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Sunday, April 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में प्रेम माहेश्वरी की अध्यक्षता में बने नए क्लब की संभावित गतिविधियों व सक्रियताओं की चुनौती के सामने रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारी फिलहाल प्रेसीडेंट इलेक्ट चुनने के झगड़े में उलझे

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली में निलंबन रद्द होने के तुरंत बाद ही प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर क्लब के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के बीच जो घमासान मचा है, उसने उन लोगों को बड़ा निराश किया है - जिन्हें उम्मीद थी कि क्लब के प्रमुख लोगों ने अपनी कारस्तानियों के चलते मिली बदनामियों और मुसीबतों के हाल ही के अपने अनुभव से सबक सीखा होगा और अब वह अपनी स्वार्थी व घटिया सोच को छोड़ कर गंभीरता व मैच्योरिटी का व्यवहार करेंगे । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली अपने पदाधिकारियों के आपसी झगड़ों तथा रोटरी विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण पिछले कुछेक महीनों से निलंबित था । क्लब के पदाधिकारियों तथा उनके नजदीकी सदस्यों ने क्लब के ही दूसरे सदस्यों को अपनी लंपटता व लफंगई का शिकार नहीं बनाया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व रोटरी के अन्य बड़े पदाधिकारियों - और रोटरी के कार्यक्रमों के खिलाफ भी अशालीन व अभद्र व्यवहार प्रदर्शित किया । उनकी हरकतों पर जब चारों तरफ से बदनामी व थू थू के दाग पड़े और गहरे होने लगे - तो क्लब के पदाधिकारियों को कुछ अक्ल आई, और तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व अन्य पदाधिकारियों से उन्होंने माफी माँगना शुरू किया । माफी व खुशामद का सहारा लेकर उन्होंने अपने क्लब का निलंबन वापस करवा लिया - उनके लिए इससे भी बड़ी राहत की बात यह रही कि जिन प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के साथ वह अपना झगड़ा बता रहे थे, उन्होंने अपना एक अलग क्लब बना लिया । इससे हर किसी को उम्मीद बनी कि रोटरी क्लब वैशाली का झमेला समाप्त हो गया है, तथा यह क्लब भी अब दूसरे क्लब्स की तरह चलेगा ।
किंतु निलंबन से बाहर आए रोटरी क्लब वैशाली में अब एक नया झगड़ा सुना जा रहा है - जो प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर है । उल्लेखनीय है कि इस पद पर नरेन सेमवाल थे, जिन्होंने लेकिन पेट्स से पहले इस्तीफा दे दिया था । क्लब का निलंबन खत्म हो जाने के बाद किंतु जो फिर से प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाए जाने की माँग करने लगे हैं - क्लब के दूसरे लोग इसके लिए लेकिन राजी नहीं हैं । उनका कहना है कि मुश्किल समय में नरेन सेमवाल जिस तरह क्लब के लोगों को अँधेरे में रख कर अपनी जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए, उसे देखते हुए वह अब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने लायक नहीं रह गए हैं - और इसलिए उन्हें दोबारा से प्रेसीडेंट इलेक्ट नहीं बनाया जा सकता है । नरेन सेमवाल का कहना है कि क्लब जब निलंबित था और उसके निलंबन के वापस होने की कोई संभावना नहीं दिख रही थी, तब ऐसे क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट के रूप में उन्हें फजीहत व अपमान महसूस हो रहा था - जिससे मुक्त होने के लिए उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ देना जरूरी लगा । क्लब के दूसरे प्रमुख लोगों का कहना लेकिन यह है कि क्लब में सलाह किए बिना मनमाने तरीके से नरेन सेमवाल ने जिस तरह प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ा, वह क्लब के साथ धोखा करने जैसा मामला है - और इसे देखते हुए उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता है । मनोज भदोला की अगले रोटरी वर्ष में भी अध्यक्ष बनने की इच्छा और कोशिश को जान/देख कर क्लब के सदस्यों में अलग बेचैनी है । मनोज भदोला ने कुछेक सदस्यों से कहा है कि यह वर्ष तो झगड़े/झंझटों में ही निकल गया, और उन्हें अध्यक्ष के रूप में कुछ करने का मौका ही नहीं मिला - इसलिए वह चाहते हैं कि अगले वर्ष भी वह अध्यक्ष बनें और अध्यक्ष के रूप में कुछ अच्छे काम करके दिखाएँ, जिससे कि उन लोगों के मुँह बंद किए जा सकें जो कह रहे हैं कि अध्यक्ष के रूप में काम कर पाना मनोज भदोला के बस में है ही नहीं । मनोज भदोला की यह इच्छा और कोशिश जान/सुन कर क्लब के लोगों में घबराहट फैल गई है : उन्हें चिंता हुई है कि मनोज भदोला यदि सचमुच दोबारा अध्यक्ष बन गए तो क्लब की इज्जत बचने की जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची हुई है भी, वह भी धूल में मिल जाएगी । क्लब में अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि इस वर्ष क्लब में जो झमेला हुआ, वह अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला की अकर्मयता व नाकामी का जीता-जागता सुबूत है; इसलिए उन्हें अध्यक्ष में रूप में एक वर्ष और देना क्लब को जानबूझ कर बर्बादी की तरफ धकेलने जैसा काम होगा ।
क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों की समस्या यह है कि क्लब पर कब्जा जमाए लोगों की हरकतों से चूँकि सभी परिचित हैं, इसलिए कोई भी प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं है । हर किसी को डर दरअसल यह है कि क्लब को अपनी जागीर समझे बैठे कर्णधार अपनी अपनी मनमानी चलायेंगे और किसी को ठीक से काम ही नहीं करने देंगे - इसलिए आफत में क्यों पड़ना ? क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों के बीच चूँकि आपस में भी विश्वास का भारी संकट है, और वह एक दूसरे की खिंचाई करने के चक्कर में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनमें से भी कोई प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं हो रहा है । क्लब में मजेदार स्थिति यह बनी है कि नरेन सेमवाल और मनोज भदोला प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने की तिकड़में लगा रहे हैं, लेकिन उनके ही संगी-साथी उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाने के लिए राजी नहीं हैं - दूसरी तरफ जिन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने के लिए कहा जा रहा है, वह बनने से बचने की कोशिश कर रहे हैं ।
अपने आप को रोटरी क्लब वैशाली का कर्णधार समझ रहे लोगों के सामने वास्तव में प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी द्वारा बनाया गया नया क्लब भी एक गंभीर चुनौती है । डर यह है कि नए क्लब के कामकाज के सामने यदि रोटरी क्लब वैशाली के कामकाज टिक नहीं सके, तो डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच भारी बदनामी होगी । यह डर दरअसल इसलिए है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई जानता है कि प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के अध्यक्ष-काल में जो काम हुए, उनसे ही रोटरी क्लब वैशाली को डिस्ट्रिक्ट में खास ऊँचाई और प्रतिष्ठा मिली थी - जो बाद के वर्षों में क्रमशः घटती गई है । उम्मीद की जा रही है कि उन्हीं प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा की मदद से नया क्लब प्रेम माहेश्वरी के अध्यक्ष-काल में कामकाज के जरिए और नए रिकॉर्ड बनायेगा । ऐसे में, रोटरी क्लब वैशाली के कर्णधारों के सामने चुनौती है कि वह भी अपनी गतिविधियों व अपनी सक्रियताओं को इस तरह से आयोजित करें ताकि प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के नए क्लब से पीछे न दिखें । नया क्लब जिस गुपचुप तरीके से बना - रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरिटेज ने नए क्लब को स्पॉन्सर किया और वरिष्ठ रोटेरियन रवींद्र सिंह उसके जीएसआर बने; उससे साबित है कि डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के लोगों का समर्थन भी नए क्लब के साथ है । ऐसे में रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों की चुनौती व जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है । किंतु वहाँ प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर जो घमासान मचा हुआ है, उसे देखते/सुनते हुए वहाँ के हालात सुधरने की उम्मीद लगाए लोगों को झटका लगा है ।

Monday, December 21, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में कॉन्करेंस के चक्कर में रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला तथा उनके साथियों की असलियत की पोल खुली

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा ने अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने के लिए जो जुगाड़ लगाए, और जिनके चलते कुछेक क्लब्स में भीषण विवाद और झगड़े हुए - उसमें एक अच्छा काम यह हुआ है कि कुछेक क्लब्स और उनके पदाधिकारियों के असली रूप सामने आ  गए, अन्यथा जो छिपे ही रहते । मुकेश अरनेजा के गेम-प्लान में फँस कर रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों ने अपना जो 'नंगापन' प्रकट किया, वह एक बड़ा दिलचस्प उदाहरण बन गया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली डिस्ट्रिक्ट के एक अच्छे क्लब के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है : इसके सदस्य उच्च शिक्षा प्राप्त तथा प्रोफेशनली खासे कामयाब लोग हैं और इनके परिवारों में अपेक्षाकृत खुलापन व आधुनिक तेवर देखे गए - किसी भी संस्था को आधुनिक व गतिशील शक्ल देने के लिए जिसे आवश्यक माना जाता है । रोटरी क्लब वैशाली अपने सदस्यों की शिक्षा, प्रोफेशनल उपलब्धियों और अपनी जीवंतता व खिलंदड़ेपन के चलते डिस्ट्रिक्ट के खास क्लब्स में गिना जा रहा था और डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में उसकी खासी उपस्थिति व पहचान बन गई थी । पिछले दो एक वर्षों में क्लब के जो अध्यक्ष बने, वह हालाँकि क्लब की पहले जैसी प्रतिष्ठा व सक्रियता की निरंतरता को नहीं बनाए रख सके - किंतु क्लब की बनी साख के ऑरा (आभामंडल) में उनकी कमजोरियाँ छिपी रह गईं और वह सामने नहीं आ पाईं । लेकिन अभी हाल ही में कॉन्करेंस को लेकर क्लब में जो झगड़ा मचा, उसमें यह तथ्य सामने आया कि क्लब पर इस समय जिन लोगों का कब्जा है - वह भले ही पढ़े-लिखे तथा प्रोफेशनली कामयाब लोग हों; लेकिन सोच, मानसिकता व व्यवहार के मामले में वह वास्तव में सड़कछाप किस्म के लोग हैं । 
क्लब के वरिष्ठ सदस्य प्रसून चौधरी ने सोशल मीडिया में क्लब की मौजूदा स्थिति पर दुःख प्रगट करते हुए जो एक टिप्पणी की, उस पर क्लब पर इस समय काबिज लोगों ने अभद्र, अशालीन व कहीं कहीं अश्लील शब्दों का प्रयोग करते हुए जो प्रतिक्रिया दी - उसने उनके असली चेहरे व चरित्र को सामने ला दिया । एक सामान्य सामाजिक समझ है कि अपने पर लगे आरोपों का जब कोई तथ्यपरक व तर्कपूर्ण जबाव नहीं दे पाता है, तो वह गालियाँ देने लगता है । रोटरी क्लब वैशाली के मौजूदा अध्यक्ष मनोज भदोला व उनके साथ के लोगों ने अपने ही एक वरिष्ठ साथी प्रसून चौधरी के साथ सोशल मीडिया पर यही व्यवहार किया । मनोज भदोला और उनके साथी प्रसून चौधरी की टिप्पणी में कही गई इस बात पर ज्यादा भड़के कि क्लब के फैसलों में सभी सदस्यों की भागीदारी नहीं होती है तथा 'कुछ लोग' ही फैसले ले रहे हैं । हो सकता है कि प्रसून चौधरी की यह बात झूठ हो । इसका तर्कपूर्ण व तथ्यपरक ढंग से जबाव दिया जा सकता था, किंतु मनोज भदोला व उनके साथी गाली-गलौच पर उतर आए । उनके इस रवैये ने ही जाहिर किया कि प्रसून चौधरी ने सही बात कही है, और सच सुन कर मनोज भदोला व उनके साथी भड़क उठे । और बातों व फैसलों को यदि जानें भी दें, तो क्लब के बोर्ड की 'शक्ल' ही प्रसून चौधरी के इस आरोप को पुष्ट करती है । बोर्ड में 18 सदस्य हैं, जिनमें 12 लोग पति-पत्नी हैं । क्लब के अधिकतर सदस्य पति-पत्नी हैं - जो भागीदारी के लिहाज से एक अच्छी बात है । लेकिन इस अच्छी बात को किस तरह से क्लब के मौजूदा पदाधिकारियों ने क्लब पर कब्जा करने/ज़माने की अपनी तरकीब के रूप में इस्तेमाल कर लिया, इसका पुख्ता सुबूत बोर्ड के गठन में देखा/पहचाना जा सकता है । बोर्ड में जो 18 सदस्य लिए गए हैं, वह यदि अलग अलग परिवारों के होते, तो बोर्ड के फैसलों में व्यापक प्रतिनिधित्व होता - लेकिन तब क्लब पर कब्जा कैसे होता ? क्लब पर कब्जा करने के लिए तरकीब निकाली गई कि परिवार के सदस्यों को ही बोर्ड में रख लो । इससे बोर्ड बनाने के पीछे जो भावना व उद्देश्य है, उसका ही मजाक बन गया । घटियापने की हद यह है कि इस पर क्लब का एक वरिष्ठ सदस्य यदि यह कहे कि क्लब में फैसले 'कुछ लोग' ही कर रहे हैं, तो उससे भिड़ जाओ और उसे गालियाँ देने लगो । 
कॉन्करेंस देने की बात क्लब की जिस मीटिंग में हुई, उसमें क्लब के मौजूदा पदाधिकारियों व उनके समर्थकों की मनमानियों, सौदेबाज-प्रवृत्ति तथा उनकी बदतमीजियो का खुला इज़हार हुआ । पदाधिकारियों ने पूरी बेशर्मी के साथ स्वीकार किया कि कॉन्करेंस के लिए उन्होंने मुकेश अरनेजा के साथ सौदा किया है, जिसके तहत उन्हें सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में एक असिस्टेंट गवर्नर का पद मिलेगा तथा दो डिस्ट्रिक्ट पोस्ट मिलेंगी । इसे लेकर मीटिंग में जो हाय-हल्ला हुआ, उसमें जबर्दस्त बद्तमीजियाँ हुईं और बेहूदा शब्दों का इस्तेमाल हुआ । क्लब के पदाधिकारी इस बात पर गर्व कर रहे थे कि उन्होंने जो चाहा उसे कर लिया; पर उनका गर्व तब हवा हो गया जब उन्हें पता चला कि उस मीटिंग की पूरी कार्रवाई का ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया गया है । यह सुन/जान कर क्लब के पदाधिकारियों के तो तोते उड़ गए और वह फिर अपनी 'औकात' पर आ गए तथा मीटिंग की कार्रवाई का ऑडियो रिकॉर्ड करने वालों के प्रति सोशल मीडिया में अपशब्दों से हमला करने लगे । हास्यास्पद तरीके से उन्होंने रिकॉर्डिंग करने को तो अनैतिक व गैरकानूनी बताने का शोर किया, किंतु अपनी हरकतों पर एक शब्द नहीं कहा । यह ऐसी ही बात हुई कि किसी चोर की हरकत सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो जाए और चोर अपनी हरकत पर शर्मिंदा होने की बजाए इस रिकॉर्डिंग को अनैतिक व गैरकानूनी बताने लगे । इस संबंध में सोशल मीडिया में जो चर्चा हुई, उसमें अध्यक्ष-पक्ष की तरफ से ऑडियो रिकॉर्डिंग करने वाले को प्रसून चौधरी के 'मुंडु' के रूप में संबोधित किया गया । चलो मान लेते हैं कि ऑडियो रिकॉर्डिंग करने वाला प्रसून चौधरी का 'मुंडु' होगा, लेकिन इसी तर्ज पर यह भी तो बताना चाहिए कि कॉन्करेंस के लिए पदों की सौदेबाजी करने तथा क्लब व रोटरी को बेचने वाले तथा उनके समर्थक किसके 'मुंडु' हैं ?
क्लब को और रोटरी को बेच देने के लिए तैयार हो जाने वाले मौजूदा पदाधिकारियों व उनके गिने-चुने संगी-साथियों की हरकतों को देखते हुए ही क्लब के कुछेक सदस्य पिछले महीनों में सवाल उठाते रहे हैं कि यह रोटरी क्लब है, या 'क्लब' है । यह सवाल इसलिए उठे क्योंकि रोटरी क्लब वैशाली के ही सदस्यों ने देखा/पाया कि उनका क्लब तो शराबबाजी और मौजमस्ती का अड्डा बनता जा रहा है । मीटिंग के नाम पर कुछ ही परिवार इकठ्ठा होते और उनमें इस बात के लिए शर्त लगती कि कौन ज्यादा शराब पी सकता है ! गज़ब तो पिछले दिनों असेम्बली में हुआ । दो दिन की असेम्बली में करीब दस परिवार गए थे : असेम्बली से लौटने का समय हुआ तो अध्यक्ष मनोज भदौला ने घोषणा की कि वह तो आज नहीं लौटेंगे । लौटने की तैयारी कर चुके सदस्यों ने आज न लौटने का कारण पूछा तो अध्यक्ष ने उन्हें बताया कि शराब की चार-पाँच बोतलें बच गई हैं, वह तो उन्हें खत्म करने के बाद ही लौटेंगे । असेम्बली के तय कार्यक्रम के अनुसार छह-सात परिवार ही लौटे, तथा बाकी तीन-चार परिवार शराब की बची हुई बोतलों को निपटाने के लिए असेम्बली के नाम पर एक दिन और रुक गए । असेम्बली का रोटरी में बड़ा खास महत्व है, जिसे ध्यान में रखते हुए ही रोटरी के कुछेक कार्यक्रमों में इसे विशेष रूप से डिजाइन किया गया है । रोटरी क्लब वैशाली में मनोज भदोला की अध्यक्षता में लेकिन इसे मटरगस्ती का जरिया और बहाना बना दिया गया है । मनोज भदोला मटरगस्ती में इस कदर मशगूल हैं कि रोटरी के नियम-कानूनों व व्यवस्था का पालन करने/करवाने के लिए उनके पास समय ही नहीं है । उन्हें बैंक में क्लब के अकाउंट के सिग्नेटरी बदलने का समय नहीं मिला है और तीन वर्ष से बैंक अकाउंट के सिग्नेटरी आशीष महाजन ही बने हुए हैं । मटरगस्ती के लिए क्लब में फंड आए, इसके लिए तरह तरह के उपाय सोचते रहने और उन्हें अमल में लाते रहने के लिए उनके पास समय की कोई कमी नहीं है । इसी के तहत अभी हाल ही में मनोज भदोला ने क्लब की नियमाबली में एक नियम यह बनवाया है कि क्लब का कोई सदस्य यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तत करता है तो क्लब की अनुमति पाने के लिए से क्लब के फंड में दस लाख रुपए देने होंगे । 
रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारी कॉन्करेंस के चक्कर में न पड़े होते तो यह तथ्य दबा-छिपा ही रह गया होता कि क्लब के अध्यक्ष मनोज भदोला के लिए रोटरी का मतलब सिर्फ सौदेबाजी करना, कुछेक लोगों के साथ मिल कर क्लब में मनमानियाँ करना, उसको शराबबाजी और मटरगस्ती का अड्डा बना देना - और क्लब का कोई वरिष्ठ सदस्य यदि इस सब पर सवाल उठाए तो अपने साथियों के साथ मिलकर उसके साथ गाली-गलौच करना भर है । रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों की असलियत जिस तरह से सामने आई है, उसे देख/जान कर लग रहा है कि मुकेश अरनेजा की कारस्तानी ने कम-अस-कम यह तो एक अच्छा काम किया है ।

Tuesday, May 12, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़ व शरत जैन जैसों के जरिए मुकेश अरनेजा को किनारे लगाने में कामयाब रहे रमेश अग्रवाल ने प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का झंडा उठाया, लेकिन प्रसून चौधरी के समर्थक रमेश अग्रवाल के खुले समर्थन को आत्मघाती मान रहे हैं

नई दिल्ली । प्रसून चौधरी की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को रमेश अग्रवाल के समर्थन की चर्चाओं के कारण डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे में फूट पड़ने के अनुमान लगाये जाने लगे हैं । यह अनुमान इसलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि मुकेश अरनेजा को अशोक गर्ग के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राहों को अलग अलग करने का कारण बनेगा । दरअसल जेके गौड़ तथा शरत जैन के रवैये ने मुकेश अरनेजा को तगड़ा झटका दिया है; और उन्हें लगने लगा है कि उनके साथ 'इस्तेमाल करो और किनारे लगाओ' वाला फार्मूला इस्तेमाल किया जा रहा है । पहले जेके गौड़ को तथा फिर शरत जैन को चुनवाने में मुकेश अरनेजा ने अपना सारा 'हुनर' इस्तेमाल किया - लेकिन यह दोनों रमेश अग्रवाल के ज्यादा सगे बने हैं और इन्होंने मुकेश अरनेजा को तो 'एक्स्ट्रा कलाकार' मान कर अलग ही बैठा दिया है । जेके गौड़ जिस तरह रमेश अग्रवाल को ही 'माई-बाप' माने बैठे हैं, उससे सबसे ज्यादा फजीहत मुकेश अरनेजा की हुई है और हो रही है । शरत जैन ने भी अभी से जेके गौड़ जैसे ही रंग-ढंग दिखाने शुरू कर दिए हैं, जिससे यह लगने लगा है कि शरत जैन के गवर्नर-काल में भी मुख्य भूमिका रमेश अग्रवाल की ही रहेगी, तथा मुकेश अरनेजा को तो ज्यादा से ज्यादा अतिथि कलाकार की भूमिका मिल जायेगी । डिस्ट्रिक्ट में मुकेश अरनेजा की यह जो दुर्गति हो रही है, उसका असर डिस्ट्रिक्ट के ऊपर की रोटरी की दुनिया पर भी पड़ रहा है - जहाँ कि रमेश अग्रवाल अपने लिए तो छोटे-मोटे असाइनमेंट जुगाड़ लेते हैं, और मुकेश अरनेजा को हाथ मलते हुए ही रह जाना पड़ता है । 
इसीलिए मुकेश अरनेजा को लग रहा है कि रमेश अग्रवाल से अलग होकर ही वह अपनी खोई हुई ताकत तथा हैसियत को पुनः पा सकते हैं । दूसरे लोगों का तो कहना है ही, लेकिन अब तो मुकेश अरनेजा को भी लगने लगा है कि उनकी रोटरी की राजनीति को रमेश अग्रवाल की हरकतों के चलते ही ग्रहण लग रहा है । अपनी हरकतों के चलते रोटरी के नेताओं के बीच रमेश अग्रवाल बुरी तरह बदनाम हैं; उनकी यह बदनामी मुकेश अरनेजा के पीछे भी चिपक जाती है - क्योंकि माना/समझा जाता है कि रमेश अग्रवाल जो भी करते हैं उसमें मुकेश अरनेजा का सहयोग व समर्थन होता ही है । इस तरह रमेश अग्रवाल के कारण मुकेश अरनेजा को दोहरा नुकसान होता है - एक तरफ तो रमेश अग्रवाल की बदनामी उनकी बदनामी में और इजाफा करती है, और दूसरी तरफ उनके लिए जो थोड़े-बहुत मौके बनते हैं उन्हें भी रमेश अग्रवाल झपट लेते हैं । बड़ा कमाल तो डिस्ट्रिक्ट में यही हुआ है कि रमेश अग्रवाल के प्रभाव में जेके गौड़ जैसे 'ना-कुछ' ने मुकेश अरनेजा को धो कर रख दिया है । मुकेश अरनेजा की बेचारगी का आलम यह है कि वह जेके गौड़ का कुछ कर भी नहीं पा रहे हैं । मुकेश अरनेजा ऐसे थे नहीं - लोगों को याद है कि अमित जैन ने जब उन्हें 'धोया' था, तब मुकेश अरनेजा ने उनसे कैसा बदला लिया था । जेके गौड़ के मामले में मुकेश अरनेजा की लेकिन सिट्टी-पिट्टी गुम है । जेके गौड़ के बाद शरत जैन भी मुकेश अरनेजा को 'ठिकाने' लगाने की तैयारी में हैं । मुकेश अरनेजा जैसे धाकड़ नेता जेके गौड़ तथा शरत जैन जैसों के सामने असहाय बने हुए हैं, तो इसका कारण यही है कि इन दोनों को रमेश अग्रवाल से शह व समर्थन मिल रहा है ।
अपनी खोई हुई ताकत व हैसियत को वापस पाने के लिए मुकेश अरनेजा ने लेकिन इस बीच एक बड़ा काम यह जरूर किया है कि उन्होंने सतीश सिंघल से तार जोड़ लिए हैं । वह भाँप रहे हैं कि सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में रमेश अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलेगी, इसलिए सतीश सिंघल के साथ तार जोड़ कर वह रोटरी की राजनीति में अपने पुराने मुकाम को पाने की उम्मीद लगाये हुए हैं और इस उम्मीद को पूरा करने के लिए उन्होंने अपना कदम बढ़ा दिया है । अपने इस कदम के वास्ते ठोस जमीन तैयार करने के लिए मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल के बाद अशोक गर्ग को गवर्नर बनवाने का जिम्मा उठा लिया है । मुकेश अरनेजा की इस चाल को पहचान कर ही रमेश अग्रवाल ने अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के समर्थन से हाथ खींच लिया है । उल्लेखनीय है कि अभी कुछ समय पहले तक रमेश अग्रवाल को अशोक गर्ग की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन रमेश अग्रवाल ने अब प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने के संकेत देना शुरू कर दिया है । मुकेश अरनेजा को यह स्थिति अपनी रणनीति के अनुरूप ही घटित होती हुई दिख रही है । रमेश अग्रवाल की इस उम्मीदवार-बदली से उनके लिए लोगों के बीच यह कहने/बताने का मौका बना है कि उन्होंने रमेश अग्रवाल का साथ नहीं छोड़ा है, बल्कि रमेश अग्रवाल ने उनका साथ छोड़ा है ।
रमेश अग्रवाल के समर्थन को लेकर प्रसून चौधरी के समर्थकों के बीच जो खलबली मची है, उसे देख/जान कर भी मुकेश अरनेजा उत्साहित हुए हैं । प्रसून चौधरी के कई समर्थक व शुभचिंतक रमेश अग्रवाल के खुले समर्थन को प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के लिए आत्मघाती मान रहे हैं । उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में रमेश अग्रवाल की जैसी जो बदनामी है - उसके कारण रमेश अग्रवाल के समर्थन से फायदा कम,नुकसान ज्यादा होगा । यह सच है कि रमेश अग्रवाल के समर्थन के बावजूद जेके गौड़ और शरत जैन जीते हैं, लेकिन यह मानना कि इन्हें जीत रमेश अग्रवाल के कारण मिली है - सच्चाई व तथ्यों से मुँह चुराना होगा । इसी का वास्ता देकर प्रसून चौधरी के कुछेक समर्थकों का सुझाव है कि रमेश अग्रवाल के समर्थन को पर्दे के पीछे छिपा कर रखे जाने की जरूरत है । सवाल लेकिन यह है कि इसके लिए रमेश अग्रवाल तैयार होंगे क्या ? यह सुझाव रमेश अग्रवाल को अपनी तौहीन नहीं लगेगा क्या ? और इस तौहीन के बाद भी वह प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में बने रहेंगे क्या ? इन सवालों से जो स्थितियाँ बन रही हैं, उन्हें सुभाष जैन और भड़का रहे हैं । वह लोगों को बता रहे हैं कि स्कूली धंधे के कारण जेके गौड़ और जैन होने के कारण शरत जैन उनके समर्थन के लिए राजी हो गए हैं, और यह दोनों रमेश अग्रवाल पर दबाव बनायेंगे कि रमेश अग्रवाल इस बार प्रसून चौधरी को उनके पक्ष में बैठा लें । सुभाष जैन का यह दावा कितना सच है, और यदि सच है तो कब तक कामयाब हो पायेगा - यह तो अगले कुछ दिनों में ही स्पष्ट हो पायेगा; लेकिन अभी यह जरूर हुआ है कि रमेश अग्रवाल के समर्थन से पैदा हुई मुसीबत में प्रसून चौधरी और उनके समर्थक अभी उलझे हुए थे ही कि सुभाष जैन के इस 'हमले' ने उनकी मुसीबत को और बढ़ा दिया है । 
रमेश अग्रवाल के नाम पर पैदा हुए इस झमेले में मुकेश अरनेजा को अपना काम आसान होता हुआ दिख रहा है; और उनकी इस आसानी में डिस्ट्रिक्ट की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ लेती हुई नजर आ रही है । 

Sunday, April 26, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में नोएडा क्षेत्र के क्लब्स ने प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन व्यक्त करके अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों के चुनावी-प्रबंधन को गड़बड़ाने के साथ-साथ उनके सामने मुश्किलें खड़ी करने का काम तो किया ही है; चुनाव को खासा दिलचस्प भी बना दिया है

नोएडा । प्रवीन निगम की उम्मीदवारी को नोएडा के क्लब्स के पदाधिकारियों व प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति में जिस जोश के साथ प्रस्तुत किया गया और उनकी उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए काम करने की योजना पर जिस दिलचस्पी के साथ विचार-विमर्श किया गया, उसने अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के समीकरणों को बुरी तरह उलट-पलट दिया है । पिछले दिनों सुभाष जैन की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी से जो अशोक गर्ग अभी कल तक बहुत खुश दिख रहे थे, वही अशोक गर्ग अब प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के जोरशोर से प्रस्तुत होने की खबर सुनकर सकते में आ गए हैं । प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की चर्चा यूँ तो काफी दिनों से थी; लेकिन चूँकि उनकी कोई सक्रियता नहीं देखी जा रही थी, इसलिए प्रवीन निगम की उम्मीदवारी को लेकर संदेह बना हुआ था और कोई भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लेता दिख रहा था । पिछले कुछ दिनों में प्रवीन निगम किंतु जब लोगों के बीच सक्रिय होते हुए दिखना शुरू हुए, तो उनकी उम्मीदवारी की ठंडी पड़ती चर्चा एक बार फिर गर्म होने लगी, जिसका पारा नोएडा के क्लब्स की संयुक्त मीटिंग ने खासा ऊपर चढ़ा दिया । इस ऊपर चढ़े पारे ने दूसरे उम्मीदवारों, खासकर अशोक गर्ग की स्थिति को पिघलाने का खतरा पैदा कर दिया है । 
किसी भी चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार दूसरे उम्मीदवारों की स्थिति में डेंट करने की संभावना तो पैदा करता ही है, इसलिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी ने यदि प्रसून चौधरी के लिए तथा प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की सक्रियता ने अशोक गर्ग के लिए मुसीबत खड़ी की है, तो यह चुनावी राजनीति का एक स्वाभाविक सीन है । अशोक गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि सुभाष जैन की उम्मीदवारी के कारण प्रसून चौधरी की स्थिति पर पड़ सकने वाले प्रतिकूल प्रभाव का आकलन करते हुए वह अपने पक्ष में समीकरणों का जुगाड़ बैठाते, उससे पहले ही प्रवीन निगम ने उनकी उम्मीदों की जड़ों में मट्ठा डाल दिया । दरअसल अशोक गर्ग के कई समर्थकों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, जिनके अब प्रवीन निगम के साथ जुड़ने की संभावना है । प्रवीन निगम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रोफेशन में एक बड़ा नाम है, जिन्होंने प्रोफेशन के एकेडमिक पक्ष के साथ-साथ प्रोफेशन के प्रशासनिक व राजनीतिक पक्ष में भी अपनी प्रभावी पैठ बनाई हुई है । इस नाते अधिकतर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रवीन निगम के संपर्क में या तो हैं, और या उनके संपर्क में रहना/होना चाहते हैं । रोटरी की राजनीति में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स कोई अलग समूह तो नहीं बनाते हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से वह महत्वपूर्ण भूमिका जरूर ही निभाते हैं । चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के नाते अशोक गर्ग को व्यक्तिगत हैसियत में कई एक चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का सहयोग व समर्थन मिल रहा था - या मिलने का विश्वास था । प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के कारण उनका सहयोग व समर्थन लेकिन अब अशोक गर्ग से छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है । 
अशोक गर्ग के सामने एक और समस्या आन पड़ी है । अशोक गर्ग अभी जिन मुकेश अरनेजा के समर्थन का दावा करते हैं, और इस दावे के भरोसे अपनी उम्मीदवारी को परवान चढ़ते देख/मान रहे हैं - उन मुकेश अरनेजा के प्रवीन निगम के क्लब के प्रमुख सदस्य प्रशांत माथुर के साथ अच्छे संबंध बताये/सुने जाते हैं । ऐसे में अशोक गर्ग के लिए मुकेश अरनेजा के समर्थन को अपने साथ बनाये रखने की चुनौती पैदा हो गई है । अशोक गर्ग के लिए डर यह पैदा हुआ है कि प्रशांत माथुर यदि मुकेश अरनेजा का समर्थन प्रवीन निगम के लिए ले उड़े, तो उनका क्या होगा ?
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के जो उम्मीदवार नोएडा में अपने अपने लिए समर्थन खोज/बना रहे थे, उन्हें प्रवीन निगम की सक्रियता से और नोएडा के लोगों के उनके समर्थन में खड़ा होने से झटका लगा है । दूसरे उम्मीदवारों का हालाँकि कहना तो है कि नोएडा क्षेत्र के क्लब्स के लोगों ने अभी भले ही प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के प्रति विश्वास और समर्थन दिखाया हो, लेकिन जैसे जैसे अभियान आगे बढ़ेगा वैसे वैसे समर्थन की वास्तविकता सामने आयेगी और ऐसा नहीं होगा कि नोएडा क्षेत्र के सारे वोट प्रवीन निगम ही ले जायेंगे । दूसरे उम्मीदवारों का ऐसा सोचना और कहना हालाँकि कोई गलत नहीं है, किंतु एक तथ्य अवश्य ही ध्यान में रखने योग्य है और वह यह कि नोएडा क्षेत्र के क्लब्स का रोटरी के काम करने के मामले में अच्छा ट्रेक रिकॉर्ड है; और रोटरी के काम करने के इस रिकॉर्ड के चलते उनके बीच अच्छी बॉन्डिंग है । प्रवीन निगम और उनके क्लब ने जो कई प्रोजेक्ट्स किये हैं, तथा कई एक प्रोजेक्ट्स में जो सहभागिता की है - उसके कारण नोएडा के दूसरे क्लब्स के लोगों के साथ उनके गहरे संबंध बने हैं । प्रवीन निगम और उनके समर्थकों ने यदि व्यावहारिक तरीका अपनाया तो नोएडा की रोटरी में लोगों के साथ उनकी जो बॉन्डिंग बनी हुई है, वह चुनावी राजनीति में उनके काम अच्छे से आ सकती है ।
प्रवीन निगम की सक्रियता ने तथा नोएडा में जाहिर हुए उनकी उम्मीदवारी के समर्थन ने अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों के चुनावी-प्रबंधन को गड़बड़ाने के साथ-साथ उनके सामने मुश्किलें खड़ी करने का काम तो किया ही है; चुनाव को खासा दिलचस्प भी बना दिया है ।

Tuesday, April 21, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन को अपने लिए स्थितियाँ अनुकूल तो खूब दिख रही हैं, लेकिन क्लब में योगेश गर्ग ने भी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके उनके लिए बड़ी समस्या और चुनौती पैदा कर दी है

गाजियाबाद । सुभाष जैन ने अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की बात करके लोगों को हैरान कर दिया है । लोगों के लिए हैरान होने का कारण यह रहा कि अभी चार दिन पहले ही तो उन्होंने सुभाष जैन को यह कहते हुए सुना था कि अगले तीन-चार वर्ष तो वह बहुत ही व्यस्त होने के कारण अपनी उम्मीदवारी के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं; लेकिन अब वही सुभाष जैन खुद ही अपनी उम्मीदवारी की बात कह रहे हैं । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि चार दिन में आखिर ऐसा क्या हो गया है कि सुभाष जैन की सारी व्यस्तता छूमंतर हो गई और वह उम्मीदवार बनने के लिए तैयार हो गए हैं ? लोगों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि चार दिन पहले अपनी व्यस्तता की जो बात उन्होंने कही थी, वह यदि झूठ थी - तो क्या जरूरी है कि अब जो वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की बात कर रहे हैं, वह झूठ नहीं होगी ? दरअसल सुभाष जैन के इसी विरोधाभासी व्यवहार के कारण अभी कोई भी उनकी उम्मीदवारी की बात को गंभीरता से नहीं लेता दिख रहा है ।
सुभाष जैन की उम्मीदवारी की बात को कोई इसलिए भी गंभीरता से नहीं ले रहा है, क्योंकि उनके अपने क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल में उनकी उम्मीदवारी को लेकर झमेला पैदा हो गया है । सुभाष जैन ने अपनी उम्मीदवारी की बात बताते हुए लोगों से इस बात का दावा किया कि उन्हें अपने क्लब में अपनी उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिल गई है; और जब कुछेक लोगों ने क्लब के वरिष्ठ सदस्य योगेश गर्ग की उम्मीदवारी के बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने जबाव दिया कि योगेश गर्ग ने भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति समर्थन व्यक्त कर दिया है । सुभाष जैन ने लोगों के बीच भले ही यह दावे कर दिए, लेकिन उनके यह दावे जल्दी ही झूठे साबित हो गए । क्लब के पदाधिकारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्लब में औपचारिक तौर पर अभी सुभाष जैन की उम्मीदवारी के बारे में कोई फैसला होना तो दूर की बात है, अभी कोई विचार-विमर्श भी नहीं हुआ है । क्लब के पदाधिकारियों का तो यहाँ तक कहना है कि जिस दिन उन्हें सुभाष जैन की तरफ से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की इच्छा जताता हुआ ईमेल संदेश मिला, उसके अगले ही दिन उन्हें योगेश गर्ग की तरफ से भी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने बाबत पत्र प्राप्त हुआ । अब यदि योगेश गर्ग भी अगले रोटरी वर्ष में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की बात कर रहे हैं, तो सुभाष जैन का यह कहना/बताना झूठ ही हुआ न कि उनके क्लब ने उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी दे दी है और योगेश गर्ग भी उनकी उम्मीदवारी को लेकर राजी हैं ।
इन तथ्यों ने सुभाष जैन की उम्मीदवारी को लोगों के बीच मजाक का विषय बना दिया है । जिन लोगों को सुभाष जैन के साथ हमदर्दी है और जो चाहते हैं कि सुभाष जैन को उम्मीदवार बनना चाहिए, उन्हें भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि सुभाष जैन ने अपनी उम्मीदवारी को इतने बचकाने तरीके से और झूठ का सहारा लेते हुए प्रस्तुत क्यों किया है ? उन्हें भी लगता है कि सुभाष जैन को अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में पहले अपने क्लब को भरोसे में लेना चाहिए था, और क्लब के झगड़ों/झंझटों को निपटाना चाहिए था - और फिर उसके बाद उन्हें दूसरे लोगों से अपनी उम्मीदवारी की बात करना चाहिए था । सुभाष जैन के शुभचिंतकों को भी लगता है कि अपने क्लब में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाए बिना सुभाष जैन ने जिस तरह से अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया है, उससे न सिर्फ उनकी उम्मीदवारी का हल्कापन जाहिर हुआ है, वह बल्कि मजाक का विषय भी बन गई है ।
दूसरों के बीच भले ही सुभाष जैन की उम्मीदवारी मजाक का विषय बन गई हो, लेकिन अपनी उम्मीदवारी को लेकर सुभाष जैन खुद बहुत आश्वस्त हैं । लोगों से बात करते हुए उन्होंने जो कुछ कहा है उसका सार यह है कि सुभाष जैन को लगता है कि प्रवीन निगम को कोई जानता नहीं है; दीपक गुप्ता को कोई पसंद नहीं करता; अशोक गर्ग के बस की चुनाव लड़ना नहीं है; प्रसून चौधरी के कट्टर समर्थक विकास चोपड़ा जब उनके समर्थन में आ जायेंगे तो प्रसून चौधरी के पास भी कुछ बचा नहीं रह जायेगा । दरअसल सुभाष जैन ने विकास चोपड़ा को कुछ बिजनेस दिया है, जिसके भरोसे वह मानते हैं कि वह उम्मीदवार बनेंगे तो विकास चोपड़ा, प्रसून चौधरी को छोड़ कर उनके समर्थन में आ जायेंगे । सुभाष जैन ने जेके गौड़ का समर्थन मिलने का भी दावा किया है । स्कूलों की जो एसोसिएशनबाजी होती है, उसमें जेके गौड़ चूँकि सुभाष जैन की हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं, इसलिए सुभाष जैन को भरोसा है कि वह उम्मीदवार बनेंगे तो जेके गौड़ उनकी उम्मीदवारी का झंडा खुद-ब-खुद उठा लेंगे । इतनी अनुकूल स्थितियों के बीच, फिर मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल भी उनका समर्थन करने को मजबूर हो जायेंगे । इस तरह, सुभाष जैन को विश्वास है कि वह बड़े आराम से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुन लिए जायेंगे ।
सुभाष जैन का आराम से चुन लिए जाने के इस सपने का क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा; सुभाष जैन के लिए अभी मुसीबत लेकिन यह पैदा हो गई है कि उनकी इन बातों के आधार पर उनका मजाक ज्यादा बन रहा है । क्लब में योगेश गर्ग ने भी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके सुभाष जैन के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर ही दी है । क्लब में सुभाष जैन के लिए जो समस्याएँ पैदा हुई हैं, उनके लिए खुद सुभाष जैन को ही जिम्मेदार माना/बताया जा रहा है । क्लब में सुभाष जैन के संगी-साथियों का ही कहना है कि सुभाष जैन ने अपने व्यवहार और अपने रवैये से लोगों को अपने खिलाफ कर लिया है; समस्या की बात यह है कि उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि उनका तौर-तरीका उन्हें सच्चाई से अवगत ही नहीं होने दे रहा है और वह खामख्याली में ही अनुमान लगाये जा रहे हैं । यही कारण है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी प्रस्तुत होते ही लोगों के बीच मजाक का विषय बन गई है ।

Wednesday, April 8, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के 'आती भी नहीं दिखती है, और जाती भी नहीं है' वाले रवैये के कारण प्रसून चौधरी और अशोक गर्ग के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने का काम मुश्किल हुआ

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के इर्द-गिर्द बुनी जाने वाली डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों को खासा असमंजस में डाला हुआ है और जिसके चलते खिलाड़ियों के लिए 'पोजीशंस' लेना मुश्किल बना हुआ है । मजे की बात यह है कि दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम अपनी अपनी संभावित उम्मीदवारी के बाबत कुछ कर भी नहीं रहे हैं - और उनके कुछ न करने के कारण उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तुत न होने के दावे भी किये/सुने जाने लगे हैं; लेकिन फिर भी चुनावी राजनीति के बनने वाले समीकरण जैसे राह भटक गए हैं, और समीकरण बनाने वाले नेता अभी और इंतजार कर लेना चाहते हैं । ऐसी स्थिति शायद ही कभी देखने में आई हो कि संभावित उम्मीदवार तो कुछ नहीं कर रहे हों और सुस्त बने हुए हों, लेकिन उन्होंने फिर भी घोषित उम्मीदवारों के लिए मुसीबत खड़ी की हुई हो और चुनावी खेमेबाजी को बनने से रोका हुआ हो । दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम के नजदीकियों का आरोप तो है कि अगले रोटरी वर्ष के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर चुके प्रसून चौधरी और अशोक गर्ग उनकी उम्मीदवारी न आने की झूठी अफवाहें फैला रहे हैं; पर यह अफवाहें फैलाने का मौका तो उन्हें एक उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम की निष्क्रियता के कारण ही मिल रहा है । दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम के लिए राहत की बात अभी सिर्फ इतनी ही है कि लोग उनकी उम्मीदवारी के प्रति सशंकित भले ही हों, लेकिन उम्मीद से अभी भी भरे हुए भी हैं ।
पेट्स में दीपक गुप्ता की सक्रियतापूर्ण उपस्थिति ने उन नेताओं को चौंकाया, जो मान रहे थे और बता रहे थे कि दीपक गुप्ता की रोटरी में दिलचस्पी लगभग खत्म हो चुकी है और अब वह रोटरी के आयोजनों में शायद ही कहीं दिखें । इस तरह की बातें कहते/बताते हुए 'संदेश' यह देने की कोशिश की गई कि दीपक गुप्ता अगले वर्ष की चुनावी प्रतिस्पर्द्धा से दूर और बाहर ही रहेंगे । लेकिन पेट्स में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा कर दीपक गुप्ता ने इस तरह की बातों पर एकदम से विराम तो लगा दिया है, हालाँकि अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच भरोसा पैदा करने के लिए उनके शुभचिंतकों को उनकी तरफ से अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत भी महसूस की जा रही है । कई लोग हैं जो अभी भी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति आश्वस्त नहीं हैं; ऐसे लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता पेट्स में नजर तो आये किंतु उनकी सक्रियता का स्तर और उनकी बॉडी लैंग्वेज उम्मीदवार होने की उनकी 'तैयारी' का आभास नहीं दे रही थी । लोगों के बीच चर्चा है कि पुराने सहयोगियों के साथ छोड़ देने के बाद दीपक गुप्ता के लिए अपना चुनाव अभियान चलाना ही मुश्किल होगा; लेकिन ऐसी ही चर्चाओं में यह भी सुनने को मिल जाता है कि दीपक गुप्ता को कई नए सहयोगी मिल गए/रहे हैं जिनके सहयोग से उनके लिए अपने चुनाव अभियान को चलाना कोई मुश्किल नहीं होगा । दरअसल इसी तरह की परस्पर विरोधी चर्चाओं के कारण लोगों के बीच दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की उम्मीद पूरी तरह टूटी नहीं है । मजे की बात यही है कि एक संभावित उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता की लोगों के बीच कहीं कोई उपस्थिति नहीं है, लोगों को उनकी बॉडी लैंग्वेज में भी उनके उम्मीदवार हो सकने का संदेश पढ़ने को नहीं मिल रहा है - लेकिन फिर भी लोग उन्हें संभावित उम्मीदवार के रूप में देख रहे हैं ।
प्रवीन निगम का मामला तो और भी दिलचस्प है - और भूतों वाली कहानियों को चरितार्थ करता है । जैसे भूतों को किसी ने नहीं देखा होता है, लेकिन फिर भी कई लोग मानते हैं कि भूत होते हैं; ठीक वैसे ही एक उम्मीदवार के रूप में तो छोड़िये, एक रोटेरियन के रूप में भी प्रवीन निगम को रोटरी में कम ही देखा जा रहा है लेकिन फिर भी लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी प्रस्तुत होने की चर्चा लगातार बनी हुई है । इसका श्रेय हालाँकि प्रवीन निगम के क्लब के वरिष्ठ सदस्य रवि सचदेवा को है, जो लगातार लोगों को आश्वस्त किए हुए हैं कि प्रवीन निगम की उम्मीदवारी अवश्य ही प्रस्तुत होगी । उल्लेखनीय है कि पहले सुना जा रहा था कि पेट्स से प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के अभियान की शुरुआत होगी, लेकिन पेट्स में प्रवीन निगम कहीं नजर ही नहीं आए । उनकी तरफ से मोर्चा यद्यपि रवि सचदेवा ने सँभाला हुआ था और पेट्स में उपस्थित लोगों के बीच वह यह जताने/दिखाने का भरसक प्रयास कर रहे थे कि प्रवीन निगम की उम्मीदवारी एक अलग तरीके से लोगों के बीच लॉन्च होने की प्रक्रिया में है, इसलिए उनकी उम्मीदवारी की प्रस्तुति में थोड़ी देर हो रही है । रवि सचदेवा ने लोगों को यह भी बताया कि प्रवीन निगम की उम्मीदवारी का अभियान पूरी रूपरेखा बना कर ही शुरू होगा और जल्दी ही शुरू होगा । रवि सचदेवा की बातों पर जिन लोगों ने विश्वास किया, उनका भी मानना और कहना लेकिन यही रहा कि प्रवीन निगम अपनी उम्मीदवारी को लेकर यदि सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें उसकी प्रस्तुति में अब ज्यादा देर नहीं लगाना चाहिए । रवि सचदेवा अभी तो प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की प्रस्तुति के प्रति विश्वास बनाये रख पा रहे हैं, लेकिन प्रवीन निगम यदि ज्यादा समय तक लोगों के बीच अनुपस्थित रहे और उन्होंने खुद सामने आकर मोर्चा नहीं सँभाला तो रवि सचदेवा के लिए भी उक्त विश्वास बनाये रख पाना मुश्किल ही होगा ।
दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के 'आती भी नहीं दिखती है, और जाती भी नहीं है' वाले रवैये के कारण प्रसून चौधरी और अशोक गर्ग के लिए अजीब मुसीबत पैदा हो गई है । उल्लेखनीय है कि अभी तक इन्हीं दोनों ने अपनी अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया हुआ है, और समर्थन जुटाने के लिए अपने अपने तरीके से प्रयास शुरू किए हुए हैं । इनके लिए समस्या की बात यह है कि जो लोग इनके साथ नहीं हैं - या नहीं होना चाहते हैं, वह दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के 'स्टेटस' को पहले देख लेना चाहते हैं । कोई भी चुनाव अपनों के भरोसे नहीं, बल्कि परायों को अपना बनाने - या तटस्थ बनाने के भरोसे पर लड़ा जाता है । दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की संभावना प्रसून चौधरी और अशोक गर्ग के लिए परायों को अपना (या तटस्थ) बनाने के प्रयास को मुश्किल बना रही है । प्रसून चौधरी और अशोक गर्ग की इसी मुश्किल में दीपक गुप्ता और/या प्रवीन निगम की उम्मीदवारी के लिए रास्ता बनता दिख रहा है । जो लोग इस 'रास्ते' को देख पा रहे हैं, उनका भी मानना और कहना है कि इस 'रास्ते' का फायदा लेकिन तब मिलेगा, जब दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम खुद इस पर 'चलना' शुरू करेंगे । दीपक गुप्ता और प्रवीन निगम की उम्मीदवारी सचमुच में प्रकट होती भी है या नहीं, यह तो अगले कुछेक दिनों में स्पष्ट हो जायेगा; लेकिन जब तक यह स्पष्ट नहीं होता है - तब तक प्रसून चौधरी और अशोक गर्ग के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए एक अलग तरह की चुनौती तो बनी ही हुई है ।

Wednesday, March 11, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता, प्रसून चौधरी, अशोक गर्ग, प्रवीन निगम की बातों व कोशिशों और सक्रियताओं ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति के परिदृश्य की झलक बनाना/दिखाना तो शुरू कर दिया है

नई दिल्ली । अशोक गर्ग की अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत की जाने वाली उम्मीदवारी दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी की चर्चा और इस चर्चा में अरनेजा गिरोह की भूमिका के कारण हाँ / ना के पचड़े में फँसी हुई लग रही है । यूँ तो अशोक गर्ग किसी से भी मिलते हैं तो अपनी उम्मीदवारी की बात जरूर ही करते हैं, लेकिन इतने सब के बावजूद वह अपने नजदीकियों को भी अपनी उम्मीदवारी के प्रति आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं । उनके नजदीकियों और उनके क्लब के लोगों का ही मानना और कहना है कि अशोक गर्ग अपनी उम्मीदवारी के प्रति अभी तक बहुत जोश व दम नहीं दिखा पा रहे हैं । वह इसका कारण भी बताते हैं । उनका कहना है कि अशोक गर्ग को दरअसल अभी तक अपने नेताओं से पक्के तौर पर हरी झंडी नहीं मिली है । उल्लेखनीय है कि अशोक गर्ग को अरनेजा गिरोह के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अरनेजा गिरोह के नेता लेकिन अभी यह भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि अशोक गर्ग एक उम्मीदवार की 'जिम्मेदारियों' को अफोर्ड कर भी पायेंगे या नहीं ? इसीलिए वह अभी अशोक गर्ग की उम्मीदवारी को हरी झंडी देने से बच रहे हैं और उन्हें 'काम करने' की सलाह दे रहे हैं । उनके इस रवैये से अशोक गर्ग को आशंका हो रही है कि जिन नेताओं के भरोसे वह उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं, वह नेता कहीं उन्हें धोखा तो नहीं देंगे ? इसी आशंका के चलते अशोक गर्ग अपनी उम्मीदवारी के प्रति बहुत जोश व दम नहीं दिखा पा रहे हैं ।
अशोक गर्ग उन सूचनाओं के चलते भी सशंकित हैं जिनमें बताया जा रहा है कि दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी भी अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए अरनेजा गिरोह के नेताओं का समर्थन जुटाने/पाने की जुगाड़ में हैं । उल्लेखनीय है कि इन दोनों की तरफ से भी अपनी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के दावे पेश किए गए हैं और इन्हें जहाँ जैसा मौका मिलता है वहाँ यह अपनी अपनी उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के प्रति लोगों को विश्वास दिलाने के प्रयत्न करते देखे/सुने गए हैं । हालाँकि इनके कॉमन फ्रेंड्स इनमें से किसी एक के उम्मीदवार बनने की वकालत करते हुए भी सुने गए हैं और चूँकि दोनों ही इस वकालत के प्रति 'ओपन' होने की बात करते हैं - इसलिए दोनों की उम्मीदवारी के प्रति संशय भी बना हुआ है । इस संशय के बावजूद लोगों के बीच एक स्ट्रांग फीलिंग यह भी है कि अरनेजा गिरोह के नेता इन्हीं दोनों में से किसी एक का समर्थन कर सकते हैं । लोगों के बीच की यह स्ट्रांग फीलिंग ही अशोक गर्ग को उम्मीदवारी के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ने से रोक रही है । अरनेजा गिरोह के नेताओं का समर्थन अशोक गर्ग को यदि नहीं मिल सकेगा, तब फिर अशोक गर्ग के लिए उम्मीदवार हो सकना मुश्किल ही क्या, असंभव ही होगा । अरनेजा गिरोह के नेताओं के समर्थन के बिना उम्मीदवार हो सकने की बात कम-अस-कम अशोक गर्ग नहीं सोच सकेंगे ।
अरनेजा गिरोह के उम्मीदवार का मुकाबला किस से होगा, यह भी अभी साफ नहीं हो रहा है । चुनावी संदर्भ में अरनेजा गिरोह के लिए इस वर्ष का मुकाबला बराबरी का रहा । वह शरत जैन को तो कामयाबी दिलवा सका, लेकिन प्रसून चौधरी के मामले में उसे गच्चा खाना पड़ा । अरनेजा गिरोह के विरोध के बावजूद सतीश सिंघल जीतने में कामयाब हुए, उससे यह बात तो साफ हो गई कि अरनेजा गिरोह के विरोध के बावजूद चुनाव जीता जा सकता है । सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट के दूसरे खेमे के नेता बनेंगे या नहीं, यह तो अभी नहीं पता; लेकिन इतना स्पष्ट है कि सतीश सिंघल अरनेजा गिरोह के नेताओं के पिटठू नहीं बनेंगे । यह स्पष्टता चाहे अनचाहे सतीश सिंघल के नेतृत्व में विरोधी खेमे के गठन की संभावनाओं का संकेत तो देती है - देखने की बात सिर्फ यह रह जाती है कि स्थितियाँ सतीश सिंघल को जो जिम्मेदारियाँ लेने की तरफ धकेल रही हैं, सतीश सिंघल उस जिम्मेदारी को उठा पाते हैं या नहीं ? दरअसल इसी कारण राजीव गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को लेकर चुप लगा गए लगते हैं । राजीव गुप्ता ने घोषणा की थी कि यदि सतीश सिंघल चुनाव जीते तो वह अगले रोटरी वर्ष में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । किंतु अब वह यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि सतीश सिंघल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करना ठीक रहेगा क्या ?
सतीश सिंघल की जीत ने डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में जो मौका दिखाया है, उसका फायदा उठाने के लिए प्रवीन निगम की तरफ से सुगबुगाहट सुनी गई है । उनके नजदीकियों का कहना है कि अपनी उम्मीदवारी की शुरुआत के लिए वह किसी शुभ मुहुर्त का इंतजार कर रहे हैं । प्रवीन निगम के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि दूसरे उम्मीदवार यदि अपने अपने गॉडफादर्स चुनने में ही व्यस्त रहेंगे और उनसे हरी झंडी मिले बिना अपनी अपनी सक्रियता से बचते रहेंगे, तो उससे पैदा हुई असमंजसता का फायदा उठाने का मौका उनके पास होगा । यह बात है तो ठीक, लेकिन इस फायदे को उठाने के लिए प्रवीन निगम को अपनी सक्रियता तो दिखानी पड़ेगी न - यह फायदा अपने आप तो नहीं मिलेगा न ।
इस तरह की बातों/चर्चाओं ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति के लिए माहौल बनाना तो शुरू कर दिया है । अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति का परिदृश्य अभी भले ही उलझा हुआ सा लग रहा हो, लेकिन इस तरह की बातों/चर्चाओं के चलते उसके जल्दी ही एक शक्ल ले लेने की संभावना भी बनती दिख रही है ।

Saturday, February 14, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी की सक्रियता व संलग्नता की निरंतरता पर बने असमंजस के कारण अरनेजा गिरोह के नेताओं ने अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अशोक कुमार गर्ग की उम्मीदवारी से फिलहाल हाथ खींचा

नई दिल्ली । अशोक कुमार गर्ग को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए अरनेजा गिरोह द्धारा दिखाई जा रही हरी झंडी को फिलहाल पीछे कर लेने से अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति का परिदृश्य थोड़ा धुँधला पड़ गया है । उल्लेखनीय है कि अभी कुछ दिन पहले तक अगले रोटरी वर्ष में अरनेजा गिरोह की तरफ से रोटरी क्लब दिल्ली शाहदरा के अशोक कुमार गर्ग को उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चा खासी मुखर थी । अशोक कुमार गर्ग को उम्मीदवार बनाये जाने को लेकर क्लब में कोई बखेड़ा न खड़ा हो, इसके लिए पहले से ही व्यवस्था कर ली गई थी और इसी व्यवस्था के तहत संजीव रस्तोगी को क्लब से बाहर करवा दिया गया था । मान लिया गया था कि संजीव रस्तोगी के क्लब से बाहर हो जाने के बाद अशोक कुमार गर्ग के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है । अरनेजा गिरोह द्धारा तीन-तिकड़म से शरत जैन को विजय दिलवा देने के साथ तो अशोक कुमार गर्ग और उनके नजदीकियों ने यह मानना और जताना भी शुरू कर दिया था कि जिस तरह अरनेजा गिरोह ने शरत जैन को जितवा दिया है, वैसे ही उन्हें भी जितवा दिया जायेगा । लेकिन अरनेजा गिरोह के नेताओं ने अगले रोटरी वर्ष में अशोक कुमार गर्ग की उम्मीदवारी को लेकर अचानक से चुप्पी साध ली है ।
अरनेजा गिरोह के नेताओं के नजदीकियों का ही कहना है कि नेताओं को दरअसल अभी अशोक कुमार गर्ग की क्षमताओं पर भरोसा नहीं हो पा रहा है, और वह इस बात को लेकर खुद को ही आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं कि अशोक कुमार गर्ग एक उम्मीदवार की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पायेंगे या नहीं और वह उन्हें जितवा भी सकेंगे क्या ? अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव खासा गहमागहमी भरा होने की उम्मीद की जा रही है । दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी के साथ साथ रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के राजीव गुप्ता तथा रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस के प्रवीण निगम द्धारा भी अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए संभावनाएँ तलाशे जाने की बातें लोगों के बीच चर्चा में हैं । दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी इस बार अपनी अपनी उम्मीदवारी में असफल भले ही रहे हों, लेकिन अपने अपने अभियान को उन्होंने जिस सक्रियता व संलग्नता के साथ चलाया - उसके कारण वह लोगों के बीच पैठ बनाने में तो कामयाब रहे ही हैं । अगले रोटरी वर्ष में वह यदि सचमुच में अपनी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हैं तो दोनों एक दूसरे के आमने-सामने होंगे और वह एक दिलचस्प मुकाबला होगा । राजीव गुप्ता और प्रवीण निगम के बारे में भी उनके नजदीकियों का कहना है कि यदि उन्होंने वास्तव में अपनी अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया तो वह पूरी पूरी तैयारी से मैदान में उतरेंगे और मुकाबले को गंभीर व संगीन बनायेंगे ।
अरनेजा गिरोह के लोगों का कहना है कि इन लोगों की संभावित उम्मीदवारी को देखते हुए ही उनके नेताओं ने अभी यह फैसला टाल दिया है कि वह किसकी उम्मीदवारी का झंडा उठाये । नेता लोग पहले यह देख/समझ लेना चाहते हैं कि कौन कौन सचमुच में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हैं, और अपनी अपनी उम्मीदवारी के अभियान को वह कैसे चलाते हैं ? वह जिसका पलड़ा भारी देखेंगे, उसी का झंडा उठा लेंगे । इस बार प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने के बावजूद उन्हें जीत दिलवाने में असफल रहने से सबक लेते हुए अरनेजा गिरोह के नेता अगली बार के लिए सावधान हैं और किसी ऐसे उम्मीदवार के साथ ही जाना चाहेंगे जिसके जीतने की उम्मीद होगी । शरत जैन की जीत से अरनेजा गिरोह के नेताओं की इज्जत इस बार तो बच गई, अगली बार वह यदि अपने उम्मीदवार को नहीं जितवा सके, तो उनके लिए मुश्किल हो जायेगी । दरअसल इसीलिए अरनेजा गिरोह के नेताओं ने अशोक कुमार गर्ग की उम्मीदवारी से फिलहाल हाथ खींच लिए हैं ।
अशोक कुमार गर्ग के नजदीकी हालाँकि दावा तो कर रहे हैं कि शरत जैन उनकी उम्मीदवारी को समर्थन देने की वकालत कर रहे हैं, और इसलिए उन्हें विश्वास है कि नेताओं का समर्थन भी उन्हें मिल जायेगा । दूसरे लोगों को यद्यपि इस विश्वास पर विश्वास नहीं है । उनका तर्क है कि गिरोह में शरत जैन की हैसियत ऐसी नहीं है कि वह अपनी पसंद का फैसला करवा सकें । फैसला तो मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ही करेंगे । संभावित उम्मीदवार अपने अपने तरीके से उनका समर्थन पाने की कोशिशें तो कर ही रहे हैं, लेकिन साथ ही यह भी जानने/समझने का प्रयास कर रहे हैं कि अपनी अपनी उम्मीदवारी के अभियान को वह कैसे आगे बढ़ाये । दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी के रवैये पर भी काफी कुछ निर्भर है । इस वर्ष उनकी जो सक्रियता व संलग्नता रही है, उसी की निरंतरता में वह यदि अपने अभियान को बनाये रखते हैं तो दूसरे उम्मीदवारों के लिए उनसे मुकाबला करना मुश्किल हो सकता है; लेकिन यदि उनकी निरंतरता का क्रम टूटा तो दूसरे उम्मीदवारों को अपने लिए जगह बनाने का मौका मिल भी सकता है । इस सब के चलते अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनावी परिदृश्य अभी थोड़ा गफलत भरा तो बना दिख रहा है, लेकिन यह सभी को लग रहा है कि वह होगा खासा पेचीदा ।

Tuesday, January 27, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में नोमीनेटिंग कमेटी के नतीजे से निराश और नाराज तथा अपने आप को ठगा हुआ पा रहे लोगों की तरफ से दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी पर नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को चैलेंज करने के लिए लगातार पड़ रहे दबाव ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ दिया

गाजियाबाद । शरत जैन और सतीश सिंघल की अधिकृत हो चुकी उम्मीदवारी को चैलेंज करने को लेकर डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह की सुगबुगाहट है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का पारा खासा गर्म हो उठा है । नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने के बाद यूँ तो आमतौर पर चुनावी सक्रियता ढीली पड़ जाती रही हैं, लेकिन इस बार उल्टा ही हो रहा है । नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह की निराशा और असंतोष है, उसके कारण प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवारों पर चैलेंज करने के लिए लोगों का दबाव पड़ रहा है । रोटरी की चुनावी राजनीति में ऐसे मौके कम ही देखने को मिलते हैं जब नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को चैलेंज करने के लिए प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार से भी ज्यादा उत्सुक दूसरे लोग हों । डिस्ट्रिक्ट 3012 के पैतृक डिस्ट्रिक्ट 3010 में तो पहले कभी शायद ही ऐसा मौका बना हो । अभी तक देखने में यही आया है कि नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले से असंतुष्ट प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार खुद ही चैलेंज करने के बारे में सोचता है, और अधिकृत उम्मीदवार व उसके समर्थक ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं । डिस्ट्रिक्ट 3012 के पहले ही चुना(वों) में लेकिन इसका ठीक उल्टा देखने में आ रहा है । यहाँ प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवारों की तुलना में डिस्ट्रिक्ट के लोग चैलेंज करने के बारे में ज्यादा 'तैयारी' दिखा रहे हैं ।
ऐसा दरअसल इसलिए भी है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट के लोगों को पहले से ही यह आशंका थी कि डिस्ट्रिक्ट पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिए अरनेजा गिरोह के नेता किसी भी तरह की हेराफेरी कर सकते हैं । लोगों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट 3010 में तो इनकी हरकतों पर लगाम रखने के लिए दूसरे नेता भी थे, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3012 में तो यह बिलकुल ही बेलगाम हो जायेंगे - इसलिए लोगों को खुद ही सक्रिय होना पड़ेगा । खास बात यह है कि लोग समझ रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल चूँकि बहुत ही घाघ किस्म के हैं, इसलिए जीतने के अवसर बनाने के मामले में आगे दिखेंगे - और इसी कारण से इनके खिलाफ लगातार सक्रिय रहने की जरूरत है । लोगों को अनुमान था कि नोमीनेटिंग कमेटी में यह लोग कोई न कोई खेल कर लेंगे और इसीलिए लोगों को नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला मंजूर नहीं हुआ है और वह प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवारों पर चैलेंज करने के लिए दबाव बना रहे हैं ।
लोगों के इस मूड को देखते/भाँपते हुए अधिकृत उम्मीदवार और उनके समर्थकों के सामने समस्या यह आ खड़ी हुई है कि वह कैसे चैलेंज करने की कोशिशों को रोकें ? शरत जैन और उनके समर्थकों के लिए तो यह इसलिए भी बड़ी समस्या हो गई है क्योंकि एक तरफ तो वह 'बड़ी जीत' का दावा करते हुए फूल कर कुप्पा हो रहे हैं, और दूसरी तरफ चैलेंज से डर रहे हैं । चैलेंज को रोकने की अपनी कोशिशों पर उन्हें लोगों से यही सुनने को मिल रहा है कि नोमीनेटिंग कमेटी में मिली 'बड़ी जीत' यदि सचमुच की जीत है तो फिर चैलेंज से डर क्यों रहे हो - चैलेंज हो जाने दो और सीधे चुनाव का सामना भी कर लो । शरत जैन की उम्मीदवारी को चैलेंज करना लोगों को इसलिए भी जरूरी लग रहा है क्योंकि वह मान रहे हैं कि शरत जैन एक कठपुतली गवर्नर ही बनेंगे, जबकि डिस्ट्रिक्ट को एक ऐसे गवर्नर की जरूरत है जो सबको साथ लेकर चल सके । जाहिर तौर पर यह सिर्फ विरोधियों का ही आरोप नहीं  है, बल्कि सत्ता खेमे के लोगों का भी स्वीकार है कि नोमीनेटिंग कमेटी में शरत जैन को जो जीत मिली है उसे मुकेश अरनेजा ने तिकड़मों से प्राप्त किया है जिसका भांडा सीधे हो सकने वाले चुनावों में फूट सकता है; और जो लोग शरत जैन के पक्ष में भी हैं वह भी मान रहे हैं कि शरत जैन की गवर्नरी में चलेगी तो रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा की मनमानी ही । इसलिए वह हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को चैलेंज न मिले और उनका भांडा फूटने से बचा रह जाए । उनके लिए मुसीबत की बात लेकिन यह हो रही है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के मूड और तर्कों के सामने उनकी कोशिशों के लिए रास्ता बनता नहीं दिख रहा है ।
सतीश सिंघल के लिए 'बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने' की तर्ज पर मिली जीत को बचाए रखने की और भी ज्यादा बड़ी चुनौती है । दरअसल सतीश सिंघल की जीत से लोग इसलिए भी दुखी और निराश हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सतीश सिंघल की इस जीत ने उनके साथ ज्यादा बड़ा छल किया है । सतीश सिंघल को खुद भी इस जीत का अनुमान नहीं था । वह तो बहुत पहले ही अपने आपको चुनावी दौड़ से बाहर हो चुका मान बैठे थे और एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय नहीं रह गए थे । एक उम्मीदवार के रूप में सतीश सिंघल ने लोगों को बुरी तरह से निराश ही किया है और इसीलिए उनके अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने में लोगों ने अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है । यही कारण है कि उनकी उम्मीदवारी के चैलेंज समर्थन करने के लिए तत्पर हैं । सतीश सिंघल के लिए मुसीबत की बात यह है कि उनकी वकालत करने तथा उनके सामने आने वाले चैलेंज को टलवाने के लिए कोई आगे ही नहीं आ रहा है और उन्हें प्रसून चौधरी के नजदीकियों से खुद ही सिफारिशें करना पड़ रही हैं ।
नोमीनेटिंग कमेटी के जरिये चुनाव कराने का जो 'तमाशा' हुआ है और उसका जो नतीजा आया है, उसने डिस्ट्रिक्ट में लोगों को जिस तरह से निराश और नाराज किया है - उसके कारण दीपक गुप्ता और प्रसून चौधरी पर नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को चैलेंज करने के लिए लगातार दबाव पड़ रहा है । यह दबाव डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में नई गर्माहट पैदा कर रहा है ।

Friday, January 23, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के बीच तुलना करते हुए लोगों ने पाया कि रोटरी का भविष्य प्रसून चौधरी के साथ है; और इसीलिए लोगों के बीच पड़े/बने प्रभाव में प्रसून चौधरी को सतीश सिंघल के मुकाबले बढ़त मिलती दिख रही है

नई दिल्ली । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने के उद्देश्य से चुनाव से दो दिन पहले हुई मीटिंग में कम रही उपस्थिति ने सतीश सिंघल के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया है । सतीश सिंघल की तरफ से चूँकि यह एक ही मीटिंग होनी थी, इसलिए इसमें अच्छी-खासी भीड़ होने की उम्मीद की जा रही थी; लेकिन लोगों की कम उपस्थिति ने सतीश सिंघल के हमदर्दों को बुरी तरह निराश किया । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के पक्ष में बनियाबाद चलाने के बावजूद उनकी उम्मीदवारी के लिए हुई मीटिंग में लोगों के न जुटने से सतीश सिंघल के समर्थकों को चिंता में डाल दिया है । हालाँकि सतीश सिंघल के नजदीकियों का कहना है कि इस मीटिंग में ज्यादा लोगों को बुलाया ही नहीं गया था, और जिन व जितने लोगों को बुलाया था उतने लोग मीटिंग में पहुँचे - और इसलिए मीटिंग में कम रही उपस्थिति कोई चिंता की बात नहीं है । सतीश सिंघल के नजदीकियों का दावा है कि मीटिंग में सिर्फ 'काम' के लोगों को बुलाया गया था, और वह आए भी ।
नजदीकियों और समर्थकों की इस परस्पर विपरीत प्रतिक्रिया से यही संकेत और सुबूत मिलता है कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के अभियान में तालमेल की भारी कमी है । सतीश सिंघल के लिए मुसीबत की बात यह रही है कि उनके समर्थक समझे जाने वाले लोग ही उनका मजाक बनाते देखे/सुने गए हैं । रोटरी क्लब दिल्ली विकास के शिव शंकर अग्रवाल लोगों को बताते सुने/देखे गए हैं कि सतीश सिंघल जो चार-पाँच पेज का विजन डॉक्युमेंट लोगों को दिखाते रहते हैं उसे सतीश सिंघल के लिए उन्होंने तैयार किया है; और सतीश सिंघल ने तो उसे शायद पढ़ा भी नहीं है, क्योंकि उसमें लिखी बातें वह कभी कहते/बताते ही नहीं हैं । सतीश सिंघल के समर्थकों को सतीश सिंघल से शिकायत रही है कि अपने पूरे अभियान में उन्होंने लोगों के बीच सिर्फ तीन बातें ही कहीं हैं : वह एक पुराने रोटेरियन हैं; उन्होंने ब्लड बैंक बनाया है; और उनका क्लब मेजर डोनर क्लब है; - और इन तीन बातों के आधार पर ही वह माँग कर रहे हैं कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बना दो । सतीश सिंघल ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत बड़े जोरशोर से की थी और अपने चुनाव अभियान में कई प्रमुख रोटेरियंस का समर्थन भी उन्होंने प्राप्त किया था; किंतु अपने व्यवहार और अपने रवैये के चलते वह न तो उस जोरशोर को बनाये रख सके और न ही अपने समर्थकों को अपने साथ जोड़े रख सके । शुरू में सतीश सिंघल के साथ दिख रहे कई लोग अब प्रसून चौधरी के साथ नजर आ रहे हैं ।
प्रसून चौधरी के साथ लोगों का चूँकि ज्यादा परिचय नहीं था, इसलिए सतीश सिंघल के मुकाबले उनके सामने गंभीर चुनौती थी । लेकिन लोगों को जैसे जैसे प्रसून चौधरी के बारे में परिचय मिलना शुरू हुआ, वैसे वैसे लोगों के बीच उनकी पैठ बनती गई । लोगों को यह जानकर वास्तव में हैरानी हुई और अच्छा लगा कि क्लब और डिस्ट्रिक्ट में प्रसून चौधरी की जो उपलब्धियाँ रहीं, उनके अलावा प्रसून चौधरी की बर्मिंघम, मॉन्ट्रियल और सिडनी में आयोजित हुईं तीन रोटरी इंटरनेशनल कन्वेंशन में भी सक्रिय भागीदारी रही और देश के बाहर विभिन्न देशों के 70 से अधिक क्लब्स के आयोजनों में शामिल होने का उन्हें मौका मिला है । प्रसून चौधरी ने दरअसल अपनी कामकाजी सक्रियता के साथ रोटरी का तानाबाना कुछ इस तरह बुना जिससे कि उन्होंने रोटरी की वास्तविक भावना को चरितार्थ किया ।
प्रसून चौधरी मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और उनकी कंपनी के दिल्ली, मुंबई व अमेरिका में ऑफिस हैं । वह भारत सहित एशिया, अमेरिका और यूरोप की तमाम बड़ी कंपनियों के सलाहकार हैं । दिल्ली आईआईटी और आईआईएम कोलकाता सहित देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों में वह विजिटिंग फैकल्टी हैं । देशी-विदेशी समाचार पत्रों तथा जर्नल्स में उनके लेख आदि प्रकाशित होते रहे हैं । कामकाजी सक्रियता के चलते प्रसून चौधरी को अक्सर ही अलग-अलग देशों की यात्रा पर जाना होता है । प्रसून चौधरी दुनिया के जिस भी शहर में होते हैं, वहाँ की रोटरी गतिविधियों से परिचित होने तथा उससे जुड़ने की हर संभव कोशिश करते हैं । दरअसल उनकी इसी कोशिश का नतीजा रहा कि देश के बाहर विभिन्न देशों के 70 से अधिक क्लब्स के आयोजनों से परिचित होने तथा उनमें शामिल होने का मौका उन्हें मिला - जिससे रोटरी का उन्हें व्यापक अनुभव हो सका ।
प्रसून चौधरी ने कार्पोरेट क्षेत्र के साथ अपने संपर्कों के चलते ही अपने क्लब के कई प्रोजेक्ट विभिन्न कंपनियों के साथ मिल कर किए । अपने विजन डॉक्युमेंट में प्रसून चौधरी इस बात पर लगातार जोर देते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह कार्पोरेट क्षेत्र के साथ मिल कर प्रोजेक्ट्स करने पर जोर देंगे, जिससे कि रोटेरियंस पर आर्थिक बोझ पड़े बिना बड़े प्रोजेक्ट्स किए जा सकेंगे और रोटरी का विस्तार भी हो सकेगा । प्रसून चौधरी का यह प्रोफाइल और उनकी कार्ययोजना स्वाभाविक रूप से किसी को भी आकर्षित करेगी ही - और उसने लोगों को आकर्षित किया भी । प्रसून चौधरी को लोगों के बीच पैठ बनाने में आसानी इसलिए भी हुई, क्योंकि उनके प्रतिद्धंद्धी सतीश सिंघल अपनी कोई कार्य योजना प्रस्तुत ही नहीं कर सके । सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी में एक बड़ा अंतर यह रहा कि सतीश सिंघल इसलिए गवर्नर बनने की उम्मीद रखते हैं क्योंकि उन्होंने पूर्व में कुछ काम किए हैं, और प्रसून चौधरी इसलिए गवर्नर बनने की उम्मीद कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भविष्य में कुछ काम करने हैं । यानि सतीश सिंघल को ईनाम के रूप में गवर्नरी चाहिए और प्रसून चौधरी को जिम्मेदारी के रूप में गवर्नरी चाहिए ।
सतीश सिंघल ने जिस तरह से अपना अभियान चलाया - उससे उन्होंने आभास दिया कि अब वह थक गए हैं, उन्हें जो करना था वह कर चुके हैं, उन्होंने जो किया है उसका 'भुगतान' करो और उन्हें गवर्नरी सौंपो । प्रसून चौधरी ने जिस तरह से अपना अभियान चलाया - उससे उन्होंने आभास दिया कि रोटरी में बहुत कुछ करने के लिए उनके पास एक सोच है, उस सोच को क्रियान्वित करने के लिए उनके पास सोर्स है, और सोर्स का उपयोग करने के लिए उनके पास जोश है । सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के बीच तुलना करते हुए लोगों ने पाया कि रोटरी का भविष्य प्रसून चौधरी के साथ है । इसीलिए तैयारियों और लोगों के बीच पड़े/बने प्रभाव में प्रसून चौधरी को सतीश सिंघल के मुकाबले बढ़त मिलती दिख रही है ।
सतीश सिंघल की तरफ से अपने आप को मुकाबले में बनाये रखने के लिए आखिरी हथियार के रूप में बनियाबाद का दाँव चला है । सतीश सिंघल के नजदीकियों का कहना है कि अब बनियाबाद ही सतीश सिंघल को बचा सकता है । रोटरी की चुनावी राजनीति से परिचित लोगों का मानना और कहना हालाँकि यह है कि रोटरी की चुनावी राजनीति में उम्मीदवार लोग अक्सर जातपात का सहारा लेते तो हैं, किंतु उन्हें सचमुच में सहारा मिल नहीं पाता है । रोटरी में कुछेक लोग तो जरूर जातपात मानते/निभाते हैं, लेकिन अधिकतर लोग इसे रोटरी के लिए गैरजरूरी ही मानते हैं और व्यवहार व कामकाज के आधार पर ही फैसले करते हैं । ऐसे में सतीश सिंघल के लिए सचमुच में परेशानी आ पड़ी है और उनके समर्थकों को भी लगने लगा है कि बनियाबाद का हथियार नहीं चला तो फिर तो प्रसून चौधरी से आगे निकल पाना उनके लिए मुश्किल ही होगा ।

Wednesday, January 21, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ज्ञानचंद गुप्ता द्धारा सतीश सिंघल की मीटिंग का जिम्मा लेने के कारण रोटरी क्लब दिल्ली विकास में मचे घमासान ने क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता के लिए तो फजीहत खड़ी की ही है, साथ ही मीटिंग के मूल उद्देश्य को भी पृष्ठभूमि में धकेल दिया है

नई दिल्ली । ज्ञानचंद गुप्ता ने सतीश सिंघल की मीटिंग का 'जिम्मा' लेकर रोटरी क्लब दिल्ली विकास में खासा बबाल पैदा कर दिया है, और क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता के लिए फजीहत खड़ी कर दी है । दरअसल जो बबाल पैदा हुआ, उसके लिए जवाहर गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया गया; और फिर सतीश सिंघल के समर्थकों ने जवाहर गुप्ता पर दीवाली मेले का हिसाब न देने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया है । इस तरह, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के चलते डिस्ट्रिक्ट का एक प्रमुख क्लब न सिर्फ खासे विवाद में फँस गया है, बल्कि क्लब के लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के काम में भी लग गए हैं ।
रोटरी क्लब दिल्ली विकास में इस कीचड़-कीचड़ खेल की शुरुआत कराने का 'श्रेय' ज्ञानचंद गुप्ता को दिया जा रहा है । ज्ञानचंद गुप्ता क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य हैं और क्लब में उनके लिए अच्छा सम्मान है । यह सम्मान उन्होंने अपनी सक्रियता और निष्पक्षता के चलते कमाया है । उन्हें जानने वाले लोगों का कहना है कि क्लब में अपनी अच्छी सक्रियता और धाक रखने के बावजूद उन्होंने कभी भी अपनी चलाने और अपने फैसले थोपने का प्रयास नहीं किया, तथा हमेशा ही क्लब में सर्वानुमति बनाने/बनवाने का काम किया । 'ऐसी' पहचान रखने वाले ज्ञानचंद गुप्ता को जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक उम्मीदवार सतीश सिंघल की पार्टी करने/करवाने का जिम्मा लेते हुए देखा गया तो क्लब के लोगों के कान खड़े हुए । क्लब के कई वरिष्ठ सदस्यों को तो इस बात की हैरानी हुई कि ज्ञानचंद गुप्ता तो 'इस तरह' के काम में पड़ते नहीं हैं, अब ऐसा क्या हुआ कि उन्हें 'इस तरह' का काम करने के लिए आगे आना पड़ा; क्लब के कई दूसरे सदस्यों का कहना रहा कि ज्ञानचंद गुप्ता के इस कदम से क्लब का नाम खराब हुआ है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास में हमेशा ही इस बात का ध्यान रखा गया है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में क्लब 'खुलेआम' किसी एक पक्ष के साथ नहीं 'दिखेगा' । ज्ञानचंद गुप्ता ने लेकिन क्लब की इस नीति के खिलाफ काम किया और अपने इस काम से क्लब को बदनाम किया/करवाया है ।
क्लब में यह समझने की कोशिश हुई कि ज्ञानचंद गुप्ता ने क्लब को बदनाम करने/करवाने वाला यह काम आखिर क्यों किया ? क्लब में सभी ने समझा/माना कि इस मामले में ज्ञानचंद गुप्ता दरअसल इस्तेमाल हो गए हैं, और दूसरे लोगों ने उन्हें आगे करके अपना उल्लू सीधा कर लिया है । जाना/समझा यह गया कि उक्त मीटिंग के पीछे हैं तो दूसरे लोग, लेकिन वह खुद तो सामने आये नहीं, और उन्होंने ज्ञानचंद गुप्ता को मोहरा बना लिया । इस तरह क्लब में ज्ञानचंद गुप्ता को क्लब की बदनामी करने/करवाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा, तो ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों ने क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता को निशाने पर ले लिया । ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों को लगता है कि सतीश सिंघल की मीटिंग कराने का जो काम ज्ञानचंद गुप्ता ने किया है, वह जवाहर गुप्ता को पसंद नहीं आया है; और इसीलिए वह ज्ञानचंद गुप्ता को बदनाम तथा उक्त मीटिंग को खराब करने/करवाने में लगे हुए हैं । जवाहर गुप्ता को निशाने पर लेने वाले लोगों का कहना है कि लगता है कि जवाहर गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने का मन बनाया है और इसीलिए उन्हें यह बात पसंद नहीं आई है कि ज्ञानचंद गुप्ता ने सतीश सिंघल की मीटिंग कराई है । ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों का आरोप है कि दीवाली मेले के आयोजन में तो जवाहर गुप्ता ने सतीश सिंघल के क्लब के लोगों से स्पॉन्सरशिप ले ली और अब सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने में लगे हुए हैं ।
ज्ञानचंद गुप्ता के नजदीकियों ने जवाहर गुप्ता पर गंभीर हमला बोलते हुए आरोप यह लगाया है कि जवाहर गुप्ता ने दीवाली मेले के हिसाब-किताब में गड़बड़ी की है, और इसीलिए उन्होंने दीवाली मेले का हिसाब-किताब अभी तक भी नहीं दिया है । आरोप लगाने वाले लोगों का कहना है कि जवाहर गुप्ता यह तो कहते/बताते रहते हैं कि दीवाली मेले में उन्हें नुकसान हुआ है और उनके अपने बहुत से पैसे लग गए हैं, किंतु जब भी उनसे हिसाब देने/बताने को कहो तो वह कन्नी काटने लगते हैं । दीवाली मेले में कुछेक काम जिन लोगों ने यह सोच कर किए थे कि 'इस' काम में होने वाला खर्चा उन्हें दीवाली मेले के एकाउंट से मिलेगा, वह भी खर्चा मिलने का अभी तक इंतजार ही कर रहे हैं - क्योंकि जवाहर गुप्ता ने 'उस' काम का खर्चा चुकाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । इसी से लोगों को कहने का मौका मिला है कि जवाहर गुप्ता ने पैसे इकट्ठे करने में तो दिलचस्पी दिखाई, लेकिन भुगतान करने में बचने की कोशिश की - और इसी से यह आरोप आया कि उन्होंने हिसाब-किताब में गड़बड़ी की है । जो लोग दीवाली मेले के हिसाब-किताब में जवाहर गुप्ता द्धारा गड़बड़ी किए जाने की बात को नहीं भी मानते हैं, उनका भी कहना लेकिन यह है कि जवाहर गुप्ता को हिसाब-किताब तो देना/बताना ही चाहिए । क्लब के लोगों के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का यह जो सिलसिला चला है, उसमें यह बात भी आई कि सतीश सिंघल ने दीवाली मेले के लिए जितनी स्पॉन्सरशिप दिलाने का वादा जवाहर गुप्ता से किया था, उतनी स्पॉन्सरशिप चूँकि सतीश सिंघल ने नहीं दिलाई - इसीलिए जवाहर गुप्ता उनसे खफा हैं; और इसीलिए वह ज्ञानचंद गुप्ता द्धारा सतीश सिंघल की मीटिंग कराने की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं और ज्ञानचंद गुप्ता की कार्रवाई को क्लब को बदनाम करने/करवाने वाले काम के रूप में प्रचारित करने की कानाफूसियाँ कर रहे हैं ।
ज्ञानचंद गुप्ता द्धारा सतीश सिंघल की मीटिंग का जिम्मा लेने के कारण रोटरी क्लब दिल्ली विकास में मचे घमासान ने क्लब के अध्यक्ष जवाहर गुप्ता के लिए तो फजीहत खड़ी की ही है, साथ ही मीटिंग के मूल उद्देश्य को भी पृष्ठभूमि में धकेल दिया है ।

Tuesday, January 13, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सतीश सिंघल को जिन लोगों से सहयोग और समर्थन मिलने की उम्मीद थी, और जो लोग शुरू में उनकी उम्मीदवारी के साथ देखे भी जा रहे थे - वही लोग अब जब प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय नजर आ रहे हैं तो बाजी प्रसून चौधरी के हाथ में आती दिखना स्वाभाविक ही है

गाजियाबाद । प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से सोनीपत में आयोजित हुई मीटिंग के पीछे मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के नजदीकियों की सक्रियता को देख/पहचान कर सतीश सिंघल की चुनावी उम्मीदों को खासा तगड़ा झटका लगा है । उल्लेखनीय है कि अभी तक सतीश सिंघल की तरफ से भी और मुकेश अरनेजा की तरफ से भी ऐसा आभास दिया जा रहा था जैसे कि मुकेश अरनेजा एण्ड पार्टी डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सतीश सिंघल की उम्मीदवारी का समर्थन करेगी । मुकेश अरनेजा ने कुछेक जगह सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन में बात की भी थी । लेकिन रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ ने चूँकि सतीश सिंघल के साथ साथ प्रसून चौधरी के साथ भी तार जोड़े हुए थे, इसलिए मुकेश अरनेजा द्धारा की जा रही सतीश सिंघल के समर्थन की बातों पर बहुत भरोसा नहीं किया जा रहा था । मुकेश अरनेजा कई लोगों के साथ राजनीतिक धोखेबाजी करने के कारण पहले से ही खासे बदनाम हैं, इसलिए भी माना/समझा जा रहा था कि मौका पड़ा तो वह सतीश सिंघल के साथ भी धोखेबाजी करने से नहीं हिचकिचायेंगे । सतीश सिंघल की तरफ से हालाँकि लगातार दावा किया जाता रहा है कि इन लोगों का समर्थन उनके साथ ही रहेगा । सतीश सिंघल के कुछेक नजदीकी तो प्राइवेट में मुकेश अरनेजा ने, रमेश अग्रवाल ने, जेके गौड़ ने जो कुछ कहा होता है, उसका हवाला देते हुए दावा करते रहे हैं कि यह लोग अंदरखाने सतीश सिंघल के साथ ही हैं ।
सतीश सिंघल के नजदीकियों के इस तरह के दावे सुनकर लोगों को याद भी आया कि दो वर्ष पहले हुए चुनाव में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल इसी तरह से 'अंदरखाने' आलोक गुप्ता के साथ थे; और आलोक गुप्ता बताते थे कि उनकी इन दोनों से ही लगभग रोजाना बातें होती हैं और दोनों ही जेके गौड़ की बड़ी बुराई किया करते हैं । आलोक गुप्ता को बहुत बाद में समझ में आया कि 'अंदरखाने' की आड़ में यह दोनों दरअसल उनको उल्लू बना रहे थे और जेके गौड़ के साथ मिले हुए थे । सोनीपत में प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से आयोजित हुई मीटिंग में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के नजदीकियों को सक्रिय देख कर यह स्पष्ट हुआ कि 'अंदरखाने' की आड़ में यह दोनों अब की बार सतीश सिंघल को गोली दे रहे थे, और यह काम वास्तव में प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी को आगे बढ़ाने का कर रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले तथा मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की हरकतों को देखते/पहचानते रहे लोगों का मानना और कहना लेकिन यह भी है कि यह दोनों हारते दिख रहे के साथ धोखा करते हैं; यह दरअसल जीतने वाले के साथ रहते हैं, ताकि यह दावा कर सकें कि उसे इन्होंने जितवाया है । दो वर्ष पहले हुए चुनाव में यह दोनों सचमुच में आलोक गुप्ता के साथ ही थे, किंतु जैसे ही इन्हें समझ में आया कि आलोक गुप्ता के मुकाबले जेके गौड़ के जीतने के चांस ज्यादा हैं वैसे ही इन्होंने आलोक गुप्ता का झंडा छोड़ कर जेके गौड़ का झंडा उठा लिया । इस बार भी, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में पहले इन्हें लगता था कि प्रसून चौधरी के लिए सतीश सिंघल का मुकाबला कर पाना मुश्किल होगा, इसलिए यह सतीश सिंघल के साथ होने का दिखावा करने लगे थे; लेकिन जैसे ही इन्हें लगा कि सतीश सिंघल के लिए चुनावी होड़ में बने/टिके रहना मुश्किल हो रहा है और प्रसून चौधरी अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अच्छा खासा समर्थन जुटाते नजर आ रहे हैं, वैसे ही इन्होंने भी सतीश सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा छोड़ कर प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है ।
सतीश सिंघल एक उम्मीदवार के रूप में चूँकि अपनी सक्रियता नहीं दिखा पाए हैं, इसीलिए धीरे धीरे करके ऐसे कई लोग, जो शुरू में उनके साथ दिखते थे, अब उनसे दूर दिख रहे हैं और या प्रसून चौधरी के साथ/समर्थन में नजर आ रहे हैं । सतीश सिंघल के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि सतीश सिंघल ने अपने ही रवैये से अपना मामला खराब कर लिया है । सतीश सिंघल ने लोगों के बीच बाकायदा तर्क दिया कि चूँकि वह पुराने रोटेरियन हैं और उन्होंने रोटरी में बहुत काम किया है, इसलिए उम्मीदवार के रूप में उन्हें लोगों से समर्थन माँगने क्यों जाना चाहिए; लोगों को खुद ही आगे बढ़ कर उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करना चाहिए । पहले उन्होंने अपने क्लब के लोगों से यह उम्मीद की कि क्लब के लोगों को उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में सक्रिय हो जाना चाहिए । क्लब के लोगों ने पाया/देखा कि सतीश सिंघल उनके ही भरोसे अपनी उम्मीदवारी की नैया को पार लगाना चाहते हैं, तो फिर वह भी पीछे हट गए । इसी तरह धीरे धीरे सतीश सिंघल ने अपने तमाम समर्थकों को खो दिया है । अभी करीब दो महीने पहले इन पँक्तियों के लेखक से सतीश सिंघल की बड़ी जोरदार वकालत करने वाले एक वरिष्ठ रोटेरियन ने उनके रवैये से पैदा हुई निराशा को अब इन शब्दों के साथ अभिव्यक्त किया कि 'अरे, सतीश की बात छोड़िये; उसका कुछ समझ में नहीं आता है कि वह क्या कहता है और क्या करता है ।'
सतीश सिंघल का नुकसान प्रसून चौधरी का फायदा बना है । यह फायदा अपने आप नहीं बना है; इसके लिए प्रसून चौधरी ने अथक मेहनत की है । कम अनुभव होने तथा रोटरी की चुनावी राजनीति के लटकों-झटकों से अपरिचित होने के बावजूद प्रसून चौधरी ने सिर्फ अपनी सक्रियता और अपनी संलग्नता के भरोसे ही अपने आप को मुकाबले में आगे किया है । प्रसून चौधरी ने अपने व्यवहार और अपनी कार्यप्रणाली से क्लब्स के प्रभावी लोगों के बीच ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों के बीच भी अपने लिए स्वीकार्यता का भाव बनाया है और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाया है । सतीश सिंघल को हालाँकि अभी भी यकीन है कि रोटरी में उन्होंने जो किया है, उसे देखते/समझते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए लोग उन्हें ही चुनेंगे; किंतु सतीश सिंघल के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि सतीश सिंघल ने अपने रवैये और व्यवहार से जिस तरह अपने समर्थकों को खो दिया है, उससे उनकी उम्मीदवारी के सफल होने की संभावना खत्म हो गई है । सतीश सिंघल को जिन लोगों से सहयोग और समर्थन मिलने की उम्मीद थी, और जो लोग शुरू में उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन व्यक्त करते हुए देखे भी जा रहे थे - वही लोग अब जब प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय नजर आ रहे हैं तो ऐसा लगना स्वाभाविक ही है कि सतीश सिंघल के लिए चुनौती अब बहुत मुश्किल हो गई है ।

Thursday, December 25, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में राजीव गुप्ता की उम्मीदवारी का संकेत मिलने के साथ सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच जो उथल-पुथल मची, उसने सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का और उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रसून चौधरी को बढ़त दिलाने का ही काम किया है

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के राजीव गुप्ता की अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी की चर्चा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के अभियान को खासी तगड़ी चोट पहुँचाई है । राजीव गुप्ता इस वर्ष असिस्टेंट गवर्नर हैं और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के शुरू से ही घनघोर समर्थक रहे हैं । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के जो भी समर्थक रहे हैं, उनमें राजीव गुप्ता सबसे आगे रहे हैं और सबसे ज्यादा सक्रिय रहे हैं । राजीव गुप्ता के दिलचस्पी लेने के कारण ही रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार का अधिष्ठापन समारोह सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के एक बड़े लॉन्चिंग पैड के रूप में आयोजित हुआ था । रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के अध्यक्ष आशीष अग्रवाल अधिष्ठापन समारोह में जितने लोगों को आमंत्रित कर रहे थे, राजीव गुप्ता ने निजी दिलचस्पी लेकर उससे ज्यादा लोगों को आमंत्रित करवाया था और इस चक्कर में हुए अतिरिक्त खर्च की भरपाई भी की थी । इस भरपाई को लेकर क्लब के लोगों के बीच थोड़ा विवाद भी हुआ था - कुछ लोगों का कहना था कि यह भरपाई राजीव गुप्ता ने की थी, लेकिन कुछ अन्य लोगों का कहना था कि अतिरिक्त खर्च हुई रकम राजीव गुप्ता ने सतीश सिंघल से दिलवाई थी । इस तरह के छोटे-मोटे विवादों के बावजूद रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार का अधिष्ठापन समारोह बहुत जोरदार रूप में संपन्न हुआ था; और उस समारोह में सतीश सिंघल की उम्मीदवारी का जैसा जो प्रमोशन हुआ था उससे सतीश सिंघल की उम्मीदवारी ने एक ऊँची छलाँग भरी थी ।
रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के अधिष्ठापन समारोह में सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को जो ऊँची छलाँग मिली, उससे राजीव गुप्ता को भी एक बड़े स्ट्रैटिजिस्ट की पहचान मिली और माना जाने लगा कि राजीव गुप्ता के साथ रहने से सतीश सिंघल के लिए अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाना और उसे बढ़ाते जाना जरा भी मुश्किल नहीं होगा ।
लेकिन वही राजीव गुप्ता अंततः सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के लिए घाटे का वाहक बने हैं ।
यह इसलिए हुआ क्योंकि राजीव गुप्ता ने सतीश सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के साथ-साथ अगले रोटरी वर्ष में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के संकेत देने भी शुरू कर दिए । उनके हवाले से लोगों के बीच चर्चा फैली कि सतीश सिंघल को चुनवाने/जितवाने के बाद राजीव गुप्ता अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । माना/समझा गया कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के पक्ष में राजीव गुप्ता ने जो सक्रियता दिखाई है, उसके पीछे उनका मकसद अगले वर्ष प्रस्तुत होने वाली अपनी उम्मीदवारी के लिए जमीन तैयार करना है । इसका परिणाम यह हुआ कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के ऐसे कई समर्थक - जो राजीव गुप्ता की प्रस्तावित उम्मीदवारी के पक्ष में नहीं थे, भड़क गए और उन्होंने सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन से बचना शुरू कर दिया । अगले रोटरी वर्ष के लिए राजीव गुप्ता के ही क्लब के अनूप मित्तल के नाम की भी चर्चा थी । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों ने रोटरी क्लब नोएडा एक्सीलेंस के प्रवीण निगम को उम्मीदवार के रूप में प्रमोट करना शुरू कर दिया । हालात यह बने कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के लिए काम करने की बजाए अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति करने में लग गए ।
इससे सतीश सिंघल की उम्मीदवारी का अभियान तो पिछड़ा ही - साथ ही उनके समर्थकों के बीच परस्पर विरोधी खेमेबाजी भी होने लगी । सतीश सिंघल के प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रसून चौधरी ने इस स्थिति का पूरा पूरा फायदा उठाया । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के ऐसे समर्थकों पर, जो राजीव गुप्ता की प्रस्तावित उम्मीदवारी के विरोधी हैं - प्रसून चौधरी की तरफ से डोरे डाले गए और सतीश सिंघल के कई समर्थकों को अपनी तरफ मिला लिया गया । इसी का नतीजा है कि चुनाव अभियान शुरू होते समय जिन लोगों को सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/समझा जा रहा था, उनमें से कई अब प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय देखे जा रहे हैं । इस तरह, राजीव गुप्ता की उम्मीदवारी का संकेत मिलने के साथ सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच जो उथल-पुथल मची, उसने सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का ही काम किया है ।
मजे की बात यह हुई है कि अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली राजीव गुप्ता की उम्मीदवारी की चर्चा भी अब ठंडी पड़ गई है । राजीव गुप्ता के क्लब के लोगों का ही कहना है कि क्लब में अपनी उम्मीदवारी को लेकर राजीव गुप्ता ने कोई बात नहीं की है । उनसे पूछा भी गया तो उन्होंने यह कहते हुए बात को टाल दिया कि क्लब के लोग तो उनकी उम्मीदवारी का विरोध कर रहे हैं, ऐसे में अभी वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर क्या बात करें ? क्लब के बाहर भी उनके जो नजदीकी हैं, उनका कहना है कि राजीव गुप्ता ने अब अपनी उम्मीदवारी को लेकर बात करना बंद दिया है । उनके कुछेक नजदीकियों का कहना है कि पहले भी वह यह कहते थे कि सतीश सिंघल के जीतने पर ही वह अगले वर्ष अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे; हो सकता है कि अब उन्हें सतीश सिंघल के जीतने का भरोसा न रह गया हो और इसीलिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की बात करना बंद कर दिया हो । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के संदर्भ में यह एक बड़ा ट्रैजिक सा प्रसंग बन गया है कि जिन राजीव गुप्ता को सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के सबसे बड़े समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, उन्हीं राजीव गुप्ता के कारण सतीश सिंघल की उम्मीदवारी अपने प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के मुकाबले पिछड़ती हुई नजर आ रही है ।

Sunday, December 21, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट गैरी हुआंग के सामने मिले प्रदर्शन के मौके का फायदा उठाने के बाद प्रसून चौधरी की तरफ से जोन स्तर पर शुरू हुईं मीटिंग्स के कार्यक्रम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सतीश सिंघल के मुकाबले प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी को बढ़त दिलाई

गाजियाबाद । प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु जोन स्तर पर शुरू हुईं मीटिंग्स ने रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पुनः गर्मी पैदा कर दी है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3012 के गठन की औपचारिक घोषणा होने की प्रक्रिया पूरी होने तथा नए बने डिस्ट्रिक्ट के लिए चुनावी प्रक्रिया के दोबारा शुरू होने के कारण चुनाव की तारीख के आगे बढ़ने से चुनावी सरगर्मियाँ ठंडी पड़ गई थीं । चुनावी सरगर्मियाँ इसलिए भी ठंडी पड़ गईं थीं क्योंकि रोटरी वर्ष के पहले तीन-चार महीनों में उम्मीदवारों ने जमकर प्रचार अभियान चला लिया था और नया कुछ करने को बाकी नहीं रह गया था । सच यह है कि उम्मीदवार भी और 'वोटर' भी पूरी तरह पक/चट गए थे । दरअसल चुनाव चूँकि अक्टूबर/नवंबर में होते हैं, इसलिए उम्मीदवार अपनी सक्रियता का प्लान भी इसी तरह बनाते हैं कि उनका चुनाव अभियान अक्टूबर/नवंबर तक पूरा हो जाये । मौजूदा रोटरी वर्ष में भी उम्मीदवारों ने तो प्लान इसी तरह से बनाया और अपना चुनाव अभियान तय समय तक पूरा कर लिया, लेकिन चुनाव आगे खिसकता गया । ऐसे में, उम्मीदवारों के सामने सचमुच में यह संकट पैदा हो गया कि अब वह क्या करें ? इसी संकट के चलते चुनावी सरगर्मियाँ ठंडी पड़ गईं ।
लेकिन प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु जोन स्तर पर शुरू हुईं मीटिंग्स ने चुनावी हलचल में एक बार फिर से गर्मी पैदा करने का काम किया है । गाजियाबाद क्षेत्र के दो जोन में प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थकों ने मीटिंग्स कर ली हैं; दिल्ली के कुछेक जोन में मीटिंग्स के कार्यक्रम तय होने की सूचनाएँ मिल रही हैं और प्रसून चौधरी के समर्थकों की तरफ  से किया जा रहा दावा सुना जा रहा है कि जल्दी ही सभी जोन में मीटिंग्स के कार्यक्रम तय कर लिए जायेंगे तथा उचित समय तक सभी जोन में मीटिंग्स कर ली जायेंगी । प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थकों की इस आक्रामक रणनीति का उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार सतीश सिंघल की तरफ से कैसे मुकाबला किया जायेगा, इसका कोई संकेत लोगों को अभी तक नहीं मिला है । इस कारण, चुनाव अभियान के इस दूसरे दौर में सतीश सिंघल के मुकाबले प्रसून चौधरी के चुनाव अभियान को बढ़त लेते हुए देखा/पाया जा रहा है । 
प्रसून चौधरी को बढ़त इसलिए भी मिलती दिख रही है क्योंकि हाल ही में रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट गैरी हुआंग की उपस्थिति में डिस्ट्रिक्ट में हुए रू-ब-रू आयोजन में रोटरी फाउंडेशन के संदर्भ में प्रसून चौधरी का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा । सतीश सिंघल का क्लब यूँ तो काफी प्रभावी बताया जाता है, लेकिन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट तथा डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों के सामने जब प्रदर्शन का मौका आया तो पता नहीं क्यों सतीश सिंघल अपने को और अपने क्लब को चार्जड दिखाने से चूक गए । रू-ब-रू आयोजन में हुए 'प्रदर्शन' के आधार पर डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों ने प्रसून चौधरी और सतीश सिंघल के बीच तुलना की तो प्रसून चौधरी के पलड़े को भारी पाया/पहचाना । प्रसून चौधरी के पक्ष में डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों के बीच बनी यह धारणा डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों तक ट्रांसफर हुई तो उसका फायदा प्रसून चौधरी को मिलना ही था । यह फायदा वैसे उतना नहीं मिलता, यदि प्रसून चौधरी की तरफ से जोन स्तर पर मीटिंग्स का कार्यक्रम न शुरू किया गया होता । प्रसून चौधरी की तरफ से जोन स्तर पर शुरू हुईं मीटिंग्स और मीटिंग्स की तैयारी ने एक तरह से कड़ी-से-कड़ी जोड़ने का काम किया और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के साथ हुए रू-ब-रू कार्यक्रम में भारी हुए अपने पलड़े को और भारी बना लिया है ।
प्रसून चौधरी को बढ़त बनाते देखने के बावजूद प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के कई एक समर्थक सतीश सिंघल से मिल सकने वाली चुनौती को लेकर हालाँकि गंभीर भी बने हुए हैं । उनका मानना और कहना है कि सतीश सिंघल अभी भले ही प्रसून चौधरी से पिछड़ते नजर आ रहे हों, लेकिन सतीश सिंघल को इस पिछड़न को दूर करने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करने पड़ेंगे और थोड़े से प्रयासों से ही वह अपनी स्थिति को बेहतर बना सकेंगे । चुनाव अभियान के पहले चरण में भी ऐसा ही हुआ था । प्रसून चौधरी और सतीश सिंघल के बीच की होड़ को दिलचस्पी और नजदीक से देख रहे रोटेरियंस का मानना और कहना है कि प्रसून चौधरी के साथ अच्छी बात यह रही है कि उन्होंने शुरू से ही अपनी कमजोरियों को जाना/पहचाना और उन्हें दूर करते हुए आगे बढ़ने का काम किया; उनके रवैये के विपरीत सतीश सिंघल ने अपनी खूबियों पर मुग्ध होने/रहने का काम किया तथा अपनी कमजोरियों को पहचानने/समझने का ज्यादा प्रयास ही नहीं किया - उन्हें दूर करने का प्रयास तो फिर क्या ही होता । यही कारण रहा कि ऐसे कई प्रमुख रोटेरियंस जिन्हें सतीश सिंघल के साथ या तो होना चाहिए था और या जिन्हें उनके साथ शुरू में देखा भी जा रहा था - वह या तो चुप बैठे दिख रहे हैं और या प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी का झंडा उठाये हुए नजर आ रहे हैं । दरअसल इसलिए ही सतीश सिंघल जहाँ मौकों का फायदा उठाने में चूकते हुए दिख रहे हैं; वहीं प्रसून चौधरी मौकों का फायदा उठाते हुए सतीश सिंघल के मुकाबले बढ़त बनाने में कामयाब होते हुए नजर आ रहे हैं ।  

Thursday, October 9, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में सतीश सिंघल ने गाजियाबाद की अपनी मीटिंग के जरिए प्रसून चौधरी के समर्थक नेताओं को उनके अपने अपने क्लब में ही घेरने की जो कोशिश की है उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है

गाजियाबाद । सतीश सिंघल ने गाजियाबाद में एक बड़ी सफल मीटिंग करके प्रसून चौधरी के गढ़ में सेंध मारने की जो कार्रवाई की है, उसने डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है । डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में गाजियाबाद क्षेत्र में प्रसून चौधरी ने जिस तेजी के साथ अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाया था; और उनकी तुलना में सतीश सिंघल जिस तरह उदासीन दिख रहे थे - उसे लेकर सतीश सिंघल के समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच असमंजस बना हुआ था और उनके लिए यह समझना लगातार मुश्किल बना हुआ था कि गाजियाबाद को लेकर सतीश सिंघल आखिर क्या सोच रहे हैं । सतीश सिंघल के नजदीकियों और शुभचिंतकों का ही मानना और कहना रहा कि गाजियाबाद के रोटेरियंस के साथ सतीश सिंघल के जैसे जो दोस्ताना संबंध रहे हैं, उन्हें यदि वह समय रहते निरंतरता के प्रवाह में बनाये रखते तो प्रसून चौधरी को यहाँ पैर जमाने का मौका ही नहीं मिलता । गाजियाबाद के रोटेरियंस को साथ लेने में सतीश सिंघल ने जो उदासीनता दिखाई, प्रसून चौधरी ने उसका पूरा पूरा फायदा उठाया और अपनी उम्मीदवारी के प्रचार अभियान में ऐसे ऐसे लोगों को अपने साथ लेने में सफलता पाई - जो वास्तव में सतीश सिंघल के नजदीक देखे/समझे जाते थे और जिन्होंने सतीश सिंघल के रोटरी ब्लड बैंक जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए, उनके साथ बढ़चढ़ कर काम किया था । प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के प्रचार अभियान में गाजियाबाद के कई एक प्रमुख लोग जिस तरह से खुल कर सक्रिय दिख रहे थे, उससे सतीश सिंघल के समर्थकों व शुभचिंतकों को निराशा होने लगी थी । इसी निराशा के चलते गाजियाबाद में सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से आयोजित हुई मीटिंग का खास महत्व बना ।
सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से गाजियाबाद में आयोजित हुई मीटिंग की रौनक देखने के बाद सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों की सारी निराशा लेकिन अब भारी उत्साह में बदल गई है । समर्थकों व शुभचिंतकों को लगने लगा है कि सतीश सिंघल यदि 'एक उम्मीदवार के रूप में' सक्रिय हो सकें, तो गाजियाबाद में अपनी खोई हुई 'जमीन' को वापस भी पा सकते हैं । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों ने माना और कहा/बताया भी कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से गाजियाबाद में आयोजित मीटिंग की सफलता का पैमाना सिर्फ यही नहीं है कि मीटिंग में खूब लोग जुटे - मीटिंग में लोग तो आ ही जाते हैं; मीटिंग की सफलता का पैमाना यह है कि इसे राजनीतिक चतुराई के साथ आयोजित किया गया । सतीश सिंघल ने लोगों को आमंत्रित करने में जिस खुलेपन का और जिस रणनीति का परिचय दिया, उसका उन्हें पूरा पूरा लाभ भी मिला । मीटिंग में मौजूद लोगों को देख कर लगा कि सतीश सिंघल ने आमंत्रितों की सूची तैयार करते समय उन क्लब्स के लोगों का खास ध्यान रखा, जिनके नेता प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में खुल कर सक्रिय नजर आ रहे हैं । इस तरकीब से सतीश सिंघल ने प्रसून चौधरी के समर्थक नेताओं को उनके अपने अपने क्लब में ही घेरने की कोशिश की है ।
सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से गाजियाबाद में आयोजित हुई मीटिंग में उपस्थित हुए वरिष्ठ रोटेरियंस ने जिस तरह याद करते हुए रोटरी में सतीश सिंघल की निरंतर सक्रियता और उनकी उपलब्धियों को रेखांकित किया, उससे उन नए रोटेरियंस के बीच सतीश सिंघल की एक कर्मठ और 'कुछ करने' वाले रोटेरियन की विश्वसनीय पहचान बनी जिनका सतीश सिंघल के साथ परिचय नहीं था । इस तरह सतीश सिंघल को दो फायदे एकसाथ हुए - एक तो उनके लिए नए रोटेरियंस के बीच विश्वसनीय पहचान बनाने का बोझ कुछ कम हुआ, वह खुद यदि अपने काम गिनाते तो विश्वसनीयता नहीं बना पाते; दूसरे वरिष्ठ रोटेरियंस से मिली तारीफ से उनकी उम्मीदवारी का एक आभामंडल बना, जिसे बना पाना अन्यथा उनके लिए मुश्किल ही होता । इससे पहले हापुड़ और दिल्ली में आयोजित मीटिंग्स में अपनाई गई रणनीति के विपरीत, सतीश सिंघल ने गाजियाबाद की मीटिंग को 'क्षेत्रीय' दर्जा देने की बजाये 'डिस्ट्रिक्ट मीटिंग' टाइप का दर्जा दिया और यह दिखाने का प्रयास किया कि डिस्ट्रिक्ट के हर क्षेत्र के लोग उनके साथ हैं ।
सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से गाजियाबाद में आयोजित हुई मीटिंग की जोरदार सफलता में लेकिन सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के लिए एक खतरा भी 'पैदा' होता दिखा है । खतरा यह कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों ने इस सफल मीटिंग के भरोसे सतीश सिंघल को जीता हुआ ही मान लिया है । काश, मीटिंग्स में लोगों को इकठ्ठा करके चुनाव जीते जा सकते होते ! तब चुनाव जीतना कितना आसान हो गया होता ! सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले वरिष्ठ रोटेरियंस का ही कहना है कि गाजियाबाद में हुई चुनावी मीटिंग की सफलता से सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के भाव निश्चित रूप से बढ़े तो हैं, लेकिन इस सफलता से आश्वस्त हो जाना आत्मघाती साबित हो सकता है । प्रसून चौधरी के समर्थन में दिखने वाले कुछेक लोगों के सतीश सिंघल की मीटिंग में सक्रिय होने को उपलब्धि मानने के प्रति सावधान रहने की हिदायत देते हुए इन्हीं वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि हो सकता है कि कल यही लोग फिर से प्रसून चौधरी के साथ नजर आयें । इनका सुझाव है कि सतीश सिंघल को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि रोटरी की चुनावी राजनीति में पाला बदलने में लोग देर नहीं लगाते हैं ।
सतीश सिंघल के समर्थक वरिष्ठ रोटेरियंस का ही मानना और कहना है कि गाजियाबाद की मीटिंग की सफलता से यह तो साबित हुआ है कि सतीश सिंघल का रोटेरियंस के बीच एक ऑरा (आभामंडल) है तथा अपनी सक्रियता से वह अपने इस ऑरा को राजनीतिक समर्थन में भी बदल सकने की सामर्थ्य रखते हैं - समस्या सिर्फ इतनी सी ही है कि 'एक उम्मीदवार के रूप में' वह अपनी सक्रियता की निरंतरता को बनाये रख सकें । सतीश सिंघल से 'परिचित' वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि सतीश सिंघल के लिए चुनौती प्रसून चौधरी की तरफ से उतनी नहीं हैं, जितनी खुद उनकी अपनी तरफ से उन्हें है । कई लोगों का मानना और कहना है कि प्रसून चौधरी ने चुनावी मुकाबले में अपनी दमदार उपस्थिति यदि बनाई है, तो इसके लिए एक उम्मीदवार के रूप में सतीश सिंघल की उदासीनता ही ज्यादा जिम्मेदार है । खरगोश और कछुए की दौड़ वाले किस्से में कछुआ तेज दौड़ने के कारण नहीं जीता था, बल्कि इसलिए जीता था क्योंकि खरगोश दौड़ जीतने के लिए जरूरी रवैया अपनाये जाने को लेकर उदासीन हो गया था । हापुड़ और दिल्ली के बाद गाजियाबाद में एक सफल मीटिंग करके सतीश सिंघल ने 'एक उम्मीदवार के रूप में' सक्रिय होने के जो तेवर लेकिन अभी तक दिखाए हैं उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है ।  

Saturday, September 6, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में हापुड़ क्षेत्र के लोगों के लिए एक्सक्लुसिव आयोजन आयोजित करके सतीश सिंघल ने यह बताने/दिखाने/जताने का जोरदार प्रयास किया है कि उन्होंने चुनाव को 'व्यावहारिक' गंभीरता के साथ लेना शुरू कर दिया है

हापुड़ । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से हापुड़ में आयोजित हुई मीटिंग में जितने जो लोग जुटे उससे सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को खासा बल मिला है । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक व शुभचिंतक हापुड़ में हुई मीटिंग की सफलता से काफी गद्गद हैं और मान रहे हैं कि सतीश सिंघल अपनी उम्मीदवारी को लेकर अब सचमुच गंभीर हो रहे हैं तथा फार्म में आ रहे हैं । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों की दरअसल अभी तक एक बड़ी शिकायत और चिंता यही थी कि चुनाव अभियान में जो 'नाजुक तत्व' होते हैं और जो चुनावी नतीजे को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं - उन पर सतीश सिंघल कोई ध्यान नहीं देते हैं । इसी कारण से सतीश सिंघल अपनी खूबियों का भी लाभ नहीं ले पा रहे थे । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन और सहानुभूति का भाव रखने वाले लोगों का यही मानना और कहना रहा है कि सतीश सिंघल एक रोटेरियन के रूप में जो हैं, रोटरी में उनके जैसे जो काम हैं और उनकी जो उपलब्धियाँ हैं - अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में वह उनकी 'मार्केटिंग' ठीक तरीके से नहीं कर पा रहे हैं । इसी कारण से सतीश सिंघल के दसियों वर्ष पुराने कुछेक दोस्त उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रसून चौधरी के साथ खड़े दिख रहे हैं; और इसी वजह से उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रसून चौधरी बहुत ही कम समय में लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने में कामयाब रहे हैं ।
लेकिन हापुड़ वाले आयोजन से सतीश सिंघल ने यह बताने/दिखाने/जताने का जोरदार प्रयास किया है कि उन्होंने अपने समर्थकों व शुभचिंतकों की बातों पर ध्यान दिया है और चुनाव को 'व्यावहारिक' गंभीरता के साथ लेना शुरू किया है । हापुड़ वाले उनके आयोजन में जो 'दिखा', उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों ने जाना कि इस आयोजन को न सिर्फ एक्सक्लुसिव तरीके से डिजाइन किया गया, बल्कि इसे संभव बनाने के लिए भी चौतरफा तैयारी की गई । इस आयोजन के डिजाइन की सबसे बड़ी खूबी यही रही कि इसे हापुड़ क्षेत्र के रोटेरियंस के लिए खास तौर से आयोजित किया गया । हापुड़ क्षेत्र के रोटेरियंस को इतनी एक्सक्लुसिव तवज्जो पहले शायद कभी नहीं मिली होगी । हापुड़ क्षेत्र में होने वाले आयोजनों में और कहीं के नहीं तो गाजियाबाद के लोगों को तो शामिल कर ही लिया जाता रहा है - और इसके चलते उनकी पहचान हमेशा 'दूसरे दर्जे' वाले और 'छोटे भाई' वाले रोटेरियन की ही बनी रही है । सतीश सिंघल ने अपने इस आयोजन के जरिये हापुड़ क्षेत्र के रोटेरियंस को शायद पहली बार एक स्वतंत्र पहचान देने का काम किया । हापुड़ क्षेत्र के क्लब्स के लोगों ने उनके इस 'काम' को पहचाना भी और रेखांकित भी किया और पूरे उल्लास के साथ उसमें शामिल भी हुए ।
सतीश सिंघल ने इस डिजाइन को सफल बनाने के लिए एक काम यह और किया कि क्षेत्र के प्रत्येक क्लब से हर महत्वपूर्व रोटेरियन को अपने इस आयोजन में शामिल कराने का उन्होंने प्रयास किया । दरअसल शुरू में कुछेक प्रमुख रोटेरियन सतीश सिंघल के निमंत्रण को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखा रहे थे - 'पहले वाले' सतीश सिंघल होते तो ऐसे लोगों की परवाह नहीं करते; किंतु 'बदले हुए वाले' सतीश सिंघल ने उनकी परवाह की और अलग-अलग तरह से उनकी ऐसी घेराबंदी की कि फिर उक्त प्रमुख लोग सतीश सिंघल के आयोजन के प्रति उत्साह दिखाने लगे और न सिर्फ खुद उनके आयोजन में शामिल हुए बल्कि अपने साथ ही महत्वपूर्ण और लोगों को भी आयोजन में लाए । इस तरह सतीश सिंघल यह 'दिखाने' में सफल रहे कि उनके इस आयोजन को कामयाब बनाने में उनके साथ हापुड़ क्षेत्र के प्रमुख समझे जाने वाले नेता लोग भी लगे हुए थे ।
सतीश सिंघल ने हापुड़ क्षेत्र के रोटेरियंस के लिए आयोजित हुए आयोजन की तैयारी और व्यवस्था में अपने क्लब के कई लोगों को शामिल 'दिखा' कर उन लोगों का भी मुँह बंद करने की कोशिश की है जो लगातार यह प्रचार करते आ रहे हैं कि उन्हें अपने ही क्लब के सदस्यों का समर्थन और सहयोग नहीं मिल रहा है । क्लब के सदस्यों के समर्थन को लेकर तो सतीश सिंघल को समस्या नहीं रही, लेकिन सहयोग की बात जरूर सवालों के घेरे में रही है । उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रसून चौधरी के साथ उनके क्लब के लोग जिस संलग्नता के साथ जुटे दिखते हैं, सतीश सिंघल अपने क्लब के सदस्यों को अपने साथ उस तरह जुटा हुआ अभी तक नहीं दिखा पाए थे । हापुड़ वाले आयोजन में सतीश सिंघल ने इस स्थिति को भी बदलने का प्रयास किया है; और अपने क्लब के सदस्यों को अपनी उम्मीदवारी के साथ सहयोग करते 'दिखाया' है ।
इस तरह, हापुड़ वाले आयोजन और उसकी व्यापक सफलता ने सतीश सिंघल के चुनाव अभियान में खासी गर्मी ला दी है । इस आयोजन के जरिए उन्होंने दरअसल यह जताने/बताने का 'काम' भी कर लिया है कि चुनाव अभियान की 'व्यावहारिक' जरूरतों को वह जानते/समझते हैं तथा मौका पड़ने पर उन्हें अपना भी सकते हैं । सतीश सिंघल के इस आयोजन ने उनके समर्थकों व शुभचिंतकों में उत्साह तो पैदा किया ही है, उन्हें आश्वस्त भी किया है । यह सब देख/जान कर सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के प्रति हमदर्दी और समर्थन का भाव रखने वाले लोगों को लगने लगा है कि प्रसून चौधरी ने अपनी और अपने समर्थकों की सक्रियता से जो चुनावी चुनौती पैदा की है, सतीश सिंघल उसे गंभीरता से समझने लगे हैं और उसका मुकाबला करने के लिए तरकीबें लगाने लगे हैं । इससे चुनावी मुकाबला दिलचस्प होने का अनुमान लगाया जा रहा है ।

Monday, September 1, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता के सामने कमजोर पड़ते दिख रहे शरत जैन को बचाने के लिए, मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध सुधारने की जेके गौड़ की कोशिशों को फेल करने में जुटी

नई दिल्ली/गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी ने एक बार फिर जेके गौड़ के गाजियाबाद के लोगों के साथ बनते अच्छे संबंधों में दरार डाल देने वाला काम किया है । जेके गौड़ ने अभी हाल ही में गाजियाबाद के प्रमुख लोगों के साथ हुई मीटिंग में वायदा किया था कि वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में किसी के पक्ष में नहीं 'दिखेंगे' - लेकिन मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी ने जेके गौड़ को ऐसी मीटिंग में शामिल होने के लिए मजबूर किया जो शरत जैन का रास्ता क्लियर करवाने के लिए दीपक गुप्ता को दबाव में लेकर रास्ते से हटाने के उद्देश्य से हुई । इस मीटिंग के जरिये मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी ने सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के साथ भी धोखा करने की कोशिश की - जाहिर है कि उन्होंने इस धोखे में भी जेके गौड़ को शामिल कर लिया । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी ने हर किसी के साथ धोखा करने का यह खेल दरअसल शरत जैन की उम्मीदवारी का काम बनाने के लिए किया । वास्तव में उन्हें यह अच्छी तरह समझ में आ गया है कि शरत जैन के लिए दीपक गुप्ता के साथ चुनावी मुकाबला करना मुश्किल है; और ऐसे में दीपक गुप्ता को उम्मीदवारी के रास्ते से हटा कर ही वह शरत जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की कुर्सी तक पहुँचा सकते हैं - और ऐसा करने के लिए उन्हें सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के साथ भी धोखाधड़ी करने पड़ेगी तो वह चूकेंगे नहीं ।
दीपक गुप्ता को घेरने के लिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी ने जो जाल बुना - उसमें उन्हें जेके गौड़ के पर कतरने का मौका भी दिखा; सो उन्होंने एक तीर से दो शिकार कर लेने की चाल भी चली । इन दोनों को दरअसल यह बात पसंद नहीं आ रही है कि जेके गौड़ गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध सुधारने का प्रयास कर रहे हैं - और जेके गौड़ के प्रयासों को गाजियाबाद के लोगों की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिल रही है । इन्हें डर है कि जेके गौड़ के गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध यदि सुधर गए और गाजियाबाद के लोगों से जेके गौड़ को सहयोग मिलने लगा तो जेके गौड़ उनके हाथ से निकल जायेंगे । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल का मानना है और उनकी तरफ से निरंतर यह कोशिश है कि जेके गौड़ के साथ गाजियाबाद के लोगों का झगड़ा बना रहे - ताकि उनके झगड़े में उन्हें राजनीति करने का मौका मिलता रहे । उल्लेखनीय बात यह है कि जेके गौड़ का गाजियाबाद के लोगों के साथ जो विवाद रहा है उसकी जड़ में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल का रवैया ही है ।
गाजियाबाद के लोगों की प्रमुख शिकायत ही यह रही है कि जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर के रूप में नहीं, बल्कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के 'आदमी' के रूप में काम करते हुए दिखते हैं तथा गाजियाबाद के लोगों को अपमानित करने व परेशान करने की मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की कार्रवाइयों पर चुप्पी साधे रहते हैं । जेके गौड़ के खिलाफ सबसे गंभीर शिकायत यही रही है कि वह मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति को आगे बढ़ाने के काम में उनके द्धारा इस्तेमाल होते हैं । जेके गौड़ ने गाजियाबाद के लोगों के साथ संबध सुधारने के उद्देश्य से पिछले दिनों पहले अलग-अलग और फिर एकसाथ जो मीटिंग्स कीं, उनमें यह बात मुखर रूप से सामने भी आई ।
जेके गौड़ ने गाजियाबाद के लोगों को आश्वस्त किया कि उनके लिए जितना महत्व मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल का है उतना ही महत्व गाजियाबाद के लोगों का भी है; और वह ऐसी स्थिति हरगिज नहीं आने देंगे जिसमें गाजियाबाद के लोगों को किसी भी रूप में अपमानित होना पड़े या परेशान होना पड़े । जेके गौड़ ने गाजियाबाद के लोगों के साथ एक बड़ा वायदा यह किया कि वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति से पूरी तरह दूर रहेंगे और किसी भी उम्मीदवार का पक्ष न तो लेंगे और न किसी के पक्ष में 'दिखेंगे' ।
मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल को जेके गौड़ के इस वायदे में अपने लिए चूँकि खतरा दिखा इसलिए उन्होंने जेके गौड़ को गाजियाबाद के लोगों के साथ किए गए अपने इस वायदे पर चार दिन भी नहीं टिका रहने दिया ।
इस बीच दरअसल मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को वापस कराने के लिए रूपक जैन के जरिये एक जाल बिछाया हुआ था - जिसमें रूपक जैन ने रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल के योगेश गर्ग को इस्तेमाल करते हुए दीपक गुप्ता को मीटिंग के लिए राजी करने का काम किया हुआ था । इस मीटिंग में दीपक गुप्ता को यह ऑफर दिए जाने की बात थी कि अपनी उम्मीदवारी को वापस लेकर वह पहले शरत जैन को गवर्नर बन जाने दें; बदले में अगली बार वह दीपक गुप्ता को गवर्नर बनवा देंगे । जाहिर तौर पर उक्त मीटिंग शरत जैन की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से ही होनी थी । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने उक्त मीटिंग में जेके गौड़ को भी शामिल होने का न्यौता दिया हुआ था । जेके गौड़ ने लेकिन गाजियाबाद के लोगों के साथ किए गए वायदे को ध्यान में रखते हुए उक्त मीटिंग में शामिल होने से बचने की कोशिश की हुई थी ।
मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल को लेकिन चूँकि जेके गौड़ के गाजियाबाद के लोगों के साथ सुधरते दिख रहे संबंधों में बाधा पहुँचानी थी, इसलिए उन्होंने जेके गौड़ को यह तर्क देते हुए मीटिंग में शामिल होने के लिए राजी कर लिया कि मीटिंग में उनके रहने से दीपक गुप्ता पर दबाव बनाने में आसानी होगी । हर किसी के लिए यह समझना मुश्किल बना हुआ है कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के सामने किस कारण से जेके गौड़ इतने मजबूर हैं कि गाजियाबाद के लोगों के साथ किए गए वायदे पर वह चार दिन नहीं टिके रह सके और शरत जैन की उम्मीदवारी के पक्ष में 'दिखने' के लिए राजी हो गए । जेके गौड़ की उपस्थिति में सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के साथ धोखाधड़ी करने की मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने जो बातें कीं, जेके गौड़ उनके भी मूक दर्शक बने रहे । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा ने वैसे तो सतीश सिंघल को समर्थन देने की घोषणा की हुई है; लेकिन दीपक गुप्ता को 'अगली' बार का ऑफर देते हुए मुकेश अरनेजा ने उन्हें आश्वस्त किया कि सतीश सिंघल को तो वह जब चाहेंगे तब बैठा लेंगे । प्रसून चौधरी के बारे में मुकेश अरनेजा का कहना था कि उनकी उम्मीदवारी को जेके गौड़ वापस करवा देंगे ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को वापस कराने के उद्देश्य से हुई उक्त मीटिंग का न कोई नतीजा निकलना था और न वह निकला - लेकिन उक्त मीटिंग में जेके गौड़ की उपस्थित को संभव बना कर मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की जोड़ी ने जेके गौड़ की गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध सुधारने की कोशिशों को संदेहास्पद बनाने का काम जरूर कर लिया है । यह करना उन्हें जरूरी भी लगता है । उनकी समस्या दरअसल यह है कि शरत जैन की उम्मीदवारी लोगों के बीच कोई स्वीकार्यता ही नहीं बना पा रही है; और दीपक गुप्ता के मुकाबले शरत जैन काफी पिछड़ते जा रहे हैं - ऐसे में उनके सामने ले दे कर जेके गौड़ की मदद से शरत जैन को किसी तरह मुकाबले में टिकाये रखने की उम्मीद ही बची है । जेके गौड़ यदि गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध सुधारने की अपनी कोशिशों के चलते चुनाव में किसी उम्मीदवार के साथ न होने और न 'दिखने' का वायदा यदि कर लेंगे तो शरत जैन की उम्मीदवारी की लुटिया तो फिर पूरी तरह ही डूब जाएगी । इसलिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल को यह जरूरी लगता है कि जेके गौड़ के गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध सुधारने की कोशिशों को चोट पहुँचाई जाए ।
जेके गौड़ की चार दिन में ही वायदे से पलटने की दशा पर गाजियाबाद के लोगों ने अभी तो बड़ी सावधानी भरी प्रतिक्रिया व्यक्त की है । अधिकतर लोगों का कहना है कि उन्होंने तो संबंध सुधारने की जेके गौड़ की कोशिशों पर सकारात्मक रूख ही दिखाया है - अब यह जेके गौड़ को तय करना है कि उन्हें चुनावी राजनीति में किसी एक का पक्ष लेने से बचते हुए सभी को साथ लेकर गवर्नरी करनी है और अपने गवर्नर-काल को अच्छे से चलाते हुए अपना और डिस्ट्रिक्ट का नाम रौशन करना है - या मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की लगाऊ-भिड़ाऊ कारस्तानियों में सहभागी बनते हुए उनकी टुच्ची व ओछी हरकतों में मदद करते हुए ही रहना और 'दिखना' है । लोगों का मानना और कहना है कि गाजियाबाद के लोगों के साथ संबंध सुधारने की जेके गौड़ की कोशिशों में यदि सचमुच ईमानदारी है तो उन्हें मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की तीन-तिकड़मों को पहचानना होगा तथा उनसे बचना होगा ।