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Wednesday, December 6, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम के नाम पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में बढ़त बनाने की भरत पांड्या की योजना को पड़ी दोतरफा चोट ने अशोक गुप्ता के मुकाबले उनकी स्थिति को डाँवाडोल बनाया

मुंबई । कुआलालुम्पुर में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में प्रतिनिधियों के रहने की जगह को लेकर तथा अगले रोटरी वर्ष में चेन्नई में आयोजित होने वाले इंस्टीट्यूट की आयोजन समिति के लिए पदाधिकारियों के चयन को लेकर उत्तर व पश्चिम भारत के रोटेरियंस के साथ जो भेदभाव हुआ है, वह जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में मुद्दा बन रहा है - और इस मुद्दे ने भरत पांड्या और उनके साथियों को लोगों के निशाने पर ला दिया है । रोमांचक बात यह है कि इस मुद्दे पर जो बबाल पैदा हुआ है, उसमें भरत पांड्या और उनके साथी दोनों तरफ से - लीडरशिप की तरफ से भी और लोगों की तरफ से भी - 'मार' खा रहे हैं । मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम ने अपना नाम इस्तेमाल करने और घसीटे जाने के लिए भरत पांड्या और उनके साथियों की 'खबर' भी ली । मजे की बात यह है कि यह स्थिति खुद भरत पांड्या और उनके साथियों ने ही बनाई है । दरअसल, कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए समर्थन जुटाने वास्ते जो खेल खेला, वह उन्हें उल्टा पड़ गया है - जिसकी भरपाई करना उनके लिए खासा मुश्किल हो उठा है । कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके साथियों ने जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के महत्त्वपूर्व पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने के लिए योजना तो बहुत अच्छी बनाई थी, लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि उनकी योजना उन्हीं के गले पड़ गई है । योजना के अनुसार, भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने के लिए उन्हें यह आभास और अहसास कराने का प्रयास किया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं, और इसके लिए वह उनके कहने से रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पदों का बँटवारा करने के लिए भी तैयार हैं । उनके इन प्रयासों की भनक जब इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम को लगी, तब बासकर चॉकलिंगम ने उनसे अपना नाम घसीटे जाने पर गंभीर नाराजगी दिखाई ।
कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके साथियों ने लोगों के साथ एक नाटक खेला - जिसके तहत भरत पांड्या के कुछेक साथी जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने तथा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व गवर्नर्स को घेरघार कर भरत पांड्या से मिलवाने ले जाते, जहाँ भरत पांड्या उनसे बासकर चॉकलिंगम तथा अन्य बड़े पदाधिकारियों से अपनी निकटता का बखान करते हुए पूछते कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप में उन्हें जो कोई भी पद चाहिए, वह बताएँ - बासकर चॉकलिंगम से कह कर वह उनसे उन्हें पद दिलवा देंगे । इस तरह भरत पांड्या की तरफ से कोशिश की गई कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पद 'लेकर' विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के नेता अपने अपने डिस्ट्रिक्ट्स में उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में वोट दिलवाएँ । भरत पांड्या और उनके साथियों को इस बात का शायद जरा भी अंदाजा नहीं था कि वोट के लिए वह जब जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स को बासकर चॉकलिंगम से पद दिलवाने की बात कर रहे थे, तब जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स बासकर चॉकलिंगम की एक पक्षपातपूर्ण कार्रवाई से जूझ रहे थे । दरअसल कुआलालुम्पुर इंस्टीट्यूट में पहुँचे जोन 4 के कई पूर्व गवर्नर्स यह देख कर परेशान हो रहे थे कि उनके ठहरने के लिए मुख्य होटल की बजाए दूसरे होटल में व्यवस्था की गई थी । लोगों का ध्यान गया कि दक्षिण भारत के प्रतिनिधियों को तो मुख्य होटल में ही ठहराया गया, जबकि उत्तर व पश्चिम भारत के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों को दूसरे होटल में जगह दी गई । सभी लोग मुख्य होटल में ही जगह चाहते थे । यह ठीक है कि मुख्य होटल में कमरों की सीमित उपलब्धता के कारण सभी को उसमें जगह नहीं मिल सकती थी - लेकिन जगह देने में दक्षिण और उत्तर का जो भेदभाव 'दिखा' उसने लोगों को भड़का दिया । जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के जिन लोगों को भरत पांड्या, बासकर चॉकलिंगम से निकटता का वास्ता देकर रोटरी रिसोर्स ग्रुप में पद दिलवा रहे थे, उन लोगों ने भरत पांड्या से अनुरोध किया कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पद/वद तो बाद में देखेंगे, पहले तो बासकर चॉकलिंगम से कह कर मुख्य होटल में कमरा दिलवाओ ।
जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स की इस माँग पर भरत पांड्या फँस गए । उनकी फँसावट को लोगों ने यह कह कर और बढ़ाया कि आप तो कहते/बताते हो कि बासकर चॉकलिंगम आपके बहुत नजदीक हैं और समर्थक हैं और कुआलालुम्पुर की व्यवस्था में आपकी भी भूमिका है - और फिर भी आप इतना सा काम भी नहीं करवा सकते हैं । इसी बहसबाजी में कई एक लोगों ने जयपुर और दुबई इंस्टीट्यूट की व्यवस्था को याद किया और कहा/दोहराया कि जयपुर में तो अशोक गुप्ता की ही पूरी व्यवस्था थी, जबकि दुबई इंस्टीट्यूट की व्यवस्था में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी - और दोनों ही जगह उन्होंने किसी भी आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया और किसी को भी जरा भी परेशान नहीं होने दिया था । जयपुर और दुबई इंस्टीट्यूट और उसमें अशोक गुप्ता की भूमिका की तारीफें सुनकर भरत पांड्या और उनके समर्थकों को समझ में आ गया कि उनका दाँव उल्टा पड़ गया है, और उनकी होशियारी ने उन्हें ही लपेटे में ले लिया है । भरत पांड्या के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत की बात तब हुई, जब इस मामले की जानकारी बासकर चॉकलिंगम को हुई । उनकी तरफ से इस बात पर गहरी नाराजगी जाहिर की गई कि भरत पांड्या और उनके साथी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनका नाम क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं ? बासकर चॉकलिंगम ने यह बात कई लोगों के सामने जिस तरह से कही, उससे भरत पांड्या और उनके साथियों को तगड़ा झटका लगा । बासकर चॉकलिंगम ने इस झटके की तीव्रता को बढ़ाते हुए एक काम यह और कर डाला कि अगले रोटरी वर्ष में चेन्नई में होने वाले इंस्टीट्यूट के लिए जो टीम घोषित की, उसमें अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के तथा उनके नजदीकी को भी महत्त्वपूर्ण भूमिका दे दी । बासकर चॉकलिंगम के तेवर को देखते हुए भरत पांड्या और उनके समर्थकों की चेन्नई इंस्टीट्यूट की मैनेजिंग कमेटी में पद दिलवाने का वायदा करके समर्थन जुटाने की योजना ने भी दम तोड़ दिया । बासकर चॉकलिंगम के नाम पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में बढ़त बनाने की भरत पांड्या की योजना को जो दोतरफा चोट पड़ी है, उसने अशोक गुप्ता के मुकाबले उनकी स्थिति को फिलहाल डाँवाडोल तो बना ही दिया है ।

Tuesday, December 5, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी कुआलालुम्पुर में आयोजित हुई इंस्टीट्यूट में वरिष्ठ पदाधिकारियों की कड़ी फटकार के बाद काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की पहली मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर तो हुए हैं, लेकिन क्या वह अपने रवैये और व्यवहार को भी सुधारेंगे ?

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी को आखिरकार काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग करने की सुध आई और उन्होंने अपने गवर्नर-काल के छठे महीने में यह मीटिंग करने/बुलाने की जहमत उठाई है । हालाँकि एक पूर्व गवर्नर ने भेद खोला और बताया कि रवि चौधरी को यह सुध खुद से नहीं आई है, बल्कि कुआलालुम्पुर में आयोजित हुई रोटरी इंस्टीट्यूट में पड़ी कड़ी फटकार के बाद वह यह मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए हैं । कुआलालुम्पुर से लौटे कुछेक अन्य पूर्व गवर्नर्स ने भी बताया कि वहाँ विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के तथा रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों तथा नेताओं के बीच रवि चौधरी की कारस्तानियों की खासी चर्चा थी; पूर्व गवर्नर्स ने बताया कि वह यह देख कर हैरान थे कि रवि चौधरी के पहुँचने से पहले तो वहाँ रवि चौधरी की कारस्तानियों की (कु)ख्याति पहुँची हुई थी । दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों ने रवि चौधरी की हरकतों का जिक्र करते हुए चुस्कियाँ लीं, तो रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने यह कहते हुए उनकी 'क्लास' ली कि वही एक अकेले गवर्नर हैं जिनके कार्य-व्यवहार को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं और जिनकी हरकतों से रोटरी की बदनामी हो रही है । रवि चौधरी ने अपनी तरफ से भी डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स की तथा अन्य कुछेक लोगों की शिकायत की और कहा कि यह लोग उन्हें बदनाम करते/करवाते रहते हैं । रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों तथा नेताओं ने लेकिन उनकी शिकायतों को यह कहते हुए तवज्जो देने से बचने की कोशिश की कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होने के कारण उनकी जिम्मेदारी है कि वह लोगों को साथ लेकर चलें और किसी को शिकायत करने का मौका न दें । 
कुआलालुम्पुर में रवि चौधरी की आभा झा चौधरी के मामले में भी खासी फजीहत हुई । वरिष्ठ पदाधिकारियों का कहना रहा कि आभा झा चौधरी उनसे पहले के गवर्नर्स के साथ काम कर चुकीं हैं, और उनसे पहले के किसी गवर्नर के साथ उनका कोई विवाद नहीं हुआ - बल्कि सभी गवर्नर्स ने उनके कामकाज की प्रशंसा ही की है, और उन्हें महत्त्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित ही किया है । रवि चौधरी से कहा/पूछा गया कि उनकी प्रतिभा और उनकी कार्य-क्षमताओं को देखते/समझते हुए ही आपने उन्हें अपनी डिस्ट्रिक्ट-टीम में महत्त्वपूर्ण पद देने का फैसला किया होगा - फिर ऐसा क्या हो गया कि आभा झा चौधरी को उनके व्यवहार और रवैये की शिकायत करते हुए रोटरी इंटरनेशनल को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखना पड़ा । कुआलालुम्पुर से लौटे पूर्व गवर्नर्स के अनुसार, वहाँ वरिष्ठ पदाधिकारियों की तरफ से रवि चौधरी को साफ शब्दों में कहा/बताया गया कि उन्हें स्वयं इस बात पर विचार करना चाहिए कि दूसरे गवर्नर्स की तुलना में एक अकेले उनके ही खिलाफ इतनी शिकायतें क्यों हैं, और उनके डिस्ट्रिक्ट के कई पूर्व गवर्नर्स भी उनके कार्य-व्यवहार को लेकर असंतुष्ट और शिकायती क्यों हैं ? रवि चौधरी की इस बात के लिए बहुत फजीहत हुई कि वह अपने डिस्ट्रिक्ट में पूर्व गवर्नर्स को साथ लेकर क्यों नहीं चल पा रहे हैं, और क्यों पूर्व गवर्नर्स उनके गवर्नर-काल में अपने आप को उपेक्षित व अपमानित महसूस कर रहे हैं । इन्हीं बातों के बीच काउंसिल और गवर्नर्स की मीटिंग की बात आई - और रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारी यह जान कर हैरान रह गए कि गवर्नर-काल के पाँच महीने पूरे होने के बाद तक भी रवि चौधरी के एक बार भी काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग नहीं की/बुलाई है । इस बात पर रवि चौधरी की कड़ी फटकार लगी और कहा गया कि यह इस बात का सुबूत है कि पूर्व गवर्नर्स को उपेक्षित किए हुए हैं और उन्हें साथ लेकर नहीं चल रहे हैं - और जिसके कारण वह रोटरी के आदर्शों व नियमों का पालन नहीं कर पा रहे हैं । वरिष्ठ पदाधिकारियों की तरफ से रवि चौधरी को सख्त हिदायत दी गई कि वह काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग जल्द बुलाएँ और डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के कामकाज को पटरी पर लाने का प्रयास करें ।
'मरता, क्या न करता' वाली तर्ज पर, वरिष्ठ पदाधिकारियों से फटकार खाने के बाद रवि चौधरी ने कुआलालुम्पुर से लौट कर पहला काम काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने का ही किया । आठ दिसंबर को काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने की घोषणा करने के बाद रवि चौधरी की चिंता लेकिन यह है कि उक्त मीटिंग में वह अपनी कारस्तानियों तथा उलटे-सीधे फैसलों व कार्रवाइयों को पूर्व गवर्नर्स के बीच कैसे उचित ठहरायेंगे ? रवि चौधरी के गवर्नर-काल में सबसे बड़ी बेवकूफी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव की प्रक्रिया की टाइमिंग को लेकर हुई है । रवि चौधरी ने इस बात की बिलकुल भी चिंता/परवाह नहीं की कि चुनावी प्रक्रिया के बारे में नियम-कानून क्या कहते हैं, और पूरी प्रक्रिया को मनमाने तरीके से चलाया है । डिस्ट्रिक्ट में कई कमेटियाँ बननी होती हैं, जिन्हें बनाने को लेकर रवि चौधरी ने कोई रुचि नहीं दिखाई - इलेक्शन कमेटी ही अभी हाल ही में तब बनी है, जब इलेक्शन की प्रक्रिया शुरू हो गई । उल्लेखनीय है कि रोटरी में होशियार गवर्नर्स यह करते हैं कि अपनी बेवकूफियों और कमजोरियों पर पर्दा डालने के लिए शुरू में ही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग कर लेते हैं, जिसमें सभी फैसले करने के अधिकार वह खुद ले लेते हैं - और फिर मनमानियाँ करते रहते हैं । लेकिन जैसा कि कहा गया है कि होशियार गवर्नर्स ऐसा करते हैं - रवि चौधरी जैसे लोग ऐसा नहीं करते । सामान्य समझ की बात है कि रवि चौधरी यदि अपने गवर्नर-काल के शुरू में ही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग कर लेते और सभी अधिकार अपने जिम्मे कर लेते, तब फिर वह जो कुछ भी करते - उस पर विवाद और या शिकायत नहीं होती और वह बदनामी से बच जाते ।
काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाए जाने की कार्रवाई पर संतुष्ट दिख रहे पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि कुआलालुम्पुर में रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से मिली कड़ी फटकार के बाद रवि चौधरी यह मीटिंग करने/बुलाने के लिए जिस तरह तैयार हो गए हैं, उससे लग रहा है कि उक्त फटकार का उन पर असर हुआ है । कुछेक पूर्व गवर्नर्स को तो यह तक उम्मीद बँधी है कि कुआलालुम्पुर में रवि चौधरी को इस बात का पता चल ही गया है कि अपने डिस्ट्रिक्ट के बाहर के रोटेरियंस के बीच और खासकर वरिष्ठ व प्रमुख रोटरी पदाधिकारियों के बीच उनकी कितनी बदनामी है, इससे सबक लेकर रवि चौधरी शायद अपने व्यवहार और रवैये को सुधारें और आगे ऐसा कुछ न करें - जिससे कि डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के साथ-साथ खुद उनकी भी बदनामी हो । कुछेक पूर्व गवर्नर्स की यह उम्मीद सचमुच पूरी होगी या सिर्फ खामख्याली ही साबित होगी - इसका संकेत आठ दिसंबर को होने वाली काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी हालाँकि मिल जायेगा ।

Monday, December 4, 2017

रोटरी इंटरनेशनल में गुलाम वहनवती और विजय जालान की बढ़ी हैसियत के कारण भरत पांड्या की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है, जिसके चलते उनके लिए चैलेंजिंग उम्मीदवार अशोक गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती और बड़ी तथा संकटपूर्ण हो गई है

मुंबई । कुआलालुम्पुर में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में अन्य बातों के साथ-साथ जोन 4 में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर जिस तरह की बातें और सक्रियता सुनने/देखने को मिली हैं, उसने भरत पांड्या के लिए मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है । भरत पांड्या के नजदीकियों और शुभचिंतकों को यह देख कर खासी हैरानी हुई कि विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के जिन प्रमुख लोगों को भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है, वह कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या को अधिकृत उम्मीदवार चुनने के लिए नोमीनेटिंग कमेटी में अपनाई गई प्रक्रिया की आलोचना कर रहे थे, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उपयुक्तता तथा उपयोगिता के लिहाज से अशोक गुप्ता को भरत पांड्या से बेहतर आँक रहे थे । भरत पांड्या के ही एक नजदीकी का कहना रहा कि कुआलालुम्पुर में चूँकि सभी लोग एक-दूसरे की नज़रों के सामने थे और यह देख/जान सकते थे कि कौन क्या कर रहा है, इसलिए यह बात सामने आई कि सीधे होने वाले चुनाव में भरत पांड्या के लिए मुकाबला आसान नहीं होगा - और उनके लिए सबसे पहली जरूरत तो अपने समर्थकों को ही राजनीतिक रूप से ट्रेंड करने और राजनीतिक रूप से ईमानदार 'बनाने' की जरूरत है । कुआलालुम्पुर जैसा नजारा ही यदि बना रहा, जहाँ कि दूसरे लोगों के साथ-साथ भरत पांड्या के समर्थक और शुभचिंतक भी भरत पांड्या की बजाए अशोक गुप्ता के रोटरी जीवन की तथा उनके कामों का बखान करते देखे/सुने गए - तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में भरत पांड्या के लिए वास्तव में मुसीबत की बात होगी । 
भरत पांड्या के समर्थकों का कहना है कि हाल ही के दिनों में गुलाम वहनवती की रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद पर तथा विजय जालान की रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर जो नियुक्तियाँ हुईं हैं, उसने जोन के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह उलट-पलट दिया है - और इस स्थिति ने भरत पांड्या के लिए दो तरफा संकट पैदा किया है । इन नियुक्तियों ने एक तरफ तो ऐसे कई लोगों को नाराज किया है, जो इन पदों के दावेदार थे और भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखे पहचाने जाते हैं, और दूसरी तरफ उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में उनके विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले गुलाम वहनवती और विजय जालान का रोटरी में 'कद' बढ़ा । पहली वाली स्थिति को समझने के लिए एक उदाहरण देना काफी होगा - डिस्ट्रिक्ट 3080 में यशपाल दास रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद के लिए तथा मधुकर मल्होत्रा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद के लिए उम्मीदवार थे, और यह दोनों भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं; लेकिन यह दोनों ही जिस तरह से भरत पांड्या के डिस्ट्रिक्ट के गुलाम वहनवती और विजय जालान से 'हार' गए, उसके कारण अब यह भरत पांड्या की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं । जोन 4 के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी इसी तरह के नज़ारे हैं । सिर्फ यही नहीं, रोटरी के बड़े नेताओं पर भी इन नियुक्तियों का बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ा है । इसका एक दिलचस्प उदाहरण पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता हैं । शेखर मेहता खुद फाउंडेशन ट्रस्टी पद के उम्मीदवार थे, पर पद पाने में असफल रहे; उसके बाद उन्होंने अपने डिस्ट्रिक्ट के देवाशीष मित्रा को रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर का पद दिलवाने का प्रयास किया, लेकिन उसमें भी वह असफल रहे - अपनी इन दोहरी असफलतताओं से पैदा हुई नाराजगी का ठीकरा वह भरत पांड्या की उम्मीदवारी पर फोड़ते नजर आ रहे हैं ।
रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद पर गुलाम वहनवती तथा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर विजय जालान की नियुक्ति ने जिन जिन लोगों को नाराज किया है, वह सब अपनी अपनी नाराजगी भरत पांड्या की उम्मीदवारी के साथ दिखाने में लग गए हैं - और इस नज़ारे में भरत पांड्या के समर्थकों व विरोधियों का फर्क मिट सा गया है । भरत पांड्या पर दोहरी चोट यह पड़ी है कि रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद और रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद मिलने से उनके विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले गुलाम वहनवती और विजय जालान काफी मजबूत हो गए हैं, और इनकी मजबूती भरत पांड्या के लिए सिर दर्द बन गई है । उल्लेखनीय है कि गुलाम वहनवती ने तो एक ही डिस्ट्रिक्ट में होने के बावजूद भरत पांड्या के साथ ही इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, और नोमीनेटिंग कमेटी में वह थोड़े से अंतर से ही भरत पांड्या से पिछड़े थे । उम्मीद की जा रही थी कि वह चेलैंज करेंगे और यदि वह अपने चेलैंज को मान्य नहीं करवा सके, तो चैलेंजिंग उम्मीदवार की मदद तो जरूर ही करेंगे । इस 'उम्मीद' को देखते/समझते हुए भरत पांड्या ने गुलाम वहनवती को कंट्रोल में करने की व्यवस्था हालाँकि कर ली थी - किंतु उनकी बदकिस्मती रही कि गुलाम वहनवती ट्रस्टी बन गए । गुलाम वहनवती यदि सिर्फ एक पूर्व गवर्नर ही रहते तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में कोई खास भूमिका नहीं निभा पाते, लेकिन ट्रस्टी बनने से रोटरी में उनका कद खासा बड़ा हो गया है और अब वह बड़ी भूमिका निभा सकने की हैसियत में हो गए हैं । भरत पांड्या के ही नजदीकियों को लगता है कि जोन के डिस्ट्रिक्ट्स में हर कोई जानता है कि गुलाम वहनवती का भरत पांड्या के साथ विरोध का संबंध है; रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी होने के बाद गुलाम वहनवती को हर कोई खुश करने की कोशिश भी करेगा - और इस कोशिश में वह गुलाम वहनवती के कुछ कहे बिना ही भरत पांड्या के खिलाफ रहेगा और काम करेगा । इस तरह गुलाम वहनवती के ट्रस्टी बनने से भरत पांड्या के लिए बैठे-बिठाए मुसीबत गले आ पड़ी है ।
इसी तरह का मामला विजय जालान के मामले में भी हुआ है । विजय जालान जब तक सिर्फ पूर्व गवर्नर थे, तब तक वह भरत पांड्या के लिए कोई समस्या नहीं थे - और इसीलिए भरत पांड्या ने भी उनके विरोध की  परवाह नहीं की हुई थी । विजय जालान के विरोध का कारण दरअसल यह रहा है कि विजय जालान को भी अगली बार इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना है । वह जान/समझ रहे हैं कि यह तभी संभव होगा जब कि भरत पांड्या इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर न बनें; भरत पांड्या यदि इस बार बनेंगे, तो अगली बार विजय जालान के लिए तो मौका ख़त्म ही हो जायेगा । अपना मौका बनाए रखने के लिए विजय जालान के लिए जरूरी है कि वह किसी भी तरह भरत पांड्या को इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकें । विजय जालान जब तक सिर्फ पूर्व गवर्नर थे, तब तक इस संबंध में कुछ कर सकना उनके लिए मुश्किल था; किंतु अब रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर बनने के बाद उनकी रोटरी हैसियत में जो बड़ा उछाल आया है - उससे भरत पांड्या और उनके समर्थक सकते में हैं । भरत पांड्या और उनके समर्थक अभी तक विजय जालान को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन बदली परिस्थिति में उनके लिए अब विजय जालान को गंभीरता से लेने की जरूरत आ पड़ी है । गुलाम वहनवती और विजय जालान की बढ़ी रोटरी हैसियत के कारण भरत पांड्या की उम्मीदवारी के सामने जो दोतरफा गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है, उसके परिणामस्वरूप भरत पांड्या के लिए अपने डिस्ट्रिक्ट और अपने क्षेत्र के डिस्ट्रिक्ट्स में ही अपने समर्थन-आधार को बचाए रखना मुश्किल हो गया है; और इस मुश्किल के चलते उनके लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चैलेंजिंग उम्मीदवार अशोक गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती और बड़ी तथा संकटपूर्ण हो गई है ।

Saturday, November 4, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी मामले में रोटरी इंटरनेशनल द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के खिलाफ जाँच बैठाए जाने के फैसले ने मलेशिया में होने वाले एशिया जोन इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए फजीहत का मौका बनाया

नई दिल्ली । वरिष्ठ रोटेरियन आभा झा चौधरी ही नहीं, बल्कि रोटरी के प्रति भी बदतमीजी करने/दिखाने के आरोपों का संज्ञान लेते हुए रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के खिलाफ जाँच कमेटी गठित करने का फैसला किया है । इस तरह अपनी हरकतों के चलते रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट के पहले और एशिया जोन के इस वर्ष के 42 डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स में अकेले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने हैं - जो अपनी करतूतों के चलते रोटरी इंटरनेशनल की जाँच के दायरे में आये हैं । किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए यह शर्म की बात होनी चाहिए, किंतु रवि चौधरी तो निराले व्यक्ति हैं - शर्मसार होने की बजाये वह अभी भी मामले की नजाकत और रोटरी समाज में हो रही अपनी बेइज्जती को गंभीरता से लेने की बजाये निरंतर बेहूदगी ही दिखाए/किए जा रहे हैं । रोटरी इंटरनेशनल द्वारा जाँच बैठाये जाने के लिए एक तरफ तो वह पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को कोस रहे हैं, तथा दूसरी तरफ वह दावा कर रहे हैं कि जाँच कमेटी के सामने वह अपने इतने समर्थक और गवाह खड़े कर देंगे कि जाँच कमेटी उनके खिलाफ कुछ कर ही नहीं पाएगी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का दुरुपयोग करते और रौब दिखाते हुए रवि चौधरी की समर्थक और गवाह तैयार करने की कोशिशों को देखते हुए आभा झा चौधरी ने भी स्पष्ट कह दिया है कि जाँच कमेटी में उन्हें यदि न्याय होता हुआ नहीं दिखा, तो फिर वह देश के कानूनों का सहारा लेंगी और जरूरत पड़ी तो पुलिस में भी रिपोर्ट करेंगी । जाँच को प्रभावित करने की रवि चौधरी की कोशिशों तथा उस पर आभा झा चौधरी के आक्रामक तेवरों ने मामले को और जटिल बना दिया है ।
रवि चौधरी ने पहले तो बदतमीजी की, और अब निर्लज्ज तरीके से वह अपनी बदतमीजी को उचित ठहराने की जो कोशिश कर रहे हैं - उसने डिस्ट्रिक्ट के बड़े और प्रमुख पूर्व गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट की साख व प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित बना दिया है । उन्हें डर है कि 27 दिन बाद एक से तीन दिसंबर के बीच मलेशिया में जो एशिया जोन इंस्टीट्यूट होना है, और जिसमें रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के साथ-साथ एशिया जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी और प्रमुख लोग उपस्थित होंगे - वहाँ रवि चौधरी की करतूत के कारण कहीं डिस्ट्रिक्ट को और डिस्ट्रिक्ट के लोगों को फजीहत का शिकार न होना पड़े । रवि चौधरी ने मामले को लेकर अकड़भरी बेशर्मी का जो रवैया अपनाया है, उसके चलते उनके समर्थक और नजदीकी पूर्व गवर्नर्स ने भी उनसे दूरी बना ली है । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर दमनजीत सिंह और विनोद बंसल को रवि चौधरी के बड़े समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, किंतु अपनी जली-कटी बातों और अकड़ भरे रवैये से रवि चौधरी इन्हें पहले ही अपने से दूर कर चुके हैं, और आभा झा चौधरी के साथ की गई उनकी बदतमीजी के मामले ने तो उन्हें रवि चौधरी से और बचने के लिए मजबूर कर दिया है । जाँच बैठाने के लिए रवि चौधरी ने सुशील गुप्ता को जिम्मेदार ठहराते हुए जिस तरह से कोसना शुरू किया है, उसके चलते रवि चौधरी और भी अकेले पड़ गए हैं । कई लोगों का मानना और कहना है कि रवि चौधरी होशियारी से कोशिश करते तो आभा झा चौधरी के साथ उनका विवाद सम्मानजनक तरीके से समाप्त हो सकता था, लेकिन अपनी अकड़भरी निर्लज्ज बेवकूफी के चलते उन्होंने अपने आप को बुरी तरह फँसा लिया है ।
रवि चौधरी को लगता है कि यह विश्वास रहा कि इससे पहले जब वह डिस्ट्रिक्ट में बड़े बड़े लोगों के साथ बदतमीजी करते रहे हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ा - तो आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने के मामले में ही उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालते ही रवि चौधरी ने जिस तरह का व्यवहार दिखाया - उससे उन्होंने अपने आप को 'सीरिअल' बदतमीज होने की संज्ञा से ही सुशोभित करवाया । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र, जो रवि चौधरी के क्लब के ही सदस्य हैं - रवि चौधरी के पहले शिकार बने । छोटे क्लब्स को 'कमजोर' क्लब बताते हुए उनके पदाधिकारियों को बेइज्जत करना तथा कार्यक्रमों में न पहुँचने पर असिस्टेंट गवर्नर्स को लताड़ लगाना तो रवि चौधरी के लिए मामूली बातें रहीं, उन्होंने तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक तलवार के क्लब, रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के अधिष्ठापन समारोह तक में अपनी बदतमीजी का जलवा दिखाया । इसके आलावा, राजेश बत्रा के क्लब, रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ सेंट्रल द्वारा सुल्तानपुरी स्कूल में आयोजित हो रहे विन्स कार्यक्रम में तो रवि चौधरी की ऐसी हरकतें रहीं कि क्लब के वरिष्ठ सदस्यों को गुस्से में 'गेट आउट' जैसा शब्द इस्तेमाल करते हुए उन्हें मौके से चले जाने के लिए कहना पड़ा; ब्लड बैंक की मीटिंग में दिल्ली में रोटरी के प्रतिष्ठित ब्लड बैंक की जिम्मेदारी सँभाल रहे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल पर उन्होंने 'दुकान चलाने' का आरोप लगा दिया; कैंसर फाउंडेशन की मीटिंग को लेकर रवि चौधरी का जो रवैया रहा, उसे देख कर फाउंडेशन के पदाधिकारियों को कहना पड़ा कि इससे पहले उन्हें किसी गवर्नर से इतना अपमानित नहीं होना पड़ा; डिस्ट्रिक्ट विन्स सेमीनार को इंडिया विन्स के चेयरमैन सुशील गुप्ता का संबोधन करवाए बिना समाप्त करके रवि चौधरी ने सुशील गुप्ता को अपमानित किया । इन 'सीरिअल' हरकतों के बावजूद, रवि चौधरी की बदतमीजी पर चूँकि कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा था, इसलिए उनके हौंसले बुलंद थे - और बुलंद हौंसलों की धमक में ही उन्होंने आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने में कोई संकोच नहीं किया । लोगों को हैरानी इस बात की है कि पहले के मामलों में बचते रहे, रवि चौधरी अपनी नई करतूत को लेकर लेकिन जिस तरह फँसे हैं और फँसते जा रहे हैं - उसकी गंभीरता को वह नहीं समझ रहे हैं, और लगातार छिछोरपन से ही मामले को हैंडल कर रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट के लोगों का ही कहना है कि रवि चौधरी इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि इस मामले को उन्हें एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि रोटरी के एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में देखना और हैंडल करना चाहिए । वह इस बात को शायद समझ ही नहीं रहे हैं कि इस मामले में लगातार उनके द्वारा अपनाये जा रहे रवैये से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी खुद की पहचान और साख के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट व रोटरी की पहचान व साख भी दाँव पर लग गई है । जाँच बैठाने के लिए सुशील गुप्ता जैसे वरिष्ठ पदाधिकारी को कोसने के साथ-साथ जाँच को प्रभावित करने के लिए रवि चौधरी जिस तरह से अपने गवाह और समर्थक तैयार कर रहे हैं, उस पर आभा झा चौधरी की तरफ से मिली प्रतिक्रिया से मामले के और भड़कने के संकेत दिख रहे हैं । लग रहा है कि आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करना रवि चौधरी को भारी पड़ रहा है ।