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Saturday, April 27, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का इस्तीफ़ा, रॉन बुर्टोन को रोटरी फाउंडेशन के चेयरमैन पद से हटाये जाने के तुरंत बाद ही आने के कारण, लोगों के बीच संशय का विषय बना

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा देकर सुशील गुप्ता ने देश के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के रोटेरियंस को उदास और निराश करने के साथ-साथ असमंजस और संशय में डाल दिया है । रोटेरियंस दरअसल इस बात पर फूले फूले फिर रहे थे कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की कुर्सी पर उनके बीच रहने वाला व्यक्ति बैठेगा । सुशील गुप्ता का एक बड़ा लंबा सक्रिय रोटरी जीवन रहा है, और प्रायः हर डिस्ट्रिक्ट में ऐसे लोग मिल जायेंगे जिनकी रोटरी में कुल हैसियत/पूँजी और उपलब्धि यह है कि वह सुशील गुप्ता के नजदीक रहे हैं । कई डिस्ट्रिक्ट्स में दो/चार ऐसे लोग मिल जायेंगे जो रोटरी व डिस्ट्रिक्ट में सिर्फ इस वजह से 'जिंदा' हैं कि उनकी सुशील गुप्ता तक सीधी पहुँच है; डिस्ट्रिक्ट्स में कोई लफड़ा होता है, तो लफड़े से जुड़े लोग उसकी शरण में आते हैं कि भाई, सुशील गुप्ता के यहाँ ले चल ! सुशील गुप्ता काम तो शायद ही किसी के आए हों, लेकिन अपने तौर-तरीकों से उन्होंने अपना ऐसा ऑरा (आभामंडल) जरूर बनाया, जिसकी बदौलत उन्होंने तो उन्होंने, उनके नजदीकियों तक ने अपना अपना 'सिक्का' चला लिया । ऑरा के मामले में सुशील गुप्ता ने राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू को टक्कर दी है; रोटरी में राजा साबू ने जो 'हैसियत' पाई उसे छू पाने में सिर्फ सुशील गुप्ता ही कामयाब हो सके हैं - कुछेक संदर्भ में सुशील गुप्ता का पलड़ा बल्कि भारी ही रहा है । राजा साबू की जो हैसियत बनी, वह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने के बाद बनी, जबकि सुशील गुप्ता ने प्रेसीडेंट नोमीनेट होने से पहले ही उस हैसियत को पा लिया - यही कारण है कि प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के लिए राजा साबू को चुनाव का सामना करना पड़ा था, लेकिन सुशील गुप्ता के सामने वैसी कोई समस्या पैदा नहीं हुई । राजा साबू ने अपने खुन्नसी व्यवहार के चलते अपने विरोधी व 'दुश्मन' भी खूब बनाये, जबकि सुशील गुप्ता ने अपने उदार रवैये के चलते विरोधियों व 'दुश्मनों' को भी 'अपना' बनाया । यही कारण रहा कि सुशील गुप्ता जब प्रेसीडेंट नॉमिनी घोषित हुए, तब देश में हर खेमे का रोटेरियन उत्साहित हुआ, उसे एक खास किस्म के भावनात्मक गर्व की अनुभूति हुई और प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में सुशील गुप्ता का अप्रत्याशित स्वागत हुआ ।
और यही कारण है कि प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से सुशील गुप्ता के इस्तीफे की खबर ने हर किसी को उदास और निराश किया है । बीमारी को इस्तीफा देने का कारण बताये जाने से लोगों के बीच असमंजस और पैदा हुआ है । रोटरी में हर तरफ पदों के लिए भयंकर किस्म की 'मारकाट', तिकड़म और झूठ-फरेब देखते रहे रोटेरियंस के लिए इस बात को हजम कर पाना मुश्किल हो रहा है कि ठीक हो सकने वाली बीमारी के कारण सुशील गुप्ता ने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जैसा बड़ा पद यूँ ही छोड़ दिया है । सुशील गुप्ता को जबड़े संबंधी समस्या बताई जा रही है, जिसके चलते उनके लिए खाना-पीना और बोल पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव सा बना हुआ है । रोटेरियंस भी लेकिन मजेदार लोग हैं; अपना अपना डॉक्टरी-ज्ञान पेल कर हर कोई सवाल उठा रहा है कि यह न तो ऐसी बीमारी है जो लंबी चले और न ऐसी है कि ठीक न हो सके - तब फिर सुशील गुप्ता को इस्तीफा देने की जल्दी क्या पड़ गई ? सुशील गुप्ता के शुभचिंतकों की तरफ से इसके जबाव में कहा/बताया जा रहा है कि ऊपर से 'देखने' पर यह बीमारी ज्यादा गंभीर भले ही न लगे, लेकिन सोचने की बात यह है कि जब समस्या शुरू हुई होगी, तब सुशील गुप्ता ने ईलाज तो करवाया ही होगा; ईलाज के बावजूद समस्या खत्म होने की बजाये बढ़ती गई है - जिससे लग रहा है कि बीमारी उतनी सरल नहीं है, जितनी लोग समझ रहे हैं । शुभचिंतकों का यह भी कहना है कि सुशील गुप्ता एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं और संगठन को प्राथमिकता देते हैं । बीमारी के चलते वह अपने पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं, और पता नहीं आगे कितना समय उन्हें अपनी जिम्मेदारियों से विमुख रहना पड़े - लिहाजा यह विचार करके कि उनकी अनुपस्थिति में संगठन के काम पर प्रतिकूल असर न पड़े, उन्होंने पद छोड़ने का फैसला कर लिया है । सुशील गुप्ता के लिए संगठन पहले है, और उन्होंने साबित कर दिया है कि अपनी निजी वजह से वह संगठन के काम पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ने देंगे ।
हिन्दुस्तानियों का किसी भी बात को लेकर कयास लगाने का जो स्वभाव है, जिसके चलते सीता तक को अग्निपरीक्षा देने के लिए मजबूर होना पड़ा था, उसके चलते कई लोगों को लेकिन सुशील गुप्ता के शुभचिंतकों का तर्क हजम नहीं हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि सुशील गुप्ता के इस्तीफे के पीछे की कहानी कुछ और ही है, जिसे बीमारी की आड़ में छिपाया जा रहा है । यह कयास असल में रॉन बुर्टोन को रोटरी फाउंडेशन के चेयरमैन पद से हटाये जाने के तुरंत बाद ही सुशील गुप्ता द्वारा इस्तीफा देने से पैदा हुआ है । उल्लेखनीय है कि चेयरमैन के रूप में रॉन बुर्टोन का कार्यकाल कुल दो महीने ही बाकी बचा था, लेकिन फिर भी अचानक लिए गए फैसले में उन्हें हटा कर ब्रेंडा क्रेसी को बाकी दो माह के लिए उनकी चेयर दे दी गई है । सुशील गुप्ता भी हाल ही के वर्षों में रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी रहे हैं । यदि यह सिर्फ एक इत्तफाक है, तो भी बहुत संदेह पैदा करने वाला इत्तफाक है कि 22 अप्रैल को रॉन बुर्टोन को ट्रस्टी चेयर से हटाया जाता है, और चार दिन बाद ही पूर्व ट्रस्टी सुशील गुप्ता प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा दे देते हैं । यह संदेह तब और बढ़ जाता है, जब सुशील गुप्ता के नजदीकी उनके इस्तीफे पर हैरानी व्यक्त करते हैं और कहते/बताते हैं कि सुशील गुप्ता से उनकी रोज ही बात होती है, लेकिन उन्हें यह आभास नहीं मिला कि सुशील गुप्ता इतना बड़ा फैसला करने वाले हैं । इस तरह की बातों से लोगों के बीच संशय है कि हो न हो रोटरी फाउंडेशन में कुछ बड़ी ही गड़बड़ हुई है, जिसके कारण रॉन बुर्टोन को फाउंडेशन के चेयरमैन पद से हटाया गया है, और सुशील गुप्ता का प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से इस्तीफा 'लिया' गया है । हालाँकि रॉन बुर्टोन को हटाने के तथा सुशील गुप्ता के इस्तीफे के जो जो कारण बताये गए हैं, उनमें कोई साम्य नहीं बैठता दिखता है; लेकिन 'टाइमिंग' के चलते सुशील गुप्ता का इस्तीफा संशय में जरूर आ जाता है । मौजूदा समय ऐसा है, जिसमें दुनिया में, समाज में, देश में और रोटरी में हम बड़ी बड़ी 'मूर्तियों' को 'ढहते' हुए देख रहे हैं, तब फिर कोई भी बुरी बात चौंकाती नहीं है; इसलिए भी सुशील गुप्ता का प्रेसीडेंट नॉमिनी पद से हुआ इस्तीफा संशय के घेरे में आ जाता है ।


Sunday, April 21, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल एकेएस सदस्यता को लेकर तो फजीहत का शिकार हैं ही, अपनी हरकतों से उन्होंने अपने ही क्लब के एक बड़े प्रोजेक्ट को भी मुसीबत में फँसा दिया है

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की हरकतों के चलते रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के बड़े प्रोजेक्ट की नींव खुदने के साथ ही क्लब में झगड़ों और विवादों की भी शुरुआत हो गई है, जिसके चलते उक्त प्रोजेक्ट के खतरे में पड़ने की आशंका पैदा हो गई है । रमेश अग्रवाल एकेएस (ऑर्च क्लम्प सोसायटी) की सदस्यता का पैसा न देने के बाद भी एकेएस सदस्य के रूप में जगह जगह अपना स्वागत करवाने को लेकर भी इन दिनों फजीहत का शिकार बन रहे हैं; ऐसे में क्लब में पैदा हुआ नया झगड़ा उनकी मुश्किलों को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली अशोका ने अभी हाल ही में 'रोटरी हेल्थ एंड वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर' नाम से एक बड़े प्रोजेक्ट की आधारशिला रखने का कार्यक्रम आयोजित किया । करीब सात करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के बारे में जिसने भी सुना, उसने क्लब और क्लब के पदाधिकारियों तथा सदस्यों की भूरि भूरि प्रशंसा की; लेकिन प्रशंसा के दौर के बीच ही उक्त प्रोजेक्ट को लेकर क्लब के सदस्यों के बीच विवाद और झगड़े के स्वर भी सुनाई देने लगे । पता चला कि क्लब के पदाधिकारी और सदस्य आधारशिला रखने की पूजा में यजमान के रूप में रमेश अग्रवाल के बैठने को लेकर खासे खफा हैं । उनका कहना है कि प्रोजेक्ट चूँकि क्लब का है, इसलिए उक्त अधिकार क्लब के मौजूदा प्रेसीडेंट और या प्रेसीडेंट इलेक्ट को मिलना चाहिए था । रमेश अग्रवाल ने लेकिन जिस मनमाने तरीके से प्रेसीडेंट और प्रेसीडेंट इलेक्ट को किनारे धकेल कर अपनी पत्नी के साथ मुख्य भूमिका हथिया ली, उसके कारण क्लब के पदाधिकारियों तथा सदस्यों के बीच भारी नाराजगी है । मजे की बात यह रही कि उक्त मौके पर रमेश अग्रवाल ने क्लब के सदस्य - दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन को भी कोई तवज्जो देने की जरूरत नहीं समझी ।
क्लब के सदस्यों का आपसी बातचीत में कहना है कि उक्त प्रोजेक्ट के लिए क्लब के प्रायः सभी सदस्यों ने पैसे दिए हैं या देने की घोषणा की है; कई सदस्यों ने तो रमेश अग्रवाल से ज्यादा पैसे दिए हैं या देने की घोषणा की है - और इस आधार पर आधारशिला रखने की पूजा में उन्हें और या प्रेसीडेंट या प्रेसीडेंट इलेक्ट को बैठना चाहिए था; रमेश अग्रवाल आखिर किस हैसियत से अपनी पत्नी के साथ पूजा में बैठ गए । क्लब के सदस्यों की तरफ से इस तरह की बातें सुनकर रमेश अग्रवाल ने तुनक कर कह दिया है कि क्लब के सदस्यों को उनसे यदि इतनी ही चिढ़ है, तो वह प्रोजेक्ट से अलग हो जाते हैं और प्रोजेक्ट में पैसे का कोई सहयोग नहीं करेंगे । रमेश अग्रवाल की इस तुनकमिजाजी ने क्लब के कुछेक सदस्यों को भड़काने का काम किया और उनकी तरफ से सुना गया कि आधारशिला की पूजा में बैठ कर रमेश अग्रवाल ने अपने आप को प्रोजेक्ट का मुख्य कर्ता-धर्ता 'दिखा' ही दिया है, तो अब वही इस प्रोजेक्ट को पूरा करें और इसका पूरा पैसा दें । इस तरह की बातें प्रोजेक्ट को लेकर क्लब के सदस्यों के उत्साह पर पानी फेरती नजर आ रही हैं; और क्लब के संजीदा सदस्यों को लग रहा है कि रमेश अग्रवाल की मनमानी तथा तुनकभरी हरकतें कहीं प्रोजेक्ट को न ले डूबें ? क्लब के कई एक सदस्यों का स्पष्ट कहना है कि रमेश अग्रवाल यदि अपनी हरकतों से बाज नहीं आए, और क्लब के सभी सदस्यों के सहयोग से बनने वाले प्रोजेक्ट का अकेले श्रेय लेने की कोशिश करते रहे, तो फिर क्लब के कई सदस्य प्रोजेक्ट में सहयोग करने की घोषणा से पीछे हट जायेंगे ।
रमेश अग्रवाल इन्हीं दिनों एकेएस सदस्यता को लेकर भी विवादों की चपेट में हैं । दरअसल रमेश अग्रवाल ने तीन वर्ष पहले जेके गौड़ और सुभाष जैन के साथ एकेएस सदस्य बनने की घोषणा की थी और संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत तीन रोटरी वर्षों में - यानि 30 मार्च 2019 तक उन्हें पूरी रकम रोटरी फाउंडेशन में जमा करना थी । जेके गौड़ और सुभाष जैन तो अपनी अपनी रकम जमा कर चुके हैं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने करीब एक लाख अमेरिकी डॉलर की रकम रोकी हुई है । तथ्य बल्कि यह है कि पिछले रोटरी वर्ष में तथा मौजूदा रोटरी वर्ष में रमेश अग्रवाल ने एकेएस की सदस्यता का कोई पैसा जमा नहीं कराया है । रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारी उनसे तकादा भी कर चुके हैं, लेकिन फिर भी रमेश अग्रवाल के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है । यह बात यूँ तो ऐसी बात नहीं है जिसके लिए रमेश अग्रवाल की फजीहत की जाए - किसी भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में ऊँच-नीच हो सकती है जिसके कारण उसके लिए पहले से की गई घोषणाओं और या वायदों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है; लेकिन रमेश अग्रवाल के मामले में शर्मनाक स्थिति और फजीहत की बात इसलिए है कि समय से पूरा पैसा न दे पाने के बाद भी रमेश अग्रवाल एकेएस सदस्य के रूप में जगह जगह अपना स्वागत करवाते रहे हैं । पिछले दिनों ही, मार्च के पहले सप्ताह में दिल्ली में रोटरी फाउंडेशन ट्रस्ट के चेयरमैन रॉन बुर्टन के सामने रमेश अग्रवाल ने एकेएस सदस्य के रूप में अपना स्वागत करवाया और उनके साथ फोटो खिंचवाई । उस समय रमेश अग्रवाल को यह तो पता था ही कि संकल्पित समय-सीमा में वह पूरा पैसा नहीं दे रहे हैं और इसलिए उन्हें अपने आपको एकेएस सदस्य कहने का 'हक' नहीं है - फिर भी रमेश अग्रवाल ने अपनी फजीहत करवाने वाला काम किया । इसके साथ ही, क्लब के प्रोजेक्ट में खुद को सर्वे-सर्वा दिखलाने की रमेश अग्रवाल की कोशिश के चलते क्लब में मचे बबाल ने रमेश अग्रवाल की मुसीबतों को बढ़ाने का ही काम किया है ।