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Thursday, June 18, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अगले चुनाव के संदर्भ में अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर तैयारियाँ शुरू होती 'दिखने' के बावजूद, वेद जैन खेमे में अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर बने संशय के पीछे डर आखिर क्या है ?

नई दिल्ली । अंकित जैन की सक्रियता के अचानक बढ़ने से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चर्चा एक बार फिर गर्म हो उठी है कि इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन ने अपने बेटे को सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में उतारने की तैयारी शुरू कर दी है । इस चर्चा ने सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी की संभावना को लेकर होने वाली चर्चाओं को तगड़ा झटका दिया है - और उनके बीच यह सवाल खासा महत्त्वपूर्ण हो उठा है कि वेद जैन यदि अपने बेटे को उम्मीदवार बनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब फिर सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी का क्या होगा ? इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने की भले ही उम्मीद हो, लेकिन खुद सुधीर अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा नहीं की है - बल्कि जब जब भी किसी ने सुधीर अग्रवाल से उम्मीदवारी को लेकर सवाल किया है, तो उसे सुधीर अग्रवाल की तरफ से इंकार ही सुनने को मिला है । मजे की बात यह है कि सुधीर अग्रवाल भले ही अपनी उम्मीदवारी की बात से इंकार कर रहे हों, लेकिन लोगों को पक्का यकीन है कि सुधीर अग्रवाल अवश्य ही उम्मीदवार होंगे । संजय अग्रवाल का उदाहरण देते हुए लोगों का कहना है कि जैसे संजय अग्रवाल इंकार करते करते उम्मीदवारी की घोषणा कर बैठे हैं, वैसे ही अभी इंकार कर रहे सुधीर अग्रवाल भी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर देंगे । ऐसा सोचने, मानने और कहने वाले लोगों को लेकिन अंकित जैन की उम्मीदवार बनने की तैयारी देख कर झटका लगा है - वह सुधीर अग्रवाल के इंकार को लेकर थोड़ा गंभीर हुए हैं । दरअसल सुधीर अग्रवाल और वेद जैन की नजदीकियत को जानने वाले लोगों का भी मानना और कहना है कि सुधीर अग्रवाल और अंकित जैन में से कोई एक ही उम्मीदवार होगा ।
हालाँकि वेद जैन या अंकित जैन या सुधीर अग्रवाल की तरफ से अभी अंकित जैन की उम्मीदवारी की पुष्टि नहीं हुई है । उनकी तरफ से यही कहा/बताया जा रहा है कि अंकित जैन की जिस सक्रियता के आधार पर उनकी उम्मीदवारी का कयास लगाया जा रहा है, वह कोई बड़ा आधार नहीं है । वेद जैन ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सर्टीफिकेट ऑफ प्रैक्टिस को जब वापस कर दिया है, और वकील बन गए हैं तो उनकी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्म के काम अंकित जैन के नाम से ही होंगे - और इसमें कोई राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए । लोग लेकिन राजनीति 'देखने' से इसलिए बाज नहीं आ रहे हैं, क्योंकि लंबी-चौड़ी सफाई के बावजूद, वेद जैन के ऑफिस की तरफ से अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर दो-टूक तरीके से बात नहीं की जा रही है । बातों की जलेबी सी बना कर जो कहा जा रहा है, उससे यह साफ नहीं हो रहा है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत होगी या नहीं । वेद जैन के एक नजदीकी ने इस संबंध में बड़ी मजेदार बात बताई कि अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर अभी घोषणा नहीं की जायेगी - क्योंकि उन्हें डर है कि घोषणा होते ही काम करवाने तथा नौकरी चाहने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की लाइन लग जायेगी; और जिसके काम नहीं होंगे, वह नाराज हो जायेगा और नकारात्मक प्रचार करेगा; इसलिए अंकित जैन की उम्मीदवारी की घोषणा चुनाव से छह/सात महीने पहले ही की जाएगी । अब वेद जैन को हक है कि वह अंकित जैन की उम्मीदवारी की घोषणा कब करें, ठीक इसी तरह दूसरों को भी हक है कि अंकित जैन की सक्रियता को देखते हुए वह अंकित जैन की उम्मीदवारी के बारे में कयास लगाएँ ।
वेद जैन के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि यह भी कहना/बताना है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर तैयारी तो शुरू हो गई है, लेकिन अंतिम रूप से फैसला तैयारियों का जायेजा लेने के बाद ही किया जायेगा । ऐसे में, लोगों के बीच सवाल यह भी है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी की तैयारियों को यदि अनुकूल नहीं पाया गया, और उसके चलते अंकित जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं हुई - तो क्या अगले चुनाव में वेद जैन खेमे की तरफ से कोई उम्मीदवार नहीं होगा; क्योंकि सुधीर अग्रवाल अपनी उम्मीदवारी की संभावना से इंकार कर चुके हैं । सुधीर अग्रवाल के समर्थकों का कहना हालाँकि यह है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी को हरी झंडी न मिलने की स्थिति में उन्हें उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए राजी कर लिया जायेगा । सुधीर अग्रवाल के नजदीकियों का लेकिन दावा है कि उम्मीदवारी को लेकर सुधीर अग्रवाल में दरअसल जोश या उत्साह बचा नहीं दिख रहा है, इसलिए राजी करने की समर्थकों की कोशिशों का कोई नतीजा निकलेगा - इसमें शक है । साथ ही साथ उनका कहना हालाँकि यह भी है कि राजनीति में कब कौन क्या फैसला कर बैठे - यह कहना बड़ा मुश्किल है । एक बात लेकिन हर कोई बहुत साफगोई से कह रहा है कि वेद जैन खेमे ने अपने उम्मीदवार की घोषणा करने में यदि ज्यादा समय लिया और देर की, तो चुनावी नतीजे पर उसका प्रतिकूल प्रभाव अवश्य ही पड़ेगा ।

Monday, December 2, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस से नवीन गुप्ता को अलग-थलग रखने/करने के लिए उनके नजदीकी, वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता को मौकापरस्त व अवसरवादी बताते हुए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के निवर्त्तमान प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता को मुंबई में होने वाली इंस्टीट्यूट की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में कोई तवज्जो न मिलने के चलते इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता को खासी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है । नवीन गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि अतुल गुप्ता को जब वाइस प्रेसीडेंट बनना था, तब तो वह नवीन गुप्ता के आसपास मँडराते रहते थे और तरह तरह से उन्हें खुश करने के प्रयासों में लगे रहते थे - लेकिन अतुल गुप्ता को अब इस बात की भी परवाह नहीं है कि इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे इंस्टीट्यूट के प्रमुख कार्यक्रम में वह नवीन गुप्ता की उपस्थिति को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाएँ । नवीन गुप्ता के नजदीकियों की नाराजगी से बचने के लिए अतुल गुप्ता ने पहले तो प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, लेकिन जब इस कोशिश से उन्हें अपना काम बनता हुआ दिखाई नहीं दिया - तो उन्होंने नवीन गुप्ता की कुछ न करने की प्रवृत्ति को जिम्मेदार बताना शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि 6 और 7 दिसंबर को मुंबई हो रही कॉन्फ्रेंस में इंस्टीट्यूट के 11 पूर्व प्रेसीडेंट्स वक्ताओं के रूप में शामिल हो रहे हैं । भावना दोषी, जयंत गोखले व पंकज जैन जैसे पूर्व काउंसिल सदस्यों को भी वक्ताओं के रूप में कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का मौका मिल रहा है; लेकिन पिछले वर्ष ही प्रेसीडेंट रहे नवीन गुप्ता को कॉन्फ्रेंस में कोई भूमिका नहीं मिली है ।
नवीन गुप्ता को इस महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम से अलग-थलग रखने पर नवीन गुप्ता के नजदीकियों और शुभचिंतकों की नाराजगी दरअसल इसलिए और भड़की हुई है, क्योंकि नॉर्दर्न रीजन से अमरजीत चोपड़ा व वेद जैन उन 11 पूर्व प्रेसीडेंट्स में शामिल हैं जिन्हें वक्ता के रूप में कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का मौका मिलेगा । नवीन गुप्ता के नजदीकियों व शुभचिंतकों की नाराजगी से बचने के लिए अतुल गुप्ता ने पहले प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के सिर ठीकरा तो फोड़ा, लेकिन यह तरकीब उनके काम आई नहीं । अतुल गुप्ता ने नवीन गुप्ता के नजदीकियों व शुभचिंतकों को समझाने का प्रयास किया कि इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस का पूरा कार्यक्रम प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ ने डिजाईन किया है, और उन्होंने उनसे कोई सलाह नहीं ली है । अतुल गुप्ता का कहना है कि यदि उनसे सलाह ली जाती तो वह अवश्य ही नवीन भाई साहब को वक्ता बनवाते । नवीन गुप्ता के नजदीकी व शुभचिंतक लेकिन अतुल गुप्ता की इस सफाई से संतुष्ट नहीं हैं । उनका कहना है कि इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस की बागडोर भले ही प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के हाथ में हो, लेकिन यदि अतुल गुप्ता दिलचस्पी लेते और कोशिश करते तो नवीन गुप्ता को इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में अवश्य ही वक्ता बनवा लेते ।
नवीन गुप्ता को इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस से दूर रखने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ को जिम्मेदार ठहराकर अपने आप को 'बचाने' की कोशिश के फेल हो जाने के बाद अतुल गुप्ता ने घुमाफिरा कर नवीन गुप्ता को ही जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है । अतुल गुप्ता का कहना है कि नवीन भाई साहब इंस्टीट्यूट की गतिविधियों में दिलचस्पी तो लेते नहीं हैं, और भूतपूर्व प्रेसीडेंट होते ही उन्होंने इंस्टीट्यूट की तरफ से पूरी तरह मुँह मोड़ लिया है, इसलिए इंस्टीट्यूट के कार्यक्रमों में उन्हें कोई बुलाना ही नहीं चाहता है । अतुल गुप्ता ने कुछेक लोगों को सफाई भी दी कि वह यदि कोशिश करके नवीन भाई साहब को वक्ता बनवा भी देते, तो भी कोई गारंटी नहीं थी कि वह कार्यक्रम में पहुँचते ही । अतुल गुप्ता का कहना है कि नवीन भाई साहब को यदि इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में सचमुच शामिल होना था, तो वह उनसे कहते - वह कोशिश करते । अतुल गुप्ता की बदकिस्मती है कि यह तर्क भी नवीन गुप्ता के नजदीकियों व शुभचिंतकों को संतुष्ट नहीं कर सका है; और वह इंस्टीट्यूट के इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम से नवीन गुप्ता को अलग-थलग रखने/करने के लिए लगातार अतुल गुप्ता को मौकापरस्त व अवसरवादी बताते हुए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।

Monday, November 19, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव अभियान में फरीदाबाद में आयोजित हुए सुधीर अग्रवाल के आयोजन को फेल करने की कोशिश में राजेश शर्मा खुद ही फजीहत का शिकार हो गए

फरीदाबाद । सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन दिखाने/जुटाने के उद्देश्य से फरीदाबाद में आयोजित होने वाले आयोजन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को जाने से रोकने के इरादे से राजेश शर्मा ने चाल तो अच्छी चली थी, लेकिन उनकी चाल उन्हें ही उल्टी पड़ गई और उनकी ही फजीहत करा बैठी । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन ने अभी हाल ही में फरीदाबाद के जिमखाना क्लब में एक प्रोफेशनल मीटिंग का आयोजन किया, जिसमें इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन तथा फरीदाबाद के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट केके गुप्ता को चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ बातचीत की । कहने के लिए तो बातचीत इनकम टैक्स नियमों में हुए संशोधनों पर हुई, लेकिन लोगों के बीच यह कोई दबी/छिपी बात नहीं थी कि इस मीटिंग का वास्तविक उद्देश्य सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन जुटाने के लिए प्रमोट करना था । मीटिंग के बाद डिनर के आयोजन की बात तो निमंत्रण पत्र में दर्ज थी ही, निमंत्रण पाने वाले लोगों का कहना था कि 'ड्रिंक' की बात मुँहजबानी बताई गई थी । सुधीर अग्रवाल और उनके समर्थकों ने इस मीटिंग में फरीदाबाद के ज्यादा से ज्यादा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को इकट्ठा करने की तैयारी की थी । उनकी तैयारी को देख कर सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाने के लिए प्रयास कर रहे राजेश शर्मा को फरीदाबाद में अपना समर्थन-आधार खिसकता और घटता हुआ नजर आया, जिसे बचाने के लिए उन्होंने सुधीर अग्रवाल के इस आयोजन को फेल करने की योजना बनाई ।
राजेश शर्मा को अपनी योजना को सफल बनाने में फरीदाबाद ब्रांच के पदाधिकारी अमित पुनिआनी व जितेंद्र चावला का समर्थन भी मिल गया । सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से होने वाली मीटिंग को फेल करने के लिए इन्होंने आनन-फानन में उसी दिन और उसी समय ब्रांच में एक सेमीनार के आयोजन की तैयारी कर ली । राजेश शर्मा, अमित पुनिआनी, जितेंद्र चावला की तिकड़ी ने सोचा था कि सुधीर अग्रवाल की मीटिंग के समय पर ब्रांच में सेमीनार होगा, तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स उसमें शामिल होंगे और सुधीर अग्रवाल की मीटिंग कम उपस्थिति का शिकार होकर फेल हो जायेगी । राजेश शर्मा, अमित पुनिआनी, जितेंद्र चावला की तिकड़ी अपनी उक्त सोच को सफल बनाने में तो कामयाब हो गई - और सुधीर अग्रवाल की मीटिंग में उतने लोग नहीं जुट सके, जितने लोगों को उनकी तरफ से जुटाने की तैयारी की गई थी । लेकिन तिकड़ी की हरकत की हुई आलोचना ने उनके किए-धरे पर पानी फेर दिया । फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच राजेश शर्मा की इस बात के लिए जोरदार आलोचना हो रही है कि चुनावी मुकाबले में वह इतना नीचे गिर कर व्यवहार कर रहे हैं, और इंस्टीट्यूट के चुनाव को वह अपनी ओछी हरकतों से सड़कछाप स्तर का बना दे रहे हैं । पिछले वर्ष सीए डे पर दिल्ली में हुए आयोजन में राजेश शर्मा द्वारा की गईं हरकतों को याद करते हुए कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि उन हरकतों के कारण हुई बदनामी व फजीहत से राजेश शर्मा ने कोई सबक आखिर क्यों नहीं लिया ? कुछेक लोगों ने तो कहा भी कि जैसे कुत्ते की पूँछ लाख कोशिशों के बाद भी सीधी नहीं की जा सकती है, वैसे ही लाख लानत-मलानत के बाद भी राजेश शर्मा अपनी हरकतों से बाज नहीं आ सकते हैं । 
फरीदाबाद के कुछेक वरिष्ठ लोगों ने राजेश शर्मा की हरकत को फरीदाबाद के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स केके गुप्ता के अपमान से जोड़ कर भी देखने/दिखाने की कोशिश की है । केके गुप्ता चुनावी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते हैं, इसलिए फरीदाबाद में अपनी वरिष्ठता के चलते वह हर किसी के लिए सम्मान के पात्र हैं । उनकी वरिष्ठता के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए फरीदाबाद के कुछेक चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि राजेश शर्मा ने अपनी ओछी राजनीति के चक्कर में फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को केके गुप्ता से मिलने और बात करने के अवसर से वंचित कर दिया - और इस तरह फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ तो नाइंसाफी की ही, साथ ही केके गुप्ता को भी अपमानित करने का प्रयास किया है । राजेश शर्मा के प्रति नाराजगी दिखाते हुए लोगों का कहना है कि राजेश शर्मा यदि यह समझते हैं कि दूसरे उम्मीदवारों के आयोजनों को फेल करने के षड्यंत्रों के जरिये वह सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचा लेंगे, तो वह बड़े भ्रम में हैं और इसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ेगा । इस किस्से में मजे की बात यह सुनी जा रही है कि सुधीर अग्रवाल की मीटिंग में लोगों को जाने से रोकने के लिए राजेश शर्मा की योजनानुसार सेमीनार आयोजित करने वाले अमित पुनिआनी व जितेंद्र चावला खुद सुधीर अग्रवाल की मीटिंग के अंत में होने वाले ड्रिंक व डिनर कार्यक्रम में जा पहुँचे थे, और इसके लिए उन्होंने ब्रांच में हो रहे सेमीनार के खत्म होने का भी इंतजार नहीं किया । कुछेक लोगों का अनुमान है कि वह वहाँ यह देखने पहुँचे थे कि लोगों को जाने से रोकने की उनकी तैयारी के बावजूद कौन और कितने लोग सुधीर अग्रवाल के आयोजन में पहुँचे हैं, तो कईयों का कहना रहा कि और लोगों को तो सुधीर अग्रवाल के आयोजन में जाने से रोकने के लिए उन्होंने सेमीनार का आयोजन कर दिया, लेकिन ड्रिंक व डिनर के लालच में वह खुद को वहाँ पहुँचने से नहीं रोक सके । लोगों का कहना है कि ऐसे लोगों के भरोसे/सहारे राजेश शर्मा सिर्फ इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को गंदा कर सकते हैं, लोगों का समर्थन व वोट नहीं पा सकेंगे - और इस तरह सुधीर अग्रवाल के आयोजन में अड़ंगा डाल कर राजेश शर्मा ने अपनी स्वयं की फजीहत करवा ली है ।

Thursday, September 27, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य में हंसराज चुग द्वारा अपनी रणनीति को पुराने ढर्रे पर ही चलाने तथा सुधीर अग्रवाल द्वारा अपनी रणनीति में व्यापक सुधार कर लेने के चलते समीकरणों में बड़ा उलटफेर होता दिख रहा है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की विभिन्न काउंसिल्स के लिए होने वाले चुनावों में नामांकन की समयसीमा पूरी हो जाने के बाद चुनावी परिदृश्य साफ हो जाने के साथ-साथ, उम्मीदवारों की तैयारी में गर्मी आ गई दिख रही है - जिसके तहत उम्मीदवारों और उनके समर्थकों/शुभचिंतकों को अपनी अपनी पोजीशंस लेते हुए देखा जा रहा है । नॉर्दर्न रीजन की चुनावी चर्चाओं में हालाँकि हंसराज चुग और सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी की स्थिति को लेकर होने वाले आकलन का जोर है । पिछले चुनाव में हंसराज चुग चूँकि मामूली अंतर से पिछड़ गए थे, इसलिए कुछेक लोगों को लगता है कि पिछली बार रह गई कमी को पूरा करके हंसराज चुग इस बार कामयाबी को अवश्य ही अपनी जेब में कर सकेंगे । अन्य कई लोगों को लेकिन लगता है कि यही 'गलतफहमी' हंसराज चुग को इस बार ले डूबेगी । उनका तर्क है कि हर उम्मीदवार के लिए हर चुनाव एक अलग चैप्टर की तरह होता है, जिसकी केमिस्ट्री और गणित पिछले चुनाव से पूरी तरह अलग होता है । किसी भी उम्मीदवार के लिए अगला चुनाव वहाँ से शुरू नहीं होता है, जहाँ पिछ्ला चुनाव खत्म हुआ होता है - यदि ऐसा होता तो काउंसिल के सदस्य तो चुनाव हारते ही नहीं; जबकि पिछले चुनाव में वेस्टर्न तथा ईस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल सदस्य चुनाव हारे थे; नॉर्दर्न रीजन में भी पीछे एक बार विजय गुप्ता सेंट्रल काउंसिल सदस्य होते हुए दोबारा नहीं चुने जा सके थे, और इस बार हर किसी को राजेश शर्मा का चुना जाना मुश्किल लग रहा है । इसलिए यह मानना/समझना कि पिछली बार की रह गई कमी को पूरा करके हंसराज चुग इस बार मैदान मार लेंगे, एक खामख्याली ही है । हंसराज चुग और उनके समर्थक चाहें तो एसएस शर्मा के अनुभव से सबक सीख सकते हैं ।  उल्लेखनीय है कि एसएस शर्मा को 2012 के चुनाव में अच्छा समर्थन मिला था, लेकिन वह सफल नहीं हो सके थे; उन्होंने सोचा कि वह अगली बार और मेहनत करेंगे और जीत को हासिल कर लेंगे - वर्ष 2015 के चुनाव के लिए उन्होंने मेहनत जमकर की भी, लेकिन जीत उन्हें फिर भी नहीं मिली । 
चुनावी राजनीति के घुमावदार समीकरणों को जानने/समझने वाले लोगों का मानना/कहना है कि चुनावी राजनीति सिर्फ मेहनत से नहीं जीती जा सकती; उसके लिये माहौल में एक 'शोर' - एक सकारात्मक किस्म का 'शोर' भी चाहिए होता है; यह शोर कभी उम्मीदवार के बैकग्राउंड से और या उसकी सक्रियता से स्वयं पैदा हो जाता है या उसे कृत्रिम तरीके से पैदा करना होता है । एसएस शर्मा यह नहीं कर पाए और सिर्फ मेहनत के भरोसे रहे - जिसका नतीजा रहा कि वह कामयाब नहीं हो सके । हंसराज चुग भी उन्हीं की कहानी को दोहराते नजर आ रहे हैं । असल में, पिछली बार किसी को उम्मीद नहीं थी कि हंसराज चुग चुनावी जीत के आसपास आ सकते हैं; दरअसल 'शोर' की कमी के चलते किसी ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया ही नहीं था । उनकी स्थिति का गहराई से तुलनात्मक अध्ययन करें तो देखते हैं कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 1072 वोटों के साथ दसवें नंबर पर रहते हुए वह 1361 वोटों के साथ आठवें नंबर पर रहे राजेश शर्मा से काफी पीछे थे; लेकिन फाइनल गिनती तक आते आते वह राजेश शर्मा से मामूली अंतर से पीछे रह गये थे । कई लोगों को लगता है कि हंसराज चुग अपनी उम्मीदवारी का यदि थोड़ा सा भी 'शोर' पैदा कर पाते, और चुनावी माहौल में अपनी उम्मीदवारी को लेकर थोड़ी सी भी गर्मी पैदा कर पाते - तो राजेश शर्मा की जगह काउंसिल में वह होते । हंसराज चुग के लिए इस बार भी पिछली बार जैसी ही स्थिति नजर आ रही है - वह और उनके समर्थक दो तथ्यों की सीधे सीधे अनदेखी करते लग रहे हैं, जिसके कारण इस बार उनके लिए हालात और भी चुनौतीपूर्ण बने नजर आ रहे हैं । पिछली बार वह रीजनल काउंसिल के सदस्य थे, जिस कारण वह लोगों के निरंतर संपर्क में थे और जिसका उन्हें फायदा मिला; दूसरी बात यह थी कि चरनजोत सिंह नंदा के उम्मीदवार न होने से उन्हें काफी पंजाबी वोट मिल गए थे - इस बार यह दोनों फायदे उन्हें आसानी से नहीं मिल सकेंगे । वोटों के किसी और 'ब्लॉक' पर उनका ध्यान है, ऐसा दिख नहीं रहा है । कुल मिलाकर उनका रवैया एसएस शर्मा जैसा ही है - और एसएस शर्मा की तरह हंसराज चुग ने भी मान लिया है कि इस बार थोड़ी और मेहनत करके वह पिछली बार रह गई कमी को पूरा कर लेंगे और सेंट्रल काउंसिल में जा बैठेंगे । लोगों को लगता है कि एसएस शर्मा जैसा रवैया अपना लेने के कारण इस बार के सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में हंसराज चुग का हाल भी कहीं एसएस शर्मा जैसा ही न हो जाए ?
चुनावी राजनीति की तरकीब को समझने और उसे अपनाने के मामले में पिछली बार की तुलना में इस बार सुधीर अग्रवाल ने लेकिन ऊँची छलाँग लगाई है । पिछला चुनाव उन्होंने 'लो-पिच' पर लड़ा था, लेकिन इस बार वह 'हाई-पिच' पर हैं । उनके मामले में हालात भी इस बार स्वाभाविक रूप से उनके अनुकूल दिख रहे हैं । सुधीर अग्रवाल के लिए खासी अनुकूल और दिलचस्प स्थिति यह बनी है कि नवीन गुप्ता और संजय अग्रवाल के रूप में जो सीटें खाली हो रही हैं, उन्हें 'बनिया सीटों' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; इन दोनों के समर्थकों के बीच अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से सुधीर अग्रवाल ने इनके नजदीकियों और खास लोगों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया है । नवीन गुप्ता के पिता और इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता तथा संजय अग्रवाल के राजनीतिक पार्टनर और रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन हरीश अग्रवाल से अपनी उम्मीदवारी के नामांकन पत्रों को प्रस्तावित करवा कर सुधीर अग्रवाल ने बड़ा राजनीतिक दाँव चला है, जिसका तोड़ खोजना बाकी उम्मीदवारों के लिए मुश्किल हो रहा है । इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन तथा रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन अनिल जिंदल, अनिल अग्रवाल, बीडी गुप्ता आदि भी सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रस्तावकों में हैं । लुधियाना के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट और एनडी गुप्ता खेमे के सदस्य के रूप में देखे जाने वाले सेंट्रल काउंसिल के पूर्व सदस्य दीपक गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी के प्रस्तावकों में शामिल करके सुधीर अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की अपील को व्यापक बनाने का जो प्रयास किया है, वह चुनावी परिदृश्य में उनकी उम्मीदवारी का 'शोर' और ऊँचा करता है । एक उम्मीदवार की सक्रियता का जो 'रुटीन' होता है, उसे अपनाने/निभाने के साथ-साथ सुधीर अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को लेकर चुनावी परिदृश्य में जो 'शोर' स्थापित किया है, उसके चलते वरिष्ठ और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनकी उम्मीदवारी को खासी  गंभीरता से लिया जा रहा है । हंसराज चुग द्वारा अपनी रणनीति को पुराने ढर्रे पर ही चलाने तथा सुधीर अग्रवाल द्वारा अपनी रणनीति में व्यापक सुधार कर लेने के चलते नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी समीकरणों में बड़ा उलटफेर होता दिख रहा है और जिस कारण यहाँ का चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो उठा है ।

Thursday, September 20, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में 'सीए प्रीमियर लीग' के जरिये सुधीर अग्रवाल ने जो बाउंसर फेंका है, उसने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनावी माहौल में गर्मी पैदा करने के साथ-साथ बाकी उम्मीदवारों को चिंतित व परेशान करने का काम भी किया है

नई दिल्ली । सुधीर अग्रवाल की 'क्रिकेट डिप्लोमेसी' ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है । नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन की तरफ से दो अक्टूबर को शुरू हो रही 'सीए प्रीमियर लीग' को सुधीर अग्रवाल की तरफ से एक ऐसे मास्टर स्ट्रोक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, जिसने नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के प्रायः सभी उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को चिंतित और परेशान कर दिया है । चिंतित और परेशान हों भी क्यों न ? इस बार की प्रीमियर लीग में दिल्ली से बाहर की भी कई टीम आ रही हैं, और इससे भी बड़ी बात यह कि बिग फोर का प्रतिनिधित्व करती हुईं भी कुछेक टीम इस बार प्रीमियर लीग का हिस्सा बन रही हैं । इन तथ्यों को सुधीर अग्रवाल की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स खिलाड़ियों के बीच बनी और बढ़ती स्वीकार्यता के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । यूँ कहने को तो खिलाड़ियों की संख्या हालाँकि ज्यादा नहीं होगी; किंतु एक खिलाड़ी सिर्फ एक ईकाई ही नहीं होता है - उसके नजदीकी और उसके प्रशंसक होते हैं, उसकी एक फॉलोइंग होती है और उसका एक ऑरा (आभामंडल) होता है; ऐसे में एक खिलाड़ी वास्तव में कई लोगों पर प्रभाव छोड़ता है । अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और मान्यता प्राप्त फिरोजशाह कोटला की पिच पर खेलने के लिए जालंधर, हिसार, यमुनानगर, गुड़गाँव आदि से आयेंगे तो कुछ ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स खिलाड़ी, लेकिन वहाँ के बाकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स खिलाड़ियों और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए भी यह तथ्य स्वाभाविक रूप से उत्सुकता और दिलचस्पी का होगा ही । जो भी क्रिकेट का बल्ला पकड़ता है, उसकी इच्छा और हसरत अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त फिरोजशाह कोटला की पिच पर खेलने की तो होती ही है । यह सच है कि सीए प्रीमियर लीग में खेलने का मौका कुछ ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को मिलेगा, लेकिन क्रिकेट में दिलचस्पी रखने वाले बाकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए भी यह मौका भावनात्मक जुड़ाव का होगा ही - और ऐसा कौन चार्टर्ड एकाउंटेंट होगा, जिसे क्रिकेट में दिलचस्पी न होगी । यही तथ्य सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में सुधीर अग्रवाल की 'क्रिकेट डिप्लोमेसी' को महत्त्वपूर्ण बना देता है, और सेंट्रल काउंसिल के बाकी उम्मीदवारों की नींद उड़ा देता है ।
इस वर्ष दो अक्टूबर से शुरू हो रही 'सीए प्रीमियर लीग' नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन का चौथा आयोजन है । पहले के तीन आयोजनों की सफलता ने सीए प्रीमियर लीग को नॉर्दर्न रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच जो पहचान और प्रतिष्ठा दी है, उसके चलते भी इस चौथे आयोजन के प्रति रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच खासा उत्साह है । इस उत्साह को बनाने/जमाने में सुधीर अग्रवाल की तरकीब भी है - जिन्होंने सीए प्रीमियर लीग के रूप में प्रोफेशन और क्रिकेट का ऐसा 'कॉकटेल' तैयार किया है, जिसमें चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को दोहरा फायदा मिलता/दिखता है । इसका नजारा तीसरे और पिछले आयोजन के फाइनल व पुरुस्कार वितरण समारोह में देखने को मिला था । उक्त समारोह में इंस्टीट्यूट के दो पूर्व प्रेसीडेंट्स - एनडी गुप्ता और वेद जैन समारोह में मौजूद चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए आकर्षण के प्रमुख केंद्र थे । उक्त समारोह में मौजूद चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सक्रियता और संलग्नता में देखा/पाया भी गया और उनमें से कईयों ने कहा भी कि यहाँ क्रिकेट के रोमांच के साथ एनडी गुप्ता और वेद जैन जैसे इंस्टीट्यूट के प्रतिष्ठित लोगों के साथ नजदीकी बनाने और दिखाने के मौके भी मिल रहे हैं । मौजूदा वर्ष के शुरू में हुए उक्त समारोह में एनडी गुप्ता और वेद जैन के साथ जिन कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने तस्वीरें खिंचवाईं और सोशल मीडिया में उन तस्वीरों को लगाया/दिखाया, उन तस्वीरों ने उक्त समारोह में न पहुँच सके चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'सीए प्रीमियर लीग' के प्रति उत्सुक व गंभीर बनाया । यह भी एक प्रमुख कारण है कि 'सीए प्रीमियर लीग' के करीब बारह दिन बाद शुरू हो रहे चौथे आयोजन के प्रति चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का जोश जोरों पर दिख रहा है । संयोग है कि यह चौथा आयोजन इंस्टीट्यूट के चुनाव के मौके पर हो रहा है । इस आयोजन के मुख्य कर्ता-धर्ता के रूप में सुधीर अग्रवाल ने इस मौके और जोश का अपनी उम्मीदवारी के लिए पूरा पूरा फायदा उठाने के उद्देश्य से चौथे आयोजन को और खास बनाने की तैयारी भी की है । दरअसल सुधीर अग्रवाल की बहुआयामी तैयारी ने ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल के चुनावी माहौल में गर्मी पैदा कर दी है ।
'तैयारी' के तहत ही व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक टीम को एक लीग मैच फिरोजशाह कोटला की पिच पर खेलने का मौका अवश्य ही मिलेगा । पिछले आयोजन में सिर्फ फाइनल मैच ही फिरोजशाह कोटला की पिच पर हो सका था । इस बार की व्यवस्था में लेकिन लीग में शामिल प्रत्येक खिलाड़ी को फिरोजशाह कोटला की अंतर्राष्ट्रीय पिच पर अपने खेल का कौशल दिखाने का मौका मिलेगा । दो अक्टूबर को 'सीए प्रीमियर लीग' का उद्घाटन दिल्ली स्थित अक्षर धाम मंदिर के मुख्य पुजारी स्वामी वत्सल मुनि कर रहे हैं, और बाद के आयोजनों में भी प्रयास रहेगा कि देश के मुख्य क्रिकेटर और इंस्टीट्यूट के प्रमुख पदाधिकारी और सदस्य खिलाड़ियों की हौंसला-आफजाई के लिए मौजूद रहें । यह व्यवस्था लीग की पहचान और प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से तो होगी ही, साथ ही इस व्यवस्था में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रमोशन का लक्ष्य भी स्वाभाविक रूप से होगा ही । सुधीर अग्रवाल ने सारी व्यवस्था इतनी चतुराई से की है कि प्रीमियर लीग के हर मौके का फायदा उनकी उम्मीदवारी को मिल सके । चुनावी आचार-संहिता का पालन करते हुए सुधीर अग्रवाल ने हालाँकि नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है, और प्रीमियर लीग के छह पृष्ठों के ब्रॉशर पर कहीं भी उनका नाम नहीं है - लेकिन पूरे आयोजन पर उनकी छाप इतनी गहरी है कि नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन और/या सीए प्रीमियर लीग का जिक्र होते ही लोगों की जुबान पर सहज ही सुधीर अग्रवाल का नाम आ जाता है । दरअसल नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन तथा सीए प्रीमियर लीग और सुधीर अग्रवाल आपस में एक दूसरे के इतने पर्याय बन चुके हैं; और लोगों के दिलों-दिमाग में ऐसे बैठ चुके हैं कि ब्रॉशर में सुधीर अग्रवाल का नाम होने या न होने का कोई अर्थ नहीं रह गया है । प्रीमियर लीग के जरिये सुधीर अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में जो बाउंसर फेंका है, उसने इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में गर्मी पैदा करने तथा सेंट्रल काउंसिल के बाकी उम्मीदवारों को चिंतित व परेशान करने का काम जरूर किया है - लेकिन इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि अपने इस आयोजन को मिलने वाले जोरदार समर्थन को वोट में बदलने का मैकेनिज्म सुधीर अग्रवाल को अभी तैयार करना है । वास्तव में वह मैकेनिज्म ही सेंट्रल काउंसिल में उनकी सफलता को सुनिश्चित करने का काम करेगा ।

Monday, May 25, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी ने अलग अलग कारणों से नवीन गुप्ता और राधेश्याम बंसल के लिए सीधी चुनौती खड़ी की

नई दिल्ली । सुधीर अग्रवाल ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करके नवीन गुप्ता और राधेश्याम बंसल की उम्मीदवारी के लिए सीधा खतरा पैदा कर दिया है । उल्लेखनीय है कि यूँ तो सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की चर्चा काफी समय से थी; कुछेक लोगों का कहना/बताना था भी कि सुधीर अग्रवाल ने उनसे अपने उम्मीदवार होने की बात कही/बताई है - लोगों को लेकिन फिर भी सुधीर अग्रवाल की तरफ से औपचारिक घोषणा होने का इंतजार था । यह इंतजार इसलिए भी था क्योंकि सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी की चर्चा तो खूब थी, लेकिन खुद सुधीर अग्रवाल अपनी उम्मीदवारी के लिए कुछ करते हुए नहीं दिख रहे थे । उनका मामला कुछ कुछ मधुसुदन गोयल जैसा था - मधुसुदन गोयल के मुकाबले हालाँकि उनकी उम्मीदवारी को लेकर ज्यादा विश्वास जरूर था । लोगों के बीच बने इस विश्वास पर बस सुधीर अग्रवाल की मोहर लगने का इंतजार किया जा रहा था । लोगों का यह इंतज़ार अंततः खत्म हुआ और अभी हाल ही में सुधीर अग्रवाल ने एक कार्यक्रम में उपस्थित होकर अपनी उम्मीदवारी का सार्वजनिक रूप से ऐलान किया ।  
सुधीर अग्रवाल द्वारा अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा में की गई इस देरी के लिए वेद जैन की हरी झंडी मिलने में हुई देरी को जिम्मेदार माना जा रहा है । हालाँकि सुधीर अग्रवाल यह नहीं मानते हैं कि उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करने में कोई देर की है; लेकिन इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों तथा सुधीर अग्रवाल व वेद जैन की नजदीकियत को जानने वाले लोगों का मानना/कहना है कि सुधीर अग्रवाल दरअसल वेद जैन से हरी झंडी मिलने का इंतजार कर रहे थे । नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी को देखते हुए वेद जैन के लिए सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के पक्ष में खड़ा दिखना मुश्किल लग रहा था । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल और वेद जैन को एनडी गुप्ता खेमे के सदस्य के रूप में ही देखा/पहचाना जाता रहा है । पिछले कुछेक वर्षों से हालाँकि इन दोनों के एनडी गुप्ता के साथ पहले जैसे संबंध नहीं रह गए बताए जाते हैं । वेद जैन जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे, तभी उनकी एनडी गुप्ता के साथ दूरी बनना शुरू हो गया था । दोनों के नजदीकियों का कहना है कि दोनों के बीच अब पहले जैसे संबंध नहीं रह गए हैं । कई लोग हालाँकि मानते हैं कि एनडी गुप्ता और वेद जैन के बीच भले ही पहले जैसे संबंध न रह गए हों, लेकिन वेद जैन ऐसा कुछ नहीं करेंगे या कर सकेंगे जिससे एनडी गुप्ता और उनके बेटे नवीन गुप्ता को राजनीतिक नुकसान होता हो ।
सुधीर अग्रवाल द्वारा अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करने के लिए इंतजार करवाने से लोगों के बीच लेकिन इंप्रेशन यही गया है कि राजनीतिक मोर्चे पर वेद जैन ने एनडी गुप्ता से एक अलग राह पकड़ ली है । मजे की बात यह है कि न तो सुधीर अग्रवाल की तरफ से और न वेद जैन की तरफ से सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को वेद जैन के समर्थन के बारे में कोई घोषणा की गई है, किंतु लोगों ने मान लिया है कि सुधीर अग्रवाल ने लंबा इंतजार करवा कर अपनी उम्मीदवारी की अब जो औपचारिक घोषणा की है, तो वेद जैन से हरी झंडी मिलने के बाद ही की है । राजनीति समझने और करने वाले लोग जानते हैं कि राजनीति तथ्यों से नहीं, परसेप्शन से होती है । नवीन गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यही है । लोगों के बीच परसेप्शन चूँकि यह बन रहा है कि सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को वेद जैन का समर्थन है, इसलिए लोगों के बीच इसकी प्रतिक्रिया इस रूप में हो रही है कि सेंट्रल काउंसिल में नवीन गुप्ता की जो परफॉर्मेंस है, वेद जैन उससे संतुष्ट नहीं हैं और इसीलिए अब वह नवीन गुप्ता का साथ छोड़ कर सुधीर अग्रवाल को आगे बढ़ाना चाहते हैं । नवीन गुप्ता के नजदीकियों की तरफ से हालाँकि यह बताने का प्रयास हो रहा है कि वेद जैन उनके ही साथ हैं तथा रहेंगे; लेकिन समस्या यह है कि यह बात बताने भर से लोगों के बीच स्वीकार्य नहीं होगी - उनकी यह बात यदि सच भी है, तो इसे उन्हें लोगों को 'दिखाना' भी होगा; और इस दिखाने में जितनी देर होगी उतना ही उन्हें नुकसान होता जायेगा । इस तरह, सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी और उनकी उम्मीदवारी को वेद जैन के समर्थन का परसेप्शन नवीन गुप्ता के लिए भारी मुसीबत बन गया है । 
सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी राधेश्याम बंसल के लिए भी मुसीबत बन कर आई है । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल और राधेश्याम बंसल कभी एक साथ हुआ करते थे; और इस नाते दोनों का कार्य-क्षेत्र और समर्थन-आधार लगभग एक ही है । पिछले वर्ष नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में अपनी सक्रियता के भरोसे राधेश्याम बंसल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी जिस उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया है, उसे सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी ने ग्रहण लगा दिया है । सुधीर अग्रवाल भले ही छह वर्ष पहले नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे, लेकिन उनका चेयरमैन-काल चूँकि ज्यादा सक्रियताभरा रहा था - इसलिए चेयरमैन होने के नाते मिलने वाले फायदे के संदर्भ में उनका पलड़ा राधेश्याम बंसल से भारी ही साबित होगा । कार्य-क्षेत्र और समर्थन-आधार में भी राधेश्याम बंसल की तुलना में सुधीर अग्रवाल का प्रभाव व स्वीकार्यता ज्यादा है, इसलिए सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी राधेश्याम बंसल की उम्मीदवारी के लिए चौतरफा मुसीबत बनकर ही आई है । राधेश्याम बंसल के समर्थक और नजदीकी यह कहने भी लगे हैं कि सुधीर अग्रवाल उम्मीदवार बने ही राधेश्याम बंसल का रास्ता रोकने के लिए हैं । उनका कहना है कि वर्ष 2009 के चुनाव में जो 'काम' भगवानदास गुप्ता ने सुधीर अग्रवाल के लिए किया था, वही काम अब राधेश्याम बंसल के लिए सुधीर अग्रवाल करने उतरे हैं ।
सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी ने नवीन गुप्ता और राधेश्याम बंसल के लिए जिस तरह की चुनौती पैदा कर दी है, उसके चलते इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का चुनाव खासा दिलचस्प हो उठा है ।