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Wednesday, January 13, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता की पुनर्प्रस्तुत उम्मीदवारी की आशंका से सत्ता खेमा अपने उम्मीदवार को लेकर असमंजस में

गाजियाबाद/नई दिल्ली । सुभाष जैन की बड़ी जीत से उत्साहित, उनकी जीत के सूत्रधारों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अगले उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी है - जो बार बार घूम फिर कर फिलहाल रवींद्र सिंह और ललित खन्ना पर टिक जा रही है । सुभाष जैन की उम्मीदवारी के संचालन में लगे कुछेक लोगों को लग रहा है कि इस बार के चुनाव में रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरिटेज के रवींद्र सिंह की जिस तरह की संलग्नता रही है, उसे देखते हुए रवींद्र सिंह ही उपर्युक्त उम्मीदवार होंगे - क्योंकि सुभाष जैन की उम्मीदवारी के एक अत्यंत सक्रिय समर्थक के रूप में रवींद्र सिंह का लोगों के बीच प्रभावी परिचय बन ही गया है, और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के तमाम समीकरणों को उन्होंने नजदीक से देख/समझ भी लिया है । सुभाष जैन की उम्मीदवारी के संचालन में लगे अन्य कुछेक लोग रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के वरिष्ठ सदस्य ललित खन्ना की बात कर रहे हैं - उन्हें लगता है कि ललित खन्ना को आगे करके मुकेश अरनेजा को उनके अपने क्लब में तथा सतीश सिंघल को नोएडा में एक साथ घेरा जा सकेगा । उल्लेखनीय है कि रवींद्र सिंह और ललित खन्ना पहले भी एक एक बार अपनी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर चुके हैं - रवींद्र सिंह ने दोस्ती निभाने के चक्कर में विनोद बंसल के पक्ष में अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लिया था; और ललित खन्ना नोमीनेटिंग कमेटी में नहीं चुने जाने के कारण चुनावी दौड़ से बाहर हो गए थे । इन दोनों के बारे में एक मजे की कॉमन बात यह भी है कि एक समय यह दोनों मुकेश अरनेजा के बड़े खास हुआ करते थे, लेकिन अब दोनों ही मुकेश अरनेजा के धुर विरोधी हैं । 
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अगले उम्मीदवार के रूप में सत्ता पक्ष के लोग भले ही रवींद्र सिंह और ललित खन्ना का नाम ले रहे हों, लेकिन इन दोनों ने अपनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर अभी तक कोई बहुत उत्सुकता नहीं दिखाई है । इसके बावजूद इनका नाम चर्चा में है, तो इसका कारण यह है कि इन्होंने अपनी उम्मीदवारी की संभावना से इंकार भी नहीं किया है । इनके नजदीकियों का कहना है कि अभी जल्दबाजी में यह कोई फैसला नहीं करना चाहते हैं, तथा 'देखो और इंतजार करो' की रणनीति अपनाते हुए अभी यह देखना चाहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनावी परिदृश्य किस रास्ते पर आगे बढ़ता है ? सत्ता खेमे के नेता दरअसल पहले दीपक गुप्ता के रवैये को देखना चाहते हैं : असल में हर किसी के सामने यह सवाल तो है, पर उसका कोई जबाव नहीं है कि दीपक गुप्ता फिर से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे या नहीं ? पहले लोगों को लग रहा था कि दीपक गुप्ता का जोश ठंडा पड़ गया है और वह दोबारा पचड़े में नहीं पड़ेंगे, किंतु दीपक गुप्ता की तरफ से लोगों को जो एसएमएस मिला है - उसका मिलना और उसकी भाषा से संकेत मिला है कि दीपक गुप्ता पिछली बार वाली गलती से सबक लेकर नए दमखम के साथ मैदान में उतर सकते हैं । इस संकेत ने सत्ता खेमे के नेताओं को सावधान किया है । वह भी मान रहे हैं कि दीपक गुप्ता ने यदि पिछली गलतियों को नहीं दोहराया तो अब की बार उनका मुकाबला करना आसान नहीं होगा । सत्ता खेमे के नेताओं को यह डर भी है कि दीपक गुप्ता ने जिस तैयारी के साथ यह चुनाव लड़ा था, उसे देखते हुए फिर से उनके उम्मीदवार होने पर हो सकता है कि सत्ता खेमे को कोई उम्मीदवार ही न मिले । इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए होने वाली अगली लड़ाई का समीकरण दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की संभावना और पिछली गलतियों के प्रति उनके रवैये पर निर्भर करेगा ।
सत्ता पक्ष के नेता और उनके संभावित उम्मीदवार इसीलिए अभी उम्मीदवारी को लेकर कोई स्पष्ट फैसला करने से बच रहे हैं । सत्ता पक्ष के नेताओं के सामने यह समझने/पहचानने की दुविधा भी है कि दीपक गुप्ता यदि सचमुच उम्मीदवार होते हैं, तो उन्हें अपना उम्मीदवार गाजियाबाद/उत्तरप्रदेश से चुनना चाहिए या दिल्ली से ? दीपक गुप्ता के उम्मीदवार न होने की स्थिति में तो उनके लिए मैदान साफ है - फिर तो कोई भी उम्मीदवार हो सकता । इस सारे झमेले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एकमात्र 'घोषित' उम्मीदवार मनोज लाम्बा के लिए हालात खासे मुश्किल हो गए हैं । रोटरी क्लब दिल्ली रिवरसाइड के मनोज लाम्बा को सतीश सिंघल के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । दीपक गुप्ता और सुभाष जैन के बीच हुए चुनाव में सबसे ज्यादा फजीहत सतीश सिंघल की ही हुई है - जिसके बाद सतीश सिंघल के भरोसे उम्मीदवारी प्रस्तुत करना मनोज लाम्बा के लिए आत्मघाती ही होगा । मनोज लाम्बा के नजदीकियों का कहना भी है कि सतीश सिंघल अपनी तमाम सक्रियता के बावजूद दीपक गुप्ता के समर्थन में कोई इजाफा कर पाने में जिस तरह से नाकाम रहे/दिखे हैं, उससे अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में मनोज लाम्बा के हौंसले पस्त पड़ते नजर आ रहे हैं । जाहिर है कि तमाम अगर-मगर के बीच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अगले उम्मीदवारों को लेकर मामला अभी उलझा हुआ है । हालाँकि उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही यह उलझन दूर हो जाएगी । सत्ता पक्ष में जिस तरह से रवींद्र सिंह और ललित खन्ना का नाम चला है, उससे लेकिन डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में हलचल जरूर मची है ।

Monday, January 11, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की सौदेबाजियाँ भी दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव नहीं जितवा सकीं

नई दिल्ली । ताज पैलेस होटल में आयोजित डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के दूसरे और अंतिम दिन के आखिरी 'प्रोग्राम' में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव का नतीजा घोषित करते हुए जब सुभाष जैन के जीतने का ऐलान हुआ, तो मुकेश अरनेजा और उनके संगी-साथियों के तो जैसे होश उड़ गए । दरअसल उन्होंने तो दीपक गुप्ता की चुनावी जीत का जश्न मनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । दीपक गुप्ता को पहनाने के लिए फूल-मालाएँ आ चुकीं थी - यह तय हो चुका था कि पहली बड़ी सी माला मुकेश अरनेजा, रूपक जैन और सतीश सिंघल मिल कर पहनायेंगे; और उसके बाद दूसरे लोग माला पहनायेंगे । माला पहनाने के साथ साथ लोगों का मुँह मीठा करवाने के लिए मिठाई आ चुकी थी । यह तय हो चुका था कि जीत का जुलूस ताज पैलेस होटल से शुरू होकर मयूर विहार स्थित होली डे इन पहुँचेगा, जहाँ फिर देर रात तक पार्टी होगी । इसके लिए होली डे इन में बुकिंग करा ली गई थी । मुकेश अरनेजा, सतीश सिंघल, दीपक गुप्ता व उनके अन्य कुछेक नजदीकी सुबह से जो कपड़े पहने हुए थे, उन्हें बदल कर नए सिरे से सूटेड-बूटेड होकर तैयार हो गए थे । किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर सुभाष जैन की जीत के चुनावी नतीजे ने उनकी सारी तैयारी पर पानी फेर दिया ।
मजे की बात यह रही कि दीपक गुप्ता की चुनावी जीत का भरोसा उनके समर्थकों को सतीश सिंघल की उस पड़ताल से हुआ, जिसे सतीश सिंघल ने वोट डालने वाले क्लब-अध्यक्षों से बात करके पूरा किया था । उल्लेखनीय है कि वोटिंग होने के बाद सतीश सिंघल ने कई एक क्लब-अध्यक्षों को फोन करके उनसे पूछा व इस बात की टोह ली कि उन्होंने किसे वोट दिया है । क्लब-अध्यक्षों से मिले फीडबैक के आधार पर सतीश सिंघल ने हिसाब जोड़ा और पाया कि दीपक गुप्ता को 67 से 72 के बीच वोट पड़े हैं । सतीश सिंघल के इस हिसाब से दीपक गुप्ता के समर्थकों का बम बम होना स्वाभाविक ही था । नतीजा घोषित होने से पहले दीपक गुप्ता के समर्थकों के बीच पैदा हुए जोश को देख कर कुछ समय के लिए तो सुभाष जैन के समर्थकों के बीच निराशा सी पैदा हुई, लेकिन जल्दी ही उन्हें आभास हो गया कि दीपक गुप्ता के समर्थकों के बीच दिख रहा यह जोश वास्तव में गलतफहमियों में तथा हवा में रहने की उनकी प्रवृत्ति का एक और सुबूत है । चुनावी नतीजा घोषित होने के साथ यह साबित भी हो गया । 
दीपक गुप्ता की चुनावी पराजय मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल जैसे उनके समर्थकों के गलतफहमी में तथा हवा में रहने का ही नतीजा है । एक नए उदाहरण से इसे समझा जा सकता है : दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में कॉन्करेंस जुटाने के उनके अभियान में जिन क्लब-अध्यक्षों ने उनकी 'उम्मीद' को पूरा नहीं किया, उनसे वह इस कदर नाराज हो गए कि एक डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम में उनमें से कुछेक ने उन्हें नमस्ते की; तो मुकेश अरनेजा ने उन्हें यह कह कर लताड़ा व अपमानित किया कि तुमने कॉन्करेंस तो दी नहीं, अब नमस्ते किस बात की ? मुकेश अरनेजा ने इस बात का जरा भी ख्याल नहीं रखा कि जिन क्लब-अध्यक्षों को वह लताड़ने व अपमानित करने का काम कर रहे हैं, उन्होंने कॉन्करेंस भले ही न दी हो - लेकिन उन्हें वोट देने के लिए तो राजी किया ही जा सकता है । मुकेश अरनेजा यदि यह कहते कि नमस्ते तो ठीक है, लेकिन इसके साथ आपका समर्थन भी चाहिए होगा ; तो क्लब-अध्यक्ष अपने आप को अपमानित न महसूस करते और दीपक गुप्ता के समर्थकों/वोटों की संख्या में इजाफा ही करते । लेकिन मुकेश अरनेजा का यह स्टाइल नहीं है । गलतफहमी में तथा हवा में रहने के चलते उन्होंने सोचा/माना तो यह था कि वह क्लब-अध्यक्षों से बदतमीजी करेंगे और उसके बाद भी वह क्लब-अध्यक्षों से वोट ले लेंगे । मुकेश अरनेजा ने अपने व्यवहार से अंतिम समय तक लोगों को इर्रिटेट करने का काम किया, जिसका बदला लोगों ने दीपक गुप्ता से लिया । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की गरिमा को छोड़ कर मुकेश अरनेजा चुनाव से पहले हुई क्रिडेंशियल कमेटी की मीटिंग में एक आम रोटेरियन की तरह शामिल हुए, जिसमें अपने बेफालतू के व बेहूदगे सवालों से मीटिंग का माहौल खराब करने का ही काम किया । वोट पड़ने के दौरान वोटिंग-स्थल के बाहर ऊपर जाती सीढ़ियों पर बैठ कर वोट डालने जाते व वोट डाल कर बाहर निकलते अध्यक्षों पर फब्तियाँ कसने का काम करके भी उन्होंने क्लब-अध्यक्षों को वास्तव में दीपक गुप्ता से दूर करने का ही काम किया ।   
दरअसल मुकेश अरनेजा ने जिस तरह की बेहूदगियों, बदतमीजियों व ओछी हरकतों से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम किया; तथा क्लब्स में तोड़-फोड़ मचाने व क्लब्स के पदाधिकारियों को आपस में लड़ाने के साथ-साथ सौदेबाजी का जाल फैला कर क्लब-अध्यक्षों को निशाना बनाया - उससे ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ माहौल बन गया था । मुकेश अरनेजा रूपी कोढ़ में सतीश सिंघल रूपी खाज ने मामला और खराब कर दिया । दीपक गुप्ता के पक्ष में वोट पक्के करने के लिए सतीश सिंघल जिस तरह अपने गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट-पदों को बेचने के लिए लोगों के घर घर घूमे, उसने रोटरी को तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा को तो कलंकित करने का काम किया ही, साथ ही लोगों को इर्रिटेट भी किया । सतीश सिंघल का जो रवैया रहा, उससे लग रहा है कि रोटरी को और डिस्ट्रिक्ट 3012 को एक दूसरा 'मुकेश अरनेजा' मिल गया है । नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ अपने क्लब की कॉन्करेंस दे/दिलवा कर, तथा दीपक गुप्ता के लिए वोट जुटाने में अपने को इन्वॉल्व करके सतीश सिंघल ने बता/जता/दिखा दिया कि रोटरी में 35 से अधिक वर्ष गुजारने/बिताने के बाद भी रोटरी के भाव व उसके उच्च आदर्शों को उन्होंने नहीं जाना/पहचाना है; तथा रोटरी उनके लिए हर तरह की सौदेबाजी करने का एक अड्डा भर है ।
मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की हर सौदेबाजी को लेकिन डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने फेल कर दिया और सुभाष जैन को एक अच्छे बहुमत से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव जितवा दिया । सुभाष जैन की जीत इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी जीत का साफ संदेश यह है कि डिस्ट्रिक्ट 3012 के लोगों को 'खरीद' कर चुनाव नहीं जीता सकता । डिस्ट्रिक्ट 3012 एक नया डिस्ट्रिक्ट है, इसलिए इस संदेश का और भी गहरा अर्थ व प्रभाव है । मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की सौदेबाजियों को नकार कर डिस्ट्रिक्ट 3012 के सदस्यों ने रोटरी में अपने डिस्ट्रिक्ट की पहचान व प्रतिष्ठा को बनाने/बचाने का भी काम किया है ।

Tuesday, January 5, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में क्लब्स के सदस्यों को एक दूसरे के खिलाफ भड़काने तथा उन्हें आपस में लड़वाने की मुकेश अरनेजा वाली रणनीति खुद अपना कर दीपक गुप्ता दोहरी मुसीबत में फँसे

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता के नजदीकी मुकेश अरनेजा के तौर-तरीकों को अपनाते हुए क्लब्स में झगड़े कराने के प्रयासों में जिस तरह की बातें कर रहे हैं, उनमें से कुछ के रिकॉर्ड पर आने की खबर से दीपक गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों के बीच खलबली मच गई है । हुआ यह कि दीपक गुप्ता के नजदीकी विभिन्न क्लब्स के सदस्यों को उनके पदाधिकारियों के खिलाफ पट्टी पढ़ाने की कोशिश में बेसिरपैर की तथा बदनामीभरी ऐसी ऐसी बातें कर रहे हैं, जिनसे क्लब्स के लोगों के बीच मनमुटाव पैदा हो तथा उनके बीच झगड़े हों । क्लब्स में झगड़े करवा कर अपना उल्लू सीधा करने की उनकी यह चाल लेकिन यह जान कर मुश्किल में पड़ गई कि फोन पर की गईं उनकी इस तरह की कुछेक बातें रिकॉर्ड कर ली गईं हैं । इससे लोगों के बीच यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि दीपक गुप्ता के नजदीकी दीपक गुप्ता की चुनावी पराजय को सामने देख कर क्लब्स के पदाधिकारियों को बदनाम करने तथा क्लब्स में झगड़े करवाने के घटिया स्तर तक पर उतर आए हैं । 
यह मुकेश अरनेजा की चुनावी राजनीति का ही नहीं, उनके सामान्य व्यवहार का बड़ा पुराना और घिसपिट चुका तरीका है - जिसमें सामने वाले को तरह तरह से बदनाम करने का प्रयास किया जाता है । मुकेश अरनेजा के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि इस तरीके को इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें हासिल कुछ नहीं हुआ, और उन्होंने बदनामियों का जो घोल दूसरों के लिए तैयार किया वह घोल उन्हीं पर चढ़ता रहा । दीपक गुप्ता के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा के हाल से दीपक गुप्ता ने लगता है कि कोई सबक नहीं सीखा है और बदनामी पाने वाले काम वह खुद भी करने लगे हैं । यह बात सामने आने के बाद दीपक गुप्ता के शुभचिंतकों को यह जान कर धक्का लगा है कि चुनावी हार को सामने देख कर दीपक गुप्ता और उनके नजदीकी इस कदर बदहवास हो गए हैं कि मुकेश अरनेजा के स्तर के घटियापने पर उतर आए हैं । दीपक गुप्ता के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का ही मानना और कहना है कि इस तरह की बातों व हरकतों से अपनी हार को तो वह जीत में नहीं ही बदल पायेंगे, अपनी साख व प्रतिष्ठा और हार के कारण लोगों के बीच पैदा होने वाली सहानुभूति को लेकिन वह जरूर खो देंगे । इन लोगों का दीपक गुप्ता के लिए सुझाव है कि सामने दिख रही अपनी चुनावी पराजय को उन्हें खिलाड़ी-भावना  के साथ स्वीकार करना चाहिए और गंभीरता के साथ अपने चुनाव अभियान में रह गई कमियों की पड़ताल करना चाहिए और उन्हें दूर करते हुए आगे के वर्षों में फिर प्रयास करना चाहिए । इस तरह के रिएक्शन से साबित हुआ कि क्लब्स के सदस्यों व पदाधिकारियों को भड़काने की रणनीति से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को दोतरफा नुकसान हुआ : पोल खुलने से एक तरफ तो लोगों के बीच नाराजगी पैदा हुई कि दीपक गुप्ता के नजदीकी उन्हें एक दूसरे से लड़ाने के प्रयास कर रहे हैं; और दूसरी तरफ उनके शुभचिंतक भी इस तरह की बातों से भड़के हैं तथा उनके खिलाफ होते नजर आ रहे हैं । 
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान के साथ मजेदार किस्म की बुरी बात यह हुई कि उसे डिस्ट्रिक्ट में लोगों का समर्थन तो नहीं ही मिला, टेक्नोलॉजी ने भी उसकी मदद नहीं की - उलटे बल्कि उनकी पोल ही खोली । रोटरी क्लब वैशाली की एक मीटिंग में क्लब के पदाधिकारियों की पदों के बदले अपना समर्थन 'बेचने' की स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड न हुई होती, तो यह सच्चाई कभी लोगों के सामने न आ पाती कि सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के पद बेच कर मुकेश अरनेजा - दीपक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाने का काम कर रहे हैं । इसी तरह, क्लब्स के सदस्यों व पदाधिकारियों को एक दूसरे के खिलाफ भड़का कर उन्हें आपस में लड़ाने की कोशिश करना दीपक गुप्ता के अभियान को भारी पड़ा है । इस प्रसंग ने दिखाया/जताया है कि सामने दिख रही हार ने दीपक गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों को बुरी तरह से हताश व निराश कर दिया है और अपनी हताशा/निराशा में वह क्लब्स के पदाधिकरियों को बदनाम करने की हद तक जा पहुँचे हैं । 

Tuesday, December 29, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में 'जितने क्लब उतने असिस्टेंट गवर्नर' बनाने का अभियान छेड़ा

नई दिल्ली/गाजियाबाद । सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के पदों का खजाना लुटा कर मुकेश अरनेजा जिस तरह से घर घर जाकर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने के अभियान में लगे हैं, उसके कारण चुनावी परिदृश्य खासा रोचक हो गया है । परिदृश्य रोचक होने का कारण यह है कि पिछले तीन दिनों में मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के 25-30 असिस्टेंट गवर्नर 'बना' दिए हैं । इस रफ्तार को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि जल्दी ही यह संख्या क्लब्स की संख्या जितनी हो जाएगी । इस तरह, मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल के गवर्नर-काल को रोटरी के इतिहास का एक ऐसा अनोखा वर्ष बनाने की तैयारी कर ली है, जिसमें 'जितने क्लब उतने ही असिस्टेंट गवर्नर' होंगे । उल्लेखनीय है कि सतीश सिंघल ने खुद यह घोषणा भी की हुई है कि अपने गवर्नर-काल में वह ऐसे ऐसे काम करेंगे, जैसे रोटरी के 110 वर्षों के इतिहास में कभी नहीं हुए होंगे । मुकेश अरनेजा ने लगता है कि ऐसे कामों की एक बानगी पेश कर दी है । इस तरीके को अपना कर मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में दी गई उस अंडरटेकिंग को भी ठेंगा दिखा दिया है, जिसमें उम्मीदवार और किसी भी डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी द्वारा चुनाव प्रचार से दूर रहने का वायदा किया गया है । 
मुकेश अरनेजा द्वारा असिस्टेंट गवर्नर का पद 'बाँटने' की कार्रवाई में लेकिन यह एक बुरी बात हुई कि असिस्टेंट गवर्नर 'बनने' वाले रोटेरियन असिस्टेंट गवर्नर 'बनने' का 'सुख' नहीं ले पाए : हुआ दरअसल यह कि असिस्टेंट गवर्नर बने एक रोटेरियन ने दूसरे क्लब के सक्रिय व प्रभावी रोटेरियन को फोन पर अपने असिस्टेंट गवर्नर बनने की बात बताते हुए उससे कहा कि 'मुझे बधाई दे'; जबाव में उसे लेकिन सुनने को मिला कि तू पहले मुझे बधाई दे, मैं तो कल ही असिस्टेंट गवर्नर 'बना' दिया गया था । उनका असिस्टेंट गवर्नर बनने का उत्साह और सुख कुछ ठंडा पड़ा, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए उन्होंने अन्य क्लब के प्रमुख व वरिष्ठ साथियों को फोन किया, जिनमें से कुछ तो असिस्टेंट गवर्नर 'बने' मिले - लेकिन कुछ ऐसे भी मिले जो असिस्टेंट गवर्नर नहीं बने थे । यह सुन/जान कर उन्हें कुछ संतोष मिला । लेकिन यह संतोष ज्यादा देर उनके पास रह नहीं पाया - क्योंकी असिस्टेंट गवर्नर नहीं बने रोटेरियंस ने दस-पंद्रह मिनट बाद ही पलट कर उन्हें फोन करके बताया कि उनकी अरनेजा जी से बात हुई है, और अरनेजा जी ने उनसे कहा है कि कल/परसों में वह उनके पास आते हैं और उन्हें असिस्टेंट गवर्नर बनाते हैं ।
इस समय जो चाहे वह सतीश सिंघल के गवर्नर-काल का असिस्टेंट गवर्नर 'बन' जाए - यह देख/जान कर असिस्टेंट गवर्नर बने रोटेरियंस का उत्साह ढेर हो गया है, और उन्हें लगने लगा है कि मुकेश अरनेजा उन्हें 'बिकाऊ' समझ रहे हैं और वास्तव में उन्हें उल्लू बना रहे हैं - इतने सब लोग सचमुच में कैसे असिस्टेंट गवर्नर बन पायेंगे ? इसके अलावा, मुकेश अरनेजा द्वारा पहले असिस्टेंट गवर्नर बनाए गए रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला का हश्र देख कर भी रोटेरियंस सावधान हुए हैं । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में कॉन्करेंस लेने के लिए मुकेश अरनेजा ने मनोज भदोला को असिस्टेंट गवर्नर बनाया था । क्लब की मीटिंग में भेद खुला कि असिस्टेंट गवर्नर 'बनने' के लिए मनोज भदोला ने कॉन्करेंस का सौदा किया है और इस तरह क्लब को बेच दिया है - जिसका नतीजा यह हुआ कि मनोज भदोला से न सिर्फ अध्यक्ष पद छीन लिया गया, बल्कि उन्हें क्लब से भी निकाल दिया गया । मुकेश अरनेजा लेकिन आश्वस्त हैं कि वह असिस्टेंट गवर्नर के काफी पद बेच लेंगे । यह देखना/जानना दिलचस्प होगा कि चुनाव का दिन आते आते वह सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के लिए कितने असिस्टेंट गवर्नर 'बना' लेते हैं ?

Sunday, December 27, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में कॉन्करेंस के मामले में संदेह का लाभ दीपक गुप्ता को देकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा की दोतरफा प्लानिंग को चौपट ही कर दिया

गाजियाबाद/नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव की घोषणा करके मुकेश अरनेजा के गेम प्लान को तो फेल किया ही, साथ ही घोषणा के साथ कॉन्करेंस का जो ब्यौरा दिया - उससे मुकेश अरनेजा के हाथ से उन्होंने एक बड़ा हथियार और छीन लिया है । रोटरी की राजनीति में मुकेश अरनेजा, जेके गौड़ को अपना चेला बताते रहे हैं; किंतु यहाँ जो होता हुआ दिखा है - उसमें चेला गुरु पर भारी पड़ता नजर आया है । चुनाव की घोषणा के साथ लोगों को जेके गौड़ का जो पत्र मिला है, उसमें बताया गया है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में 18 कॉन्करेंस मिलीं - जिनमें से 10 को वैध पाया गया, 4 को नियमों का पालन न होने के कारण अवैध घोषित किया गया, और 4 में नियमों का पालन न होने का संदेह देखा/पहचाना गया; लेकिन संदेह का लाभ दीपक गुप्ता को दिया गया । इस जानकारी ने मुकेश अरनेजा के हाथ से एक बड़ा हथियार छीनने का काम किया है । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा लगातार प्रचार करते रहे हैं कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुभाष जैन की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाने वाले फैसले और काम कर रहे हैं - लेकिन संदेह का लाभ दीपक गुप्ता को देकर जेके गौड़ ने एक झटके में मुकेश अरनेजा के उस प्रचार की हवा निकाल दी है । कॉन्करेंस के संबंध में संदेह का लाभ दीपक गुप्ता को देकर जेके गौड़ ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यही संदेश दिया है कि उन्होंने तो हमेशा ही रोटरी की मूल भावना और डिस्ट्रिक्ट के हितों का ध्यान रखते हुए ही फैसले किए हैं; इसी का ध्यान रखते हुए उन्होंने कॉन्करेंस के संदर्भ में दीपक गुप्ता को संदेह का लाभ दिया है । इससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में हमदर्दी जुटाने की मुकेश अरनेजा की कोशिशों को खासा तगड़ा वाला धक्का लगा है । 
मुकेश अरनेजा को यह समझने/पहचानने में देर नहीं लगी है कि जेके गौड़ उनके साथ एक ऊँची चाल खेल गए हैं; और इसीलिए वह कह भी रहे हैं कि कॉन्करेंस के संदर्भ में दीपक गुप्ता को संदेह का लाभ देकर जेके गौड़ ने वास्तव में सुभाष जैन को लाभ पहुँचाने का इंतजाम किया है । दीपक गुप्ता को संदेह का लाभ देकर जेके गौड़ ने चुनाव की जो घोषणा की है, उसने मुकेश अरनेजा को जिस तरह से बौखला दिया है उससे पता चलता है कि चुनाव की घोषणा से मुकेश अरनेजा का पूरा गेम-प्लान ही चौपट हो गया है - और अपना सारा खेल बिगड़ जाने के कारण ही मुकेश अरनेजा बुरी तरह बौखला गए हैं । मुकेश अरनेजा की बौखलाहट बता/जता/दिखा रही है कि मुकेश अरनेजा चुनाव चाहते ही नहीं थे, वह चाहते थे कि कॉन्करेंस रिजेक्ट हों और सुभाष जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी घोषित किया जाए । दरअसल चुनावी राजनीति की राह कोई सीधी/सपाट राह नहीं होती है, वह टेढ़ी-मेढ़ी ही होती है - जिससे सच्चाई को छिपाए रखने में मदद मिलती है; नेताओं पर सबसे गंभीर आरोप ही यह होता है कि वह चाह कुछ और रहे होते हैं, लेकिन कह कुछ और रहे होते हैं । कथनी और करनी में अंतर रख कर ही नेता अपनी राजनीति की दुकान चलाता है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के एक खिलाड़ी नेता के रूप में मुकेश अरनेजा भी यही कर रहे थे । सभी को 'दिख' तो यही रहा था कि मुकेश अरनेजा ने सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच चुनाव कराने के लिए जी-जान एक किया हुआ है; और इसी के लिए उन्होंने कॉन्करेंस जुटाने को लेकर दिन-रात अपने को काम में लगाया हुआ है । लेकिन चुनाव की घोषणा पर अपनी बौखलाहट प्रगट करके मुकेश अरनेजा ने खुद ही पोल खोल दी है कि वास्तव में वह चुनाव नहीं चाहते थे, चुनाव चाहने का वह सिर्फ दिखावा कर रहे थे ।  
मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का कहना है कि चुनाव की घोषणा से मुकेश अरनेजा को गहरा धक्का लगा है; क्योंकि वह यह उम्मीद कर रहे थे कि कॉन्करेंस को अवैध ठहरा कर जेके गौड़ नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी घोषित कर देंगे । मुकेश अरनेजा ने इसके बाद अपनी राजनीतिक चाल चलने की तैयारी की हुई थी । नजदीकियों के अनुसार, उनकी योजना थी कि कॉन्करेंस को अवैध ठहराने के फैसले को वह रोटरी इंटरनेशनल में चैलेंज करवाते तथा रोटरी इंटरनेशनल में जब तक इस चैलेंज पर फैसला होता, तब तक अगला रोटरी वर्ष शुरू हो गया होता और तब अगले रोटरी वर्ष के क्लब-अध्यक्षों के बीच काम करके वह दीपक गुप्ता की चुनावी नैय्या को पार लगवाते । मुकेश अरनेजा को दरअसल इस वर्ष के क्लब-अध्यक्षों से कोई उम्मीद नहीं रह गई है; इस वर्ष के क्लब-अध्यक्षों के प्रति बहुत ही खराब शब्दों व भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन्हें अक्सर ही सुना जाता है । दरअसल मुकेश अरनेजा ने यह भाँप लिया था कि इस वर्ष के क्लब-अध्यक्ष तो किसी भी तरह से उनके झाँसे में नहीं आयेंगे और इसीलिए इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को वह वीरेंद्र 'बॉबी' जैन व दीपक तलवार के बीच हुए चुनाव की तर्ज पर अगले रोटरी वर्ष में ले जाना चाहते थे । उल्लेखनीय है कि अशोक घोष के गवर्नर-काल में हुए उस चुनाव में दीपक तलवार विजयी घोषित हुए थे; जिसे वीरेंद्र 'बॉबी' जैन ने रोटरी इंटरनेशनल में चैलेंज किया था और फिर उन दोनों के बीच अगले रोटरी वर्ष में चुनाव हुआ, जिसमें वीरेंद्र 'बॉबी' जैन को जीत मिली थी । मुकेश अरनेजा भी चाहते थे कि इस वर्ष सुभाष जैन विजयी घोषित हो जाएँ, जिसे वह रोटरी इंटरनेशनल में चैलेंज करें और इस तरीके से वह इस वर्ष के चुनाव को अगले रोटरी वर्ष में ले जाएँ । उन्हें विश्वास था कि अगले रोटरी वर्ष में वह अवश्य ही दीपक गुप्ता को जितवा लेंगे । 
मुकेश अरनेजा ने इसके लिए दोतरफा तैयारी की : एक तरफ तो उन्होंने जानबूझ कर ऐसी फर्जी किस्म की कॉन्करेंस जुटाईं और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय को सौंपी, जिनके रिजेक्ट होने की पक्की गारंटी थी; और दूसरी तरफ उन्होंने यह प्रोपेगेंडा किया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय कॉन्करेंस देने वाले क्लब्स के पदाधिकरियों को धमका कर कॉन्करेंस वापस कराने तथा कॉन्करेंस को अवैध ठहराने का षड्यंत्र कर रहा है । इस बारे में उन्होंने मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता तक का नाम इस्तेमाल किया । मुकेश अरनेजा ने दावा किया कि उन्होंने जेके गौड़ की पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों से मनोज देसाई और सुशील गुप्ता को भी अवगत कराया है, और दोनों ने उन्हें आश्वस्त किया है कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में कोई पक्षपात नहीं होने देंगे । इस तरह मुकेश अरनेजा ने नीचे से ऊपर तक ऐसी पक्की व्यवस्था की थी कि कॉन्करेंस रिजेक्ट होंगी, और उन्हें लोगों की हमदर्दी भी मिलेगी और रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत करने को लेकर उन्हें लोगों का समर्थन भी मिलेगा - हमदर्दी और समर्थन अगले रोटरी वर्ष में होने वाले चुनाव में उनके काम आयेगा । जेके गौड़ ने लेकिन मुकेश अरनेजा की इस दोतरफा व्यवस्था को एक झटके में ध्वस्त कर दिया । मुकेश अरनेजा को सपने में भी यह ख्याल नहीं आया कि जेके गौड़ संदेह का लाभ दीपक गुप्ता को दे देंगे । जेके गौड़ ने दरअसल मुकेश अरनेजा की ही छड़ी से मुकेश अरनेजा को पीट दिया । मुकेश अरनेजा अब न तो यह कहने लायक रहे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ कोई पक्षपात कर रहे हैं, यानि उनका सारा प्रोपेगेंडा बैठ गया है; और दूसरी तरफ जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा को उन्हीं क्लब-अध्यक्षों के सामने भेजने का इंतजाम कर दिया, जिनके बारे में अभद्र और अशालीन किस्म के आरोप लगा कर मुकेश अरनेजा जिन्हें बदनाम और अपमानित करने लगे थे । 

Thursday, November 19, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन को चेलैंज करने के मामले में दीपक गुप्ता क्या एक बार फिर मुकेश अरनेजा के उकसावे में आकर अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों की सलाह को अनसुना करेंगे ?

गाजियाबाद । रोटरी क्लब गाजियाबाद में कई वरिष्ठ और प्रमुख सदस्यों के विरोध के कारण दीपक गुप्ता के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन को चेलैंज करने के फैसले को व्यवहार में लाना चुनौतीपूर्ण बन गया है । विरोध करने वाले इन वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों का कहना है कि उन्होंने दीपक गुप्ता को सलाह दी है कि लोगों का समर्थन प्राप्त करने के मामले में वह लगातार दूसरे वर्ष जिस तरह से असफल रहे हैं तथा जिस बड़े अंतर से असफल रहे हैं, उसके कारणों का उन्हें गहराई से विश्लेषण करना चाहिए; अपनी कमजोरियों को पहचानना चाहिए तथा ईमानदारी से उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए - और फिर उसके बाद उन्हें अपनी उम्मीदवारी के बारे में सोचना चाहिए । इन वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों ने दीपक गुप्ता को साफ साफ बता दिया है कि डिस्ट्रिक्ट में इस समय लोगों का जो मूड है, उसे देखते हुए चुनाव में जाने के फैसले में कोई अक्लमंदी नहीं है; नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले में सुंभाष जैन के साथ उनका जो अंतर रहा है, उसे देखते/समझते हुए कोई भी बता सकता है कि चुनाव में भी दीपक गुप्ता को असफलता ही हाथ लगेगी - और वह असफलता रोटरी की राजनीति के संदर्भ में दीपक गुप्ता के लिए ज्यादा बड़ी चोट होगी । कुछेक सदस्यों ने दीपक गुप्ता को आगाह किया है कि सुभाष जैन चूँकि गाजियाबाद/उत्तरप्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, इसलिए उनकी अधिकृत उम्मीदवारी को चेलैंज करने से उन्हें गाजियाबाद/उत्तरप्रदेश में आगे रोटरी से जुड़े रहने में मुश्किल होगी - दिल्ली का कोई उम्मीदवार होता, तो उसे चेलैंज करना एक अलग बात होती । इसी तथ्य का वास्ता देकर क्लब के कुछेक सदस्यों का तो यहाँ तक कहना है कि दीपक गुप्ता चुनाव में गए - तो उसमें मिली पराजय सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि क्लब के लिए भी बड़ी चोट होगी । दीपक गुप्ता के क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों का ही दो-टूक कहना है कि खुद अपनी और क्लब की साख व प्रतिष्ठा के लिए जरूरी है कि दीपक गुप्ता नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले के प्रति मैच्योर तरीके से सम्मान व्यक्त करें और उसे स्वीकार करें ।
दीपक गुप्ता ने अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों को हालाँकि यह भरोसा दिलाने का भरसक प्रयास किया है कि नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले से उनकी चुनावी स्थिति जितनी बुरी और कमजोर दिख रही है, वह वास्तव में उतनी बुरी और कमजोर है नहीं; तथा नोमीनेटिंग कमेटी के कुछेक सदस्यों ने उनके साथ यदि धोखा नहीं किया होता तो अधिकृत उम्मीदवार वही चुने जाते - और यदि नहीं भी चुने जाते, तो इतने बड़े अंतर से तो पीछे नहीं ही रहते ! दीपक गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह है कि उनकी इस थ्योरी पर उनके अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख लोगों को ही भरोसा नहीं हुआ है । इन्हीं वरिष्ठ व प्रमुख लोगों में से जिन कुछेक से इन पंक्तियों के लेखक की बात हो सकी है, उन सभी ने एक उल्लेखनीय बात यह बताई है कि नोमीनेटिंग कमेटी को जैसा जो फैसला आया है, उन्हें उसका पूरा आभास था और उन्होंने दीपक गुप्ता को इसे लेकर आगाह भी किया था; लेकिन दीपक गुप्ता ने उनकी बातों पर जरा सा भी गौर ही नहीं किया । इनका तर्क रहा कि दीपक गुप्ता की इस बात को यदि सच मान भी लिया जाए कि नोमीनेटिंग कमेटी के कुछेक सदस्यों ने उनके साथ धोखा किया है; तो उन्हें यह विचार तो करना ही चाहिए कि उन सदस्यों ने उनके साथ धोखा आखिर किया क्यों ? और इस बात की आखिर क्या गारंटी है कि आगे चुनाव में लोग उनके साथ एक बार फिर ऐसा ही धोखा नहीं करेंगे ? 
दीपक गुप्ता के क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों ने नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों से मिले धोखे की दीपक गुप्ता की थ्योरी को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ कहा है कि दीपक गुप्ता को समझना चाहिए कि उन्हें धोखा उन लोगों से नहीं मिला है जिन्होंने उनका साथ नहीं दिया; बल्कि धोखा उन्हें उन लोगों से मिला है जो उनके साथ हैं - और जिन्हें वह अपना समर्थक व सहयोगी मान रहे हैं । उनके समर्थक व उनके साथ सहयोग करने वाले लोगों ने सच्चाई को उनतक पहुँचने ही नहीं दिया और उनकी आँखों पर ऐसी पट्टी बाँध दी कि खुद दीपक गुप्ता को भी सच्चाई दिखना बंद हो गई । इससे भी ज्यादा बुरी बात यह हुई कि जिस किसी ने दीपक गुप्ता को सच्चाई दिखाने/बताने का प्रयास भी किया, दीपक गुप्ता उसे अपना दुश्मन मानने लगे । यही कारण रहा कि चुनाव से कुछ पहले तक दीपक गुप्ता अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख लोगों से पूरी तरह कट गए थे, और उन लोगों पर भरोसा कर रहे थे जो नोमीनेटिंग कमेटी में उन्हें ग्यारह में से आठ वोट तो पक्के तौर पर मिलने का दावा कर रहे थे । उनके यही समर्थक अभी भी दीपक गुप्ता के 'दुश्मन' बने हुए हैं । दीपक गुप्ता के क्लब के कुछेक सदस्यों ने ही बताया कि उन्हें कई लोगों से सुनने को मिला है कि उन्होंने तो मुकेश अरनेजा के फोन उठाना ही बंद कर दिया है । इसके बाद भी मुकेश अरनेजा यदि दीपक गुप्ता को चुनाव जितवाने का दावा कर रहे हैं, तो जाहिर है कि वह दीपक गुप्ता को उकसा कर सिर्फ अपनी राजनीति करने का मौका बना रहे हैं । दीपक गुप्ता के क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों ने इधर-उधर कई लोगों से शिकायत के अंदाज में कहा/बताया है कि दीपक गुप्ता को उन्होंने जब उनकी चुनावी स्थिति के बारे में बताया, तो उसके बाद दीपक गुप्ता ने उनसे बात करना ही बंद कर दिया था । 
दीपक गुप्ता ने लेकिन अब फिर अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों का दरवाजा खटखटाया है और उनसे मदद की गुहार लगाई है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात लेकिन यह हुई है कि उनके क्लब के हर उस सदस्य ने, जिनसे उन्होंने मदद माँगी है, उन्हें यही सलाह दी है कि उन्हें नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को स्वीकार कर लेना चाहिए तथा अगले वर्षों में अपनी चुनावी स्थिति को अनुकूल बनाने के लिए काम करना चाहिए । दीपक गुप्ता के क्लब के जिन कुछेक वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों से इन पंक्तियों के लेखक की बात हुई है, उनका कहना है कि उन्होंने दीपक गुप्ता को साफ साफ बता दिया है कि इस बार के चुनाव में अपनाए गए उनके तरीके तथा उनके व्यवहार ने - तथा उनके समर्थक नेताओं के रवैये ने उनको लोगों की पसंद से इतना दूर कर दिया है कि उस दूरी को जल्दी से व आसानी से पाटना संभव नहीं है; इसलिए चुनाव में जाने का उनका फैसला उनकी स्थिति को और खराब ही करेगा । कुछेक सदस्यों का तो यहाँ तक कहना है कि अभी जिन लोगों को उनकी हार के चलते उनसे हमदर्दी हुई भी है, चुनाव में जाने पर वह लोगों की उस हमदर्दी को भी खो देंगे । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि एक तरफ तो मुकेश अरनेजा उन्हें नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन को चेलैंज करने के लिए उकसा रहे हैं, और दूसरी तरफ उनके क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्य उन्हें नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले का सम्मान करने व उसे स्वीकार करने का सुझाव दे रहे हैं । दीपक गुप्ता के सामने समस्या यह खड़ी हुई है कि वह किसकी बात मानें : मुकेश अरनेजा के उकसावे में आने तथा अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख सदस्यों की सलाह को अनसुना करने का परिणाम उन्होंने एक बार देख लिया है - ऐसे में क्या एक बार फिर वह मुकेश अरनेजा की झूठी और बड़बोली पट्टी को अपनी आँखों पर बँधा रहने दें और अपने क्लब के वरिष्ठ व प्रमुख लोगों की सलाह को अनसुना कर दें ?

Monday, November 16, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर हुई सुभाष जैन की जीत की पार्टी में सतीश सिंघल क्या मुकेश अरनेजा की तरफ से जासूसी करने आए थे ?

गाजियाबाद । सुभाष जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मिली जीत की खुशी मनाने के उद्देश्य से हुई पार्टी में सतीश सिंघल की मौजूदगी पर वहाँ मौजूद लोगों को खासी हैरानी हुई, और अपनी अपनी हैरानी को प्रकट करने के लिए लोगों ने मजे मजे की बातें की तथा चुस्कियाँ लीं । यह इसलिए हुआ क्योंकि सतीश सिंघल को शुरू से ही सुभाष जैन की उम्मीदवारी के विरोध में देखा/पहचाना जा रहा था । उन्होंने सुभाष जैन की उम्मीदवारी के समर्थकों को तोड़ने तथा उन्हें पहले अशोक गर्ग तथा बाद में दीपक गुप्ता के समर्थन में लाने का हर संभव प्रयास किया था । मजे की बात हालाँकि यह भी थी कि सतीश सिंघल को सुभाष जैन से कोई खास शिकायत नहीं थी; और उन्होंने कई एक लोगों से कहा भी कि उन्हें तो रमेश अग्रवाल से बदला लेना है, और सुभाष जैन चूँकि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं इसलिए उन्हें सुभाष जैन का विरोध करना है । सुभाष जैन ने उन्हें अपने साथ/समर्थन में लाने के लिए काफी पापड़ बेले, लेकिन सतीश सिंघल उनके समर्थन में आने के लिए तैयार नहीं हुए । सुभाष जैन के नजदीकियों का कहना है कि उम्मीदवार के रूप में सुभाष जैन ने सबसे ज्यादा सतीश सिंघल पर ही 'काम' किया, लेकिन सतीश सिंघल ने उनके काम का कोई मान नहीं रखा । वही सतीश सिंघल लेकिन जीत का नतीजा आने के कुछ ही घंटों के भीतर हुई जीत की पार्टी में शामिल होने पहुँचे तो सुभाष जैन के समर्थकों को जैसे मजा लेने का मौका मिल गया । 
सुभाष जैन की जीत की पार्टी में सतीश सिंघल की उपस्थिति को लेकर पार्टी में मौजूद कई लोगों ने जहाँ मजे लिए, वहाँ कुछेक ने उनकी उपस्थिति को संदेह से भी देखा । पार्टी में सतीश सिंघल की उपस्थिति को संदेह से देखने वाले लोगों का कहना रहा कि यहाँ सतीश सिंघल कहीं सुभाष जैन की 'चुनावी ताकत' का अंदाजा करने तो नहीं आए हैं ? यह संदेह इसलिए भी पैदा हुआ क्योंकि जिस समय सुभाष जैन की जीत की पार्टी चल रही थी, ठीक उसी समय मुकेश अरनेजा के कुछेक नजदीकी आगे की राजनीति को लेकर माथापच्ची कर रहे थे । वह दो विकल्पों को लेकर आपस में उलझे हुए थे - कभी उन्हें लगता कि सुभाष जैन को अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने के नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को चेलैंज किया जाए और चुनाव की स्थितियाँ बनाई जाएँ; लेकिन कभी उन्हें लगता कि चुनाव में भी उन्हें हारना ही पड़ेगा, इसलिए बेहतर होगा कि चुनावी प्रक्रिया में बरती गई कुछेक अनियमितताओं का सहारा लेकर सुभाष जैन के चुने जाने के फैसले को निरस्त कराने की लड़ाई में उतरा जाए । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश में मुकेश अरनेजा को कुछ न कुछ करना जरूरी लग रहा है; और यह समझने की कोशिश में कि क्या किया जाए, मुकेश अरनेजा तथा उनके नजदीकियों ने कुछेक लोगों से बात भी की । मुकेश अरनेजा तथा उनके नजदीकियों की इस सक्रियता की पृष्ठभूमि में सुभाष जैन की जीत की पार्टी में सतीश सिंघल की उपस्थिति को लेकर संदेह बना । 
सतीश सिंघल को नजदीक से जानने/पहचानने वाले कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी कहना रहा कि रमेश अग्रवाल से निजी खुंदक रखने के चलते सतीश सिंघल ने मुकेश अरनेजा के साथ तार भले ही जोड़ लिए हों, लेकिन मुकेश अरनेजा की हर हरकत में वह शामिल नहीं हो सकते हैं । ऐसा इसलिए भी है क्योंकि मुकेश अरनेजा के नजदीकियों के बीच भी सतीश सिंघल की स्थिति विश्वसनीय नहीं रह गई है । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों ने दीपक गुप्ता की इस बुरी हार के लिए सतीश सिंघल की तरफ से मिले धोखे को जिम्मेदार ठहराया है । उनका आरोप है कि सतीश सिंघल ने उन्हें उल्लू बनाया : वह उन्हें दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का सहयोग व समर्थन करने का भरोसा तो देते रहे, लेकिन वास्तव में उनके लिए किया कुछ नहीं । इस तरह की बातों से लगता है कि सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच हुए चुनाव में सबसे ज्यादा फजीहत बेचारे सतीश सिंघल की ही हुई है । सुभाष जैन के समर्थक मानते/जानते और कहते हैं कि सतीश सिंघल ने दीपक गुप्ता का समर्थन किया; और दीपक गुप्ता के समर्थक उन पर धोखा करने का आरोप मढ़ते हैं । 
सतीश सिंघल के नजदीकियों का कहना है कि स्पष्ट फैसला न करने तथा ज्यादा चतुराई दिखाने के चक्कर में सतीश सिंघल ने अपनी ऐसी दशा बना ली है कि वह किसी का भी विश्वास नहीं जीत सके, और हर कोई उन्हें और उनकी भूमिका को संदेह से देखता है । उनकी यह दशा इसलिए भी बनी, क्योंकि उन्होंने नकारात्मक सोच रखी । वह वास्तव में न अशोक गर्ग के साथ थे, और न दीपक गुप्ता के साथ थे; वह इनके समर्थन में सिर्फ इस कारण से दिख रहे थे क्योंकि वह सुभाष जैन के खिलाफ थे - और सुभाष जैन के भी वह इसलिए खिलाफ थे क्योंकि उन्हें रमेश अग्रवाल से बदला लेना था । नजदीकियों के अनुसार ही, सतीश सिंघल को लेकिन जब समझ में आ गया कि उनके लिए सुभाष जैन के समर्थकों को तोड़ पाना संभव नहीं होगा, तो उन्होंने उस संबंध  में प्रयास करना ही छोड़ दिया । दीपक गुप्ता के समर्थक उनके खिलाफ दरअसल इसीलिए भड़के हुए हैं, क्योंकि उन्होंने सुभाष जैन के समर्थकों के बीच सेंध लगाने में कोई खास दिलचस्पी ली ही नहीं । सतीश सिंघल बेचारे उन्हें यह कैसे बताते कि वह दिलचस्पी तो खूब ले रहे हैं, लेकिन उनकी चल नहीं रही है; उनकी कोई सुन/मान नहीं रहा है । सतीश सिंघल अंत तक लेकिन दीपक गुप्ता के समर्थकों को दीपक गुप्ता के साथ बने रहने के लिए जरूर प्रोत्साहित करते रहे । सुभाष जैन के समर्थक कारण उन्हें अपने विरोध में मानते/देखते रहे । वास्तव में इसीलिए, सुभाष जैन की जीत की पार्टी में सतीश सिंघल को शामिल देख कर सुभाष जैन के समर्थकों को हैरानी हुई । इस हैरानी में हालाँकि उन्होंने मजे खूब लिए, और यह समझने की कोशिश कि सुभाष जैन को हरवाने की कोशिशों में जुटे रहने वाले सतीश सिंघल - सुभाष जैन की जीत की पार्टी में आखिर आए क्या करने थे ?

Thursday, November 5, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दिल्ली, सोनीपत व गाजियाबाद की मीटिंग से निराश हुए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को प्रवीन निगम की अचानक बढ़ी सक्रियता से और झटका लगा है

गाजियाबाद/नई दिल्ली । प्रवीन निगम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु गाजियाबाद में पिछले दो-तीन दिनों में जो चक्कर लगाए हैं, और अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में गाजियाबाद में मीटिंग करने का मौका बनाने का जो प्रयास किया है, उसने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को निराश व हताश करने का काम किया है । इसका कारण बनता भी है । प्रवीन निगम अपनी उम्मीदवारी को लेकर कभी भी इतने गंभीर नहीं दिखे हैं, जितने गंभीर वह पिछले दो-तीन दिनों में नजर आए हैं - और इन दिनों की अपनी सारी गंभीरता उन्होंने गाजियाबाद में ही उड़ेल दी है । प्रवीन निगम की इस गंभीरतापूर्ण सक्रियता पर लोगों का ध्यान इस कारण से और गया है, क्योंकि इन्हीं दिनों मुकेश अरनेजा को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रचार अभियान से पीछे हटते हुए देखा गया है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में हुई मीटिंग में तो मुकेश अरनेजा बहुत सक्रिय थे - सक्रिय क्या थे, पूरी मीटिंग की कमान उन्होंने ही संभाली हुई थी; किंतु उसके बाद सोनीपत व गाजियाबाद में हुई मीटिंग्स से वह पूरी तरह नदारत रहे । मुकेश अरनेजा चूँकि कुछ ही दिन पहले यह घोषणा कर चुके थे कि चुनावी प्रक्रिया में खुल कर भाग लेने को लेकर उनकी हुई शिकायत की उन्हें कोई परवाह नहीं है, और वह किसी से नहीं डरते हैं, और वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में खुलकर काम करते रहेंगे - इसलिए दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से मुकेश अरनेजा के अंतर्ध्यान होने का लोगों ने नोटिस लिया । लोगों के बीच चर्चा रही कि 'मैं किसी से नहीं डरता' का उद्घोष करने वाले मुकेश अरनेजा आखिर दीपक गुप्ता को बीच मँझदार में छोड़ कर कहाँ छिप गए हैं ? लोगों को पिछले तीन-चार दिनों में हुई इन दो 'घटनाओं' ने चकराया हुआ है - जिनमें दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से मुकेश अरनेजा के गायब होने के साथ साथ प्रवीन निगम के प्रचार अभियान में अचानक से गर्मी देखी गई । कुछ लोगों को यह महज एक संयोग दिख रहा है, तो कुछ लोग इसमें पर्दे के पीछे की राजनीति देख रहे हैं । 
दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से मुकेश अरनेजा के गायब होने को लेकर दीपक गुप्ता के समर्थक अलग अलग कारण बता रहे हैं - कोई कह रहा है कि मुकेश अरनेजा निजी व्यस्तता के चलते पिछले तीन-चार दिन रोटरी से छुट्टी पर रहे और इसलिए वह दीपक गुप्ता के आयोजनों में नजर नहीं आए; तो किसी ने बताया कि दीपक गुप्ता की दिल्ली की मीटिंग के फ्लॉप होने का ठीकरा जिस तरह मुकेश अरनेजा के सिर फोड़ा गया, उससे नाराज होकर मुकेश अरनेजा ने खुद को दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से दूर कर लिया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने/दिखाने हेतु दिल्ली में हुई मीटिंग में उपस्थिति तो अच्छी थी, लेकिन चुनावी मुकाबले में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाने वाले लोग वहाँ न के बराबर थे । यह देख कर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों का माथा ठनका । दिल्ली मीटिंग का सारा जिम्मा चूँकि मुकेश अरनेजा के पास था, इसलिए उन्हीं से पूछा गया कि जो लोग यहाँ दिख रहे हैं, क्या इन्हीं के भरोसे चुनाव जीता जायेगा ? चुनाव में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाने वाले लोगों की अनुपस्थिति से मुकेश अरनेजा खुद भी उखड़े हुए से थे, और ऐसे में इस तरह के सवालों ने उन्हें बुरी तरह बौखला दिया था । दिल्ली की मीटिंग में मुकेश अरनेजा ने जो बकवासबाजी  की, उसे उनकी बौखलाहट के नतीजे के रूप में ही देखा/पहचाना गया । मुकेश अरनेजा की बौखलाहटभरी बकवासबाजी की खबर डिस्ट्रिक्ट में फैली, तो दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के संदर्भ में मामला और खराब हुआ । इसी के बाद दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से सुझाव मिलता सुना गया कि मुकेश अरनेजा के कारण फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो रहा है - इसलिए दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान में उन्हें पीछे कर देना चाहिए । कुछेक लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा इसी सुझाव पर अमल करने के चलते दीपक गुप्ता की सोनीपत व गाजियाबाद की मीटिंग से दूर रहे; तो अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि उक्त सुझाव से नाराज होकर मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता की मीटिंग्स से खुद को दूर कर लिया । 
मुकेश अरनेजा की नाराजगी की बात को प्रवीन निगम की सक्रियता से बल मिला । कई लोगों को लगता है कि प्रवीन निगम की सक्रियता के पीछे मुकेश अरनेजा ही हैं । मजे की बात है कि अभी कुछ दिन पहले ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों ने दावा किया था कि प्रवीन निगम जल्दी ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे । प्रवीन निगम ने इस दावे पर सार्वजनिक रूप से गहरी नाराजगी व्यक्त की थी । दावा करने वाले लोगों का कहना था कि उन्हें मुकेश अरनेजा ने प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की वापसी के बारे में आश्वस्त किया था; लेकिन प्रवीन निगम का कहना था कि मुकेश अरनेजा उनके निरंतर संपर्क में हैं और मुकेश अरनेजा ने उनसे कभी भी उम्मीदवारी को वापस लेने के बारे में नहीं कहा है । प्रवीन निगम यह बात अलग अलग मौकों पर लोगों को बताते रहे हैं कि मुकेश अरनेजा अपनी कंपनी के झगड़े /लफड़े में उनकी प्रोफेशनल मदद ले रहे हैं, और इसके बदले में उन्हें उनकी उम्मीदवारी के बारे में सलाह-सुझाव देते रहते हैं । प्रवीन निगम ने कभी-कभार इस बात पर निराशा तो जाहिर की कि उन्हें मुकेश अरनेजा से जितनी मदद की उम्मीद थी, मुकेश अरनेजा से उन्हें उतनी मदद नहीं मिली है - लेकिन इस बात को लेकर प्रवीन निगम ने ज्यादा रोना/धोना नहीं मचाया । घटना-चक्र ने जो मोड़ लिया है, उससे कुछेक लोगों को यह भी लग रहा है कि प्रवीन निगम को मुकेश अरनेजा की तरफ से यह आश्वासन रहा होगा कि ऐन मौके पर वह उनके साथ आ जायेंगे । धोखेबाजी में मुकेश अरनेजा ने दरअसल इतना नाम कमाया हुआ है कि लोग विश्वास करते हैं कि मुकेश अरनेजा कुछ भी कर सकते हैं । प्रवीन निगम के नजदीकियों का कहना है कि मुकेश अरनेजा को भी वास्तव में समझ में आ गया है कि दीपक गुप्ता के लिए वह ज्यादा कुछ कर नहीं सकते हैं, इसलिए अब वह प्रवीन निगम पर दाँव लगाना चाहते हैं । दिल्ली में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग के फ्लॉप होने से मुकेश अरनेजा को सचमुच खासा तगड़ा वाला झटका लगा है, और इसके बाद ही मुकेश अरनेजा ने अपने आपको दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से दूर करना/दिखाना शुरू कर दिया है - जिससे कि दीपक गुप्ता की पराजय का ठीकरा उनके सिर पर न फूटे । वह कह सकेंगे कि दीपक गुप्ता ने उन्हें अपने अभियान से चूँकि अलग कर दिया, और सोनीपत व गाजियाबाद में हुई मीटिंग की योजना व तैयारी से उन्हें दूर रखा - इसलिए इन दोनों जगहों पर हुई मीटिंग्स भी बहुत खराब गईं । गाजियाबाद की मीटिंग का हाल इसलिए और बुरा हुआ क्योंकि  मीटिंग के लिए आमंत्रित किए गए कई एक क्लब-अध्यक्षों से तो फिर कहना पड़ा कि वह उनके कार्यक्रम में न आएँ । प्रवीन निगम के नजदीकियों के अनुसार, दीपक गुप्ता की तरफ से क्लब-अध्यक्षों का यह जो अपमान हुआ - उसके लिए मुकेश अरनेजा व दीपक गुप्ता के अभियान के बीच पैदा हुई तनातनी ही जिम्मेदार है । इस तनातनी से प्रवीन निगम और उनके समर्थक बम बम हैं - और इसकी प्रतिक्रिया में ही प्रवीन निगम ने अपनी सक्रियता अचानक से बढ़ा दी है । प्रवीन निगम की सक्रियता ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की बची-खुची उम्मीद को भी ग्रहण लगा दिया है ।

Friday, October 16, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में आलोक गुप्ता को इग्नोर करते हुए मुकेश अरनेजा ने अमित अग्रवाल की उम्मीदवारी की घोषणा करके दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान को भटकाने तथा उसे और पीछे धकेलने का काम किया है

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता के गवर्नर-काल में अमित अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनवाने/चुनवाने की घोषणा करके मौजूदा चुनावी माहौल को मनोरंजक बनाने का काम किया है । उल्लेखनीय है कि किसी भी चुनाव में कई रंग देखने को मिलते हैं - उनमें एक रंग मनोरंजन का भी होता है । नेताओं के बहुत से बयान, उनकी बहुत सी बातें, उनकी बहुत सी हरकतें - जो कही/होती तो बड़ी गंभीरता से हैं, लेकिन काम वह चुटकुले का करती हैं । जैसे मुकेश अरनेजा ने अमित अग्रवाल को लेकर जो कहा है, वह उन्होंने कोई मजाक में थोड़े ही कहा है; उन्होंने तो बड़ी गंभीरता से उक्त घोषणा की है - डिस्ट्रिक्ट में लोग लेकिन उसे चुटकुला समझ कर मजा ले रहे हैं । मजा इसलिए ले रहे हैं क्योंकि सभी लोग समझ रहे हैं कि अभी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी तो खतरे में पड़ी है और उनका जीत पाना ही मुश्किल दिख रहा है; मुकेश अरनेजा ने लेकिन उनके गवर्नर-काल की राजनीति के सपने देखने शुरू कर दिए हैं । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति जिन लोगों की हमदर्दी है, उनमें से ही कुछेक का कहना है कि मुकेश अरनेजा को इस तरह की जुमलेबाजी छोड़ कर इस समय दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की फिक्र करना चाहिए - और इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि दीपक गुप्ता की तमाम भागदौड़ तथा मेहनत के बावजूद उनकी उम्मीदवारी को समर्थन मिलता आखिर 'दिख' क्यों नहीं रहा है ? ऐसा क्यों है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी के जो समर्थक हैं, वह तो खुल कर सुभाष जैन की उम्मीदवारी की वकालत करते हुए नजर आ रहे हैं; जबकि दीपक गुप्ता के समर्थन में जो लोग बताए जा रहे हैं, वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की वकालत खुल कर करने से बचते हुए दिख रहे हैं ? दीपक गुप्ता ने कई लोगों को अपने साथ 'चलने' के लिए प्रेरित करने का प्रयास भी खूब किया, किंतु उनकी चुनावी संभावना में कहीं कोई उम्मीद न देखने के कारण कोई उनकी बातों में आता हुआ दिखा नहीं है । 
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को खुले तरफदारों/समर्थकों का जो टोटा पड़ा है, उसे दूर करने में उन्हें मुकेश अरनेजा से भी कोई मदद नहीं मिली है । लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि इस मामले में मुकेश अरनेजा ने उनकी मदद करने की कोशिश तो बहुत की, किंतु वह मदद दिलवा नहीं सके । डिस्ट्रिक्ट में जिन लोगों को मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के रूप में जाना/पहचाना जाता है, उन्होंने भी जिस तरह से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में सार्वजनिक रूप से सक्रिय होने से परहेज किया है - उससे लोगों के बीच यही संदेश जा रहा है कि उन्हें भी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में कोई दम नजर नहीं आ रहा है, और इसीलिए वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में 'दिखने' से बच रहे हैं । ऐसी स्थिति में, मुकेश अरनेजा यदि दीपक गुप्ता के तथाकथित गवर्नर-काल की चुनावी राजनीति का एजेंडा तय करने वाली बातें कर रहे हैं - तो लोग उसे 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' की तरह सुनते/देखते हुए मजा ही तो लेंगे न ! लोग यही कर रहे हैं । मजे की बात यह है कि मुकेश अरनेजा की इस जुमलेबाजी को खुद अमित अग्रवाल ने कोई बहुत उत्साह से नहीं लिया है । अपनी उम्मीदवारी की बातों में उन्हें बहुत संकोच के साथ प्रतिक्रिया देते हुए देखा/पाया गया है । कुछेक लोगों ने उन्हें मुकेश अरनेजा की बातों में आकर 'उड़ना' शुरू न कर देने की जो नसीहत दी, उस पर भी वह सकारात्मक प्रतिक्रिया ही देते सुने/पाए गए हैं । 
अमित अग्रवाल के लिए कई लोगों का सुझाव है कि जब भी उम्मीदवार बनो, स्थिति का खुद से आकलन करके बनना; मुकेश अरनेजा की बातों में आकर उम्मीदवार बने तो अशोक गर्ग व दीपक गुप्ता की दशा को प्राप्त होगे ! अशोक गर्ग को तो अभी समझ में आ गया है कि मुकेश अरनेजा की बातों में आकर उन्होंने कितनी बड़ी बेवकूफी की; दीपक गुप्ता को भी जल्दी ही समझ में आ जायेगा कि वह नाहक ही मुकेश अरनेजा के जाल में फँसे और उनके उकसाने में आ गए । मुकेश अरनेजा के भरोसे उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले दीपक गुप्ता को मुकेश अरनेजा से मदद कम मिल रही है, नुकसान ज्यादा हो रहा है । नुकसान भी दोतरफा हो रहा है : एक तरफ तो मुकेश अरनेजा की जो नकारात्मक छवि है, उसका नुकसान; और दूसरी तरफ उनकी बातों व हरकतों से होने वाला नुकसान । जैसे यह, अमित अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर मुकेश अरनेजा ने जो घोषणा की है - वह एक तरफ तो मजाक का विषय बनी है, और दूसरी तरफ दीपक गुप्ता के जो थोड़े से समर्थक हैं भी उनमें भी खटराग पैदा करने का कारण बनी है । मुकेश अरनेजा की यह घोषणा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के एक दूसरे समर्थक आलोक गुप्ता को झटका देने वाली घोषणा के रूप में भी देखी/पहचानी जा रही है । मजे की बात यह है कि आलोक गुप्ता को अमित अग्रवाल के मुकाबले मुकेश अरनेजा के ज्यादा नजदीक माना/पहचाना जाता है; और आलोक गुप्ता भी अगले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुक सुने जाते हैं । ऐसे में, हर किसी को हैरानी है कि मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता की बजाए अमित अग्रवाल की उम्मीदवारी की बात क्यों की ?
इस सवाल का जबाव खोजने में दो तथ्यों का ध्यान करना/रखना बहुत जरूरी है : एक यह कि अपनी उम्मीदवारी के चक्कर में आलोक गुप्ता एक बार मुकेश अरनेजा से धोखा खा चुके हैं; तथा दूसरा यह कि अमित अग्रवाल और आलोक गुप्ता के बीच परस्पर विरोध का - तगड़े वाले विरोध का संबंध है । उल्लेखनीय है कि तीन वर्ष पहले आलोक गुप्ता ने मुकेश अरनेजा के भरोसे ही अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, किंतु मुकेश अरनेजा से उन्हें धोखा ही मिला था - जिसके चलते उनके बीच एक बड़ी दूरी बन गईं थी । अपनी अपनी मजबूरियों के चलते पिछले कुछेक महीनों में दोनों ने अपने बीच की दूरी को पाटने के संकेत तो दिए हैं; किंतु अमित अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर की गई मुकेश अरनेजा की घोषणा ने उन संकेतों को संदेहास्पद बना दिया है । आलोक गुप्ता की एक समय अमित अग्रवाल से भी अच्छी पटती थी । अमित अग्रवाल पहले उन्हीं के क्लब में थे । खटपट होने पर बाद में अमित अग्रवाल ने अपना क्लब बना लिया था । उनके बीच की खटपट कितनी तल्ख थी, इसका पता तब चला जब तीन वर्ष पहले उम्मीदवार के रूप में आलोक गुप्ता को नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य के रूप में अमित अग्रवाल ने जीरो नंबर दिए । यानि उम्मीदवार के रूप में आलोक गुप्ता को मुकेश अरनेजा से तो धोखा मिला ही था, साथ ही अमित अग्रवाल से भी विरोध का बहुत तगड़ा वाला डोज मिला था । पिछले तीन वर्षों में उक्त तल्खी हालाँकि काफी घटी है - मुकेश अरनेजा के साथ तो आलोक गुप्ता के संबंध पहले जैसे होते 'दिखे' ही हैं और अमित अग्रवाल के दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के सेनापति होने के बावजूद आलोक गुप्ता भी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक बने हैं, तो माना जा रहा था कि पुरानी दुश्मनियों को छोड़ कर दोस्ती की नई इबारत लिखने का प्रयास हो रहा है । 
किंतु मुकेश अरनेजा द्वारा अमित अग्रवाल की उम्मीदवारी की घोषणा ने आलोक गुप्ता के पुराने जख्मों को कुरेदने का काम किया है । करीब तीन वर्ष बाद, अब जब मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता को इग्नोर करते हुए अमित अग्रवाल की उम्मीदवारी की घोषणा की है - तो लोगों के बीच सहसा सवाल भी पैदा हुआ है कि तीन वर्ष पहले अमित अग्रवाल ने आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति जिस तरह का घोर नकारात्मक रवैया दिखाया था, उसके प्रेरणा स्रोत कहीं मुकेश अरनेजा ही तो नहीं थे ? आलोक गुप्ता से अमित अग्रवाल की खटपट का फायदा उठाते हुए कहीं मुकेश अरनेजा ने ही तो अमित अग्रवाल के जरिए आलोक गुप्ता को निपटाने की भूमिका नहीं बनाई थी ? एक सवाल का जबाव मिलता नहीं है कि दूसरा सवाल खड़ा हो जाता है - मुकेश अरनेजा, अमित अग्रवाल व आलोक गुप्ता के संबंधों की पहेली को हल करने के लिए उठते सवालों के इस शोर में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की बात और पीछे चली गई है । दीपक गुप्ता को समर्थकों का वैसे ही टोटा है, उनके जो गिने-चुने समर्थक हैं भी उन्हें मुकेश अरनेजा ने अपनी फालतू की बयानबाजी से आपस में ऐसा उलझा दिया है कि वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को भूल कर अपनी अपनी उम्मीदवारी के बारे में हाँ/ना करने में उलझ गए हैं । इसी सब को देख कर लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा की बातें और हरकतें दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम ज्यादा कर रही हैं । 

Friday, August 7, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाने के बदले में मुकेश अरनेजा को लोगों से जो खरी-खोटी सुनने को मिल रही है उससे बचने के लिए उनके सारे फार्मूले, हथकंडे, टोटके फेल साबित हो रहे हैं

नई दिल्ली/गाजियाबाद । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाने के बाद मुकेश अरनेजा के और भी बुरे दिन शुरू हो गए हैं - क्योंकि लोगों ने अब उन्हें खुल कर तथा सामने सामने लताड़ना शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में अभी तक फिर भी लोग मुकेश अरनेजा का थोड़ा बहुत लिहाज किया करते थे और कम से कम उनके मुँह पर बुरा/भला कहने से बचते थे और यदि कोई कुछ कहता भी था तो थोड़ा संयत भाषा का प्रयोग करता था । लेकिन अब लगता है कि लिहाज का पर्दा पूरी तरह से हट गया है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा ने जिस तरह से उकसाया है, उससे मुकेश अरनेजा को दोहरी मार पड़ी है : दिल्ली में अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के समर्थन में जुड़े लोगों को इस बात की नाराजगी है कि मुकेश अरनेजा ने उन्हें धोखा दिया, गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश के लोग इस बात पर खफा हैं कि मुकेश अरनेजा उनके बीच फूट पैदा करके उन्हें आपस में लड़वाना चाहते हैं । हाल-फिलहाल में संपन्न हुए क्लब्स के अधिष्ठापन समारोहों में ऐसे बहुत से दृश्यों को देखा गया जिनमें कि लोग मुकेश अरनेजा को खूब खरी-खोटी सुना रहे हैं, और मुकेश अरनेजा के लिए जबाव देते तथा उनसे बचना मुश्किल हो रहा है, तथा वह सिर्फ बौखला कर रह जा रहे हैं । लोगों को मनाने के लिए मुकेश अरनेजा हालाँकि अपने सारे फार्मूले, हथकंडे, टोटके इस्तेमाल कर रहे हैं - लेकिन सब फेल साबित हो रहे हैं । मुकेश अरनेजा को ऐसी असहाय व निरुपाय स्थिति में इससे पहले कभी भी नहीं देखा गया है ।  
मुकेश अरनेजा की बदकिस्मती से टाइमिंग दरअसल उनके लिए बहुत गलत हो गई है । हाल ही में मुकेश अरनेजा अपनी कारस्तानियों के चलते पहले अपने भाई-भतीजों द्वारा कंपनी से भगाए गए और फिर अपने क्लब से निकाले गए । इन घटनाओं पर लोगों के बीच चर्चा अभी चल ही रही थी कि मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अशोक गर्ग को धोखा देने का किस्सा सामने आ गया । कई लोगों का मानना/कहना हालाँकि यह रहा है कि मुकेश अरनेजा ने अशोक गर्ग को कोई धोखा नहीं दिया है, और उन्होंने वास्तव में अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को मदद पहुँचाने के इरादे से ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसाया है । मुकेश अरनेजा की चाल है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को उकसा कर वह गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश के लोगों के बीच फूट डलवा देंगे और उन्हें आपस में लड़वा कर सुभाष जैन की स्थिति को कमजोर करके अशोक गर्ग को फायदा पहुँचवा देंगे । कई अन्य लोगों का लेकिन इस थ्योरी पर भरोसा नहीं भी है - उनका मानना/कहना है कि मुकेश अरनेजा की चाल भले ही अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाने के लिए हो, लेकिन उनकी चाल के क्रियान्वन ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को खासा बुरा झटका दिया है । अधिकतर लोगों का मानना/कहना है कि मुकेश अरनेजा वास्तव में किसी के साथ नहीं है, वह तो रोटरी और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपने आप को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए पहले अशोक गर्ग को इस्तेमाल कर रहे थे, और अब दीपक गुप्ता को इस्तेमाल करने लगे हैं । 
मुकेश अरनेजा के साथ कंपनी में और क्लब में जो हुआ, उसका जिक्र करते हुए यह भी कहा जा रहा है कि मुकेश अरनेजा की असली समस्या दरअसल यह है कि जिस चीज को वह अपनी चतुराई समझते हैं, वह उनकी मूरखता होती है - और वह मूरखता साबित भी होती है, लेकिन फिर भी वह कोई सबक नहीं सीखते हैं । कंपनी में और क्लब में उनकी जो भी हरकतें रही होंगी, उन्हें अंजाम देते हुए उन्हें सोचा तो यही होगा कि इन हरकतों से उनका रुतबा बढ़ेगा; किंतु नतीजा ठीक उलटा निकला । इससे मुकेश अरनेजा ने भले ही कोई सबक न लिया/सीखा हो, दूसरों को लेकिन यह खूब समझ में आ रहा है कि - जो मुकेश अरनेजा अपनी होशियारी, अपनी तरकीबों, अपने फार्मूलों से अपनी खुद की मदद नहीं कर पाए; और अपने क्लब में वर्षों से साथ रहे सदस्यों तथा कंपनी में अपने ही भाई-भतीजों द्वारा बाहर निकाल दिए गए; उन मुकेश अरनेजा की होशियारी, तरकीबें, फार्मूले दूसरों की भला क्या और कैसे मदद कर पायेंगे ? हमारे समाज में तो वैसे भी कहावत भी है और देखने में भी आता है कि जो गिर गया हो या पिट रहा हो तो हर कोई उसे अपनी तरफ से दो लात और लगा देने का प्रयास करता है । मुकेश अरनेजा के साथ दरअसल यही हुआ है । कंपनी से और क्लब से निकाले जाने की खबरों के सामने आने के बाद उनका इक़बाल, उनका ऑरा खत्म हो गया है - जिसका नतीजा यह हुआ है कि उनके प्रति लोगों के बीच जो लिहाज था, वह खत्म हो गया है और अब हर कोई उनके सामने सामने उनसे तू-तड़ाक करने के लिए प्रस्तुत हो गया है । डिस्ट्रिक्ट में जो लोग किसी से भी कभी कुछ कहते हुए सुने नहीं गए हैं और बड़े शरीफ समझे जाते हैं, और मुकेश अरनेजा के नजदीकी भी रहे हैं, वह लोग भी मुकेश अरनेजा से सीधे सीधे सवाल करने लगे हैं, और उन्हें लताड़ने लगे हैं । 
मुकेश अरनेजा से हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना/कहना है कि कंपनी में और क्लब में उनके साथ जो हुआ उसके कारण लोगों के बीच उनका इक़बाल और उनका ऑरा तो खत्म हुआ, लेकिन लोगों के बीच उनके प्रति सहानुभूति भी बनी; लोगों ने माना/समझा कि मुकेश अरनेजा ने जैसी जो कारस्तानियाँ की हैं उसका नतीजा उन्हें मिल गया है । किंतु लोगों ने जब मुकेश अरनेजा को दीपक गुप्ता को उम्मीदवारी के लिए उकसाते पाया, तो उनकी सहानुभूति विरोध में बदल गई और लोगों ने मुकेश अरनेजा को लताड़ना शुरू कर दिया । लोगों को यह बात खास तौर से बुरी लगी है कि चौतरफा मुसीबतों में घिरे मुकेश अरनेजा अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं, और उनके बीच फूट डाल कर तथा उन्हें आपस में एक-दूसरे के खिलाफ भिड़ाने का प्रयास कर रहे हैं । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता ने इस बार के चुनावी झमेले से जब अपने आपको अलग और दूर कर लिया था, उनके क्लब के पदाधिकारी लोगों को बता रहे थे कि दीपक गुप्ता ने इस बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से इंकार कर दिया है, और इसी इंकार के भरोसे दीपक गुप्ता के क्लब के पदाधिकारी सुभाष जैन की मीटिंग्स व पार्टियों में जा रहे थे और सुभाष जैन की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन व्यक्त कर रहे थे - तब मुकेश अरनेजा ने अचानक से दीपक गुप्ता को उम्मीदवारी के लिए उकसाना शुरू करके उनके लिए तो भारी समस्या खड़ी कर दी है । मुकेश अरनेजा के प्रति लोगों के बीच संगठित व मुखर हुए इस विरोध ने दीपक गुप्ता के सामने अजीब सा संकट खड़ा कर दिया है - मुकेश अरनेजा का जो समर्थन उनके लिए वरदान होना चाहिए था, वह अभिशाप बनता नजर आ रहा है ।

Monday, July 20, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी को मिल रहे व्यापक समर्थन को देख कर निराश/परेशान मुकेश अरनेजा ने गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की जो कोशिश शुरू की है, उससे अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान का बंटाधार होता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की खबरों ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को तगड़ा झटका दिया है । झटका इसलिए क्योंकि अभी तक अशोक गर्ग को मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है; लेकिन मुकेश अरनेजा अब यदि कोई और उम्मीदवार खोज रहे हैं - तो इसका मतलब है कि अशोक गर्ग में उन्होंने अपना विश्वास खो दिया है । अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा का बड़ा सहारा था - लेकिन अब इस सहारे के छिन जाने से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया है । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का कहना है कि मुकेश अरनेजा ने पाया/समझा है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह का समर्थन मिलता दिख रहा है, उसका मुकाबला करना अशोक गर्ग के बस की बात नहीं है; सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में अपने लिए समर्थन जुटाया है और इस समर्थन के भरोसे सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी पर बढ़त बना ली है - उससे मुकेश अरनेजा को यह भी लगा है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी का मुकाबला गाजियाबाद/नोएडा का कोई उम्मीदवार ही कर सकता है । इसीलिए वह गाजियाबाद/नोएडा में एक उपर्युक्त और समर्थ उम्मीदवार की तलाश में जुट गए हैं । मुकेश अरनेजा की तलाश का क्या नतीजा निकलता है और उनकी तलाश कहाँ/किस पर खत्म होती है, यह तो आगे पता चलेगा - उनकी इस तलाश ने लेकिन अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा संकट तो खड़ा कर ही दिया है । 
मुकेश अरनेजा की यह तलाश लेकिन कुछेक लोगों को मुकेश अरनेजा की चाल नजर आ रही है । उन्हें लग रहा है कि सुभाष जैन को खासतौर पर गाजियाबाद और आमतौर पर उत्तर प्रदेश में जो समर्थन मिल रहा है, उसे कमजोर करने के लिए उन्हें गाजियाबाद/नोएडा में एक उम्मीदवार 'पैदा' करना होगा - और इस फार्मूले से वह अशोक गर्ग की राह को आसान बना सकेंगे । मुकेश अरनेजा की इस 'चाल' को पहचानने का दावा करने वाले लोगों का कहना है कि तीन वर्ष पहले जेके गौड़ का रास्ता रोकने के लिए मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल के साथ मिल कर जिस तरह से आलोक गुप्ता का इस्तेमाल किया था, उसी तरह से अब वह सुभाष जैन का रास्ता रोकने के लिए गाजियाबाद/नोएडा में किसी को खोज रहे हैं । रंग बदलने की कला में गिरगिट को पीछे छोड़ते हुए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल बाद में जेके गौड़ की जीत का श्रेय लेने में भले ही कामयाब हो गए हों, लेकिन जेके गौड़ की उम्मीदवारी के साथ शुरू से जुड़े रहे लोगों को तो सच्चाई का पता है ही, दूसरे लोगों को भी जानकारी है कि इन दोनों ने कैसे कैसे जेके गौड़ को छकाया था । आलोक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल से मिले धोखे के कारण आज तक उन्हें माफ नहीं किया है । मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के साथ हुई धोखाधड़ी का सारा दोष रमेश अग्रवाल पर मढ़ कर आलोक गुप्ता से हालाँकि पुनः संबंध जोड़ लिए है - मुकेश अरनेजा में आलोक गुप्ता का भरोसा भी पुनः लौट आया है, यह यद्यपि अभी 'देखना' बाकी है । इस किस्से को जिन लोगों ने नजदीक से देखा है, वह उस अनुभव को याद करते बहुत ही विश्वास के साथ कहते हैं कि मुकेश अरनेजा गाजियाबाद/नोएडा में कोई उम्मीदवार नहीं, बल्कि 'बलि का बकरा' खोज रहे हैं - जिसका सहारा लेकर वह सुभाष जैन का शिकार कर सकें, और उन्हें कमजोर कर सकें । 
अब सच चाहें जो हो - मुकेश अरनेजा चाहें अशोक गर्ग की उम्मीदवारी की परफॉर्मेंस से निराश होकर वास्तव में एक ऐसा उम्मीदवार खोज रहे हों, जो सुभाष जैन को टक्कर दे सके; और या रणनीतिक चाल के रूप में 'बलि का बकरा' तलाश कर रहे हों - मुकेश अरनेजा की इस कार्रवाई से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए तो संकट खड़ा हो ही गया है । वह तो एक तर्क दिया जाता है न कि चाहे चाकू खरबूजे पर गिरे चाहे खरबूजा चाकू पर गिरे, कटना खरबूजे को ही है - उसी तर्ज पर मुकेश अरनेजा के किसी भी 'कारण' से किसी दूसरे उम्मीदवार की तलाश में जुटने का सीधा नुकसान अशोक गर्ग को ही होना है । यही हुआ भी है । अशोक गर्ग ने पिछले दिनों अपनी उम्मीदवारी के अभियान को जिस तरह से संयोजित किया था, उससे चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कई खिलाड़ी रोटेरियंस प्रभावित हुए थे और वह यह मानने/कहने लगे थे कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी का अभियान भले ही काफी बढ़त बनाए हुए दिख रहा हो, किंतु अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान से उसे कड़ी टक्कर मिलेगी । इस तरह की बातों से अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का मोमेंटम बढ़ रहा था - जिसे लेकिन मुकेश अरनेजा की नई हरकत ने धूल में मिला दिया है । पिछले दिनों मुकेश अरनेजा का नाम लेकर कुछेक नए उम्मीदवारों के नाम जिस तरह से चर्चा में आए, उससे एक उम्मीदवार के रूप में अभी तक हासिल की गई अशोक गर्ग की उपलब्धियों पर पानी फिर गया है । मुकेश अरनेजा की यह कार्रवाई यदि सचमुच अशोक गर्ग की स्थिति से निराश होने के कारण प्रेरित है, तब तो यह अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के लिए बड़ा झटका है ही; यह कार्रवाई मुकेश अरनेजा की यदि एक चाल है तो भी मुकेश अरनेजा की इस चाल ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी का कबाड़ा करने का ही काम किया है । 
उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा को एक बड़े चालबाज नेता/व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है - कुछेक लोग उनकी चालबाजियों के बड़े मुरीद भी हैं; किंतु यह तथ्य बहुत निराश करने वाला है कि अपनी तमाम चालबाजियों के बावजूद उन्हें अभी तक हासिल कुछ नहीं हुआ है - अपनी चालबाजियों के बावजूद वह अपने क्लब से, अपने परिवार से और अपने बिजनेस से खदेड़े ही गए हैं । क्लब में, परिवार में, बिजनेस पार्टनर्स में मनमुटाव होते ही हैं; मनमुटाव के कारण बँटवारे भी होते हैं - यह बड़ी स्वाभाविक सी स्थितियाँ हैं । मुकेश अरनेजा के अपने क्लब में, परिवार में और बिजनेस में झमेले रहे तो यह कोई बहुत बुरी बात नहीं है - यह स्वाभाविक सी बात है; पर जो बात स्वाभाविक नहीं है और बहुत बुरी है वह यह कि मुकेश अरनेजा हर जगह से खदेड़े गए हैं, भगाए गए हैं, निकाले गए हैं; और कहीं भी उनकी चालबाजी काम नहीं आई । इसी आधार पर माना जा रहा है कि मुकेश अरनेजा यदि सचमुच अशोक गर्ग की परफॉर्मेंस से निराश होकर किसी और उम्मीदवार की तलाश में जुटे हैं - तो सवाल यह है कि मुकेश अरनेजा जब अशोक गर्ग की उम्मीदवारी में दम नहीं भर सके तो किसी और उम्मीदवार को ही भला कैसे 'खड़ा' कर सकेंगे ? और यदि यह उनकी चाल है तो जैसे अभी तक मुकेश अरनेजा की हर चाल खुद उन्हें ही उल्टी पड़ी है, तो इस चाल के सीधी पड़ने की ही क्या गारंटी है - मुकेश अरनेजा अपनी चालबाजियों से जब अपने आप को न अपने क्लब में, न अपने परिवार में और न बिजनेस में बचा सके, तो दूसरे किसी को वह भला कैसे बचायेंगे ? जाहिर तौर पर मुकेश अरनेजा के गाजियाबाद/नोएडा में उम्मीदवार खोजने की खबरों ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सुगबुगाहट तो पैदा की है, लेकिन अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान का बंटाधार कर दिया है । 

Friday, July 10, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के बोर्ड सदस्यों द्वारा सर्वसम्मत फैसले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन को क्लब का अधिकृत उम्मीदवार घोषित करने तथा उनकी उम्मीदवारी को क्लब की इज्जत व प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लेने से चुनावी समीकरणों में उलटफेर होने की संभावना बढ़ी

गाजियाबाद । रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के बोर्ड ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी को जिस सहजता के साथ हरी झंडी दे दी है, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को हैरान किया है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को आशंका व उम्मीद थी कि क्लब में चूँकि सुभाष जैन के साथ-साथ योगेश गर्ग ने भी उम्मीदवारी का दावा ठोका हुआ है, इसलिए क्लब में उम्मीदवारी का निर्णय आराम से और जल्दी से तो नहीं ही हो पायेगा - और निर्णय लेने की प्रक्रिया में दोनों उम्मीदवारों व उनके समर्थकों की तरफ से क्लब में खूब पटाखेबाजी होगी । उम्मीदवारी के मुद्दे पर रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल में पटाखेबाजी व तमाशाबाजी होती देखने की प्रतीक्षा कर रहे लोगों को यह जानकर लेकिन भारी निराशा हुई है कि क्लब के लोगों ने दूसरों को मजा लेने का तथा क्लब की फजीहत करने का मौका नहीं दिया और बहुत ही मैच्योर तरीके से एक मुश्किल दिख रहा फैसला सहजता से ले लिया । इस फैसले से नहीं, बल्कि सौहार्दपूर्ण माहौल में फैसला होने से उन लोगों को तगड़ा झटका लगा है जो उम्मीद कर रहे थे कि उम्मीदवारी के फैसले को लेकर सुभाष जैन और योगेश गर्ग अपने अपने समर्थकों के साथ एक दूसरे पर कीचड़ उछालेंगे और तमाशाबाजी करेंगे - जिसमें उन्हें मजा लेने का मौका मिलेगा । डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों का कहना है कि उन्हें सचमुच उम्मीद नहीं थी कि सुभाष जैन और योगेश गर्ग के बीच उम्मीदवारी को लेकर चलती दिख रही होड़ इतनी आसानी से और क्लब के सदस्यों के बीच सौहार्द बनाए रखते हुए किसी नतीजे पर पहुँच सकेगी । रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल की डिस्ट्रिक्ट में एक खास पहचान रही है : क्लब के वरिष्ठ सदस्यों में कभी कभी खटपट सुनाई देती रही है, और उनके बीच एक-दूसरे के प्रति जाहिर होने वाली शिकायतें सार्वजनिक चर्चा का विषय भी बनी हैं - लेकिन अपने बीच की नाराजगियों और शिकायतों को क्लब के सदस्य बहुत ही गरिमापूर्ण तरीके से हल करते रहे हैं; और उन्होंने क्लब की साख व प्रतिष्ठा पर कभी आँच नहीं आने दी । इस बार का 'झगड़ा' लेकिन थोड़ा बड़ा और गंभीर था - और इसलिए ही दूसरे लोगों को लग रहा था कि क्लब के सदस्यों के लिए इस बार क्लब की साख व प्रतिष्ठा को बचा पाना मुश्किल ही होगा । लेकिन क्लब के सदस्यों ने दिखा दिया कि बात अगर क्लब की साख व प्रतिष्ठा को बचाने की होगी - तो उनके लिए कुछ भी करना मुश्किल नहीं होगा । 
उल्लेखनीय है कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी को हरी झंडी देने का फैसला क्लब की जिस बोर्ड मीटिंग में हुआ, उस बोर्ड मीटिंग में योगेश गर्ग के नजदीकी व समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले सदस्य भी थे, और उन्होंने योगेश गर्ग की उम्मीदवारी के लिए वकालत भी की - किंतु जब उन्हें लगा कि उनके तर्क कमजोर पड़ रहे हैं तो फिर उन्होंने सुभाष जैन के पक्ष में हामी भरने में भी देर नहीं लगाई । योगेश गर्ग के इन नजदीकियों और समर्थकों से भी ज्यादा मैच्योर रवैया क्लब के अध्यक्ष आशीष गर्ग ने दिखाया । आशीष गर्ग को सुभाष जैन के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; उनके बारे में यह भी प्रचलित है कि वह जो कहना/करना चाहते हैं उसे किसी की परवाह किए बिना दो-टूक ढंग से कह/कर देते हैं । इस 'ख्याति' के चलते आशंका यह व्यक्त की जा रही थी कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी को क्लियर कराने के लिए आशीष गर्ग कहीं ऐसा कुछ न कर बैठें जिससे झमेला खड़ा हो जाए । अपनी 'ख्याति' के विपरीत आशीष गर्ग ने लेकिन बहुत ही संयम का परिचय दिया और वह कोई पक्ष लेने से बचते हुए ही दिखे । योगेश गर्ग और सुभाष जैन के समर्थकों के इस संयमी और मैच्योर व्यवहार ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए क्लब में चल रही उम्मीदवारी की होड़ में सुभाष जैन को जितवाने या योगेश गर्ग को हरवाने का काम नहीं किया - बल्कि क्लब को और रोटरी को 'जितवाया' है । 
रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल की मौजूदा वर्ष की पहली बोर्ड मीटिंग में उम्मीदवारी के मुद्दे पर फैसला करना दरअसल इसलिए जरूरी हो गया था, क्योंकि पिछले रोटरी वर्ष की अंतिम बोर्ड मीटिंग में योगेश गर्ग ने क्लब की तत्कालीन अध्यक्ष स्वाति गुप्ता से इस बात पर अपनी नाराजगी दिखाई थी कि उन्हें उम्मीदवारी के जो आवेदन मिले - उससे क्लब के बोर्ड के सदस्यों को अवगत कराने का काम उन्होंने नहीं किया और इस तरह उन्होंने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया । स्वाति गुप्ता का कहना था कि उम्मीदवारी के जो दो आवेदन उन्हें मिले, वह चूँकि अगले रोटरी वर्ष के लिए थे - इसलिए उन्होंने उन पर कोई कार्रवाई करने की आवश्यकता नहीं समझी; और ऐसा करके उन्होंने यदि कोई गलती की है, तो इसे अनजाने में हुई गलती समझा जाए और इसके लिए वह माफी माँगती हैं । योगेश गर्ग ने उन्हें माफ तो कर दिया, लेकिन उन्हें यह सुझाव भी दिया कि अपना अध्यक्ष-काल पूरा होने पर वह अगले अध्यक्ष को उम्मीदवारी के दोनों आवेदन सौंपे और उस पर जल्दी कार्रवाई करने की सिफारिश करें । स्वाति गुप्ता ने 30 जून और या एक जुलाई को जब अध्यक्ष पद आशीष गर्ग को हस्तांतरित किया तो कवरिंग लैटर में योगेश गर्ग द्वारा दिए गए सुझावों को लिख दिया । आशीष गर्ग ने भी अध्यक्ष के रूप में पहला काम वह किया, जिसे करीब ढाई महीने तक न करने और लटकाये रखने के लिए योगेश गर्ग ने स्वाति गुप्ता से नाराजगी व्यक्त की थी । क्लब के बोर्ड के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में रोटरी इंटरनेशनल ने अपने संविधान के आर्टिकल 10 के सैक्शन 1, सैक्शन 2 और सैक्शन 3 में जो नियम प्रतिपादित किए हैं - उनका अक्षर-अक्षर पालन करते हुए रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के बोर्ड ने अपनी पहली मीटिंग में उम्मीदवारी के मुद्दे पर चर्चा की और एकमत से सुभाष जैन की उम्मीदवारी के पक्ष में फैसला किया । 
उम्मीदवारी पर चर्चा करने बैठे रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के बोर्ड सदस्यों के सामने प्रमुख रूप से दो सवाल थे : एक यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए क्लब की तरफ से उम्मीदवारी प्रस्तुत की जाए या नहीं; और दूसरा सवाल यह कि यदि क्लब की तरफ से उम्मीदवारी प्रस्तुत की जानी है तो किसकी उम्मीदवारी प्रस्तुत करें ? पहला सवाल दरअसल इसलिए चर्चा में लिया गया क्योंकि क्लब में भी और क्लब के बाहर के कुछेक लोगों के बीच भी यह चर्चा सुनी गई थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के चक्कर में क्लब में झगड़ा पैदा हो रहा है और क्लब की बदनामी हो रही है, इसलिए बेहतर यह होगा कि इस चक्कर से दूर ही रहा जाए । बोर्ड मीटिंग में हालाँकि किसी ने भी इस तर्क का समर्थन नहीं किया । सभी की रजामंदी इस बात को लेकर थी कि क्लब में जब दो दो वरिष्ठ सदस्य उम्मीदवारी प्रस्तुत कर रहे हैं, तब उम्मीदवारी से पीछे हटने में क्लब की ज्यादा बदनामी होगी । सभी ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि यह ठीक है कि उम्मीदवारी के चलते बहुत सी ऐसी अप्रिय बातें हो रही हैं तथा ऐसी समस्याएँ खड़ी हो रही हैं, जो क्लब की साख व प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं हैं - किंतु क्लब उन बातों और समस्याओं का सामना करने तथा आपस में मिलबैठ कर उन्हें हल करने की बजाये, उनसे बचने और मुँह छिपाने की कोशिश करेगा तो अपनी साख व प्रतिष्ठा को खोयेगा । बोर्ड मीटिंग में सभी ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि हम लोग भी और क्लब के दूसरे सदस्य भी मैच्योर लोग हैं और अपने झगड़ों को आपस में बातचीत करके हल कर सकते हैं; इसलिए जो भी झगड़े हैं उन्हें हल कर लेने का विश्वास रखते हुए क्लब को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाहिए । ऐसा करना इसलिए भी जरूरी समझा गया कि क्लब में झगड़े की बात फैला कर क्लब के बाहर के जो लोग क्लब को बदनाम कर रहे हैं, तथा क्लब को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की होड़ से बाहर करने का षड्यंत्र कर रहे हैं, उन्हें उचित जबाव दिया जा सके । 
क्लब की तरफ से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का फैसला तो आराम से हो गया, किंतु उम्मीदवारी योगेश गर्ग और सुभाष जैन में से किसकी प्रस्तुत हो - यह फैसला करना थोड़ा पेचीदा काम था । मीटिंग में मौजूद एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि उम्मीदवार को लेकर बातचीत जब शुरू हुई, तो माहौल में थोड़ी गर्मी पैदा हो गई थी । ऐसा लगा जैसे योगेश गर्ग और सुभाष जैन के समर्थक अपनी अपनी तरफ से पूरी तैयारी करके मीटिंग में आए थे । योगेश गर्ग के समर्थकों ने क्लब में और रोटरी में योगेश गर्ग के लंबे योगदान का हवाला देते हुए तर्क दिया कि डिस्ट्रिक्ट में योगेश गर्ग की बड़ी पहचान है, और डिस्ट्रिक्ट के कई बड़े नेताओं के साथ उनके अच्छे संबंध हैं - इसलिए उनकी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया जाना चाहिए । सुभाष जैन के समर्थकों का कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट में बेशक योगेश गर्ग की बड़ी पहचान है, लेकिन हाल-फिलहाल की उनकी गतिविधियों को देखें तो लगता है कि रोटरी में उन्हें जो कुछ करना था उसे वह कर चुके हैं तथा आगे रोटरी के लिए ज्यादा कुछ करने का उनमें पहले जैसा उत्साह बचा नहीं रह गया है, जबकि सुभाष जैन ने अपनी सक्रियता से यह दिखाया/जताया है कि उनमें रोटरी के लिए बहुत कुछ करने का हौंसला अभी बाकी है और क्लब उनमें अपना भविष्य देख/पा सकता है । इस बात के पक्ष में सुभाष जैन के रोटरी फाउंडेशन की ऑर्च क्लम्प सोसायटी के सदस्य बनने का जिक्र किया गया, जिसके लिए सुभाष जैन को इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की प्रशंसा तो मिली ही, साथ ही मनोज देसाई ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर सुभाष जैन को प्रमुखता से स्थान भी दिया और उनकी तस्वीर लगाई । इस पर योगेश गर्ग की वकालत करने वालों ने टिप्पणी की कि यह काम तो सुभाष जैन ने अपनी उम्मीदवारी की हवा बनाने के लिए किया; जिसका सुभाष जैन के समर्थकों ने तुरंत जबाव दिया कि यदि इसे सच भी मान लिया जाए, तो इसमें गलत क्या है ? 
सुभाष जैन के समर्थकों ने यह तथ्य भी बताया कि सुभाष जैन ने पिछले रोटरी वर्ष में जब अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं की थी, तब भी उन्होंने दो हजार डॉलर रोटरी फाउंडेशन में दिए थे और साथ ही घोषणा भी की थी कि क्लब को अपने लक्ष्य तक पहुँचने में कुछ कमी पड़ेगी, तो वह उस कमी को भी पूरा करेंगे । इसलिए यह कहना झूठा प्रचार है कि सुभाष जैन जो कर रहे हैं, वह सिर्फ अपनी उम्मीदवारी को ध्यान में रखकर कर रहे हैं । सुभाष जैन जब उम्मीदवार नहीं थे, तब भी वह रोटरी का 'काम' कर रहे थे; और जब उम्मीदवार बने, तब और जोरशोर से रोटरी का काम करने लगे । किसी भी उम्मीदवार को अपनी उम्मीदवारी की हवा बनाने के लिए बहुत कुछ करना ही होता है; कुछ करने वाले उम्मीदवार से बेहतर वह उम्मीदवार भला कैसे हो सकता है, जो उम्मीदवार बनने से पहले भी कुछ न कर रहा हो, और उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बाद अपनी उम्मीदवारी की हवा बनाने के लिए भी कुछ न कर रहा हो ? सुभाष जैन के समर्थकों की इस तरह की बातें सुनकर योगेश गर्ग के समर्थकों के हौंसले पस्त पड़ गए और उनसे कुछ कहते हुए नहीं बना । सुभाष जैन के समर्थकों ने इसके बाद जो तर्क दिया, उसे सुनकर तो योगेश गर्ग के समर्थक सुभाष जैन के समर्थक बन गए । सुभाष जैन के समर्थकों का कहना रहा कि योगेश गर्ग ने करीब ढाई महीने पहले अपनी उम्मीदवारी तो प्रस्तुत की है, किंतु अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु इन ढाई महीनों में उन्होंने किया कुछ नहीं है - इससे ऐसा लग रहा है कि जैसे वह अपनी उम्मीदवारी के प्रति जरा भी गंभीर नहीं हैं, और वह सिर्फ सुभाष जैन की उम्मीदवारी को बिगाड़ने के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात कर रहे हैं । योगेश गर्ग के समर्थक भी यह दावा नहीं कर सके कि योगेश गर्ग अपनी उम्मीदवारी के प्रति सचमुच गंभीर हैं; और इसके साथ ही योगेश गर्ग की उम्मीदवारी की वकालत किसी ने नहीं की और सुभाष जैन सर्वसम्मति से क्लब की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार घोषित कर दिए गए । सुभाष जैन को उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही बोर्ड सदस्यों ने यह फैसला भी किया कि अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन अकेले अपने दम पर अपना अभियान चला रहे थे, किंतु अब उनके अभियान में क्लब भी जुटेगा - क्योंकि उनकी उम्मीदवारी अब क्लब की इज्जत और प्रतिष्ठा का मुद्दा भी बन गई है ।  
सुभाष जैन की उम्मीदवारी पर क्लब के बोर्ड सदस्यों की सर्वसम्मत मोहर लगते ही, यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई । इसकी एक वजह यह भी रही कि रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के बोर्ड सदस्य जिस समय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए क्लब के अधिकृत उम्मीदवार के रूप में सुभाष जैन के नाम पर सर्वसम्मत सहमति दर्ज और घोषित कर रहे थे, ठीक उसी समय शहर के कई रोटेरियंस के साथ सुभाष जैन रोटरी क्लब गाजियाबाद के भजन संध्या कार्यक्रम में थे - और वहीं उन्हें अपने अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने की सूचना मिली, और उनसे दूसरे लोगों को जानकारी मिली । सुभाष जैन के इतनी आसानी से क्लब के सर्वसम्मत उम्मीदवार बन जाने से दूसरे उम्मीदवारों की उम्मीदों को खासा तगड़ा झटका लगा है, और उन्हें अपनी चुनावी रणनीति नए सिरे से बनाने की जरूरत महसूस हुई है । सुभाष जैन की उम्मीदवारी को रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के बोर्ड सदस्यों ने जिस तरह अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है और घोषित कर दिया है, उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के समीकरणों में काफी उलटफेर देखने को मिल सकता है ।

Tuesday, July 7, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 की डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में अपने आप को उचित जगह पर न पाकर गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख रोटेरियंस अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं; अमित अग्रवाल का मामला तो जेके गौड़ का अवसरवादी रूप सामने लाया

गाजियाबाद । जेके गौड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालते ही खास तौर पर गाजियाबाद और आमतौर पर उत्तर प्रदेश के रोटेरियंस को अपना असली 'रूप' दिखाने का जो काम किया है, उससे गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश के लोगों में भारी नाराजगी के स्वर तो पैदा हुए ही हैं - पर सबसे क्लासिक केस रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लेटिनम के वरिष्ठ सदस्य अमित अग्रवाल का सामने आया है । उल्लेखनीय है कि अमित अग्रवाल - उम्मीदवार जेके गौड़ के सबसे बड़े समर्थक थे, और नोमीनेटिंग कमेटी में उनकी भूमिका को जेके गौड़ की जीत में एक बड़े प्रेरक व कारण के रूप में अभी तक देखा जा रहा है । इस नाते से उम्मीद की जा रही थी कि जेके गौड़ जब गवर्नर बनेंगे, तब वह अमित अग्रवाल को अवश्य ही एक बड़ा और महत्वपूर्ण पद सौपेंगे । लेकिन अभी जब डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी सामने आई तो लोग यह देख कर हैरान रह गए कि अमित अग्रवाल को रोटरी वॉलंटियर्स जैसा मामूली पद देकर टरका दिया गया है । इसके अलावा जेके गौड़ ने उन्हें जोनल स्तर का एक पद और भी दिया है । अमित अग्रवाल के साथ किए गए जेके गौड़ के इस सुलूक की जिसे भी जानकारी मिली, उसे खासा तगड़ा झटका लगा । जो लोग जेके गौड़ को बहुत ही घटिया सोच व व्यवहार का व्यक्ति मानते हैं और उन्हें अवसरवादी बताते हैं, उनका भी कहना है कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अमित अग्रवाल के साथ जेके गौड़ इस तरह का 'व्यवहार' करेंगे । अमित अग्रवाल लेकिन थोड़ा खुशकिस्मत भी हैं, क्योंकि इस मौके पर जब गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के रोटेरियंस उनके प्रति हमदर्दी व्यक्त कर रहे हैं - उन्हें उन आलोक गुप्ता की सहानुभूति भी मिल रही है, जेके गौड़ के बरक्स जिनकी उम्मीदवारी को जीरो करने का उन्होंने अदम्य रवैया अपनाया था । 
यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि जेके गौड़ ने जब अपनी टीम बनाना शुरू ही किया था, तब अमित अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट मीट की चेयर मिलने की चर्चा सुनी गई थी; लेकिन बाद में इस चेयर पर रोटरी क्लब कैपिटल सिटी नई दिल्ली के आशीष माखीजा 'बैठे' हुए मिले/दिखे । उस समय यही सुनने को मिला था कि डिस्ट्रिक्ट मीट की चेयर अमित अग्रवाल से छिनवाने का काम रमेश अग्रवाल ने किया, और यह चेयर आशीष माखीजा को दिलवाने का काम मुकेश अरनेजा ने किया । चर्चा यह थी कि मुकेश अरनेजा के कानूनी झमेलों में आशीष माखीजा एक वकील के रूप में उनकी जो मदद करते रहते है, यह चेयर मुकेश अरनेजा ने उसकी फीस के रूप में उन्हें दिलवाई है । अमित अग्रवाल के लिए झटके की बात सिर्फ यही नहीं रही कि डिस्ट्रिक्ट मीट की चेयर उनसे छिन गई; इससे भी ज्यादा बड़ा झटका उनके लिए यह रहा कि उन्हें जेके गौड़ के कोर ग्रुप में भी कोई जगह नहीं मिली । और जैसे इतना ही काफी नहीं था - जेके गौड़ की तरफ से इस स्थिति के लिए अमित अग्रवाल को ही जिम्मेदार ठहरा दिया गया है । जेके गौड़ और उनकी छाया बने अशोक अग्रवाल से जब कुछेक लोगों ने अमित अग्रवाल के साथ नाइंसाफी होने की बात कही, तो उन्हें इनकी तरफ से सुनने को मिला कि अमित अग्रवाल जिस लायक हैं, उसके अनुरूप उन्हें उचित पद दिए गए हैं । जेके गौड़ व अशोक अग्रवाल ने लोगों से कहा/बताया कि अमित अग्रवाल एक नकारात्मक सोच के व्यक्ति हैं, इसलिए चुनावी राजनीति में तो उनकी मदद ली जा सकती है, किंतु डिस्ट्रिक्ट चलाने के लिए तो सकारात्मक सोच के व्यक्तियों की जरूरत होती है; और उसमें अमित अग्रवाल जैसे लोग फिट नहीं बैठते हैं । जेके गौड़ ने तो एक मजेदार बात और कही, और वह यह कि - नोमीनेटिंग कमेटी में अमित अग्रवाल ने जो किया था वह इसलिए नहीं किया, क्योंकि वह उनके समर्थक थे बल्कि इसलिए किया क्योंकि वह आलोक गुप्ता से बदला लेना चाहते थे और आलोक गुप्ता को नीचा दिखाना चाहते थे । जेके गौड़ का कहना है कि यह सच है कि नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग में की गई अमित अग्रवाल की इस कार्रवाई से उनकी उम्मीदवारी को फायदा हुआ; लेकिन यह तो अमित अग्रवाल ने आलोक गुप्ता से अपनी खुंदक निकालने के लिए किया था; इसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनके लिए अमित अग्रवाल को पुरस्कृत करना जरूरी क्यों होना चाहिए ?
जेके गौड़ की इस बात में दम तो है, लेकिन यह दम तब दम तोड़ देता है जब गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख रोटेरियंस डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में अपने आप को उचित जगह पर न पाकर अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में समर्थन पाने के लिए जेके गौड़ जिन प्रमुख रोटेरियंस के चक्कर काटा करते थे, और जिनकी खुशामद करते हुए नहीं थकते थे - डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उन्हें जेके गौड़ ने 'एरिया ऑफ फोकस' तथा 'गवर्नर्स स्पेशल ऐड्स' तथा और भी गई-गुजरी जगहों पर धकेल दिया है । इसी से लोगों को यह कहने का मौका मिला है कि जेके गौड़ ने जब वरिष्ठ रोटेरियंस की परवाह नहीं की, तो अमित अग्रवाल की ही परवाह वह क्यों करते भला ? अमित अग्रवाल से हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि वरिष्ठ रोटेरियंस ने तो अपनी अपनी सीमाओं में रह ही जेके गौड़ की मदद की, और इसके लिए जेके गौड़ से खुशामद भी करवाई; किंतु अमित अग्रवाल ने तो अपनी सीमा से पार जाकर उनकी मदद की थी और इसके लिए जेके गौड़ से खुशामद भी नहीं करवाई थी - इसलिए जेके गौड़ को अमित अग्रवाल के साथ तो अन्याय नहीं करना चाहिए था । पर अब जब अमित अग्रवाल के साथ किए गए व्यवहार को जेके गौड़ पूरी बेशर्मी के साथ उचित ठहरा रहे हैं, तो लोगों को यह कहने का मौका मिल रहा है कि अमित अग्रवाल को जेके गौड़ ने पहले तो इस्तेमाल किया और अब उन्हें उपयोगी न पाकर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया है । कुछेक लोगों का कहना है कि उन्होंने अमित अग्रवाल को बताया/समझाया था कि जेके गौड़ बहुत ही मतलबी और अवसरवादी किस्म का व्यक्ति है, इसके चक्कर में ज्यादा पड़ोगे तो अपनी ही फजीहत करवाओगे । इनका कहना है कि अमित अग्रवाल ने उस समय तो उनकी एक न सुनी, किंतु अब जेके गौड़ का रवैया देख कर पछता रहे हैं । 
मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में मिली अपनी अपनी जगहों से निराश, दुखी और नाराज वरिष्ठ रोटेरियंस की नाराजगियों की खबर जेके गौड़ को निरंतर मिल रही हैं, किंतु वह इसकी जरा भी परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं । यह खबरें देने वाले लोगों से उनका कहना रहता है कि वह इन वरिष्ठ रोटेरियंस को पहचान गए हैं; यह सिर्फ अपनी आपसी बातचीतों में ही नाराजगी व्यक्त कर सकते हैं - इससे ज्यादा कुछ कर पाना इनके बस की बात नहीं है । जेके गौड़ ने किसी किसी से यहाँ तक दावा किया कि जिन लोगों के नाम नाराज लोगों के रूप में लिए जा रहे हैं, उन्हें अपने घर या अपने स्कूल में मीटिंग करने आने के लिए एक फोन करूँ तो अभी दौड़े चले आयेंगे; इसलिए इनकी नाराजगी को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है । गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश के लोगों में जेके गौड़ के प्रति बढ़ रही नाराजगी आगे क्या गुल खिलायेगी - और खिलायेगी भी या जेके गौड़ का दावा ही सच साबित करेगी; यह तो आने वाले समय में पता चलेगा; किंतु अभी इस नाराजगी ने तरह तरह की दिलचस्प किस्म की चर्चाओं को जरूर हवा दी हुई है । 

Sunday, June 28, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस योगेश गर्ग तक के साथ धोखा और चालबाजी करने वाले जेके गौड़ का रवैया यदि अशोक गर्ग के प्रति भी बदला बदला सा है, तो इसमें आश्चर्य की भला क्या बात है ?

नई दिल्ली । जेके गौड़ के बदले-बदले से रवैये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार अशोक गर्ग को खासा हैरान भी किया है, और बुरी तरह परेशान भी । अशोक गर्ग के नजदीकियों के अनुसार, अशोक गर्ग उन दिनों को याद करके अपनी हैरानी व परेशानी को और बढ़ाते हुए भी दिखते हैं, जब जेके गौड़ खुद उम्मीदवार थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए जेके गौड़ उनकी कैसे कैसे और कैसी कैसी खुशामद किया करते थे, उसे याद करते हुए - और जेके गौड़ के अब के व्यवहार के साथ उसकी तुलना करते हुए अशोक गर्ग अचंभा करते हैं कि कोई व्यक्ति इतना भी बदल सकता है क्या ? पिछले रोटरी वर्ष में भी जेके गौड़ के साथ अशोक गर्ग के इतने घनिष्ट संबंध थे कि जेके गौड़ के कहने पर अशोक गर्ग ने अपने क्लब के वरिष्ठ सदस्य संजीव रस्तोगी को क्लब से ही निकाल/निकलवा दिया था । नजदीकियों के अनुसार, अशोक गर्ग को अब लगता है कि जेके गौड़ ने पिछले वर्षों में उन्हें तरह-तरह से इस्तेमाल किया, और अब जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में उन्हें जेके गौड़ से मदद की उम्मीद है, तो जेके गौड़ उनके साथ ऐसे पेश आते हैं कि जैसे उन्हें पहचानते ही नहीं हैं । अशोक गर्ग को चूँकि दूसरे रोटेरियंस से भी यह सुनने को मिलता है कि जेके गौड़ बहुत बदल गए हैं, अब वह पहले जैसे नहीं रह गए हैं और घमंडी व बदतमीज तक हो गए हैं, तो अशोक गर्ग को थोड़ी सांत्वना तो मिलती है किंतु उनका अचंभा खत्म नहीं होता है । गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस तक से की जा रही जेके गौड़ की बदतमीजियों की खबरें दरअसल अशोक गर्ग के अचंभे को खत्म नहीं होने दे रही हैं । 
गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस को जेके गौड़ की ताजा बदतमीजी का शिकार उस समय होना पड़ा, जब 30 जून को आयोजित हो रहे अपने 'संभव - टू मेक पॉसिबल' कार्यक्रम की तैयारियों के सिलसिले में उन्होंने अपनी तथाकथित कोर टीम की मीटिंग बुलाई । इस मीटिंग में उपस्थित लोगों से विचार-विमर्श करने व सलाह लेने की बजाए जेके गौड़ ने अपने फरमान सुनाने पर ही ज्यादा ध्यान दिया । हद तब हुई जब जेके गौड़ ने ऐलान किया कि 30 जून के उक्त कार्यक्रम के लिए वह 25 जून तक ही रजिस्ट्रेशन स्वीकार करेंगे । मीटिंग में मौजूद गाजियाबाद के वरिष्ठ रोटेरियंस राजीव वशिष्ठ, उमेश चोपड़ा, विनोद चावला आदि ने जेके गौड़ को समझाने का प्रयास किया कि अपने डिस्ट्रिक्ट की रोटरी में लोग ऐन कार्यक्रम के दिन तक रजिस्ट्रेशन करवाते हैं, इसलिए इस तरह का फैसला व्यवहारिक नहीं होगा - और यह फैसला लागू नहीं किया जाना चाहिए । जेके गौड़ ने लेकिन इनकी एक न सुनी और 25 जून तक रजिस्ट्रेशन करवाने के फैसले को लागू करने पर अड़े रहे । मीटिंग में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने उनके इस फैसले पर सहमति व्यक्त नहीं की, लेकिन जेके गौड़ फिर भी 'अपने' फैसले को लागू करने की जिद पूरी करके ही माने । मीटिंग में मौजूद लोगों के बीच नाराजगी भरे स्वर भी उभरे कि जेके गौड़ को जब किसी की सुननी/माननी ही नहीं है, तो फिर मीटिंग बुलाने का नाटक क्यों करता है ? इस किस्से में मजे की बात यह रही कि मीटिंग में जेके गौड़ को जो बात समझ में नहीं आ रही थी, और जिसे मानने के लिए वह हरगिज तैयार नहीं हुए - वह बात जेके गौड़ को तीन दिन बाद लेकिन समझ में आ गई; जब उन्होंने उक्त कार्यक्रम के लिए 25 जून तक रजिस्ट्रेशन कराने की शर्त को हटा लिया । इस पर कुछेक लोगों ने चुटकी भी ली कि जेके गौड़ की अक्ल का ताला धीरे-धीरे खुलता है क्या, जो उन्हें बात देर से समझ में आती है । 
इस मीटिंग की आड़ में जेके गौड़ ने गाजियाबाद के एक अन्य वरिष्ठ रोटेरियन योगेश गर्ग के साथ एक दूसरी किस्म की चाल खेली । इस मीटिंग में जेके गौड़ ने योगेश गर्ग को भी आमंत्रित किया । योगेश गर्ग ने मीटिंग में आने के लिए हामी भी भर दी - लेकिन ऐन मौके पर उन्हें पता चला कि जेके गौड़ ने इस मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे किसी संभावित उम्मीदवार को तो आमंत्रित किया ही नहीं है; संभावित उम्मीदवारों में एक अकेले उन्हीं को जेके गौड़ ने आमंत्रित किया है । यह जानकारी देने वाले ने योगेश गर्ग को यह जानकारी और दी कि उक्त मीटिंग में उनकी उपस्थिति को बना/दिखा कर जेके गौड़ ने उनकी संभावित उम्मीदवारी की राह के लिए रोड़ा तैयार करने की चाल चली है । समय रहते जेके गौड़ द्वारा रची गई साजिश की पोल खुल जाने से योगेश गर्ग ने उक्त मीटिंग में जाना तो स्थगित कर दिया, किंतु योगेश गर्ग को यह जानकर तगड़ा झटका लगा कि जेके गौड़ उनके साथ भी इस तरह की धोखाधड़ी कर सकता है ? जेके गौड़ की इस चालबाजी से सावधान होकर ही योगेश गर्ग ने जेके गौड़ का कामकाज देख रहे अशोक अग्रवाल को फोन करके एक बार फिर याद दिलाया कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उनका नाम किसी भी रूप में नहीं छपना चाहिए । योगेश गर्ग हालाँकि यह बात जेके गौड़ व अशोक अग्रवाल को पहले बता चुके थे; किंतु जेके गौड़ द्वारा रची गई चालबाजी के बेनकाब होने के बाद बाद योगेश गर्ग को डर हुआ कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में नाम छापने की हरकत कर सकता है, इसलिए उन्हें अशोक अग्रवाल को वह बात दोबारा से याद दिलाना जरूरी लगा ।
जेके गौड़ ने योगेश गर्ग के साथ जो चालबाजी खेली, उसके बारे में जानकर अशोक गर्ग की अपने प्रति जेके गौड़ के बदले रवैये से पैदा हुई निराशा शायद कुछ कम हुई होगी । उन्हें लगा होगा कि जेके गौड़ जब गाजियाबाद के योगेश गर्ग जैसे वरिष्ठ रोटेरियन को धोखा देने का काम कर सकते हैं और उनके साथ चालबाजी खेल सकते हैं, तो फिर उनके साथ अपना रवैया क्यों नहीं बदल सकते ? अशोक गर्ग के प्रति जेके गौड़ के बदले रवैये के पीछे हालाँकि मुकेश अरनेजा वाले ऐंगल को भी देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि अशोक गर्ग को मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अशोक गर्ग के समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि जेके गौड़ ने आजकल अपना 'आका' चूँकि रमेश अग्रवाल को बनाया हुआ है, और रमेश अग्रवाल तथा मुकेश अरनेजा के बीच छत्तीस का संबंध बना हुआ है - इसलिए जेके गौड़ को भी मुकेश अरनेजा से दूरी बनानी/दिखानी पड़ रही है; और इस चक्कर में अशोक गर्ग को 'पिसना' पड़ रहा है । कुछेक अन्य लोगों का कहना लेकिन यह भी है कि खेमेबाजी के कारण अशोक गर्ग को जेके गौड़ से जो चोट पड़ेगी, वह इतनी बुरी नहीं लगती; जितनी चोट अशोक गर्ग को जेके गौड़ के बदलते व्यवहार और उनके घमंडी हो जाने के कारण लग रही है । अशोक गर्ग के समर्थकों का कहना है कि जेके गौड़ यदि मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार होने के नाते भी अशोक गर्ग के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं, तो यह बात भी तो जेके गौड़ के अवसरवादी होने का सुबूत ही है - जेके गौड़ को क्या यह बात याद नहीं है कि रोटरी में आज वह जहाँ हैं, वहाँ तक उन्हें पहुँचाने में मुकेश अरनेजा का कितना और कैसा सहयोग रहा है ? अशोक गर्ग ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का अभियान जब शुरू किया था, तब उन्हें बड़ा भरोसा था कि मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार होने का जो लाभ उन्हें मिलेगा, उसके साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ की भी मदद उन्हें मिलेगी । यह भरोसा उन्हें इसलिए भी था, क्योंकि जेके गौड़ की उम्मीदवारी के समय उन्होंने जेके गौड़ की हर तरह से मदद की थी । अशोक गर्ग को यह देख/जान कर लेकिन खासा झटका लगा है कि जेके गौड़ पूरी तरह अहसानफरामोश निकले । जेके गौड़ की इस अहसानफ़रामोशी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में अशोक गर्ग की चुनौती को बढ़ा दिया है ।