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Sunday, April 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में प्रेम माहेश्वरी की अध्यक्षता में बने नए क्लब की संभावित गतिविधियों व सक्रियताओं की चुनौती के सामने रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारी फिलहाल प्रेसीडेंट इलेक्ट चुनने के झगड़े में उलझे

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली में निलंबन रद्द होने के तुरंत बाद ही प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर क्लब के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के बीच जो घमासान मचा है, उसने उन लोगों को बड़ा निराश किया है - जिन्हें उम्मीद थी कि क्लब के प्रमुख लोगों ने अपनी कारस्तानियों के चलते मिली बदनामियों और मुसीबतों के हाल ही के अपने अनुभव से सबक सीखा होगा और अब वह अपनी स्वार्थी व घटिया सोच को छोड़ कर गंभीरता व मैच्योरिटी का व्यवहार करेंगे । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली अपने पदाधिकारियों के आपसी झगड़ों तथा रोटरी विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण पिछले कुछेक महीनों से निलंबित था । क्लब के पदाधिकारियों तथा उनके नजदीकी सदस्यों ने क्लब के ही दूसरे सदस्यों को अपनी लंपटता व लफंगई का शिकार नहीं बनाया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व रोटरी के अन्य बड़े पदाधिकारियों - और रोटरी के कार्यक्रमों के खिलाफ भी अशालीन व अभद्र व्यवहार प्रदर्शित किया । उनकी हरकतों पर जब चारों तरफ से बदनामी व थू थू के दाग पड़े और गहरे होने लगे - तो क्लब के पदाधिकारियों को कुछ अक्ल आई, और तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व अन्य पदाधिकारियों से उन्होंने माफी माँगना शुरू किया । माफी व खुशामद का सहारा लेकर उन्होंने अपने क्लब का निलंबन वापस करवा लिया - उनके लिए इससे भी बड़ी राहत की बात यह रही कि जिन प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के साथ वह अपना झगड़ा बता रहे थे, उन्होंने अपना एक अलग क्लब बना लिया । इससे हर किसी को उम्मीद बनी कि रोटरी क्लब वैशाली का झमेला समाप्त हो गया है, तथा यह क्लब भी अब दूसरे क्लब्स की तरह चलेगा ।
किंतु निलंबन से बाहर आए रोटरी क्लब वैशाली में अब एक नया झगड़ा सुना जा रहा है - जो प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर है । उल्लेखनीय है कि इस पद पर नरेन सेमवाल थे, जिन्होंने लेकिन पेट्स से पहले इस्तीफा दे दिया था । क्लब का निलंबन खत्म हो जाने के बाद किंतु जो फिर से प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाए जाने की माँग करने लगे हैं - क्लब के दूसरे लोग इसके लिए लेकिन राजी नहीं हैं । उनका कहना है कि मुश्किल समय में नरेन सेमवाल जिस तरह क्लब के लोगों को अँधेरे में रख कर अपनी जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए, उसे देखते हुए वह अब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने लायक नहीं रह गए हैं - और इसलिए उन्हें दोबारा से प्रेसीडेंट इलेक्ट नहीं बनाया जा सकता है । नरेन सेमवाल का कहना है कि क्लब जब निलंबित था और उसके निलंबन के वापस होने की कोई संभावना नहीं दिख रही थी, तब ऐसे क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट के रूप में उन्हें फजीहत व अपमान महसूस हो रहा था - जिससे मुक्त होने के लिए उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ देना जरूरी लगा । क्लब के दूसरे प्रमुख लोगों का कहना लेकिन यह है कि क्लब में सलाह किए बिना मनमाने तरीके से नरेन सेमवाल ने जिस तरह प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ा, वह क्लब के साथ धोखा करने जैसा मामला है - और इसे देखते हुए उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता है । मनोज भदोला की अगले रोटरी वर्ष में भी अध्यक्ष बनने की इच्छा और कोशिश को जान/देख कर क्लब के सदस्यों में अलग बेचैनी है । मनोज भदोला ने कुछेक सदस्यों से कहा है कि यह वर्ष तो झगड़े/झंझटों में ही निकल गया, और उन्हें अध्यक्ष के रूप में कुछ करने का मौका ही नहीं मिला - इसलिए वह चाहते हैं कि अगले वर्ष भी वह अध्यक्ष बनें और अध्यक्ष के रूप में कुछ अच्छे काम करके दिखाएँ, जिससे कि उन लोगों के मुँह बंद किए जा सकें जो कह रहे हैं कि अध्यक्ष के रूप में काम कर पाना मनोज भदोला के बस में है ही नहीं । मनोज भदोला की यह इच्छा और कोशिश जान/सुन कर क्लब के लोगों में घबराहट फैल गई है : उन्हें चिंता हुई है कि मनोज भदोला यदि सचमुच दोबारा अध्यक्ष बन गए तो क्लब की इज्जत बचने की जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची हुई है भी, वह भी धूल में मिल जाएगी । क्लब में अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि इस वर्ष क्लब में जो झमेला हुआ, वह अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला की अकर्मयता व नाकामी का जीता-जागता सुबूत है; इसलिए उन्हें अध्यक्ष में रूप में एक वर्ष और देना क्लब को जानबूझ कर बर्बादी की तरफ धकेलने जैसा काम होगा ।
क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों की समस्या यह है कि क्लब पर कब्जा जमाए लोगों की हरकतों से चूँकि सभी परिचित हैं, इसलिए कोई भी प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं है । हर किसी को डर दरअसल यह है कि क्लब को अपनी जागीर समझे बैठे कर्णधार अपनी अपनी मनमानी चलायेंगे और किसी को ठीक से काम ही नहीं करने देंगे - इसलिए आफत में क्यों पड़ना ? क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों के बीच चूँकि आपस में भी विश्वास का भारी संकट है, और वह एक दूसरे की खिंचाई करने के चक्कर में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनमें से भी कोई प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं हो रहा है । क्लब में मजेदार स्थिति यह बनी है कि नरेन सेमवाल और मनोज भदोला प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने की तिकड़में लगा रहे हैं, लेकिन उनके ही संगी-साथी उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाने के लिए राजी नहीं हैं - दूसरी तरफ जिन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने के लिए कहा जा रहा है, वह बनने से बचने की कोशिश कर रहे हैं ।
अपने आप को रोटरी क्लब वैशाली का कर्णधार समझ रहे लोगों के सामने वास्तव में प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी द्वारा बनाया गया नया क्लब भी एक गंभीर चुनौती है । डर यह है कि नए क्लब के कामकाज के सामने यदि रोटरी क्लब वैशाली के कामकाज टिक नहीं सके, तो डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच भारी बदनामी होगी । यह डर दरअसल इसलिए है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई जानता है कि प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के अध्यक्ष-काल में जो काम हुए, उनसे ही रोटरी क्लब वैशाली को डिस्ट्रिक्ट में खास ऊँचाई और प्रतिष्ठा मिली थी - जो बाद के वर्षों में क्रमशः घटती गई है । उम्मीद की जा रही है कि उन्हीं प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा की मदद से नया क्लब प्रेम माहेश्वरी के अध्यक्ष-काल में कामकाज के जरिए और नए रिकॉर्ड बनायेगा । ऐसे में, रोटरी क्लब वैशाली के कर्णधारों के सामने चुनौती है कि वह भी अपनी गतिविधियों व अपनी सक्रियताओं को इस तरह से आयोजित करें ताकि प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के नए क्लब से पीछे न दिखें । नया क्लब जिस गुपचुप तरीके से बना - रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरिटेज ने नए क्लब को स्पॉन्सर किया और वरिष्ठ रोटेरियन रवींद्र सिंह उसके जीएसआर बने; उससे साबित है कि डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के लोगों का समर्थन भी नए क्लब के साथ है । ऐसे में रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों की चुनौती व जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है । किंतु वहाँ प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर जो घमासान मचा हुआ है, उसे देखते/सुनते हुए वहाँ के हालात सुधरने की उम्मीद लगाए लोगों को झटका लगा है ।

Tuesday, April 5, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में निलंबित रोटरी क्लब वैशाली का कार्यभार मनोज भदोला को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की बदौलत क्या सचमुच वापस मिलने जा रहा है ?

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली का मामला पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के गले की फाँस बनता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली अपने पदाधिकारियों के आपसी झगड़ों तथा रोटरी विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण निलंबित है, जिस कारण क्लब के सदस्यों के ड्यूज लेना/जमा करना बंद कर दिया गया है । क्लब के पदाधिकारियों के एक गुट ने होशियारी दिखाते हुए रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय में ड्यूज जमा कराने की कोशिश की, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय ने लेकिन जिसे कामयाब नहीं होने दिया । क्लब के पदाधिकारियों के इसी गुट के लोगों की तरफ से अब दावा किया जा रहा है कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वह जल्दी ही उनके क्लब का निलंबन खत्म करवायेंगे । इन्हीं लोगों की तरफ से यह दावा भी किया जा रहा है कि सुशील गुप्ता ने इनकी माँग भी मान ली है कि जिन पाँच/छह लोगों को यह क्लब में नहीं रखना चाहते हैं, उन्हें यह क्लब से निकाल सकते हैं । क्लब के दूसरे सदस्यों व पदाधिकारियों की तरफ से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लेकिन यह सुनने को भी मिल रहा है कि यदि ऐसा हुआ तो वह इस अन्याय के खिलाफ रोटरी इंटरनेशनल से लेकर देश की अदालतों तक का दरवाजा खटखटायेंगे । इनका कहना है कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की न्यायप्रियता पर उन्हें पूरा भरोसा है, और उन्हें उम्मीद है कि किन्हीं सिफारिशों के चलते वह क्लब पर उन लोगों को फिर से काबिज नहीं होने देंगे, जिन्होंने रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का तो पालन नहीं ही किया - अपनी हरकतों से क्लब में झगड़ा पैदा किया तथा रोटरी को बदनाम किया ।
रोटरी क्लब वैशाली का जो झगड़ा है, उसके घटना-क्रम को यदि सिलसिलेवार तरीके से देखें, तो यह सीधे सीधे निलंबित क्लब के अध्यक्ष मनोज भदोला की मनमानी, बेबकूफीभरी, सौदेबाजीपूर्ण तथा रोटरी विरोधी कार्यप्रणाली का नतीजा है । मनोज भदोला न अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सके और न अध्यक्ष पद की गरिमा को बनाए/बचाए रख सके । हालाँकि यह सच है कि उनके अध्यक्ष-काल में क्लब में रोटरी नियमों व रोटरी भावनाओं के जो घुर्रे बिखरे और क्लब में रोटरी मजाक बन कर रह गई, उसमें क्लब के दूसरे पदाधिकारियों तथा सदस्यों की भी भूमिका व जिम्मेदारी रही है - लेकिन यह सब हुआ इसलिए ही क्योंकि अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला स्थितियों को सँभालने की बजाए खुद एक पक्ष बन गए तथा रोटरी नियमों का उल्लंघन करने व रोटरी के उच्च आदर्शों व भावनाओं की ऐसी-तैसी करने में शामिल हो गए । मजे की बात यह है कि अब वही मनोज भदोला तथा उनके साथी लोगों को बता रहे हैं कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतीश सिंघल ने मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को 'सेट' कर लिया है, और फैसला करने की जिम्मेदारी सुशील गुप्ता को मिल गई है - और सुशील गुप्ता न सिर्फ क्लब का निलंबन वापस करवायेंगे, बल्कि मनोज भदोला को अध्यक्ष पद भी वापस दिलवायेंगे और क्लब के कुछेक पदाधिकारियों व सदस्यों को क्लब से निकलवाने का अधिकार भी उन्हें दिलवायेंगे ।
मनोज भदोला व उनके साथियों की तरफ से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को बताया जा रहा है कि सुशील गुप्ता इस बात से बहुत प्रभावित हैं कि क्लब के सदस्यों का बहुमत उनके साथ है । डिस्ट्रिक्ट में जो लोग रोटरी क्लब वैशाली के मनोज भदोला के अध्यक्ष-काल की गतिविधियों व हरकतों से परिचित हैं, उन्हें हैरानी इस बात की है कि बहुमत के तथाकथित समर्थन की आड़ में सुशील गुप्ता क्या सचमुच मनोज भदोला की कार्रवाइयों व हरकतों को स्वीकृति प्रदान कर देंगे ? उल्लेखनीय है कि मनोज भदोला क्लब के अध्यक्ष बने थे - जिससे यह बात स्वतः जाहिर है कि क्लब के सदस्यों का उन्हें पूरा पूरा समर्थन प्राप्त था । क्लब में जो बबाल मचा, उसका संबंध उन्हें मिलने वाले समर्थन से बिलकुल भी नहीं था - उसका संबंध उनकी कार्रवाइयों व हरकतों से था । क्लब के पदाधिकारियों व सदस्यों का ही आरोप रहा कि अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला क्लब में सदस्यों के बीच व्यावहारिक सौहार्द बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं तथा पक्षपातपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का कोई पालन नहीं कर रहे हैं, क्लब के खर्चों का कोई हिसाब-किताब नहीं रख/कर रहे हैं, पिछले वर्ष किए गए प्रोजेक्ट के खर्चों का हिसाब देने/लेने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपना समर्थन व वोट बेचने के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं - और सबसे गंभीर आरोप यह कि फैलोशिप के नाम पर क्लब में शराबबाजी व लफंगई को बढ़ावा दिया जा रहा है । कोढ़ में खाज की बात यह कि शराबबाजी व लफंगे एक्शन वाली तस्वीरें सोशल साइट्स पर प्रसारित की जाती रहीं - जिससे कि न सिर्फ क्लब का बल्कि दूसरे आम लोगों के बीच रोटरी का और डिस्ट्रिक्ट का नाम भी खराब हुआ ।
इन्हीं आरोपों के चलते, मनोज भदोला व उनके साथियों के सुशील गुप्ता को 'सेट' कर लेने के दावे पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को हैरानी हुई है । वह आपस में एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि सुशील गुप्ता एक वरिष्ठ रोटेरियन हैं, इंटरनेशनल डायरेक्टर रहे हैं - क्या वह मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की सिफारिश पर मनोज भदोला तथा उनके साथियों की रोटरी विरोधी हरकतों को बिलकुल ही नजरअंदाज कर देंगे और क्लब को उन्हीं लोगों को सौंप देने की वकालत करेंगे ? सुशील गुप्ता को रोटरी क्लब वैशाली के फेसबुक पेज पर लगाई गईं कुछेक बेहूदा व अशालीन किस्म की तस्वीरें भेजी गईं हैं - यह बताने के लिए कि मनोज भदोला अपने अध्यक्ष-काल में यह रोटरी का आखिर कौन सा प्रोजेक्ट कर रहे हैं, और या फैलोशिप के नाम पर किस तरह की लफंगई को शह दे रहे हैं । क्लब के ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों का मानना और कहना है कि सुशील गुप्ता ने इन तथ्यों को अनदेखा करते हुए रोटरी क्लब वैशाली यदि सचमुच उन्हीं लोगों को वापस दिलवा दिया, जो क्लब में बबाल करवाने तथा क्लब को मटरगश्ती का अड्डा समझने/बनाने के काम में लगे रहे - तो यह डिस्ट्रिक्ट के लिए, रोटरी के लिए - और खुद उनकी प्रतिष्ठा के लिए आत्मघाती होगा ।

Tuesday, January 26, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के रोटरी क्लब वैशाली में मनोज भदोला व उनके संगी-साथी अब अपनी कारस्तानियों को तो 'रासलीला' समझने तथा प्रेम दास माहेश्वरी के कदम को उनके 'करेक्टर के ढीला' होने के सुबूत के तौर पर देखे जाने की माँग कर रहे हैं

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने सेक्रेटरी प्रेम दास माहेश्वरी के खिलाफ जो मोर्चा खोला है, उसके चलते न सिर्फ मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की दबी-छिपी कारस्तानियाँ सामने आ रही हैं, उनके बीच आपस में भी मनमुटाव पैदा हो रहे हैं - बल्कि रोटरी क्लब वैशाली का भविष्य और अनिश्चित होता जा रहा है । मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों के बीच रमणीक तलवार की भूमिका को लेकर भी मनमुटाव पैदा हो रहा है । रमणीक तलवार ने दरअसल दूसरे डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में जाने का फार्मूला देकर आग में घी डालने का जो काम किया है, उससे मनोज भदोला के कुछेक साथी ही खुश नहीं हैं । क्लब के कुछेक सदस्य ही अब कहने लगे हैं कि क्लब के झगड़े को अब खत्म होना/करवाना चाहिए और एक-दूसरे के प्रति आपसी शिकायतों पर खुले मन से विचार होना चाहिए । क्लब के ही सदस्यों का मानना/कहना है कि तथ्यात्मक रूप से देखें तो गलतियाँ दोनों तरफ से हुई हैं, इसलिए कोई एक पक्ष दूसरे पक्ष के लोगों को सजा देने/दिलवाने की जिद पर अड़े - तो यह उचित नहीं होगा; ऐसे में उचित यह होगा कि क्लब में ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे कि आपसी मनभेद किसी बड़े टकराव का माहौल न बना सकें । क्लब के सत्ता खेमे के कुछेक सदस्य लेकिन किसी न किसी की बलि लेकर ही मामले को खत्म करना चाहते हैं; उनका कहना है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी बहुत ही फजीहत होगी । ऐसे सदस्यों ने ही अब प्रसून चौधरी तथा विकास चोपड़ा को छोड़ कर प्रेम दास माहेश्वरी को निशाने पर ले लिया है । 
मजे की बात यह है कि मनोज भदोला और उनके संगी-साथी जब प्रसून चौधरी तथा विकास चोपड़ा से लोहा ले रहे थे, तब प्रेम दास माहेश्वरी उनके ही साथ थे; लेकिन इसके साथ साथ सच यह भी है कि यह प्रेम दास माहेश्वरी ही हैं जिनके एक 'कदम' ने मामले की दशा-दिशा ही बदल दी और मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों को ऐसी पटखनी दी कि उनसे न रोते बन रहा है, और न अपनी 'चोटों' को सहलाते बन रहा है । कुछेक लोगों को प्रेम दास माहेश्वरी के 'बदले' रवैये पर हैरानी जरूर है, लेकिन क्लब के ही सदस्यों का कहना है कि क्लब के कामकाज और फैसलों को लेकर मनोज भदोला व प्रेम दास माहेश्वरी के बीच तालमेल कभी भी नहीं बन पाया; और मनोज भदोला ने हमेशा ही प्रेम दास माहेश्वरी को अलग-थलग रखने का काम किया । प्रेम दास माहेश्वरी दरअसल नियम/व्यवस्था से काम करने और फैसले लेने की बात करते, मनोज भदोला लेकिन मनमर्जी चलाते; प्रेम दास माहेश्वरी क्लब को रोटरी भावना से चलाने की बात करते, मनोज भदोला के लिए रोटरी का मतलब लेकिन तफ़रीह व मौज़-मज़ा रहा - क्लब के ही सदस्यों का आरोप रहा कि मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने रोटरी क्लब को शराब-बाजी का अड्डा बना रख छोड़ा था । कई मामलों में मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की कारस्तानियों पर प्रेम दास माहेश्वरी की गहरी नाराजगी थी, किंतु क्लब-अनुशासन के चलते वह चुप रहे । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए कॉन्करेंस देने का फैसला जिस गुपचुप तरीके से हुआ, उससे भी प्रेम दास माहेश्वरी को ऐतराज था - किंतु क्लब अनुशासन के चलते वह इस मामले में भी चुप रहे । वह तो जब यह पोल खुली कि कॉन्करेंस के लिए मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने सौदेबाजी की है और क्लब को 'बेच' दिया है, तब प्रेम दास माहेश्वरी को लगा कि पानी अब सिर से ऊपर जा पहुँचा है - और अब चुप नहीं रहा जा सकता है । 
मनोज भदोला व उनके संगी-साथी प्रेम दास माहेश्वरी की भलमनसाहत को उनकी कमजोरी समझ बैठे थे; किंतु प्रेम दास माहेश्वरी ने जैसे भी अपने अधिकार का प्रयोग किया, वैसे ही मनोज भदोला और उनके संगी-साथी जमीन सूँघते नजर आए । दरअसल इसीलिए मनोज भदोला और उनके संगी-साथी चाहते हैं कि प्रेम दास माहेश्वरी के खिलाफ अवश्य ही कार्रवाई हो । मनोज भदोला व उनके संगी-साथी चाहते हैं कि क्लब में गड़बड़ी की शुरुआत वहाँ से देखी जाए, जहाँ से प्रेम दास माहेश्वरी ने सेक्रेटरी के रूप में अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए मनोज भदोला के खिलाफ कार्रवाई की - और उससे पहले की सारी घटनाओं को अनदेखा कर दिया जाए । मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की बातों से लगता है जैसे कि वह चाहते हैं कि उनकी कारस्तानियों को तो 'रासलीला' समझा जाए, तथा प्रेम दास माहेश्वरी के कदम को उनके 'करेक्टर के ढीला' होने का सुबूत माना जाए । क्लब के कुछेक सदस्यों का हालाँकि यह भी कहना है कि जिन तर्कों के आधार पर प्रेम दास माहेश्वरी के खिलाफ कार्रवाई करने की बात की जा रही है, उन तर्कों के आधार पर तो मनोज भदोला के खिलाफ भी कार्रवाई बनती है - इसलिए बेहतर यही होगा कि जो हुआ उसे भुलाकर मामले को ख़त्म किया जाए । 
रोटरी क्लब वैशाली में कुछेक लोगों को लेकिन लगता है कि रमणीक तलवार मामले को खत्म नहीं होने देंगे, और वह मामले को तरह-तरह से भड़काए हुए हैं । उल्लेखनीय है कि रमणीक तलवार क्लब के संस्थापक सदस्यों में हैं, लेकिन पिछले काफी समय से क्लब में अलग-थलग बने हुए थे - जिस कारण वह क्लब के कार्यक्रमों व मीटिंग्स में कम ही शामिल हो रहे थे; किंतु क्लब में झगड़ा शुरू होने के बाद से वह अचानक से खूब सक्रिय हो गए हैं । समझा जाता है कि मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों के गाइड आजकल रमणीक तलवार ही बने हुए हैं । रमणीक तलवार ने मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों में यह कहते/बताते हुए हवा भरी हुई है कि यदि डिस्ट्रिक्ट 3012 में उनकी नहीं सुनी गई, तो वह डिस्ट्रिक्ट 3011 में उनका क्लब बनवा देंगे । क्लब के कई एक सदस्यों के बीच इस बात पर नाराजगी है; उनका कहना है कि उनकी डिस्ट्रिक्ट 3011 के पदाधिकारियों से बात हुई है - जिनका कहना है कि नया क्लब तो किसी का भी बन जायेगा, उसके लिए रमणीक तलवार की सिफारिश की जरूरत थोड़े ही पड़ेगी । मुकेश अरनेजा के विरोध के बावजूद मुकेश अरनेजा के क्लब से निकले लोगों का नया क्लब यहाँ बन ही रहा है; वैशाली के भी जो भी लोग यहाँ नया क्लब बनाना चाहेंगे, उनका क्लब भी बन जायेगा; ऐसे में रमणीक तलवार नाहक ही अपनी नेतागिरी दिखा रहे हैं । क्लब के कई एक सदस्यों का कहना है कि क्लब के जिन सदस्यों को लगता है कि उनके लिए क्लब में और डिस्ट्रिक्ट 3012 में रहना संभव नहीं है, उन्हें यहाँ से निकल कर डिस्ट्रिक्ट 3011 में अपना नया क्लब बना लेना चाहिए - तथा यहाँ और गंदगी नहीं करना/फैलाना चाहिए । मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों को भी यह बात तो समझ में आने लगी है कि मामला उनके हाथ से निकल गया है, तथा उनके पास अब बहुत सीमित विकल्प ही बचे हैं - और यह भी कि मामले को वह जितना खींचेंगे, उतना ही अपनी फजीहत और ज्यादा करवायेंगे ।

Monday, January 18, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सतीश सिंघल और रमणीक तलवार ने प्रसून चौधरी के खिलाफ अपनी निजी खुन्नस को निकालने के लिए मनोज भदोला का जैसा इस्तेमाल किया, उससे किरकिरी सिर्फ मनोज भदोला की ही हुई है

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला तथा उनके संगी-साथी अपनी फजीहत के लिए सतीश सिंघल और रमणीक तलवार को जिम्मेदार ठहराने लगे हैं, तथा अनौपचारिक बातचीतों में इस बात पर अफसोस व्यक्त करने लगे हैं कि नाहक ही सतीश सिंघल और रमणीक तलवार की बातों में फँस कर उन्होंने अपनी और क्लब की बेइज्जती करवाई । रोटरी क्लब वैशाली के मामले की पड़ताल कर रही डिस्ट्रिक्ट कमेटी के सदस्यों के सामने मनोज भदोला तथा उनके संगी-साथियों के तेवर काफी बदल गए हैं - पहले वह अपने 'पक्ष' को लेकर जहाँ कठोर रवैया अपनाए हुए थे, वहाँ समय बीतने के साथ साथ उनके तेवर ढीले पड़ने लगे हैं; तथा प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के प्रति उनका अब पहले जैसा विरोध नहीं रह गया है । प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा को छोड़ कर उन्होंने हालाँकि प्रेम दास माहेश्वरी को निशाने पर लिया हुआ है, लेकिन कमेटी के सदस्यों से बातचीत में वह सतीश गुप्ता और रमणीक तलवार के प्रति अपनी नाराजगी को भी जाहिर करने से नहीं चूक रहे हैं । दूसरे अन्य लोगों से भी मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने कहा/दोहराया है कि सतीश सिंघल व रमणीक तलवार की निजी खुंदक के चक्कर में फँस कर उन्होंने अपना काफी नुकसान किया है । मजे की और विडंबना की बात यह रही कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की मदद करने के उद्देश्य से अध्यक्षों को अधिकार दिलाने के अभियान में जुड़ने पर रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में कोई मदद करने लायक तो नहीं हो सके - बल्कि अपने कपड़े और 'उतरवा' बैठे !    
उल्लेखनीय है कि मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों के प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के साथ मनमुटाव तो बने थे, लेकिन वह इतने गंभीर नहीं थे कि उनके बीच अप्रिय विवाद पैदा करते/बनाते । इस संबंध में बल्कि मनोज भदोला की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने बड़प्पन दिखाया हुआ था । यह इस तथ्य से जाहिर है कि विकास चोपड़ा काफी पहले क्लब के अपने पद से इस्तीफा दे चुके थे, जिसे लेकिन मनोज भदोला स्वीकार नहीं कर रहे थे । मनोज भदोला बल्कि उन्हें इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी करने का प्रयास कर रहे थे । मनोज भदोला चाहते तो विकास चोपड़ा का इस्तीफा स्वीकार करके उनसे पीछा छुड़ा लेते । जाहिर है कि मनोज भदोला का दिमाग तब 'बिगड़ा' जब कॉन्करेंस के बदले में सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के असिस्टेंट गवर्नर का पद उन्हें ऑफर हुआ । हालाँकि बात यदि कॉन्करेंस के लिए हुई सौदेबाजी तक ही रहती, तब भी बात इतना नहीं बिगड़ती । कॉन्करेंस देने का विरोध यदि प्रसून चौधरी और विकास चोपड़ा करते भी, तो उनके विरोध का असर नहीं होता - क्योंकि वह क्लब में अल्पमत में थे । प्रेम दास माहेश्वरी ने भी कॉन्करेंस का समर्थन किया ही था । लेकिन सतीश सिंघल और रमणीक तलवार ने अपना निजी एजेंडा खुसेड़ कर मामला बिगाड़ दिया । प्रसून चौधरी के साथ इनकी निजी खुन्नस जगजाहिर है - इन्हें जब लगा कि क्लब अध्यक्ष मनोज भदोला पूरी तरह से इनके कहे में है, तो इन्होंने प्रसून चौधरी का 'शिकार' कर लेने के लिए मनोज भदोला को राजी कर लिया । असिस्टेंट गवर्नर का पद 'पाकर' मनोज भदोला इतने जोश में आ गए थे कि उन्होंने सतीश सिंघल और रमणीक तलवार को यह 'दिखाना' शुरू कर दिया कि देखो, मैं प्रसून चौधरी की कैसी गत बनाता हूँ । 
मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की तरफ से प्रसून चौधरी के खिलाफ सोशल मीडिया में अभद्र व अशालीन भाषा के जरिए जो हमला हुआ, और जोश में जिसमें फिर विकास चोपड़ा को भी लपेट लिया गया - उससे सतीश सिंघल और रमणीक तलवार के कलेजे को भले ही ठंडक मिली हो, लेकिन मामला पटरी से उतर गया था । क्लब का जो माहौल था, उसमें प्रसून चौधरी और विकास चोपड़ा चुपचाप किनारे लगने को 'तैयार' हो गए दिख रहे थे; किंतु सोशल मीडिया के जरिए उन पर जब हमला हुआ तो वह भी जबाव देने के लिए तत्पर हो गए । इस मौके पर, मौके की तलाश कर रहे रमेश अग्रवाल का सहारा उन्हें मिल गया । दरअसल, रोटरी क्लब वैशाली में एक दूसरे को क्लब से डिलीट करने का जो खेल चला उसकी शुरुआत रमेश अग्रवाल की प्रेरणा और सलाह से ही हुई थी । सतीश सिंघल व मुकेश अरनेजा के संगसाथ के भरोसे मनोज भदोला व उनके संगी-साथी इस 'हमले' के लिए तैयार नहीं थे; सो जब तक वह सँभले और जबावी कार्रवाई पर उतरे, तब तक मामला लेकिन उनके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका था - और वह बस लकीर पीटते रह गए । 
मनोज भदोला व उनके संगी-साथी अब महसूस कर रहे हैं कि सतीश सिंघल व रमणीक तलवार की बातों में वह न आते और प्रसून चौधरी के खिलाफ उनके निजी एजेंडे को पूरा करने के चक्कर में न फँसते/पड़ते तो दीपक गुप्ता के अभियान को भी वह कमजोर न करते, और अपनी फजीहत भी न कराते । मनोज भदोला व उनके संगी-साथी यदि अपनी शराफत का पर्दा ओढ़े रखते और बात को कॉन्करेंस के लिए हुई सौदेबाजी तक ही रखते, तो बात फिर बिगड़ती नहीं - वह लेकिन न तो शराफत का पर्दा ओढ़े रख सके, और न रमेश अग्रवाल के दिशा-निर्देशन में हुए प्रसून चौधरी के हमले को झेल सके । जाहिर है कि सतीश सिंघल और रमणीक तलवार ने प्रसून चौधरी के खिलाफ अपनी निजी खुन्नस को निकालने के लिए मनोज भदोला का जैसा इस्तेमाल किया, उससे नुकसान और किरकिरी सिर्फ मनोज भदोला की ही हुई है । 

Monday, December 21, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में कॉन्करेंस के चक्कर में रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला तथा उनके साथियों की असलियत की पोल खुली

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा ने अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने के लिए जो जुगाड़ लगाए, और जिनके चलते कुछेक क्लब्स में भीषण विवाद और झगड़े हुए - उसमें एक अच्छा काम यह हुआ है कि कुछेक क्लब्स और उनके पदाधिकारियों के असली रूप सामने आ  गए, अन्यथा जो छिपे ही रहते । मुकेश अरनेजा के गेम-प्लान में फँस कर रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों ने अपना जो 'नंगापन' प्रकट किया, वह एक बड़ा दिलचस्प उदाहरण बन गया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली डिस्ट्रिक्ट के एक अच्छे क्लब के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है : इसके सदस्य उच्च शिक्षा प्राप्त तथा प्रोफेशनली खासे कामयाब लोग हैं और इनके परिवारों में अपेक्षाकृत खुलापन व आधुनिक तेवर देखे गए - किसी भी संस्था को आधुनिक व गतिशील शक्ल देने के लिए जिसे आवश्यक माना जाता है । रोटरी क्लब वैशाली अपने सदस्यों की शिक्षा, प्रोफेशनल उपलब्धियों और अपनी जीवंतता व खिलंदड़ेपन के चलते डिस्ट्रिक्ट के खास क्लब्स में गिना जा रहा था और डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में उसकी खासी उपस्थिति व पहचान बन गई थी । पिछले दो एक वर्षों में क्लब के जो अध्यक्ष बने, वह हालाँकि क्लब की पहले जैसी प्रतिष्ठा व सक्रियता की निरंतरता को नहीं बनाए रख सके - किंतु क्लब की बनी साख के ऑरा (आभामंडल) में उनकी कमजोरियाँ छिपी रह गईं और वह सामने नहीं आ पाईं । लेकिन अभी हाल ही में कॉन्करेंस को लेकर क्लब में जो झगड़ा मचा, उसमें यह तथ्य सामने आया कि क्लब पर इस समय जिन लोगों का कब्जा है - वह भले ही पढ़े-लिखे तथा प्रोफेशनली कामयाब लोग हों; लेकिन सोच, मानसिकता व व्यवहार के मामले में वह वास्तव में सड़कछाप किस्म के लोग हैं । 
क्लब के वरिष्ठ सदस्य प्रसून चौधरी ने सोशल मीडिया में क्लब की मौजूदा स्थिति पर दुःख प्रगट करते हुए जो एक टिप्पणी की, उस पर क्लब पर इस समय काबिज लोगों ने अभद्र, अशालीन व कहीं कहीं अश्लील शब्दों का प्रयोग करते हुए जो प्रतिक्रिया दी - उसने उनके असली चेहरे व चरित्र को सामने ला दिया । एक सामान्य सामाजिक समझ है कि अपने पर लगे आरोपों का जब कोई तथ्यपरक व तर्कपूर्ण जबाव नहीं दे पाता है, तो वह गालियाँ देने लगता है । रोटरी क्लब वैशाली के मौजूदा अध्यक्ष मनोज भदोला व उनके साथ के लोगों ने अपने ही एक वरिष्ठ साथी प्रसून चौधरी के साथ सोशल मीडिया पर यही व्यवहार किया । मनोज भदोला और उनके साथी प्रसून चौधरी की टिप्पणी में कही गई इस बात पर ज्यादा भड़के कि क्लब के फैसलों में सभी सदस्यों की भागीदारी नहीं होती है तथा 'कुछ लोग' ही फैसले ले रहे हैं । हो सकता है कि प्रसून चौधरी की यह बात झूठ हो । इसका तर्कपूर्ण व तथ्यपरक ढंग से जबाव दिया जा सकता था, किंतु मनोज भदोला व उनके साथी गाली-गलौच पर उतर आए । उनके इस रवैये ने ही जाहिर किया कि प्रसून चौधरी ने सही बात कही है, और सच सुन कर मनोज भदोला व उनके साथी भड़क उठे । और बातों व फैसलों को यदि जानें भी दें, तो क्लब के बोर्ड की 'शक्ल' ही प्रसून चौधरी के इस आरोप को पुष्ट करती है । बोर्ड में 18 सदस्य हैं, जिनमें 12 लोग पति-पत्नी हैं । क्लब के अधिकतर सदस्य पति-पत्नी हैं - जो भागीदारी के लिहाज से एक अच्छी बात है । लेकिन इस अच्छी बात को किस तरह से क्लब के मौजूदा पदाधिकारियों ने क्लब पर कब्जा करने/ज़माने की अपनी तरकीब के रूप में इस्तेमाल कर लिया, इसका पुख्ता सुबूत बोर्ड के गठन में देखा/पहचाना जा सकता है । बोर्ड में जो 18 सदस्य लिए गए हैं, वह यदि अलग अलग परिवारों के होते, तो बोर्ड के फैसलों में व्यापक प्रतिनिधित्व होता - लेकिन तब क्लब पर कब्जा कैसे होता ? क्लब पर कब्जा करने के लिए तरकीब निकाली गई कि परिवार के सदस्यों को ही बोर्ड में रख लो । इससे बोर्ड बनाने के पीछे जो भावना व उद्देश्य है, उसका ही मजाक बन गया । घटियापने की हद यह है कि इस पर क्लब का एक वरिष्ठ सदस्य यदि यह कहे कि क्लब में फैसले 'कुछ लोग' ही कर रहे हैं, तो उससे भिड़ जाओ और उसे गालियाँ देने लगो । 
कॉन्करेंस देने की बात क्लब की जिस मीटिंग में हुई, उसमें क्लब के मौजूदा पदाधिकारियों व उनके समर्थकों की मनमानियों, सौदेबाज-प्रवृत्ति तथा उनकी बदतमीजियो का खुला इज़हार हुआ । पदाधिकारियों ने पूरी बेशर्मी के साथ स्वीकार किया कि कॉन्करेंस के लिए उन्होंने मुकेश अरनेजा के साथ सौदा किया है, जिसके तहत उन्हें सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में एक असिस्टेंट गवर्नर का पद मिलेगा तथा दो डिस्ट्रिक्ट पोस्ट मिलेंगी । इसे लेकर मीटिंग में जो हाय-हल्ला हुआ, उसमें जबर्दस्त बद्तमीजियाँ हुईं और बेहूदा शब्दों का इस्तेमाल हुआ । क्लब के पदाधिकारी इस बात पर गर्व कर रहे थे कि उन्होंने जो चाहा उसे कर लिया; पर उनका गर्व तब हवा हो गया जब उन्हें पता चला कि उस मीटिंग की पूरी कार्रवाई का ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया गया है । यह सुन/जान कर क्लब के पदाधिकारियों के तो तोते उड़ गए और वह फिर अपनी 'औकात' पर आ गए तथा मीटिंग की कार्रवाई का ऑडियो रिकॉर्ड करने वालों के प्रति सोशल मीडिया में अपशब्दों से हमला करने लगे । हास्यास्पद तरीके से उन्होंने रिकॉर्डिंग करने को तो अनैतिक व गैरकानूनी बताने का शोर किया, किंतु अपनी हरकतों पर एक शब्द नहीं कहा । यह ऐसी ही बात हुई कि किसी चोर की हरकत सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो जाए और चोर अपनी हरकत पर शर्मिंदा होने की बजाए इस रिकॉर्डिंग को अनैतिक व गैरकानूनी बताने लगे । इस संबंध में सोशल मीडिया में जो चर्चा हुई, उसमें अध्यक्ष-पक्ष की तरफ से ऑडियो रिकॉर्डिंग करने वाले को प्रसून चौधरी के 'मुंडु' के रूप में संबोधित किया गया । चलो मान लेते हैं कि ऑडियो रिकॉर्डिंग करने वाला प्रसून चौधरी का 'मुंडु' होगा, लेकिन इसी तर्ज पर यह भी तो बताना चाहिए कि कॉन्करेंस के लिए पदों की सौदेबाजी करने तथा क्लब व रोटरी को बेचने वाले तथा उनके समर्थक किसके 'मुंडु' हैं ?
क्लब को और रोटरी को बेच देने के लिए तैयार हो जाने वाले मौजूदा पदाधिकारियों व उनके गिने-चुने संगी-साथियों की हरकतों को देखते हुए ही क्लब के कुछेक सदस्य पिछले महीनों में सवाल उठाते रहे हैं कि यह रोटरी क्लब है, या 'क्लब' है । यह सवाल इसलिए उठे क्योंकि रोटरी क्लब वैशाली के ही सदस्यों ने देखा/पाया कि उनका क्लब तो शराबबाजी और मौजमस्ती का अड्डा बनता जा रहा है । मीटिंग के नाम पर कुछ ही परिवार इकठ्ठा होते और उनमें इस बात के लिए शर्त लगती कि कौन ज्यादा शराब पी सकता है ! गज़ब तो पिछले दिनों असेम्बली में हुआ । दो दिन की असेम्बली में करीब दस परिवार गए थे : असेम्बली से लौटने का समय हुआ तो अध्यक्ष मनोज भदौला ने घोषणा की कि वह तो आज नहीं लौटेंगे । लौटने की तैयारी कर चुके सदस्यों ने आज न लौटने का कारण पूछा तो अध्यक्ष ने उन्हें बताया कि शराब की चार-पाँच बोतलें बच गई हैं, वह तो उन्हें खत्म करने के बाद ही लौटेंगे । असेम्बली के तय कार्यक्रम के अनुसार छह-सात परिवार ही लौटे, तथा बाकी तीन-चार परिवार शराब की बची हुई बोतलों को निपटाने के लिए असेम्बली के नाम पर एक दिन और रुक गए । असेम्बली का रोटरी में बड़ा खास महत्व है, जिसे ध्यान में रखते हुए ही रोटरी के कुछेक कार्यक्रमों में इसे विशेष रूप से डिजाइन किया गया है । रोटरी क्लब वैशाली में मनोज भदोला की अध्यक्षता में लेकिन इसे मटरगस्ती का जरिया और बहाना बना दिया गया है । मनोज भदोला मटरगस्ती में इस कदर मशगूल हैं कि रोटरी के नियम-कानूनों व व्यवस्था का पालन करने/करवाने के लिए उनके पास समय ही नहीं है । उन्हें बैंक में क्लब के अकाउंट के सिग्नेटरी बदलने का समय नहीं मिला है और तीन वर्ष से बैंक अकाउंट के सिग्नेटरी आशीष महाजन ही बने हुए हैं । मटरगस्ती के लिए क्लब में फंड आए, इसके लिए तरह तरह के उपाय सोचते रहने और उन्हें अमल में लाते रहने के लिए उनके पास समय की कोई कमी नहीं है । इसी के तहत अभी हाल ही में मनोज भदोला ने क्लब की नियमाबली में एक नियम यह बनवाया है कि क्लब का कोई सदस्य यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तत करता है तो क्लब की अनुमति पाने के लिए से क्लब के फंड में दस लाख रुपए देने होंगे । 
रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारी कॉन्करेंस के चक्कर में न पड़े होते तो यह तथ्य दबा-छिपा ही रह गया होता कि क्लब के अध्यक्ष मनोज भदोला के लिए रोटरी का मतलब सिर्फ सौदेबाजी करना, कुछेक लोगों के साथ मिल कर क्लब में मनमानियाँ करना, उसको शराबबाजी और मटरगस्ती का अड्डा बना देना - और क्लब का कोई वरिष्ठ सदस्य यदि इस सब पर सवाल उठाए तो अपने साथियों के साथ मिलकर उसके साथ गाली-गलौच करना भर है । रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों की असलियत जिस तरह से सामने आई है, उसे देख/जान कर लग रहा है कि मुकेश अरनेजा की कारस्तानी ने कम-अस-कम यह तो एक अच्छा काम किया है ।

Saturday, December 19, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में कॉन्करेंस जुटाने से जुड़ी अपनी कारस्तानियों को लेकर मुकेश अरनेजा को रोटरी इंस्टीट्यूट में भारी छीछालेदर का सामना करना पड़ा है

जयपुर/नई दिल्ली । जयपुर स्थित बीएम बिड़ला ऑडीटोरियम में रोटरी इंस्टीट्यूट में शामिल होने आए रोटरी के बड़े नेताओं तथा विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के बीच डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपनी भूमिका को लेकर मुकेश अरनेजा को जिस लानत-मलानत का शिकार होना पड़ा, उसका वहाँ मौजूद दूसरे रोटेरियंस के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट 3012 व डिस्ट्रिक्ट 3011 के रोटेरियंस नेताओं ने खूब मजा लिया । मुकेश अरनेजा के लिए मुसीबत की बात यह रही कि वहाँ उनके बचाव में कोई आगे नहीं आया, और जिनसे उन्हें सहयोग व समर्थन मिलने की उम्मीद भी थी - वह लोग भी उनकी उड़ती खिल्ली में मजे लेते देखे गए । मुकेश अरनेजा के लिए आफत यह रही कि इंस्टीट्यूट के उद्घाटन अवसर पर जुटे रोटरी नेताओं के बीच खड़े रहना, उनके लिए अपनी फजीहत को निमंत्रण देने जैसा रहा । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मुकेश अरनेजा जिस किसी के पास खड़े हो जाते - वही उनसे डिस्ट्रिक्ट 3012 के चुनाव में उनकी भूमिका का जिक्र छेड़ देता और कहने लगता कि एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर के रूप में उन्हें वह सब नहीं करना चाहिए जो उन्होंने किया है या कर रहे हैं । किसी किसी ने तो मुकेश अरनेजा को साफ साफ कहा कि उनकी हरकतों से दूसरे रोटेरियंस को भी शर्मिंदा होना पड़ता है, और रोटरी की बदनामी होती है । अधिकतर मौकों पर होता यह कि यह बात शुरू होती तो आसपास खड़े दूसरे लोग भी इस बातचीत में शामिल हो जाते और फिर सब मिल कर मुकेश अरनेजा की लानत-मलानत करते - और मुकेश अरनेजा के लिए उससे बच निकलना मुश्किल होता । 
मुकेश अरनेजा के लिए हालत यह बनी कि रोटरी इंस्टीट्यूट में उनसे पहले उनकी कारस्तानियों की खबरें पहुँची हुई थीं, और इसीलिए हो यह रहा था कि मुकेश अरनेजा जिससे भी मिलते वह उनसे हालचाल पूछने की बजाए उनकी कारस्तानियों की बात छेड़ देता । रोटरी इंस्टीट्यूट में मौजूद लोगों के बीच मुकेश अरनेजा की बदनामी के चर्चे सुन/देख कर बड़े रोटरी नेताओं ने मुकेश अरनेजा को तवज्जो नहीं दी, और उन्हें अपने पास ज्यादा देर बैठने/खड़े होने नहीं दिया । कुछेक बड़े नेताओं के साथ और उनके बीच तस्वीरें खिंचवाने के लिए मुकेश अरनेजा को खासी मशक्कत करना पड़ी - कुछेक मौकों पर वह इसमें सफल भी हुए । रोटरी इंस्टीट्यूट के उद्घाटन के मौके पर मुकेश अरनेजा ने रोटरी के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाने पर खास ध्यान दिया, ताकि सोशल साइट्स पर उन्हें पेस्ट करके वह लोगों को 'दिखा' सकें कि तमाम बदनामी और फजीहत के बावजूद रोटरी के बड़े नेताओं के बीच उनकी अच्छी पैठ है । रोटरी के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाना मुकेश अरनेजा के लिए कभी भी इतना मुश्किल नहीं हुआ, जितना इस बार रोटरी इंस्टीट्यूट के उद्घाटन मौके पर हुआ । रोटरी इंस्टीट्यूट के जयपुर में हुए उद्घाटन अवसर पर रोटरी के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए मुकेश अरनेजा बेशर्मी पर उतरे, तब जाकर वह कुछेक बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवा सकने में सफल हो सके । 
रोटरी नेताओं के बीच मुकेश अरनेजा की सबसे ज्यादा छीछालेदर डिस्ट्रिक्ट 3012 के रोटरी क्लब वैशाली के संदर्भ में हुई । रोटरी क्लब वैशाली में सदस्यों की सदस्यता को लेकर रोटरी इंटरनेशनल की वेबसाइट के साथ जिस तरह की छेड़छाड़ की गई, उसे रोटरी नेताओं ने बहुत ही 'संगीन अपराध' के रूप में देखा/पहचाना है - और इस 'अपराध' के प्रेरणा स्रोत के रूप में मुकेश अरनेजा को जिम्मेदार पाया/ठहराया । जिन्हें भी इस किस्से की जानकारी रही, उन्होंने माना/समझा कि वैशाली क्लब की कॉन्करेंस जुटाने के लिए मुकेश अरनेजा ने क्लब में झगड़ा पैदा करने का जो काम किया, उसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए मुकेश अरनेजा ने ही क्लब के प्रेसीडेंट मनोज भदोला को रोटरी इंटरनेशनल के रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ करने का रास्ता दिखाया/सुझाया - और इसके बाद जो हुआ उससे रोटरी इंटरनेशनल की सदस्यता का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था मजाक बन कर रह गई । मजे की बात यह रही कि मुकेश अरनेजा के दिखाए रास्ते पर चल कर जिन मनोज भदोला ने इस खेल की शुरुआत की, वही मनोज भदोला आज क्लब से बाहर कर दिए गए हैं । दरअसल वैशाली क्लब की कॉन्करेंस का जुगाड़ बैठा रहे मुकेश अरनेजा को क्लब के प्रेसीडेंट मनोज भदोला ने बताया कि क्लब के वरिष्ठ सदस्य प्रसून चौधरी कॉन्करेंस देने का विरोध कर सकते हैं और चूँकि क्लब में प्रसून चौधरी की अच्छी पकड़ है, इसलिए उनके विरोध के चलते क्लब के बाकी सदस्यों को कॉन्करेंस के लिए राजी करना असंभव होगा । उल्लेखनीय है कि प्रसून चौधरी पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार थे - नोमीनेटिंग कमेटी में फैसला लेकिन उनके अनुकूल नहीं रहा था; डिस्ट्रिक्ट में कई नेताओं व लोगों का उन पर दबाव रहा कि उन्हें अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करना चाहिए, लेकिन प्रसून चौधरी ने साफ कह दिया कि अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने के काम में जो गंदगी होती है उसे वह रोटरी के हित में नहीं देखते हैं और इसलिए वह चेलैंज नहीं करेंगे । प्रसून चौधरी ने अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज न करने की लाइन ली, उससे रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में उनका कद और बढ़ा । इसी कारण से मुकेश अरनेजा और उनके जाल में फँसे क्लब प्रेसीडेंट मनोज भदोला को लगा कि प्रसून चौधरी कॉन्करेंस में रोड़ा बनेंगे । 
मुकेश अरनेजा ने मनोज भदोला को प्रसून चौधरी रूपी रोड़े को हटाने का उपाय बताया कि क्लब में फर्जी किस्म की ग्राउंड तैयार करो और उसका बहाना लेकर प्रसून चौधरी को क्लब से ही बाहर कर दो । मनोज भदोला ने मुकेश अरनेजा की आज्ञा का पालन किया । किंतु मामला उल्टा पड़ गया । प्रसून चौधरी की क्लब में जो साख है, उसके चलते फर्जी तरीके से क्लब से उन्हें निकालने की कार्रवाई पर क्लब में बबाल हो गया । इस बबाल को थामने तथा क्लब के लोगों के विरोध को नियंत्रित करने के लिए मनोज भदोला ने अपने गिने-चुने साथियों के साथ मिलकर चालबाजियाँ तो खूब चलीं, लेकिन उनकी चालबाजियाँ उनके काम आई नहीं और कुल नतीजा यह है कि प्रसून चौधरी को क्लब से निकाले जाने के फैसले को रद्द कर दिया गया है, और प्रेसीडेंट मनोज भदोला को क्लब से निकाल दिया गया है । रोटरी क्लब वैशाली का मामला वैसे तो एक क्लब का मामला भर है, जिस पर रोटरी के बड़े नेताओं का ध्यान शायद ही जाता - किंतु इस मामले में मुकेश अरनेजा की संलग्नता और रोटरी इंटरनेशनल की वेबसाइट के साथ हुई छेड़छाड़ ने इसे एक बड़ा मामला बना दिया है । 
रोटरी इंस्टीट्यूट के उद्घाटन अवसर पर मौजूद रोटेरियंस के बीच मुकेश अरनेजा की इस बात के लिए भी खासी छीछालेदर हुई कि कॉन्करेंस जुटाने के लिए उन्होंने अपने डीआरएफसी होने का बेजा इस्तेमाल किया और मैचिंग ग्रांट के नाम पर क्लब्स के पदाधिकारियों को ब्लैकमेल किया । उल्लेखनीय है कि कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया है कि मुकेश अरनेजा ने उन्हें धमकी दी कि उन्होंने यदि कॉन्करेंस नहीं दी तो वह मैचिंग ग्रांट के उनके आवेदनों पर साइन नहीं करेंगे । अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने में मुकेश अरनेजा ने अपने पद की गरिमा के साथ साथ रोटरी को भी जिस तरह से लज्जित किया है, उसकी हर किसी ने तीखी आलोचना ही की है । मुकेश अरनेजा के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि क्लब्स में झगड़े करवा कर तथा अपनी भारी फजीहत करवा कर उन्होंने जो कॉन्करेंस इकठ्ठा की/करवाई हैं, उनके फर्जी होने की पोल खुलने लगी है । कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों तथा सदस्यों ने अपने अपने क्लब की कॉन्करेंस को फर्जी करार देते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को पत्र लिखे हैं । इससे कई क्लब्स की कॉन्करेंस निरस्त हो जाने की संभावना बन रही है । सचमुच यदि ऐसा हुआ तो मुकेश अरनेजा के लिए तो 'जूते भी खाने और प्याज भी खाने' वाला मामला हो जायेगा - यानि रोटरी भर में बदनामी भी मिली और काम भी नहीं हुआ ।