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Monday, February 11, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की पानीपत ब्रांच के ट्रेजरर मितेश मल्होत्रा की बदनामी के कारण उन्हें सत्ता खेमे में शामिल नहीं करने तथा अलग-थलग रखने के वायदे के बीच पानीपत ब्रांच को सात सदस्यों की बजाये छह सदस्यों से ही चलाने की तैयारी

पानीपत । जितेंद्र बंगा ने पानीपत ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी की सदस्यता के लिए होने वाले चुनाव में बने न रहने की घोषणा करके मितेश मल्होत्रा की उम्मीदवारी को बड़ी राहत दी है । उल्लेखनीय है कि 'रचनात्मक संकल्प' की 7 फरवरी की रिपोर्ट में बताया गया था कि मितेश मल्होत्रा के पक्के वाले साथियों/समर्थकों के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले जितेंद्र बंगा के खुद उम्मीदवार बन जाने से मितेश मल्होत्रा को दोहरा नुकसान होने का खतरा पैदा हो गया है; और आशंका यह पैदा हो गई है कि जितेंद्र बंगा खुद तो डूबेंगे ही - मितेश मल्होत्रा को भी ले डूबेंगे । इस खतरे को भाँप कर ही मितेश मल्होत्रा ने जमीन/आसमान एक करके जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी को वापस करवा लेने में तो सफलता प्राप्त कर ली है, लेकिन लगता नहीं है कि मुसीबतों ने उनका पीछा छोड़ दिया है । पानीपत ब्रांच के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने अन्य उम्मीदवारों पर अभी से यह दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि मितेश मल्होत्रा ब्रांच की सदस्यता का चुनाव यदि जीत भी जाते हैं, तो भी उन्हें सत्ता खेमे में शामिल नहीं करना है और उन्हें अलग-थलग ही रखना है । मजे की बात यह है कि पानीपत ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों के लिए होने वाले चुनाव अभी चार-पाँच दिन दूर हैं, लेकिन अभी से पानीपत में लोगों की जुबान पर चर्चा आम है कि ब्रांच तो सात सदस्य नहीं, बल्कि छह सदस्य ही चलायेंगे । 
पानीपत ब्रांच की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने और जीतने की संभावना रखने वाले उम्मीदवारों और उनके नजदीकियों ने अभी से यह घोषणा कर दी है कि वह मितेश मल्होत्रा को तो अपने साथ नहीं रखेंगे । दरअसल ट्रेजरर के रूप में मौजूदा वर्ष में मितेश मल्होत्रा की ऐसी ऐसी हरकतें रही हैं कि पानीपत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उन्हें भारी बदनामी तो मिली ही है - साथ ही ब्रांच के हर संभावित पदाधिकारी को यह आभास भी हो गया है कि मितेश मल्होत्रा यदि किसी भी रूप में उनके साथ रहे, तो उनके लिए काम करना तो मुश्किल हो ही जायेगा - उनकी जान पर भी बन आएगी । ब्रांच के मौजूदा चेयरमैन अतुल चोपड़ा को ट्रेजरर के रूप में मितेश मल्होत्रा ने जिस तरह से तंग किया और तरह तरह से उन्हें 'ब्लैकमेल' करने की कोशिश की, उसके चलते ब्रांच में कामकाज तो बुरी तरह प्रभावित हुआ ही और ब्रांच में ताला पड़ने की नौबत आ गई - अतुल मल्होत्रा के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ा और उनकी तबियत काफी खराब हुई । अतुल चोपड़ा पानीपत के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउटेंट हैं, और पिछले वर्षों में वह दो/तीन बार दूसरों दूसरों के लिए अपने हाथ में आए चेयरमैन पद को कुर्बान कर चुके हैं; बड़ी मुश्किल से इस वर्ष उनके चेयरमैन बनने का मौका आया, तो मितेश मल्होत्रा ने अपनी लूट-खसोटपूर्ण मनमानियों से उनका जीना ही हराम कर दिया ।    
मितेश मल्होत्रा की बदनामी को इसलिए भी पंख मिले और उसका विस्तार हुआ, क्योंकि उन पर ट्रेजरर के रूप में बेंडर्स के बिल पास करने के ऐवज में पैसे ऐंठने के आरोप लगे हैं । ब्रांच के कामकाज और फंक्शन में होने वाले प्रत्येक छोटे/बड़े खर्चे में अपना कमीशन 'बसूलने' की मितेश मल्होत्रा की कोशिशों ने पानीपत ब्रांच के हर संभावित पदाधिकारी को डराया हुआ है - और इसीलिए हर कोई मितेश मल्होत्रा से दूर रहने तथा उन्हें दूर रखने की बातें कर रहा है । इस तरह की बातों ने मितेश मल्होत्रा के लिए चुनौती और मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जो जितेंद्र बंगा के चुनावी मुकाबले से बाहर होने की घोषणा के बाद भी कम होती हुई नहीं दिख रही हैं । मितेश मल्होत्रा के नजदीकियों को लग रहा है कि पानीपत ब्रांच के सदस्यों के बीच उनकी जैसी जो बदनामी है, और जिसके चलते हर संभावित विजेता उन्हें दूर रखने तथा उनसे दूर रहने की घोषणा कर रहा है - वह लोगों के बीच बहुत ही अपमानजनक स्थिति है; और ऐसी स्थिति में मितेश मल्होत्रा को अपने किए-धरे के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी चाहिए । मितेश मल्होत्रा को लेकर होने वाली इस तरह की चर्चाओं ने पानीपत ब्रांच के चुनाव को खासा दिलचस्प बना दिया है । 

Thursday, February 7, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की पानीपत ब्रांच के कामकाज और फंक्शन में होने वाले प्रत्येक छोटे/बड़े खर्चे में अपना हिस्सा 'बसूलने' की तिकड़मों से मितेश मल्होत्रा को मिली बदनामी को देखते हुए उनके समर्थक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने राकेश अरोड़ा तथा जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी को आगे बढ़ा कर मितेश मल्होत्रा की उम्मीदवारी को दोहरी चोट पहुँचाई

पानीपत । इंस्टीट्यूट की पानीपत ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी की सदस्यता के लिए राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी ने मितेश मल्होत्रा के पुनर्निर्वाचित होने के प्रयास को खासा तगड़ा झटका दिया है । ब्रांच के ट्रेजरर के रूप में अपनी हरकतों के लिए मितेश मल्होत्रा पानीपत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पहले से ही बदनाम हैं, जिसके चलते इस बार का चुनाव उनके लिए वैसे ही चुनौतीपूर्ण था - जिस पर राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है । दरअसल इन दोनों को मितेश मल्होत्रा के पक्के वाले साथियों/समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता है; पिछले चुनाव में इन्होंने मितेश मल्होत्रा की उम्मीदवारी के समर्थन में जमकर काम किया था । इस बार के चुनाव में इनके खुद उम्मीदवार बन जाने से मितेश मल्होत्रा को दोहरा नुकसान होने का खतरा पैदा हो गया है - इनके उम्मीदवार बन जाने से मितेश मल्होत्रा को एक तरफ तो अपनी उम्मीदवारी के लिए कार्यकर्ताओं का टोटा पड़ गया है, दूसरी तरफ इन दोनों को मिलने वाले वोट सीधे सीधे मितेश मल्होत्रा के वोटों में ही कमी करेंगे । मितेश मल्होत्रा, राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा पानीपत की ब्रांच की चुनावी राजनीति में न सिर्फ साथी/दोस्त/सहयोगी/समर्थक रहे हैं, बल्कि इनका समर्थन आधार और खेमा भी एक ही है । इनके दूसरे साथियों का मानना और कहना है कि तीनों के उम्मीदवार बन जाने से खतरा यह पैदा हो गया है कि कहीं तीनों ही चुनाव न हार जाएँ ?
उल्लेखनीय है कि पानीपत ब्रांच की सात सीटों के लिए नाम वापसी के बाद 10 उम्मीदवार मैदान में बचे हैं । इनमें मौजूदा वाइस चेयरमैन आदित्य नंदवानी, मनप्रीत सिंह गंभीर, सुरेश नंदवानी और योगेश गोयल की जीत को सुनिश्चित माना/बताया जा रहा है । भूपिंदर शर्मा और मुकेश गुप्ता को भी अच्छा समर्थन मिलता दिख रहा है और उन्हें मुकाबले में माना/पहचाना जा रहा है । नोएडा में काम करने और रहने के कारण संगीता प्रजापति के लिए पानीपत में वोट जुटाना मुश्किल तो माना जा रहा है, लेकिन पानीपत ब्रांच में कार्यरत ममता प्रजापति के सहयोग के कारण उनकी जीत की संभावना को अच्छा माना जा रहा है । मौजूदा ट्रेजरर के रूप में तमाम बदनामी के बावजूद मितेश मल्होत्रा के लिए चुनाव जीतना आसान ही होता, लेकिन राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी उनकी जीत में रोड़ा बनती दिख रही है । दरअसल राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी के चलते मितेश मल्होत्रा की उम्मीदवारी को जो ग्रहण लगा है, उसमें भूपिंदर शर्मा, मुकेश गुप्ता और संगीता प्रजापति की उम्मीदवारी के लिए सफलता की राह खुलती नजर आ रही है ।
मितेश मल्होत्रा के नजदीकियों का कहना/बताना है कि मितेश मल्होत्रा ने राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा का नामांकन वापस करवाने के लिए इन दोनों पर काफी दबाव भी बनाया था । इसके लिए अपने समर्थक पानीपत के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से उन्होंने इन दोनों पर दबाव भी डलवाया था । नजदीकियों के अनुसार, राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा अपना अपना नामांकन वापस लेने के लिए राजी भी हो गए थे, लेकिन फिर अचानक से पता नहीं क्या हुआ - उन्होंने अपना नामांकन वापस नहीं लिया । इन तीनों के नजदीकियों का कहना है कि खेमे के वरिष्ठ सदस्यों को दरअसल मितेश मल्होत्रा की जीत के प्रति संदेह है, इसलिए उन्होंने राकेश अरोड़ा और जितेंद्र बंगा को उम्मीदवार बने रहने के लिए हरी झंडी दे दी और नाम वापस लेने के उनके 'प्रोग्राम' को कैंसिल करवा दिया । असल में, मौजूदा वर्ष में ट्रेजरर के रूप में मितेश मल्होत्रा ने ब्रांच में काम ही नहीं होने दिए; शुरू के कुछेक महीने तो ब्रांच की सीपीई कमेटी का मुखिया पद पाने के लिए वह चेयरमैन अतुल चोपड़ा को ब्लैकमेल करते रहे और इस कारण ब्रांच में ताला पड़ने की नौबत आ गई । ट्रेजरर के रूप में बेंडर्स के बिल पास करने के ऐवज में पैसे ऐंठने की कोशिशों के कारण बिल पास होने और चेक रिलीज होने का काम टलता रहा और इस वजह से ब्रांच के कामकाज पर बहुत ही बुरा असर पड़ा । ब्रांच के कामकाज और फंक्शन में होने वाले प्रत्येक छोटे/बड़े खर्चे में अपना हिस्सा 'बसूलने' की मितेश मल्होत्रा की तिकड़मों ने ब्रांच में काम होने की स्थितियों को बुरी तरह से प्रभावित किया और इसके चलते पानीपत ब्रांच को इस वर्ष बहुत ही बुरे दिन देखने पड़े । पानीपत में इस स्थिति के लिए हर किसी ने मितेश मल्होत्रा को ही जिम्मेदार ठहराया और इस कारण पानीपत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के  बीच मितेश मल्होत्रा की खासी बदनामी है । मितेश मल्होत्रा के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि उनके समर्थक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ही इस बार उनकी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं हैं; इसीलिए उन्होंने राकेश अरोड़ा तथा जितेंद्र बंगा की उम्मीदवारी को आगे बढ़ा दिया है । इससे मितेश मल्होत्रा के लिए अपनी सीट बचाना मुश्किल हो गया है ।

Thursday, August 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के दूसरे कुछेक उम्मीदवारों की तुलना में पानीपत में अपनी स्थिति को काफी कमजोर पाते/देखते हुए अतुल गुप्ता ने असीम पाहवा को मोहरा बनाया और उनकी मदद से अमरजीत चोपड़ा का कार्यक्रम फ्लॉप करवाया था क्या ?

नई दिल्ली । पानीपत ब्रांच के एक आयोजन में करीब पाँच महीने पहले हुए हंगामे के तार इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य अतुल गुप्ता से जुड़ने की चर्चाओं ने मामले को खासा दिलचस्प बना दिया है । दरअसल उस हंगामे से पानीपत में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में जो नाटक शुरू हुआ था, उसका दूसरा भाग अभी हाल ही में खेला गया - जिसमें पोल खुली कि इस नाटक के असली सूत्रधार अतुल गुप्ता हैं । उल्लेखनीय है कि अभी तक इस मामले को असीम पाहवा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिणति के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन हाल में दोबारा से जो तमाशा हुआ तो लोगों को 'पता चला' कि असीम पाहवा तो बेचारे इस्तेमाल हो रहे थे - और पूरे खेल की बागडोर तो दिल्ली में बैठे अतुल गुप्ता के हाथ में थी । इसी के साथ लोगों को इस बात का भी जबाव मिल गया कि करीब पाँच महीने पहले का तमाशा इतना 'आक्रामक' क्यों था कि इंस्टीट्यूट के पूर्व अध्यक्ष अमरजीत चोपड़ा को अपमानित होकर वापस लौटना पड़ा । दरअसल अभी तक इस सवाल पर असमंजस बना हुआ था कि ब्रांच में पदाधिकारियों का झगड़ा क्यों तो उस समय सामने आया, जब अमरजीत चोपड़ा ब्रांच के सेमिनार में भाषण देने आए; और क्यों उसने इतना उग्र रूप ले लिया कि अमरजीत चोपड़ा को बिना भाषण दिए वापस लौटना पड़ा । इंस्टीट्यूट के किसी बड़े पदाधिकारी के साथ इंस्टीट्यूट की किसी ब्रांच में ऐसा सुलूक इससे पहले कभी देखने में नहीं आया । हालाँकि तब भी लोगों को शक तो हुआ था, कि यह तमाशा कहीं 'बाहर से तो निर्देशित नहीं हो रहा है, लेकिन लोगों की समझ में ज्यादा कुछ आया नहीं; और फिर उक्त तमाशे को एक तात्कालिक प्रतिक्रिया मान कर लगभग भुला भी दिया गया था ।    
किंतु अभी जब पानीपत ब्रांच में उस नाटक का अगला सीन मंचित हुआ, तो सारा माजरा साफ हो गया । उल्लेखनीय है कि करीब पांच महीने पहले पानीपत ब्रांच में जो तमाशा हुआ था, उसमें निशाना तत्कालीन चेयरमैन विशाल मल्होत्रा को बनाया गया था । उस तमाशे का नेतृत्व असीम पाहवा ने किया था । असीम पाहवा को खुन्नस तो इस बात की थी कि उनके उम्मीदवार गोविंद सैनी को हरा कर विशाल मल्होत्रा चेयरमैन बन गए थे; किंतु उन्होंने मुद्दा बनाया चेयरमैन के रूप में विशाल मल्होत्रा द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार को । विशाल मल्होत्रा को चेयरमैन बने कुछ ही दिन हुए थे - कुछ ही दिनों में उन्होंने भला ऐसा क्या भ्रष्टाचार कर लिया था कि असीम पाहवा को उनके खिलाफ हुड़दंग मचाना/मचवाना जरूरी लगा; और वह भी उस कार्यक्रम में जिसमें इंस्टीट्यूट के पूर्व चेयरमैन अमरजीत चोपड़ा को मुख्य वक्ता के रूप में भाषण करना था । असीम पाहवा और उनके साथियों को समझाने की बहुत कोशिश की गई कि जो मुद्दा वह उठा रहे हैं, उस पर बाद में बात हो जाएगी - अभी कार्यक्रम होने दिया जाए । असीम पाहवा और उनके साथियों ने लेकिन किसी की भी नहीं सुनी और कार्यक्रम नहीं हो पाया, तथा अमरजीत चोपड़ा को बिना भाषण दिए हुए ही वापस लौटना पड़ा । असीम पाहवा और उनके साथियों के रवैये को देखने वाले कुछेक लोगों को लगा भी कि इस हंगामे के पीछे असल उद्देश्य कहीं अमरजीत चोपड़ा को बैरंग लौटाने का तो नहीं है ?
उक्त हंगामे के बाद चूँकि विशाल मल्होत्रा ने चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया, और असीम पाहवा अपनी मनमानी करने में कामयाब हो गए - इसलिए बात आई-गई हो गई । वह आई-गई बात लेकिन अभी तब फिर मुखर हो उठी, जब पानीपत के एक कार्यक्रम में अतुल गुप्ता मुख्य वक्ता के रूप में पधारे और जिसमें असीम पाहवा को भी भाषण देना था । कार्यक्रम में मौजूद कुछेक लोगों ने असीम पाहवा से जानना चाहा कि विशाल मल्होत्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार के जो आरोप आपने लगाए थे, उन्हें लेकर क्या कार्रवाई की गई है ? उनसे पूछा गया कि उन्होंने तो विशाल मल्होत्रा पर बड़े गंभीर आरोप लगाए थे; अब जब ब्रांच पर उनका पूरी तरह से कब्जा है तो वह अपने आरोपों को सच साबित करने के लिए क्या कर रहे हैं ? असीम पाहवा ने पहले तो इन सवालों को टालने का प्रयास किया, किंतु बात जब बढ़ी तो असीम पाहवा ने बहानेबाजी की कि जाँच करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज/कागज ही गायब मिले । इस पर उन्हें कहा गया कि इससे तो मामला और भी गंभीर हो गया है, और उन्हें इसके लिए पुलिस में रिपोर्ट करना चाहिए और विशाल मल्होत्रा के खिलाफ कार्रवाई करना/करवाना चाहिए । असीम पाहवा लेकिन फिर भी बहानेबाजी करते रहे और सवालों को टालते रहे । बात बढ़ती, लेकिन उससे पहले अतुल गुप्ता बीच में कूद पड़े और उन्होंने असीम पाहवा को लोगों के सवालों से बचाया । इस मौके पर अतुल गुप्ता ने असीम पाहवा की जिस तरह से वकालत की और लोगों के सवालों से उन्हें बचाने का काम किया, उससे लोगों को यह समझने में देर नहीं लगी कि अतुल गुप्ता और असीम पाहवा के बीच अवश्य ही बड़ी स्वादपूर्ण खिचड़ी पकी हुई है । 
इस 'खिचड़ी' को लेकर चर्चा चली तो फिर कई रहस्य उघड़ते चले गए । असीम पाहवा के नजदीकियों ने ही वहाँ लोगों को बताया कि रीजनल काउंसिल के लिए असीम पाहवा की उम्मीदवारी को अतुल गुप्ता ने ही उकसाया है; और अतुल गुप्ता के सहयोग/समर्थन के भरोसे ही असीम पाहवा चुनावी मैदान में उतरे हैं । हालाँकि कुछेक लोगों का यह भी कहना रहा कि अतुल गुप्ता वास्तव में असीम पाहवा को इस्तेमाल कर रहे हैं और उनके जरिए अपनी 'जमीन' को बढ़ाने का जुगाड़ कर रहे हैं । मजे की बात यह है कि चुनावी संदर्भ में अतुल गुप्ता की स्थिति बहुत ही सुरक्षित समझी जा रही है, और कई लोगों को तो यहाँ तक लगता है कि वह तो सबसे ज्यादा वोट पायेंगे - लेकिन फिर भी अपने वोटों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्हें तरह तरह के प्रपंच करते हुए देखा/सुना जा रहा है । इसी प्रपंच के चलते उन्होंने पानीपत के नाटक की स्क्रिप्ट लिखी । दरअसल पानीपत में अतुल गुप्ता अपनी स्थिति दूसरे कुछेक उम्मीदवारों की तुलना में काफी कमजोर पाते/देखते हैं । पानीपत में अपनी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अतुल गुप्ता ने असीम पाहवा को मोहरा बनाया और उनकी मदद से अपने लिए मौके बनाने के प्रयास तेज किए । अब समझा जा रहा है कि अमरजीत चोपड़ा का कार्यक्रम फ्लॉप करवाने के लिए ही विशाल मल्होत्रा को निशाना बनाते हुए हंगामा करवाया गया था - और उस हंगामे का मास्टर माइंड अतुल गुप्ता थे । अतुल गुप्ता की इस भूमिका के खुलासे ने इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।