Showing posts with label ROTARY INTERNATIONAL DISTRICT 3100. Show all posts
Showing posts with label ROTARY INTERNATIONAL DISTRICT 3100. Show all posts

Thursday, May 14, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में सीओएल के चुनाव में संजीव रस्तोगी की हार को वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जीएस धामा की जीत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; माना जा रहा है कि लगभग चमत्कारिक रूप से योगेश मोहन गुप्ता को जितवा कर जीएस धामा ने दिखा दिया है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सफलता के ताले की चाबी अभी उन्हीं के पास है 

मेरठ । सीओएल के चुनाव में संजीव रस्तोगी की पराजय के नतीजे ने उनके नजदीकियों और समर्थकों को ही नहीं, बल्कि उनके विरोधियों को भी हैरान किया है । उनके विरोधियों का ही कहना/बताना है कि वोटिंग के दौरान यह तो दिखने लगा था कि संजीव रस्तोगी को अपने कुछेक नए नए बने 'समर्थकों' की तरफ से धोखा मिल रहा है - लेकिन फिर भी यह उम्मीद किसी को नहीं थी कि वह चुनाव हार जायेंगे । इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि संजीव रस्तोगी की हार को वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जीएस धामा की जीत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों पर नजर रखने वालों का कहना/बताना है कि सीओएल का चुनाव हो भले ही संजीव रस्तोगी और योगेश मोहन गुप्ता के बीच रहा था - लेकिन जीएस धामा इस चुनाव को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर अपनी पकड़ जमाने और 'दिखाने' के अवसर के रूप में देख रहे थे, और इसके लिए उन्होंने बड़ी होशियारी से तैयारी की - इतनी होशियारी से कि किसी को उसकी भनक तक नहीं लगी । यही कारण रहा कि सीओएल के चुनाव में जीएस धामा को तटस्थ देखा/पहचाना जा रहा था । वोटिंग के दौरान कई मौकों पर यह चर्चा सुनाई तो दी कि जीएस धामा तो योगेश मोहन गुप्ता के पक्ष में वोट जुटाने के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जीएस धामा ने होशियारी और सावधानी से काम करते हुए चर्चा को ज्यादा मुखर नहीं होने दिया । अब लेकिन चर्चा है कि अशोक गुप्ता की तरफ से संजीव रस्तोगी को जो धोखा मिला, उसके पीछे जीएस धामा के ही प्रयास थे । समझा जाता है कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में समर्थन का भरोसा देकर जीएस धामा ने अशोक गुप्ता के वोट योगेश मोहन गुप्ता को दिलवाए । अपनी संभावित उम्मीदवारी के चक्कर में, विकास गोयल ने भी संजीव रस्तोगी का साथ छोड़ कर अपने वोट योगेश मोहन गुप्ता को दिलवाए ।
बहुत से लोगों के लिए समझना मुश्किल है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जीएस धामा को सबसे तगड़ा झटका योगेश मोहन गुप्ता ने ही दिया है, जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में जीएस धामा के उम्मीदवार के रूप में संगीता कुमार को योगेश मोहन गुप्ता ने हराया था - आखिर तब फिर जीएस धामा ने सीओएल के चुनाव में योगेश मोहन गुप्ता को जितवाने के लिए काम क्यों किया ? डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को जानने/समझने वाले लोगों का मानना और कहना है कि वह बात अब पुरानी हो चुकी है - और जीएस धामा की नजर अब मौजूदा परिदृश्य पर है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में पिछले कुछेक वर्षों से जीएस धामा का सिक्का चल रहा है; देखा/पाया गया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में जिस उम्मीदवार को जीएस धामा का समर्थन मिलता है, वह चुनाव में विजयी होता है । लेकिन इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में जीत का 'मुकुट' जीएस धामा को संजीव रस्तोगी के साथ 'शेयर' करना पड़ा । दरअसल डीके शर्मा को संजीव रस्तोगी के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । हालाँकि नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस के दौरान डीके शर्मा को रोटरी इंटरनेशनल से 'न्याय' दिलवाने के मामले में भी जीएस धामा ने काफी प्रयास किए थे, और इस वर्ष हुए चुनाव में डीके शर्मा की जीत को सुनिश्चित करने/करवाने में भी जीएस धामा की बड़ी भूमिका थी - लेकिन डीके शर्मा की जीत के मामले में 'नाम' संजीव रस्तोगी का हुआ, जिससे संजीव रस्तोगी डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के नेता बनते हुए दिखे । अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव लड़ने की तैयारी करने वाले अशोक गुप्ता और विकास गोयल को संजीव रस्तोगी के साथ नजदीकी बनाते हुए देखा/पहचाना गया ।
यह सब देख/जान कर ही जीएस धामा को संजीव रस्तोगी की राजनीतिक उड़ान को 'कट टु साइज' करना जरूरी लगा । उन्हें लगा कि सीओएल के चुनाव में संजीव रस्तोगी यदि जीत गए तो फिर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उनका कद और बड़ा हो जायेगा । जीएस धामा को लगा कि योगश मोहन गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह की बदनामी है, उसके भरोसे योगेश मोहन गुप्ता से तो वह कभी भी निपट लेंगे - फिलहाल उनके लिए संजीव रस्तोगी के बढ़ते कदमों को रोकना जरूरी है । इसलिए ही, योगेश मोहन गुप्ता के पुराने 'गुनाह' को भूलकर जीएस धामा ने बड़ी चतुराई से एक तरफ तो अशोक गुप्ता तथा विकास गोयल जैसे संजीव रस्तोगी के नए नए बने समर्थकों को तोड़ने का काम किया, और दूसरी तरफ मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, चंदौसी आदि के ऐसे लोगों को योगेश मोहन गुप्ता के पक्ष में वोट देने के लिए राजी किया - जो अलग अलग कारणों से योगेश मोहन गुप्ता से नाराज थे । लगभग चमत्कारिक रूप से योगेश मोहन गुप्ता की जीत को सुनिश्चित करवा कर जीएस धामा ने दिखा दिया है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सफलता के ताले की चाबी अभी उन्हीं के पास है । संजीव रस्तोगी की हैरान करने वाली पराजय ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता पर पनौती का दाग और लगा दिया है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को कहने का मौका मिला है कि हरि गुप्ता जिसके साथ होते हैं, वह तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद चुनाव हार जाता है । हरि गुप्ता ने दो चुनावों में दीपा खन्ना की उम्मीदवारी का समर्थन किया, फिर वह अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक हुए, और सीओएल के चुनाव में संजीव रस्तोगी को उनका समर्थन मिला - और नतीजा पहले जैसा ही रहा ।

Thursday, April 23, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरी गुप्ता ने सदाशयता और बड़प्पन दिखाते हुए योगेश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी को खारिज न करके उनकी 'योजना' पर मिट्टी डाली और उन्हें हार की दलदल में धकेलने का काम किया 

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता की पक्षपात न करते हुए सभी को मौका देने की सोच योगेश मोहन गुप्ता पर खासी भारी पड़ गई है, और सीओएल के चुनाव में उन्हें फजीहत का शिकार बनाने वाली साबित हुई है । दरअसल सीओएल के लिए योगेश मोहन गुप्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए नामांकन में कई तरह की गड़बड़ियाँ हैं, और उम्मीदवार के रूप में वह कई जरूरी शर्तों का पालन नहीं करते हैं । गड़बड़ियों/खामियों को जानते/पहचानते हुए भी योगेश मोहन गुप्ता ने नामांकन प्रस्तुत किया, तो इसलिए ताकि उनका नामांकन रद्द हो जाए । योगेश मोहन गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि योगेश मोहन गुप्ता की योजना थी कि नामांकन रद्द होने पर वह जोरशोर से इस बात को प्रचारित करेंगे कि संजीव रस्तोगी उनकी उम्मीदवारी से डर गए और हार से बचने के लिए संजीव रस्तोगी ने दबाव डाल कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के जरिये उनका नामांकन रद्द करवा दिया - और इस तरह डिस्ट्रिक्ट तथा रोटरी में जोरदार तरीके से पुनर्वापसी करेंगे । योगेश मोहन गुप्ता भी अच्छी तरह जानते हैं कि चुनाव जीतना तो उनके बस की बात नहीं है, इसलिए उन्होंने यह नाटक रचा । योगेश मोहन गुप्ता को विश्वास था कि इस नाटक के जरिये - 'न हींग लगेगी और न फिटकरी, रंग चोखा जम जायेगा ।' लेकिन हरि गुप्ता ने नामांकन रद्द न करके, योगेश मोहन गुप्ता की सारी योजना पर मिट्टी डाल दी है । हरि गुप्ता का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में सभी लोग एक बराबर हैं, और कोई यदि चुनाव लड़ना चाहता है तो तकनीकी गड़बड़ियों/खामियों के आधार पर उससे चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए और उसे चुनाव लड़ने देना चाहिए । हरि गुप्ता की यह सदाशयता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका यह बड़प्पन योगेश मोहन गुप्ता के लिए मुसीबत बन कर उन्हें हार के अपमान व फजीहत की दलदल में धकेलने वाला बन गया है ।
हरि गुप्ता ने योगेश मोहन गुप्ता के नामांकन को स्वीकार करके योगेश मोहन गुप्ता को चुनाव लड़ने के लिए मजबूर कर दिया है - और योगेश मोहन गुप्ता का रचा गया नाटक खुद उन पर भारी पड़ गया है । योगेश मोहन गुप्ता ने चुनाव लड़ने तथा डिस्ट्रिक्ट व रोटरी में पुनर्वापसी के लिए रोटरी क्लब सरधना महान में शरण लेकर अपने लिए मुसीबत को और बढ़ा लिया है । दूसरे शहरों के क्लब के पदाधिकारी योगेश मोहन गुप्ता से पूछ रहे हैं कि वह जब रहते मेरठ में हैं, और उन्होंने रोटरी मेरठ में की है - तब फिर वह मेरठ के किसी क्लब के सदस्य न होकर सरधना महान के सदस्य क्यों बने ? अब बेचारे योगेश मोहन गुप्ता उन्हें क्या और कैसे बतायें कि उन्होंने तो मेरठ के ही किसी भी क्लब की सदस्यता के लिए बहुत कोशिश की थी, लेकिन उनके लिए मेरठ के किसी भी क्लब का दरवाजा नहीं खुला । मेरठ में यह चर्चा आम है कि योगेश मोहन गुप्ता ने सदस्यता के लिए मेरठ के कई क्लब्स के पदाधिकारियों और प्रमुख सदस्यों के दरवाजे खटखटाये थे, लेकिन उनकी हरकतों और कारस्तानियों से परिचित होने के कारण कोई भी उन्हें अपने क्लब में लेने के लिए तैयार नहीं हुआ, और तब योगेश मोहन गुप्ता को रोटरी क्लब सरधना महान में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा । ऐसे में, मेरठ में ही बातें कही/सुनी जा रही हैं कि मेरठ का कोई क्लब जब उन्हें अपने यहाँ सदस्य बनाने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो यहाँ उन्हें वोट कौन देगा ? इस स्थिति के चलते, योगेश मोहन गुप्ता के लिए दूसरे शहरों में वोट प्राप्त करने की कोशिश करना तक मुश्किल हो गया है । लगता है कि मेरठ में योगेश मोहन गुप्ता के अलग-थलग पड़ जाने को लेकर, दूसरे शहरों के लोग उन्हें चिढ़ाने और मजे लेने के लिए जानबूझ कर उनसे पूछते हैं कि मेरठ के किसी क्लब में उन्हें सदस्यता क्यों नहीं मिली ?
डिस्ट्रिक्ट में अभी हाल ही में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद चुनाव हुआ है, जिसमें डीके शर्मा और अशोक गुप्ता उम्मीदवार थे - यानि क्लब्स के वोट इन्हीं दोनों को मिले थे; सीओएल के चुनाव में यह दोनों संजीव रस्तोगी का समर्थन करते हुए उन्हें वोट दिलवाने के प्रयासों में जुटे हैं । इस एक तथ्य से सीओएल के चुनाव में संजीव रस्तोगी की उम्मीदवारी की मजबूती को समझा जा सकता है । वास्तव में, इसीलिए योगेश मोहन गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थकों तक का टोटा पड़ गया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मनीष शारदा ने शुरू में योगेश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में कुछ सक्रियता दिखाई थी, लेकिन लोगों का मूड भाँप कर जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि उनके समर्थन के बावजूद योगेश मोहन गुप्ता का तो कोई लाभ नहीं होगा, उलटे उनके लिए मुसीबतें खड़ी हो जायेंगी - लिहाजा मनीष शारदा ने योगेश मोहन गुप्ता के समर्थन से हाथ खींच लिए । योगेश मोहन गुप्ता के नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि योगेश मोहन गुप्ता की करतूतें और कारस्तानियाँ ही वास्तव में उनकी दुश्मन हो बैठी हैं । योगेश मोहन गुप्ता ने अपनी हरकतों, अपने व्यवहार और अपनी बातों से बहुतों के साथ दुर्व्यवहार किया है और उन्हें तरह तरह से नीचा दिखाने की कोशिश करते हुए उन्हें अपमानित किया है । सीओएल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट के बहुत से आम और खास सदस्यों के घावों को फिर से हरा कर दिया है, और वह योगेश मोहन गुप्ता से बदला लेने के लिए सक्रिय हो उठे हैं । वास्तव में इसीलिए योगेश मोहन गुप्ता को मेरठ के किसी क्लब में सदस्यता नहीं मिली और उनकी उम्मीदवारी को समर्थक नहीं मिल रहे हैं । योगेश मोहन गुप्ता को इस स्थिति का अंदाजा तो था, लेकिन उन्होंने इस स्थिति की चिंता नहीं की थी - क्योंकि उन्हें विश्वास था कि नामांकन पत्र की गड़बड़ियों और खामियों के चलते उनका नामांकन रद्द हो जायेगा और वह आरोपों का शोर मचा कर डिस्ट्रिक्ट व रोटरी में जोरशोर के साथ अपनी पुनर्वापसी कर लेंगे; लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता ने उन्हें इसका मौका नहीं दिया ।

Sunday, April 12, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में डीके शर्मा की जीत के चलते संजीव रस्तोगी के बढ़े 'राजनीतिक भाव' के बीच सीओएल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके योगेश मोहन गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपने आपको मजाक का विषय बना लिया है, और अपनी फजीहत को ही आमंत्रित किया है

मेरठ । योगेश मोहन गुप्ता ने सीओएल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बनाने के साथ-साथ अपनी घटिया व षड्यंत्रपूर्ण हरकतों का एक बार फिर नजारा पेश किया है, और अपनी फजीहत के हालात बनाए हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब मेरठ से 'निकाले' जाने के बाद योगेश मोहन गुप्ता को किसी क्लब में शरण नहीं मिली, और वह रोटरी से बाहर ही हो गए थे । लेकिन सीओएल के लिए उनकी उम्मीदवारी जिस क्लब से आई है, आरोप सुने जा रहे हैं कि उसकी सदस्यता उन्होंने फर्जी तरह से 'प्राप्त' की है । डिस्ट्रिक्ट में लोग इस बात को भी याद कर रहे हैं कि योगेश मोहन गुप्ता ने रोटरी में कोई भी चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी; दरअसल योगेश मोहन गुप्ता की बेईमानीपूर्ण हरकतों को लेकर रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने उनके खिलाफ कुछ फैसले किए/लिए थे, जिससे नाराज होकर उन्होंने रोटरी, रोटेरियंस तथा रोटरी के कामकाज को लेकर प्रतिकूल टिप्पणियाँ की थीं - और उसी नाराजगी में उन्होंने रोटरी में कोई चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी; लेकिन जैसी कि एक मशहूर कहावत है कि 'बंदर गुलाटियाँ मारना नहीं छोड़ पाता', सो योगेश मोहन गुप्ता से ज्यादा दिन रोटरी से और चुनाव लड़ने से दूर नहीं रहा गया । योगेश मोहन गुप्ता रोटरी में वापस लौटे - और चुनाव लड़ने के उद्देश्य से वापस लौटे, तो लोगों के बीच उनकी करतूतों और कारस्तानियों के गड़े मुर्दे उखड़ने लगे । इससे डिस्ट्रिक्ट का राजनीतिक माहौल दिलचस्प हो उठा है ।
योगेश मोहन गुप्ता की करतूतों और कारस्तानियों के गड़े मुर्दों के उखड़ने और उन पर लोगों के बीच होने वाली चर्चाओं के चलते संजीव रस्तोगी के लिए सीओएल का चुनाव आसान होता नजर आ रहा है । असल में योगेश मोहन गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट में अलग अलग लोगों से इतने झगड़े-फसाद रहे हैं कि उन सभी का समर्थन संजीव रस्तोगी को स्वतः मिलने की उम्मीद बन रही है । इसका एक पुख्ता सुबूत राजीव रस्तोगी के अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने के प्रसंग में देखा/पहचाना जा सकता है । उल्लेखनीय है कि सीओएल के लिए राजीव रस्तोगी भी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन योगेश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के बाद उन्हें लगा कि तीन उम्मीदवार होने से कहीं योगेश मोहन गुप्ता बाजी न मार लें, और क्षेत्रावार वोटों की गणना करते हुए उन्हें यह भी समझ में आया कि योगेश मोहन गुप्ता के मंसूबों को संजीव रस्तोगी ही धूल चटा सकते हैं - सो, उन्होंने संजीव रस्तोगी के पक्ष में अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली । अखिलेश कोठीवाल भी उम्मीदवारी के इच्छुक सुने/बताये जा रहे हैं, लेकिन उनके नजदीकी और समर्थक ही उन्हें समझा रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट में जो चुनावी परिदृश्य दिख रहा है, उसमें उनके लिए कहीं कोई संभावना है नहीं - इसलिए उनकी उम्मीदवारी सिर्फ औपचारिक ही होगी और उन्हें पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए । सबसे ज्यादा मजे की बात अशोक गुप्ता और विकास गोयल के रवैये में देखने/सुनने को मिल रही है - यह दोनों अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं; इसलिए दोनों अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए संजीव रस्तोगी का समर्थन पाने की उम्मीद में सीओएल के चुनाव में संजीव रस्तोगी की उम्मीदवारी का समर्थन करते नजर आ रहे हैं ।
दरअसल इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में डीके शर्मा की जीत ने संजीव रस्तोगी का 'राजनीतिक भाव' बढ़ाया हुआ है । डीके शर्मा को संजीव रस्तोगी के उम्मीदवार के रूप में ही देखा/पहचाना गया था । डीके शर्मा की चुनावी जीत में हालाँकि और बहुत से कारण जिम्मेदार बने, लेकिन माना/समझा यही जा रहा है कि डीके शर्मा की उम्मीदवारी के अभियान का समीकरण बनाने और उसे क्रियान्वित करने की तैयारी के पीछे संजीव रस्तोगी ही थे, इसलिए डीके शर्मा की जीत वास्तव में संजीव रस्तोगी की जीत ही है ।डीके शर्मा की जीत के चलते संजीव रस्तोगी के 'राजनीतिक भाव' बढ़ने का असर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने की तैयारी कर रहे मनीष शारदा पर पड़ा है । मनीष शारदा कहने के लिए तो योगेश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं, लेकिन योगेश मोहन गुप्ता की शिकायत यह है कि मनीष शारदा उनकी उम्मीदवारी को समर्थन/वोट दिलवाने के लिए कोई प्रयास ही नहीं कर रहे हैं । मनीष शारदा की चिंता यह है कि उन्होंने योगेश मोहन गुप्ता के लिए यदि काम किया, तो संजीव रस्तोगी के नजदीकी और समर्थक - तथा अलग अलग कारणों से योगेश मोहन गुप्ता के विरोधी बने लोग उनके गवर्नर-वर्ष में उनके साथ सहयोग नहीं करेंगे, और तब उनके लिए गवर्नरी करना ही मुश्किल हो जायेगा । मनीष शारदा को यह भी 'नजर' आ रहा है कि योगेश मोहन गुप्ता चाहें जो कर लें, सीओएल का चुनाव जीतेंगे तो नहीं ही - इसलिए उनके चक्कर में वह अपना गवर्नर-वर्ष खतरे में क्यों डालें ? योगेश मोहन गुप्ता के साथ जिन लोगों को सहानुभूति है, उनका भी मानना और कहना है कि सीओएल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके योगेश मोहन गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपने आपको मजाक का विषय बना लिया है, और अपनी फजीहत को ही आमंत्रित किया है । 

Saturday, March 14, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक गुप्ता जिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी राजीव सिंघल के समर्थन के बल पर जीतने की उम्मीद कर रहे थे, वही उनकी हार का कारण बने; और दिनेश शर्मा बड़े अंतर से विजयी हुए

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी राजीव सिंघल की हर संभव तिकड़म के बावजूद, अशोक गुप्ता अगले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव दिनेश शर्मा से बड़े अंतर से हार गए हैं । राजीव सिंघल और अशोक गुप्ता की जोड़ी और उनके नजदीकी इस हार के लिए पूर्व गवर्नर राकेश सिंघल को कोस रहे हैं । इनका आरोप है कि राकेश सिंघल वैसे तो अपने आपको मुरादाबाद का बड़ा नेता बताते/समझते हैं, लेकिन मुरादाबाद का वह एक वोट भी अशोक गुप्ता को नहीं दिलवा सके । चर्चा है कि अशोक गुप्ता वोटों की मुँहमाँगी कीमत देने को तैयार थे, और मुरादाबाद में आठ/दस वोट अपने आप को 'तटस्थ' भी बता/दिखा रहे थे - लेकिन दिनेश शर्मा और उनके समर्थकों द्वारा की गई घेराबंदी को तोड़ पाने में वह विफल रहे । अशोक गुप्ता की बदकिस्मती यह रही कि मुरादाबाद में उन्हें अपने घनघोर व दमदार समर्थक राकेश सिंघल के खासमखास लोगों का भी वोट नहीं मिला । दिनेश शर्मा के गृह क्षेत्र बुलंदशहर तक में अशोक गुप्ता ने कुछेक वोट प्राप्त करने का जुगाड़ बैठा लिया, लेकिन मुरादाबाद में उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ा - और यही उनकी हार का प्रमुख कारण बना । मुरादाबाद के क्लब्स ने जिस तरह से दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी के पक्ष में एकतरफा रूप में वोट किया/दिया, वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का एक दिलचस्प अध्याय है । मुरादाबाद का कोई उम्मीदवार होता है, तब मुरादाबाद के क्लब्स की ऐसी एकता कभी-कभार ही देखने को मिली है; मुरादाबाद से बाहर के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होने की स्थिति में तो यहाँ के वोट निश्चित रूप से बँटते ही हैं । लेकिन इस बार अनोखा काम हुआ, और दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी के पक्ष में मुरादाबाद के क्लब्स की अप्रत्याशित एकता देखने को मिली ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के कुछेक जानकारों के अनुसार, मुरादाबाद के क्लब्स की यह एकता वास्तव में दिनेश शर्मा के पक्ष में नहीं - बल्कि अशोक गुप्ता के विरोध में बनी; दिनेश शर्मा को तो उसका लाभ भर मिला है । दरसअल अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी की कमान जिस तरह से राजीव सिंघल के हाथों में रही/दिखी; और अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के सहारे राजीव सिंघल जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट का नेता बनने की कोशिश करते नजर आये - उससे डिस्ट्रिक्ट के कई नेता बुरी तरह बिदक गए । राजीव सिंघल के रवैये में डिस्ट्रिक्ट के आम और खास लोगों ने घमंड का भाव देखा और महसूस किया है; राजीव सिंघल की तरफ से, अशोक गुप्ता की जीत के बाद उनके दो/एक नजदीकियों के नाम अगले उम्मीदवारों के रूप में जिस तरह से 'उछले' - उससे भी डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के बीच खलबली मची, और वह आपसी मतभेदों को भुला कर एकजुट हुए । डिस्ट्रिक्ट के कई नेताओं के बीच बनी एकजुटता को वरिष्ठ पूर्व गवर्नर जीएस धामा तथा युवा पूर्व गवर्नर संजीव रस्तोगी ने अपने अपने तरीके से न सिर्फ पुख्ता किया, बल्कि अपने अपने समर्थकों के जरिये दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी के पक्ष में ऐसी जबर्दस्त घेराबंदी भी की कि विरोधियों के नजदीक समझे जाने वाले लोगों के वोट भी दिनेश शर्मा की झोली में आ गिरे । उल्लेखनीय है कि दिनेश शर्मा पहली और पिछली बार संजीव रस्तोगी के गवर्नर वर्ष में निर्विरोध चुने गए थे; लेकिन डिस्ट्रिक्ट के नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में जाने के चलते दिनेश शर्मा की वह कामयाबी खटाई में पड़ गई थी । डिस्ट्रिक्ट को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस से बाहर लाकर दिनेश शर्मा को 'न्याय' दिलवाने के लिए रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के बीच जीएस धामा ने खासी 'वकालत' की थी, लेकिन उनके वह प्रयास सफल नहीं हो सके थे । इसलिए इस बार के चुनाव में दिनेश शर्मा को जीत की माला और शॉल पहनाने के लिए जीएस धामा और संजीव रस्तोगी ने जैसे कमर कस ली थी, और इस बार वह अपनी कोशिशों में कामयाब हुए ।
अशोक गुप्ता के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता का समर्थन लेना/पाना भी आत्मघाती साबित हुआ । मजे की बात यह रही कि हरि गुप्ता का समर्थन पाने के बाद अशोक गुप्ता व उनके समर्थक और जोश में आ कर अपनी जीत के प्रति आश्वस्त व निश्चिंत हो गए थे । लेकिन हुआ ठीक उल्टा और उनकी उम्मीदवारी का बंटाधार करने में हरि गुप्ता का भी भारी 'सहयोग' रहा । दरअसल, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में हरि गुप्ता का कार्यकाल बहुत ही बुरा रहा है और अधिकतर लोग अलग अलग कारणों से नाराज हुए हैं । रही सही कसर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की बदइंतजामी ने पूरी कर दी । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में बदइंतजामी का आलम यह रहा कि लोगों को खाना पाने के लिए मशक्कत करना पड़ी और अपमानित तक होना पड़ा । खाना पाने के लिए पहले तो लोगों को लंबी लाइन में लगना पड़ा, जब तक उनका नंबर आया तो पता चला कि प्लेट्स खत्म हो गई हैं; जब तक प्लेट्स लगीं, तब तक रोटियाँ समाप्त हो गईं - लोग रोटियों का इंतजार कर रहे थे, लेकिन सप्लाई में दाल के डोंगे पर डोंगे चले आ रहे थे । इससे लोगों के बीच भारी अफरातफरी फैली । इससे पहले मुख्य अतिथि के रूप में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता कई मुद्दों पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में हरि गुप्ता की कमजोरियों को उद्घाटित कर चुके थे । इस तरह, लोगों ने देखा/पाया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में हरि गुप्ता हर मोर्चे पर फेल रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच चर्चा चल ही रही थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में हरि गुप्ता ने अशोक गुप्ता से कई खर्चे स्पॉन्सर करवाए हैं, और हरि गुप्ता का सहयोग/समर्थन पाने के लिए अशोक गुप्ता ने खुशी खुशी उनके खर्चों को उठाया है - इसके चलते, डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में फैली बदइंतजामी का शिकार हुए लोगों ने अशोक गुप्ता से बदला लिया । अशोक गुप्ता की बदकिस्मती रही कि उन्हें अपने समर्थकों के रवैये से पैदा हुई नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा है; इस कारण से उनकी 'आगे की राह' को भी मुश्किलों से भरा देखा/पहचाना जा रहा है ।

Friday, February 28, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पिछड़ते दिख रहे अशोक गुप्ता की स्थिति सुधारने की कोशिश में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी राजीव सिंघल इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के नजदीक आने की अपनी कोशिशों को कहीं नुकसान तो नहीं पहुँचा लेंगे ?

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी राजीव सिंघल की अपने गवर्नर वर्ष की टीम के लिए आवेदन माँगने की कार्रवाई को इस वर्ष हो रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, और इसकी शिकायत डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में आ रहे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी से करने की तैयारी की जा रही है । कुछेक पूर्व गवर्नर्स राजीव सिंघल की कार्रवाई को लेकर खासे नाराज हैं, और मान रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के रूप में राजीव सिंघल के जब यह रंग-ढंग हैं, तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में तो वह पता नहीं क्या करेंगे ? मजे की बात है कि कुछेक पूर्व गवर्नर्स की नाराजगी को राजीव सिंघल ने कोई तवज्जो नहीं दी है; उनका कहना है कि उन्होंने कोई रोटरी-विरोधी काम नहीं किया है और कुछेक पूर्व गवर्नर्स नाहक ही बात का बतंगड़ बना रहे हैं । राजीव सिंघल कुछेक पूर्व गवर्नर्स की नाराजगी को तवज्जो देते हुए भले ही नहीं दिख रहे हों; लेकिन उनके नजदीकियों के अनुसार, वह इस बात को लेकर चिंतित जरूर हैं कि शेखर मेहता व कमल सांघवी के सामने उनकी कार्रवाई की शिकायत यदि हुई - तो उन दोनों के बीच उन्हें लेकर एक नकारात्मकता जरूर बनेगी, जो उनकी रोटरी की 'आगे की यात्रा' के लिए नुकसानदेह हो सकती है । समझा जाता है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में शेखर मेहता और कमल सांघवी को एक साथ बुलाने की 'व्यवस्था' राजीव सिंघल ने ही की है, और इस व्यवस्था के जरिये राजीव सिंघल ने रोटरी के सेटअप में अपनी पहुँच ऊँची करने की तैयारी दिखाई है । ऐसे में, उन्हें डर है कि शेखर मेहता और कमल सांघवी के सामने यदि यह बात जाहिर हुई कि उनके डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स उनकी पक्षपातपूर्ण राजनीतिक कार्रवाईयों से नाराज हैं, तो यह रोटरी के सेटअप में अपनी पहुँच ऊँची करने की उनकी तैयारी को झटका दे सकती है ।
राजीव सिंघल को इस वर्ष हो रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए डीके शर्मा व अशोक गुप्ता के बीच होने वाले चुनाव में अशोक गुप्ता के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अशोक गुप्ता, राजीव सिंघल के नजदीकी रिश्तेदार हैं । समझा जाता है और डिस्ट्रिक्ट में चर्चा है कि राजीव सिंघल ने ही उन्हें उम्मीदवार बनाया है - अन्यथा अशोक गुप्ता की रोटरी में न तो ज्यादा रुचि रही है और न ज्यादा संलग्नता रही है । अपने क्लब के आयोजनों में ही वह वर्ष में मुश्किल से दो या तीन मौकों पर ही शामिल होते हुए देखे गए हैं । अशोक गुप्ता के नजदीकियों को ही हैरानी है कि रोटरी के आयोजनों में यदा-कदा दिखने वाले अशोक गुप्ता को आखिर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की कैसे और क्यों सूझी ? लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि अशोक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट में लोगों को जानते/पहचानते तक नहीं हैं, और न ही लोग उन्हें जानते/पहचानते हैं - ऐसे में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में कूद पड़ने का फैसला भला किसके भरोसे लिया है । हालाँकि यह जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी पूरी तरह राजीव सिंघल के भरोसे ही है । राजीव सिंघल ने अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए प्रयत्न तो काफी किए हैं, लेकिन लगता है कि अपने प्रयत्न खुद उन्हें भी नाकाफी लग रहे हैं । राजीव सिंघल को भी लग रहा है कि उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद अशोक गुप्ता की चुनावी स्थिति डीके शर्मा के मुकाबले काफी कमजोर है । आरोप है कि इसीलिए चुनाव शुरू होने से छह दिन पहले राजीव सिंघल ने अपने गवर्नर-वर्ष के पदों के जरिये वोटों को 'खरीदने' का दाँव चला है । 
राजीव सिंघल का यह कहना तो बिलकुल दुरुस्त है कि अपने गवर्नर-वर्ष की टीम के पदों का ऑफर देने का जो पत्र उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को भेजा है, वह कोई रोटरी-विरोधी काम नहीं है । लेकिन उक्त पत्र भेजने की जो टाइमिंग है, वह पदों के ऑफर के जरिये डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को प्रभावित करने के आरोप को हवा देती है । मजे की बात यह है कि राजीव सिंघल ने अपने गवर्नर-वर्ष के लिए विजन अभी तय नहीं किया है; रोटरी की व्यवस्था के अनुसार, यह अभी तय हो भी नहीं सकता है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में राजीव सिंघल जब ट्रेनिंग के लिए जायेंगे, तब इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट उक्त विजन देंगे - जाहिर है कि उसके बाद ही तथा उसके अनुरूप ही उन्हें अपनी टीम के पदों का निर्धारण करना होगा, और उसके बाद ही यह तय कर सकना संभव व उचित होगा कि योग्यतानुसार किसे क्या पद दिया जाए । राजीव सिंघल अपने गवर्नर-वर्ष की टीम के पदाधिकारियों को चुनने की उचित प्रक्रिया को अपनाये बिना जिस तरह से पदों के लिए आवेदन माँग बैठे हैं, उससे साफ संकेत मिला है कि यह कार्रवाई उन्होंने अपने गवर्नर-वर्ष को प्रभावी बनाने के लिए नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव को प्रभावित करने के लिए - और अशोक गुप्ता के लिए वोट 'खरीदने' के लिए की है । उनकी इस कार्रवाई के दो दिन बाद ही डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस हो रही है, जिसमें इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी आ रहे हैं - तो डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने इस मामले को उनके सामने उठाने तथा राजीव सिंघल की शिकायत करने की तैयारी दिखाई है । राजीव सिंघल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि अभी तक उन्हें पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के नजदीक समझा/पहचाना जाता था; लेकिन राजीव सिंघल अब मनोज देसाई को छोड़ कर कमल सांघवी के नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं - ऐसे में, उनकी चिंता है कि उनके डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स उनकी शिकायत करेंगे, तो कमल सांघवी के यहाँ उनकी अनुकूल स्थिति कैसे बनेगी ? राजीव सिंघल के नजदीकियों को डर है कि अशोक गुप्ता की चुनावी स्थिति सुधारने के चक्कर में राजीव सिंघल रोटरी सेटअप में कहीं अपनी स्थिति न खराब कर लें ?

Friday, January 17, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दिनेश शर्मा के पक्ष में पूर्व गवर्नर जीएस धामा की दिलचस्पी व सक्रियता के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मनीष शारदा के लिए अशोक गुप्ता का समर्थन करना मुश्किल हुआ

मेरठ । दिनेश शर्मा और अशोक गुप्ता के बीच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए छिड़ी लड़ाई में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मनीष शारदा के लिए हालात इस समय, बकौल मिर्जा ग़ालिब 'ईमां मुझे रोके है, तो खींचे है मुझे कुफ्र' जैसे हो रहे हैं । उनके लिए यह हालात दरअसल पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जीएस धामा के कारण बने हैं । जीएस धामा को दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/पहचाना जा रहा है । मनीष शारदा चूँकि जीएस धामा के ही क्लब के सदस्य हैं, और क्लब में जीएस धामा का ही प्रभाव है - इसलिए 'ईमां' तो उन्हें दिनेश शर्मा के समर्थन में रहने के लिए मजबूर कर रहा है; लेकिन कई तरह के दबावों व स्वार्थों के चलते 'कुफ्र' उन्हें अशोक गुप्ता की तरफ खींच रहा है । अशोक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी राजीव सिंघल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; दोनों नजदीकी रिश्तेदार हैं - और अशोक गुप्ता ने समर्थन जुटाने के लिए ठीक वैसे ही हथकंडे अपनाए हुए हैं, जिनके सहारे/भरोसे राजीव सिंघल ने अपनी चुनावी नैय्या पार लगाई थी । राजीव सिंघल की चुनावी नैय्या पार करवाने में मनीष शारदा का बड़ा योगदान था । उस समय जीएस धामा चूँकि विदेश में थे, इसलिए मनीष शारदा को अपनी मनमानी करने तथा राजनीति चलाने का मौका मिल गया था । अपने चुनाव के समय मनीष शारदा के साथ बनी नजदीकी का राजीव सिंघल अब अशोक गुप्ता के लिए भी फायदा उठाना चाहते हैं । मनीष शारदा उन्हें फायदा देना/पहुँचाना भी चाहते हैं, लेकिन अब की बार उनके लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि जीएस धामा यहीं पर हैं और दिनेश शर्मा की चुनावी नैय्या को पार लगवाने की कुछ छिपी व कुछ खुली कोशिशों में जुटे हुए हैं ।
दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी की कामयाबी जीएस धामा के लिए दो कारणों से बहुत महत्त्व की है । पहला कारण तो यह है कि दिनेश शर्मा को रोटरी इंटरनेशनल के जिस 'अन्याय' का सामना करना पड़ा है, उसमें दिनेश शर्मा को न्याय दिलवाने के लिए जीएस धामा ने रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेताओं के सामने दिनेश शर्मा के पक्ष में खासी वकालत की थी । उनकी वकालत उस समय तो कई कारणों से दिनेश शर्मा के काम नहीं आ सकी थी, लेकिन अब जब दिनेश शर्मा दोबारा से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (नॉमिनी) पद की चुनावी दौड़ में शामिल हुए हैं, तो जीएस धामा के लिए दिनेश शर्मा को 'न्याय' दिलवाने का मामला जरूरी बन गया है; दरअसल इसके जरिये वह अपनी पिछली असफलता को भी ढक लेना चाहते हैं । दूसरा कारण राजनीतिक है । जीएस धामा के नजदीकियों का कहना है कि पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के तुरंत बाद राजीव सिंघल जिस तरह से अपने रिश्तेदार अशोक गुप्ता को उम्मीदवार बना बैठे हैं, उसे देख कर जीएस धामा को ही नहीं, बल्कि कई अन्य लोगों को भी लग रहा है कि राजीव सिंघल डिस्ट्रिक्ट पर कब्जा करके डिस्ट्रिक्ट के नेता बनना चाहते हैं । जीएस धामा के नजदीकियों का कहना/बताना है कि दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी को सफल बनाने के जरिये जीएस धामा वास्तव में राजीव सिंघल के मंसूबों पर भी पानी फेरना चाहते हैं । 
दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी को लेकर जीएस धामा की सक्रियता ने मनीष शारदा के लिए लेकिन बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है । मेरठ के रोटेरियंस को लगता है कि दिनेश शर्मा की उम्मीदवारी को जीएस धामा का जैसा समर्थन प्राप्त है, उसे देखते/समझते हुए मनीष शारदा के लिए अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करना मुश्किल ही होगा । इसके चलते अशोक गुप्ता को सत्ता का एकतरफा समर्थन मिलना मुश्किल ही दिख रहा है ।अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मनीष शारदा तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी राजीव सिंघल का समर्थन पाने की उम्मीद पाले बैठे थे - लेकिन मनीष शारदा को 'ईमां' में फँसा देख अशोक गुप्ता के समर्थकों को अपना पक्ष कमजोर पड़ता दिख रहा है । शक उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरि गुप्ता के रवैये पर भी है । हालाँकि हरि गुप्ता को अभी तक अशोक गुप्ता के समर्थन में ही देखा/पहचाना जा रहा है; लेकिन अशोक गुप्ता के समर्थक उन सूचनाओं से भी डरे हुए हैं, जिनमें कहा/बताया जा रहा है कि हरि गुप्ता कुछेक प्रमुख लोगों के जरिये दिनेश शर्मा से भी सौदेबाजी करने में लगे हैं । दरअसल अभी तक हरि गुप्ता यदि अशोक गुप्ता के समर्थन में दिख रहे हैं, तो इसे हरि गुप्ता के कई आयोजनों में अशोक गुप्ता द्वारा खुलकर किए गए खर्च के परिणाम के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । अशोक गुप्ता के समर्थकों को लेकिन सुनने को अब यह भी मिल रहा है कि दिनेश शर्मा की तरफ से भी हरि गुप्ता को खर्च का ऑफर मिला है । मजे की बात यह है कि अशोक गुप्ता के समर्थक यह भी कहते/बताते रहते हैं कि हरि गुप्ता के पास वोट तो कोई नहीं है, वह अपने क्लब का वोट भी नहीं दिलवा सकते हैं - लेकिन फिर भी वह अशोक गुप्ता के लिए हरि गुप्ता का समर्थन 'बनाये' रखना चाहते हैं, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के समर्थन का एक मनोवैज्ञानिक फायदा तो मिलता ही है । अशोक गुप्ता के समर्थकों को डर है कि मनीष शारदा के बाद यदि हरि गुप्ता का समर्थन भी संशय में पड़ा और गड़बड़ाया - तब तमाम तीन तिकड़म व सौदेबाजियों के बावजूद अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी खतरे में पड़ जा सकती है ।

Thursday, May 16, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में राजीव सिंघल के व्यवहार और रवैये से नाराज डिस्ट्रिक्ट के और खास तौर से मेरठ के लोगों ने अंततः दीपा खन्ना को उम्मीदवारी के लिए राजी किया, जिसके चलते राजीव सिंघल के लिए मुसीबतें अचानक से न सिर्फ पैदा हो गई हैं, बल्कि खासी बढ़ भी गई हैं

मेरठ । दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (नॉमिनी डेजिग्नेट) बनने की राजीव सिंघल की कोशिशों को एक बार फिर ग्रहण लगता दिख रहा है । राजीव सिंघल की बदकिस्मती ही है कि पिछले चार वर्ष से उनके साथ यह तमाशा हो रहा है कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हैं, सारी तैयारी और व्यवस्था करके हालात अनुकूल बनाते हैं, लेकिन जैसे ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का पद उनके हाथ में आने को होता है कि कोई न कोई गड़बड़ हो जाती है और उनका किया-कराया सारा जुगाड़ फेल हो जाता है । यहाँ याद करना प्रासंगिक होगा कि चार वर्ष पहले सुनील गुप्ता के गवर्नर-वर्ष में राजीव सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने के लिए 'पक्की' व्यवस्था कर ली थी, जिसके तहत उन्होंने मुख्य प्रतिद्वंद्वी मधु गुप्ता की उम्मीदवारी को षड्यंत्रपूर्वक रद्द करवा दिया था - 'स्टेज' तैयार था और राजीव सिंघल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की कुर्सी पर बैठने की 'तैयारी' पूरी हो चुकी थी कि अनहोनी घट गई; जिसके तहत सुनील गुप्ता की गवर्नरी ही चली गई । गवर्नर का कार्यभार दीपक बाबु को मिला । राजीव सिंघल ने फिर जोर मारा और दीपक बाबु को भी इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की कुर्सी पर बिठलायेंगे । दीपक बाबु ने राजीव सिंघल की हसरत को पूरा करने के लिए कदम अभी बढ़ाये ही थे कि रोटरी इंटरनेशनल ने उन्हें भी उनके पद से हटा दिया और डिस्ट्रिक्ट को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डाल दिया । उन दिनों की घटनाओं को देखें और याद करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि सारी तैयारी और अनुकूल स्थितियों के बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (नॉमिनी) चुने जाने का 'मौका' राजीव सिंघल के हाथ से फिसल गया ।
इस वर्ष भी ऐसा ही होता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021-22 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए होने वाले चुनाव के लिए उम्मीदवारों का टोटा नजर आ रहा था और एक अकेले राजीव सिंघल ही चुनावी मैदान में उतरते दिख रहे थे । इस लिहाज से राजीव सिंघल के लिए हालात पूरी तरह अनुकूल थे और सभी ने मान लिया था कि राजीव सिंघल निर्विरोध ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेट हो जायेंगे । डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेता लोग दीपा खन्ना को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए राजी करने का प्रयास कर तो रहे थे, लेकिन दीपा खन्ना कुछ ही महीनों के भीतर दूसरी बार उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए तैयार होती हुई नहीं दिख रही थीं । दरअसल अभी करीब पाँच महीने पहले ही संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपा खन्ना उम्मीदवार थीं, और खासी मेहनत से चुनाव लड़ने के बावजूद वह मामूली अंतर से चुनाव हार गईं थीं । उनका आकलन रहा कि कुछेक लोगों ने सहयोग/समर्थन का वायदा तथा 'दिखावा' करने के बाद भी वास्तव में उनका सहयोग/समर्थन नहीं किया, जिस कारण जीतते लग रहे चुनाव में उन्हें लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा । इस 'झटके' के कारण ही इस वर्ष  दोबारा चुनाव में उतरने का उनका मन नहीं था । हालाँकि चुनावी राजनीतिक समीकरणों को देखने/समझने वाले लोगों का मानना/कहना रहा कि पिछले चुनाव के समय के हालात अलग थे, और उस समय के अनुभव के आधार पर अब होने जा रहे चुनाव के हालात का आकलन नहीं किया जा सकता है और दीपा खन्ना को समझना चाहिए कि अब की बार हालात पिछली बार जैसे पेचीदा नहीं हैं । लेकिन किसी भी तर्क से दीपा खन्ना उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए तैयार होती नहीं दिख रही थीं । इस स्थिति ने राजीव सिंघल की संभावनाओं को एकतरफा तरीके से उछाल दे दिया था, और सभी ने मान लिया था कि चुनाव तो सिर्फ औपचारिकता है; हरि गुप्ता और मनीष शारदा के बाद राजीव सिंघल ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालेंगे । मजे की बात यह देखने में आई कि चुनाव की घोषणा होने से पहले ही खुद राजीव सिंघल ने भी अपने आप को विजेता के रूप में देखना और भावी गवर्नर मानना शुरू कर दिया था । 
लेकिन लगता है कि बदकिस्मती एक बार फिर राजीव सिंघल के दरवाजे आ खड़ी हुई है । जो दीपा खन्ना उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से लगातार इंकार कर रही थीं, अप्रत्याशित तरीके से उन्होंने अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी । दरअसल उन्होंने क्या घोषित कर दी, डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों ने अपनी उम्मीदवारी घोषित करने के लिए उन्हें मजबूर कर दिया । खास बात यह रही कि दीपा खन्ना के लगातार इंकार करते रहने के बाद भी, मुरादाबाद में पहले तो मुरादाबाद के सभी पूर्व गवर्नर्स ने और फिर मुरादाबाद के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स व अन्य प्रमुख लोगों ने मीटिंग करके दीपा खन्ना की उम्मीदवारी को समर्थन देने की घोषणा करके उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए उन पर दबाव बनाया; और फिर डिस्ट्रिक्ट के दूसरे शहरों के नेताओं ने भी दीपा खन्ना की उम्मीदवारी को समर्थन देने का भरोसा दिया - जिसके चलते दीपा खन्ना के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से इंकार करते रहना संभव नहीं रहा और उन्होंने उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए हामी भर दी । इस स्थिति के लिए राजीव सिंघल को ही जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है । कई लोगों का मानना और कहना है कि राजीव सिंघल ने अपने व्यवहार और रवैये से आम तौर से डिस्ट्रिक्ट के और खास तौर से मेरठ के लोगों को इतना नाराज किया हुआ है कि अधिकतर लोग उनकी राह में रोड़े डालने में लग गए हैं । नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस के दौरान राजीव सिंघल हालाँकि चार को-ऑर्डीनेटर्स में से एक थे, लेकिन उनके तेवर ऐसे रहते थे, जैसे वह अकेले ही को-ऑर्डिनेटर हैं - इस बात से डिस्ट्रिक्ट के और मेरठ के कई लोग राजीव सिंघल से जले-भुने बैठे हैं और चुनाव में एक एक बात का बदला लेने के लिए तैयार हो रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के और खास तौर से मेरठ के नेताओं व सक्रिय लोगों के बीच राजीव सिंघल के प्रति जिस तरह का नकारात्मक भाव दिख रहा है, और जिसके चलते लगातार इंकार करते रहने के बावजूद दीपा खन्ना उम्मीदवारी के लिए तैयार हो गईं हैं - उससे राजीव सिंघल के लिए मुसीबतें अचानक से न सिर्फ पैदा हो गई हैं, बल्कि खासी बढ़ भी गई हैं ।

Saturday, January 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता के नजदीकियों की ही 'मदद' से होने वाली मनीष शारदा की जीत हरि गुप्ता के लिए फजीहत का कारण बनी

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मनीष शारदा की जीत की खबर मिलने के तुरंत बाद पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश मोहन गुप्ता द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता को लानत-सी देता वाट्स-ऐप संदेश भेजना इस बात की पुष्टि ही करता है कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेताओं के लिए मनीष शारदा को चुनाव जितवाना हरि गुप्ता को नीचा दिखाने के लिए जरूरी हो गया था - और उसके लिए उन नेताओं ने हर हथकंडा अपनाया । दरअसल इसीलिए मनीष शारदा की मामूली अंतर से हुई चुनावी जीत को हरि गुप्ता की पराजय के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष दीपक जैन और हरि गुप्ता के बीच हुए चुनाव में मनीष शारदा के क्लब - रोटरी क्लब मेरठ महान - ने दीपक जैन का समर्थन किया था; और तभी से हरि गुप्ता तथा मनीष शारदा के क्लब के बीच तनातनी की चर्चा थी । यह चर्चा पिछले दिनों उस समय पुख्ता हुई जब अगले वर्ष की डिस्ट्रिक्ट टीम में हरि गुप्ता द्वारा शामिल किए गए मनीष शारदा के क्लब के सदस्यों ने इकट्ठे इस्तीफा दे दिया । उनका आरोप रहा कि हरि गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपा खन्ना का समर्थन कर रहे हैं और इस तरह मनीष शारदा की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम कर रहे हैं । हरि गुप्ता ने उनके इस्तीफे तुरंत स्वीकार भी कर लिए । इस प्रसंग से संदेश यह गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव  जैसे मनीष शारदा और हरि गुप्ता के बीच हो रहा है । इससे अलग अलग कारणों से हरि गुप्ता के विरोधी बने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जीएस धामा, योगेश मोहन गुप्ता और राकेश सिंघल ने खुलकर मनीष शारदा की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया, और तब मनीष शारदा की उम्मीदवारी के पक्ष में वोट जुटाने के लिए हर हथकंडा अपनाया गया ।
हरि गुप्ता के लिए बड़े झटके की बात यह रही कि अगले वर्ष की उनकी डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्यों तक के क्लब के वोट मनीष शारदा और उनके समर्थकों के हाथों 'बिक' गए । माना/समझा जा रहा था कि हरि गुप्ता ने जिन प्रमुख रोटेरियंस को अपनी टीम में महत्त्वपूर्ण पद दिए हैं, वह अपने अपने क्लब के वोट निश्चित रूप से दीपा खन्ना को दिलवा देंगे । रोटरी की चुनावी राजनीति का यह एक बड़ा आम फार्मूला है, जिसे प्रायः हर डिस्ट्रिक्ट में हमेशा ही आजमाया जाता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पास अवॉर्ड का तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के पास पदों का 'खजाना' होता है, जिसके जरिये वह चुनाव को प्रभावित करने का काम करते हैं । लेकिन मनीष शारदा और उनके समर्थकों ने हरि गुप्ता की टीम में जगह पाने वाले प्रमुख रोटेरियंस के क्लब्स के प्रेसीडेंट के सामने ऐसी-ऐसी पेशकशें कीं कि प्रेसीडेंट्स ने अपने क्लब के नेताओं की बात मानने से इंकार कर दिया और हरि गुप्ता की टीम में जगह पाने वाले क्लब्स के नेताओं के लिए हरि गुप्ता से आँख मिला पाना मुश्किल हुआ । इस उलट-फेर के कारणों का आकलन करने वाले लोगों को यह भी लगता है कि हरि गुप्ता के अति-आत्मविश्वास में रहने के चलते भी यह हुआ । चुनाव से पहले हरि गुप्ता को कुछेक क्लब्स के प्रेसीडेंट के बदलते दिख रहे रवैये के प्रति आगाह किया गया था, लेकिन हरि गुप्ता ने उसकी परवाह नहीं की और आश्वस्त रहे कि उन्हें धोखा नहीं मिलेगा । हरि गुप्ता का यह अति-आत्मविश्वास ही दीपा खन्ना की हार का कारण बना । हरि गुप्ता के लिए समस्या की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पराजय दीपा खन्ना की हुई है, लेकिन फजीहत हरि गुप्ता की हो रही है ।
डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोगों को लगता है कि हरि गुप्ता की फजीहत इसलिए भी हो रही है, क्योंकि वह हर किसी को साथ लेकर चलना चाहते हैं, और डिस्ट्रिक्ट में सौहार्द बनाने का प्रयास कर रहे हैं । इसी प्रयास के तहत उन्होंने मनीष शारदा के क्लब के कई सदस्यों को अपनी गवर्नर-टीम में जगह दी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वह दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में थे - इसका प्रचार तो बहुत था, लेकिन दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के पक्ष में कुछ करते हुए उन्हें देखा किसी ने नहीं । वास्तव में उनके रवैये को देखते हुए उनके ऊपर आरोप चस्पाँ हुआ कि वह दोनों नावों में पैर रखे रहना चाहते हैं । हरि गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि वह स्पष्ट फैसला करने से हिचकते/बचते हैं, और इसलिए उनके विरोधी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं । लोगों का कहना है कि हरि गुप्ता की सदाशयता और भलमनसाहत को उनके विरोधी उनकी कमजोरी समझते हैं, और उनके साथ मनमाना व्यवहार करते हैं - हरि गुप्ता लेकिन उससे कोई सबक नहीं लेते हैं । रोटरी क्लब मेरठ महान से धोखा खाने के बाद भी हरि गुप्ता उसके कई सदस्यों को अपनी टीम में प्रमुख पद देते हैं; वह सदस्य लेकिन हरि गुप्ता की इस भलमनसाहत का सम्मान नहीं करते हैं और उन्हें नीचा दिखाने के उद्देश्य से सामूहिक इस्तीफे दे देते हैं । हरि गुप्ता उन इस्तीफों के पीछे छिपी षड्यंत्रकारी राजनीति को समझने/पहचानने में भी चूक कर जाते हैं, और सावधान होने की बजाये अति-आत्मविश्वास का शिकार बने रहते हैं - जिसका नतीजा हरि गुप्ता के नजदीकियों की ही 'मदद' से होने वाली मनीष शारदा की जीत के रूप में सामने आता है ।

Sunday, December 16, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता की टीम से मनीष शारदा के क्लब के सदस्यों द्वारा इस्तीफे देने की घटना के चलते क्लब की हो रही बदनामी मनीष शारदा की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाती तथा दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के लिए वरदान बनती दिख रही है

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता द्वारा अपने गवर्नर-वर्ष के लिए बनाई जा रही डिस्ट्रिक्ट टीम में पद पाने वाले रोटरी क्लब मेरठ महान के सदस्यों के अपने अपने पदों से इस्तीफा देने की कार्रवाई ने क्लब की तरफ से बने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार मनीष शारदा के लिए मुसीबतें बढ़ाने का ही काम किया है । समझा जाता है कि मनीष शारदा की उम्मीदवारी को चूँकि हरि गुप्ता से सहयोग और समर्थन नहीं मिल रहा था, इसलिए हरि गुप्ता को 'सबक' सिखाने तथा उन्हें दबाव में लेने के उद्देश्य से हरि गुप्ता की प्रस्तावित टीम में जगह पाने वाले क्लब के सदस्यों ने उक्त कदम उठाया है । मनीष शारदा और इस योजना के रणनीतिकारों को लेकिन पहला झटका यह देख/जान कर लगा कि हरि गुप्ता ने तुरंत ही इस्तीफे स्वीकार कर लिए । मनीष शारदा और इस योजना के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि एकसाथ कई इस्तीफे पा कर हरि गुप्ता घबरा जायेंगे और इस्तीफा न देने के लिए मान-मनौव्वल करेंगे और तब वह हरि गुप्ता से मनीष शारदा की उम्मीदवारी के लिए सौदेबाजी कर लेंगे । लेकिन हरि गुप्ता के रवैये ने उनकी योजना व उम्मीदों पर पानी डाल दिया है । रोटरी क्लब मेरठ महान की इस कार्रवाई से मनीष शारदा की उम्मीदवारी को दूसरा बड़ा झटका यह लगा है कि इस कार्रवाई को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच मनीष शारदा की उम्मीदवारी की कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना और कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से साफ हो गया है कि मनीष शारदा और उनके समर्थकों ने चुनाव होने से पहले ही अपनी हार स्वीकार कर ली है, और इसी निराशा व बौखलाहट में मनीष शारदा और उनके समर्थक डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों को 'ब्लैकमेल' करने पर उतर आए हैं ।
हरि गुप्ता को दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जो रोटरी क्लब मुरादाबाद ब्राइट की तरफ से उम्मीदवार हैं । मुरादाबाद से अकेली उम्मीदवार होने के कारण दीपा खन्ना को मुरादाबाद तथा उसके आसपास के क्लब्स का तो लगभग एकतरफा समर्थन प्राप्त है ही; हरि गुप्ता के समर्थन के चलते खास तौर से मेरठ के और आम तौर से डिस्ट्रिक्ट के अन्य शहरों के क्लब्स का भी समर्थन मिलता दिख रहा है - जिस कारण डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों को दीपा खन्ना की उम्मीदवारी खासी बढ़त बनाए नजर आ रही है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में आमतौर पर उस उम्मीदवार का पलड़ा भारी हो ही जाता है, जिसके साथ आने वाले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का समर्थन होता है । हरि गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में तो दीपा खन्ना की उम्मीदवारी को लाभ पहुँचाते हुए दिख ही रहे हैं; मेरठ के होने कारण भी उनके समर्थन को दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के लिए महत्त्वपूर्ण माना/समझा जा रहा है । हरि गुप्ता - यानि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट - यदि मेरठ के न होते तो मेरठ के क्लब्स का दीपा खन्ना को वैसा समर्थन न दिलवा पाते जैसा मेरठ के होने के नाते वह अब दिलवा सकते हैं । मनीष शारदा के लिए मुसीबत की बात दरअसल यह हुई कि मेरठ से ही प्रस्तुत शशिकांत गोयल की उम्मीदवारी मेरठ में ही उनके समर्थन आधार को नुकसान पहुँचा रही है । डिस्ट्रिक्ट में हर जगह मनीष शारदा और उनके समर्थकों को सुनने को मिला है कि उनकी उम्मीदवारी को जब मेरठ में ही समर्थन नहीं मिल रहा है, तो दूसरी जगह वह समर्थन की कैसे, क्या और क्यों उम्मीद कर रहे हैं ? मनीष शारदा के लिए फजीहत की बात यह भी बनी हुई है कि मेरठ में चूँकि पहले शशिकांत गोयल की उम्मीदवारी प्रस्तुत हुई थी; इसलिए मेरठ में ही लोगों का कहना/पूछना है कि मेरठ की एकता को तोड़ने का काम मनीष शारदा और उनके क्लब ने ही जब बार बार और जोरशोर से किया है - तब फिर अब वह किस मुँह से मेरठ में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं ?
उल्लेखनीय है कि हरि गुप्ता के पहले चुनाव में भी मनीष शारदा के क्लब पर हरि गुप्ता की उम्मीदवारी को धोखा देने का आरोप रहा है । पिछले रोटरी वर्ष की ही उस बात को याद करते हुए मेरठ के लोगों का कहना है कि हाल फिलहाल के समय में मनीष शारदा के क्लब ने मेरठ के 'हितों' के खिलाफ ही काम किया है, इसलिए मेरठ के लोगों के बीच उनके प्रति गहरी नाराजगी है और इसी कारण से मेरठ में ही मनीष शारदा की उम्मीदवारी को कोई समर्थन मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि मनीष शारदा के क्लब से विरोध सहने और धोखा खाने के बाद भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता ने क्लब के कई वरिष्ठ सदस्यों को अपनी प्रस्तावित टीम में प्रमुख जगहें दीं - लेकिन क्लब के लोगों को अपना यह सम्मान भी लगता है कि हजम नहीं हुआ, और उन्होंने हरि गुप्ता की तरफ से हुई एक अच्छी पहल को ही नकार दिया है । मनीष शारदा के क्लब के सदस्यों द्वारा हरि गुप्ता की टीम से इस्तीफे देने की घटना को लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह की तीखी प्रतिक्रिया हुई है, और लोग जिस एकजुटता के साथ हरि गुप्ता के साथ खड़े नजर आ रहे हैं - उससे मनीष शारदा की उम्मीदवारी को और झटका लगा है । मनीष शारदा और उनके साथियों की इस हरकत के चलते वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जीएस धामा की भी किरकिरी हो रही है । जीएस धामा क्लब के वरिष्ठ सदस्य हैं, और पूर्व गवर्नर के रूप में उनकी अच्छी पहचान है और इसी पहचान के चलते रोटरी क्लब मेरठ महान को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच 'उनके क्लब' के रूप में ही जाना/पहचाना जाता है । लोगों को हैरानी है कि जीएस धामा के होते हुए उनके क्लब की तरफ से आखिर ऐसी हरकतें क्यों हो रही हैं, जिससे क्लब की भी बदनामी हो रही है और मनीष शारदा की उम्मीदवारी को भी खासा नुकसान हो रहा है । मनीष शारदा की उम्मीदवारी को होने वाला यह नुकसान दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के लिए वरदान बनता दिख रहा है । 

Wednesday, December 12, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव की तारीख को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन फिर से आरोपों में घिरे

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन ने वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव की प्रक्रिया पर ब्रेक लगा कर एक बार फिर रोटरी व डिस्ट्रिक्ट की विश्वसनीयता पर संकट खड़ा कर दिया है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता और रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारी जितेंद्र सिंह के आगाह करने के बावजूद दीपक जैन ने जिस तरह से उक्त चुनाव की प्रक्रिया को मजाक बनाया हुआ है, उसके कारण रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस से बाहर लाकर इंटरनेशनल प्रशासन ने जैसे बड़ी गलती कर दी है । उल्लेखनीय है कि प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट में वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पिछले रोटरी वर्ष में ही तय हो चुके थे । नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट 3100 में यह नहीं हो पाया था; लेकिन मौजूदा रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3100 को डिस्ट्रिक्ट का स्टेटस मिला तो उम्मीद की गई थी कि सितंबर/अक्टूबर तक डिस्ट्रिक्ट 3100 को भी वर्ष 2020-21 का गवर्नर मिल जायेगा । दीपक जैन यदि सचमुच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में व्यवहार करते तो यह हो भी जाता, लेकिन दीपक जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की बजाये कुछेक लोगों की 'कठपुतली' बन गए - इसलिए उक्त मामला लटक गया । इस मामले को लेकर होने वाली चौतरफा फजीहत को देख कर दीपक जैन ने अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में नामांकन की प्रक्रिया शुरू की, तो लगा कि उन्होंने कठपुतली का चोगा उतार कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में व्यवहार करना शुरू किया है - लेकिन यह भ्रम साबित हुआ । 
दीपक जैन नामांकन करवा कर फिर 'सो' गए । रोटरी में आम रिवाज है कि नामांकन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद निरंतरता में ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाती है । हाल ही के दिनों में डिस्ट्रिक्ट 3011 और डिस्ट्रिक्ट 3012 में इसी रिवाज का पालन करते हुए चुनाव या तो हो चुके हैं और या हो रहे हैं - लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3100 में नामांकन हो जाने के बाद किसी को भी पता नहीं है कि चुनाव आखिर कब होंगे ? मजे की बात यह है कि दीपक जैन ने यह कहते हुए ठीकरा रोटरी इंटरनेशनल के सिर फोड़ा हुआ है कि वह जब लिंक भेज देगा, तब चुनाव शुरू हो जायेंगे; व्यवस्था जबकि यह होती है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को चुनाव की तारीख सुनिश्चित करना होती है - रोटरी इंटरनेशनल उसी तारीख के हिसाब से लिंक भेजता है । चुनाव की तारीख का डिस्ट्रिक्ट में किसी को पता नहीं है । डिस्ट्रिक्ट के कुछेक प्रमुख लोगों के अनुसार यह मामला दीपक जैन की काबिलियत की कमी से जुड़ा है । उनका कहना है कि दीपक जैन तीन-तिकड़म और वोटों की खरीद-फरोख्त से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बन गए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी का निर्वाह कर पाने की काबिलियत उनमें नहीं है और इसीलिए जो चुनाव सितंबर/अक्टूबर तक हो जाना चाहिए था - उसका अभी दिसंबर में भी कोई अता-पता नहीं है । यह मामला इसलिए भी गंभीर है कि वर्ष 2021-22 के गवर्नर पद के लिए भी इसी वर्ष चुनाव होने हैं । लोगों का कहना/पूछना है कि दीपक जैन जब अभी पहला चुनाव ही नहीं करवा पा रहे हैं, तो दूसरा चुनाव कब और कैसे करवा सकेंगे ? इसी सवाल के जबाव में उनके 'कठपुतली' होने के आरोप को बल मिलता है । लोगों का कहना है कि एक कठपुतली की यही तो खूबी होती है - उसकी डोर खींची रखी जाये तो वह कुछ नहीं करती है और ढीली छोड़ दी जाये, तो वह आनन-फानन में जल्दी से काम निबटा देगी । वर्ष 2020-21 के गवर्नर पद के चुनाव में दीपक जैन भले ही छह महीने से ज्यादा का समय ले रहे हों; लेकिन आप देखियेगा - वर्ष 2021-22 के गवर्नर पद के चुनाव वह आनन-फानन में संपन्न कर/करवा देंगे ।  
दीपक जैन दो वर्षों के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के चुनावों को लेकर अपने साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट व रोटरी की जो फजीहत कर/करवा रहे हैं; उसमें डिस्ट्रिक्ट के कुछेक लोगों को कमाई करने का ऐंगल भी लग रहा है । लोगों का सीधा/साफ आरोप है कि दीपक जैन ने वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव की प्रक्रिया को जिस तरह से बीच अधर में लटका दिया है, उससे लगता है कि वह उम्मीदवारों से पैसे ऐंठने के जुगाड़ में हैं और इसीलिए चुनावी प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक जैन का रवैया प्रायः संदेहास्पद तथा आरोपों से परिपूर्ण रहा है, इसलिए उम्मीदवारों से पैसे ऐंठने के आरोप को लोगों के बीच स्वीकार्यता मिलती दिख रही है । डिस्ट्रिक्ट से लेकर रोटरी की बड़ी दुनिया तक में वर्ष 2020-21 के गवर्नर पद के चुनाव को न करवाने को लेकर दीपक जैन की भारी फजीहत हो रही है, लेकिन वह इसकी कोई परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं - इससे भी लोगों को आभास हो रहा है कि उक्त चुनाव को लेकर दीपक जैन किसी बड़ी सौदेबाजी के चक्कर में हैं, और उसके चक्कर में किसी भी तरह की बदनामी उठा लेने के लिए तैयार हैं । दीपक जैन के रवैये से स्पष्ट है कि उन्होंने सुनील गुप्ता के हुए हश्र से कोई सबक नहीं सीखा है, और डिस्ट्रिक्ट 3100 को दो वर्षों तक नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डालने का कोई फायदा नहीं मिला है ।

Saturday, October 20, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में चुनाव करवाने की रट लगाए जा रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन ने अचानक से वर्ष 2020-21 के गवर्नर के चुनाव की प्रक्रिया को शुरु करके मनीष शारदा को खासा तगड़ा झटका दिया

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन ने वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव की प्रक्रिया अचानक से शुरू करके मनीष शारदा की उम्मीदों को खासा तगड़ा झटका दिया है । मनीष शारदा की उम्मीद और कोशिश थी कि उक्त चुनाव मार्च में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में हों, ताकि वह अच्छे से तैयारी कर लें और लोगों के बीच अपनी पैठ बना लें । अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन का रवैया भी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में ही उक्त चुनाव करवाने का था, जिसके चलते मनीष शारदा निश्चिंत बैठे थे । पिछले दिनों सुना गया था कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के कहने पर रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारी जितेंद्र सिंह ने दीपक जैन से उक्त चुनाव करवाने को लेकर बात की थी, लेकिन दीपक जैन के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी । सुशील गुप्ता का कहना दरअसल यह था कि प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट में वर्ष 2020-21 के गवर्नर हैं, और उनकी ट्रेनिंग हो रही है - इसलिए डिस्ट्रिक्ट 3100 में भी वर्ष 2020-21 का गवर्नर हो जाना चाहिए, ताकि वह भी अपने समकालीन गवर्नर्स के साथ अभी से परिचित और प्रशिक्षित हो सके । जितेंद्र सिंह ने इसी तर्क के साथ दीपक जैन को उक्त चुनाव जल्दी करवाने के लिए राजी करने का प्रयास किया । दीपक जैन ने लेकिन बहानेबाजी करके उनकी बात को अनसुना कर दिया । दीपक जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियों को अभी तक भले ही न समझे हों, लेकिन यह बात वह अच्छे से समझ गए हैं कि रोटरी इंटरनेशनल का बड़े से बड़ा पदाधिकारी उन्हें चुनाव करवाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है - और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्हें यह अधिकार है कि वह जब चाहें तब चुनाव करवाएँ । इसीलिए वह वर्ष 2020-21 के गवर्नर के चुनाव को लेकर डिस्ट्रिक्ट में तथा रोटरी के बड़े पदाधिकारियों की तरफ से उठ रही माँग को लगातार अनसुना करते आ रहे थे ।
दीपक जैन की तरफ से कहा/सुना जा रहा था कि वह उक्त चुनाव यदि जल्दी करवा लेंगे तो डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की रौनक खत्म हो जाएगी; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह चाहेंगे कि उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस अच्छे से हो - इसलिए उक्त चुनाव वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के दौरान और या उसके बाद ही करवायेंगे । दीपक जैन को अपने गवर्नर-काल में वर्ष 2021-22 के गवर्नर का भी चुनाव करवाना है, जिसकी आड़ में अपनी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को अच्छे से करवा सकने का मौका उनके पास है ही, लेकिन फिर भी वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को अच्छे से करने/करवाने की आड़ में वर्ष 2020-21 के गवर्नर के चुनाव को टालते रहे - जिसके चलते लोगों को लगा कि यह सब वह मनीष शारदा को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से कर रहे हैं । लोगों का यह लगना स्वाभाविक भी माना/समझा गया, क्योंकि मनीष शारदा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की पिछले वर्ष दीपक जैन को चुनाव जितवाने में महत्त्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका थी, इसलिए हर किसी को लग रहा था कि मनीष शारदा की सुविधानुसार दीपक जैन वर्ष 2020-21 के गवर्नर के चुनाव को टाल कर मनीष शारदा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के अहसान का बदला चुका रहे हैं । लेकिन अचानक तरीके से वर्ष 2020-21 के गवर्नर के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करके दीपक जैन ने तमाम कयासों और आलोचनाओं का मुँह बंद कर दिया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक जैन द्वारा अचानक से शुरू की गई चुनाव की प्रक्रिया ने दूसरों को तो हैरान किया है, लेकिन मनीष शारदा को खासा तगड़ा झटका दिया है । 
मनीष शारदा दरअसल आराम से बैठे थे और मान कर चल रहे थे कि उक्त चुनाव मार्च में और या उसके बाद होंगे, इसलिए अभी से ज्यादा कुछ करने की जरूरत भला क्या है ? वर्ष 2020-21 के गवर्नर पद के लिए अपनी इच्छा दिखाने वाले उम्मीदवारों में एक अकेली दीपा खन्ना ही लगातार सक्रिय बनी हुईं थीं, और लगातार डिस्ट्रिक्ट में लोगों से मिलजुल रही थीं तथा अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के प्रयासों में लगीं हुईं थीं । इसलिए अचानक शुरू हुई चुनावी प्रक्रिया से एक अकेले दीपा खन्ना और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से परेशानी होने की बात नहीं सुनी गई है, बल्कि उनकी तरफ से तो चुनावी प्रक्रिया शुरू होने का स्वागत होने की बात ही सुनी गई है । इसके विपरीत, मनीष शारदा और शशिकांत गोयल के खेमे में चुनावी प्रक्रिया शुरू होने की घोषणा से निराशा और हताशा के स्वर सुनाई दे रहे हैं । इन दोनों खेमों में इस बात पर भी हैरानी प्रकट की जा रही है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में चुनाव करवाने की लगातार रट लगाए जा रहे दीपक जैन का अचानक से हृदय परिवर्तन कैसे और क्यों हो गया कि आनन-फानन में उन्होंने चुनाव की प्रक्रिया ही शुरू कर दी है ? बिना चुनावी तैयारी के 'पकड़े' गए मनीष शारदा और शशिकांत गोयल के सामने मुसीबत की बात यह भी है कि दोनों ही मेरठ के होने के नाते चुनाव में एक-दूसरे को ही नुकसान पहुँचाते नजर आ रहे हैं । दोनों के समर्थक नेता हालाँकि चाह तो रहे थे कि दोनों के बीच ऐसा कोई समझौता हो जाये - जिसके तहत एक पहले और दूसरा उसके बाद उम्मीदवार बन जाए; लेकिन इस समझौते के लिए बातचीत अभी यह सोच कर शुरू नहीं की गई थी कि चुनाव तो अभी दूर हैं; दोनों ही लोग इस उम्मीद में थे कि हो सकता है कि चुनाव होने तक दूसरा थक-हार कर खुद ही मैदान छोड़ दे, इसलिए अभी बात क्या और क्यों करना ? लेकिन अचानक से शुरू हुई चुनावी प्रक्रिया ने मेरठ के दोनों उम्मीदवारों को मुसीबत में फँसा दिया है और उनके समर्थक व शुभचिंतक ही दोनों को दीपा खन्ना के सामने कमजोर पा/समझ रहे हैं ।

Thursday, August 30, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में एक भी दिन गवर्नर रहे बिना दीपक बाबु को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिलने में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता की मिलीभगत की चर्चाओं ने मामले को गंभीर रूप दिया

मुरादाबाद । दीपक बाबु को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिलने की खबर ने डिस्ट्रिक्ट 3100 के लोगों को ही नहीं, बल्कि उन सभी रोटेरियंस को चौंकाया और हैरान किया है, जो रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को सम्मान की नजर से देखते हैं और उनमें भरोसा करते हैं - इस मामले में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का नाम आने से मामला दिलचस्प और हो गया है । जिसने भी इस बात को सुना है, उसका यही मानना और कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल भी एक अंधेर नगरी हो गया है, जिसे चौपट राजा चला रहे हैं । उल्लेखनीय है कि दीपक बाबु वर्ष 2016-17 के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए थे । लेकिन उनका गवर्नर-वर्ष शुरू होने के करीब तीन महीने पहले ही डिस्ट्रिक्ट को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डाल दिया गया था । अप्रैल 2016 के शुरू में ही मजे की बात यह हुई थी कि डिस्ट्रिक्ट को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डालने की औपचारिक घोषणा होने से पहले ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में दीपक बाबु को डिस्ट्रिक्ट असेम्बली करने से रोक दिया गया था । इस तरह दीपक बाबु को रोटरी के 113 वर्षों के इतिहास में पहले और अकेले ऐसे 'गवर्नर' होने की पहचान मिली, जिन्हें गवर्नर का पदभार संभालने से पहले ही गवर्नर पद के कामकाज करने से रोक दिया गया था । यानि दीपक बाबु ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में एक भी दिन काम नहीं किया है - इसके बावजूद उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिल गया है । रोटरी इंटरनेशनल के नियम के अनुसार, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा पाने के लिए जरूरी है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वर्ष के 365 दिन रहा गया हो - पर दीपक बाबु तो एक दिन भी गवर्नर नहीं रहे । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना/पूछना है कि दीपक बाबु को यदि एक भी दिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहे बिना पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिल सकता है, तो वर्ष 2017-18 के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए डीके शर्मा को भी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिलना चाहिए ।
दिलचस्प बात यह रही कि दीपक बाबु को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा देने की बात 'चुपचाप' तरीके से तय कर ली गई, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन तक को इस बारे में अधिकृत जानकारी नहीं दी गई - खुद दीपक बाबु ने भी इस बारे में किसी को जानकारी नहीं दी । इससे लगता है कि खुद दीपक बाबु को और इस फैसले से जुड़े बड़े पदाधिकारियों को भी यह 'अपराधबोध' तो है कि इस फैसले से उनका मजाक ही बनेगा । यह पोल तब खुली, जब 25 अगस्त को हुए इंटरसिटी सेमीनार से पहले होने वाली कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन को सिफारिश मिली कि कॉलिज और गवर्नर्स की मीटिंग में उन्हें दीपक बाबु को भी आमंत्रित करना चाहिए, क्योंकि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने नाते दीपक बाबु भी कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के सदस्य हैं । दीपक जैन का माथा ठनका और उन्होंने दिल्ली स्थित रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया ऑफिस से इस बारे में जानकारी माँगी, जहाँ से उन्हें बताया गया कि हाँ, दीपक बाबु को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मान्यता दी गई है । इंटरसिटी सेमीनार में आए इंटरनेशनल डायरेक्टर भरत पांड्या और नेशनल पोलियो प्लस कमेटी के चेयरमैन दीपक कपूर भी कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में शामिल हुए और उन्हें भी दीपक बाबु को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिलने पर हैरानी हुई । डिस्ट्रिक्ट के 'असली' पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ अनौपचारिक बातचीत में इस मामले पर बात करते हुए भरत पांड्या और दीपक कपूर ने हालाँकि औपचारिक तौर पर तो ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन बातों ही बातों में इशारों-इशारों में उन्होंने इसके लिए नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस के दौरान डिस्ट्रिक्ट के प्रभारी रहे संजय खन्ना और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता को जिम्मेदार ठहराने वाले संकेत जरूर दिए ।
एक भी दिन गवर्नर रहे बिना दीपक बाबु को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा मिलने जैसा चमत्कार घटने के पीछे के खेल को समझने की कोशिश करने वाले लोगों को लगता है कि इसके लिए भूमिका बनाने का काम पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के कहने पर संजय खन्ना ने किया, जिसे अंजाम तक पहुँचाने की जिम्मेदारी सुशील गुप्ता ने निभाई । दीपक बाबु की मनोज देसाई से खास निकटता की बात सभी की जानकारी में है; मनोज देसाई के इंटरनेशनल डायरेक्टर रहते हुए ही डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में गए डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रभारी की भूमिका मिली थी और उनके द्वारा खासी कुशलता के साथ निभाई गई उक्त भूमिका के चलते रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के बीच उनकी अच्छी पहचान और साख बनी - लोगों को लगता है कि जिसका फायदा उठाते हुए मनोज देसाई ने पहले तो संजय खन्ना के जरिये 'माहौल' तैयार किया और फिर इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में सदस्य होने का फायदा उठाते हुए सुशील गुप्ता के संपर्कों के जरिये दीपक बाबु के मामले में फैसले पर मोहर लगवाई । इस 'थ्योरी' को दरअसल इसलिए भी विश्वसनीय माना जा रहा है क्योंकि इस फैसले को पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उन्हीं के प्रेसीडेंट-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3100 नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में गया था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता का इस्तीफा करा लेने के बावजूद रोटरी इंटरनेशनल ने डिस्ट्रिक्ट को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में नहीं डाला था; बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में दीपक बाबु की हरकतों और कारस्तानियों को देखने के बाद डिस्ट्रिक्ट को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डाला था । दरअसल सुनील गुप्ता के इस्तीफे के बाद दीपक बाबु ने खुद को गवर्नर समझ लिया था, और वह तरह-तरह की मनमानी करने पर उतर आये थे । दीपक बाबु के मनमाने, स्वार्थपूर्ण तथा अहंकारभरे रवैये को देख कर ही केआर रवींद्रन ने डिस्ट्रिक्ट 3100 को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डाल दिया । लोगों का कहना है कि जो दीपक बाबु डिस्ट्रिक्ट की बदनामी और बर्बादी के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार रहे, उन्हीं दीपक बाबु को नियमों की अनदेखी करते हुए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का तमगा देना दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, डिस्ट्रिक्ट के लिए भी बदकिस्मती की बात है ।

Wednesday, August 1, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन दुबई में इंटरसिटी कार्यक्रम करने की आड़ में अपनी जेब गर्म करने के आरोप में फँसे

शामली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन पर इंटरसिटी जैसे रोटरी इंटरनेशनल के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम को पिकनिक का जरिया बना देने और उसके नाम पर भारी लूट-खसोट मचाने का गंभीर आरोप लगाया गया है । इसके चलते विडंबनापूर्ण स्थिति यह बनी है कि डिस्ट्रिक्ट की छवि सुधारने के नाम पर हो रहे इंटरसिटी कार्यक्रम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक जैन के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की पहचान को और कलंकित करने का ही काम किया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की छवि सुधारने के आह्वान के साथ डिस्ट्रिक्ट की दूसरी इंटरसिटी 22 से 25 नवंबर के बीच दुबई में आयोजित करने की घोषणा की गई है, जिसके लिए प्रति व्यक्ति 45 हजार रुपए का खर्च निर्धारित किया गया है । इस खर्च निर्धारण के चलते इंटरसिटी कार्यक्रम को 'लूट के कार्यक्रम' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । जानकारों का कहना/पूछना है कि दुबई जाने वाले लोगों को इस समय जब प्रतिष्ठित ट्रेवल एजेंसियों की तरफ से प्रति व्यक्ति करीब 30 हजार रुपए के हिसाब में अच्छा पैकेज मिल रहा है, तब दीपक जैन 45 हजार रुपए क्यों बसूल रहे हैं  ? डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों को कहते हुए सुना गया है कि दीपक जैन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनने' में जो पैसा लगाया है, वह लगता है कि इस इंटरसिटी के आयोजन से ही बसूल लेंगे और इस तरह अपने आप को एक कुशल व्यावसायी साबित करेंगे । ऐसा करते हुए दीपक जैन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की इच्छा रखने वाले लोगों को एक 'रास्ता' भी दिखा दिया है, जिसके तहत पहले तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव जीतने वास्ते वोटों को खरीदने के लिए पैसे लुटाओ और गवर्नर बन जाने  के बाद तरह तरह से लुटाए गए पैसों की बसूली कर लो । कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी कहना है कि इस लूट में अकेले दीपक जैन का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि उनके कुछेक नजदीकियों का भी हिस्सा है और लूट की यह योजना दीपक जैन और उनके कुछेक नजदीकियों ने मिलकर बनाई है । 
दीपक जैन के कुछेक शुभचिंतकों का कहना लेकिन यह भी है कि दुबई के लिए प्रचलित कीमत से डेढ़ गुनी कीमत बसूलने के लिए दीपक जैन दरअसल इसलिए मजबूर हुए हैं, क्योंकि उन्हें कई आम और खास लोगों को मुफ्त में दुबई ले चलने का दबाव झेलना पड़ रहा है । दीपक जैन के नजदीकियों का भी कहना है कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तथा उनके खास लोग दीपक जैन पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि दीपक जैन उन्हें मुफ्त में दुबई ले चलें । कुछेक लोग तो अपने साथ-साथ अपने परिवार के सदस्यों को भी मुफ्त में दुबई ले जाने/चलने का जुगाड़ बैठाने में लगे हैं । दीपक जैन के लिए कुछेक लोगों को तो मुफ्त में ले जाने से बचना मुश्किल ही है, इसलिए उन पर होने वाले खर्च को वह दूसरे लोगों से ही बसूल करेंगे - और इसी कारण से वह दुबई पैकेज डेढ़ गुना करने/रखने के लिए मजबूर हुए हैं । दीपक जैन के लिए बदकिस्मती की बात यह हुई है कि इस तरह की मजबूरीभरी सफाइयों के बाद भी वह लूट मचाने के आरोपों से बच नहीं पा रहे हैं । लोगों का कहना है कि उन्हें दृढ़ता से ऐलान करना चाहिए कि दुबई जाने वाले हर आम और खास को अपना खर्चा स्वयं उठाना होगा, और वह चाहे पूर्व गवर्नर हो या उनका खास हो - मुफ्त में दुबई जाने का मौका नहीं मिलेगा । लोगों का कहना है कि दीपक जैन यदि ऐसा नहीं कह/कर पाते हैं, तो उन्हें उन लोगों के नाम सार्वजनिक करने चाहिए, जो दबाव बना कर मुफ्त में दुबई जाना चाह रहे हैं - अन्यथा यही समझा जायेगा कि कुछेक लोगों के मुफ्त में दुबई जाने की कोशिशों का बहाना बना कर दीपक जैन ने अपनी जेब गर्म करने की तैयारी कर ली है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन को इस आरोप का भी सामना करना पड़ रहा है कि लूट की अपनी योजना में उन्होंने रोटरी के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में डिजाईन किए गए इंटरसिटी को मजाक बना दिया है ।उल्लेखनीय है कि इंटरसिटी कार्यक्रम के डिजाईन में प्रारूप यह बनाया गया है कि किसी एक विषय पर रोटेरियंस को जागरूक बनाया जाए और उन्हें उस विषय से संबंधित क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया जाए । दीपक जैन ने लेकिन इंटरसिटी को मौज-मजा के एक पिकनिक कार्यक्रम में बदल दिया है - और मजे की बात यह है कि रोटरी इंटरनेशनल के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम का मजाक बनाते हुए वह यह उम्मीद भी कर रहे हैं कि इससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी और डिस्ट्रिक्ट की छवि सुधरेगी । लोगों का कहना है कि रोटरी की भावना और उसके आदर्शों से अपरिचित रहे दीपक जैन जैसे लोग जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनेंगे, तब ऐसे ही तमाशे देखने को मिलेँगे । डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि दीपक जैन इंटरसिटी कार्यक्रम यहीं - डिस्ट्रिक्ट की भौगिलिक सीमा में कहीं करते; और दुबई के लिए घोषित रूप से पिकनिक का कार्यक्रम बनाते, तो रोटरी की गरिमा से खिलवाड़ करने के आरोप से तो कम से कम बच जाते । उन्हें लगता है कि दीपक जैन ने होशियारी दिखाते हुए एक ही कार्यक्रम के जरिये 'रोटरी' और 'लूट' - दोनों करने की जो योजना बनाई, उसके कारण वह दोहरे आरोप में फँस गए हैं ।

Sunday, July 29, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में जल्दी ही होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर जीएस धामा के क्लब से अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने एमएस जैन से सबंध सुधारने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन की कोशिशों में पलीता लगाया और उन्हें मुसीबत में फँसाया

मेरठ । मनीष शारदा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है । दरअसल दीपक जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए शशिकांत गोयल की उम्मीदवारी का समर्थन करने की तैयारी कर रहे थे, और ऐसा करके वह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एमएस जैन की नाराजगी दूर करने का दाँव चल रहे थे । रोटरी क्लब मेरठ प्रभात के शशिकांत गोयल को एमएस जैन के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । एमएस जैन ने ही दीपक जैन को भी उम्मीदवारी के लिए प्रेरित किया था, और उनको जीत दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका दिलवाई थी; जीतने के बाद दीपक जैन ने लेकिन एमएस जैन को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका और उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक उन्हें कोई पद या तवज्जो नहीं दी । दीपक जैन के रवैये से अपमानित महसूस करने वाले एमएस जैन डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग पड़ गए । जल्दी ही होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के लिए अपने क्लब के शशिकांत गोयल को उम्मीदवार बनवा कर एमएस जैन ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वापस लौटने की कोशिश की, तो उनकी कोशिश को दीपक जैन का समर्थन मिलता नजर आया । दीपक जैन के नजदीकियों के अनुसार, शशिकांत गोयल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के जरिये दीपक जैन ने वास्तव में एमएस जैन से संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाने का काम किया है । दीपक जैन को उम्मीद रही कि शशिकांत गोयल की उम्मीदवारी को वह समर्थन देंगे, तो एमएस जैन उनके प्रति पाली हुई नाराजगी को भूल जायेंगे और उनके कार्यों तथा फैसलों का समर्थन करने लगेंगे । मनीष शारदा की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने लेकिन एमएस जैन से सबंध सुधारने की दीपक जैन की कोशिशों में पलीता लगा दिया है ।
मनीष शारदा रोटरी क्लब मेरठ महान के सदस्य हैं, जो डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर जीएस धामा का क्लब है । इस नाते मनीष शारदा को विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन का समर्थन उन्हें ही मिलेगा । मनीष शारदा को पक्का भरोसा है कि दीपक जैन के लिए जीएस धामा के क्लब के उम्मीदवार को छोड़ कर एमएस जैन के क्लब के उम्मीदवार का समर्थन करना किसी भी तरह से संभव नहीं होगा । दीपक जैन के नजदीकियों के अनुसार, मनीष शारदा का यह भरोसा सच भी है; मनीष शारदा की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के बाद दीपक जैन सचमुच मुसीबत में फँस गए हैं और शशिकांत गोयल की उम्मीदवारी के समर्थन से वह पीछे हटते दिख रहे हैं । दूसरे लोगों को भी लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक जैन जिस तरह से नाकारा साबित हो रहे हैं, और डिस्ट्रिक्ट के सामान्य कामकाज तक या तो ठप पड़े हैं और या लेट-लतीफी का शिकार बने हुए हैं; वैसे में जीएस धामा तथा उनके क्लब के लोगों को भी नाराज करने का खतरा दीपक जैन नहीं उठायेंगे । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में जो थोड़े से काम हुए भी हैं, वह जीएस धामा और उनके क्लब के लोगों की मदद से ही हो सकेंगे । अन्यथा दीपक जैन के गवर्नर-काल का हाल यह है कि लोगों को अभी तक यही नहीं पता है कि डिस्ट्रिक्ट टीम में कौन कौन प्रमुख पदाधिकारी है । क्लब्स के पदाधिकारियों की भी आधिकारिक सूची अभी तक लोगों को उपलब्ध नहीं हो सकी है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की क्लब्स के पदाधिकारियों के साथ होने वाली आधिकारिक मीटिंग (जीओवी) में कुछ पता न होने के कारण दीपक जैन प्रायः चुपचाप ही बैठने को मजबूर होते हैं, और मीटिंग में मौजूद कोई वरिष्ठ रोटेरियन ही जीओवी की औपचारिकता पूरी करता है । दीपक जैन दरअसल वोटों की खरीद-फरोख्त करके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद तो पा गए हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद की जिम्मेदारी सँभालने की काबिलियत हासिल नहीं कर पाए हैं - और इसका खामियाजा डिस्ट्रिक्ट को भुगतना पड़ रहा है ।
ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को यह भी लग रहा है कि दीपक जैन का समर्थन शशिकांत गोयल को नहीं मिलेगा और मनीष शारदा को मिल जायेगा - तो क्या हो जायेगा ? अधिकतर लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक जैन जिस तरह से नाकारा साबित हो रहे हैं, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में - किसी के पक्ष में कोई बेईमानी करने के अलावा - वह कोई राजनीतिक भूमिका सचमुच निभा भी पायेंगे । शशिकांत गोयल और मनीष शारदा, दोनों की ही समस्या यह है कि दोनों का ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ कोई परिचय नहीं है । उनके काम-काज की और उनकी क्षमताओं की डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच कोई पहचान नहीं है; उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि दोनों के ही क्लब्स ने दीपक जैन और श्रीहरि गुप्ता के बीच हुए चुनाव में मेरठ के उम्मीदवार श्रीहरि गुप्ता की खिलाफत की थी, जिस कारण उनके लिए अब मेरठ में ही समर्थन जुटाना मुश्किल होगा । दोनों के मेरठ के होने के कारण दोनों एक-दूसरे को ही वोटों की चोट पहुँचायेंगे, वह बात अलग से है और 'कंगाली में आटे के गीले' होने की कहावत को चरितार्थ करती है - जिसका फायदा तीसरे उम्मीदवार के रूप में रोटरी क्लब मुरादाबाद ब्राइट की दीपा खन्ना को हो सकता है । दीपा खन्ना की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद राजकमल गुप्ता जिस सहयोगभावना के साथ अपनी उम्मीदवारी से पीछे हट गए हैं, उसके कारण दीपा खन्ना मुरादाबाद से अकेली उम्मीदवार रह गई हैं । मुरादाबाद में दीपा खन्ना को इस कारण भी एकतरफा समर्थन मिलता नजर आ रहा है क्योंकि मुरादाबाद में कई लोगों को लग रहा है कि मेरठ के बाद अब मुरादाबाद में भी महिला गवर्नर होनी चाहिए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन को मुरादाबाद में किसी किसी को उकसाने और उम्मीदवार बनाने की कोशिश करने के मामले में सक्रिय सुना/बताया तो जा रहा है, लेकिन उनके भरोसे कोई उम्मीदवार बनने को राजी हो जायेगा - इसकी संभावना कम ही दिख रही है । अपने अपने उम्मीदवारों के साथ एमएस जैन और जीएस धामा के आमने-सामने हो जाने तथा दीपक जैन के उनके बीच फँस जाने की स्थिति से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनावी परिदृश्य दिलचस्प तो हो ही गया है ।

Wednesday, May 9, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डीके शर्मा के पक्ष में आए अदालती फैसले तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक जैन की हरकत और उस हरकत पर रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय द्वारा अपनाए गए कड़े रवैये जैसी घटनाओं के एक साथ होने/घटने से डिस्ट्रिक्ट में डर हो चला है कि पटरी पर वापस लौटता डिस्ट्रिक्ट कहीं एक बार फिर पटरी से उतर तो नहीं जाएगा ?

सिकंदराबाद । पौढ़ी-गढ़वाल के सिविल जज की अदालत में डीके शर्मा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी सौंपने को लेकर आज हुए एक फैसले ने डिस्ट्रिक्ट 3100 में एक बार फिर उथलपुथल मचा दी है । उथलपुथल दरअसल इस फैसले से उत्साहित होते हुए डीके शर्मा की अगली कार्रवाई से मची है । अदालत में हुए फैसले का संज्ञान लेते हुए डीके शर्मा की तरफ से अगले दो रोटरी वर्षों के लिए हुए चुनाव को निरस्त करने के लिए कानूनी कार्रवाई शुरू करने की चर्चा है । उनकी कार्रवाई पर अदालती फैसला क्या होगा, यह तो कार्रवाई चलने और फैसला आने के बाद ही पता चलेगा - लेकिन आज जो घटनाचक्र घटा/चला है, उसने कम से कम अगले रोटरी वर्ष के दीपक जैन के गवर्नर-काल को तो संशय में डाल ही दिया है । दीपक जैन बेचारे के लिए मुसीबत की बात यह हो गई है कि उन्हें वैसे भी ज्यादा लोग गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, तिस पर इस तरह की घटनाएँ उनके गवर्नर-काल का और कबाड़ा किए दे रही हैं । एक गवर्नर के रूप में दीपक जैन की कारस्तानियाँ भी उनकी फजीहत करने/करवाने में सहयोग कर रही हैं । डीआरएफसी के पद से अजय कुमार को हटवाने की उनकी कोशिशों का जैसा जो हश्र हुआ और रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने उनकी हरकत को जिस तरह से निष्प्रभावी किया, वह किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए बहुत ही शर्म की बात है । रोटरी इंटरनेशनल के इतिहास में इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा, जबकि डीआरएफसी के मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की सिफारिश को स्वीकार करने की बजाये रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया हो । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में दीपक जैन द्वारा की गई हरकत, उस हरकत पर रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय द्वारा अपनाए गए कड़े रवैये और डीके शर्मा की अदालती जीत जैसी घटनाओं के एक साथ होने/घटने से लोगों को यह डर भी हो चला है कि पटरी पर वापस लौटता डिस्ट्रिक्ट कहीं एक बार फिर पटरी से उतर न जाए ।
पिछले दिनों, हिचकोले खाते खाते हुए भी दीपक जैन की गवर्नरी के कार्यक्रमों के जैसे तैसे होने तथा उनके गवर्नर-काल के बाद वाले वर्ष के लिए निर्विरोध तरीके से गवर्नर का चयन होने से लगा था कि डिस्ट्रिक्ट धीरे धीरे ही सही पटरी पर लौट रहा है । डीके शर्मा और उनकी कानूनी लड़ाईयों को लोगों ने भुला दिया था और उनके चैप्टर को खत्म हुआ मान/समझ लिया गया था । लेकिन आज आए अदालती फैसले ने डीके शर्मा के मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है । लगता है कि आज आए फैसले ने डीके शर्मा को एक नई ऊर्जा से भर दिया है, और वह एक बार फिर ताल ठोंक कर रोटरी इंटरनेशनल से भिड़ने को तैयार हो गए हैं । देखा/समझा जा रहा है कि डीके शर्मा को मिली अदालती जीत तथा उनके फिर से सक्रिय होने से डिस्ट्रिक्ट के उन लोगों को खासा उत्साह मिला है, जो दीपक जैन के वोटों की खरीदारी से गवर्नरी का चुनाव जीतने की स्थिति को देख कर निराश हुए हैं । दीपक जैन के चुनावी अभियान में वोटों को खरीदने का जो खुल्लाखेल हुआ, उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सवाल उठा/छिड़ा कि दो वर्षों तक डिस्ट्रिक्ट को निलंबित रखने का आखिर क्या फायदा हुआ ? यह सवाल इस विडंबना को देखते हुए और महत्त्वपूर्ण बना कि निहायत शांति और भाईचारे की भावना के साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के लिए चुने गए डीके शर्मा को तो गवर्नरी करने का मौका नहीं मिला, और वोटों की खरीद-फरोख्त के आरोपों के बीच गवर्नर का चुनाव जीतने वाले दीपक जैन को गवर्नरी करने का मौका मिल रहा है । यही कारण रहा कि डिस्ट्रिक्ट के पटरी पर लौटने की स्थिति डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर लोगों को उत्साहित व प्रेरित करने में विफल रही है ।
दीपक जैन की हरकतों ने जैसे ठंडी पड़ती आग में घी डालने का काम किया । दीपक जैन द्वारा चुनाव जीतने के लिए अपनाए गए हथकंडों की चर्चा भी थमने लगी थी, और लोगों ने स्वीकार करना शुरू कर दिया था कि दीपक जैन चाहें जैसे भी हों, और वह चाहें जैसे चुनाव जीते हों - लेकिन डिस्ट्रिक्ट को अब उन्हीं के नेतृत्व में आगे बढ़ना है । यह एक मौका था, जब दीपक जैन होशियारी व जिम्मेदारी से काम लेते तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी साख बनाते, लेकिन वह पदों के मनमाने बँटवारे और छीना-झपटी के खेल में उलझ गए । डीआरएफसी के पद पर नई नियुक्ति को लेकर की गई उनकी मूर्खतापूर्ण कार्रवाई ने तो उन्हें जगहँसाई का पात्र बना दिया । कई-एक लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि दीपक जैन की गलती सिर्फ इतनी है कि वह कठपुतली बने हुए हैं, और उनके नजदीकी उन्हें जैसा नचाते हैं वह नाचते हैं - ऐसे में उनके नजदीकियों ने उन्हें गलत 'स्टेप' बता दिए तो वह भी क्या करते ? कुछेक लोगों का लेकिन यह भी कहना है कि दीपक जैन इतने नादान भी नहीं हैं; वह यह अच्छे से जानते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रोटरी फाउंडेशन के पैसे में हेराफेरी करनी है तो डीआरएफसी अपना 'आदमी' होना चाहिए; उन्हें पता है कि अजय कुमार के डीआरएफसी रहते हुए तो रोटरी फाउंडेशन के पैसों में हेराफेरी करने का उन्हें मौका नहीं मिल सकेगा, इसलिए अजय कुमार को डीआरएफसी पद से हटाने/हटवाने के लिए दीपक जैन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया - लेकिन तमाम जोर के बावजूद उनके हाथ सिर्फ फजीहत ही लगी । दीपक जैन की इन हरकतों ने डीके शर्मा के साथ हुई नाइंसाफी की बात को और मुखर बना दिया । कई लोग तो कहने भी लगे हैं कि डिस्ट्रिक्ट दीपक जैन के 'हाथ' में रहे, उससे तो अच्छा है कि वह निलंबित ही बना रहे । डीके शर्मा के पक्ष में आज आए अदालती फैसले ने इस बात को और बड़ा करने तथा बढ़ाने का काम किया है कि डीके शर्मा की अदालती कार्रवाई के चलते डिस्ट्रिक्ट यदि निलंबित ही बना रहता है तो कम से कम दीपक जैन की बेईमानीपूर्ण हरकतों से तो बचा रहेगा ।

Monday, April 16, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक जैन की अनुभवहीनता तथा सभी को जोड़ पाने में मिल रही विफलता के साथ-साथ गवर्नर पद की जिम्मेदारियों को गंभीरता से न लेने/समझने के उनके रवैये के कारण पेट्स जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम का कबाड़ा हुआ

शामली । अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3100 के गवर्नर का पदभार संभालने की तैयारी कर रहे दीपक जैन के पेट्स आयोजन में बदइंतजामी और अफरातफरी का जो माहौल बना/रहा, उसे देख/जान कर लोगों को चिंता हुई है कि दीपक जैन अपना गवर्नर-काल पूरा कैसे करेंगे ? कुछेक लोगों ने तो कहना शुरू भी कर दिया है कि वोटों की खरीद-फरोख्त करके दीपक जैन गवर्नर तो बन गए हैं, लेकिन रोटरी के कामकाज को लेकर चूँकि उनका कोई अनुभव नहीं है - इसलिए उनके गवर्नर-वर्ष का तो बस भगवान ही मालिक है । लोगों को यह देख कर ज्यादा हैरानी और निराशा है कि दीपक जैन अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ कितनी बड़ी और महत्त्वपूर्ण हैं; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद तो वोटों की खरीद-फरोख्त से मिल सकता है - लेकिन उसकी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए सबसे पहली जरूरत जिम्मेदारियों को समझने/पहचानने की है । पेट्स में जो बदइंतजामी व अफरातफरी का नजारा देखने को मिला, उसका छोटा सा कारण यह रहा कि एक दिन पहले तक रजिस्ट्रेशन लिए/किए जाते रहे, और वह भी फोन पर मुँहजबानी - और बिना यह जाने/समझे कि कमरे कुल हैं कितने । इसका नतीजा यह रहा कि पेट्स में पहुँचे लोगों को ठहरने के लिए कमरे ही नहीं मिले और कई लोग तो पूरे कार्यक्रम के दौरान कमरे के लिए ही भटकते रहे । इस स्थिति को संभालने के लिए भी होशियारी से प्रयास नहीं किए गए, जिसके चलते कई लोगों को आयोजन टीम के सदस्यों की बदतमीजी का भी शिकार होना पड़ा । इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह हुई कि पेट्स में जिन प्रेसीडेंट इलेक्ट को होना चाहिए था, उनकी बजाए दूसरे लोगों का जमावड़ा ज्यादा हुआ । यह इसलिए हुआ क्योंकि दीपक जैन ने पेट्स के आयोजन की जरूरत और महत्ता को ही नहीं समझा/पहचाना और रोटरी के पेट्स जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम को पिकनिक का अड्डा बना दिया ।
दीपक जैन के रंग-ढंग और उनके रवैये के चलते ही डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर पूर्व गवर्नर्स ने पेट्स आयोजन का बहिष्कार किया, और गिनती के प्रायः वही पूर्व गवर्नर्स पेट्स में पहुँचे - दीपक जैन ने जिन्हें प्रमुख पद दिए हुए हैं । पूर्व गवर्नर एमएस जैन और योगेश मोहन गुप्ता की अनुपस्थिति पर सभी का ध्यान गया और कई लोगों को उनकी अनुपस्थिति पर हैरानी हुई । इसका कारण यह रहा कि दीपक जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनाने से लेकर उन्हें चुनाव जितवाने के लिए हर धतकर्म करने में इन्हीं दोनों की भूमिका और संलग्नता थी । इन दोनों की मदद से दीपक जैन पहले उम्मीदवार बने और फिर गवर्नर का चुनाव जीते, और जीतने के बाद पहला काम दीपक जैन ने इन दोनों को किनारे करने का किया । दीपक जैन की शिकायत रही कि चुनाव जीतने के लिए क्लब्स के वोट खरीदने के नाम पर एमएस जैन और योगेश मोहन गुप्ता ने उनसे अनाप-शनाप पैसे खर्च करवाए और अपनी अपनी जेबें भी भरीं । इस शिकायत के चलते ही दीपक जैन ने इन दोनों को अपने गवर्नर-वर्ष के कोई प्रमुख पद नहीं दिए, जिसके चलते यह भड़क गए और दीपक जैन के बारे में विरोधी बातें कहने/करने लगे और उनसे दूर हो गए । इन दोनों के अलावा जो दूसरे गवर्नर्स हैं, उन्हें पहले से ही दीपक जैन के तौर-तरीके पसंद नहीं हैं और वह दीपक जैन से दूर दूर ही बने हुए हैं । दीपक जैन के नजदीकियों का कहना/बताना है कि दीपक जैन ने हालाँकि सभी पूर्व गवर्नर्स से मिल कर उन्हें अपने साथ जोड़ने के प्रयास किये हैं, लेकिन बात बनी नहीं है । पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि दीपक जैन उनसे मिले जरूर हैं और सहयोग भी माँगा है, लेकिन उनके रवैये और व्यवहार में गंभीरता का अभाव तथा अनमनापन सा महसूस हुआ; ऐसा लगा जैसे वह जबर्दस्ती उनके पास भेजे गए हैं । इसके चलते पूर्व गवर्नर्स के साथ उनकी बात बननी ही नहीं थी, और वह नहीं ही नहीं बनी ।
दीपक जैन ने जीएस धामा जैसे वरिष्ठ और अनुभवी पूर्व गवर्नर का सहयोग और समर्थन प्राप्त करने में जो सफलता पाई भी है, उस सफलता का भी फायदा उठा पाने में वह विफल साबित हो रहे हैं । जीएस धामा के सहयोग और समर्थन के कारण उनके क्लब ने पेट्स आयोजित करने की जिम्मेदारी ली, दीपक जैन लेकिन आयोजक-क्लब के पदाधिकारियों के साथ तालमेल ही नहीं बना सके । आयोजक क्लब के पदाधिकारियों ने पेट्स में हुई बदइंतजामी और अफरातफरी के लिए दीपक जैन को जिम्मेदार ठहराया है । उनकी शिकायत है कि दीपक जैन ने उन्हें कभी भी यह नहीं बताया कि पेट्स में कितने लोग आ रहे हैं, ताकि उसी हिसाब से इंतजाम किया जा सके । आयोजक क्लब के पदाधिकारियों की तरफ से दीपक जैन को बता दिया गया था कि पेट्स में कितने लोगों की व्यवस्था की गई है; उसके बाद भी दीपक जैन एक दिन पहले तक लोगों को पेट्स का निमंत्रण देते रहे और लोगों की पहुँचने की स्वीकृति व इच्छा को स्वीकार करते रहे । इसके चलते कार्यक्रम में अव्यवस्था और अराजकता तो होनी ही थी, और वह हुई भी । लोगों का कहना है कि दीपक जैन की अनुभवहीनता तथा सभी को जोड़ पाने में मिल रही विफलता के साथ-साथ गवर्नर पद की जिम्मेदारियों को गंभीरता से न लेने/समझने के उनके रवैये के कारण ही पेट्स जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम का कबाड़ा हुआ है । दीपक जैन के साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों का कहना है कि दीपक जैन ने अपने व्यवहार और रवैये में यदि जल्दी ही सुधार नहीं किया, तो अगले रोटरी वर्ष के उनके गवर्नर-काल का भी बुरा हाल ही होगा ।

Friday, December 15, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में रोटरी इंटरनेशनल के खिलाफ एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अंततः डीके शर्मा को रोटरी में ऐतिहासिक जीत मिली है और उनके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता साफ हुआ है

सिकंदराबाद । रोटरी इंटरनेशनल से लड़ी एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद डीके शर्मा के लिए वह रास्ता आखिरकार खुला, जिस पर चल कर वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक पहुँच पायेंगे । पौढ़ी-गढ़वाल की डिस्ट्रिक्ट व सेशन जज की अदालत के फैसले ने डिस्ट्रिक्ट 3100 के नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस को हटाने, डीके शर्मा को गवर्नर पद सौंपने तथा इस बात को रेखांकित करते हुए कि मौजूदा रोटरी वर्ष में अब चूँकि ज्यादा समय नहीं बचा रह गया है, इसलिए अगले रोटरी वर्ष के लिए भी उन्हें गवर्नर पद पर रहने का मौका देने की जो बातें कहीं हैं - वह रोटरी इंटरनेशनल के इतिहास में अनोखा अध्याय जोड़ती हैं । इस फैसले से अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हुआ चुनाव भी निरस्त हो जाता है और जिसके तहत डीके शर्मा के लिए दो रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर रहने का एक विलक्षण मौका बनता है । रोटरी इंटरनेशनल के इतिहास में दो रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहने का मौका इससे पहले शायद किसी को नहीं मिला है । इस अदालती फैसले ने डीके शर्मा के नजदीकियों और समर्थकों को ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के अन्य लोगों को भी राहत और खुशी पहुँचाई है - जो डिस्ट्रिक्ट को फिर से डिस्ट्रिक्ट बनते देखने का इंतजार कर रहे थे । अधिकतर लोगों का मानना और कहना रहा है कि डीके शर्मा को बिना कोई गुनाह किए ही रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से 'सजा' मिल रही है, इसलिए उनके साथ न्याय होना ही चाहिए । इसी भावना के चलते पौढ़ी-गढ़वाल की डिस्ट्रिक्ट व सेशन जज की अदालत में हुए फैसले का डिस्ट्रिक्ट में हर किसी ने स्वागत ही किया है और इसे डिस्ट्रिक्ट 3100 के लिए शुभ लक्षण के रूप में देखा/पहचाना है ।
रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से डीके शर्मा के साथ हो रहे 'अन्याय' को लेकर लोगों के बीच इसलिए भी उदासी और नाराजगी थी, क्योंकि हाल-फिलहाल के वर्षों में डीके शर्मा ही अकेले ऐसे चुने हुए गवर्नर हैं, जो बिना किसी विवाद और या शोर-शराबे के गवर्नर चुने गए । संजीव रस्तोगी के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जितनी शांति और आपसी भाईचारे की भावना के साथ संपन्न हुआ, वैसा उदाहरण डिस्ट्रिक्ट 3100 तो छोड़िए - दूसरे किसी डिस्ट्रिक्ट में भी मुश्किल से ही मिलेगा । डिस्ट्रिक्ट 3100 में और दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी, निर्विरोध डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के उदाहरण तो खूब मिलेंगे - लेकिन उन उदाहरणों की पृष्ठभूमि में सौदेबाजियों और या पक्षपातपूर्ण रूप से डराने/फुसलाने/ललचाने वाली हरकतों की जालसाजियों के किस्से भी अवश्य ही सुनने को मिलेंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में संजीव रस्तोगी ने लेकिन अपने कार्यकाल में पारदर्शी तरीके से सभी को विश्वास में लेते हुए ऐसा अनोखा माहौल बनाया था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद को लेकर कोई झमेला ही पैदा नहीं हुआ और सारी कार्रवाई बड़े सामान्य ढंग से संपन्न हुई, जिसमें डीके शर्मा सर्वसहमति से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए । इससे ठीक पहले के वर्ष में दीपक बाबू के चुनाव में चूँकि खासे झगड़े-झंझट हुए थे, इसलिए डीके शर्मा के चुनाव के शांत/सहज भाव से निपट जाने पर सभी ने राहत, संतोष और खुशी की साँस ली थी । संजीव रस्तोगी के डिस्ट्रिक्ट में बनाए गए माहौल को लेकिन उनके बाद गवर्नर बने सुनील गुप्ता बनाए नहीं रख सके, जिस कारण सुनील गुप्ता के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट में खासे बबाल हुए और नतीजे के रूप में सुनील गुप्ता की गवर्नरी पूरी होने से पहले ही वापस ले ली गई और डिस्ट्रिक्ट का स्टेटस भी खत्म कर दिया गया । इससे दीपक बाबू और डीके शर्मा का गवर्नर बनने का मौका भी छिन गया ।
दीपक बाबू ने तो इस स्थिति को स्वीकार कर लिया, किंतु डीके शर्मा ने अपना मौका वापस पाने के लिए प्रयास करना शुरू किया । शुरू से ही उनका तर्क रहा कि एक रोटेरियन और एक उम्मीदवार के रूप में उनके व्यवहार और आचरण पर कभी कोई आरोप नहीं रहा, और उनका चुनाव निर्विरोध ही नहीं बल्कि निर्विवाद रूप से संपन्न हुआ - आखिर तब फिर उनसे गवर्नर बनने का उनका अधिकार क्यों छीना जा रहा है ? डीके शर्मा ने अपनी तरफ से पहले रोटरी के भीतर ही न्याय प्राप्त करने की कोशिश की, और इस कोशिश में उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल का हर दरवाजा खटखटाया; कई एक मौकों पर उन्हें तथा उनके साथियों को लगा भी कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारी उनके साथ अन्याय नहीं होने देंगे और उनका गवर्नर-वर्ष शुरू होने से पहले ही डिस्ट्रिक्ट 3100 से नॉन-डिस्ट्रिक्ट का तमगा हट जाएगा और डीके शर्मा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद मिल जाएगा । लेकिन समय बीतते बीतते डीके शर्मा और उनके साथियों को समझ में आ गया कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारी उन्हें उलझाए हुए रख कर झाँसा दे रहे हैं तथा रोटरी में उन्हें न्याय नहीं ही मिलेगा ।
डीके शर्मा को तब मजबूर होकर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा । अदालती कार्रवाई के दौरान भी डीके शर्मा को रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की तरफ से कई बार संकेत/संदेश मिले कि वह अदालती कार्रवाई को वापस ले लें, और उसके बदले में रोटरी इंटरनेशनल उन्हें उनका हक दे देगी - लेकिन हर बार डीके शर्मा को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ । अदालती कार्रवाई में भी काफी उतार-चढ़ाव रहे, जिसमें कभी डीके शर्मा का तो कभी रोटरी इंटरनेशनल का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आया । डीके शर्मा ने रेखांकित किया कि अदालती कार्रवाई में जब जब उनका पलड़ा भारी होता हुआ लगा, तब तब रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की तरफ से समझौते की बातें हुईं - लेकिन जल्दी ही यह भेद भी खुलता गया कि समझौते की बातों के पीछे उद्देश्य किसी भी तरह से अदालती कार्रवाई को रुकवाना और वापस करवाना ही था । डीके शर्मा रोटरी इंटरनेशनल की इस चाल में नहीं फँसे और बार बार कहते रहे कि रोटरी इंटरनेशनल के साथ कानूनी लड़ाई लड़ना उन्हें अच्छा तो नहीं लग रहा है, लेकिन रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के पक्षपातपूर्ण और चालाकी भरे रवैये के कारण उन्हें यह कानूनी लड़ाई मजबूरी में लड़ना पड़ रही है । मजबूरी में लड़ी इस कानूनी लड़ाई में अंततः डीके शर्मा को जीत मिली है और उनके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता साफ हुआ है । डीके शर्मा के हक में आया कानूनी फैसला डीके शर्मा और डिस्ट्रिक्ट 3100 के साथ-साथ रोटरी के लिए भी खासा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस फैसले से रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों द्वारा फैलाए और स्थापित किए गए उस झूठ का पर्दाफाश हुआ है कि रोटरी इंटरनेशनल की मनमानियों को अदालती कार्रवाई के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती है और न्याय नहीं पाया सकता है ।
 पौढ़ी-गढ़वाल की डिस्ट्रिक्ट व सेशन जज की अदालत का फैसला :