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Thursday, May 7, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सुरेश बिंदल के लिए बन रहे मौके को बोगस वोटों की मदद से छीन कर विनोद खन्ना के 'बच्चों के मामा' डीके अग्रवाल चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने थे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बोगस वोटों की राजनीति की नींव रखने के लिए डीके अग्रवाल ही जिम्मेदार ठहरते हैं; हर्ष बंसल और दीपक टुटेजा तो उनके चेले हैं

नई दिल्ली । हर्ष बंसल ने अपनी ताजा कारस्तानी में अपने पापों को छिपाने तथा दूसरों पर दोष मढ़ने की जो कुत्सित हरकत की है, उसके कारण वह लायन नेताओं के बीच एक बार फिर हँसी का पात्र बन गए हैं । लायन नेताओं के बीच चर्चा का विषय यही है कि दूसरों को मूर्ख समझने/बनाने की अपनी ओछी हरकतों के जरिए हर्ष बंसल कब तक अपने आप को मूर्ख साबित करता रहेगा ? पौराणिक कथाओं में शैतानों द्वारा अपने बुरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए देवताओं का रूप धरने और उनकी भाषा बोलने के असंख्य किस्से हैं । सीता का हरण करने के लिए रावण द्वारा साधू का भेष धरने का किस्सा तो खासा लोकप्रिय है । मौजूदा समय में भी अपराधी किस्म के लोगों द्वारा भले दिखने व भली बातें करके अपने काम निकालने के प्रयास खूब देखे जाते हैं । हर्ष बंसल ने तो लेकिन भले दिखने की कोशिश में बेशर्मी की सारी हदें पार कर देने का काम किया है । अपने डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के मॉरटोरियम में जाने के संदर्भ में लायन नेताओं को लिखे एक ईमेल पत्र में बोगस क्लब्स को लायनिज्म व डिस्ट्रिक्ट के लिए नुकसानदेह बताते हुए उन्होंने कहा है कि उनके डिस्ट्रिक्ट में बोगस क्लब्स की शुरुआत वर्ष 2007-08 में उम्मीदवार बने वीके हंस द्वारा 50 बोगस क्लब्स बनाने से हुई है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की चुनावी राजनीति से परिचित लोगों के अनुसार हर्ष बंसल का यह दावा सरासर झूठा है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बोगस क्लब्स की शुरुआत वीके हंस की उम्मीदवारी से हुई; सच तो यह है कि इस डिस्ट्रिक्ट में बोगस क्लब्स की राजनीति इससे बहुत पहले से शुरू हो चुकी थी । कब से ? इसकी पड़ताल करने से पहले यह जानना दिलचस्प होगा कि वीके हंस द्वारा 50 बोगस क्लब्स बनाये जाने के संदर्भ में हर्ष बंसल ने किस तरह अपने शैतानी रूप पर साधू का मुखौटा लगाने का बेशर्मीभरा प्रयास किया है । 
हर्ष बंसल की यह बात सच है कि वर्ष 2007-08 में वीके हंस की उम्मीदवारी को कामयाब बनाने के लिए डिस्ट्रिक्ट में 50 बोगस क्लब्स बनाये गए थे । हर्ष बंसल ने लेकिन बेशर्मी दिखाते हुए इस बात को छिपा लिया कि इन 50 बोगस क्लब्स के बनने के पीछे गंदा दिमाग और ओछी सक्रियता किसकी थी ? लायन राजनीति को जो कोई थोड़ा-बहुत भी जानता है वह समझता है कि कोई भी उम्मीदवार डिस्ट्रिक्ट में बोगस क्लब्स नहीं बना सकता; यह काम उसके लिए उसके समर्थक बड़े नेता करते हैं । उम्मीदवार को तो बस बोगस क्लब्स बनने में खर्च होने वाला पैसा देना होता है । वर्ष 2007-08 में वीके हंस जब पहली बार उम्मीदवार बने थे, तब उनके सरपरस्त नेता ने उन्हें बोगस वोटों के सहारे चुनाव जीतने का फार्मूला सुझाया था और खर्चे का हिसाब बताया था । वीके हंस खर्चा करने को तैयार हो गए थे और तब उस वर्ष 50 बोगस क्लब्स बने । हर्ष बंसल उस वर्ष 50 बोगस क्लब बनने की बात तो बताते हैं, लेकिन इस बात को पूरी बेशर्मी के साथ छिपा जाते हैं कि वह 50 बोगस क्लब्स किसकी सरपरस्ती में बने थे ? दरअसल हर्ष बंसल इस तथ्य का यदि खुलासा करते तो उन्हें अपना ही नाम लेना पड़ता । उस वर्ष वीके हंस की उम्मीदवारी का झंडा हर्ष बंसल के पास ही था, और 50 बोगस क्लब्स बना कर चुनाव जीतने का फार्मूला हर्ष बंसल के गंदे दिमाग की ही उपज था । हर्ष बंसल को लगा होगा कि इस सच्चाई को वह नहीं बतायेंगे और छिपा जायेंगे, तो अपनी काली करतूतों से लोगों का ध्यान भटका लेंगे । हर्ष बंसल की करतूतों का लेकिन ऐसा बोलबाला है कि उनकी यह चाल सफल नहीं हो सकी और लायन नेताओं के बीच वह हँसी का पात्र बन बैठे । हालाँकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बोगस क्लब्स की राजनीति की शुरुआत हर्ष बंसल ने की थी; शुरुआत तो यह पहले से ही हो चुकी थी - हर्ष बंसल ने तो इस कलाकारी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की । 
डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री का इतिहास वर्ष 1993-94 से शुरू होता है, जिसमें पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डीके अग्रवाल थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका 'चुनाव' उससे पिछले वर्ष, यानि वर्ष 1992-93 में अविभाजित डिस्ट्रिक्ट 321 ए में हुआ था । वर्ष 1992-93, अविभाजित डिस्ट्रिक्ट 321 ए का अंतिम वर्ष था, और उस वर्ष अविभाजित डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद खन्ना थे । अविभाजित डिस्ट्रिक्ट में विभाजित डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के लिए जो चुनाव हुआ था, उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के लिए चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का जो चुनाव होना था, उसमें सुरेश बिंदल का पलड़ा भारी था और हर कोई सुरेश बिंदल को ही डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में देख/पहचान रहे थे । लेकिन सुरेश बिंदल का मौका डीके अग्रवाल ने विनोद खन्ना की मदद से हड़प लिया । आज कई लोगों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि उस समय डीके अग्रवाल के विनोद खन्ना के साथ बहुत ही नजदीकी संबंध होते थे । उनके नजदीकी संबंधों की जड़ें उनके परिवारों तक पहुँची हुई थीं । डीके अग्रवाल, विनोद खन्ना की पत्नी रेणु खन्ना को बहन मानते थे । रेणु खन्ना को डीके अग्रवाल जिस तरह दीदी दीदी कह कर संबोधित करते थे, उसे सुनते/देखते हुए लायन नेताओं ने डीके अग्रवाल का नाम ही 'बच्चों के मामा' रख दिया था । उस समय उनका यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया था कि बड़े लायन नेता भी डीके अग्रवाल की बात करते थे, तो उन्हें 'बच्चों के मामा' कह कर संबोधित/उच्चारित करते थे । अपने 'बच्चों के मामा' डीके अग्रवाल को विनोद खन्ना ने टिप्स दी कि वह यदि पीपी भारद्वाज की मदद जुगाड़ लें, तो सुरेश बिंदल को पछाड़ कर नए डिस्ट्रिक्ट के चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन जायेंगे । 
पीपी भारद्वाज अविभाजित डिस्ट्रिक्ट में करीब सौ सौ की सदस्यता वाले तीन-चार बोगस क्लब्स रखने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे, और अपने बोगस क्लब्स के जरिये अविभाजित डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अच्छा-खासा दखल रखने वाले नेता के रूप में देखे/पहचाने जाते थे । पीपी भारद्वाज मूलतः नरेश अग्रवाल के डिस्ट्रिक्ट के खिलाड़ी थे और वही वह गवर्नर बने थे । एक सरकारी बीमा कंपनी में नौकरी करने वाले पीपी भारद्वाज ट्रांसफर के चलते दिल्ली आ गए तो यहाँ के डिस्ट्रिक्ट में 'खिलाड़ी' बन गए । विनोद खन्ना ने ही पीपी भारद्वाज के बोगस क्लब्स के वोटों का सौदा डीके अग्रवाल से करवाया, जिनकी ताकत से सुरेश बिंदल का चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का मौका छिना और डीके अग्रवाल चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने । इस तरह डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की शुरुआत ही बोगस क्लब्स के वोटों के भरोसे मिली जीत के 'सम्मान' से हुई । सुरेश बिंदल का मौका छीनने में डीके अग्रवाल को जो सफलता मिली, उससे बोगस क्लब्स की ताकत पर डीके अग्रवाल को ऐसा भरोसा हुआ कि अपने गवर्नर-काल में उन्होंने ललित नरूला को अगले लायन वर्ष का गवर्नर और नरहरि डालमिया को वाइस गवर्नर बनवाने/चुनवाने का जाल बिछाया और नरहरि डालमिया के पैसे लगवा कर बोगस वोट बनाये । डीके अग्रवाल के यह दोनों उम्मीदवार हालाँकि चुनाव हार गए थे, लेकिन नरहरि डालमिया को जेएन भूटानी से हरवाने का आरोप डीके अग्रवाल पर ही लगा था । ललित नरूला तो सुरेश बिंदल से चार-पाँच वोटों से ही हारे थे, किंतु नरहरि डालमिया को जेएन भूटानी से 35 के करीब वोटों से पराजय मिली थी । उस समय आरोप लगा था कि नरहरि डालमिया को डीके अग्रवाल ने जितवाने का भरोसा तो उनका पैसा लगवाने के लिए दिया था, वास्तव में साथ वह जेएन भूटानी के थे । 
डीके अग्रवाल इस तरह के खेल करते रहे हैं । वह 'दिखते' किसी के साथ और सचमुच में 'होते' किसी और के साथ । उनके इसी रवैये पर राकेश जैन ने उन्हें 'डुप्लीकेट कुमार' जैसा नाम दिया था । जिन विनोद खन्ना के 'बच्चों के मामा' जैसी उन्हें पहचान मिली थी, उन्हीं विनोद खन्ना की फिर उन्होंने ऐसी हालत कर दी थी कि विनोद खन्ना को डिस्ट्रिक्ट से भाग कर डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में शरण लेनी पड़ी । बोगस वोट तथा क्लब्स बनवाने का खेल हर्ष बंसल ने वास्तव में डीके अग्रवाल से ही सीखा । बोगस वोट और क्लब्स बनाने के लिए जो क्लेरिकल हुनर चाहिए होता है, उसमें हर्ष बंसल चूँकि एक्सपर्ट रहे इसलिए वह डीके अग्रवाल की गुडबुक में शामिल हुए । बोगस वोट के खेल की ताकत समझने के बाद जिस तरह डीके अग्रवाल ने विनोद खन्ना को किनारे लगाया, ठीक वैसे ही हर्ष बंसल ने डीके अग्रवाल से निपटने की कोशिश की तो दोनों में खटक गई । तब क्लेरिकल काम के लिए डीके अग्रवाल ने दीपक टुटेजा का सहारा लिया । डीके अग्रवाल की देखरेख में ही दीपक टुटेजा बोगस वोटों के खिलाड़ी बने । दीपक टुटेजा के इस खिलाड़ीपने से मिली ऑक्सीजन के सहारे ही डीके अग्रवाल ने हर्ष बंसल को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उसकी औकात बताई और हर्ष बंसल को जीरो बना कर रख दिया । फिर लेकिन डीके अग्रवाल को दीपक टुटेजा से भी शिकायत होने लगी । समझा जाता है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दीपक टुटेजा की बढ़ती ताकत से अजय बुद्धराज को खतरा महसूस हुआ, और उन्होंने डीके अग्रवाल के कान भरे । डीके अग्रवाल ने दीपक टुटेजा से निपटने की रणनीति में हर्ष बंसल से हाथ मिला लिया, लेकिन हर्ष बंसल की लोगों के बीच इतनी बदनामी है कि उनसे मिलकर डीके अग्रवाल खुद भी जीरो हो गए ।
दीपक टुटेजा से मिली मात पर मात से उबरने के लिए डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल की जोड़ी ने ऐसे हालात पैदा किए कि डिस्ट्रिक्ट मॉरटोरियम में चला गया है । मजे की बात यह है कि बोगस वोटों का सारा ठीकरा दीपक टुटेजा के सिर फोड़ने की कोशिश करते हुए डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल अपने आप को बड़ा पवित्र दिखाने/जताने की जो कोशिश कर रहे हैं, उससे कई दबी/छिपी बातें सामने आ रही हैं - जिनसे वास्तव में इन्हीं की किरकिरी व फजीहत हो रही है ।

Monday, April 20, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के मॉरटोरिअम में जाने के बावजूद वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और/या एडमिनिस्ट्रेटिव का पद दिलवाने के लिए उनके कलीग्स फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने प्रयास तो शुरू किए हैं, लेकिन सेकेंड वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी कर रहे नरेश अग्रवाल का रवैया वीके हंस को 'न्याय' दिलाने के मामले में अभी स्पष्ट नहीं है

नई दिल्ली । वीके हंस को मॉरटोरिअम पीरियड में डिस्ट्रिक्ट का गवर्नर और/या एडमिनिस्ट्रेटिव बनाने/बनवाने के लिए कुछेक दलाल किस्म के लायन नेता सक्रिय हो गए हैं, जो ऑफर दे रहे हैं कि वीके हंस यदि नरेश अग्रवाल के सेकेंड वाइस प्रेसीडेंट पद के अभियान के लिए मोटी रकम खर्च करें तो वह नरेश अग्रवाल से कह कर उन्हें मॉरटोरिअम पीरियड में डिस्ट्रिक्ट का गवर्नर और/या एडमिनिस्ट्रेटिव नियुक्त करवा देंगे । इनका कहना है कि नरेश अग्रवाल ने ही डिस्ट्रिक्ट के नेताओं की हरकतों और शिकायतों से परेशान होकर डिस्ट्रिक्ट को मॉरटोरिअम में डलवाया है, ताकि डिस्ट्रिक्ट के नेताओं की अक्ल कुछ ठिकाने लगे । अपनी इस कार्रवाई में नरेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट के नेताओं को अपनी शरण में आने के लिए मजबूर करने का मौका भी पाया/देखा है : उन्हें पक्का विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट को मॉरटोरिअम से बाहर निकलवाने के लिए डिस्ट्रिक्ट के नेता उनकी खुशामद करने उनके पास अवश्य ही आयेंगे । दरअसल नरेश अग्रवाल के इन्हीं तेवरों को देखते हुए कुछेक दलाल किस्म के लोगों ने वीके हंस के लिए ऑफर निकाल दिया है कि वह यदि नरेश अग्रवाल के 'काम' आना स्वीकार करें, तो नरेश अग्रवाल भी उनका काम कर/करवा सकते हैं । इनका तो यहाँ तक दावा है कि वीके हंस ने चूँकि नरेश अग्रवाल के चुनाव अभियान के लिए पैसे नहीं दिए हैं, इसलिए 'भी' नरेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट को मॉरटोरिअम में डलवा दिया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का वीके हंस का मौका खत्म करवा दिया ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का वीके हंस का मौका जिस तरह से छिना है, उसे लेकर उनके कलीग्स फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच गहरी नाराजगी और निराशा है । उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में जो कुछ भी हुआ और जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट के मॉरटोरिअम में जाने की स्थितियाँ बनीं, उसमें वीके हंस का भला क्या दोष है ? वीके हंस का कोई दोष भी नहीं है, लेकिन फिर भी डिस्ट्रिक्ट के मॉरटोरिअम में जाने से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं का हुआ है । इसी तर्क के साथ मल्टीपल के डिस्ट्रिक्ट्स के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स लायंस इंटरनेशनल से यह गुहार लगाने की तैयारी कर रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट को भले ही मॉरटोरिअम में डाल दिया गया है, लेकिन मॉरटोरिअम-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद वीके हंस को ही सौंपा जाए । मल्टीपल के कुछेक बड़े नेताओं को भी लगता है कि लायंस इंटरनेशनल ने डिस्ट्रिक्ट को मॉरटोरिअम में डालने का फैसला करने के साथ-साथ ही जिस तरह से वीके हंस को इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में पहुँचने के लिए टिकिट भेजा है, उससे लगता है कि लायंस इंटरनेशनल वीके हंस के साथ अन्याय नहीं होने देने का मन शायद बना चुका है । उल्लेखनीय है कि पूर्व में डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में पहले अशोक कपूर और फिर श्याम विजयवर्गीय के साथ लायंस इंटरनेशनल न्यायपूर्ण उदारता दिखा चुका है जिसमें अशोक कपूर बारह महीनों की बजाये सत्रह महीने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर रहे और इक्यावन प्रतिशत से अधिक खिलाफ वोट पाने के बावजूद श्याम विजयवर्गीय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने । इन्हीं उदाहरणों के भरोसे तथा होनोलुलु का टिकट आने की स्थिति से उम्मीद की जा रही है कि वीके हंस के साथ भी 'अन्याय' शायद न हो ।
हालाँकि सारा दामोमदार नरेश अग्रवाल के रवैये पर निर्भर है । कुछेक लोगों को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री को मॉरटोरिअम में डलवाने का सारा खेल नरेश अग्रवाल ने ही संभव करवाया है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की राजनीति में वीके हंस विरोधी नेताओं के साथ नरेश अग्रवाल की नजदीकी जगजाहिर बात है । ऐसे में, नरेश अग्रवाल की तरफ से वीके हंस को सहानुभूतिपूर्ण न्याय दिलवाने की कोई उम्मीद नहीं कर रहा है । लेकिन नरेश अग्रवाल के लिए खतरा भी है - मल्टीपल के डिस्ट्रिक्ट्स में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच जिस तरह वीके हंस को लेकर अभी जो सहानुभूति दिख रही है, उसने यदि सचमुच संगठित रूप ले लिया और नरेश अग्रवाल पर दबाव बनाया तो नरेश अग्रवाल को वीके हंस को न्याय दिलाने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है । नरेश अग्रवाल को यह तथ्य अच्छे से पता है कि पिछले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव का फैसला करीब पाँच सौ वोटों के अंतर से ही हुआ था; इसलिए वीके हंस के मुद्दे पर मल्टीपल 321 के गवर्नर्स यदि वास्तव में आंदोलित हो गए तो सेकेंड वाइस प्रेसीडेंट पद का उनका चुनाव खतरे में भी पड़ सकता है ।
जाहिर तौर पर वीके हंस के लिए उम्मीदें अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई हैं; हालाँकि उनकी उम्मीद के फलीभूत होने का सारा दारोमदार इस बात पर निर्भर है कि उनका केस किस तरह आगे बढ़ता है । उन्हें न्याय दिलवाने के नाम पर नरेश अग्रवाल से नजदीकी होने का दावा करने वाले कुछेक लोग जिस तरह से उनसे पैसे ऐंठने के की तरकीबें लगाने लगे हैं, उससे यह भी लग रहा है कि वीके हंस के लिए आगे की राह बहुत चुनौतीपूर्ण भी है ।

Sunday, April 19, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के कुछेक नेताओं की नकारात्मक राजनीति के कारण डिस्ट्रिक्ट मॉरटोरिअम में गया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता अपने अधिकार छिनवाने वाले देश के पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने

नई दिल्ली । नरेश गुप्ता देश के पहले ऐसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने हैं जिनसे लायंस इंटरनेशल ने कार्यकाल खत्म होने से पहले गवर्नर पद के अधिकार छीन लिए हैं । देश में लायनिज्म का यह साठवाँ वर्ष है - और इस साठवें वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के गवर्नर के रूप में नरेश गुप्ता ने लायनिज्म को जिस तरह कलंकित किया है, वह अपने आप में बेमिसाल उदाहरण तो है ही; एक रिकॉर्ड भी है । अपने और लायनिज्म के मुँह पर एक साथ कालिख पुतवाने का नरेश गुप्ता ने जो 'कमाल' किया है, वह सिर्फ इस कारण से संभव हो सका क्योंकि उन्होंने अपने आपको पूरी तरह हर्ष बंसल और डीके अग्रवाल के यहाँ गिरवी रख दिया और अपने आप को उनकी कठपुतली बना लिया । डिस्ट्रिक्ट के मॉरटोरिअम में जाने से उन गतिविधियों पर रोक लग गई है, जिन गतिविधियों ने पिछले करीब एक वर्ष से डिस्ट्रिक्ट में लायनिज्म को एक गंदा नाला बना दिया था । डिस्ट्रिक्ट में राजनीति और राजनीति के नाम पर फर्जीवाड़ा वर्षों से हो रहा था और प्रत्येक नेता ने अपने अपने तरीके से फर्जी कामों में भूमिका निभाई हुई थी । लायनिज्म का तानाबाना लेकिन इतना विशाल और महान है कि वह तमाम तरह की टुच्चईयों को झेल लेता है । लायनिज्म ने हर्ष बंसल को झेल लिया, जिसने हर किसी से गालियाँ खाईं हैं - और सिर्फ गालियाँ ही नहीं, भरी मीटिंग में लात-घूँसे भी खाए हैं ।
लायनिज्म किंतु तब हर्ष बंसल से हार गया, जब हर्ष बंसल ने ऐलान कर दिया कि वह किसी भी कीमत पर वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नहीं बनने देंगे । हर्ष बंसल चुनावी तरीके से तो वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने से रोकने में विफल रहे और फिर उन्होंने गैर-लायनिस्टिक तरीके अपनाए - जहाँ लायनिज्म को हारना ही था । डीके अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट में बहुत से लोगों को बनाया और बिगाड़ा है - इसके बावजूद वह डिस्ट्रिक्ट के एक सर्वमान्य नेता बने और सभी के बीच अपने लिए आधार बनाया; किंतु दीपक टुटेजा को 'बिगाड़ने' के अपने इरादे में वह इतनी दूर तक चले गए कि हर्ष बंसल जैसे घटिया व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने से भी परहेज नहीं बनाये रख सके, तो डिस्ट्रिक्ट को मॉरटोरिअम में पहुँचाने के एक जिम्मेदार वह भी बने । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश त्रेहन के कुछेक 'खेल' विजय शिरोहा के कारण यदि कामयाब नहीं हो सके, तो राकेश त्रेहन के मन में उनके प्रति गुस्सा पैदा हुआ - यहाँ तक तो बात समझ में आती है; लेकिन यह गुस्सा एक लीचड़ किस्म के व्यक्तिगत विरोध में बदल जाये तो फिर हालात मॉरटोरिअम की तरफ ही जाते हैं । ओंकार सिंह रेनु लायनिज्म में कुछ अच्छा करने के इरादे से आते हैं और बहुत कुछ करते भी हैं; यह करते हुए वह डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में एक पक्ष के साथ जुड़ जाते हैं - इसमें कोई गलती नहीं है; लेकिन एक पक्ष के साथ वह इस हद तक जुड़ जाते हैं कि उस पक्ष की राजनीति को साधने के लिए वह रीजन चेयरमैन होने के बाद जोन चेयरमैन बनना भी स्वीकार कर लेते हैं, तो यह घटिया लोगों के साथ सहभागी बनने का उदाहरण है ।
डिस्ट्रिक्ट के मॉरटोरिअम में जाने के लिए हर्ष बंसल, डीके अग्रवाल, राकेश त्रेहन जैसे लोग ही जिम्मेदार नहीं हैं - ओंकार सिंह रेनु जैसे लोग भी जिम्मेदार हैं । इसलिए जिम्मेदार हैं क्योंकि इन्होंने जो पाना/करना चाहा उसके लिए इन्होंने लिमिट क्रॉस करने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई । बात सिर्फ यह नहीं है कि इन्होंने फर्जीवाड़े किए और षड्यंत्र किए - वह तो दीपक टुटेजा और विजय शिरोहा ने भी किए । किसने नहीं किए ? कम/ज्यादा का अंतर भले ही हो, फर्जीवाड़े और षड्यंत्र के गंदे नाले में सभी ने हाथ धोये हैं । लायनिज्म में यदि चुनाव की व्यवस्था है, तो राजनीति तो होगी ही; और यदि राजनीति होगी तो फर्जीवाड़ा व षड्यंत्र भी होंगे - यह एक कठोर सच्चाई है; जो लोग बड़ी आदर्शात्मक बातें करते हैं या कर रहे हैं और धर्मात्मा 'दिखने' का प्रयास कर रहे हैं, वह झूठे और पाखंडी लोग हैं । बात फर्जीवाड़े और षड्यंत्र की नहीं है - बात दाल में नमक या नमक में दाल की है !
डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री मॉरटोरिअम में इसलिए नहीं गया क्योंकि इसमें राजनीति हुई और राजनीति में फर्जीवाड़ा व षड्यंत्र हुआ - यह सब तो यहाँ शुरू से हो रहा था । दूसरे डिस्ट्रिक्ट में भी खूब राजनीति होती है और खूब फर्जीवाड़े व षड्यंत्र होते हैं । यह कोई नई बात नहीं है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री मॉरटोरिअम में इसलिए गया क्योंकि यहाँ कुछेक नेताओं ने अपनी नकारात्मक राजनीति को सफल बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने का फैसला लिया था । आरके शाह की चुनावी जीत में लायंस इंटनेशनल के फैसले के जरिये तथा विक्रम शर्मा के 'चयन' में अदालती कार्रवाई के जरिये फच्चर फँसा देने के बाद भी हालात बहुत खराब नहीं हुए थे; और इसी का नतीजा था कि दोनों पक्षों के नेता आरके शाह व विक्रम शर्मा को बारी बारी से गवर्नर 'चुन' लेने के फार्मूले पर लिए राजी हो गए थे । आरके शाह के समर्थक नेता पहला नंबर विक्रम शर्मा को भी देने को तैयार हो गए थे । पर यह हो न सका, क्योंकि विक्रम शर्मा के समर्थक नेताओं का उद्देश्य दरअसल 'कुछ' और था ! हर्ष बंसल को वीके हंस से दुश्मनी निकालनी थी; डीके अग्रवाल को दीपक टुटेजा से निपटना था; राकेश त्रेहन को विजय शिरोहा से बदला लेना था; नरेश गुप्ता को हर्ष बंसल व डीके अग्रवाल की गुलामी करनी थी; ओंकार सिंह रेनु को इन लोगों के सहारे 'आगे' बढ़ना था - और इस सबके लिए यह विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी को 'इस्तेमाल' कर रहे थे ।
विक्रम शर्मा के समर्थक नेताओं को यदि सचमुच में विक्रम शर्मा को गवर्नर बनवाना होता, तो विक्रम शर्मा को वह आराम से गवर्नर बनवा लेते; पर वह तो अपनी अपनी राजनीति करने में लगे रहे और डिस्ट्रिक्ट को मॉरटोरिअम की भेंट चढ़ा बैठे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता यदि जरा सी अक्ल और जरा सा आत्मसम्मान दिखाते तो न तो डिस्ट्रिक्ट को इस तरह से बदनाम होना पड़ता और न खुद उन्हें इस तरह बेइज्जत होना पड़ता ।