कारण उठा है । असल में, हर किसी को हैरानी है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता  कार्यकाल जब खत्म होने जा रहा है, तब उनके द्वारा किए जा रहे इस सेमीनार का औचित्य भला क्या है ? रोटरी इंटरनेशनल की व्यवस्था के अनुसार, यह सेमीनार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपना कार्यकाल शुरू होने दिनों में करना होता है । रोटरी फाउंडेशन की रोटरी में बड़ी महत्ता है; रोटरी फाउंडेशन वास्तव में रोटरी की जान है - इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से उम्मीद की जाती है कि अपना कार्यकाल शुरू होते ही वह अपने प्रेसीडेंट्स तथा अन्य पदाधिकारियों को रोटरी फाउंडेशन के बारे में शिक्षित करेगा, ताकि प्रेसीडेंट्स व अन्य पदाधिकारी रोटरी फाउंडेशन को 'मजबूत' करने को लेकर सक्रिय हों । जाहिर है कि गवर्नर वर्ष के अंतिम दिनों में रोटरी फाउंडेशन को लेकर सेमीनार करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । लेकिन दीपक गुप्ता को इस बात से जैसे कोई मतलब नहीं है, उन्हें तो बस रिकॉर्ड पूरा करना है - ताकि वह 'दिखा' सकें कि उन्होंने सारे काम किए हैं । यही उन्होंने मेंबरशिप सेमीनार के साथ किया । मेंबरशिप सेमीनार भी गवर्नर वर्ष के शुरू में होता है, जिसे दीपक गुप्ता ने अभी हाल ही में किया है । रोटरी के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों को करने के नाम पर महज खानापूर्ति करते हुए दीपक गुप्ता को यह उम्मीद जरूर है कि रोटरी फाउंडेशन जूम सेमीनार में रमेश अग्रवाल एकेएस सदस्यता का अपना बकाया चुकाने की घोषणा जरूर कर देंगे, जिससे उन्हें भी बकाया न देने पर होने वाली लानत-मलानत से छुटकारा मिल जायेगा और दीपक गुप्ता का रोटरी फाउंडेशन के लिए रकम इकट्ठा करने का रिकॉर्ड बन जायेगा । देखना दिलचस्प होगा कि दीपक गुप्ता की उम्मीद पूरी होती है, या रमेश अग्रवाल से उन्हें गच्चा ही मिलता है । 

Sunday, May 3, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को रोटरी ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट पद से अंततः हाथ धोना पड़ा; हालाँकि कई लोगों को लग रहा है कि संजीव राय मेहरा के जरिये विनोद बंसल प्रेसीडेंट पद फिर से पाने की कोशिश करेंगे

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की रोटरी ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट बने रहने की अंतिम समय तक की गईं कोशिशें आखिरकार विफल रहीं, और उनके लिए खासे अपमानजनक रहे घटनाचक्र में उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया । उल्लेखनीय बात यह रही कि रोटरी ब्लड बैंक के नए पदाधिकारियों के चुनाव की तैयारी के बीच में ही बोर्ड मीटिंग में नए पदाधिकारियों का चयन कर लिया गया, जिसमें बाकी पदों के पदाधिकारी या तो यथावत रहे और या उनकी स्थिति अदली-बदली गई - लेकिन  विनोद बंसल की प्रेसीडेंट पद से छुट्टी कर दी गई । रोटरी ब्लड बैंक के नए प्रेसीडेंट पूर्व गवर्नर सुरेश जैन बने हैं । विनोद बंसल ने सारे घटनाक्रम के प्रति नाराजगी और असंतोष प्रकट करते हुए बड़े दुखी मन से एक पत्र लिखा/भेजा है - जिससे लगता है कि रोटरी ब्लड बैंक में पिछले कई महीनों से चल रही उठापटक इस सत्ता परिवर्तन के बावजूद समाप्त नहीं होगी, तथा अभी आगे और तमाशे देखने को मिलेंगे । इसके संकेत विनोद बंसल के डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव राय मेहरा के तेवर देख/सुन कर भी मिले । संजीव राय मेहरा ने उक्त मीटिंग को असंवैधानिक बताया और आरोप लगाया कि जल्दबाजी में बुलाई गई उक्त मीटिंग में न नियमों की परवाह की गई और न उचित व्यवस्था का पालन किया गया । संजीव राय मेहरा ने उचित 'फोरम' पर 'असंवैधानिक रूप से आयोजित हुई' इस मीटिंग के मुद्दे को उठाने की बात भी कही । कई लोगों को लगता है कि विनोद बंसल अब आगे की 'लड़ाई' संजीव राय मेहरा के सहारे लड़ेंगे ।
रोटरी ब्लड बैंक में पिछले कुछेक महीने से चल रहा झमेला विनोद बंसल के लिए खासा फजीहत भरा रहा है । उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों को भी लगता है कि विनोद बंसल ने मामले को सही ढंग से हैंडल नहीं किया, और अपनी अकड़ तथा अपने अहंकार में अपनी मुसीबतों को बढ़ाते ही गए । विनोद बंसल दरअसल उस स्थिति का शिकार हो गए, जिसके लिए अंग्रेजी में एक जुमला कहा जाता है - 'एलिफैंट इन द रूम' । इसका प्रयोग ऐसी समस्या के लिए किया जाता है जो वास्तव में दिखाई तो नहीं देती है, लेकिन होती बहुत बड़ी है और आपके ठीक बगल में होती है । ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट के रूप में विनोद बंसल के दरवाजे पर इस समस्या ने वास्तव में उस समय दस्तक दी, जब ब्लड बैंक के सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल और ट्रेजरर संजय खन्ना ने कुछेक बड़े बिलों पर हैरानी व्यक्त करते हुए विनोद बंसल से ब्लड बैंक के कामकाज में पारदर्शिता रखने/बरतने के लिए कहा । विनोद बंसल ने इस बात को बड़े हलके रूप में लिया; वह यह समझने/पहचानने में बुरी तरह चूक गए कि यह बात उनके लिए बड़ी फजीहत की नींव रखने वाली बन जाएगी । उनके शुभचिंतकों के साथ-साथ उनके विरोधियों को भी लगता है कि ब्लड बैंक के कामकाज में पारदर्शिता रखने/बरतने की रमेश अग्रवाल और संजय खन्ना की बात को विनोद बंसल ने यदि गंभीरता से लिया होता, और व्यावहारिक रवैया अपनाया होता - तो न तो उन्हें फजीहत का शिकार होना पड़ता और न प्रेसीडेंट का पद गँवाना पड़ता ।
ब्लड बैंक के कामकाज में झमेलेबाजी के आरोपों से शुरू हुई समस्या ने जब विनोद बंसल के बगल में जगह बनाना शुरू की, विनोद बंसल ने सिर्फ तब ही उसकी अनदेखी नहीं की - समस्या ने जब उन्हें चारों तरफ से घेरना शुरू किया, तब भी वह अकड़ और अहंकार की गिरफ्त में फँसे रह कर उससे अनजान बने रहे; और अपने व्यवहार से अपने समर्थकों को भी अपने से दूर करते गए । ब्लड बैंक के बोर्ड सदस्यों में जो लोग विनोद बंसल को घेर रहे थे, उनके तौर-तरीकों से नई टीम में ट्रेजरर बने आशीष घोष अकेले लोहा ले रहे थे - और इस कारण से आशीष घोष को विनोद बंसल के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा था । लेकिन एक मीटिंग में आशीष घोष के एक सुझाव पर विनोद बंसल इतनी बुरी तरह से भड़क गए कि फिर उसके बाद आशीष घोष को उनके समर्थन से दूर हटते देखा गया । विनोद बंसल के बड़े नजदीकी के रूप में देखे/पहचाने जाते रहे डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता पहले से ही उनके विरोधियों के साथ जा मिले थे । अपने व्यवहार और रवैये के चलते विनोद बंसल ब्लड बैंक के बोर्ड सदस्यों के बीच पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए थे; उसके बावजूद विनोद बंसल प्रेसीडेंट पद की कुर्सी पर बने रहने की उम्मीद रखे रहे । उनके कई शुभचिंतकों ने उन्हें सुझाव दिया था कि उन्हें स्वयं प्रेसीडेंट पद से इस्तीफा दे देना चाहिए और गरिमापूर्ण तरीके से ब्लड बैंक से विदा ले लेना चाहिए - लेकिन विनोद बंसल को लगता रहा कि तमाम फजीहत और विरोध के बावजूद वह प्रेसीडेंट पद बचा लेंगे । दरअसल ब्लड बैंक के बोर्ड के कई सदस्यों का रवैया कई मौकों पर बड़ा ढुलमुल सा रहा, जिसके चलते कई बार कुछेक फैसले टलते से रहे - इसे देखते हुए विनोद बंसल को विश्वास रहा कि बोर्ड के सदस्य कभी फैसला कर ही नहीं पायेंगे, और इस वजह से उनकी प्रेसीडेंट की कुर्सी बची रहेगी । लेकिन उनका यह विश्वास दिवास्वप्न साबित हुआ और तमाम कोशिशों के बावजूद अंततः उन्हें रोटरी ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट पद से हाथ धोना पड़ा ।
मीटिंग में और मीटिंग के बाद संजीव राय मेहरा द्वारा दिखाए गए रवैये से लेकिन लगता है कि ब्लड बैंक का झगड़ा अभी और चलेगा; लोगों को लग रहा है कि संजीव राय मेहरा के जरिये विनोद बंसल उक्त मीटिंग को 'नल एंड वॉयड' घोषित करवा कर प्रेसीडेंट पद फिर से पाने की कोशिश करेंगे ।

Thursday, April 9, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर मंजीत साहनी ने रोटरी ब्लड बैंक के अकाउंट से बड़ी रकम दान करने के जरिये शेखर मेहता को खुश करके अपनी राजनीति संभालने की विनोद बंसल की कोशिश को बाहर से जो झटका दिया, उसे गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में सुरेश जैन ने अंजाम तक पहुँचाया और विनोद बंसल की योजना पर पानी फेर दिया 

नई दिल्ली । विनोद बंसल ने रोटरी ब्लड बैंक के अकाउंट से मोटी रकम दान में देने के अपने मनमाने फैसले को तथाकथित गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में मंजूर करवाने के लिए फील्डिंग तो बेहद कसी हुई सजाई थी, लेकिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी की एक 'आउट स्विंग' ने उनकी फील्डिंग को ऐसा ऐसा तहसनहस किया कि फिर उनका फैसला तो मंजूर नहीं ही हुआ - उन्हें फजीहत का सामना और करना पड़ा । इस मामले में और भी बुरी बात यह हुई कि विनोद बंसल के चक्कर में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के लिए भी दुविधा के हालात बने । मामले से परिचित हर व्यक्ति को हैरानी हुई कि शेखर मेहता आखिर विनोद बंसल के चक्कर में फँस कैसे गए ? हालाँकि मीटिंग से पहले तक जो 'स्थिति' थी, उसमें कोई भी विनोद बंसल के चक्कर में फँस सकता था । अपने फैसले को मंजूर करवाने के लिए विनोद बंसल ने बड़ी चाक-चौबंद व्यवस्था की थी; उनकी 'व्यवस्था' में कोई सेंध न लगा सके, इसके लिए उन्होंने शेखर मेहता का और उनके नाम का भरपूर इस्तेमाल किया । मीटिंग में उन्हें, जिन सदस्यों की तरफ से विरोध की आशंका थी, उनके मुँह बंद रखवाने के लिए उन्होंने शेखर मेहता रूपी टेप का पक्का इस्तेमाल किया हुआ था । विनोद बंसल ने ब्लड बैंक के सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल और ट्रेजरर संजय खन्ना को अपने फैसले के पक्ष में करके हालात को पूरी तरह साध लिया था; यह दोनों सिर्फ विनोद बंसल के फैसले के साथ ही नहीं थे, बल्कि फैसले के विरोध में दिख रहे गवर्निंग बॉडी के सदस्यों को भी मनाने के काम में लगे हुए थे । ऐसे में, यही माना/समझा जा रहा था कि रोटरी ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी की जूम मीटिंग में 'अपने' फैसले को मंजूर करवाने में विनोद बंसल को कोई दिक्कत नहीं होगी ।
लेकिन मंजीत साहनी ने विनोद बंसल की सारी तैयारी पर पानी फेर दिया ।
मीटिंग शुरू होने से कुछेक घंटे पहले, मंजीत साहनी ने सोशल मीडिया में एक संदेश दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि रोटरी में बने ट्रस्ट के असली 'मालिक' डिस्ट्रिक्ट के सदस्य होते हैं, और काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की सहमति के बाद ही वह बनते हैं - इसलिए उसकी संपत्ति व जमापूँजी के बारे में फैसला करने का अधिकार ट्रस्ट की गवर्निंग बॉडी को नहीं है । मंजीत साहनी के इस संदेश ने दरअसल 'बिल्ली के गले में घंटी बाँधने' का काम किया । असल में, मंजीत साहनी के मामले में कूदने से पहले हर कोई शेखर मेहता की संलग्नता के कारण चुप बना हुआ था । विनोद बंसल इसी चुप्पी में अपना काम निकालने की तैयारी में थे । मंजीत साहनी के संदेश ने लेकिन उक्त चुप्पी को भंग कर दिया । सोशल मीडिया में फिर कई पूर्व गवर्नर्स ने विनोद बंसल की ब्लड बैंक का अकाउंट खाली करने की मनमानी कार्रवाई के प्रति अपनी नाराजगी दिखाई । यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि विनोद बंसल का 'रायता' फैलने लगा है । यह फैलता 'रायता' गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में लेथन/गंदगी न करे, इसके लिए विनोद बंसल ने अभूतपूर्व तरीका अपनाया - और वह यह कि गवर्निंग बॉडी की मीटिंग की शुरुआत उन्होंने शेखर मेहता से करवाई । दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक से शेखर मेहता का कोई मतलब नहीं है; एक बड़े पदाधिकारी होने के नाते ब्लड बैंक के किसी समारोह में शेखर मेहता उपस्थित हों - तो बात समझ में आती है; लेकिन ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में उनकी मौजूदगी एक अभूतपूर्व बात बनी । समझा जाता है कि विनोद बंसल ने शेखर मेहता से मीटिंग की शुरुआत मीटिंग में मौजूद सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए करवाई । लेकिन उनकी  तरकीब बुरी तरह फेल हो गई ।
मंजीत साहनी ने जो काम 'बाहर' किया था, गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में वही काम वरिष्ठ पूर्व गवर्नर सुरेश जैन ने किया । मीटिंग में, शेखर मेहता के तुरंत बाद सुरेश जैन ने बोला और उन्होंने पूरी स्पष्टता व दृढ़ता के साथ ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करने की विनोद बंसल की कोशिश का दो-टूक विरोध किया । सुरेश जैन की बातों ने शेखर मेहता की मौजूदगी तथा उनकी अपील से बने प्रभाव को पूरी तरह धो-पोंछ दिया । सुरेश जैन की बातों ने एक तरह से मीटिंग की दशा-दिशा तय कर दी । रही-सही कसर रूपक जैन ने पूरी कर दी । इसके बाद तो हर कोई जैसे विनोद बंसल से बदला लेने पर उतारू दिखा । माहौल देख कर रमेश अग्रवाल और संजय खन्ना ने भी पाला बदल लिया, और वह भी विनोद बंसल के फैसले की खिलाफत करते नजर आए । रमेश अग्रवाल ने तो जोश जोश में यह पोल भी खोल दी कि विनोद बंसल तो यह मीटिंग ही नहीं करना चाहते थे, वह तो इस कोशिश में थे कि तीन-चार पदाधिकारी मिल कर ही ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करने का फैसला कर लें । यह पोल खुलने के बाद माहौल और गर्मा गया, तथा अनूप मित्तल बुरी तरह भड़के । इसके बाद तो मीटिंग में विनोद बंसल पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए और किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया । ऐसे में, विनोद बंसल ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करने का अपना फैसला मंजूर भला कैसे करवाते ? मीटिंग  में जो हुआ, उसमें विनोद बंसल को सिर्फ अपना फैसला मंजूर करवाने में ही हार का मुँह नहीं देखना पड़ा, बल्कि यह सच्चाई भी लोगों के सामने आई कि अपने ही डिस्ट्रिक्ट में वह पूरी तरह अलग-थलग हैं । इस बात ने राजनीतिक रूप से विनोद बंसल को तगड़ा झटका दिया है ।

Wednesday, April 8, 2020

रोटरी ब्लड बैंक के हिसाब-किताब में मनमानी और गड़बड़ी करने के मामलों के चलते मुसीबत में फँसने के बावजूद विनोद बंसल ने कोरोना वायरस के कारण पैदा हुए हालात का फायदा उठा कर, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से ब्लड बैंक के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करने का 'मौका' बनाया 

नई दिल्ली । रोटरी ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट पद से हटाये जाने की कोशिशों से नाराज विनोद बंसल ने जाते-जाते ब्लड बैंक के अकाउंट को 'लुटाने' की अच्छी व्यवस्था कर ली है, और इस बार उनके लिए खुशकिस्मती की बात यह है कि उनकी 'व्यवस्था' में कोई टाँग अड़ाने की कोशिश भी नहीं कर रहा है । विनोद बंसल ने ब्लड बैंक की जमा पूँजी का मोटा हिस्सा प्रधानमंत्री कोविड19 रिलीफ फंड में देने का फैसला करके ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करके जाने का दाँव चला है । ब्लड बैंक के सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल और एक्स-ऑफिसो सदस्य के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3012 के गवर्नर दीपक गुप्ता ने शुरू में यह तर्क देते हुए विनोद बंसल के फैसले का विरोध किया था कि विनोद बंसल और अन्य पदाधिकारी इस समय कार्यकारी पदाधिकारी हैं, और कानूनन उन्हें ब्लड बैंक की जमा पूँजी को लेकर कोई फैसला करने का अधिकार नहीं है; लेकिन विनोद बंसल ने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता का नाम लेकर उनकी ऐसी हवा टाइट की है कि उन्होंने अब पूरी तरह समर्पण कर दिया है । विनोद बंसल ने मुद्दे पर विचार-विमर्श करने के लिए 9 अप्रैल की शाम चार बजे ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी की जूम मीटिंग बुलाई है । विचार-विमर्श की बात सिर्फ धोखा है; विनोद बंसल ने वास्तव में पक्की व्यवस्था कर ली है कि वह प्रस्ताव रखेंगे और बाकी सदस्य बिना कोई चूँ-चपड़ किए उनके प्रस्ताव पर ताली बजायेंगे । मजे की बात यह है कि जो लोग 9 अप्रैल की शाम 4 बजे की मीटिंग में ब्लड बैंक का अकाउंट खाली करने का फैसला करेंगे, वही लोग कुछ दिन पहले ही यह फैसला कर चुके हैं कि अगली गवर्निंग बॉडी बनने तक ब्लड बैंक के अकाउंट से सिर्फ रोजमर्रा के जरूरी खर्चों के लिए ही पैसे निकाले जायेंगे, और कोई भी बड़ा खर्चा अगली गवर्निंग बॉडी ही करेगी । यानि, मीटिंग में शामिल होने वालों को फैसला करने का अधिकार ही नहीं है । 
रमेश अग्रवाल और दीपक गुप्ता का उक्त फैसले का हवाला देते हुए दरअसल यही कहना रहा कि प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में पैसा देने में जल्दबाजी करने की बजाये विनोद बंसल को ब्लड बैंक की अगली गवर्निंग बॉडी चुनवाने/बनवाने में जल्दबाजी करना चाहिए और ब्लड बैंक के पैसे का कैसे/क्या करना है - इसका फैसला उन्हें करने देना चाहिए । विनोद बंसल लेकिन पैसे देने का श्रेय खुद लेना चाहते हैं; आरोप है कि यह श्रेय लेकर वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपनी उम्मीदवारी के लिए फायदा उठाने की तिकड़म लगा रहे हैं - और इसलिए वह बड़ा खर्चा न करने के उस फैसले की अनदेखी करने के लिए तैयार हैं, जिस फैसले में वह खुद भी शामिल थे । लोगों के बीच चर्चा रही है कि विनोद बंसल की रोटरी के पैसे पर राजनीति करने के मामले में 'मास्टरी' है; रोटरी फाउंडेशन को 'एक का चार करने' की 'मशीन' बना कर वह पहले ही (कु)ख्याति पा चुके हैं । ब्लड बैंक में भी हिसाब-किताब में मनमानी और गड़बड़ी करने के मामले सामने आने के बाद विनोद बंसल को प्रेसीडेंट पद से हटाने की बात व प्रक्रिया शुरू हुई । इसे विनोद बंसल की 'मास्टरी' ही कहेंगे कि रोटरी ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद छिनने की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद उन्होंने ब्लड बैंक के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करने का मौका बना लिया है - और ब्लड बैंक के दूसरे पदाधिकारियों को अपना फैसला स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया है । इसके लिए, विनोद बंसल ने बड़ी सफाई से इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के नाम का इस्तेमाल कर लिया है । 
9 अप्रैल की शाम चार बजे की जूम मीटिंग का जो संदेश विनोद बंसल ने ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी के सदस्यों को भेजा है, उसमें शेखर मेहता का नाम जोड़ कर विनोद बंसल ने सदस्यों पर दबाव बनाने की जो चाल चली है, वह कामयाब रही है । दबी जुबान में तो चर्चा है कि शेखर मेहता ने जो 'टारगेट' दिया है, वह आराम से पूरा और पार हो तो रहा है - आखिर तब फिर विनोद बंसल उनका नाम लेकर ब्लड बैंक का खजाना खाली करने पर क्यों तुले हुए हैं । उल्लेखनीय है कि शेखर मेहता ने देश के रोटेरियंस की तरफ से प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में 25 करोड़ रुपए देने का टारगेट तय किया है । पाँच डिस्ट्रिक्ट्स के रोटेरियंस की तरफ से तथा रोटरी न्यूज ट्रस्ट की तरफ से प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में दिए जाने वाले पैसे की अभी तक जो घोषणाएँ हुई हैं, उनमें करीब 21 करोड़ रुपए का जोड़ बैठ रहा है । इससे जाहिर है कि प्रधानमंत्री रिलीफ फंड के लिए रोटेरियंस की तरफ से शेखर मेहता ने जो टारगेट रखा है, वास्तव में उससे कहीं ज्यादा रकम रोटेरियंस की तरफ से जा रही है - ऐसे में, रोटरी ब्लड बैंक का अकाउंट खाली करने की कोई जरूरत नहीं है; लेकिन फिर भी विनोद बंसल ब्लड बैंक का अकाउंट खाली करने पर आमादा हैं - तो इसका कारण सिर्फ यही है कि ऐसा करके विनोद बंसल अपना निजी हित साध सकेंगे । इसे बिडंवना ही कहेंगे कि नोएडा ब्लड बैंक के कर्ताधर्ता सतीश सिंघल पर ब्लड बैंक में इकट्ठा हुए खून की कमाई से निजी हित साधने का आरोप लगा, तो उनसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद ही छिन गया और उन्हें पूर्व गवर्नर की मान्यता भी नहीं मिली; जबकि दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक में इकट्ठा हुए खून से हुई कमाई को मनमाने तरीके से 'निजी हित' में इस्तेमाल करने के आरोपों के बीच विनोद बंसल लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर पहुँचने की तैयारी कर रहे हैं ।

Wednesday, March 18, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रमेश अग्रवाल की बदनामी के कारण सीओएल के चुनाव में शरत जैन को अपने समर्थकों की मदद का ही टोटा पड़ता नजर आ रहा है, जिसके चलते मुकेश अरनेजा के मुकाबले उनकी स्थिति पतली ही दिख रही है  

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल के कहने/उकसाने पर शरत जैन सीओएल के लिए उम्मीदवार तो बन गए हैं, लेकिन मुकाबले पर मुकेश अरनेजा को देख कर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने जैसे मुसीबत आमंत्रित कर ली है । दरअसल रमेश अग्रवाल की हालत ही कुछ ऐसी बन गई है कि वह जिसे उम्मीदवार बनाते हैं, मुसीबतें उसे शुरू से ही दबोच लेती हैं । मौजूदा रोटरी वर्ष में रमेश अग्रवाल ने अशोक जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया, लेकिन अशोक जैन को जल्दी ही समझ में आ गया कि रमेश अग्रवाल की 'साढ़े साती' के कारण उनके लिए उम्मीदवारी का अभियान चला पाना मुश्किल ही होगा - सो, वह जिस पतली गली से उम्मीदवार बनने के लिए आगे बढ़े थे, उसी पतली गली से वापस लौट गए; और सुखी रहे । अब शरत जैन की भी हालत अशोक जैन जैसी ही है । मुकेश अरनेजा को मुकाबले में देख कर रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी ने यह तर्क देते हुए दाँव तो अच्छा चला था कि मुकेश अरनेजा एक बार सीओएल में रह चुके हैं, इसलिए अब उन्हें दूसरों के लिए मौका छोड़ देना चाहिए - लेकिन उनकी बदकिस्मती रही कि उनका यह दाँव चलते ही फुस्स हो गया । दरअसल किसी की भी समझ में नहीं आया कि रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानून यदि मुकेश अरनेजा को दोबारा सीओएल का सदस्य बनने का अधिकार देते हैं, तब फिर रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी मनमाने तरीके से उनसे यह अधिकार छीनने का प्रयास क्यों कर रही है ? और फिर, यदि इस तर्क को व्यवहार में लाना ही था, तो इसके लिए काउंसिल और गवर्नर्स की मीटिंग में बात होना चाहिए थी । यह दोनों डिस्ट्रिक्ट काउंसलर हैं, इन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को कह कर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलवाना चाहिए थी, और उसमें यह मुद्दा रखना चाहिए था । मजे की बात लेकिन यह है कि इसके लिए न तो इन दोनों ने कोई प्रयास किए और न दीपक गुप्ता ने ही कोशिश की ।
डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों और जानकारों का मानना और कहना है कि हो सकता है कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी रमेश अग्रवाल और शरत जैन की जोड़ी मुकेश अरनेजा को उम्मीदवार बनने से न रोक पाती; तब भी लेकिन लोगों को यह तो 'दिखता' कि वह प्रॉपर तरीके से अपनी बात कह रहे हैं - और उससे उन्हें लोगों के बीच सहानुभूति और समर्थन भी मिल सकता था । यह मौका लेकिन रमेश अग्रवाल और शरत जैन की जोड़ी ने खो दिया । इससे जाहिर है कि सीओएल का पद पाने के लिए शरत जैन को और उन्हें पद दिलवाने के लिए रमेश अग्रवाल को कायदे/कानून से कुछ करना नहीं है; और इसीलिए उनके संभावित सहयोगी/समर्थक भी उनके लिए कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । शरत जैन को उम्मीद रही है कि दीपक गुप्ता, अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करेंगे; लेकिन वह यह देख/जान कर निराश हैं कि यह तीनों ही कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । दीपक गुप्ता तो अपने स्वार्थ और अपनी बेवकूफी में कुछ नहीं कर रहे हैं; दीपक गुप्ता दरअसल उम्मीद कर रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना उनकी मदद पाने के लिए जिस तरह उनके आगे-पीछे रहते थे, और उनकी हर 'डिमांड' पूरी करते थे, शरत जैन भी वैसे ही करें - शरत जैन चूँकि वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं, इसलिए दीपक गुप्ता भी उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं समझ रहे हैं । 
अशोक अग्रवाल लगता है कि रमेश अग्रवाल के साथ हुए पुराने झगड़े को अभी नहीं भूले हैं, और शरत जैन को वह चूँकि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में ही देख/पहचान रहे हैं - इसलिए वह शरत जैन के लिए कुछ करने को प्रेरित नहीं हो पा रहे हैं । ललित खन्ना की समस्या बिलकुल अलग तरह की है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव वह खुद बड़ी मुश्किलों से - चौथी बार में जीते हैं; ऐसे में, उन्हें डर है कि वह शरत जैन के लिए वोट जुटाने की कोशिश में कहीं खुद का मजाक न बनवा बैठें, लिहाजा वह चुप ही बने हुए हैं । ललित खन्ना की इस चुप्पी ने सीओएल के चुनाव से अलग मामले में शरत जैन की दुविधा को बढ़ाने का काम किया है । शरत जैन को ललित खन्ना की तरफ से संकेत मिला है कि वह उन्हें अपने गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे; शरत जैन की आशंका है कि कहीं उस मामले में भी तो ललित खन्ना उन्हें झाँसा नहीं दे देंगे ? अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना के सामने एक और मुसीबत है - उन्हें आने वाले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ सँभालनी हैं, और इसके लिए उन्हें डिस्ट्रिक्ट में सभी का सहयोग/समर्थन चाहिए होगा - सीओएल के चुनाव के चक्कर में वह उस संभावित सहयोग/समर्थन को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे । यह मुसीबत वास्तव में इसलिए भी है, क्योंकि किसी को भी सीओएल के चुनाव में शरत जैन के जीतने की संभावना नहीं दिख रही है - इसलिए उनके सहयोगी/समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले नेता लोग भी उनके समर्थन में 'दिख' कर अपनी फजीहत नहीं करवाना चाहते हैं, और उनकी उम्मीदवारी से दूर ही रहना चाहते हैं । शरत जैन और मुकेश अरनेजा के बीच होते दिख रहे सीओएल के चुनाव को एक बेमेल चुनाव के रूप में देखा जा रहा है; मुकेश अरनेजा को चुनावी राजनीति का धुरंधर समझा जाता है, जबकि शरत जैन चुनावी राजनीति के बड़े कच्चे खिलाड़ी के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं । रही सही कसर रमेश अग्रवाल की बदनामी पूरी कर देती है । लोगों का मानना/कहना है कि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार होने के कारण शरत जैन की भी स्थिति वैसी ही होगी, जैसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद चुनाव के मामले में अशोक जैन की हुई थी । अशोक जैन तो हालात को समझ/पहचान कर जल्दी ही 'कट' लिए थे, देखना दिलचस्प होगा कि शरत जैन क्या करते हैं ? 

Tuesday, February 25, 2020

रोटरी ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट विनोद बंसल को डर है कि कल होने वाली मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग में उन पर ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद छोड़ने का दबाव पड़ेगा/बनेगा; लेकिन उनके नजदीकियों के अनुसार, उन्होंने भी तय कर लिया है कि उन पर चाहें जितना भी दबाव पड़े/बने, वह ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद तो नहीं छोड़ेंगे

नई दिल्ली । दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक की मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग बुलाने की माँग को लगातार टालते आ रहे ब्लड बैंक के प्रमुख कर्ताधर्ता विनोद बंसल अंततः मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए, जिसके चलते बहुप्रतीक्षित मीटिंग कल होने जा रही है । कल होने वाली मीटिंग को रोटरी में विनोद बंसल के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है । मजे की बात यह है कि इस मीटिंग को - और इस मीटिंग को बुलाने की लगातार होती माँग को - राजनीतिक रंग खुद विनोद बंसल ने ही दिया है । उल्लेखनीय है कि मामले की शुरुआत तब हुई, जब ब्लड बैंक के दूसरे पदाधिकारियों को - सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल तथा ट्रेजरर संजय खन्ना तक को - ब्लड बैंक में लाखों/करोड़ों रुपयों के खर्च से होने वाले कामों की जानकारी तब मिली, जब उनके भुगतान के बिल आए । लंबे-चौड़े बिल देख कर पदाधिकारियों के सिर चकराए कि ब्लड बैंक में ऐसे कौन से काम हो रहे हैं, जिनके बारे में उन्हें भनक तक भी नहीं है । पदाधिकारियों का कहना रहा कि ब्लड बैंक में लाखों/करोड़ों रुपये के खर्चे वाले जो काम हो रहे हैं, उनकी जानकारी ब्लड बैंक के पदाधिकारियों तथा मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों को तो होनी ही चाहिए - और उनके अनुमति ली जानी चाहिए । विनोद बंसल ने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया । बात जब बढ़ी, तो विनोद बंसल ने यह आरोप और लगा दिया कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक लोग उन्हें बदनाम करने के इरादे से ब्लड बैंक में हो रहे कामकाज को मुद्दा बना रहे हैं । विनोद बंसल की तरफ से मामले को राजनीतिक रंग देते हुए कहना/बताना शुरू किया गया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ से उन्हें हटाने के लिए रंजन ढींगरा और दीपक कपूर की तरफ से उन्हें बदनाम करने का प्रचार शुरू किया गया है ।
विनोद बंसल ने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता से भी यह शिकायत की । समझा जाता है कि शेखर मेहता से शिकायत करने के पीछे विनोद बंसल का उद्देश्य उनकी सहानुभूति प्राप्त करने का रहा, जिसे 'दिखा' कर वह लोगों को बता सकें कि शेखर मेहता का समर्थन उनके साथ है । लोगों के बीच चर्चा रही कि इस तरह विनोद बंसल ने ब्लड बैंक के प्रतिकूल पड़ते मामले को अनुकूल बनाने तथा उससे दोहरा फायदा उठाने का जुगाड़ लगाया । विनोद बंसल की लेकिन बदकिस्मती रही कि शेखर मेहता उनकी चाल में नहीं फँसे और समझा जाता है कि शेखर मेहता की तरफ से उन्हें यही सलाह मिली कि मैनेजिंग कमेटी के लोग यदि मीटिंग चाहते हैं, तो उन्हें मीटिंग कर लेनी चाहिए । समझा जाता है कि शेखर मेहता की इस सलाह के चलते ही विनोद बंसल ब्लड बैंक की मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए । विनोद बंसल ने मीटिंग तो बुला ली है; उनके नजदीकियों के अनुसार, लेकिन वह इस बात से डरे हुए भी हैं कि मीटिंग में कुछेक लोग उन पर ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद छोड़ने के लिए दबाव भी बना सकते हैं । मैनेजिंग कमेटी में एक्स-ऑफिसो के रूप में शामिल डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता तो पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि ब्लड बैंक में बिना चुनाव करवाए विनोद बंसल अनधिकृत रूप से प्रेसीडेंट बने हुए हैं, और मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं । उन्होंने माँग की हुई है कि विनोद बंसल को ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद तुरंत छोड़ देना चाहिए और नए चुनाव होने तक किसी और को वर्किंग प्रेसीडेंट बनाया जाना चाहिए । 
दीपक गुप्ता की इस माँग ने विनोद बंसल की मुसीबत को एक अलग तरीके से खासा गंभीर बना दिया है । दरअसल दीपक गुप्ता को विनोद बंसल के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है; विनोद बंसल  का दावा रहा है कि उन्होंने कई मौकों पर दीपक गुप्ता की मदद की है । डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता और सुभाष जैन के बीच हुए चुनाव में विनोद बंसल ने अपनी सामर्थ्यभर दीपक गुप्ता का सहयोग/समर्थन किया था । ऐसे में, दीपक गुप्ता को अपने विरोधियों के साथ खड़ा देख कर विनोद बंसल को तगड़ा झटका लगा है । विनोद बंसल का कहना है कि दीपक गुप्ता असल में रमेश अग्रवाल के बहकावे में आकर उनके अहसानों को भूल गए हैं । दीपक गुप्ता जैसे अपने नजदीकियों के विरोधियों के साथ जा मिलने से विनोद बंसल ब्लड बैंक के मामले में अलग-थलग और अकेले पड़ गए हैं, और इसीलिए ब्लड बैंक के हिसाब-किताब से जुड़े आरोपों के मामले में उनके लिए हालात ज्यादा गंभीर हो गए हैं । विनोद बंसल के नजदीकियों के अनुसार, विनोद बंसल के लिए मामला चाहें जितना गंभीर हो गया हो और कल होने वाली मीटिंग में उन पर चाहें जितना भी दबाव पड़े - वह ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद तो नहीं छोड़ेंगे । दरअसल माना/समझा जा रहा है कि ब्लड बैंक में हिसाब-किताब अभी जिस 'हालत' में है, उसी हालत में वह यदि उनके विरोधियों के हाथ लग गया - तो उसका इस्तेमाल करके उनके विरोधी उन्हें बदनाम करने का मौका पा लेंगे । नजदीकियों का ही कहना है कि विनोद बंसल ब्लड बैंक के हिसाब-किताब को 'डेकोरेट' करने के लिए समय चाहेंगे, और इसके लिए प्रेसीडेंट पद पर बने रहने की पुरजोर कोशिश करेंगे । ब्लड बैंक की मैनेजिंग कमेटी की कल की मीटिंग में हो चाहें कुछ भी, एक बात यह तय है कि विनोद बंसल की मुश्किलें खत्म होने नहीं जा रही हैं - कल की मीटिंग के बाद बल्कि वह बढ़ेंगी ही ।

Thursday, February 13, 2020

रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के प्रेसीडेंट होने के बावजूद विनोद बंसल के समिट के लिए फंड जुटाने के मामले में असफल रहने के कारण रोटरी के बड़े नेताओं के बीच दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक की अनियमितताओं और घपलेबाजियों की चर्चा को विनोद बंसल के लिए बड़े खतरे के संकेत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं उनका भी हाल सतीश सिंघल जैसा न हो

नई दिल्ली । रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट शुरू होने से पहले कोलकाता पहुँचे प्रमुख रोटेरियंस के बीच दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक के कामकाज में अनिमितताओं और घपलेबाजियों से जुड़े आरोपों की जो चर्चा सुनी गई है, उनमें विनोद बंसल के लिए सतीश सिंघल जैसी दशा में 'पहुँचने' का डर पैदा होता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि नोएडा रोटरी ब्लड बैंक में अनियमितताओं व घपलेबाजियों के आरोपों के चलते डिस्ट्रिक्ट 3012 में गवर्नर पद की जिम्मेदारी निभा रहे सतीश सिंघल को रोटरी इंटरनेशनल ने गवर्नर पद से हटा दिया था, और उन्हें पूर्व गवर्नर का दर्जा भी नहीं दिया गया । सतीश सिंघल नोएडा रोटरी ब्लड बैंक के प्रमुख कर्ताधर्ता थे । विनोद बंसल दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक के प्रमुख कर्ताधर्ता हैं । सतीश सिंघल की तरह ही विनोद बंसल पर आरोप है कि ब्लड बैंक की प्रशासनिक व्यवस्था में सारा लेना-देना विनोद बंसल मनमाने तरीके से करते हैं, और ब्लड बैंक के दूसरे पदाधिकारियों को उसकी हवा भी नहीं लगने देते हैं । विनोद बंसल के इस रवैये पर पिछले दिनों बबाल तब उठा, जब ब्लड बैंक की बन रही बिल्डिंग से जुड़े बड़े खर्चों के बिल भुगतान के लिए ब्लड बैंक के ट्रेजरर पूर्व गवर्नर संजय खन्ना के पास आए । संजय खन्ना का कहना रहा कि लाखों/करोड़ों रुपये के खर्चे वाले जो काम हो रहे हैं, उनकी जानकारी ब्लड बैंक की मैनेजिंग टीम के सदस्यों को तो होनी ही चाहिए । ब्लड बैंक के सेक्रेटरी पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल को मामले का जब पता चला, तो वह भी वह भी बुरी तरह भड़के; उनका कहना रहा कि वह ब्लड बैंक के सेक्रेटरी हैं, और उन्हें भी नहीं पता कि ब्लड बैंक में हो क्या रहा है और किस काम में किन लोगों पर कितना पैसा खर्च हो रहा है ? डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता का तो आरोप है कि ब्लड बैंक में बिना चुनाव करवाए विनोद बंसल अनधिकृत रूप से प्रेसीडेंट बने हैं, और मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं । उन्होंने माँग की कि ब्लड बैंक की मैनेजिंग टीम के सदस्यों की जल्दी से जल्दी मीटिंग बुलाई जाए और नियमानुसार चुनाव करवाए जाएँ । विनोद बंसल लेकिन ब्लड बैंक की मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग बुलाने की माँग को लगातार टालते ही जा रहे हैं ।
दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक में अनियमितताओं व घपलेबाजियों के आरोपों में घिरे विनोद बंसल के लिए मुसीबत की बात लेकिन यह हुई है कि रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के आयोजन में कोलकाता में जुटे वरिष्ठ रोटेरियंस के बीच आरोपों की बातें सुनी/सुनाई जा रही हैं । यह बातें वहाँ दरअसल इसलिए चर्चा में आईं, क्योंकि रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के प्रेसीडेंट के रूप में वह उचित फंड जुटाने के मामले में फेल हुए हैं । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल रोटरी में फंड जुटाने के मामले में 'मास्टर' समझे जाते हैं । वास्तव में अपनी इसी खूबी के चलते उन्होंने रोटरी की सीढ़ियाँ बड़ी तेजी से चढ़ी हैं । लेकिन लगता है कि उनकी यही खूबी उनके लिए मुसीबत बन गई है । रोटरी में हर छोटा/बड़ा नेता उनकी तरफ इसी उम्मीद से 'देखता' है कि वह उसके 'आयोजन' के लिए फंड जुटाएँ । रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के लिए भी उनसे बड़ी रकम की उम्मीद की गई थी । समझा जाता है कि समिट का प्रेसीडेंट उन्हें इसीलिए बनाया गया, ताकि इसका खर्च वह जुटाएँ । विनोद बंसल लेकिन उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं, और इसीलिए बड़े नेता उनसे बुरी तरह नाराज हुए हैं । विनोद बंसल के फंड जुटाने के मामले में असफल रहने का कारण यह माना/पहचाना जा रहा है कि लोगों के बीच उनकी पोल खुल गई है, और लोगों ने समझ लिया है कि वह झूठे आश्वासन देकर अपना काम निकालते हैं और लोगों  बरगलाते हैं - इसलिए लोग उनके झाँसे में नहीं आते हैं । रोटरी फाउंडेशन से ग्लोबल ग्रांट लेकर तथा दिलवा कर विनोद बंसल जिस तरह का 'काम' करते हैं, उसे लेकर भी उनकी खासी बदनामी हुई है । दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक को लेकर जो बबाल मचा है, उसके चलते तो विनोद बंसल की साख पर और दाग लगे हैं । इसी सब का नतीजा है कि फंड जुटाने के उनके स्रोत 'सूख' गए हैं, और इसीलिए रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के लिए फंड जुटाने के मामले में वह बुरी तरह असफल रहे हैं ।
रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के प्रेसीडेंट होने के बावजूद विनोद बंसल को समिट के लिए फंड जुटाने के मामले में जिस असफलता का मुँह देखना पड़ा है, उसके कारण रोटरी के बड़े नेता और मुख्य कर्ताधर्ता उनसे बुरी तरह नाराज हैं । रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट शुरू होने से पहले कोलकाता में जुटे रोटरी के बड़े नेताओं के बीच विनोद बंसल के प्रति नाराजगी जिस तरह खुल कर प्रकट हुई है, उसे देखने/सुनने वाले लोगों को लगा है कि रोटरी के बड़े नेताओं ने जैसे मान लिया है कि विनोद बंसल अब उनके - और रोटरी के काम के नहीं रह गए हैं । ऐसे में, दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक की अनियमितताओं और घपलेबाजियों की चर्चा को विनोद बंसल के लिए बड़े खतरे के संकेत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । विनोद बंसल से हमदर्दी रखने वाले नेताओं का मानना/कहना है कि विनोद बंसल ने दिल्ली रोटरी ब्लड बैंक में भड़के बबाल को यदि होशियारी से हैंडल नहीं किया, तो कहीं उनका हाल भी नोएडा रोटरी ब्लड बैंक के सतीश सिंघल जैसा न हो जाए ।

Friday, February 7, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल के गवर्नर-वर्ष का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए अन्य किसी के तैयार न होने की स्थिति में, मजबूरी में जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाए जाने से एमएलसी स्नातक बनने की जेके गौड़ की तैयारी को झटका लगा है क्या ?

गाजियाबाद । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को अपने गवर्नर-वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर चुन कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल ने एमएलसी स्नातक सीट पाने के चुनाव में सक्रिय जेके गौड़ की चुनाव जीतने की संभावना पर मिट्टी डालने का काम किया है क्या ? उल्लेखनीय है कि अशोक अग्रवाल लगातार यह कहते/बताते रहे हैं कि वह वैसे तो जेके गौड़ को ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाते, लेकिन एमएलसी स्नातक बन जाने के कारण चूँकि जेके गौड़ को रोटरी के लिए ज्यादा समय निकाल पाना मुश्किल होगा - इसलिए मजबूरी में उन्हें किसी और को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना पड़ेगा । लेकिन अब जब अशोक अग्रवाल ने जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना और घोषित कर दिया है, तो लोगों को लग रहा है कि जैसे उन्होंने संकेत दिया है कि जेके गौड़ को रोटरी के कामों के लिए समय की कोई समस्या नहीं होगी - तो इस तरह क्या अशोक अग्रवाल ने मान/समझ लिया है कि जेके गौड़ एमएलसी स्नातक नहीं बन रहे हैं, और उनके गवर्नर वर्ष में जेके गौड़ के पास समय ही समय होगा । जेके गौड़ हालाँकि एमएलसी स्नातक चुनाव जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं; उनके बहुत नजदीक होने के नाते विश्वास किया जाता है कि अशोक अग्रवाल उनकी मेहनत से परिचित होंगे ही और यह इच्छा भी रखते ही होंगे कि जेके गौड़ को अपनी मेहनत का सुफल मिले - लेकिन जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना और घोषित करके अशोक अग्रवाल ने उनकी मेहनत तथा उस मेहनत के भरोसे मिलने वाले सुफल पर सवाल खड़ा कर दिया है, और एमएलसी स्नातक सीट पाने के लिए चलाए जा रहे जेके गौड़ के चुनावी अभियान को मनोवैज्ञानिक झटका दिया है ।
अशोक अग्रवाल और जेके गौड़ के नजदीकियों का हालाँकि कहना यह है कि अशोक अग्रवाल ने जेके गौड़ को बहुत ही मजबूरी में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया है । उन्होंने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के लिए किसी और को राजी करने के लिए कोशिशें तो खूब की थीं, लेकिन अन्य कोई उनके गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए तैयार ही नहीं हुआ । अशोक अग्रवाल के पास हालाँकि विकल्प भी बहुत सीमित थे । सीमित विकल्पों के बीच, अशोक अग्रवाल उन मुकेश अरनेजा को भी डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने के लिए तैयार हो गए थे - जिन्होंने उनके चुनाव में उनकी उम्मीदवारी का जमकर विरोध किया था, और हर संभव तरीके से उन्हें हरवाने का प्रयास किया था । अशोक अग्रवाल की बदकिस्मती ही रही कि डिस्ट्रिक्ट के 'परमानेंट डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर' का ख़िताब पा चुके मुकेश अरनेजा ने भी उनके गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने से इंकार कर दिया । हर तरफ से निराश होकर अशोक अग्रवाल ने फिर जेके गौड़ को ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद थमा दिया । लोगों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद स्वीकार करके जेके गौड़ की तरफ से भी लोगों को संदेश मिला है कि जैसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि एमएलसी स्नातक सीट पर तो चुनाव जीतना उनके लिए मुश्किल ही होगा, और इसलिए उन्होंने रोटरी में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद अपने लिए सुरक्षित कर लिया है । 
इस बात पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लेकिन हैरानी है कि अशोक अग्रवाल के गवर्नर वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए और कोई - यहाँ तक कि मुकेश अरनेजा भी - राजी क्यों नहीं हुआ ? अशोक अग्रवाल के नजदीकियों के अनुसार, इसका कारण उनका पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल के साथ किया गया व्यवहार जिम्मेदार है । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल को जेके गौड़ के गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया गया था; लेकिन काम पूरा हो जाने के बाद जेके गौड़ और उनके सहयोगी के रूप में अशोक अग्रवाल ने रमेश अग्रवाल की जमकर लानत-मलामत की । जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल की इस हरकत को अहसानफरामोशी के रूप में देखा/पहचाना गया और माना/कहा गया कि अपना काम निकालने के लिए तो यह किसी को भी भाई-बाप बना लेते हैं, और काम निकलने के बाद उसे धिक्कारने लगते हैं । रमेश अग्रवाल के साथ इन्होंने यही किया । हालाँकि इनका कहना था कि रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी करते हुए इन्हें तरह तरह से परेशान और अपमानित किया और लगातार इनके साथ बदतमीजी करते रहे - और इसीलिए रमेश अग्रवाल के खिलाफ इनका गुस्सा फूटा । लोगों का कहना लेकिन यह रहा कि रमेश अग्रवाल 'ऐसे' ही हैं, क्या यह बात इन्हें पहले से पता नहीं थी, और या क्या इन्होंने यह सोचा था कि हर किसी से बदतमीजी करने वाले आदतन बद्तमीज रमेश अग्रवाल इन्हें बख़्श देंगे और इनके साथ बदतमीजी नहीं करेंगे । रमेश अग्रवाल ने तो वही किया, जिसके लिए वह (कु)ख्यात हैं । इन्होंने क्या किया - इन्हें जब लगा कि रमेश अग्रवाल इन्हें परेशान और अपमानित कर रहे हैं, तब इन्होंने रमेश अग्रवाल का साथ क्यों नहीं छोड़ दिया था ? इन्हें पता ही था कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में मुकेश अरनेजा ने जब अमित जैन को परेशान करना शुरू किया था, तब अमित जैन ने मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा दिया था । यह भी रमेश अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा कर उनकी बदतमीजियों का शिकार होने से बच सकते थे । जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल की जोड़ी ने ऐसा नहीं किया; इन्होंने किया यह कि पहले तो अपना काम निकाला/बनाया और फिर तुरंत ही रमेश अग्रवाल को धिक्कारने लगे । उसी प्रसंग को ध्यान में रखते हुए चूँकि अन्य कोई पूर्व गवर्नर अशोक अग्रवाल का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने को तैयार नहीं हुआ, और इंकार करते करते जेके गौड़ ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना दिए गए हैं । इससे लेकिन एमएलसी स्नातक बनने की जेके गौड़ की तैयारी को झटका लगा है ।

Tuesday, December 3, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अपने बदतमीजीपूर्ण व्यवहार के लिए माफी माँग कर पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल ने क्लब की अपनी सदस्यता को फिलहाल तो बचा लिया है, लेकिन देखने की बात होगी कि क्लब में वह कब तक रह पाते हैं ?

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने का ख्बाव देख रहे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल को अपने क्लब में अपनी सदस्यता बचाने के लिए आखिरकार माफी माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा है । हालाँकि क्लब के कुछेक सदस्यों का ही कहना है कि रमेश अग्रवाल अभी भले ही क्लब से निकाले जाने से बच गए हैं, लेकिन ज्यादा समय तक क्लब में बने नहीं रह सकेंगे । इसके पीछे उनका तर्क है कि रमेश अग्रवाल अपनी बदतमीजियों से बाज आयेंगे नहीं और फिर फिर ऐसी हरकतें करेंगे कि क्लब से निकाले जाने के हालातों में फँसेंगे । एक मशहूर मुहावरे का उपयोग करते हुए कुछेक लोगों का कहना है कि जैसे कुत्ते की पूँछ को चाहें कितने भी दिन नली में डाले रखो, उसे सीधा नहीं किया जा सकता है; वैसे ही रमेश अग्रवाल को बदतमीजीपूर्ण हरकतें करने से नहीं रोका/सुधारा जा सकता है । इस बार रमेश अग्रवाल अपनी हरकतों को लेकर जिस तरह से क्लब के पदाधिकारियों के निशाने पर आए हैं तथा क्लब के सदस्यों के बीच अलग थलग पड़े है, और माफी माँगने के लिए मजबूर हुए हैं, उसके कारण क्लब के सदस्यों हौंसले भी बुलंद हुए हैं  उन्हें लगा है कि रमेश अग्रवाल की बदतमीजियों को चुपचाप बर्दाश्त करने की जरूरत नहीं है ।
उल्लेखनीय है कि अभी तक रमेश अग्रवाल क्लब के कुछेक सदस्यों को अपनी तरफ मिला कर क्लब के पदाधिकारियों पर दबाव बना लेते थे और बच जाते थे । इस बार भी रमेश अग्रवाल ने वैसी ही कोशिश तो की थी, किंतु उनकी कोशिश सफल नहीं हो सकी । दरअसल रमेश अग्रवाल की बदतमीजियों से क्लब के अधिकतर सदस्य परेशान हो चुके हैं और वह रमेश अग्रवाल की चालाकी को भी समझ चुके हैं, इसलिए इस बार क्लब के सदस्य उनके झाँसे में नहीं आए । रमेश अग्रवाल के खिलाफ कार्रवाई को लेकर इस बार क्लब में जो एकता बनी, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता से क्लब  पदाधिकारियों को धौंस दिलवा कर भी रमेश अग्रवाल बच सकने का जुगाड़ नहीं बना पाए । गौरतलब है कि रमेश अग्रवाल के एजेंट का काम करते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने क्लब के पदाधिकारियों को धमकी दी कि वह रमेश अग्रवाल के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते हैं, जिस पर क्लब के पदाधिकारियों की तरफ से दीपक गुप्ता को बता दिया गया कि उन्हें अपनी गवर्नरी पर ध्यान देना चाहिए और किसी क्लब के अंदरूनी मामले में जबर्दस्ती हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और वह जो भी करेंगे रोटरी इंटरनेशनल के नियमानुसार तथा व्यवस्थानुसार ही करेंगे ।
इससे रमेश अग्रवाल को समझ में आ गया कि इस बार उनके लिए बच पाना मुश्किल है; और तब वह खुशामद पर उतर आए । कुछेक लोगों ने बीचबचाव करने के फार्मूलों पर बात की, तो क्लब के पदाधिकारियों की तरफ से उन्हें साफ साफ बता दिया गया कि रमेश अग्रवाल को अपनी कारस्तानियों के लिए माफी तो माँगनी ही पड़ेगी - और लिखित में माँगनी पड़ेगी । 'मरता, क्या न करता' की तर्ज पर रमेश अग्रवाल लिखित में माफी माँगने के लिए तैयार हो गए । माफीनामे के लिए रमेश अग्रवाल और क्लब के पदाधिकारियों के बीच जो लिखित बयान तैयार होना था, उसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को भी शामिल कर लिया गया - ताकि रमेश अग्रवाल आगे कोई हरकत करें तो उनके खिलाफ होने वाली कार्रवाई में दीपक गुप्ता और या अन्य गवर्नर अनुचित हस्तक्षेप न कर सकें । दीपक गुप्ता के घर पर रमेश अग्रवाल और क्लब  पदाधिकारियों की बैठक हुई, माफीनामे का बयान तैयार हुआ, रमेश अग्रवाल तथा संबंधित अन्य लोगों के उस पर हस्ताक्षर हुए और इस तरह रमेश अग्रवाल की क्लब की सदस्यता बची । क्लब के ही सदस्यों का कहना है कि रमेश अग्रवाल की क्लब की सदस्यता फिलहाल तो बच गई है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कब तक बची रह पाती है ?

Wednesday, November 20, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की तैयारी कर रहे रमेश अग्रवाल को बद्तमीजीपूर्ण हरकतों के कारण क्लब से निकाले जाने का नोटिस मिला

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की दौड़ में शामिल होने की कोशिश कर रहे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल फिलबक्त अपने क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली अशोका में अपनी सदस्यता बचाने की लड़ाई में फँसे हुए हैं । रमेश अग्रवाल अपने क्लब के सदस्यों को समझाने में लगे हुए हैं कि क्लब के मौजूदा प्रेसीडेंट राकेश जैन तथा प्रेसीडेंट इलेक्ट मनोज अग्रवाल उन्हें क्लब से निकालने के षड्यंत्र में लगे हैं । क्लब के सदस्यों को मदद के लिए पुकार कर रमेश अग्रवाल ने क्लब के सदस्यों के बीच विभाजन पैदा कर दिया है, और क्लब को फूट के कगार पर पहुँचा दिया है । हालाँकि क्लब के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि रमेश अग्रवाल की बदतमीजियों से क्लब के अधिकतर सदस्य परेशान हो चुके हैं और इस बार रमेश अग्रवाल को उनकी कोई भी तिकड़म बचा नहीं पाएगी और वह अपने आप को क्लब से बाहर ही पायेंगे; उनका दावा है कि अधिकतर सदस्य रमेश अग्रवाल की असलियत समझ गए हैं, और अब कोई भी रमेश अग्रवाल के झाँसे में नहीं आयेगा । क्लब के अन्य कुछेक सदस्यों का भी कहना/बताना है कि रमेश अग्रवाल के मामले को लेकर क्लब के अधिकतर सदस्य प्रेसीडेंट राकेश जैन के साथ हैं और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के बावजूद रमेश अग्रवाल को बस दो-चार सदस्यों का ही समर्थन प्राप्त है ।
रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के सदस्यों के अनुसार, रमेश अग्रवाल को क्लब के प्रेसीडेंट की तरफ से कारण बताओ नोटिस मिला हुआ है, जिसमें उनसे पूछा गया है कि क्लब के पदाधिकारियों से बदतमीजी करने के मामले में क्यों न क्लब की उनकी सदस्यता को रद्द कर दिया जाए ? इस नोटिस का जबाव देने की बजाये रमेश अग्रवाल क्लब के सदस्यों को प्रेसीडेंट के खिलाफ भड़काने में लग गए हैं । रमेश अग्रवाल नोटिस देने की कार्रवाई को नियम-विरुद्ध बताते हुए अपने आप को बचाने का प्रयास कर रहे हैं । रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता से भी गुहार लगाई हुई है कि वह प्रेसीडेंट पर दबाव बना कर आगे कार्रवाई होने से रोकें और उन्हें बचाएँ । प्रेसीडेंट का क्लब के सदस्यों से कहना है कि वह लगातार रमेश अग्रवाल की बदतमीजियों को झेलते रहे हैं, और कोशिश करते रहे हैं कि वह रमेश अग्रवाल के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई न करें - लेकिन रमेश अग्रवाल ने प्रेसीडेंट इलेक्ट के साथ भी बदतमीजी करके दिखा दिया है कि क्लब के पदाधिकारियों के साथ बदतमीजी करना वह अपना अधिकार समझने लगे हैं और वह क्लब के पदाधिकारियों के लिए स्थाई खतरा बन गए हैं - इसलिए यह क्लब के हित में है कि उन्हें क्लब से निकाल दिया जाए ।
उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल क्लब को मिलने वाले विभिन्न प्रोजेक्ट्स पर तथा महत्त्व के फैसलों पर अपना 'कब्जा' रखना चाहते हैं और इसके लिए तरह तरह से क्लब के पदाधिकारियों को दबा कर रखते हैं । पिछले रोटरी वर्ष के अंतिम दिनों में एक बड़े प्रोजेक्ट के शुरुआती कार्यक्रम में वह जिस मनमाने तरीके से अपनी पत्नी के साथ 'आगे' आ बैठे थे, उसे लेकर क्लब में भारी बबाल हुआ और उक्त प्रोजेक्ट ही अधर में लटक गया था । सिर्फ यही नहीं, उस बबाल और फजीहत के चलते अशोक जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाने की घोषणा से भी रमेश अग्रवाल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा था । उस बबाल और फजीहत के लिए रमेश अग्रवाल ने राकेश जैन को जिम्मेदार माना था, और तभी से रमेश अग्रवाल उनके साथ तरह तरह से बदतमीजी करते रहे हैं । राकेश जैन तो किसी तरह रमेश अग्रवाल की हरकतों को अनदेखा करते रहे, लेकिन अभी हाल ही में रमेश अग्रवाल ने जब प्रेसीडेंट इलेक्ट मनोज अग्रवाल के साथ भी बदतमीजी की, तब मामला बिगड़ गया और राकेश जैन पर दबाव बना कि वह रमेश अग्रवाल के खिलाफ कार्रवाई करें । रमेश अग्रवाल को विश्वासपूर्ण घमंड रहा कि क्लब में जिस तरह से अभी तक उनकी बदतमीजियाँ चलती रही हैं, और कोई भी प्रेसीडेंट उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर सका है, वैसे ही राकेश जैन भी हिम्मत नहीं कर सकेंगे । लेकिन राकेश जैन ने उन्हें क्लब से निकालने का नोटिस थमा कर उनके घमंड को तोड़ दिया है । ऐसे में, रमेश अग्रवाल को क्लब से निकाले जाने से बचने के लिए क्लब के सदस्यों की खुशामद में जुटना पड़ा है । देखना दिलचस्प होगा कि क्लब  सदस्यों की खुशामद करके रमेश अग्रवाल अपने क्लब में बने रहने का जुगाड़ कर लेंगे, या फिर उन्हें दूसरे किसी क्लब में शरण लेना पड़ेगी ।

Wednesday, October 30, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में होने वाले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान के नाम पर रमेश अग्रवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की 'राजनीति' करने का मौका देने तथा खर्च का बोझ क्लब्स पर डालने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता मुसीबत में फँसे   

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान में होने वाला कार्यक्रम क्लब्स से 50/50 हजार रुपए माँगने के कारण विवाद में फँस गया है । लोगों के बीच चर्चा सुनी जा रही है कि उक्त कार्यक्रम को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की राजनीति का जरिया बना कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता क्लब्स पर नाहक ही बोझ डाल रहे हैं और इस तरह रमेश अग्रवाल को क्लब्स के पैसों पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव लड़वाने की तैयारी कर रहे हैं । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि रमेश अग्रवाल ने अपने राजनीतिक स्वार्थ में दीपक गुप्ता को फँसा दिया है, और दीपक गुप्ता ने क्लब्स को फँसा दिया है । उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने पर सुशील गुप्ता का दिल्ली में जो स्वागत/सम्मान समारोह हुआ था, उसे डिस्ट्रिक्ट 3012 और डिस्ट्रिक्ट 3011 ने मिल कर किया था । उसी तर्ज पर दीपक गुप्ता के सामने इस वर्ष शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह को आयोजित करने का ऑफर था । दीपक गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, दीपक गुप्ता इसके लिए राजी भी थे; लेकिन रमेश अग्रवाल ने दीपक गुप्ता को समझा लिया कि उक्त समारोह अकेले करना ही उचित होगा । समझा जाता है कि रमेश अग्रवाल चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार होने की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए उन्हें लगा कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के जरिये वह अपनी डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के लिए 'माहौल' बना सकेंगे ।   
रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने के उद्देश्य से किए जा रहे शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के लिए दीपक गुप्ता ने क्लब्स से 50 हजार रुपए देने की माँग की है, जिसके बदले में क्लब को पाँच युगल्स के लिए समारोह में शामिल होने का अवसर देने की बात की गई है । उल्लेखनीय है कि रोटरी में इस तरह के आयोजनों के लिए पैसे जुटाने का काम व्यक्तिगत रजिस्ट्रेशन के जरिये किया जाता है; और या कुछेक सक्रिय रोटेरियंस से स्पॉन्सरशिप ली जाती है । पिछले रोटरी वर्ष में हुए समारोह में कुछेक लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया था, तथा कई लोगों को तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन द्वारा ली गई स्पॉन्सरशिप के बदले में प्रवेश मिला था । लोगों का कहना है कि सुभाष जैन की ही तरह दीपक गुप्ता को और रमेश अग्रवाल को समारोह का खर्च जुटाने के लिए स्पॉन्सरशिप लेना चाहिए; दीपक गुप्ता ने लेकिन क्लब्स पर बोझ डाल कर नाहक ही विवाद पैदा कर दिया है । इस 'व्यवस्था' के चलते समारोह में हिस्सा लेने के लिए क्लब के पाँच युगल्स का चयन करने को लेकर क्लब्स में झगड़े होने की आशंका व्यक्त की जा रही है । लोगों का कहना है कि शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के खर्च के लिए दीपक गुप्ता को पिछले वर्ष जैसी ही व्यवस्था अपनाना चाहिए थी - जिससे न कोई झंझट पैदा होता, न किसी झगड़े की आशंका होती और न क्लब पर कोई बोझ पड़ता ।
शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह का मुखिया रमेश अग्रवाल को बनाने के दीपक गुप्ता के फैसले पर पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा भी नाराज बताये/सुने जा रहे हैं । मुकेश अरनेजा चूँकि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं, इसलिए वह उम्मीद कर रहे थे कि दीपक गुप्ता उक्त समारोह के आयोजन की जिम्मेदारी उन्हें देंगे । मुकेश अरनेजा को यह उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि पिछले रोटरी वर्ष में सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में हुए स्वागत/सम्मान समारोह की जिम्मेदारी सुभाष जैन ने तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर शरत जैन को दी थी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता ने लेकिन उक्त समारोह की जिम्मेदारी के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने की बजाये रमेश अग्रवाल को चुना और मुकेश अरनेजा को निराश किया और झटका दिया । रमेश अग्रवाल को समारोह की जिम्मेदारी मिलने से शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान में होने वाला समारोह रमेश अग्रवाल का राजनीतिक तमाशा बन गया है, जिसके खर्च का बोझ क्लब्स पर डालने के कारण वह विवादपूर्ण भी बन गया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता के पिछले कार्यक्रम, खासतौर से डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों का अधिष्ठापन कार्यक्रम और फिर दीवाली मेला - लोगों से सहयोग न मिलने के कारण बुरी तरह से 'पिटे' और फ्लॉप रहे हैं; शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान के कार्यक्रम को लेकर दीपक गुप्ता की तैयारी जिस विवाद में फँस/पड़ गई है, उसके कारण डर पैदा हुआ है कि कहीं इस समारोह का हश्र भी उनके पिछले कार्यक्रमों जैसा तो नहीं होगा ? 

Wednesday, October 9, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अजय नारायण से रोटरी कैंसर फाउंडेशन के मुखिया पद की कुर्सी छिनने के बाद रोटरी ब्लड बैंक में विनोद बंसल का मुखिया पद मुसीबत में फँसा, विनोद बंसल ने इसके लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की रमेश अग्रवाल की राजनीति को जिम्मेदार ठहराया

नई दिल्ली । रोटरी कैंसर फाउंडेशन के मुखिया पद पर वर्षों से कुंडली मारे बैठे अजय नारायण की छुट्टी करने के बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन ने रोटरी ब्लड बैंक के मुखिया विनोद बंसल को निशाने पर लेने की तैयारी शुरू की है । विनोद बंसल वाले मामले में सुरेश भसीन को सहयोगी/साथी डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता का भी समर्थन मिलता नजर आ रहा है । दीपक गुप्ता के रवैये पर हैरानी व्यक्त करते हुए विनोद बंसल ने यह कहते/बताते हुए रमेश अग्रवाल के सिर ठीकरा फोड़ा है कि दीपक गुप्ता को भड़का कर रमेश अग्रवाल उन्हें रोटरी ब्लड बैंक के मुखिया पद से हटवाने का षड्यंत्र कर रहे हैं, ताकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में उनकी स्थिति को कमजोर किया जा सके । मजे की बात यह हुई है कि अपनी कुर्सी पर आई आफत से बचने के लिए विनोद बंसल ने अजय नारायण की कुर्सी बचाने की कोशिशों से किनारा कर लिया, हालाँकि पहले वह अजय नारायण की कुर्सी बचाने की लड़ाई में जोरशोर से शामिल थे । दरअसल अजय नारायण को पूर्व गवर्नर्स विनय अग्रवाल व रवि चौधरी के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव राय मेहरा का खुला समर्थन रहा; पूर्व गवर्नर विनोद बंसल इस उम्मीद में अजय नारायण की कुर्सी बचाने की मुहिम में शामिल हुए कि इससे वह संजीव राय मेहरा की गुडबुक में आ जायेंगे । लेकिन उन्होंने जब देखा/पाया कि दोनों डिस्ट्रिक्ट्स के छह पदाधिकारियों (दोनों डिस्ट्रिक्ट्स के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी) में से बाकी पाँच अजय नारायण के खिलाफ हैं, और अजय नारायण के खिलाफ छिड़ी लड़ाई की आँच रोटरी ब्लड बैंक की उनकी कुर्सी की तरफ भी बढ़ रही है - तब उन्होंने अजय नारायण के पक्ष में चल रही कोशिशों से अपने आप को अलग कर लिया । अजय नारायण और उनके समर्थकों के बीच बुरा बनने के बावजूद विनोद बंसल अपनी कुर्सी पर मँडराने वाले संकट को लेकिन टाल नहीं सके हैं ।
रोटरी कैंसर फाउंडेशन के मुखिया पद पर वर्षों से कब्जा जमाये बैठे अजय नारायण के खिलाफ नाराजगी तो पिछले कुछेक वर्षों से लगातार बनी हुई थी, लेकिन अजय नारायण तिकड़में लगा कर अपनी कुर्सी को बचाये रखने में कामयाब होते आ रहे थे; अबकी बार लेकिन सुरेश भसीन ने अजय नारायण की ऐसी घेराबंदी की कि उनकी कोई भी तिकड़म काम नहीं आई । रोटरी कैंसर फाउंडेशन के मुखिया के रूप में अजय नारायण ने जैसी मनमानी फैलाई हुई थी, दरअसल उससे सभी खफा थे; सुरेश भसीन ने इसी बात का फायदा उठाया । बची-खुची कसर विनय अग्रवाल व रवि चौधरी जैसे डिस्ट्रिक्ट के बदनाम लोगों के समर्थन ने पूरी कर दी । इन दोनों को अजय नारायण के समर्थन में देख, जिन कुछेक लोगों को अजय नारायण के प्रति हमदर्दी थी भी - उन्होंने भी अजय नारायण की वकालत से हाथ खींच लिए । विनय अग्रवाल व रवि चौधरी के समर्थन ने अजय नारायण को लाभ पहुँचाने की जगह नुकसान पहुँचाने का ही काम किया । जिस आधार पर अजय नारायण की आलोचना की जा रही थी, उसी आधार पर रोटरी ब्लड बैंक का कामकाज भी निशाने पर आया, तो विनोद बंसल ने यह समझने में देर नहीं लगाई कि अजय नारायण के खिलाफ भड़की आग उन्हें भी अपने लपेटे में ले सकती है । अजय नारायण को बचाने की लड़ाई में विनोद बंसल कूदे तो इसलिए थे, ताकि वह विनय अग्रवाल व रवि चौधरी के साथ अजय नारायण के वकील बने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव राय मेहरा का भरोसा जीत सकें; लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि संजीव राय मेहरा का भरोसा जीतने के चक्कर में वह कहीं मुसीबत में न घिर जाएँ - सो वह चुपचाप तरीके से पीछे हट गए । 
विनोद बंसल लेकिन पीछे हटने के बावजूद मुसीबत से बचते नहीं लग रहे हैं । असल में, रोटरी कैंसर फाउंडेशन के कामकाज पर विचार करते समय रोटरी ब्लड बैंक के कामकाज पर भी पदाधिकारियों का ध्यान गया । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट में जो भी ट्रस्ट हैं - उसके पदाधिकारियों को कामकाज व हिसाब-किताब का ब्यौरा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को देना जरूरी होता है । इसी नियम के हवाले से रोटरी ब्लड बैंक के कामकाज का जिक्र आया तो यह उल्लेख भी हुआ कि ट्रस्ट के संविधान के अनुसार, प्रत्येक दो वर्ष में पदाधिकारियों का चुनाव होना चाहिए, जो नहीं हुआ है । इस पर दीपक गुप्ता ने रेखांकित किया कि इस आधार पर विनोद बंसल रोटरी ब्लड बैंक के प्रमुख पदाधिकारी नहीं हो सकते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता से यह सुनकर विनोद बंसल के तनबदन में जैसे आग लग गई । वह बिफर उठे और बताने लगे कि उन्होंने रोटरी ब्लड बैंक में क्या क्या किया है, और उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है । लोगों के पास इसका जबाव जैसे तैयार था; उनका कहना रहा कि उन्हें पदाधिकारी बनाया ही इसलिए गया था कि उन्हें काम करना है, और काम करने का मतलब यह थोड़े ही है कि नियमों का पालन नहीं होगा । इस तर्क से तो कभी कोई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दावा कर सकता है कि उसने बहुत काम किया है, इसलिए कार्यकाल खत्म होने के बाद भी उसे गवर्नर बने रहने दिया जाना चाहिए । यह सुनकर विनोद बंसल को चुप हो जाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा । उनकी खुशकिस्मती रही कि दूसरे लोगों ने भी रोटरी ब्लड बैंक के मामले को लेकर ज्यादा बात नहीं की, क्योंकि उन्हें रोटरी कैंसर फाउंडेशन के मामले को निपटाना था । विनोद बंसल समझ रहे हैं कि अभी तो वह बच गए हैं, लेकिन जिस तरह की बातें हुई हैं उसके चलते वह ज्यादा दिन तक बचे नहीं रह सकेंगे । इसीलिए उन्होंने मामले को राजनीतिक ट्विस्ट देकर राजनीतिक लाभ उठाने की चाल चली है । दीपक गुप्ता के रवैये के पीछे विनोद बंसल ने डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल को 'देखा'/बताया है और दावा किया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उन्हें नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से रमेश अग्रवाल ने दीपक गुप्ता को भड़का कर रोटरी ब्लड बैंक के मुखिया पद से उन्हें हटवाने का षड्यंत्र रचा है । विनोद बंसल के इस आरोप ने मामले को रोचक व रोमांचक बना दिया है । 

Saturday, September 7, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मेंबरशिप सेमीनार जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम की कुर्बानी देकर की गई बॉलीवुड नाईट के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ-साथ रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं के बीच भी फजीहत का शिकार बने

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट मेंबरशिप सेमीनार को रद्द करके बॉलीवुड नाईट करवाने की हरकत के चलते हुई फजीहत के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को बॉलीवुड नाईट कार्यक्रम से दूर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा । इस कार्यक्रम को लेकर दीपक गुप्ता को दोहरी मुसीबत झेलना पड़ रही है । डिस्ट्रिक्ट के दिल्ली व सोनीपत क्षेत्र के रोटेरियंस व प्रेसीडेंट्स इस कारण उनसे नाराज हुए हैं कि उन्हें कार्यक्रम का निमंत्रण नहीं मिला और जिसके चलते वह कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके; दूसरी तरफ रोटरी के बड़े नेताओं ने दीपक गुप्ता की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने बॉलीवुड नाईट के नाम पर मेंबरशिप सेमीनार जैसे रोटरी इंटरनेशनल के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम की गुपचुप तरीके से बलि चढ़ा दी । रोटरी के कुछेक बड़े नेताओं ने 'रचनात्मक संकल्प' से भी 7 सितंबर के लिए मेंबरशिप सेमीनार की पूर्व घोषणा के तथ्य की जानकारी ली और पुष्टि की, जिसके तहत 'रचनात्मक संकल्प' ने उन्हें बताया कि अपने गवर्नर वर्ष की डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में पृष्ठ 102 पर खुद दीपक गुप्ता ने कार्यक्रम का शिड्यूल प्रकाशित किया हुआ है । दीपक गुप्ता ने 27 सदस्यों की भारी-भरकम डिस्ट्रिक्ट मेंबरशिप कमेटी बनाई हुई है, जिसके चेयरमैन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल हैं; लेकिन न दीपक गुप्ता ने और न रमेश अग्रवाल ने किसी को बताया है कि 7 सितंबर को होने वाले मेंबरशिप सेमीनार का आखिर हुआ क्या ? रमेश अग्रवाल की भी इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि उन्हें यदि चेयरमैन बनने का शौक है, तो उन्हें चेयरमैन पद की जिम्मेदारी निभाने में तथा नियमानुसार पद के अनुरूप काम करने में भी उन्हें दिलचस्पी क्यों नहीं है ।
मजे की बात यह है कि दीपक गुप्ता की तरफ से लगातार यही तर्क दिया जा रहा है कि बॉलीवुड नाईट डिस्ट्रिक्ट का कार्यक्रम नहीं है; लेकिन उनकी तरफ से आधिकारिक रूप से यह नहीं बताया जा रहा है कि यह कार्यक्रम आखिर था किसका ? रोटरी की व्यवस्था के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट में कोई भी कार्यक्रम या तो क्लब करता है और या डिस्ट्रिक्ट । डिस्ट्रिक्ट का कार्यक्रम कुछेक क्लब्स तथा डिस्ट्रिक्ट टीम के कुछेक पदाधिकारी मिल कर करते हैं । बॉलीवुड नाईट का आयोजन दो असिस्टेंट गवर्नर्स तथा उनके जोन के प्रेसीडेंट्स ने किया है, तो इसे डिस्ट्रिक्ट का ही कार्यक्रम माना जायेगा । रोटरी के नियम-कानूनों तथा उसकी व्यवस्था को जानने/समझने वाले वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि बॉलीवुड नाईट का जो आयोजन हुआ है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है; गलत सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता का रवैया है; अपने रवैये और अपनी बेवकूफी के चलते वह ऐसी मुसीबत में फँस गए हैं कि उससे निकलने के लिए उन्हें नए नए बहाने गढ़ने पड़ रहे हैं तथा मुँह छिपाना पड़ रहा है । उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड नाईट कार्यक्रम जिस होटल में हुआ, वह दीपक गुप्ता के घर से मुश्किल से सौ मीटर की दूरी पर होगा, लेकिन फिर भी दीपक गुप्ता ने कार्यक्रम में न जाने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । रोटरी में इससे पहले ऐसा शायद ही किसी डिस्ट्रिक्ट में किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ हुआ होगा कि दो असिस्टेंट गवर्नर्स अपने जोन के प्रेसीडेंट्स के साथ मिल कर एक कार्यक्रम करें, जिसमें कई रोटेरियंस शामिल हुए हों, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को उस कार्यक्रम से मुँह छिपाना पड़ा हो ।
दीपक गुप्ता को अपनी टीम के दो प्रमुख पदाधिकारियों तथा 12 क्लब्स के प्रेसीडेंट्स द्वारा आयोजित कार्यक्रम से इसलिए मुँह छिपाना पड़ा, क्योंकि जिस तारीख को यह कार्यक्रम हुआ, उस तारीख पर उन्होंने मेंबरशिप सेमीनार करने की घोषणा की हुई थी । 7 सितंबर को होने वाले मेंबरशिप सेमीनार का क्या हुआ, यह डिस्ट्रिक्ट में किसी को नहीं पता - डिस्ट्रिक्ट की मेंबरशिप कमेटी के पदाधिकारियों को भी इस बारे में कुछ नहीं पता । कमेटी के चेयरमैन रमेश अग्रवाल को भी पता है या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है । गारंटी लेकिन इस बात की जरूर है कि चेयरमैन के रूप में रमेश अग्रवाल ने भी अपनी कमेटी के पदाधिकरियों को कोई जानकारी नहीं दी है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता एक तरफ तो बॉलीवुड नाईट के लिए मेंबरशिप सेमीनार की कुर्बानी करने को लेकर फजीहत का शिकार बन रहे हैं; दूसरी तरफ डिस्ट्रिक्ट के तमाम रोटेरियंस व पदाधिकारी इस बात पर खफा हैं कि उन्हें बॉलीवुड नाईट से दूर रखा गया है । दिल्ली व सोनीपत क्षेत्र के वरिष्ठ रोटेरियंस तथा क्लब्स के प्रेसीडेंट्स व अन्य पदाधिकारी इस बात पर नाराजगी जता/दिखा रहे हैं कि उन्हें क्यों इस कार्यक्रम से अलग-थलग रखा गया और निमंत्रण तक नहीं दिया गया । डिस्ट्रिक्ट में यह भी कहा/सुना जा रहा है कि बॉलीवुड नाईट वास्तव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार ललित खन्ना का कार्यक्रम था, जिसके लिए दीपक गुप्ता ने मेंबरशिप सेमीनार की बलि चढ़ा दी । दीपक गुप्ता की इस हरकत के चलते विवाद में फँसा बॉलीवुड नाईट कार्यक्रम ललित खन्ना के लिए भी मुसीबत का कारण बना । ललित खन्ना के समर्थकों व शुभचिंतकों को डर हुआ है कि दीपक गुप्ता की हरकत के चलते बॉलीवुड नाईट कार्यक्रम को लेकर रोट्रेरियंस के बीच जो नाराजगी पैदा हुई है, वह कहीं ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान पर प्रतिकूल असर न डाले ।

Sunday, August 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के ई-क्लब मैग्नम से पैसा वापस माँगने की रोटरी फाउंडेशन की कार्रवाई ने 'बताया' कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के खासमखास सुनील प्रकाश ने रवि सिंघल व नवनीत गुप्ता के साथ मिल कर सीएसआर, रोटरी फाउंडेशन व स्कूली बच्चों के साथ एक साथ धोखा किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों को रोटरी फाउंडेशन से मिले करीब 31 लाख रुपए वापस लौटाने के आदेश ने डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले को उजागर कर दिया है । इस मामले ने रोटरी फाउंडेशन के साथ-साथ सीएसआर (कॉपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी) के पैसों में भी रोटेरियंस की लूट की तरकीबों को सामने लाने का काम किया है । इस मामले ने डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों के गैर-जिम्मेदार रवैये को भी उद्घाटित किया है, जो उनकी मिलीभगत होने के भी संकेत देता है । ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों ने जिस ग्लोबल ग्रांट (जीजी 1755525) में घपला किया है, वह शरत जैन के गवर्नर वर्ष में मंजूर हुई थी, और उस दौरान मुकेश अरनेजा डीआरएफसी थे । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने वरदान अस्पताल में बनने वाले ब्लड बैंक की ग्रांट के मामले में तो बड़ा बबाल काटा था, लेकिन ई-क्लब मैग्नम की ग्लोबल ग्रांट बिना किसी चूँ-चपड़ के पास कर दी थी । विन्स इंडिया के सेक्रेटरी के रूप में रमेश अग्रवाल ने उक्त ग्रांट मिलने पर खासी खुशी जाहिर की थी । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने तो और भी कमाल किया है । रोटरी फाउंडेशन व सीएसआर के पैसों की लूट के उद्देश्य से स्कूलों और स्कूली बच्चों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराए जा रहे क्लब के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील प्रकाश को दीपक गुप्ता ने अपनी टीम में बेसिक एजुकेशन एंड लिट्रेसी कमेटी का जोन चेयरमैन बनाया हुआ है । इस तरह जाहिर होता है और देखने में आया है कि रोटरी फाउंडेशन, सीएसआर तथा स्कूली बच्चों के पैसों व उनकी सुविधाओं की लूट करने वाले ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट के कई बड़े पदाधिकारियों/नेताओं के चहेते हैं ।
सुनील प्रकाश को संबोधित रोटरी फाउंडेशन की तरफ से भेजे गए पाँच पृष्ठीय पत्र में विस्तार से बताया गया है कि हरियाणा के छह स्कूलों में शौचालय, पीने के पानी और शिक्षा सुविधाओं के स्तर में सुधार के उद्देश्य से ग्लोबल ग्रांट ली गई थी, जिसके तहत नए शौचालय बनने थे; नए कंप्यूटर लगने थे; विज्ञान की प्रयोगशालाओं के लिए टेबल व रैक्स व स्टूल तथा क्लास रूम्स के लिए नए डेस्क्स आने थे; इन्वर्टर व यूपीएस लगने थे; आदि-इत्यादि । प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद रोटरी फाउंडेशन की ऑडिट टीम ने मौके पर जा कर जो जाँच की, उसमें लेकिन घपलेबाजी की पोल खुली । ऑडिट टीम ने पाया कि प्रोजेक्ट के तहत जो कुछ भी किया जाना था, उसमें से कुछ भी नहीं किया गया । नए शौचालय बनवाने की जगह पुराने बने शौचालयों की ही मरम्मत/पुताई करवा दी गई; नए कंप्यूटर, इन्वर्टर व यूपीएस देने/लगाने की जगह पुराने कंप्यूटर्स, इन्वर्टर व यूपीएस की ही सर्विस करवा दी गई; डेस्क, टेबल, रैक्स, स्टूल आदि के मामले में भी यही रवैया अपनाया गया । प्रोजेक्ट के सलाहकार की फीस के नाम पर करीब साढ़े तीन लाख रुपए खर्च दिखाए गए । ऑडिट टीम का निष्कर्ष रहा कि प्रोजेक्ट में जो जो काम करने की बात की गई थी, उनमें से कोई भी काम करने के उदाहरण नहीं मिले हैं । ऑडिट टीम की रिपोर्ट के आधार पर रोटरी फाउंडेशन ने सुनील प्रकाश को फैसला सुनाया है कि चूँकि प्रोजेक्ट के तहत बताए गए कोई काम नहीं हुए हैं, इसलिए विभिन्न मदों में दिखाए गए कुल खर्च के 30,85,085 रुपए वह रोटरी फाउंडेशन को 31 अगस्त तक वापस भेजें ।
रोटरी फाउंडेशन के पैसों के साथ की गई इस लूट का और भी गंभीर व सनसनीखेज पक्ष यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जेको एयरकॉन लिमिटेड से सीएसआर के तहत पैसा लिया गया । जो तथ्य इस बात को गंभीर व सनसनीखेज बनाता है, वह यह है कि सुनील प्रकाश इस कंपनी में डायरेक्टर हैं । सुनील प्रकाश के साथ प्रोजेक्ट कमेटी में जो दूसरे लोग सदस्य हैं, उनमें रवि सिंघल इसी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और नवनीत कुमार गुप्ता इसी कंपनी में एक अन्य डायरेक्टर हैं । रवि सिंघल पिछले रोटरी वर्ष में क्लब के प्रेसीडेंट थे, और नवनीत कुमार गुप्ता प्रेसीडेंट इलेक्ट हैं । क्लब में कुल 16 सदस्य हैं । यानि क्लब कुल मिलाकर इन्हीं तीन-चार लोगों का क्लब है । इस तरह कहानी यह बनी कि इनकी कंपनी इनके क्लब को सीएसआर के तहत पैसे देती है, जिसे दिखा कर यह रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम ले लेते हैं - और उसे हजम कर जाते हैं । इस तरह यह एक साथ सरकार से, रोटरी फाउंडेशन से और स्कूली बच्चों से धोखा करते हैं । सुनील प्रकाश, रवि सिंघल, नवनीत कुमार गुप्ता आदि बड़े लोग हैं, बड़े पैसे वाले लोग हैं, बड़ी बड़ी बातें करते हैं; यह स्कूली डेस्क, स्टूल, रैक्स, कंप्यूटर और शौचालयों के पैसों में चोरी-चकारी जैसा काम करेंगे - यह किसी ने नहीं सोचा था । लेकिन रोटरी फाउंडेशन से सुनील प्रकाश को संबोधित और भेजा गया पत्र इनकी सारी कारस्तानी की पोल खोल देता है और इनके मामले में 'नाम बड़े और दर्शन छोटे' वाली कहावत को चरितार्थ करता है । 

Friday, July 19, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के अधिष्ठापन समारोह में प्रेसीडेंट्स, असिस्टेंट गवर्नर्स के साथ-साथ वरिष्ठ रोटेरियंस व गवर्नर्स की उत्साही उपस्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रभावी रूप से उत्साहित करने का काम किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के क्लब के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को और मजबूती देने का काम किया है । वास्तव में उक्त अधिष्ठापन समारोह को ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार की झलक पाने-दिखाने के रूप में ही डिजाईन किया गया था; और कह सकते हैं कि उसका नतीजा भी उनकी तैयारी के अनुरूप ही निकला/रहा । उल्लेखनीय है कि चुनावी राजनीति के चलते रोटरी में दरअसल यह प्रथा ही बन गई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह नए पदाधिकारियों की बजाये वास्तव में उम्मीदवार का 'शो' बन जाता है - और उसमें जुटे लोगों की पहचान के आधार पर उम्मीदवार की ताकत और कमजोरी का शुरुआती आकलन किया जाता है । संख्या के हिसाब से रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के - नहीं, ललित खन्ना के - समारोह में भीड़ तो अच्छी जुटी ही; उस भीड़ में प्रेसीडेंट्स और असिस्टेंट गवर्नर्स की अच्छी-खासी उपस्थिति ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के शुभचिंतकों को बम बम भी किया । समारोह में प्रायः सभी असिस्टेंट गवर्नर्स थे और प्रेसीडेंट्स की संख्या भी 70 के करीब सुनी/बताई गई । समारोह में डिस्ट्रिक्ट के प्रायः हर क्षेत्र - दिल्ली, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों तथा सोनीपत के क्लब्स के सदस्यों की अच्छी खासी संख्या थी; और कई क्लब्स के छोटे/बड़े समझे जाने वाले नेता लोग भी समारोह की रौनक बढ़ा रहे थे ।  गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों तथा सोनीपत के रोटेरियंस की उपस्थिति ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को खासा उत्साहित करने का काम किया ।
समारोह में मौजूद डिस्ट्रिक्ट के कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस ने इस मजेदार संयोग को भी रेखांकित किया कि जेके गौड़ और उनके बाद जिस उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह इस जगह पर हुआ है, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव उसी ने जीता है । उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना लेकिन संयोगों पर निर्भर नहीं हैं; और कई एक वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना रहा कि ललित खन्ना इस बार अपने चुनाव अभियान में कहीं कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं और हर तरफ ध्यान दे रहे हैं । पिछले महीनों में ललित खन्ना ने प्रेसीडेंट्स तथा वरिष्ठ रोटेरियंस के बीच काफी प्रभावी तरीके से संपर्क-अभियान चलाया है - समारोह में डिस्ट्रिक्ट के कई आम और खास लोगों की उपस्थिति को उनके उसी संपर्क-अभियान के नतीजे के रूप में देखा/समझा गया है । ललित खन्ना ने इस बार के अधिष्ठापन समारोह को इस तरह से डिजाईन किया कि उनका समारोह सिर्फ समारोह के रूप में ही नहीं था, बल्कि उसमें रोटरी के उद्देश्य व लक्ष्य भी थे - अधिष्ठापन समारोह में क्लब ने 17 नए प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की घोषणा की तथा दो ग्लोबल ग्रांट्स के प्रोजेक्ट्स घोषित हुए; ग्लोबल ग्रांट्स के तहत घोषित किए गए दो प्रोजेक्ट्स में एक में ललित खन्ना का क्लब एक विदेशी क्लब से मदद ले रहा है, तथा दूसरे में उनका क्लब एक अन्य विदेशी क्लब को मदद दे रहा है । समारोह में एक और खास बात यह रही कि इसमें इनरव्हील की एक पूर्व प्रेसीडेंट तथा दो पूर्व एसोसिएटेड प्रेसीडेंट तथा ललित खन्ना की पत्नी नीलु खन्ना के अलावा दो अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट चेयरपरसन उपस्थित हुईं - और उनकी उपस्थिति ने रोटेरियंस को, खासतौर से प्रेसीडेंट्स को रोटरी परिवार की अवधारणा से परिचित होने का मौका दिया और उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया ।
ललित खन्ना की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के संपर्क-अभियान के असर को जाँचने/परखने तथा उसे और गति देने के उद्देश्य से आयोजित हुए समारोह में कई गवर्नर्स के शामिल होने से भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को 'वजन' मिलता नजर आया । हालाँकि यह देखने की बात होगी कि 'समय' पर कौन उनकी उम्मीदवारी के सचमुच काम आता है, लेकिन कई एक गवर्नर्स ने जिस उत्साह के साथ ललित खन्ना की और उनकी लीडरशिप क्वालिटी की प्रशंसा की, उससे उपस्थित लोगों के बीच ललित खन्ना की 'पहचान' का रंग कुछ गाढ़ा तो हुआ ही - और यह बात उनकी उम्मीदवारी के अभियान को सुदृढ़ तो करती नजर आई भी । ललित खन्ना की उम्मीदवारी की नाव को पिछले दिनों कुछ हिचकोले खाने पड़े हैं, लेकिन क्लब के अधिष्ठापन समारोह को भव्यता तथा रोटेरियंस की व्यापक उपस्थिति के साथ आयोजित करके ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी की नाव को स्थिरता व मजबूती देने का जो काम किया है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को रोमांचक बना दिया है । 

Tuesday, June 18, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक जैन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी छोड़ने से पूर्व गवर्नर्स रमेश अग्रवाल और शरत जैन का समर्थन ललित खन्ना को मिलने की संभावना बनी, जिसके चलते ललित खन्ना की उम्मीदवारी को बड़ा फायदा मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के अशोक जैन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी से पीछे हटने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी समीकरणों में खासा उलटफेर होता नजर आ रहा है, जिसके चलते ललित खन्ना की उम्मीदवारी को खासा फायदा होता देखा/पहचाना जा रहा है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के साथ अभी तक एक सबसे बड़ी समस्या यह थी कि डिस्ट्रिक्ट के सक्रिय नेताओं में उन्हें किसी नेता का समर्थन प्राप्त नहीं था, और इसे उनकी उम्मीदवारी की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव यूँ तो उम्मीदवारों के बीच ही होता है, लेकिन वास्तव में वह डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स नेताओं की खेमेबाजी से नियंत्रित होता है; और इसीलिए उम्मीदवारों की ताकत व कमजोरी का आकलन उन्हें मिलने वाले नेताओं के समर्थन के आधार पर किया जाता है । हालाँकि चुनावी राजनीति को नजदीक व गहराई से देखने/समझने वाले रोटेरियंस कहते/बताते हैं कि नेताओं का समर्थन वास्तव में किसी काम नहीं आता है, और सारी 'लड़ाई' उम्मीदवार को खुद ही लड़नी पड़ती है । कई बार नेता लोग भी इस बात को अप्रत्यक्ष रूप से 'स्वीकार' कर लेते हैं । जैसे मौजूदा रोटरी वर्ष में मुकेश अरनेजा, रमेश अग्रवाल, दीपक गुप्ता के खुल्ले समर्थन के बावजूद अमित गुप्ता को जब बहुत ही कम वोट मिले, तो मुकेश अरनेजा ने अपने बचाव में सफाई दी कि जब उम्मीदवार में ही दम नहीं था, तो 'हम' ही क्या करते ? इस तरह मुकेश अरनेजा ने ही स्वीकार कर लिया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में नेताओं के भरोसे रहने वाले उम्मीदवार को नेताओं का समर्थन नहीं बचा सकता है, और उम्मीदवार में अपना दम होना जरूरी है ।
इसके बावजूद, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में - और/या रोटरी के किसी भी अन्य चुनाव में - नेताओं का समर्थन भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर उम्मीदवार के दम में दम पैदा करने का काम तो करता ही है । इसीलिए जल्दी से चुनावी मैदान छोड़ चुके अशोक जैन की उम्मीदवारी को - एक उम्मीदवार के रूप में अशोक जैन को कमजोर मानने के बावजूद - तवज्जो मिलती दिख रही थी । हर कोई मान रहा था कि अशोक जैन के लिए एक उम्मीदवार की भूमिका निभा पाना मुश्किल ही होगा, लेकिन दो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के समर्थन के चलते उनकी उम्मीदवारी तवज्जो पाने लगी थी । किंतु अशोक जैन की उम्मीदवारी जितने अचानक तरीके से आई थी, उतने ही अचानक तरीके से विदा भी हो गई । अशोक जैन की उम्मीदवारी को ललित खन्ना के लिए चुनौती व मुसीबत के रूप में देखा/पहचाना गया था । इसलिए अशोक जैन की उम्मीदवारी के वापस होने का फायदा भी उन्हें ही मिलता दिख रहा है । ललित खन्ना को सबसे बड़ा फायदा यह मिलता दिख रहा है कि रमेश अग्रवाल और शरत जैन के रूप में जो पूर्व गवर्नर्स नेता अशोक जैन की उम्मीदवारी का झंडा उठा रहे थे, वह अब ललित खन्ना की उम्मीदवारी का झंडा उठाने में अपना फायदा देखेंगे । रमेश अग्रवाल ने वास्तव में अशोक जैन को जबर्दस्ती उम्मीदवार बनाया/बनवाया ही इसलिए था, ताकि वह वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका पा सकें । 
रमेश अग्रवाल के लिए बदकिस्मती की बात यह है कि वह रोटरी में बड़ी भूमिका निभाना चाहते हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में उनकी विकट दुर्गति हुई पड़ी है और वह पूरी तरह अलग थलग पड़े हुए हैं । डिस्ट्रिक्ट में उनकी जो बुरी हालत है, उसका असर क्लब में उनकी 'हैसियत' पर भी पड़ने लगा है - और क्लब में उनकी मनमानियों पर सवाल उठने लगे हैं तथा उनका विरोध होने लगा है । अभी हाल ही में अपने क्लब में रमेश अग्रवाल को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है; दरअसल उसी फजीहत को देखते हुए रमेश अग्रवाल के भरोसे चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे अशोक जैन अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के लिए मजबूर हुए । कहा जाता है कि ईश्वर जब एक दरवाजा बंद करता है, तो दूसरा दरवाजा खोल भी देता है । रमेश अग्रवाल को ललित खन्ना की उम्मीदवारी के रूप में दूसरा दरवाजा खुला मिल गया है; और यह बात ललित खन्ना के लिए भी बोनस प्वाइंट बनी है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी को रमेश अग्रवाल का समर्थन मिलना एक आश्चर्य ही होगा - लेकिन आश्चर्य ही तो राजनीति में रोमांच पैदा करते हैं और उसमें नई नई संभावनाएँ बनाते हैं; इसीलिए तो माना/कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में आने का रमेश अग्रवाल को एक बड़ा फायदा यह मिलता दिख रहा है कि इसके जरिये उन्हें अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के नजदीक आने/रहने का मौका मिलेगा । दीपक गुप्ता को चूँकि ललित खन्ना के साथ/समर्थन में देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए रमेश अग्रवाल को लगता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी का समर्थन करने के जरिये वह दीपक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में तवज्जो पा सकेंगे; और पिछले दो वर्षों से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स द्वारा किनारे बैठाये गए वाली स्थिति से निजात पायेंगे । यह स्थिति नेताओं के समर्थन के मामले में कमजोरी का सामना कर रही ललित खन्ना की उम्मीदवारी को अचानक से बड़ी ताकत दे देती है ।

Monday, May 13, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में हापुड़ में हुए जोनल सेमीनार के 'डिजाईन' ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में रमेश अग्रवाल की उम्मीदों को झटका दिया और ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को महत्त्वपूर्ण बनाया

हापुड़ । हापुड़ में आयोजित हुए जोनल सेमीनार में ललित खन्ना को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किए जाने ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल और उनके समर्थन के भरोसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को लेकर हाँ और न के बीच फँसे अशोक जैन को भारी झटका दिया है । रमेश अग्रवाल और अशोक जैन के लिए दरअसल झटके की बात यह रही कि नेता बनने की कोशिश करते रहने वाले हापुड़ के जो दो/एक लोग रमेश अग्रवाल के घनघोर प्रशंसक के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं, वह जोनल सेमीनार में 'राग ललित' का आलाप लेते हुए देखे/सुने गए ।यह देख/सुन कर रमेश अग्रवाल और अशोक जैन को हापुड़ में अपनी राजनीतिक दुनिया बसने से पहले ही उजड़ती हुई लगी है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में हापुड़ क्षेत्र का महत्त्व बढ़ता जा रहा है; इसी महत्त्व को देखते हुए रमेश अग्रवाल हापुड़ में अपने प्रशंसक के भरोसे अशोक जैन के लिए समर्थन जुटाने की उम्मीद बाँधे हुए थे - लेकिन जोनल सेमीनार में ललित खन्ना को मिलती अहमियत देख कर रमेश अग्रवाल की उम्मीद नाउम्मीदी में बदल गई है । जोन 9 और जोन 10 के दसों क्लब्स द्वारा 'विजन ऑफ रोटरी' विषय पर आयोजित किए गए जोनल सेमीनार की खास बात यह रही कि इसमें हापुड़ क्षेत्र के सभी प्रमुख रोटेरियंस और पदाधिकारी मौजूद थे । गाजियाबाद और नोएडा को छोड़ कर उत्तर प्रदेश के बाकी सभी क्लब्स का प्रतिनिधित्व करने वाले मौजूदा रोटरी वर्ष तथा आगामी रोटरी वर्ष के सभी पदाधिकारी इस जोनल सेमीनार के हिस्सा थे । क्षेत्र से बाहर के सिर्फ एक ही रोटेरियन की इस सेमीनार में मौजूदगी थी - और वह एक रोटेरियन ललित खन्ना थे । क्षेत्र के बाहर से अकेले रोटेरियन होने के नाते ललित खन्ना को आयोजन में खास अहमियत मिली । 
ललित खन्ना चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार हैं, इसलिए हापुड़ में हुए जोनल सेमीनार में उन्हें मिलने वाली अहमियत का एक राजनीतिक संदेश भी है - और यही संदेश रमेश अग्रवाल व अशोक जैन के लिए मुसीबत खड़ी करने वाला है । रमेश अग्रवाल और अशोक जैन के लिए मुसीबत की बात यह है कि रमेश अग्रवाल ने जब से अशोक जैन को बहका/फुसला/भड़का कर और न जाने कौन से सब्जबाग दिखा कर जबर्दस्ती डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए राजी किया है, तभी से रमेश अग्रवाल और अशोक जैन लगातार मुश्किलों में फँसे हैं । उनके अपने क्लब में उनके खिलाफ ऐसा बड़ा झमेला खड़ा हुआ है, जिसके प्रकोप से वह अभी तक पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाए हैं । रमेश अग्रवाल ने गाजियाबाद के पूर्व, मौजूदा और भावी गवर्नर्स के साथ ऐसा झगड़ा कर रखा है कि उत्तर प्रदेश के क्लब्स में अशोक जैन के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर पाना रमेश अग्रवाल के लिए बड़ी चुनौती है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता ने डीआरएफसी बनने की रमेश अग्रवाल की कोशिश को जिस 'बेरहमी' से झटका दिया है, उसे देखते हुए इनके रमेश अग्रवाल के आगे किसी काम आ सकने की कोई संभावना नहीं ही दिखती है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेट अशोक अग्रवाल को इसी वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में हरवाने की रमेश अग्रवाल ने जिस तरह की कोशिशें की थीं, उन्हें देखते हुए उनके लिए अशोक जैन के लिए अशोक अग्रवाल का समर्थन जुटा पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही होगा । ऐसे में, रमेश अग्रवाल को नेता बनने की कोशिश में इधर से उधर डोलते रहने वाले अपने गिनती के प्रशंसकों से ही उम्मीद थी कि वह अशोक जैन की उम्मीदवारी के लिए कुछ करेंगे; लेकिन उनकी इस उम्मीद को हापुड़ क्षेत्र में ललित खन्ना ने झटका दे दिया है । 
गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि हापुड़ क्षेत्र में हुए जिस जोनल सेमीनार में ललित खन्ना को अहमियत मिली, उस तरह के जोनल सेमीनार डिस्ट्रिक्ट में इससे पहले कभी होते हुए नहीं सुने/देखे गए हैं । संभवतः पहली बार एक क्षेत्र में पड़ने वाले डिस्ट्रिक्ट के दो जोन्स के क्लब्स के पदाधिकारियों ने मिलकर 'विजन ऑफ रोटरी' जैसे गंभीर विषय पर सेमीनार किया और संभवतः पहली ही बार ऐसा हुआ है कि क्षेत्र के सभी क्लब्स के महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी और सदस्य एक कार्यक्रम में जुटे और संभवतः पहली ही बार ऐसा हुआ कि इतने महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट के किसी 'बड़े' पदाधिकारी और/या नेता को आमंत्रित नहीं किया गया और 'अपने' लोगों के बीच बातचीत के जरिये ही रोटरी के विजन को रेखांकित करने और समझने की कोशिश की गई । इस तरह हापुड़ में हुए जोनल सेमीनार का वास्तव में एक अलग ही डिजाईन बना । ऐसे कार्यक्रम में क्षेत्र से बाहर से एक अकेले ललित खन्ना को आमंत्रित किए जाने से कार्यक्रम ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को एक राजनीतिक संदेश भी दे दिया है । इस राजनीतिक संदेश ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को महत्त्वपूर्ण बना दिया है ।

Wednesday, April 24, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल ने अशोक जैन के साथ मिल कर अपने ही क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट राकेश जैन को 'धमकाने' तथा दबाव में लेने के लिए उन्हें प्रेसीडेंट न बनने देने की मुहिम शुरू की

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल ने अपने ही क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली अशोका - के एक बड़े प्रोजेक्ट को विवाद व खतरे में डालने के बाद क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट राकेश जैन को पद से हटाने की मुहिम छेड़ दी है । इस मुहिम में उन्हें अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी की तैयारी करते सुने जा रहे क्लब के वरिष्ठ सदस्य अशोक जैन का भी समर्थन मिल रहा है । दरअसल रमेश अग्रवाल और अशोक जैन की जोड़ी को लग रहा है कि 'रोटरी हेल्थ एंड वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर' नाम से एक बड़े प्रोजेक्ट की आधारशिला रखने के कार्यक्रम को लेकर जो बखेड़ा खड़ा हुआ है, उसके पीछे राकेश जैन ही हैं; और राकेश जैन यदि अगले रोटरी वर्ष में क्लब के प्रेसीडेंट बनते हैं तो अशोक जैन की उम्मीदवारी के लिए वह तरह तरह से मुसीबतें खड़ी करते रहेंगे - इसलिए किसी भी तरह से ऐसा कुछ करना है जिससे प्रेसीडेंट की कुर्सी की तरफ राकेश जैन के बढ़ते कदमों को रोका जाए । उल्लेखनीय है कि राकेश जैन कई लोगों के बीच यह शिकायत कर चुके हैं कि वह प्रेसीडेंट इलेक्ट हैं, उन्हें अगले रोटरी वर्ष में प्रेसीडेंट बनना है और फिर भी अशोक जैन ने इसकी कोई जरूरत ही नहीं समझी कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी की वह उन्हें सूचना भी दे दें - यह सूचना उन्हें क्लब के बाहर  के लोगों से मिली है । राकेश जैन ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि पेट्स (प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार) में अशोक जैन लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी की संभावना से लगातार इंकार कर रहे थे, और सुनील मल्होत्रा व ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए शुभकामनाएँ व्यक्त कर रहे थे - फिर अचानक से ऐसा क्या हुआ कि क्लब के पदाधिकारियों से बात किए बिना ही वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात करने/कहने लगे ?
क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट राकेश जैन की इन बातों को गंभीरता से लेने, जो गलती हुई उसे सुधारने तथा सभी कोआश्चर्य में डाल कर पलटी खाते हुए अचानक से प्रस्तुत की गई अपनी उम्मीदवारी से क्लब के पदाधिकारियों के बीच पैदा हुई नाराजगी को दूर करने की बजाये - अशोक जैन ने रमेश अग्रवाल के साथ मिलकर राकेश जैन को प्रेसीडेंट न बनने देने का जो बीड़ा उठाया है, उसने क्लब के सदस्यों के बीच खासी गर्मी पैदा कर दी है । क्लब के सदस्यों का ही बताना/कहना है कि राकेश जैन की जगह 'अपने' किसी आदमी को प्रेसीडेंट बनवाने की रमेश अग्रवाल व अशोक जैन की 'बातों' के पीछे वास्तव में राकेश जैन को दबाव में लेने की रणनीति है । इन दोनों को विश्वास है कि यह प्रेसीडेंट इलेक्ट को प्रेसीडेंट न बनने देने की बात करेंगे, तो राकेश जैन अपना प्रेसीडेंट पद बचाने के लिए इनके सामने समर्पण कर देंगे । हालाँकि राकेश जैन की तरफ से अभी तक ऐसा कोई काम नहीं हुआ है, जिसे रमेश अग्रवाल के विरोध के रूप में देखा/पहचाना जाए; लेकिन राकेश जैन ने अपने कार्य-व्यवहार और अपने तरीकों से यह अहसास जरूर करवा दिया है कि वह रमेश अग्रवाल की कठपुतली बन कर नहीं रहेंगे । इंकार करते करते अचानक से प्रस्तुत हो गई अशोक जैन की उम्मीदवारी और उस फैसले से प्रेसीडेंट इलेक्ट होने के बावजूद उन्हें अवगत न करवाए जाने से राकेश जैन को जो झटका लगा, उसे व्यक्त करके राकेश जैन ने यह जता भी दिया है कि उन्हें इग्नोर करने की कोशिशों को वह चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगे । राकेश जैन के इसी 'व्यवहार' ने रमेश अग्रवाल और अशोक जैन को भड़का दिया है, और वह राकेश जैन को प्रेसीडेंट इलेक्ट के पद से हटवाने की धमकी दे कर कर दबाव में लेने की कार्रवाई पर उतर आए हैं । 
दरअसल, इसी बीच क्लब में प्रोजेक्ट वाला विवाद पैदा हो गया, जिसने रमेश अग्रवाल के लिए खासी फजीहत वाली स्थिति पैदा कर दी । उक्त विवाद को होशियारी व शालीनता से हल करने की बजाये रमेश अग्रवाल ने जिस तरह की धमकीबाजी वाला 'रास्ता' अपनाया, उसमें अशोक जैन भी जुड़ गए । इन दोनों का यह भी मानना/समझना है कि उक्त विवाद की जड़ राकेश जैन ने ही रोपी है । प्रोजेक्ट वाले मामले में और अचानक तरीके से आई अशोक जैन की उम्मीदवारी के किस्से में राकेश जैन की भूमिका को रमेश अग्रवाल व अशोक जैन ने अपने लिए एक 'चुनौती' के रूप में देखा/पहचाना है और समझ लिया है कि राकेश जैन को वह एक कठपुतली की तरह से इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे - इसीलिए उन्होंने राकेश जैन को प्रेसीडेंट बनने से रोकने की मुहिम शुरू की है । क्लब के सदस्यों के अनुसार, रमेश अग्रवाल और अशोक जैन की राकेश जैन के खिलाफ शुरू की गई मुहिम को क्लब में समर्थन नहीं मिलेगा और इस मामले में उन्हें मुँहकी ही खानी पड़ेगी । क्लब में चार/पाँच सदस्य जरूर ऐसे हैं, जो रमेश अग्रवाल की बात का आँख बंद करके समर्थन करते हैं - लेकिन क्लब के अधिकतर सदस्य रमेश अग्रवाल की मनमानी व बदतमीजी को पसंद नहीं करते हैं और जरूरत पड़ने पर विरोध भी करते हैं । क्लब के सदस्यों का ही कहना/बताना है कि रमेश अग्रवाल और अशोक जैन भी इस बात को जानते/समझते हैं कि राकेश जैन को उनके पद से हटाने/हटवाने की उनकी मुहिम सफल नहीं होगी; लेकिन फिर भी वह मुहिम चला रहे हैं तो इसलिए ताकि वह राकेश जैन को अपने सामने 'समर्पण' के लिए मजबूर कर सकें । रमेश अग्रवाल और अशोक जैन की अपने ही क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम से यह आभास लेकिन जरूर मिलता है कि उनके क्लब में घमासान अभी जारी रहेगा ।