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Monday, June 18, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी लड़ाई से महेश मडखोलकर के बाहर रहने पर भी श्रीनिवास जोशी पिछली बार की हार को जीत में सचमुच बदल सकेंगे क्या और या फिर से 'अपमान' का शिकार होंगे ?

मुंबई । पिछली बार के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट गवाँ बैठे श्रीनिवास जोशी इस बार के चुनाव में अपनी जीत पक्की करने के लिए महेश मडखोलकर को चुनाव न लड़ने के लिए राजी करने के प्रयासों में जुटे हैं, लेकिन रमेश प्रभु की उम्मीदवारी की चर्चा उनकी मुसीबतों को बढ़ाने का काम कर रही है - जिसके चलते श्रीनिवास जोशी के लिए मामला 'आसमान से टपके, खजूर पर अटके' जैसी हो गई है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार की अपनी पराजय के लिए श्रीनिवास जोशी, मंगेश किनरे और महेश मडखोलकर की उम्मीदवारी को मानते/ठहराते हैं । दरअसल उनका ही नहीं, अन्य लोगों का भी मानना और कहना है कि मुंबई से एक ही मराठी उम्मीदवार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत सकता है । वर्ष 2012 में श्रीनिवास जोशी को इसी बात का अच्छा फायदा मिला था, और वह जीतने वाले लोगों में छठवें नंबर पर रहे थे । वर्ष 2012 में सेंट्रल काउंसिल के लिए अच्छी जीत हासिल करने वाले श्रीनिवास जोशी वर्ष 2015 के चुनाव में लेकिन 16वें नंबर पर लुढ़क गए । वर्ष 2015 में श्रीनिवास जोशी की सेंट्रल काउंसिल की सीट मंगेश किनरे ने छीन ली । श्रीनिवास जोशी के लिए संकट की बात यह रही कि पहले तो पहली वरीयता के वोटों की गिनती में श्रीनिवास जोशी, मंगेस किनरे से करीब दो सौ वोट पीछे रहे; और फिर मंगेस किनरे तो उछलते/बढ़ते 15वें स्थान से छठवें स्थान पर पहुँच गए, लेकिन श्रीनिवास जोशी 17वें स्थान से बढ़ कर 16वें स्थान तक ही पहुँच पाए । इस बुरे नतीजे को श्रीनिवास जोशी ने अपने अपमान के रूप में लिया है, और वह लगातार दावा कर रहे हैं कि इस बार के चुनाव में वह पिछली बार हुए अपमान का बदला लेंगे ।
पिछली बार हुए अपमान का बदला लेने के लिए श्रीनिवास जोशी तरह तरह से महेश मडखोलकर पर दबाव बना रहे हैं कि वह इस बार सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत न करें । श्रीनिवास जोशी उन्हें समझा रहे हैं कि वह यदि उम्मीदवार बनेंगे तो जीत तो नहीं ही पायेंगे; इसलिए वह यदि इस बार उन्हें उम्मीदवार बनने दें, तो अगली बार वह उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे; श्रीनिवास जोशी ने महेश मडखोलकर से वायदा किया है कि उन्हें बस एक बार चुनाव लड़ना है और पिछली बार के अपमान का बदला लेना है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 1395 वोटों के साथ श्रीनिवास जोशी 17वें स्थान पर थे, तो महेश मडखोलकर 1254 वोटों के साथ 18वें स्थान पर थे । मंगेस किनरे 1603 वोटों के साथ 15वें स्थान पर थे । वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के 22 उम्मीदवारों की गिनती का काम आगे बढ़ा तो श्रीनिवास जोशी और मंगेस किनरे के बीच का अंतर कम हो रहा था; लेकिन महेश मडखोलकर के मुकाबले से बाहर होने पर मंगेस किनरे को खासी बढ़त मिली । दरअसल महेश मडखोलकर के दूसरी वरीयता के वोटों में बड़ा हिस्सा मंगेस किनरे को मिला, जिसके चलते श्रीनिवास जोशी के लिए फिर मंगेस किनरे को पकड़ पाना मुश्किल हो गया । श्रीनिवास जोशी को लगता है कि महेश मडखोलकर की उम्मीदवारी ने पहले तो पहली वरीयता के उनके वोटों में सेंध लगाई और फिर दूसरी वरीयता के वोटों में भी वह पिछड़ गए; उनका आकलन है कि महेश मडखोलकर यदि उम्मीदवार न होते, तो मंगेस किनरे को ज्यादा बढ़त नहीं मिलती - और जो मिलती उसे वह कवर कर लेते । इसी आकलन के भरोसे, श्रीनिवास जोशी इस बार प्रयास कर रहे हैं कि महेश मडखोलकर इस बार उम्मीदवार न बनें - ताकि वह सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत सकें और पिछली बार के अपमान का बदला ले सकें ।
श्रीनिवास जोशी के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि पिछली बार की अपनी हार के लिए महेश मडखोलकर को जिम्मेदार ठहराकर श्रीनिवास जोशी अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं, और इस रवैये से वह पिछली बार की हार को जीत में नहीं बदल सकेंगे । उनका कहना है कि श्रीनिवास जोशी को इस तथ्य पर भी विचार करना चाहिए कि सेंट्रल काउंसिल में होते हुए भी वह लोगों के बीच अपना समर्थन-आधार बनाए रखने व बढ़ाने में सफल क्यों नहीं हुए, और क्यों मंगेस किनरे उनके समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा ले उड़े ? महेश मडखोलकर भी उनके समर्थकों के बीच सेंध लगाने में सफल रहे और वह समर्थक दूसरी वरीयता का वोट भी श्रीनिवास जोशी को देने को तैयार नहीं हुए । श्रीनिवास जोशी के शुभचिंतकों का ही मानना और कहना है कि श्रीनिवास जोशी यदि इसी चक्कर में पड़े रहे कि महेश मडखोलकर को सेंट्रल काउंसिल की चुनावी लड़ाई से बाहर रख/रखवा कर वह पिछली बार के अपमान का बदला ले लेंगे, तो अब की बार वह फिर अपमान का शिकार होंगे; इसलिए जरूरी है कि वह चुनावी परिदृश्य का तथा अपनी कमजोरियों का ईमानदारी से आकलन करें और अपनी कमजोरियों को सचमुच में दूर करने का प्रयास करें । शुभचिंतकों की इस तरह की नसीहतों के साथ-साथ को-ऑपरेटिव सेक्टर में अच्छी दखल रखने वाले वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट रमेश प्रभु के उम्मीदवार बनने की चर्चा ने भी श्रीनिवास जोशी के लिए मुसीबतों का बढ़ाने का ही काम किया है । दरअसल रमेश प्रभु और महेश मडखोलकर के बीच अच्छे संबंध देखे/बताये जाते हैं; जिस बिना पर लोगों को लगता है कि श्रीनिवास जोशी के दबाव में महेश मडखोलकर ने सेंट्रल काउंसिल का चुनाव यदि नहीं भी लड़ा, तो वह रमेश प्रभु की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । इस तरह श्रीनिवास जोशी के लिए मामला 'आसमान से गिरे, खजूर पर अटके' जैसा हो गया है । देखना दिलचस्प होगा कि पिछली बार की अपनी हार का बदला लेने के लिए श्रीनिवास जोशी अपने ही शुभचिंतकों की नसीहत पर ध्यान देते हैं या नहीं; और यदि देते हैं तो करते क्या हैं ?

Thursday, August 20, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में हुए सौ करोड़ रुपयों के जमीन घोटाले के कारण जयदीप शाह पर लगे दाग और नागपुर में मराठों व गैर मराठों के बीच विभाजन होने से जुल्फेश शाह के लिए सेंट्रल काउंसिल की राह मुश्किल बनी

नागपुर । जुल्फेश शाह के लिए भारी मुसीबत की बात यह हो गई है कि वह जिन जयदीप शाह के नाम/समर्थन के भरोसे सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीतने का जुगाड़ बैठा रहे हैं, वही जयदीप शाह लेकिन उनकी राह का रोड़ा बनते नजर आ रहे हैं । दरअसल जयदीप शाह के अध्यक्ष-काल में इंस्टीट्यूट में सौ करोड़ रुपयों का जो जमीन घोटाला हुआ था, और उसकी जो कालिख जयदीप शाह के नाम पर लगी थी - उसका दाग अभी तक धुला नहीं है, और यही दाग जुल्फेश शाह के लिए मुसीबत बना है । जुल्फेश शाह को चूँकि जयदीप शाह के 'आदमी' के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, इसलिए कई लोगों को लगता है कि जुल्फेश शाह की आड़ में जयदीप शाह फिर से प्रोफेशन के लोगों के बीच नागपुर का नाम खराब करेंगे । यूँ भी सौ करोड़ रुपयों के जमीन घोटाले के दाग के कारण जयदीप शाह की लोगों के बीच जो फजीहत हुई है, उसके चलते उनका लोगों के बीच पहले जैसा प्रभाव भी नहीं रह गया है । जयदीप शाह की बदनामी का ही नतीजा माना/समझा गया कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में 18 वर्ष से लगातार चलती चली आ रही नागपुर की उपस्थिति, पिछली बार अनुपस्थिति में बदल गई । पिछले चुनाव में राजेश लोया की चुनावी असफलता को जयदीप शाह की 'करनी' के नतीजे के रूप में ही देखा/पहचाना गया । राजेश लोया की साफ-सुथरी छवि, एक बड़े सहकारी बैंक की चेयरमैनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गहरी पैठ के चलते राजेश लोया की जीत को सुनिश्चित ही समझा जा रहा था - किसी को भी उनके असफल होने की आशंका तक नहीं थी; किंतु उनकी तमाम खूबियों पर जयदीप शाह की बदनामी भारी पड़ी । 
जयदीप शाह की वही बदनामी जुल्फेश शाह के लिए मुसीबत बनती नजर आ रही है । पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में जुल्फेश शाह को जयदीप शाह की बदनामी के कारण ही अपेक्षित वोट नहीं मिल सके थे, और पहली वरीयता में उन्हें एक हजार वोटों पर ही संतोष करना पड़ा था । इस बार सेंट्रल काउंसिल के लिए वेस्टर्न रीजन में कोटा तीन हजार वोट के आसपास तय होता दिख रहा है । इस आधार पर देखें तो रीजनल काउंसिल के चुनाव में एक हजार वोट पाने वाले जुल्फेश शाह के लिए सेंट्रल काउंसिल का चुनाव एक बहुत बड़ी चुनौती है । उनके लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि वह अपनी चुनावी सफलता के लिए जयदीप शाह पर पूरी तरह निर्भर हैं । हालाँकि जयदीप शाह को लेकर जुल्फेश शाह थोड़ी सावधानी तो जरूर बरत रहे हैं - पहले जहाँ वह जयदीय शाह की छत्रछाया में रहना अपना गौरव समझते थे और जयदीप शाह की शान में कविताएँ सुनाया करते थे, वैसा सब तो करने से वह बचते नजर आ रहे हैं; लेकिन फिर भी अपने चुनाव अभियान में वह जयदीप शाह पर निर्भर तो हैं ही । जुल्फेश शाह के लिए यह बहुत मुश्किल है कि वह जयदीप शाह को पूरी तरह छोड़ दें । वास्तव में जयदीप शाह का संग-साथ और समर्थन ही उनकी कुल ताकत है - पर सौ करोड़ रुपयों का जमीन घोटाला उनकी बदकिस्मती का सबब बना हुआ है, जिसके कारण उनकी यह 'कुल ताकत' ही उनकी परेशानी भी बनी हुई है । 
जुल्फेश शाह के लिए परेशानी और चुनौती की बात यह भी है कि नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की महान चट्टानी एकता जातीय आधार पर चटकती जा रही है । नागपुर के बारे में मशहूर रहा है कि यहाँ के वोट यहाँ के ही उम्मीदवार को पक्के तौर पर मिलते हैं, तथा अन्य किसी उम्मीदवार की दाल यहाँ नहीं गलती है । किंतु अब यह दावा कमजोर पड़ रहा है । दरअसल पिछले वर्षों में हुई राजनीति ने यहाँ मराठों को अपने ठगे जाने का अहसास कराया है, जिसके चलते मराठों में बगावती सुर पैदा हुए हैं । पहले अशोक चांडक ने और फिर जयदीप शाह ने जिस तरह से नागपुर की राजनीति पर कब्जा किया, उससे मराठों के बीच असंतोष पैदा हुआ है । उल्लेखनीय है कि जब अशोक चांडक सेंट्रल काउंसिल में होते थे, तब रीजनल काउंसिल में नागपुर का प्रतिनिधित्व जयदीप शाह और अनिरुद्ध शेनवई करते थे । अशोक चांडक की जगह लेने के लिए इन्हीं दोनों के बीच होड़ थी । अशोक चांडक के लिए जिस तरह से अनिल दानी ने राजनीतिक त्याग किया था, उसी तर्ज पर अनिरुद्ध शेनवई के लिए लोग जयदीप शाह से त्याग की उम्मीद करते थे । लोगों ने उम्मीद की थी कि जयदीप शाह बड़प्पन दिखायेंगे और सेंट्रल काउंसिल में अशोक चांडक की जगह अनिरुद्ध शेनवई के लिए छोड़ेंगे । जयदीप शाह ने लेकिन बड़प्पन दिखाने की बजाये चतुराई दिखाई । जयदीप शाह ने जिस तरह से सेंट्रल काउंसिल में अशोक चांडक की जगह हथियाई और अनिरुद्ध शेनवई को पीछे धकेल दिया, उससे नागपुर में मराठों व गैर मराठों के बीच एक गाँठ पड़ गई थी । 
जयदीप शाह ने अपनी राजनीतिक कुशलता से इस गाँठ के बावजूद नागपुर के वोटरों को विभाजित तो नहीं होने दिया, लेकिन वह गाँठ को खोलने का काम भी नहीं कर पाएँ । उनकी राजनीतिक कुशलता को उनकी चतुराईपूर्ण तीन-तिकड़म के रूप में देखा गया, जिसका खामियाजा उन्हें सौ करोड़ रुपयों के जमीन घोटाले के दाग के रूप में भुगतना पड़ा । जयदीप शाह के नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि सौ करोड़ रुपयों के जमीन घोटाले वाले मामले की 'आग' पर्दे के पीछे से अनिरुद्ध शेनवई ने ही लगाई थी । इस मामले के सूत्रधारों के रूप में भले ही दूसरे लोगों के नाम लिए जाते हों, लेकिन जयदीप शाह के नजदीकियों की नजरों में मामले के असली सूत्रधार अनिरुद्ध शेनवई ही थे । नागपुर में और नागपुर के बाहर भी कई लोगों का साफ कहना है कि अनिरुद्ध शेनवई को राजनीतिक मोर्चे पर जयदीप शाह से जो मात खानी पड़ी थी, उसका बदला उन्होंने जयदीप शाह पर जमीन घोटाले का दाग लगा/लगवा कर लिया । इस प्रसंग ने नागपुर में मराठों व गैर मराठों के बीच विभाजन को और हवा दी । 
मराठों व गैर मराठों के बीच विभाजन होने तथा सौ करोड़ रुपयों के जमीन घोटाले के कारण जयदीप शाह पर लगे दाग के चलते बाहर के उम्मीदवारों को नागपुर में समर्थन जुटाने में खासी सफलता मिली । पिछले चुनाव में इसका फायदा श्रीनिवास जोशी, प्रफुल्ल छाजेड़ और सुधीर पंडित को मिला । सुधीर पंडित हालाँकि इस फायदे के बावजूद जीत नहीं पाए । इस बार नागपुर के मराठी वोटों में मंगेश किनरे के सेंध लगाने की चर्चा है । प्रफुल्ल छाजेड़ को जयदीप शाह की बदनामी के कारण नागपुर के गैर मराठी वोटों का अच्छा समर्थन मिला । प्रफुल्ल छाजेड़ को मिले समर्थन का हाल तो यह रहा कि जो लोग उन्हें पहली वरीयता का वोट नहीं दे पाये, उन्होंने उन्हें दूसरी वरीयता का वोट दिया - जिसने उनकी जीत में निर्णायक भूमिका निभाई । उल्लेखनीय है कि राजेश लोया के बाहर होने के बाद ही प्रफुल्ल छाजेड़, एनसी हेगड़े से आगे निकल कर विजयी हो पाए थे । इन स्थितियों ने जुल्फेश शाह की चुनावी दौड़ को मुश्किल बना दिया है । रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में जुल्फेश शाह ने यद्यपि अपने समर्थन आधार को बढ़ाने का काम किया है, अपने व्यवहार और अपनी संलग्नता से उन्होंने अपने दोस्तों व समर्थकों की संख्या में इजाफा भी किया है; किंतु कोई भी चुनाव चूँकि एक मैनेजमेंट भी होता है, और जो परिस्थितियों से नियंत्रित होता है - इसलिए जुल्फेश शाह के लिए सेंट्रल काउंसिल की राह आसान नहीं है । जुल्फेश शाह पर जयदीप शाह की बदनामी का बोझ तो है ही, साथ ही मराठों व गैर मराठों के बीच पनप रहे अविश्वास तथा विरोध से निपटने की चुनौती भी है ।

Friday, November 14, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के दिसंबर 2015 में होने वाले चुनाव के लिए वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए महेश मडखोलकर द्धारा उम्मीदवारी प्रस्तुत किए जाने की घोषणा ने मंगेश किनरे की उम्मीदवारी के लिए समस्या पैदा कर दी है

मुंबई । महेश मडखोलकर ने दिसंबर 2015 में होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के लिए अचानक से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करके मंगेश किनरे के समर्थकों व शुभचिंतकों को चिंता में डाल दिया है । वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पिछले वर्ष चेयरमैन रहे मंगेश किनरे भी उक्त चुनाव में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी में हैं । मंगेश किनरे के समर्थकों व शुभचिंतकों की चिंता यह है कि महेश मडखोलकर की उम्मीदवारी मंगेश किनरे की उम्मीदवारी की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर डालेगी और मंगेश किनरे की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम करेगी । दरअसल इन दोनों का समर्थन-आधार क्षेत्र एक ही है - दोनों ही ठाणे क्षेत्र में पहचान-परिचय रखते हैं, दोनों ही महाराष्ट्रियन हैं और दोनों ही दक्षिणपंथी राजनीति में सक्रिय हैं । दक्षिणपंथी राजनीति में दोनों की सक्रियता का यह अंतर जरूर है कि महेश मडखोलकर शिव सेना के नजदीक हैं, तो मंगेश किनरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पैठ रखते हैं । एक सा समर्थन-आधार रखने के कारण - दोनों के उम्मीदवार होने की स्थिति में दोनों के एक-दूसरे की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का डर स्वाभाविक ही है ।
मंगेश किनरे के नजदीकी चूँकि महेश मडखोलकर की तुलना में मंगेश किनरे की स्थिति मजबूत मानते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि महेश मडखोलकर को अभी रीजनल काउंसिल में ही काम करना चाहिए तथा अपने समर्थन-आधार को और फैलाना चाहिए तथा फिर उसके बाद सेंट्रल काउंसिल के लिए आना चाहिए । महेश किनरे के नजदीकियों की इस बात में दम भी है । पिछली बार, वर्ष 2012 में हुए रीजनल काउंसिल के चुनाव में मंगेश किनरे को महेश मडखोलकर की तुलना में अच्छा समर्थन मिला था । उस चुनाव में मंगेश किनरे को फर्स्ट प्रिफरेंस में 1290 वोट मिले थे, जो फाइनल में 1397 तक पहुँच गए थे और मंगेश किनरे चौथे नंबर पर रहे थे । उनके मुकाबले, महेश मडखोलकर का प्रदर्शन काफी पिछड़ा हुआ था । महेश मडखोलकर को उस चुनाव में फर्स्ट प्रिफरेंस में कुल 682 वोट मिले थे, जो फाइनल तक पहुँचते हुए 1063 हो गए थे; और महेश मडखोलकर 22वें - यानि अंतिम नंबर पर रहे थे । उससे पिछले चुनाव में, यानि वर्ष 2009 में महेश मडखोलकर ने सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा था और उसमें उन्हें इतना कम समर्थन मिला था कि अगली बार उन्होंने सेंट्रल काउंसिल का चुनाव न लड़ने में ही अपनी भलाई देखी । इसी ट्रेक रिकॉर्ड को देखते हुए महेश मडखोलकर के कुछेक नजदीकियों ने भी उन्हें सलाह दी है कि उन्हें अभी रीजनल काउंसिल में ही सक्रिय रहना चाहिए तथा यहाँ सक्रिय रहते हुए अपने प्रभाव क्षेत्र का दायरा बढ़ाना चाहिए ।
महेश मडखोलकर लेकिन किसी की नहीं सुन/मान रहे हैं और अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए ही उम्मीदवारी प्रस्तुत करने पर जोर दे रहे हैं । दरअसल उन्होंने पाया है कि रीजनल काउंसिल में करने के लिए कुछ खास है ही नहीं और रीजनल काउंसिल में रहना समय बर्बाद करना है । उनके समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि पिछले चुनावों में उनकी उम्मीदवारी का प्रदर्शन भले ही कमजोर रहा हो, लेकिन उन्होंने अपनी स्थिति को और मजबूत किया है तथा अपने समर्थन-आधार को और फैलाया है । उनका दावा है कि महेश मडखोलकर ने मारवाड़ी व गुजराती चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अच्छी पैठ बनाई है और महाराष्ट्र व गुजरात की ब्रांचेज में अपने लिए समर्थन बनाया है - जिसका फायदा उन्हें आगामी चुनाव में निश्चित ही मिलेगा । महेश मडखोलकर के कुछेक समर्थकों को यह भी लगता है और वह कहते भी हैं कि वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में मंगेश किनरे ने अपने वोटरों को बुरी तरह से निराश किया है, जिस कारण उनके समर्थन-आधार में कमी आई है; और इसलिए महेश मडखोलकर के लिए अच्छा मौका बना है ।
मंगेश किनरे और महेश मडखोलकर के समर्थकों व शुभचिंतकों के दावे-प्रतिदावे चाहें जो हों - सेंट्रल काउंसिल में वर्षों बाद दो महाराष्ट्रियन सदस्य देखने के इच्छुक लोगों को मंगेश किनरे तथा महेश मडखोलकर की एकसाथ प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी से झटका लगा है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के अभी तक के इतिहास में सिर्फ 12 वर्ष ऐसे रहे हैं, जबकि मुकुंद चितले तथा वाईएम काले के रूप में दो महाराष्ट्रियन सेंट्रल काउंसिल में एक साथ रहे हैं । महाराष्ट्रियन लॉबी के प्रतिनिधि के रूप में अभी श्रीनिवास जोशी को देखा जाता है । अगले चुनाव में भी उनकी उम्मीदवारी और जीत को पक्का ही माना जा रहा है । महाराष्ट्रियन लॉबी के लोगों को लगता है कि मंगेश किनरे और महेश मडखोलकर में से यदि कोई एक उम्मीदवार होता है तो इंस्टीट्यूट की तेईसवीं काउंसिल में दो महाराष्ट्रियन हो सकते हैं, अन्यथा मुकुंद चितले और वाईएम काले का रिकॉर्ड अभी बना रह सकता है ।