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Sunday, January 5, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को चौतरफा बदनामी और फजीहत के बाद अंततः डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा करनी ही पड़ी

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने अंततः वह फैसला सुना ही दिया, जिसे सुनाने से इंकार करने के कारण पिछले करीब दो महीने से उनकी भारी फजीहत और छीछालेदर हो रही थी । बेचारे राकेश सिंघल - अभी तक लोग उनकी इस बात के लिए आलोचना कर रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए आये नामांकनों की वैधता पर वह कोई फैसला नहीं ले रहे हैं; लेकिन अब जब उन्होंने फैसला सुना दिया है तो लोग यह कहते हुए उन्हें निशाना बना रहे हैं कि उन्हें यदि यही फैसला करना था तो फिर इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी ? राकेश सिंघल ने जो किया, उसे व्याख्यायित करने के लिए कुछ लोगों ने एक पुरानी कविता को याद किया - ' खाया/पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना'; कुछ गर्म दिमाग और बदतमीज स्वभाव वाले लोगों ने 'जूते भी खाये, और प्याज भी खाया' वाला मुहावरा भी हवा में उछाला - लेकिन अधिकतर लोगों ने माना कि 'अंत भला तो सब भला ।' ऐसे लोगों का मानना और कहना रहा कि राकेश सिंघल को अंततः सद्बुद्धि आई, जिसके चलते उन्होंने झुकना स्वीकार किया और उनकी तथा डिस्ट्रिक्ट की और ज्यादा बदनामी होने से बच गई ।
हमारे यहाँ माना/कहा भी जाता है कि सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहा जाता है ।
इस आधार पर लेकिन कई लोग अभी भी राकेश सिंघल को माफ़ करने के मूड में नहीं हैं । उनका तर्क है कि राकेश सिंघल कुछ भूले नहीं थे, उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक एक योजना बनाई थी; और वह पश्चाताप करते हुए लौटे नहीं हैं, वह तब लौटे हैं जब लौटने के लिए मजबूर हुए हैं ।
राकेश सिंघल की षड्यंत्रपूर्ण योजना में अपना फायदा देख रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक उम्मीदवार दीपक बाबू और उनके समर्थकों के लिए आश्चर्य की बात यह रही कि अभी पाँच-छह दिन पहले तक ताल ठोक रहे और 'देख लेंगे' 'निपट लेंगे' जैसे दावे कर रहे राकेश सिंघल ने अचानक से पलटी क्यों मार ली ? उल्लेखनीय है कि 29 दिसंबर को होने वाली कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग को ऐन मौके पर स्थगित करके राकेश सिंघल ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वह 'अपने' फैसले में कॉलिज और गवर्नर्स की भी नहीं सुनेंगे । 31 दिसंबर को राकेश सिंघल के घर पर संजीव रस्तोगी, सुनील गुप्ता, ब्रज भूषण तथा कुछेक अन्य लोगों की उपस्थिति में हुई अनौपचारिक मुलाकात में भी काफी गर्मागर्मी हुई थी, जिसमें संजीव रस्तोगी को यहाँ तक धमकाया गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मुरादाबाद में वह कैसे घुस पायेंगे । यहीं राकेश सिंघल ने एक बार फिर यह घोषणा की कि पाँच जनवरी को मेरठ में होने वाली संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग में वह शामिल नहीं होंगे । इससे लगा था कि राकेश सिंघल पूरी तरह से टकराव के मूड में हैं । लेकिन उसके तुरंत बाद ही घटनाचक्र तेजी से घूमा और फिर राकेश सिंघल को जमीन पर आने में देर नहीं लगी ।
टकराव का मूड दिखाने के तुरंत बाद ही राकेश सिंघल को पहला झटका तब लगा जब रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से उन्हें साफ जबाव मिल गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में लिए गए उनके फैसले को तभी स्वीकार किया जायेगा जब वह कॉलिज ऑफ गवर्नर्स द्धारा अनुमोदित होगा । इसके साथ ही राकेश सिंघल को पता चला कि उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के कानों तक भी उनकी कारस्तानियों के किस्से पहुँच गए हैं और वह उनके किये-धरे से नाराज हो रहे हैं । इसके अलावा, राकेश सिंघल के सामने यह स्पष्ट होता ही जा रहा था कि डिस्ट्रिक्ट में उन्होंने जो झगड़ा पैदा किया है उसके चलते उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस का कबाड़ा होना निश्चित ही है । इन सब बातों से राकेश सिंघल ने अपने आप को चारों तरफ से घिरा हुआ पाया और फिर उनके तेवरों ने ढीले होने में समय नहीं लिया ।
राकेश सिंघल ने तुरंत स्थितियों को सँभालने का ऑपरेशन शुरू किया और अपने लिए सम्मानजनक वापसी का एक फॉर्मूला तैयार किया । मुजफ्फरनगर में सरेआम उनकी जो फजीहत हुई थी, उसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराकर उन्होंने पहले दिवाकर अग्रवाल से माफी मँगवाने की शर्त रखी । पाँच जनवरी को मेरठ में होने वाली संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग के लिए राकेश सिंघल ने एक पटकथा तैयार की जिसके अनुसार पहले दिवाकर अग्रवाल द्धारा माफी माँगने का कार्यक्रम संपन्न होना था और फिर राकेश सिंघल को उनकी उम्मीदवारी को मान्यता देने की घोषणा करनी थी । दिवाकर अग्रवाल ने लेकिन माफी मॉँगने से इंकार कर दिया । उनका कहना रहा कि मुजफ्फरनगर में जो कुछ भी हुआ, उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी - जो कुछ भी हुआ वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के गुस्से का इजहार था, उसके लिए वह माफी क्यों माँगे । राकेश सिंघल ने तब सुझाव दिया कि माफी न सही, दिवाकर अग्रवाल खेद तो प्रकट करें ताकि उनके लिए सम्मानजनक वापसी का मौका बन सके । डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों के हस्तक्षेप के बाद फार्मूला यही बना कि दिवाकर अग्रवाल खेद व्यक्त करेंगे और फिर राकेश सिंघल उनकी उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा करेंगे ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग में पहले से तैयार पटकथा को क्रियान्वित करने का माहौल बनाया गया - दिवाकर अग्रवाल ने बड़ी होशियारी से तैयार किये गए बयान को पढ़ा जिसमें राकेश सिंघल के घावों पर मलहम लगाने की कोशिश की गई थी । उसके बाद राकेश सिंघल को अपने हिस्से की भूमिका निभानी थी - 'चोर चोरी से जाये, हेराफेरी से न जाये' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए राकेश सिंघल ने लेकिन इस मौके पर भी शरारत करने की कोशिश की । दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को सीधे-सीधे स्वीकार करने की बजाये उन्होंने इधर-उधर की बातें करके निकलने की कोशिश की । उनके इस रवैये पर माहौल गर्म होना शुरू हो गया ।
राकेश सिंघल को लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा बचा नहीं है - सो, चारों तरफ से घिर जाने के बाद राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा अंततः कर ही दी । 

Saturday, October 19, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में सीओएल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को अचानक से वापस लेकर बृज भूषण अग्रवाल ने योगेश मोहन गुप्ता की मुश्किल बढ़ाई

मेरठ । बृज भूषण अग्रवाल ने एक नाटकीय घटनाक्रम में सीओएल के लिए प्रस्तुत की गई अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने की घोषणा करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है । बृज भूषण अग्रवाल ने जिस अचानक तरीके से अपनी उम्मीदवारी को वापस लिया है, उसे लेकर तरह-तरह की बातें सुनी/कही जा रही हैं । कुछ लोगों को लगता है कि सीओएल के लिए योगेश मोहन गुप्ता ने जिस तरह की तैयारी दिखाई उसे देख/आँक कर बृज भूषण अग्रवाल डर गए और उन्होंने समझ लिया कि चुनाव हारने से अच्छा यह होगा कि वह चुनाव से बाहर ही हो जाएँ । कुछेक अन्य लोगों का कहना लेकिन यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी के पाला बदल कर योगेश मोहन गुप्ता के साथ खड़े हो जाने की खबर मिलने के बाद बृज भूषण अग्रवाल के लिए कहीं कोई उम्मीद नहीं बची, तो फिर अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने में ही उन्हें अपनी भलाई दिखी । उल्लेखनीय है कि संजीव रस्तोगी पहले बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी के साथ सिर्फ थे भर ही नहीं, बल्कि बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी को हवा देते हुए भी 'दिख' रहे थे । हाल ही में, लेकिन पता नहीं योगेश मोहन गुप्ता ने उन्हें क्या घुट्टी पिलाई कि संजीव रस्तोगी मेरठ के रोटेरियंस की कोर कमेटी में लॉटरी द्धारा हुए फैसले को स्वीकारने की वकालत करने लगे । जबकि अभी हाल के दिनों तक यही संजीव रस्तोगी उक्त फैसले को धता बता कर बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी को हवा दे रहे थे और इस कारण से उनके और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुनील गुप्ता के साथ तनातनी की बातें सुनाई देने लगी थीं ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी अपने गवर्नर-काल के महत्वपूर्ण पदों को बाँटने के जरिये बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए राजनीतिक बिसात बिछा रहे थे - और ऐसा करते हुए वह दरअसल योगेश मोहन गुप्ता के लिए समस्याएँ खड़ी कर रहे थे । संजीव रस्तोगी का योगेश मोहन गुप्ता के साथ कुछ पुराना बैर है - जिसे दो वर्ष पहले, संजीव रस्तोगी की उम्मीदवारी का योगेश मोहन गुप्ता द्धारा किये गए विरोध से और मजबूती मिली । बृज भूषण अग्रवाल की सीओएल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी में संजीव रस्तोगी को योगेश मोहन गुप्ता से निपटने का मौका दिखा तो उन्होंने तेवर कस लिए । संजीव रस्तोगी ने तेवर जरूर कस लिए और बृज भूषण अग्रवाल के समर्थन में लोगों को जुटाने की तैयारी भी की, लेकिन उनकी तैयारी उन्हें और बृज भूषण अग्रवाल को कोई खास नतीजा देती हुई नहीं दिखी । इसी बीच योगेश मोहन गुप्ता ने अपना दाँव चला । योगेश मोहन गुप्ता मानते और कहते हैं कि वह डिस्ट्रिक्ट में हरेक की औकात जानते और पहचानते हैं, इसलिए किसी को भी अपने पक्ष में करने में उन्हें ज्यादा समय नहीं लगता । संजीव रस्तोगी भी तभी तक बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी को हवा देते हुए दिखे, जब तक कि योगेश मोहन गुप्ता उनसे नहीं मिले । हाल ही में, एक शाम जब योगेश मोहन गुप्ता ने संजीव रस्तोगी के दरवाजे पर दस्तक दी, तो संजीव रस्तोगी ने उनके साथ आने में और बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी से हाथ खींचने में देर नहीं लगाई ।
सीओएल की उम्मीदवारी को लेकर पर्दे के पीछे जो खेल हुआ उसे बृज भूषण अग्रवाल द्धारा इन पंक्तियों के लेखक से कहे गए उन शब्दों के जरिये समझा/पहचाना जा सकता है, जिसमें उन्होंने बताया कि उनके और योगेश मोहन गुप्ता के बीच हुए समझौते के बाद उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है । उनके और योगेश मोहन गुप्ता के बीच क्या समझौता हुआ है - इसे लेकर बृज भूषण अग्रवाल ने तो कुछ नहीं बताया; लेकिन समझौते की बातचीत की टेबल पर मौजूद एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि योगेश मोहन गुप्ता ने बृज भूषण अग्रवाल को आश्वस्त किया है कि अगली बार सीओएल के लिए वह बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । योगेश मोहन गुप्ता से यह आश्वासन मिलने के बाद ही बृज भूषण अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने का फैसला किया ।
बृज भूषण अग्रवाल और योगेश मोहन गुप्ता के बीच हुए इस समझौते ने - और इस समझौते को कराने में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुनील गुप्ता की भूमिका ने दूसरे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को भड़का दिया है । उनका कहना है कि रोटरी के पदों की बंदरबाँट बृज भूषण अग्रवाल और योगेश मोहन गुप्ता को कैसे और क्यों करने दी जा सकती है ? पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के आलावा, दूसरे कई लोगों का भी मानना और कहना है कि बृज भूषण अग्रवाल और योगेश मोहन गुप्ता चूँकि सीओएल में क्रमशः दो बार और एक बार जा चुके हैं, इसलिए अब दूसरे लोगों को मौका मिलना चाहिये । किस को मौका मिले - इसे चाहें वरिष्टता के आधार पर और या लॉटरी जैसे किसी तरीके से तय कर लिया जाये । अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि योगेश मोहन गुप्ता को पदों की ऐसी भूख है कि वह उक्त तर्क को मान कर अपनी उम्मीदवारी छोड़ेंगे नहीं - लेकिन कुछेक अन्य लोगों का तर्क है कि कौन विश्वास करता था कि बृज भूषण अग्रवाल बीच रास्ते में अचानक से अपनी उम्मीदवारी को छोड़ देंगे ? इस तर्क के भरोसे उनका कहना है कि जिस तरह से बृज भूषण अग्रवाल अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के लिए मजबूर हुए हैं, उसी तरह से योगेश मोहन गुप्ता को भी अपनी उम्मीदवारी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है ।
लाख टके का सवाल लेकिन यही है कि योगेश मोहन गुप्ता को कौन और कैसे अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने के लिए मजबूर कर सकेगा ? यह बात सभी मानते और कहते हैं कि केवल बातें बनाकर और अच्छे-अच्छे तर्क देकर योगेश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी को वापस नहीं कराया जा सकेगा । इसके लिए तो उनके सामने कड़ी चुनौती प्रस्तुत करनी पड़ेगी और उन्हें इस बात का अहसास कराना पड़ेगा कि पदों की उनकी भूख को लोगों का समर्थन नहीं मिलेगा । योगेश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच माहौल बना सकने वाले पूर्व गवर्नर को ही लोगों का समर्थन मिल सकेगा । बृज भूषण अग्रवाल की उम्मीदवारी के वापस होने से कुछेक लोगों को भले ही लगता हो कि योगेश मोहन गुप्ता की राह आसान हो गई है, लेकिन कई एक लोगों का मानना और कहना है कि बृज भूषण अग्रवाल के हटने से योगेश मोहन गुप्ता के लिए मामला ख़राब ज्यादा हो गया है । दरअसल बृज भूषण अग्रवाल का विरोध ज्यादा था - उनकी उम्मीदवारी के रहते उनके विरोधी योगेश मोहन गुप्ता को नापसंद करने के बावजूद उनके साथ खड़े होने के लिए मजबूर होते । लेकिन बृज भूषण अग्रवाल के हटने के बाद अब ऐसी कोई मजबूरी नहीं रही है । विरोध का जो दबाव पहले बृज भूषण अग्रवाल के ऊपर था, वह दबाव अब योगेश मोहन गुप्ता के ऊपर आ गया है । यह देखना दिलचस्प होगा कि कोई पूर्व गवर्नर अपनी सक्रियता से इस दबाव से योगेश मोहन गुप्ता को 'दबा' पाता है; या फिर योगेश मोहन गुप्ता पदों की अपनी भूख को शांत करने के लिए लोगों का समर्थन जुगाड़ ही लेंगे ।

Saturday, October 12, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में सीओएल के लिए बृज भूषण और योगेश मोहन गुप्ता के बीच छिड़ी लड़ाई में ललित मोहन गुप्ता और वागीश स्वरूप ने अपने लिए मौका देखा

मेरठ । योगेश मोहन गुप्ता ने सीओएल (काउंसिल ऑन लेजिसलेशन) के लिए अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने के साथ-साथ ही जिस तरह से अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान शुरू कर दिया है, उससे डिस्ट्रिक्ट 3100 की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा हो गई है । योगेश मोहन गुप्ता चूँकि मानते और कहते हैं कि वह चुनाव में यदि खड़े हुए हैं तो सिर्फ लड़ने के लिए नहीं बल्कि 'जीतने' के लिए खड़े हुए हैं - इसलिए वह हर हथकंडा आजमाना अपना अधिकार और कर्तव्य समझते हैं । योगेश मोहन गुप्ता ने चूँकि इसी तर्ज पर सीओएल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान शुरू किया है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गर्मी पैदा होना स्वाभाविक भी है । इस गर्मी का तापमान तब और बढ़ा जब मुरादाबाद के दौरे में योगेश मोहन गुप्ता के साथ ऐसे लोगों को देखा गया जो संजीव रस्तोगी के नजदीकी समझे जाते हैं । संजीव रस्तोगी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हैं और सीओएल की राजनीति में बृज भूषण अग्रवाल के समर्थन में समझे जाते हैं । उल्लेखनीय है कि सीओएल के लिए इस बार बृज भूषण अग्रवाल को शुरू से ही मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, किंतु मेरठ से एक उम्मीदवार लाने के नाम पर जो कसरत हुई उसने बृज भूषण अग्रवाल के लिए हालात को मुश्किल बना दिया है ।
दरअसल, सीओएल के लिए योगेश मोहन गुप्ता ने इस बार - लगातार दूसरी बार जब एक बार फिर अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की सुगबुगाहट दिखाई तो मेरठ को 'एक' करने/रखने वाले लोगों ने लाटरी के जरिये बृज भूषण अग्रवाल और योगेश मोहन गुप्ता में से किसी एक की उम्मीदवारी तय करने का प्रस्ताव रखा । सभी की सहमति के बाद लाटरी खुली तो बाजी योगेश मोहन गुप्ता के हाथ लगी । बृज भूषण अग्रवाल ने लेकिन इस फैसले को स्वीकार करने से इंकार कर दिया । बृज भूषण अग्रवाल चूँकि दो बार सीओएल में जा चुके हैं, इसलिए कई लोग इस बार फिर प्रस्तुत होने वाली उनकी उम्मीदवारी के विरोध में कमर कस रहे थे । लाटरी से निकले फैसले को स्वीकार करने से इंकार करके बृज भूषण अग्रवाल ने अपने विरोधियों की संख्या को बढ़ाने का ही काम किया है । बृज भूषण अग्रवाल और उनके नजदीकियों को लेकिन इस विरोध की परवाह नहीं है । उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत और अपने रणनीतिक कौशल पर भरोसा है । दूसरे लोगों को भी लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी का समर्थन उन्हें ताकत दे रहा है, जिसके भरोसे वह मेरठ में बनी कोर-टीम के फैसले को भी न मानने का दम दिखा रहे हैं । लाटरी से निकले फैसले ने योगश मोहन गुप्ता की उम्मीदवारी को यदि ताकत दी है, तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी के रवैये ने उनकी ताकत के गुब्बारे की हवा भी कम की हुई है ।
योगेश मोहन गुप्ता ने इसीलिये मुरादाबाद के दौरे में सुनियोजित तरीके से ऐसे लोगों को अपने साथ रखा जो संजीव रस्तोगी के नजदीक समझे जाते हैं । इस तरीके से उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को एक तरफ तो यह दिखाने/बताने की कोशिश की है कि संजीव रस्तोगी उस तरह से बृज भूषण अग्रवाल के साथ नहीं हैं जैसे कि बृज भूषण अग्रवाल और उनके लोग बता/जता रहे हैं और दूसरी तरफ उन्होंने यह संदेश देने का काम किया है कि संजीव रस्तोगी के नजदीकियों को अपनी तरफ कर लेना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा । योगेश मोहन गुप्ता की इस चाल के सामने आने के बाद बृज भूषण अग्रवाल और संजीव रस्तोगी की तरफ से जो सफाईयाँ आईं हैं उसने ही दरअसल गर्मी का अहसास कराया है ।
सीओएल की चुनावी लड़ाई में मेरठ को बँटा देख कर ललित मोहन गुप्ता को बल मिला है और इसी बल के चलते उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है । उनका सीधा सा तर्क है कि बृज भूषण अग्रवाल दो बार और योगेश मोहन गुप्ता एक बार चूँकि सीओएल में रह चुके हैं इसलिए अब डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों को मौका मिलना चाहिए । उल्लेखनीय है कि ललित मोहन गुप्ता ने सीओएल के पिछले चुनाव में भी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, लेकिन एक बड़ी दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो जाने के कारण उनकी उम्मीदवारी खुद-ब-खुद ही समाप्त हो गई थी । इस बार, ललित मोहन गुप्ता जिस तर्क के साथ अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट कर रहे हैं वह तर्क तो लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बना रहा है, लेकिन इस स्वीकार्यता को समर्थन में बदलने के जिस मैकेनिज्म की जरूरत होती है उस पर ललित मोहन गुप्ता के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है ।  
सीओएल के लिए वागीश स्वरूप ने भी हालाँकि अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की हुई है, लेकिन उनकी उम्मीदवारी में अपनी जीत से ज्यादा बृज भूषण को हराने का ताव ज्यादा है । उन्होंने ऐलान भी किया हुआ है कि बृज भूषण को हराने का माद्दा यदि किसी और में उन्हें दिखाई दिया तो वह अपनी उम्मीदवारी छोड़ कर उसका समर्थन करेंगे । वागीश स्वरूप अभी तक हालाँकि यह तय नहीं कर पाए हैं कि बृज भूषण अग्रवाल को हराने का माद्दा किस में है । मुजफ्फरनगर में अभी हाल ही में हुई इंटरसिटी के दौरान योगेश मोहन गुप्ता ने वागीश स्वरूप को यह विश्वास दिलाने का भरसक प्रयास किया कि वह बृज भूषण अग्रवाल को हरा सकते हैं । वागीश स्वरूप लेकिन अभी योगेश मोहन गुप्ता के इस दावे पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं । योगेश मोहन गुप्ता के तौर-तरीके भी वागीश स्वरूप को पसंद नहीं हैं इसलिए उम्मीद की जा रही है कि वागीश स्वरूप का समर्थन योगेश मोहन गुप्ता को तो शायद नहीं ही मिलेगा ।
इसी तरह की स्थितियों के चलते सीओएल को लेकर डिस्ट्रिक्ट 3100 में छिड़ी चुनावी लड़ाई दिलचस्प हो उठी है ।