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Saturday, May 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में खासी फजीहत के बाद अंततः डीआरएफसी तय हुआ और सुशील गुप्ता के हस्तक्षेप तथा अशोक घोष की नर्म/गर्म कोशिशों के बावजूद बड़ी मुश्किल से संजय खन्ना के नाम पर सहमति बनी

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन (डीआरएफसी) पद को लेकर रंजन  ढींगरा व आशीष घोष के समर्थकों के बीच छिड़ी और कई दिनों से जारी लड़ाई का फायदा संजय खन्ना को मिला - और लंबी कश्मकश के बाद आखिरकार संजय खन्ना को डीआरएफसी घोषित कर दिया गया है । मजे की खास बात हालाँकि यह रही कि यूँ तो यह फैसला तीन-चार दिन पहले हो गया था, लेकिन फिर भी इसे छिपा कर रखा गया और जिन लोगों को इसकी भनक लग भी गई थी - उन्हें भी कन्फ्यूज करने की कोशिश की गई; ताकि कहीं कोई फैसले में अड़ंगा न डाल/डलवा दे । उल्लेखनीय है कि डीआरएफसी को लेकर इस बार जितनी राजनीति हुई, इससे पहले शायद ही कभी और कहीं हुई होगी । एक बार को तो लगने लगा था कि डिस्ट्रिक्ट में डीआरएफसी पर फैसला हो ही नहीं पायेगा, और डिस्ट्रिक्ट बिना डीआरएफसी के ही रहेगा । पिछले दिनों ही विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के डीआरएफसी के लिए एक महत्त्वपूर्ण ट्रेनिंग प्रोग्राम हुआ, जिसमें डिस्ट्रिक्ट 3011 का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया और जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट की खासी बदनामी भी हुई । डिस्ट्रिक्ट 3011 एक महत्त्वपूर्ण डिस्ट्रिक्ट है । डिस्ट्रिक्ट ने रोटरी को चार इंटरनेशनल डायरेक्टर दिए हैं; डिस्ट्रिक्ट के दो लोग इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की प्रक्रिया के अंतिम चरण तक पहुँचे, जिनमें से एक सुशील गुप्ता तो कामयाब भी हुए; इस कारण से रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं के बीच डिस्ट्रिक्ट की एक विशेष पहचान है । इस विशेष पहचान के चलते डीआरएफसी पर फैसला न कर पाने के लिए रोटरी में डिस्ट्रिक्ट की फजीहत हो रही थी ।
डीआरएफसी के लिए रंजन ढींगरा और आशीष घोष के नाम थे - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुरेश भसीन और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेट अनूप मित्तल का समर्थन रंजन ढींगरा को था, जबकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी संजीव राय मेहरा ने आशीष घोष को समर्थन दिया हुआ था । दोनों पक्ष अपने अपने समर्थन-रवैये पर अड़े हुए थे, जिस कारण फैसला नहीं हो पा रहा था । लेकिन जब डिस्ट्रिक्ट की फजीहत होना शुरू हुई, और बड़े नेताओं का दबाव पड़ना शुरू हुआ तो दोनों पक्ष हिले-डुले तो जरूर, लेकिन उससे मामला सुलझने की बजाये उलझ और गया । संजीव राय मेहरा ने नया नाम राजेश बत्रा का दिया, तो सुरेश भसीन व अनूप मित्तल की तरफ से दीपक तलवार, संजय खन्ना, अमित जैन के विकल्प दिए गए । मामला एक बार फिर वहीं फँस गया, जहाँ से निकलने के लिए नए नाम दिए गए थे । मामले में अपनी टाँग अड़ाते हुए विनोद बंसल ने विनय भाटिया का नाम बढ़ाया/सुझाया, लेकिन उनके सुझाव पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया । मामले को फिर से फँसता देख सुशील गुप्ता सक्रिय हुए और उन्होंने अशोक घोष को जिम्मेदारी सौंपी कि वह डीआरएफसी पर फैसला करवाएँ । अशोक घोष ने मामले में दिलचस्पी ली, और कुछ नर्म व कुछ गर्म रवैया दिखाते हुए फैसला करवाया । अशोक घोष यह भी समझ रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोग ऐसे हैं जो डीआरएफसी पर फैसला नहीं होने देना चाहते हैं और इसलिए जिस भी नाम पर सहमति बनेगी, 'इसे'या 'उसे' भड़का कर फैसले को लटकवा देंगे । डिस्ट्रिक्ट में कुछेक महत्त्वाकांक्षी लोग ऐसे हैं, जिनका संजय खन्ना से खासा विरोध है । अशोक घोष ने इसीलिए सहमति बन जाने के बाद भी फैसले की जानकारी को छिपा कर रखने पर जोर दिया ।उन्होंने संबंधित चारों लोगों को इसके लिए राजी किया कि जब तक फैसला रिकॉर्ड पर न चला जाये, किसी अन्य को फैसले की भनक भी न लगने दी जाए । कुछेक लोगों को हालाँकि भनक लग गई थी, उनके द्वारा जानकारी कन्फर्म करने की कोशिशों को लेकिन होशियारी के साथ टालमटोल करके कन्फ्यूज कर दिया गया । कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद ही संजय खन्ना के डीआरएफसी बनने की जानकारी दी गई है ।

Thursday, July 19, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को नीचा दिखाने की कोशिश के जरिये अपने नाकारापन को छिपाने की निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी की चाल उल्टी पड़ी है और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच वह खुद तमाशा बन गए हैं

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के प्रति निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी द्वारा निरंतर की जा रही बदजुबानी और बद्तमीजी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए वरदान साबित होती दिख रही है । दरअसल रवि चौधरी द्वारा निरंतर की जा रही बदजुबानी व बद्तमीजी के कारण लोगों ने जिज्ञासावश पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के कामकाजों तथा उनकी उपलब्धियों का जायेजा लिया, तो उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की बड़ी उपलब्धियों का रिकॉर्ड मिला - और इस रिकॉर्ड को देखते हुए डिस्ट्रिक्ट में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की विविधतापूर्ण भूमिकाओं को सम्मान के साथ रेखांकित किया जा रहा है । ऐसा नहीं है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के कामकाज का रिकॉर्ड कहीं छिपा/दबा पड़ा हुआ था, और इस कारण वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों - खासकर नए सदस्यों की आँखों से ओझल था; वास्तव में होता यह था कि 'मौजूदा' डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सहज व स्वाभाविक रूप में अपने कामकाज का शोर मचाता था, और उसके इस शोर में पिछले गवर्नर्स के काम छिप/दब जाते थे - नतीजतन लोग, खासकर नए सदस्य पिछले गवर्नर्स के कामकाज से अपरिचित ही रह जाते थे । पिछले रोटरी वर्ष में, रवि चौधरी के गवर्नर-काल में लेकिन यह सिलसिला टूटा - क्योंकि रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में लोगों के साथ बद्तमीजी तथा लफंगई करने के अलावा ऐसा कुछ किया ही नहीं, जिसका लोग नोटिस लेते । दुनिया में दस्तूर है कि कुछ न करने वाला अपने नाकारापन को छिपाने के लिए दूसरों को नाकारा बताने लगता है । रवि चौधरी ने भी इसी फार्मूले को अपनाया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी न तो कुछ अच्छा व बड़ा सोच सके और न कर सके; इसलिए दुनिया के दस्तूर के अनुसार उन्होंने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को निशाने पर ले लिया । रवि चौधरी जब तब यह कहते फिरे कि पूर्व गवर्नर्स ने कुछ किया नहीं है और उन्होंने सिर्फ राजनीति ही की है । रवि चौधरी ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की निरंतर आलोचना करके यह कोशिश की कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपने नाकारापन को वह छिपा लेंगे । रवि चौधरी की बदकिस्मती से लेकिन उनका दाँव उल्टा पड़ा है । 
रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद से हटने के बाद भी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की आलोचना करना जारी रखा, तो लोगों का ध्यान पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के कामकाज पर गया । कुछेक प्रेसीडेंट्स व नए रोटेरियंस ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया कि दरअसल रवि चौधरी के मुँह से बार बार पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की आलोचना सुन सुन कर उन्हें जिज्ञासा हुई कि डिस्ट्रिक्ट में जो स्थायी प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, और रोटरी फाउंडेशन में साल-दर-साल डिस्ट्रिक्ट की जो सहभागिता रहती है वह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की मदद व प्रेरणा के बिना आखिर कैसे संभव होती है ? इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्होंने पिछले वर्षों पर नजर डाली, तो उनका परिचय पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की गौरवशाली भूमिकाओं व उपलब्धियों से हुआ । जब जाना, तब पता चला कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुदर्शन अग्रवाल की सक्रियताभरी प्रेरणा न होती, तो डिस्ट्रिक्ट में रोटरी कैंसर हॉस्पिटल तथा रोटरी ब्लड बैंक जैसे प्रमुख व महत्त्वपूर्ण स्थायी प्रोजेक्ट्स अस्तित्व में न आ पाते । सुदर्शन अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट की भौगोलिक सीमा के बाहर भी, देहरादून में करीब दस करोड़ रुपए की लागत से गर्ल्स स्कूल स्थापित किया है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को देश में वाटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट्स, लिट्रेसी व एजुकेशन मिशन, रोटरी फाउंडेशन आदि के लिए प्रमुख प्रेरणास्रोत के रूप में तो देखा/पहचाना जाता ही है, साथ ही गिफ्ट ऑफ लाइफ प्रोजेक्ट, पोलियो मिशन तथा विन्स जैसे कार्यक्रमों के संस्थापक सदस्य के रूप में भी उनकी भूमिका को रेखांकित किया जाता है । दीपक कपूर और रमन भाटिया की पोलियो मिशन में जो भूमिका रही हैं, उसकी सर्वत्र प्रशंसा ही होती है । लोगों ने जाना कि मंजीत साहनी ने अपने डिस्ट्रिक्ट में ही नहीं, बल्कि दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी कैटरेक्ट सर्जरी के प्रोजेक्ट्स को क्लब्स के बीच प्रेरित व प्रोत्साहित किया और अपने प्रयत्नों से उन्हें संभव भी बनाया । चार करोड़ रुपए की लागत से दिल्ली में बन रहे आई हॉस्पिटल के मुख्य प्रेरणास्रोत मंजीत साहनी ही हैं, और उन्हीं के प्रयत्नों से पिछले दिनों हरियाणा के मेवात क्षेत्र के करीब 400 गाँवों में टॉयलेट बनने का काम हो सका है ।
रंजन ढींगरा ने विभिन्न राज्यों में वाटर हार्वेस्टिंग प्रोग्राम के तहत चकडैम बनवाने में जो दिलचस्पी दिखाई है, उसके बारे में सुन/जान कर लोगों को पता चला कि उनके डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स की सोच कितनी व्यापक रही है । विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के लीडर्स को ट्रेनिंग देने में रंजन ढींगरा की जो सक्रियता व संलग्नता रही है, उसने भी डिस्ट्रिक्ट 3011 की पहचान को समृद्ध करने का काम किया है । सुरेश जैन की उदारताभरी बड़ी सोच व संलग्नता के चलते डिस्ट्रिक्ट को रोटरी डायबेटिक सेंटर तथा रोटरी हैबिटेट सेंटर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स मिले हैं । अशोक घोष ने लिट्रेसी मिशन व रोटरी फाउंडेशन के लिए जो काम किया है, उसके लिए उन्हें रोटरी इंटरनेशनल से अवॉर्ड/सम्मान मिले हैं । राजेश बत्रा ने लीडर्स की ट्रेनिंग के मामले में तथा सदस्यता वृद्धि के लिए किये गए कामों के लिए विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में तारीफ प्राप्त की है । रमेश चंद्र ने लिट्रेसी व विन्स प्रोग्राम में; दमनजीत सिंह ने पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स में; वीरेंदर उर्फ बॉबी जैन ने हैल्थ प्रोजेक्ट्स में; सुशील खुराना ने गुड़गाँव स्थित रोटरी पब्लिक स्कूल की स्थापना में; सुधीर मंगला ने विन्स व पोलियो कार्यक्रम में जो योगदान दिया है, वह रोटरी के प्रति उनकी गहरी जिम्मेदारी तथा उनकी संलग्नता को जाहिर करता है । दीपक तलवार ने रोटरी फ्रेंडशिप एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत 40 से अधिक देशों के साथ जो संबंध बनाए और मैचिंग ग्रांटस के तहत प्रोजेक्ट्स करने की जो शुरुआत की, उसने डिस्ट्रिक्ट को एकअलग ही पहचान दिलाई है । आशीष घोष ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए विदेशों तक से रोटरी फाउंडेशन के लिए जो डोनेशंस जुटाए, उसके चलते रोटरी इंटरनेशनल में उनकी बड़ी पहचान बनी और वहाँ उन्हें महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ मिलीं । अमित जैन ने पोलियो मिशन में उल्लेखनीय सहभागिता दिखाई और पोलियो मिशन के काम को व्यापक पहचान दिलाई । विनोद बंसल ने रोटरी ब्लड बैंक को नई और प्रभावी पहचान देने/दिलाने का काम जितने कम समय में किया है, वह रोटरी में एक अनुकरणीय उदाहरण बना है । रोटरी फाउंडेशन और समृद्ध करने में विनोद बंसल के योगदान को भी उल्लेखनीय माना/पाया गया है और सीएसआर (कार्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी) स्कीम के जरिये कार्पोरेट सेक्टर को रोटरी के साथ जोड़ने में उनकी सक्रियता का लाभ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स ने भी खूब उठाया है । संजय खन्ना ने मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ रोटरी के प्रोजेक्ट्स को जोड़ने का जो काम किया है, और जिसके तहत माइक्रोसॉफ्ट प्रोजेक्ट व सिंगर मशीन सेंटर प्रोजेक्ट्स के तहत 75 से अधिक जो सेंटर अभी तक स्थापित किए हैं, उसने डिस्ट्रिक्ट ही नहीं रोटरी को भी एक अलग व व्यापक पहचान दी है । डॉक्टर सुब्रमणियन की रोटरी विकलांग केंद्र को स्थापित करने व निरंतरता के साथ चलाने में जो भूमिका है, वह हर किसी के लिए प्रेरणास्पद है । 
इन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की सक्रियताओं व उपलब्धियों के सामने रवि चौधरी अपने नाकारापन व निकम्मेपन के कारण बौने बन कर रह गए हैं । रवि चौधरी ने अपनी हरकतों से रोटरी और डिस्ट्रिक्ट का नाम खराब करने का ही काम किया है । रवि चौधरी पहले और अकेले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, जिनके बदतमीजी व अशालीन व्यवहार के लिए रोटरी इंटरनेशनल तक में शिकायत हुई । वास्तव में, अपने नाकारापन तथा अपनी हरकतों और अपनी बदनामियों को छिपाने के लिए ही रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स को निशाना बनाया और यह कहते हुए लोगों के बीच उन्हें बदनाम करने की कोशिश की कि उन्होंने तो कुछ किया ही नहीं है और वह तो सिर्फ राजनीति ही करते हैं । रवि चौधरी की इस तरह की बातों से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को, खासतौर से नए सदस्यों को यह जानने की उत्सुकता हुई कि पिछले वर्षों के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने आखिर किया क्या क्या है - और तब उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के कार्यों व उपलब्धियों का ब्यौरा मिला और रवि चौधरी के झूठ की पोल खुली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को नीचा दिखाने की कोशिश के जरिये अपने नाकारापन को छिपाने की रवि चौधरी की चाल उल्टी पड़ी और अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के मुकाबले अपने नाकारापन के जाहिर हो जाने से रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच खुद तमाशा बन गए हैं ।

Friday, January 8, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में विनय भाटिया की जीत का अवार्ड विनोद बंसल की बजाए संजय खन्ना को 'मिलने' की आहट में सत्ता समीकरणों के बदलने के संकेत छिपे हैं क्या ?

नई दिल्ली । विनय भाटिया को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनवाने/चुनवाने के लिए पर्दे के पीछे जो खेल चला, उसमें क्या सचमुच विनोद बंसल और अशोक कंतूर के साथ रवि चौधरी की 'राजनीतिक बलि' चढ़ने जा रही है ? यह सवाल लोगों के बीच इसलिए महत्वपूर्ण हो उठा है क्योंकि पिछले काफी समय से विनोद बंसल के अगले डीआरएफसी बनने तथा रवि चौधरी के 'आदमी' के रूप में अशोक कंतूर के अगले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी उम्मीदवार बनने की चर्चा सुनी जाती रही है, लेकिन अब इस चर्चा के पात्र बदल गए हैं और विनोद बंसल की जगह संजय खन्ना तथा अशोक कंतूर की जगह संजीव राय मेहरा ने ले ली है । रवि चौधरी की जगह अशोक घोष आ गए हैं । मजे की और विडंबना की बात यह है कि विनय भाटिया की उम्मीदवारी के सबसे घनघोर समर्थक विनोद बंसल व रवि चौधरी ही थे, और बिलकुल शुरू से थे; विनय भाटिया की उम्मीदवारी को दिल्ली में समर्थन दिलवाना इन्हीं दोनों के जिम्मे था; और तमाम बदनामियों का सामना करते हुए इन्होंने अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाई भी - लेकिन विनय भाटिया की जीत के साथ जब 'मिठाई' बँटने का नंबर आया, तो देखा/पाया जा रहा है कि इन दोनों को लाइन से बाहर कर दिया गया है, और इनकी जगह संजय खन्ना व अशोक घोष को लाइन में शामिल कर लिया गया है । विनोद बंसल और रवि चौधरी का अचानक से जो तख्तापलट होता हुआ दिख रहा है, उससे इन दोनों के नजदीकियों व शुभचिंतकों को खासा झटका लगा है; किंतु उन्हें समझाया जा रहा है कि वह यदि सचमुच विनय भाटिया के समर्थक और शुभचिंतक हैं, तो उन्हें अपना स्वार्थ छोड़ कर यह कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए । 
विनोद बंसल और रवि चौधरी के नजदीकियों व शुभचिंतकों को बताया/समझाया जा रहा है कि यह ठीक है कि विनोद बंसल और रवि चौधरी ने विनय भाटिया की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए अथक प्रयास किए, किंतु विनय भाटिया को जीत इनके अथक प्रयासों के कारण नहीं मिली है - बल्कि संजय खन्ना और अशोक घोष से मिले 'गुप्त' सहयोग के कारण मिली है; इसलिए 'मिठाई' के सही हकदार वह हैं । दिलचस्प बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में संजय खन्ना और अशोक घोष की भूमिका थी तो तटस्थ - लेकिन यही तटस्थता विनय भाटिया के लिए बड़ी मददगार साबित हुई । दरअसल किसी भी लड़ाई में - किसी भी चुनावी लड़ाई में तटस्थता जैसी कोई भूमिका होती ही नहीं है, तटस्थता भी वास्तव में एक 'पक्ष' होता है : संजय खन्ना और अशोक घोष ने तटस्थ होकर वास्तव में विनय भाटिया का पक्ष 'लिया' और उनके काम आए । मजे की बात यह रही कि विनय भाटिया और रवि दयाल के बीच संगठित हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में जो खेमेबाजी बनी, उसमें संजय खन्ना और अशोक घोष देखे/पहचाने तो उस खेमे में जा रहे थे, जो रवि दयाल की उम्मीदवारी के साथ था; लेकिन इन्होंने रवि दयाल की उम्मीदवारी के लिए सक्रियता न दिखा कर 'गुप्त' रूप से विनय भाटिया की मदद की । नोमीनेटिंग कमेटी में कई लोग संजय खन्ना के बड़े नजदीकी थे, और उन्होंने रवि दयाल के समर्थकों से कहा भी था कि संजय खन्ना यदि उनसे रवि दयाल का साथ देने को कहेंगे, तो वह रवि दयाल का ही साथ देंगे । रवि दयाल के समर्थकों ने संजय खन्ना से कई बार यह बात कही भी, लेकिन संजय खन्ना ने उनकी एक न सुनी । विनय भाटिया के समर्थकों ने संजय खन्ना से एक ही बात कही हुई थी कि हम समझते हैं कि आप जहाँ हैं वहाँ होते हुए आपके लिए विनय भाटिया का खुला समर्थन करना मुश्किल होगा, लिहाजा हम तो सिर्फ यह चाहते हैं कि आप रवि दयाल का भी खुला समर्थन न करें । संजय खन्ना ने उनकी यह बात मान ली । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने इसी तरीके को अपनाकर अशोक घोष का भी समर्थन जुटाया । 
विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का मानना और कहना है कि विनय भाटिया की जीत में यूँ तो बहुत से लोगों के सहयोग और समर्थन का योगदान है, लेकिन संजय खन्ना और अशोक घोष से मिले 'गुप्त' सहयोग ने वास्तव में निर्णायक भूमिका अदा की है । इसलिए विनय भाटिया की जीत की 'मिठाई' पाने वालों में पहला नंबर इन्हीं दोनों का होगा । संजय खन्ना को डीआरएफसी से नवाजे जाने की चर्चा है । डीआरएफसी पद पर सुशील खुराना का कार्यकाल मौजूदा रोटरी वर्ष में पूरा हो रहा है; उनके बाद इस पद पर विनोद बंसल के सुशोभित होने की चर्चा थी । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थन में वह जिस संलग्नता के साथ लगे हुए थे, उसे देख कर सभी मान रहे थे कि विनय भाटिया यदि जीत गए तो डीआरएफसी पद विनोद बंसल को मिलना पक्का है । विनय भाटिया की जीत के साथ लेकिन हालात बदले हुए लग रहे हैं । डीआरएफसी पद के लिए अब विनोद बंसल की बजाए संजय खन्ना का नाम सुना जा रहा है । कुछेक लोग हालाँकि विनोद बंसल के लिए दबाव बनाए हुए हैं, लेकिन संजय खन्ना के वकालती ज्यादा हैं; उनका तर्क है कि पिछले वर्ष भी संजय खन्ना का 'गुप्त' सहयोग न मिला होता, तो रवि चौधरी को चुनाव जितवाना मुश्किल होता - इसलिए संजय खन्ना को 'अवार्ड' देना जरूरी है । 
विनय भाटिया की जीत से डिस्ट्रिक्ट के सत्ता समीकरणों में जो बदलाव आता दिख रहा है, उसमें रवि चौधरी व अशोक कंतूर की जोड़ी को जोर का झटका लगता नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि रवि चौधरी ने बहुत पहले से अशोक कंतूर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अगले उम्मीदवार के रूप में प्रमोट कर रखा है । रोटरी की चुनावी राजनीति का एक मजेदार पहलू यह भी है कि यहाँ रवि चौधरी टाइप के लोग देखने को खूब मिलते हैं, जो अपना खुद का चुनाव तो किसी तरह मुश्किल से जीत पाते हैं, लेकिन जीतने के तुरंत बाद गॉडफादर वाली भूमिका में आ जाते हैं और दूसरों को जितवाने का ठेका ले लेते हैं । इसी तर्ज पर रवि चौधरी ने ऐलान किया हुआ था कि विनय भाटिया को जितवाने के बाद वह अशोक कंतूर को जितवायेंगे । विनय भाटिया की जीत के बाद लेकिन जिस तरह से संजीव राय मेहरा का नाम अगले उम्मीदवर के रूप में सामने आया है, उससे अशोक कंतूर की उम्मीदवारी की बात गर्दिश में ही दिख रही है । संजीव राय मेहरा को अशोक घोष के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और इसी कारण से संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी की चर्चा गंभीर हो उठी है । खेमे के नेताओं की बातों से भी लग रहा है कि अशोक कंतूर की उम्मीदवारी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है । रवि चौधरी व अशोक कंतूर की तरफ से हालाँकि कहा जा रहा है कि संजीव राय मेहरा के लिए उम्मीदवार 'बनना' संभव ही नहीं होगा, और इसलिए फिर सभी अशोक कंतूर की उम्मीदवारी पर सहमत हो ही जायेंगे । लेकिन संजीव राय मेहरा के उम्मीदवार न बन 'पाने' की संभावना को देखते हुए जिस तरह से अन्य कुछेक लोग अपने अपने लिए मौके तलाशने में जुटे हैं, उसे देख/सुन कर अशोक कंतूर के लिए मामला मुश्किल बनता हुआ नजर आ रहा है । 
विनय भाटिया की जीत के साथ ही डिस्ट्रिक्ट के सत्ता समीकरणों में जो बदलाव आता दिख रहा है, और इस बदलाव में विनोद बंसल और रवि चौधरी जिस तरह अलग-थलग पड़ते हुए नजर आ रहे हैं, उसमें डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में दिलचस्प नजारे बनने/दिखने के संकेत साफ पढ़े जा सकते हैं ।

Monday, August 11, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 में सरोज जोशी की सक्रियता के बीच रवि चौधरी के लिए अरनेजा गिरोह के ठप्पे से मुक्त होकर अपनी उम्मीदवारी के लिए स्वीकार्यता बनाने की चुनौती पैदा हुई

नई दिल्ली । सरोज जोशी ने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने हेतु जो सक्रियता दिखाई है, उसके चलते रवि चौधरी की पिछले दिनों की गई सारी मेहनत पर पानी पड़ता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का पद पाने के लिए रवि चौधरी ने पिछले दिनों 'दुश्मनों' को दोस्त बनाने का अभियान चलाया हुआ था । रवि चौधरी के शुभचिंतकों ने हवा यह बनाई हुई थी कि उक्त पद के लिए चूँकि और कोई नाम सामने नहीं आ रहा है, इसलिए रवि चौधरी के 'दुश्मनों' के सामने भी उनका दोस्त बनने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है । रवि चौधरी के शुभचिंतकों ने बहुत ही सुनियोजित तरीके से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना को भी अपने लपेटे में ले लिया था और यह दावा करना शुरू कर दिया था कि तीन वर्ष पहले संजय खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ते हुए रवि चौधरी और उनके समर्थक नेताओं ने संजय खन्ना के खिलाफ जो कारस्तानियाँ की थीं, उन्हें भूल कर संजय खन्ना ने उन्हें माफ़ कर दिया है और रवि चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन कर दिया है । मजे की बात यह रही कि खुद संजय खन्ना ने कभी भी रवि चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने की बात नहीं कही; किंतु रवि चौधरी के शुभचिंतकों की तरफ से संजय खन्ना का समर्थन मिलने का झूठा दावा लगातार किया जाता रहा ।
रवि चौधरी की तरफ से रवि दयाल के साथ अपने झगड़े को सुलझा लेने का भी दावा बढ़चढ़ कर किया गया । यह दावा करने की जरूरत दरअसल इसलिए भी पड़ी ताकि संजय खन्ना के समर्थन के दावे को विश्वसनीय बनाया जा सके । रवि दयाल के संजय खन्ना के साथ जैसे नजदीकी संबंध हैं उसके चलते रवि दयाल के साथ झगड़े को सुलटाये बिना संजय खन्ना का समर्थन मिलने का दावा उन लोगों को अविश्वसनीय लगता जिन्हें यह पता है कि किस तरह रवि चौधरी द्धारा खड़ी की गई अपमानजनक परिस्थितियों के चलते रवि दयाल को अपने कुछेक साथियों के साथ रोटरी क्लब दिल्ली वैस्ट छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था । जो लोग भी उस एपीसोड को जानते हैं, उनके लिए यह स्वीकार करना मुश्किल ही होगा कि रवि दयाल अपनी उस फजीहत और अपमान को भूल सकेंगे । रवि दयाल और संजय खन्ना चूँकि प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 के एक बड़े खेमे के सदस्य के रूप में देखे जाते हैं इसलिए रवि चौधरी को इन दोनों के साथ अपने लफड़ों/झगड़ों को सुलझा लेना जरूरी लगा । रवि चौधरी ने इसकी कोशिश भी की - समस्या लेकिन यह हुई कि अपनी कोशिश को उन्होंने कामयाब हुआ भी खुद ही मान लिया और अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीटना भी शुरू कर दिया ।
रवि चौधरी के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोगों का भी मानना और कहना है कि रवि चौधरी अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़ते, लेकिन अपने प्रयासों में पता नहीं क्यों वह तिकड़मों और साजिशों का तड़का लगाते रहते हैं, जिस कारण उनका बनता-बनता काम बिगड़ जाता है । दोस्तों का चुनाव करने में वह ऐसी लापरवाही करते हैं कि तगड़ा नुकसान उठाते हैं । रोटरी में बिजनेस करने लिए उन्होंने असित मित्तल को चुना, जो आजकल तिहाड़ जेल में हैं । उनके साथ के बिजनेस संबंध का सहारा लेकर रवि चौधरी ने रोटरी की राजनीति में लंबी छलांग लगाने की कोशिश की - लेकिन उन्होंने बिजनेस में भी घाटा खाया और राजनीति में भी औधें गिरे । तीन वर्ष पहले संजय खन्ना से चुनाव जीतने के लिए रवि चौधरी ने जिस अरनेजा गिरोह की मदद ली थी, उस अरनेजा गिरोह की हरकतें ही वास्तव में उनकी पराजय का कारण बनीं थीं । इस बार रवि चौधरी ने दीपक तलवार का दामन पकड़ा - जिनका तौर-तरीका भी अरनेजा गिरोह के तौर-तरीकों से मिलता है और जिनका खुद का पहला चुनाव खासे फसाद का शिकार हुआ था । अशोक घोष के गवर्नर-काल में हुए वीरेंद्र उर्फ़ बॉबी जैन के मुकाबले में मिली दीपक तलवार की जीत को बेईमानी से मिली जीत के रूप में आरोपित किया गया था; और रोटरी इंटरनेशनल ने उनकी जीत के फैसले को अमान्य घोषित करते हुए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया था । दोबारा हुए चुनाव में दीपक तलवार को हार का सामना करना पड़ा था । उन्हीं दीपक तलवार के हाथ में रवि चौधरी ने इस बार अपनी उम्मीदवारी की कमान सौंपी हुई है । लोगों का मानना और कहना है कि शायद यही कारण है कि पिछले दिनों रवि चौधरी की तरफ से किए गए दावों को किसी ने भी विश्वसनीय नहीं माना है । 
संजय खन्ना और रवि दयाल को 'मना' लेने के झूठे दावों के साथ-साथ रवि चौधरी के शुभचिंतकों ने सरोज जोशी की उम्मीदवारी के प्रति भी लोगों को बरगलाने की कोशिश की, और बीमारी के कारण हुई उनकी अनुपस्थिति का फायदा उठाने का प्रयास किया । उल्लेखनीय है कि सरोज जोशी ने प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी को घोषित किया हुआ था; और इसी नाते से उन्होंने पेम थर्ड के आयोजन में अपने क्लब को हिस्सेदार बनवाया था । पिछले दिनों चूँकि बीमार होने के कारण सरोज जोशी के लिए कहीं आना-जाना संभव नहीं हो पाया, तो रवि चौधरी के शुभचिंतकों ने कहना/उड़ाना शुरू कर दिया कि सरोज जोशी ने तो उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का इरादा त्याग दिया है । रवि चौधरी की उम्मीदवारी के शुभचिंतकों ने लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए एक अकेले रवि चौधरी ही उम्मीदवार हैं । स्वस्थ होने के बाद सरोज जोशी जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु सक्रिय हुईं तब रवि चौधरी के शुभचिंतकों द्धारा फैलाये जा रहे झूठ की पोल खुली ।
सरोज जोशी की उम्मीदवारी रवि चौधरी के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से खासी चुनौतीपूर्ण है । किसी भी चुनावी राजनीति की तरह रोटरी की चुनावी राजनीति में भी प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है - इसी संदर्भ में रवि चौधरी के लिए समस्या की बात यह है कि उन्हें लोगों के बीच अरनेजा गिरोह के उम्मीदवार के रूप में देखा जाता है, जबकि सरोज जोशी को अरनेजा गिरोह के हथकंडों का निशाना बने उम्मीदवार के रूप में पहचाना जाता है । रमेश अग्रवाल के गवर्नर-काल में सरोज जोशी की उम्मीदवारी को निरस्त करने के लिए रमेश अग्रवाल और अरनेजा गिरोह के दूसरे सदस्यों ने हर तरह का हथकंडा अपनाया था । उस समय वह सरोज जोशी की उम्मीदवारी को निरस्त करवाने में तो कामयाब नहीं हुए थे, लेकिन उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों को सशंकित करने में वह जरूर सफल रहे थे । उस प्रकरण के चलते सरोज जोशी के प्रति अरनेजा गिरोह के विरोधी लोगों की सहानुभूति पैदा हुई । इस सहानुभूति को सरोज जोशी किस तरह अपने समर्थन में बदल सकेंगी - यह तो उनकी सक्रियता से तय होगा; अभी लेकिन रवि चौधरी के लिए चुनौती की बात यह है कि प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 में अरनेजा गिरोह के विरोधी लोगों का जो वर्चस्व है - उसमें वह अपनी उम्मीदवारी के लिए स्वीकार्यता कैसे बनाये ?

Saturday, July 27, 2013

'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन का पद 'बेचने' में लगे रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर पूछ रहे हैं कि रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात क्या है ?

नई दिल्ली । दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' का आयोजन करने का प्रस्ताव देने वाले रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को जब यह बताया गया कि डिस्ट्रिक्ट 3010 की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स ने उक्त इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में मंजीत साहनी और/या अशोक घोष का नाम प्रस्तावित किया है, तो पीटी प्रभाकर बुरी तरह बिफर गए और पूछने लगे कि मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात क्या है ? मंजीत साहनी ने जब यह सुना तो किंचित आश्चर्य के साथ उन्होंने कहा कि प्रभाकर को मेरी औकात तो पता है - तभी तो वह डायरेक्टर चुने जाने से पहले फोन पर मुझसे दिन में दो दो बार बात करता था, सलाह लेता था, मदद माँगता था, कभी 'इससे' तो कभी 'उससे' सिफारिश करवाता था; उसे मेरी औकात का पता है, तभी तो वह यह सब करता था । मंजीत साहनी को हैरानी इस बात पर हुई कि प्रभाकर यह सब इतनी जल्दी भूल गया और पूछ रहा है कि उनकी औकात क्या है ? रोटरी में हालाँकि यह आम चलन है - चुनाव जीतने के लिए तो हर किसी की बड़ी खुशामद की जाती है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद हर किसी के प्रति नजरिया यह होता है कि तुम हो कौन ? इसलिए यदि पीटी प्रभाकर ने मंजीत साहनी के प्रति यह रवैया प्रदर्शित किया है तो इसमें हैरान होने वाली भी कोई बात नहीं है । लेकिन यहाँ मामला अवसरवादी व्यवहार का नहीं है, बल्कि उससे भी ज्यादा गंभीर है ।
पीटी प्रभाकर की बातों से और उनके 'व्यवहार' से डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व गवर्नर्स को 'बाद में' यह 'पता' चला की 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन का पद पीटी प्रभाकर बेचने की फ़िराक में हैं और शायद उन्हें ग्राहक मिल भी गया है । दरअसल इसीलिए पीटी प्रभाकर को जब डिस्ट्रिक्ट 3010 में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम प्रस्तावित होने की सूचना मिली तो वह बुरी तरह उखड़ गए । उखड़ कर फिर उन्होंने अपना जो असली वाला रंग दिखाया तो उसमें निशाना भले ही उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व गवर्नर्स को, और खास कर मंजीत साहनी व अशोक घोष को बनाया लेकिन फजीहत अपनी ही कराई और रोटरी को बदनाम किया । उन्होंने जो कुछ भी कहा उसका लब्बोलुबाब यह है कि वह रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को बेचेंगे और जो उन्हें इसकी कीमत देगा उसे चेयरमैन बनायेंगे । उन्होंने दावा किया कि उन्हें ऐसा करने से कोई भी नहीं रोक सकता । इसी संदर्भ में उन्होंने पूछा कि मंजीत साहनी और अशोक घोष चेयरमैन पद की कीमत देने को तैयार हैं क्या ? पीटी प्रभाकर फिर औकात पता करने पर आ गए; उन्होंने पूछा कि मंजीत साहनी और अशोक घोष की कीमत देने की औकात है क्या ? इंटरनेशनल डायरेक्टर के पद पर बैठे व्यक्ति के मुँह से इस तरह की बातें जिसने भी सुनी वह हतप्रभ रह गया । मंजीत साहनी और अशोक घोष ने तुरंत ही यह स्पष्ट कर दिया कि रोटरी में उन्होंने कभी भी पद खरीदने की न तो कोई कोशिश की और न इस तरह की कोई बात उनके मन में कभी भी आई; उन्हें यहाँ जो कोई भी पद मिले हैं, उनकी काबिलियत के आधार पर ही मिले हैं । इन्होंने साफ कहा है कि पीटी प्रभाकर रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन का पद बेचना चाहते हैं, तो बेच लें - उनकी इसे खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं है ।
उल्लेखनीय है कि पीटी प्रभाकर ने जो कुछ भी कहा है, उसके पीछे जो 'सोच' है उसे रोटरी में स्वीकार्यता प्राप्त है । उन्होंने कोई अनोखा काम करने की कोशिश नहीं की है । उनसे पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर रहे शेखर मेहता ने जब दो बार - पहली बार 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2011' में और दूसरी बार अभी हाल ही में हैदराबाद में आयोजित हुए 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' में - चेयरमैन कमल सांघवी को बनाया था, तो उन्होंने वास्तव में चेयरमैन का पद 'बेचा' ही था । इसे लेकर शेखर मेहता को अपने डिस्ट्रिक्ट में और कमल सांघवी को अपने डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि विरोध भी झेलना पड़ा था - लेकिन शेखर मेहता और कमल सांघवी चूँकि होशियार लोग हैं इसलिए उन्होंने ज्यादा हील-हुज्जत में फंसे बिना डील कर ली थी । पीटी प्रभाकर ने अपनी मूरखता से सब गुड़-गोबर कर लिया । जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि पीटी प्रभाकर ने जो 'सोचा' और जो करने की कोशिश की, उसमें कुछ भी गलत नहीं है । क्लब्स में, डिस्ट्रिक्ट्स में और उसके ऊपर भी 'ऐसे' ही काम होते हैं - यह कहना ज्यादा सही होगा कि काम 'ऐसे' ही हो सकते हैं । पीटी प्रभाकर इसे ठीक तरह से अंजाम नहीं दे पाए और बुरी तरह एक्सपोज हो गए । इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए पीटी प्रभाकर की पसंद बने विनोद बंसल भी इस बात को या तो पहचान नहीं पाए और या पीटी प्रभाकर को कम्युनिकेट नहीं कर पाए कि उनके चेयरमैन बनने के मुद्दे पर उनके डिस्ट्रिक्ट में बबाल हो जायेगा - इसलिए अच्छा होगा कि इंस्टीट्यूट की मोटी-मोटी बातें तय होने से पहले डिस्ट्रिक्ट 3010 के लोगों को किसी भी स्तर पर शामिल ही न किया जाये ।
पीटी प्रभाकर और विनोद बंसल यह जानने/समझने में भी चूक कर बैठे कि जो खिचड़ी वह गुपचुप गुपचुप पका रहे हैं उसकी खुशबु लोगों तक जा पहुँची है और इस खिचड़ी को बिखेरने के लिए वह बस मौके का इंतजार कर रहे हैं । और यह मौका पीटी प्रभाकर ने खुद दे दिया । यह इससे साबित है कि पीटी प्रभाकर ने इंस्टीट्यूट के चेयरमैन को लेकर तो कोई बात ही नहीं की थी, उन्होंने तो दिल्ली के लोगों से दिल्ली में इंस्टीट्यूट करने को लेकर बात शुरू की थी - मौके का इंतजार कर रहे दिल्ली के भाई लोगों ने चेयरमैन का चुनाव ही कर डाला । विनोद बंसल के लिए इसे दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना के अलावा और क्या कहा जायेगा कि पर्दे के पीछे तो वह रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने की तैयारी कर रहे थे, और पर्दे के सामने वह उस मीटिंग के हिस्सा थे जो मंजीत साहनी और या अशोक घोष को चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव पास कर रही थी । विनोद बंसल के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' को लेकर महत्वपूर्ण फैसले करने से पहले पीटी प्रभाकर को डिस्ट्रिक्ट 3010 में आना ही नहीं चाहिए था । यह सच है कि विनोद बंसल चेयरमैन हो जाते और फिर डिस्ट्रिक्ट 3010 में बात आती तो बबाल तब भी होता, लेकिन तब वह जल्दी शांत भी हो जाता । अब लेकिन मामला गंभीर हो गया है - पीटी प्रभाकर ने मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात की बात करके तथा चेयरमैन पद को बेचने की घोषणा करके मामले को कुछ ज्यादा पेजीदा बना दिया है ।
बहरहाल, चूँकि पीटी प्रभाकर ने यह दावा कर दिया है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन पद को बेचने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता - इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उक्त पद को कौन खरीदता है ? 

Saturday, September 22, 2012

राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर विनोद बंसल ने कहीं मुसीबत तो मोल नहीं ले ली है ?

नई दिल्ली | राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में विनोद बंसल की ऐसी दशा कर दी है कि विनोद बंसल के लिए न कुछ कहते बन रहा है और न कुछ करते | राजेश बत्रा के दबावपूर्ण व्यवहार के चलते विनोद बंसल को ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण पद देने पड़े हैं, जिन्होंने न तो उनके चुनाव में उनकी सक्रिय मदद की थी, और न उनके कहने के बावजूद पिछले वर्ष रवि चौधरी का समर्थन किया था | जो लोग विनोद बंसल के किसी भी तरह से काम नहीं आये, विनोद बंसल को उन्हें जिस तरह से महत्वपूर्ण पद देने के लिए मजबूर होना पड़ा है - उससे लोगों के बीच यही संदेश गया है कि उनकी टीम का गठन वह नहीं, बल्कि राजेश बत्रा कर रहे हैं | इसका नतीजा यह है कि विनोद बंसल के चुनाव में खुल कर उनका साथ देने वाले लोग अपने आपको उपेक्षित पा रहे हैं | ऐसे लोगों का 'दर्द' यह याद करके और टीस मार उठता है कि अपने चुनाव के समय तो विनोद बंसल उन्हें 'खुल कर' साथ आने के लिए प्रेरित करते थे, लेकिन अब उनसे बात करने से भी कतराते हैं और दूसरों के जरिये संदेश भिजवाते हैं | विनोद बंसल की मौजूदा दशा से परिचित लोग इस स्थिति के लिए लेकिन राजेश बत्रा को जिम्मेदार ठहराते हैं | उनका कहना है कि राजेश बत्रा ने विनोद बंसल के लिए वास्तव में कोई मौका ही नहीं छोड़ा है, ताकि वह 'अपने' लोगों का ख्याल रख सकें - और चूँकि वह अपने लोगों के काम नहीं आ पा रहे हैं इसलिए वह उनसे बात करने से भी बच रहे हैं | राजेश बत्रा को हावी देख कर विनोद बंसल के हाथ-पैर ऐसे फूल गए हैं कि उनके लिए छोटे-मोटे दबावों से बच पाना भी मुश्किल बना हुआ है, जिस कारण अपने फैसलों को क्रियान्वित कर पाने में भी वह लाचार से बने हुए हैं | रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लेटिनम के अमित अग्रवाल को असिस्टेंट गवर्नर बनाने का विनोद बंसल ऐलान कर चुके हैं, लेकिन अपने इस ऐलान को क्रियान्वित कर पाने को लेकर उनके पसीने छूटे हुए हैं | विनोद बंसल ने जो फैसले किए हैं उन्हें दबाव में लिए फैसले के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और जिस एक फैसले को वह क्रियान्वित नहीं कर पा रहे हैं - उसके पीछे भी दबाव बताया जा रहा है |
राजेश बत्रा के चौधराहटपूर्ण रवैये ने विनोद बंसल को सहयोगी आम रोटेरियन ही नहीं, सहयोगी रहे रोटेरियन नेताओं के निशाने पर भी ला दिया है | सबसे ज्यादा क्रोध में असित मित्तल हैं | विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनवाने' का असित मित्तल चूँकि अकेले ही श्रेय लेते हैं, इसलिए वह विनोद बंसल से खास व्यवहार की उम्मीद रखते हैं | विनोद बंसल के लिए असित मित्तल लेकिन 'दूध में पड़ी मक्खी' बने हुए हैं | इसके लिए कुछ तो विनोद बंसल का अपना स्वभाव जिम्मेदार है, और कुछ राजेश बत्रा का रवैया | विनोद बंसल ने पीछे अपना जो पहला कार्यक्रम किया था - उसमें राजेश बत्रा के रवैये के चलते असित मित्तल को मंच की बजाये, आम रोटेरियंस के बीच जगह मिली थी | कार्यक्रम ख़त्म हो जाने और अधिकतर लोगों के चले जाने के बाद, जब मुश्किल से छह-आठ लोग बचे रह गए थे तब विनोद बंसल ने असित मित्तल की सुध ली थी | असित मित्तल ने नोट किया और कई लोगों से कहा भी कि विनोद बंसल उन्हें जानबूझ कर किनारे लगाये हुए हैं | असित मित्तल का कष्ट यह है कि वह उम्मीद लगाये हुए थे कि विनोद बंसल उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे - लेकिन जो हुआ उसमें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना तो दूर, विनोद बंसल उन्हें किनारे/ठिकाने लगाने में लगे हुए हैं | विनोद बंसल ने असित मित्तल को दोहरी चोट दी - डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर न बना कर उनकी उम्मीदों पर तो पानी फेरा ही; असित मित्तल को फूटी आँख न देख पाने वाले राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना दिया | असित मित्तल के प्रति राजेश बत्रा के रवैये ने विनोद बंसल का 'काम' आसान और कर दिया है - असित मित्तल इसी बात से भड़के हुए हैं |  
राजेश बत्रा के रवैये ने विनोद बंसल के लिए अजीब-अजीब तरह की मुसीबतें पैदा कर दी हैं | जैसे राजेश बत्रा ने घोषणा कर दी है कि वह हैदराबाद में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे | क्यों नहीं होंगे ? क्योंकि उक्त ट्रेनिंग कार्यक्रम के ट्रेनर अशोक घोष बनाये गए हैं | राजेश बत्रा को अशोक घोष से ट्रेनिंग लेने में अपनी नाक नीची होती हुई लगती है | अपनी नाक को नीची होने से बचाने के लिए ही राजेश बत्रा ने रोटरी इंटरनेशनल द्धारा डिजाइन किए गए महत्वपूर्ण ट्रेनिंग कार्यक्रम से गायब रहने का फैसला किया है | राजेश बत्रा को लगता है और उन्होंने कहा है कि जब वह उक्त कार्यक्रम में शामिल ही नहीं होंगे, तो अशोक घोष से ट्रेनिंग लेने से नाक नीची होने के 'खतरे' से बच जायेंगे | राजेश बत्रा के इस रवैये पर लोगों का कहना है कि राजेश बत्रा को अपनी नाक की यदि इतनी ही चिंता है तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद नहीं स्वीकार करना चाहिए था | राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद क्यों स्वीकार किया - इसका उन्होंने बड़ा दिलचस्प और बचकाना-सा जबाव दिया है | उन्होंने कहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद पाने के लिए उन्होंने कोई लॉबिंग नहीं की; विनोद बंसल ने उनसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद स्वीकार करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया | राजेश बत्रा बताते/कहते हैं कि वह 'इस' पद पर रह चुके हैं, 'उस' पद पर रह चुके हैं; दो बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रह चुके हैं - तीसरी बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | कुर्सी का मोह दरअसल होता ही ऐसा है | सयाने लोग 'दिखाते' तो यह हैं कि उन्हें कुर्सी का कोई मोह नहीं है - लेकिन कुर्सी जब उन्हें मिल रही होती है तो उसे लेने से वह बेचारे इंकार नहीं कर पाते | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद तो बेचारे राजेश बत्रा को विनोद बंसल के अनुरोध पर स्वीकार करने के लिए 'मजबूर' होना पड़ा - लेकिन अपनी टीम अपने आप चुनने और हैदराबाद में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने का विनोद बंसल का 'अनुरोध' राजेश बत्रा को न सुनाई दे रहा है और न समझ आ रहा है | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने से राजेश बत्रा के इंकार ने विनोद बंसल को अशोक घोष तथा उनके नजदीकियों के साथ-साथ रोटरी के बड़े नेताओं व दूसरे डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों के सामने अजीब-सी स्थिति में ला दिया है; और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वह इस स्थिति से कैसे निपटे ?
इन्हीं सब बातों व तथ्यों के संदर्भ में, विनोद बंसल के शुभचिंतकों को लग रहा है कि राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर विनोद बंसल ने कहीं मुसीबत तो मोल नहीं ले ली है ?