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Sunday, April 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में प्रेम माहेश्वरी की अध्यक्षता में बने नए क्लब की संभावित गतिविधियों व सक्रियताओं की चुनौती के सामने रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारी फिलहाल प्रेसीडेंट इलेक्ट चुनने के झगड़े में उलझे

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली में निलंबन रद्द होने के तुरंत बाद ही प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर क्लब के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के बीच जो घमासान मचा है, उसने उन लोगों को बड़ा निराश किया है - जिन्हें उम्मीद थी कि क्लब के प्रमुख लोगों ने अपनी कारस्तानियों के चलते मिली बदनामियों और मुसीबतों के हाल ही के अपने अनुभव से सबक सीखा होगा और अब वह अपनी स्वार्थी व घटिया सोच को छोड़ कर गंभीरता व मैच्योरिटी का व्यवहार करेंगे । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली अपने पदाधिकारियों के आपसी झगड़ों तथा रोटरी विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण पिछले कुछेक महीनों से निलंबित था । क्लब के पदाधिकारियों तथा उनके नजदीकी सदस्यों ने क्लब के ही दूसरे सदस्यों को अपनी लंपटता व लफंगई का शिकार नहीं बनाया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व रोटरी के अन्य बड़े पदाधिकारियों - और रोटरी के कार्यक्रमों के खिलाफ भी अशालीन व अभद्र व्यवहार प्रदर्शित किया । उनकी हरकतों पर जब चारों तरफ से बदनामी व थू थू के दाग पड़े और गहरे होने लगे - तो क्लब के पदाधिकारियों को कुछ अक्ल आई, और तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व अन्य पदाधिकारियों से उन्होंने माफी माँगना शुरू किया । माफी व खुशामद का सहारा लेकर उन्होंने अपने क्लब का निलंबन वापस करवा लिया - उनके लिए इससे भी बड़ी राहत की बात यह रही कि जिन प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के साथ वह अपना झगड़ा बता रहे थे, उन्होंने अपना एक अलग क्लब बना लिया । इससे हर किसी को उम्मीद बनी कि रोटरी क्लब वैशाली का झमेला समाप्त हो गया है, तथा यह क्लब भी अब दूसरे क्लब्स की तरह चलेगा ।
किंतु निलंबन से बाहर आए रोटरी क्लब वैशाली में अब एक नया झगड़ा सुना जा रहा है - जो प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर है । उल्लेखनीय है कि इस पद पर नरेन सेमवाल थे, जिन्होंने लेकिन पेट्स से पहले इस्तीफा दे दिया था । क्लब का निलंबन खत्म हो जाने के बाद किंतु जो फिर से प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाए जाने की माँग करने लगे हैं - क्लब के दूसरे लोग इसके लिए लेकिन राजी नहीं हैं । उनका कहना है कि मुश्किल समय में नरेन सेमवाल जिस तरह क्लब के लोगों को अँधेरे में रख कर अपनी जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए, उसे देखते हुए वह अब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने लायक नहीं रह गए हैं - और इसलिए उन्हें दोबारा से प्रेसीडेंट इलेक्ट नहीं बनाया जा सकता है । नरेन सेमवाल का कहना है कि क्लब जब निलंबित था और उसके निलंबन के वापस होने की कोई संभावना नहीं दिख रही थी, तब ऐसे क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट के रूप में उन्हें फजीहत व अपमान महसूस हो रहा था - जिससे मुक्त होने के लिए उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ देना जरूरी लगा । क्लब के दूसरे प्रमुख लोगों का कहना लेकिन यह है कि क्लब में सलाह किए बिना मनमाने तरीके से नरेन सेमवाल ने जिस तरह प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ा, वह क्लब के साथ धोखा करने जैसा मामला है - और इसे देखते हुए उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता है । मनोज भदोला की अगले रोटरी वर्ष में भी अध्यक्ष बनने की इच्छा और कोशिश को जान/देख कर क्लब के सदस्यों में अलग बेचैनी है । मनोज भदोला ने कुछेक सदस्यों से कहा है कि यह वर्ष तो झगड़े/झंझटों में ही निकल गया, और उन्हें अध्यक्ष के रूप में कुछ करने का मौका ही नहीं मिला - इसलिए वह चाहते हैं कि अगले वर्ष भी वह अध्यक्ष बनें और अध्यक्ष के रूप में कुछ अच्छे काम करके दिखाएँ, जिससे कि उन लोगों के मुँह बंद किए जा सकें जो कह रहे हैं कि अध्यक्ष के रूप में काम कर पाना मनोज भदोला के बस में है ही नहीं । मनोज भदोला की यह इच्छा और कोशिश जान/सुन कर क्लब के लोगों में घबराहट फैल गई है : उन्हें चिंता हुई है कि मनोज भदोला यदि सचमुच दोबारा अध्यक्ष बन गए तो क्लब की इज्जत बचने की जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची हुई है भी, वह भी धूल में मिल जाएगी । क्लब में अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि इस वर्ष क्लब में जो झमेला हुआ, वह अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला की अकर्मयता व नाकामी का जीता-जागता सुबूत है; इसलिए उन्हें अध्यक्ष में रूप में एक वर्ष और देना क्लब को जानबूझ कर बर्बादी की तरफ धकेलने जैसा काम होगा ।
क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों की समस्या यह है कि क्लब पर कब्जा जमाए लोगों की हरकतों से चूँकि सभी परिचित हैं, इसलिए कोई भी प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं है । हर किसी को डर दरअसल यह है कि क्लब को अपनी जागीर समझे बैठे कर्णधार अपनी अपनी मनमानी चलायेंगे और किसी को ठीक से काम ही नहीं करने देंगे - इसलिए आफत में क्यों पड़ना ? क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों के बीच चूँकि आपस में भी विश्वास का भारी संकट है, और वह एक दूसरे की खिंचाई करने के चक्कर में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनमें से भी कोई प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं हो रहा है । क्लब में मजेदार स्थिति यह बनी है कि नरेन सेमवाल और मनोज भदोला प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने की तिकड़में लगा रहे हैं, लेकिन उनके ही संगी-साथी उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाने के लिए राजी नहीं हैं - दूसरी तरफ जिन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने के लिए कहा जा रहा है, वह बनने से बचने की कोशिश कर रहे हैं ।
अपने आप को रोटरी क्लब वैशाली का कर्णधार समझ रहे लोगों के सामने वास्तव में प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी द्वारा बनाया गया नया क्लब भी एक गंभीर चुनौती है । डर यह है कि नए क्लब के कामकाज के सामने यदि रोटरी क्लब वैशाली के कामकाज टिक नहीं सके, तो डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच भारी बदनामी होगी । यह डर दरअसल इसलिए है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई जानता है कि प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के अध्यक्ष-काल में जो काम हुए, उनसे ही रोटरी क्लब वैशाली को डिस्ट्रिक्ट में खास ऊँचाई और प्रतिष्ठा मिली थी - जो बाद के वर्षों में क्रमशः घटती गई है । उम्मीद की जा रही है कि उन्हीं प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा की मदद से नया क्लब प्रेम माहेश्वरी के अध्यक्ष-काल में कामकाज के जरिए और नए रिकॉर्ड बनायेगा । ऐसे में, रोटरी क्लब वैशाली के कर्णधारों के सामने चुनौती है कि वह भी अपनी गतिविधियों व अपनी सक्रियताओं को इस तरह से आयोजित करें ताकि प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के नए क्लब से पीछे न दिखें । नया क्लब जिस गुपचुप तरीके से बना - रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरिटेज ने नए क्लब को स्पॉन्सर किया और वरिष्ठ रोटेरियन रवींद्र सिंह उसके जीएसआर बने; उससे साबित है कि डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के लोगों का समर्थन भी नए क्लब के साथ है । ऐसे में रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों की चुनौती व जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है । किंतु वहाँ प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर जो घमासान मचा हुआ है, उसे देखते/सुनते हुए वहाँ के हालात सुधरने की उम्मीद लगाए लोगों को झटका लगा है ।

Saturday, August 2, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 में सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को मनीष अग्रवाल और राजीव गुप्ता की मदद ने, तथा प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी को रमणीक तलवार और विकास चोपड़ा की तरफदारी ने; दोनों के बीच होने वाले चुनावी मुकाबले को दिलचस्प और काँटे का बनाया

गाजियाबाद । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन में मनीष अग्रवाल और राजीव गुप्ता ने तथा प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में रमणीक तलवार और विकास चोपड़ा ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट 3010 के प्रस्तावित विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर खासी गर्मी पैदा हो गई है । मजे की बात यह है कि मनीष अग्रवाल और रमणीक तलवार डिस्ट्रिक्ट में 'ग्रुप 26' के नाम से जाने/पहचाने जाने वाले एक प्रमुख ग्रुप के सदस्य हैं, जिसके सदस्यों ने आपस में बड़ी कसमें/बसमें खाई हुई हैं कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चक्कर में ग्रुप के सदस्य अपनी एकता पर आँच नहीं आने देंगे । लेकिन इन दोनों के अलग-अलग उम्मीदवारों के साथ खुल कर सक्रिय होने से उक्त ग्रुप की एकता खतरे में पड़ गई है । मनीष अग्रवाल और रमणीक तलवार की मजबूरी भी है - जब इनके अपने अपने क्लब से उम्मीदवार आ रहे हैं, तो इन्हें उनके समर्थन में सक्रिय होना भी है । इस प्रसंग की एक और दिलचस्प बात यह है कि सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी घोषित होने से पहले संभावित उम्मीदवारों की जो सूची लोगों के बीच चर्चा में थी उसमें मनीष अग्रवाल और रमणीक तलवार के नाम थे; लेकिन उम्मीदवारी जब चर्चा की चुगलखोरियों से निकल कर जमीन पर उतरी तो सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के नाम सामने आये ।
सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को मनीष अग्रवाल की सक्रियता से तो बल मिला ही है, साथ ही रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के राजीव गुप्ता की सक्रियता से भी ताकत मिली है । राजीव गुप्ता ने निजी दिलचस्पी लेकर अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह को न सिर्फ आमंत्रित किए गए अतिथियों की संख्या को बढ़वा कर बड़ा करवाया बल्कि उसे सतीश सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक-आयोजन में भी तब्दील कर दिया । किसी उम्मीदवार को किसी दूसरे क्लब में इतना खुला समर्थन शायद ही कभी मिला हो, जितना रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार में सतीश सिंघल को मिला । कुछेक लोगों को हालाँकि यह कहते हुए भी सुना गया कि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के बहाने राजीव गुप्ता ने वास्तव में अगले वर्षों में प्रस्तुत होने वाली अपनी उम्मीदवारी के लिए जमीन तैयार का काम किया है । यह बात यदि सच भी है तो भी - राजीव गुप्ता ने जो किया उससे अभी तो सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को ही ताकत मिली है । इससे पहले, सतीश सिंघल और मनीष अग्रवाल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह को अच्छे से आयोजित करने में तथा दूसरे क्लब्स के महत्वपूर्ण लोगों की उपस्थिति को संभव बनाने में मनीष अग्रवाल ने अतिरिक्त सक्रियता दिखाई । क्लब के लोगों को ही कहते हुए सुना गया कि मनीष अग्रवाल यदि सक्रिय न होते तो क्लब का अधिष्ठापन समारोह वैसा न होता, जैसा कि वह हुआ ।
मनीष अग्रवाल और राजीव गुप्ता ने यदि सतीश सिंघल की उम्मीदवारी को मुकाबले में लाने का काम किया है तो रमणीक तलवार और विकास चोपड़ा ने प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी की हवा बनाने में योगदान दिया है । उम्मीदवार के रूप में प्रसून चौधरी के सामने सबसे बड़ी समस्या लोगों के साथ अपने अपरिचय को लेकर थी । वह खुद भी ज्यादा लोगों को नहीं जानते/पहचानते थे और विभिन्न क्लब्स के लोग भी उन्हें नहीं जानते/पहचानते थे । लोगों के साथ उनके इस अपरिचय को दूर करने में उन्हें रमणीक तलवार और विकास चोपड़ा की सक्रियता से बहुत मदद मिली । रमणीक तलवार चूँकि चुनावी लटकों-झटकों से भी अच्छी तरह परिचित हैं, इसलिए रमणीक तलवार की सक्रियता के कारण प्रसून चौधरी ने कम समय में चुनावी-यात्रा की जितनी दूरी तय कर ली है, वह अन्यथा उनके लिए मुश्किल क्या - शायद असंभव ही होती । संजय खन्ना और रवि चौधरी के बीच हुए चुनाव में रवि चौधरी के पक्ष में जुटे चुनावी महारथियों के जबड़े से संजय खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन को खींचने का जो लोमहर्षक काम हुआ था, उसे करने वालों में एक नाम रमणीक तलवार का भी था । तभी से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों की सूची में रमणीक तलवार का भी नाम जुड़ा है । संजय खन्ना के चुनाव में रमणीक तलवार ने जिस तरह की जो भूमिका निभाई थी, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट के प्रायः सभी क्लब्स में उनका परिचय है जिसका फायदा वह प्रसून चौधरी को दिलवा रहे हैं । विकास चोपड़ा इस वर्ष असिस्टेंट गवर्नर हैं, जिस नाते उनके लिए लोगों के बीच पैठ बनाने की सुविधा है । विकास चोपड़ा की इस सुविधा ने प्रसून चौधरी के कई कामों को आसान बना दिया है ।
सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी की एक कॉमन समस्या है - और वह यह कि राजनीतिक तिकड़मों को संभव करने के मामले में दोनों ही कच्चे हैं । सतीश सिंघल की रोटरी में लंबी सक्रियता रही है । रोटरी में उन्होंने काम भी बहुत किए हैं लेकिन डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उन्हें कभी इन्वॉल्व होते हुए नहीं देखा/पाया गया । यही कारण रहा कि रोटरी में कामकाजी उपलब्धियों के लिहाज से उन्हें डिस्ट्रिक्ट में जो जगह मिलना चाहिए थी, वह नहीं मिल सकी । प्रसून चौधरी अपने क्लब के चार्टर प्रेसीडेंट हैं और प्रेसीडेंट के रूप में उन्होंने कुछेक ऐसे उल्लेखनीय काम किए जो डिस्ट्रिक्ट में उदाहरण बने; किंतु उनका क्लब डिस्ट्रिक्ट में पहचाना जाता है 'रमणीक तलवार के क्लब' के रूप में । सतीश सिंघल भी और प्रसून चौधरी भी अपने काम से राजनीतिक फायदा उठाने का हुनर नहीं सीख सके । सामान्य परिस्थितियों में तो इसे एक अच्छी बात के तौर पर लिया जाता; लेकिन चुनावी राजनीति के संदर्भ में यह 'कमजोरी' है । जाहिर है कि उम्मीदवार के रूप में दोनों के सामने अपनी इस 'कमजोरी' पर विजय पाने की गंभीर चुनौती है ।
सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में जिस तरह अपने अपने नजदीकी समर्थकों पर निर्भर हैं और उनके नजदीकी समर्थक भी उन्हें जिस तरह से मदद पहुँचा रहे हैं - उसके चलते दोनों के बीच होने वाले चुनाव का परिदृश्य दिलचस्प और काँटे का हुआ जा रहा है ।