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Monday, August 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता के चुने जाने की पटकथा, भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले एक पूर्व प्रेसीडेंट की सुशील गुप्ता के साथ जुलाई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई एक गुपचुप मुलाकात में ही लिख दी गई थी क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2021-22 के प्रेसीडेंट पद के लिए शेखर मेहता के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से सुशील गुप्ता विरोधी रोटेरियंस को खासा तगड़ा झटका लगा है, और 26 अप्रैल को सुशील गुप्ता के इस्तीफे के बाद फूला हुआ उनका जोश का गुब्बारा एक बार फिर से पिचक गया है । शेखर मेहता को सुशील गुप्ता के खेमे का 'आदमी' तो माना ही जाता है, इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद पर शेखर मेहता की जीत को सुशील गुप्ता के ऑरा (आभामंडल) की जीत के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । इससे पहले सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने से खाली हुआ वर्ष 2020-21 का प्रेसीडेंट पद होल्गर नेक को मिल जाने में भी सुशील गुप्ता की भूमिका को देखा/पहचाना गया था । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की चुनावी दौड़ में होल्गर नेक व शेखर मेहता अभी कहीं नजर नहीं आ रहे थे । होल्गर नेक को पर्याप्त समर्थन नहीं था, और शेखर मेहता के लिए सुशील गुप्ता के 'पूर्व प्रेसीडेंट' हो जाने तक इस बारे में सोचना भी असंभव था । शेखर मेहता तो अभी करीब तीन महीने पहले, सुशील गुप्ता का इस्तीफा होने के बाद उम्मीदवार बने थे । तीन महीने पहले कोई अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करे, और प्रेसीडेंट चुन लिया जाए - रोटरी इंटरनेशनल के 114 वर्षों के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ । शेखर मेहता ने यह एक नया इतिहास रचा है, तो इसके पीछे रोटरी इंटरनेशनल में बने सुशील गुप्ता के ऑरा को ही देखा/पहचाना जा रहा है - और इस बात ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादियों की 'खुशियों' पर जैसे ताला जड़ दिया है ।
उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य कारणों से सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद सुशील गुप्ता के विरोधी नेताओं के मन बड़े गदगद थे । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता से नजदीकियाँ बनाने और 'दिखाने' वाले महत्त्वाकांक्षी नेताओं ने - जिनमें उनके डिस्ट्रिक्ट के महत्त्वाकांक्षी नेता भी हैं - उनके इस्तीफा देते ही रंग बदलना शुरू कर दिया था । सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं ने मान/समझ लिया था कि रोटरी इंटरनेशनल की 'व्यवस्था' तथा उसकी राजनीति में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हो गया है, और इसलिए उन्हें सुशील गुप्ता की परवाह करने की जरूरत नहीं है । लेकिन पहले होल्गर नेक और अब शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने ने उनकी 'समझ' पर पत्थर गिरा दिए हैं । होल्गर नेक के बाद शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं को तगड़ा करंट दिया है; दरअसल सुशील गुप्ता के प्रभाव को खत्म हुआ मान कर उन्होंने रोटरी में अपने जो जो मंसूबे बनाए थे, वह सब उन्हें फेल होते हुए दिख रहे हैं । होल्गर नेक के बाद शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने से उन्हें यह मुश्किल लग रहा है कि सुशील गुप्ता की 'अनुपस्थिति' का वह कोई फायदा उठा सकेंगे । इससे दरअसल साबित हुआ है कि सुशील गुप्ता भले ही बीमार हों, और बीमारी के चलते वह प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद छोड़ने के लिए मजबूर हुए हों - लेकिन रोटरी में उनका प्रभाव पहले जैसा ही बना हुआ है; और यह बात रोटरी में उनके विरोधियों तथा अवसरवादी महत्त्वाकांक्षी नेताओं के लिए काफी मुसीबतभरी है ।
शेखर मेहता की जीत और उसमें सुशील गुप्ता के 'असर' के एक प्रमुख कारण के रूप में रोटरी इंटरनेशनल में भारत के बढ़ते दबदबे को भी देखा/पहचाना जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल की सदस्यता तथा रोटरी फाउंडेशन में हिस्सेदारी के मामले में भारत की हैसियत जिस तरह से बढ़ रही है, उसे देखते हुए रोटरी इंटरनेशनल को 'नियंत्रित' करने वाले लोगों के लिए भारत के नेताओं की उपेक्षा करना और उन्हें अलग-थलग रखना अब मुश्किल होता जा रहा है । दक्षिण एशिया के जिन रोटरी नेताओं व पूर्व प्रेसीडेंट्स को भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, उन्होंने भी वस्तुस्थिति को समझा/पहचाना है और अपने विरोध के स्वर को नीचा किया है । इसी संदर्भ में भारत विरोधी व सुशील गुप्ता विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले एक पूर्व प्रेसीडेंट की जुलाई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई एक गुपचुप मुलाकात को महत्त्वपूर्ण घटनाचक्र के रूप में देखा/पहचाना गया । सुशील गुप्ता के नजदीकियों का दावा है कि उस गुपचुप मुलाकात में ही शेखर मेहता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने जाने की पटकथा लिख दी गई थी ।

Saturday, June 22, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी होल्गर नेक ने अपनी कोर टीम में सुशील गुप्ता के 'लोगों' को ही बनाए रख कर रोटरी में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हुआ मान कर खुशी मनाने वाले उनके विरोधियों को तगड़ा झटका दिया है

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के बाद इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद की जिम्मेदारी संभालने वाले होल्गर नेक ने सुशील गुप्ता द्वारा बनाई गई कोर टीम को ही अपनी कोर टीम बना कर सुशील गुप्ता के विरोधियों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य कारणों से सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देने के बाद सुशील गुप्ता के विरोधी नेताओं के मन बड़े गदगद थे । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता से नजदीकियाँ बनाने और 'दिखाने' वाले महत्त्वाकांक्षी नेताओं ने भी उनके इस्तीफा देते ही रंग बदलना शुरू कर दिया था । सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं ने मान/समझ लिया था कि रोटरी इंटरनेशनल की 'व्यवस्था' तथा उसकी राजनीति में सुशील गुप्ता का प्रभाव खत्म हो गया है, और इसलिए उन्हें सुशील गुप्ता की परवाह करने की जरूरत नहीं है । लेकिन सुशील गुप्ता की जगह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बने होल्गर नेक ने उनकी 'समझ' पर पत्थर गिरा दिए हैं । इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय होल्गर नेक की कोर टीम की चल रही मीटिंग की तस्वीरों में यह देखने को मिल रहा है कि सुशील गुप्ता द्वारा अपनी कोर टीम के लिए चुने गए पदाधिकारियों को ही होल्गर नेक ने अपनी कोर टीम में बनाए रखा है और इसके जरिये उन्होंने वास्तव में यह 'संदेश' देने का काम किया है कि उन्हें सुशील गुप्ता से अलग न समझा जाए । होल्गर नेक के इस संदेश ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं की 'खुशियों' पर जैसे ताला डाल दिया है । 
उल्लेखनीय है कि सुशील गुप्ता के इस्तीफा देने के बाद, इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद पर होल्गर नेक का 'चयन' हुआ था, तब भी यह चर्चा चली थी कि उनके चयन में सुशील गुप्ता की पसंद का ध्यान रखा गया है । दरअसल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद के दावेदारों में होल्गर नेक की स्थिति बहुत ही कमजोर थी; इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव की राजनीति के खिलाड़ियों में कोई भी उन्हें 'दौड़' में नहीं पा/देख रहा था । सुशील गुप्ता के इस्तीफे के बाद, प्रेसीडेंट नॉमिनी पद के लिए होने वाले पुनर्निर्वाचन में उन उम्मीदवारों का पलड़ा भारी देखा/पहचाना जा रहा था जिनका सुशील गुप्ता के साथ तगड़ा मुकाबला हुआ था, और जो बहुत मामूली अंतर से पिछड़ गए थे । होल्गर नेक को तो कोई भी संभावित प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में नहीं देख रहा था; यहाँ तक कि वह खुद भी कोई उम्मीद नहीं रखे थे और इसीलिए प्रेसीडेंट नॉमिनी पद के लिए होने वाले पुनर्निर्वाचन की प्रक्रिया में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । लेकिन जब उनके नाम की घोषणा हुई, तब हर किसी को हैरानी हुई । नोमीनेटिंग कमेटी ने जितनी आसानी से होल्गर नेक के नाम पर सहमति बनाई, उतनी आसानी से तो सुशील गुप्ता भी नहीं चुने गए थे । नोमीनेटिंग कमेटी में सुशील गुप्ता को कड़ी टक्कर देने वाले उम्मीदवारों के समर्थकों ने होल्गर नेक को चुने जाने के मामले में ज्यादा टाँग नहीं अड़ाई तो इसका कारण यही रहा कि नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को सुशील गुप्ता की राय का सम्मान करने का 'इशारा' था और उनकी 'पसंद' के रूप में होल्गर नेक को प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद मिल गया ।
होल्गर नेक को सुशील गुप्ता की पसंद के रूप में मिली चर्चा को सुशील गुप्ता के विरोधियों ने ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और यह मान लिया कि रोटरी में सुशील गुप्ता के दिन अब पूरे हो गए हैं । वैसे भी, रोटरी में पद पाने वाला यह कहाँ ध्यान रखता है कि उसे किन लोगों के सहयोग से पद मिला है ? लेकिन होल्गर नेक ने सुशील गुप्ता द्वारा अपनी कोर टीम के लिए चुने गए पदाधिकारियों को ही अपनी कोर टीम में बनाए रखने के फैसले से यह दिखा/जता दिया है कि उन्हें सुशील गुप्ता के 'प्रतिनिधि' के रूप में ही देखा/पहचाना जाए । सुशील गुप्ता ने अपनी कोर टीम में अपने देश से रंजन ढींगरा को चुना था, होल्गर नेक ने रंजन ढींगरा को अपनी कोर टीम में उसी पद पर बनाए रखा है । इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय होल्गर नेक की कोर टीम की चल रही मीटिंग में यह देखने को भी मिला कि सिर्फ रंजन ढींगरा ही नहीं, सुशील गुप्ता की कोर टीम के दूसरे सदस्य भी होल्गर नेक की कोर टीम में पहले के अपने अपने पदों पर बनाए रखे गए हैं । होल्गर नेक के इस फैसले ने सुशील गुप्ता के विरोधियों और अवसरवादी नेताओं को तगड़ा झटका दिया है; सुशील गुप्ता के प्रभाव को खत्म हुआ मान कर उन्होंने रोटरी में अपने जो जो मंसूबे बनाए थे, वह सब उन्हें फेल होते हुए दिख रहे हैं । होल्गर नेक के रवैये को देखते हुए उन्हें यह मुश्किल लग रहा है कि सुशील गुप्ता की 'अनुपस्थिति' का वह कोई फायदा उठा सकेंगे । होल्गर नेक के प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने में तथा उनके द्वारा सुशील गुप्ता की टीम को ही अपनी टीम बना लेने के फैसले में एक यह संदेश भी निहित है कि सुशील गुप्ता भले ही बीमार हों, और बीमारी के चलते वह प्रेसीडेंट नॉमिनी का पद छोड़ने के लिए मजबूर हुए हों - लेकिन रोटरी में उनका प्रभाव पहले जैसा ही बना हुआ है; और यह बात रोटरी में उनके विरोधियों तथा अवसरवादी महत्त्वाकांक्षी नेताओं के लिए काफी मुसीबतभरी है ।