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Saturday, February 24, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भरत पांड्या और अशोक गुप्ता के बीच हो रहे चुनाव में अचानक से नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस वाले डिस्ट्रिक्ट 3100 को वोटिंग अधिकार दिलवाने के फैसले ने चुनाव को और भी विवादपूर्ण बना दिया है

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जोन 4 में वोट डालने की समय-सीमा के अंतिम सप्ताह में डिस्ट्रिक्ट 3100 को अचानक से वोटिंग अधिकार मिलने की खबर से जो हड़कंप मचा है, उसने रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की कार्य-पद्धति पर तो सवालिया निशान लगाया ही है - चुनावी व्यवस्था को भी शक व आरोपों के घेरे में ला दिया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 सजा के तौर पर नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में है, और इसलिए एक डिस्ट्रिक्ट के रूप में उसकी पहचान और उसके अधिकार निलंबित हैं । डिस्ट्रिक्ट में कोई गवर्नर नहीं है और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंटरनेशनल असाइनमेंट्स से अलग-थलग किया हुआ है । डिस्ट्रिक्ट की व्यवस्था देखने और उसे 'रास्ते पर लाने' की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर संजय खन्ना को सौंपी हुई है । खास और अंतर्विरोधी बात लेकिन यह है कि संजय खन्ना की देखरेख में डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट स्टेटस वाले काम हो भी रहे हैं - जैसे क्लब्स की सक्रियता बनी हुई है, संजय खन्ना के प्रयत्नों से रोटरी फाउंडेशन से संबद्ध कार्रवाइयाँ शुरू हुई हैं और अगले रोटरी वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव भी संपन्न हुआ है । लेकिन फिर भी, नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस के कारण डिस्ट्रिक्ट 3100 को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में प्रतिनिधित्व नहीं मिला, और इस पर किसी को कोई आश्चर्य भी नहीं हुआ । न इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवारों और उनके समर्थकों ने, और न डिस्ट्रिक्ट 3100 के वोटरों ने इसकी कोई उम्मीद या माँग ही की । सभी ने मान लिया कि नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट 3100 को भरत पांड्या व अशोक गुप्ता के बीच हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव की प्रक्रिया से बाहर ही रहना है ।
लेकिन अभी जब इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव पूरे होने की समय-सीमा को समाप्त होने में करीब सप्ताह भर का ही समय बचा रह गया है, तब अचानक से सूचना मिली कि डिस्ट्रिक्ट 3100 के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को लिंक व पासवर्ड भेजे जा रहे हैं, ताकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वह अपने अधिकार का प्रयोग कर सकें । अचानक मिली इस सूचना से हड़कंप मचना स्वाभाविक ही था, और वह मचा भी । हैरत की बात किंतु यह हुई कि इस बारे में पक्की सूचना और या व्यवस्था के बारे में संबद्ध पदाधिकारियों को भी कुछ पता नहीं था । प्रेसीडेंट्स को लिंक व पासवर्ड भेजे जाने की सूचना तो मिली है, लेकिन सचमुच में लिंक व पासवर्ड नहीं मिले । इस बारे में जब रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारियों से पूछा गया तो उन्होंने कोई जानकारी न होने की बात कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया । डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लगा कि साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारी कामचोरी कर रहे हैं और या किसी उम्मीदवार को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से बदमाशी दिखा रहे हैं । हद की बात तो यह हुई कि रोटरी इंटरनेशनल के प्रतिनिधि के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3100 की जिम्मेदारी देख/संभाल रहे संजय खन्ना तक को अधिकृत रूप से नहीं पता कि वास्तव में हो क्या रहा है; इसीलिए पहले तो उन्होंने इसे अफवाह बताया, लेकिन जब उन्हें बताया गया कि कुछेक क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को लिंक व पासवर्ड मिले हैं - तब वह यह पता करने के लिए सक्रिय हुए कि इस मामले में हो क्या रहा है, और वास्तव में होना क्या है ? यह स्थिति तब की है, जब वोटिंग लाइन बंद होने में कुल चार दिन बचे हैं । रोटरी इंटरनेशनल पदाधिकारियों के काम करने के बेवकूफीभरे तरीके का यह एक नया और दिलचस्प उदाहरण है ।
इस नए उदाहरण से एक बार फिर यह सवाल उठा कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की अक्ल का ताला धीरे धीरे खुलता है क्या ? नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में होने के कारण जिस डिस्ट्रिक्ट 3100 को नोमीनेटिंग कमेटी में प्रतिनिधित्व देने से तो इंकार कर दिया गया, लेकिन अब जब चुनावी प्रक्रिया संपन्न होने में कुल चार दिन बचे हैं, तब उसी डिस्ट्रिक्ट को चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार दे दिया गया है । तर्क सुना जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट भले ही नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में हो, लेकिन क्लब्स तो काम कर रहे हैं - इसलिए उनके प्रेसीडेंट्स को चुनावी प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया है । इस तर्क से सवाल लेकिन यह उठता है कि नोमीनेटिंग कमेटी के लिए प्रतिनिधि चुनने का काम भी तो प्रेसीडेंट्स को ही करना था - तब प्रेसीडेंट्स को उनके अधिकार देने का ख्याल क्यों नहीं आया ? मजे की और मजाक की बात यह भी है कि नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस के बावजूद डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रेसीडेंट्स के लिए रोटरी फाउंडेशन के अधिकार तो खुले हुए हैं; उन्होंने अगले रोटरी वर्ष के लिए गवर्नर का चुनाव भी कर लिया है - जिसे रोटरी इंटरनेशनल ने ट्रेनिंग भी दे दी है; लेकिन उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव/चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में प्रतिनिधि चुनने/भेजने का अधिकार नहीं दिया गया । पर अब जब रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की अक्ल का ताला खुला, तो उन्होंने नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में होने के बावजूद डिस्ट्रिक्ट 3100 को इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए समाप्ति की ओर बढ़ रही चुनावी प्रक्रिया में शामिल करने का फैसला कर लिया है ।
अचानक हुए इस फैसले को लेकिन शक की निगाह से भी देखा/पहचाना जा रहा है । कई एक लोगों को शक है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को अचानक से अंतिम दिनों में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में शामिल करने के पीछे भरत पांड्या की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाने का उद्देश्य छिपा हो सकता है । जोन की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि जोन के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में पड़े वोटों का जो विवरण मिल रहा है, उसमें भरत पांड्या के मुकाबले अशोक गुप्ता का पलड़ा भारी पहचाना जा रहा है, जिसके कारण भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं के बीच चिंता और घबराहट है । हालाँकि भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक बड़े नेताओं ने अपनी तरफ से भरत पांड्या की उम्मीदवारी को बढ़त दिलवाने के लिए प्रयास तो खूब किए, लेकिन अपने प्रयासों का कोई लाभ मिलता हुआ उन्हें नहीं दिख रहा है । लोगों के बीच चर्चा सुनी जा रही है कि अशोक गुप्ता की बढ़त को रोकने के लिए ही भरत पांड्या के समर्थक नेताओं ने आनन-फानन में डिस्ट्रिक्ट 3100 को चुनावी प्रक्रिया में शामिल करवाने का फैसला करवा लिया है । उन्हें उम्मीद है कि यहाँ वह भरत पांड्या को इतने वोट जरूर दिलवा लेंगे, जिससे कि अशोक गुप्ता की बढ़त को वह रोक सकेंगे । उल्लेखनीय है कि भरत पांड्या को ज्यादा से ज्यादा वोट दिलवाने के लिए उनके समर्थक नेताओं ने कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में वोटिंग लाइन भी शिड्यूल से पहले ही खुलवा ली थीं, जिस पर खासा विवाद हुआ था । चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के शिड्यूल से सप्ताह भर पहले अचानक से डिस्ट्रिक्ट 3100 को चुनावी प्रक्रिया में शामिल करने के फैसले ने जोन 4 में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को और भी विवादपूर्ण बना दिया है ।

Wednesday, January 17, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में अशोक गुप्ता की बढ़त रोकने तथा भरत पांड्या को वोट दिलवाने की तिकड़मों के चक्कर में रिसोर्स ग्रुप में दीपक तलवार, विनोद बंसल, ललित श्रीमाल और आशीष देसाई के पद खतरे में पड़े

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जोन 4 में हो रहे चुनाव में भरत पांड्या को कड़े मुकाबले के चलते हार के कगार में फँसा देख, बचे-खुचे वोटों पर कब्जा जमाने के लिए भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं व पदाधिकारियों ने रिसोर्स ग्रुप के पदों को 'बेचने' की तैयारी की है । समस्या की बात लेकिन यह हुई है कि इस तैयारी की भनक मिलने पर रिसोर्स ग्रुप के मौजूदा पदाधिकारियों के बीच अपनी अपनी कुर्सी बचाने की दौड़ मच गई है, जिसके कारण एक तरफ तो गुपचुप रूप से की जा रही तैयारी की पोल खुल गई है - और दूसरी तरफ रिसोर्स ग्रुप के पदों पर काबिज होने के लिए भरत पांड्या के समर्थकों में होड़ मच गई है । इस दौड़/होड़ में रिसोर्स ग्रुप में दीपक तलवार, विनोद बंसल, ललित श्रीमाल, आशीष देसाई आदि के पदों पर खतरा मंडराता देखा जा रहा है । रिसोर्स ग्रुप के पदों के लिए यूँ तो लंबी लाइन है, लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की पृष्ठभूमि में रिसोर्स ग्रुप के पदों के लिए सबसे बड़े दावेदारों में गुरजीत सिंह, दीपक शिकारपुर, दीपक पुरोहित आदि हैं । इन्होंने भरत पांड्या के पक्ष में माहौल बनाने तथा उन्हें वोट दिलवाने के लिए अथक प्रयास किए हैं, लेकिन उन्हें लग रहा है कि भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक बड़े नेताओं व पदाधिकारियों ने उन्हें इस्तेमाल कर लिया है - उनसे काम तो ले लिया, लेकिन उनके लिए कुछ करते हुए नहीं दिख रहे हैं । अपने आप को 'इस्तेमाल करो, और छोड़ दो' वाले फार्मूले का शिकार होता देख यह लोग भड़के हुए हैं । गुरजीत सिंह का तो काम पूरा हो गया है, इसलिए भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं व पदाधिकारियों को उनकी ज्यादा चिंता नहीं है; लेकिन दीपक शिकारपुर और दीपक पुरोहित के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3131 में अभी करीब पचास प्रतिशत वोटिंग बाकी है - इसलिए भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं व पदाधिकारियों को इनकी चिंता करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है ।
जोन 4 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए हो रहे चुनाव में 85 से 90 प्रतिशत के बीच वोटिंग हो चुकने का अनुमान लगाया जा रहा है । वोटिंग पैटर्न के जो तथ्य भरत पांड्या के समर्थकों को मिले हैं, या उन्होंने जुटाए हैं - उसने उन्हें निराश किया है । भरत पांड्या के कई एक समर्थकों का कहना है कि अभी तक जो वोट पड़े हैं, उनमें ही अशोक गुप्ता ने निर्णायक बढ़त बना ली है; हालाँकि अन्य कुछेक समर्थकों का कहना है कि अशोक गुप्ता को विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में अच्छे वोट मिले हैं और वह बराबर की टक्कर पर हैं या थोड़ा बहुत आगे भी हैं - तो भी भरत पांड्या के लिए मुकाबला अभी खत्म नहीं हुआ है, और बाकी बचे वोटों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में कुल करीब 2300 वोट पड़ने हैं । अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में इंटरनेट सुविधा से दूर और अलग-थलग रहने/पड़ने वाले क्लब्स के वोट अभी नहीं पड़ सके हैं, और या जिन्हें अभी तक भी लिंक व पासवर्ड नहीं मिले हैं - वह वोट डालने से बचे रह गए हैं । एक अकेले डिस्ट्रिक्ट 3131 में ही वोटिंग की रफ्तार ढीली है । इसका कारण यह सुना जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के 'नेताओं' ने जानबूझ कर 'अपने अपने' क्लब्स को वोट डालने से रोका हुआ है - ताकि वह भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं व पदाधिकारियों से 'ठीक' से सौदेबाजी कर सकें । दरअसल भरत पांड्या के समर्थक नेताओं व पदाधिकारियों ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के प्रमुख 'नेताओं' को रिसोर्स ग्रुप में पद देने/दिलवाने का लालच देकर अपने पक्ष में किया हुआ था । वह तो जब कमल सांघवी के इस्तीफे से खाली हुए आरआरएफसी के पद पर भरत पांड्या के ही डिस्ट्रिक्ट के विजय जालान की नियुक्ति हो गई, तब नेताओं का माथा ठनका और उन्हें लगा कि उन्हें झूठे लालच देकर इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है ।
दरअसल विजय जालान को रिसोर्स ग्रुप में पद मिलने के साथ ही विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं को जब अपने ठगे जाने तथा धोखे का शिकार होने का अहसास हुआ, तभी उनमें से अधिकतर ने भरत पांड्या की उम्मीदवारी के पक्ष में सक्रिय रहने तथा कुछ करने से मुँह मोड़ लिया - जिसका खामियाजा वोटिंग लाइन खुलने के बाद भरत पांड्या की उम्मीदवारी को उठाना पड़ा । भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं को विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में जिन जिन नेताओं से 'सहयोग' मिलने की उम्मीद थी, उनमें से अधिकतर शांत बने रहे और उन्होंने कुछ किया ही नहीं - कुछेक ने तो अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए काम किया । स्वाभाविक रूप से इसका फायदा अशोक गुप्ता को मिला, और कई डिस्ट्रिक्ट्स में उन्हें उम्मीद से बढ़ कर समर्थन मिला । मामले की नजाकत भरा यह नजारा देख कर भरत पांड्या के समर्थक नेता और पदाधिकारी सावधान और सक्रिय हुए हैं, तथा उन्होंने समझ लिया है कि अब झूठे आश्वासन देने से काम नहीं चलेगा - उन्हें ठोस रूप में कुछ करना पड़ेगा । ठोस रूप में कुछ करने की ज्यादा जरूरत उन्हें डिस्ट्रिक्ट 3131 में ही लग रही है - जहाँ कि अभी सौ के करीब वोट पड़ना बाकी हैं, और जहाँ दो/तीन नेता रिसोर्स ग्रुप में पद पाने के अभिलाषी हैं । रिसोर्स ग्रुप की विभिन्न कमेटियों में में इनके लिए जगह बनाने के लिए मौजूदा कुछेक कमेटियों के पदाधिकारियों की बलि चढ़ानी पड़ेगी - और जिसके तहत उन्हें उनके पदों से हटाना पड़ेगा ।
इस हलचल को देखते हुए रिसोर्स ग्रुप के पदाधिकारियों के बीच अपने अपने पद बचाने की होड़ मच गई है । रिसोर्स ग्रुप में दीपक तलवार, विनोद बंसल, ललित श्रीमाल और आशीष देसाई को कमजोर कड़ी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और जिसके चलते इनकी कुर्सी को खतरे के निशाने पर चिन्हित किया गया है । कुछेक लोगों को लगता है कि आशीष देसाई को पद से हटाने का चूँकि गलत संदेश जायेगा और उससे अशोक गुप्ता को सहानुभूति मिल सकती है, इसलिए हो सकता है कि उनकी कुर्सी सुरक्षित बनी रहे - और बाकी लोग निशाना बने; जबकि अन्य कुछ लोगों को लगता है कि दीपक तलवार व विनोद बंसल के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में, तथा ललित श्रीमाल के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3040 में अभी चूँकि थोड़ी बहुत वोटिंग बाकी है, इसलिए उन्हें न छेड़ कर आशीष देसाई का ही शिकार करने का निश्चय किया जाए । इसके अलावा, यह तय करने की भी चुनौती है कि रिसोर्स ग्रुप में किसे पद दिया जाए ? पद पाने के आकांक्षी चूँकि ज्यादा हैं, अंतिम चरण की वोटिंग के लिहाज से महत्त्वपूर्ण बने डिस्ट्रिक्ट 3131 में ही दो/तीन नेता पद के आकांक्षी हैं - इसलिए यह तय करना भी मुश्किलों भरा काम है कि अभी किसे संतुष्ट किया जाए । बीच वर्ष में पद खाली करवाने/भरवाने की कार्रवाई एक अलग तरह की बदनामी और मुसीबत का सबब बन सकती है, इसलिए ज्यादा कुछ करने से भी बचने की कोशिश होगी । बड़े नेताओं के बीच की चर्चाओं के अनुसार, ज्यादा नहीं तो - एक पद के लिए तो हटाने/भरने का खेल हो सकता है । अब लोगों के बीच सारी माथापच्ची इस बात पर है कि वह एक कौन होगा, जिसका पद छिनेगा और जिसे मिलेगा ? सारी माथापच्ची में यह मानने/समझने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है कि भरत पांड्या को बाकी बचे वोटों की बड़ी संख्या दिलवाने के लिए उनके समर्थक नेता और पदाधिकारी रिसोर्स ग्रुप में रोटरी पब्लिक इमेज कोऑर्डीनेटर के पद से आशीष देसाई को हटा कर उनकी जगह दीपक शिकारपुर को बैठा दें - जिसके बदले में दीपक शिकारपुर डिस्ट्रिक्ट के बाकी बचे करीब पचास प्रतिशत वोट भरत पांड्या को दिलवाएँ । लोगों के बीच कयास बहुतेरे हैं; ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आखिर होता क्या है ?

Wednesday, December 27, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स द्वारा मिड ईयर रिव्यू मीटिंग को रद्द करवाने की कार्रवाई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार अशोक गुप्ता के लिए वरदान ही बनी

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट 3080 में बीते छह महीनों में हुए कामकाज का लेखाजोखा करने तथा उसके आधार पर अगले छह महीनों के कामकाज का निर्धारण करने के उद्देश्य से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी द्वारा आयोजित की जा रही मिड ईयर रिव्यू मीटिंग - इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अशोक गुप्ता और भरत पांड्या के बीच हो रहे चुनावी मुकाबले की गर्मी की भेंट चढ़ गई है । 29 दिसंबर को चंडीगढ़ में हॉलिडे इन होटल में बुलाई गई मीटिंग को रद्द करने के लिए आधिकारिक रूप से तो 'अपरिहार्य परिस्थितियों' को जिम्मेदार बताया गया है, लेकिन यह 'अपरिहार्य परिस्थितियाँ' वास्तव में क्या हैं - इसका खुलासा टीके रूबी की तरफ से नहीं किया गया है । दिलचस्प बात यह है कि इसका खुलासा राजा साबू गिरोह के सदस्यों की तरफ से किया गया, जिसके तहत कुछेक लोगों को बताया गया कि राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने टीके रूबी पर दबाव बना कर इस मीटिंग को रद्द करवाया है । राजा साबू गिरोह के गवर्नर्स का आरोप रहा कि रिव्यू के बहाने बुलाई जा रही इस मीटिंग में टीके रूबी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता को वोट डलवाने का काम कर सकते हैं, इसलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव होने के मौके पर कोई मीटिंग नहीं होनी चाहिए । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के दोहरे चरित्र का मजेदार और बिलकुल नया उदाहरण यह है कि 6 जनवरी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट प्रवीन गोयल द्वारा माउंट व्यू होटल में की जा रही 'परिचय' मीटिंग को लेकर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है । प्रवीन गोयल को दरअसल वह अपना 'आदमी' समझते हैं ।
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि टीके रूबी भी पहले उनके ही आदमी थे, लेकिन अपने ही आदमियों की उठक-बैठक लगवाने की अपनी सोच और प्रवृत्ति के चलते राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने जब टीके रूबी के गवर्नर की कुर्सी तक पहुँचने में बाधाएँ खड़ी करना शुरू कीं, तो उसके चलते टीके रूबी अब उनके 'आदमी' नहीं रह गए हैं । सच बात यह है कि कुछ समय पहले तक डिस्ट्रिक्ट 3080 में सभी लोग राजा साबू के 'आदमी' बन कर ही रहे हैं; किंतु धीरे-धीरे जब राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स की हरकतें बढ़ती गईं और उनकी असलियत लोगों के सामने आती गई - तब लोग उनके चंगुल से निकलते गए और अपने व्यवहार व अपने काम के भरोसे अपनी अपनी पहचान बनाते गए । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए इससे बड़ी फजीहत की बात और क्या होगी कि उन्होंने जिन टीके रूबी को गवर्नर बनने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया, वह टीके रूबी न सिर्फ यह कि गवर्नर बने - बल्कि इंटरनेशनल डायरेक्टर जैसे बड़े चुनाव में राजा साबू गिरोह के लिए वह बड़े प्रतिद्वंदी बन गए हैं । राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स के विरोध के बावजूद उनके डिस्ट्रिक्ट में ही इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता को अच्छा समर्थन मिलता दिख रहा है । मजे की बात यह रही कि इसके लिए टीके रूबी को ज्यादा कुछ करना भी नहीं पड़ा; उन्होंने तो सिर्फ जाल बिछाया - राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स उनके जाल में फँसते गए । कुछ ही समय पहले टीके रूबी ने एक इंटरसिटी सेमीनार में अशोक गुप्ता को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया । वह जानते थे कि राजा साबू और उनके गिरोह के लोग अशोक गुप्ता का डिस्ट्रिक्ट में आना हजम नहीं कर पायेंगे और उनके आने को निरस्त करवाने के लिए हाथ-पैर मारेंगे । यही हुआ भी । राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने 'ऊपर से' दबाव डलवा कर अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट में आने को तो रुकवा दिया, लेकिन इस के चलते अशोक गुप्ता और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की बात डिस्ट्रिक्ट 3080 में एक जानी-पहचानी बात बन गई - और डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने टीके रूबी के बिना कुछ कहे/सुने ही जान लिया कि टीके रूबी का सहयोग और समर्थन अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए है ।
अशोक गुप्ता यदि उस इंटरसिटी सेमीनार में मुख्य अतिथि के रूप में आ जाते, तो उन्हें उतना राजनीतिक फायदा नहीं मिलता - जितना कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने उनके आने को रद्द करवा कर उन्हें दिलवा दिया । उस प्रसंग ने रोटरी के बड़े नेताओं और पदाधिकारियों के बीच टीके रूबी की पहचान और भूमिका को भी और और विस्तार दिया । यही कहानी 29 दिसंबर की मिड ईयर रिव्यू मीटिंग के मामले में दोहराई गई है । इस मीटिंग का तो अशोक गुप्ता से तो कुछ लेना-देना भी नहीं था; लेकिन राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स चूँकि टीके रूबी - और अशोक गुप्ता को उनके समर्थन की बात से इतना बौखलाए हुए हैं कि टीके रूबी को यदि छींक भी आ जाए, तो वह अपने अपने जुकाम का ईलाज करने में जुट जाते हैं - लिहाजा उन्होंने टीके रूबी की इस मीटिंग को अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में वोटिंग कराने की तैयारी के रूप में देखा और इसे रद्द करने/करवाने के काम में जुट गए । टीके रूबी ने भी मीटिंग रद्द करने को लेकर कोई हील-हुज्जत नहीं की - क्योंकि वह जो करना चाहते थे, वह तो हो ही गया । राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने ही डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स तक यह संदेश 'भिजवा' दिया कि टीके रूबी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता को वोट दिलवाना चाहते हैं । टीके रूबी को इस संदर्भ में कुछ कहना/करना ही नहीं पड़ा । मीटिंग यदि होती, तो टीके रूबी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में कुछ नहीं कर पाते; यदि कुछ करने का प्रयास करते भी, तो विवाद में पड़ते । इस लिहाज से राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स की उक्त मीटिंग को रद्द करवाने की कार्रवाई टीके रूबी और अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए वरदान ही बनी है ।

Monday, December 25, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में डिस्ट्रिक्ट 3070 में प्रमुख पदों की सौदेबाजी के जरिए भरत पांड्या को वोट दिलाने की कोशिशों के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट बरजेश सिंघल को विरोध व रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत का सामना करना पड़ रहा है

जालंधर । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट बरजेश सिंघल पर अगले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल के असिस्टेंट गवर्नर्स के पद के बदले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भरत पांड्या के लिए वोट जुटाने का आरोप लगने - और रोटरी इंटरनेशनल में इस बारे में शिकायत होने से डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गर्मी पैदा होने के साथ-साथ उसके समीकरणों में बदलाव आने के संकेत भी मिले हैं । उल्लेखनीय है कि अशोक गुप्ता और भरत पांड्या के बीच हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर डिस्ट्रिक्ट 3070 में खासी गहमागहमी है । हालाँकि कुछेक पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि गहमागहमी ज्यादा नहीं है, गहमागहमी का शोर ज्यादा है - और इसका कारण पूर्व गवर्नर गुरजीत सिंह की सक्रियता है । गुरजीत सिंह ने भरत पांड्या की उम्मीदवारी का झंडा उठाया हुआ है; और पंचकुला में हुई नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग से लेकर कुआलालुम्पुर में हुए रोटरी इंस्टीट्यूट तक भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थन में काम करने को लेकर वह चर्चा में रहे हैं । कुआलालुम्पुर से लौट कर गुरजीत सिंह ने नॉर्दर्न क्षेत्र के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में अपनी सक्रियता दिखाने का प्रयास किया, लेकिन वहाँ कहीं उनकी ज्यादा चली नहीं - और इस कारण से उनकी चर्चा का ग्राफ जितनी तेजी से ऊँचा चढ़ा था, उतनी ही तेजी से वह नीचे भी आ गया । इसका कारण यह भी रहा कि गुरजीत सिंह को अपने ही डिस्ट्रिक्ट में भरत पांड्या के समर्थन के संदर्भ में अपनी सक्रियता को लेकर विरोध का सामना करना पड़ा । दरअसल डिस्ट्रिक्ट 3070 में भरत पांड्या की उम्मीदवारी के दूसरे समर्थक नेताओं ने भरत पांड्या और उनके चुनावी-प्रबंधकों से साफ कह दिया कि उनकी उम्मीदवारी की कमान यदि गुरजीत सिंह के हाथ में रहेगी, तो डिस्ट्रिक्ट में उन्हें जो वोट मिल सकते हैं, वह भी उन्हें नहीं मिलेंगे । इसके बाद, भरत पांड्या की उम्मीदवारी के चुनाव-प्रबंधकों ने गुरजीत सिंह को 'ज्यादा न उड़ने' का निर्देश दिया, और तब गुरजीत सिंह ने अपनी सक्रियता की रफ़्तार धीरे की ।
गुरजीत सिंह की सक्रियता भरत पांड्या के लिए वास्तव में मुसीबत का कारण ही बनी । दरअसल भरत पांड्या के लिए गुरजीत सिंह की सक्रियता को रोटरी में आगे बढ़ने की उनकी 'सीढ़ी' के रूप में देखा/पहचाना गया । गुरजीत सिंह को एक महत्त्वाकांक्षी रोटेरियन के रूप में देखा/पहचाना जाता है; उन्होंने खुद भी कई लोगों से कहा है कि उन्हें रोटरी में 'आगे' बढ़ना है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3070 में सुरेंद्र सेठ को छोड़ कर किसी अन्य गवर्नर की रोटरी में ऊँची पहचान नहीं बन सकी है । इसका कारण यह भी रहा कि किसी ने ऊँची पहचान के लिए कोई प्रयास भी नहीं किया । सुरेंद्र सेठ की वक्तृत कला और उनकी सक्रियता की विविधता के चलते रोटरी में उनका एक आभामंडल बना, जो लगातार कायम रहा । तीन वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहे गुरजीत सिंह ने रोटरी में ऊँची उड़ान भरने के बारे में सोचा तो, लेकिन वह ऐसा कोई काम करके दिखा नहीं सके जिससे कि रोटरी के बड़े नेताओं की निगाह में वह 'चढ़' सकें । बासकर चॉकलिंगम के इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में काम करना शुरू करने के बाद, गुरजीत सिंह ने उनके लिए कम्प्यूटर नेटवर्किंग को लेकर कुछ काम किया - जिसके चलते वह बासकर चॉकलिंगम के नजदीक तो आए, पर इस नजदीकियत का उन्हें कोई फायदा होता हुआ नहीं दिखा । इस बीच इंटरनेशनल डायरेक्टर पद को लेकर शुरू हुई गहमागहमी में उन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने का मौका नजर आया, और इस मौके को इस्तेमाल करने के लिए वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी मैदान में कूद पड़े । उन्हें विश्वास रहा कि वह भरत पांड्या की उम्मीदवारी के लिए काम करेंगे, तो भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेता रोटरी में ऊँचा उठने की उनकी कोशिशों में अवश्य ही मदद करेंगे । इसी विश्वास के चलते गुरजीत सिंह ने भरत पांड्या की उम्मीदवारी के पक्ष में जोशो-खरोश के साथ मोर्चा संभाल लिया । गुरजीत सिंह को भरत पांड्या के यहाँ ज्यादा तवज्जो मिलती देख, भरत पांड्या के दूसरे समर्थक लेकिन नाराज हो गए - और यह कहते हुए भरत पांड्या के समर्थन से पीछे हट गए कि अब जो करेंगे, गुरजीत सिंह ही करेंगे ।
जोन 4 के नॉर्दर्न हिस्से के डिस्ट्रिक्ट्स में गुरजीत सिंह की अति-सक्रियता के कारण भरत पांड्या के संभावित समर्थकों में फैली नाराजगी ने भरत पांड्या की उम्मीदवारी को तगड़ा झटका दिया । गुरजीत सिंह के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3070 तक में भरत पांड्या ने अपना काफी समर्थन खो दिया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3070 में भरत पांड्या के लिए अच्छा समर्थन था - कुछ खेमेबाजी के समीकरणों के चलते और कुछ डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न आयोजनों में भरत पांड्या के आने के कारण । डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में जो विभिन्न खेमे हैं, उनके नेताओं के साथ अलग-अलग कारणों से भरत पांड्या के संबंध बने और रहे - लेकिन जब भरत पांड्या को गुरजीत सिंह पर ज्यादा निर्भर देखा गया, तो उनके दूसरे समर्थक गुरजीत सिंह के साथ विरोध के चलते भरत पांड्या से दूर हो गए । इसीलिए भरत पांड्या के समर्थक बड़े नेताओं ने गुरजीत सिंह से दूरी भी बनाई और गुरजीत सिंह को लो-प्रोफाइल रहने को भी कहा गया । डिस्ट्रिक्ट 3070 में हाल-फिलहाल के वर्षों में गुरजीत सिंह की राजनीति चल तो रही है, लेकिन उनका ज्यादा असर अमृतसर के क्लब्स पर ही देखने को मिलता है । गुरजीत सिंह ने डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में जालंधर और लुधियाना के गवर्नर्स को जिस तरह अलग-थलग किया हुआ है, उसके कारण जालंधर और लुधियाना में गुरजीत सिंह का ज्यादा प्रभाव नहीं है । ऐसे में, भरत पांड्या को मिल सकने वाला समर्थन अमृतसर तक ही सिमट गया और बाकी क्षेत्रों में अशोक गुप्ता के लिए अच्छा मौका बना ।
गुरजीत सिंह के समर्थन का उल्टा असर होता देख - और डिस्ट्रिक्ट 3070 में भरत पांड्या के समर्थन-आधार को अशोक गुप्ता की तरफ जाता देख कर भरत पांड्या के रणनीतिकारों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट बरजेश सिंघल पर दबाव बनाया और उन्हें भरत पांड्या के लिए वोट जुटाने के काम पर लगाया है । बरजेश सिंघल का अभी लोगों के बीच ऐसा कोई असर तो है नहीं कि उनके कहने से लोग भरत पांड्या को वोट देने को तैयार हो जाएँ - इसलिए बरजेश सिंघल ने असिस्टेंट गवर्नर्स के पदों की सौदेबाजी के जरिए वोट खरीदने की योजना बनाई । डिस्ट्रिक्ट के लोगों से ही आरोप सुने गए हैं कि बरजेश सिंघल ने छोटे शहरों व क्षेत्रों के क्लब्स के वोट जुटाने के लिए क्लब्स के प्रमुख लोगों को असिस्टेंट गवर्नर्स व अन्य प्रमुख पदों का ऑफर दिया है, और उनसे क्लब के पासवर्ड माँग रहे हैं । इस तरह बरजेश सिंघल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की व्यवस्था को ही हाईजैक करने की कोशिश कर रहे हैं । बरजेश सिंघल की इस हरकत पर तीखी प्रतिक्रिया सुनने को मिली है और इसकी शिकायत रोटरी इंटरनेशनल में भी किए जाने की चर्चा सुनी गई है । बरजेश सिंघल के नजदीकियों व शुभचिंतकों की तरफ से यह सुनने को भी मिला है कि बरजेश सिंघल को अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालना है, और ऐसी स्थिति में उन्हें अपनी टीम के पदों की सौदेबाजी से बचना चाहिए - अन्यथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ निभा सकना उनके लिए मुश्किल होगा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की कुर्सी पर बैठने से पहले ही भारत पांड्या को वोट दिलवाने के चक्कर में बरजेश सिंघल डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ रोटरी इंटरनेशनल में भी अपने लिए जो विरोधी माहौल बना रहे हैं, उसे उनके नजदीकी और शुभचिंतक भी कोई शुभ लक्षण के रूप में नहीं देख रहे हैं ।

Saturday, December 23, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता के मुकाबले भरत पांड्या की स्थिति को कमजोर पाकर अशोक महाजन चुनावी मैदान में खुद उतरे और वोटिंग शिड्यूल में हुई घपलेबाजी का समर्थन करने के संकेत देने लगे

मुंबई । रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जोन 4 में कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में घोषित शिड्यूल से पहले वोटिंग लाइन खुल जाने से चुनावी व्यवस्था शक और आरोपों के घेरे में आ गई है । बीकानेर में आयोजित हुई रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3053 की कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए वोटिंग खुलने की और कई क्लब्स के वोट पड़ जाने की सूचना मिलने पर भरत पांड्या और उनके साथियों की तरफ से जिस तरह की खुशी देखने/सुनने को मिली, उससे लगा कि उन्हें ऐसा कुछ होने का भरोसा था और वह बस 'शुभसूचना' मिलने का इंतजार ही कर रहे थे । कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में 22 दिसंबर से वोटिंग लाइन खुलने को लेकर बात तो कही/सुनी जा रही थी, लेकिन उसे कन्फ्यूजन कहते/बताते हुए अनदेखा/अनसुना कर दिया गया था । दरअसल रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से प्रेसीडेंट्स को वोटिंग के संदर्भ में जो शिड्यूल मिला था, उसमें 22 दिसंबर से पासवर्ड मिलने और 30 दिसंबर से वोटिंग लाइन खुलने की बात कही गई थी । इसलिए मान लिया गया था कि कुछेक लोग गलतफहमी में 22 दिसंबर से ही वोटिंग लाइन खुलने की बात कर रहे हैं । पर अब जब कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में 22 दिसंबर को ही वोटिंग लाइन खुलने तथा वोट पड़ जाने की बात सामने आई है, तो लग रहा है कि शिड्यूल में गड़बड़ी करने की पहले से ही तैयारी थी । मजे की बात यह है कि वोटिंग शिड्यूल में हुई इस गड़बड़ी पर अशोक गुप्ता के समर्थकों की तरफ से तो आपत्ति व शिकायत हुई है, लेकिन भरत पांड्या की तरफ से कोई आपत्ति व शिकायत नहीं हुई है । भरत पांड्या की उम्मीदवारी के एक बड़े समर्थक पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन की तरफ से तो बल्कि यहाँ तक कहा/सुना गया है कि वोटिंग लाइन 30 की बजाए यदि 22 से खुल गई हैं, तो इसमें आपत्ति व शिकायत करने की भला क्या बात है ? इससे यह तो जाहिर हो ही रहा है कि वोटिंग शिड्यूल में गड़बड़ी सोची समझी योजना के साथ हुई और की गई है तथा इसके पीछे भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेता ही हैं ।
अशोक महाजन ने अभी हाल ही में पुणे में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट 3131 के फाउंडेशन सेमीनार में शामिल होने के नाम पर जिस तरह की सक्रियता दिखाई और कोल्हापुर में डिस्ट्रिक्ट 3170 के पूर्व गवर्नर मोहन मुल्हेरकर के घर डिनर के लिए जाते हुए डिस्ट्रिक्ट 3131 के पूर्व गवर्नर दीपक शिकारपुर को भी अपने साथ लेते गए - तो लोगों की निगाह में मोहन मुल्हेरकर के घर की वह रात सिर्फ डिनर के लिए ही नहीं थी और उस रात वहाँ सिर्फ डिनर ही नहीं खाया गया, बल्कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की राजनीति के लिए भी तिकड़में प्लान की गईं थीं । अशोक महाजन को पिछले कुछ दिनों में जोन 4 के वेस्टर्न हिस्से में पड़ने वाले डिस्ट्रिक्ट्स में तो सशरीर ही खासा सक्रिय देखा/पाया गया, और नॉर्दर्न हिस्से के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों को उनके फोन खूब मिले हैं । कुछेक लोगों ने बताया है कि अशोक महाजन ने रोटरी कैरियर का वास्ता देकर उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपना पक्ष तय करने का सुझाव दिया, तो कुछेक लोगों ने शिकायती स्वर में बताया कि अशोक महाजन ने उन्हें अशोक गुप्ता के समर्थकों व नजदीकियों के साथ रहने के लिए झिड़का । अशोक महाजन की बातों से लोगों को लगा कि उन्हें जैसे दूसरों की गतिविधियों की पूरी पूरी जानकारी है कि कौन किससे कब और कहाँ मिला है, और या मिलने का कार्यक्रम तय हुआ है । अशोक महाजन की सक्रियता देख/सुन कर लोगों को लगा है कि जैसे भरत पांड्या के चुनाव की कमान अब उन्होंने ही पूरी तरह संभाल ली है - और इस बात की परवाह करना छोड़ दिया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में खुली पक्षधरता दिखाने के लिए रोटरी में उनकी कितनी बदनामी होगी । अशोक महाजन के नजदीकियों का कहना है कि अशोक महाजन अभी तक तो पर्दे के पीछे रह कर भरत पांड्या की उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए काम कर रहे थे, लेकिन अभी जब उन्होंने भरत पांड्या की उम्मीदवारी की स्थिति को कमजोर पाया/देखा, तो उन्हें पर्दा हटा कर सामने आने के लिए मजबूर होना पड़ा है ।
भरत पांड्या की उम्मीदवारी के रणनीतिकारों ने जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स में अपने समर्थक तो खूब बनाए/तैयार किए थे, लेकिन देखा/पाया गया कि उन समर्थकों ने किया कुछ नहीं । भरत पांड्या और उनके साथियों को विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के जिन पूर्व गवर्नर्स से समर्थन और सहयोग मिलने की उम्मीद थी, उन्हें मौका आने पर जब चुप होते और पीछे हटते हुए देखा/पाया गया - तब भरत पांड्या और उनके साथियों को अपनी नाव पूरी तरह डूबती हुई लगी । अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों की सक्रियता ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में जो हवा बनाई, उसके चलते भरत पांड्या की उम्मीदवारी के लिए संकट और बढ़ा । यह नजारा देख अशोक महाजन को खुद मैदान में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भरत पांड्या को चुनाव जितवाना अशोक महाजन को अपनी राजनीति के लिए बहुत ही जरूरी लग रहा है । दरअसल हाल के वर्षों में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की अशोक महाजन की कोशिशें जिस तरह फेल हुई हैं, उससे उनका राजनीतिक आभामंडल कमजोर हुआ है । उनके ही डिस्ट्रिक्ट के गुलाम वहनवती के रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बनने से अशोक महाजन को दोहरी चोट पड़ी है । ट्रस्टी बनने के बाद से गुलाम वहनवती का कद अपने डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी जिस तरह से बढ़ा है, उसे देखते/पहचानते हुए अशोक महाजन को अपने कद की चिंता करने के लिए मजबूर होना पड़ा है । गुलाम वहनवती के बढ़े कद के सामने अपने कद को बचाने के लिए अशोक महाजन को भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनवाना/चुनवाना जरूरी लग रहा है । मजे की बात यह है कि अशोक महाजन को यह भी लग रहा है कि उनका कद घटाने के लिए ही गुलाम वहनवती ने भरत पांड्या की उम्मीदवारी का विरोध किया हुआ है । भरत पांड्या की उम्मीदवारी अशोक महाजन और गुलाम वहनवती के बीच की होड़ में जिस तरह से फँस गई है, उससे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी को और बढ़त मिली है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के घोषित शिड्यूल से पहले वोटिंग लाइन खुलने के पीछे अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी की इसी बढ़त को रोकने की - भरत पांड्या समर्थकों की चाल को देखा/पहचाना जा रहा है । भरत पांड्या के समर्थकों को इस तरह की चालबाजी पर उतरता देख इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनकी हालत पतली होने के संकेत ही पुख्ता हुए हैं ।

Saturday, December 16, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शशि शर्मा के प्री-पेट्स कार्यक्रम को इस्तेमाल करने की भरत पांड्या और उनके समर्थकों की योजना गुलाम वहनवती व विजय जालान से मिले धोखे तथा अशोक गुप्ता की निगरानी-व्यवस्था के चलते फेल हुई

मुंबई/जयपुर । भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में राजनीतिक फायदा उठाने के उद्देश्य से अपने डिस्ट्रिक्ट की प्री-पेट्स जयपुर में करवा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शशि शर्मा के लिए तो दोहरी मुसीबत खड़ी कर ही दी - साथ ही वह राजनीतिक फायदा भी नहीं उठा सके, जिसके लिए उन्होंने यह तिकड़म की थी । भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने अपनी तिकड़म के असफल हो जाने के लिए गुलाम वहनवती और विजय जालान को जिम्मेदार ठहराया है । उधर प्री-पेट्स जयपुर में करने को लेकर शशि शर्मा से एक तरफ तो प्रेसीडेंट्स इलेक्ट्स तथा प्री-पेट्स के अन्य आमंत्रित जयपुर की सर्दी में फँसा देने के लिए नाराज हैं, और दूसरी तरफ रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेता प्री-पेट्स जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम को राजनीति का जरिया बना देने को लेकर खिलाफ हुए हैं । प्री-पेट्स में शामिल होने के लिए मुंबई से जयपुर पहुँचे डिस्ट्रिक्ट 3141 के रोटेरियंस का जयपुर की सर्दी ने जिस तरह 'स्वागत' किया, उससे कई रोटेरियंस के जयपुर घूमने के प्रोग्राम चौपट हो गए - और तब उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शशि शर्मा को जयपुर में प्री-पेट्स का आयोजन करने के लिए कोसा । लोगों के लिए यह समझना मुश्किल रहा कि जब सभी को यह पता है कि मध्य दिसंबर में जयपुर में कड़ाके की ठंड पड़ रही होती है, तब प्री-पेट्स का आयोजन यहाँ करने की क्या जरूरत थी ? लोगों का कहना है कि यदि किसी ठंडी जगह पर ही कार्यक्रम करना था तब फिर किसी पर्वतीय स्थान को चुनना चाहिए था ! उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट के प्री-पेट्स कार्यक्रम प्रायः महाराष्ट्र के दर्शनीय और या पर्वतीय शहरों में होते रहे हैं । पिछले रोटरी वर्ष में यह महाराष्ट्र के पर्वतीय शहर महाबालेश्वर में हुआ था । इसलिए आम रोटेरियंस के लिए जयपुर में प्री-पेट्स आयोजित करने का कारण समझना मुश्किल रहा । रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3141 के खास लोगों के लिए हालाँकि इसके पीछे की राजनीतिक चालबाजी पूरी तरह स्पष्ट थी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शशि शर्मा के प्री-पेट्स के आयोजन के जरिए दरअसल भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई के संदर्भ में प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार अशोक गुप्ता के गढ़ और घर पर धावा बोला है ।
भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं की इस हरकत पर रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेताओं और जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई है । बड़े नेताओं ने हालाँकि सार्वजनिक रूप से कुछ कहा तो नहीं है, लेकिन कुछेक लोगों के साथ निजी बातचीत में इस बात पर नाराजगी दिखाई है कि भरत पांड्या और उनके समर्थक अशोक गुप्ता के कहीं के भी कार्यक्रमों में शामिल होने पर आपत्ति व शिकायत करते रहते हैं, लेकिन खुद कार्यक्रम करने के नाम पर अशोक गुप्ता के 'घर' में ही आ पहुँचे हैं । मजे की बात यह रही कि जयपुर में हो रहे अपने कार्यक्रम में सौजन्यतावश भी जयपुर में रह रहे किसी (पूर्व) गवर्नर्स को - एक अकेले अनिल अग्रवाल को छोड़ कर - आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि ऐसा करना रोटरी में आम प्रथा है । अगले रोटरी वर्ष में शशि शर्मा के साथ गवर्नर होने वाले नीरज सोगानी तक को शशि शर्मा ने 'अपने' कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया । अनिल अग्रवाल को चूँकि रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3054 की राजनीति और व्यवस्था में अशोक गुप्ता के खिलाफ देखा/पहचाना जाता है, इसलिए उनसे फायदा उठाने की नीयत से उन्हें भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं की तरफ से डिस्ट्रिक्ट 3141 के जयपुर में हो रहे प्री-पेट्स कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया और अनिल अग्रवाल कार्यक्रम में कुछ समय के लिए देखे भी गए - इस बात ने डिस्ट्रिक्ट 3141 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शशि शर्मा के प्री-पेट्स कार्यक्रम को जयपुर में करने के पीछे छिपे राजनीतिक एजेंडा को और स्पष्ट कर दिया ।
भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं के लिए हालाँकि बदकिस्मती की बात यह रही कि स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा रखने और उस पर अमल करने की तैयारी के बावजूद उनके हाथ कुछ लगा नहीं - और उन्हें खाली हाथ लौटने के लिए ही मजबूर होना पड़ रह है । भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने इस असफलता का ठीकरा गुलाम वहनवती और विजय जालान के सिर यह कहते/बताते हुए फोड़ा है कि ऐन मौके पर इन दोनों के धोखा देने के कारण पूरी योजना फेल हो गई । भरत पांड्या और उनके समर्थकों को दरअसल यह देख कर तगड़ा झटका लगा कि ऐन मौके पर रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों की नाराजगी का वास्ता देकर गुलाम वहनवती और विजय जालान ने भरत पांड्या और उनके समर्थकों की राजनीति करने से बचने की ही कोशिश की । उल्लेखनीय है कि भरत पांड्या और उनके समर्थकों की कोशिश और तैयारी थी कि रोटरी में बड़े मुकाम पर पहुँचे इन पदाधिकारियों से वह जयपुर के कुछेक आम और खास रोटेरियंस को मिलवाएँ और जो उन्हें भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थन के लिए प्रेरित करें; लेकिन भरत पांड्या के नजदीकियों के अनुसार ही, इन दोनों ने यह कहते हुए इस खेल में शामिल होने से इंकार कर दिया कि रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत होने पर उनके लिए शर्मिंदगी की स्थिति बनेगी - इनका यह भी कहना रहा कि रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों ने जयपुर में हो रही प्री-पेट्स को अपनी निगरानी में लिया हुआ है और ऐसे में यहाँ कोई राजनीति करना अपने को मुसीबत में डालना हो सकता है । इसके अलावा, अशोक गुप्ता के समर्थकों ने भी भरत पांड्या और उनके समर्थकों की चालबाजी को फेल करने की पूरी तैयारी की हुई थी, और उनकी निगाह बराबर यह देखने पर थी कि जयपुर का कौन रोटेरियन भरत पांड्या और या उनके लोगों से मिलता है । इस कारण अनिल अग्रवाल के लिए भी कुछ कर पाना संभव नहीं हो सका और वह जयपुर में भरत पांड्या और उनके समर्थकों के मददगार की भूमिका नहीं निभा सके ।   
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार अशोक गुप्ता के गढ़ और घर - जयपुर में अपने डिस्ट्रिक्ट की प्री-पेट्स करने की योजना बनाने और योजना के क्रियान्वयन में फेल हो जाने के लिए भरत पांड्या और उनके समर्थकों की खासी किरकिरी हुई है । राजनीति करने और समझने वाले लोगों का कहना है कि वास्तव में यह योजना ही बेबकूफीभरी है और यह कुलमिलाकर भरत पांड्या और उनके समर्थकों की निराशा, हताशा और बौखलाहट को प्रकट करती है; तिस पर इसके बुरी तरह से फेल होने पर यह और साबित हो गया कि भरत पांड्या और उनके समर्थक कोई काम ढंग से कर ही नहीं सकते हैं । अशोक गुप्ता के समर्थकों और शुभचिंतकों ने अपने 'घर' पर हुए राजनीतिक हमले को जिस होशियारी के साथ फेल किया है, उसके बारे में सुन/जान कर जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों और नेताओं ने महसूस किया और जाना है कि अशोक गुप्ता के पास/साथ काम करने वाले प्रतिबद्ध लोगों की अच्छी टीम है । भरत पांड्या और उनके समर्थकों की योजना ने जिस तरह उनके अपने लोगों के बीच आरोपों/प्रत्यारोपों के साथ कलह और नाराजगी पैदा कर दी है और उनके जयपुर से खाली हाथ लौटने की स्थितियाँ बना दी हैं - वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में भरत पांड्या की उम्मीदवारी के लिए एक बड़े झटके की बात है ।

Wednesday, December 13, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में अशोक गुप्ता को बढ़त बनाते देख पैदा हुई राजा साबू की बौखलाहट ने अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में भरत पांड्या की उम्मीदवारी की कमजोर स्थिति की पोल खोलने का काम और कर दिया है

चंडीगढ़ । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में अशोक गुप्ता के मुकाबले भरत पांड्या को पिछड़ता देख बौखलाए राजा साबू ने कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में अपनी बौखलाहट को प्रदर्शित किया । कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में राजा साबू ने अपनी बौखलाहट में निशाना बनाया मोहिंदर पॉल गुप्ता को, जो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी की डिस्ट्रिक्ट टीम में कई एक कमेटियों में या तो चेयरमैन हैं और या सदस्य हैं । राजा साबू का कहना रहा कि मोहिंदर पॉल गुप्ता डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता को वोट देने के लिए तैयार कर रहे हैं, इसलिए मोहिंदर पॉल गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट टीम की सभी कमेटियों से हटा देना चाहिए । रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के वरिष्ठ पूर्व अध्यक्ष मोहिंदर पॉल गुप्ता ने पिछले कुछ समय से डिस्ट्रिक्ट में रोटरी के पैसों में हिसाब/किताब में पारदर्शिता तथा ईमानदारी लाने/बरतने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है, और निरंतरता के साथ कई ऐसे ऐसे तथ्य उद्घाटित किये हैं, जिनसे पता चला है कि राजा साबू और उनके करीबी पूर्व गवर्नर्स ने किस किस तरीके की 'बेईमानियों' से विभिन्न ग्रांट्स को इधर से उधर करके मोटी मोटी रकमें जुटा लीं, और उनसे सेवा के नाम पर अपनी राजनीति तथा अपने मौज-मजे के लिए मौके बनाए है । इसलिए मोहिंदर पॉल गुप्ता को लेकर राजा साबू का गुस्सा सातवें आसमान पर हैं, पर अपने गुस्से में राजा साबू इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को बीच में ले आयेंगे - यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी । ऐसे में लोगों को लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अधिकृत उम्मीदवार होने के बावजूद भरत पांड्या की कमजोर होती/पड़ती स्थिति और उनके लिए कुछ कर न पाने की अपनी विवशता को देख कर राजा साबू इस हद तक बौखला गए हैं कि इसके लिए भी उन्होंने मोहिंदर पॉल गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा दिया है ।
कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर राजा साबू द्वारा दिखाई गई बौखलाहट से कुछेक लोगों ने हालाँकि यह नतीजा भी निकाला है कि मोहिंदर पॉल गुप्ता के बहाने राजा साबू ने वास्तव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी जितेंद्र ढींगरा को 'चेतावनी' दी है । इन दोनों को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है । ऐसे में माना/समझा जा रहा है कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव का जिक्र करके मोहिंदर पॉल गुप्ता को अशोक गुप्ता का समर्थक बताते हुए उन्हें कमेटियों से हटाने की माँग के जरिये राजा साबू ने वास्तव में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा को खबरदार करने की कोशिश की है । मजे की बात यह हुई है कि अपनी इस कोशिश के जरिये राजा साबू ने वास्तव में इनकी और अशोक गुप्ता की मदद ही कर दी है । दरअसल टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा और मोहिंदर पॉल गुप्ता ने अभी तक इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था । टीके रूबी जिस तरह से घिरे हुए हैं, उसके चलते वह अपनी गवर्नरी संभल-संभल कर ही करने में लगे हैं; जितेंद्र ढींगरा इन दिनों अपने काम में व्यस्त है और मोहिंदर पॉल गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी खेल में 'बाहर' के व्यक्ति हैं (राजा साबू ने लेकिन अपनी बौखलाहट में उन्हें 'अंदर' का व्यक्ति बना दिया है) - इस कारण यह लोग अभी तक इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के अभियान से दूर ही थे; लेकिन राजा साबू ने इनका काम आसान करते हुए खुद ही लोगों को बता दिया है कि यह लोग इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता के साथ हैं, और चाहते हैं कि इनके डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स अशोक गुप्ता को वोट दें । 
कई लोगों को हैरानी हो सकती है और उनके लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि राजा साबू इतनी बड़ी राजनीतिक बेबकूफी कैसे कर सकते हैं कि अपने विरोधियों का काम भी वह खुद ही कर दें ? लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों की उनके डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों को देखें/समझें तो पायेंगे कि राजनीतिक बेबकूफियाँ करने में राजा साबू बड़े 'एक्सपर्ट' हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपने खुले और सक्रिय समर्थन के बावजूद टीके रूबी के मुकाबले डीसी बंसल को 'जीत' नहीं दिलवा सके, यह तो उनकी राजनीतिक कमजोरी का सुबूत है - लेकिन टीके रूबी का इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होना राजा साबू की राजनीतिक बेबकूफी का प्रचंड सुबूत और उदाहरण है । वास्तव में राजा साबू के लिए फजीहत की बात ही यह हुई है कि उन्होंने अपनी सारी ताकत, अपनी सारी पहचान, अपनी सारी प्रतिष्ठा को सिर्फ इसलिए दाँव पर लगा दिया कि कहीं टीके रूबी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर न बन जाएँ - लेकिन अंत में बेबकूफी करते हुए प्रवीन गोयल को पहले तो वर्ष 2017-18 की गवर्नरी सँभलवाने की और फिर हटवाने की ऐसी कोशिश की कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद टीके रूबी की गोद में खुद-ब-खुद आ गिरा । पिछले ढाई-तीन वर्षों की लड़ाई में राजा साबू ने अपनी हरकतों से अपने कई नए 'दुश्मन' बनाए, जिनमें से एक मोहिंदर पॉल गुप्ता की सक्रियता राजा साबू और उनके संगी-साथी गवर्नर्स की बेईमानियों की पोल खोलने का वाहक बनी । टीके रूबी को गवर्नर न बनने देने की जिद ने राजा साबू की सारी पहचान और प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया है - और आज राजा साबू राजनीतिक व आर्थिक बेईमानी के 'प्रतीक-पुरुष' बन गए हैं । बड़े पदों पर रहे लोगों के पतन की कीचड़ में लिथड़ने के किस्से यूँ तो बहुत हैं, लेकिन रोटरी में एक अकेले राजा साबू ने ही यह पतन-गाथा लिखी है । जिन लोगों ने रोटरी में राजा साबू का 'भव्य-काल' देखा है, उन लोगों के लिए राजा साबू को पतन की कीचड़ में लिथड़ते देखना सचमुच निराशाजनक और शर्मिंदगी भरा है ।
राजा साबू के पतन की यही स्थिति इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भरत पांड्या के लिए मुसीबत बन गई है । कहने/होने को तो भरत पांड्या की उम्मीदवारी के सबसे बड़े समर्थक राजा साबू हैं, लेकिन राजा साबू के ही डिस्ट्रिक्ट में भरत पांड्या की स्थिति सबसे खराब है - सबसे खराब इसलिए क्योंकि यही एक डिस्ट्रिक्ट है, जहाँ भरत पांड्या के वोट अपने समर्थक नेताओं के कारण बढ़ने की बजाए घटेंगे । डिस्ट्रिक्ट में तमाम लोगों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वह किसी भी उम्मीदवार को नहीं जानते हैं, लेकिन वह उस उम्मीदवार को तो हरगिज वोट नहीं देंगे जिसका समर्थन राजा साबू और उनके साथी पूर्व गवर्नर्स कर रहे होंगे । यह स्थिति भरत पांड्या के लिए मुसीबत बनी है । राजा साबू ने अपने रवैये से अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अशोक गुप्ता के लिए सहानुभूति और समर्थन पैदा करने का ही काम किया है । कुछ समय पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी ने इंटरसिटी सेमीनार में अशोक गुप्ता को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था; अशोक गुप्ता द्वारा आमंत्रण स्वीकार कर लेने के बाद उनके नाम और फोटो के साथ निमंत्रण पत्र भी छप/बँट गए थे - लेकिन राजा साबू और उनके साथी पूर्व गवर्नर्स ने आपत्ति व शिकायत करके अशोक गुप्ता का उक्त सेमीनार में आना स्थगित करवा दिया था । इसका असर लेकिन यह हुआ कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अशोक गुप्ता के प्रति सहानुभूति और समर्थन पैदा हुआ, और राजा साबू और उनके साथी पूर्व गवर्नर्स का दाँव उल्टा पड़ा । अभी जब कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में राजा साबू ने अशोक गुप्ता का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए मोहिंदर पॉल गुप्ता को कमेटियों से हटाने की बात कही, तब फिर लोगों की तरफ से यही प्रतिक्रिया देखने/सुनने को मिली है । जिन लोगों को अभी तक इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर कोई जानकारी नहीं थी और जिन्होंने अभी तक अपनी कोई भूमिका तय नहीं की थी, राजा साबू की हरकत के चलते उनके सामने भी सारा नजारा स्पष्ट हो गया है, और लोगों के सामने राजा साबू तथा उनके संगी-साथी गवर्नर्स का राजनीतिक छोटापन एक बार फिर जाहिर हो गया है ।
भरत पांड्या और उनके नजदीकियों के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उनके सबसे बड़े समर्थक राजा साबू की अपने ही डिस्ट्रिक्ट में जो फजीहत हुई है, जिसके चलते रोटरी की व्यवस्था और राजनीति में राजा साबू पतन की ओर बढ़े हैं - उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आसपास के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी राजा साबू की 'अपील' न सिर्फ कमजोर पड़ी है, बल्कि राजा साबू के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले नेताओं ने बचना/छिपना शुरू कर दिया है । इसका नतीजा यह है कि अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में भरत पांड्या की उम्मीदवारी के लिए कैम्पेन चलाने और चुनाव की व्यवस्था देखने/सँभालने के लिए व्यक्तियों का टोटा तक पड़ गया है ।

Wednesday, December 6, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम के नाम पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में बढ़त बनाने की भरत पांड्या की योजना को पड़ी दोतरफा चोट ने अशोक गुप्ता के मुकाबले उनकी स्थिति को डाँवाडोल बनाया

मुंबई । कुआलालुम्पुर में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में प्रतिनिधियों के रहने की जगह को लेकर तथा अगले रोटरी वर्ष में चेन्नई में आयोजित होने वाले इंस्टीट्यूट की आयोजन समिति के लिए पदाधिकारियों के चयन को लेकर उत्तर व पश्चिम भारत के रोटेरियंस के साथ जो भेदभाव हुआ है, वह जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में मुद्दा बन रहा है - और इस मुद्दे ने भरत पांड्या और उनके साथियों को लोगों के निशाने पर ला दिया है । रोमांचक बात यह है कि इस मुद्दे पर जो बबाल पैदा हुआ है, उसमें भरत पांड्या और उनके साथी दोनों तरफ से - लीडरशिप की तरफ से भी और लोगों की तरफ से भी - 'मार' खा रहे हैं । मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम ने अपना नाम इस्तेमाल करने और घसीटे जाने के लिए भरत पांड्या और उनके साथियों की 'खबर' भी ली । मजे की बात यह है कि यह स्थिति खुद भरत पांड्या और उनके साथियों ने ही बनाई है । दरअसल, कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए समर्थन जुटाने वास्ते जो खेल खेला, वह उन्हें उल्टा पड़ गया है - जिसकी भरपाई करना उनके लिए खासा मुश्किल हो उठा है । कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके साथियों ने जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के महत्त्वपूर्व पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने के लिए योजना तो बहुत अच्छी बनाई थी, लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि उनकी योजना उन्हीं के गले पड़ गई है । योजना के अनुसार, भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने के लिए उन्हें यह आभास और अहसास कराने का प्रयास किया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं, और इसके लिए वह उनके कहने से रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पदों का बँटवारा करने के लिए भी तैयार हैं । उनके इन प्रयासों की भनक जब इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम को लगी, तब बासकर चॉकलिंगम ने उनसे अपना नाम घसीटे जाने पर गंभीर नाराजगी दिखाई ।
कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके साथियों ने लोगों के साथ एक नाटक खेला - जिसके तहत भरत पांड्या के कुछेक साथी जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने तथा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व गवर्नर्स को घेरघार कर भरत पांड्या से मिलवाने ले जाते, जहाँ भरत पांड्या उनसे बासकर चॉकलिंगम तथा अन्य बड़े पदाधिकारियों से अपनी निकटता का बखान करते हुए पूछते कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप में उन्हें जो कोई भी पद चाहिए, वह बताएँ - बासकर चॉकलिंगम से कह कर वह उनसे उन्हें पद दिलवा देंगे । इस तरह भरत पांड्या की तरफ से कोशिश की गई कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पद 'लेकर' विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के नेता अपने अपने डिस्ट्रिक्ट्स में उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में वोट दिलवाएँ । भरत पांड्या और उनके साथियों को इस बात का शायद जरा भी अंदाजा नहीं था कि वोट के लिए वह जब जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स को बासकर चॉकलिंगम से पद दिलवाने की बात कर रहे थे, तब जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स बासकर चॉकलिंगम की एक पक्षपातपूर्ण कार्रवाई से जूझ रहे थे । दरअसल कुआलालुम्पुर इंस्टीट्यूट में पहुँचे जोन 4 के कई पूर्व गवर्नर्स यह देख कर परेशान हो रहे थे कि उनके ठहरने के लिए मुख्य होटल की बजाए दूसरे होटल में व्यवस्था की गई थी । लोगों का ध्यान गया कि दक्षिण भारत के प्रतिनिधियों को तो मुख्य होटल में ही ठहराया गया, जबकि उत्तर व पश्चिम भारत के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों को दूसरे होटल में जगह दी गई । सभी लोग मुख्य होटल में ही जगह चाहते थे । यह ठीक है कि मुख्य होटल में कमरों की सीमित उपलब्धता के कारण सभी को उसमें जगह नहीं मिल सकती थी - लेकिन जगह देने में दक्षिण और उत्तर का जो भेदभाव 'दिखा' उसने लोगों को भड़का दिया । जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के जिन लोगों को भरत पांड्या, बासकर चॉकलिंगम से निकटता का वास्ता देकर रोटरी रिसोर्स ग्रुप में पद दिलवा रहे थे, उन लोगों ने भरत पांड्या से अनुरोध किया कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पद/वद तो बाद में देखेंगे, पहले तो बासकर चॉकलिंगम से कह कर मुख्य होटल में कमरा दिलवाओ ।
जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स की इस माँग पर भरत पांड्या फँस गए । उनकी फँसावट को लोगों ने यह कह कर और बढ़ाया कि आप तो कहते/बताते हो कि बासकर चॉकलिंगम आपके बहुत नजदीक हैं और समर्थक हैं और कुआलालुम्पुर की व्यवस्था में आपकी भी भूमिका है - और फिर भी आप इतना सा काम भी नहीं करवा सकते हैं । इसी बहसबाजी में कई एक लोगों ने जयपुर और दुबई इंस्टीट्यूट की व्यवस्था को याद किया और कहा/दोहराया कि जयपुर में तो अशोक गुप्ता की ही पूरी व्यवस्था थी, जबकि दुबई इंस्टीट्यूट की व्यवस्था में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी - और दोनों ही जगह उन्होंने किसी भी आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया और किसी को भी जरा भी परेशान नहीं होने दिया था । जयपुर और दुबई इंस्टीट्यूट और उसमें अशोक गुप्ता की भूमिका की तारीफें सुनकर भरत पांड्या और उनके समर्थकों को समझ में आ गया कि उनका दाँव उल्टा पड़ गया है, और उनकी होशियारी ने उन्हें ही लपेटे में ले लिया है । भरत पांड्या के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत की बात तब हुई, जब इस मामले की जानकारी बासकर चॉकलिंगम को हुई । उनकी तरफ से इस बात पर गहरी नाराजगी जाहिर की गई कि भरत पांड्या और उनके साथी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनका नाम क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं ? बासकर चॉकलिंगम ने यह बात कई लोगों के सामने जिस तरह से कही, उससे भरत पांड्या और उनके साथियों को तगड़ा झटका लगा । बासकर चॉकलिंगम ने इस झटके की तीव्रता को बढ़ाते हुए एक काम यह और कर डाला कि अगले रोटरी वर्ष में चेन्नई में होने वाले इंस्टीट्यूट के लिए जो टीम घोषित की, उसमें अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के तथा उनके नजदीकी को भी महत्त्वपूर्ण भूमिका दे दी । बासकर चॉकलिंगम के तेवर को देखते हुए भरत पांड्या और उनके समर्थकों की चेन्नई इंस्टीट्यूट की मैनेजिंग कमेटी में पद दिलवाने का वायदा करके समर्थन जुटाने की योजना ने भी दम तोड़ दिया । बासकर चॉकलिंगम के नाम पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में बढ़त बनाने की भरत पांड्या की योजना को जो दोतरफा चोट पड़ी है, उसने अशोक गुप्ता के मुकाबले उनकी स्थिति को फिलहाल डाँवाडोल तो बना ही दिया है ।

Monday, December 4, 2017

रोटरी इंटरनेशनल में गुलाम वहनवती और विजय जालान की बढ़ी हैसियत के कारण भरत पांड्या की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है, जिसके चलते उनके लिए चैलेंजिंग उम्मीदवार अशोक गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती और बड़ी तथा संकटपूर्ण हो गई है

मुंबई । कुआलालुम्पुर में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में अन्य बातों के साथ-साथ जोन 4 में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर जिस तरह की बातें और सक्रियता सुनने/देखने को मिली हैं, उसने भरत पांड्या के लिए मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है । भरत पांड्या के नजदीकियों और शुभचिंतकों को यह देख कर खासी हैरानी हुई कि विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के जिन प्रमुख लोगों को भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है, वह कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या को अधिकृत उम्मीदवार चुनने के लिए नोमीनेटिंग कमेटी में अपनाई गई प्रक्रिया की आलोचना कर रहे थे, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उपयुक्तता तथा उपयोगिता के लिहाज से अशोक गुप्ता को भरत पांड्या से बेहतर आँक रहे थे । भरत पांड्या के ही एक नजदीकी का कहना रहा कि कुआलालुम्पुर में चूँकि सभी लोग एक-दूसरे की नज़रों के सामने थे और यह देख/जान सकते थे कि कौन क्या कर रहा है, इसलिए यह बात सामने आई कि सीधे होने वाले चुनाव में भरत पांड्या के लिए मुकाबला आसान नहीं होगा - और उनके लिए सबसे पहली जरूरत तो अपने समर्थकों को ही राजनीतिक रूप से ट्रेंड करने और राजनीतिक रूप से ईमानदार 'बनाने' की जरूरत है । कुआलालुम्पुर जैसा नजारा ही यदि बना रहा, जहाँ कि दूसरे लोगों के साथ-साथ भरत पांड्या के समर्थक और शुभचिंतक भी भरत पांड्या की बजाए अशोक गुप्ता के रोटरी जीवन की तथा उनके कामों का बखान करते देखे/सुने गए - तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में भरत पांड्या के लिए वास्तव में मुसीबत की बात होगी । 
भरत पांड्या के समर्थकों का कहना है कि हाल ही के दिनों में गुलाम वहनवती की रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद पर तथा विजय जालान की रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर जो नियुक्तियाँ हुईं हैं, उसने जोन के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह उलट-पलट दिया है - और इस स्थिति ने भरत पांड्या के लिए दो तरफा संकट पैदा किया है । इन नियुक्तियों ने एक तरफ तो ऐसे कई लोगों को नाराज किया है, जो इन पदों के दावेदार थे और भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखे पहचाने जाते हैं, और दूसरी तरफ उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में उनके विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले गुलाम वहनवती और विजय जालान का रोटरी में 'कद' बढ़ा । पहली वाली स्थिति को समझने के लिए एक उदाहरण देना काफी होगा - डिस्ट्रिक्ट 3080 में यशपाल दास रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद के लिए तथा मधुकर मल्होत्रा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद के लिए उम्मीदवार थे, और यह दोनों भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं; लेकिन यह दोनों ही जिस तरह से भरत पांड्या के डिस्ट्रिक्ट के गुलाम वहनवती और विजय जालान से 'हार' गए, उसके कारण अब यह भरत पांड्या की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं । जोन 4 के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी इसी तरह के नज़ारे हैं । सिर्फ यही नहीं, रोटरी के बड़े नेताओं पर भी इन नियुक्तियों का बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ा है । इसका एक दिलचस्प उदाहरण पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता हैं । शेखर मेहता खुद फाउंडेशन ट्रस्टी पद के उम्मीदवार थे, पर पद पाने में असफल रहे; उसके बाद उन्होंने अपने डिस्ट्रिक्ट के देवाशीष मित्रा को रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर का पद दिलवाने का प्रयास किया, लेकिन उसमें भी वह असफल रहे - अपनी इन दोहरी असफलतताओं से पैदा हुई नाराजगी का ठीकरा वह भरत पांड्या की उम्मीदवारी पर फोड़ते नजर आ रहे हैं ।
रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद पर गुलाम वहनवती तथा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर विजय जालान की नियुक्ति ने जिन जिन लोगों को नाराज किया है, वह सब अपनी अपनी नाराजगी भरत पांड्या की उम्मीदवारी के साथ दिखाने में लग गए हैं - और इस नज़ारे में भरत पांड्या के समर्थकों व विरोधियों का फर्क मिट सा गया है । भरत पांड्या पर दोहरी चोट यह पड़ी है कि रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद और रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद मिलने से उनके विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले गुलाम वहनवती और विजय जालान काफी मजबूत हो गए हैं, और इनकी मजबूती भरत पांड्या के लिए सिर दर्द बन गई है । उल्लेखनीय है कि गुलाम वहनवती ने तो एक ही डिस्ट्रिक्ट में होने के बावजूद भरत पांड्या के साथ ही इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, और नोमीनेटिंग कमेटी में वह थोड़े से अंतर से ही भरत पांड्या से पिछड़े थे । उम्मीद की जा रही थी कि वह चेलैंज करेंगे और यदि वह अपने चेलैंज को मान्य नहीं करवा सके, तो चैलेंजिंग उम्मीदवार की मदद तो जरूर ही करेंगे । इस 'उम्मीद' को देखते/समझते हुए भरत पांड्या ने गुलाम वहनवती को कंट्रोल में करने की व्यवस्था हालाँकि कर ली थी - किंतु उनकी बदकिस्मती रही कि गुलाम वहनवती ट्रस्टी बन गए । गुलाम वहनवती यदि सिर्फ एक पूर्व गवर्नर ही रहते तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में कोई खास भूमिका नहीं निभा पाते, लेकिन ट्रस्टी बनने से रोटरी में उनका कद खासा बड़ा हो गया है और अब वह बड़ी भूमिका निभा सकने की हैसियत में हो गए हैं । भरत पांड्या के ही नजदीकियों को लगता है कि जोन के डिस्ट्रिक्ट्स में हर कोई जानता है कि गुलाम वहनवती का भरत पांड्या के साथ विरोध का संबंध है; रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी होने के बाद गुलाम वहनवती को हर कोई खुश करने की कोशिश भी करेगा - और इस कोशिश में वह गुलाम वहनवती के कुछ कहे बिना ही भरत पांड्या के खिलाफ रहेगा और काम करेगा । इस तरह गुलाम वहनवती के ट्रस्टी बनने से भरत पांड्या के लिए बैठे-बिठाए मुसीबत गले आ पड़ी है ।
इसी तरह का मामला विजय जालान के मामले में भी हुआ है । विजय जालान जब तक सिर्फ पूर्व गवर्नर थे, तब तक वह भरत पांड्या के लिए कोई समस्या नहीं थे - और इसीलिए भरत पांड्या ने भी उनके विरोध की  परवाह नहीं की हुई थी । विजय जालान के विरोध का कारण दरअसल यह रहा है कि विजय जालान को भी अगली बार इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना है । वह जान/समझ रहे हैं कि यह तभी संभव होगा जब कि भरत पांड्या इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर न बनें; भरत पांड्या यदि इस बार बनेंगे, तो अगली बार विजय जालान के लिए तो मौका ख़त्म ही हो जायेगा । अपना मौका बनाए रखने के लिए विजय जालान के लिए जरूरी है कि वह किसी भी तरह भरत पांड्या को इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकें । विजय जालान जब तक सिर्फ पूर्व गवर्नर थे, तब तक इस संबंध में कुछ कर सकना उनके लिए मुश्किल था; किंतु अब रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर बनने के बाद उनकी रोटरी हैसियत में जो बड़ा उछाल आया है - उससे भरत पांड्या और उनके समर्थक सकते में हैं । भरत पांड्या और उनके समर्थक अभी तक विजय जालान को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन बदली परिस्थिति में उनके लिए अब विजय जालान को गंभीरता से लेने की जरूरत आ पड़ी है । गुलाम वहनवती और विजय जालान की बढ़ी रोटरी हैसियत के कारण भरत पांड्या की उम्मीदवारी के सामने जो दोतरफा गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है, उसके परिणामस्वरूप भरत पांड्या के लिए अपने डिस्ट्रिक्ट और अपने क्षेत्र के डिस्ट्रिक्ट्स में ही अपने समर्थन-आधार को बचाए रखना मुश्किल हो गया है; और इस मुश्किल के चलते उनके लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चैलेंजिंग उम्मीदवार अशोक गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती और बड़ी तथा संकटपूर्ण हो गई है ।

Wednesday, November 29, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3141 के विजय जालान को रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर का पद मिलने से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भरत पांड्या की उम्मीदवारी पर संकट मँडराया, और अशोक गुप्ता के पक्ष में मनोवैज्ञानिक माहौल बना

मुंबई/जयपुर । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए प्रस्तुत किए गए चेलैंज को मान्य करवाने के लिए अशोक गुप्ता को अपने डिस्ट्रिक्ट में मिले जोरदार समर्थन, रंजन ढींगरा के चेलैंज के वापस होने तथा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर (आरआरएफसी) पद पर विजय जालान की नियुक्ति ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर भरत पांड्या के दावे पर गंभीर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का काम किया है - जिसके चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जो लड़ाई उन्हें अभी तक आसान लग रही थी, वह उनके लिए मुश्किलोंभरी हो गई लग रही है । विजय जालान के आरआरएफसी बनने पर भरत पांड्या तथा उनके समर्थकों को अपने ही लोगों से सुनने को मिल रहा है कि रोटरी में सभी पद क्या एक ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को मिलेंगे ? उल्लेखनीय है कि अभी पिछले दिनों ही गुलाम वहनवती की रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी पद पर नियुक्ति हुई है, और अब उनके ही डिस्ट्रिक्ट के विजय जालान आरआरएफसी नियुक्त हो गए हैं । भरत पांड्या भी इन्हीं के डिस्ट्रिक्ट के हैं । ऐसे में, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भूमिका निभाने वाले आम और खास रोटेरियंस के बीच यह सवाल उठने लगा है कि रोटरी में सभी बड़े और महत्त्वपूर्ण पद किसी एक ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को ही क्यों मिलने चाहिए ? यह सवाल भरत पांड्या के समर्थन-आधार को डिस्टर्ब करने के साथ घटाने का काम भी करता दिख रहा है । भरत पांड्या के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उनके डिस्ट्रिक्ट के 'जुड़वाँ भाई' जैसे डिस्ट्रिक्ट 3142 और उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में उनके जो विरोधी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में अभी तक नैतिक व मनोवैज्ञानिक कारणों से चुप लगाए बैठे थे, वह अचानक से मुखर होने लगे हैं और 'एक ही डिस्ट्रिक्ट में सभी पद क्यों' जैसे सवाल को हवा दे कर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में भरत पांड्या के सामने मुश्किलें खड़ी करने के अभियान में लग गए हैं ।
इसी के साथ-साथ भरत पांड्या और उनके चुनावी रणनीतिकारों को यह देख/जान कर तगड़ा झटका लगा है कि अशोक गुप्ता को अपने डिस्ट्रिक्ट में जोरदार समर्थन मिला है । भरत पांड्या और उनके नजदीकियों को हालाँकि यह विश्वास तो था ही कि अशोक गुप्ता के चेलैंज को अपने डिस्ट्रिक्ट में पर्याप्त समर्थन मिल जाएगा - लेकिन इतना जोरदार समर्थन मिलने की उन्हें उम्मीद नहीं थी । डिस्ट्रिक्ट के करीब 125 क्लब्स में से 110/112 क्लब्स की तरफ से अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में कॉन्करेंस मिली हैं । कॉन्करेंस देने के मामले में जो क्लब्स बचे रह गए हैं, वह भी इसलिए बचे रह गए क्योंकि उनमें से अधिकतर की कॉन्करेंस उचित समय पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में पहुँच नहीं सकी, और बाकी कुछ क्लब्स कॉन्करेंस को अधिकृत करवाने की प्रक्रिया को पूरा नहीं कर सके । इस स्थिति ने जता/दिखा दिया है कि डिस्ट्रिक्ट के मामलों में लोगों की राय और पक्ष भले ही अलग अलग रहते रहे हों, लेकिन अशोक गुप्ता की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के मामले में पूरा डिस्ट्रिक्ट उनके समर्थन में है । यह परिदृश्य भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के लिए चिंता का विषय इसलिए है, क्योंकि पहली बात तो यह कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अशोक गुप्ता को अपने डिस्ट्रिक्ट में इतना व्यापक समर्थन प्राप्त है, और दूसरी बात यह कि अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट में अशोक गुप्ता विरोधी जिन नेताओं पर वह भरोसा कर रहे थे - वह नेता निष्प्रभावी साबित हुए हैं और उनके भरोसे पर खरे नहीं उतरे हैं । इससे भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेता यह सोचने के लिए मजबूर हुए हैं कि वह कहीं अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार की पहुँच को कम आँकने की गलती तो नहीं कर रहे हैं, और अशोक गुप्ता के साथ निजी खुन्नस रखने वाले विरोधियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा तो नहीं कर रहे हैं ?
भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की रणनीति दरअसल नकारात्मक तिकड़मों पर ही आधारित रही है । अशोक गुप्ता को घेर लेने, उन्हें अपने ही डिस्ट्रिक्ट में 'कमजोर' करने/दिखाने तथा उनके समर्थन-आधार में विभाजन करने पर ही भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का जोर रहा है । इसके तहत अशोक गुप्ता पर रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पदाधिकारी के रूप में काम करने पर रोक लगा दी गई, जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट 3080 में आयोजित हुए इंटरसिटी सेमीनार में मुख्य अतिथि के रूप में मिले निमंत्रण को स्वीकार करने के बाद उन्हें वापस करने के लिए मजबूर होना पड़ा । अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट में कोशिश की गई कि उन्हें अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में ज्यादा कॉन्करेंस न मिल सकें; भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने यह तो मान लिया था कि अशोक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को मान्य करवाने के लिए जरूरी कॉन्करेंस तो जुटा ही लेंगे, लेकिन उनकी घेरेबंदी के जरिए कोशिश की गई थी कि उन्हें ज्यादा कॉन्करेंस न मिलें - ताकि जोन के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच यह प्रचारित किया जा सके कि अशोक गुप्ता को तो अपने ही डिस्ट्रिक्ट में समर्थन नहीं है, और उन्होंने तो बस जैसे-तैसे जरूरी कॉन्करेंस जुटाई हैं । अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में दर्ज हुईं 90 प्रतिशत से अधिक क्लब्स की कॉन्करेंस ने लेकिन भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की चाल को फेल कर दिया है । भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार में विभाजन करने के लिए रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के जरिए बड़ी चाल चली थी, लेकिन रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के वापस हो जाने से उनकी उस चाल ने बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया है ।
मजे की बात यह देखने में आई है कि अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ चली गईं नकारात्मक चालें स्वतः ही फेल होती गईं हैं; उन्हें फेल करने के लिए अशोक गुप्ता और या उनके समर्थक नेताओं को कुछ करना नहीं पड़ा है । अशोक गुप्ता और उनके समर्थकों पर गंभीर आरोप बल्कि यही है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को उन्हें जिस गंभीरता से लेना चाहिए, उतनी गंभीरता से वह ले नहीं रहे हैं - यदि ले रहे हैं, तो लेते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । संभवतः यह भरत पांड्या के समर्थक नेताओं के द्वारा की गई उनकी घेराबंदी का नतीजा भी हो । इसलिए अशोक गुप्ता और उनके समर्थकों द्वारा बिना कुछ किए ही भरत पांड्या के समर्थक नेताओं की चालबाजियों के फेल होने को किस्मत की बात के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि अशोक गुप्ता और उनके समर्थकों की तुलना में तो उनकी किस्मत ज्यादा तेज चल रही है । इससे लोगों को यह उम्मीद भी बँधी है कि इसे एक सकारात्मक संदेश के रूप में लेते/देखते हुए अशोक गुप्ता और उनके समर्थक/साथी अब ज्यादा जोश और तैयारी के साथ जुटेंगे । भरत पांड्या के समर्थक नेताओं के लिए मुसीबत और चिंता की बात वास्तव में यही है कि हाल-फिलहाल की घटनाओं से अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में जो एक वातावरण बना है, उससे उनके समर्थक नेताओं में खासा जोश पैदा हुआ है और उन्हें लगने लगा है कि माहौल उनके पक्ष में है - उन्हें जरूरत सिर्फ उसे संयोजित व संगठित करने की है । समय ने भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी कर दी है - एक तरफ तो अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए चुनौती बनती स्थितियाँ खुद-ब-खुद सुलझती जा रही हैं और उनके रास्ते की बाधाएँ अपने आप से दूर हो रही हैं; और दूसरी तरफ विजय जालान को आरआरएफसी का पद मिलने से उनके लिए लोगों को यह समझाना मुश्किल हुआ है कि रोटरी के सभी बड़े और महत्त्वपूर्ण पद एक ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को क्यों मिलने चाहिए ? इसलिए विजय जालान के रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर बनने ने भरत पांड्या की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है ।

Thursday, November 23, 2017

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने के लिए ही सुशील गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी को धोखा देने और रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की बलि चढ़ाने के रास्ते पर बढ़े हैं क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी जोन 4 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपने चेलैंज को अधिकृत करवाने के लिए रंजन ढींगरा और उनके समर्थकों को जिस तरह की मशक्कत करना पड़ रही है, उसके चलते पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की अपने ही खेमे के लोगों के बीच भारी फजीहत हो रही है । सुशील गुप्ता के ही नजदीकयों का कहना है कि पहले तो उन्हें यही समझ नहीं आ रहा है कि सुशील गुप्ता ने क्यों तो रंजन ढींगरा से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चेलैंज करवा दिया, और फिर जब चेलैंज करवा ही दिया है - तो अब उनके चेलैंज को अधिकृत करवाने के लिए न्यूनतम सक्रियता दिखलाने से भी क्यों बच रहे हैं ? खेमे के पूर्व गवर्नर्स नेताओं का कहना है कि उन्होंने सुझाव दिया था कि सुशील गुप्ता की मौजूदगी में संभावित समर्थक पूर्व गवर्नर्स की एक मीटिंग कर लेना चाहिए, ताकि रंजन ढींगरा के समर्थन में एकजुटता को 'दिखाया' जा सके; किंतु ऐसी कोई मीटिंग तो नहीं ही हो सकी है - बल्कि रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के पक्ष में क्लब्स से कॉन्करेंस जुटाने का काम कुछेक अनजान से रोटेरियंस को सौंप दिया गया है । खेमे के नेताओं का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट से रंजन ढींगरा चूँकि अकेले ही चेलैंज कर रहे हैं, इसलिए उन्हें जरूरी कॉन्करेंस तो मिल ही जायेंगी - लेकिन जिस तरह से उनके पक्ष में कॉन्करेंस जुटाने का काम हो रहा है, उसे देखते हुए उनकी उम्मीदवारी एक मजाक बन जा रही है और इसके लिए सुशील गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । दरअसल सुशील गुप्ता और रंजन ढींगरा के खास नजदीकी महत्त्वपूर्ण लोगों को भी यह नहीं पता है कि रंजन ढींगरा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चेलैंज कर क्यों रहे हैं ? रंजन ढींगरा की इस प्रस्तावित उम्मीदवारी के पीछे चूँकि सुशील गुप्ता को देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए हर किसी के निशाने पर सुशील गुप्ता ही हैं । 
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में सुशील गुप्ता का व्यवहार अचानक से पहेलीभरा इसलिए भी हो गया है, क्योंकि उन्हें तो अशोक गुप्ता की प्रस्तावित उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है; और अशोक गुप्ता अपनी प्रस्तावित उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते ज्यादा गंभीरता और योजना के साथ तैयारी करते हुए सुने जा रहे हैं । ऐसे में हर किसी को यह सवाल परेशान कर रहा है कि सुशील गुप्ता ने अशोक गुप्ता की तैयारी में सहयोग करना छोड़ कर रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को झंडा क्यों उठा लिया है - और अब जब उठा ही लिया है, तब फिर वह रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के पक्ष में गंभीरता और योजना के साथ काम करते हुए 'नजर' क्यों नहीं आ रहे हैं ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3011 में और जोन 4 के नेताओं के बीच रंजन ढींगरा के चेलैंज का जिक्र पहली बार तब सुना गया था, जब डिस्ट्रिक्ट 3011 में ही दीपक कपूर के चेलैंज की चर्चा थी । दीपक कपूर को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार भरत पांड्या के समर्थक खेमे के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । माना/समझा गया था कि चूँकि डिस्ट्रिक्ट 3011 और उसके ' जुड़वाँ भाई' डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक गुप्ता के लिए अच्छा समर्थन है, इसलिए उनके समर्थन-आधार को तोड़ने के लिए दीपक कपूर की उम्मीदवारी को लाया जा रहा है । इस तरकीब की काट के लिए रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की बात सामने आई थी । अशोक गुप्ता के समर्थन-आधार को बचाने के लिए रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को ढाल के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी को एक अच्छी और जबावी कार्रवाई के रूप में देखा/पहचाना गया था और इससे अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी को मनोवैज्ञानिक फायदा मिलता 'दिखा' था । इस जबावी कार्रवाई से भरत पांड्या खेमे को झटका लगा था और तब दीपक कपूर का चेलैंज करने का फैसला वापस ले लिया गया । ऐसी स्थिति में रंजन ढींगरा का चेलैंज करने का कार्यक्रम भी स्वतः ही स्थगित होना था - और वह हो भी गया था । लेकिन एक शाम अचानक पता चला कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में रंजन ढींगरा के क्लब ने उनके चेलैंज के पेपर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में जमा करवा दिए हैं ।
इस अप्रत्याशित घटनाचक्र पर सभी का सिर चकराया । सुशील गुप्ता के नजदीकियों से उस समय हालाँकि यह सुनने को मिला कि सुशील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट 3011 के गवर्नर रवि चौधरी पर भरोसा नहीं है और उन्हें आशंका है कि रवि चौधरी बाद में दीपक कपूर के चेलैंज के पेपर आए/मिले बता देने की धोखाधड़ी कर सकता है, इसलिए ऐहतियातन रंजन ढींगरा के चेलैंज के पेपर भी जमा करवा दिए जाने चाहिए । ऐसे में भी, जब यह बात रिकॉर्ड पर आ गई कि डिस्ट्रिक्ट 3011 में एक अकेले रंजन ढींगरा का चेलैंज हुआ है, और दीपक कपूर का चेलैंज धोखाधड़ी से भी आ सकने का रास्ता बंद हो चुका है - तब रंजन ढींगरा की प्रस्तावित उम्मीदवारी का नाटक बंद हो जाना चाहिए था, और उनके लिए कॉन्करेंस जुटाने की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी । इससे रंजन ढींगरा का चेलैंज अपने आप निरस्त हो जाता और अशोक गुप्ता के लिए हालात पहले जैसे ही हो जाते । मजे की बात यह देखने में आ रही है कि रंजन ढींगरा के चेलैंज के मामले को न तो ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है, और न इस मामले में कोई खास सक्रियता दिखाई जा रही है । इससे लग रहा है कि सुशील गुप्ता की मंशा रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को बनाए रखने में भी है, लेकिन वह उसके लिए कुछ करने को लेकर भी उत्सुक नहीं हैं । चूँकि यह स्थिति अशोक गुप्ता को नुकसान पहुँचाने वाली है, इसलिए सुशील गुप्ता की राजनीतिक नीयत सवालों के घेरे में आ गई है । लोगों को हैरानी है कि अशोक गुप्ता के लिए बैटिंग करते करते सुशील गुप्ता आखिर भरत पांड्या के लिए बैटिंग कैसे और क्यों करने लगे ?
लोगों को लग रहा है कि सुशील गुप्ता यह सब नाटक इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की लाइन में लगने के लिए कर रहे हैं । अशोक गुप्ता के समर्थक के रूप में उनका नाम तेजी से सामने आया तो उन्होंने इससे बचने के उपाय के रूप में रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की बलि चढ़ाने की तैयारी कर ली है । लोगों को लग रहा है कि अशोक गुप्ता के समर्थक का टैग हटाने के लिए ही उन्होंने रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को सचमुच ले आने का फैसला किया है; इससे रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट का 'चुनाव' करवाने वाले बड़े खिलाड़ियों के सामने उन्हें यह दिखाने और साबित करने में आसानी होगी कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वह अशोक गुप्ता के साथ नहीं थे - यदि होते तो अपने ही डिस्ट्रिक्ट से वह किसी को उम्मीदवार क्यों बनने देते ? अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी को धोखा देकर, रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की बलि चढ़ा कर और भरत पांड्या की उम्मीदवारी की मदद करने का नाटक जमा कर सुशील गुप्ता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अपनी राह को आसान बना सकेंगे या नहीं - यह तो बाद में पता चलेगा, अभी लेकिन सुशील गुप्ता दूसरों के साथ साथ अपनों के निशाने पर भी हैं । उनके अपनों का ही कहना है कि दूसरों को खुश करने के नाम पर सुशील गुप्ता जिस तरह से अपनों को धोखा दे रहे हैं तथा उन्हें बलि का बकरा बना रहे हैं, इससे वह दूसरों के साथ साथ अपनों के बीच भी अपनी फजीहत करवा रहे हैं ।

Saturday, October 14, 2017

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लगने की तैयारी कर रहे पूर्व डायरेक्टर सुशील गुप्ता के पीछे हटने के कारण, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की अशोक गुप्ता की तैयारी मँझधार में फँसी

जयपुर । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार भरत पांड्या को चेलैंज करने की तैयारी के तहत अशोक गुप्ता ने समर्थन जुटाने का जो प्रयास शुरू किया है, उसे कोई खास समर्थन न मिलता देख अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों को तगड़ा झटका लगा है । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के रवैये ने तो उन्हें सदमे जैसी हालत में पहुँचा दिया है । निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई उनके चेलैंज में उन्हें दिलचस्पी लेते/दिखाते हुए तो लग रहे हैं, लेकिन कुछ करते और कोई नतीजा दिखाते हुए नजर नहीं आए हैं । अशोक गुप्ता ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से समर्थन जुटाने हेतु बात की है, लेकिन अधिकतर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने उनके चेलैंज को लेकर कोई खास उत्साह नहीं जताया/दिखाया । 17 सितंबर को नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा फैसला करने की प्रक्रिया में बुरी तरह पराजित होने के बाद अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों ने पहला सप्ताह तो शोक मनाने में बिता दिया, उसके बाद फिर उन्होंने चेलैंज करने के बारे में सोचना शुरू किया । पिछले दो सप्ताहों में अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में समर्थन जुटाने के लिए कई बड़े/छोटे नेताओं के दरवाजे खटखटाए हैं, लेकिन इस कोशिश में उन्हें जो प्रतिक्रिया मिली है - उसने उन्हें हतोत्साहित ही किया है । अशोक गुप्ता के कुछेक नजदीकी और समर्थक तो कहने भी लगे हैं कि अशोक गुप्ता को चेलैंज/फैलेंज के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, अन्यथा उनकी और ज्यादा फजीहत होगी ।
अशोक गुप्ता के लिए फजीहत की बात यह भी हुई है कि चेलैंज न करने के लिए रोटरी के बड़े नेता उन्हें मनाने का कोई प्रयास भी नहीं कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को चेलैंज कर सकने को लेकर और जिन जिन उम्मीदवारों से खतरा था, उन सभी को 'मैनेज' कर लेने की बातें सुनी जा रही हैं । गुलाम वहनवती को रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बना दिया गया है; रंजन ढींगरा और दीपक कपूर को भी आकर्षक ऑफर के साथ-साथ 'अगली बार' का झुनझुना दिया/दिखाया जा रहा है - लेकिन अशोक गुप्ता को कोई 'मैनेज' करने का प्रयास ही नहीं कर रहा है । इससे लगता है कि रोटरी के बड़े नेता और पदाधिकारी भी चाहते हैं कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को अशोक गुप्ता चेलैंज करें : हालाँकि उनकी चाहना है अलग अलग कारणों से - कुछ नेता लोग तो इसलिए चाहते हैं, ताकि उन्हें अपनी राजनीति दिखाने/जताने का मौका मिले, और कुछ इसलिए चाहते हैं ताकि अशोक गुप्ता यह भी करके देख लें और बाहर निकलें तथा दूसरों के लिए मौका छोड़ें ।
अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता का रवैया काफी हैरान/परेशान करने वाला लगा है । उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद सुशील गुप्ता से ही थी; सुशील गुप्ता की तरफ से जब रंजन ढींगरा को चेलैंज न करने के लिए राजी कर लिया गया था, तब अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों की उम्मीद और बढ़ गई थी - लेकिन सुशील गुप्ता उनकी मदद करते हुए भी नहीं दिख रहे हैं । इसका एक प्रमुख कारण यह सुना/बताया जा रहा है कि सुशील गुप्ता चूँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए लाइन में लगना चाहते हैं, इसलिए वह किसी भी तरह के विवाद में पड़ने/फँसने से बचना चाहते हैं - और इसलिए ही उन्होंने अशोक गुप्ता की चेलैंज करने की तैयारी से अपने आपको दूर किया/दिखाया हुआ है । अशोक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह बनी है कि जिन सुशील गुप्ता पर वह सबसे ज्यादा भरोसा कर रहे थे, उन सुशील गुप्ता ने इस बार तो उन्हें बीच मँझधार में छोड़ ही दिया है - दो/तीन वर्ष में ही मिलने वाले अगली बार के मौके के लिए भी वह कोई झूठा-मूठा भरोसा तक उन्हें नहीं दे रहे हैं । सुना जा रहा है कि सुशील गुप्ता अगली बार के लिए अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को 'हवा' दे रहे हैं । उनके डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स के बीच चर्चा है कि विनोद बंसल आजकल सुशील गुप्ता की 'आँख का तारा' बने हुए हैं, जो अभी तक रंजन ढींगरा हुआ करते थे ।
सुशील गुप्ता के पीछे हटने से अशोक गुप्ता के चैलेंजिंग अभियान को जो धक्का लगा है, उससे उबरने का वह कोई तरीका नहीं खोज पा रहे हैं । निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की तरफ से उन्हें उत्साहित किए जाने की बातें तो सुनी जा रही हैं, लेकिन मनोज देसाई वास्तव में उनकी मदद करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । इसका एक बड़ा कारण यह माना/समझा जा रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में मनोज देसाई ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में लोगों को अलग अलग कारणों से नाराज किया हुआ है, और इसलिए वह किसी से ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं । अशोक गुप्ता ने हाल ही के दिनों में विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स से खुद भी बात की है, और अपने चेलैंज के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है - पर अपने प्रयासों के नतीजों से वह खुद ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि उनके कई समर्थकों ने हालात की प्रतिकूलता का हवाला देते हुए उन्हें चेलैंज को लेकर आगे न बढ़ने का सुझाव भी दिया है, लेकिन चेलैंज को लेकर अशोक गुप्ता जितना आगे बढ़ चुके हैं - उससे पीछे हटना भी उनके लिए फजीहतभरा होगा । नोमीनेटिंग कमेटी की चुनावी प्रक्रिया में सबसे पहले चुनावी दौड़ से बाहर होने के कारण अशोक गुप्ता की एक बार किरकिरी हो चुकी है, चेलैंज को लेकर वह जिस मँझधार में फँसे नजर आ रहे हैं - उससे लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए अपनाई गई उनकी कोई भी तरकीब उनके काम नहीं आ पा रही है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने का उनका सपना एक बुरा सपना साबित होने जा रहा है ।

Sunday, April 9, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन के रवैए ने रमेश अग्रवाल के लिए मुसीबत पैदा की

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन जिस तरह से रमेश अग्रवाल द्वारा तय की गई वोट-जुटाऊ योजना को क्रियान्वित करने से पीछे हटते दिख रहे हैं, उसके चलते रमेश अग्रवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव के लिए प्रस्तुत की गई अपनी उम्मीदवारी अभी से संकट में पड़ती नजर आ रही है । रमेश अग्रवाल ने क्लब के कुछेक सदस्यों को यह कहते/बताते हुए शरत जैन के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया है कि शरत जैन का यही रवैया रहा, तो क्लब को डिस्ट्रिक्ट में एक बार फिर से बदनामी का सामना करना पड़ेगा । अपनी जीत/हार को क्लब के मान/अपमान से जोड़ कर रमेश अग्रवाल ने शरत जैन पर मदद के लिए सक्रिय होने के लिए दबाव बनाने का काम शुरू तो किया है, लेकिन क्लब के ही कुछेक सदस्यों का कहना है कि शरत जैन को रमेश अग्रवाल को पूरी तरह बर्फ में लगा देने का जो मौका मिला है - उसे वह यूँ ही नष्ट नहीं होने देंगे । शरत जैन जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए यदि चुन लिए गए तो डिस्ट्रिक्ट तो छोड़िए, क्लब तक में उनकी स्थिति को दोयम दर्जे की बना देंगे । शरत जैन के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि शरत जैन को यह अच्छी तरह समझ में आ रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में और क्लब में अपनी स्थिति को सम्मानजनक बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव हार जाएँ । रमेश अग्रवाल को हरवाने के लिए तो शरत जैन कुछ नहीं कर सकते हैं, लेकिन वह इतना तो कर ही सकते हैं कि वह उन्हें चुनाव जितवाने के लिए कुछ न करें ।
रमेश अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि उन्होंने अपनी जीत का सारा ताना-बाना ही शरत जैन के भरोसे बुना है । रमेश अग्रवाल की डिस्ट्रिक्ट में वैसे ही खासी बदनामी है, जिसके चलते इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक जैन को बुरी तरह से हारना पड़ा । अशोक जैन की बुरी हार के लिए डिस्ट्रिक्ट में हर किसी ने 'रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार' की उनकी पहचान को ही जिम्मेदार माना/ठहराया । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच रमेश अग्रवाल के प्रति जो गुस्सा और नाराजगी है, उसका खामियाजा अशोक जैन को भुगतना पड़ा है । रमेश अग्रवाल को भी इस बात का अहसास तो है, और इसीलिए वह पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से दूर रहने में ही अपनी भलाई देख रहे थे । रमेश अग्रवाल के लिए रोटरी की राजनीति और व्यवस्था में लेकिन जीने/मरने वाले हालात बन गए हैं । रोटरी की राजनीति और व्यवस्था में अपने पुनर्जीवन के लिए उन्हें कुछ बड़ा करना जरूरी लग रहा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता में उन्हें ऐसा ही मौका दिख रहा है । रमेश अग्रवाल को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों में उनके प्रति जो गुस्सा और नाराजगी है, वह अशोक जैन का 'खून पीकर' काफी कुछ रिलीज हो चुकी है - बाकी जो थोड़ी/बहुत बची होगी, उसे वह शरत जैन की मदद से दूर कर लेंगे । शरत जैन के नजदीकियों के अनुसार, रमेश अग्रवाल ने शरत जैन को फार्मूला सुझाया है कि इस वर्ष के अवॉर्ड्स का लालच दिखा कर क्लब-प्रेसीडेंट्स के वोट खरीदे जा सकते हैं । रमेश अग्रवाल का विश्वास है कि क्लब्स के प्रेसीडेंट्स अवॉर्ड के लालची होते ही हैं - और शरत जैन के जरिए वह उनके इस लालच का फायदा उठा कर उनके वोट हासिल कर सकेंगे । रमेश अग्रवाल ने शरत जैन को जिम्मेदारी सौंपी कि क्लब-प्रेसीडेंट्स को अवॉर्ड का आश्वासन देकर वह उनके लिए वोट पक्के करने का काम करें ।
रमेश अग्रवाल लेकिन यह देख/जान कर हैरान और परेशान हैं कि शरत जैन इस काम में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं । हाल/फिलहाल के दिनों में अपनी उम्मीदवारी के सिलसिले में रमेश अग्रवाल ने जिन भी लोगों से बात की, उनसे उन्हें ऐसे कोई संकेत नहीं मिले जिनसे उन्हें आभास हुआ हो कि शरत जैन ने उनकी उम्मीदवारी के लिए तय की गई वोट-जुटाऊ योजना पर कुछ किया हो । यह जान कर रमेश अग्रवाल को अपनी उम्मीदवारी पर अभी से खतरा मँडराता दिखने लगा है, और उन्होंने शरत जैन की नकेल कसने के लिए क्लब में शरत जैन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है । रमेश अग्रवाल लोगों को बता रहे हैं कि उन्होंने ही शरत जैन को गवर्नर बनवाया और डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में उनकी गवर्नरी चलवाई, लेकिन अब जब उन्हें शरत जैन की मदद की जरूरत है - तो शरत जैन उनके साथ परायो जैसा व्यवहार कर रहे हैं, और इस तरह अहसानफरामोशी दिखा रहे हैं । क्लब के सदस्यों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने के लिए रमेश अग्रवाल क्लब की इज्जत का हवाला भी यह कहते हुए दे रहे हैं कि यदि वह चुनाव हारे तो क्लब की दोहरी बेइज्जती होगी । इस तरह की बातों का शरत जैन की तरफ से भी जबाव आ रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में क्लब का नाम यदि खराब है तो इसके लिए रमेश अग्रवाल की घटिया हरकतें जिम्मेदार हैं । शरत जैन की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि रमेश अग्रवाल की घटिया हरकतों के कारण ही अगले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल इतने पीड़ित हैं कि वह रमेश अग्रवाल को अपने किसी भी कार्यक्रम में कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं; सगे भाई जैसे पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला ने रमेश अग्रवाल को अपने डिस्ट्रिक्ट में 'घुसने' तक नहीं दिया था; अपने डिस्ट्रिक्ट में भी निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ उनकी कारस्तानियों से परेशान होकर उनके खिलाफ गए हैं; उनकी हरकतों का ही परिणाम निकला कि अशोक जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में बुरी तरह हार गए । शरत जैन की तरफ से कहा जा रहा है कि रमेश अग्रवाल उन पर मदद न करने का आरोप लगा कर दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में अपनी संभावित हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ने की अभी से तैयारी कर रहे हैं ।
रमेश अग्रवाल और शरत जैन के बीच की इस झींगामश्ती को स्वाभाविक घटनाचक्र के रूप में देख/पहचान रहे लोगों का मानना और कहना है कि रमेश अग्रवाल के बदतमीजीपूर्ण रवैए और स्वभाव को देखते हुए शरत जैन का असहयोगात्मक रुख उचित ही है । शरत जैन को डिस्ट्रिक्ट में और क्लब में यदि उचित सम्मान के साथ रहना है, तो यह जरूरी है कि रमेश अग्रवाल हारे हुए ही रहें - जीतने के बाद तो रमेश अग्रवाल फिर शरत जैन को कुछ समझेंगे ही नहीं । दरअसल रमेश अग्रवाल हैं ही ऐसे - वह किसी के लिए कुछ करना चाहेंगे, तो फिर खुशी के साथ उसके लिए बहुत कुछ करेंगे - लेकिन करने के साथ-साथ उसकी पूरी पूरी कीमत भी बसूलते चलेंगे और इस प्रक्रिया में उसके साथ बदतमीजी की सीमाएँ भी लाँघते जायेंगे । रमेश अग्रवाल ने यही कुछ जेके गौड़ के साथ किया । जेके गौड़ को गवर्नर बनवाने से लेकर उनकी गवर्नरी चलाने/चलवाने तक में रमेश अग्रवाल ने पूरी पूरी मेहनत की - लेकिन बदले में जेके गौड़ को उन्होंने ऐसा ऐसा 'निचोड़ा' कि आज वह जेके गौड़ के दुश्मन नंबर एक बन गए हैं । यही हाल उन्होंने शरत जैन का किया है - इसलिए ही शरत जैन जान/समझ रहे हैं कि रमेश अग्रवाल यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए चुन लिए गए, तो डिस्ट्रिक्ट में और क्लब में उनके लिए सम्मान के साथ रह पाना मुश्किल हो जाएगा । यह जान/समझ लेने के कारण ही शरत जैन ने रमेश अग्रवाल की वोट-जुटाऊ योजना से दूर रहने का निश्चय किया है । शरत जैन के इस निश्चय ने रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी के सामने शुरू में ही संकट खड़ा कर दिया है । इस संकट से उबरने के लिए ही रमेश अग्रवाल ने क्लब में शरत जैन की गर्दन पकड़ने और उन्हें रास्ते पर लाने की चालबाजियाँ तेज कर दी हैं - उन्होंने अपने नजदीकियों से कहा है कि किसी भी तरह उन्हें शरत जैन को 'रास्ते पर लाना' ही है । यह देखना दिलचस्प होगा कि शरत जैन किस तरह से रमेश अग्रवाल की चालबाजियों का मुकाबला करते हैं - कर भी पाते हैं, या नहीं ?

Saturday, March 18, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा के भरोसे रमेश अग्रवाल ने जेके गौड़ को चुनौती देने की तैयारी शुरू की, तो अगले रोटरी वर्ष का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव आलोक गुप्ता की मुट्ठी में जाता दिखा

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अपनी उम्मीदवारी के बाबत सक्रियता दिखा कर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में हलचल मचा दी है - जो अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए बनने वाले चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करती नजर आ रही है । उल्लेखनीय है कि उक्त पद के लिए अभी तक जेके गौड़ की दावेदारी को निर्विवाद रूप से देखा/पहचाना जा रहा था, और रमेश अग्रवाल ने भी इस 'स्थिति' के सामने समर्पण किया हुआ था । लेकिन अब जिस तरह अचानक से रमेश अग्रवाल उक्त पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के बाबत सक्रिय हुए हैं, उससे लोगों को लगा है कि अंदरखाने रमेश अग्रवाल को कोई बड़ा 'ताकत का इंजेक्शन' लगा है - जिसके असर में उन्हें उक्त नोमीनेटिंग कमेटी में अपनी जगह पक्की होती हुई दिखी है, और उन्होंने इसके लिए प्रयास शुरू कर दिया है । दो दिन पहले रोटरी क्लब गाजियाबाद आईडियल के कार्यक्रम में अपनी पत्नी के साथ उनके आने/पहुँचने तथा देर रात तक अशोक अग्रवाल के साथ तू तू मैं मैं में उनके उलझे रहने से लोगों को यह 'संदेश' तो मिल गया है कि रमेश अग्रवाल ने उक्त पद के लिए जेके गौड़ के साथ दो-दो हाथ करने की तैयारी कर ली है । रमेश अग्रवाल के नजदीकियों ने इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए साफ कहा कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चयन के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए उम्मीदवार हो रहे हैं, और वह चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं ।
रमेश अग्रवाल को इसके लिए ताकत का इंजेक्शन कहाँ से और किस से मिल रहा है, इस बारे में उनके नजदीकी साफ साफ तो कुछ नहीं बता रहे हैं - लेकिन वह यह जरूर कह रहे हैं कि यहाँ दुश्मन को दोस्त बनने में कितनी देर लगती है ? इससे समझा जा रहा है कि रमेश अग्रवाल को ताकत का इंजेक्शन मुकेश अरनेजा की तरफ से लगा है । मजे की बात यह है कि मुकेश अरनेजा के भरोसे ही अभी तक जेके गौड़ उक्त पद के लिए अकेले और निर्विवाद दावेदार बने हुए थे । माना जा रहा था कि मुकेश अरनेजा किसी भी कीमत पर उक्त पद के लिए रमेश अग्रवाल का समर्थन नहीं ही करेंगे; और इस तरह जेके गौड़ का रास्ता इतना साफ था - कि रमेश अग्रवाल ने उनके रास्ते में आने की हिम्मत तक नहीं की । मुकेश अरनेजा का समर्थन और पक्का करने के लिए ही जेके गौड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक जैन के साथ धोखा किया । इस धोखाधड़ी के चक्कर में जेके गौड़ वास्तव में अपने ही जाल में फँस गए । अशोक जैन के साथ धोखाधड़ी की तो उन्होंने रमेश अग्रवाल से बदला लेने के लिए - लेकिन इसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए उन्होंने सुभाष जैन को जिस तरह से सीढ़ी बनाया और फिर सुभाष जैन को धोखा दिया, उससे जेके गौड़ के बुरे दिनों की शुरुआत हुई ।
जेके गौड़ ने दीपक गुप्ता की जीत का श्रेय जिस तरह से खुद लिया और उसके बाद आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी की खिलाफत करना शुरू किया, उससे उन्होंने वास्तव में मुकेश अरनेजा को भड़काने का काम किया । मुकेश अरनेजा ने अपना अगला लक्ष्य आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को सफल बनाने का तय किया हुआ है । आलोक गुप्ता को धोखा देने का कलंक वह एक बार अपने माथे पर ले चुके हैं; वह जल्दी से जल्दी उस कलंक से मुक्त होना चाहते हैं । इससे भी बड़ी बात यह कि वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी के रास्ते में मुसीबतें खड़ी करना चाहते हैं । ऐसे में, जेके गौड़ ने आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध घोषित करके तथा ललित खन्ना की उम्मीदवारी के प्रति नजदीकी दिखा कर वास्तव में मुकेश अरनेजा को सीधी चुनौती देने का काम किया । समझा जाता है कि जेके गौड़ के इसी रवैये ने मुकेश अरनेजा को रमेश अग्रवाल की तरफ धकेलने का काम किया । मुकेश अरनेजा जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल इस समय इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए मरे जा रहे हैं; रोटरी में अपने भविष्य को बचाए रखने के लिए रमेश अग्रवाल को उक्त सदस्यता प्राप्त करना जरूरी लग रहा है । मुकेश अरनेजा को लगता है कि उक्त सदस्यता दिलवाने के लिए वह यदि रमेश अग्रवाल की मदद करते हैं, तो रमेश अग्रवाल भी बदले में आलोक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने में उनकी मदद करेंगे ।
मुकेश अरनेजा की तरफ से दोस्ती के लिए बढ़े हाथ ने रमेश अग्रवाल को उत्साहित किया है, और उन्हें उम्मीद हो चली है कि मुकेश अरनेजा के भरोसे वह जेके गौड़ का चुनावी मुकाबला कर लेंगे । डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि कई लोगों का मानना और कहना है कि रमेश अग्रवाल की डिस्ट्रिक्ट में बहुत ही बदनामी है; पिछले दिनों ही संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक जैन को मिली भारी हार के नतीजे को रमेश अग्रवाल के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों की नाराजगी के रूप में ही देखा/पहचाना गया है । मुकेश अरनेजा का संग-साथ उनकी बदनामी में कोई कमी करेगा - इसे लेकर लोगों को शक है; क्योंकि मुकेश अरनेजा की उनसे ज्यादा बदनामी है । पिछले दिनों ही संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा जिन दीपक गुप्ता के समर्थन में थे, उन दीपक गुप्ता ने उनसे कहा हुआ था कि - तुम बस मेरी एक मदद करो और वह यह कि तुम मेरी कोई मदद न करो ! मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता की बात मान ली थी, और वह उनकी उम्मीदवारी के लिए कुछ करते हुए नहीं नजर आए - जिसका नतीजा रहा कि दीपक गुप्ता को अच्छी जीत मिली । पिछले रोटरी वर्ष में मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता के पक्ष में जोरदार अभियान चलाया था, और नतीजा हुआ था कि दीपक गुप्ता बुरी तरह हार गए थे । इसी आधार पर माना/कहा जा रहा है कि मुकेश अरनेजा का संग-साथ मिल जाने से रमेश अग्रवाल की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो जायेगा । हाँ, यह जरूर होगा कि जेके गौड़ के लिए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जब कोई समर्थन-आधार नहीं बचा रह जायेगा, तब रमेश अग्रवाल के लिए जेके गौड़ से निपटना आसान जरूर हो जायेगा ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए रमेश अग्रवाल को मिलते दिख रहे मुकेश अरनेजा के समर्थन का डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों पर भी असर पड़ना लाजिमी है । रमेश अग्रवाल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा कर मुकेश अरनेजा ने अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को आलोक गुप्ता की मुट्ठी में कर देने का उपक्रम भी कर दिया है । आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा के साथ साथ रमेश अग्रवाल का भी समर्थन मिलेगा, तो आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान के सामने चुनौती कम होगी और उन्हें मनोवैज्ञानिक फायदा पहुँचेगा ।

Tuesday, January 3, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3250 की डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में राजा साबू तथा बासकर की उपस्थिति जोन 6ए की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में कमल सांघवी की उम्मीदवारी को घेरने की रणनीति का संकेत है क्या ?

जमशेदपुर । कमल सांघवी के डिस्ट्रिक्ट - यानि डिस्ट्रिक्ट 3250 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू तथा भावी इंटरनेशनल डायरेक्टर सी बासकर की उपस्थिति अगला इंटरनेशनल डायरेक्टर चुन जाने के लिए दौड़ रहे कमल सांघवी के लिए क्या स्पीड ब्रेकर का काम करती है ? उल्लेखनीय है कि अगले रोटरी वर्ष में जोन 6ए में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए बिछ रही राजनीतिक बिसात में कमल सांघवी को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, जबकि अजॉय छाबड़ा को शेखर मेहता के खेमे के प्रतिद्धंद्धी खेमे के नेताओं की 'प्रेरणा' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । प्रतिद्धंद्धी खेमे के नेताओं में अलग अलग कारणों से राजा साबू और सी बासकर की विशेष हैसियत है । इसी नाते से डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में इन दोनों की उपस्थिति से अजॉय छाबड़ा और उनके समर्थकों को बल्ले-बल्ले वाले मूड में देखा गया, जबकि कमल सांघवी तथा उनके समर्थक निराश-से नजर आए । कमल सांघवी के कुछेक समर्थकों ने हालाँकि अपने आप को भी और दूसरों को भी यह समझाने की कोशिश तो बहुत की कि इन दोनों की उपस्थिति को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर भरत की अपनी कांफ्रेंस को बड़ा बनाने/दिखाने की निजी कोशिश के नतीजे के रूप में देखा जाना चाहिए, और इसमें कोई राजनीति - या राजनीतिक संदेश नहीं देखा/पढ़ा जाना चाहिए । कमल सांघवी के समर्थक नेताओं का तर्क रहा कि डॉक्टर भरत ने अपनी कांफ्रेंस को यादगार बनाने के लिए ही राजा साबू तथा सी बासकर की उपस्थिति के लिए प्रयास किया, और उनकी किस्मत अच्छी रही कि उनका प्रयास सफल रहा - बात बस इतनी सी है, इसमें राजनीति देखना ठीक नहीं है ।
बात बस इतनी सी है - कमल सांघवी के समर्थक नेता लोग दूसरों को तो यह बताने/समझाने का प्रयास करते रहे, किंतु अपने ही इस तर्क को वह खुद हजम नहीं कर पाए; और राजा साबू व सी बासकर की उपस्थिति से जले-भुने से रहे/दिखे । खासकर राजा साबू की उपस्थिति ने कई लोगों को चौंकाया । दरअसल राजा साबू के बारे में मशहूर है कि वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंसेस में नहीं जाते हैं । इसीलिए जमशेदपुर में डिस्ट्रिक्ट 3250 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में उनकी उपस्थिति की बात जिसने भी सुनी, वह हैरान हुआ और उसने इस उपस्थिति के राजनीतिक 'इरादे' पढ़ने/समझने का प्रयास किया । राजा साबू अभी दुबई में आयोजित हुई रोटरी जोन इंस्टीट्यूट में नहीं गए थे, और उनकी तरफ से इसका कारण बताया गया था कि उनकी पत्नी ऊषा साबू को चूँकि बाहर आने-जाने में तकलीफ होने लगी है और उनको साथ लिए बिना वह कहीं आते-जाते नहीं हैं । जमशेदपुर लेकिन वह उनके बिना आ गए । दुबई इंस्टीट्यूट में राजा साबू की अनुपस्थिति के पीछे भी जिस तरह से 'राजनीति' देखी/पहचानी गई थी; ठीक उसी तरह से जमशेदपुर में उनकी उपस्थिति के पीछे भी राजनीति देखी गई । कमल सांघवी के समर्थकों व शुभचिंतकों ने इस राजनीति को पहचानने में लगता है कि कोई चूक नहीं की है ।
कमल सांघवी और उनके समर्थकों को दरअसल महसूस यह हो रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में उनके डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के साथ-साथ ऊपर के कुछेक नेता भी उनकी घेराबंदी करने की तैयारी कर रहे हैं । कमल सांघवी और उनके समर्थकों को अजॉय छाबड़ा की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने की आशंका तो थी; किंतु उनका आकलन था कि अजॉय छाबड़ा की उम्मीदवारी को ज्यादा समर्थन नहीं मिलेगा और अजॉय छाबड़ा की उम्मीदवारी उनके लिए कोई चुनौती या समस्या खड़ी नहीं पायेगी । जोन 6ए की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले दूसरे लोग भी इस आकलन से सहमत रहे हैं । असल में, रोटरी में अजॉय छाबड़ा की तुलना में कमल सांघवी की सक्रियता और संलग्नता बहुत ज्यादा रही है; डिस्ट्रिक्ट से बाहर तथा ऊपर की रोटरी में तो कमल सांघवी उनसे बहुत - बहुत आगे बने और 'दिखते' रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट से बाहर तथा ऊपर की रोटरी में पहचान के मामले में भी कमल सांघवी का पलड़ा हमेशा ही अजॉय छाबड़ा से भारी नजर आता रहा है । इसीलिए अजॉय छाबड़ा की तरफ से कमल सांघवी को ज्यादा समस्या होने का कोई डर नहीं था । लेकिन अब अचानक से अजॉय छाबड़ा की उम्मीदवारी के अभियान में जिस तरह की आक्रामकता देखी जा रही है, उससे कमल सांघवी के समर्थकों और शुभचिंतकों को लग रहा है कि अजॉय छाबड़ा की उम्मीदवारी की डोर कहीं और किन्हीं हाथों में है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए जोगेश गंभीर की उम्मीदवारी आने से कमल सांघवी के लिए मामला खासा गंभीर हो गया है । जोगेश गंभीर को अजॉय छाबड़ा के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि कई लोगों को लगता है कि नोमीनेटिंग कमेटी के लिए कमल सांघवी अपने उम्मीदवार के रूप में संजय खेमका को आराम से जितवा लेंगे; लेकिन ऐसा मानने वाले लोगों में भी कई एक को लगता है कि कमल सांघवी के लिए झंझट तो खड़ा हो ही गया है । जोन में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार के रूप में और जो कुछ नाम सुने जा रहे हैं, उन्हें भी कमल सांघवी की उम्मीदवारी के लिए झंझट खड़ा करने के उद्देश्य को पाने की कार्रवाई के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इसी सब नजारे को देखते हुए जोन 6ए में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लग रहा है कि रोटरी के किन्हीं बड़े नेताओं ने कमल सांघवी की उम्मीदवारी के खिलाफ जैसे 'सुपारी' ले ली है, और उन्होंने कमल सांघवी की उम्मीदवारी को चारों तरफ से घेरना शुरू कर दिया है । कमल सांघवी के डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में ही कमल सांघवी को जो झटका दिया गया है, वह इस बात का सुबूत है कि उनकी उम्मीदवारी के खिलाफ काम कर रहे लोग बहुत बारीकी और गंभीरता से अपनी चाल चल रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में अजॉय छाबड़ा और जोगेश गंभीर के साथ ऐसे ऐसे लोग नजर आने लगे हैं, जो प्रायः इनके खिलाफ रहे हैं; जाहिर है कि जो इनके साथ सिर्फ कमल सांघवी का खेल बिगाड़ने के लिए खड़े हुए हैं या खड़े किये गए हैं । डिस्ट्रिक्ट के बाद जोन के दूसरे डिस्ट्रक्ट्स में भी जिस तरह से कमल सांघवी तथा उनके समर्थकों के खिलाफ लोगों को सक्रिय और इकट्ठा किया जा रहा है, उससे लग रहा है कि कमल सांघवी के लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई खासी मुश्किल होने जा रही है ।