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Saturday, January 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता के नजदीकियों की ही 'मदद' से होने वाली मनीष शारदा की जीत हरि गुप्ता के लिए फजीहत का कारण बनी

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मनीष शारदा की जीत की खबर मिलने के तुरंत बाद पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश मोहन गुप्ता द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता को लानत-सी देता वाट्स-ऐप संदेश भेजना इस बात की पुष्टि ही करता है कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेताओं के लिए मनीष शारदा को चुनाव जितवाना हरि गुप्ता को नीचा दिखाने के लिए जरूरी हो गया था - और उसके लिए उन नेताओं ने हर हथकंडा अपनाया । दरअसल इसीलिए मनीष शारदा की मामूली अंतर से हुई चुनावी जीत को हरि गुप्ता की पराजय के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष दीपक जैन और हरि गुप्ता के बीच हुए चुनाव में मनीष शारदा के क्लब - रोटरी क्लब मेरठ महान - ने दीपक जैन का समर्थन किया था; और तभी से हरि गुप्ता तथा मनीष शारदा के क्लब के बीच तनातनी की चर्चा थी । यह चर्चा पिछले दिनों उस समय पुख्ता हुई जब अगले वर्ष की डिस्ट्रिक्ट टीम में हरि गुप्ता द्वारा शामिल किए गए मनीष शारदा के क्लब के सदस्यों ने इकट्ठे इस्तीफा दे दिया । उनका आरोप रहा कि हरि गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपा खन्ना का समर्थन कर रहे हैं और इस तरह मनीष शारदा की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम कर रहे हैं । हरि गुप्ता ने उनके इस्तीफे तुरंत स्वीकार भी कर लिए । इस प्रसंग से संदेश यह गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव  जैसे मनीष शारदा और हरि गुप्ता के बीच हो रहा है । इससे अलग अलग कारणों से हरि गुप्ता के विरोधी बने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जीएस धामा, योगेश मोहन गुप्ता और राकेश सिंघल ने खुलकर मनीष शारदा की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया, और तब मनीष शारदा की उम्मीदवारी के पक्ष में वोट जुटाने के लिए हर हथकंडा अपनाया गया ।
हरि गुप्ता के लिए बड़े झटके की बात यह रही कि अगले वर्ष की उनकी डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्यों तक के क्लब के वोट मनीष शारदा और उनके समर्थकों के हाथों 'बिक' गए । माना/समझा जा रहा था कि हरि गुप्ता ने जिन प्रमुख रोटेरियंस को अपनी टीम में महत्त्वपूर्ण पद दिए हैं, वह अपने अपने क्लब के वोट निश्चित रूप से दीपा खन्ना को दिलवा देंगे । रोटरी की चुनावी राजनीति का यह एक बड़ा आम फार्मूला है, जिसे प्रायः हर डिस्ट्रिक्ट में हमेशा ही आजमाया जाता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पास अवॉर्ड का तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के पास पदों का 'खजाना' होता है, जिसके जरिये वह चुनाव को प्रभावित करने का काम करते हैं । लेकिन मनीष शारदा और उनके समर्थकों ने हरि गुप्ता की टीम में जगह पाने वाले प्रमुख रोटेरियंस के क्लब्स के प्रेसीडेंट के सामने ऐसी-ऐसी पेशकशें कीं कि प्रेसीडेंट्स ने अपने क्लब के नेताओं की बात मानने से इंकार कर दिया और हरि गुप्ता की टीम में जगह पाने वाले क्लब्स के नेताओं के लिए हरि गुप्ता से आँख मिला पाना मुश्किल हुआ । इस उलट-फेर के कारणों का आकलन करने वाले लोगों को यह भी लगता है कि हरि गुप्ता के अति-आत्मविश्वास में रहने के चलते भी यह हुआ । चुनाव से पहले हरि गुप्ता को कुछेक क्लब्स के प्रेसीडेंट के बदलते दिख रहे रवैये के प्रति आगाह किया गया था, लेकिन हरि गुप्ता ने उसकी परवाह नहीं की और आश्वस्त रहे कि उन्हें धोखा नहीं मिलेगा । हरि गुप्ता का यह अति-आत्मविश्वास ही दीपा खन्ना की हार का कारण बना । हरि गुप्ता के लिए समस्या की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पराजय दीपा खन्ना की हुई है, लेकिन फजीहत हरि गुप्ता की हो रही है ।
डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोगों को लगता है कि हरि गुप्ता की फजीहत इसलिए भी हो रही है, क्योंकि वह हर किसी को साथ लेकर चलना चाहते हैं, और डिस्ट्रिक्ट में सौहार्द बनाने का प्रयास कर रहे हैं । इसी प्रयास के तहत उन्होंने मनीष शारदा के क्लब के कई सदस्यों को अपनी गवर्नर-टीम में जगह दी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वह दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में थे - इसका प्रचार तो बहुत था, लेकिन दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के पक्ष में कुछ करते हुए उन्हें देखा किसी ने नहीं । वास्तव में उनके रवैये को देखते हुए उनके ऊपर आरोप चस्पाँ हुआ कि वह दोनों नावों में पैर रखे रहना चाहते हैं । हरि गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि वह स्पष्ट फैसला करने से हिचकते/बचते हैं, और इसलिए उनके विरोधी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं । लोगों का कहना है कि हरि गुप्ता की सदाशयता और भलमनसाहत को उनके विरोधी उनकी कमजोरी समझते हैं, और उनके साथ मनमाना व्यवहार करते हैं - हरि गुप्ता लेकिन उससे कोई सबक नहीं लेते हैं । रोटरी क्लब मेरठ महान से धोखा खाने के बाद भी हरि गुप्ता उसके कई सदस्यों को अपनी टीम में प्रमुख पद देते हैं; वह सदस्य लेकिन हरि गुप्ता की इस भलमनसाहत का सम्मान नहीं करते हैं और उन्हें नीचा दिखाने के उद्देश्य से सामूहिक इस्तीफे दे देते हैं । हरि गुप्ता उन इस्तीफों के पीछे छिपी षड्यंत्रकारी राजनीति को समझने/पहचानने में भी चूक कर जाते हैं, और सावधान होने की बजाये अति-आत्मविश्वास का शिकार बने रहते हैं - जिसका नतीजा हरि गुप्ता के नजदीकियों की ही 'मदद' से होने वाली मनीष शारदा की जीत के रूप में सामने आता है ।

Saturday, February 7, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में सीओएल के लिए ललित मोहन गुप्ता की जीत के साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी ने मुश्किलों और चौतरफा घेराबंदियों के बावजूद डिस्ट्रिक्ट में सौहार्द बनाने तथा पिछले रोटरी वर्ष में मिली बदनामी के दाग को धोने/पोंछने में सफलता प्राप्त की

मेरठ । सीओएल के लिए दोबारा हुए चुनाव में ललित मोहन गुप्ता की जीत के बाद - मजेदार सीन यह बना है कि लोग बधाई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी को दे रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोग इस बात से ज्यादा खुश दिख रहे हैं कि संजीव रस्तोगी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डिस्ट्रिक्ट में सौहार्द बनाने का प्रयास किया और उसमें कामयाब रहे । संजीव रस्तोगी के प्रयासों का ही नतीजा है कि डिस्ट्रिक्ट में इस वर्ष चुनावी बदमजगी जरा भी नहीं फैली तथा जो भी चुनाव - और चुनावी झगड़े थे, वह सब बिना किसी हील-हुज्जत के निपट गए हैं । संजीव रस्तोगी की यह उपलब्धि इसलिए और बड़ी है, क्योंकि उन्हें अपने गवर्नर-काल के झगड़ों-टंटों से तो निपटना ही था, साथ ही उन्हें विरासत में पिछले रोटरी वर्ष के झगड़ों को निपटाने का काम भी मिला था । पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल ने जिस तरह डिस्ट्रिक्ट को तथा रोटरी को शर्मसार किया था, और जिनकी कारस्तानियों के चलते न सिर्फ डिस्ट्रिक्ट का माहौल खराब हुआ बल्कि रोटरी समुदाय में डिस्ट्रिक्ट 3100 की भारी बदनामी हुई - उसके बाद डिस्ट्रिक्ट को पटरी पर लाना संजीव रस्तोगी के लिए बड़ी चुनौती थी । सीओएल के चुनाव को शांतिपूर्ण तरीके से निपटा कर संजीव रस्तोगी ने उक्त चुनौती को सफलता पूर्वक अंजाम तक पहुँचाया है - और इसीलिए लोगों को ललित मोहन गुप्ता की जीत के मुकाबले संजीव रस्तोगी की 'जीत' ज्यादा बड़ी लग रही है ।
सीओएल का चुनाव कराना संजीव रस्तोगी के लिए भारी मुसीबत बना हुआ था । यह चुनाव कराने की मुसीबत उन्हें विरासत में मिली थी । सीओएल का यह चुनाव दरअसल पिछले रोटरी वर्ष में, राकेश सिंघल की गवर्नरी में हुआ था और राकेश सिंघल ने इसमें बेईमानीपूर्ण तरीके से योगेश मोहन गुप्ता को जितवा दिया था । ललित मोहन गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल में राकेश सिंघल और योगेश मोहन गुप्ता की कारस्तानियों की शिकायत की, जिसे रोटरी इंटरनेशनल ने सही पाया और योगेश मोहन गुप्ता की जीत को निरस्त कर दिया । सिर्फ इतना ही नहीं, योगेश मोहन गुप्ता के लिए ऐसा माहौल बना दिया गया कि उन्होंने सीओएल के लिए दोबारा होने वाले चुनाव से बाहर रहने में ही अपनी भलाई समझी । योगेश मोहन गुप्ता के मुकाबले से बाहर होने से ललित मोहन गुप्ता को जो राहत मिली, वह राहत लेकिन वागीश स्वरूप ने छीन ली । सीओएल के लिए अचानक से प्रकट हुई अखिलेश सरन कोठीवाल की उम्मीदवारी ने ललित मोहन गुप्ता की मुश्किलों को और बढ़ा दिया ।
ललित मोहन गुप्ता से भी ज्यादा लेकिन संजीव रस्तोगी की मुश्किलें बढ़ीं । सीओएल के चुनाव के चक्कर में हालात धीरे धीरे पिछले वर्ष जैसी स्थितियों में पहुँचते दिख रहे थे । दरअसल सीओएल के चुनाव की आड़ में बृज भूषण और योगेश मोहन गुप्ता जैसे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी से बदला लेने की फिराक में जुट गए थे, तो कुछेक अन्य लोगों को भी सीओएल का चुनाव संजीव रस्तोगी से निपटने के मौके के रूप में दिख रहा था । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में संजीव रस्तोगी ने गर्मी-सर्दी दिखा कर जो सहमति बनाई और जिसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुनील गुप्ता को संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा, उसकी प्रतिक्रिया में सुनील गुप्ता भी उन लोगों के साथ खड़े दिखाई देने लगे जो संजीव रस्तोगी को फँसाना और बदनाम करने/कराने के खेल में लगे हुए थे । कई लोग इस बात से भी चिढ़े बैठे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए संजीव रस्तोगी ने आम सहमति बना लेने में सफलता प्राप्त कर ली थी और इस सफलता से डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में अपना कद ऊँचा कर लिया था । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में तो संजीव रस्तोगी ने अपने प्रयत्नों से आम सहमति बना ली थी, लेकिन सीओएल के चुनाव में आम सहमति बनाना उनके लिए मेढ़कों को तोलने जैसा मुसीबतभरा काम साबित हो रहा था ।
संजीव रस्तोगी ने लेकिन अपने प्रयासों में कोई ढील नहीं छोड़ी । सीओएल के लिए आम सहमति बनाने के लिए एक तरफ तो उन्होंने पूर्व गवर्नर्स की गरिमा और प्रतिष्ठा का वास्ता दिया, और दूसरी तरफ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपनी कड़क व्यवस्था का संकेत देते हुए स्पष्ट कर दिया कि कोई भी उम्मीदवार कैम्पेन करता हुआ पाया गया तो वह उसकी उम्मीदवारी को निरस्त कर देंगे । संजीव रस्तोगी का सुझाव रहा कि सीओएल का चुनाव कॉलिज ऑफ गवर्नर्स में ही हो जाना चाहिए और यहाँ हुए फैसले को सभी को स्वीकार कर लेना चाहिए । कभी गर्म तो कभी नर्म तेवर दिखा कर संजीव रस्तोगी ने सीओएल के चुनाव को कॉलिज ऑफ गवर्नर्स में करवा लेने पर सभी उम्मीदवारों को अंततः राजी कर लिया । इस राजीनामे के बावजूद सीओएल के चुनाव में जो घमासान मचा, उसे देख कर कई बार यह आशंका भी उठी कि उक्त राजीनामा बना भी रह सकेगा या नहीं ? किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'रूप' में संजीव रस्तोगी ने पहले से ही ऐसी पक्की व्यवस्था कर ली कि उक्त राजीनामा किसी भी तरह से बाधित न हो सके ।
सीओएल के लिए दोबारा हुए चुनाव में कॉलिज ऑफ गवर्नर्स में जो घमासान मचा, वह पहले कभी देखने में नहीं आया । जो पूर्व गवर्नर पिछले कई कई वर्षों से लोगों को नहीं दिखे हैं, वह भी इस चुनाव में वोट डालने आये । विष्णु सरन भार्गव घायल होने तथा उठने-बैठने की मुश्किलों के बावजूद वोट देने आये । वागीश स्वरूप ने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अच्छी फील्डिंग सजाई थी और उनके कुछेक समर्थक खासे आक्रामक तरीके से उनका कैम्पेन चलाये हुए थे । दूसरी तरफ, ललित मोहन गुप्ता ने बड़ा काम यह किया कि पिछले दिनों दीपक बाबू के साथ निकटता दिखाने के चक्कर में दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों के साथ उनकी जो खटपट हो गई थी, उन्होंने उसे दूर कर लिया - जिसके बाद उनकी तरफ से मोर्चाबंदी सँभाली नीरज अग्रवाल ने । नीरज अग्रवाल का वागीश स्वरूप के साथ कुछ पुराना लफड़ा है, जिसका हिसाब नीरज अग्रवाल ने इस चुनाव में चुकता किया । यह चुनाव सिर्फ वागीश स्वरूप और ललित मोहन गुप्ता के बीच ही नहीं हो रहा था; जैसा कि पहले कहा गया है कि इस चुनाव के जरिये कुछेक लोग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी से निपटने की फिराक में थे और इस कारण से भी वागीश स्वरूप और ललित मोहन गुप्ता के समर्थकों व विरोधियों के बीच अदला-बदली हुई और नए नए समीकरण बने । खासी अनिश्चितता से परिपूर्ण घमासान तरीके से हुए इस चुनाव में ललित मोहन गुप्ता को एक वोट से जीत मिली तो अधिकतर लोगों ने संतोष व्यक्त किया कि ललित मोहन गुप्ता ने इस चुनाव को लेकर पिछले वर्ष से लगातार जो मेहनत की और जो मुश्किल लड़ाई लड़ी अंततः उन्हें उसका फल मिला ।
ललित मोहन गुप्ता को तो फल मिला ही, संजीव रस्तोगी को ज्यादा बड़ा फल मिला । दो दिन पहले तक कोई भी उम्मीद नहीं कर रहा था कि सीओएल का चुनाव आराम से हो सकेगा । संजीव रस्तोगी के इसी वर्ष अभी हाल तक बने 'दुश्मन' सीओएल के चुनाव के जरिये संजीव रस्तोगी को लपेटने की कोशिश कर रहे थे । संजीव रस्तोगी ने लेकिन दृढ़ता से और खासी होशियारी से काम किया और एक मुश्किल दिख रहे काम को अंततः अंजाम तक पहुँचा दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में संजीव रस्तोगी का कार्यकाल खासा चुनौतीपूर्ण रहा है । योगेश मोहन गुप्ता, बृज भूषण, राकेश रस्तोगी आदि जिन लोगों के भरोसे उन्होंने अपने गवर्नर-काल को चलाने की तैयारी की थी, उनकी तरफ से मदद मिलने की बजाये उन्हें कदम कदम पर काँटे ही बिछे मिले - जिस कारण से बारी बारी से उन्हें इन लोगों को पदमुक्त करना पड़ा । बृज भूषण के साथ तो उनकी खासी गर्मागर्मी भी हुई । इस सबके चलते कई बार ऐसा लगा/दिखा जैसे कि डिस्ट्रिक्ट में संजीव रस्तोगी अकेले पड़ गए हैं । इतनी सब मुश्किलों और घेराबंदियों के बावजूद संजीव रस्तोगी ने डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह से सौहार्द बनाने में सफलता प्राप्त की तथा पिछले रोटरी वर्ष में मिली बदनामी के दाग को धोने/पोंछने का जो काम किया है, उससे डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी समुदाय में वह बधाई के पात्र बने हैं ।

Friday, January 9, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़, रमेश अग्रवाल, मुकेश अरनेजा की तिकड़ी को विश्वास है कि पीटी प्रभाकर एक जैसे 'अपराध' के बावजूद शरत जैन के साथ वैसा कुछ नहीं करेंगे, जैसा कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3100 के दीपक बाबू के साथ किया है; क्योंकि उनके पास सुशील गुप्ता और मनोज देसाई का समर्थन है

नई दिल्ली । पीटी प्रभाकर - इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर ने दिल्ली में डिस्ट्रिक्ट 3100 की काउंसिल (ऑफ गवर्नर्स) के साथ हुई बातचीत में दीपक बाबू की अपील पर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा 26 से 29 जनवरी के बीच होने वाली वर्ष 2014-15 की तीसरी बोर्ड मीटिंग में 'लिए जाने वाले' फैसले को आज ही सुना दिया । इस तरह पीटी प्रभाकर ने एकबार फिर साबित कर दिया कि फैसलों के लिए बोर्ड मीटिंग का इंतजार करना बेवकूफी है, फैसले तो पहले ही कर लिए जाते हैं । मीटिंग में तो फैसलों पर सिर्फ मोहर लगती है । पीटी प्रभाकर आज दोपहर दिल्ली में डिस्ट्रिक्ट 3100 की काउंसिल (ऑफ गवर्नर्स) की उस मीटिंग में अचानक शामिल होने के लिए आ पहुँचे, जिसे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने बुलाया था । इस मीटिंग में मुख्य तौर पर पिछले रोटरी वर्ष में हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से जुड़े झगड़े/झंझट पर ही चर्चा हुई । पीटी प्रभाकर इस मीटिंग में शायद इसीलिए शामिल हुए, ताकि वह उक्त झगड़े/झंझट को लेकर डिस्ट्रिक्ट 3100 के लोगों को 'अपनी' राय से अवगत करा दें । इसीलिए कल सायं जब अचानक से पीटी प्रभाकर का इस मीटिंग में शामिल होना निश्चित हुआ, उसके बाद ही डिस्ट्रिक्ट 3100 में पिछले वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के दोनों उम्मीदवारों - दीपक बाबू और दिवाकर अग्रवाल को भी मीटिंग में पहुँचने का नोटिस मिला । रोटरी इंटरनेशनल साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब एवं डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट मैनेजर जतिंदर सिंह को भी उक्त झगड़े/झंझट से जुड़े तथ्यों/सुबूतों के साथ मीटिंग स्थल पर मौजूद रहने का आदेश मिला ।
पीटी प्रभाकर ने डिस्ट्रिक्ट 3100 में पिछले रोटरी वर्ष में हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपक बाबू को पक्षपातपूर्ण व धॉँधलीपूर्ण तरीके से चुनाव जितवाने को लेकर अपनी गहरी नाराजगी दिखाई । जिस किसी पूर्व गवर्नर ने कुछ सफाई देने की कोशिश की, उसे पीटी प्रभाकर से लताड़ ही सुनने को मिली । पीटी प्रभाकर की नाराजगी का सबसे ज्यादा शिकार तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल बने । राकेश सिंघल को कई प्रसंगों में पीटी प्रभाकर की लताड़ सुनने को मिली । पीटी प्रभाकर ने अपनी तरफ से यह स्पष्ट कर दिया कि दीपक बाबू ने भले ही अपनी जीत को अमान्य करार दिए जाने के फैसले के खिलाफ रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड में अपील की हुई है, लेकिन बोर्ड पहले लिए जा चुके फैसले को बदलने का काम नहीं करेगा । इस तरह पीटी प्रभाकर ने दीपक बाबू और उनके समर्थकों को तगड़ा झटका दिया, क्योंकि दीपक बाबू एण्ड पार्टी रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की 26 से 29 जनवरी के बीच होने वाली मीटिंग से अपनी चुनावी जीत के बहाल होने की उम्मीद लगाये हुए थे । पीटी प्रभाकर ने इससे भी बड़ा झटका यह कह कर दिया कि वर्ष 2016-17 के गवर्नर पद के लिए अब जो दोबारा चुनाव होगा, उसमें दीपक बाबू और दिवाकर अग्रवाल उम्मीदवार नहीं बनेंगे ।
दीपक बाबू और उनके समर्थकों की तैयारी थी कि बोर्ड मीटिंग में उनकी चुनावी जीत यदि नहीं भी बहाल हुई, तो वर्ष 2016-17 के गवर्नर पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में अकेले वही उम्मीदवार होंगे - क्योंकि दिवाकर अग्रवाल को तो रोटरी इंटरनेशनल पहले ही उनके रास्ते से हटा चुका है । किंतु पीटी प्रभाकर ने आज उनकी इस तैयारी पर भी पानी फेर दिया है । दीपक बाबू ने हालाँकि प्रतिरोध करने का विकल्प अभी बचा कर रखा हुआ है । उन्होंने पीटी प्रभाकर को यह भरोसा देने से आज तो इंकार कर दिया है कि वर्ष 2016-17 के गवर्नर पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में वह उम्मीदवार नहीं बनेंगे । उन्होंने इंकार भले ही कर दिया है, लेकिन पीटी प्रभाकर के तेवर देख कर यह भी लगता है कि दीपक बाबू इस इंकार के बाद भी हासिल कुछ नहीं कर पायेंगे । दीपक बाबू का साथ देने के लिए पिछले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को जैसी झाड़ पड़ी है, उसे देखते हुए दीपक बाबू को किसी का समर्थन मिल सकेगा - इसमें संदेह है । पिछले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को उस एक तस्वीर के लिए पीटी प्रभाकर का बुरी तरह कोपभाजन बनना पड़ा, जिसमें वह मंच पर दीपक बाबू को अपने साथ बैठाए हुए हैं । इस तस्वीर के साथ-साथ, रोटरी इंटरनेशनल साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब एवं डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट मैनेजर जतिंदर सिंह द्धारा दिखाए जा रहे दूसरे तथ्यों/सुबूतों को देखते हुए पीटी प्रभाकर ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिस पक्षपातपूर्ण और धाँधलीपूर्ण तरीके से दीपक बाबू को चुनाव जितवाया गया, उसे जानने/पहचानने के बाद दीपक बाबू को वर्ष 2016-17 में तो गवर्नर नहीं बनने दिया जायेगा ।
पीटी प्रभाकर के दिल्ली में दिखाए गए इन तेवरों से दिल्ली में होने जा रहे डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट पद के चुनाव पर नजरें आ पड़ी हैं, जहाँ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट जेके गौड़, उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रमेश अग्रवाल और उनके डीआरएफसी मुकेश अरनेजा खुलेआम शरत जैन को जितवाने का बीड़ा उठाए हुए हैं । पीटी प्रभाकर को दीपक बाबू के साथ राकेश सिंघल की एक तस्वीर मिली; शरत जैन के साथ जेके गौड़-रमेश अग्रवाल-मुकेश अरनेजा की तस्वीरों का तो पूरा अल्बम है । पक्षपातपूर्ण और धाँधलीपूर्ण तरीके से दीपक बाबू को चुनाव जितवाने की जिस बात पर पीटी प्रभाकर उखड़े हुए हैं; शरत जैन के मामले में तो उससे कहीं ज्यादा पक्षपातपूर्ण व धाँधलीपूर्ण तरीकों को अपनाया जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट 3012 में शरत जैन को चुनाव जितवाने के लिए जेके गौड़, रमेश अग्रवाल, मुकेश अरनेजा की तिकड़ी तो रोटरी और डिस्ट्रिक्ट ही 'बेचे' दे रही है । ऐसे में सवाल यही उठ रहा है कि पीटी प्रभाकर ने यदि डिस्ट्रिक्ट 3100 के दीपक बाबू के साथ कोई निजी खुंदक नहीं निकाली है, और सचमुच में रोटरी के हितों का ध्यान रखते हुए फैसला किया है - तो फिर वह डिस्ट्रिक्ट 3012 में शरत जैन के साथ वैसा ही फैसला क्यों नहीं करेंगे ?
पीटी प्रभाकर एक जैसे 'अपराध' के बावजूद शरत जैन के साथ वैसा कुछ नहीं करेंगे, जैसा कि उन्होंने दीपक बाबू के साथ किया है; क्यों नहीं करेंगे - शरत जैन, जेके गौड़, रमेश अग्रवाल, मुकेश अरनेजा के पास इसका एक बड़ा ठोस जबाव है; उनका जबाव है कि - क्योंकि उनके पास सुशील गुप्ता और मनोज देसाई हैं । उनका विश्वास है कि उनके पास जब तक सुशील गुप्ता और मनोज देसाई का समर्थन है, तब तक वह कुछ भी करते रह सकते हैं और कोई पीटी/बीटी/सीटी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।  

Tuesday, November 4, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में रोटरी इंटरनेशनल द्धारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की कुर्सी से उतारे जाने से मिले झटके से निराश व हताश दीपक बाबू और उनके समर्थकों ने दावा करना शुरू किया है कि वह दिवाकर अग्रवाल को भी वर्ष 2016-2017 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की दौड़ से बाहर करवायेंगे

मुरादाबाद । रोटरी इंटरनेशनल ने दीपक बाबू से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद न सिर्फ छीन लिया है, बल्कि इस पद के लिए उनके दोबारा उम्मीदवार हो सकने के मौके पर भी रोक लगा दी है । पिछले रोटरी वर्ष में संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपक बाबू द्धारा वोटों की खरीद के सहारे जीत प्राप्त करने का आरोप लगाते हुए रोटरी क्लब मुरादाबाद हैरिटेज द्धारा की गई शिकायत को सही ठहराते हुए रोटरी इंटरनेशनल की तीन सदस्यीय कमेटी ने उस चुनाव को निरस्त करते हुए उस चुनाव को दोबारा कराने का फैसला सुनाया है । दीपक बाबू के लिए इससे भी ज्यादा बुरी बात यह हुई है कि उक्त कमेटी ने दोबारा होने वाले चुनाव में दीपक बाबू के उम्मीदवार होने पर रोक लगा दी है ।
रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले के जरिये नियति ने दीपक बाबू के साथ बहुत ही क्रूर तरीके से बदला लिया है, और दीपक बाबू की करनी ही नहीं - उनकी कथनी का भी उन्हें करारा जबाव दिया है । जो स्थिति बनी है, उसे 'बनाने' का श्रेय खुद दीपक बाबू को ही है ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों की खरीद-फ़रोख्त के आरोप पहले भी लगते रहे हैं - लेकिन दीपक बाबू पहले उम्मीदवार हैं जिन्होंने यह आरोप लगाने के लिए लोगों को बाकायदा 'मौका' दिया । दीपक बाबू ने कई बार लोगों के बीच 'वोटों की खरीद' को चुनाव जीतने की अपनी तरकीब के रूप में व्याख्यायित किया था । उन्होंने कई मौकों पर लोगों को बताया था कि चुनाव के समय, यानि वोट देने के समय वह क्लब-अध्यक्षों को मोटी मोटी रकम ऑफर करेंगे और बदले में उनसे वोट पा लेंगे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जायेंगे । वही नहीं, उन्हें ऐन-केन-प्रकाणेन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनवाने पर आमादा रहे तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल भी इसी तरह के दावे किया करते थे । दीपक बाबू और तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल जब खुद ही इस तरह की बातें करते थे, तो दीपक बाबू के जीत जाने के बाद लोगों को यह कहने का मौका मिला ही कि उनकी जीत तो वोटों की खरीद के जरिये मिली जीत है । कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों ने हलफनामे देकर दीपक बाबू द्धारा की गई वोटों की खरीद-फ़रोख्त के सुबूत भी दे दिए, जिन्हें आधार बना कर दिवाकर अग्रवाल के क्लब - रोटरी क्लब मुरादाबाद हैरिटेज ने रोटरी इंटरनेशनल में दीपक बाबू की जीत को चेलैंज कर दिया ।
दीपक बाबू द्धारा की गई वोटों की खरीद-फ़रोख्त के जो किस्से लोगों के बीच चर्चा में रहे, उनसे पता चला कि दीपक बाबू ने वोटों को 'खरीदने' के लिए बड़ी हार्ड बारगेनिंग की । कुछेक क्लब के पदाधिकारियों को वोट के बदले साठ हजार रुपये के ऑफर से सौदा करना शुरू किया गया, जो फिर दस-दस हजार रुपये बढ़ता हुआ एक लाख रुपये और उससे भी अधिक तक पहुँचा । कुछेक क्लब के पदाधिकारियों ने मौके की नजाकत से फायदा उठाने की कोशिश करते हुए ज्यादा 'मुँह खोले', तो दीपक बाबू को फिर वह सौदे बीच में ही छोड़ने पड़े । जीत का नतीजा आने के बाद दीपक बाबू ने कुछेक लोगों के बीच बड़े घमंड के साथ कहा भी था कि कुछेक क्लब्स से बात बनते बनते 'रह गई', अन्यथा उनकी जीत का अंतर और बड़ा होता ।
दीपक बाबू की इसी तरह की बातें उन पर अब भारी पड़ गई हैं; और इसका नतीजा यह हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की कुर्सी से उतार दिए जाने के बाद दीपक बाबू के साथ किसी को हमदर्दी भी नहीं हो रही है । लोगों का यही कहना है कि दीपक बाबू ने जो किया, उन्हें उसी की 'कीमत' चुकानी पड़ रही है । दीपक बाबू का इसे बड़ा दुर्भाग्य ही माना/बताया जा रहा है कि बुरी खबर के साथ-साथ उन्हें एक 'अच्छी' खबर भी मिली है - लेकिन वह उस अच्छी खबर का कोई मजा ही नहीं ले पा रहे हैं । दीपक बाबू के क्लब - रोटरी क्लब मुरादाबाद मिडटाउन ने दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को मान्य करने को लेकर जो शिकायत की थी, उसे रोटरी इंटरनेशनल ने सही पाया और दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को अमान्य घोषित कर दिया । रोटरी क्लब मुरादाबाद हैरिटेज की शिकायत पर पिछले वर्ष हुए चुनाव को ही जब अमान्य घोषित कर दिया गया है, तो दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को अमान्य घोषित करने वाला फैसला निरर्थक ही साबित हुआ है और दीपक बाबू को मिल सकने वाली खुशी भी नसीब नहीं हो सकी है ।
रोटरी इंटरनेशनल से जो झटका मिला है उससे दीपक बाबू और उनके समर्थक व शुभचिंतक अभी तो निराश और हताश हैं, लेकिन उनमें से कुछेक यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि दिवाकर अग्रवाल और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को इस फैसले से ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए क्योंकि वह कोशिश करेंगे कि जैसे दीपक बाबू को वर्ष 2016-2017 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की दौड़ से बाहर किया गया है, वैसे ही वह दिवाकर अग्रवाल को भी उस दौड़ से बाहर करवायेंगे । उनका कहना है कि वर्ष 2016-2017 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव के लिए दिवाकर अग्रवाल के नामांकन को रोटरी इंटरनेशनल ने अमान्य घोषित करने का जो फैसला किया है उसी का हवाला देते हुए वह अपील करेंगे कि वर्ष 2016-2017 के लिए दोबारा से होने वाले चुनाव में दिवाकर अग्रवाल के नामांकन को न स्वीकार किया जाए । दीपक बाबू के समर्थकों के इस तेवर को देख/जान कर लगता है कि दीपक बाबू और दिवाकर अग्रवाल के बीच चल रहा झगड़ा अभी भी शांत नहीं होने वाला है तथा अभी इसमें और आतिशवाजी देखने को मिलेगी । हालाँकि कई लोगों का कहना यह भी है कि दीपक बाबू और राकेश सिंघल ने अपनी हरकतों से डिस्ट्रिक्ट का नाम बहुत खराब कर लिया है और खुद उन्हें भी उससे कुछ हासिल नहीं हुआ है - इसलिए अभी तक जो कुछ भी हुआ है उससे सबक लेते हुए दीपक बाबू को अपनी नकारात्मक सोच को अब विराम दे देना चाहिए ।

Friday, August 8, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में सीओएल का चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवारों द्धारा की जाने वाली खरीद-फ़रोख्त को रोकने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी द्धारा स्टिंग ऑपरेशन की मदद लेने की तैयारी की खबर से उम्मीदवारों के बीच हड़कंप मचा

मेरठ । सीओएल के संभावित उम्मीदवारों के होश यह सुन/जान कर उड़े हुए हैं कि चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को लुभाने/पटाने वाले उनके हथकंडों को पकड़ने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी ने स्टिंग ऑपरेशन का जाल बिछाया है । उम्मीदवारों को पता चला है कि संजीव रस्तोगी ने विभिन्न क्लब्स के कुछेक लोगों को गुप्त तरीके से ऑडियो/वीडियो रिकॉर्ड कर लेने वाले यन्त्र - जैसे पेन और शर्ट के बटन उपलब्ध करवाने की तैयारी है, जिनके जरिये वह वोट जुटाने के लिए उम्मीदवारों द्धारा अपनाये जाने वाले हथकंडों के सुबूत इकठ्ठा करेंगे । उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में हुए सीओएल के चुनावी नतीजे को रोटरी इंटरनेशनल द्धारा अमान्य घोषित कर दिए जाने के चलते सीओएल का चुनाव अब नए सिरे से होना है । पिछले रोटरी वर्ष में हुए सीओएल के चुनाव में योगेश मोहन गुप्ता की जीत हुई थी । चुनाव में पराजित हुए ललित मोहन गुप्ता ने योगेश मोहन गुप्ता की जीत को ओछे और बेईमानीपूर्ण हथकंडों से हासिल की गई जीत बताते हुए रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत दर्ज करवाई । शिकायत के साथ जो सुबूत दिए गए वह इतने पुख्ता थे कि रोटरी इंटरनेशनल के पास चुनावी नतीजे को अमान्य घोषित करने के अलावा कोई चारा ही नहीं था । योगेश मोहन गुप्ता की चुनावी जीत वाले फैसले को अमान्य घोषित करने के साथ ही रोटरी इंटरनेशनल ने सीओएल के लिए नए सिरे से चुनाव करवाने का आदेश भी पारित किया; इस आदेश के तहत संजीव रस्तोगी को सीओएल का चुनाव करवाना है ।
रोटरी इंटरनेशनल ने पिछले वर्ष हुए सीओएल के चुनाव में हुई धाँधली को लेकर जो कठोर रुख अपनाया, उसे देखते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी के सामने अब दोबारा होने वाले चुनाव को ठीक से करवाने की गंभीर चुनौती है । संजीव रस्तोगी ने हालाँकि कई बार यह तो कहा/दोहराया है कि वह उम्मीदवारों को वोटों की खरीद-फ़रोख्त बिलकुल भी नहीं करने देंगे और किसी भी उम्मीदवार के खिलाफ वोटों की खरीद-फ़रोख्त करने संबंधी शिकायत यदि मिलेगी तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेंगे; लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वोटों की खरीद-फ़रोख्त होने के तथ्य/सुबूत वह कैसे जुटायेंगे - कार्रवाई तो सुबूत मिलने पर ही हो सकेगी न, केवल आरोप लगाने भर से तो कार्रवाई हो नहीं सकेगी । इसी कारण से लोगों के सामने यह सवाल उठा कि संजीव रस्तोगी चुनाव को ईमानदारी से कराने की जो बात कर रहे हैं, उसे अमली जामा वह कैसे पहनायेंगे ? संजीव रस्तोगी ने पिछले दिनों योगेश मोहन गुप्ता की हरकतों पर कार्रवाई करते हुए जिस तरह से उन्हें दिए गए महत्वपूर्ण पद से हटाया, उससे उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को यह संदेश तो दिया ही है कि वह कठोर फैसले लेने से हिचकेंगे नहीं । योगेश मोहन गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई करने पर संजीव रस्तोगी को कई लोगों ने समझाया था कि योगेश मोहन गुप्ता बहुत छोटी सोच का आदमी है और रोटरी के फैसलों को वह निजी रूप से ले लेता है और व्यक्तिगत दुश्मनी के रूप में देखने लगता है; संजीव रस्तोगी ने लेकिन साफ कह दिया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रोटरी के और डिस्ट्रिक्ट के हित में उन्हें यदि योगेश मोहन गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी लगेगा, तो फिर वह यह नहीं सोचेंगे कि योगेश मोहन गुप्ता कैसे रिएक्ट करेंगे ?
संजीव रस्तोगी के इन्हीं तेवरों को देखते हुए लोगों ने यह तो समझ/मान लिया कि चुनाव जीतने  के लिए वोटों की खरीद-फ़रोख्त का जैसा नंगा-नाच राकेश सिंघल के गवर्नर-काल में पिछले वर्ष हुआ, वैसा इस वर्ष नहीं हो पायेगा । लेकिन यह सवाल फिर भी अनुत्तरित ही बना रहा कि संजीव रस्तोगी वोटों की खरीद-फ़रोख्त को रोकेंगे कैसे ? इसी बीच यह चर्चा फैली कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी ने वोटों की खरीद-फ़रोख्त को रोकने के लिए स्टिंग ऑपरेशन का सहारा लेने का फैसला किया है । यहाँ तक दावा किया गया है कि स्टिंग ऑपरेशन के लिए संजीव रस्तोगी ने गुप्त रूप से बातों को और तस्वीरों को रिकॉर्ड करने वाले यन्त्र खरीद भी लिए हैं और वह डिस्ट्रिक्ट में अपने उन विश्वासपात्र लोगों की लिस्ट बना रहे हैं जिन्हें वह यह यन्त्र सौपेंगे और वोटों की खरीद-फ़रोख्त करने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ सुबूत जुटायेंगे । इस बारे में जिन कुछेक लोगों ने संजीव रस्तोगी से पूछा, उन्हें संजीव रस्तोगी से कोई सीधा जबाव नहीं मिला । इससे उक्त चर्चा को और बल मिला । लोगों ने यही समझा/माना कि संजीव रस्तोगी इस बारे में कुछ कहेंगे थोड़े ही - यदि कहेंगे तो फिर स्टिंग ऑपरेशन कैसा ?
संजीव रस्तोगी के स्टिंग ऑपरेशन वाले काम को योगेश मोहन गुप्ता की गर्दन दबोचने के उनके प्रयास के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । पिछले दिनों योगेश मोहन गुप्ता की राकेश रस्तोगी के साथ जिस स्तर की तू-तू मैं-मैं हुई, और उसके बाद जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी ने योगेश मोहन गुप्ता को दिया गया पद उनसे छीन लिया - उससे यह तो दिखने लगा है कि इस वर्ष योगेश मोहन गुप्ता द्धारा की जाने वाली कोई भी हरकत उन्हें मुश्किल में डाल सकती है । रोटरी इंटरनेशनल ने खरीद-फ़रोख्त के आरोपों के चलते जिस तरह से योगेश मोहन गुप्ता की जीत के फैसले को अमान्य घोषित किया है, उससे डिस्ट्रिक्ट में योगेश मोहन गुप्ता के खिलाफ माहौल भी बना है । रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले से रोटरी में डिस्ट्रिक्ट की बहुत बदनामी हुई है, और इस बदनामी के लिए डिस्ट्रिक्ट के लोग योगेश मोहन गुप्ता को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । लोगों का मानना/कहना है कि चुनाव जीतने के लिए अनैतिक हथकंडे यूँ तो सभी उम्मीदवार अपनाते हैं, लेकिन योगेश मोहन गुप्ता ने तो इस मामले में सारी हदें पार कर दी हैं, इसलिए उन्हें सबक सिखाया जाना जरूरी है । समझा जाता है कि डिस्ट्रिक्ट में योगेश मोहन गुप्ता के खिलाफ बने इस माहौल का फायदा उठाने पर राकेश रस्तोगी और संजीव रस्तोगी का पूरा ध्यान है ।
सीओएल के दोबारा होने जा रहे चुनाव को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी कैसे करवायेंगे और ईमानदारी से करवाने के लिए कैसी व्यवस्था करेंगे/करवायेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा; किंतु उनके द्धारा स्टिंग ऑपरेशन करवाने वाली चर्चा ने संभावित उम्मीदवारों को जरूर सांसत में डाला हुआ है । यह देखना दिलचस्प होगा कि संजीव रस्तोगी की स्टिंग ऑपरेशन वाली चाल से बचने के लिए उम्मीदवार क्या चाल चलते हैं ?

Sunday, July 13, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में सीओएल के चुनावी नतीजे को अमान्य घोषित करने के फैसले से लगता है कि योगेश मोहन गुप्ता की कारस्तानियों को सुन-देख कर रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों तथा अन्य प्रमुख लोगों ने भी उनकी नकेल कसने का मन बना लिया है

मेरठ । योगेश मोहन गुप्ता ने वोटों की खरीद-फ़रोख्त के जरिये सीओएल का जो चुनाव जीता था, उसे रोटरी इंटरनेशनल ने अमान्य करार दिया है और दोबारा चुनाव कराने का फैसला सुनाया है । योगेश मोहन गुप्ता ने इस फैसले के लिए राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू को कोसा है । योगेश मोहन गुप्ता ने कुछेक लोगों के बीच कहा/बताया है कि उन्होंने चूँकि कभी भी राजा साबू की चमचागिरी नहीं की है, इसलिए राजा साबू उनसे खुन्नस रखते रहे हैं और राजा साबू ने ही मनमाने तरीके से उनकी जीत को रद्द करवाने का यह फैसला करवाया है । मजे की बात यह है कि सीओएल के चुनाव में योगेश मोहन गुप्ता की जीत के फैसले के खिलाफ रोटरी इंटरनेशनल में जब शिकायत दर्ज करवाई गई थी, तब योगेश मोहन गुप्ता कहा करते थे कि ललित मोहन गुप्ता दरअसल यशपाल दास, शेखर मेहता और मनोज देसाई जैसे लोगों पर भरोसा कर रहे हैं कि ये लोग उनकी शिकायत पर रोटरी इंटरनेशनल में फैसला करवा देंगे; ललित मोहन गुप्ता लेकिन यह नहीं जानते हैं कि रोटरी में इन लोगों के 'बाप' समझे जाने वाले राजा साबू तो मेरे साथ हैं और वह ऐसा कोई फैसला नहीं होने देंगे जिसमें मेरा नुकसान होता हो या मेरी बदनामी होती हो । कल तक राजा साबू के भरोसे अपने नुकसान और अपनी बदनामी के बचने की उम्मीद करने वाले योगेश मोहन गुप्ता अब लेकिन अपने नुकसान और अपनी बदनामी के लिए राजा साबू को ही कोस रहे हैं ।
वैसे तो यह योगेश मोहन गुप्ता का पुराना स्टाइल है कि पहले तो वह हर किसी को अपना खास बतायेंगे और लेकिन जब उनका काम बिगड़ जायेगा तो वह उसी को, जिसे वह अपना खास बता रहे थे, गाली देने लगेंगे । सीओएल के चुनाव के चक्कर में योगेश मोहन गुप्ता का यह स्टाइल जिस तरह बार-बार और जल्दी-जल्दी सामने आया उसने लोगों का खासा मनोरंजन ही किया है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि सीओएल के चुनाव को लेकर बनी ऑब्जर्वर्स की टीम के लिए योगेश मोहन गुप्ता ने अपनी तरफ से राकेश रस्तोगी का नाम दिया था, लेकिन फिर उन्हीं राकेश रस्तोगी के साथ उनकी गाली-गलौच भरी चिट्ठी-पत्री लोगों ने देखी-पढ़ी । पिछले रोटरी वर्ष में तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की मनमानियों को देखते/जानते हुए भी योगेश मोहन गुप्ता पहले तो 'सोते' रहे, लेकिन सीओएल के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद करीब चौथे महीने में उनकी नींद खुली और तब उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत की कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल ने सीओएल के चुनाव को लेकर जो टाइम टेबल बनाया, उसके पीछे उनकी सीओएल पद के दूसरे उम्मीदवार को फायदा पहुँचाने की बदनीयत काम रही है ।
मौजूदा रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी के साथ तो योगेश मोहन गुप्ता ने जो किया, वह और भी दिलचस्प है । संजीव रस्तोगी से उनके संबंध पहले हालाँकि अच्छे नहीं थे, लेकिन संजीव रस्तोगी के गवर्नर-काल में आगे-आगे रहने के लालच में उन्होंने संजीव रस्तोगी से संबंध सुधार लिए थे । संजीव रस्तोगी ने भी पुराने बैर को भूलकर उनसे हाथ मिला लिए थे और उन्हें एक महत्वपूर्ण पद दे दिया था । संजीव रस्तोगी के नजदीकियों ने हालाँकि उन्हें समझाया था कि योगेश मोहन गुप्ता एक अहसानफ़रामोश व्यक्ति हैं इसलिए उनके साथ ज्यादा मेलजोल न रखें, लेकिन संजीव रस्तोगी ने किसी की नहीं सुनी । संजीव रस्तोगी को इसका भुगतान तब भुगतना पड़ा जब सीओएल के चुनाव के संदर्भ में उनके क्लब - रोटरी क्लब मेरठ कैंट - ने ललित मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में जाने का फैसला किया । यह फैसला क्लब की जिस बोर्ड मीटिंग में हुआ था, उसमें संजीव रस्तोगी मौजूद नहीं थे - यह जानते हुए भी योगेश मोहन गुप्ता ने इस फैसले के लिए संजीव रस्तोगी को जिम्मेदार ठहराया और पैसे लेकर फैसला करने/करवाने का आरोप लगा कर क्लब को और संजीव रस्तोगी को बदनाम करना शुरू कर दिया । योगेश मोहन गुप्ता का यह भी एक स्टाइल है कि जिसे वह अपने साथ नहीं पाते हैं उसे वह दूसरे के हाथ 'बिका हुआ' घोषित कर देते हैं ।
किंतु अब वह खुद अपनी जीत को 'खरीदने' के आरोप में फँस गए हैं । सीओएल के उम्मीदवार के रूप में प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं से दबाव डलवा कर तथा पैसे देकर वोट जुटाने के आरोप योगेश मोहन गुप्ता पर जब तक डिस्ट्रिक्ट के लोग लगा रहे थे, तब तक मामला गंभीर नहीं था; किंतु रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय द्धारा इस आरोप को विश्वसनीय मान लेने और उनकी जीत के फैसले को अमान्य करार देने के साथ ही योगेश मोहन गुप्ता के लिए मामला गंभीर हो गया है । रोटरी इंटरनेशनल का फैसला योगेश मोहन गुप्ता को 'रंगेहाथ' पकड़वाने जैसा साबित हुआ है । योगेश मोहन गुप्ता के साथ समस्या यह हुई है कि कोई उनके साथ हमदर्दी तक नहीं दिखा रहा है, और हर किसी को जैसे लग रहा है कि 'पाप का घड़ा' आखिर कब तक बचा रहता - उसे एक न एक दिन तो फूटना ही था । सीओएल के चुनाव में जो लोग उनके साथ थे भी, उन्हें भी मुँह छिपाते हुए देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में योगेश मोहन गुप्ता ने ऐन मौके पर जिस तरह दिवाकर अग्रवाल को धोखा देकर दीपक बाबू की जीत का मार्ग प्रशस्त किया था - वह दीपक बाबू भी योगेश मोहन गुप्ता के प्रति हमदर्दी नहीं दिखा पा रहे हैं ।
योगेश मोहन गुप्ता के साथ जो हुआ है, उससे दीपक बाबू दरअसल डर भी गए हैं । उल्लेखनीय है कि जिन हथकंडों से योगेश मोहन गुप्ता ने जीत प्राप्त की थी, लगभग उन्हीं हथकंडों से जीत प्राप्त करने का आरोप दीपक बाबू पर भी है - और उनकी जीत के खिलाफ आरोप पत्र रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय में विचाराधीन है । दीपक बाबू और उनके शुभचिंतकों व समर्थकों को डर हुआ है कि जैसा न्याय योगेश मोहन गुप्ता के मामले में हुआ है, वैसा ही न्याय उनके मामले में अगर हो गया तो उनकी भी भैंस गई पानी में !
योगेश मोहन गुप्ता के साथ समस्या यह हुई है कि चुनावी जीत के लिए अपनाए गए उनके हथकंडों पर रोटरी इंटरनेशनल ने जो संज्ञान लिया है उससे उनके रोटरी जीवन पर विराम लगने का खतरा पैदा हो गया है । डिस्ट्रिक्ट में उन्होंने तमाम लोगों को अपना दुश्मन बना लिया है - जिन्हें नहीं भी बनाया है, वह उनकी बदनामी देख कर और उनके रवैये की बातें सुन-सुन कर उनसे दूर दूर रहने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं । तिकड़मों से सफल होने का योगेश मोहन गुप्ता के पास जो हुनर था - उसे रोटरी इंटरनेशनल ने 'छीन' लिया है । समझा जाता है कि योगेश मोहन गुप्ता की कारस्तानियों को सुन-देख कर रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों तथा अन्य प्रमुख लोगों ने भी उनकी नकेल कसने का मन बना लिया है । इस तरह योगेश मोहन गुप्ता दोनों तरफ से घिर गए हैं - बिना कोई गोरखधंधा किए डिस्ट्रिक्ट में उनके लिए सफल हो पाना मुश्किल है, और गोरखधंधे से पाई सफलता की शिकायत होने पर रोटरी इंटरनेशनल के लोग उनके साथ रियायत करने को तैयार नहीं हैं ।
तो क्या, जैसा कि लोगों को लग रहा है कि, योगेश मोहन गुप्ता के 'पापों का घड़ा' वास्तव में इतना भर गया है कि अब उसके फूटने का समय हो गया है - या योगेश मोहन गुप्ता अपने तिकड़मी हुनर से अभी उसे फूटने से बचा लेंगे ? यह देखना दिलचस्प होगा ।

Thursday, May 15, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी लड़ाई को जारी रखने की दीपक बाबू की 'जिद' के बीच वोटों की ख़रीद-फ़रोख्त के उनके फार्मूले ने दिवाकर अग्रवाल के मुकाबले हारी दिख रही बाजी को दीपक बाबू की झोली में ला दिया

मुरादाबाद । दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने के लिए जो फार्मूला बाकायदा घोषित किया था, वह अंततः कामयाब साबित हुआ । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में दीपक बाबू ने कोई संपर्क अभियान नहीं चलाया; अपनी तरफ से लोगों से संपर्क करना तो दूर की बात थी, लोगों ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो लोगों की कोशिश तक को भी उन्होंने कोई तवज्जो नहीं दी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार हमेशा इस ताक में रहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट का कोई आयोजन हो तो वह उसमें सबसे पहले पहुँचे और सबसे अंत तक उस आयोजन में उपस्थित दिखें ताकि वहाँ उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों से मिलने का मौका तो मिले ही, साथ ही लोगों को यह 'दिखाने' का अवसर भी मिले कि एक उम्मीदवार के रूप में वह कितने कंसर्न हैं और कितने सक्रिय हैं - लेकिन दीपक बाबू ने ऐसा कोई भी काम नहीं किया । डिस्ट्रिक्ट के कई आयोजनों में तो उन्होंने उपस्थित रहने तक की जरूरत नहीं समझी - डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में दर्ज होने वाली उनकी लंबी अनुपस्थिति के कारण कई बार तो लोगों ने उनकी उम्मीदवारी को लेकर भी संदेह करना शुरू कर दिया था । डिस्ट्रिक्ट के जिन कुछेक आयोजनों में दीपक बाबू उपस्थित भी हुए, वहाँ भी उन्होंने लोगों से मिलने-जुलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । उनके व्यवहार को देख कर लोगों ने - यहाँ तक कि कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तक ने मजाक में कहना शुरू कर दिया था कि दीपक बाबू ने तो अपने आप को गवर्नर मान लिया है और इसीलिए उम्मीदवार होने के बावजूद वह एक उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि चुने हुए गवर्नर की तरह व्यवहार कर रहे हैं ।
दीपक बाबू का 'कॉन्फिडेंस लेबल' देख कर उनके समर्थक और उनके नजदीकी तक हैरान थे और फुसफुसाहटों में एक-दूसरे से पूछते थे कि दीपक बाबू आखिर हैं किसके भरोसे ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल के प्रति जिस तरह के विरोध का रवैया अपनाया हुआ था, उससे हर किसी को यह तो महसूस हो रहा था कि दीपक बाबू को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल का भरोसा है और राकेश सिंघल ने दाँव भी चला था जिससे दीपक बाबू को बिना चुनाव लड़े ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जाना था । लेकिन राकेश सिंघल के हथकंडे भी फेल हो रहे थे । राकेश सिंघल के हथकंडे को सफल बनाने के लिए दीपक बाबू की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल में आधिकारिक रूप से शिकायत भी दर्ज करवाई गई, किंतु वहाँ से भी दीपक बाबू को कोई मदद नहीं मिली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल को रास्ते से हटाने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल द्धारा अपनाये गए हथकंडे फेल हो रहे थे, और रोटरी इंटरनेशनल से मदद पाने की उम्मीदें भी ध्वस्त हो रही थीं - लेकिन फिर भी दीपक बाबू का कॉन्फिडेंस लेबल खासा हाई दिख रहा था । उस सवाल का जबाव लेकिन किसी को नहीं मिल रहा था कि दीपक बाबू आखिर हैं किसके भरोसे ?
मजे की बात यह रही कि दीपक बाबू लोगों को बता रहे थे कि वह किसके भरोसे हैं । किंतु कोई भी उनके भरोसे पर भरोसा ही नहीं कर रहा था ।
दीपक बाबू लोगों को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने का फार्मूला बता रहे थे । उनका फार्मूला बड़ा सीधा था - वह लोगों को बता रहे थे कि जब चुनाव का समय आयेगा तब क्लब-अध्यक्षों को वह मोटी मोटी रकम ऑफर करेंगे और बदले में उनसे वोट पा लेंगे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जायेंगे । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों की ख़रीद-फ़रोख्त का यूँ तो पुराना इतिहास है, और कई जीतों में ख़रीद-फ़रोख्त की निर्णायक भूमिका देखी गई है; लेकिन सिर्फ - सिर्फ ख़रीद-फ़रोख्त के भरोसे चुनाव जीतने का भरोसा दीपक बाबू ही दिखा रहे थे । यही कारण था कि किसी को भी उनके इस फार्मूले के सफल होने का विश्वास नहीं था । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों की ख़रीद-फ़रोख्त की महत्ता से परिचित लोगों का भी मानना और कहना था कि सिर्फ ख़रीद-फ़रोख्त के भरोसे चुनाव जीतने की उम्मीद करना गले नहीं उतर रहा है ।
दीपक बाबू की चुनावी जीत ने लेकिन साबित कर दिया है कि उनका फार्मूला अचूक था और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का उनका 'अनुभव' आखिरकार उनके काम आया । दीपक बाबू की चुनावी जीत ने साबित कर दिया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पाने के लिए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच काम करने की, लोगों से संपर्क बनाने/रखने की, लोगों को तवज्जो देने की, विभिन्न मौकों पर उनके लिए सुविधाएँ जुटाने की कोई जरूरत नहीं है - चुनाव का जब समय आये तो वोट खरीदने निकल पड़ो : जीत तुम्हारी झोली में खुद-ब-खुद आ गिरेगी ।
बात लेकिन इतनी सीधी-सरल भी नहीं है । दीपक बाबू की जीत को सिर्फ ख़रीद-फ़रोख्त से मिली जीत मानना दीपक बाबू के साथ अन्याय करना भी होगा । दीपक बाबू की एक बात के लिए तो तारीफ की ही जानी चाहिए कि तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद वह मैदान में लगातार डटे रहे । चुनाव उन्होंने अपने 'तरीके' से लड़ा; उनकी तरकीबें लगातार फेल होती जा रही थीं और उनके समर्थकों के बीच ही सवाल उठ रहे थे कि दीपक बाबू आखिर क्यों अपनी फजीहत कराने पर तुले हुए हैं - लेकिन दीपक बाबू कभी भी मैदान छोड़ते हुए नहीं 'दिखे' । दीपक बाबू अपने जिस फार्मूले के भरोसे जीतने का दावा कर रहे थे, उनके उस दावे पर दूसरों को तो छोड़िये - खुद दीपक बाबू को भरोसा नहीं हो पा रहा था । अपने फार्मूले पर दीपक बाबू को यदि सचमुच पूरा भरोसा होता तो ठीक चुनावी प्रक्रिया के बीच में वह प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करवाने के लिए रोटरी इंटरनेशनल की और ऊँची 'अदालत' में तीन हजार डॉलर की मोटी फीस देकर शिकायत दर्ज नहीं करवाते । ठीक चुनावी प्रक्रिया के बीच में उन्होंने शिकायत दर्ज करवाई, इससे जाहिर है कि उन्हें भी अपने 'फार्मूले' के सफल होने को लेकर संदेह था । शिकायत दर्ज करवाने की उनकी कार्रवाई से केवल एक बात साबित होती है और वह यह कि चुनावी नतीजा प्रतिकूल आने के बाद भी वह लड़ाई को जारी रखने की तैयारी कर रहे थे । तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अपनी लड़ाई को जारी रखने की दीपक बाबू की इस 'जिद' को नोट किया जाना चाहिए और उन्हें मिली चुनावी जीत में उनकी इस 'जिद' की भूमिका को समझना/पहचानना चाहिए ।
दीपक बाबू की इस जिद ने दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी प्रक्रिया को खासा लंबा करने का काम किया, जिसने लगता है कि दिवाकर अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को थका दिया और जिसके चलते चुनाव के आख़िरी दिनों में होने वाले उलट-फेर को काबू में करने के लिए जरूरी तैयारी करने में वह चूक गए और जिसके नतीजे के रूप में जीती-जिताई समझी जा रही बाजी दिवाकर अग्रवाल अंततः दीपक बाबू से हार गए ।

Sunday, March 16, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने की दीपक बाबू की माँग को रोटरी इंटरनेशनल द्धारा ख़ारिज कर दिए जाने के बाद तो कॉन्करेंस जुटाने की दीपक बाबू की कोशिशों और उम्मीदों पर कुठाराघात ही हो गया है

मुरादाबाद । दीपक बाबू को अब रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने भी बता दिया है कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर उनकी जो शिकायतें हैं, उनमें किसी भी तरह का कोई तर्क-दम नहीं है । इसी के साथ, दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करवा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने का सपना देखने वाले दीपक बाबू की सारी तरकीबें धूल-धूसरित हो गईं हैं । दीपक बाबू के लिए इससे भी ज्यादा मुसीबत की बात यह हुई है कि रोटरी इंटरनेशनल का फैसला ऐसे समय आया है, जबकि रोटरी इंटरनेशनल में की गई अपनी शिकायत का वास्ता देकर वह अपनी उम्मीदवारी को मान्य करवाने के लिए आवश्यक क्लब्स के कॉन्करेंस जुटाने की कोशिशों में लगे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि कॉन्करेंस के लिए क्लब्स के पदाधिकारियों को पटाने के उद्देश्य से वह बराबर यह तर्क दे रहे थे कि रोटरी इंटरनेशनल उनकी शिकायत पर कार्रवाई करते हुए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त कर देगा, इसलिए क्लब्स के पदाधिकारियों को उनके साथ रहने में ही फायदा है । रोटरी इंटरनेशनल का नाम लेकर दीपक बाबू लोगों को दरअसल उल्लू बनाने का ही प्रयास कर रहे थे - अन्यथा वह अच्छी तरह से जानते/समझते थे कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी के खिलाफ उनकी जो शिकायत है उसमें कोई तर्क-दम नहीं है; यदि सचमुच में होता तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ही दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त कर देते । गौर करने वाला तथ्य यह है कि दीपक बाबू ने दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने हेतु अपना शिकायती पत्र पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को ही सौंपा था, और राकेश सिंघल ने उनकी आपत्तियों के बारे में रोटरी के तमाम बड़े नेताओं से पूछताछ की थी; लेकिन सभी ने राकेश सिंघल को साफ साफ चेता दिया था कि दीपक बाबू की शिकायत में जो तर्क-तथ्य दिए गए हैं उनके आधार पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त नहीं किया जा सकता है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल इसी कारण से दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के यहाँ दीपक बाबू की जब दाल नहीं गली तब वह अपनी शिकायत को लेकर रोटरी इंटरनेशनल में जा पहुँचे । रोटरी इंटरनेशनल में अपनी शिकायत को ले जाते समय दीपक बाबू को अच्छी तरह पता था कि रोटरी इंटरनेशनल भी उनकी शिकायत के आधार पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त नहीं करेगा, लेकिन फिर भी वह अपनी शिकायत को लेकर रोटरी इंटरनेशनल में गए तो सिर्फ इसलिए ताकि इसे दिखा/बता कर वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों को भ्रमित कर सकें और लोगों को धोखे में रखकर अपना उल्लू सीधा कर सकें । उनकी तरकीब काम तो नहीं कर रही थी, लेकिन फिर भी वह लोगों को उल्लू बनाने के काम में जुटे हुए थे । अभी वह कॉन्करेंस जुटाने हेतु जिन लोगों से मिले उन्हें वह यही बता रहे थे कि रोटरी इंटरनेशनल में उन्होंने जो शिकायत की है, उसका फैसला बस आने ही वाला है और उस फैसले में दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने का ही फैसला होगा । रोटरी इंटरनेशनल के फैसले ने लेकिन उनके सपनों पर पानी फेर दिया है ।
रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने दीपक बाबू को सूचित किया है कि उनकी शिकायत में दिए गए तथ्यों की पड़ताल हेतु तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई थी, जिसने बड़ी बारीकी से तथ्यों को देखा और उनकी व्याख्या की । अपनी पड़ताल और अपनी व्याख्या में उक्त कमेटी ने पाया कि ऐसा कोई कारण प्रस्तुत तथ्यों में नहीं मिलता है जिसके आधार पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त किया जाये । रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय से मिले इस तो-टूक जबाव से साबित हो गया है कि दीपक बाबू जिस भरोसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने की तिकड़म लगा रहे थे, वह अपनी प्रकृति और अपनी सोच में कितना नकारात्मक और फर्जी था ।
मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में दीपक बाबू ने लोगों से व्यवहार ही नहीं किया । लोगों की एक आम शिकायत रही है कि उम्मीदवार होने के बावजूद उन्होंने लोगों से कभी भी सीधे मुँह बात तक नहीं की; कई मौकों पर तो उन्होंने बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में व्यवहार किया । कुछेक पूर्व गवर्नर्स तक ने यह महसूस किया और इस बात का जिक्र भी किया कि दीपक बाबू तो अपने आप को गवर्नर समझ रहे हैं । दिवाकर अग्रवाल के प्रति डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की खुन्नस को अपने लिए वरदान समझने वाले दीपक बाबू को उम्मीद रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल किसी भी कीमत पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को मान्य नहीं होने देंगे, और वह बिना कुछ किए-धरे ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी हो जायेंगे । इस चक्कर में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने अपनी खासी किरकिरी करवाई और हुआ कुछ नहीं । दीपक बाबू सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के भरोसे रहे और उन्होंने लोगों की कोई परवाह नहीं की । बदले में लोगों ने भी उनकी कोई परवाह नहीं की । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की मदद भी दीपक बाबू के काम नहीं आई और नोमीनेटिंग कमेटी में भी लोगों ने दीपक बाबू को नकार दिया ।
दीपक बाबू ने लेकिन इस सब से कोई सबक नहीं सीखा है । अभी भी वह दावा कर रहे हैं कि उनकी उम्मीदवारी यदि मान्य हो जाती है तो वह वोट तो अध्यक्षों को पैसे देकर खरीद लेंगे । वोट खरीद कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने का सपना देख रहे और दावा कर रहे दीपक बाबू को लेकिन अभी तो कॉन्करेंस जुटाने के लाले पड़ रहे हैं । रोटरी इंटरनेशनल द्धारा उनकी शिकायत रद्द कर देने के बाद तो कॉन्करेंस जुटाने की उनकी कोशिशों और उम्मीदों पर कुठाराघात ही हो गया है । लोगों के सामने दीपक बाबू की पोल अब पूरी तरह खुल गई है और उनके नजदीकियों व समर्थकों ने भी मानना और कहना शुरू कर दिया है कि दिवाकर अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने से अब किसी भी तरह से नहीं रोका जा सकता है ।

Saturday, March 1, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में दीपक बाबू की शिकायत है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल रिश्वतकांड में सीबीआई की गिरफ्त में फँसे अपने छोटे दामाद के चक्कर में होने के कारण उनकी ठीक से मदद नहीं कर पा रहे हैं

मुरादाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने दीपक बाबू को कॉन्करेंस जुटाने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय देने के लिए ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी प्रक्रिया के शिड्यूल को तय करने से बचने की तरकीब लगाई है क्या ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर डिस्ट्रिक्ट 3100 में मजेदार सीन बना हुआ है - नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन हो चुका है । अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने का काम भी हो चुका है । लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने अभी तक भी यह घोषित नहीं किया है कि चेलैंज को मान्यता देने के लिए आवश्यक कॉन्करेंस कब तक जमा कराई जानी हैं । उल्लेखनीय है कि अधिकृत उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल चुने गए हैं और उनकी उम्मीदवारी को चेलैंज करने का काम दीपक बाबू ने किया है । रोटरी इंटरनेशनल के जो नियम-कानून हैं और प्रायः जो होता है - उसके अनुसार, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को इस समय तक यह सुनिश्चित कर देना चाहिए था और घोषित कर देना चाहिए था कि दीपक बाबू को अपने चेलैंज को मान्य कराने के लिए आवश्यक कॉन्करेंस कब तक जमा करानी हैं । राकेश सिंघल ने अभी तक लेकिन ऐसा नहीं किया है । डिस्ट्रिक्ट में चर्चा है कि दीपक बाबू को क्लब्स से आवश्यक कॉन्करेंस मिल नहीं रही हैं; इसीलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय देना चाहते हैं जिससे कि वह कॉन्करेंस जुटाने के लिए और प्रयास कर लें और इसी कारण से राकेश सिंघल कॉन्करेंस जमा करने के लिए समय-सीमा तय और घोषित नहीं कर रहे हैं ।
राकेश सिंघल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक बाबू की मदद करने के चक्कर में पहले ही भारी फजीहत और किरकिरी का सामना करना पड़ा है और बार-बार मुहँकी खानी पड़ी है, लेकिन लगता है कि पीछे उन्हें जिन शर्मनाक हालातों से गुजरना पड़ा है - उससे उन्होंने कोई सबक नहीं लिया है ।
राकेश सिंघल ने पहले दीपक बाबू की मदद करने के उद्देश्य से दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को ही निरस्त करने की चाल चली थी, लेकिन अपनी उस चाल के चलते खुद उन्हें ही भारी फजीहत का शिकार होना पड़ा । डिस्ट्रिक्ट और डिस्ट्रिक्ट से बाहर अपनी चौतरफा किरकिरी करा लेने के बाद राकेश सिंघल को अंततः दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा था । इसमें मुहँकी खाने के बाद, दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के फैसले को दीपक बाबू द्धारा रोटरी इंटरनेशनल में चुनौती देने को मुद्दा बना करा राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने के लिए होने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की बैठक को स्थगित करने की तिकड़म लगाई - लेकिन उसमें भी उनकी दाल नहीं गली । इसके बाद, राकेश सिंघल ने कोशिश की कि नोमीनेटिंग कमेटी दीपक बाबू को अधिकृत उम्मीदवार चुन ले और या किसी को न चुने, ताकि चुनाव का मामला खुला बना रहे । लेकिन राकेश सिंघल की यह कोशिश भी विफल रही ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने के लिए तैयार हुई नोमीनेटिंग कमेटी ने राकेश सिंघल की सारी कोशिशों को धता बताते हुए दिवाकर अग्रवाल को अधिकृत उम्मीदवार चुन लिया । ऐसे में, राकेश सिंघल के पास दिवाकर अग्रवाल की राह में रोड़ा अटकाने के लिए एक ही तरीका बचा और वह यह कि वह दीपक बाबू से चेलैंज करवाएँ । दीपक बाबू के कई नजदीकियों ने उन्हें समझाया कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनके लिए किसी भी तरह से कोई समर्थन नहीं है, इसलिए चेलैंज-वेलैंज के चक्कर में न पड़ो; लेकिन राकेश सिंघल ने उन्हें आश्वस्त किया कि चुनाव चूँकि पोस्टल बैलेट से होगा, जिसमें क्लब अध्यक्ष को पैसे देकर वोट खरीद लेने का विकल्प होगा और उस काम में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मैं भी तुम्हारी मदद करूँगा - इसलिए चेलैंज करो । दीपक बाबू को राकेश सिंघल के इस 'खेल' में दम लगा और उन्होंने चेलैंज कर दिया । दीपक बाबू और राकेश सिंघल की जोड़ी के लिए लेकिन यह काम भी मुश्किल हो गया है । दीपक बाबू ने चेलैंज तो कर दिया है, लेकिन चेलैंज को मान्य कराने के लिए आवश्यक क्लब्स का समर्थन जुटाने में उन्हें सफलता नहीं मिल रही है । कई क्लब्स से दीपक बाबू को टका-सा जबाव सुनने को मिला है कि उम्मीदवार के रूप में आपने कभी बात तक भी नहीं की, तो अब समर्थन की उम्मीद कैसे और क्यों कर रहे हैं ? दीपक बाबू को चूँकि पर्याप्त क्लब्स से कॉन्करेंस नहीं मिल रही हैं इसलिए ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल कॉन्करेंस जमा कराने की समय-सीमा तय और घोषित नहीं कर रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि दीपक बाबू के कुछेक नजदीकियों को ही अब लगने लगा है कि राकेश सिंघल सचमुच में दीपक बाबू के लिए कुछ कर तो पा नहीं रहे हैं और नाहक ही दीपक बाबू को इस्तेमाल करते हुए झगड़े को बनाये हुए हैं । दीपक बाबू के नजदीकियों को हालाँकि यह भी लगता है कि राकेश सिंघल दरअसल रिश्वतकांड में सीबीआई की गिरफ्त में फँसे अपने छोटे दामाद योगेंद्र मित्तल के चक्कर में परेशान होने के कारण डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों के लिए ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं, और इसलिए भी दीपक बाबू की मदद नहीं कर पा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि राकेश सिंघल के छोटे दामाद योगेंद्र मित्तल दिल्ली में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर हैं जो 60 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने के मामले में सीबीआई की गिरफ्त में हैं । दामाद के आईआरएस अफसर होने का जो तथ्य अभी तक राकेश सिंघल के लिए गर्व का विषय था, उसी दामाद के रिश्वतकांड में फँसने से राकेश सिंघल के लिए शर्म की स्थितियाँ बनीं । इसका असर राकेश सिंघल की सामाजिक सक्रियता पर पड़ा । राकेश सिंघल ने मुरादाबाद में कम रहना शुरू किया है । जब भी कोई उन्हें फोन करता, राकेश सिंघल से उसे यही सुनने को मिलता कि वह बाहर हैं । शर्म के चलते ही राकेश सिंघल को डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख आयोजनों में भी अपनी उपस्थिति को सीमित करना पड़ा है । दीपक बाबू के नजदीकियों का कहना है कि राकेश सिंघल इसीलिए दीपक बाबू की कुछ मदद नहीं कर पा रहे हैं । दीपक बाबू के नजदीकियों का कहना है कि ऐसे में राकेश सिंघल को दीपक बाबू को सब्जबाग नहीं दिखाने चाहिए और स्वीकार कर लेना चाहिए कि दीपक बाबू का कुछ नहीं हो सकता है ।
राकेश सिंघल ने दीपक बाबू के चक्कर में डिस्ट्रिक्ट में और रोटरी में अपनी जो फजीहत कराई है - और उसके बाद भी दीपक बाबू के लिए कुछ हासिल नहीं कर पाएँ हैं, उससे सबक लेने का सुझाव देते हुए राकेश सिंघल के शुभचिंतकों का कहना है कि राकेश सिंघल को हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए : अपने दामाद के कारण वह वैसे ही परेशानी में हैं और लोगों को फेस करने से बचते/छिपते फिर रहे हैं, ऐसे में उन्होंने दीपक बाबू को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने का ठेका और ले लिया है । इस 'ठेके' के चलते अभी तक तो उन्हें सिर्फ बदनामी ही हाथ लगी है - आगे भी इसके अलावा कुछ और उन्हें मिल सकेगा, इसकी संभावना नहीं है । ऐसे में, शुभचिंतकों की राकेश सिंघल को सलाह है कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियों का नियमानुसार पालन करें और अपनी मनमानियाँ थोपने की कोशिश न करें । अपने ही शुभचिंतकों की इस सलाह को राकेश सिंघल कैसे लेंगे, यह देखने की बात होगी ।

Wednesday, February 5, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने के लिए होने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की बैठक को स्थगित करने की दीपक बाबू की माँग को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल मानेंगे क्या ?

मुरादाबाद । दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने का एक बड़ा आसान-सा तरीका अपनाया है - उनका तरीका है कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों से मिलने-जुलने जाने में समय, एनर्जी और पैसा खर्च करने की कोई जरूरत नहीं है; उनका तरीका है कि प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार की रोटरी इंटरनेशनल में आधिकारिक शिकायत करो और फिर रोटरी इंटरनेशनल का फैसला आये बिना लोगों को फोन कर कर के यह बताओ कि रोटरी इंटरनेशनल प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार की उम्मीदवारी को स्वीकार ही नहीं करेगा और इसलिए उसे जितवाने का कोई फायदा नहीं होगा - इसलिए मुझे विजयी बनाओ । दीपक बाबू ने इसी तरीके को अपना कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने की तैयारी की है । मजे की बात है कि मौजूदा रोटरी वर्ष में दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में कोई संपर्क अभियान नहीं चलाया; लोगों से मिलने जाना तो दूर की बात, उन्होंने फोन पर भी लोगों से बात करने की जरूरत नहीं समझी । यहाँ तक की जिन कुछेक डिस्ट्रिक्ट आयोजनों में वह उपस्थित भी हुए, वहाँ भी अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु लोगों से मिलने/बात करने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी । दीपक बाबू के इसी व्यवहार को देख कर कई लोगों ने निष्कर्ष निकाला और कहा भी कि दीपक बाबू तो अपने आप को गवर्नर मान रहे हैं ।
दीपक बाबू आखिर किस भरोसे अपने आप को गवर्नर मान बैठे हैं ? उन्हें यह विश्वास क्यों है कि डिस्ट्रिक्ट के लोग उन दिवाकर अग्रवाल को वोट नहीं करेंगे, जो दिवाकर अग्रवाल पिछले कई महीनों से लोगों से लगातार मिलजुल रहे हैं और लोगों के बीच अपनी साख और पैठ बनाने की कोशिश करते रहे हैं । पिछले दिनों दिवाकर अग्रवाल के करीब नब्बे वर्षीय पिता को जब तबीयत ख़राब होने के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था - तब भी, उनकी उचित देखभाल की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ दिवाकर अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ भी संपर्क बनाये रखने के प्रयत्न किये थे । एक उम्मीदवार को जो कुछ भी करना होता है - दिवाकर अग्रवाल ने वह सब करने का हर संभव प्रयास किया है । लेकिन दीपक बाबू ने एक उम्मीदवार के रूप में कुछ भी - सचमुच, कुछ भी नहीं किया । इसके बावजूद दीपक बाबू को विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट के लोग - नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य - दिवाकर अग्रवाल की बजाये उन्हें वोट करेंगे । यह विश्वास उन्हें क्यों है ?
दीपक बाबू इसका बड़ा मजेदार-सा कारण लोगों को बता रहे हैं । अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते लोगों से संपर्क करने से लगातार बचते रहे दीपक बाबू अब लोगों को
फोन कर कर के बता रहे हैं कि उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल में दिवाकर अग्रवाल की शिकायत कर दी है और अब यदि दिवाकर अग्रवाल जीत भी जाते हैं तो रोटरी इंटरनेशनल उन्हें गवर्नर नहीं मानेगा । दीपक बाबू के पास हालाँकि इस बात का कोई जबाव नहीं है कि उन्हें यह कैसे पता है कि रोटरी इंटरनेशनल दिवाकर अग्रवाल को गवर्नर नहीं मानेगा । इसीलिए यह पूछे जाने पर वह दायें'-बायें की बातें करने लगते हैं । दीपक बाबू के पास इस बात का भी कोई जबाव नहीं है कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त कराने के लिए उन्होंने जिस बात को आधार बनाया है, उस आधार को रोटरी इंटरनेशनल के अधिकारी चूँकि पहले ही ख़ारिज कर चुके हैं, इसलिए इसमें नई बात क्या है ? उल्लेखनीय है कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को ख़ारिज करने के लिए दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को जो शिकायत की थी, उसे लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल पहले ही रोटरी इंटरनेशनल के प्रायः सभी बड़े अधिकारीयों के साथ बात कर चुके हैं; और चूँकि किसी ने भी उक्त आधार को पर्याप्त नहीं माना, इसलिए राकेश सिंघल ने दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा की । जाहिर है कि दीपक बाबू लोगों को सिर्फ बहका रहे हैं ।
दीपक बाबू ने यह दावा करके हालाँकि डिस्ट्रिक्ट के चुनावी माहौल में गर्मी जरूर पैदा कर दी है कि रोटरी इंटरनेशनल में उनके द्धारा की गई शिकायत के आधार पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार का चुनाव करने के लिए होने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की बैठक को स्थगित कर देंगे । रोटरी के नियम-कानून की जानकारी रखने वाले लोगों का कहना यद्यपि यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को ऐसा कुछ करने का अधिकार ही नहीं है और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को पहले से ही तय कार्यक्रम के अनुसार नोमीनेटिंग कमेटी की बैठक होने देनी है और उस बैठक में अधिकृत उम्मीदवार का फैसला होने देना है । दीपक बाबू लेकिन फिर भी लगातार दावा किये जा रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वही करेंगे, जैसा वह कह रहे हैं । दीपक बाबू ने इस बारे में एक तर्क भी दिया है । उन्होंने बताया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के एक नजदीकी रिश्तेदार इनकम टैक्स विभाग की जाँच-पड़ताल में फँसे हुए हैं, चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के नाते दीपक बाबू अपने संपर्कों से उस मामले में राकेश सिंघल की मदद कर रहे हैं, इसलिए उस मदद के बदले में राकेश सिंघल रोटरी में उनकी मदद करेंगे । यह अब अगले तीन-चार दिन में पता चलेगा कि दीपक बाबू के इस दावे में कितना दम है ।
दीपक बाबू को लेकिन अपने दावों को लेकर शायद खुद भी ज्यादा भरोसा नहीं है । इसीलिये तमाम झूठों और तिकड़मों के बावजूद वह यह भी कहते/बताते जा रहे हैं कि उन्हें भी यह पता है कि चुनाव में वह जीतेंगे तो नहीं ही; ऐसे में वह तो सिर्फ दिवाकर अग्रवाल की जीत को मुश्किल बनाने पर ही ध्यान दे रहे हैं । दीपक बाबू ने अपने नजदीकियों से कहा है कि उन्हें भी पता है कि जीतेगा तो दिवाकर ही, लेकिन वह दिवाकर अग्रवाल और उनके समर्थकों के सामने तरह-तरह की परेशानी तो खड़ी कर ही सकते हैं - और वह यही कर भी रहे हैं । इससे लेकिन रोटरी का और डिस्ट्रिक्ट का जो नाम ख़राब हो रहा है - दीपक बाबू को लगता है कि उसकी लेकिन कोई परवाह नहीं है । दीपक बाबू की इस नकारात्मक सोच और कार्रवाई पर डिस्ट्रिक्ट के आम और खास लोग किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं - यह देखने की बात होगी ।

Sunday, January 5, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को चौतरफा बदनामी और फजीहत के बाद अंततः डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा करनी ही पड़ी

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने अंततः वह फैसला सुना ही दिया, जिसे सुनाने से इंकार करने के कारण पिछले करीब दो महीने से उनकी भारी फजीहत और छीछालेदर हो रही थी । बेचारे राकेश सिंघल - अभी तक लोग उनकी इस बात के लिए आलोचना कर रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए आये नामांकनों की वैधता पर वह कोई फैसला नहीं ले रहे हैं; लेकिन अब जब उन्होंने फैसला सुना दिया है तो लोग यह कहते हुए उन्हें निशाना बना रहे हैं कि उन्हें यदि यही फैसला करना था तो फिर इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी ? राकेश सिंघल ने जो किया, उसे व्याख्यायित करने के लिए कुछ लोगों ने एक पुरानी कविता को याद किया - ' खाया/पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना'; कुछ गर्म दिमाग और बदतमीज स्वभाव वाले लोगों ने 'जूते भी खाये, और प्याज भी खाया' वाला मुहावरा भी हवा में उछाला - लेकिन अधिकतर लोगों ने माना कि 'अंत भला तो सब भला ।' ऐसे लोगों का मानना और कहना रहा कि राकेश सिंघल को अंततः सद्बुद्धि आई, जिसके चलते उन्होंने झुकना स्वीकार किया और उनकी तथा डिस्ट्रिक्ट की और ज्यादा बदनामी होने से बच गई ।
हमारे यहाँ माना/कहा भी जाता है कि सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहा जाता है ।
इस आधार पर लेकिन कई लोग अभी भी राकेश सिंघल को माफ़ करने के मूड में नहीं हैं । उनका तर्क है कि राकेश सिंघल कुछ भूले नहीं थे, उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक एक योजना बनाई थी; और वह पश्चाताप करते हुए लौटे नहीं हैं, वह तब लौटे हैं जब लौटने के लिए मजबूर हुए हैं ।
राकेश सिंघल की षड्यंत्रपूर्ण योजना में अपना फायदा देख रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक उम्मीदवार दीपक बाबू और उनके समर्थकों के लिए आश्चर्य की बात यह रही कि अभी पाँच-छह दिन पहले तक ताल ठोक रहे और 'देख लेंगे' 'निपट लेंगे' जैसे दावे कर रहे राकेश सिंघल ने अचानक से पलटी क्यों मार ली ? उल्लेखनीय है कि 29 दिसंबर को होने वाली कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग को ऐन मौके पर स्थगित करके राकेश सिंघल ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वह 'अपने' फैसले में कॉलिज और गवर्नर्स की भी नहीं सुनेंगे । 31 दिसंबर को राकेश सिंघल के घर पर संजीव रस्तोगी, सुनील गुप्ता, ब्रज भूषण तथा कुछेक अन्य लोगों की उपस्थिति में हुई अनौपचारिक मुलाकात में भी काफी गर्मागर्मी हुई थी, जिसमें संजीव रस्तोगी को यहाँ तक धमकाया गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मुरादाबाद में वह कैसे घुस पायेंगे । यहीं राकेश सिंघल ने एक बार फिर यह घोषणा की कि पाँच जनवरी को मेरठ में होने वाली संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग में वह शामिल नहीं होंगे । इससे लगा था कि राकेश सिंघल पूरी तरह से टकराव के मूड में हैं । लेकिन उसके तुरंत बाद ही घटनाचक्र तेजी से घूमा और फिर राकेश सिंघल को जमीन पर आने में देर नहीं लगी ।
टकराव का मूड दिखाने के तुरंत बाद ही राकेश सिंघल को पहला झटका तब लगा जब रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से उन्हें साफ जबाव मिल गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में लिए गए उनके फैसले को तभी स्वीकार किया जायेगा जब वह कॉलिज ऑफ गवर्नर्स द्धारा अनुमोदित होगा । इसके साथ ही राकेश सिंघल को पता चला कि उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के कानों तक भी उनकी कारस्तानियों के किस्से पहुँच गए हैं और वह उनके किये-धरे से नाराज हो रहे हैं । इसके अलावा, राकेश सिंघल के सामने यह स्पष्ट होता ही जा रहा था कि डिस्ट्रिक्ट में उन्होंने जो झगड़ा पैदा किया है उसके चलते उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस का कबाड़ा होना निश्चित ही है । इन सब बातों से राकेश सिंघल ने अपने आप को चारों तरफ से घिरा हुआ पाया और फिर उनके तेवरों ने ढीले होने में समय नहीं लिया ।
राकेश सिंघल ने तुरंत स्थितियों को सँभालने का ऑपरेशन शुरू किया और अपने लिए सम्मानजनक वापसी का एक फॉर्मूला तैयार किया । मुजफ्फरनगर में सरेआम उनकी जो फजीहत हुई थी, उसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराकर उन्होंने पहले दिवाकर अग्रवाल से माफी मँगवाने की शर्त रखी । पाँच जनवरी को मेरठ में होने वाली संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग के लिए राकेश सिंघल ने एक पटकथा तैयार की जिसके अनुसार पहले दिवाकर अग्रवाल द्धारा माफी माँगने का कार्यक्रम संपन्न होना था और फिर राकेश सिंघल को उनकी उम्मीदवारी को मान्यता देने की घोषणा करनी थी । दिवाकर अग्रवाल ने लेकिन माफी मॉँगने से इंकार कर दिया । उनका कहना रहा कि मुजफ्फरनगर में जो कुछ भी हुआ, उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी - जो कुछ भी हुआ वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के गुस्से का इजहार था, उसके लिए वह माफी क्यों माँगे । राकेश सिंघल ने तब सुझाव दिया कि माफी न सही, दिवाकर अग्रवाल खेद तो प्रकट करें ताकि उनके लिए सम्मानजनक वापसी का मौका बन सके । डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों के हस्तक्षेप के बाद फार्मूला यही बना कि दिवाकर अग्रवाल खेद व्यक्त करेंगे और फिर राकेश सिंघल उनकी उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा करेंगे ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग में पहले से तैयार पटकथा को क्रियान्वित करने का माहौल बनाया गया - दिवाकर अग्रवाल ने बड़ी होशियारी से तैयार किये गए बयान को पढ़ा जिसमें राकेश सिंघल के घावों पर मलहम लगाने की कोशिश की गई थी । उसके बाद राकेश सिंघल को अपने हिस्से की भूमिका निभानी थी - 'चोर चोरी से जाये, हेराफेरी से न जाये' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए राकेश सिंघल ने लेकिन इस मौके पर भी शरारत करने की कोशिश की । दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को सीधे-सीधे स्वीकार करने की बजाये उन्होंने इधर-उधर की बातें करके निकलने की कोशिश की । उनके इस रवैये पर माहौल गर्म होना शुरू हो गया ।
राकेश सिंघल को लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा बचा नहीं है - सो, चारों तरफ से घिर जाने के बाद राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा अंततः कर ही दी । 

Tuesday, December 24, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की फजीहत में दीपक बाबू और उनके नजदीकियों को मजा आ रहा है और खुशी मिल रही है

मुरादाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की हो रही फजीहत से डिस्ट्रिक्ट 3100 में एक व्यक्ति को बड़ी खुशी हो रही है, क्योंकि राकेश सिंघल की फजीहत में उन्हें अपने लिए बड़ा फायदा होता दिख रहा है । वह व्यक्ति हैं दीपक बाबू - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार दीपक बाबू । दीपक बाबू की खुशी का कारण उनके समर्थक ही बता रहे हैं, जिनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक बाबू को यदि दिवाकर अग्रवाल से चुनाव लड़ना पड़ता तो उनके लिए मुश्किल होती और दिवाकर अग्रवाल से उन्हें पराजय का ही सामना करना पड़ता; लेकिन जो हालात हैं उसमें दिवाकर अग्रवाल से लड़ने का जिम्मा चूँकि राकेश सिंघल ने खुद ही ले लिया है तो अब दीपक बाबू को कुछ करने की जरूरत ही नहीं हैं - और कुछ न करते हुए भी वह पूरी तरह आश्वस्त हो सकते हैं । राकेश सिंघल की उस घोषणा के बाद से तो दीपक बाबू पूरी तरह आश्वस्त हो गए हैं जिसमें राकेश सिंघल ने कहा है कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं और वह जो चाहेंगे, वह करेंगे । दीपक बाबू अच्छी तरह जान/समझ रहे हैं कि राकेश सिंघल किसी भी कीमत पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को मान्य नहीं करेंगे और ऐसे में वह बिना कुछ किये-धरे ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जायेंगे ।
मुजफ्फरनगर में हुए हल्ले-हंगामे के बाद से तो दीपक बाबू ने अपने आप को वर्ष 2016-17 का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मानना/समझना भी शुरू कर दिया है । दीपक बाबू के खुश होने और आश्वस्त होने का कारण भी है : राकेश सिंघल मानते हैं और कहते भी हैं कि डिस्ट्रिक्ट में उनके खिलाफ जो बबाल हो रहा है वह दिवाकर अग्रवाल के समर्थक कर रहे हैं । मुजफ्फरनगर में हुए हल्ले-हंगामे का सारा ठीकरा उन्होंने दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों के सिर ही फोड़ा है । राकेश सिंघल की बात कुछ हद तक सही भी है - लेकिन पूरा सच यह है कि डिस्ट्रिक्ट के बहुत से लोग जो दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थक नहीं होने के बावजूद राकेश सिंघल के रवैये के खिलाफ हैं । राकेश सिंघल ने अपने व्यवहार और अपने रवैये से प्रायः हर किसी को नाराज किया हुआ है । उनसे नाराज लोगों के अपने अपने कारण हैं । इसी वजह से राकेश सिंघल डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग पड़े हुए हैं । अपने व्यवहार और अपने रवैये से राकेश सिंघल डिस्ट्रिक्ट के उन प्रमुख लोगों को भी अपने साथ नहीं जोड़ पा रहे हैं जिन्हें दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी से कोई मतलब नहीं है ।
राकेश सिंघल की बदकिस्मती यह है कि जिन दीपक बाबू को फायदा पहुँचाने के लिए उन्होंने आफत और बदनामी मोल ली है, उन दीपक बाबू और उनके समर्थकों ने भी राकेश सिंघल से किनारा कर लिया है । मुजफ्फरनगर का कार्यक्रम एक तरह से डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन डॉक्टर पल्लव अग्रवाल का कार्यक्रम था, जो दीपक बाबू के सबसे बड़े समर्थक के रूप में पहचाने जाते हैं । उक्त कार्यक्रम में जब राकेश सिंघल लोगों के गुस्से और विरोध का शिकार होना शुरू हुए थे तब डॉक्टर पल्लव अग्रवाल मंच पर राकेश सिंघल के पास में ही खड़े हुए थे, लेकिन जैसे ही मामला बढ़ा - डॉक्टर पल्लव अग्रवाल चुपचाप सरक कर किनारे हो गए और तमाशा देखने लगे । उस हल्ले-हंगामे को देख कर दीपक बाबू की तो मानों बाछें खिल गई थीं - मंच पर राकेश सिंघल मुसीबत में फँसे थे, लेकिन दीपक बाबू उनकी मुसीबत में अपने लिए गवर्नर की कुर्सी को पक्का होता हुआ 'देख' रहे थे । कार्यक्रम-स्थल पर शोर मचा हुआ था, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल मुसीबत में फँसे हुए थे और अकेले थे - लेकिन दीपक बाबू पीछे खड़े होकर वर्ष 2016-17 की डिस्ट्रिक्ट टीम 'बना' रहे थे । अपने आसपास उन्हें जो कोई राकेश सिंघल के खिलाफ गुस्सा दिखाता हुआ मिल/दिख रहा था, उसे वह नाम लेकर संबोधित कर रहे थे - इतना गुस्सा क्यों हों, डिस्ट्रिक्ट में साथ मिल कर काम करेंगे । दीपक बाबू की तरफ से यह इशारा था कि गुस्सा छोड़ों और उनकी डिस्ट्रिक्ट टीम के लिए अपना नाम लिखवाओ ।
मुजफ्फरनगर में मचे हाय-हल्ले के बाद दीपक बाबू जिन लोगों से भी मिले हैं, उनमें से जिनसे भी इन पंक्तियों के लेखक की बात हो सकी है उन सभी ने इस बात को खास तौर से रेखांकित किया कि दीपक बाबू ने तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की तरह बात/व्यवहार करना शुरू कर दिया है । कुछेक पूर्व गवर्नर तक ने दीपक बाबू के तेवरों में आये बदलाव को महसूस किया और बताया कि दीपक बाबू तो अपने आप को गवर्नर मानने लगे हैं । रोटरी के इतिहास में शायद यह पहला मौका होगा जबकि एक संभावित उम्मीदवार की उम्मीदवारी अधिकृत रूप से अभी घोषित भी नहीं हुई है, लेकिन वह अपने आप को विजेता न सिर्फ मानने लगा है, बल्कि विजेता की तरफ बात/व्यवहार भी करने लगा है ।
दीपक बाबू को यह हौंसला राकेश सिंघल के रवैये से मिला है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने जिन नियम/कानून का हवाला देकर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को संदेह के घेरे में ला दिया है, उन्हीं नियम/कानून के तहत दीपक बाबू की उम्मीदवारी भी निरस्त होती है - इसे लेकर बाकायदा शिकायत भी दर्ज करवाई गई है । दीपक बाबू को लेकिन भरोसा है कि राकेश सिंघल उनकी उम्मीदवारी को लेकर हुई शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं करेंगे और दिवाकर अग्रवाल को छोड़ेंगे नहीं ।
मजे की बात है कि दीपक बाबू ने इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन बनाने/जुटाने हेतु कोई सक्रियता नहीं दिखाई । इस कारण से बीच में बहुत दिनों तक तो लोगों के बीच यही चर्चा रही कि दीपक बाबू की उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं होगी । इस चर्चा के पीछे लोगों का यही तर्क रहा कि कोई यदि अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाहता है तो इस तरह से डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों और कार्यक्रमों से लगातार गायब नहीं रह सकता । लेकिन जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नामांकन करने का समय आया और दीपक बाबू की उम्मीदवारी प्रस्तुत हुई तो हर किसी को हैरानी हुई कि दीपक बाबू ने किसके भरोसे अपना नामांकन दिया है । मोटे तौर पर यह मान लिया गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने मदद का भरोसा देकर दीपक बाबू को उम्मीदवार बनवा दिया है । इस तरह की बातें होती ही हैं इसलिए इस पर कोई खास गहमागहमी नहीं हुई । लेकिन दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी पर निरस्ती की तलवार लटका कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने मामले को गर्मा दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अधिकृत रूप से फैसला अभी तक भी नहीं ले सके हैं - इससे जाहिर है कि अपने 'तरीके' पर उन्हें खुद भरोसा नहीं है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के रवैये ने अपने आपको ही विवाद के केंद्र में खड़ा कर लिया है ।
यह स्थिति दीपक बाबू को बहुत रास आ रही है । इस स्थिति के चलते दीपक बाबू को उम्मीदवार 'बनने' की जरूरत ही नहीं है । उन्हें विश्वास है कि राकेश सिंघल अब दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को मान्य होने ही नहीं देंगे और ऐसे में वह बिना कुछ किये-धरे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी घोषित हो जायेंगे । इसीलिए राकेश सिंघल की फजीहत में दीपक बाबू और उनके नजदीकियों को मजा आ रहा है और खुशी मिल रही है ।  

Monday, December 23, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की हुई फजीहत ने दूसरे डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ रोटेरियंस जीके ठकराल और दीपक तलवार को भी आश्चर्य में डाला

मुजफ्फरनगर । रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को दूसरे डिस्ट्रिक्ट से पधारे अतिथियों जीके ठकराल और दीपक तलवार के सामने अपने ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों के जिस आक्रोश और विरोध का सामना करना पड़ा - उसके चलते डिस्ट्रिक्ट में हो रही उनकी फजीहत की कीर्ति डिस्ट्रिक्ट की सीमाओं के पार भी जा पहुँची है । जीके ठकराल डिस्ट्रिक्ट 3080 - जो कि पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू का डिस्ट्रिक्ट है - के और दीपक तलवार डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं तथा ये दोनों ही रोटरी फाउंडेशन के जिम्मेदार पदों पर हैं । रोटरी फाउंडेशन के बाबत डिस्ट्रिक्ट 3100 की मुजफ्फरनगर में आयोजित इंटरसिटी में इन दोनों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था । ये दोनों वरिष्ठ रोटेरियन बेचारे डिस्ट्रिक्ट 3100 की इंटरसिटी में पहुँचे तो रोटरी फाउंडेशन के बाबत ज्ञान देने थे, लेकिन वहाँ से लौटे डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की कारगुजारियों का ज्ञान लेकर । इन दोनों ने ही बाद में अलग अलग लोगों से जिक्र किया कि अपने रोटरी जीवन में उन्होंने इतनी गैरजिम्मेदारी से और पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने वाला गवर्नर नहीं देखा है और न किसी गवर्नर की ऐसी फजीहत होते देखी ।
मुजफ्फरनगर में 22 दिसंबर को आयोजित इंटरसिटी में जो तमाशा हुआ, वह सचमुच बेमिसाल था और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल का व्यवहार वास्तव में हैरान करने वाला था - लेकिन जीके ठकराल और दीपक तलवार को जिस बात ने आश्चर्य में डाला, वह था राकेश सिंघल का अपने ही डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग पड़ जाना । डिस्ट्रिक्ट इंटरसिटी में डिस्ट्रिक्ट चीफ काउंसलर बृज भूषण, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुनील गुप्ता सहित कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उपस्थित थे - लेकिन डिस्ट्रिक्ट के लोगों के गुस्से और विरोध का सामना कर रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के बचाव में कोई भी आगे नहीं आया; कुछ मौके से निकल गए थे और कुछ किनारे खड़े होकर तमाशा देख रहे थे । प्रायः सभी का मानना और कहना रहा कि राकेश सिंघल जो कर रहे हैं वह किसी भी तरह से न्यायपूर्ण नहीं है और उनके किये-धरे का किसी भी तर्क से बचाव नहीं किया जा सकता है ।
जीके ठकराल और दीपक तलवार जैसे वरिष्ठ व अनुभवी रोटेरियंस ने पहले तो मामले को समझने और उसे हल करने के उपायों पर विचार करना शुरू किया ताकि हालात को सँभाला जा सके, लेकिन जैसे ही उन्होंने मामले को जाना उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने इतनी घपड़-चौथ कर रखी है कि सारा दोष सिर्फ और सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ही बनता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का दोष समझ लेने के बाद जीके ठकराल और दीपक तलवार के सामने समस्या यह आ खड़ी हुई कि जिस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के बुलावे पर वह यहाँ आये हैं उसे ही कैसे दोषी ठहराये - सो उन्होंने मौके से चुपचाप निकल लेने में ही अपनी भलाई देखी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को लोगों के बीच अकेला फँसा देख कर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नीरज कुमार अग्रवाल आगे आये और उन्होंने राकेश सिंघल के लिए निकलने का मौका बनाया ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल ने अपनी पक्षपातपूर्ण भूमिका से डिस्ट्रिक्ट में जो झमेला खड़ा किया हुआ है, उसके चलते लोगों को यह आभास तो था कि इंटरसिटी में इस बारे में कुछ सवाल-जबाव जरूर ही होंगे । वह हुए भी और कुछ समय तक हालात संभले हुए भी रहे लेकिन जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'फैसला' सुनाने के बाद इस जिद पर अड़े कि अब वह किसी सवाल का जबाव नहीं देंगे, तब हालात बिगड़ना शुरू हो गए । इस पर भी राकेश सिंघल का रवैया यह रहा कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं और वह जो चाहेंगे, करेंगे । उनके इस रवैये को किसी ने भी पसंद नहीं किया और उनके इसी रवैये के चलते हर किसी ने उनका साथ छोड़ दिया । उनके अहंकारी और मनमाने रवैये के चलते उनके अपने लोग उनके खिलाफ हो गए । राकेश सिंघल अपनी डिस्ट्रिक्ट टीम में असिस्टेंट गवर्नर पब्लिकेशन के पद पर नियुक्त चक्रेश लोहिआ के सवालों का जबाव देने को तैयार नहीं थे, जिस पर उन दोनों के बीच गर्मागर्मी हुई । राकेश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में बिलकुल शुरुआत में ही चक्रेश लोहिआ के नाम और तस्वीर और संपादकीय का दर्शन होता है, लेकिन मुजफ्फरनगर में राकेश सिंघल उन्हीं चक्रेश लोहिआ पर मंच से चिल्ला रहे थे कि मैं तुम्हें देख लूँगा, मैं तुमसे निपट लूँगा ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल ने जिम्मेदारी तो इंटरनेशनल प्रेसीडेंट रॉन डी बर्टन के नारे 'एंगेज रोटरी चेंज लाइव्स' को अमल में लाने की उठाई पर मंच से घोषणाएँ वह अपनी ही डिस्ट्रिक्ट टीम के एक सदस्य को 'देख लेने' और 'निपट लेने' की करते सुने गए हैं ।
दरअसल राकेश सिंघल के इसी रवैये ने लोगों को भड़काया और फिर ऐसा माहौल बना जिसकी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी । राकेश सिंघल के रवैये पर हालाँकि उन्हें जानने/पहचानने वालों को आश्चर्य भी हुआ - उनके लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में क्यों तो उन्होंने लोगों के सवालों के जबाव देने से इंकार किया और फिर क्यों इस हद तक चले गए कि 'देख लेने' और 'निपट लेने' की शब्दावली इस्तेमाल करने पर उतर आये । जिस जिस ने भी यह समझने की कोशिश की वह प्रायः इसी नतीजे पर पहुँचा कि वहाँ जो सवाल हो रहे थे वह राकेश सिंघल द्धारा पिछले कई दिनों से लगातार बोले जा रहे झूठ की चूँकि पोल खोल रहे थे, इसलिए राकेश सिंघल बौखला गए थे और इसीलिये उन्होंने सवालों के जबाव देने से मना कर दिया और प्रयास किया कि कोई सवाल न किये जाएँ । सवाल लेकिन फिर भी हो रहे थे - राकेश सिंघल किसी सवाल का जबाव नहीं दे रहे थे; लेकिन उनके जबाव देने से किये जा रहे इंकार 'से' भी लोगों को जबाव 'मिल' रहे थे : और लोगों को जो जबाव 'मिल' रहे थे उनसे राकेश सिंघल द्धारा बोले जा रहे झूठ और उनके द्धारा किये जा रहे षड्यंत्र की पोल खुल रही थी, जिससे राकेश सिंघल बौखला रहे थे ।
किंतु उस बौखलाहट ने राकेश सिंघल को और अकेला तो कर ही दिया, साथ ही अतिथियों के रूप में दूसरे डिस्ट्रिक्ट से पधारे वरिष्ठ रोटेरियंस के सामने भी उनकी असलियत को उद्घाटित भी कर दिया है ।

Friday, December 13, 2013

साउथ एशिया लिटरेसी समिट में, डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपनाई जा रही पक्षपातपूर्ण भूमिका पर मोहर लग सकेगी क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को पूरा विश्वास है कि अपने डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर उन्होंने राजनीति की जो बिसात बिछाई है, उसमें उन्हें जीत दिलवाने का काम साउथ एशिया लिटरेसी समिट में अवश्य ही हो जायेगा । कोई भी आश्चर्य कर सकता है कि साउथ एशिया लिटरेसी समिट का घोषित उद्देश्य तो दक्षिण एशिया के लोगों को शिक्षित बनाने के उपायों पर विचार करना है, तब फिर उसमें किसी एक डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद को लेकर चल रहे झगड़े के हल होने का क्या मतलब है ? लोगों के आश्चर्य अपनी जगह हैं - लेकिन सच यही है कि साउथ एशिया लिटरेसी समिट में मंच पर चाहें जितनी बड़ी-बड़ी बातें हों, कई एक रोटरी नेताओं के लिए यह अपनी राजनीति चमकाने, रोटरी के बड़े नेताओं के साथ अपनी नजदीकी बनाने और/या 'दिखाने' का सुनहरा मौका भर है । यही कारण है कि जिन रोटेरियंस को रोटरी की राजनीति में आगे जाना है, वह तो बढ़-चढ़ कर यहाँ लोगों को 'ला' रहे हैं, लेकिन जिन्हें रोटरी की राजनीति नहीं करनी है वह इस महत्वपूर्ण आयोजन के प्रति अपने आप को प्रेरित नहीं कर पा रहे हैं । सच यह भी है कि उन्हें प्रेरित करने का कोई प्रयास भी नहीं किया गया है ।
साउथ एशिया लिटरेसी समिट की विभिन्न कमेटियों में जो लोग हैं वे प्रायः वही लोग हैं जो रोटरी के हर बड़े आयोजन की कमेटियों में होते हैं और जो अपने अपने डिस्ट्रिक्ट में रोटरी की राजनीति करने में संलग्न रहते हैं और जिन पर रोटरी की राजनीति में पक्षपात करने के आरोप दर्ज रहे हैं । विभिन्न कमेटियों में जिन लोगों को रखा गया है उनमें से कुछेक बेचारों को तो यह भी नहीं पता कि वह किस कमेटी में हैं । होस्ट डिस्ट्रिक्ट - रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 - के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी जेके गौड़ समिट की तैयारियों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे लेकिन जैसे ही उनसे यह पूछ लिया गया कि उनके पास किस कमेटी की जिम्मेदारी है तो वह बगले झाँकने लगे; बहुत कोशिश करने पर भी उन्हें याद नहीं आया कि वह किस कमेटी में 'क्या कुछ' हैं; तब फिर उन्होंने यह कह कर बात को आगे बढ़ाया कि उनके पास बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और उन्हें बहुत काम करना पड़ रहा है । कुछेक और लोगों का भी ऐसा ही हाल मिला जो काम तो बहुत कर रहे थे, बिजी तो वह बहुत थे लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि वह कर क्या रहे हैं और क्यों कर रहे हैं ?
ऐसा दरअसल इसीलिए है क्योंकि जिम्मेदारी से काम तो कुछ ही लोग कर रहे हैं, बाकी अधिकतर लोग - जैसा कि ऊपर कहा गया है - अपनी राजनीति चमकाने, रोटरी के बड़े नेताओं के साथ अपनी नजदीकी बनाने और/या 'दिखाने' को ही 'काम' समझ रहे हैं । कुछेक नेताओं ने इस मौके को अपने आपस के झगड़े निपटाने के मौके के रूप में भी देखा/पहचाना है । होस्ट डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3010 में अभी कुछेक लोगों को एक बेनामी पत्र मिला था जिसमें इस समिट के बहाने राजनीति करने का आरोप लगाते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को जी-भर कर कोसा गया था । उक्त पत्र पर किसी का नाम तो नहीं था, लेकिन उसके मजमून से लोगों ने अंदाजा लगाया कि यह पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल का काम है । ये दोनों भी इस समिट में महत्वपूर्ण पदों पर हैं । मजे की बात है कि ये तीनों - विनोद बंसल, मुकेश अरनेजा, रमेश अग्रवाल - पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर और इस समिट के एक प्रमुख नियंत्रक शेखर मेहता के बड़े खास हैं । समिट के होस्ट डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते विनोद बंसल को चूँकि ज्यादा तवज्जो मिल रही है, इसलिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने बेनामी पत्र के जरिये समिट से ठीक पहले विनोद बंसल पर हमला बोल दिया ।
साउथ एशिया लिटरेसी समिट को डिस्ट्रिक्ट 3010 में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने यदि विनोद बंसल से निपटने के एक मौके के रूप में देखा/पहचाना है; तो डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपनी पक्षपातपूर्ण भूमिका पर मोहर लगवाने के एक अवसर के रूप में इसका इस्तेमाल करने की योजना बनाई है । डिस्ट्रिक्ट नॉमिनी पद के चुनाव में राकेश सिंघल ने जो झमेला खड़ा कर दिया है, उसे लेकर उन्हें न अपने डिस्ट्रिक्ट में कोई समर्थन मिल रहा है और न रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय से कोई समर्थन मिला है । इस मुद्दे पर राकेश सिंघल अपने ही डिस्ट्रिक्ट में इस कदर अलग-थलग पड़ गए हैं कि लिटरेसी समिट के लिए कोई अभियान चला पाना तक उनके लिए संभव नहीं हुआ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुनील गुप्ता तक को नहीं पता कि लिटरेसी समिट के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल कर क्या रहे हैं ? राकेश सिंघल ने इन्हें विश्वास में संभवतः इसीलिये नहीं लिया है कि लिटरेसी समिट में उन्हें अपनी भूमिका पर जो मोहर लगवानी है उसमें ये दोनों कहीं अड़ंगा न डाल दें । दरअसल हर तरफ से समर्थन खो चुके राकेश सिंघल को अब आख़िरी आसरा यही है कि लिटरेसी समिट में जुटे बड़े नेताओं को वह किसी तरह समझा सकें कि अपने डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में उन्होंने जो किया है, वह ठीक किया है ।
लोगों को शिक्षित करने के उपायों पर विचार करने के लिए लिटरेसी समिट में जुटे रोटरी के बड़े नेताओं को क्या इस बात पर भी विचार नहीं करना चाहिए कि रोटरी में विभिन्न पदों पर बैठे लोगों और/या विभिन्न पदों की आस लगाये रोटेरियंस को रोटरी के आदर्शों व लक्ष्यों के प्रति गंभीर होने के प्रति भी थोड़ा 'शिक्षित' करने के बारे में प्रयास करने की जरूरत है ?

Wednesday, December 11, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में तथ्यों/सुबूतों के साथ की गई दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की मांग ने राकेश सिंघल की दिवाकर अग्रवाल को षड्यंत्रपूर्ण तरीके से चुनावी दौड़ से बाहर करने की योजना पर पलीता लगाया

मुरादाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत दीपक बाबू की उम्मीदवारी के खिलाफ मिली शिकायत पर चुप्पी साध लेने के आरोपों के कारण विवाद में और भी ज्यादा गहरे तक फँस गए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाने के आरोपों के चलते राकेश सिंघल पहले से ही विवादों और गंभीर किस्म के आरोपों के घेरे में हैं । राकेश सिंघल पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों का आरोप है कि उन्हें जब दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी के खिलाफ शिकायत मिली थी तो उन्होंने तुरंत कार्रवाई कर दी थी, लेकिन अब जब उन्हें दूसरे उम्मीदवार दीपक बाबू के खिलाफ शिकायत मिली है तो वह यह बताने से ही इंकार कर रहे हैं कि उन्होंने उक्त शिकायत पर क्या कार्रवाई की है ।
दीपक बाबू की उम्मीदवारी के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को जो शिकायत मिली है उसमें दीपक बाबू पर अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में प्रचार करने का आरोप लगाया गया है । रोटरी इंटरनेशनल के
नियमानुसार चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के किसी भी उम्मीदवार को प्रचार करने की छूट नहीं है, इसलिए इस बिना पर दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की मांग की गई है । राकेश सिंघल को इस बारे में जो शिकायत मिली है उसमें बताया गया है कि दीपक बाबू अपने क्लब के पदाधिकारियों और सदस्यों के साथ जब अपनी उम्मीदवारी के लिए नामांकन पेपर देने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के यहाँ आये थे तो अपने साथ शहर के समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों और फोटोग्राफरों को भी लेकर आये थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल
को अपनी उम्मीदवारी के नामांकन पेपर देते हुए दीपक बाबू ने प्रेस फोटोग्राफरों से अपनी तस्वीरें खिंचवाई और अपनी उम्मीदवारी के बारे में आवश्यक विवरण समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों को दिया । इस तरह, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी की खबर और तस्वीरों को समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाने की दीपक बाबू ने पूरी व्यवस्था की । उनकी व्यवस्था ने अपना असर भी दिखाया । अगले दिन स्थानीय समाचार पत्रों में दीपक बाबू की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की खबर और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को नामांकन पत्र सौंपते हुए अवसर की तस्वीरें प्रकाशित हुईं । शिकायत में कहा गया है कि दीपक बाबू की यह कार्रवाई रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का खुला उल्लंघन है और इसके लिए उनकी उम्मीदवारी को तुरंत ही निरस्त कर दिया जाना चाहिए ।
दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की मांग करते हुए राकेश सिंघल को जो शिकायती पत्र मिला है, उसमें डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में प्रकाशित दीपक बाबू के विज्ञापन को भी मुद्दा बनाया गया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में आमतौर पर डिस्ट्रिक्ट टीम के सदस्यों और/या क्लब्स के पदाधिकारियों की ओर से शुभकामना संदेश विज्ञापन के रूप में प्रकाशित होते हैं । इसके अलावा, रोटरी सदस्यों द्धारा अरेंज कराये गए संस्थानों के विज्ञापन भी डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में प्रकाशित होते हैं । लेकिन दीपक बाबू का विज्ञापन जिस अंदाज़ में प्रकाशित हुआ है, वह अपने आप में डिस्ट्रिक्ट 3100 में ही नहीं, बल्कि रोटरी के इतिहास में एक विलक्षण घटना है । दीपक बाबू को चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करनी है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उन्हें अपनी टीम में तो नहीं लेते हैं - किंतु उनका व्यक्तिगत किस्म का विज्ञापन डायरेक्टरी में प्रकाशित करने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं । दीपक बाबू को और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि इस तरह का विज्ञापन छपवाने/छापने का अर्थ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी के जरिये अपनी उम्मीदवारी का प्रचार करना ही माना जायेगा । उन्होंने क्या सोच कर उक्त विज्ञापन छपवाया/छापा यह तो वे दोनों जानें, लेकिन अब उक्त विज्ञापन का हवाला देकर दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की मांग की जा रही है ।
इस मांग ने राकेश सिंघल और दीपक बाबू को सकते में ला दिया है । दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त कराने के लिए इन्होंने जो व्यूह-रचना की थी, उसी व्यूह-रचना को अब जब उनके खिलाफ इस्तेमाल कर लिया गया है तो उनके तो होश फाख्ता हो गए हैं - और उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि इस मांग का वह क्या करें ?
समझा जाता है कि दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की यह मांग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल पर दबाव बनाने के लिए ही की गई है ताकि वह दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने/कराने के जिस षड्यंत्र का हिस्सा बने हुए हैं उससे अपने आप को अलग कर लें । यह मांग करके दीपक बाबू और उनके समर्थकों को भी यह संदेश दे दिया गया है कि जब वह खुद शीशे के घर में रहते हैं तो उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए । डिस्ट्रिक्ट के कई एक वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि उम्मीदवारों की उम्मीदवारी को नियम-कानूनों का वास्ता देकर निरस्त करने/करवाने के खेल का किसी को भी समर्थन नहीं करना चाहिए तथा जिन्होंने उम्मीदवारी प्रस्तुत की है उनके बीच चुनावी मुकाबला हो जाने देना चाहिए । दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों का भी कहना है कि वह भी यही चाहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट में गवर्नर कौन बने - इसका फैसला षड्यंत्रपूर्वक तरीके से किसी की उम्मीदवारी को निरस्त करके नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों को चुनाव के जरिये करने देना चाहिए ।
दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की मांग जिस तरह के तथ्यों/सुबूतों के साथ की गई है, उसके चलते राकेश सिंघल की दिवाकर अग्रवाल को षड्यंत्रपूर्ण तरीके से चुनावी दौड़ से बाहर करने की योजना पर पलीता लगता दिख रहा है । समझा जाता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल के लिए दीपक बाबू की उम्मीदवारी के खिलाफ हुई शिकायत को अनदेखा करना तथा दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को शिकायत के आधार पर निरस्त करना आसान नहीं होगा । डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोगों का यही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल ने अपने एक गलत फैसले से अपनी बहुत बदनामी और छीछालेदर करवा ली है - इससे सीख लेते हुए कम-अस-कम अब उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपनी पक्षपातपूर्ण भूमिका को छोड़ देना चाहिए । यह देखना दिलचस्प होगा कि राकेश सिंघल ने अब तक हुई अपनी बदनामी और छीछालेदर से कोई सबक सचमुच में लिया है या नहीं ?

Wednesday, December 4, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में हर किसी की यही सलाह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में एक पक्ष नहीं बनना चाहिए

मुरादाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अपने ही द्धारा बुने गए जाल में बुरी तरह फँस गए हैं । उनकी हालत 'न घर के न घाट के' वाली हो गई है । राकेश सिंघल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्होंने जिन दीपक बाबू को फायदा पहुँचाने के लिए उक्त जाल बुना, उन्हीं दीपक बाबू के समर्थकों ने अब शक जताना और आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि राकेश सिंघल अब लगता है कि दिवाकर अग्रवाल के साथ 'सौदा' करने का मौका बना रहे हैं और इसीलिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी पर उठे सवाल पर फैसला करने से बच रहे हैं । दरअसल, दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी पर फैसला लेने में राकेश सिंघल जिस तरह से टाल-मटोल कर रहे हैं, उससे दीपक बाबू के समर्थकों में बेचैनी बढ़ती जा रही है । बढ़ती बेचैनी के प्रभाव में ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया है कि लगता है कि राकेश सिंघल ने दीपक बाबू के साथ धोखा करने का निश्चय कर लिया है । 
ऐसा इसलिए है क्योंकि राकेश सिंघल ने जिस दिन दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी में फच्चर फँसाया था, दीपक बाबू के समर्थकों ने उसी दिन से दीपक बाबू को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी मानना शुरू कर दिया था । 
राकेश सिंघल की टीम में प्रमुख हैसियत में रहने वाले दीपक बाबू के समर्थकों ने योजना ही ऐसी बनाई थी जिसमें 'बिना लाठी तोड़े साँप को मार देने का' पूरा इंतज़ाम था । उनके सामने चुनौती बस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल का समर्थन जुटाने भर की थी । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी योजना को राकेश सिंघल का समर्थन आसानी से मिल जायेगा । दरअसल राकेश सिंघल के दिवाकर अग्रवाल से और दिवाकर अग्रवाल के कई नजदीकियों से बड़े अच्छे संबंध रहे हैं - जिन्हें जानते/पहचानते हुए दीपक बाबू के समर्थकों को उम्मीद नहीं थी कि राकेश सिंघल उनकी ऐसी किसी योजना का सहयोग/समर्थन करेंगे, जिसके चलते उनके दिवाकर अग्रवाल के साथ ही नहीं, उनके कई नजदीकियों के साथ भी वर्षों के संबंध खतरे में पड़ जायेंगे ।
दीपक बाबू के समर्थक लेकिन यह देख कर हैरान रह गए कि राकेश सिंघल ने तो उनकी योजना के प्रति बड़ा उत्साह दिखाया । दीपक बाबू के समर्थकों द्धारा तैयार की गई योजना को क्रियान्वित करने को लेकर राकेश सिंघल ने जी उत्साह दिखाया, उससे सिर्फ दीपक बाबू के समर्थक ही हैरान नहीं हुए; डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोग भी हैरान हुए और उनके बीच इस तरह की चर्चाएँ चलीं कि राकेश सिंघल को दीपक बाबू से आखिर ऐसा क्या मिल गया है, जो वह ऐसा कदम उठाने के लिए तैयार हो गए जिसके नतीजे के रूप में उन्हें सिर्फ और सिर्फ बदनामी ही मिलेगी ।
दरअसल इसी वजह से, राकेश सिंघल द्धारा दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निशाने पर लेने के साथ ही दीपक बाबू के समर्थकों ने दीपक बाबू को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी मानना शुरू कर दिया था । उन्हें विश्वास हो गया कि राकेश सिंघल ने जो खेल शुरू किया है, उसे वह तार्किक परिणति तक पहुँचायेंगे ही । लेकिन अब जब राकेश सिंघल ऐसा करते हुए नहीं दिख रहे हैं तो दीपक बाबू के समर्थकों को दाल में कुछ काला होने का शक होने लगा है । उन्हें शक यह होने लगा है कि राकेश सिंघल कहीं दिवाकर अग्रवाल से खेल खेलने की आड़ में उनके साथ तो कोई खेल नहीं खेल रहे हैं ? राकेश सिंघल कहीं डबल क्रॉस तो नहीं कर रहे हैं ? दीपक बाबू के समर्थकों को ही नहीं, दूसरे कई लोगों को भी लग रहा है कि राकेश सिंघल ने पहले दीपक बाबू के साथ सौदा करके 'माल' हड़पा और अब वह दिवाकर अग्रवाल के साथ सौदा करके उनसे 'माल' हड़पने की कोशिश में तो नहीं हैं - और इसीलिये फैसला लगातार टाल रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी के संबंध में फैसला टालने के अपने रवैये में रोटरी इंटरनेशनल को बहाना बनाया हुआ है । उनका कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल उन्हें जो निर्देश देगा, वह वही फैसला करेंगे । रोटरी इंटरनेशनल उन्हें कोई निर्देश दे क्यों नहीं रहा, इस सवाल के जबाव में राकेश सिंघल चुप्पी साध लेते हैं । राकेश सिंघल भले ही चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन रोटरी इंटरनेशनल के जिन भी बड़े पदाधिकारियों से इन पँक्तियों के लेखक की बात हुई है उन सभी का कहना है कि संबंधित मामले में फैसला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को ही करना है - रोटरी इंटरनेशनल का उससे कुछ लेना-देना नहीं है । उल्लेखनीय है कि राकेश सिंघल ने लिखित में और मौखिक रूप से इस मामले में रोटरी इंटरनेशनल के जिन भी पदाधिकारियों से बात की है, उन्होंने राकेश सिंघल को यही कहा/बताया है कि जिस आधार पर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने की बात की जा रही है, वह कोई आधार बनता ही नहीं है । इसके बाद जो फैसला करना है वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को करना है ।
ऐसे में, राकेश सिंघल को यह बात तो समझ में आ रही है कि उन्होंने यदि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने का फैसला किया, तो डिस्ट्रिक्ट से लेकर रोटरी इंटरनेशनल तक में उनकी भारी फजीहत होगी । समस्या उनकी लेकिन यह भी है कि वह यदि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार कर लेते हैं तो दीपक बाबू के समर्थकों को कैसे मुँह दिखायेंगे ?
राकेश सिंघल ने रोटरी के कुछेक बड़े नेताओं की मदद से यह प्रयास भी किया कि वह रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को सेट कर लें, जो दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने के उनके फैसले पर मुहर लगा दें । इस मामले में उन्हें मिलाजुला सा रेस्पांस मिला है, और वह बहुत आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं । इसीलिए वह फैसले को टालते रहने में ही अपना बचाव देख रहे हैं । उनके इस रवैये को लेकिन दीपक बाबू के समर्थक अपने साथ धोखा मान रहे हैं । उनका कहना है कि राकेश सिंघल ने दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने के लिए जो खेल शुरू किया था, उसे पूरा करें । मजे की बात यह है कि दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों का भी कहना है कि राकेश सिंघल को जो भी फैसला करना हो करें, लेकिन जल्दी करें ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों का कहना लेकिन यह है कि राकेश सिंघल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में इस तरह से एक पक्ष नहीं बनना चाहिए; और जब रोटरी इंटरनेशनल के लोगों ने भी उन्हें बता दिया है कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने का कोई आधार बनता ही नहीं है तब फिर उन्हें दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करके दोनों उम्मीदवारों के बीच चुनाव हो जाने देना चाहिए । इसी से उनकी साख और प्रतिष्ठा बनेगी । रोटरी इंटरनेशनल के जिन भी पदाधिकारियों से इस मामले को लेकर इन पँक्तियों के लेखक की बात हो सकी है, उन सभी का भी यही कहना है कि राकेश सिंघल ने नाहक ही अपने आप को एक मुसीबत में फँसा लिया है, जिसके कारण उनकी सिर्फ बदनामी ही हो रही है; अच्छा होगा कि वह अपने आप को इस पचड़े से बाहर निकाल लें - क्योंकि अभी भी बहुत देर नहीं हुई है । कल तक राकेश सिंघल के प्रति समर्थन का भाव दिखा रहे दीपक बाबू के समर्थकों ने अब उनके लिए जिस तरह की बातें करना शुरू कर दिया है, उससे लगने लगा है कि राकेश सिंघल ने अपना मौजूदा रवैया यदि बनाये रखा तो वह अपने लिए और ज्यादा आरोपों को तथा और ज्यादा मुसीबतों को ही आमंत्रित करेंगे ।