Showing posts with label RAVI BHATIA. Show all posts
Showing posts with label RAVI BHATIA. Show all posts

Wednesday, May 11, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट डॉक्टर सुब्रमनियम पर डिस्ट्रिक्ट की पहचान को बद से बदतर करने/बनाने का काम करने का आरोप पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता की उपस्थिति में लगा

नई दिल्ली । डॉक्टर सुब्रमनियम को अपनी डिस्ट्रिक्ट असेम्बली में मुख्य अतिथि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता के सामने अपने ही डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों की जिस तरह की आलोचना का शिकार होना पड़ा है, उससे संकेत मिल रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डॉक्टर सुब्रमनियम की राह खासी मुश्किलों भरी है । उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में संपन्न हुई डिस्ट्रिक्ट असेम्बली में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता के सामने ही कई मौकों पर अलग अलग लोगों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट डॉक्टर सुब्रमनियम को अलग अलग कारणों से निशाना बनाया : किसी ने व्यवस्था को लेकर शिकायत की, तो किसी ने असेम्बली के स्तर को लेकर तथा किसी ने असेम्बली में ज्यादा लोगों की भागीदारी न हो पाने का ठीकरा डॉक्टर सुब्रमनियम के सिर फोड़ा, गंभीर आरोप यह भी सुनाई दिया कि डॉक्टर सुब्रमनियम के नजदीकी कार्यक्रम की आड़ में पैसों का भी घपला कर रहे हैं । डॉक्टर सुब्रमनियम के लिए खासी फजीहत की स्थिति उस समय हुई, जब किन्हीं लोगों ने तमाम खामियों के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रंजन ढींगरा को भी जिम्मेदार ठहराना शुरू किया - लेकिन रंजन ढींगरा यह कहते/बताते हुए बचने की कोशिश करते दिखे कि बहुत सी बातों की तो उन्हें भी बाद में ही जानकारी मिलती है, और वह तो बस कहने भर के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं । डॉक्टर सुब्रमनियम पर यह आरोप तो कई लोगों की तरफ से सुना गया है कि अपने गवर्नर-काल के कामकाज को लेकर वह किसी से कोई विचार-विमर्श ही नहीं करते हैं, और बस दो-एक लोगों ही के भरोसे वह गवर्नरी करने/चलाने का काम कर रहे हैं - लेकिन वह अपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर से भी विचार-विमर्श नहीं करते हैं - इस सूचना ने तो लोगों को डॉक्टर सुब्रमनियम पर भड़कने का और मौका दे दिया ।
डॉक्टर सुब्रमनियम के तौर-तरीकों से नाराज होने/रहने वाले लोगों की दो कैटेगरी हैं : एक तरफ तो ऐसे लोग हैं जिन्हें तवज्जो न मिलने की शिकायत है; उनका कहना है कि डॉक्टर सुब्रमनियम जब उम्मीदवार थे, तब तो उनकी खुशामद किया करते थे और तरह तरह से उनकी मदद लिया करते थे - किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक पहुँचते पहुँचते वह उन्हें पूरी तरह भुला बैठे हैं । ऐसे लोगों में डॉक्टर सुब्रमनियम के अपने क्लब के लोगों की संख्या ज्यादा है । क्लब के कई सदस्यों का कहना है कि क्लब में रवि भाटिया की बजाए डॉक्टर सुब्रमनियम की उम्मीदवारी को क्लियर करवाने में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी, लेकिन अब उन्हें लगता है कि उनसे गलती हुई । क्लब के कई सदस्यों को लगता है कि डॉक्टर सुब्रमनियम की बजाए वह यदि रवि भाटिया की उम्मीदवारी पर ध्यान देते तो उन्हें इतना उपेक्षित व अपमानित न होना पड़ता । डॉक्टर सुब्रमनियम से नाराज होने वाले लोगों की दूसरी कैटेगरी में वह लोग हैं, जो यह देख कर बेहद निराश हैं कि डॉक्टर सुब्रमनियम ने दीपक तलवार, सुशील खुराना, रवि चौधरी, विनय भाटिया जैसे लोगों को शह दी हुई है - जो रोटरी व डिस्ट्रिक्ट में अपने नकारात्मक रवैये के कारण बदनाम ज्यादा हैं । इनकी भूमिका की रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड तक ने अभी हाल की अपनी मीटिंग में भर्त्सना की है । डिस्ट्रिक्ट असेम्बली में इन्हीं चार लोगों को आगे आगे देखा गया । लोगों का कहना/पूछना है कि डिस्ट्रिक्ट में जो लोग अपनी नकारात्मकता के लिए, और अपनी कम काबिलियत के लिए जाने/पहचाने जाते हैं - उन्हें आगे रख कर व तवज्जो देकर डॉक्टर सुब्रमनियम डिस्ट्रिक्ट को आखिर कहाँ ले जाना चाहते हैं ? डिस्ट्रिक्ट के कई महत्वपूर्ण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने जिस तरह से अपने आप को डिस्ट्रिक्ट असेम्बली से दूर रखा, उसे डॉक्टर सुब्रमनियम के रवैये के परिणाम के रूप में देखा गया है और डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के लिए इसे आत्मघाती माना गया है ।
डॉक्टर सुब्रमनियम के रवैये से उन लोगों को ज्यादा झटका लगा है, जो उनके समर्थक व शुभचिंतक रहे हैं । ऐसे लोगों का मानना और कहना है कि उन्होंने उम्मीद की थी कि डॉक्टर सुब्रमनियम डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में एक मिसाल कायम करेंगे, लेकिन अभी तक के उनके रवैये से लग रहा है कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने में थी, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में काम करने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं है - और इसीलिए उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के काम को भगवान भरोसे छोड़ दिया है । इसी का फायदा उठाकर कुछेक नकारात्मक सोच रखने वाले कम काबिल लोगों ने डिस्ट्रिक्ट पर 'कब्ज़ा' कर लिया है । इनमें से कुछेक लोगों पर तो पैसा बनाने का आरोप भी है । लोगों के बीच शिकायत है कि कुछेक आयोजनों में रजिस्ट्रेशन के नाम पर जितने पैसे लिए गए, उतने की लोगों को 'सर्विस' नहीं मिली - जिससे लगता है कि डॉक्टर सुब्रमनियम के कुछेक नजदीकियों ने कार्यक्रमों को पैसा बनाने का जरिया भी बना लिया है । इस तरह की बातों की पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता के सामने जिस तरह से चर्चा हुई, उससे डिस्ट्रिक्ट की बदनामी के डिस्ट्रिक्ट की सीमाओं से बाहर तक फैलने के संकेत मिले । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट को लेकर दर्ज हुई प्रतिकूल टिप्पणी ने डिस्ट्रिक्ट 3011 की पहचान को पहले से ही संदिग्ध बना दिया है; उम्मीद की गई थी कि उससे सबक लेकर डॉक्टर सुब्रमनियम संभल कर काम करेंगे - उनके तौर-तरीकों ने लेकिन डिस्ट्रिक्ट की पहचान को बद से बदतर बनाने/करने की दिशा में मोड़ दिया लगता है ।

Sunday, November 17, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में सुधीर मंगला की मदद के बहाने से विनय कुमार अग्रवाल और रमेश अग्रवाल ने विनोद बंसल को अपमानित करने तथा नीचा दिखाने का काम किया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से जुड़ी जिस एक महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत करने की तैयारी की थी - सुधीर मंगला और उनके समर्थक समझे जाने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने लेकिन उस योजना का शुरू होने से पहले ही गला घोंट दिया है । सुधीर मंगला के समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने उक्त योजना को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की एक चाल के रूप में देखा/पहचाना जिसके पीछे सुधीर मंगला को नुकसान पहुँचाने का उद्देश्य उन्होने छिपा पाया; और इसीलिए उन्होंने जाल बिछा कर विनोद बंसल को ऐसा फँसाया कि विनोद बंसल को खुद ही अपनी योजना का वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
विनोद बंसल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में योजना यह बनाई कि नॉमिनेटिंग कमेटी के लिए क्वालीफाई क्लब्स से प्रस्तावित किये गए सदस्यों के सामने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार रोटरी को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपनी सोच, अपना उद्देश्य और अपना लक्ष्य प्रस्तुत करेंगे - जिससे कि नॉमिनेटिंग कमेटी के सदस्य उनका मूल्यांकन कर सकेंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों के सामने अपनी इस योजना के बारे में बात करते हुए विनोद बंसल ने उन्हें बताया कि इस तरीके से प्रत्येक उम्मीदवार को नॉमिनेटिंग कमेटी के सदस्यों को रोटरी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और अपने विज़न से परिचित कराने का मौका मिलेगा और नॉमिनेटिंग कमेटी के सदस्यों को रोटरी व डिस्ट्रिक्ट के हितों को पूरा कर सकने वाले उम्मीदवार को पहचानने का अवसर मिल सकेगा । विनोद बंसल ने उम्मीदवारों को बताया कि उन्होंने अपनी इस योजना के बारे में रोटरी के जिन भी बड़े नेताओं और पदाधिकारियों को बताया, उन सभी ने इसकी तारीफ की है और उनकी इस योजना को रोटरी के हित में डिस्ट्रिक्ट में एक सही नेता चुनने के संदर्भ में उपयोगी माना । विनोद बंसल ने उम्मीदवारों को बताया कि इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से अनुमति भी ले ली है ।
मजे की बात यह रही कि विनोद बंसल ने अपनी इस योजना के बारे में बात करने के लिए उम्मीदवारों के साथ जो मीटिंग की, उस मीटिंग में सभी उम्मीदवारों ने उनकी इस योजना के प्रति समर्थन व्यक्त किया और इस योजना को अमल में लाने के लिए विनोद बंसल को अपनी अपनी तरफ से हरी झंडी भी दे दी ।
लेकिन, अगले ही दिन विनोद बंसल को सुधीर मंगला के क्लब के अध्यक्ष की तरफ से उक्त योजना पर आपत्ति करता और विरोध जताता हुआ ईमेल मिला । चुनाव के संदर्भ में रोटरी इंटरनेशनल के बनाये हुए नियमों का हवाला देते हुए उक्त योजना का विरोध किया गया था । विनोद बंसल को इससे भी बड़ा झटका लेकिन तब लगा जब इलेक्शन कमेटी की मीटिंग में सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के घोषित समर्थक विनय कुमार अग्रवाल ने विनोद बंसल की उक्त योजना का खुला विरोध किया और उनके विरोध का समर्थन इलेक्शन कमेटी के एक दूसरे सदस्य रमेश अग्रवाल ने भी किया ।
विनय कुमार अग्रवाल और रमेश अग्रवाल का कहना था कि विनोद बंसल जिस योजना को अमल में लाना चाहते हैं उससे उम्मीदवारों के सामने नोमिनेटिंग कमेटी के सदस्यों की पहचान खुलेगी और तब उम्मीदवारों को नोमिनेटिंग कमेटी के सदस्यों को प्रभावित करने का मौका मिलेगा और यह चुनाव के संदर्भ में बनाये गए रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का उल्लंघन होगा । विनोद बंसल का कहना था कि नोमिनेटिंग कमेटी के लिए क्लब्स से जो जो नाम दिए गए हैं उनके बारे में सभी उम्मीदवारों को जानकारी है ही और सभी उम्मीदवार अपने अपने तरीके से उनसे संपर्क करने और उन्हें प्रभावित करने का काम कर ही रहे हैं । विनोद बंसल का तर्क रहा कि इसलिए वह जिस योजना को अमल में लाना चाहते हैं उससे किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं होगा; और इस बात को जानते/समझते हुए ही रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने उक्त योजना को अमल में लाने के लिए उन्हें अनुमति दे दी है । विनय कुमार अग्रवाल और रमेश अग्रवाल ने लेकिन उनकी एक न सुनी और अपनी जिद पर अड़े रहे ।
विनोद बंसल ने यह कह कर उन दोनों को और भड़का दिया कि उनकी योजना पर एक अकेले सुधीर मंगला को ही ऎतराज क्यों है - जबकि बाकी उम्मीदवार तो नॉमिनेटिंग कमेटी के सदस्यों के सामने प्रेजेंटेशन देने को तैयार हैं । विनोद बंसल ने कहा कि सुधीर मंगला लोगों के बीच रोटरी को लेकर बात करने से बचना क्यों चाहते हैं ? विनोद बंसल ने जब यह जोड़ा कि पहले तो सुधीर मंगला भी तैयार थे और मीटिंग में उन्होंने उक्त योजना को लेकर समर्थन भी व्यक्त किया था, लेकिन फिर बाद में पता नहीं किसके भड़काने पर वह विरोध करने लगे हैं - तो विनय कुमार अग्रवाल और रमेश अग्रवाल बुरी तरह उखड़ गए और फिर उनके जो तेवर रहे तो विनोद बंसल को अपनी योजना को वापस लेने के लिए मजबूर ही होना पड़ा ।
विनय कुमार अग्रवाल लोगों को फोन कर कर के खुद ही बातें बता रहे हैं कि उन्होंने और रमेश अग्रवाल ने कैसे विनोद बंसल को घेरा और कैसे उनकी योजना को विफल किया । विनय कुमार अग्रवाल ने लोगों को बताया है कि विनोद बंसल ने बड़ी होशियारी से ऐसी योजना बनाई जिससे नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों के सामने सुधीर मंगला के मुकाबले रवि भाटिया का पलड़ा भारी हो । विनय कुमार अग्रवाल के अनुसार, सुधीर मंगला पहले विनोद बंसल की इस चाल को समझ नहीं सके और उनकी योजना के प्रति समर्थन कर बैठे - लेकिन उनके सामने जैसे ही यह बात आई, उन्होंने सुधीर मंगला को विनोद बंसल की चाल में न फँसने की सलाह दी और उसके बाद ही सुधीर मंगला के क्लब के अध्यक्ष से विनोद बंसल को विरोध का ईमेल लिखवाया गया तथा बाकी काम उन्होंने और रमेश अग्रवाल ने इलेक्शन कमेटी की मीटिंग में कर दिया ।
विनोद बंसल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से जुड़ी एक नई और महत्वाकांक्षी योजना का गला घोंट देने में विनय कुमार अग्रवाल और रमेश अग्रवाल को भले ही सफलता मिल गई हो, लेकिन उनकी इस कार्रवाई को विनोद बंसल को अपमानित करने तथा रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के बीच उन्हें नीचा दिखाने की उनकी कोशिश के रूप में भी देखा/समझा जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के बीच विनोद बंसल की बढ़ी सक्रियता और पैठ को मुकेश अरनेजा गिरोह के लोग पचा नहीं पा रहे हैं, और इसीलिये किसी न किसी बहाने से वह विनोद बंसल को घेरते, परेशान करते और अपमानित करने के मौके बनाते रहते हैं । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को भी उन्होंने ऐसे ही मौके के रूप में देखा/पहचाना हुआ है । विनोद बंसल के खिलाफ छेड़ी हुई मुकेश अरनेजा गिरोह की इस लड़ाई ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मुकाबले को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Wednesday, October 30, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के दीवाली मेले में अपने क्लब के लोगों के धोखे के शिकार सुधीर मंगला ने झोपड़-पट्टियों में वोट जुटाने वाले फार्मूले को अपनाया

नई दिल्ली । सुधीर मंगला अपने क्लब के पदाधिकारियों और दूसरे सदस्यों से बुरी तरह खफा हैं । इसका कारण बताते हुए उनके क्लब के कुछेक सदस्यों का ही कहना है कि सुधीर मंगला को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में खड़े होने से इंकार करके उनके क्लब के सदस्यों ने उनके साथ धोखा किया है और इस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उन्हें अकेला छोड़ दिया है । उल्लेखनीय है कि क्लब के सदस्यों की हरकत के कारण सुधीर मंगला को डिस्ट्रिक्ट में लोगों के तरह-तरह के सवालों का सामना करना पड़ा है - जिनमें प्रमुख सवाल यही रहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में जब वह अपने क्लब के सदस्यों का ही सहयोग और समर्थन नहीं जुटा पा रहे हैं, तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट के दूसरे क्लब्स का सहयोग और समर्थन भला कैसे और क्यों मिलेगा ? इस तरह के सवालों के चलते डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सुधीर मंगला की खासी किरकिरी हो रही है । इसलिए क्लब के पदाधिकारियों और सदस्यों के प्रति उनकी नाराजगी और उनके आरोप स्वाभाविक ही जान पड़ते हैं ।
सुधीर मंगला के सामने यह स्थिति हाल ही में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में उस समय पैदा हुई, जब वहाँ मौजूद डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने पाया कि सुधीर मंगला के क्लब से तो एक भी पदाधिकारी और या सदस्य यहाँ नहीं है । लोगों ने सुधीर मंगला से पूछा तो सुधीर मंगला ने पहले तो यह कहते हुए सवालों को टाला कि 'आ रहे हैं, रास्ते में हैं', 'मुझसे तो कहा था कि आयेंगे' आदि-इत्यादि । फिर वह एक अलग कहानी सुनाने लगे कि उनके क्लब के पदाधिकारी और सदस्य चूँकि विनोद बंसल से नाराज हैं, इसलिए उन्होंने दीवाली मेले का बहिष्कार किया है । सुधीर मंगला ने कुछेक लोगों को बताया कि विनोद बंसल ने अपनी टीम में उनके क्लब के किसी भी सदस्य को जगह नहीं दी है और इसके चलते डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में किसी सदस्य का नाम और फोटो नहीं छप सका है, इसलिए उनके क्लब के लोग विनोद बंसल से बहुत नाराज हैं । नाराजगी दरअसल इस कारण से और बढ़ी क्योंकि क्लब के कई सदस्यों के विनोद बंसल के साथ वर्षों के संबंध हैं और वह विनोद बंसल से भी पुराने रोटेरियन हैं  - विनोद बंसल ने लेकिन किसी भी बात का लिहाज नहीं रखा ।
यह कहानी सुनाने के बाद भी, लोगों के सवालों से सुधीर मंगला का लेकिन पीछा नहीं छूटा । लोगों ने सुधीर मंगला से कहा भी कि उनके क्लब के सदस्यों के विनोद बंसल से चाहें जैसी जो नाराजगी है, पर यहाँ तो उन्हें आपकी उम्मीदवारी को मजबूती देने के लिए आना था - आना चाहिए था । सुधीर मंगला इस बात का कोई जबाव नहीं दे पाये । इससे लोगों ने यही नतीजा निकाला कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को लेकर उनके अपने ही क्लब के लोगों में न तो कोई उत्साह है और न ही सहयोग व समर्थन का कोई भाव है । इस लिहाज से सुधीर मंगला की स्थिति चारों उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा ख़राब नज़र आई । क्योंकि बाकी तीनों उम्मीदवारों के क्लब से - किसी से कम तो किसी से ज्यादा - लोग डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में शिरकत करने आये हुए थे और इस तरह अपने अपने उम्मीदवार के प्रति सहयोग और समर्थन व्यक्त कर रहे थे । सुरेश भसीन के साथ उनके क्लब के दो-तीन सदस्यों को देखा/पहचाना जा रहा था; राजीव देवा के क्लब की अध्यक्षा को भी लोगों के साथ मिलते-जुलते देखा गया; रवि भाटिया के क्लब से तो पच्चीस से तीस सदस्य अपने-अपने परिवारों के साथ वहाँ मौजूद थे । जाहिर है कि रवि भाटिया के क्लब के पदाधिकारियों व सदस्यों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत रवि भाटिया की उम्मीदवारी को बहुत गंभीरता से लिया हुआ है और अपने-अपने तरीके से उन्होंने रवि भाटिया की उम्मीदवारी का प्रमोशन किया ।
उम्मीदवारी का 'प्रमोशन' सुधीर मंगला ने भी किया - क्लब के साथी रोटेरियंस उनके साथ भले ही न खड़े हों, लेकिन उनके दोनों बेटे बड़ी मेहनत से लोगों को शराब बाँटने में लगे हुए थे । इस तरह - वोट जुटाने के लिए शराब बाँटने के जिस फार्मूले को झोपड़-पट्टियों में इस्तेमाल करते/होते सुना जाता है, सुधीर मंगला ने उसे रोटरी में इस्तेमाल करने का दाँव चला है । सुधीर मंगला को लगता है कि उनके क्लब के लोग भले ही उनके काम न आ रहे हों, लेकिन शराब बाँटने की उनकी तरकीब अवश्य ही उनके काम आयेगी । रोटरी की चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवार लोग फैलोशिप की आड़ में शराब पिलाते ही हैं, और इसे लोगों के बीच स्वीकार्यता प्राप्त है । लेकिन सुधीर मंगला ने शराब पिलाने के काम को जिस तरह से अंजाम दिया, उसे देख कर कई लोगों को गंभीर ऐतराज हुए और वे वहाँ कहते हुए सुने गए कि सुधीर मंगला ने रोटेरियंस को झोपड़-पट्टी वाला समझ लिया है क्या जो शराब के जरिये उनके वोट खरीदने की कोशिश कर रहे हैं । कई वरिष्ठ रोटेरियंस का भी कहना रहा कि चुनावी प्रक्रिया में फैलोशिप के नाम पर खाना-'पीना' होता ही है, और इससे संबंध मजबूत व विश्वासपूर्ण बनते हैं; लेकिन सुधीर मंगला ने जो किया वह 'आउट ऑफ प्रोपोर्शन' है और इसलिए उसमें फूहड़ता दिखी । वोट पाने के लिए शराब पिलाने के काम में अपने बेटों को इस्तेमाल करने के लिए तो सुधीर मंगला की आलोचना उन लोगों ने भी की, जो उनके साथ समझे जाते हैं ।
सुधीर मंगला के नजदीकियों का इस पर हालाँकि कहना यह भी है कि सुधीर मंगला को जब अपने क्लब के सदस्यों से सहयोग नहीं मिल रहा है, तो वह अपने बेटों की मदद ही लेंगे । इस तरह की बातों की प्रतिक्रिया में ही सुधीर मंगला ने अपने क्लब के पदाधिकारियों तथा दूसरे सदस्यों के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट की है और अपने क्लब के सदस्यों पर धोखा देने का और उन्हें अकेला छोड़ देने का आरोप लगाया है । सुधीर मंगला के क्लब के लोगों ने क्यों उन्हें अकेला छोड़ दिया है और क्यों उनके साथ धोखा कर रहे हैं - यह तो वही जानें; सुधीर मंगला ने लेकिन चुनाव जीतने के लिए झोपड़-पट्टियों वाला फार्मूला अपना लिया है । सुधीर मंगला को विश्वास है कि उनकी उम्मीदवारी के प्रमोशन में उनके क्लब के लोग भले ही उनके साथ सहयोग न करें, लेकिन झोपड़-पट्टियों वाला फार्मूला जरूर उनके काम आयेगा ।

Friday, October 25, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी अभियान में रवि भाटिया के मुकाबले पिछड़ते जाने के लिए सुधीर मंगला ने सुरेश भसीन को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया

नई दिल्ली । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों को सुरेश भसीन की सक्रियता ने बुरी तरह निराश किया हुआ है और उन्हें लगने लगा है कि सुरेश भसीन की उम्मीदवारी के रहते उनके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए रवि भाटिया की उम्मीदवारी से मुकाबला करना मुश्किल हो रहा है । सक्रियता के लिहाज से सुधीर मंगला निश्चित रूप से दूसरे उम्मीदवारों से इक्कीस दिख रहे हैं, लेकिन लोग जब इस बात पर विचार करना शुरू करते हैं कि उनका डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कैसा हो, तो सुधीर मंगला के नंबर कम हो जाते हैं । सुधीर मंगला के व्यवहार और रवैये के प्रति लोगों को जैसी जो शिकायतें हैं, वह तो हैं हीं - रही सही कसर सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के झंडाबरदार विनय कुमार अग्रवाल ने पूरी कर दी है । विनय कुमार अग्रवाल की गाली-गलौच पूर्ण बातों के कारण सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति नकारात्मक भावना ही पैदा हुई है । सुधीर मंगला के समर्थकों का ही कहना है कि इस कारण से सुधीर मंगला के साथ आ सकने वाले कई लोगों का झुकाव सुरेश भसीन की तरफ होता जा रहा है । सुरेश भसीन ने अपनी सक्रियता के बल पर अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में अच्छी सफलता प्राप्त की है । अलग-अलग कारणों से जो लोग रवि भाटिया के साथ नहीं जा सकते हैं, और इस कारण जो सुधीर मंगला के साथ जाते दिख रहे थे - वह सुरेश भसीन के समर्थन में आते दिख रहे हैं । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच इसी कारण से चिंता और निराशा पैदा हुई है ।
सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों ने दावा किया था कि वह सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को वापस करवा देंगे; सुरेश भसीन अपनी उम्मीदवारी के साथ लेकिन चुनावी मैदान में न सिर्फ डटे हुए हैं, बल्कि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन भी जुटाते जा रहे हैं । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थक हालाँकि अभी भी उम्मीद बनाये हुए हैं और तर्क दे रहे हैं कि सुरेश भसीन खुद तो रवि भाटिया का मुकाबला कर नहीं पायेंगे, सुधीर मंगला के लिए भी हालात को मुश्किल बना रहे हैं । सुरेश भसीन के समर्थकों की तरफ से उन्हें लेकिन इसका सटीक जबाव मिल रहा है, जिसमें उन्हें सुनने को मिल रहा है कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थक नेता यदि सचमुच रवि भाटिया की खिलाफत करना चाहते हैं तो इसके लिए उन्हें सुधीर मंगला को छोड़ कर सुरेश भसीन की उम्मीदवारी के साथ जुड़ना/जुटना चाहिए ।
सुधीर मंगला के लिए बड़ी मुसीबत दरअसल अपने समर्थक नेताओं के कारण से ही पैदा हुई है । उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में जो नेता समझे जाते हैं वह उनके प्रति सकारात्मक रुख के कारण नहीं हैं, बल्कि अपनी नकारात्मक सोच के कारण उनके साथ हैं । जो लोग अलग-अलग कारणों से रवि भाटिया का विरोध करना चाहते हैं, वह मजबूरी में सुधीर मंगला के साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं । सुधीर मंगला के और उनके घोषित समर्थक विनय कुमार अग्रवाल के रवैये के कारण वह लेकिन सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के साथ ज्यादा देर तक खड़े भी नहीं रह पा रहे हैं । कोई सुनियोजित और एकाग्र सोच व तैयारी न होने के कारण वह वास्तव में आपस में ही लड़-मर रहे हैं ।
सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को जेके गौड़ और उनके साथी नेताओं का समर्थन तो चाहिए - लेकिन अपनी बातों में वह जेके गौड़ और उनके साथी नेताओं को बदनाम करने का काम कर रहे हैं । जैसे, सुधीर मंगला और उनके कुछेक समर्थक नेता यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि जेके गौड़ के पक्ष में बेईमानी न की गई होती तो सुधीर मंगला तो पिछले वर्ष ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुन लिए गए होते । सुधीर मंगला और उनके कुछेक समर्थक पिछले वर्ष हुई राजनीति का आकलन जिस तरह कर रहे हैं उसमें जेके गौड़ और उनके नेताओं को बेईमान बताया जा रहा है : कहा/बताया जा रहा है कि पिछले वर्ष काम तो जेके गौड़ का ज्यादा था, लेकिन लोगों के बीच समर्थन सुधीर मंगला के प्रति था । सुधीर मंगला के प्रति लोगों के बीच समर्थन होने का कारण यह बताया जा रहे है कि जेके गौड़ को लोग गवर्नर-मैटेरियल नहीं मान रहे थे, जिसका फायदा सुधीर मंगला को मिल रहा था । सुधीर मंगला और उनके समर्थकों का दावा है कि जेके गौड़ के पक्ष में तब के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल ने यदि बेईमानी न की होती तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुधीर मंगला ही चुने गए होते ।
सुधीर मंगला और उनके समर्थक इस तरह की बातें करके अपने लिए समर्थन घटाने का ही काम कर रहे हैं । उनकी इन बातों को सुनकर जेके गौड़ की गुडबुक में आने और या बने रहने की इच्छा रखने वाले लोग स्वतः ही सुधीर मंगला से दूर होंगे, और वह हो भी रहे हैं । सुधीर मंगला और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक जिस तरह के तर्क दे रहे हैं उनमें जिस तरह के विरोधाभास दिख रहे हैं उससे भी साफ हो रहा है कि वह सच्चाई और तथ्यों को लेकर पूरी तरह भ्रमित हैं । पिछले वर्ष को लेकर उनका मानना और कहना है कि पिछले वर्ष उम्मीदवार के रूप में काम जेके गौड़ का ज्यादा था, लेकिन फिर भी लोगों के बीच समर्थन सुधीर मंगला के लिए ज्यादा था । इस तरह, वह खुद मानते हैं कि ज्यादा काम का कोई खास मतलब नहीं होता है और अपेक्षाकृत कम काम करने वाला भी लोगों के बीच अच्छा समर्थन जुटा सकता है । लेकिन इस वर्ष की बात करते हुए वह बिलकुल उल्टा तर्क देते हैं और दावा करते हैं कि चूँकि रवि भाटिया का काम उनके मुकाबले कम है इसलिए लोगों के बीच उनका समर्थन ज्यादा है । यह उलटबयानी क्यों ? पिछले वर्ष कम काम के बावजूद यदि सुधीर मंगला को ज्यादा काम करने वाले जेके गौड़ के मुकाबले अच्छा समर्थन मिल रहा था तो इस वर्ष ज्यादा काम करने वाले सुधीर मंगला को अच्छा समर्थन मिलने के प्रति आश्वस्त कैसे हुआ जा सकता है ? सुधीर मंगला और उनके समर्थकों का मानना और कहना है कि पिछले वर्ष कम काम के बावजूद सुधीर मंगला को लोगों का समर्थन इसलिए था क्योंकि गवर्नर-मैटेरियल के संदर्भ में जेके गौड़ के मुकाबले सुधीर मंगला को ज्यादा नंबर मिल रहे थे । यही तर्क इस वर्ष लेकिन सुधीर मंगला के खिलाफ जा रहा है । गवर्नर-मैटेरियल के संदर्भ में रवि भाटिया को सुधीर मंगला से ज्यादा नंबर मिल रहे हैं । जिन लोगों को यह शिकायत है भी कि रवि भाटिया ने उनसे देर में संपर्क किया और या वह उनसे कम मिले - उन लोगों का भी मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लायक तो रवि भाटिया ही हैं ।
रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में किये गए कामकाज के संदर्भ में बात हो या आपसी व्यवहार की बात हो - सुधीर मंगला पर रवि भाटिया ही भारी पड़ते/दिखते हैं । एक उदाहरण से इसे समझा/पहचाना जा सकता है : जिस वर्ष डॉक्टर सुब्रमणियन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार बने उसी वर्ष उनके क्लब के रवि भाटिया भी उम्मीदवार होना चाहते थे, क्लब में लेकिन डॉक्टर सुब्रमणियन को समर्थन मिला । रवि भाटिया को इससे दुःख और निराशा तो हुई, लेकिन क्लब के फैसले को उन्होंने एक सच्चे खिलाड़ी की तरह स्वीकार किया और डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी की वह जैसी जो मदद कर सकते थे उन्होंने की । ऐसी ही परिस्थितियों में लेकिन जब सुधीर मंगला पड़े तो उनका आचरण बिलकुल उलट था । सुधीर मंगला ने पहली बार अपनी उम्मीदवारी के लिए अचानक से तब दावा ठोका, जब उनके ही क्लब के विनोद बंसल अपनी उम्मीदवारी को लेकर काफी काम कर चुके थे । सुधीर मंगला ने जिद पकड़ी कि विनोद बंसल ने काम चाहें जितना कर लिया हो, लेकिन उम्मीदवार वह बनेंगे । इसे लेकर उन्होंने अपने ही क्लब में संघर्ष की स्थिति पैदा की । क्लब में उम्मीदवारी को लेकर विनोद बंसल के साथ हुए संघर्ष में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा - लेकिन फिर भी उन्होंने चुप बैठने की जरूरत नहीं समझी और क्लब में ऐसा बखेड़ा खड़ा किया कि क्लब में फूट हुई और सुधीर मंगला भी क्लब और अपने वर्षों पुराने साथियों को छोड़ गए ।
सुधीर मंगला ने अपने इसी तरह के व्यवहार और रवैये से अपने दोस्तों और अपने साथियों को अपने से दूर कर लिया है । उनके चुनाव अभियान पर भी इसका असर है । कई लोगों को - जिन्हें पहले सुधीर मंगला के साथ समझा/पहचाना जाता रहा था, अब उनसे अलग और या रवि भाटिया व सुरेश भसीन के साथ देखा/पहचाना जा रहा है । सुधीर मंगला और उनके समर्थक दावा तो करते हैं कि कई नेता उनके साथ हैं लेकिन 'वे' कई नेता उनके लिए कुछ करते हुए दिखते तो नहीं हैं; कुछेक नेता तो ऐसे हैं जिनके खुद के क्लब के ड्यूज का झगड़ा पड़ा हुआ है और यही साफ नहीं है कि चुनाव में उनके खुद के क्लब की कोई भागीदारी होगी भी या नहीं । इन्हीं नेताओं में से कुछ का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों में सुधीर मंगला और उनके घोषित समर्थक विनय कुमार अग्रवाल के प्रति जो नकार का भाव है, उसे देख/पहचान कर ही उन्होंने सुधीर मंगला के साथ दिखना बंद कर दिया है । सुधीर मंगला और उनके समर्थकों ने अपनी कमजोरी का ठीकरा सुरेश भसीन के सर फोड़ना शुरू कर दिया है । उनका कहना है कि सुरेश भसीन की उम्मीदवारी उनका खेल ख़राब कर रही है । मजे की बात यह है कि सुरेश भसीन के समर्थक भी ऐसी ही बात कह रहे हैं । उनका कहना है कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी हट जाये तो वह रवि भाटिया को अच्छी चुनौती दे सकेंगे । रवि भाटिया के मुकाबले पर आने के लिए सुधीर मंगला और सुरेश भसीन के बीच जो लड़ाई छिड़ी है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है ।

Wednesday, September 25, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में राजीव देवा ने विनोद बंसल और संजय खन्ना पर भरोसा करके बड़ी भूल की है क्या

नई दिल्ली । राजीव देवा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजय खन्ना और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र के रवैये को देख कर अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं । राजीव देवा का रोना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए पहले तो इन्होंने उन्हें कुछ करने के लिए उकसाया, लेकिन अब जब उन्होंने अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह के जरिये अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने का कार्यक्रम बनाया तो ये लोग उनकी मदद करने से पीछे हट रहे हैं । राजीव देवा के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उनके लिए अपने क्लब के लोगों को भी 'इनके' समर्थन का विश्वास दिलाना मुश्किल हुआ है - जिस कारण अधिष्ठापन समारोह में लोगों को आमंत्रित करने का काम भी राजीव देवा को बुझे मन से अकेले ही जैसे-तैसे वाले अंदाज़ में करना पड़ रहा है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल, राजीव देवा द्धारा अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह को आयोजित करने की टाईमिंग को लेकर नाराज अलग देखे/बताये जा रहे हैं । विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में तटस्थ रहने का जो दावा कर रहे हैं - राजीव देवा ने 27 सितंबर को अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने का कार्यक्रम रख कर उसे सवालों के घेरे में ला दिया है । राजीव देवा चूँकि शुरू से लगातार लोगों को यह बता रहे हैं कि उन्होंने तो विनोद बंसल के कहने पर अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नामांकन भरने की अंतिम तारिख के नजदीक राजीव देवा द्धारा अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने का कार्यक्रम रखना विनोद बंसल की बदनामी का कारण बनता है । राजीव देवा के क्लब के पदाधिकारियों के अनुसार, विनोद बंसल ने उन्हें आगाह किया है कि 27 सितंबर के आयोजन में सिर्फ अधिष्ठापन संबंधी कामकाज ही होना चाहिए और उसमें ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जिसे राजीव देवा की उम्मीदवारी के प्रमोशन के रूप में देखा/समझा जाये । विनोद बंसल के इस रवैये ने अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिए रखे गए आयोजन को लेकर राजीव देवा का उत्साह ठंडा कर दिया है ।
राजीव देवा को सबसे तगड़ा झटका संजय खन्ना की तरफ से लगा है । उन्हें उम्मीद थी कि संजय खन्ना से उन्हें सक्रिय सहयोग मिलेगा । लोगों को वह बार-बार याद दिला रहे थे कि संजय खन्ना जिस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार थे, उस वर्ष असिस्टेंट गवर्नर के रूप में उन्होंने संजय खन्ना की उम्मीदवारी का खुल कर समर्थन किया था । यह बता/जता कर राजीव देवा लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रहे थे कि संजय खन्ना आखिर क्यों उनका समर्थन करेंगे । राजीव देवा का यह प्रयास उन कुछेक लोगों पर सफल होता हुआ दिखा भी, जिन्होंने संजय खन्ना को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में राजीव देवा के साथ ज्यादा घुलते-मिलते देखा/पाया । संजय खन्ना को लेकिन जैसे ही इस बात का पता चला कि उनकी मिलनसारिता का राजीव देवा इस तरह फायदा उठा रहे हैं, वह सावधान हो गए । संजय खन्ना ने राजीव देवा से जिस तरह से दूरी बनाई, उसके चलते राजीव देवा की सारी तैयारी चौपट हो गई ।
राजीव देवा ने सबसे बड़ा दाँव रमेश चंद्र को लेकर चला । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र को चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक दूसरे उम्मीदवार रवि भाटिया के समर्थन में समझा जाता है, इसलिए राजीव देवा ने लोगों के बीच जब उनके समर्थन का दावा किया तो लोगों को हैरानी इस बात की हुई कि राजीव देवा इतना बड़ा झूठ कैसे बोल सकते हैं ? रमेश चंद्र कोई बहुत सक्रियता के साथ राजनीति करते हुए नहीं सुने/देखे जाते हैं - लेकिन उनकी जो भी और जैसी भी सक्रियता है, डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने उसे रवि भाटिया के समर्थन में ही देखा/पाया है । राजीव देवा किंतु फिर भी रमेश चंद्र के समर्थन का दावा करते रहे और अपने इस दावे को कन्विन्सिंग बनाने के लिए उन्होंने तर्क बड़ा दिलचस्प दिया और वह यह कि रमेश चंद्र चूँकि सुबह उसी पार्क में टहलने आते हैं, जिस पार्क में वह टहलते हैं इसलिए रमेश चंद्र उनका समर्थन कर रहे हैं । राजीव देवा के इस तर्क को लोगों के बीच लेकिन एक चुटकुले से ज्यादा महत्व नहीं मिला । अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के लिए आयोजित किये जा रहे आयोजन की तैयारी में राजीव देवा को रमेश चंद्र का चूँकि कोई सहयोग या समर्थन मिलता हुआ नहीं दिख रहा है, इसलिए लोगों को और पक्का यकीन हो गया है कि रमेश चंद्र को लेकर किये गए राजीव देवा के दावे हवा-हवाई किस्म के ही हैं ।
राजीव देवा ने विनोद बंसल, संजय खन्ना और रमेश चंद्र के समर्थन का दावा करके अपनी उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच बढ़ाने की जो कोशिश की थी, वह उन्हें उल्टी पड़ गई है । उनके तमाम दावों के बावजूद, उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में चूँकि कोई प्रमुख 'नेता' लोगों को नहीं दिखा है - इसलिए उनकी उम्मीदवारी लोगों के बीच किसी तरह की कोई विश्वसनीयता नहीं बना सकी । उनके दावों ने विनोद बंसल और संजय खन्ना को बदनाम करने का काम बल्कि और किया - जिस पर व्यक्त की गईं उन दोनों की प्रतिक्रियाओं ने राजीव देवा की मुश्किलों को और बढ़ाया ही है ।
राजीव देवा की तुलना में लोगों के बीच सुरेश भसीन की उम्मीदवारी की ज्यादा साख है - हालाँकि उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में भी अभी नेता किस्म का कोई नहीं दिखा है । सुरेश भसीन ने इस स्थिति को दरअसल खासी होशियारी से हैंडल किया है और व्यावहारिक तर्क दिया है । उन्होंने हमेशा यही कहा है कि नेता लोग अभी भले ही उनके साथ न हों, किंतु जैसे ही लोगों के बीच उनका समर्थन दिखने लगेगा, नेता लोग खुद-ब-खुद उनके समर्थन में आ जायेंगे । राजीव देवा ने लेकिन अपने बड़बोलेपन और झूठे दावों से अपनी खुद की ही फजीहत करा ली है । अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से किये जा रहे कार्यक्रम में राजीव देवा को चूँकि किसी भी तरफ से समर्थन और सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए उनका खुद का उत्साह भी ढीला पड़ गया है । राजीव देवा अब यह कह/बता कर अपना दुःख दूर करने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्होंने विनोद बंसल और संजय खन्ना पर भरोसा करके बड़ी भूल की है ।

Wednesday, August 28, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह की तैयारी में सुधीर मंगला को अकेले जुटा देख, उनकी उम्मीदवारी से उनके क्लब के लोगों की दूरी की पोल खुली

नई दिल्ली । सुधीर मंगला को अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह की तैयारी में जिस तरह अकेले ही जुटना पड़ रहा है, उसके कारण उक्त समारोह आयोजित करना उनके लिए बेमतलब की कसरत साबित हो गया है, और इस बेमतलब की कसरत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उनकी उम्मीदवारी के अभियान को कमजोर करने का काम ही किया है । दरअसल अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह को आयोजित करने को लेकर सुधीर मंगला को जिस तरह अपने ही क्लब के लोगों का सहयोग और समर्थन नहीं मिल रहा है, उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यह मैसेज गया है कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को उनके अपने ही क्लब के लोगों का समर्थन नहीं है । क्लब के कुछेक लोगों ने डिस्ट्रिक्ट के अलग-अलग लोगों से यह कहा भी है कि क्लब के अधिष्ठापन समारोह को आयोजित करना सुधीर मंगला की जरूरत है, इसलिए उन्हें ही उसकी सारी तैयारी करनी है और वह अपनी तरह से उसे कर भी रहे हैं । उल्लेखनीय है कि सुधीर मंगला ने जिस तरह संजय गोयल को हटवा कर अपने पड़ोसी विपिन गुप्ता को क्लब का अध्यक्ष बनवाया, उससे क्लब के लोगों में सुधीर मंगला के रवैये को लेकर भारी नाराजगी पैदा हुई । सुधीर मंगला के लिए इससे भी ज्यादा झटके वाली बात यह हुई कि उन्होंने जिस उम्मीद से विपिन गुप्ता को क्लब का अध्यक्ष बनवाया, विपिन गुप्ता उन उम्मीदों पर बुरी तरह असफल साबित हुए । सुधीर मंगला की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए विपिन गुप्ता ने क्लब के अध्यक्ष के रूप में अपनी सक्रियता का कोई प्रदर्शन ही नहीं किया है ।
गौरतलब बात यह है कि रोटरी में यह एक अलिखित-सा नियम है कि जिस क्लब से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार होता है, उस क्लब का अध्यक्ष दूसरे क्लब के अध्यक्षों से तथा डिस्ट्रिक्ट के दूसरे प्रमुख लोगों से मिलने-जुलने में ज्यादा दिलचस्पी लेता है और इस तरह कुछ ज्यादा सक्रिय होता है । सुधीर मंगला के क्लब के अध्यक्ष के रूप में विपिन गुप्ता ने लेकिन इस तरह की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । विपिन गुप्ता को शायद ही किसी ने कहीं देखा हो । इसके विपरीत रवि भाटिया के क्लब के अध्यक्ष अजय नागपाल को विभिन्न आयोजनों में लोगों के बीच खूब-खूब सक्रिय देखा/पाया गया । स्वाभाविक तौर पर इस कारण से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए रवि भाटिया की उम्मीदवारी को लोगों के बीच खासा बल मिला । यहाँ तक कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के एक और उम्मीदवार सुरेश भसीन के क्लब के अध्यक्ष विजय ठाकुर को भी लोगों के बीच अपेक्षाकृत इन्बॉल्व और कंसर्न देखा/पाया गया । इसका नतीजा ही है कि सुधीर मंगला की तुलना में सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को लोगों के बीच ज्यादा नंबर मिलने लगे हैं ।
क्लब के अध्यक्ष के रूप में विपिन गुप्ता का तथा क्लब के दूसरे सदस्यों का सहयोग सुधीर मंगला को मिलता हुआ यदि नहीं नजर आ रहा है, तो इसके लिए क्लब के लोगों ने सुधीर मंगला को ही जिम्मेदार ठहराया है । उनका कहना है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर सुधीर मंगला ने क्लब के लोगों को न तो विश्वास में लिया है और न ही वह क्लब के लोगों के साथ किसी तरह की कोई सलाह करते हैं । सुधीर मंगला ने पिछले वर्ष रमेश अग्रवाल द्धारा की गई कथित बेईमानी के संदर्भ में की गई शिकायत को जिस तरह, क्लब के पदाधिकारियों को भरोसे में लिए बिना सरेंडर कर दिया था उसके चलते भी क्लब के प्रमुख सदस्य सुधीर मंगला से बुरी तरह खफा हैं । क्लब के लोगों का मानना और कहना है कि सुधीर मंगला डिस्ट्रिक्ट के जिन बदनाम और घटिया लोगों के कहने में हैं, उनके कहने में आकर ही वह क्लब के प्रमुख सदस्यों को कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं । मजे की बात यह हुई कि पहले क्लब के पदाधिकारियों ने सुधीर मंगला से क्लब के अधिष्ठापन समारोह को लेकर बात की थी, लेकिन तब सुधीर मंगला ने उसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी । सुधीर मंगला ने क्लब के अधिष्ठापन समारोह के आयोजन में अपना 'सहयोग' देने से भी साफ इंकार कर दिया था । सुधीर मंगला ने कई लोगों से साफ साफ कहा/बताया भी कि अधिष्ठापन में पैसा खर्च करने की बजाये वह अध्यक्षों को अलग से पार्टी देंगे तो उन्हें ज्यादा फायदा होगा । उनका तर्क था कि क्लब के अधिष्ठापन समारोह में उम्मीदवारी को प्रमोट करना मुश्किल होता है; उसमें क्लब प्रमोट होता है, उम्मीदवार नहीं - उसमें खर्च किया गया पैसा व्यर्थ ही जाता है । सुधीर मंगला की इन बातों को सुनकर क्लब के पदाधिकारियों ने क्लब के अधिष्ठान समारोह को आयोजित करने का इरादा त्याग दिया था ।
रवि भाटिया के क्लब के अधिष्ठापन समारोह में रवि भाटिया की उम्मीदवारी का जो प्रमोशन हुआ और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उम्मीदवार के रूप में रवि भाटिया की जो धाक जमी, उसे देख/जान कर सुधीर मंगला ने लेकिन अचनक से पलटी मारी और वह क्लब के अधिष्ठापन समारोह करने की बात करने लगे । उनके इस रवैये ने दूसरों के साथ-साथ क्लब के लोगों को भी हैरान किया । क्लब के लोगों को यह जान कर झटका लगा कि सुधीर मंगला ने अपना यह फैसला अपनी उम्मीदवारी के सलाहकारों से मिली सलाह के कारण किया है । क्लब के लोगों को एक बार फिर इस बात का सामना करना पड़ा कि सुधीर मंगला उनकी बजाये बाहर के लोगों की बात को ज्यादा अहमियत देते हैं । यह 'देख' कर क्लब के लोगों ने क्लब के अधिष्ठापन समारोह की तैयारी से अपने आप को पूरी तरह अलग कर लिया । यह बात तो सुधीर मंगला खुद ही लोगों को बता रहे हैं कि अधिष्ठापन समारोह का सारा खर्चा वही उठा रहे हैं । क्लब के लोगों के अधिष्ठापन समारोह की
तैयारी से दूर-दूर होने के बाकी तथ्य डिस्ट्रिक्ट के लोगों को खुद-ब-खुद मिल रहे हैं । कई लोगों ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि सुधीर मंगला के क्लब के अधिष्ठापन समारोह के निमंत्रण उन्हें सिर्फ सुधीर मंगला से ही मिले हैं; क्लब के पदाधिकारियों ने निमंत्रण तक देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है । इन्हीं लोगों ने बताया कि रवि भाटिया के क्लब का अधिष्ठापन समारोह हुआ था, तो उसका निमंत्रण उन्हें रवि भाटिया से भी मिला था और क्लब के अध्यक्ष से भी मिला था । रवि भाटिया की पत्नी ने आमंत्रितों की पत्नी(यों) को फोन किया था । पूर्व गवर्नर्स को रवि भाटिया और क्लब के अध्यक्ष के साथ-साथ क्लब के एक पूर्व गवर्नर रंजन ढींगरा ने भी फोन किया, तथा पूर्व गवर्नर्स की पत्नी(यों) को रंजन ढींगरा की पत्नी ने भी फोन किया । क्लब के दूसरे कुछेक सदस्यों ने भी अपनी पहल से अपने-अपने परिचितों को फोन किया था । इस तरह, रवि भाटिया के क्लब के अधिष्ठापन समारोह को रवि भाटिया की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के एक मौके के रूप में क्लब के लोगों ने सामूहिक रूप से इस्तेमाल किया । रवि भाटिया की उम्मीदवारी को इसका फायदा भी मिला । दरअसल उन्हें मिले फायदे को देख कर ही सुधीर मंगला के सलाहकारों ने उन्हें अपने क्लब का अधिष्ठापन समारोह करने के लिए तैयार किया । सलाहकारों के दबाव में सुधीर मंगला अपने क्लब का अधिष्ठापन समारोह करने को तो राजी हो गए, लेकिन अपने क्लब के लोगों का सहयोग लेने में वह विफल रहे हैं । लोगों से मिले इस फीडबैक के बाद सुधीर मंगला अपने क्लब के लोगों को मनाने में जुटे तो हैं और कोशिश कर रहे हैं कि समारोह वाले दिन क्लब के लोग उनके साथ सक्रिय 'दिखें' - उनकी इस कोशिश का क्या नतीजा निकलेगा, यह तो बाद में पता चलेगा, फ़िलहाल तो उनका नुकसान हो चुका है । न न करते हुए, क्लब का अधिष्ठापन समारोह करने को लेकर सुधीर मंगला तैयार हुए; लेकिन उनकी इस तैयारी ने उनकी उम्मीदवारी से उनके क्लब के लोगों की बनी हुई दूरी की पोल और खोल दी है । इस तरह, सुधीर मंगला को अपने सलाहकारों की सलाह पर अमल करना भारी पड़ा है ।

Monday, August 19, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर राजेश बत्रा ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी के पक्ष में हवा बनाने के लिए जो तरकीब चली उसने अपना काम किया है

नई दिल्ली/गाजियाबाद । गाजियाबाद में एक क्लब के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट के मौजूदा माहौल और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को लेकर जो बातें की/कहीं, उनसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार रवि भाटिया की उम्मीदवारी को बड़ा बल मिला और रवि भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थन में माहौल बनता हुआ नजर आया । राजेश बत्रा द्धारा की/कहीं बातों को जिन्होंने सुना, उनमें से कुछ ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि राजेश बत्रा ने हालाँकि किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने जो कुछ भी कहा उसे सुनकर वहाँ मौजूद हर किसी ने यही जाना/समझा कि राजेश बत्रा इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के संदर्भ में रवि भाटिया का समर्थन करने की जरूरत और अहमियत बता रहे हैं । राजेश बत्रा ने इस 'काम' को जिस सफाई से किया, उसके चलते भी उनकी बातों को सुनने वालों ने न सिर्फ गंभीरता से लिया - बल्कि उसके राजनीतिक आशयों को भी समझा/पहचाना । राजेश बत्रा चूँकि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर हैं, इसलिए भी उनकी 'बातों' की गंभीरता को पहचाना गया और उनके प्रति सहमति दिखाई/जताई गई ।
राजेश बत्रा ने अनौपचारिक बातचीत में इस बात को न सिर्फ रेखांकित किया बल्कि इस पर चिंता भी व्यक्त की कि कुछ लोगों ने डिस्ट्रिक्ट के माहौल को और चुनावी राजनीति को ऐसा बना दिया है कि कुछ अच्छा करने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए यहाँ बने रहना मुश्किल होने लगा है । राजेश बत्रा ने बताया कि कई लोगों ने उनसे कहा है कि जैसे एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है, वैसे ही थोड़े से लोगों की हरकतों के कारण डिस्ट्रिक्ट की और रोटरी की ऐसी बदनामी हो रही है कि अच्छे, भले और कुछ करने का जज्बा रखने वाले लोग अपने आप को हतोत्साहित महसूस करने लगे हैं और धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जा रहे हैं । राजेश बत्रा ने सिर्फ स्थिति का आकलन ही नहीं किया, बल्कि उन्होंने लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करने की कोशिश भी की कि जो लोग डिस्ट्रिक्ट को और रोटरी को बचाना चाहते हैं, उन्हें आगे आना होगा और अच्छे व सही लोगों का साथ देना होगा । राजेश बत्रा ने जो कुछ भी कहा, उसमें किसी का भी नाम नहीं लिया - लेकिन फिर भी सभी ने यह समझने/पहचानने में देर नहीं की कि उनके निशाने पर कौन है ?
दरअसल, एक अकेले राजेश बत्रा ही नहीं, बल्कि कई लोग क्लब्स के और या डिस्ट्रिक्ट के आधिकारिक आयोजनों के पहले और बाद में होने वाली अनौपचारिक बातचीतों के स्तर को लेकर अपनी अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं । अनौपचारिक बातचीतों के स्तर को गंदला करने का काम पहले मुकेश अरनेजा और असित मित्तल आदि ही करते थे, पर अब इनके भी 'गुरु' विनय कुमार अग्रवाल ने मोर्चा संभाला हुआ है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय कुमार अग्रवाल की खूबी यह है कि यह बिना अश्लील शब्दों के अपनी बात कह ही नहीं पाते हैं । इनके निशाने पर चाहे कोई वरिष्ठ रोटेरियन हो और या आम रोटेरियन हो - यह उसके लिए ऐसी-ऐसी भद्दी और अश्लील किस्म की गलियाँ इस्तेमाल करते हैं कि दूसरों के लिए उन्हें दोहराना भी संभव नहीं होता । मनुष्य की चूँकि यह एक बड़ी स्वाभाविक-सी कमजोरी है कि उसके विरोधी के खिलाफ यदि कुछ कहा जा रहा है, तो उसका मन बड़ा प्रसन्न महसूस करता है - इसके चलते कभी-कभी कुछ लोग विनय कुमार अग्रवाल की गालियों में मजा भी लेते हैं, जाहिर है कि इससे उनके हौंसले और बुलंद हुए हैं और इस कारण से उनके गाली-गलौच कार्यक्रम में और तेजी आई है । विनय कुमार अग्रवाल की गालियों के स्वर तेज होने का एक कारण यह भी है कि मुकेश अरनेजा उन्हें इस्तेमाल करने लगे हैं । किसी भी सभा/संगठन में नॉनसेंस लोगों की जो एक 'वैल्यू' होती है - विनय कुमार अग्रवाल की उस वैल्यू को पहचान कर मुकेश अरनेजा उन्हें इस्तेमाल करने लगे हैं । विनय कुमार अग्रवाल की यह वैल्यू इसलिए और 'महत्वपूर्ण' हो गई है क्योंकि विनय कुमार अग्रवाल ने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । उल्लेखनीय है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स में यदि कोई सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थन में घोषित रूप से है तो वह अकेले विनय कुमार अग्रवाल हैं ।
विनय कुमार अग्रवाल के घोषित समर्थन ने लेकिन सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का ही काम किया है । विनय कुमार अग्रवाल अपनी गाली-गलौचपूर्ण बातों से मजमा तो जोड़ लेते हैं, लेकिन वह मजमा फिर जल्दी ही उजड़ भी जाता है । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव रखने वाले, मुकेश अरनेजा की अश्लील और अशालीन किस्म की फिकरेबाजियों का शिकार रहे एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को हाल-फ़िलहाल में जब मुकेश अरनेजा और विनय कुमार अग्रवाल की बातों में रस लेते हुए देखा/पाया गया तो उन्हें सफाई देनी पड़ी की कि जहाँ ये दोनों होते हैं, वहाँ मैं ज्यादा देर रुकता ही नहीं हूँ । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी की बागडोर विनय कुमार अग्रवाल के हाथ में आने के बाद सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले कई लोगों ने ऐसी ही प्रतिक्रिया दी है । इसी नज़ारे को देख कर सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के जेनुइन किस्म के शुभचिंतकों ने चिंता व्यक्त की है कि विनय कुमार अग्रवाल के कारण सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । इसके बावजूद विनय कुमार अग्रवाल को रोका नहीं जा रहा है तो इसका कारण सुधीर मंगला के नजदीकियों के अनुसार यह है कि मुकेश अरनेजा ने सुधीर मंगला को समझाया है कि विनय कुमार अग्रवाल की बातों से दिल्ली में कुछ क्लब्स तो छिटकेंगे, लेकिन उत्तर प्रदेश और हरियाणा के क्लब्स जुड़ेंगे । ऐसा लगता है कि मुकेश अरनेजा मानते/समझते हैं कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में लोग लफंगई ही पसंद करते हैं । शायद ऐसा ही सोचकर मुकेश अरनेजा और असित मित्तल ने रवि चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु गाजियाबाद में नाच-गाना करवाया था, जिसमें फिर मार-पिटाई हो गई थी । लगता है कि मुकेश अरनेजा उसी फार्मूले को सुधीर मंगला के लिए भी आजमाना चाहते हैं । मुकेश अरनेजा का उक्त फार्मूला लेकिन जब रवि चौधरी के काम नहीं आया था, तो वह सुधीर मंगला के काम कैसे और क्यों आयेगा ?
डिस्ट्रिक्ट में लफंगई को प्रोत्साहित करने की कुछेक लोगों की कोशिश को राजेश बत्रा ने गाजियाबाद में ही मुद्दा बनाया - तो यह उनकी सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट को और रोटरी को बदनाम करने वाली बातों के खिलाफ राजेश बत्रा पहले भी आवाज उठाते रहे हैं । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि असित मित्तल के बिजनेस संबंधी लफड़ों के कारण राजेश बत्रा ने उनके खिलाफ खुला अभियान छेड़ा था और असित मित्तल से सावधान रहने को लेकर लोगों को आगाह किया था । विनय कुमार अग्रवाल की हरकतों को देखते हुए राजेश बत्रा लगता है कि एक बार फिर उसी तेवर को अपनाने जा रहे हैं । राजेश बत्रा ने हालाँकि अभी किसी का नाम नहीं लिया है लेकिन उन्होंने जिस तरह से रोटरी को और डिस्ट्रिक्ट को भले लोगों की, काम करने वाले लोगों की, परिवार सहित शामिल होने की इच्छा रखने वाले लोगों की जगह बनाने और बनाये रखने की जरूरत को रेखांकित किया है - उससे हर किसी को यह साफ समझ में आ रहा है कि उनके निशाने पर इस बार विनय कुमार अग्रवाल हैं । राजेश बत्रा के निशाने पर होंगे भले ही विनय कुमार अग्रवाल, लेकिन उससे पैदा होने वाली चोट पड़ रही है सुधीर मंगला की उम्मीदवारी पर । राजेश बत्रा ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन जब उन्होंने यह कहा कि डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की भलाई इसमें है कि भले, शरीफ और ईमानदारी से रोटरी का काम करते रहे और आगे भी करते रहने की इच्छा रखने वाले लोगों का साथ दिया जाये तो मौके पर मौजूद लोगों ने यह समझने में न तो देर की और न कोई गलती की कि वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी का समर्थन करने का अनुरोध कर रहे हैं । राजेश बत्रा लोगों के बीच यह संदेश देने में सफल रहे हैं कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी की बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में है जो रोटरी को और डिस्ट्रिक्ट को बदनाम करने का ही काम करेंगे । राजेश बत्रा की बातों को सुनने वालों की जो प्रतिक्रिया रही और जो बाद तक भी जाहिर होती रही है, उससे साफ है कि राजेश बत्रा ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी के पक्ष में हवा बनाने के लिए जो तरकीब चली उसने अपना काम किया है ।

Friday, March 29, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में क्लब के लोगों की सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए रवि भाटिया की उम्मीदवारी को मजबूत आधार दिया है

नई दिल्ली । रवि भाटिया की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के समर्थन में उनके क्लब के प्रमुख सदस्यों ने जैसा अभियान चलाया हुआ है, उससे रवि भाटिया की उम्मीदवारी को ठोस समर्थन आधार और व्यापक पहचान मिलती दिख रही है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में ऐसा कम देखने को मिला है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार को शुरू दिन से अपने क्लब के लोगों का सक्रिय समर्थन मिले । अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम शुरू में उम्मीदवार को खुद ही करना पड़ता है । बाद में फिर जब वह अपने क्लब के लोगों को साथ लेकर निकलता भी है तो क्लब के लोगों का काम सिर्फ 'दिखना' भर होता है । किन्हीं किन्हीं मामलों में तो उम्मीदवारों को अपने ही क्लब में विरोध का सामना करना पड़ा है । विनोद बंसल का उदाहरण तो बहुत ही मौजूँ है - उनकी उम्मीदवारी को उनके अपने क्लब में ही चुनौती का सामना करना पड़ा था और उनकी उम्मीदवारी के मुद्दे पर उनके क्लब में विभाजन तक हो गया था । जेके गौड़ का मामला भी कम दिलचस्प नहीं रहा । उनके क्लब के अशोक अग्रवाल कहने को तो जेके गौड़ की उम्मीदवारी के साथ थे, लेकिन दूसरों को हमेशा यही लगता रहा कि अशोक अग्रवाल के होते हुए जेके गौड़ को दुश्मनों की जरूरत नहीं पड़ेगी; दुश्मनों वाला काम अशोक अग्रवाल ही कर लेंगे । जेके गौड़ को एकतरफ तो कई लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी कि अशोक अग्रवाल उनके साथ ही हैं; और दूसरी तरफ इस बात पर ध्यान रखना पड़ा कि अशोक अग्रवाल मदद के नाम पर कहीं उनका कबाड़ा न कर दें । संजय खन्ना को भी अपने क्लब के लोगों का समर्थन जुटाने - 'दिखाने' में काफी इंतजार करना पड़ा और बिलकुल आख़िरी दिनों में ही क्लब के लोग उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय 'दिखे' थे । रमेश अग्रवाल का अपने क्लब में भले रूतबा चाहें जैसा भी हो, लेकिन पहले वर्ष में जब वह हारे तब और दूसरे वर्ष में जब वह जीते तब - अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम उन्हें अकेले ही करना पड़ा था ।
हाल-फ़िलहाल के इन उदाहरणों को देखते/पहचानते हुए रवि भाटिया की स्थिति बहुत ही अच्छी दिखाई देती है - उनके क्लब के कुछेक प्रमुख लोग डिस्ट्रिक्ट के होली मिलन समारोह में जिस तरह उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में चर्चा करते नजर आये उससे लोगों के बीच यह संदेश गया है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को अपने क्लब में एकतरफा और पूरा समर्थन है । इस संदेश का इसलिए खासा महत्व है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कुछेक नेता लगातार यह प्रचार कर रहे हैं कि रवि भाटिया को अभी तो अपने क्लब में ही अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाना है । डॉक्टर सुब्रमणियन का नाम लेकर रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए क्लब में संकट और विरोध की बातें करके कुछेक नेता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की फ़िराक में लगे हुए हैं । इसलिए रवि भाटिया के क्लब के प्रमुख सदस्यों की सक्रियता ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने का काम तो किया ही है, रवि भाटिया की उम्मीदवारी के खिलाफ काम करने वाले नेताओं को भी 'चुप' हो जाने के लिए मजबूर किया है ।   
डिस्ट्रिक्ट के होली मिलन समारोह में रवि भाटिया के क्लब के जो लोग सक्रिय थे, उनमें से एक मुनीश गौड़ से इन पँक्तियों के लेखक की भी बात हुई । मुनीश गौड़ पिछले रोटरी वर्ष में क्लब के अध्यक्ष थे और तमाम प्रतिकूल दवाबों के बावजूद उन्होंने संजय खन्ना की उम्मीदवारी को समर्थन दिया था । तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर असित मित्तल ने रवि चौधरी की उम्मीदवारी के लिए उनका समर्थन पाने के लिए उनके क्लब के वोटों को कम करने की चाल चली थी, लेकिन क्लब के अध्यक्ष के रूप में मुनीश गौड़ ने किसी भी दबाव में आने से तो इंकार किया ही, साथ ही पूरे वोटों का अधिकार भी प्राप्त किया । मुनीश गौड़ के दबदबे के सामने असित मित्तल की एक नहीं चली थी । वही मुनीश गौड़ डिस्ट्रिक्ट के होली मिलन समारोह में जोर शोर से यह दावा कर रहे थे कि क्लब में रवि भाटिया की उम्मीदवारी को लेकर किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है, और जो कोई भी इस तरह की बात कर रहा है वह सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसा झूठ बोल रहा है । मुनीश गौड़ ने दावा किया कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी की बात सामने आने और उनकी उम्मीदवारी को क्लब में हरी झंडी मिलने के बाद उन्होंने डिस्ट्रिक्ट में जिन भी लोगों से बात की है, उन्होंने पाया है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों में उत्साह है और समर्थन का भाव है । मुनीश गौड़ का ही कहना/बताना रहा कि रवि भाटिया को चूँकि डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोग जानते हैं और रवि भाटिया भी अधिकतर लोगों को चूँकि जानते हैं इसलिए रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अभी से ही समर्थन का तेवर नजर आ रहा है ।
मुनीश गौड़ ने हालाँकि यह भी स्वीकार किया कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेताओं को रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति दिख रहे समर्थन का दृश्य अच्छा नहीं लग रहा है और वह लगातार किसी न किसी को उम्मीदवार बनाने की मुहिम में जुटे हुए हैं । यह सच है कि नकारात्मक सोच रखने वाले ऐसे नेताओं को अभी तक अपनी मुहिम में सफलता नहीं मिली है - दरअसल उम्मीदवार हो सकने वाले लोग 'ऐसे' नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, जिनका उद्देश्य ही अपनी राजनीति 'दिखाने' के लिए झूठे वायदों के आधार पर अपने लोगों को ही चूसने, लुटवाने और मजाक का विषय बना देना रहता है । रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच दिख रहे समर्थन को पहचानते/समझते हुए उन लोगों के क़दमों को भी पीछे हटते हुए पाया जा रहा है जिनकी उम्मीदवारी की चर्चा सुनी जा रही थी । मुनीश गौड़ का कहना है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद क्लब के लोग रवि भाटिया की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचा सकने वाले नेताओं की गतिविधियों से सावधान हैं और इसलिए रवि भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थन में क्लब के लोग सक्रिय हैं । रवि भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थन के प्रति उनके क्लब के लोगों की इस सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को एक नई शक्ल तो दी ही है, साथ ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी को मजबूत आधार भी दिया है ।

Monday, March 18, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में अजय जुनेजा की उम्मीदवारी को विनोद बंसल के समर्थन की बात सच है या मिसमैनेजमेंट के कारण पैदा हुई गलतफहमी है

नई दिल्ली । विनोद बंसल ने डीटीटीएस में अजय जुनेजा को आमंत्रित करके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपनी भूमिका को विवादास्पद बना लिया है । डीटीटीएस में अजय जुनेजा की उपस्थिति दरअसल उस समय सवालों के घेरे में आ गई जब लोगों ने डीटीटीएस में रवि भाटिया की अनुपस्थिति के बारे में विनोद बंसल से पूछा । विनोद बंसल से यह सुनकर कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को डीटीटीएस में आमंत्रित नहीं किया है; लोगों ने उनसे पूछा कि तब फिर यहाँ अजय जुनेजा कैसे हैं ?
विनोद बंसल ने इसका जबाव यह दिया कि उन्हें यह पता ही नहीं है कि अजय जुनेजा भी उम्मीदवार हैं ? विनोद बंसल के इस जबाव ने लोगों को हैरान किया और फिर उन्होंने आपस में चर्चा शुरू की कि जो बात पूरे डिस्ट्रिक्ट को पता है वह विनोद बंसल को क्यों नहीं पता है ? यह सवाल भी उठा कि विनोद बंसल को रवि भाटिया के उम्मीदवार होने का ही कैसे पता चला है ? विनोद बंसल ने जो कुछ भी पहले 'किया' और फिर जो कहा उससे स्पष्ट हुआ कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को लेकर उनकी अपनी कोई 'राजनीति' है ।
विनोद बंसल की बदकिस्मती यह है कि 'कोई राजनीति न करने' के उनके दावे पर किसी को विश्वास नहीं है । 'उन्हें पता नहीं था' जैसी उनकी बातों को कोई भी सच नहीं मान रहा है । डीटीटीएस में रवि भाटिया को आमंत्रित न करने और अजय जुनेजा को आमंत्रित करने के पीछे विनोद बंसल की सोची-समझी राजनीति को ही देखा/पहचाना जा रहा है । सतीश सिंघल और राजीव देवा को चूँकि कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है, इसलिए उनमें से किसी को बुला लिया और किसी को नहीं बुलाया - इसे लेकर कोई भी कयास नहीं लगा रहा है; लेकिन रवि भाटिया और अजय जुनेजा के नाम पर गहमागहमी है । विनोद बंसल के नजदीकियों को ही लग रहा है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को चूँकि राजेश बत्रा का समर्थन है इसलिए विनोद बंसल को रवि भाटिया की उम्मीदवारी पसंद नहीं आ रही है । विनोद बंसल को लग रहा है कि रवि भाटिया के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने जाने की स्थिति में राजेश बत्रा की राजनीती जमेगी/बढ़ेगी और उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा । अपनी राजनीति ज़माने/चलाने के लिए विनोद बंसल को 'अपना' उम्मीदवार लाना जरूरी लग रहा है - और अपनी इसी जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने अजय जुनेजा की तरफ 'देखा' है । डीटीटीएस में कई लोगों ने इस बात का नोटिस लिया कि कई मौकों पर विनोद बंसल और अजय जुनेजा गुपचुप गुपचुप रूप से 'अपनी' खिचड़ी पका रहे थे । दरअसल दोनों की अकेले अकेले होने वाली छोटी-छोटी बातचीतों में ही लोगों ने अजय जुनेजा के जरिये राजनीति करने/ज़माने की विनोद बंसल की कोशिशों को चरितार्थ होते देखा ।
विनोद बंसल से हमदर्दी रखने वाले कुछेक लोगों के लिए हालाँकि इस बात को हजम कर पाना मुश्किल भी हो रहा है कि अजय जुनेजा की उम्मीदवारी को विनोद बंसल भला क्यों समर्थन देंगे ? विनोद बंसल जब उम्मीदवार थे तब अजय जुनेजा ने अपनी उम्मीदवारी के जरिये उन्हें कम तंग किया था क्या ? विनोद बंसल कुछ भी 'भूलने' वाले व्यक्ति नहीं हैं - किये गए वायदे को न निभा पाने की सूरत में भूलने का वास्ता देकर बच निकलने की विनोद बंसल भले ही जब-तब कोशिश करते रहते हों - लेकिन 'भूलते' वह कुछ भी नहीं हैं । जब वह सुधीर मंगला को नहीं 'भूले' तब फिर अजय जुनेजा को भला कैसे 'भूल' जायेंगे ? ऐसा सोचने/मानने वाले लोगों का कहना यह है कि डीटीटीएस की तैयारी में हुए मिसमैनेजमेंट के कारण विनोद बंसल को इस विवाद में फँसना पड़ा है । उनका कहना है कि विनोद बंसल यदि डीटीटीएस में शामिल होने का निमंत्रण देते समय यदि यह पूछते चलते कि आमंत्रित होने वाला रोटेरियन उम्मीदवार बनने की तैयारी तो नहीं कर रहा है - तब यह बखेड़ा ही खड़ा नहीं होता । समस्या लेकिन यह है कि यह सब करने का विनोद बंसल के पास समय ही नहीं है । विनोद बंसल ने डिस्ट्रिक्ट का काम करने के लिए न तो कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया है, न कोई टीम बनाई है - इसका एक कारण यह तो है ही कि उनके पास समय नहीं है; दूसरा कारण यह भी लगता है कि उन्हें किसी पर भरोसा ही नहीं है । इसका नतीजा यह हो रहा है कि उनके आयोजनों की दूसरों को जानकारी नहीं है और डिस्ट्रिक्ट में क्या हो रहा है यह उन्हें पता नहीं चलता । इसके चलते वह विवाद में जा फँसते हैं ।
अजय जुनेजा की उम्मीदवारी को समर्थन देने का जो आरोप विनोद बंसल पर लगा है - वह सच है या मिसमैनेजमेंट के कारण पैदा हुई गलतफहमी का नतीजा है, यह विनोद बंसल की आगे की गतिविधियों से ही तय हो सकेगा । इसलिए लोगों को लगता है कि विनोद बंसल की आगे की गतिविधियाँ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति की दिशा और दशा को तय करने का काम करेंगी । 

Tuesday, March 12, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के संदर्भ में लगातार मिल रही प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं से सतीश सिंघल के लिए अपनी उम्मीदवारी को बनाये रखना मुश्किल हुआ

नई दिल्ली । सतीश सिंघल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी प्रस्तावित उम्मीदवारी पर जिस तरह की प्रतिक्रिया मिली है, उसने उनको हतोत्साहित करने का ही काम किया है । विनोद गोयल की ‘अभी दो तीन वर्ष काम करने’ वाली सलाह ने तो सतीश सिंघल को बुरी तरह बिफरा दिया है । विनोद गोयल तथा अन्य लोगों से मिलने वाली प्रतिक्रिया ने सतीश सिंघल और उनके समर्थकों को यह अहसास साफ-साफ करा दिया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की तरफ जाने वाली राह उनके लिए आसान नहीं होगी । सतीश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी प्रस्तावित उम्मीदवारी के संदर्भ में अभी तक जिन भी लोगों से संपर्क किया है, उनमें से जिनसे भी इन पंक्तियों के लेखक की बात हो सकी है उन सभी का प्रायः एक स्वर में यही कहना है कि सतीश सिंघल का जो टेम्परामेंट है, उसके कारण एक उम्मीदवार ‘बनना’ उनके लिए मुश्किल ही होगा ।
दरअसल ब्लड बैंक को लेकर सतीश सिंघल का रोटेरियंस के प्रति - खासकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के प्रति - जो रवैया रहा था, उसे याद करते हुए लोगों का कहना है कि सतीश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट में पहले से ही लोगों को नाराज किया हुआ है, और अपनी एक नकारात्मक पहचान बनाई हुई है - ऐसे में उनके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए लोगों का समर्थन जुटाना काफी चुनौतीपूर्ण होगा । सतीश सिंघल उन दुर्भाग्यशाली लोगों में से हैं जिन्हें अपने अच्छे काम के लिए भी कोई समर्थन और प्रशंसा नहीं मिली है । सतीश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट में दूसरे ब्लड बैंक को स्थापित करने का ऐसा महत्त्वपूर्ण और बड़ा काम किया है, जिसे करने के बारे में दूसरे किसी ने सोचा तक भी नहीं है । इसके बावजूद - डिस्ट्रिक्ट में एक बड़े प्रोजेक्ट को अपने दम पर संभव कर दिखाने के बावजूद सतीश सिंघल को लेकिन डिस्ट्रिक्ट के लोगों से कोई तारीफ सुनने को नहीं मिली । सतीश सिंघल खुद भी इस बात को बड़ी तल्खी से, बड़ी निराशा से और बड़े गुस्से के साथ कहते/बताते रहे हैं कि उनके ब्लड बैंक जैसे बड़े प्रोजेक्ट को रोटेरियंस से कोई सहयोग और समर्थन नहीं मिला । उनके प्रोजेक्ट में दिलचस्पी न दिखाने और सहयोग न करने को लेकर सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स किस्म के लोगों को खुलेआम कोसते भी रहे हैं ।
सतीश सिंघल के इसी रवैये ने एक बड़ा काम करने के बावजूद उन्हें लोगों के निशाने पर ही रखा है - और उस प्रशंसा से उन्हें दूर ही रखा, जिसके कि वह वास्तव में हकदार हैं । उन्हें प्रशंसा की बजाये आलोचना ही मिली है । इसके लिए लेकिन वह खुद ही जिम्मेदार हैं । सार्वजनिक रूप से उन्हें जिम्मेदार ठहराने का काम किया था अमित जैन ने । अपने गवर्नर-काल में अमित जैन ने सतीश सिंघल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह में सतीश सिंघल के रवैये की खुली आलोचना की थी । अमित जैन का कहना था कि सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को तो कोसते रहते हैं कि किसी ने उनके प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं ली और रोटरी इंटरनेशनल से मदद नहीं दिलवाई, लेकिन सच यह है कि सतीश सिंघल ने कभी भी उचित तरीके से मदद के लिए आवेदन ही नहीं दिया है । डिस्ट्रिक्ट के कुछेक प्रमुख लोगों ने भी बताया है कि सतीश सिंघल ने उनसे जब अपने प्रोजेक्ट में मदद के लिए कहा तो उन्होंने सतीश सिंघल से कहा कि वह उनके क्लब की किसी मीटिंग में आकर अपने प्रोजेक्ट के बारे में प्रेजेंटेशन दें, ताकि क्लब के सदस्यों को मदद के लिए प्रेरित किया जा सके - लेकिन सतीश सिंघल ने ऐसा कुछ करने में दिलचस्पी ही नहीं ली । जहाँ कहीं सतीश सिंघल प्रेजेंटेशन देने के लिए तैयार भी हुए, वहाँ मौके पर पहुँचे ही नहीं - जाहिर है कि उन्हें अपने प्रोजेक्ट के लिए मदद नहीं मिली । लोगों को इससे समस्या नहीं हुई कि सतीश सिंघल एक बड़े प्रोजेक्ट में डिस्ट्रिक्ट के लोगों को नहीं जोड़ सके और उनकी मदद नहीं ले सके - समस्या यह देख कर हुई कि सतीश सिंघल ने उनके प्रोजेक्ट में मदद न करने के लिए लोगों को लताड़ा और लोगों के प्रति अपनी नाराजगी को सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया; और बार-बार व्यक्त किया - और जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को खास तौर से लताड़ा । अपनी बातों से उन्होंने यह दिखाने/जताने की कोशिश की कि जैसे एक अकेले उन्हीं को रोटरी में कुछ करने का हौंसला है, तथा बाकी लोग तो कुछ करना ही नहीं चाहते हैं । सतीश सिंघल के इसी रवैये के कारण सतीश सिंघल को एक बड़ा प्रोजेक्ट संपन्न करने के बावजूद लोगों से तारीफ नहीं मिली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उनकी उम्मीदवारी को लेकर इसीलिए उनके नजदीकियों तक का कहना है कि सतीश सिंघल ने तो डिस्ट्रिक्ट में पहले से ही अपने विरोधी बनाये हुए हैं, ऐसे में उनके लिए अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाना मुश्किल ही होगा । चुनावी राजनीति की जरूरतों को पहचानने/समझने वाले लोगों का मानना और कहना है कि लोगों के साथ जुड़ने की कोशिश के बिना एक प्रोजेक्ट तो संभव किया जा सकता है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए समर्थन नहीं जुटाया जा सकता ।
सतीश सिंघल को मुकेश अरनेजा का उम्मीदवार समझे जाने के कारण भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है । कुछेक लोगों ने उनसे दो-टूक कहा कि मुकेश अरनेजा जैसे घटिया किस्म के व्यक्ति के सहारे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की कोशिश करोगे, तो भई हम तो आपका साथ नहीं देंगे । लोगों से मिली इस प्रतिक्रिया ने सतीश सिंघल के हाथ-पैर फुला दिए - और उन्हें लोगों के बीच सफाई देनी पड़ी कि वह मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार नहीं हैं । सतीश सिंघल के शुभचिंतकों ने भी उन्हें समझाया कि रवि चैधरी और आलोक गुप्ता के अनुभव से सबक लेकर उन्हें मुकेश अरनेजा से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा रवि चैधरी और आलोक गुप्ता जैसा हाल ही होगा । मजे की बात यह हुई कि सतीश सिंघल को इस ‘मुसीबत’ में फँसाया भी मुकेश अरनेजा ने ही - सतीश सिंघल ने तो अपनी उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा के समर्थन का दावा कभी किया नहीं; मुकेश अरनेजा ने ही उनकी उम्मीदवारी के प्रति समर्थन की-सी बातें की, जिससे उन्हें मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा । मुकेश अरनेजा के साथ दरअसल समस्या यह हुई है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख नेताओं का जिस तरह समर्थन मिलता दिख रहा है, उसके चलते उनकी राजनीति के तो पूरी तरह पिटने की नौबत आ गई है । मुकेश अरनेजा के समर्थन के बावजूद पहले रवि चैधरी और फिर आलोक गुप्ता के साथ जो हुआ, उसे देखते/समझते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के संभावित उम्मीदवार मुकेश अरनेजा से ऐसे बच रहे हैं, जैसे मुकेश अरनेजा को कोई खुजली वाली बीमारी हो गई है । मुकेश अरनेजा ने हरीश मल्होत्रा से डॉक्टर सुब्रमणियन को उम्मीदवार बनवाने को लेकर बात की थी, ताकि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को प्रस्तुत होने से रोका जा सके - लेकिन हरीश मल्होत्रा ने उन्हें ऐसी लताड़ लगाई कि बेचारे मुकेश अरनेजा को अपना-सा मुँह लेकर रह जाना पड़ा । डिस्ट्रिक्ट में अपनी राजनीति को बचाने के लिए मुकेश अरनेजा को अब एक ऐसे उम्मीदवार की जरूरत है जो रवि भाटिया की उम्मीदवारी को टक्कर दे सके। सतीश सिंघल को उम्मीदवारी प्रस्तुत करते देख मुकेश अरनेजा ने झट से उनकी उम्मीदवारी के प्रति समर्थन दिखाना शुरू कर दिया । मुकेश अरनेजा का खुद-ब-खुद आगे बढ़ कर उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करना सतीश सिंघल को पहले तो बहुत रास आया, लेकिन जैसे ही मुकेश अरनेजा के समर्थन को लेकर लोगों के विरोध से उनका सामना हुआ, उनकी आँखों के सामने रवि चैधरी और आलोक गुप्ता की तस्वीरें तैरने लगीं । फिर सतीश सिंघल ने अपनी उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा से बचाने का प्रयास शुरू किया । लगातार मिल रही प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं को देखते/झेलते हुए सतीश सिंघल और उनके शुभचिंतकों को लगने लगा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की दौड़ कोई आसान दौड़ नहीं है ।

Friday, December 28, 2012

रवि भाटिया की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की उम्मीदवारी को राजेश बत्रा के ‘कनेक्शन’ के कारण विनोद बंसल का समर्थन भी मिल सकेगा क्या ?

नई दिल्ली । रवि भाटिया के जरिये रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल की अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की खबरों ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है । दिलचस्प इसलिए क्योंकि रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल ने मौजूदा रोटरी वर्ष में डॉक्टर सुब्रमणियन के जरिये अपनी जो उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, उसमें उसे सफलता नहीं मिली; लिहाजा हर किसी के लिए उत्सुकता का विषय यह है कि मौजूदा रोटरी वर्ष के अनुभव से रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के लोगों ने क्या सबक सीखा है और उस सीखे हुए सबक से वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी को किस तरह लोगों के बीच समर्थन दिलवाते हैं और स्वीकार्य बनाते/बनवाते हैं । क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव में यूँ तो उम्मीदवार की अपनी सक्रियता ही काम आती है और क्लब की कोई बहुत भूमिका नहीं होती है - लेकिन फिर भी कोई उम्मीदवार यदि क्लब के लोगों को अपने अभियान में प्रभावी तरीके से शामिल करता है; क्लब के लोगों की मदद लेता है तो निश्चित ही उसे इसका फायदा मिलता है । रवि भाटिया चूँकि क्लब के पुराने सदस्य हैं, इसलिए क्लब के पुराने और प्रमुख लोगों के साथ उनके गहरे विश्वास के संबंध हैं । जाहिर है की यह संबंध चुनाव में व्यावहारिक तरीके से उनके काम आयेंगे । यूँ तो क्लब के लोगों के साथ डॉक्टर सुब्रमणियन के भी अच्छे संबंध थे; और क्लब के लोगों ने उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में काम भी किया - लेकिन क्लब के लोगों का काम डॉक्टर सुब्रमणियन के काम इसलिए नहीं आ सका, क्योंकि क्लब के लोगों के साथ उनका बहुत जुड़ाव नहीं था; और जो लोग डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ सक्रिय थे, उनका न डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ और न डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के साथ कोई परिचय रहा है ।
रवि भाटिया के मामले में संबंधों का ‘गणित’ और संबंधों की 'केमिस्ट्री’ लेकिन बिल्कुल अलग है । रवि भाटिया ने कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ काम किया है; और इस कारण से वह कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की कोर टीम का हिस्सा रहे हैं । इस नाते से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि भाटिया की पहचान तो है ही, लोग उनकी कार्य-क्षमताओं और रोटरी में तथा डिस्ट्रिक्ट में उनकी सक्रिय संलग्नता से भी परिचित हैं । डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि भाटिया के इस परिचय के चलते क्लब के लोगों के लिए भी रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए अभियान चलाना सुविधाजनक हो जाता है । उल्लेखनीय है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी के संदर्भ में इन्हीं ‘सुविधाओं’ का वास्ता देकर क्लब के कुछेक प्रमुख लोग मौजूदा वर्ष में ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी की वकालत कर रहे थे; किंतु पिछली डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में निभाई गई अपनी सक्रिय भूमिका से लाभ मिलने का वास्ता देकर डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा, तो रवि भाटिया की उम्मीदवारी की वकालत करने वालों ने डॉक्टर सुब्रमणियन को मौका दे देने की बात मान ली । डॉक्टर सुब्रमणियन के चुनावी मुकाबले से बाहर होने के बाद रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के तथा डिस्ट्रिक्ट के कई एक नेताओं का मानना और कहना रहा कि रवि भाटिया यदि उम्मीदवार होते तो इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता । किंतु जो हुआ, उसे खिलाड़ीभावना के साथ स्वीकार करते हुए रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के प्रमुख लोगों ने अगले रोटरी वर्ष में रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है ।
रवि भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक अब की बार वह गलती नहीं करना चाहते हैं, जो पिछली बार हो जाने के कारण उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का मौका उनसे छिन गया था । पिछली बार रवि भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक रवि भाटिया की उम्मीदवारी की घोषणा करने की टाइमिंग को लेकर गच्चा खा गये थे । वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी को जब तक सामने लाते, उससे पहले ही डॉक्टर सुब्रमणियन ने चूँकि अपनी उम्मीदवारी के लिए लॉबीइंग शुरू कर दी - जिस कारण रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने का मौका जाता रहा । अगले रोटरी वर्ष के लिए चूँकि अभी तक किसी ने भी अपनी उम्मीदवारी की बात नहीं की है, इसलिए रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों ने अभी से उनकी उम्मीदवारी की बात करना शुरू करके बढ़त बनाने का लाभ लेने की होशियारी चली है । अगले रोटरी वर्ष के लिए उम्मीदवार के रूप में कुछेक नाम बीच-बीच में सुने तो गये हैं, लेकिन जितने अचानक तरीके से वह नाम सामने आये उतने ही रहस्यपूर्ण ढंग से वह गुम भी हो गये हैं । पिछले दो-तीन वर्षों का नजारा देखें तो एक बात कॉमन दिखती है और वह यह कि जिस उम्मीदवार ने पहले से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, चुनावी बाजी उसके हाथ लगी । इस वर्ष जेके गौड़ चुने गये हैं, तो उनकी उम्मीदवारी की चर्चा दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में पहले से थी । उनसे पहले संजय खन्ना और उनसे भी पहले विनोद बंसल जीते तो उनकी उम्मीदवारी भी अपने-अपने प्रतिद्धंद्धियों से पहले सामने आई थी । यह कोई टोटके का मामला नहीं है - पहले से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से आम लोगों के बीच यह संदेश जाता है कि पहले से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाला उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से ले रहा है । जब कोई उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेता नजर आता है, तो दूसरे लोग भी उसकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते हैं । देर से उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के मामले में इम्प्रेशन यही पड़ता है कि उक्त उम्मीदवार लगता है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही कन्फ्यूज रहा होगा, इसलिए देर से अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत कर रहा है । अब जो उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही कन्फ्यूज रहा हो, उसके लिए अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के कन्फ्यूजन को दूर कर पाना मुश्किल ही होता है । चुनावी नतीजों से भी यही बात साबित होती रही है । इसलिए ही रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को अभी से ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करना जरूरी भी लगा और उपयोगी भी ।
रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को अगले रोटरी वर्ष में स्थितियाँ यदि रवि भाटिया के अनुकूल लग रही हैं तो इसका एक बड़ा कारण राजेश बत्रा का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर होना है । राजेश बत्रा यूँ तो चुनावी राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका निभाते हुए नहीं देखे/पाये गये हैं, लेकिन रवि भाटिया के साथ उनके नजदीकी संबंधों को देखते हुए यह विश्वास तो किया ही जा सकता है कि उनके नजदीकी संबंधों के चलते मनोवैज्ञानिक फायदा तो रवि भाटिया को मिलेगा ही । राजेश बत्रा के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनोद बंसल के लिए भी ऐसा कुछ कर पाना संभव नहीं होगा, जिससे कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को नुकसान पहुंचे । रवि भाटिया से विनोद बंसल के कोई विरोध के संबंध नहीं हैं; लेकिन मुकेश अरनेजा के साथ विनोद बंसल की जो निकटता है उसे देखते हुए रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को विनोद बंसल के रवैये को लेकर कुछ आशंका है । रवि भाटिया हालाँकि इस नाते से खुशकिस्मत हैं कि जिन लोगों के विनोद बंसल के भरोसे उम्मीदवार बनने की चर्चा/संभावना थी, वह पीछे हटते दिख रहे हैं; और अभी तक ऐसे किसी नाम की चर्चा नहीं है जिसे विनोद बंसल के उम्मीदवार के तौर पर देखा/पहचाना जाये । रवि भाटिया के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को ही नहीं, दूसरे अन्य लोगों को यह विश्वास भी है कि राजेश बत्रा के ‘कनेक्शन’ के कारण रवि भाटिया ही हो सकता है कि विनोद बंसल के उम्मीदवार हो जायें । यह विश्वास इसलिए बना और बढ़ा है क्योंकि रवि भाटिया की उम्मीदवारी की चर्चा शुरू होते ही कुछेक संभावनाशील उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी उम्मीदवारी से इंकार करना शुरू कर दिया है । ऐसा ही नजारा रहा तो नेताओं के पास और डिस्ट्रिक्ट के पास ज्यादा विकल्प ही नहीं होंगे - और तब रवि भाटिया को हो सकता है कि किसी खास चुनौती का सामना ही न करना पड़े । हालाँकि यह सोचना/मानना थोड़ा जल्दबाजी करना भी होगा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए आक्रामक तरीके से अभियान चला सकने की क्षमता रखने वाले कुछेक रोटेरियंस को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुक देखा/सुना जा रहा है । हालाँकि उनके बारे में अभी यह सुनिश्चित नहीं है कि वह अगले वर्ष उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे या और आगे आने वाले वर्षों में ? जो होगा, वह तो आगे पता चलेगा - फ़िलहाल तो रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी की चर्चा चला कर अगले वर्ष होने वाली चुनावी दौड़ में रवि भाटिया की उम्मीदवारी को आगे तो बढ़ा ही दिया है ।

Wednesday, April 4, 2012

देखा असर ....................! रमेश अग्रवाल ने अपनी आलोचना से कुछ सबक तो सीखा है, लेकिन 'हेराफेरी' से वह सचमुच बाज आयेंगे क्या ?

नई दिल्ली | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को हेराफेरीपूर्ण तरीके से 'मौका' देने को लेकर रमेश अग्रवाल की चारों तरफ जो थू थू हुई, उससे सबक लेकर रमेश अग्रवाल ने पेट्स की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टीम के सदस्यों की अभी हाल ही में जो मीटिंग बुलाई उसमें उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाया | उल्लेखनीय है कि अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी होड़ से दूर और तटस्थ दिखाने के चक्कर में रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को अपनी टीम में शामिल करने से तो इंकार कर दिया, लेकिन अपने सभी कार्यक्रमों में उन्हें नियमित रूप से शामिल करते रहे | रमेश अग्रवाल ने गजब तो यह किया कि पहले ऐजी एंड डिस्ट्रिक्ट कोर टीम ट्रेनिंग सेमिनार में तथा बाद में डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमिनार (DTTS) में उन्होंने संभावित उम्मीदवारों को भी शामिल किया | सबसे पहले 'रचनात्मक संकल्प' ने यह सवाल उठाया था कि रमेश अग्रवाल ने जिन लोगों को अपनी टीम का सदस्य बनाने से इंकार कर दिया है, उन लोगों को 'कोर टीम सेमिनार' व 'डिस्ट्रिक्ट टीम सेमिनार' में आमंत्रित करने के पीछे आखिर उद्देश्य क्या है ? रमेश अग्रवाल के नजदीकियों के हवाले से ही 'रचनात्मक संकल्प' ने बताया था कि इसके पीछे उद्देश्य दरअसल संभावित उम्मीदवारों से पेट्स के लिए पैसा ऐंठना है | 'रचनात्मक संकल्प' में यह बात सामने आने के बाद रमेश अग्रवाल की चौतरफा आलोचना हुई | दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के रमेश अग्रवाल के साथी गवर्नर्स ने भी आश्चर्य से पूछना/कहना शुरू किया कि रमेश अग्रवाल बातें तो बड़ी ऊँची ऊँची करते हैं, हरकतें उनकी ऐसी हेराफेरी वाली हैं ? रमेश अग्रवाल को अपने डिस्ट्रिक्ट में भी पूर्व गवर्नर्स की आलोचना का शिकार होना पड़ा | पूर्व गवर्नर्स के साथ की गई मीटिंग में रमेश अग्रवाल ने होशियारी तो दिखाई कि नियम और व्यवस्था की बात करने वाले पूर्व गवर्नर्स को उन्होंने मीटिंग में बुलाया ही नहीं, और सिर्फ उन्हीं पूर्व गवर्नर्स को बुलाया जिनसे उन्हें उम्मीद थी कि वह उनकी आलोचना नहीं करेंगे | इतनी होशियारी करने के बाद भी रमेश अग्रवाल आलोचना से बच नहीं पाये | रमेश अग्रवाल की इस बात के लिए अच्छी खिंचाई हुई कि जिन लोगों को उन्होंने खुद ही तो अपनी टीम में शामिल नहीं किया, फिर क्यों उन्हीं लोगों को वह अपनी टीम के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए बुलाते हैं ?
रमेश अग्रवाल ने समझ लिया कि 'रचनात्मक संकल्प' ने जो मुद्दा उठाया उस मुद्दे का व्यापक असर हुआ है और उसने उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में और दूसरे डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स के बीच उनकी खासी फजीहत करा दी है | इससे उन्होंने सबक लिया और पहली बार - पहली बार उन्होंने अपने किसी कार्यक्रम में उन लोगों को शामिल नहीं किया जो उनकी टीम में नहीं हैं |
तो क्या रमेश अग्रवाल पर सचमुच असर हुआ है ? रमेश अग्रवाल वह नौटंकीपना अब नहीं दिखायेंगे जो अभी हाल तक वह दिखाते रहे हैं ?
रमेश अग्रवाल को जानने वाले लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल पर अभी असर होता हुआ जरूर दिखा है, लेकिन यह असर ज्यादा दिन तक बना नहीं रह पायेगा; क्योंकि रमेश अग्रवाल उन लोगों में से हैं जिनके बारे में मशहूर कहावत कही गई है कि 'चोर चोरी से जाये, पर हेराफेरी से न जाये' | रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि रमेश अग्रवाल ने पेट्स की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टीम के सदस्यों की मीटिंग में भले ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाया है, लेकिन पेट्स में संभावित उम्मीदवारों की उपस्थिति को आप अवश्य ही देखेंगे | पेट्स, जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि प्रेसीडेंट इलेक्ट सेमिनार है - जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट की उपस्थिति होनी होती है | इस कार्यक्रम को संभव बनाने तथा अच्छे से आयोजित करने के लिए कुछेक लोगों का सहयोग चाहिए होता है - जिन लोगों को सहयोग करने के लिए चुना जाता है उनकी उपस्थिति की बात भी समझ में आती है | लेकिन जिन लोगों को सहयोग के लिए नहीं चुना जाता, जिन लोगों का पेट्स में कोई काम नहीं है - पेट्स में उनकी उपस्थिति का क्या अर्थ है ? पेट्स की तैयारियों से जुड़े रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों का पेट्स में कोई काम नहीं है, पेट्स की तैयारी से जुड़ी मीटिंग में रमेश अग्रवाल ने उन्हें बुलाया भी नहीं - लेकिन पेट्स में वह उपस्थित होंगे | इसलिए होंगे - क्योंकि रमेश अग्रवाल उनसे मोटा पैसा ऐंठ चुके हैं |
रमेश अग्रवाल लेकिन जिन संभावित उम्मीदवार से पैसा नहीं ऐंठ पाये - जैसे रवि भाटिया से, उन रवि भाटिया का पेट्स के लिए रजिस्ट्रेशन करने में अड़ंगे डाल रहे हैं | रवि भाटिया पेट्स में जा सकें इसके लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रयासों के बाद भी रवि भाटिया का पेट्स में जाना अभी तक तो मुश्किल ही बना हुआ है | इस तरह रमेश अग्रवाल ने 'दिखा' दिया है कि रोटरी को धंधा बना देने और पक्षपात करने जैसे आरोपों से बचने के लिए वह एक कदम आगे तो बढ़ाते हैं लेकिन फिर तुरंत ही दो कदम पीछे खींच लेते हैं - 'हेराफेरी' की आदत आसानी से छूटती जो नहीं |

Wednesday, February 22, 2012

रवि भाटिया की राह में रोड़ा अटकाने के लिए डॉक्टर सुब्रमणियन मोहरा बनेंगे क्या

नई दिल्ली | रवि भाटिया और डॉक्टर सुब्रमणियन में से किसी एक को अगले रोटरी वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार चुनने को लेकर रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल में खासा घमासान मच गया है | खास बात यह है कि दिल्ली सेंट्रल में मचे इस घमासान में डिस्ट्रिक्ट के नेताओं ने भी अपने अपने पक्ष तय कर लिए हैं, जिस कारण दिल्ली सेंट्रल का यह घमासान डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति की दिशा और दशा को लेकर भी महत्वपूर्ण हो गया है | संजय खन्ना की चुनावी जीत से उत्साहित और संजय खन्ना की चुनावी जीत में डिस्ट्रिक्ट की बेहतरी को देख रहे लोगों की उम्मीदें अब रवि भाटिया पर आ टिकी हैं, लेकिन संजय खन्ना की जीत से बने माहौल को फिर से बदरंग करने और संजय खन्ना की जीत से पहले वाले माहौल को वापस लाने की इच्छा रखने वाले 'लोग' भी चूँकि चुप नहीं बैठे हैं, इसलिए उन्होंने रवि भाटिया की राह में रोड़ा अटकाने के लिए डॉक्टर सुब्रमणियन को मोहरा बना लिया है | गौर करने की बात यह है कि रवि भाटिया की बजाये डॉक्टर सुब्रमणियन को उम्मीदवार बनाये जाने की वकालत करने वालों के पास इसके अलावा और कोई तर्क नहीं है कि डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा और असित मित्तल ने समर्थन देने का भरोसा दे दिया है | इस तर्क के भरोसे डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी की वकालत करने वालों के पास लेकिन इस बात का कोई जबाव नहीं है कि इन दोनों नेताओं के समर्थन के बावजूद जब रवि चौधरी का कुछ नहीं हुआ, तो डॉक्टर सुब्रमणियन का ही क्या होगा ?
दिल्ली सेंट्रल के भी और डिस्ट्रिक्ट के भी कई लोगों का साफ मानना और कहना है कि किसी भी उम्मीदवार की सफलता का आधार यह नहीं होता है कि उसे 'इसका' या 'उसका' समर्थन प्राप्त है; सफलता का आधार होता है उसकी अपनी पहचान और उसकी अपनी सामर्थ्य | सभी मानते और कहते हैं कि पहचान और सामर्थ्य को लेकर रवि भाटिया का पलड़ा डॉक्टर सुब्रमणियन की तुलना में बहुत-बहुत भारी है | रवि भाटिया की डिस्ट्रिक्ट में अच्छी पहचान है, उन्होंने डिस्ट्रिक्ट में कई गवर्नर्स के साथ महत्वपूर्ण भूमिकाओं में काम किया है, डिस्ट्रिक्ट में सक्रिय भूमिका निभाने वाले लोगों को वह अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं, पीछे एक बार चुनावी प्रक्रियां का हिस्सा बन चुकने के कारण वह चुनावी राजनीति की सपरीली-पथरीली राहों को भी जानते-पहचानते हैं - और उनके बारे में सबसे बड़ी बात यह कि संजय खन्ना की चुनावी जीत में अहम् भूमिका निभाने वाले सभी बड़े-छोटे नेताओं का समर्थन उन्हें बिना किसी झंझट के मिल सकने के पूरे आसार हैं | डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ समस्या यह है कि डिस्ट्रिक्ट में उनकी न तो कोई पहचान है, और न ही उनकी किसी भी तरह की कोई सक्रियता रही है | उन्होंने कभी कोई जिम्मेदारी भी नहीं निभाई - निभाई इसलिए नहीं, क्योंकि किसी ने उन्हें कोई जिम्मेदारी दी नहीं; किसी ने उन्हें जिम्मेदारी दी इसलिए नहीं क्योंकि कोई भी उनकी सामर्थ्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाया | ले देकर उनके नाम अभी हाल ही में संपन्न हुई डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस की चेयरमैनी है | लेकिन यह चेयरमैनी उन्हें रोटरी में की गई उनकी सेवाओं से प्रभावित होकर नहीं मिली, बल्कि असित मित्तल के भाई की 'सेवा' करने के कारण मिली |
असित मित्तल रोटरी को और डिस्ट्रिक्ट को चूँकि अपनी निजी जायदाद की तरह देखते/समझते हैं, इसलिए वह निजी रूप से उनके काम आने वालों को डिस्ट्रिक्ट 'दे देने' को तैयार हो जाते हैं | रवि चौधरी को 'लंगड़ा घोड़ा' बताते हुए वह उनके बारे में इधर जिस तरह की बातें करने लगे हैं उससे जाहिर हो रहा है कि वह रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इसलिए नहीं बनवा रहे थे क्योंकि वह रवि चौधरी की रोटरी-सेवाओं से प्रभावित थे: वह तो चूँकि रवि चौधरी ने निजी तौर पर उनकी 'सेवा' की हुई है - असित मित्तल को उन्होंने खासी मोटी रकम उपलब्ध करवाई हुई है, जिसे असित मित्तल वापिस नहीं कर रहे हैं: सो असित मित्तल ने रवि चौधरी से कहा कि मैं तुम्हें तुम्हारे पैसे तो वापस नहीं कर पा रहा हूँ, चलो मैं तुम्हें डिस्ट्रिक्ट 3010 दे देता हूँ | असित मित्तल ने यही खेल डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ खेला | डॉक्टर सुब्रमणियन ने असित मित्तल के भाई के उपचार में मदद की थी; उनके इस उपकार के बदले में असित मित्तल ने उन्हें भी डिस्ट्रिक्ट 3010 'दे देने' का वायदा कर लिया | इस वायदे को पूरा करते दिखने के उद्देश्य से ही असित मित्तल ने डॉक्टर सुब्रमणियन को कांफ्रेस चेयरमैन बनाया | असित मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट को बड़े-बड़े 'महान' लोग दिए हैं | डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ असित मित्तल ने एक जिन प्रदीप चौधरी को डायरेक्टर कांफ्रेंस प्रोमोशन बनाया, उन प्रदीप चौधरी की रोटरी सेवाओं को असित मित्तल के अलावा और कोई नहीं जानता | प्रदीप चौधरी रोटेरियंस के बीच यदि जाने जाते हैं तो सिर्फ एक काम के लिए - 25 जनवरी को गाजियाबाद में रवि चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उदेश्य से हुई मीटिंग में लड़कीबाजी को लेकर जो मारपिटाई हुई थी उसके मुख्य आयोजक प्रदीप चौधरी ही थे | यह तथ्य जानना इसलिए जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट रूप से समझा जा सके कि असित मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट प्रोमोशन का काम प्रदीप चौधरी और डॉक्टर सुब्रमणियन को उनकी रोटरी सेवाओं को देखते हुए नहीं, बल्कि अपने निजी स्वार्थों को पूरा करते हुए सौंपा था |
डॉक्टर सुब्रमणियन के नजदीकियों और उनके शुभचिंतकों ने उनको समझाया है कि असित मित्तल की बातों में आकर वह अपनी किरकिरी न करवाएँ | उन्हें बताया गया है कि असित मित्तल ही दूसरों से कहते हैं कि डॉक्टर के बस की चुनाव लड़ना है ही नहीं, और यह भी कि डॉक्टर को अभी इस बात का अंदाज़ा ही नहीं है कि एक उम्मीदवार को क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं | नजदीकियों और शुभचिंतकों की इस समझाइश का कोई असर पड़ता इससे पहले रवि भाटिया की उम्मीदवारी से डरे मुकेश अरनेजा जैसे लोगों ने भी डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी को हवा देने का काम शुरू कर दिया | मजे की बात यह है कि मुकेश अरनेजा ने कुछ ही दिन पहले रवि भाटिया को अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया था | रवि भाटिया लेकिन उन्हें जैसे ही प्रेरित होते दिखे, उन्होंने डॉक्टर सुब्रमणियन को उकसाने का काम हाथ में ले लिया | रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल में जो लोग रवि भाटिया को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते हैं, उन्होंने भी डॉक्टर सुब्रमणियन को हवा देना शुरू कर दिया है | डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि उन्हें मुकेश अरनेजा और असित मित्तल जैसे अपनी राजनीतिक दुकान के लिए 'सामान' खोज रहे लोगों तथा रवि भाटिया के विरोधी लोगों के बहकाने में नहीं आना चाहिए और तथ्यपूर्ण तरीके से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी समीकरण व अपनी स्थिति का आकलन करना चाहिए और तब अपनी उम्मीदवारी के बारे में फैसला करना चाहिए | रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के कई प्रमुख लोगों का तथा डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के प्रमुख खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि डॉक्टर सुब्रमणियन की बजाये यदि रवि भाटिया उम्मीदवार बनते हैं तो वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के प्रबल दावेदार हो सकेंगे | रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के पदाधिकारियों पर रवि भाटिया को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने का दबाव तो बहुत है, लेकिन डॉक्टर सुब्रमणियन को हवा दे रहे रवि भाटिया के विरोधियों ने भी अभी अपनी कोशिशें नहीं छोड़ी हैं - इसलिए रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल में उम्मीदवार चुनने को लेकर खासा घमासान मचा हुआ है |