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Saturday, June 13, 2020

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता की पद्मश्री पाने की कोशिशों पर, रोटरी के बेईमानों के साथ 'दिखती' उनकी नजदीकी के चलते कहीं पानी न फिर जाए !

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता की केंद्र सरकार के मंत्रियों के नजदीक घूम घूम कर रोटरी 'करने' की सक्रियता को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री पाने के उनके जुगाड़ के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उनके नजदीकियों का तो कहना/बताना है कि शेखर मेहता ने पद्मश्री पाने की पूरी व्यवस्था कर ली है, और कभी भी राष्ट्रपति भवन से उन्हें बुलावा आ सकता है । लेकिन कुछेक लोगों को आशंका है कि रोटरी के तरह तरह के बेईमानों को शेखर मेहता के यहाँ जिस तरह का संरक्षण मिलता 'दिख' रहा है, उसके चलते पद्मश्री पाने की उनकी कोशिशों को झटका भी लग सकता है । शेखर मेहता के कुछेक नजदीकियों के अनुसार, उन्हें बार बार सावधान किया गया है कि रोटरी के बेईमानों से उन्हें दूरी बना कर रखना चाहिए, लेकिन शेखर मेहता ने पता नहीं क्यों इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के बाद शेखर मेहता जब पहली बार कोलकाता एयरपोर्ट पर उतरे थे, तब वहाँ उनके स्वागत में मौजूद रोटेरियंस में वह पूर्व गवर्नर भी कभी उनके दाएँ तो कभी उनके बाएँ खड़े हो कर तस्वीरें खिंचवा रहा था, जो बूढ़ों, बीमारों, गरीबों और अनपढ़ों के नाम पर ली गई ग्लोबल ग्रांट की रकम में घपलेबाजी करने के आरोप में रोटरी इंटरनेशनल से सजा पाया हुआ था । कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में रोटरी के नियम-कानूनों तथा रोटरी के पैसों का मनमाना इस्तेमाल करने के आरोपियों को बार-बार शेखर मेहता के नजदीक देखा/पहचाना गया । वरिष्ठ रोटेरियंस ने बार-बार माना/कहा कि इस तरह की 'नजदीकियों' से शेखर मेहता की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा - लेकिन शेखर मेहता इस तरह की बातों की परवाह करते हुए कभी नजर नहीं आए ।
ऐसे में, शेखर मेहता के नजदीकियों को डरभरी आशंका यही है कि शेखर मेहता ने जिन बातों की परवाह नहीं की है, कहीं वही बातें पद्मश्री पाने की उनकी कोशिशों में बाधा न बन जाएँ ? शेखर मेहता को लेकिन अपने उद्यम पर भरोसा है ! शायद उन्हें लगता है कि रोटरी में होने वाली बेईमानियों के बारे में जब अधिकतर रोटेरियंस को ही पता नहीं चल पाता है, और कुछ ही किस्से चर्चा में आ पाते हैं - तब सरकार के लोगों को भला कैसे उनके बारे में पता चलेगा ? इसलिए शेखर मेहता का सारा जोर रोटरी के सहारे सरकार के विभिन्न मंत्रियों और प्रमुख सरकारी विभागों के बड़े पदाधिकारियों के साथ संबंध बनाने पर है । इसके लिए उन्होंने पीएम कोविड 19 केयर्स फंड में रोटरी की तरफ से 25 करोड़ देने/दिलवाने का काम भी किया । हालाँकि इसके लिए शेखर मेहता की बड़ी आलोचना भी हुई । कई वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स ने कहा कि रोटरी एक सेवा संगठन है, जो अपने काम के लिए लोगों से, संस्थाओं से व सरकारों से पैसा लेता है - सरकार को पैसा देना उसका उद्देश्य या काम नहीं है; और शेखर मेहता जो कर रहे हैं, वह उल्टी गंगा बहाना है तथा रोटरी को सिर के बल खड़ा करना है । लेकिन पद्मश्री के लिए 'रास्ता बनाने' में लगे शेखर मेहता ने इस तरह की आलोचनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया । उनका सारा ध्यान पद्मश्री पाने पर है । वह इसलिए भी है, क्योंकि उनसे पहले जो भी भारतीय रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बने हैं, उन सभी को पद्मश्री या उससे ऊपर के नागरिक सम्मान मिले हैं ।
उल्लेखनीय है कि कल्याण बनर्जी तथा राजेंद्र उर्फ राजा साबू को देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री मिला हुआ है, जबकि रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने वाले पहले भारतीय नितीश चंद्र लहरी को तो देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण मिला था । यहाँ तक कि प्रेसीडेंट न बन पाने वाले, लेकिन प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने गए सुशील गुप्ता भी पद्मश्री से सुशोभित हैं । हालाँकि इन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने और इनके प्रेसीडेंट(नॉमिनी) होने में कोई सीधा संबंध दिखता नहीं है - संयोग सिर्फ इतना ही है कि सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले जो चार रोटेरियन हैं, वह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट(नॉमिनी) भी रहे हैं । राजेंद्र उर्फ राजा साबू वर्ष 1991-92 में प्रेसीडेंट थे, पद्मश्री लेकिन उन्हें वर्ष 2006 में मिला; कल्याण बनर्जी प्रेसीडेंट वर्ष 2011-12 में बने, जबकि पद्मश्री उन्हें वर्ष 2009 में ही मिल चुका था । कल्याण बनर्जी को मेडिसिन में काम करने के लिए उक्त सम्मान मिला था, और वह देश के पहले होम्योपैथ हैं, जिन्हें उक्त सम्मान मिला । सुशील गुप्ता इस्तीफा न देते, तो वर्ष 2020-21 में प्रेसीडेंट बनते, लेकिन पद्मश्री से वह 2007 में ही सम्मानित हो चुके हैं । नितीश चंद्र लहरी के साथ जरूर यह संयोग बना कि वर्ष 1962-63 में वह प्रेसीडेंट बने, और 1963 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान मिला । लेकिन नितीश चंद्र लहरी वास्तव में बड़े 'आदमी' थे - उन्होंने नोबेल पुरुस्कार प्राप्त रबीन्द्रनाथ टैगोर के साथ साहित्यिक गतिविधियों में भाग लिया था, और बंगला फिल्मों के उत्थान/विकास में उनका अप्रतिम योगदान था । वह पहली बंगला मोशन फिल्म के निर्माता थे । उनकी सक्रियता और संलग्नता देख कर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्हें यूनाइटेड एस्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ डिफेन्स की आधिकारिक इकाई आर्म्ड फोर्सेस एंटरटेनमेंट का वाइस चेयरमैन बनाया गया था । जाहिर है कि अपनी पहचान के लिए वह रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के मोहताज नहीं थे - और यही कारण है कि उन्हें पद्मभूषण के लिए चुना गया था ।
शेखर मेहता के लिए मुसीबत और चुनौती की बात यह है कि नितीश चंद्र लहरी के बाद, कोलकाता के वह दूसरे रोटेरियन हैं - जो रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बने हैं । ऐसे में, स्वाभाविक रूप से कोलकाता के लोगों की नजर इस बात पर है कि शेखर मेहता को पद्मभूषण न सही - पद्मश्री भी मिल पाता है, या नहीं । इसीलिए शेखर मेहता रोटरी के बहाने से मंत्रियों के नजदीक होने और रहने के जरिये पद्मश्री पाने की कोशिशों में कोई कोर-कसर तो नहीं छोड़ रहे हैं - बस डर यही है कि रोटरी के बेईमानों के साथ 'दिखती' उनकी नजदीकी कहीं उनकी कोशिशों पर पानी न फेर दे ?

Thursday, February 20, 2020

रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट में शेखर मेहता के साथ कमल सांघवी जिस तरह से जुड़े रहे, और किसी तीसरे को इस समिट में तवज्जो मिलती नहीं दिखी - उससे मनोज देसाई की रोटरी में 'आगे की यात्रा' में रोड़े पड़ते देखे/पहचाने जा रहे हैं

नई दिल्ली । रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट में हर मौके पर इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता और इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी की जैसी छाप रही, उसे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की 'भावी योजना' को तगड़ी चोट पहुँचने के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि इस समिट का घोषित उद्देश्य चाहें जो रहा हो, लेकिन इसका अघोषित उद्देश्य भारत से अगले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए कमल सांघवी को प्रमोट करना था - और शेखर मेहता व कमल सांघवी ने इस अघोषित उद्देश्य को बहुत ही प्रभावी तरीके से अंजाम दिया । इसके लिए शेखर मेहता व कमल सांघवी की जोड़ी ने दो बातों का खास ख्याल रखा - एक तो यह कि इन्होंने अपने अलावा किसी तीसरे को पूरे आयोजन में कोई तवज्जो नहीं मिलने दी; और दूसरे उन्होंने खेमेबाजी की दीवारों को तोड़ने की कोशिश की ताकि कोई भी नाराज न हो । विरोधी समझे जाने वाले खेमे के लोगों को छोटे छोटे मौकों पर जिम्मेदारियाँ देकर संदेश देने की कोशिश की गई कि यह सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहते है । प्रेसीडेंट नॉमिनी डिनर की जिम्मेदारी राजु सुब्रमणियन को सौंपे जाने के फैसले पर हर किसी को हैरानी हुई । राजु सुब्रमणियन को पूर्व प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के नजदीक समझा/पहचाना जाता है, इसलिए उन्हें जिम्मेदारी सौंपने के फैसले को शेखर मेहता व कमल सांघवी की जोड़ी की बड़ी चाल के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
शेखर मेहता व कमल सांघवी की इस चाल को मनोज देसाई की आगे की राजनीति के लिए खतरे की घंटी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि भारत से अगले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए मनोज देसाई की उम्मीदवारी की चर्चा रही है । सुशील गुप्ता जब प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने गए थे, तभी यह चर्चा थी कि उनके बाद प्रेसीडेंट पद के लिए शेखर मेहता व मनोज देसाई के बीच मुकाबला होगा । दोनों ही सुशील गुप्ता की आँखों के तारे रहे हैं; हालाँकि सुशील गुप्ता के नजदीकियों को लगता था कि सुशील गुप्ता पहले शेखर मेहता को और फिर मनोज देसाई को प्रेसीडेंट का पद दिलवाने का प्रयास करेंगे । अप्रत्याशित रूप से सुशील गुप्ता के प्रेसीडेंट पद तक पहुँचने के रास्ते से हट जाने के बाद, शेखर मेहता 'उम्मीद से पहले' ही प्रेसीडेंट पद के नजदीक हो गए । सुशील गुप्ता के सीन से हटने के बाद उनका खेमा नेतृत्वविहीन हो गया है । अलग अलग कारणों से चूँकि कल्याण बनर्जी और राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू की हैसियत भी 'डेकोरेटिव आईटम' जैसी हो गई है, जिससे देश की रोटरी राजनीति में नेतृत्व का वैक्यूम पैदा हो गया है । प्रेसीडेंट (नॉमिनी) होने के कारण शेखर मेहता के पास इस वैक्यूम को भरने का एक बढ़िया मौका है, और वह इस मौके का पूरा पूरा फायदा उठाते हुए दिख भी रहे हैं - लेकिन फायदा उठाने के उनके मौके में कमल सांघवी की मौजूदगी लोगों के बीच बेचैनी व हलचल भी पैदा कर रही है ।
रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट में शेखर मेहता के साथ कमल सांघवी जिस तरह से जुड़े रहे, और किसी तीसरे को इस समिट में तवज्जो मिलती नहीं दिखी - उससे लोगों के बीच कई सवाल पैदा हुए हैं । समिट में सबसे बुरी बीती भरत पांड्या और विनोद बंसल के साथ । भरत पांड्या इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं, और विनोद बंसल समिट की तैयारी समिति के प्रेसीडेंट थे - इसके बावजूद दोनों को खास तवज्जो नहीं मिली, और दूसरे लोगों की तरह यह दोनों भी शेखर मेहता व कमल सांघवी के दिशा-निर्देशों पर ही 'काम' करते हुए देखे गए । दरअसल समिट के पूरे आयोजन में, महत्त्वपूर्ण पदों पर होने के बावजूद भरत पांड्या और विनोद बंसल की जैसी जो उपेक्षा हुई, उसे देख कर ही लोगों का ध्यान इस बात की तरफ गया कि पूरा आयोजन तो वास्तव में शेखर मेहता व कमल सांघवी की गिरफ्त में है । पूरे आयोजन का 'डिजाईन' खासी होशियारी से तैयार किया गया था, जिसमें ऐसे लोगों को तो छोटे छोटे मौकों पर जिम्मेदारियाँ दी गईं और अलग अलग कारणों से तथा रूपों में मंच पर आने का मौका दिया गया - जो शेखर मेहता व कमल सांघवी के लिए कोई खतरा और या चुनौती नहीं बनते हैं; लेकिन उनके लिए खतरा और या चुनौती बन सकने वाले बड़े नेताओं को 'किनारे' लगा दिया गया । शेखर मेहता व कमल सांघवी की इसी होशियारी में मनोज देसाई की रोटरी में 'आगे की यात्रा' में रोड़े पड़ते देखे/पहचाने जा रहे हैं । 

Friday, November 1, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में शेखर मेहता के सम्मान में होने वाले समारोह की बागडोर रंजन ढींगरा को मिलने से भड़के विनोद बंसल ने समारोह की तैयारी के लिए होने वाली बैठक का बहिष्कार किया; जिसके बाद उनके समारोह को फेल करने की कोशिशों में जुटने की बात फैली

नई दिल्ली । विनोद बंसल की नाराजगी और विरोधी तेवरों के चलते 8 नवंबर को होने वाला इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता का सम्मान समारोह मुसीबत में पड़ता/फँसता नजर आ रहा है । विनोद बंसल हालाँकि समारोह की तैयारी कमेटी के चेयरमैन हैं, लेकिन उनकी शिकायत है कि समारोह की तैयारी से उन्हें अलग-थलग कर दिया गया है और तैयारी का सारा काम कन्वेनर रंजन ढींगरा तथा एडवाईजर सुरेश जैन ने हथिया लिया है और सारा प्रोग्राम यही दोनों तय कर रहे हैं । प्रोग्राम तय करने को लेकर तैयारी कमेटी व रिसेप्शन कमेटी के सदस्यों की हाल ही में हुई बैठक में विनोद बंसल इतने तमतमाए कि जोर से 'आय एम् नॉट इंटरेस्टिंग' कहते हुए बैठक को बीच में ही छोड़ कर चले गए । मजे की बात यह रही कि बैठक में शामिल सदस्यों को यही समझ में नहीं आया कि विनोद बंसल आखिर भड़के किस बात पर हैं । किसी ने उनकी नाराजगी का कारण पूछने की कोशिश भी की, लेकिन उन्होंने किसी को बोलने का मौका ही नहीं दिया और जोर जोर से बोलते हुए बैठक छोड़ कर चले गए । बैठक में मौजूद सदस्यों को यह तो समझ में आया कि विनोद बंसल समारोह की तैयारी से अलग-थलग किए जाने की शिकायत कर रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हुआ कि तैयारी से जुड़ा ऐसा कौन सा काम कर लिया गया, जिसमें विनोद बंसल अपनी भागीदारी चाहते थे - और जिसके न मिलने पर वह इतना भड़क गए कि तैयारी पर बात करने के लिए हो रही बैठक को बीच में ही छोड़ कर - एक तरह से उसका बायकाट करके - निकल गए । डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच यह चर्चा भी सुनी गई है कि विनोद बंसल अब उक्त समारोह को विफल करने की तैयारी में जुट गए हैं; और इसके लिए एक तरफ तो उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन को यह कहते हुए भड़काना शुरू किया है कि वह समारोह में दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं, उन्हें इससे क्या मिलेगा - और दूसरी तरफ निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया को उन्होंने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी है कि फरीदाबाद से समारोह के लिए ज्यादा रजिस्ट्रेशन न हों । विनोद बंसल को लगता है कि शेखर मेहता के सम्मान समारोह में लोगों की ज्यादा भागीदारी नहीं होगी, तो समारोह विफल माना जायेगा और इससे साबित होगा कि समारोह को सफल करने/बनाने का हुनर तो सिर्फ उनके पास है ।
लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, विनोद बंसल एक तरफ तो शेखर मेहता के सम्मान समारोह को विफल करने के प्रयासों में लगे हैं, और दूसरी तरफ समारोह की तैयारी कमेटी के चेयरमैन पद को बचाने का प्रयास भी कर रहे हैं । दरअसल विनोद बंसल जिस तरह से नाराजगी दिखाते हुए तैयारी कमेटी व रिसेप्शन कमेटी की बैठक का बायकाट करके गए, उसे देखते हुए बैठक में विचार आया कि विनोद बंसल जब खुद कह गए हैं कि वह समारोह में 'इंट्रेस्टेड' नहीं हैं, तब फिर उन्हें चेयरमैन बनाये रखने का क्या फायदा - उनकी जगह किसी और को चेयरमैन बनाया जाए । अधिकतर कमेटी सदस्यों ने लेकिन जल्दबाजी में इस तरह का फैसला न करने का सुझाव दिया । विनोद बंसल को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कमेटी के वरिष्ठ सदस्यों से संपर्क साधा । उनकी क्या बातें हुईं, यह तो किसी को नहीं पता चला, लेकिन समझा जाता है कि उन्होंने चेयरमैन पद को बचाने का ही प्रयास किया है । विनोद बंसल के नजदीकियों का कहना है कि विनोद बंसल ने गुस्से में बैठक का बहिष्कार तो कर दिया और तैश में यह बोल आये कि 'आय एम् नॉट इंटरेस्टिंग' - लेकिन चेयरमैन का पद वह नहीं खोना चाहते हैं । समझा जाता है कि विनोद बंसल समारोह की बागडोर पूरी तरह अपने हाथ में रखना चाहते थे, लेकिन जो संभव नहीं हो सका, और इसीलिए वह नाराज हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में हुए सम्मान समारोह की बागडोर विनोद बंसल के हाथ में थी, और - आरोपों के अनुसार - उन्होंने खूब मनमानी की थी तथा अन्य किसी को कोई तवज्जो नहीं दी थी । पिछले वर्ष के उसी अनुभव को याद रखते हुए डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स इस बार तैयार थे और उन्होंने विनोद बंसल के लिए ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा कि वह अपनी मनमानी कर सकें । विनोद बंसल दरअसल इसी बात से बुरी तरह बौखलाए हुए हैं । 
विनोद बंसल को सबसे तगड़ा झटका यह लगा कि वह विनय भाटिया को कमेटी में कोई जगह नहीं दिलवा सके । वह विनय भाटिया को को-चेयरमैन या को-कन्वेनर बनवाना चाहते थे । को-कन्वेनर पद पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल की नियुक्ति का उन्होंने खूब विरोध किया । इसके लिए उन्होंने यहाँ तक तर्क दिया कि गवर्नर नॉमिनी के रूप में अनूप मित्तल तो प्रोटोकॉल में ही नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें किसी भी कमेटी में कैसे रखा जा सकता है । उनके इस तर्क को लेकिन सुना नहीं गया । शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में होने वाले सम्मान समारोह की बागडोर अपने हाथ में रख कर विनोद बंसल दरअसल यह दिखाना/जताना चाहते थे कि अपने डिस्ट्रिक्ट में उनकी अच्छी धाक है । समारोह की बागडोर लेकिन रंजन ढींगरा को मिल जाने से विनोद बंसल को दोहरा झटका लगा - रोटरी में लोगों के बीच एक संदेश तो यह गया कि अपने ही डिस्ट्रिक्ट में विनोद बंसल को तवज्जो नहीं मिल रही है, और दूसरा संदेश यह गया कि डिस्ट्रिक्ट में उनकी बजाये रंजन ढींगरा को तवज्जो है । रंजन ढींगरा भी चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की दौड़ में हैं, इसलिए रंजन ढींगरा को तवज्जो मिलना - विनोद बंसल के लिए खासी फजीहत वाली स्थिति है । कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि समारोह में एमओसी (मास्टर ऑफ सेरेमनी) की जिम्मेदारी भी रंजन ढींगरा को मिल गई है । विनोद बंसल इससे और उखड़ गए । एमओसी पद पर उनकी निगाह थी । समारोह की तैयारी से जुड़े डिस्ट्रिक्ट के लीडर्स लेकिन इस बार पूरी तैयारी से थे और विनोद बंसल को कोई बढ़त नहीं देना चाहते थे । उनकी तरफ से सुना गया है कि विनोद बंसल अति-महत्त्वाकांक्षी हैं और सब कुछ पाना चाहते हैं; वह चेयरमैन पद से संतुष्ट नहीं है - वह वास्तव में मैक्सीमम को मिनिमम ही समझते हैं । विनोद बंसल की 'दशा' पर एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर ने एक किस्सा सुनाया : 
'एक महिला अपने छोटे बच्चे को गोद में लेकर समुद्र के किनारे थी, कि एक तेज लहर आई 
और उसके बच्चे को गोद से छीन कर बहा ले गई । महिला ने रोना-चिल्लाना शुरू किया और 
ईश्वर से गुहार लगाना शुरू किया कि तभी एक और तेज लहर आई 
और उसका बच्चा वापस उसकी गोद में आ गया । महिला खुश हुई और ईश्वर को 
शुक्रिया कहने ही वाली थी कि उसने देखा कि बच्चे के सर पर जो टोपी थी, 
वह नहीं है । तब शुक्रिया कहने की बजाये उसने यह कहते हुए
ईश्वर के प्रति नाराजगी दिखाई कि अच्छा, टोपी तूने मार ली ।' 
किस्सा सुना कर वरिष्ठ पूर्व गवर्नर का कहना है कि किस्से वाली महिला की तरह विनोद बंसल को इस बात की संतुष्टि नहीं है कि वह चेयरमैन बने हैं, वह दूसरी 'चीजें' न मिलने से दुखी और नाराज हैं तथा कमेटी के लोगों को कोस रहे हैं । शेखर मेहता के सम्मान समारोह को फेल करने की विनोद बंसल की तैयारी की बातों ने सम्मान समारोह को लेकिन मुसीबत में फँसा दिया है । 

Sunday, September 22, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3020 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सैम मोव्वा के इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने जाने से इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के सहारे रोटरी की राजनीति व प्रशासनिक व्यवस्था में ऊँची छलाँग लगाने के मंसूबे बाँधने वाले रोटेरियंस को तगड़ा झटका लगा है

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 3020 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सैम राव मोव्वा के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से सिर्फ उनके प्रतिद्वंद्वी विनय कुलकर्णी को ही झटका नहीं लगा है, बल्कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता तथा उनके सहारे रोटरी की राजनीति व प्रशासनिक व्यवस्था में ऊँची छलाँग लगाने के मंसूबे बाँधने वाले रोटेरियंस को भी तगड़ा झटका लगा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी में प्रत्येक स्तर की चुनावी राजनीति उम्मीदवारों की बजाये वास्तव में खेमों की राजनीति होती है और चुनावी हार-जीत को खेमों की हार-जीत के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है । कभी-कभार कोई उम्मीदवार अपने आप को खेमे से 'बड़ा' साबित कर देता है, लेकिन यह कभी-कभार ही हो पाता है - और  उसके 'बड़े' साबित होने में भी कुल मिलाकर खेमे की ही भूमिका देखी/मानी जाती है । इसी तर्ज पर जोन 7 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में विनय कुलकर्णी को उस खेमे के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, जिसके नेताओं के रूप में कल्याण बनर्जी व सुशील गुप्ता को देखा/पहचाना जाता रहा है और शेखर मेहता भी जिसके एक प्रमुख सदस्य रहे हैं । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के चलते शेखर मेहता की पहचान ने एकदम से ऊँची छलाँग लगाई और खेमे को उनके नाम से भी जाना/पहचाना जाने लगा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से ठीक पहले शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने से खेमे के लोगों में एक नई जान पड़ी और उन्हें विश्वास हुआ कि अब वह जोन 7 में विनय कुलकर्णी को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए आसानी से 'चुनवा' लेंगे ।
इसीलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने हेतु होने वाली मीटिंग से चार दिन पहले कोलकाता में हुए रोटरी इंडिया लिटरेसी मिशन के आयोजन को विनय कुलकर्णी की जीत को आसान बनाने के 'उपाय' के रूप में ही देखा/पहचाना गया और आरोपित किया गया । यह दरअसल आयोजन में विनय कुलकर्णी की उपस्थिति के कारण हुआ । आयोजन में रोटरी इंटरनेशनल के तमाम बड़े पदाधिकारी थे - इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी थे, पूर्व व मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर्स थे और फ्यूचर इंटरनेशनल डायरेक्टर्स की तो खासी भीड़ थी; लेकिन किसी की अक्ल में यह जरा सी बात नहीं आई कि रोटरी में चुनावी आचार संहिता नाम की एक व्यवस्था है, जिसकी मन से आप भले ही परवाह न करते हों, लेकिन 'दिखावे' के लिए तो कम से कम उसकी इज्जत कर लो - और उम्मीदवार होने के नाते विनय कुलकर्णी को आयोजन के मंच से दूर रखो । रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों की मौजूदगी में रोटरी इंडिया लिटरेसी मिशन के आयोजन में चुनावी आचार संहिता की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ी देखी गईं, उससे खासा बबाल हो गया । कोढ़ में खाज वाली बात यह हो गई कि इतने सब के बाद भी जोन 7 में नोमीनेटिंग कमेटी ने विनय कुलकर्णी को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए नहीं चुना । 
विनय कुलकर्णी की इस असफलता ने शेखर मेहता के सहारे रोटरी की राजनीति व व्यवस्था में ऊँची छलाँग लगाने की तैयारी करने वाले रोटेरियंस को खासी चोट पहुँचाई है । उल्लेखनीय है कि शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाते ही, रोटरी में बड़े पद पाने की जुगाड़ में लगे रहने वाले कुछेक रोटेरियंस ने शेखर मेहता के साथ अपनी नजदीकी का वास्ता देकर रोटरी में 'जो चाहेंगे, वह पा लेंगे' जैसे दावे करने शुरू कर दिए । जब तक सुशील गुप्ता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी थे, तब तक यह सुशील गुप्ता के यहाँ सुबह-शाम हाजिरी लगाते थे, अब इन्होंने शेखर मेहता के नाम की माला जपना शुरू कर दिया है । रोटरी में जो कोई भी प्रभावी होता है, या दिखता है - यह उसके आसपास मँडराना शुरू कर देते हैं । शेखर मेहता दरअसल अभी ऐसे लोगों को हैंडल नहीं कर पा रहे हैं, और इसलिए ऐसे लोग अपने स्वार्थ में शेखर मेहता के लिए तरह तरह से मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं । रोटरी के 'चोर-उचक्कों', यहाँ तक कि रोटरी से सजा पाए रोटेरियंस ने तथा जल्दी से जल्दी कुछ भी करके बड़े पद पाने की इच्छा रखने वाले रोटेरियंस ने - इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाते ही शेखर मेहता के नजदीक 'दिखने' तथा अपने आपको उनके नजदीक बताने की जो तत्परता दिखाई है, और ऐसे रोटेरियंस ने जिस तरह से शेखर मेहता को घेर लिया है, उससे शेखर मेहता को सिर्फ बदनामी ही मिल रही है । शेखर मेहता से हमदर्दी रखने वाले वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि शेखर मेहता ने यदि ऐसे लोगों से 'निपटना' नहीं सीखा तो मुसीबत में ही फँसेंगे । विनय कुलकर्णी को लेकर  पिछले पाँच/छह दिनों में जो तमाशा हुआ, और कुछ हासिल भी नहीं हुआ - वह एक सबक भी है । 

Tuesday, August 6, 2019

रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता के चुने जाने में विनोद बंसल को अपना इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना 'पक्का' लग रहा है; उन्हें विश्वास है कि दूसरे बड़े नेताओं की तरह शेखर मेहता उन्हें धोखा नहीं देंगे और उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की जिम्मेदारी निभायेंगे

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए शेखर मेहता के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने की जानकारी मिलने के बाद से विनोद बंसल ने दावा करना शुरू कर दिया है कि अब उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने जाने से कोई नहीं रोक सकता है । विनोद बंसल ने अपने नजदीकियों से कहना शुरू कर दिया है कि अब कोई चाहें कुछ भी करे या कहे, उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से नहीं रोक पायेगा । विनोद बंसल का कहना है कि शेखर मेहता के साथ उनके जैसे संबंध हैं, उसके चलते उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने/बनवाने की जिम्मेदारी अब वह खुद लेंगे -  और जब इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में शेखर मेहता उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने/बनवाने की जिम्मेदारी लेंगे, तो फिर कौन उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोक सकेगा ? विनोद बंसल ने अपने नजदीकियों को बताया है कि शेखर मेहता से उनकी उस समय से दोस्ती है, जब वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी थे और शेखर मेहता इंटरनेशनल डायरेक्टर थे । वर्ष 2011 में शेखर मेहता ने कोलकाता में जो रोटरी इंस्टीट्यूट करवाया था, उसके लिए उन्होंने मोटी रकम की स्पॉन्सरशिप दिलवाई थी; जिसके चलते शेखर मेहता उनसे काफी प्रभावित हुए थे और फिर दोनों के संबंध मजबूत होते गए । विनोद बंसल ने अपने नजदीकियों को बताया है कि शेखर मेहता जब भी पारिवारिक कारणों से और या रोटरी के काम से दिल्ली आते हैं, तो उनसे जरूर मिलते हैं । ऐसे में, स्वाभाविक ही है कि शेखर मेहता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में विनोद बंसल की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी का झंडा उठा लें और उन्हें चुनवा/बनवा कर ही मानें ।
विनोद बंसल का कहना/बताना है कि शेखर मेहता ने जिस तरह से कमल सांघवी को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनवाया/चुनवाया है, वैसे ही वह उन्हें भी चुनवाएँगे/बनवाएँगे । उल्लेखनीय है कि यूँ तो विनोद बंसल के रोटरी के हर बड़े नेता/पदाधिकारी के साथ अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन उनके लिए मुसीबत की बात यह रही कि मौकों पर तथा जरूरत पड़ने पर कोई भी उनके काम नहीं आया । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर के साथ उनके बड़े नजदीकी संबंध रहे हैं; पीटी प्रभाकर के रोटरी इंस्टीट्यूट को स्पॉन्सर करने की जिम्मेदारी लेने को वह तैयार थे, और बदले में वह इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनना चाहते थे । पीटी प्रभाकर दिल्ली में इंस्टीट्यूट करने के लिए तैयार भी हो गए थे, लेकिन विनोद बंसल के डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स ने अड़ंगा डाल दिया कि विनोद बंसल यदि चेयरमैन होंगे तो वह इंस्टीट्यूट से नहीं 'जुड़ेंगे' - विनोद बंसल ने पीटी प्रभाकर को बहुत समझाया कि उन्हें किसी के सहयोग/समर्थन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, वह अकेले ही सब संभाल लेंगे, लेकिन पीटी प्रभाकर ने उनकी एक नहीं सुनी और सिर्फ इतना ही नहीं कि वह इंस्टीट्यूट चेन्नई ले गए, उन्होंने विनोद बंसल को चेयरमैन भी नहीं बनाया । इसके बाद, गुलाम वाहनवती के रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी बनने से खाली हुई आरआरएफसी (रीजनल रोटरी फाउंडेशन को-ऑर्डिनेटर) की कुर्सी पाने के लिए विनोद बंसल ने पीटी प्रभाकर, बासकर चॉकलिंगम, मनोज देसाई, शेखर मेहता से लेकर सुशील गुप्ता तक की मदद लेने की कोशिश लेकिन उनकी दाल गली नहीं । पिछले कुछ समय में वह सुशील गुप्ता के काफी नजदीक पहुँचे, लेकिन यहाँ भी उन्होंने पाया कि खासी नजदीकियत के बावजूद सुशील गुप्ता जब कुछ देने/दिलवाने की 'हैसियत' में आते हैं, तो उन्हें भूल जाते हैं और तब वह या तो अशोक गुप्ता को याद करते हैं और या रंजन ढींगरा को । सुशील गुप्ता की तरफ से निराश होने के बाद विनोद बंसल ने पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन से तार जोड़े, लेकिन वहाँ भी उन्होंने केआर रवींद्रन को उनकी बजाए आशीष घोष को ज्यादा तवज्जो देते हुए देखा/पाया ।
हर तरफ से धोखा खाए विनोद बंसल को यकीन है कि शेखर मेहता उनके साथ दूसरों की तरह धोखा नहीं करेंगे । ऐसा भी नहीं है कि दूसरों ने विनोद बंसल को कुछ नहीं दिलवाया; विनोद बंसल को बहुत कुछ मिला भी है - विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में आरआई रिप्रेजेंटेटिव बनने का उन्हें अवसर मिला; लेकिन यह अवसर तो किसी को भी मिल जाता है, इसलिए विनोद बंसल इससे संतुष्ट नहीं हुए । इंटरनेशनल में उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी भी मिली है, लेकिन वह जिम्मेदारी ऐसी है कि रोटेरियंस को उसके बारे में कुछ पता ही नहीं है; उन्होंने कई बार लोगों को बताने की कोशिश भी की, लेकिन लोगों की समझ में कुछ आया नहीं । उन्हें इस बात का बड़ा अफसोस रहा कि उन्हें रोटरी इंटरनेशनल में इतना बड़ा पद मिला, और किसी ने उन्हें बधाई भी नहीं दी । उन्हें रीजनल लीडर्स ग्रुप में शामिल होने का मौका भी मिला, जहाँ उन्हें एंडाउमेंट एडवाइजर का पद मिला है । यह पद तो उन्होंने ले लिया, ताकि इसके बहाने से देश के डिस्ट्रिक्ट्स के डायरेक्टरी में नाम/फोटो छपने का जुगाड़ हो जाए, लेकिन इस पद की जिम्मेदारी निभाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है । हद की, मजाक की और विडंबना की बात यह है कि विनोद बंसल के क्लब ने रोटरी फाउंडेशन में यूँ तो करीब सवा दो लाख डॉलर दिए हैं, लेकिन एंडाउमेंट फंड में इकन्नी भी नहीं दी है । समझा जा सकता है कि एडवाइजर के रूप में विनोद बंसल जब अपने ही क्लब को, और इस तरह जब अपने आप को ही एडवाइज नहीं करना चाहते हैं, तो फिर दूसरों को वह क्या और क्यों करेंगे ? विनोद बंसल को दरअसल रोटरी में ऐसा पद चाहिए, रोटेरियंस के बीच जिसका 'भौकाल' बने - और इसीलिए उन्होंने मिली जिम्मेदारियों को निभाने की बजाये अपना सारा ध्यान इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में लगाया हुआ है । यहाँ लेकिन उन्हें अपने ही डिस्ट्रिक्ट में मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है । लेकिन शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने में उन्हें अपनी सारी मुसीबतें दूर होती हुई नजर आ रही हैं । इसीलिए उन्होंने अपने नजदीकियों को आश्वस्त किया है कि अब फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के बाद अब उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से कोई नहीं रोक सकेगा । 

Monday, August 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता के चुने जाने की पटकथा, भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले एक पूर्व प्रेसीडेंट की सुशील गुप्ता के साथ जुलाई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई एक गुपचुप मुलाकात में ही लिख दी गई थी क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए शेखर मेहता के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से सुशील गुप्ता विरोधी रोटेरियंस को खासा तगड़ा झटका लगा है, और 26 अप्रैल को सुशील गुप्ता के इस्तीफे के बाद फूला हुआ उनका जोश का गुब्बारा एक बार फिर से पिचक गया है । शेखर मेहता को सुशील गुप्ता के खेमे का 'आदमी' तो माना ही जाता है, इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता की जीत को सुशील गुप्ता के ऑरा (आभामंडल) की जीत के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । इससे पहले सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने से खाली हुआ वर्ष 2020-21 का प्रेसीडेंट पद होल्गर नेक को मिल जाने में भी सुशील गुप्ता की भूमिका को देखा/पहचाना गया था । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की चुनावी दौड़ में होल्गर नेक व शेखर मेहता अभी कहीं नजर नहीं आ रहे थे । होल्गर नेक को पर्याप्त समर्थन नहीं था, और शेखर मेहता के लिए सुशील गुप्ता के 'पूर्व प्रेसीडेंट' हो जाने तक इस बारे में सोचना भी असंभव था । शेखर मेहता तो अभी करीब तीन महीने पहले, सुशील गुप्ता का इस्तीफा होने के बाद उम्मीदवार बने थे । तीन महीने पहले कोई अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करे, और प्रेसीडेंट चुन लिया जाए - रोटरी इंटरनेशनल के 114 वर्षों के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ । शेखर मेहता ने यह एक नया इतिहास रचा है, तो इसके पीछे रोटरी इंटरनेशनल में बने सुशील गुप्ता के ऑरा को ही देखा/पहचाना जा रहा है - और इस बात ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादियों की 'खुशियों' पर जैसे ताला जड़ दिया है ।
उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य कारणों से सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद सुशील गुप्ता के विरोधी नेताओं के मन बड़े गदगद थे । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता से नजदीकियाँ बनाने और 'दिखाने' वाले महत्त्वाकांक्षी नेताओं ने - जिनमें उनके डिस्ट्रिक्ट के महत्त्वाकांक्षी नेता भी हैं - उनके इस्तीफा देते ही रंग बदलना शुरू कर दिया था । सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं ने मान/समझ लिया था कि रोटरी इंटरनेशनल की 'व्यवस्था' तथा उसकी राजनीति में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हो गया है, और इसलिए उन्हें सुशील गुप्ता की परवाह करने की जरूरत नहीं है । लेकिन पहले होल्गर नेक और अब शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने ने उनकी 'समझ' पर पत्थर गिरा दिए हैं । होल्गर नेक के बाद शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं को तगड़ा करंट दिया है; दरअसल सुशील गुप्ता के प्रभाव को खत्म हुआ मान कर उन्होंने रोटरी में अपने जो जो मंसूबे बनाए थे, वह सब उन्हें फेल होते हुए दिख रहे हैं । होल्गर नेक के बाद शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने से उन्हें यह मुश्किल लग रहा है कि सुशील गुप्ता की 'अनुपस्थिति' का वह कोई फायदा उठा सकेंगे । इससे दरअसल साबित हुआ है कि सुशील गुप्ता भले ही बीमार हों, और बीमारी के चलते वह प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद छोड़ने के लिए मजबूर हुए हों - लेकिन रोटरी में उनका प्रभाव पहले जैसा ही बना हुआ है; और यह बात रोटरी में उनके विरोधियों तथा अवसरवादी महत्त्वाकांक्षी नेताओं के लिए काफी मुसीबतभरी है ।
शेखर मेहता की जीत और उसमें सुशील गुप्ता के 'असर' के एक प्रमुख कारण के रूप में रोटरी इंटरनेशनल में भारत के बढ़ते दबदबे को भी देखा/पहचाना जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल की सदस्यता तथा रोटरी फाउंडेशन में हिस्सेदारी के मामले में भारत की हैसियत जिस तरह से बढ़ रही है, उसे देखते हुए रोटरी इंटरनेशनल को 'नियंत्रित' करने वाले लोगों के लिए भारत के नेताओं की उपेक्षा करना और उन्हें अलग-थलग रखना अब मुश्किल होता जा रहा है । दक्षिण एशिया के जिन रोटरी नेताओं व पूर्व प्रेसीडेंट्स को भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, उन्होंने भी वस्तुस्थिति को समझा/पहचाना है और अपने विरोध के स्वर को नीचा किया है । इसी संदर्भ में भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले एक पूर्व प्रेसीडेंट की जुलाई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई एक गुपचुप मुलाकात को महत्त्वपूर्ण घटनाचक्र के रूप में देखा/पहचाना गया । सुशील गुप्ता के नजदीकियों का दावा है कि उस गुपचुप मुलाकात में ही शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने की पटकथा लिख दी गई थी ।

Sunday, August 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए देर से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के चलते शेखर मेहता के लिए 5 अगस्त को होने वाला चुनाव आसान तो नहीं है, लेकिन सुशील गुप्ता के इस्तीफे से बनी हमदर्दीपूर्ण स्थिति उनका काम बना भी सकती है

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग में शेखर मेहता की कामयाबी के लिए उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने भले ही फिंगर्स क्रॉस कर ली हों, लेकिन समर्थक व शुभचिंतक भी जानते हैं कि यह चुनाव कोई आसान चुनाव नहीं है । वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन/चुनाव करने के लिए 17 सदस्यीय नोमीनेटिंग कमेटी की कल, यानि 5 अगस्त को बैठक हो रही है । वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए आए नामांकनों में से ग्यारह नाम चुने गए हैं, जिनमें शेखर मेहता का नाम भी है । शेखर मेहता को अन्य दस उम्मीदवारों के साथ कल नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों के सामने साक्षात्कार के लिए उपस्थित होना है । नोमीनेटिंग कमेटी के 17 सदस्यों में पीटी प्रभाकर तथा एमके पांडुरंगा सेट्टी के रूप में दो सदस्य भारत के हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष सुशील गुप्ता को वर्ष 2020-21 के प्रेसीडेंट के रूप में चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में शेखर मेहता खुद थे, और इस नाते उम्मीद की जाती है कि नोमीनेटिंग कमेटी में फैसले पर कैसे पहुँचा जाता है, उसके मैकेनिज्म से शेखर मेहता परिचित होंगे ही - और उसका फायदा वह अपनी उम्मीदवारी के लिए उठा सकते हैं । शेखर मेहता के समर्थकों व शुभचिंतकों को यह भी उम्मीद है कि सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के चलते इंटरनेशनल प्रेसीडेंट का चुनाव करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं के बीच सुशील गुप्ता और भारत के प्रति जो हमदर्दी बनी होगी, उसका फायदा भी शेखर मेहता को मिल सकता है ।
हालाँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के चयन/चुनाव में होने वाली राजनीति से परिचित बड़े नेताओं का मानना/कहना यह भी है कि हालात तो शेखर मेहता की उम्मीदवारी के अनुकूल हैं, लेकिन समस्या की बात सिर्फ यह है कि अनुकूल हालात का लाभ उठाने के लिए जिस तरह की 'तैयारी' की जरूरत होती है, शेखर मेहता को उसके लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिला - और इसलिए उनकी तैयारी थोड़ा कमजोर 'दिखती' है । दरअसल, किसी और को क्या - खुद शेखर मेहता को यह पता नहीं था कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की चुनावी दौड़ में उन्हें इतना जल्दी कूदना पड़ जायेगा । अभी अगले रोटरी वर्ष में तो सुशील गुप्ता को प्रेसीडेंट बनना था; उसके तीन-चार वर्ष बाद भारत के उम्मीदवारों को अपने प्रयास शुरू करने थे । वह तो 26 अप्रैल को अचानक व अप्रत्याशित रूप से सुशील गुप्ता के इस्तीफा दे देने के बाद बनी स्थिति में शेखर मेहता को अभी ही अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए आनन-फानन में तैयार होना पड़ा । ऐसे में स्वाभाविक ही है कि जो उम्मीदवार आठ/नौ महीने पहले से अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समीकरण/गठजोड़ बना रहे थे, उनकी तुलना में शेखर मेहता की तैयारी कमजोर ही होगी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में देर से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवार को जैसी/जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, ठीक वैसी ही चुनौतियाँ इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव के संदर्भ में शेखर मेहता के सामने हैं - और ऐसे में जाहिर है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के लिए चुने जाने का मामला उनके लिए आसान नहीं है ।
शेखर मेहता के कुछेक नजदीकियों का इन पंक्तियों के लेखक से कहना/बताना यह भी है कि शेखर मेहता ने अपनी तैयारी को दो स्तरों पर केंद्रित किया हुआ है, और वह चुनावी खिलाड़ियों को नाराज करने की हद तक जा कर इस बार ही कामयाब होने के लिए अपनी कोशिशें नहीं करेंगे । पिछले रोटरी वर्ष में सुशील गुप्ता को अधिकृत उम्मीदवार चुनवाने के लिए नोमीनेटिंग कमेटी में जिस तरह की धींगामुश्ती हुई थी, शेखर मेहता अपनी उम्मीदवारी को लेकर उस स्तर पर जाने की कोशिश नहीं करेंगे; उनका प्रयास होगा कि इस बार यदि उनका काम आसानी से नहीं बनता है, तो वह अगले वर्ष के लिए अपना मौका बनाएँ । इसी बार कामयाब होने के लिए शेखर मेहता ऐसा कोई काम नहीं करना चाहेंगे, जिससे खिलाड़ी नेता खफा हों - और उनके लिए आगे का रास्ता मुश्किल बने । दरअसल माना/समझा यह जा रहा है कि शेखर मेहता की पहली कोशिश तो यह है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट का चुनाव करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं की गुडबुक में वह शामिल हों, ताकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के गंभीर उम्मीदवारों में उनकी पहचान व गिनती होने लगे - और उसके चलते इस बार नहीं तो अगली बार उनके लिए इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने का मौका बन सके । शेखर मेहता के नजदीकियों का यह भी कहना/बताना है कि इस बार के चुनाव में सुशील गुप्ता की भी भूमिका होनी थी, और इस बार के चुनावी समीकरणों में उनकी भूमिका का भी महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप था - जो उनके इस्तीफा दे देने से गड़बड़ा तो गया है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है । इसलिए एक संभावना यह भी है कि सुशील गुप्ता के सक्रिय न रहने के बावजूद उनका जो प्रभाव इस बार के चुनावी समीकरणों पर है, उसका फायदा हो सकता है कि शेखर मेहता को मिल जाए । क्या होगा, यह तो भारतीय समयानुसार 6 अगस्त की सुबह को ही पता चलेगा; लेकिन शेखर मेहता की उम्मीदवारी के चलते इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद का चुनाव भारतीय रोटेरियंस के लिए दिलचस्पी का विषय जरूर बन गया है ।

Saturday, July 6, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह से गायब रहने के कारण डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल लोगों के निशाने पर आए और उन्हें पद से हटाने की माँग उठी; लोगों का यह भी कहना है कि उनका यह रवैया इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उन पर भारी पड़ सकता है

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल की अनुपस्थिति पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन को लोगों से काफी कुछ सुनना पड़ा; जिससे दुखी होकर किन्हीं किन्हीं लोगों से उन्होंने कहा भी कि वह सोच रहे हैं कि वह विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा दें, और अन्य किसी को यह पद सौंपे । सुरेश भसीन का रोना है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद हासिल करने के लिए तो विनोद बंसल ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, लेकिन उक्त पद की जिम्मेदारी निभाने में उन्होंने न कोई रुचि दिखाई और न भागीदारी निभाने की कोई जरूरत समझी । शायद ही अन्य किसी डिस्ट्रिक्ट में ऐसा हुआ हो, कि डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर ही गायब हो । इससे पहले विनोद बंसल डीटीटीएस (डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमीनार) कार्यक्रम में भी नदारत थे । सुरेश भसीन के अन्य कुछेक कार्यक्रमों में भी विनोद बंसल ने शामिल होने तथा अपनी जिम्मेदारी निभाने की जरूरत नहीं समझी थी । रोटरी में नया रोटरी-वर्ष शुरू होने से पहले के तथा पहले दिन के कार्यक्रम का बड़ा खास महत्त्व माना/समझा जाता है; इन कार्यक्रमों को इस तरह से डिजाईन किया गया है जिससे कि नए रोटरी-वर्ष के पदाधिकारियों को विषयों, लक्ष्यों व मुद्दों के बारे में प्रशिक्षित किया जा सके - और इसीलिए इन कार्यक्रमों में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की भूमिका खासी जिम्मेदारी भरी होती है । विनोद बंसल ने लेकिन कई कार्यक्रमों में उपस्थित रहना तक जरूरी नहीं समझा । विनोद बंसल के इस रवैये पर लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद की जिम्मेदारी निभाने के लिए विनोद बंसल के पास जब समय ही नहीं है, तो वह इस पद पर बने ही क्यों हैं और यह पद वह छोड़ क्यों नहीं देते हैं ?
विनोद बंसल दरअसल इन दिनों इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हैं; और इसके तहत विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के बीच पैठ बनाने की कोशिशों में लगे हैं - इन कोशिशों में वह दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के कार्यक्रमों के निमंत्रणों का जुगाड़ करते हैं, और अपने डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों से गायब रह कर दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं । लोगों का कहना है कि विनोद बंसल दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में अपनी पैठ बनाने के जो प्रयास कर रहे हैं, उन पर आपत्ति करने का किसी को अधिकार नहीं है - लेकिन खुद विनोद बंसल को भी यह सोचना चाहिए कि इस सब को ध्यान में रखते हुए उन्हें जिम्मेदारी का कोई पद नहीं लेना चाहिए; विनोद बंसल को खुद भी 'देखना' चाहिए कि वह यदि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह ठीक से नहीं करते नजर आयेंगे तो इसका इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उनकी उम्मीदवारी पर प्रतिकूल असर ही पड़ेगा । विनोद बंसल के इस मामले में लेकिन अपने 'जबाव' हैं; कुछेक लोगों के बीच उन्होंने सुरेश भसीन के रवैये की शिकायतें की हैं । उनका कहना है कि सुरेश भसीन ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर तो बना दिया, लेकिन सारे काम और सारे फैसले वह खुद ही करना चाहते हैं और वह तो बस नाम के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को यह तो 'दिखा' है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में विनोद बंसल को सुरेश भसीन के साथ वैसी 'आजादी' नहीं मिली, जैसी उन्होंने विनय भाटिया के साथ 'ली' - लेकिन लोगों का मानना और कहना है कि रोटरी में विनय भाटिया और सुरेश भसीन की 'स्थिति' देखते हुए विनोद बंसल को यह खुद ही सोचना चाहिए था कि जैसे उन्होंने विनय भाटिया को 'चला' लिया है, वैसे ही वह सुरेश भसीन को भी नहीं 'चला' पायेंगे । सुरेश भसीन व विनोद बंसल को एक दूसरे से जो शिकायतें रहीं, वह अभी तक दबी/ढकी रही थीं, और दोनों ने ही अपनी अपनी नाराजगियों व शिकायतों को ज्यादा लोगों के सामने प्रकट नहीं किया था और अपने अपने तरीके से काम चला रहे थे - लेकिन डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में विनोद बंसल की अनुपस्थिति से मामला भड़क गया है, और विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद से हटाए जाने की बातें होने लगी हैं । 
मजे की बात यह रही कि विनोद बंसल के अपने डिस्ट्रिक्ट के इंस्टॉलेशन समारोह में पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू तथा इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने वाले सुशील गुप्ता जैसे बड़े नेता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल थे, लेकिन फिर भी विनोद बंसल ने उक्त समारोह में शामिल होना जरूरी नहीं समझा - और उस समय उन्होंने अन्य जगह व्यस्त रहना जरूरी समझा । लोगों के बीच चर्चा रही कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में लगता है कि विनोद बंसल को राजा साबू, सुशील गुप्ता और अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों का समर्थन मिलने का भरोसा नहीं है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर होते हुए भी उन्होंने अपने डिस्ट्रिक्ट के खास आयोजन में शामिल रहना जरूरी नहीं समझा - और वहाँ व्यस्त रहे जहाँ उन्हें मदद मिलने की उम्मीद है । विनोद बंसल के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि सुरेश भसीन से उन्हें चाहें जो और जैसी शिकायतें हों, लेकिन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के नाते उन्हें डिस्ट्रिक्ट के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल तो होना ही चाहिए और उन्होंने जो जिम्मेदारी ली है उसे उचित तरीके से निभाना ही चाहिए - अन्यथा उस जिम्मेदारी को छोड़ देना चाहिए; डिस्ट्रिक्ट के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों से अनुपस्थित होकर वह वास्तव में लोगों को आलोचना करने का मौका दे रहे हैं, और यह बात इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उन पर भारी पड़ सकती है ।

Saturday, June 22, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी होल्गर नेक ने अपनी कोर टीम में सुशील गुप्ता के 'लोगों' को ही बनाए रख कर रोटरी में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हुआ मान कर खुशी मनाने वाले उनके विरोधियों को तगड़ा झटका दिया है

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के बाद इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद की जिम्मेदारी संभालने वाले होल्गर नेक ने सुशील गुप्ता द्वारा बनाई गई कोर टीम को ही अपनी कोर टीम बना कर सुशील गुप्ता के विरोधियों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य कारणों से सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद सुशील गुप्ता के विरोधी नेताओं के मन बड़े गदगद थे । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता से नजदीकियाँ बनाने और 'दिखाने' वाले महत्त्वाकांक्षी नेताओं ने भी उनके इस्तीफा देते ही रंग बदलना शुरू कर दिया था । सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं ने मान/समझ लिया था कि रोटरी इंटरनेशनल की 'व्यवस्था' तथा उसकी राजनीति में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हो गया है, और इसलिए उन्हें सुशील गुप्ता की परवाह करने की जरूरत नहीं है । लेकिन सुशील गुप्ता की जगह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बने होल्गर नेक ने उनकी 'समझ' पर पत्थर गिरा दिए हैं । इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय होल्गर नेक की कोर टीम की चल रही मीटिंग की तस्वीरों में यह देखने को मिल रहा है कि सुशील गुप्ता द्वारा अपनी कोर टीम के लिए चुने गए पदाधिकारियों को ही होल्गर नेक ने अपनी कोर टीम में बनाए रखा है और इसके जरिये उन्होंने वास्तव में यह 'संदेश' देने का काम किया है कि उन्हें सुशील गुप्ता से अलग न समझा जाए । होल्गर नेक के इस संदेश ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं की 'खुशियों' पर जैसे ताला डाल दिया है । 
उल्लेखनीय है कि सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के बाद, इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद पर होल्गर नेक का 'चयन' हुआ था, तब भी यह चर्चा चली थी कि उनके चयन में सुशील गुप्ता की पसंद का ध्यान रखा गया है । दरअसल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद के दावेदारों में होल्गर नेक की स्थिति बहुत ही कमजोर थी; इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव की राजनीति के खिलाड़ियों में कोई भी उन्हें 'दौड़' में नहीं पा/देख रहा था । सुशील गुप्ता के इस्तीफे के बाद, प्रेसीडेंट नॉमिनी पद के लिए होने वाले पुनर्निर्वाचन में उन उम्मीदवारों का पलड़ा भारी देखा/पहचाना जा रहा था जिनका सुशील गुप्ता के साथ तगड़ा मुकाबला हुआ था, और जो बहुत मामूली अंतर से पिछड़ गए थे । होल्गर नेक को तो कोई भी संभावित प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में नहीं देख रहा था; यहाँ तक कि वह खुद भी कोई उम्मीद नहीं रखे थे और इसीलिए प्रेसीडेंट नॉमिनी पद के लिए होने वाले पुनर्निर्वाचन की प्रक्रिया में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । लेकिन जब उनके नाम की घोषणा हुई, तब हर किसी को हैरानी हुई । नोमीनेटिंग कमेटी ने जितनी आसानी से होल्गर नेक के नाम पर सहमति बनाई, उतनी आसानी से तो सुशील गुप्ता भी नहीं चुने गए थे । नोमीनेटिंग कमेटी में सुशील गुप्ता को कड़ी टक्कर देने वाले उम्मीदवारों के समर्थकों ने होल्गर नेक को चुने जाने के मामले में ज्यादा टाँग नहीं अड़ाई तो इसका कारण यही रहा कि नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को सुशील गुप्ता की राय का सम्मान करने का 'इशारा' था और उनकी 'पसंद' के रूप में होल्गर नेक को प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद मिल गया ।
होल्गर नेक को सुशील गुप्ता की पसंद के रूप में मिली चर्चा को सुशील गुप्ता के विरोधियों ने ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और यह मान लिया कि रोटरी में सुशील गुप्ता के दिन अब पूरे हो गए हैं । वैसे भी, रोटरी में पद पाने वाला यह कहाँ ध्यान रखता है कि उसे किन लोगों के सहयोग से पद मिला है ? लेकिन होल्गर नेक ने सुशील गुप्ता द्वारा अपनी कोर टीम के लिए चुने गए पदाधिकारियों को ही अपनी कोर टीम में बनाए रखने के फैसले से यह दिखा/जता दिया है कि उन्हें सुशील गुप्ता के 'प्रतिनिधि' के रूप में ही देखा/पहचाना जाए । सुशील गुप्ता ने अपनी कोर टीम में अपने देश से रंजन ढींगरा को चुना था, होल्गर नेक ने रंजन ढींगरा को अपनी कोर टीम में उसी पद पर बनाए रखा है । इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय होल्गर नेक की कोर टीम की चल रही मीटिंग में यह देखने को भी मिला कि सिर्फ रंजन ढींगरा ही नहीं, सुशील गुप्ता की कोर टीम के दूसरे सदस्य भी होल्गर नेक की कोर टीम में पहले के अपने अपने पदों पर बनाए रखे गए हैं । होल्गर नेक के इस फैसले ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं को तगड़ा झटका दिया है; सुशील गुप्ता के प्रभाव को खत्म हुआ मान कर उन्होंने रोटरी में अपने जो जो मंसूबे बनाए थे, वह सब उन्हें फेल होते हुए दिख रहे हैं । होल्गर नेक के रवैये को देखते हुए उन्हें यह मुश्किल लग रहा है कि सुशील गुप्ता की 'अनुपस्थिति' का वह कोई फायदा उठा सकेंगे । होल्गर नेक के प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने में तथा उनके द्वारा सुशील गुप्ता की टीम को ही अपनी टीम बना लेने के फैसले में एक यह संदेश भी निहित है कि सुशील गुप्ता भले ही बीमार हों, और बीमारी के चलते वह प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद छोड़ने के लिए मजबूर हुए हों - लेकिन रोटरी में उनका प्रभाव पहले जैसा ही बना हुआ है; और यह बात रोटरी में उनके विरोधियों तथा अवसरवादी महत्त्वाकांक्षी नेताओं के लिए काफी मुसीबतभरी है ।

Friday, June 21, 2019

रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन से संबंध 'सुधारने' की तमाम कोशिशों के बावजूद इंदौर इंस्टीट्यूट में बड़ी भूमिका न मिलने से निराश और परेशान डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी तैयारियों पर पानी फिरता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । इंदौर में 3 से 8 दिसंबर के बीच हो रहे रोटरी जोन इंस्टीट्यूट में बड़ी भूमिका न मिल पाने के कारण विनोद बंसल इंस्टीट्यूट के कन्वेनर भरत पांड्या और चेयरमैन टीएन सुब्रमणियन से खासे नाराज हैं । विनोद बंसल के लिए झटके वाली बात यह है कि इस मामले में उन्हें इंस्टीट्यूट के चीफ काउंसलर कमल सांघवी से मदद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन कमल सांघवी भी उनकी कोई मदद नहीं कर रहे हैं । इंदौर इंस्टीट्यूट की कमेटियों में हालाँकि उन लोगों की ही भरमार है, जो राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू, अशोक महाजन व केआर रवींद्रन के 'खेमे' में देखे/पहचाने जाते हैं और जिन्होंने भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव जितवाने में मदद की थी; इसलिए विनोद बंसल को इंदौर इंस्टीट्यूट में कोई तवज्जो न मिलना कोई 'राजनीतिक हैरानी' की बात नहीं है, लेकिन फिर भी विनोद बंसल परेशान हैं - तो इसका कारण यह है कि पिछले कुछेक महीनों में उन्होंने उक्त खेमे के साथ नजदीकी बनाने की बहुतेरी कोशिशें की हैं, और फिर भी उन्हें अपनी कोशिशों का फल मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल को सुशील गुप्ता वाले खेमे के सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और इसी नाते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के पिछले चुनाव में उन्हें अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/पहचाना गया था; बाद में हालाँकि उनकी तरफ से भरत पांड्या और उनके नजदीकियों को बताने/समझाने के काफी प्रयास हुए कि वह तो चुनाव में तटस्थ थे और उन्होंने अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में कोई काम नहीं किया था । इंदौर इंस्टीट्यूट में लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद विनोद बंसल तवज्जो पाने में विफल रहे हैं, उससे लगता है कि उनकी समझाइस भरत पांड्या को समझ में आई नहीं है ।  
विनोद बंसल को दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी के संबंध में इंदौर इंस्टीट्यूट में बड़ी भूमिका निभाना जरूरी लगता है । यह इसलिए क्योंकि पिछले दिनों उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स नॉमिनी के साथ साथ प्रमुख रोटेरियंस के साथ तार जोड़ने का काम खासी प्रमुखता के साथ किया है; उन्हें लगता है कि उनका यह काम सचमुच में तब प्रभावी बन सकेगा, जब यह लोग इंदौर इंस्टीट्यूट में उन्हें कोई बड़ी भूमिका निभाते हुए देखेंगे; ऐसे में उन्हें डर है कि जब ऐसा नहीं होगा, तो उनके सारे किये-धरे पर पानी ही फिर जाएगा । लेकिन इंदौर इंस्टीट्यूट के कन्वेनर भरत पांड्या और चेयरमैन टीएन सुब्रमणियन उन्हें कोई भूमिका निभाने का मौका देने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं । विनोद बंसल को अब यह भी लगने लगा है कि भरत पांड्या और टीएन सुब्रमणियन यह व्यवहार खेमे के बड़े नेताओं के इशारे पर ही कर रहे हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में विनोद बंसल के लिए यह बात और भी ज्यादा झटके वाली है । 
दरअसल विनोद बंसल देखे/पहचाने भले ही सुशील गुप्ता वाले खेमे में हैं, और सुशील गुप्ता के साथ उनके नजदीक के संबंध भी रहे - लेकिन सुशील गुप्ता खेमे के समर्थन के भरोसे इंटरनेशनल डायरेक्टर बन पाने का उन्हें भरोसा नहीं हो पाया । सुशील गुप्ता वाले खेमे में अशोक गुप्ता और रंजन ढींगरा का पलड़ा उनसे भारी है । कई मौकों पर सुशील गुप्ता उन्हें झटका देते हुए अशोक गुप्ता और रंजन ढींगरा को आगे बढ़ाते हुए नजर आए । यह देखने के बाद विनोद बंसल ने दूसरे खेमे के नेताओं के साथ पींगें बढ़ाना शुरू किया । कुछेक लोगों को लगता है और उनका कहना है कि विनोद बंसल ने पहले से ही दूसरे खेमे के नेताओं के साथ संबंध जोड़ने/बनाने शुरू कर दिए थे, और इस बात को देखते/समझते हुए ही सुशील गुप्ता के यहाँ उनकी भूमिका संदेहास्पद हो गई थी और इस कारण सुशील गुप्ता वाले खेमे में उनकी वैसी जगह नहीं बन पाई जैसी अशोक गुप्ता और या रंजन ढींगरा की है । विनोद बंसल के लिए लगता है कि बदकिस्मती की बात यह रही है कि वह दूसरे खेमे के लोगों के बीच भी अपनी विश्वसनीयता नहीं बना सके हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले काफी समय से विनोद बंसल पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के साथ नजदीकी बनाने और 'दिखाने' की खूब कोशिशें करते आ रहे हैं; अपने डिस्ट्रिक्ट में उन्होंने केआर रवींद्रन का बड़े जोरशोर से एक कार्यक्रम भी करवाया ।  विनोद बंसल को उम्मीद रही कि केआर रवींद्रन से नजदीकी बना और 'दिखा' कर वह  उनके वाले खेमे के नेताओं और 'सदस्यों' का सहयोग/समर्थन पा लेंगे; लेकिन इंदौर इंस्टीट्यूट में बड़ी भूमिका पाने की उनकी कोशिशों को जो झटका लगा है, उससे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में उन्हें अपनी उम्मीदों पर पानी फिरता दिख रहा है ।

Saturday, June 8, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा दे चुके सुशील गुप्ता की बीमारी का फायदा उठा कर टीके रूबी को डीआरएफसी के पद से हटवा देंगे और ग्रांट के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करने का अधिकार पा लेने के प्रयासों में जुटे

चंडीगढ़ । सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू और उनके संगी-साथी एक बार फिर अपने 'असली रंग' में आ गए हैं, और इसके तहत उन्होंने निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी को एक बार फिर निशाना बनाना शुरू कर दिया है । राजा साबू और उनके संगी-साथियों को दरअसल टीके रूबी का डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) बनना पसंद नहीं आ रहा है; वास्तव में उन्हें डर यह हुआ है कि टीके रूबी के डीआरएफसी बनने से रोटरी की ग्रांट्स में हेराफेरी करने तथा मनमानी से उसका इस्तेमाल करने की उनकी हरकतों पर रोक लग जाएगी - इसलिए वह किसी भी बहाने से टीके रूबी को डीआरएफसी पद से हटवाना चाहते हैं । इसके लिए टीके रूबी द्वारा अपने गवर्नर-वर्ष का एकाउंट न दिए जाने तथा पिछले रोटरी वर्ष के ग्रांट-एकाउंट को बंद न करने को बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि सुशील गुप्ता जब तक इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी थे, तब तक राजा साबू और उनके संगी-साथी 'भीगी बिल्ली' बने हुए थे, और चुप बैठे थे, लेकिन सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के बाद वह फिर से अपनी हरकतों पर उतर आए हैं । असल में, राजा साबू और उनके संगी-साथी टीके रूबी से चलने वाली लड़ाई में बार-बार मात खाने के लिए टीके रूबी को मिलने वाले सुशील गुप्ता के समर्थन को जिम्मेदार मानते/ठहराते रहे हैं; उनका स्पष्ट आरोप रहा कि सुशील गुप्ता इंटरनेशनल कार्यालय में अपनी पहुँच का फायदा उठाते हुए टीके रूबी को बचाते तथा उन्हें लाभ पहुँचवाते रहे हैं । राजा साबू के संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स इसके लिए सुशील गुप्ता को सरेआम कोसते भी रहे हैं । यह तब की बात है, जब सुशील गुप्ता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी नहीं बने थे । ऐसे में, सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के बाद तो राजा साबू और उनके संगी-साथियों को जैसे साँप सूँघ गया था ।
सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद लेकिन राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स बिलों से बाहर निकल आए हैं; कुछेक को कहते हुए सुना गया है कि सुशील गुप्ता ने सिर्फ इस्तीफा ही नहीं दिया है; बीमारी के चलते अब वह इतने असाध्य हो गए हैं कि कुछ कहने/करने लायक नहीं हैं, इसलिए वह अब देखते हैं कि टीके रूबी को कौन बचायेगा ? राजा साबू के संगी-साथी टीके रूबी पर दो 'गुनाह' करने का आरोप लगा रहे है - एक यह कि उन्होंने पिछले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल का एकाउंट नहीं दिया है, और दूसरा अपने गवर्नर वर्ष का ग्रांट-एकाउंट उन्होंने बंद नहीं किया है । यह दोनों आरोप 'नौ सौ चूहे खा चुकी बिल्ली के हज पर जाने' वाले मुहावरे की याद दिलाते हैं । डिस्ट्रिक्ट में कई गवर्नर ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपने गवर्नर-वर्ष के एकाउंट नहीं दिए हैं; लेकिन राजा साबू और या उनके संगी-साथियों ने कभी उनके एकाउंट न देने को मुद्दा नहीं बनाया । जिनके एकाउंट मिले भी उनमें गड़बड़ी के आरोप लगे, लेकिन उन आरोपों को अनसुना किया गया । एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के एकाउंट में गड़बड़ी छिपाने के लिए के दो बार ऑडिट करने की 'बेईमानी' करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट तथा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाया हुआ है । ग्रांट-एकाउंट की जहाँ तक बात है तो पूर्व गवर्नर डेविड हिल्टन ने तीसरे वर्ष ग्रांट-एकाउंट बंद किया था, जिसके चलते टीके रूबी पूरे वर्ष अपना काम नहीं कर सके थे । मजे की बात यह है कि डेविड हिल्टन और टीके रूबी के बीच गवर्नर रहे रमन अनेजा ने डेविड हिल्टन से ग्रांट बंद करने के लिए कहा भी नहीं । दरअसल डिस्ट्रिक्ट में ग्रांट का पैसा राजा साबू की मर्जी और सुविधा से खर्च होता रहा है, इसलिए डेविड हिल्टन ने ग्रांट-अकाउंट बंद नहीं किया और जिस कारण रमन अनेजा अपने गवर्नर-वर्ष की ग्रांट का उपयोग नहीं कर सके, तो इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा - क्योंकि राजा साबू की 'सेवा' तो होती ही रही; फर्क तब पड़ता, जब रमन अनेजा को 'ईमानदारी' से क्लब्स को ग्रांट देना होती । 
टीके रूबी अपने गवर्नर वर्ष में ग्रांट का पैसा 'ईमानदारी' से क्लब्स पर खर्च न कर सकें, और ग्रांट के पैसे का राजा साबू मनमाने तरीके से इस्तेमाल कर सके - इसलिए डेविड हिल्टन ने तीसरे वर्ष भी ग्रांट-एकाउंट खुला रखा और रोटरी वर्ष के अंत में मई/जून में उसे बंद किया । तब तक राजा साबू ने इतना जुगाड़ कर लिया था कि मेडीकल मिशन के उनके आयोजनों पर कोई आँच नहीं आ सके । राजा साबू ने इस वर्ष तो बल्कि तीन मेडीकल मिशन किए हैं । डिस्ट्रिक्ट में किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल है कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स को अपने डिस्ट्रिक्ट के भौगोलिक क्षेत्र के और या देश के बीमारों का ईलाज करने/करवाने की जरूरत क्यों नहीं महसूस होती और क्यों वह दूसरे देशों के बीमारों के ईलाज में ही ग्रांट का पैसा लगा देते हैं ? इसी से लोगों को शक होता है कि राजा साबू और उनके साथी पूर्व गवर्नर्स बीमारों के ईलाज की आड़ में वास्तव में कोई और 'धंधा' करते हैं । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल की माँग और शिकायत अपनी जगह बिलकुल उचित ही है । टीके रूबी द्वारा ग्रांट-एकाउंट बंद न करने की स्थिति में प्रवीन गोयल के लिए वास्तव में यह संभव नहीं रह गया है कि वह अपने गवर्नर-वर्ष की ग्रांट का इस्तेमाल कर सकें - लेकिन उनकी इस स्थिति के लिए डेविड हिल्टन जिम्मेदार हैं; जिन्होंने तीसरे वर्ष अपना ग्रांट-एकाउंट तब बंद किया, जब टीके रूबी के गवर्नर-वर्ष को समाप्त होने में मुश्किल से एक महीना ही बचा था । राजा साबू और उनके संगी-साथियों को लगता था कि एक महीने में टीके रूबी अपना ग्रांट-एकाउंट खुलवा नहीं सकेंगे, और टीके रूबी के गवर्नर-वर्ष की ग्रांट पर भी वह हाथ साफ कर लेंगे । लेकिन उनकी बदकिस्मती रही कि टीके रूबी ने अपने गवर्नर-वर्ष का ग्रांट-एकाउंट खुलवा लिया । राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स ने इस पर काफी हायतौबा मचाई थी, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह कुछ कर नहीं सके थे । राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स का कहना रहा है कि टीके रूबी का ग्रांट-एकाउंट खुलवाने में सुशील गुप्ता का 'सहयोग' था ।
टीके रूबी को जो ग्रांट-एकाउंट जुलाई 2017 में मिलना चाहिए था, राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स की चालबाजियों के चलते वह उन्हें जून 2018 में मिला । ग्रांट-एकाउंट को उन्हें मई 2019 तक पूरा करना था । प्रवीन गोयल उससे पहले ही टीके रूबी पर ग्रांट-एकाउंट बंद करने के लिए दबाव बनाने लगे । रोटरी इंटरनेशनल के जनरल सेक्रेटरी को लिखे उनके पत्र में यह बात स्वतः ही स्पष्ट होती है । उनके पत्र का दिलचस्प पक्ष यह है कि ग्रांट-एकाउंट बंद न करने तथा अपने गवर्नर-काल का एकाउंट न देने का वास्ता देकर प्रवीन गोयल टीके रूबी के डीआरएफसी बनने पर निशाना साध रहे हैं और जनरल सेक्रेटरी से अनुरोध कर रहे हैं कि टीके रूबी के डीआरएफसी बनने के मामले का उन्हें 'रिव्यू' करना चाहिए । प्रवीन गोयल के इस पत्र से वास्तव में राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स की वह बौखलाहट ही सामने आती है, जो टीके रूबी के डीआरएफसी बनने से उनके बीच पैदा हुई है । राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स को लगता है कि अब जब सुशील गुप्ता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा दे चुके हैं, और बीमारी के कारण कुछ कहने/करने की स्थिति में नहीं हैं, तो वह टीके रूबी को डीआरएफसी के पद से हटवा देंगे और ग्रांट के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करने का अधिकार पा लेंगे ।

Saturday, May 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में खासी फजीहत के बाद अंततः डीआरएफसी तय हुआ और सुशील गुप्ता के हस्तक्षेप तथा अशोक घोष की नर्म/गर्म कोशिशों के बावजूद बड़ी मुश्किल से संजय खन्ना के नाम पर सहमति बनी

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन (डीआरएफसी) पद को लेकर रंजन  ढींगरा व आशीष घोष के समर्थकों के बीच छिड़ी और कई दिनों से जारी लड़ाई का फायदा संजय खन्ना को मिला - और लंबी कश्मकश के बाद आखिरकार संजय खन्ना को डीआरएफसी घोषित कर दिया गया है । मजे की खास बात हालाँकि यह रही कि यूँ तो यह फैसला तीन-चार दिन पहले हो गया था, लेकिन फिर भी इसे छिपा कर रखा गया और जिन लोगों को इसकी भनक लग भी गई थी - उन्हें भी कन्फ्यूज करने की कोशिश की गई; ताकि कहीं कोई फैसले में अड़ंगा न डाल/डलवा दे । उल्लेखनीय है कि डीआरएफसी को लेकर इस बार जितनी राजनीति हुई, इससे पहले शायद ही कभी और कहीं हुई होगी । एक बार को तो लगने लगा था कि डिस्ट्रिक्ट में डीआरएफसी पर फैसला हो ही नहीं पायेगा, और डिस्ट्रिक्ट बिना डीआरएफसी के ही रहेगा । पिछले दिनों ही विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के डीआरएफसी के लिए एक महत्त्वपूर्ण ट्रेनिंग प्रोग्राम हुआ, जिसमें डिस्ट्रिक्ट 3011 का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया और जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट की खासी बदनामी भी हुई । डिस्ट्रिक्ट 3011 एक महत्त्वपूर्ण डिस्ट्रिक्ट है । डिस्ट्रिक्ट ने रोटरी को चार इंटरनेशनल डायरेक्टर दिए हैं; डिस्ट्रिक्ट के दो लोग इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की प्रक्रिया के अंतिम चरण तक पहुँचे, जिनमें से एक सुशील गुप्ता तो कामयाब भी हुए; इस कारण से रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं के बीच डिस्ट्रिक्ट की एक विशेष पहचान है । इस विशेष पहचान के चलते डीआरएफसी पर फैसला न कर पाने के लिए रोटरी में डिस्ट्रिक्ट की फजीहत हो रही थी ।
डीआरएफसी के लिए रंजन ढींगरा और आशीष घोष के नाम थे - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुरेश भसीन और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेट अनूप मित्तल का समर्थन रंजन ढींगरा को था, जबकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी संजीव राय मेहरा ने आशीष घोष को समर्थन दिया हुआ था । दोनों पक्ष अपने अपने समर्थन-रवैये पर अड़े हुए थे, जिस कारण फैसला नहीं हो पा रहा था । लेकिन जब डिस्ट्रिक्ट की फजीहत होना शुरू हुई, और बड़े नेताओं का दबाव पड़ना शुरू हुआ तो दोनों पक्ष हिले-डुले तो जरूर, लेकिन उससे मामला सुलझने की बजाये उलझ और गया । संजीव राय मेहरा ने नया नाम राजेश बत्रा का दिया, तो सुरेश भसीन व अनूप मित्तल की तरफ से दीपक तलवार, संजय खन्ना, अमित जैन के विकल्प दिए गए । मामला एक बार फिर वहीं फँस गया, जहाँ से निकलने के लिए नए नाम दिए गए थे । मामले में अपनी टाँग अड़ाते हुए विनोद बंसल ने विनय भाटिया का नाम बढ़ाया/सुझाया, लेकिन उनके सुझाव पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया । मामले को फिर से फँसता देख सुशील गुप्ता सक्रिय हुए और उन्होंने अशोक घोष को जिम्मेदारी सौंपी कि वह डीआरएफसी पर फैसला करवाएँ । अशोक घोष ने मामले में दिलचस्पी ली, और कुछ नर्म व कुछ गर्म रवैया दिखाते हुए फैसला करवाया । अशोक घोष यह भी समझ रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोग ऐसे हैं जो डीआरएफसी पर फैसला नहीं होने देना चाहते हैं और इसलिए जिस भी नाम पर सहमति बनेगी, 'इसे'या 'उसे' भड़का कर फैसले को लटकवा देंगे । डिस्ट्रिक्ट में कुछेक महत्त्वाकांक्षी लोग ऐसे हैं, जिनका संजय खन्ना से खासा विरोध है । अशोक घोष ने इसीलिए सहमति बन जाने के बाद भी फैसले की जानकारी को छिपा कर रखने पर जोर दिया ।उन्होंने संबंधित चारों लोगों को इसके लिए राजी किया कि जब तक फैसला रिकॉर्ड पर न चला जाये, किसी अन्य को फैसले की भनक भी न लगने दी जाए । कुछेक लोगों को हालाँकि भनक लग गई थी, उनके द्वारा जानकारी कन्फर्म करने की कोशिशों को लेकिन होशियारी के साथ टालमटोल करके कन्फ्यूज कर दिया गया । कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद ही संजय खन्ना के डीआरएफसी बनने की जानकारी दी गई है ।

Saturday, April 27, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का इस्तीफ़ा, रॉन बुर्टोन को रोटरी फाउंडेशन के चेयरमैन पद से हटाये जाने के तुरंत बाद ही आने के कारण, लोगों के बीच संशय का विषय बना

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देकर सुशील गुप्ता ने देश के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के रोटेरियंस को उदास और निराश करने के साथ-साथ असमंजस और संशय में डाल दिया है । रोटेरियंस दरअसल इस बात पर फूले फूले फिर रहे थे कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की कुर्सी पर उनके बीच रहने वाला व्यक्ति बैठेगा । सुशील गुप्ता का एक बड़ा लंबा सक्रिय रोटरी जीवन रहा है, और प्रायः हर डिस्ट्रिक्ट में ऐसे लोग मिल जायेंगे जिनकी रोटरी में कुल हैसियत/पूँजी और उपलब्धि यह है कि वह सुशील गुप्ता के नजदीक रहे हैं । कई डिस्ट्रिक्ट्स में दो/चार ऐसे लोग मिल जायेंगे जो रोटरी व डिस्ट्रिक्ट में सिर्फ इस वजह से 'जिंदा' हैं कि उनकी सुशील गुप्ता तक सीधी पहुँच है; डिस्ट्रिक्ट्स में कोई लफड़ा होता है, तो लफड़े से जुड़े लोग उसकी शरण में आते हैं कि भाई, सुशील गुप्ता के यहाँ ले चल ! सुशील गुप्ता काम तो शायद ही किसी के आए हों, लेकिन अपने तौर-तरीकों से उन्होंने अपना ऐसा ऑरा (आभामंडल) जरूर बनाया, जिसकी बदौलत उन्होंने तो उन्होंने, उनके नजदीकियों तक ने अपना अपना 'सिक्का' चला लिया । ऑरा के मामले में सुशील गुप्ता ने राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू को टक्कर दी है; रोटरी में राजा साबू ने जो 'हैसियत' पाई उसे छू पाने में सिर्फ सुशील गुप्ता ही कामयाब हो सके हैं - कुछेक संदर्भ में सुशील गुप्ता का पलड़ा बल्कि भारी ही रहा है । राजा साबू की जो हैसियत बनी, वह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने के बाद बनी, जबकि सुशील गुप्ता ने प्रेसीडेंट नोमीनेट होने से पहले ही उस हैसियत को पा लिया - यही कारण है कि प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के लिए राजा साबू को चुनाव का सामना करना पड़ा था, लेकिन सुशील गुप्ता के सामने वैसी कोई समस्या पैदा नहीं हुई । राजा साबू ने अपने खुन्नसी व्यवहार के चलते अपने विरोधी व 'दुश्मन' भी खूब बनाये, जबकि सुशील गुप्ता ने अपने उदार रवैये के चलते विरोधियों व 'दुश्मनों' को भी 'अपना' बनाया । यही कारण रहा कि सुशील गुप्ता जब प्रेसीडेंट नॉमिनी घोषित हुए, तब देश में हर खेमे का रोटेरियन उत्साहित हुआ, उसे एक खास किस्म के भावनात्मक गर्व की अनुभूति हुई और प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में सुशील गुप्ता का अप्रत्याशित स्वागत हुआ ।
और यही कारण है कि प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से सुशील गुप्ता के इस्तीफे की खबर ने हर किसी को उदास और निराश किया है । बीमारी को इस्तीफा देने का कारण बताये जाने से लोगों के बीच असमंजस और पैदा हुआ है । रोटरी में हर तरफ पदों के लिए भयंकर किस्म की 'मारकाट', तिकड़म और झूठ-फरेब देखते रहे रोटेरियंस के लिए इस बात को हजम कर पाना मुश्किल हो रहा है कि ठीक हो सकने वाली बीमारी के कारण सुशील गुप्ता ने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जैसा बड़ा पद यूँ ही छोड़ दिया है । सुशील गुप्ता को जबड़े संबंधी समस्या बताई जा रही है, जिसके चलते उनके लिए खाना-पीना और बोल पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव सा बना हुआ है । रोटेरियंस भी लेकिन मजेदार लोग हैं; अपना अपना डॉक्टरी-ज्ञान पेल कर हर कोई सवाल उठा रहा है कि यह न तो ऐसी बीमारी है जो लंबी चले और न ऐसी है कि ठीक न हो सके - तब फिर सुशील गुप्ता को इस्तीफा देने की जल्दी क्या पड़ गई ? सुशील गुप्ता के शुभचिंतकों की तरफ से इसके जबाव में कहा/बताया जा रहा है कि ऊपर से 'देखने' पर यह बीमारी ज्यादा गंभीर भले ही न लगे, लेकिन सोचने की बात यह है कि जब समस्या शुरू हुई होगी, तब सुशील गुप्ता ने ईलाज तो करवाया ही होगा; ईलाज के बावजूद समस्या खत्म होने की बजाये बढ़ती गई है - जिससे लग रहा है कि बीमारी उतनी सरल नहीं है, जितनी लोग समझ रहे हैं । शुभचिंतकों का यह भी कहना है कि सुशील गुप्ता एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं और संगठन को प्राथमिकता देते हैं । बीमारी के चलते वह अपने पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं, और पता नहीं आगे कितना समय उन्हें अपनी जिम्मेदारियों से विमुख रहना पड़े - लिहाजा यह विचार करके कि उनकी अनुपस्थिति में संगठन के काम पर प्रतिकूल असर न पड़े, उन्होंने पद छोड़ने का फैसला कर लिया है । सुशील गुप्ता के लिए संगठन पहले है, और उन्होंने साबित कर दिया है कि अपनी निजी वजह से वह संगठन के काम पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ने देंगे ।
हिन्दुस्तानियों का किसी भी बात को लेकर कयास लगाने का जो स्वभाव है, जिसके चलते सीता तक को अग्निपरीक्षा देने के लिए मजबूर होना पड़ा था, उसके चलते कई लोगों को लेकिन सुशील गुप्ता के शुभचिंतकों का तर्क हजम नहीं हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि सुशील गुप्ता के इस्तीफे के पीछे की कहानी कुछ और ही है, जिसे बीमारी की आड़ में छिपाया जा रहा है । यह कयास असल में रॉन बुर्टोन को रोटरी फाउंडेशन के चेयरमैन पद से हटाये जाने के तुरंत बाद ही सुशील गुप्ता द्वारा इस्तीफा देने से पैदा हुआ है । उल्लेखनीय है कि चेयरमैन के रूप में रॉन बुर्टोन का कार्यकाल कुल दो महीने ही बाकी बचा था, लेकिन फिर भी अचानक लिए गए फैसले में उन्हें हटा कर ब्रेंडा क्रेसी को बाकी दो माह के लिए उनकी चेयर दे दी गई है । सुशील गुप्ता भी हाल ही के वर्षों में रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी रहे हैं । यदि यह सिर्फ एक इत्तफाक है, तो भी बहुत संदेह पैदा करने वाला इत्तफाक है कि 22 अप्रैल को रॉन बुर्टोन को ट्रस्टी चेयर से हटाया जाता है, और चार दिन बाद ही पूर्व ट्रस्टी सुशील गुप्ता प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा दे देते हैं । यह संदेह तब और बढ़ जाता है, जब सुशील गुप्ता के नजदीकी उनके इस्तीफे पर हैरानी व्यक्त करते हैं और कहते/बताते हैं कि सुशील गुप्ता से उनकी रोज ही बात होती है, लेकिन उन्हें यह आभास नहीं मिला कि सुशील गुप्ता इतना बड़ा फैसला करने वाले हैं । इस तरह की बातों से लोगों के बीच संशय है कि हो न हो रोटरी फाउंडेशन में कुछ बड़ी ही गड़बड़ हुई है, जिसके कारण रॉन बुर्टोन को फाउंडेशन के चेयरमैन पद से हटाया गया है, और सुशील गुप्ता का प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा 'लिया' गया है । हालाँकि रॉन बुर्टोन को हटाने के तथा सुशील गुप्ता के इस्तीफे के जो जो कारण बताये गए हैं, उनमें कोई साम्य नहीं बैठता दिखता है; लेकिन 'टाइमिंग' के चलते सुशील गुप्ता का इस्तीफा संशय में जरूर आ जाता है । मौजूदा समय ऐसा है, जिसमें दुनिया में, समाज में, देश में और रोटरी में हम बड़ी बड़ी 'मूर्तियों' को 'ढहते' हुए देख रहे हैं, तब फिर कोई भी बुरी बात चौंकाती नहीं है; इसलिए भी सुशील गुप्ता का प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से हुआ इस्तीफा संशय के घेरे में आ जाता है ।


Monday, April 15, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के साथ बनी दूरी के कारण इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में पतली हुई हालत से उबरने के लिए विनोद बंसल ने शेखर मेहता व मनोज देसाई की मदद से अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के एक प्रमुख कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति 'दिखा' कर बड़ा 'कांड' किया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3054 तथा डिस्ट्रिक्ट 3060 द्वारा संयुक्त रूप से अहमदाबाद में आयोजित किए गए प्रेसीडेंट इलेक्ट व सेक्रेटरी इलेक्ट के ट्रेनिंग सेमीनार में आमंत्रित वक्ताओं में विनोद बंसल की उपस्थिति ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के बनते-बिगड़ते समीकरणों में दिलचस्पी रखने वाले रोटेरियंस को चौंकाया है; और उन्हें उक्त कार्यक्रम में विनोद बंसल की मौजूदगी एक पहेली की तरह लगी है । हालाँकि कार्यक्रम जिन 'लोगों' का था, और कार्यक्रम में जो भी प्रमुख लोग शामिल थे - उनके साथ विनोद बंसल के नजदीक के संबंध रहे हैं; और विनोद बंसल उनके काम आते रहे हैं और बदले में समय-समय पर उनसे 'फायदे' भी लेते रहे हैं । इस पृष्ठभूमि में, उक्त कार्यक्रम में विनोद बंसल की उपस्थिति पर सवाल नहीं उठने चाहिए थे - लेकिन वह उठे हैं, तो इसका कारण इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए बनने वाला समीकरण है । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 3054 के पूर्व गवर्नर अशोक गुप्ता उम्मीदवार हैं, तो डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल भी तैयारी करते सुने/देखे जा रहे हैं । इसलिए डिस्ट्रिक्ट 3054 के कार्यक्रम में विनोद बंसल की उपस्थिति राजनीतिक रूप से मामले को हैरान करने वाला बनाती है । मजे की बात यह है कि अशोक गुप्ता और विनोद बंसल - दोनों एक ही खेमे के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं, और जिन बड़े नेताओं को अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, विनोद बंसल भी उन्हीं नेताओं के भरोसे अपनी दाल गलाने की फिराक में बताये/सुने जा रहे हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में लोगों के बीच अभी जो परसेप्शन है, उसमें अशोक गुप्ता का पलड़ा ही भारी देखा/समझा जा रहा है; लेकिन इसके बावजूद विनोद बंसल जिस तरह से तैयारी करते हुए देखे जा रहे हैं, उससे लोगों को यह अहसास भी हो रहा है कि विनोद बंसल को कहीं से तो 'फूँक' मिल रही है, जिसके भरोसे उन्हें 'लग' रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद को लेकर जोन के रोटेरियंस के बीच अभी भले ही जो परसेप्शन हो, लेकिन उनके लिए मौका बन सकता है ।
दरअसल इसी कवायद के चलते डिस्ट्रिक्ट 3054 और डिस्ट्रिक्ट 3060 के संयुक्त कार्यक्रम में विनोद बंसल की उपस्थिति ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के कान खड़े किए हैं । इन खड़े कानों में उन्हें जो सुनाई दिया है, उससे परस्पर विरोधी दावे किए गए हैं । कुछेक लोगों का कहना है कि कार्यक्रम में विनोद बंसल का शामिल होना 'घर की बात' है, और इसमें 'राजनीति' नहीं देखी जानी चाहिए; लेकिन अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि विनोद बंसल जब 'घर' में बबाल करने वाले हालात पैदा करने का काम कर रहे हैं तो फिर राजनीति तो देखी ही जाएगी । कहा/बताया और सुना जा रहा है कि उक्त कार्यक्रम का निमंत्रण पाने के लिए विनोद बंसल ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता और मनोज देसाई से तगड़ी सिफारिश करवाई, और उन दोनों की सिफारिश के बाद ही विनोद बंसल को उक्त कार्यक्रम का निमंत्रण मिला । यूँ तो विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कार्यक्रमों का निमंत्रण पाने के लिए विनोद बंसल द्वारा लॉबिइंग करने की बात सुनी/बताई जाती है; लेकिन उस बात में कोई बुराई न देखने वाले लोगों का भी मानना/कहना है कि विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट 3054 के कार्यक्रम में शामिल होने से बचना चाहिए था, क्योंकि उससे नाहक ही एक विवाद की सी स्थिति बनी है । कुछेक लोगों को आशंका है कि हो सकता है कि विनोद बंसल ने यह विवाद की सी स्थिति बनाने/दिखाने के लिए ही अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3054 के एक प्रमुख कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति को संभव बनाने के लिए शेखर मेहता व मनोज देसाई से दबाव डलवाया हो । इससे विनोद बंसल यह जताने/दिखाने में भी 'सफल' हुए हैं कि वह शेखर मेहता और मनोज देसाई से कभी भी कुछ भी करवा सकते हैं - उन्हें लगता है कि इससे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का 'वजन' बढ़ेगा ।
विनोद बंसल को इसकी बहुत 'जरूरत' भी है । असल में पिछले दिनों घटी कई घटनाओं से लोगों के बीच यह बात स्थापित हुई है कि खेमे के सबसे बड़े नेता - इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के यहाँ विनोद बंसल का 'कद' घटा है । विनोद बंसल ने हालाँकि सुशील गुप्ता के यहाँ अपनी अच्छी 'जगह' बना ली थी, लेकिन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के बाद से उनके प्रति सुशील गुप्ता का रवैया कुछ बदला बदला सा दिख रहा है । सेन डिएगो में अभी पिछले ही दिनों संपन्न हुई इंटरनेशनल असेम्बली में सुशील गुप्ता ने विनोद बंसल की बजाये रंजन ढींगरा को अपने साथ ले जाने के मामले में जो तवज्जो दी, उसे विनोद बंसल के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा/पहचाना । अभी हाल ही में, सुशील गुप्ता की सरपरस्ती वाले रोटरी इंडिया वाटर कंजर्वेशन ट्रस्ट द्वारा दिल्ली में आयोजित किए गए 'वर्ल्ड वाटर डे' के कार्यक्रम में रंजन ढींगरा और अशोक गुप्ता की मौजूदगी तो लोगों को नजर आई, लेकिन विनोद बंसल उक्त कार्यक्रम में नहीं दिखे । विनोद बंसल के अपने डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना/कहना है कि इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में विनोद बंसल द्वारा निभाई गई भूमिका ने सुशील गुप्ता को नाराज करने का काम किया है, और इसीलिए विनोद बंसल अब उनकी गुडबुक में नहीं रह गए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में विनोद बंसल ने उन निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के उम्मीदवार अशोक कंतूर का समर्थन किया, जिन्होंने पिछले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल में सुशील गुप्ता को तरह तरह से अपमानित किया और नीचा दिखाने वाले काम किए । विनोद बंसल के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि उनके समर्थन के बावजूद अशोक कंतूर चुनाव भी हार गए । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चक्कर में विनोद बंसल की सुशील गुप्ता के साथ जो दूरी बनी, उससे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के मामले में उनकी हालत खासी पतली कर दी । इस स्थिति से उबरने के लिए विनोद बंसल को कोई बड़ा 'कांड' करने की जरूरत थी - अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के एक प्रमुख कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति 'दिखा' कर जो उन्होंने कर दिया है । इसका उन्हें कोई राजनीतिक फायदा मिलेगा या नहीं, यह बात लेकिन आगे पता चलेगी ।

Wednesday, January 30, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के जरिये विनोद बंसल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी संभावित उम्मीदवारी के समर्थन के लिए डिस्ट्रिक्ट में अनुकूल माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं क्या ?

नई दिल्ली । एक से दो फरवरी के बीच हो रही डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की तैयारी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की संलग्नता को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उनकी संभावित उम्मीदवारी की तैयारी के रूप में देखे जाने के कारण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का रवैया अचानक से आलोचनात्मक हो गया है । उनकी तरफ से शिकायतें अचानक से तेज हो गयीं हैं, जिनमें तरह तरह से सिर्फ एक ही बात सुनी जा रही है और वह यह कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की तैयारी में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया पूर्व गवर्नर्स को तो पूछ ही नहीं रहे हैं, और एक अकेले विनोद बंसल ही उनके सलाहकार बने हुए हैं । पूर्व गवर्नर्स को लग रहा है कि विनोद बंसल ने जैसे डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को हाईजैक कर लिया है, और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की तैयारी में अन्य पूर्व गवर्नर्स के लिए कोई जगह, कोई मौका नहीं छोड़ा है । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की तैयारी में तथा उसके 'प्रचार' में विनोद बंसल ज्यादा 'दिख' नहीं रहे हैं, और उन्होंने अपने आप को पीछे व छिपाकर ही रखा हुआ है - क्योंकि वह जानते/समझते हैं कि वह यदि ज्यादा दिखेंगे तो अन्य पूर्व गवर्नर्स भड़केंगे और उनके लिए परेशानी पैदा करेंगे; इसके बावजूद विनोद बंसल 'पकड़' लिए गए हैं । विनोद बंसल के लिए समस्या और चुनौती की बात यह है कि उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स उन्हें आगे बढ़ता देख नहीं पाते हैं । उल्लेखनीय है कि पीटी प्रभाकर के इंटरनेशनल डायरेक्टर रहते हुए दिल्ली में रोटरी जोन इंस्टीट्यूट आयोजित होने की योजना बनी थी, जिसका लेकिन दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स ने सिर्फ इसलिए भारी विरोध किया था - क्योंकि विनोद बंसल को उस इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनाया जा रहा था; उस विरोध के चलते पीटी प्रभाकर के डायरेक्टर-वर्ष में रोटरी जोन इंस्टीट्यूट दिल्ली में नहीं हो पाया था, और विनोद बंसल से इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनने का मौका छिन गया था ।
लगता है कि उसी अनुभव से सबक लेकर विनोद बंसल ने इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को हाईजैक कर लेने के बावजूद उसकी तैयारी में अपने आपको 'दिखाने' से बचने का प्रयास किया है । लेकिन चूँकि तैयारी पर उनकी छाप देख/पहचान ली गई है, इसलिए उनका प्रयास सफल नहीं रहा है - और पूर्व गवर्नर्स को शिकायतें करने का बहाना/मौका मिल गया है । पूर्व गवर्नर्स का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की तैयारी के बहाने से विनोद बंसल दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया की 'स्थिति' को सुधारने और मजबूत बनाने/करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए वह विनय भाटिया को उम्मीदवार बना/बनवा सकें । पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि विनोद बंसल को भी पता है कि डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स में ऐसा कोई नहीं है, जो नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की वकालत करे; और उन्हें जब नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग में अपने ही डिस्ट्रिक्ट के प्रतिनिधि का समर्थन नहीं मिलेगा, तब फिर दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के प्रतिनिधियों के समर्थन की वह कैसे क्या उम्मीद कर सकते हैं ? अगले से अगले रोटरी वर्ष में जब उक्त नोमीनेटिंग कमेटी के लिए सदस्यों का चुनाव होगा, तब तक विनय भाटिया पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स वाली कैटेगरी में आ चुके होंगे और अकेले वही होंगे जो यदि नोमीनेटिंग कमेटी के लिए चुने जा सके, तो विनोद बंसल की उम्मीदवारी के पक्ष में आवाज उठा सकेंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय भाटिया का कार्यकाल ऐसा नहीं जा रहा है कि पूर्व हो जाने के बाद डिस्ट्रिक्ट में उनकी कोई अहमियत रहे/बचे; इसलिए विनोद बंसल की कोशिश है कि वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को ऐसी यादगार कांफ्रेंस बना/बनवा दें कि उसके सहारे विनय भाटिया की कुछ साख/पहचान बन जाये और उनके काम आए । विनय भाटिया की हरकतों से नाराज होने वाले खास तौर से फरीदाबाद तथा आमतौर से डिस्ट्रिक्ट के 'अपने' लोगों को पुनः विनय भाटिया के साथ ला कर विनोद बंसल ने अपने कुनबे को फिर से जोड़ने का काम किया है - उन्हें उम्मीद होगी कि यह काम और इसके नतीजे व्यर्थ नहीं जायेंगे और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में डिस्ट्रिक्ट में उन्हें अलग-थलग पड़ने से बचायेंगे । 
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में विनोद बंसल को अपने डिस्ट्रिक्ट में सिर्फ पूर्व गवर्नर्स से ही चुनौती मिलने का खतरा नहीं है, बल्कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का बदलता दिख रहा रवैया भी उनके लिए मुसीबत पैदा कर रहा है । सेन डिएगो में अभी हाल ही में संपन्न हुई इंटरनेशनल असेम्बली में सुशील गुप्ता के साथ रंजन ढींगरा के जाने को विनोद बंसल के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुशील गुप्ता के साथ रंजन ढींगरा की नजदीकियत हालाँकि काफी पुरानी है, लेकिन हाल-फिलहाल की चर्चा में यह बात रही है कि पिछले कुछ समय से नजदीकियत की वह जगह रंजन ढींगरा से विनोद बंसल ने ले ली है । कई मौकों पर ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिनसे उक्त बात की पुष्टि भी हुई । लेकिन सेन डिएगो जाने में सुशील गुप्ता ने विनोद बंसल की बजाये रंजन ढींगरा को जो तवज्जो दी, उससे लोगों के बीच संदेश गया कि रंजन ढींगरा की जगह अभी भी रंजन ढींगरा के पास ही है । इस संदेश का इसलिए खास अर्थ है और यह विनोद बंसल के लिए इसलिए मुसीबत की बात है - क्योंकि रंजन ढींगरा को भी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । ऐसे में, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में विनोद बंसल के अपने ही डिस्ट्रिक्ट में विपरीत हालातों का और गंभीर चुनौतियों का सामना करने की स्थितियाँ बनी हैं । इन स्थितियों से निपटने के लिए विनोद बंसल को सहयोगियों की जरूरत तो होगी ही, जिनकी लेकिन उनके लिए बहुत कमी है । ले दे के एक विनय भाटिया पर वह कुछ भरोसा कर सकते हैं; विनय भाटिया की लेकिन डिस्ट्रिक्ट में कोई साख/पहचान नहीं बन पाई है । विनय भाटिया की मदद से विनोद बंसल ने इस वर्ष अशोक कंतूर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने का बीड़ा उठाया था, जिसमें उन्हें लेकिन करारी मात मिली । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को अच्छे से आयोजित कर/करवा कर विनोद बंसल उस हार से मिली फजीहत को धुँधला करना तथा विनय भाटिया की 'कुछ न कर सकने' वाली इमेज को सुधारना चाहते हैं - ताकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में विनय भाटिया उनके कुछ काम आ सकें । डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स ने इस बात को पहचान/समझ कर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को लेकर जिस तरह की शिकायतें करना शुरू कर दिया है, उससे लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए विनोद बंसल की अपने ही डिस्ट्रिक्ट में राह आसान नहीं है । 

Friday, January 18, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद पर विनोद बंसल की नियुक्ति और उसके बाद, डीआरएफसी पद पर रंजन ढींगरा और आशीष घोष को लेकर चल रही खींचतान के पीछे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का हाथ है क्या ?

नई दिल्ली । अगले तीन वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद संभालने वाले क्रमशः सुरेश भसीन, संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल के बीच सहमति न बन पाने के कारण अगले तीन वर्षों के लिए नियुक्त होने वाले डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन का नाम तय होने का काम लगातार टलता ही जा रहा है - और उसके हल होने के जल्दी ही कोई आसार नहीं दिख रहे हैं । सुरेश भसीन और अनूप मित्तल उक्त पद के लिए रंजन ढींगरा का नाम ले रहे हैं, जबकि संजीव राय मेहरा ने आशीष घोष के नाम को लेकर पैर जमाया हुआ है । संजीव राय मेहरा का गंभीर आरोप यह है कि डीआरएफसी के लिए आशीष घोष के नाम पर पहले तीनों की सहमति बन गई थी, लेकिन फिर अचानक से पता नहीं क्या हुआ कि सुरेश भसीन और अनूप मित्तल ने आशीष घोष के नाम पर दी गई अपनी अपनी सहमति को वापस ले लिया और वह रंजन ढींगरा के नाम की वकालत करने लगे । संजीव राय मेहरा चूँकि अपनी राय बदलने के लिए तैयार नहीं हुए, इसलिए मामला अटक गया । संजीव राय मेहरा की तरफ से यह सुझाव भी दिया गया कि चूँकि इन दोनों नामों पर सहमति नहीं बन पा रही है, इसलिए किसी तीसरे नाम पर विचार किया जाए । सुरेश भसीन और अनूप मित्तल लेकिन इसके लिए भी राजी नहीं हो रहे हैं । इससे लगा है कि जैसे सुरेश भसीन और अनूप मित्तल डीआरएफसी पद के लिए रंजन ढींगरा के नाम की जिद पकड़ कर बैठ गए हैं; जिसकी प्रतिक्रिया में संजीव राय मेहरा ने भी जिद पकड़ ली लगती है - औरडीआरएफसी पद को लेकर मामला फँस गया है ।
इस झमेले की शुरुआत वास्तव में सुरेश भसीन के गवर्नर-वर्ष के लिए विनोद बंसल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने से हुई । दरअसल सुरेश भसीन के गवर्नर-वर्ष का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद रंजन ढींगरा को मिलने की चर्चा थी ।इसके लिए कई लोग रंजन ढींगरा को बधाई भी दे चुके थे, और रंजन ढींगरा बधाई ले भी चुके थे । लेकिन डिस्ट्रिक्ट में लोग तब हक्के-बक्के रह गए जब डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर उन्होंने विनोद बंसल की ताजपोशी होते हुए देखी । विनोद बंसल की ताजपोशी पर लोगों को आश्चर्य इसलिए भी हुआ, क्योंकि विनोद बंसल को अक्सर ही कहते/बताते सुना जाता है कि रोटरी फाउंडेशन एंडोवमेंट मेजर गिफ्ट एडवाइजर लीडरशिप टीम में शामिल होने के बाद उनके लिए डिस्ट्रिक्ट और जोन का हर पद छोटा है, और उन्हें डिस्ट्रिक्ट में या जोन में कोई पद नहीं चाहिए । यह कहते/बताते रहने के बावजूद अगले रोटरी वर्ष में लगातार दूसरे वर्ष उनको डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद लेते देख लोगों को कहने का मौका मिला कि विनोद बंसल कहते तो हैं कि उन्हें कोई पद नहीं चाहिए, लेकिन वास्तव में उन्हें हर पद चाहिए । कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी मानना/कहना है कि रोटरी फाउंडेशन एंडोवमेंट मेजर गिफ्ट एडवाइजर लीडरशिप टीम में पद मिलना भले ही इंटरनेशनल लेबल की बात हो, लेकिन उक्त पद का रोटेरियंस के बीच वास्तव में कोई 'ग्लैमर' नहीं है; सच तो यह है कि डिस्ट्रिक्ट में और या जोन में कोई जानता भी नहीं होगा कि ऐसी कोई लीडरशिप टीम है, जिसमें विनोद बंसल को शामिल किया गया है । इसलिए उक्त पद पर होने में कोई 'मजा' नहीं है, और ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि इंटरनेशनल लेबल का एक बड़ा पद मिलने के बाद भी डिस्ट्रिक्ट और जोन के 'छोटे' 'छोटे' पदों के लिए विनोद बंसल का मोह न छूट पाता हो । अब एक इंटरनेशनल लेबल के पद पर रहते हुए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर जैसे डिस्ट्रिक्ट के पद को - और वह भी लगातार दूसरे वर्ष - विनोद बंसल ने क्यों स्वीकार कर लिया, यह तो विनोद बंसल ही जानते होंगे; लेकिन उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के साथ ही डिस्ट्रिक्ट में झमेला खड़ा हो गया । रंजन ढींगरा से डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद छिना तो उन्हें डीआरएफसी का पद देने की चर्चा शुरू हुई ।
इस चर्चा ने ही मामले में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता की मिलीभगत के संकेत दिए । चूँकि विनोद बंसल और रंजन ढींगरा को सुशील गुप्ता के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है; इसलिए माना/समझा जा रहा है कि सुशील गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के दोनों महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने नजदीकियों की नियुक्ति के लिए दबाव बनाया है । डीआरएफसी पद के लिए आशीष घोष के नाम पर बनी सहमति से सुरेश भसीन और अनूप मित्तल ने जिस तरह से पलटी मारी, उससे भी मामले में सुशील गुप्ता की मिलीभगत के संदेह और मजबूत हुए हैं - क्योंकि सुरेश भसीन और अनूप मित्तल को भी सुशील गुप्ता की 'टीम' के सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता है । संजीव राय मेहरा ने भी जिस तरह से जिद पकड़ ली है; और वह आशीष घोष के नाम को तो छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं, लेकिन रंजन ढींगरा के नाम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं - उससे भी उक्त मामला डिस्ट्रिक्ट में सुशील गुप्ता खेमे और उनके विरोधी खेमे के बीच का झगड़ा बनता नजर आ रहा है । संजीव राय मेहरा ने इस मामले को एक बड़ी बहस में तब्दील करने की भी कोशिश की है, जिसके तहत उनका सवाल है कि ग्रांट्स आदि के काम करने का रंजन ढींगरा को जब कोई अनुभव नहीं है, तब डीआरएफसी का पद उन्हें ही देने पर जोर क्यों दिया जा रहा है; और इस तरह से पद देने के मामले में सिफारिश और पक्षपातपूर्ण व्यवहार क्यों हावी हो रहा है ? डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोगों को लग रहा है कि इस तरह की बातों के जरिये वास्तव में सुशील गुप्ता को निशाने पर लेने और उन्हें घेरने की कोशिश की जा रही है । समझा जा रहा है कि विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद दिलवा कर सुशील गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में एक ऐसा पिटारा खोल दिया है, जिसमें विवाद ही विवाद हैं ।

Monday, January 14, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के दूसरे सदस्यों को दरकिनार कर मनमाने तरीके से की जा रही विनोद बंसल की कार्रवाई रवि चौधरी की लूट-खसोट पर पर्दा डालने का मौका बना रही है, जो इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के लिए भी फजीहत का कारण हो सकता है

नई दिल्ली । पिछले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के चेयरमैन विनोद बंसल पर राजनीति करने तथा उन्हें परेशान और बदनाम करने का आरोप लगाया है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का डिस्ट्रिक्ट होने के नाते इस मामले में रोटरी के छोटे/बड़े नेताओं की भी दिलचस्पी नजर आ रही है । रवि चौधरी की तरफ से गंभीर आरोप यह सुनने को मिल रहा है कि विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के बाकी सदस्यों को विश्वास में लिए बिना, उनके द्वारा दिए/सौंपे गए विवरण में कमी निकाल रहे हैं और तरह तरह से उन्हें दबाव में लेने की कोशिश कर रहे हैं । रवि चौधरी की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि उन्होंने अक्टूबर में ही अपने गवर्नर-वर्ष के अकाउंट्स डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के तीनों सदस्यों को भेज दिए थे, जिस पर तीनों सदस्यों को मीटिंग करना थी और तीनों सदस्य जिन कमियों पर एकराय होते - उन कमियों के बारे में उनसे स्पष्टीकरण माँगते - चेयरमैन के रूप में विनोद बंसल ने लेकिन डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के बाकी सदस्यों के साथ कोई मीटिंग ही नहीं की, और खुद 'चौधरी' बन कर हिसाब-किताब में कमियाँ निकालने/बताने लगे । रवि चौधरी का कहना है कि विनोद बंसल उनके द्वारा दिए गए विवरणों को लीक कर रहे हैं, और उनके आधे-अधूरे होने की बात कहते हुए उन पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में पैसे कमाने/बनाने के आरोपों को हवा दे रहे हैं । रवि चौधरी और उनके समर्थकों की तरफ से कहा जा रहा है कि विनोद बंसल के रवैये से लग रहा है कि उनकी दिलचस्पी पिछले रोटरी वर्ष के अकाउंट्स को क्लियर करने/करवाने में नहीं है, और वह उसकी आड़ में डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के बाकी दो सदस्यों के सामने खुद को 'बॉस' दिखाने/जताने तथा रवि चौधरी को परेशान और बदनाम करने का काम कर रहे हैं ।
विनोद बंसल पर लगाए जा रहे रवि चौधरी के इन आरोपों को डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोग 'उल्टा चोर कोतवाल को डांटे' वाले मुहावरे के रूप में ले रहे हैं । लोगों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने पैसों की जो लूट-खसोट मचाई, और जिसे लेकर खुद अपने द्वारा दिए विवरण में ही वह 'पकड़े/फँसते' दिख रहे हैं - उससे लोगों का ध्यान भटकाने के लिए वह उलटे विनोद बंसल पर ही आरोप लगा रहे हैं । लोगों का कहना है कि विनोद बंसल पर आरोप लगाने की बजाये; कई एक रोटेरियंस से पैसे लेने और उस पैसे का विवरण न देने के जो आरोप 'पब्लिक डोमेन' में सुने/सुनाये जा रहे हैं - वह भले ही विनोद बंसल के यहाँ से लीक हुए हों - रवि चौधरी को उन आरोपों का जबाव देना चाहिए । लोगों की माँग है कि रवि चौधरी पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में लोगों से पैसे लेने और उसका विवरण हिसाब-किताब में न देने तथा खर्चों के कच्चे/फर्जी बिल देने के जो आरोप लग रहे हैं, वह बहुत ही गंभीर किस्म के आरोप हैं, और डिस्ट्रिक्ट व रोटरी को कलंकित करने वाले हैं - इसलिए रवि चौधरी को सीधे सीधे तरीके से उनके जबाव देने चाहिए; और यदि वह ऐसा नहीं करते हैं, तो काउंसिल ऑफ गवर्नर्स को रवि चौधरी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना चाहिए ।
रवि चौधरी अपने ऊपर लगे आरोपों को भटकाने का जो प्रयास कर रहे हैं, कई लोग उसके लिए विनोद बंसल को भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । लोगों का कहना है कि विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के बाकी दोनों सदस्यों - आशीष घोष और राजेश बत्रा को दरकिनार कर पिछले रोटरी वर्ष के अकाउंट्स को लेकर रवि चौधरी के साथ जो 'खेल' खेल रहे हैं, उसने रवि चौधरी को 'टेबल टर्न' करने का अवसर दिया है, और रवि चौधरी इसी का फायदा उठा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि नियम, तरीका, परंपरा यह है कि निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अपने वर्ष के अकाउंट्स का विवरण डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के सभी सदस्यों को भेजता है; कमेटी सदस्य उस विवरण को लेकर मीटिंग करते हैं - और आपसी सहमति से उन्हें जो कोई तथ्य संदेहास्पद लगते हैं, उसके बारे में कमेटी निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से स्पष्टीकरण माँगती है; और इस तरह अकाउंट्स मान्य होने की तरफ बढ़ते हैं । इस बार लेकिन विनोद बंसल ने एक अलग ही नजारा पेश किया । वह चूँकि डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के चेयरमैन हैं, शायद इसलिए उन्होंने मान लिया कि 'बॉस' वही हैं और उन्हें बाकी सदस्यों के साथ मीटिंग करने की कोई जरूरत ही नहीं है और उन्होंने अकेले ही रवि चौधरी से मीटिंग कर ली । रवि चौधरी ने अक्टूबर में अपने अकाउंट्स के विवरण सौंप दिए थे; उसके बाद किसी किसी ने विनोद बंसल से डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी की मीटिंग के बारे में पूछा भी, लेकिन हर किसी को विनोद बंसल से यही सुनने को मिला कि जल्दी क्या है, मीटिंग हो जाएगी - पर जो अभी करीब करीब तीन महीने होने पर भी नहीं हो पाई है । तीन सदस्यीय डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी में चेयरमैन होता जरूर है, लेकिन वह सिर्फ एक व्यवस्था के तहत होता है, उसे कोई विशेषाधिकार नहीं होता है - लेकिन विनोद बंसल ने लगता है कि अपने लिए विशेषाधिकार खुद गढ़ लिया और चेयरमैन होने के नाते उन्होंने अपने आप को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का 'बॉस' मान लिया । विनोद बंसल के इस रवैये ने पिछले रोटरी वर्ष के अकाउंट्स के मामले को और उलझा दिया है, जिसमें रवि चौधरी को बचने का चोर-दरवाजा नजर आ रहा है । विनोद बंसल के रवैये के चलते रवि चौधरी की लूट-खसोट पर यदि पर्दा पड़ा रह गया, तो यह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के लिए भी फजीहत भरी स्थिति हो सकती है ।