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Thursday, July 20, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ललित खन्ना के कार्यक्रम को बिगाड़ने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल की योजना को क्लब्स के प्रेसीडेंट्स ने ही फेल कर दिया

नई दिल्ली । ललित खन्ना के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह को बिगाड़ने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल ने जोर तो बहुत लगाया, लेकिन उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद जिस तरह से हर क्षेत्र से रोटेरियंस और क्लब-पदाधिकारी समारोह में पहुँचे - उससे दिखा कि सतीश सिंघल की कोशिशें सफल नहीं हो सकीं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी दीपक गुप्ता तक ने सतीश सिंघल की बात नहीं मानी, और वह भी ललित खन्ना के निमंत्रण पर उक्त समारोह में पहुँचे । रास्ते बंद होने के कारण कई लोगों के लिए हालाँकि समारोह स्थल तक पहुँचना असंभव हुआ और उन्हें वापस लौटने के लिए ही मजबूर होना पड़ा । लेकिन काँवड़-यात्रा के कारण रास्ते बंद होने और वैकल्पिक रास्तों पर जाम जैसी स्थिति होने के बावजूद ललित खन्ना के निमंत्रण पर उक्त समारोह में बड़ी संख्या में रोटेरियंस और क्लब-पदाधिकारियों के जुटे हुए दृश्य ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों को उत्साहित करने का ही काम किया है । उक्त अधिष्ठापन समारोह वास्तव में ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रमोट का ही प्रयास था - और इसीलिए सतीश सिंघल ने ऐसी तैयारी की थी कि उक्त समारोह में ज्यादा लोग न पहुँचे; किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के बावजूद उनकी चाल कामयाब नहीं हो सकी ।
सतीश सिंघल ने पहली बड़ी चाल तो यह चली कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्होंने रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के पदाधिकारियों को डेट ही नहीं दी और डेट को लेकर वह उन्हें चक्कर ही कटवाते रहे । 19 जुलाई के लिए तो सतीश सिंघल के पास बड़ा ठोस बहाना भी था, यह डेट वह पहले ही रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लैटिनम के लिए बुक कर चुके थे; लेकिन क्लब पदाधिकारियों द्वारा सुझाई गईं बाद की कई तारीखों को भी अलग अलग वजहों से सतीश सिंघल जब नकारते गए, तब क्लब पदाधिकारियों ने समझ लिया कि सतीश सिंघल उनके क्लब में न आने का मन बना चुके हैं - और वह यदि उनके चक्कर में फँसे तो अधिष्ठापन समारोह कर ही नहीं पायेंगे । सतीश सिंघल ने कुछेक लोगों से कहा भी कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केके गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल में जिस तरह से उनकी शिकायत की है, उसके बाद उनके लिए केके गुप्ता के क्लब के साथ कोई व्यवहार रखना संभव ही नहीं है; और वह देखेंगे कि रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ में कुछ भी अच्छा कैसे होता है । सतीश सिंघल ने सोचा था कि रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के अधिष्ठापन समारोह में जब वह नहीं जायेंगे, तो डिस्ट्रिक्ट टीम के तथा क्लब्स के पदाधिकारी भी नहीं जायेंगे - और वह सभी तो उनके पीछे पीछे उस कार्यक्रम में पहुँचेंगे जहाँ उनकी उपस्थिति होगी । अपनी सोच को व्यावहारिक तौर पर और पुख्ता करने के लिए सतीश सिंघल ने कई लोगों को यह कहने के लिए फोन किए और करवाए कि उन्हें उस कार्यक्रम में आना है जिसमें वह मुख्य अतिथि होंगे ।
सतीश सिंघल को विश्वास रहा कि उनकी चालबाजी कामयाब रहेगी और इसी विश्वास के भरोसे रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लैटिनम के पदाधिकारियों से उन्होंने इंतजाम बढ़ा लेने को कह दिया । उनकी बात मान भी ली गयी, और जो कार्यक्रम पहले छोटे हॉल में होना था - उसे बड़े हॉल में शिफ्ट कर दिया गया और खाने की प्लेट्स की संख्या भी कुछ बढ़ा दी गईं । लेकिन दोनों कार्यक्रम हो जाने के बाद जब तुलनात्मक तथ्य सामने आए तो सतीश सिंघल को यह देख/जान कर तगड़ा झटका लगा कि डिस्ट्रिक्ट टीम के पदाधिकारियों के साथ-साथ क्लब्स के पदधिकारियों ने भी उनकी चालबाजी को फेल कर दिया है । क्लब-पदाधिकारियों के रवैये से तो सतीश सिंघल हैरान ही रह गए । दरअसल क्लब-पदाधिकारियों, खासकर प्रेसीडेंट्स को वह अपनी जेब में ही 'देखते' हैं और मानते/समझते हैं कि प्रेसीडेंट्स उनके कहने से ही उठेंगे/बैठेंगे । इसी भरोसे उन्हें उम्मीद रही कि उन्होंने जब फतवा जारी करवा दिया था कि क्लब्स के प्रेसीडेंट्स उस कार्यक्रम में रहेंगे जिस कार्यक्रम में वह होंगे, तब फिर प्रेसीडेंट उस कार्यक्रम में क्यों पहुँचे - जहाँ उन्हें नहीं होना था, और वह भी बड़ी संख्या में । सतीश सिंघल को यह जान कर तो और भी निराशा हुई कि उनके द्वारा तमाम 'व्यवस्था' करने के बावजूद 40 से 45 प्रेसीडेंट्स ललित खन्ना के निमंत्रण पर उनके कार्यक्रम में पहुँचे । सतीश सिंघल ने महसूस किया कि प्रेसीडेंट्स को काबू में रखने के लिए उन्हें उनकी गर्दनों पर शिकंजा अभी और कसना पड़ेगा ।
सतीश सिंघल के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत की बात यह हुई कि उनकी 'तैयारी' के पीछे रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लैटिनम और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार आलोक गुप्ता के बीच वर्षों से बिगड़े संबंधों को सुधारने की कवायद को देखा जा रहा था,  लेकिन जो अंततः एक फूहड़ किस्म के प्रहसन के रूप में सामने आई । रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लैटिनम के निर्माता सदस्य दरअसल पहले आलोक गुप्ता के क्लब में ही थे और उनके बड़े सहयोगी हुआ करते थे; लेकिन उनसे हुए भीषण झगड़े के बाद उन्होंने आलोक गुप्ता का साथ छोड़ कर प्लैटिनम बनाया और तभी से आलोक गुप्ता के साथ उनका बैर चल रहा है । सतीश सिंघल ने इस बैर को खत्म करने के लिए अपनी तरफ से तैयारी तो पक्की की थी, लेकिन उनकी तैयारी को दोनों तरफ से ही कोई सहयोग नहीं मिला । आलोक गुप्ता खुद बहुत देर से कार्यक्रम में पहुँचे; उनके पहुँचने का क्लब के पदाधिकारियों ने जल्दी से कोई नोटिस नहीं लिया - बहुत देर बाद जब नोटिस लिया भी तब इस उलाहने के साथ उनका स्वागत किया कि आलोक गुप्ता पहली बार हमारे क्लब में आए हैं, उम्मीद है कि वह इसलिए नहीं आएँ होंगे क्योंकि वह उम्मीदवार हैं । इस तरह की बातों ने सतीश सिंघल की सारी योजना और तैयारी पर पानी फेर दिया । सतीश सिंघल को आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक और मददगार के रूप देखा/पहचाना जा रहा है, लेकिन 19 जुलाई के कार्यक्रमों को लेकर उनकी तमाम तैयारी का जो हश्र देखने में आया है -उससे लग रहा है कि सतीश सिंघल का समर्थन और मदद कहीं आलोक गुप्ता के लिए मुसीबत न बन जाए ?

Saturday, February 18, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में बदलते राजनीतिक माहौल में अपने लिए मौका बनाने की ललित खन्ना की सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का तापमान बढ़ाया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के ललित खन्ना ने अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गर्मी पैदा करने का काम किया है । ललित खन्ना इस वर्ष भी उम्मीदवार थे, लेकिन इस वर्ष उन्हें सफलता नहीं मिल सकी । इस वर्ष का चुनावी नतीजा आने के तुरंत बाद ही उन्होंने हालाँकि संकेत तो दिए थे कि उन्होंने लड़ाई हारी जरूर है, पर छोड़ी नहीं है - लेकिन लगातार दूसरे वर्ष उनके उम्मीदवार होने को लेकर लोगों के बीच संशय बना रहा था । ललित खन्ना अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार होने के संकेत तो दे रहे थे, लेकिन चूँकि वह इस बारे में साफ-साफ घोषणा करने से बच रहे थे - इसलिए लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी को लेकर असमंजस बना । इसका फायदा रोटरी क्लब गाजियाबाद शताब्दी के आलोक गुप्ता ने उठाया । आलोक गुप्ता ने अगले रोटरी वर्ष के लिए अपनी उम्मीदवारी को लेकर तैयारी शुरू दी । समझा जाता है कि ललित खन्ना को उनके शुभचिंतकों ने समझाया होगा - या क्या पता उन्होंने खुद ही समझा होगा कि यदि संकेतों और इशारों में ही बात करते रहोगे और पक्के तौर पर अपनी उम्मीदवारी को घोषित नहीं करोगे तथा उसके लिए काम शुरू नहीं करोगे, तो पिछड़ जाओगे; लिहाजा ललित खन्ना भी फिर औपचारिक रूप से अपनी उम्मीदवारी को लेकर सक्रिय हो गए और उन्होंने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी तथा अहमियत रखने वाले प्रमुख लोगों से बातचीत करना शुरू कर दिया ।
ललित खन्ना के नजदीकियों के अनुसार, नेताओं से ललित खन्ना को समर्थन का अभी कोई ठोस भरोसा तो नहीं मिला है लेकिन सकारात्मक इशारे जरूर मिले हैं - जिनसे ललित खन्ना ने अपने आप को उत्साहित पाया है । किन्हीं किन्हीं नेताओं ने ललित खन्ना से कहा कि अभी इस चक्कर में ज्यादा न पड़ो कि कौन साथ है और कौन साथ नहीं है - अभी तो बस काम करो । ललित खन्ना को यह देख/जान कर ज्यादा उत्साह मिला कि आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को ज्यादा नेताओं का समर्थन नहीं है, बल्कि कुछेक नेता तो उन्हें आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में तीखे तेवर दिखाते नजर आए हैं । ललित खन्ना के क्लब में आयोजित हुए स्वागत समारोह में इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीते दीपक गुप्ता ने ललित खन्ना की जैसी जो तारीफ की, उसके बाद से ललित खन्ना अपनी उम्मीदवारी को लेकर और ज्यादा उत्साहित नजर आए हैं । हालाँकि खुद ललित खन्ना के ही नजदीकियों का कहना है कि ललित खन्ना का उत्साह बढ़ने/बढ़ाने का कारण दीपक गुप्ता का भाषण शायद नहीं है - रोटरी में भाषणों में झाड़ पर चढ़ाने का 'काम' तो खूब होता है, समझदार लोग भाषणों में कही गई बातों के झाँसे में नहीं आते हैं; लगता है कि ललित खन्ना और दीपक गुप्ता के बीच जो अनौपचारिक बातचीत हुई है, उसमें ललित खन्ना को दीपक गुप्ता से कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्स मिली होंगी - जिन्होंने ललित खन्ना को आश्वस्त व उत्साहित किया है । ललित खन्ना के नजदीकियों के अनुसार, ललित खन्ना कुछेक नेताओं से मिले इस फीडबैक से ज्यादा उत्साहित हैं कि आमतौर पर उत्तर प्रदेश तथा खासतौर पर गाजियाबाद में आलोक गुप्ता को एकतरफा समर्थन नहीं मिल सकेगा । कुछेक नेताओं ने हालाँकि ललित खन्ना को चेतावनी भी दी है कि उन्होंने पिछली बार के अपने चुनाव अभियान में जो गलतियाँ की हैं, इस बार भी यदि उन्हें दोहराया तो फिर उनका भी आलोक गुप्ता के सामने वैसा ही हाल होगा, जैसा इस वर्ष के चुनाव में दीपक गुप्ता के सामने अशोक जैन का हुआ है ।
इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी नतीजे ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं की जो सिट्टी-पिट्टी निकाली है, और उसके कारण नेताओं के हौंसले जिस तरह से पस्त पड़े हैं - उसमें भी ललित खन्ना को अपने लिए अच्छा मौका नजर आ रहा है । अशोक जैन की बुरी हार से रमेश अग्रवाल को जो जोर का झटका जोर से लगा है, उससे लग रहा है कि अगले वर्ष रमेश अग्रवाल के भरोसे कोई उम्मीदवार नहीं आयेगा - ऐसे में ललित खन्ना उनका समर्थन मिलने की उम्मीद कर सकते हैं । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल जिस बड़बोलेपन के साथ दीपक गुप्ता की जीत का श्रेय ले रहे हैं, और खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, उससे लग रहा है कि यह दोनों बड़बोली बेवकूफियाँ करने से आगे भी बाज नहीं आयेंगे, जिससे आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को नुकसान होगा - जाहिर है कि वह प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना का फायदा होगा । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल के बड़बोलेपन पर लोगों की नाराजगी अभी से 'दिखने' भी लगी है; लोग पूछने लगे हैं कि इस वर्ष दीपक गुप्ता यदि इनके समर्थन के कारण जीते हैं, तो पिछले वर्ष दीपक गुप्ता इनके समर्थन के होते हुए भी सुभाष जैन से हार क्यों गए थे ?
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के बदलते नजारे को पहचान रहे लोगों का मानना और कहना है कि रमेश अग्रवाल की बड़बोली मनमानियों ने इस वर्ष जैसा नुकसान अशोक जैन का किया है, वैसे ही खतरे का सामना अगले वर्ष आलोक गुप्ता को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की तरफ से करना पड़ेगा । आलोक गुप्ता के सामने पैदा होने वाले इस खतरे में ही ललित खन्ना को अपने लिए मौका दिख रहा है । इस 'मौके' को देख लेने के कारण ही ललित खन्ना ने अगले वर्ष प्रस्तुत होने वाली अपनी उम्मीदवारी के लिए तैयारी शुरू कर दी है । आलोक गुप्ता के बाद, अगले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मैदान में ललित खन्ना के भी सक्रिय हो जाने से डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का तापमान बढ़ने लगा है - और जिस कारण से चुनावी राजनीति के समीकरण नए सिरे से बनना शुरू हो गए हैं ।

Sunday, October 23, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दोहरे लाभ की उम्मीद में मुकेश अरनेजा द्धारा रमेश अग्रवाल की तरफ दोस्ती के बढ़ाए कदम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए गंभीर संकट पैदा कर दिया है

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के बीच दोस्ती होने की कोशिशों की पसीने में लथपथभरी जो एक झलक डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में देखने को मिली, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के परिदृश्य में खासी हलचल मचा दी है, जिसके नतीजे के रूप में दीपक गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों के तोते उड़ने के लिए फड़फड़ा उठे हैं । दरअसल मुकेश अरनेजा डिस्ट्रिक्ट से ऊपर की रोटरी की राजनीति और व्यवस्था में जिस तरह से खदेड़े गए हैं, उससे मुकेश अरनेजा को रमेश अग्रवाल की शरण में लौटने की मजबूरी समझ में आ रही है । उल्लेखनीय है कि दिसंबर में हो रहे रोटरी जोन इंस्टीट्यूट की भारी-भरकम कमेटी में मुकेश अरनेजा को जगह तक नहीं मिली है; उनके लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि उक्त कमेटी में रमेश अग्रवाल के साथ-साथ जेके गौड़ तक को जगह मिल गई, लेकिन उन्हें कमेटी से बाहर ही रखा गया है । मुकेश अरनेजा के लिए फजीहत की बात यह हुई कि जिन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के साथ वह अपनी निकटता की डींगे हाँकते रहे हैं, उन्हीं मनोज देसाई ने उन्हें उक्त कमेटी में 'घुसने' नहीं दिया । मुकेश अरनेजा के निकटवर्तियों का कहना है कि कुछेक दूसरे बड़े नेताओं के साथ साथ पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने भी उन्हें बताया/समझाया है कि डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में नकारात्मक भूमिका निभाने के कारण रोटरी के बड़े नेताओं के बीच उनकी बहुत बदनामी है, और इसीलिए रोटरी जोन इंस्टीट्यूट जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजन में उन्हें कोई जगह नहीं मिल सकी ।
इन हालात में मुकेश अरनेजा को रमेश अग्रवाल के साथ दोस्ती कर लेने में ही अपनी भलाई नज़र आई है - और समझा जाता है कि मुकेश अरनेजा ने अपनी तरफ से रमेश अग्रवाल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है । हालाँकि रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के जैसे जो संबंध चल रहे हैं, उन्हें देखते/पहचानते हुए दोनों के बीच सहयोगात्मक संबंध बन पाना आसान नहीं होगा - लेकिन फिर भी दोनों के ही निकटवर्तियों का मानना और कहना है कि रोटरी में और रोटरी की राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है; और राजनीति में तो नए समीकरण बनते/बिगड़ते ही रहते हैं । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के मामले में भी लोगों ने देखा ही है कि दोनों के संबंध कई बार सर्द/गर्म होते रहे हैं । दोनों के बीच संबंध सुधारने की जरूरत इस समय भले ही मुकेश अरनेजा को लग रही है, लेकिन भविष्य की आहटों को सुनते/समझते हुए रमेश अग्रवाल को भी यह जरूरत महसूस हो रही है । रमेश अग्रवाल भी समझ रहे हैं कि जेके गौड़ जैसे लोग तक जब उन्हें आँखें दिखाने लगे हैं, तो भविष्य उनका भी कोई अच्छा नहीं है । भविष्य को सुरक्षित करने/बनाए रखने के लिए रमेश अग्रवाल को भी मुकेश अरनेजा के साथ तार एक बार फिर से जोड़ लेने की जरूरत महसूस हो रही है । रमेश अग्रवाल भी समझ रहे हैं कि मुकेश अरनेजा के साथ उनकी दोस्ती यदि फिर से हो जाएगी, तो 'नए' गवर्नर उन्हें अलग-थलग नहीं कर पायेंगे ।
मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की जरूरतों के कारण भले ही अलग अलग हों, लेकिन जरूरतें चूँकि एक सी ही हैं - इसलिए दोनों के ही नजदीकियों का मानना और कहना है कि अपने अपने ईगो को छोड़कर साथ आ मिलने में दोनों को ही देर नहीं लगेगी । मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के बीच हो सकने वाले इस मिलन समारोह ने दीपक गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों को बेचैन कर दिया है । दरअसल वह भी समझ रहे हैं कि दोनों के बीच संबंध सुधरे, तो इसका खामियाजा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को ही भुगतना पड़ेगा । वास्तव में हर कोई समझ रहा है कि रमेश अग्रवाल के लिए तो अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हटना संभव नहीं होगा; और मुकेश अरनेजा के लिए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन को छोड़ देने में कोई समस्या नहीं होगी । मुकेश अरनेजा खुद भी कहते रहे हैं कि पिछले रोटरी वर्ष में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा तो उन्होंने मजबूरी में तब उठाया था, जब रमेश अग्रवाल एंड कंपनी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की राजनीति में उन्हें अलग-थलग कर दिया था । यानि मुकेश अरनेजा के लिए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन डिस्ट्रिक्ट में अपनी उपस्थिति, पहचान और अहमियत बनाए रखने का एक जरिया भर है । ऐसे में, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हट कर मुकेश अरनेजा को यदि रोटरी में अपनी उपस्थिति, पहचान और अहमियत बनाए रखने का मौका मिलता दिख रहा होगा - तो वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से पीछे हटने में देर भला क्यों लगायेंगे ?
मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में जातिवाद का कार्ड चल कर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हटना वास्तव में शुरू भी कर दिया है । ललित खन्ना के नजदीक दिखने वाले गैर-पंजाबी लोगों को हाल-फिलहाल में मुकेश अरनेजा की तरफ से समझाने की कोशिश की गई है कि वह एक पंजाबी का साथ क्यों देना चाहते हैं, उन्हें गैर पंजाबी का साथ देना चाहिए - भले ही दीपक का साथ दो या अशोक का । मुकेश अरनेजा की जातिवादी राजनीति को रमेश अग्रवाल चूँकि अच्छे से जानते/समझते हैं, इसलिए उन्हें यह समझने/पहचानने में देर नहीं लगी कि इस तरह की बातों के स्रोत मुकेश अरनेजा ही हैं । मुकेश अरनेजा की इस समय दरअसल एक बड़ी खुन्नस ललित खन्ना हैं । मुकेश अरनेजा को अपने ही क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ से जिस तरह अपमानित होकर निकलना/भागना पड़ा, और रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के पदाधिकारी व लोग अभी भी उनके साथ जिस तरह का परायापन दिखा/जता रहे हैं, मुकेश अरनेजा उसके लिए ललित खन्ना को ही जिम्मेदार मान रहे हैं । इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा का मुख्य एजेंडा दीपक गुप्ता को जितवाना नहीं, बल्कि किसी भी तरह से ललित खन्ना का हरवाना है । इसके लिए यदि उन्हें अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थन में भी जाने की जरूरत होगी, तो वह हिचकेंगे नहीं । अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थन से यदि रमेश अग्रवाल के साथ उनके संबंध सुधरते हैं, तो फिर उनके लिए तो यह बात सोने पर सुहागे वाली बात होगी ।
यानि रमेश अग्रवाल के साथ पुनः दोस्ती करने से मुकेश अरनेजा को ललित खन्ना से निपटने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट से ऊपर की 'व्यवस्था' में भी अपनी स्थिति ठीक करने का मौका मिलेगा - तो उनके लिए तो यह दोहरा लाभ पाने का तरीका हुआ । मुकेश अरनेजा के निकटवर्तियों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट तथा उससे ऊपर की राजनीति तथा व्यवस्था में अपनी जरूरतों का ध्यान करते हुए, और दोहरे लाभ को पाने की उम्मीद में मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल की तरफ दोस्ती का कदम बढ़ा दिया है, जिसकी एक झलक हाल ही में हुए डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में लोगों को भी देखने को मिली है । इस झलक ने लेकिन दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए गंभीर संकट पैदा कर दिया है ।

Sunday, August 28, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकार्यता व विश्वसनीयता मिलती देख डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सक्रिय खिलाड़ी नेताओं की मुसीबत बढ़ी

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के परिदृश्य में ललित खन्ना का यूँ तो कोई सक्रिय खेमा नहीं है - किंतु दीपक गुप्ता और अशोक जैन के खेमे के नेताओं ने जिस तरह से उन्हें अपनी अपनी तरफ खींचने की कोशिशें चलाई हुई हैं, उसके चलते ललित खन्ना की उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को असमंजसपूर्ण तथा दिलचस्प बनाया हुआ है । मजे का सीन यह है कि दोनों खेमे के नेता दिखावे के लिए तो ललित खन्ना की उम्मीदवारी को तवज्जो देने से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसके साथ साथ वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को वापस कराने तथा अपनी अपनी तरफ करने के जुगाड़ लगाते हुए भी देखे/सुने जाते है - ऐसे में, लोगों के बीच यही सवाल उठता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी में यदि सचमुच कोई दम नहीं है, तो फिर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं को उनकी उम्मीदवारी की उपस्थिति से परेशान क्यों होना पड़ रहा है ? खास बात यह है कि दोनों खेमे के नेता लोग ललित खन्ना को - दूसरे खेमे के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में भी पोर्ट्रेट करने की कोशिश करते हैं; इसका नतीजा यह निकल रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में ललित खन्ना को दोनों खेमे के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस तरह से, होता यह दिख रहा है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को 'मिटाने' की कोशिशें बूमरेंग करते हुए वास्तव में उनकी उम्मीदवारी को 'जमाने' का काम कर रही हैं ।
ललित खन्ना की उम्मीदवारी का 'शोर' जरूर कम है, लेकिन क्लब्स के अध्यक्षों के बीच उनकी पैठ जिस तरह से बनती नजर आ रही है - वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का मैदान मार लेने की कोशिशों में जुटे दोनों खेमे के नेताओं के लिए परेशानी का सबब बनी है । चुनावी राजनीति में खेमेबाजी का जो प्रभाव होता है, उस प्रभाव को जमाने/दिखाने में ललित खन्ना भले ही कमजोर पड़ रहे हों - लेकिन उम्मीदवार का जो अपना एक 'प्रभाव' होता/पड़ता है, उस मामले में ललित खन्ना किसी भी तरह से पीछे नहीं हैं । वह वर्षों मुकेश अरनेजा के अच्छे-बुरे समय के साथी/सहयोगी रहे हैं, और इस नाते से राजनीति की तरकीबें अच्छे से जानते/पहचानते भी हैं - और उन्हें इस्तेमाल करने के हुनर से भी परिचित हैं । राजनीति की तरकीबों को जानने/पहचानने की अपनी काबिलियत के चलते ही ललित खन्ना ने बिना किसी के सहयोग/समर्थन के बावजूद डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के गणित को उलझा दिया है । ललित खन्ना अकेले ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों से टक्कर ले रहे हैं, और अपनी उम्मीदवारी के लिए 'मौके' बना रहे हैं - इस बात ने भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों की उत्सुकता को बढ़ाया है; और उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ती इसी उत्सुकता ने डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों के सामने मुसीबत खड़ी कर दी है ।
इस तरह, ललित खन्ना की उम्मीदवारी पर किसी की 'छतरी' न होने के जिस तथ्य को उनकी बड़ी कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - उस तथ्य को उन्होंने अपनी ही छतरी तान कर अपनी ताकत बना लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के जाने-पहचाने सीन में हर उम्मीदवार किन्हीं दूसरों की छतरी में आगे बढ़ता दिखाई देता है; ललित खन्ना ने लेकिन इस जाने-पहचाने सीन को बदलने का प्रयास किया है - और वह किन्हीं दूसरों की नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी ही छतरी में अपने राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाना शुरू किया । इसका उन्हें सुफल भी मिलता दिखा है । वास्तव में, अधिकतर लोग - और इन अधिकतर लोगों में क्लब्स के अध्यक्ष भी आते हैं - उम्मीदवार में 'लीडर' के गुण देखते हैं और उन गुणों को पसंद करते हैं; लीडर जब 'इसके' या 'उसके' 'आदमी' के रूप में सामने आता है, तो वह लोगों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़/बना पाता है । उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना ने लोगों के बीच इस कारण से अपनी पैठ बनाई है - क्योंकि वह किसी नेता के 'आदमी' के रूप में लोगों के बीच नहीं हैं । क्लब्स के पदाधिकारी नेताओं की दखलंदाजी और लगातार पड़ते रहने वाले तरह तरह के उनके दबावों से प्रायः परेशान और दुखी रहते हैं, इसलिए भी ललित खन्ना के साथ वह अपने आप को कंफर्टेबल पाते हैं । क्लब्स के पदाधिकारियों की इस कंफर्टेबिलिटी को वोट में बदलने की चुनौती ललित खन्ना के सामने हालाँकि अभी बाकी है; किंतु ललित खन्ना की अभी तक की उपलब्धि ने ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं की परेशानी को बढ़ा दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी को उनकी पत्नी नीलू खन्ना की सक्रियता के चलते और व्यापकता व स्वीकार्यता मिल रही है । दरअसल नीलू खन्ना की पहचान सिर्फ ललित खन्ना की पत्नी के रूप में ही नहीं है; बल्कि इंटरनेशनल इनरव्हील डिस्ट्रिक्ट 301 की निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट चेयरपरसन के रूप में एक लीडर की भी है । अभी करीब दो महीने पहले तक वह इंटरनेशनल इनरव्हील डिस्ट्रिक्ट 301 की चेयरपरसन के रूप में सक्रिय थीं, और उनकी सक्रियता को चूँकि कई प्रमुख रोटेरियंस की पत्नियों ने नजदीक से देखा/पहचाना है; इसलिए जब वह ललित खन्ना के साथ क्लब्स के और डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में शामिल होती हैं - तो ललित खन्ना के अभियान को और नजदीकियत तथा विश्वसनीयता मिलती है । नीलू खन्ना रोटरी परिवार में एक बड़े पद पर रही हैं, इस कारण से क्लब्स के पदाधिकारियों तथा दूसरे लोगों के बीच उनका एक 'ऑरा' बनता/दिखता है, जिसका फायदा स्वतः ललित खन्ना के अभियान को मिलता ही है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को उनके क्लब के अध्यक्ष विजय भूषण की सक्रियता से भी मनोवैज्ञानिक फायदा मिल रहा है । विजय भूषण उनके साथ भी लोगों के बीच जाते हैं, और खुद अकेले भी अपनी सक्रियता लोगों - खासकर क्लब्स के अध्यक्षों के बीच रखते हैं । दीपक गुप्ता और अशोक जैन के क्लब के अध्यक्ष चूँकि इस तरह की सक्रियता के मामले में ढीले-ढाले दिखते हैं, इसलिए विजय भूषण की सक्रियता ललित खन्ना की उम्मीदवारी के काम भी आती है ।
ललित खन्ना की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले रोटेरियंस को उनसे बस एक बड़ी शिकायत यही है कि वह कभी भी सीन से गायब हो जाते हैं; हालाँकि उनके नजदीकियों का दावा है कि वह गायब कहीं नहीं होते - वह निरंतर सक्रिय हैं, होता सिर्फ यह है कि कभी कभी उनकी सक्रियता 'दिखना' बंद हो जाती है । जाहिर है कि सक्रिय होने के साथ साथ, सक्रिय 'दिखने' की जरूरत तथा अहमियत को उन्हें अभी समझना है । दीपक गुप्ता और अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने जिस तरह से बहला-फुसला कर और तरह तरह के ऑफर देकर उन्हें इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए राजी करने तथा अपने अपने साथ आने के लिए 'तैयार' करने का काम शुरू किया है, उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सक्रिय खिलाड़ी नेताओं के लिए भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी को इग्नोर करना संभव नहीं रह गया है; और वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को अपने लिए और अपने उम्मीदवार के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं ।

Wednesday, December 2, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ अपने ही क्लब की कॉन्करेंस जुटाने में असफल रहे मुकेश अरनेजा अब दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों से किस आधार पर और किस मुँह से कॉन्करेंस मागेंगे ?

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस देने से इंकार कर दिया है । इस तरह सुभाष जैन की अधिकृत उम्मीदवारी के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने के लिए अपनाए जा रहे मुकेश अरनेजा के 'पैर पकड़ो' अभियान को मुकेश अरनेजा के क्लब में ही मुहँकी खानी पड़ी है । मुकेश अरनेजा ने हालाँकि दावा किया था कि अपने क्लब के बोर्ड सदस्यों को उन्होंने कॉन्करेंस देने के लिए राजी कर लिया है, किंतु क्लब की बोर्ड मीटिंग में प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने जब कॉन्करेंस के लिए स्वीकृति लेने की कोशिश की तो मुकेश अरनेजा का दावा झूठा साबित हो गया । मुकेश अरनेजा के लिए मुसीबत की बात अब यह हो गई है कि अब जब वह अपने ही क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने में फेल हो गए हैं और अपने ही क्लब के संदर्भ में किया गया उनका दावा झूठा साबित हो गया है, तो दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों को वह किस मुँह से कॉन्करेंस के लिए राजी करें और जरूरी कॉन्करेंस दिलवाने/जुटाने के उनके दावे पर कौन क्यों विश्वास करे ? अपने ही क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने के मामले में मुकेश अरनेजा की जो भद्द पिटी है, उससे क्लब में मुकेश अरनेजा की बेचारगी वाली दशा की पोल एक बार फिर खुल गई है । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा की कारस्तानियों के कारण पिछले रोटरी वर्ष में उन्हें उनके क्लब से निकाल दिया गया था; निकाल दिए जाने की प्रक्रिया की खामियों में चोर-दरवाजा बना कर मुकेश अरनेजा क्लब में अपनी वापसी करवाने में तो सफल हो गए थे, लेकिन कॉन्करेंस को अपनी इज्जत का सवाल बना बैठे मुकेश अरनेजा की कॉन्करेंस देने की अपील के खारिज हो जाने से साबित हुआ है कि क्लब के सदस्यों के बीच अपनी स्वीकृति बनाने तथा सम्मान हासिल करने के मामले में वह जरा भी सफल नहीं हो सके हैं । 
क्लब की बोर्ड मीटिंग में प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने बोर्ड सदस्यों को कॉन्करेंस के लिए राजी करने के उद्देश्य से यह कहते हुए भावनात्मक कार्ड भी चला कि आज मुकेश अरनेजा का जन्मदिन है, और कॉन्करेंस के रूप में 'हम' उन्हें जन्मदिन का गिफ्ट दे सकते हैं । बोर्ड सदस्यों ने लेकिन उनकी बात पर कोई गौर ही नहीं किया और इस तरह यही जाहिर किया कि उनके लिए मुकेश अरनेजा के जन्मदिन का कोई मतलब नहीं है - गिफ्ट/विफ्ट तो उनके लिए बहुत दूर की बात है । क्लब की बोर्ड मीटिंग में प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने मुकेश अरनेजा की तथा कॉन्करेंस देने की वकालत तो खूब की, लेकिन उनकी तमाम वकालत के बावजूद बोर्ड के सदस्य कॉन्करेंस के लिए राजी नहीं हुए । मीटिंग में शामिल एक बोर्ड सदस्य ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया कि शुरू में तो प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने कॉन्करेंस के बाबत सामान्य रूप से बात की, जिसके जबाव में बोर्ड के सदस्यों ने उन्हें रोटरी की मूल भावना से परिचित कराया और समझाया कि अधिकृत उम्मीदवार को ही विजेता के रूप में स्वीकार करने से लोगों के बीच परस्पर मान-सम्मान व सहयोग का संबंध बनता है - अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने से लोगों के बीच बेवजह के विवाद पैदा होते हैं तथा झगड़े शुरू होते हैं, जिससे रोटरी की मूल भावना आहत होती है । मनीष गोयल पर किंतु इस तरह की बातों का कोई असर नहीं हुआ । शायद मुकेश अरनेजा ने उन्हें खूब सिखा-पढ़ा कर तैयार किया था । मुकेश अरनेजा की ड्यूटी बजाने के चक्कर में मनीष गोयल कॉन्करेंस के लिए जिद पकड़ कर बैठ गए और मुकेश अरनेजा व क्लब की इज्जत की बात करने लगे । इस पर बोर्ड सदस्यों ने मनीष गोयल को हड़काना शुरू किया और उन्हें लताड़ा कि उन्होंने और मुकेश अरनेजा ने अपनी हरकतों से क्लब को बहुत बेइज्जत करवाया है । क्लब के बोर्ड सदस्यों ने मनीष गोयल को इस बात के लिए खूब लताड़ा कि मुकेश अरनेजा की कठपुतली बन कर रहने के चलते अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी का गरिमापूर्ण तरीके से निर्वाह करने में वह पूरी तरह असफल रहे हैं, और इस कारण से मुकेश अरनेजा के साथ-साथ उन्होंने भी क्लब की पहचान व प्रतिष्ठा को कलंकित किया है । 
क्लब के बोर्ड सदस्यों को कॉन्करेंस के लिए राजी करने के वास्ते मनीष गोयल ने जो भी बातें कहीं व तर्क दिए, उनसे उन्होंने न सिर्फ अपनी व मुकेश अरनेजा की खिल्ली उड़वाई बल्कि रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के प्रेसीडेंट अंकुर बाना के लिए भी अप्रिय स्थितियाँ बनाई । दरअसल मनीष गोयल ने अपने बोर्ड के सदस्यों के सामने उदाहरण पेश करते हुए उन्हें बताया कि मुकेश अरनेजा की प्रेरणा से रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के प्रेसीडेंट अंकुर बाना ने क्लब प्रेसीडेंट्स के अधिकारों व मान-सम्मान के लिए जो अभियान शुरू किया है, उसके चलते कॉन्करेंस मिलने का काम हो जायेगा और 'हमें' भी इस अभियान का हिस्सा बनना चाहिए । यह सुन कर बोर्ड सदस्य बुरी तरह उखड़ गए और उन्होंने मनीष गोयल को जोरों की फटकार लगाई कि तुम हमें क्या बेवकूफ समझते हो; हमें क्या पता नहीं है कि रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर कुल आठ सदस्यों का क्लब है, जिसकी नियमानुसार न कभी मीटिंग होती है और जिसमें न कभी कोई प्रोजेक्ट होता है; खुद मुकेश अरनेजा ने ही कई बार बताया है कि उन्होंने कई उम्मीदवारों से उसके ड्यूज दिलवाए हैं और जो वोट व कॉन्करेंस 'बेचने' के लिए ही बना हुआ है । अंकुर बाना इस वर्ष भी क्लब के प्रेसीडेंट हैं और अगले रोटरी वर्ष के भी प्रेसीडेंट हैं; लेकिन रोटरी इंटरनेशनल के मापदंडों के अनुसार प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारियों को निभाने में तथा अध्यक्ष के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा करने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है; ऐसे में उनके मुँह से प्रेसीडेंट के अधिकार व मान-सम्मान की बात सुनना मजाक जैसा लगता है । मनीष गोयल को याद दिलाया गया कि कुछेक मौकों पर आपके सामने ही तो मुकेश अरनेजा ने यह कहा/बताया है कि रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर की कॉन्करेंस व वोट प्राप्त करने की कीमत उन्हें पता है, और उसकी कॉन्करेंस तो वह जब चाहेंगे तब खरीद लेंगे । मनीष गोयल से पूछा गया कि आप क्या यह चाहते हो कि रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ जैसा प्रतिष्ठित क्लब रोटरी को धंधे के रूप में इस्तेमाल करने वाले रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के कहने में चले ? मीटिंग में लोगों का कहना रहा कि प्रेसीडेंट के रूप में अंकुर बाना ने अपनी जिम्मेदारियों व कर्तव्यों का निर्वाह किया होता और फटीचर से क्लब को सुधारने व बेहतरीन क्लब बनाने का प्रयास किया होता - और फिर प्रेसीडेंट्स के अधिकारों व मान-सम्मान की बात की होती तो वह समझ में भी आती; अभी तो ऐसा लग रहा है कि प्रेसीडेंट्स के अधिकारों व मान-सम्मान की बात करने की आड़ में उनका असल इरादा कॉन्करेंस के बदले में ज्यादा से ज्यादा रकम ऐंठना है । मनीष गोयल को अपने ही क्लब के बोर्ड सदस्यों से सुनने को मिला कि अंकुर बाना की तरह कहीं आपने भी तो कॉन्करेंस का सौदा नहीं कर लिया है ? 
मुकेश अरनेजा की ड्यूटी बजाने के तहत कॉन्करेंस के लिए बोर्ड सदस्यों को राजी करने की कोशिश में मनीष गोयल को बोर्ड सदस्यों से जैसी जैसी फटकार सुनने को मिली, उसके चलते मनीष गोयल के लिए बोर्ड सदस्यों के प्रकोप से बचना खासा मुश्किल हो गया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में भागीदारी निभाने, दूसरे क्लब्स के अध्यक्षों का समर्थन जुटाने के प्रयासों में लगने तथा चुनावी संदर्भ में खुली चिट्ठी लिखने के लिए मनीष गोयल को तगड़ी फटकार लगाई गई - जिसके चलते मनीष गोयल को माफी माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा । बोर्ड सदस्यों ने मनीष गोयल को स्पष्ट शब्दों में समझा दिया है कि यदि उन्हें क्लब के अध्यक्ष-पद पर रहना है, तो उन्हें मुकेश अरनेजा की कठपुतली के रूप में नहीं, बल्कि अध्यक्ष के रूप में काम/व्यवहार करना होगा । मनीष गोयल ने बोर्ड सदस्यों को आश्वस्त किया कि आगे उन्हें उनकी तरफ से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा । इस तरह, मुकेश अरनेजा के चक्कर में मनीष गोयल को अपने ही क्लब में जिस तरह की फजीहत का शिकार होना पड़ा है, वह इस बात का उदाहरण और सुबूत भी बन गया है कि जो कोई भी मुकेश अरनेजा के साथ जुड़ेगा उसे फजीहत का शिकार होने के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा ।
मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने के मामले में अपने ही क्लब में जो झटका लगा है, उसके कारण कॉन्करेंस जुटाने के उनके प्रयास शुरू होते ही बुरी तरह पिट गए हैं । उनके सामने समस्या यह आ खड़ी हुई है कि अब वह दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों से किस आधार पर और किस मुँह से कॉन्करेंस मागेंगे ? उनके चेले के रूप में काम कर रहे मनीष गोयल ने अतिउत्साहपूर्ण बेवकूफी में रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के अध्यक्ष अंकुर बाना की मुहिम को भी एक्सपोज कर दिया है, जिसके कारण कॉन्करेंस 'खरीदना' भी अब आसान नहीं रह जायेगा । 

Saturday, October 3, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अपने ही क्लब से भाषण दिए बिना बैरंग लौटाए गए मुकेश अरनेजा वास्तव में अपनी तिकड़मों के बार-बार फेल होते जाने का शिकार हुए हैं

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा को अपने ही क्लब की बोर्ड मीटिंग में भाषण देने से मना कर दिया गया, और फलस्वरूप भाषण देने की तैयारी करके गए मुकेश अरनेजा को अपने ही क्लब की बोर्ड मीटिंग से बैरंग लौटना पड़ा । इस प्रसंग के चलते उनके क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के अध्यक्ष मनीष गोयल को अपने ही बोर्ड मेंबर्स से खरी-खोटी और सुननी पड़ी । मनीष गोयल आजकल इस बात का एक जीवंत उदाहरण बने हुए हैं कि 'एक मूर्ख व बदनाम किस्म के व्यक्ति की दोस्ती' किस तरह मुसीबतों का जंजाल बन जाती है । क्लब के लोगों का ही कहना है कि मनीष गोयल बेचारे भले व्यक्ति हैं, लेकिन मुकेश अरनेजा से दोस्ती निभाने के चक्कर में ऐसी ऐसी हरकतें कर जातें हैं कि क्लब से लेकर डिस्ट्रिक्ट तक में मजाक का विषय बन कर रह गए हैं । क्लब की पिछली बोर्ड मीटिंग में मुकेश अरनेजा के भाषण मामले में यही हुआ । नियमानुसार और परंपरानुसार बोर्ड मीटिंग का एक बना-बनाया एजेंडा होता है; उसमें यदि कुछ जोड़ना होता है तो अध्यक्ष दूसरे पदाधिकारियों से बात करके एजेंडे को विस्तार दे देता है - दे सकता है । क्लब की पिछली बोर्ड मीटिंग के एजेंडे में मुकेश अरनेजा का भाषण था नहीं; लेकिन जैसे ही बोर्ड मीटिंग शुरू हुई - पता चला की मुकेश अरनेजा भाषण देने की तैयारी कर रहे हैं । बोर्ड मेंबर उखड़ गए । उन्होंने अध्यक्ष से पूछा कि यह सब क्या हो रहा है । मनीष गोयल ने उन्हें बताया कि ऐन मौके तक कोई स्पीकर तय नहीं हो रहा था; इसलिए उन्होंने सोचा कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा को ही स्पीकर के रूप में आमंत्रित कर लूँ । बोर्ड मेंबर्स को यह समझने में देर नहीं लगी कि मनीष गोयल यह जो बोल रहे हैं, इसकी चाबी किसने भरी है; लिहाजा उन्होंने मनीष गोयल को बताया कि मुकेश अरनेजा इस क्लब के मेंबर हैं, इस क्लब के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नहीं हैं; और दूसरी बात यह कि चाहें कितना ही ऐन मौका हो स्पीकर का फैसला आप दूसरे पदाधिकारियों से सलाह करके ही कर सकते हैं । मनीष गोयल ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने देखा/पाया कि इस मामले में वह बिलकुल अकेले पड़ गए हैं - लिहाजा वह चुप होने तथा बोर्ड के सदस्यों की बात मानने के लिए मजबूर हुए । 
भाषण देने की तैयारी से बोर्ड मीटिंग में पहुँचे मुकेश अरनेजा ने मनीष गोयल को सरेंडर करते देखा, तो उन्होंने मनीष गोयल में हवा भरने की कोशिश तो की; किंतु बोर्ड मेंबर्स की सख्ती और तल्खी से मनीष गोयल में इतना बड़ा पंक्चर हो गया था कि फिर मुकेश अरनेजा द्वारा भरी गई हवा उनमें ठहर ही नहीं पाई । अंततः मुकेश अरनेजा को बिना भाषण दिए हुए ही अपने क्लब की बोर्ड मीटिंग से वापस लौटना पड़ा । मुकेश अरनेजा की 'भक्ति' करने के कारण मनीष गोयल को यह कोई पहली बार फजीहत का सामना नहीं करना पड़ा । इससे पहले भी कई बार वह मुकेश अरनेजा के कारण क्लब में और डिस्ट्रिक्ट में किरकिरी करवा चुके हैं । क्लब में उनकी समस्या यह है कि उनके बोर्ड में ऐसे लोग हैं जिन्हें मुकेश अरनेजा के विरोधी के रूप में देखा/पहचाना जाता है; इसलिए वह कोई ऐसा काम कर ही नहीं पाते हैं, जिसे मुकेश अरनेजा अपने आपको प्रमोट करने के लिए करना जरूरी समझते हों । मनीष गोयल को साफ-साफ बता दिया गया है कि अध्यक्ष के रूप में क्लब और रोटरी की गरिमा के अनुरूप तथा हित में कोई काम करोगे, तो हर तरह का सहयोग मिलेगा; मुकेश अरनेजा के कहने से कोई उल्टा-सीधा काम करने की कोशिश करोगे तो सहयोग तो नहीं ही मिलेगा, विरोध का सामना भी करना पड़ेगा । क्लब के लोगों का कहना है कि मनीष गोयल ने भी इस बात को समझ लिया है, और वह अपनी तरफ से कोई ऐसी हरकत नहीं करते हैं जिससे कि उन्हें फजीहत का सामना करना पड़े; किंतु कभी-कभी मुकेश अरनेजा की 'होशियारी' के चलते ऐसी स्थिति आ ही जाती है । 
मुकेश अरनेजा ने मनीष गोयल से कई एक क्लब-अध्यक्षों को सिफारिश करवाई कि अपने यहाँ के कार्यक्रमों में वह मुकेश अरनेजा को भी बुलाएँ । इसके लिए लेकिन कई अध्यक्षों ने तो उनकी सिफारिश पर कोई गौर ही नहीं किया, और कुछेक ने तो उन्हें सीधा और साफ साफ इंकार भी कर दिया । मजे की बात यह रही कि जिन कुछेक क्लब्स से मुकेश अरनेजा को निमंत्रण मिले, उनके पदाधिकारियों से मुकेश अरनेजा ने मनीष गोयल को भी आमंत्रित करने को कहा । कुछेक को तो मुकेश अरनेजा ने इसका कारण भी बता दिया कि फिर मैं मनीष गोयल के साथ उनकी ही गाड़ी में आ जाऊँगा, अन्यथा मैं कैसे आऊँगा ? मुकेश अरनेजा को चूँकि क्लब्स में आने जाने के कम मौके मिले, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपनी भूमिका उन्हें बहुत हद तक फोन से निभानी पड़ रही है । इस कारण से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में उतना काम करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं, जितने काम की उनसे उम्मीद की जाती है । कई एक लोगों का कहना है कि उनकी राजनीति चूँकि बुरी तरह पिट गई है और लोग उनके कहे में नहीं फँस रहे हैं, इसलिए चुनावी तिकड़मों के रूप में क्लब्स में - खासतौर से गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के क्लब्स में तोड़फोड़ मचाने की उनकी कोशिशें दरअसल सफल नहीं हो पा रही हैं, और यही कारण है कि चुनाव में उनका कोई खास असर नहीं दिख रहा है ।        
मुकेश अरनेजा की समस्या यह है कि रोटरी में वैसे तो उनकी कोई साख व इज्जत नहीं रह गई है; इसलिए जुगाड़ बैठाने में अपने माहिरपने का इस्तेसेमाल करते हुए उन्हें अपने लिए मौके बनाने पड़ते हैं - जिनमें कभी-कभार वह कामयाब भी हो जाते हैं । पिछले दिनों डिस्ट्रिक्ट 3100 में मेंबरशिप डेवलपमेंट विषय पर हुई इंटरसिटी में मुख्य अतिथि के रूप में अपने को बुलाए जाने को मुकेश अरनेजा ने बड़ा प्रचारित किया । किंतु इसके पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है । डिस्ट्रिक्ट 3100 के उक्त कार्यक्रम में दरअसल पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को आना था । इसके एक दिन पहले लेकिन पीटी प्रभाकर अपने घर में बाथरूम में फिसल जाने से चोट खा बैठे । ऐसे में उनका आ पाना स्थगित ही होना था । मुकेश अरनेजा को यह खबर मिली, तो 'किसी के मरने की सूचना मिलते ही तेरहवीं खाने की तैयारी करने' की प्रवृत्ति का इज़हार करते हुए उन्होंने तुरंत डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता से संपर्क किया । उन्हें पता था कि सुनील गुप्ता के बस की इतना जल्दी किसी मुख्य अतिथि का इंतजाम करना नहीं होगा । कोई ढंग का रोटेरियन 'मजबूरी' वाला मुख्य अतिथि बनने को तैयार भी नहीं होगा । मुकेश अरनेजा ने खुद ही ऑफर किया कि कोई और न मिल रहा हो, तो मैं आ जाऊँगा । सुनील गुप्ता का भी आसानी से काम बन रहा था, सो उन्होंने भी हाँ कहने में देर नहीं लगाई । जुगाड़ से मुख्य अतिथि बने मुकेश अरनेजा फोटो दिखा दिखा कर अपने यहाँ लोगों को बता/जता रहे हैं कि देखिए, बाहर उनकी कितनी पूछ है ।
इससे पहले, डिस्ट्रिक्ट 3080 में हुए एक सेमिनार के निमंत्रण का जुगाड़ भी उन्होंने तीन-तिकड़मों से किया । डिस्ट्रिक्ट 3080 में पिछले रोटरी वर्ष में हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर बड़ा झगड़ा चल रहा है । इस झगड़े के कारण दोनों पक्षों ने डिस्ट्रिक्ट से बाहर भी अपने अपने लिए समर्थन जुटाने का अभियान छेड़ा हुआ है । मुकेश अरनेजा ने इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई से अपनी नजदीकी का वास्ता देकर दोनों पक्षों के लोगों के साथ अपने तार जोड़ लिए और सेमिनार का निमंत्रण जुगाड़ लिया । डिस्ट्रिक्ट 3080 की राजनीति में अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंकने के लिए मुकेश अरनेजा ने जिस तरह से मनोज देसाई के नाम का इस्तेमाल  किया, उससे मनोज देसाई उनसे बुरी तरह खफा हैं । उनका खफा-पन अभी हाल ही में तब जाहिर हुआ, जब डिस्ट्रिक्ट 3080 के एक इंटरसिटी कार्यक्रम में जाने से ठीक पहले मनोज देसाई ने मसूरी में कुछेक प्रमुख रोटेरियंस के साथ मीटिंग की - और उसमें उन्होंने मुकेश अरनेजा को नहीं बुलाया । मुकेश अरनेजा ने उनका निमंत्रण पाने की हालाँकि हर संभव कोशिश की, किंतु मनोज देसाई की सख्ती के चलते उनकी कोई भी कोशिश सिरे नहीं चढ़ सकी ।
मुकेश अरनेजा ने अपने क्लब की बोर्ड मीटिंग में भाषण देने की भूमिका बनाने में भी कई तिकड़में लगाईं, किंतु यहाँ भी उन्हें मुँहकी खानी पड़ी । अपने साथ उन्होंने अपने क्लब के अध्यक्ष मनीष गोयल की फजीहत मुफ्त में और करवा दी । 

Thursday, June 4, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा अपनी हरकतों व कारस्तानियों के कारण अपने क्लब से निकाले गए उर्फ़ शिकारी खुद शिकार हो गया

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा अपनी जिन कारस्तानियों और करतूतों के कारण अपने क्लब से निकाल दिए गए है, उससे इंटरनेशनल डायरेक्टर का पदभार संभालने की तैयारी कर रहे मनोज देसाई के लिए यह संकट पैदा हो गया है कि उन्होंने मुकेश अरनेजा को असिस्टेंट रोटरी कोऑर्डिनेटर का जो पद दिया है, उसका वह क्या करें ? उल्लेखनीय है कि मनोज देसाई ने असिस्टेंट रोटरी कोऑर्डिनेटर के रूप में मुकेश अरनेजा को चार डिस्ट्रिक्ट्स की जिम्मेदारी सौंपी है, जिनमें उन्हें रोटरी की भावना और उसके आदर्शों के अनुरूप लोगों को शिक्षित व प्रशिक्षित करना है । मनोज देसाई के सामने सवाल लेकिन अब यह खड़ा हो गया है कि जो मुकेश अरनेजा रोटरी की भावना व उसके आदर्शों का पालन न करने के कारण अपने क्लब से निकाल दिए गए हों, वह मुकेश अरनेजा दूसरों को रोटरी की भावना व उसके आदर्शों के बारे में भला कैसे शिक्षण/प्रशिक्षण दे सकेंगे ? मनोज देसाई इस बात पर कोई फिक्र कर रहे हैं या नहीं, यह तो अभी पता नहीं चला है; लेकिन मुकेश अरनेजा इस बात की फिक्र बिलकुल भी नहीं कर रहे हैं । मुकेश अरनेजा का कहना है कि वह भले ही अपने क्लब से निकाल दिए गए हैं, लेकिन मनोज देसाई उन्हें दिया गया असिस्टेंट रोटरी कोऑर्डिनेटर का पद वापस नहीं लेंगे । मुकेश अरनेजा का कहना है कि मनोज देसाई ने उन्हें यह पद इसलिए दिया है क्योंकि मनोज देसाई को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने/बनवाने में उन्होंने मदद की थी । जाहिर है कि यह पद मनोज देसाई ने उन्हें ईनाम में दिया है, और उन्हें विश्वास है कि मनोज देसाई दिया गया ईनाम वापस नहीं लेंगे । 
मुकेश अरनेजा को मनोज देसाई से तो 'राहत' मिलने की उम्मीद है, किंतु अपने ही क्लब के पदाधिकारियों से उन्हें राहत नहीं मिल सकी । उनकी कारस्तानियों और करतूतों के खिलाफ उनके क्लब के पदाधिकारियों में जो नाराजगी पैदा हुई; और उस नाराजगी के चलते उनके खिलाफ कार्रवाई करने की जो स्थितियाँ बनीं - उन्हें टालने के लिए मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना से लेकर रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारियों तक से मदद की गुहार की; लेकिन वह क्लब से अपने निष्कासन को बचा नहीं सके । खास बात यह रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना ने तथा रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के वरिष्ठ पदाधिकारी जितेंद्र सिंह ने मुकेश अरनेजा को बचाने का प्रयास भी किया, लेकिन क्लब के पदाधिकारियों की तैयारी के सामने उनके प्रयास भी मुकेश अरनेजा को बचा नहीं सके । 
मुकेश अरनेजा का 'गणित' इस बार दरअसल फेल हो गया । मुकेश अरनेजा चूँकि बदतमीजियाँ और बदमाशियाँ करके हमेशा बच निकलते रहे हैं, इसलिए उन्हें पक्का भरोसा था कि वह इस बार भी बच निकलेंगे । किंतु वह यह समझने/पहचानने में चूक गए कि उनके 'पापों' का घड़ा अब इतना भर गया है कि उनके बचने की संभावनाएँ लगातार कम - और खत्म होती जा रही हैं । उल्लेखनीय है कि मौजूदा रोटरी वर्ष के शुरू में भी हालात ऐसे बने थे जिसमें मुकेश अरनेजा को क्लब से निकाले जाने की बात चली थी । खुशामद करके और माफी माँग कर के प्रतिकूल स्थितियों को अनुकूल करने में मुकेश अरनेजा बड़े होशियार रहे हैं; इसी होशियारी का इस्तेमाल करते हुए मौजूदा रोटरी वर्ष के शुरू में आये संकट को टाल देने में मुकेश अरनेजा सफल हो गए थे । मुकेश अरनेजा ने चूँकि अपनी करतूतों के लिए माफी माँग ली थी, इसलिए क्लब के पदाधिकारियों व दूसरे सदस्यों ने समझा था कि मुकेश अरनेजा अब कम-से-कम इस वर्ष अपनी हरकतों से बाज रहेंगे । लेकिन मुकेश अरनेजा ने उस बात को सही साबित किया, जो बात लोग उनके बारे में प्रायः कहते हैं कि जैसे कुत्ते की पूँछ को किसी भी तरह से सीधा नहीं किया जा सकता है, वैसे ही मुकेश अरनेजा को सुधारा नहीं जा सकता है । माफी माँग कर मुकेश अरनेजा ने अपने खिलाफ होने वाली कार्रवाई को तो टलवा दिया, लेकिन अपनी हरकतों से बाज वह नहीं आए । दरअसल उन्होंने सोचा यह था कि मौजूदा वर्ष तो अब निकल ही जायेगा और अगले वर्ष अध्यक्ष पद सँभालने वाले मनीष गोयल तो उनके ही 'आदमी' हैं, तो फिर उन्हें थोड़े दिन के लिए भी सुधरने की जरूरत भला क्या है ?
मुकेश अरनेजा सुधरने का वायदा करके भी नहीं सुधरे और उन्होंने अपनी हरकतें जारी रखीं । उन्होंने गलती यही की कि उन्होंने मौजूदा अध्यक्ष आभा गुप्ता को हल्के में लिया । आभा गुप्ता ने पहली बार तो मुकेश अरनेजा को माफ करने की उदारता और बड़प्पन दिखाया था; लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनकी उदारता और उनके बड़प्पन को मुकेश अरनेजा उनकी कमजोरी समझ रहे हैं, तो उन्होंने मुकेश अरनेजा की गर्दन ऐसे पकड़ी कि गर्दन छुड़ाने के लिए मुकेश अरनेजा छटपटाये तो बहुत, और - और जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि - उन्होंने संजय खन्ना व जितेंद्र सिंह जैसे बड़े पदाधिकारियों की मदद भी जुटाई, किंतु आभा गुप्ता की पकड़ से अपनी गर्दन छुड़ा नहीं पाए और क्लब से बाहर कर दिए गए । 
मुकेश अरनेजा के समर्थकों का कहना है कि मुकेश अरनेजा को भले ही क्लब से बाहर कर दिया गया है, लेकिन मुकेश अरनेजा अभी हार मानने वाले नहीं हैं । क्लब में वापसी करने के लिए उनके पास दो रास्ते हैं : एक तो वह क्लब के सदस्यों की मीटिंग बुला/बुलवा कर दो-तिहाई समर्थन जुटा कर क्लब से उन्हें निकालने के फैसले को वापस करवा सकते हैं; और दूसरा रास्ता उनके पास यह है कि वह रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत कर सकते हैं कि उन्हें क्लब से निकालने की प्रक्रिया में नियमों आदि का पालन नहीं हुआ है, और वहाँ से वह अपने पक्ष में फैसला होने की उम्मीद कर सकते हैं । इन दोनों रास्तों की सफलता को लेकर लेकिन शक इसलिए है क्योंकि क्लब में अधिकतर सदस्य मुकेश अरनेजा के खिलाफ हो गए हैं । इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि अगले रोटरी वर्ष के लिए बनने वाले बोर्ड में मुकेश अरनेजा गिरोह ने जब अपने लोगों को रखने का प्रयास किया तो उसका तगड़ा विरोध हुआ, जिसके कारण बोर्ड के सदस्यों के लिए चुनाव करवाने की नौबत पैदा हुई - जिसमें मुकेश अरनेजा गिरोह के उम्मीदवार भारी अंतर से पराजित हुए । इससे यही लग रहा है कि रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा के लिए अब शायद कोई जगह नहीं रह गई है । 
मुकेश अरनेजा को क्लब से निकाले जाने की घटना डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में एक अनोखी घटना भी है - डिस्ट्रिक्ट में लोग अभी तक यही सुनते और देखते रहे हैं कि मुकेश अरनेजा ही क्लब्स में झगड़े करवाते हैं और लोगों को उनके क्लब्स से निकलवाते हैं । पिछले वर्षों में क्लब्स से जो लोग निकाले गए हैं, या क्लब्स में अलग-थलग किए गए हैं - उनमें अधिकतर मामलों में मुकेश अरनेजा का ही हाथ बताया/सुना जाता रहा है । मुकेश अरनेजा अभी तक दूसरोँ का ही शिकार करते रहे हैं - लेकिन दूसरों का शिकार करने के लिए वह जिस तरह की हरकतें और कारस्तानियाँ करते रहे हैं, उन्हीं हरकतों और कारस्तानियों का अब वह खुद शिकार हो गए हैं । 

Tuesday, November 6, 2012

कल पता चलेगा कि ललित खन्ना के खिलाफ मुकेश अरनेजा के पास सचमुच कोई तिकड़म है या केके गुप्ता की रणनीति के सामने उनकी सारी तिकड़मबाजी हवा हो गई है

नई दिल्ली | ललित खन्ना क्या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के वास्ते अपनी उम्मीदवारी के लिए अपने क्लब की हरी झंडी प्राप्त कर लेंगे ? इस बात में यूँ तो किसी को भी कोई शक नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्लब में ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर पर्याप्त समर्थन है; लेकिन फिर भी यदि यह सवाल चर्चा में है तो इसका कारण मुकेश अरनेजा का रवैया है | यह सच है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के खिलाफ मुकेश अरनेजा कुछ भी करते हुए नहीं दिखे हैं: लेकिन सच यह भी है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में भी मुकेश अरनेजा कुछ करते हुए नहीं दिखे हैं | यह दूसरा सच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुकेश अरनेजा चुपचाप बैठ कर तमाशा देखने वाले लोगों में से नहीं हैं; और ललित खन्ना उनके थोड़े से खास लोगों में एक रहे हैं | दरअसल इसी नाते से लोगों को उम्मीद रही कि मुकेश अरनेजा हर तरह से ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में जुटेंगे | पर जब मुकेश अरनेजा ऐसा करते हुए नहीं नज़र आये तो सभी का माथा ठनका और तब पता चला कि मुकेश अरनेजा तो ललित खन्ना की उम्मीदवारी के पूरी तरह खिलाफ हैं |
मुकेश अरनेजा के खिलाफ होने के बावजूद ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अपने क्लब में हालाँकि समर्थन जुटा लिया है | क्लब के अध्यक्ष राकेश मल्होत्रा यूँ तो मुकेश अरनेजा के आदमी के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं - लेकिन इस मामले में वह भी मुकेश अरनेजा के साथ नहीं, बल्कि ललित खन्ना के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं | देखा/पाया जा रहा है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी का विरोध करने के कारण मुकेश अरनेजा अपने ही क्लब में अलग-थलग हो गए हैं और अकेले पड़ गए हैं | इसके बावजूद, ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर संशय यदि बना हुआ है तो इसका कारण यही है कि मुकेश अरनेजा को आसानी से हार मानने वाला नहीं माना जाता है | लोगों को लगता है कि मुकेश अरनेजा क्लब की हरी झंडी ललित खन्ना को आसानी से नहीं मिलने देंगे और उन्होंने अवश्य ही कोई तिकड़म सोच रखी होगी, जिसके भरोसे वह ललित खन्ना का रास्ता रोक लेंगे | ललित खन्ना ने भी अपनी उम्मीदवारी को क्लब के समर्थन के बाबत हालाँकि चाक-चौबंद व्यवस्था की हुई है | मुकेश अरनेजा की तिकड़मों से निपटने के लिए ललित खन्ना ने केके गुप्ता से पहले ही तार जोड़ लिया हुआ है | केके गुप्ता ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के संदर्भ में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की चालबाजियों को जिस तरह से विफल किया और ललित खन्ना के समर्थन में विभिन्न खेमों में बँटे क्लब को एकजुट किया है, उसके कारण मुकेश अरनेजा को और झटका लगा है |
ललित खन्ना की उम्मीदवारी मुकेश अरनेजा के लिए दरअसल इसलिए भी गंभीर चुनौती बनी है, क्योंकि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के नाम पर क्लब में जो राजनीति हुई है उसमें मुकेश अरनेजा यदि अलग-थलग और अकेले पड़े हैं तो केके गुप्ता की साख तो बनी ही है, साथ ही उनकी चौधराहट भी स्थापित हुई है | मुकेश अरनेजा जानते हैं कि उनके विरोध के बावजूद - उनकी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की तमाम चालबाजियों के बावजूद - केके गुप्ता ने जिस तरह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को क्लब से लेकर इंटरनेशनल डायरेक्टर तक के यहाँ स्वीकार्य बनाया, उससे लोगों को केके गुप्ता के रणनीतिक कौशल का और उनकी पहुँच का सुबूत मिला है | ललित खन्ना की उम्मीदवारी के नाम पर जो राजनीति हुई, उसके कारण क्लब में केके गुप्ता की जो धाक बनी है उसे देख/जान कर मुकेश अरनेजा को डर यह पैदा हुआ है कि केके गुप्ता अब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की उनकी उम्मीदवारी में रोड़ा डालेंगे |
केके गुप्ता ने इस मामले को उठाना शुरू भी कर दिया है | केके गुप्ता ने क्लब के सदस्यों के बीच उन चर्चाओं पर गौर करने की जरूरत पर बल दिया है जिनमें कहा/बताया गया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की अपनी उम्मीदवारी का इस्तेमाल करके मुकेश अरनेजा सौदेबाजी करने की जुगाड़ में हैं | केके गुप्ता का कहना है कि इस तरह की बातों से क्लब का नाम बदनाम होता है और किसी मुकेश अरनेजा को यह हक़ नहीं दिया जाना चाहिए कि वह अपने निजी स्वार्थ में क्लब का नाम बदनाम करे | केके गुप्ता ने लोगों को याद दिलाया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की उम्मीदवारी के नाम पर मुकेश अरनेजा पहले भी सौदेबाजी कर चुके हैं |        
केके गुप्ता के इन तेवरों ने मुकेश अरनेजा को वास्तव में संकट में डाल दिया है | केके गुप्ता के इन तेवरों में मुकेश अरनेजा अपने लिए जिस संकट को देख/पहचान रहे हैं, उसकी जड़ में वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को ही पा रहे हैं | मुकेश अरनेजा के नजदीकियों की बातों पर विश्वास करें तो मुकेश अरनेजा मान रहे हैं कि वह यदि ललित खन्ना की उम्मीदवारी में किसी भी तरह फच्चर फँसा दें, तो उनके सारे संकट समाप्त हो जायेंगे | मुकेश अरनेजा के एक नजदीकी ने कुछ दिन पहले इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि क्लब में ललित खन्ना के आलावा एक और उम्मीदवार लाने की तैयारी की जा रही है, ताकि उम्मीदवारी के नाम पर झगड़ा दिखा कर ललित खन्ना की उम्मीदवारी को ख़त्म कर/करा दिया जा सके | अभी तक ऐसा नहीं हो सका है - इससे यह तो पता चल रहा है कि मुकेश अरनेजा की कोई तिकड़म काम नहीं कर रही है | लेकिन इससे यह भी पता चल रहा है कि मुकेश अरनेजा ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है और ललित खन्ना की उम्मीदवारी में रोड़ा डालने की कोई न कोई तिकड़म लगा रहे होंगे | यह देखना दिलचस्प होगा कि तिकड़मबाज मुकेश अरनेजा के पास सचमुच कोई तिकड़म है या केके गुप्ता की रणनीति के सामने उनकी सारी तिकड़मबाजी हवा हो गई है |

Sunday, September 23, 2012

रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के मामले में जो शीर्षासन किया, मुहावरे की भाषा में उसे - 'थूक कर चाटना' कहते हैं

नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने करीब चार महीने पहले ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर जो तड़ी दिखाई थी, ललित खन्ना ने उसका उन्हें सटीक जबाव दे दिया है | नतीजा यह हुआ है कि रमेश अग्रवाल की सारी तड़ी निकल गई और अब उन्होंने मान लिया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी प्रस्तुत हो सकती है | इस प्रसंग से एक बार फिर साबित हुआ है कि रमेश अग्रवाल को अपनी फजीहत कराने का कुछ ज्यादा ही शौक है | शौक क्या है - वह बिना सोचे-विचारे तड़ी दिखाते हैं और फिर फजीहत का शिकार होते हैं | ललित खन्ना के मामले में उन्होंने जो किया, मुहावरे की भाषा में उसे - 'थूक कर चाटना' कहते हैं | उल्लेखनीय है कि मई में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा तय किए गए दिशा-निर्देशों को बिना समझे-बूझे रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना को फरमान सुना दिया कि चूँकि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट का एक असाइनमेंट स्वीकार किया हुआ है, इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे | रमेश अग्रवाल ने जो कुछ कहा, ललित खन्ना ने उसका मतलब यही समझा था जैसे कि वह उन्हें सलाह दे रहे हैं कि उन्हें यदि सचमुच उम्मीदवार होना है तो जो असाइनमेंट उनके पास है उसे छोड़ दें | ललित खन्ना ने रमेश अग्रवाल की सलाह मानने में जरा सी भी देर नहीं लगाई और तुरंत अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया | बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए थी | लेकिन वह यदि यहीं ख़त्म हो जाती तो रमेश अग्रवाल को अपना घटियापन दिखाने का मौका कैसे मिलता और कैसे वह अपनी फजीहत के लिए स्थितियां बनाते ?
रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना को तुरंत यह बताना जरूरी समझा कि वह यह न समझ लें कि अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बाद वह उम्मीदवार हो जायेंगे | यह जून 2012 की बात है - जबकि न तो इस तरह की बातें करने का समय था और न ही कोई जरूरत थी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में रमेश अग्रवाल को इस बात को कहने का न कोई अधिकार था | लेकिन रमेश अग्रवाल इस तरह की बातों की परवाह नहीं करते हैं और अपनी तड़ीबाजी दिखाने के लिए कभी भी कोई भी बात करना अपना अधिकार समझते हैं | इसी तड़ीबाजी में रमेश अग्रवाल ने जून में ललित खन्ना को बाकायदा लिख कर बता दिया कि वह उम्मीदवार नहीं हो सकते | ललित खन्ना को दिखाई गई रमेश अग्रवाल की इस तड़ीबाजी से निपटने का जिम्मा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केके गुप्ता ने संभाला | केके गुप्ता उसी रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के सदस्य हैं, जिसमें ललित खन्ना हैं | ललित खन्ना के साथ की जा रही रमेश अग्रवाल की बदतमीजी को केके गुप्ता ने क्लब पर हमले के रूप में देखा/पहचाना और क्लब की इज्ज़त व साख बचाने के उद्देश्य से उन्होंने इस मामले में आगे आने का फैसला किया | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा भी इसी क्लब के सदस्य हैं, और वह इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर भी हैं - लेकिन उन्होंने ललित खन्ना को दिखाई जा रही रमेश अग्रवाल की तड़ीबाजी का कोई नोटिस नहीं लिया | मुकेश अरनेजा ने न ललित खन्ना के साथ हो रहे अन्याय की परवाह की, और न क्लब की इज्ज़त व साख की ही चिंता की | मुकेश अरनेजा को जानने वालों का कहना रहा कि मुकेश अरनेजा अपने को चाहे जितना तीसमारखां समझते/दिखाते हों, लेकिन वह भी जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल की बदतमीजी का विरोध करने की उनकी 'औकात' है नहीं |
रमेश अग्रवाल का 'नशा' उतारने के लिए केके गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल के जिम्मेदार पदाधिकारियों से बात करने का जिम्मा संभाला, तो ललित खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ सदस्यों - खासकर पूर्व गवर्नर्स से बात की और उन्हें अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में तैयार करने का काम किया | रमेश अग्रवाल द्धारा खड़ी की गई प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के मौके का ललित खन्ना ने बड़ी होशियारी के साथ इस्तेमाल किया | अपनी उम्मीदवारी के खिलाफ रमेश अग्रवाल के रवैये को लेकर ललित खन्ना ने पूर्व गवर्नर्स के बीच जो गुहार लगाई - उसका उन्होंने दो तरह से फायदा उठाया : एक तरफ तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने का काम किया, और साथ ही साथ दूसरी तरफ अपनी उम्मीदवारी के प्रति पूर्व गवर्नर्स के बीच विश्वास और समर्थन पैदा करने का काम भी किया | ललित खन्ना की समस्या थी कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर जो असमंजस बना हुआ था, उसके चलते वह अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम कर ही नहीं पा रहे थे | लिहाजा अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने के लिए उनको जो कोशिश करनी थी, उस कोशिश को उन्होंने इस तरह से संयोजित किया कि वह उनका समर्थन जुटाने का अभियान भी बन गई | दरअसल अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने के लिए ललित खन्ना ने जो प्रयास किए, उन्हें आक्रामक तेवर इसी रणनीति के तहत दिए ताकि लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी के प्रति भरोसा पैदा हो | अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच भरोसा पैदा करने में ललित खन्ना को जो सफलता मिल रही थी, उसका ही नतीजा था कि दूसरे संभावित उम्मीदवारों के बीच घबराहट फैली और इसी घबराहट में ललित खन्ना की उम्मीदवारी की खिलाफत करते हुए उन्होंने भी इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास के सामने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकृत न करने की मांग रखी | कई लोगों को लगता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के विरोध में यश पाल दास के साथ संभावित उम्मीदवारों की मुलाकात का 'स्टेज' पर्दे के पीछे से रमेश अग्रवाल ने ही सजाया था | रमेश अग्रवाल का यह टुच्चापन भी लेकिन उनके काम नहीं आया |
ललित खन्ना की उम्मीदवारी को रोकने की रमेश अग्रवाल की हर कोशिश जब पिट गई तब रमेश अग्रवाल यह स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रस्तुत होने से नहीं रोका जा सकता है | 'थूक के चाटना' वाला मुहावरा किसने बनाया था और किस घटना से प्रेरित होकर बनाया था - यह तो पता नहीं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर जो शीर्षासन किया, उस पर पूरी तरह फिट जरूर बैठता है | रमेश अग्रवाल की तड़ीबाजी से निपटने में ललित खन्ना ने जिस तरह से केके गुप्ता का सक्रिय समर्थन जुटाया, मुकेश अरनेजा के खुले विरोध के बावजूद अपने क्लब के पदाधिकारियों व अन्य सदस्यों का समर्थन प्राप्त किया और रमेश अग्रवाल की हर तिकड़म को फेल किया - उससे उन्होंने अपनी 'लड़ने' की सामर्थ्य का तथा प्रतिकूल स्थितियों को अनुकूल बना सकने के अपने हुनर का सुबूत ही पेश किया है | ललित खन्ना के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने की जो लड़ाई ललित खन्ना ने जीती है उसका उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में एक प्रतीकात्मक महत्व है; और उनकी यह जीत डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी के दावे को गंभीर बनाती है |