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Thursday, March 7, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की एक्जीक्यूटिव कमेटी में शामिल होने के कारण, धोखाधड़ी से चेयरमैन बनने/बनवाने की हरकत में अविनाश गुप्ता को हरीश चौधरी के सहयोगी की भूमिका में 'पहचाना' गया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में बनी आठ सदस्यीय एक्जीक्यूटिव कमेटी में अविनाश गुप्ता के शामिल होने से हरीश चौधरी के धोखेबाजी से चेयरमैन बनने के किस्से में सातवें वोटर की पहचान से जुड़ी पहेली लोगों को हल होती हुई दिखी है । लोगों ने मान लिया है कि धोखेबाजी से चेयरमैन बनने/बनाने के खेल में हरीश चौधरी के अभी तक छिपे बैठे सहयोगी अविनाश गुप्ता ही हैं । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अभी तक के इतिहास में इस वर्ष पहला मौका है, जबकि पक्के तौर पर यह स्पष्ट नहीं है कि चेयरमैन के चुनाव में जीते उम्मीदवार को काउंसिल के 13 सदस्यों में से किस किस के वोट मिले हैं । डेमोक्रेटिक सिस्टम में चुनाव की अवधारणा के नजरिये से देखें, तो यह अच्छी बात है - दरअसल इसीलिए चुनाव में गोपनीयता को महत्त्व दिया जाता है । उम्मीद की जाती है कि जीता हुआ पदाधिकारी सिर्फ अपने वोटरों का ही पदाधिकारी नहीं होता है, बल्कि सभी का पदाधिकारी होता है । किंतु यह बात आदर्श और नैतिकता की किताबी बात बन कर ही रह गई है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में भी हर कोई हमेशा ही कुर्सी पाने की तिकड़मों में लगा नजर आता है और इसके चलते चुनाव से संबद्ध डेमोक्रेटिक वैल्यूज मजाक बन कर रह गए हैं । यहाँ ग्रुप बनाना, ईश्वर और बच्चों के नाम पर सौगंधे खाना, ग्रुप के सदस्यों को छिपा कर रखना, साजिशें करना, दोहरे खेल खेलना, धोखाधड़ी करना आदि आम बातें हैं । दरअसल इसीलिए करीब डेढ़ महीना पहले बन चुके ग्रुप के साथ धोखा करके हरीश चौधरी के चेयरमैन बनने की हरकत में उनके सहयोगी की पहचान का मामला महत्त्वपूर्ण हो उठा था - और हर कोई यह जानने को उत्सुक था कि धोखाधड़ी के खेल में उनका सहयोगी वास्तव में है कौन ?
हरीश चौधरी के धोखाधड़ी से चेयरमैन बनने की हरकत में उनके सहयोगी के रूप में दो लोगों - अविनाश गुप्ता और अजय सिंघल के नाम चर्चा में थे । रीजनल काउंसिल की कार्यप्रणाली से परिचित लोगों का मानना और कहना था कि धोखाधड़ी से चेयरमैन बने हरीश चौधरी का दूसरा सहयोगी छिपने की चाहें कितनी भी कोशिश करें - लेकिन अपराधशास्त्र के अनुसार जिस तरह हर अपराधी कोई न कोई सुबूत/संकेत छोड़ ही देता है - ठीक वैसे ही एक्जीक्यूटिव कमेटी का गठन होने पर हरीश चौधरी का दूसरा सहयोगी खुद-ब-खुद सामने आ ही जायेगा । ऐसा मानने और कहने वालों का तर्क रहा कि हरीश चौधरी को चेयरमैन बनवाने की धोखाधड़ी में शामिल उनका दूसरा सहयोगी खुद को एक्जीक्यूटिव कमेटी में रखने के लोभ से बच नहीं पायेगा । चूँकि हर 'अपराध' और या हर 'धोखे' के पीछे कोई ठोस कारण या स्वार्थ होता ही है; इसलिए माना/समझा गया कि धोखाधड़ी से चेयरमैन बनने की हरकत में हरीश चौधरी का साथ देने वाले का भी कोई बड़ा स्वार्थ होगा ही - जिसे वह सत्ता खेमे में शामिल होकर ही पूरा कर सकेगा; और इसके लिए उसे एक्जीक्यूटिव कमेटी में रहना ही होगा । इसीलिए एक्जीक्यूटिव कमेटी में अविनाश गुप्ता का नाम आते/देखते ही लोगों ने मान लिया कि धोखाधड़ी से चेयरमैन बनने की हरीश चौधरी की हरकत में अविनाश गुप्ता ही उनके सहयोगी हैं । अविनाश गुप्ता को चेयरमैन बनने की जल्दी में देखा/पहचाना जाता रहा है; इसलिए माना/समझा जाता है कि अविनाश गुप्ता ने इस उम्मीद में धोखाधड़ी से चेयरमैन बनने की हरीश चौधरी की हरकत में सहयोगी बनना स्वीकार कर लिया होगा - ताकि अगले वर्ष वह चेयरमैन बन सकें । एक्जीक्यूटिव कमेटी में शामिल होने के कारण, धोखाधड़ी से चेयरमैन बनने/बनवाने की हरकत में सहयोगी की भूमिका निभाते 'पहचाने' जाने से अविनाश गुप्ता के लिए अगले वर्ष चेयरमैन बनने का 'सपना' लेकिन फिलहाल मुसीबत में फँसता दिख रहा है ।

Thursday, February 28, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में चेयरमैन बने हरीश चौधरी की धोखेबाजी तो सभी को नजर आ रही है, लेकिन सातवाँ धोखेबाज अभी भी 'छिपा' बैठा है; सातवें वोटर के रूप में कुछेक लोग अविनाश गुप्ता का नाम लेते हैं, तो कई लोग अजय सिंघल को 'देखते' हैं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन की चुनावी राजनीति में हरीश चौधरी ने कुछ ही मिनटों में ऐसा रंग बदला कि काउंसिल में धोखेबाजी और दगाबाजी के अभी तक के सारे किस्से फीके पड़ गए - और हरीश चौधरी ने मौकापरस्ती का अनोखा रिकॉर्ड बनाया । हरीश चौधरी पहले तो 'आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप' में चेयरमैन पद के चुनाव में उम्मीदवार बनते हैं, और अपने नाम की पर्ची डलवाते हैं - लेकिन वहाँ जब वह चेयरमैन नहीं चुने जाते हैं, तो कुछ ही मिनटों के बाद काउंसिल के 13 सदस्यों के बीच होने वाले चुनाव में सभी को आश्चर्य में डालते हुए वहाँ उम्मीदवार बन जाते हैं और 7 - 6 से चेयरमैन का चुनाव जीत लेते हैं । घटनाक्रम के सीक्वेन्स तथा उसके समयांतराल को देखें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि हरीश चौधरी ने धोखेबाजी की स्क्रिप्ट पहले से तैयार करके रखी थी - पहले तो वह अपने आप को 'आठ सदस्यीय सत्ता खेमे' के साथ दिखाते रहे, लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो उन्होंने अपने दूसरे प्लान पर काम किया और चेयरमैन का पद हासिल कर लिया । कुछेक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तरफ से सुनने को मिला कि वह पिछले कई वर्षों से चेयरमैन बनने वाले को बधाई देते आ रहे हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि हरीश चौधरी को बधाई देने का उनका मन नहीं हुआ; उन्हें लगा कि धोखेबाजी से चेयरमैन का पद पाने वाले हरीश चौधरी को बधाई देना प्रोफेशन व इंस्टीट्यूट की तौहीन करना ही होगा । वैसे हरीश चौधरी की धोखेबाजी की हरकत पर हैरान होने वाले लोगों को 'रचनात्मक संकल्प' की 25 जनवरी की रिपोर्ट को फिर से पढ़ लेना चाहिए, जिसमें कह दिया गया था कि आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप में कुछेक सदस्य तो पहले ही वर्ष में चेयरमैन बनना चाहते हैं, और इसके लिए पाला बदलने से भी परहेज नहीं करेंगे और ग्रुप की एकता बनाये रखना मुश्किल ही होगा । हरीश चौधरी ने 34 दिन पहले 'रचनात्मक संकल्प' की कही गई बात को सच साबित कर दिखाया गया है ।
मजे की, लेकिन गंभीर बात यह है कि हरीश चौधरी की धोखेबाजी तो सभी को नजर आ रही है - लेकिन सातवाँ धोखेबाज अभी भी 'छिपा' बैठा है । माना/समझा जा रहा है कि हरीश चौधरी को 'आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप' से बाहर के पाँच सदस्यों का समर्थन तो मिला ही है - लेकिन यह बात पहेली ही बनी हुई है कि उन्हें सातवाँ वोट किसका मिला है । हरीश चौधरी की धोखेबाजी का मुख्य शिकार बने रतन सिंह यादव तथा अन्य कुछेक लोग सातवें वोटर के रूप में अविनाश गुप्ता का नाम लेते हैं, तो कई लोग अजय सिंघल को 'देखते' हैं । 'आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप' में हरीश चौधरी, रतन सिंह यादव, अविनाश गुप्ता व अजय सिंघल को चेयरमैन पद के लिए ज्यादा लालायित देखा/पहचाना जा रहा था । इनके बीच होड़ केवल चेयरमैन बनने को लेकर ही नहीं है; अपने आपको ज्यादा से ज्यादा जेनुइन और प्रभावी दिखाने की होड़ भी है । यह चारों लोग हालाँकि दूसरी बार में रीजनल काउंसिल का चुनाव जीते हैं, लेकिन चारों ही समझते यह हैं कि जैसे इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के सबसे बड़े तुर्रमखाँ यही हैं । ऐसे में, चारों ही एक दूसरे को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकते हैं । इन्होंने ग्रुप तो बना लिया, लेकिन अपने आप को दूसरों से आगे और बड़ा दिखाने की कोशिशों में भी लगे रहे - दरअसल यही कारण है कि सातवें वोटर के रूप में अविनाश गुप्ता और अजय सिंघल को ही देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि पर्चीबाजी में रतन सिंह यादव का नाम निकलने की बात को अविनाश गुप्ता और अजय सिंघल हजम नहीं कर पाए और हरीश चौधरी की धोखेबाजी के खेल में शामिल हो गए । यह बात यद्यपि अभी भी साफ नहीं है कि हरीश चौधरी को चेयरमैन चुनवाने में मदद करने वाला सातवाँ समर्थक/वोटर वास्तव में कौन है ?
रतन सिंह यादव के नजदीकियों के अनुसार, रतन सिंह यादव धोखेबाजी के लिए हरीश चौधरी के साथ-साथ अविनाश गुप्ता को कोस रहे हैं - लेकिन पब्लिकली वह जो हुआ, उसे डेमोक्रेटिक वैल्यूज की जीत बता रहे हैं । रतन सिंह यादव का यह मजेदार किस्म का मसखरापन है - पहले तो वह डेमोक्रेटिक वैल्यूज का 'बलात्कार' करते हुए 13 सदस्यों के बीच आठ सदस्यों का ग्रुप बनाते हैं, 13 की बजाये आठ लोगों के बीच चेयरमैन का चुनाव पर्चीबाजी से करने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं; और फिर 'फिसल पड़े तो हरगंगे' की तर्ज पर डेमोक्रेटिव वैल्यूज का लिहाफ ओढ़ लेते हैं । लोगों का कहना है कि रतन सिंह यादव की अतिमहत्त्वाकाँक्षा और उस महत्त्वाकाँक्षा को पूरा करने के लिए की गईं मसखरेपन व फूहड़ किस्म की हरकतें ही रतन सिंह यादव को ले डूबीं और उनके हाथ में लगभग आ चुकी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की चेयरमैनी फिसल गई । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के नए टर्म के लिए चुने गए सदस्यों में हालाँकि कई लोगों की चेयरमैन पद पर निगाह थी, और वह अपने अपने तरीके से गोटियाँ सेट करने में लगे थे - लेकिन रतन सिंह यादव इस मामले में बेहद फूहड़ तरीके से जुटे थे, और उनके नजदीकियों व समर्थकों ने माहौल को और भी हास्यास्पद बनाया हुआ था । उनके नजदीकियों और समर्थकों ने पिछले कई दिनों से उन्हें 'चेयरमैन साब' कहना शुरू किया हुआ था, और यह सुन सुन कर रतन सिंह यादव गदगद हुआ करते थे । खुद रतन सिंह यादव तर्क भी देते थे कि नई रीजनल काउंसिल के सदस्यों में वह चूँकि सबसे 'बूढ़े' हैं, इसलिए उन्हें चेयरमैन बना देना चाहिए । रतन सिंह यादव को नजदीक से जानने वाले कुछेक लोगों का कहना/बताना है कि नई काउंसिल में चुने गए लोगों में रतन सिंह यादव ही सबसे जेनुइन व गंभीर व्यक्ति हैं, लेकिन अपने व्यवहार और अपनी बातों में वह तालमेल नहीं बना पाते हैं; उनके कुछेक घनघोर किस्म के समर्थक तो और भी माशाल्लाह हैं - रतन सिंह यादव तथा उनके घनघोर किस्म के समर्थक अपने तरीकों व अपनी बातों से रतन सिंह यादव की भद्द पिटवाते रहते हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की नई पारी जिस अप्रत्याशित धमाके के साथ शुरू हुई है, उसे देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि रीजनल काउंसिल में आगे भी नए नए तमाशे देखने को मिलते रहेंगे ।

Thursday, April 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पिछली बार अच्छे-खासे वोट पा कर भी असफल रहे हरीश चौधरी, अनिल अग्रवाल, रतन सिंह यादव, अजय सिंघल, अविनाश गुप्ता, मुकुल अग्रवाल आदि को इस बार भी बेवकूफियाँ करते देखते नए उम्मीदवारों को उत्साह मिला है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अब की बार अपनी जीत को पक्की करने के लिए हरीश कुमार चौधरी ने एक बड़ा काम यह किया है कि अपने नाम में उन्होंने 'जैन' शब्द और जोड़ लिया है । पिछले चुनाव में वह हरीश कुमार चौधरी के नाम से उम्मीदवार थे, और पहली वरीयता में 596 वोट पाकर वह 16वें नंबर पर थे, लेकिन फिर भी वह 'विजेता 13' की सूची में नहीं आ सके थे । अब की बार वह हरीश कुमार चौधरी जैन के नाम से उम्मीदवार होंगे, और उन्हें विश्वास है कि नाम में जैन शब्द जोड़ लेने से जैन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स उन पर वोटों की ऐसी बारिश करेंगे कि चुनावी जीत उनसे बच कर निकल ही नहीं पाएगी । उनका विश्वास पूरा होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन यह जरूर पता चल रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को अगले टर्म में कैसे कैसे पदाधिकारी मिल सकते हैं ? इससे भी मजेदार किस्सा अनिल अग्रवाल का है । पिछली बार 451 वोट पाकर अनिल अग्रवाल 23वें नंबर पर थे; और अगली बार के लिए अच्छी तैयारी कर रहे थे । पिछले वर्ष लेकिन एक टीवी चैनल के स्टिंग में काले धन को सफेद करने के चक्कर में पकड़े जाने के बाद उनकी उम्मीदवारी की संभावना पर ग्रहण लगता दिखा । काफी समय तक तो उन्होंने हालाँकि 'बहादुरी' वाले तेवर दिखाए, जिसका संदेश था कि बेईमान और अपराधी किस्म के लोग क्या चुनाव नहीं जीतते हैं; लेकिन धीरे-धीरे उनके तेवर ढीले पड़ते गए और उन्होंने लालू यादव से प्रेरणा लेकर उनके 'रास्ते' को अपनाया । जिस प्रकार लालू यादव ने बेईमानी व लूट-खसोट में पकड़े जाने के बाद अपनी पत्नी राबड़ी देवी को आगे कर दिया था, उसी तर्ज पर अनिल अग्रवाल ने अपनी पत्नी रोबिना अग्रवाल को आगे करने की तैयारी दिखाई है । उनके नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि अगले चुनाव में अनिल अग्रवाल अपनी जगह अपनी पत्नी रोबिना अग्रवाल को चुनाव लड़वायेंगे - और इस तरह इंस्टीट्यूट को रोबिना अग्रवाल के रूप में एक राबड़ी देवी मिलेंगी ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का अगला चुनाव उन उम्मीदवारों के लिए बहुत खास है, जो पिछली बार जोरदार सक्रियता तथा अच्छे-खासे वोट पाकर भी सफल नहीं हो पाए थे । हरीश कुमार चौधरी और अनिल अग्रवाल के अलावा ऐसे लोगों में रतन सिंह यादव, अजय सिंघल, अविनाश गुप्ता, मुकुल अग्रवाल आदि का नाम लिया/सुना जा रहा है । पिछली बार भी इन्हें 'जीतने वाले' उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था और इनका प्रदर्शन अच्छा भी रहा था । इसी बिना पर इन्हें इस बार मजबूत उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । किंतु मजे की बात यह है कि इनमें से कोई भी पिछली बार की अपनी जीत को हार में बदलने वाले कारणों की पहचान/पड़ताल करता और उन्हें दूर करने की कोशिश करता हुआ नजर नहीं आ रहा है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति पर निगाह रखने वाले दिल्ली के अनुभवी नेताओं का मानना/कहना है कि यह लोग दरअसल यह समझते हैं कि इनके लिए अगला चुनाव वहाँ से शुरू होगा, जहाँ पिछला चुनाव खत्म हुआ था; जबकि सच यह है कि हर चुनाव में एक अलग केमिस्ट्री होती है । इस बात को हरित अग्रवाल के उदाहरण से समझा जा सकता है । वर्ष 2012 के चुनाव में हरित अग्रवाल पहली वरीयता में 605 वोट पाकर नौवें नंबर पर थे, और काउंसिल के सदस्य बने थे; लेकिन वर्ष 2015 के चुनाव में पहली वरीयता में कुल 422 वोट के साथ 24वें नंबर पर जा लुढ़के थे - और काउंसिल सदस्य होने के बावजूद चुनाव हार गए थे । इस तरह के कई लोगों के और उदाहरण मिल जायेंगे, जिन्हें पिछली बार की तुलना में कम वोट मिले होते हैं । ऐसे उदाहरण भी हैं, जबकि पिछली बार की तुलना में ज्यादा वोट तो मिले - लेकिन सफलता नहीं मिली । आलोक कृष्ण इसके सबसे बदकिस्मत उदाहरण हैं । वर्ष 2012 में पहली वरीयता में 625 वोट के साथ दसवें नंबर पर रहने वाले आलोक कृष्ण वर्ष 2015 में पहली वरीयता में 877 वोट के साथ पाँचवें नंबर पर तो पहुँच गए, लेकिन काउंसिल में नहीं पहुँच सके ।
इन उदाहरणों के बावजूद रतन सिंह यादव अब की बार तो अपनी जीत पक्की ही मान कर चल रहे हैं । अपनी जीत को पक्का तो वह पिछली बार भी मान रहे थे; जिसके चलते उन्होंने नतीजा आने से पूर्व ही पहले वर्ष में ही चेयरमैन बनने के लिए जुगाड़ बैठाना भी शुरू कर दिया था । इस अति-आत्मविश्वास के चलते वह दरअसल यह देख/समझ ही नहीं पाए कि उनके चुनाव अभियान में कैसी क्या बेवकूफियाँ हो रही हैं । उनका पूरा चुनाव अभियान झूठ और बड़बोले दावों पर टिका था । उनके एक घनघोर समर्थक जयदीप सिंह गुसाईं ने सोशल मीडिया में उनकी बढ़ाई करते हुए पेल दिया कि वह इंस्टीट्यूट की कई कमेटियों में रह चुके हैं । इस पर लोगों ने पूछ लिया कि कौन कौन सी कमेटियों में ? इसका जबाव देने में उक्त समर्थक के तो पसीने छूट गए । उसके बचाव में उतरते हुए रतन सिंह यादव ने तो लेकिन बेवकूफी की पराकाष्ठा को छू लिया । उन्होंने जबाव दिया कि अभी मैं चुनाव में व्यस्त हूँ; चुनाव पूरा हो जाने पर मैं बताऊँगा कि मैं इंस्टीट्यूट की कौन कौन सी कमेटियों में रहा हूँ । रतन सिंह यादव के इस जबाव के चलते लोगों के बीच उनकी खासी फजीहत हुई । अच्छे-खासे वोट पाने के बाद भी रतन सिंह यादव के असफल रहने में उक्त प्रसंग का कितना क्या रोल था, यह तो नहीं पता; लेकिन उक्त प्रसंग से यह जरूर पता चला कि उनका चुनाव-अभियान किस तरह के झूठों व बड़बोले दावों पर निर्भर था और अपने झूठ व बड़बोले दावों को 'मैनेज' करने की उनकी तैयारी भी बेवकूफीपूर्ण थी । यही नजारा अब की बार भी देखने को मिल रहा है । उनके नजदीकियों का ही कहना है कि वह या तो ज्ञान बाँटने का अहँकार दिखाते हैं (मानो दूसरे सभी अज्ञानी हैं) और या बेसिरपैर की बातों में लगे रहते हैं । कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि उन्हें अजय सिंघल का संग-साथ और मिल गया है । यह दोनों दुनिया जहान की खराब बातों पर कमेंट करेंगे, लेकिन प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट की गड़बड़ियों पर चुप्पी साधे रहेंगे और बेईमानों के साथ खड़े दिखेंगे । अजय सिंघल को भी पिछली बार अच्छे वोट मिले थे । इस बार भी वह जीतने की उम्मीद कर रहे हैं; लेकिन अपना चुनाव अभियान वह ऐसे उपदेशात्मक तरीके से चला रहे हैं कि उनके ही एक शुभचिंतक को उन्हें सलाह देनी पड़ी कि चुनाव दिसंबर में ही हैं । यह बताने/कहने के पीछे उक्त शुभचिंतक का इशारा शायद यही रहा है कि बेसिर पैर की बातें छोड़ों और अपने चुनाव को लेकर गंभीर हो जाओ ।
अविनाश गुप्ता थोड़े जहीन और महीन किस्म के व्यक्ति हैं और अपनी बातों व अपने व्यवहार से पढ़े-लिखे 'लगते' भी हैं । पिछली बार भी उन्हें जीतने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा था, और इस बार भी जीतने वाले संभावितों की लिस्ट में उनका नाम है । कई लोग यह कहते हुए भी सुने जाते हैं कि उनके जैसे लोगों को काउंसिल में होना ही चाहिए । लेकिन चुनाव लड़ने के नाम पर अविनाश गुप्ता की तरफ से जिस तरह की हरकतें होती देखी/सुनी जा रही हैं, उससे उनके शुभचिंतकों के बीच भी निराशा है । कुछेक को तो कहते हुए भी सुना गया है कि चुनाव अभियान में अच्छे-भले लोगों की भी अक्ल पता नहीं कहाँ घास चरने चली जाती है । पिछली बार जीतते जीतते रह गए मुकुल अग्रवाल को भी इस बार जीतने की संभावना वाले उम्मीदवारों में देखा/गिना जा रहा है, लेकिन उनके नजदीकियों का भी रोना है कि इस बार की चुनौतियों पर मुकुल अग्रवाल का ध्यान ही नहीं है । मुकुल अग्रवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती गौरव गर्ग ही हैं, जो पिछली बार उनकी उम्मीदवारी के बड़े समर्थक थे - लेकिन इस बार खुद उम्मीदवार हो गए हैं । ऐसे में, पिछली बार पहली वरीयता के 610 वोट पाकर पंद्रहवें नंबर की उन्हें जो जगह मिली थी, उस जगह को ही बचा कर रख पाना उनके लिए बड़ी मुसीबत और चुनौती की बात है । इससे निपटने के लिए लेकिन वह कुछ खास प्रयास करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । पिछली बार के चुनाव में अच्छी स्थितियों में रहने वाले उम्मीदवारों को इस बार अभी तक ढीले-ढाले रवैये में देखते और पिछली बार जैसी ही बेवकूफियाँ करते देखते पिछली बार ज्यादा पीछे रहे तथा नए उम्मीदवारों के बीच जिस तरह का उत्साह देखने को मिल रहा है, उसने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य को अभी से रोमांचक बना दिया है ।