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Thursday, September 19, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की 'सफलता' उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट में उनकी दुश्मन हो गई लगती है

नई दिल्ली । विनोद बंसल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे जुटाने के मामले में रिकॉर्ड बना कर रोटरी के बड़े पदाधिकारियों को भले ही इंप्रेस कर लिया हो, लेकिन उनकी इस 'सफलता' ने उन्हें अपने ही डिस्ट्रिक्ट में भारी आलोचना का शिकार बना दिया है । उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनोद बंसल ने पैसे खर्च करने और पैसे जुटाने को ही रोटरी समझा हुआ है और इसके जरिये वह रोटरी के बड़े पदाधिकारियों और बड़े नेताओं को खुश करने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं । रोटरी की बाकी गतिविधियों से और रोटरी की मूल भावना को बनाये रखने के कामों से उन्हें जैसे कोई मतलब नहीं है ।
अपने आरोप को उदाहरणों के द्धारा वजनदार बनाते हुए इन पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि एक तरफ पैसे खर्च करके विनोद बंसल ने रोटरी इंस्टीट्यूट 2014 का वाइस चेयरमैन का पद जुगाड़ लिया और दूसरी तरफ रोटरी फाउंडेशन के लिए रिकॉर्ड पैसे जुटा कर रोटरी के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं को खुश कर दिया - लेकिन डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी के प्रकाशन के लिए उनके पास समय नहीं है, जिस कारण अभी तक भी डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी प्रकाशित नहीं हो सकी है । डायरेक्टरी के काम से जुड़े लोगों के हवाले से इनका कहना है कि डायरेक्टरी का काम सिर्फ इसलिये रुका हुआ है क्योंकि जो चीजें विनोद बंसल को देनी हैं उन्हें देने का विनोद बंसल के पास समय नहीं है ।
विनोद बंसल के पास समय की सचमुच बहुत कमी है । क्लब्स के कार्यक्रमों में लेट पहुँचने और पहले से तय कार्यक्रम को ऐन मौके पर स्थगित कर देने के आरोप उन पर हैं । किसी भी क्लब के लिए कार्यक्रम की तैयारी करना एक श्रमसाध्य काम है - पहले से तय कार्यक्रम को विनोद बंसल लेकिन जब अचानक पैदा हुई व्यस्तता के कारण देर से पहुँच कर डिस्टर्ब कर देते हैं और या उसे कैंसिल ही कर देते हैं, तो क्लब के लोगों की मेहनत पर पानी तो फिरता ही है - उसे पैसों का घाटा भी होता है । क्लब के लोगों के उत्साह पर जो पानी फिर जाता है, वह अलग !
रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे जुटाने के उद्देश्य से अभी हाल ही में हुए कार्यक्रम में तो विनोद बंसल ने और भी कमाल कर दिया । डिस्ट्रिक्ट के मेजर डोनर्स को सम्मानित करने के नाम पर हुए इस कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट के कई मेजर डोनर्स को निमंत्रण तक नहीं मिले । निमंत्रण न पाने वाले ऐसे मेजर डोनर्स में कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भी हैं । कार्यक्रम से कई दिन पहले ही हालाँकि विनोद बंसल ने स्पष्ट कर दिया था कि चूँकि एक कार्यक्रम में सभी मेजर डोनर्स को सम्मानित नहीं किया/कराया जा सकता है, इसलिए इस तरह के दो कार्यक्रम होंगे । लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि पहले कार्यक्रम में किन्हें बुलाया जायेगा; या पहले कार्यक्रम में बुलाये जाने वाले लोगों को चुनने का तरीका या मापदण्ड क्या होगा ?
विनोद बंसल ने तो यह स्पष्ट नहीं किया, लेकिन उनके नजदीकियों ने जो बताया उससे कुलमिलाकर विनोद बंसल की ही किरकिरी हुई । उनके नजदीकियों का कहना रहा कि विनोद बंसल को जिन लोगों से मोटी रकम मिलने की उम्मीद थी, उन्हें ही पहले कार्यक्रम में बुलाया जायेगा । इससे मामला और उलझा । विनोद बंसल को जिन लोगों से मोटी रकम मिलने की उम्मीद बनी - उस उम्मीद के बनने का कारण क्या रहा ? देखा/जाना यह गया कि विनोद बंसल ने लोगों से पैसा बसूलने के लिए दिन-रात मेहनत की । उन्होंने लोगों को तरह-तरह से घेरा । जिन लोगों से फोन पर बात नहीं बन पा रही थी, उन लोगों के घर के कई-कई चक्कर काटे । कई लोगों ने इन पंक्तियों के लेखक से बताया कि विनोद बंसल ने उन पर तरह-तरह से दबाव बना कर उनसे कमिटमेंट ली है । रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे जुटाने के काम के लिए उनके पास समय की कोई कमी नहीं थी ।
ऐसे में, सवाल यह भी उठा कि विनोद बंसल को जब लोगों से जबरदस्ती ही पैसे बसूलने थे, तो फिर उन्होंने कई मेजर डोनर्स को - यहाँ तक कि कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तक को एप्रोच क्यों नहीं किया ? पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के मामले में तो बात यह समझ में आई कि जिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने रोटरी इंस्टीट्यूट 2014 के लिए उनको वाइस चेयरमैन बनाने का खुला और सक्रिय विरोध किया था, उनको रोटरी फाउंडेशन के उक्त कार्यक्रम से दूर रखने का विनोद बंसल ने प्रयास किया । लेकिन बाकी लोगों के साथ उन्होंने कौन सी दुश्मनी निभाई - यह किसी की समझ में नहीं आया ।
रोटरी फाउंडेशन के कार्यक्रम में अपनी उपेक्षा से खिन्न डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स याद कर कर के और पहले की बातें बताते हैं कि डिस्ट्रिक्ट में इस बार पहली बार ऐसा हुआ कि डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली में लोगों को किट नहीं मिली । एक पूर्व गवर्नर का कहना है कि यह बात छोटी सी है, लेकिन यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विनोद बंसल की कार्य प्रणाली और उनके कंसर्न का पता चलता है । अपने कार्यकाल की डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली में ज्यादा से ज्यादा लोगों को जुटा कर रिकॉर्ड बनाने के लिए विनोद बंसल ने बहुत मेहनत की थी । डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली में भीड़ जुटाने के लिए किये गए कैम्पेन में विनोद बंसल ने किट देने की बात को जोरशोर से प्रचारित भी किया था । लेकिन डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली हो जाने के बाद जब किट न मिलने की शिकायतें हुईं तो विनोद बंसल ने उन शिकायतों का यह कह कर मजाक उड़ाया कि किट से क्या होता है ? डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली के कैम्पेन में उन्होंने मनोरंजन के लिए कुछेक बड़े कलाकारों के आने के दावे भी किये थे, लेकिन जब उन कलाकारों के न आने की शिकायतें हुईं तो उनका कहना रहा कि रोटरी में हम क्या मनोरंजन के लिए हैं ? शुक्र है कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी न आने की शिकायतों पर उन्होंने अभी तक यह नहीं कहा है कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी से क्या होता है ? वह कह सकते हैं कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी नहीं आई है - लेकिन फिर भी उनकी डिस्ट्रिक्ट एसेम्बली, उनका डिस्ट्रिक्ट इन्सटॉलेशन रिकॉर्डतोड़ कामयाब रहा; रोटरी फाउंडेशन में उन्होंने रिकॉर्ड पैसा इकठ्ठा कर लिया है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर रहते हुए अभी तक किसी को रोटरी इंस्टीट्यूट के वाइस चेयरमैन का पद नहीं मिला, जो उन्हें मिला है - और जो एक रिकॉर्ड है ।
कामयाबी या सफलता आखिर और किसे कहते हैं ?
लेकिन, उनकी यही 'सफलता' उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट में उनकी दुश्मन हो गई लगती है ।

Thursday, August 15, 2013

'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में को-चेयरमैन का पद पाकर विनोद बंसल ने अपने ही डिस्ट्रिक्ट के अपने विरोधियों को फ़िलहाल धूल तो चटा ही दी है

नई दिल्ली । 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में को-चेयरमैन का पद विनोद बंसल को देकर इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर ने डिस्ट्रिक्ट 3010 के तुर्रमखाँ नेताओं को ऐसा आईना दिखाया है, कि उनके लिए आईने के सामने पड़ना मुश्किल हो गया है । उल्लेखनीय है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में विनोद बंसल को को-चेयरमैन का पद न मिले इसके लिए डिस्ट्रिक्ट 3010 के घोषित और अघोषित नेताओं ने पूरी तैयारी के साथ ताल ठोकी हुई थी - और इसके चलते उन्होंने 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के दिल्ली में होने के प्रस्ताव तक को ख़ारिज करवा दिया । दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के होने के प्रस्ताव के दिल्ली के रोटरी नेता इसलिए दुश्मन हो गये, क्योंकि उक्त इंस्टीट्यूट की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में को-चेयरमैन का पद विनोद बंसल को ऑफर हो रहा था । दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के आयोजन के प्रस्ताव को ख़ारिज करवाने में तो दिल्ली के रोटरी नेता सफल हो गए, लेकिन विनोद बंसल के को-चेयरमैन बनने के जिस कारण को लेकर वह विरोध कर रहे थे - उस 'कारण' का वह कुछ नहीं बिगाड़ पाए । विनोद बंसल 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में को-चेयरमैन बना दिए गए हैं । विनोद बंसल को को-चेयरमैन बनाने के पीटी प्रभाकर के प्रस्ताव को दिल्ली के रोटरी नेता भी यदि मान लेते, तो 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' का आयोजन दिल्ली में हो रहा होता और उसके चेयरमैन का पद भी दिल्ली के ही एक रोटरी नेता रंजन ढींगरा के पास होता । विनोद बंसल के प्रति अपनी खुन्नस के चलते दिल्ली के कुछेक रोटरी नेताओं ने लेकिन ऐसा नहीं होने दिया । उनकी बदकिस्मती यह रही कि अपने तमाम प्रयासों के बावजूद वह विनोद बंसल को को-चेयरमैन बनने से नहीं रोक सके ।
हर बात का श्रेय 'लेने' में आगे रहने वाले मुकेश अरनेजा ने हालाँकि यह दावा करके अपने मूव को सफल बताया है कि उनके प्रयासों के कारण विनोद बंसल को इंस्टीट्यूट के चेयरमैन का पद तो नहीं मिल पाया । उल्लेखनीय है कि शुरू में पीटी प्रभाकर की तरफ से जब दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' को आयोजित करने का प्रस्ताव मिला था, तब यह अनुमान लगाया गया था कि विनोद बंसल को उक्त इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनाने की तैयारी हो रही है । इस अनुमान से कई लोगों के कान खड़े हुए । विनोद बंसल ने अलग-अलग कारणों से डिस्ट्रिक्ट में अपने जो कई-कई दुश्मन बनाये हुए हैं - उन सब के बीच खलबली मच गई । हमेशा कुछ न कुछ करने की फ़िराक में रहने वाले मुकेश अरनेजा को जैसे काम मिल गया - उन्होंने अलग-अलग तर्क देकर लोगों को जोड़ा और विनोद बंसल के चेयरमैन बन सकने की योजना में पलीता लगा देने वाला काम किया । इस 'काम' में जो लोग जुड़े, उनकी पहचान एक खेमे के रूप में करते/बनाते हुए इस काम को सुशील गुप्ता की खिलाफत के साथ जोड़ दिया गया । मुकेश अरनेजा और उनके साथ लगे कुछ लफंगे किस्म के लोगों ने दावे भी किये कि उन्होंने सुशील गुप्ता को ठिकाने लगा दिया है । सुशील गुप्ता भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेले हैं - पर्दे के पीछे से रचे गए उनके खेल में इंस्टीट्यूट 2014 के चेयरमैन पद के लिए रंजन ढींगरा का नाम आया और विनोद बंसल के लिए को-चेयरमैन का पद ऑफर हुआ । दिल्ली के रोटरी नेताओं के बीच चेयरमैन पद के लिए रंजन ढींगरा के नाम को पसंद तो नहीं किया गया, लेकिन उनका बहुत मुखर विरोध भी नहीं हुआ । विनोद बंसल को लेकर लेकिन पहले वाला रवैया ही सामने आया । 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के कन्वेनर के रूप में पीटी प्रभाकर ने उनके रवैये को स्वीकार करने से जब इंकार कर दिया, तब दिल्ली के रोटरी नेताओं ने दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के आयोजन को लेकर अपनी स्वीकृति देने से मना कर दिया ।
दिल्ली के रोटरी नेताओं के इंकार के बाद, पीटी प्रभाकर ने चेन्नई में उक्त इंस्टीट्यूट के आयोजन की घोषणा की और साथ ही को-चेयरमैन पद के लिए उन्होंने विनोद बंसल के पक्ष में तय किये गए अपने फैसले को बनांये रखने का निश्चय दोहराया । 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में विनोद बंसल का नाम को-चेयरमैन के रूप में आने से दिल्ली के रोटरी नेताओं की सारी कसरत बेकार चली गई है । विनोद बंसल के नजदीकियों का कहना है कि लोग देखेंगे कि जो मुकेश अरनेजा अभी इस बात का श्रेय ले रहे हैं कि उन्होंने पीटी प्रभाकर की मनमानी नहीं चलने दी और विनोद बंसल को चेयरमैन नहीं बनने दिया, वही मुकेश अरनेजा उक्त इंस्टीट्यूट की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में पद पाने के लिए अब विनोद बंसल की खुशामद में जुटेंगे । 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में को-चेयरमैन का पद पाकर विनोद बंसल ने अपने डिस्ट्रिक्ट के अपने विरोधियों को धूल तो चटा दी है, लेकिन देखने की बात यह होगी कि अपने डिस्ट्रिक्ट में अपने इतने तगड़े विरोध के चलते वह रोटरी की अपनी आगे की 'यात्रा' कैसे पूरी करेंगे ? कुछेक लोगों का कहना है कि इंस्टीट्यूट के को-चेयरमैन का पद स्वीकार करके विनोद बंसल ने अपने आप को अपने डिस्ट्रिक्ट के नेताओं से और दूर कर लिया है; अभी मौके की नजाकत को देखते/समझते हुए उन्हें यह ऑफर स्वीकार नहीं करना चाहिए था, जिससे कि उनके विरोध की आँच धीमी पड़ जाती और बुझ जाती और तब उनकी आगे की राह आसान हो जाती । इसके विपरीत अन्य कुछ लोगों का मानना और कहना है कि तमाम विरोध के बावजूद को-चेयरमैन का पद उन्हें मिलने से उनका दम बढ़ा है और यह पद, अभी तक जो लोग उन्हें हलके में ले रहे थे उनके बीच उनकी हैसियत में इजाफा ही करेगा ।
रोटरी की राजनीति से परिचित लोगों का मानना और कहना है कि यहाँ जिसे आगे बढ़ना है, उसे अपने दम पर ही आगे बढ़ना होता है - मदद/अदद मिलती नहीं है, जुटानी पड़ती है । सुशील गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर बने थे, तो डिस्ट्रिक्ट के लोग तो उनकी टाँग खींचने में ही जुटे थे; सुशील गुप्ता ने पहले डिस्ट्रिक्ट के बाहर अपने लिए समर्थन जुटाया, फिर डिस्ट्रिक्ट के लोग उनका समर्थन करने के लिए मजबूर हुए थे । शेखर मेहता को तो अपने डिस्ट्रिक्ट में बहुत ही गंभीर विरोध का सामना करना पड़ा था । आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाले को सबसे पहले और सबसे ज्यादा अपने नजदीकी लोगों के विरोध का ही सामना करना होता है - इसलिए विनोद बंसल के साथ यदि ऐसा हो रहा है, तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है । अपने डिस्ट्रिक्ट में विनोद बंसल का भले ही विरोध हो, लेकिन 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' का को-चेयरमैन बनके विनोद बंसल ने दिखा/जता दिया है कि रोटरी के बड़े नेताओं के बीच उनकी अच्छी पैठ है । कुछेक लोगों को लगता है कि पैठ/बैठ कुछ नहीं है, विनोद बंसल चूँकि 'इस्तेमाल' होने के लिए प्रस्तुत हैं, इसलिए रोटरी के बड़े नेता उन्हें सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं । यह बात यदि सच भी है, तो यह रोटरी की राजनीति में सफल होने के फार्मूले के 'सच' को ही कहती है - और इसलिए यहाँ सफल होने की इच्छा रखने वाले को इस 'सच' को स्वीकार करना ही होगा । विनोद बंसल ने इसे स्वीकार कर लिया है - और वह इंस्टीट्यूट के को-चेयरमैन का पद पाने में कामयाब हो गए हैं । उनके विरोधी सिर्फ सिर धुनते ही नहीं रह गए हैं - बल्कि जल्दी ही उन्हें विनोद बंसल की खुशामद में भी देखा जाने लगेगा ।

Saturday, July 27, 2013

'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन का पद 'बेचने' में लगे रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर पूछ रहे हैं कि रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात क्या है ?

नई दिल्ली । दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' का आयोजन करने का प्रस्ताव देने वाले रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को जब यह बताया गया कि डिस्ट्रिक्ट 3010 की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स ने उक्त इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में मंजीत साहनी और/या अशोक घोष का नाम प्रस्तावित किया है, तो पीटी प्रभाकर बुरी तरह बिफर गए और पूछने लगे कि मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात क्या है ? मंजीत साहनी ने जब यह सुना तो किंचित आश्चर्य के साथ उन्होंने कहा कि प्रभाकर को मेरी औकात तो पता है - तभी तो वह डायरेक्टर चुने जाने से पहले फोन पर मुझसे दिन में दो दो बार बात करता था, सलाह लेता था, मदद माँगता था, कभी 'इससे' तो कभी 'उससे' सिफारिश करवाता था; उसे मेरी औकात का पता है, तभी तो वह यह सब करता था । मंजीत साहनी को हैरानी इस बात पर हुई कि प्रभाकर यह सब इतनी जल्दी भूल गया और पूछ रहा है कि उनकी औकात क्या है ? रोटरी में हालाँकि यह आम चलन है - चुनाव जीतने के लिए तो हर किसी की बड़ी खुशामद की जाती है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद हर किसी के प्रति नजरिया यह होता है कि तुम हो कौन ? इसलिए यदि पीटी प्रभाकर ने मंजीत साहनी के प्रति यह रवैया प्रदर्शित किया है तो इसमें हैरान होने वाली भी कोई बात नहीं है । लेकिन यहाँ मामला अवसरवादी व्यवहार का नहीं है, बल्कि उससे भी ज्यादा गंभीर है ।
पीटी प्रभाकर की बातों से और उनके 'व्यवहार' से डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व गवर्नर्स को 'बाद में' यह 'पता' चला की 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन का पद पीटी प्रभाकर बेचने की फ़िराक में हैं और शायद उन्हें ग्राहक मिल भी गया है । दरअसल इसीलिए पीटी प्रभाकर को जब डिस्ट्रिक्ट 3010 में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम प्रस्तावित होने की सूचना मिली तो वह बुरी तरह उखड़ गए । उखड़ कर फिर उन्होंने अपना जो असली वाला रंग दिखाया तो उसमें निशाना भले ही उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व गवर्नर्स को, और खास कर मंजीत साहनी व अशोक घोष को बनाया लेकिन फजीहत अपनी ही कराई और रोटरी को बदनाम किया । उन्होंने जो कुछ भी कहा उसका लब्बोलुबाब यह है कि वह रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को बेचेंगे और जो उन्हें इसकी कीमत देगा उसे चेयरमैन बनायेंगे । उन्होंने दावा किया कि उन्हें ऐसा करने से कोई भी नहीं रोक सकता । इसी संदर्भ में उन्होंने पूछा कि मंजीत साहनी और अशोक घोष चेयरमैन पद की कीमत देने को तैयार हैं क्या ? पीटी प्रभाकर फिर औकात पता करने पर आ गए; उन्होंने पूछा कि मंजीत साहनी और अशोक घोष की कीमत देने की औकात है क्या ? इंटरनेशनल डायरेक्टर के पद पर बैठे व्यक्ति के मुँह से इस तरह की बातें जिसने भी सुनी वह हतप्रभ रह गया । मंजीत साहनी और अशोक घोष ने तुरंत ही यह स्पष्ट कर दिया कि रोटरी में उन्होंने कभी भी पद खरीदने की न तो कोई कोशिश की और न इस तरह की कोई बात उनके मन में कभी भी आई; उन्हें यहाँ जो कोई भी पद मिले हैं, उनकी काबिलियत के आधार पर ही मिले हैं । इन्होंने साफ कहा है कि पीटी प्रभाकर रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन का पद बेचना चाहते हैं, तो बेच लें - उनकी इसे खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं है ।
उल्लेखनीय है कि पीटी प्रभाकर ने जो कुछ भी कहा है, उसके पीछे जो 'सोच' है उसे रोटरी में स्वीकार्यता प्राप्त है । उन्होंने कोई अनोखा काम करने की कोशिश नहीं की है । उनसे पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर रहे शेखर मेहता ने जब दो बार - पहली बार 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2011' में और दूसरी बार अभी हाल ही में हैदराबाद में आयोजित हुए 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' में - चेयरमैन कमल सांघवी को बनाया था, तो उन्होंने वास्तव में चेयरमैन का पद 'बेचा' ही था । इसे लेकर शेखर मेहता को अपने डिस्ट्रिक्ट में और कमल सांघवी को अपने डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि विरोध भी झेलना पड़ा था - लेकिन शेखर मेहता और कमल सांघवी चूँकि होशियार लोग हैं इसलिए उन्होंने ज्यादा हील-हुज्जत में फंसे बिना डील कर ली थी । पीटी प्रभाकर ने अपनी मूरखता से सब गुड़-गोबर कर लिया । जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि पीटी प्रभाकर ने जो 'सोचा' और जो करने की कोशिश की, उसमें कुछ भी गलत नहीं है । क्लब्स में, डिस्ट्रिक्ट्स में और उसके ऊपर भी 'ऐसे' ही काम होते हैं - यह कहना ज्यादा सही होगा कि काम 'ऐसे' ही हो सकते हैं । पीटी प्रभाकर इसे ठीक तरह से अंजाम नहीं दे पाए और बुरी तरह एक्सपोज हो गए । इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए पीटी प्रभाकर की पसंद बने विनोद बंसल भी इस बात को या तो पहचान नहीं पाए और या पीटी प्रभाकर को कम्युनिकेट नहीं कर पाए कि उनके चेयरमैन बनने के मुद्दे पर उनके डिस्ट्रिक्ट में बबाल हो जायेगा - इसलिए अच्छा होगा कि इंस्टीट्यूट की मोटी-मोटी बातें तय होने से पहले डिस्ट्रिक्ट 3010 के लोगों को किसी भी स्तर पर शामिल ही न किया जाये ।
पीटी प्रभाकर और विनोद बंसल यह जानने/समझने में भी चूक कर बैठे कि जो खिचड़ी वह गुपचुप गुपचुप पका रहे हैं उसकी खुशबु लोगों तक जा पहुँची है और इस खिचड़ी को बिखेरने के लिए वह बस मौके का इंतजार कर रहे हैं । और यह मौका पीटी प्रभाकर ने खुद दे दिया । यह इससे साबित है कि पीटी प्रभाकर ने इंस्टीट्यूट के चेयरमैन को लेकर तो कोई बात ही नहीं की थी, उन्होंने तो दिल्ली के लोगों से दिल्ली में इंस्टीट्यूट करने को लेकर बात शुरू की थी - मौके का इंतजार कर रहे दिल्ली के भाई लोगों ने चेयरमैन का चुनाव ही कर डाला । विनोद बंसल के लिए इसे दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना के अलावा और क्या कहा जायेगा कि पर्दे के पीछे तो वह रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने की तैयारी कर रहे थे, और पर्दे के सामने वह उस मीटिंग के हिस्सा थे जो मंजीत साहनी और या अशोक घोष को चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव पास कर रही थी । विनोद बंसल के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' को लेकर महत्वपूर्ण फैसले करने से पहले पीटी प्रभाकर को डिस्ट्रिक्ट 3010 में आना ही नहीं चाहिए था । यह सच है कि विनोद बंसल चेयरमैन हो जाते और फिर डिस्ट्रिक्ट 3010 में बात आती तो बबाल तब भी होता, लेकिन तब वह जल्दी शांत भी हो जाता । अब लेकिन मामला गंभीर हो गया है - पीटी प्रभाकर ने मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात की बात करके तथा चेयरमैन पद को बेचने की घोषणा करके मामले को कुछ ज्यादा पेजीदा बना दिया है ।
बहरहाल, चूँकि पीटी प्रभाकर ने यह दावा कर दिया है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन पद को बेचने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता - इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उक्त पद को कौन खरीदता है ? 

Friday, July 26, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने मंजीत साहनी को आगे करके विनोद बंसल की रोटरी इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनने की तैयारी में अड़चन पैदा की

नई  दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3010 में इन दिनों उस मशहूर हिंदी कहावत को चरितार्थ होते देखा जा सकता है जिसमें 'गाँव के बसने से पहले ही लुटेरों के सक्रिय होने' की बात कही गई है । हुआ यह है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर ने वर्ष 2014 में होने वाले रोटरी इंस्टीट्यूट को दिल्ली में आयोजित करने का प्रस्ताव रखा तो डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच उस इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनने को लेकर भयानक मारकाट मच गई । यह मारकाट इतने गंभीर रूप में चल रही है कि इसके चलते इंस्टीट्यूट के दिल्ली में होने का प्रस्ताव रद्द होने का खतरा तक पैदा हो गया है । उल्लेखनीय है कि क्लब्स के लोग इन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपने प्रोजेक्ट्स संबंधी कार्यक्रम में आमंत्रित करें, तो यह व्यस्तता का तर्क देकर बच निकलते हैं । डिस्ट्रिक्ट के इंटरसिटी सेमीनारों में न आने का इनके पास बड़ा ठोस बहाना होता है कि गवर्नर ने इन्हें तरीके से निमंत्रित ही नहीं किया, बस एक इमेल भेज दिया है । लेकिन प्रस्तावित इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने को लेकर छिड़ी लड़ाई में अपनी अपनी पोजीशन लेने की तैयारी को लेकर होने वाली मीटिंग्स के लिए इन्हें न तो किसी निमंत्रण के 'तरीके से' मिलने की जरूरत है और न इनके पास समय की कोई कमी है । इससे भी ज्यादा मजे की बात यह हुई है कि प्रस्तावित इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को लेकर छिड़ी लड़ाई में अभी कुछ दिन पहले तक एक-दूसरे को अश्लील और अशालीन तरीके से निशाना बना रहे कुछेक पूर्व गवर्नर्स अब एक दूसरे से गलबहियाँ करते देखे जा हैं ।
इस संबंध में मुकेश अरनेजा, आशीष घोष और अमित जैन के बीच बनी निकटता ने लोगों का ध्यान खास तौर से खींचा है । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा पिछले काफी समय से आशीष घोष और अमित जैन को तरह-तरह से निशाना बनाते हुए अपमानित करते रहे हैं । आशीष घोष को लेकर मुकेश अरनेजा ने जिस तरह की अश्लील और अशालीन किस्म की बातें की हैं, किसी सामान्य भले व्यक्ति के लिए तो उन बातों को कहना/सुनना भी मुश्किल होगा । अमित जैन के साथ तो मुकेश अरनेजा का ऐसा टकराव रहा कि अमित जैन के लिए मुकेश अरनेजा को अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाने की मजबूरी पैदा हो गई थी जिसके बदले में मुकेश अरनेजा ने अमित जैन के गवर्नर-काल को खराब करने का बीड़ा उठा लिया था । लेकिन अब, प्रस्तावित इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को लेकर छिड़ी लड़ाई में मुकेश अरनेजा की 'बातों' में आशीष घोष और अमित जैन को मजे लेते हुए देखा गया है । दरअसल, मुकेश अरनेजा की अश्लील और अशालीन किस्म की बातों में निशाने पर अब विनोद बंसल हैं - इसलिए इन्हें मजा आ रहा है । इन्हें मजा इसलिए भी आ रहा है क्योंकि अभी तक मुकेश अरनेजा की  बातों में निशाने पर जब ये होते थे तो विनोद बंसल मजा लेते थे । विनोद बंसल ने यह समझने की दरअसल कोई कोशिश ही नहीं की कि जो मुकेश अरनेजा अभी आशीष घोष और अमित जैन को निशाना बना रहे हैं, कल वही मुकेश अरनेजा उन्हें निशाना बनाने से नहीं चूकेंगे ।
मुकेश अरनेजा ने विनोद बंसल को आजकल इसलिए निशाने पर लिया हुआ है, क्योंकि दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए पीटी प्रभाकर की पसंद के रूप में उन्हें विनोद बंसल का नाम सुनाई दिया । मुकेश अरनेजा ने यह भाँपने में कोई देर नहीं की कि पूर्व गवर्नर्स के बीच राजनीति करने का उन्हें यह सुनहरा मौका मिला है । उन्होंने समझ लिया कि अलग-अलग तरीके से वह लोगों को उकसायेंगे तो विनोद बंसल को चेयरमैन बनाने का विरोध करने के लिए हर कोई तैयार हो जायेगा । मुकेश अरनेजा ने गणित यह लगाया कि पिछले छह-आठ वर्ष में बने गवर्नर निजी खुन्नस, ईर्ष्या और या निजी महत्वाकांक्षा के चलते विनोद बंसल के खिलाफ किये जा सकते हैं और पुराने गवर्नर्स को वरिष्ठता का नारा देकर विनोद बंसल के खिलाफ किया जा सकता है । दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम उछाल कर मुकेश अरनेजा ने पहले तो काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में स्थितियों को विनोद बंसल के लिए प्रतिकूल बना दिया और फिर अपनी आदत के अनुसार चटखारेदार बातों के जरिये विनोद बंसल को निशाने पर ले कर मजाक का विषय बना दिया । इस तरह, आशीष घोष और अमित जैन को भी मुकेश अरनेजा की बातों में मजे लेने का मौका बहुत समय बाद मिला ।
मुकेश अरनेजा लोगों को रस ले ले कर बता रहे हैं कि दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद की लड़ाई में किस तरह सुशील गुप्ता भी विनोद बंसल के काम नहीं आ पाये । लोगों को यह बात बताना मुकेश अरनेजा को इसलिए जरूरी लगा क्योंकि मुकेश अरनेजा को इस बात से भी बड़ी चिढ़ रही कि विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुशील गुप्ता को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दे रहे हैं । मुकेश अरनेजा ने लोगों को जो बताया उसके अनुसार, काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में सुशील गुप्ता ने एक बार यह तर्क जरूर दिया कि इंस्टीट्यूट के चेयरमैन को चुनने का अधिकार तो इंटरनेशनल डायरेक्टर को मिलना ही चाहिए । लेकिन बाकी लोगों ने जब यह तर्क दिया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर को यह अधिकार मिलना तो जरूर चाहिए, लेकिन इंस्टीट्यूट की व्यवस्था अच्छे से हो सके इसके लिए क्या यह उचित नहीं होगा कि वह चेयरमैन का चुनाव दूसरों से सलाह करके करे - तो सुशील गुप्ता को चुप रह जाना पड़ा । दिल्ली में अगले रोटरी वर्ष में, यानि संजय खन्ना के गवर्नर-काल में रोटरी इंस्टीट्यूट की बात अभी सिर्फ प्रस्ताव के स्तर पर है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को लेकर आपस में भिड़ गए हैं । इंस्टीट्यूट के प्रभारी के रूप में पीटी प्रभाकर ने विनोद बंसल को चेयरमैन बनाने की तैयारी की, तो डिस्ट्रिक्ट के सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनके खिलाफ लामबंद हो गए; मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में आया जरूर, लेकिन किसी एक नाम पर सहमति नहीं हो पाई - सहमति बनाने की कोशिश भी दरअसल नहीं हुई और इसलिए नहीं हुई क्योंकि इनके नाम ऐसे लोगों ने दिए जो इनके घोर विरोधी के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं । समझा जाता है कि इनके नाम तो विनोद बंसल के खिलाफ माहौल बनाने के उद्देश्य से लिया गया है - चेयरमैन चुनने का जब सचमुच का वक्त आयेगा तो कुछेक लोग अपना नाम आगे कर सकते हैं । चेयरमैन पद को लेकर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग होने के बाद भी जिस तरह की हलचल है और छोटे-छोटे समूहों में गुपचुप गुपचुप बातचीतें हो रही हैं उससे यही आभास मिल रहा है कि इंस्टीट्यूट - जिसके दिल्ली में होने का सिर्फ प्रस्ताव भर है, अभी यह तय नहीं हुआ है कि वह दिल्ली में होगा भी या नहीं - के चेयरमैन पद को लेकर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तलवारें लिए घूम रहे हैं, इस बात की परवाह किये बिना कि उनकी यह तलवारें इंस्टीट्यूट के दिल्ली में होने की संभावना को ही काटने का काम करेंगी ।