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Sunday, September 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी संदर्भ में हंसराज चुग क्या एक बार फिर राज चावला की 'किस्मत' का शिकार होंगे ?

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल और उनके समर्थकों ने जीएमसीएस में छात्रों को घटिया खाना परोसने के मामले की आड़ में राज चावला के लिए जो गड्ढा खोदना शुरू किया था, उसमें खुद हरित अग्रवाल और उनके समर्थकों के फँस जाने से राज चावला की किस्मत के चर्चे लोगों के बीच चल पड़े हैं - और इन चर्चों ने हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों की नींद हराम कर दी है । हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों को दरअसल डर यह हुआ है कि राज चावला की किस्मत क्या एक बार फिर कहीं हंसराज चुग का काम तो नहीं बिगाड़ेगी ? उनके बीच यह डर रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद को पाने को लेकर चले घटनाचक्र को याद करने के कारण पैदा हुआ । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में मौजूदा वर्ष के चेयरमैन पद को लेकर जो राजनीतिक गोटियाँ बिछना शुरू हुईं थीं, उसमें राज चावला का तो कहीं नाम ही नहीं था - उन्हें तो हंसराज चुग के समर्थन में 'देखा' और प्रचारित किया जा रहा था । हंसराज चुग चेयरमैन पद के एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे थे । चेयरमैन पद को लेकर होने वाली चर्चाओं में तो छोड़िए, अफवाहों तक में राज चावला का जिक्र नहीं था । चेयरमैन पद के लिए राज चावला ने जब सभी को अचंभित करते हुए अचानक से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तब भी किसी ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया । दूसरे उन्हें क्या गंभीरता से लेते, खुद उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया था; उन्हें कहते/बताते सुना गया था कि वह तो बस यूँ ही उम्मीदवार बनने का सुख लेना चाहते हैं, इसलिए उम्मीदवार बन गए हैं । चेयरमैन पद को लेकर जो भी तीन-तिकड़में हो रही थीं, जो भी चाल-बाजियाँ चल रहीं थीं, जो भी लॉबिंग हो रही थीं - उनमें किसी को भी राज चावला की दाल गलती हुई नहीं नजर आ रही थी । लेकिन नॉर्दर्न इंडिया रीजन की राजनीति के सारे 'पंडितों' का गणित तब फेल हो गया, जब दाल राज चावला की गली पाई गई । चेयरमैन पद पर राज चावला की जीत को राज चावला की नहीं, 'राज चावला की किस्मत' की जीत के रूप में देखा और प्रचारित किया गया । 
हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों को डर यही हुआ है कि राज चावला की किस्मत कहीं सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी वही कहानी तो नहीं दोहरायेगी ? सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में राज चावला की किस्मत का डर हंसराज चुग और उनके समर्थकों को इसलिए है क्योंकि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में हंसराज चुग और राज चावला को एक दूसरे के साथ जोड़ कर ही देखा जा रहा है, और माना जा रहा है कि इन दोनों में से कोई एक ही सेंट्रल काउंसिल में जायेगा । लोगों के बीच की चर्चाओं में राज चावला के मुकाबले हंसराज चुग का पलड़ा भारी माना/देखा जा रहा है । हंसराज चुग की जीत का दावा करने वाले तो फिर भी मिल/दिख जायेंगे, लेकिन राज चावला की जीत का दावा उनके समर्थक व सहयोगी तक करने में हिचक रहे हैं । यानि कहानी - अभी तक - ठीक वैसी ही है, जैसी कि वह रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव से पहले थी । हालाँकि इस बात पर किसी का ध्यान था नहीं । किंतु हरित अग्रवाल के समर्थकों द्वारा जीएमसीएस के मुद्दे पर घेरे जाने के प्रयासों का मुँह जिस तरह से राज चावला की बजाए हरित अग्रवाल की तरफ ही मुड़ गया है, उसमें जादुई चमत्कार का सा जो आभास मिला है - उससे राज चावला की किस्मत की चर्चा ने लोगों के बीच पुनः जोर पकड़ लिया है । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल के समर्थकों ने राज चावला को निशाना बनाते हुए जीएमसीएस के खाने को लेकर तूफान खड़ा किया हुआ था; रोज बातों व तथ्यों को दोहराते हुए राज चावला को कोसा जा रहा था । लेकिन जैसे ही भेद खुला कि जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन तो हरित अग्रवाल हैं, और वहाँ खाने की क्वालिटी तथा उसकी व्यवस्था देखने की जिम्मेदारी तो उनकी है - वैसे ही जीएमसीएस के मामले में हरित अग्रवाल के समर्थकों के मुँह पर ताले पड़ गए । मजे की बात यह रही कि इस मामले में राज चावला ने एक शब्द नहीं कहा, और फिर भी वह तो 'हमले' में साफ बच निकले और हमलावर ही लहूलुहान हो गए ।  
यह क्या किस्मत की बात है ? कई लोगों के लिए इसका जबाव 'हाँ' है, तो राज चावला के नजदीकियों का जबाव 'ना' है - उनका तर्क है कि किस्मत भी उनका साथ देती है, जो सही तरीके से अपना काम करते हैं । दूसरे लोगों का भी मानना और कहना है कि जीएमसीएस मामले में हरित अग्रवाल और उनके समर्थकों की फजीहत इसलिए नहीं हुई कि उनकी किस्मत खराब थी; उनकी फजीहत इसलिए हुई कि उन्होंने जो मुद्दा उठाया, उसमें 'बेईमानी' की - और उन्हें अपनी ही बेईमानी का फल मिला । राज चावला के समर्थकों का कहना है कि राज चावला बहुत आक्रामक तरीके से और बहुत शोर मचा कर काम करने वाले व्यक्ति नहीं हैं; वह चुपचाप तरीके से स्थिति को भाँपते हैं और अपने लिए मौका बनाते हैं; उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि प्रतिकूल हालात में भी वह उम्मीद नहीं छोड़ते हैं । राज चावला के नजदीकी उनके बारे में एक बड़ी मजेदार बात बताते हैं कि सड़क पर उनकी गाड़ी के सामने यदि कोई जानवर आ जाता है, तो वह उसे हटाने के लिए हॉर्न नहीं बजाते हैं; वह कहते हैं कि हॉर्न के शोर से जानवर असहज होगा तथा ज्यादा परेशान करेगा, इसलिए चुप रहने में ही फायदा है; जानवर खुद बहुत संवेदनशील होता है, वह खुद परेशानी महसूस कर रहा होता है, और अपने लिए रास्ता खोज कर निकल लेता है । राज चावला के समर्थकों का कहना है कि सड़क पर अपनाए जाने वाले इसी फार्मूले को उन्होंने रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बनने के लिए भी आजमाया था, और बिना कोई शोर-शराबा किए उन्होंने अपनी तरकीब लगाई और चेयरमैन पद पा लिया । 
चेयरमैन 'बनने' के बाद भी राज चावला ने इसी फार्मूले को अपनाया हुआ है - और इसी फार्मूले के चलते वह 'बचे' भी हुए हैं । उनकी राह में मुसीबतें कम नहीं पैदा की गईं - चेयरमैन 'बनने' के बाद भी, चेयरमैन घोषित होने के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ा; नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इससे पहले शायद ही किसी चेयरमैन के साथ ऐसा हुआ हो । जाहिर है कि 'बनने' और 'घोषित' होने के बीच उन्हें न बनने देने के खूब प्रयास हुए, किंतु जो कामयाब नहीं हो सके । राज चावला चेयरमैन घोषित भी हो गए, तो उन्हें चेयरमैन के अधिकार नहीं लेने दिए गए । अधिकार मिले तो उनके हर फैसले में टाँग अड़ाने के तरीके अपनाए गए । काउंसिल में उनके साथियों द्वारा सामने कुछ तथा पीछे कुछ और कहने के जरिए उनके फैसलों पर विवाद खड़ा करने के प्रयास हुए हैं । काउंसिल में उनके सहयोगी/साथी हरित अग्रवाल ने अपने समर्थकों के जरिए अपना 'पाप' उनके सिर मढ़ने की जो कोशिश की, वह तो सभी ने देखी/जानी । इसके बाद भी राज चावला न सिर्फ चेयरमैन के रूप में अपना काम किए जा रहे हैं, बल्कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए भी अभियान चलाए हुए हैं । राज चावला के इसी रवैये में हंसराज चुग और उनके समर्थकों को खतरे की घंटी सुनाई दे रही है । 
उल्लेखनीय है कि राज चावला के समर्थक भी मानते और कहते हैं कि राज चावला की उम्मीदवारी ही हंसराज चुग की जीत की राह का रोड़ा है । दोनों का समर्थन-आधार लगभग समान है, और दोनों को ही समान लोगों से ही समर्थन की उम्मीद है - कई लोगों को लगता है कि चेयरमैन होने का फायदा तो राज चावला को मिलेगा ही, साथ ही उनके खिलाफ जिस तरह से जो जो षड्यंत्र होते रहे हैं, उसके चलते लोगों के बीच उनके प्रति हमदर्दी भी है । राज चावला के खिलाफ होते षड्यंत्र जिस तरह अभी तक बेअसर साबित होते रहे हैं, उसे चाहें उनकी किस्मत का नतीजा मानें; और चाहें वह उनकी सुनियोजित रणनीति का प्रतिफल हो - उससे भी हंसराज चुग और उनके समर्थकों की नींद खराब हो रही है । हाँ, इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के पंडित अभी राज चावला की उम्मीदवारी को बहुत तवज्जो देते हुए नहीं दिख रहे हैं - पर चुनावी राजनीति के इन्हीं पंडितों ने रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव में भी राज चावला की उम्मीदवारी को कहाँ कोई तवज्जो दी थी ? 

Monday, August 31, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन की जिम्मेदारी ठीक से न निभाने को लेकर हरित अग्रवाल अपने जिन सबसे बड़े समर्थक सुधीर कत्याल के कारण मुसीबत में फँसे हैं, उन सुधीर कत्याल को कोर टीम से निकालने की अपने समर्थकों की माँग से हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी का अभियान समर्थकों के झगड़े में फँसा

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के सबसे बड़े समर्थक सुधीर कत्याल को लेकर भारी मुसीबत में फँस गए हैं - और यह मुसीबत भी उनके अपने दूसरे समर्थकों ने ही पैदा की है । दरअसल उनके समर्थक सुधीर कत्याल को साथ रखने को लेकर आपस में बुरी तरह बँट गए हैं, और हरित अग्रवाल के लिए यह फैसला करना मुश्किल हो रहा है कि वह अपने किन समर्थकों की बात मानें । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल के समर्थकों का एक तबका हरित अग्रवाल की कोर टीम में सुधीर कत्याल को शामिल किए जाने का विरोध कर रहा है : इनका कहना है कि सुधीर कत्याल का जिस तरह का रवैया रहता है और वह जिस तरह की गाली-गलौच भरी बातें करते हैं उससे लोगों के बीच नकारात्मक असर पड़ता है, और इस कारण लोग खिलाफ हो जाते हैं । हरित अग्रवाल के समर्थकों के किंतु एक दूसरे तबके का मानना/कहना है कि चुनावी माहौल में सुधीर कत्याल की तरह के लोगों की भी उपयोगिता होती ही है, नॉनसेंस भी आखिर एक 'वैल्यू' होती है और चुनावी माहौल में नॉनसेंस वैल्यू से भी फायदा होता है, इसलिए सुधीर कत्याल को साथ में रखे जाना चाहिए । दोनों तबकों की बातें और उनके तर्क अपनी अपनी जगह सही हैं, किंतु समस्या की बात यह है कि दोनों तबके के लोग एक दूसरे की बातों को समझने लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं । जो लोग हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी के अभियान को नियंत्रित करने वाली कोर टीम में सुधीर कत्याल को रखे जाने का विरोध कर रहे हैं, उनमें से कइयों ने तो हरित अग्रवाल को अल्टीमेटम तक दे दिया है कि सुधीर कत्याल यदि टीम में रहे तो फिर उनके लिए हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में रहना मुश्किल होगा । वास्तव में अपने कुछेक समर्थकों को तो हरित अग्रवाल ने सुधीर कत्याल के चक्कर में खो भी दिया है । 
इन्हीं समर्थकों के दबाव में हरित अग्रवाल ने पिछले दिनों सुधीर कत्याल से दूरी भी बना ली थी ।सुधीर कत्याल ने तब रतन सिंह यादव की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया था । रतन सिंह यादव को लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि सुधीर कत्याल यदि उनके समर्थन में रहे, तो फिर उनका बनता दिख रहा काम बिगड़ने में देर नहीं लगेगी । उनके समर्थकों/शुभचिंतकों ने भी उन्हें सुधीर कत्याल से दूर रहने की सलाह दी । और तब रतन सिंह यादव ने उनसे पीछा छुड़ा लिया । हरित अग्रवाल ने जिस तरह से सुधीर कत्याल से दूरी बना ली थी, सुधीर कत्याल उससे क्रोधित तो बहुत हुए थे और क्रोध में उन्होंने हरित अग्रवाल को बुरा-भला भी बहुत कहा था - लेकिन जब रतन सिंह यादव के यहाँ उनकी दाल नहीं गली और वह वहाँ से निकाल दिए गए, तब उन्होंने फिर से हरित अग्रवाल के यहाँ शरण ले ली । हरित अग्रवाल के एक नजदीकी ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया कि सुधीर कत्याल के संग-साथ से खुद हरित अग्रवाल भी बहुत दुखी हैं, और अक्सर रोना रोते हैं कि सुधीर कत्याल के कारण उनका बहुत खर्चा हो रहा है; लेकिन सुधीर कत्याल से पीछा कैसे छुड़ाएँ, इसकी वह कोई तरकीब नहीं सोच पा रहे हैं । हालाँकि हरित अग्रवाल के एक अन्य नजदीकी ने इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए दावा किया कि सुधीर कत्याल के साथ जो समस्या थी, बातचीत करके उसे हल कर लिया गया है और अब आगे कोई समस्या नहीं होगी । यद्यपि उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि दो लोगों के बीच कुछ न कुछ समस्या हो ही जाती है, और यह कोई बड़ी बात नहीं है । 
हरित अग्रवाल को सुधीर कत्याल के खर्चे उठाने को लेकर निजी रूप में जो परेशानी है, वह तो है ही - साथ ही उनकी सार्वजनिक भूमिका और खुन्नसी राजनीति से नुकसान अलग हो रहा है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राज चावला तथा काउंसिल की ट्रेजरर योगिता आनंद से अपनी निजी खुन्नस निकालने के लिए सुधीर कत्याल ने जीएमसीएस में छात्रों को घटिया खाना परोसने के मामले को जोरशोर से उठाया - और राज चावला व योगिता आनंद पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए; किंतु उनके संज्ञान में जब यह बात लाई गई कि जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन तो हरित अग्रवाल हैं, और वहाँ की बदइंतजामी के लिए सीधे वही जिम्मेदार हैं - तो सुधीर कत्याल को साँप सूँघ गया । सुधीर कत्याल ने हालाँकि पहले तो बात को संभालने की कोशिश की और कुतर्क दिया कि जीएमसीएस में जो खर्च होता है, उसके बिल चेयरमैन पास करता है और भुगतान ट्रेजरर करता है - इसलिए वही दोनों दोषी हैं; किंतु जब सवाल उठे कि कमेटी का चेयरमैन क्या सिर्फ झुनझुना बजाने के लिए होता है ? जीएमसीएस में जो बदइंतजामी है, उसे दूर करने के लिए कमेटी के चेयरमैन के रूप में हरित अग्रवाल ने क्या कदम उठाए - तो सुधीर कत्याल अपने 'स्वभाव' के अनुरूप मैदान छोड़ गए । सुधीर कत्याल तो मैदान छोड़ गए, लेकिन मुसीबत हरित अग्रवाल के जिम्मे कर गए । जीएमसीएस में बदइंतजामी का मामला उनके गले पड़ गया है, और जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन के रूप में उनकी अक्षमता तथा गैरजिम्मेदारी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है । हरित अग्रवाल के जो समर्थक सुधीर कत्याल को साथ नहीं रखना चाहते हैं, वह इसी मामले का उदाहरण देते हुए कह रहे हैं कि सुधीर कत्याल अपनी निजी खुन्नस में ऐसे ही काम करते रहेंगे और समस्याएँ खड़ी करते रहेंगे, इसलिए उनसे पीछा छुड़ा लेने में ही भलाई है । हरित अग्रवाल के जो समर्थक सुधीर कत्याल की 'जरूरत' को रेखांकित करते हैं, उनका भी मानना और कहना है कि सुधीर कत्याल ने जीएमसीएस में बदइंतजामी को जो रंग दिया, उससे वास्तव में हरित अग्रवाल की भारी फजीहत हुई है, और चुनावी नजरिए से हरित अग्रवाल को तगड़ा झटका लगा है । 
हरित अग्रवाल को जीएमसीएस मामले से जो झटका लगा है, उससे उन्हें मिल सकने वाले पहली वरीयता के वोटों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है । पहली वरीयता के वोटों के मामले में पिछली बार का उनका रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं था । पिछली बार के चुनाव में हरित अग्रवाल को पहली वरीयता के कुल 605 वोट मिले थे, और वह 12वें नंबर पर आए थे । काउंसिल में उनका कामकाज कोई बहुत उल्लेखनीय तो नहीं रहा, किंतु काउंसिल में होने के कारण उन्होंने अपने आधार-क्षेत्र में कुछ बढ़ोत्तरी तो की ही है - और उसी के भरोसे हरित अग्रवाल तथा उनके समर्थकों को उम्मीद है कि पहली वरीयता के वोटों के मामले में उनकी स्थिति पिछली बार की तुलना में सुधरी हुई होगी; किंतु चुनावी वर्ष में जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन के रूप में बदइंतजामी का उन पर जो दाग लगा है, उसने उनकी उम्मीदों पर ग्रहण लगा दिया है । जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन की जिम्मेदारी ठीक से न निभाने के लिए हरित अग्रवाल अब जब सार्वजनिक रूप से निशाने पर हैं, तो लोग उन पर आखिर क्यों और कैसे विश्वास करेंगे ? हरित अग्रवाल के लिए मुसीबत सिर्फ जीएमसीएस में बदइंतजामी का दाग भर नहीं है - उनकी ज्यादा बड़ी मुसीबत यह है कि यह दाग उनके सबसे बड़े समर्थक सुधीर कत्याल के कारण उन पर लगा है; और इस प्रसंग के चलते उनके कई समर्थकों ने उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि सुधीर कत्याल से पीछा छुड़ाओ । हरित अग्रवाल के अन्य कुछेक समर्थक हालाँकि सुधीर कत्याल को साथ में बनाए रखने की वकालत भी कर रहे हैं । हरित अग्रवाल के लिए यह समझना अभी मुश्किल हो रहा है कि सुधीर कत्याल और उन्हें साथ बनाए रखने की वकालत करने वाले उनके समर्थक सचमुच में उनके शुभचिंतक हैं, या समर्थक/शुभचिंतक के भेष में उनके 'दुश्मन' हैं ? 

Wednesday, February 26, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दीपक गर्ग की पोल खुली और लॉटरी लगी राधेश्याम बंसल, मनोज बंसल और हरित अग्रवाल की

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के एक सदस्य दीपक गर्ग के साथ तो बहुत ही बुरा हुआ । दीपक गर्ग पिछले करीब तीन महीने से चेयरमैन बनने की तिकड़म लगा रहे थे - लेकिन चेयरमैन बनना तो दूर वह एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य तक नहीं बन सके । सिर्फ इतना ही नहीं, रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उनकी हरकतों का खुलासा हुआ, जिससे उनकी भारी फजीहत हुई - और सिर्फ यही नहीं हुआ, उन्हें फजीहत से बचाने में उनके 'गुरु' विजय गुप्ता ने भी कोई प्रयास नहीं किया और उन्हें अकेला छोड़ दिया । नए पदाधिकारियों को चुनने के लिए हुई रीजनल काउंसिल की मीटिंग दीपक गर्ग के लिए 'सिर मुंडाते ही ओले पड़ने' वाली साबित हुई । मीटिंग की शुरुआत सेंट्रल काउंसिल के सदस्य संजीव चौधरी के उस निमंत्रण से हुई जो उन्होंने रीजनल काउंसिल के सदस्य हरित अग्रवाल को दिया, जिसमें कहा गया कि हरित, जो कुछ तुम अभी बाहर कह रहे थे, उसे यहाँ कहो । दरअसल, मीटिंग शुरू होने से पहले एक अनौपचारिक बातचीत में हरित अग्रवाल ने संजीव चौधरी से कुछ कहा था - उसी का संज्ञान लेते हुए संजीव चौधरी ने मीटिंग के औपचारिक रूप से शुरू होने पर हरित अग्रवाल को निमंत्रित किया ।
हरित अग्रवाल ने जो कुछ कहा, उससे दीपक गर्ग के लिए फजीहत का माहौल पूरी तरह बन गया । हरित अग्रवाल ने जो बताया, उसका लब्बोलुबाब यह था कि दीपक गर्ग ने चेयरमैन पद हथियाने की अपनी तिकड़म में सत्ता खेमे से बाहर के दो सदस्यों - हरित अग्रवाल और मनोज बंसल से संपर्क साधा था और उन्हें पदों का लालच देकर अपने साथ करने की तैयारी की थी । दीपक गर्ग ने उन्हें समझाया था कि अपने खेमे में उनकी राजिंदर नारंग, हंसराज चुग और राज चावला से नहीं बन रही है, इसलिए यदि वह दोनों उनके साथ आ जाते हैं तो उनका एक नया सत्ता खेमा बन जायेगा । नया सत्ता खेमा बनाने की दीपक गर्ग की कोशिश में स्वदेश गुप्ता का समर्थन तो उन्हें खुल कर मिल रहा था, लेकिन राधेश्याम बंसल और विशाल गर्ग के समर्थन को लेकर संदेह बना हुआ था । दरअसल इसीलिए दीपक गर्ग के प्रयासों के फलीभूत होने में देर लग रही थी । हरित अग्रवाल और मनोज बंसल सत्ता खेमे का हिस्सा बनने को लेकर तो तैयार हो गए थे, लेकिन वह आश्वस्त भी हो लेना चाहते थे कि सचमुच में कोई नया सत्ता खेमा बन भी रहा है ? उधर राधेश्याम बंसल और विशाल गर्ग भी दीपक गर्ग की खिचड़ी में शामिल होने के लिए तब तक इंतज़ार कर लेना चाहते थे, जब तक की खिचड़ी के सचमुच तैयार होने की स्थितियाँ न बन जाएँ । दीपक गर्ग ने इस खिचड़ी को तैयार करने में काफी मेहनत की और उनकी मेहनत से परिचित लोगों का कहना है कि इस खिचड़ी को तैयार करने/करवाने में सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता ने दीपक गर्ग की बहुत मदद की । चर्चा तो यहाँ तक रही कि दीपक गर्ग के इस खेल के असली सूत्रधार विजय गुप्ता ही थे, दीपक गर्ग तो सिर्फ इस्तेमाल हो रहे थे ।
ख़ैर, इस संबंध में सच्चाई चाहें जो हो - दीपक गर्ग के लिए एक समय उपलब्धि की बात यह रही कि नए सत्ता खेमे के लिए पर्याप्त लोग जुट गए । इन जुटे लोगों की एकजुटता को और सीमेंटेड करने के उद्देश्य से दीपक गर्ग इन्हें लेकर कनॉट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर गए और वहाँ एकजुट रहने की सौगंध ली । यहाँ तक लगा कि दीपक गर्ग ने नया कुनबा जोड़ लिया है और अब उन्हें चेयरमैन बनने से कोई नहीं रोक सकता है । लेकिन इसके बाद फिर अचानक पता नहीं कि क्या हुआ, दीपक गर्ग ने हरित अग्रवाल और मनोज बंसल से बात तक करना बंद कर दिया । उनका माथा ठनका और उन्होंने तहकीकात की तो उन्हें पता चला कि दीपक गर्ग दूसरे लोगों के साथ भी समीकरण बनाने की जुगाड़ में हैं । हरित अग्रवाल और मनोज बंसल ने अपने आप को ठगा हुआ पाया । यह किस्सा बयान करते हुए हरित अग्रवाल ने अपनी बात को भावनात्मक-सा ट्विस्ट दिया और कहा कि मेरा कैरियर अभी शुरू ही हुआ है, इस तरह की धोखेबाजी और ठगी के अनुभव लेकर मैं आगे बढ़ूँगा तो मैं कैसा बनूँगा और प्रोफेशन को तथा इंस्टीट्यूट को कैसी पहचान दूँगा । हरित अग्रवाल के इस किस्से ने मीटिंग में मौजूद सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को भड़का दिया और उन्होंने लगभग एक मत से कहा कि रीजनल काउंसिल में जो खेमेबाजी है, उसे ख़त्म किया जाए । इसके लिए उन्होंने फार्मूला सुझाया कि दीपक गर्ग ने सत्ता खेमे के बहुमत के भरोसे हरित अग्रवाल और मनोज बंसल को जो पद देने का वायदा किया था, उन दोनों को वह पद दिए जाएँ और बाकी पदों के लिए सत्ता खेमे के लोग जैसे चाहें वैसे चुनाव कर लें । फार्मूले में एक बात यह और कही गई कि सत्ता खेमे से बाहर जो दो सदस्य हैं - गोपाल केडिया और प्रमोद माहेश्वरी, उन्हें एक्जीक्यूटिव काउंसिल की प्रत्येक मीटिंग में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाये ।
सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों ने यह फार्मूला सुझाते हुए स्पष्ट कर दिया कि रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के लोग यदि इस फार्मूले को स्वीकार नहीं करेंगे तो फिर वह एक्स-ऑफिसो सदस्य के रूप में रीजनल काउंसिल में शामिल होंगे और देखेंगे कि यहाँ कौन कैसे क्या मनमानी करता है ? सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के यह तेवर देख कर रीजनल काउंसिल में सत्ता की बंदरबाँट की जुगाड़ में लगे सत्ता खेमे के सदस्यों ने समर्पण करने में ही अपनी भलाई देखी और सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों द्धारा सुझाए गए फार्मूले को स्वीकार करते हुए बाकी बचे पदों के लिए पिछली बार तय किये गए तरीके - लॉटरी निकालने के जरिए - से चुनाव करने को राजी हो गए । यानि, सत्ता खेमे के लिए दीपक गर्ग की हरकत से हालात यह बने कि 'खाया पिया कुछ नहीं और गिलास तोड़ा बारह आना ।' आखिर हुआ वही जो होना तय हुआ था; दीपक गर्ग हरकत न करते और यही होने देते तो सत्ता खेमे की एकता भी बनी रहती और उन्हें सेंट्रल काउंसिल के फार्मूले को स्वीकार करने के लिए मजबूर भी न होना पड़ता - और सबसे बड़ी बात कि दीपक गर्ग की फजीहत भी नहीं होती । जिनको भी दीपक गर्ग की हरकत का पता चला है, उनका कहना रहा है कि दीपक गर्ग ने काउंसिल के अपने साथियों को तो धोखा दिया और देने की कोशिश की ही, हनुमान जी को भी धोखा देने की जो कोशिश की, उसका ही प्रतिफल उन्हें मिला है और उन्हें भारी फजीहत का शिकार होना पड़ा है ।  

Thursday, November 29, 2012

योगिता आनंद की रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी को वापस कराने की हरकत से राजेश शर्मा ने हरित अग्रवाल को मुश्किल में डाला

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल की नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए जीत पक्की करने के लिए उनके सबसे बड़े समर्थक राजेश शर्मा ने योगिता आनंद पर अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने के लिए जिस तरह से दबाव बनाया, वह अब बड़े बबाल का रूप लेता जा रहा है । इस मामले में आरके गौड़ की एंट्री होने से मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है । मजे की बात है कि योगिता आनंद इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं, लेकिन उनके समर्थक और शुभचिंतक चुप बैठने को तैयार नहीं हैं; क्योंकि उन्हें डर है कि हरित अग्रवाल के समर्थक ऐन मौके पर उनकी उम्मीदवारी को लेकर कहीं कोई समस्या खड़ी न कर दें; इसलिए वह मामले को ऐसा बना देना चाहते हैं कि हरित अग्रवाल के समर्थकों के सामने योगिता आनंद की उम्मीदवारी के खिलाफ कुछ करने का कोई मौका ही न बचे । इस कोशिश में योगिता आनंद के कुछेक समर्थकों ने आरके गौड़ से संपर्क किया । उल्लेखनीय है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - खास कर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान ऐसी है कि अन्याय और बेईमानी और मनमानीपूर्ण दादागिरी के खिलाफ लड़ाई में किसी को भी मदद की जरूरत होती है तो वह सबसे पहले आरके गौड़ का फोन लगाता है । आरके गौड़ भी मदद के लिए तुरंत हाज़िर हो जाते हैं । इस मामले में भी ऐसा ही हुआ ।
आरके गौड़ लेकिन, चूंकि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार भी हैं, इसलिए मामले में उनके पड़ते ही मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है । मामले ने राजनीतिक रंग इसलिए भी ले लिया, क्योंकि जिन राजेश शर्मा ने हरित अग्रवाल की मदद करने के लिए योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने का बीड़ा उठाया, वह राजेश शर्मा सेंट्रल काउंसिल के लिए चरनजोत सिंह नंदा की उम्मीदवारी का समर्थन करते हुए बताये जा रहे हैं । मजे की बात यह है कि आरके गौड़ को इस मामले में अभी तक कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी है - योगिता आनंद के समर्थकों को उन्होंने सिर्फ आश्वस्त भर किया है कि वह चिंता न करें और परेशान न हों - योगिता आनंद की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम नहीं हो सकेगा । यूँ तो यह बात हर कोई कहता जिससे भी योगिता आनंद के समर्थक गुहार लगाते । किंतु अभी यह बात चूँकि आरके गौड़ ने - सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार आरके गौड़ ने कही है - और सेंट्रल काउंसिल के एक दूसरे उम्मीदवार चरनजोत सिंह नंदा के समर्थक समझे जाने वाले लोगों के संदर्भ में कही है; इसलिए उक्त मामला बड़ा हो गया है ।
आरके गौड़ की एंट्री के बाद, योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने की मुहिम में जुटे राजेश शर्मा के लिए सचमुच मुसीबत हो गई है कि अब वह क्या करेंगे ? राजेश शर्मा ने जो किया, उसे लेकर हरित अग्रवाल के दूसरे समर्थकों के बीच हालाँकि नाराजगी है - उनका मानना और कहना है कि हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी को अच्छा समर्थन मिलता दिख रहा है, इसलिए राजेश शर्मा को ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए जिससे कि हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी विवाद में फँसे और कमजोर नज़र आये । राजेश शर्मा नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके हैं - इसलिए इस तरह की हरकत की उनसे उम्मीद नहीं की जाती है । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव घटिया हरकतों के कारण लगातार विवादस्पद होते जा रहे हैं - पिछली बार बूथ केप्चरिंग तक की हरकत हो गई थी और इस बार उम्मीदवार को डरा-धमका कर उम्मीदवारी वापस कराने का प्रयास करने का मामला सामने आया है । गंभीर बात यह है कि इस तरह के मामलों में बड़े पदों पर रहे लोगों के नाम आरोपियों के रूप में सामने आये हैं - बूथ केप्चरिंग में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन अनुज गोयल का नाम है तो डरा-धमका कर उम्मीदवारी वापस कराने के मामले में नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन राजेश शर्मा का नाम है ।
राजेश शर्मा की इस हरकत ने हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी को सवालों के घेरे में ला दिया है । लोगों के बीच सवाल पैदा हो रहे हैं कि हरित अग्रवाल क्या इसी तरह की घटिया हरकतों के भरोसे चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे हैं; और कि हरित अग्रवाल भी क्या इसी तरह की हरकतें करेंगे जैसी कि राजेश शर्मा कर रहे हैं ? हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों का ही कहना है कि योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने के लिए राजेश शर्मा ने जो किया है, हरित अग्रवाल को उसके लिए सार्वजानिक रूप से माफी मांग लेनी चाहिए, ताकि इस कारण से होने वाली बदनामी उनका कोई नुकसान न करे । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल के समर्थकों के बीच राजेश शर्मा की भूमिका को लेकर पहले से ही संदेह रहा है और हरित अग्रवाल के ही समर्थक कहते रहे हैं कि राजेश शर्मा समर्थक के भेष में विरोधी की भूमिका निभा रहे हैं । अब फिर हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों ने सुझाव दिया है कि हरित अग्रवाल को राजेश शर्मा से हाथ जोड़ कर एक यह अहसान करने के लिए कहना चाहिए कि अब वह उन पर कोई अहसान न करें ।  

Friday, November 16, 2012

हरित अग्रवाल की जीत में राजेश शर्मा को अपनी 'तैयारी' के लिए खतरा दिखाई दे रहा है

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल के समर्थकों के बीच राजेश शर्मा की भूमिका को लेकर संदेह लगातार गहराता जा रहा है । उल्लेखनीय है कि नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन राजेश शर्मा घोषित रूप से तो नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ रहे हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं; लेकिन हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों को लग रहा है कि राजेश शर्मा उन्हें जितवाने के लिए नहीं, बल्कि हरवाने के लिए काम कर रहे हैं । हरित अग्रवाल के इन समर्थकों को राजेश शर्मा की हाल की कुछेक गतिविधियों से संदेह हुआ है कि राजेश शर्मा जैसे हरित अग्रवाल को नुकसान पहुँचाने वाले काम कर रहे हैं । अन्य कुछेक लोगों का कहना हालाँकि यह है कि राजेश शर्मा भले ही नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बन और रह चुके हैं, लेकिन उनकी ऐसी फोलोइंग नहीं है कि वह किसी उम्मीदवार को फायदा या नुकसान पहुँचा सकें । इन लोगों का कहना है कि राजेश शर्मा जिस ग्रुप के सदस्य समझे जाते हैं, उस ग्रुप के कुछेक सदस्य हरित अग्रवाल की खिलाफत कर रहे हों और हो सकता है कि राजेश शर्मा उनकी हाँ में हाँ मिला रहे हों । इन लोगों के अनुसार राजेश शर्मा के इस रवैये को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है ।
लेकिन जो लोग राजेश शर्मा के इस रवैये को गंभीरता से ले रहे हैं उनका कहना है कि राजेश शर्मा चूंकि कुछेक जगह हरित अग्रवाल को अपनी 'राजनीति' के लिए खतरे के रूप में बता रहे हैं, इसलिए उनके रवैये की अनदेखी करना हरित अग्रवाल को मुश्किल में डाल सकता है । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल रीजनल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी को बहुत ही गंभीरता से ले रहे हैं और एक अकेले वही पूरी तैयारी से चुनाव लड़ते देखे जा रहे हैं । लेकिन उनकी इसी 'गंभीरता' और 'तैयारी' ने राजेश शर्मा को डरा दिया है । राजेश शर्मा इस बार के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए चरनजोत सिंह नंदा का समर्थन इस उम्मीद में कर रहे हैं कि अगली बार चरनजोत सिंह नंदा सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । राजेश शर्मा रीजनल काउंसिल में हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी के साथ होने का दावा करते सुने गए हैं । लेकिन अब राजेश शर्मा को यह डर सताने लगा है कि हरित अग्रवाल रीजनल काउंसिल में जीत कर अपनी पहली ही टर्म में चेयरमैन बन गए तो फिर अगली बार वह सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे और अगली बार के लिए की जा रही उनकी तैयारी को नुकसान पहुँचायेंगे । इसी डर से राजेश शर्मा अब इस कोशिश में जुटे बताये जा रहे हैं कि हरित अग्रवाल को वह इस बार रीजनल काउंसिल में जीतने न दें ।
हरित अग्रवाल के समर्थकों को यह तो विश्वास है कि राजेश शर्मा चाहेंगे और कोशिश भी करेंगे तो भी हरित अग्रवाल को जीतने से नहीं रोक सकेंगे । लेकिन हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थक राजेश शर्मा की गतिविधियों से सावधान रहने की जरूरत को जरूर पहचानने लगे हैं ।