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Thursday, October 20, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में नरेश अग्रवाल से फर्जी एल्मनॅक विमोचित करवाने की धोखाधड़ी से पीछा अभी छूटा भी नहीं था, कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा दूसरी कैबिनेट मीटिंग के लिए पैसा माँगने को लेकर निशाने पर आ गए

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा डिस्ट्रिक्ट की सेकेंड कैबिनेट मीटिंग के लिए कैबिनेट के सदस्यों से पैसे माँग कर गंभीर आरोपों के घेरे में फँस गए हैं । दरअसल विशाल सिन्हा कैबिनेट सदस्यों से पहले ही मोटी रकम बसूल चुके हैं, और उक्त रकम बसूलते समय उन्होंने दावा/वायदा किया था कि कैबिनेट सदस्यों से किसी कैबिनेट मीटिंग में, अधिष्ठापन समारोह और अवॉर्ड समारोह में पैसा नहीं लिया जायेगा । लोगों को हैरानी है कि विशाल सिन्हा दूसरी कैबिनेट मीटिंग तक आते-आते अपना दावा/वायदा भूल गए, और कैबिनेट मीटिंग के लिए पैसे माँगने लगे । विशाल सिन्हा हालाँकि लोगों को पैसे माँगने का 'कारण' बता/समझा रहे हैं, लेकिन उनकी बदकिस्मती है कि लोग उनके द्धारा बताए जा रहे कारण को समझने की बजाए उन्हें कोसने में लगे हैं - और उनके द्धारा बताए जा रहे कारण को उनकी ठगी की एक तरकीब के रूप में देख/बता रहे हैं । विशाल सिन्हा का कहना है कि दूसरी कैबिनेट मीटिंग वह भीमताल में कर रहे हैं, और वहाँ एक बढ़िया होटल में लोगों के एक रात ठहरने की व्यवस्था कर रहे हैं - वह तो एक रात होटल में ठहरने के खर्च को पूरा करने के लिए पैसे माँग रहे हैं । विशाल सिन्हा का यह तर्क कैबिनेट सदस्यों को लेकिन उनकी चालाकी लग रहा है । लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा कान सीधे न पकड़ कर, थोड़ा घुमा कर पकड़ रहे हैं - और चाह रहे हैं कि लोग उनकी इस चालाकी को चुपचाप स्वीकार कर लें । लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा कैबिनेट मीटिंग भीमताल में करें या झुमरी तलैया में करें - अपने दावे/वायदे के अनुसार उसके लिए कोई पैसा न माँगे; और जो कोई वहाँ होटल में रुकना चाहता है, उसे अपना इंतजाम खुद करने का मौका/अधिकार दें । हाँ, वह अपनी तरफ से एक विकल्प/पैकेज दे सकते हैं; जिसे उनका पैकेज पसंद आएगा, वह उनसे ले लेगा । लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा को कैबिनेट सदस्यों से किए गए अपने दावे/वायदे को याद करते/रखते हुए कैबिनेट मीटिंग के लिए पैकेज थोपना नहीं चाहिए ।
विशाल सिन्हा के तर्क से जो लोग सहमत भी हैं, उनका भी कहना है कि विशाल सिन्हा ने एक रात होटल में ठहरने/ठहराने के नाम पर कैबिनेट सदस्यों से पैसे माँग कर गलत किया है, और नाहक ही परेशानी मोल ले ली है । विशाल सिन्हा लेकिन अपनी 'गलती' मानने को तैयार ही नहीं हैं । उनका कहना है कि पिछले वर्षों में कई एक (पूर्व) डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने भीमताल और या ऐसी ही जगहों पर कैबिनेट मीटिंग्स या अन्य कार्यक्रम किए हैं, और उसके लिए लोगों से पैसे लिए हैं - इस पर कभी कोई विरोध नहीं हुआ; उन्हें लेकिन निशाना बनाया जा रहा है । लोगों की तरफ से इसका जबाव भी सुनने को मिला है, जिसमें कहा/बताया जा रहा है कि दूसरे गवर्नर्स की तुलना में विशाल सिन्हा की बदनामी ज्यादा है; लोग अच्छी तरह जानते/पहचानते हैं कि विशाल सिन्हा झूठ बोलने में, सामने कुछ और पीछे कुछ कहने में, धोखेबाजी करने में, इधर की उधर करने में बड़े एक्सपर्ट हैं - इसलिए उनकी हर बात, उनका हर काम शक के घेरे में आ जाता है । वह हर काम इतना घुमाफिरा कर तथा छिपा कर करते हैं कि कुछेक लोगों का शक फिर सभी का विश्वास बन जाता है । बेचारे विशाल सिन्हा की डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच (कु)ख्याति ऐसी है कि उनकी हर हरकत तुरंत से लोगों की पकड़ में आ जाती है - और फिर उनकी खुद की सफाई भी उन्हें किसी भी तरह से नहीं बचा पाती है ।
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट एल्मनॅक को लेकर विशाल सिन्हा ने इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर अरुणा ओसवाल सहित लायंस इंटरनेशनल के अन्य पदाधिकारियों सहित डिस्ट्रिक्ट के लोगों की आँखों में धूल झोंकने का जो काम किया - वह इस बात का सुबूत है कि धोखाधड़ी करने में विशाल सिन्हा खासा दुस्साहस रखते हैं । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में विशाल सिन्हा ने नरेश अग्रवाल से डिस्ट्रिक्ट एल्मनॅक को विमोचित करवाया । एल्मनॅक हालाँकि उन्होंने किसी को दी नहीं - उनका कहना था कि प्रिंटर/बाइंडर ने अभी कुछ ही प्रतियाँ दी हैं; जैसे ही उन्हें एल्मनॅक की प्रतियाँ मिलेंगी, वह सभी के पते पर पहुँचा देंगे । विमोचित करते समय जो थोड़ी सी प्रतियाँ मंचासीन अतिथियों के पास थीं, विशाल सिन्हा ने उन्हें भी झटपट तरीके से इकट्ठा करके छिपा दिया । बाद में प्रिंटर/बाइंडर से लोगों को पता चला कि एल्मनॅक तो अभी तैयार ही नहीं हुई है; और विशाल सिन्हा ने रद्दी कागजों को जोड़ कर फर्जी एल्मनॅक की पाँच/सात कॉपी बनवा ली थीं, और नरेश अग्रवाल से उसे ही विमोचित करवा लिया । फर्जी एल्मनॅक की एक कॉपी 'रचनात्मक संकल्प' के पास भी आ गई है । फर्जी एल्मनॅक का भेद खुला, तो विशाल सिन्हा ने पैंतरा बदला और लीपापोती करते हुए कहना शुरू किया कि उन्होंने एल्मनॅक नहीं, बल्कि एल्मनॅक का टाइटल कवर विमोचित करवाया था । इस सवाल का जबाव लेकिन उन्होंने नहीं दिया कि टाइटल कवर ही यदि उन्हें विमोचित करवाना था, तो प्रिंटर/बाइंडर से रद्दी कागजों को जोड़ कर फर्जी एल्मनॅक की पाँच/सात कॉपी बनवाने की उन्हें क्या जरूरत थी ? एल्मनॅक के नाम पर किए गए फर्जीवाड़े की पोल खुलने से विशाल सिन्हा की कार्यक्षमता की पोल और खुल गई : लोगों ने पूछना शुरू किया है कि गवर्नरी के तीसरे महीने में तो वह एल्मनॅक का कवर तैयार कर/करवा पाए हैं - ऐसे में एल्मनॅक उनकी गवर्नरी का कार्यकाल पूरा होने तक आ जाएगी या नहीं ?
एल्मनॅक के फर्जीवाड़े को लेकर विशाल सिन्हा की फजीहत अभी हो ही रही थी, कि दूसरी डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग के लिए कैबिनेट सदस्यों से पैसे माँगने का विवाद शुरू हो गया । लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विशाल सिन्हा विवादों का कोई रिकॉर्ड बनायेंगे - एक विवाद थमता नहीं है, कि वह दूसरे विवाद में जा फँसते हैं । विशाल सिन्हा से हमदर्दी रखने वाले लायन सदस्यों को भी लगता है और वह कहते भी हैं कि विशाल सिन्हा ने अपनी हरकतों से अपनी गवर्नरी का मज़ाक बनवा लिया है, और इसी का नतीजा है कि डिस्ट्रिक्ट में उनकी बातों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है । यही कारण है कि विशाल सिन्हा जिस किसी को भी सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में तैयार करते हैं, वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच विशाल सिन्हा की असलियत देख/जान कर भाग खड़ा होता है - और तमाम कोशिशों के बावजूद विशाल सिन्हा एक उम्मीदवार खड़ा नहीं कर पा रहे हैं ।

Tuesday, April 22, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 323 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए राजू मनवानी का समर्थन अरूणा ओसवाल के लिए फायदे के साथ-साथ मुसीबत का सौदा भी बना है और मुसीबत के इसी सौदे में संतोष शेट्टी के समर्थकों को उम्मीद की संभावना दिख रही है

मुंबई । इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी के खुले और सक्रिय समर्थन के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर एनडोर्सी के लिए अरुणा ओसवाल के लिए चुनावी लड़ाई आसान तो हो गई है, लेकिन साथ ही कई तरह की नई-नई मुश्किलों के पैदा होने के कारण चुनौतीपूर्ण भी हो गई है । अरुणा ओसवाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती - उनकी उम्मीदवारी की बागडोर थामने को लेकर राजू मनवानी और उमेश गाँधी के बीच छिड़े घमासान को नियंत्रित करने की है । राजू मनवानी यह साबित करने का और दिखाने/जताने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते कि अरुणा ओसवाल का इस बार का चुनाव उनके दिशा-निर्देशन में तथा उनकी सक्रियता के भरोसे लड़ा जा रहा है और उन्हीं के कारण अरुणा ओसवाल की स्थिति इस बार सुरक्षित देखी/समझी जा रही है; जबकि दूसरी तरफ उमेश गाँधी हर उस अवसर का 'लाभ' उठाने को तत्पर दिखते हैं जिससे यह साबित किया जा सके कि इस बार अरुणा ओसवाल की स्थिति मजबूत ही थी और राजू मनवानी तो महज श्रेय लेने के लिए अरुणा ओसवाल के समर्थन में आये हैं, और राजू मनवानी के कारण तो अरुणा ओसवाल के लिए मुश्किलें कम होने की बजाये बढ़ी ही हैं । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि एक ही डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 323 ए थ्री - के सदस्य राजू मनवानी और उमेश गाँधी के बीच अपने आप को बड़ा दिखाने की होड़ तभी से मुखर रूप में लोगों के सामने हैं, जब वह क्रमशः डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर थे । वर्ष 2008-09 में राजू मनवानी जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर थे, तब वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उमेश गाँधी के साथ उनके खुले टकराव के कई दृश्य बने/दिखे थे ।
राजू मनवानी और उमेश गाँधी के बीच अपने आप को एक-दूसरे से बड़ा दिखाने/जताने की होड़ में हालाँकि अभी तक राजू मनवानी का ही पलड़ा भारी रहा है । वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उमेश गाँधी के न चाहने के बावजूद राजू मनवानी मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बने । उमेश गाँधी लेकिन अपनी बारी आने पर यह पद हासिल नहीं कर पाये और उन्हें मल्टीपल काउंसिल में वाइस चेयरपरसन के पद से ही संतोष करना पड़ा । इसके बाद, राजू मनवानी और अरुणा ओसवाल के बीच इंटरनेशनल डायरेक्टर पद को लेकर जो 'युद्ध-जैसा' माहौल बना उसमें उमेश गाँधी को राजू मनवानी से बदला लेने का मौका मिला और उन्होंने उस मौके का भरपूर इस्तेमाल भी किया, लेकिन उस समय भी वह राजू मनवानी का कुछ बिगाड़ नहीं सके और राजू मनवानी के सामने उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अरुणा ओसवाल जब दूसरे अटैम्प्ट में कूदीं तो उमेश गाँधी को लगा कि इस बार अरुणा ओसवाल की जीत से उन्हें अपनी स्थिति को 'बेहतर' बनाने का मौका मिलेगा - लेकिन 'अब भी' उनकी बदकिस्मती उनसे आगे चल रही थी । अरुणा ओसवाल की उम्मीदवारी की सक्रियता अभी शुरू ही हुई थी कि उमेश गाँधी यह देख कर अवाक् रह गए कि राजू मनवानी ने जबरदस्त पलटी मार कर अरुणा ओसवाल की उम्मीदवारी का न सिर्फ समर्थन करना शुरू कर दिया, बल्कि अरुणा ओसवाल की उम्मीदवारी की बागडोर भी थाम ली । इस तरह, अरुणा ओसवाल की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की दोबारा प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी में उमेश गाँधी अपने लिए जो मौका देख रहे थे, राजू मनवानी ने उसे भी उनसे छीन लिया । उमेश गाँधी ने लेकिन अभी भी हार नहीं मानी है और वह अरूणा ओसवाल के लिए काम करने में लगे हुए हैं - कुछेक लोगों का कहना है कि उमेश गाँधी वस्तुतः अरूणा ओसवाल के लिए काम करने की आड़ में दरअसल राजू मनवानी से आगे दिखने की कोशिश कर रहे हैं । अरूणा ओसवाल के कुछेक समर्थकों का कहना है कि राजू मनवानी और उमेश गाँधी के बीच की इस होड़ ने अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के अभियान पर प्रतिकूल असर ही डाला है ।
मजे की बात है, जिसे दूसरे लोगों के लिए समझना मुश्किल हो रहा है कि अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में डिस्ट्रिक्ट के दो तुर्रमखां नेता जीजान लगाये हुए हैं, लेकिन फिर भी अरूणा ओसवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपने डिस्ट्रिक्ट में एनडोर्समेंट नहीं ले सकीं हैं । डिस्ट्रिक्ट ने वर्ष 1994-95 में मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन रहे संतोष शेट्टी को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एनडोर्स किया है । अरूणा ओसवाल ने दरअसल राजू मनवानी और उमेश गाँधी जैसे अपने दोनों समर्थकों के बीच की होड़ को देखते हुए ही डिस्ट्रिक्ट में एनडोर्समेंट लेने की कोशिश ही नहीं की - उन्हें डर था कि इन दोनों की होड़ के कारण कहीं वह डिस्ट्रिक्ट में ही हार गईं, तो फिर मल्टीपल में उनके लिए और समस्या होगी । यहाँ यह याद करना मौजूँ होगा कि अरूणा ओसवाल पिछली बार हर तरह की तीन-तिकड़म के बाद भी राजू मनवानी की तिकड़मों के सामने डिस्ट्रिक्ट में हार गईं थीं - जिसका खामियाजा उन्हें फिर मल्टीपल में भी भुगतना पड़ा । मल्टीपल में उन्हें इस आरोप का सामना करना पड़ा था कि वह जब डिस्ट्रिक्ट में नहीं जीत पाईं हैं तो मल्टीपल में जीतने की उम्मीद कैसे करती हैं ? और इसका जबाव वह नहीं दे पाईं थीं - और जबाव न दे पाना ही तब उन्हें भारी पड़ा था । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के दूसरे उम्मीदवार संतोष शेट्टी और उनके समर्थक हालाँकि वही सवाल इस बार भी उठा कर अरूणा ओसवाल को घेरने की कोशिश कर रहे हैं - लेकिन इस बार उस सवाल की धार ज्यादा तेज नहीं है; क्योंकि इस बार अरूणा ओसवाल डिस्ट्रिक्ट में चुनाव हारी नहीं हैं । लेकिन फिर भी सवाल बना हुआ है और वह अरूणा ओसवाल की 'पोजिशनिंग' को चोट भी पहुँचा रहा है - तो इसका जिम्मा उनके प्रतिद्धंद्धी संतोष शेट्टी पर नहीं, बल्कि उनके समर्थकों राजू मनवानी और उमेश गाँधी पर है ।
राजू मनवानी ने अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करके जो कलाबाजी दिखाई है, उसने सभी को हैरान किया है । यूँ तो यह सभी जानते/मानते हैं कि लायन राजनीति में दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ ज्यादा दिन नहीं बनी/टिकी रह पाती हैं, लेकिन फिर भी पिछली बार राजू मनवानी और अरूणा ओसवाल के बीच हुए चुनाव के चलते जिस तरह की 'भयंकर मारकाट' मची थी, उसे देखते/जानते हुए लोगों के लिए राजू मनवानी को अरूणा ओसवाल के समर्थन में देखना किसी चमत्कार से कम नहीं लगा । राजू मनवानी के कुछेक नजदीकियों का कहना है कि राजू इमोशनल व्यक्ति हैं और इमोशन में आकर वह अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में आ गए; किंतु अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि राजू व्यावहारिक व्यक्ति हैं, उन्होंने भाँप लिया कि अरूणा ओसवाल का विरोध करके उन्हें तो कुछ मिलेगा नहीं, साथ रह कर वह जरूर कुछ हासिल कर सकते हैं - लिहाजा वह अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के समर्थक बन गए । राजू मनवानी की दिलचस्पी इस बीच देश की राजनीति में हुई है और उन्होंने राज्यसभा में सीट का जुगाड़ करने की तरफ अपना ध्यान लगाया है । हवा का रुख भाँप पर राजू मनवानी ने 'नरेंद्र मोदी विचार मंच' का गठन कर लिया है और उसकी गतिविधियों के जरिये संभावित सत्ता खेमे से नजदीकियाँ बनाना शुरू कर दी हैं । अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों का कहना है कि राजू मनवानी ने चूँकि समझ लिया है कि इस बार अरूणा ओसवाल को ही सफल होना है, इसलिए अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करके उन्होंने अरूणा ओसवाल की गुडबुक में शामिल होने की व्यवस्था कर ली है, जिस 'व्यवस्था' का लाभ वह राजयसभा की सीट जुगाड़ने के अपने प्रयासों में भी ले सकेंगे ।
अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के राजू मनवानी के फैसले का उनके कई समर्थकों ने ही विरोध किया है और इस विरोध के चलते राजू मनवानी के कई समर्थक नेता चुप बैठ गए हैं और उन्होंने अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करने से अपने हाथ खींच लिए हैं, और कई तो संतोष शेट्टी के समर्थन में खुल कर काम करने लगे हैं । इसी कारण से अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के कई समर्थकों को लग रहा है कि राजू मनवानी का समर्थन अरूणा ओसवाल के लिए फायदे का सौदा होगा या नहीं - यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन राजू मनवानी का समर्थन अरूणा ओसवाल के लिए मुसीबत का सौदा जरूर बन गया है । अरूणा ओसवाल की उम्मीदवारी के समर्थकों को इस बार अरूणा ओसवाल की जीत की उम्मीद भले ही हो, लेकिन संतोष शेट्टी की उम्मीदवारी के समर्थकों को अरूणा ओसवाल के लिए बने इसी मुसीबत के सौदे में अपने लिए उम्मीद की संभावना दिख रही है ।

Saturday, November 2, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में शिव कुमार चौधरी द्धारा हुई सुधीर जनमेजा की फजीहत के कारण सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के समीकरण बदलेंगे क्या

गाजियाबाद । लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर जनमेजा डिस्ट्रिक्ट के एक प्रमुख क्लब - लायंस क्लब गाजियाबाद से मिले झटके से अभी उबर भी नहीं पाये थे कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार शिव कुमार चौधरी ने उनकी फजीहत कर दी । सुधीर जनमेजा ने अपनी सेकेंड कैबिनेट मीटिंग में फैलोशिप के आयोजन हेतु शिव कुमार चौधरी को पहले तो अपने एक दूत के जरिये ऑफर भेजा, शिव कुमार चौधरी ने उक्त ऑफर को लेकर जब कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई तो सुधीर जनमेजा खुद मैदान में उतरे । जो संदेश सुधीर जनमेजा ने पहले अपने दूत के जरिये शिव कुमार चौधरी तक पहुँचाया थे, दौबारा में वही संदेश उन्होंने स्वयं शिव कुमार चौधरी के सामने रखा । संदेश यह था कि सेकेंड कैबिनेट मीटिंग में फैलोशिप के आयोजन के लिए दो लोगों ने प्रस्ताव रखा है, आप बताओ कि क्या करना है ? शिव कुमार चौधरी ने सुधीर जनमेजा के दूत से जब यह संदेश सुना तो दोटूक शब्दों में जबाव दिया कि - मुझे क्या करना है, उन दोनों से कहो कि फैलोशिप का आयोजन करें । दूत से सुधीर जनमेजा को शिव कुमार चौधरी का जब यह जबाव मिला तो उन्होंने खुद मोर्चा संभाला । सुधीर जनमेजा ने भी शिव कुमार चौधरी को वही संदेश दिया, जिसका दोटूक जबाव शिव कुमार चौधरी दे चुके थे ।
सुधीर जनमेजा को शायद यह उम्मीद रही होगी कि शिव कुमार चौधरी ने जिस टोटूक तरीके से उनके दूत को जबाव दिया, वैसे उन्हें नहीं देंगे । शिव कुमार चौधरी ने लेकिन वही जबाव उन्हें भी दिया और ठीक वैसे ही दिया जैसे सुधीर जनमेजा के दूत को दिया था । दरअसल शिव कुमार चौधरी समझ गए थे कि सुधीर जनमेजा को फैलोशिप के लिए कोई मिला नहीं है और वह उन्हें फाँसने के लिए झूठे दावे कर रहे हैं कि उन्हें दो लोगों का प्रस्ताव मिला है । शिव कुमार चौधरी ने भाँप लिया था कि सुधीर जनमेजा को यदि फैलोशिप के लिए सचमुच में दो लोग मिल गए होते तो फिर वह उनसे बात ही नहीं करते । स्कूलिंग के समय का अनुभव शिव कुमार चौधरी भूले नहीं थे, जब सुधीर जनमेजा ने तीन-तिकड़म से उन्हें फैलोशिप के लिए फँसा लिया था और उनसे मोटी रकम खर्च करवा ली थी । शिव कुमार चौधरी अब की बार सावधान थे और सुधीर जनमेजा के जाल में फँसने से बचने की तैयारी किये हुए थे । उनकी खुशकिस्मती रही कि दो लोगों के प्रस्ताव की बात कह कर बचने का मौका खुद सुधीर जनमेजा ने ही उन्हें दे दिया ।
सुधीर जनमेजा को जब लगा कि शिव कुमार चौधरी तो हाथ से निकले जा रहे हैं तो फिर उन्होंने उनके उम्मीदवार होने का वास्ता दिया । सुधीर जनमेजा ने उनसे कहा कि उम्मीदवार होने के नाते फैलोशिप का आयोजन उन्हें करना चाहिये । शिव कुमार चौधरी ने लेकिन उन्हें यह कह कर टका-सा जबाव दे दिया कि उम्मीदवार के रूप में उन्हें क्या करना है, यह वह जानते हैं और कर लेंगे; फैलोशिप का आयोजन दूसरे लोगों को ही कर लेने दो । इसके बाद सुधीर जनमेजा के पास कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं रह गया । शिव कुमार चौधरी के दोटूक फैसले ने फैलोशिप जुटाने की उनकी सारी तिकड़म पर पानी फेर दिया था । हाल-फ़िलहाल के दिनों में सुधीर जनमेजा को यह दूसरा बड़ा झटका लगा है । इससे पहले लायंस क्लब गाजियाबाद के पदाधिकारी अपने क्लब के गोल्डन जुबली कार्यक्रम से बाहर रख कर सुधीर जनमेजा की खासी फजीहत कर चुके थे । उल्लेखनीय है कि जिस कार्यक्रम में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की राह पर बढ़ रहे नरेश अग्रवाल और इंटरनेशनल बोर्ड की सदस्या अरुणा ओसवाल आमंत्रित किये गए हों, उस कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर को ही न तवज्जो दी जाये तो यह उक्त गवर्नर के लिए फजीहत की बात तो है ही । कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र पर अपना नाम न पाकर सुधीर जनमेजा बहुत बुरी तरह से बिफरे थे और उन्होंने हर संभव प्रयास किया कि उक्त कार्यक्रम या तो हो ही न सके और या नरेश अग्रवाल व अरुणा ओसवाल उसमें शामिल न हों । सुधीर जनमेजा की लेकिन एक न चली और उन्हें ऐतिहासिक रूप से फजीहत का शिकार होना पड़ा । ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि इतनी और किसी गवर्नर की हुई हो, ऐसा किसी को याद नहीं पड़ता ।
सुधीर जनमेजा के लिए शिव कुमार चौधरी से मिला झटका लेकिन ज्यादा गंभीर है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की इतनी अवहेलना करे और फैलोशिप करने के उसके आमंत्रण को सिरे से ख़ारिज कर दे, यह अपने आप में बड़ी बात है । यह बात तब और बड़ी हो जाती है जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उसी खेमे का हो जिस खेमे के समर्थन के भरोसे उम्मीदवार सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की दौड़ में हो । तो क्या यह माना जाये कि शिव कुमार चौधरी ने सुधीर जनमेजा के प्रति उपेक्षा का जो रवैया दिखाया है, उसकी प्रेरणा और प्रोत्साहन उन्हें खेमे के बड़े नेताओं से मिला है ? क्योंकि यह भी देखा/सुना गया है कि खेमे के बड़े नेता सुधीर जनमेजा से खुश नहीं चल रहे हैं । सुधीर जनमेजा के नजदीकियों का कहना है कि शिव कुमार चौधरी अभी चाहें किसी भी कारण से सुधीर जनमेजा की अहमियत नहीं समझ रहे हों, लेकिन जल्दी ही उन्हें इसकी जो कीमत चुकानी पड़ेगी उससे उन्हें अहसास होगा कि उन्होंने गलती की है । सुधीर जनमेजा के इन्हीं नजदीकियों का यह भी कहना है कि हो यह भी सकता है कि अभी तेवर दिखा रहे शिव कुमार चौधरी अंततः कैबिनेट मीटिंग में फैलोशिप के लिए राजी हो ही जाएँ ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर जनमेजा के प्रति शिव कुमार चौधरी के रवैये को देख/पहचान कर डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों को यह आभास जरूर होने लगा है कि शिव कुमार चौधरी को सबक सिखाने के उद्देश्य से सुधीर जनमेजा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के समीकरण बदलने का प्रयास कर सकते हैं । सुधीर जनमेजा अपनी फजीहत को चुपचाप बर्दास्त करते रहेंगे या कुछ करेंगे और करेंगे तो क्या करेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Sunday, March 11, 2012

अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी ने डिस्ट्रिक्ट में मिली चुनावी हार से लगता है कि कोई सबक नहीं सीखा है

मुंबई | श्याम मालपानी और अरूणा ओसवाल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट से एंडोर्समेंट लेने वाले राजू मनवानी की उम्मीदवारी के खिलाफ अभियान में शामिल होकर लायन सदस्यों की निगाह में अपने आप को और नीचे गिरा लिया है | उल्लेखनीय है कि लायन राजनीति में यह शायद पहला मौका है जब लायनिज्म में अपनी पहचान रहने वाले लोग अपने ही डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्स किए गए उम्मीदवार के खिलाफ खुल कर काम कर रहे हैं | पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते श्याम मालपानी की और लायनिज्म में अच्छी-खासी दान-दक्षिणा देने के कारण अरूणा ओसवाल की अपनी पहचान है और आम लायन सदस्य उनसे टुच्ची बातों से ऊपर उठे होने की उम्मीद करते हैं | लेकिन इन्होंने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की बजाये - इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपने ही डिस्ट्रिक्ट द्धारा एंडोर्स किए गए उम्मीदवार राजू मनवानी की उम्मीदवारी के खिलाफ प्रचार करने के जरिये अपने आपको 'छोटा' साबित कर दिया है | उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ-साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने भी कहना शुरू कर दिया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के चलते इन दोनों ने पहले तो अपनी राजनीतिक फजीहत करवाई और अब यह दोनों एक लायन सदस्य के रूप में भी अपनी-अपनी किरकिरी करवाने में लगे हैं | इनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों तक का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एंडोर्समेंट लेने के मामले में जो हुआ, उससे भी इन्होंने कोई सबक नहीं सीखा है और लगातार इस तरह की गतिविधियाँ चलाये हुए हैं कि लोगों के बीच समर्थन खोते जा रहे हैं | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि अपने डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्समेंट लेने के लिए अरूणा ओसवाल का राजू मनवानी से जो पहला चुनाव हुआ था, उसमें वह दो वोट से हारी थीं, लेकिन तीन-तिकड़म से दूसरे चुनाव की जो नौबत पैदा की गई उसमें वह पचास से भी ज्यादा वोटों से हारीं | इसका कारण यह रहा कि दूसरे चुनाव में अरूणा ओसवाल को ऐसे कई प्रमुख लोगों का समर्थन नहीं मिला, जो पहले चुनाव में उनके साथ थे | अरूणा ओसवाल और उनके तथाकथित शुभचिंतकों को सोचना चाहिए कि उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के जो लोग पहले चुनाव में उनके साथ थे, वह दूसरे चुनाव में उनका साथ क्यों छोड़ गए ?
अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी जैसे उनके समर्थकों ने लेकिन यह सोचने की कोई जरूरत नहीं समझी | लगातार दूसरे चुनाव में मिली पराजय से वह इस कदर बौखला गए कि जिन राजू मनवानी से उन्हें लगातार दूसरी बार मात मिली, उन राजू मनवानी को उन्होंने अपना निजी दुश्मन मान लिया और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वह खुलेआम राजू मनवानी को हरवाने की कोशिशों में लग गए हैं | डिस्ट्रिक्ट में उनके समर्थक लोगों का ही मानना और कहना है कि अपनी जिस 'सोच' के कारण अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी ने अपने डिस्ट्रिक्ट में अपनी फजीहत करवाई और अपने समर्थकों को खोया, उस 'सोच' से वह अभी भी मुक्त नहीं हो पाए हैं | उनके समर्थक रहे लोगों का मानना और कहना है कि अरूणा ओसवाल तथा श्याम मालपानी जैसे उनके समर्थक राजू मनवानी से मिली पहली पराजय को यदि एक सच्चे लायन की तरह स्वीकार कर लेते तो उन्हें दूसरी बार मिली पराजय से हुई फजीहत को नहीं झेलना पड़ता | चुनाव को लेकर एक 'व्यावहारिक आदर्श' की बात यह स्वीकार की जाती है कि चुनाव जीतने के लिए चाहे जो हथकंडा आजमा लिया जाये, चुनावी नतीजे को आदर और बड़प्पन के साथ स्वीकार कर लिया जाना चाहिए | अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा लिए/दिए गए फैसले के प्रति लेकिन न कोई आदर दिखाया और न कोई बड़प्पन | यह ठीक है कि उन्होंने जो कुछ किया वह उनका कानूनी अधिकार था और उनके इस अधिकार का सम्मान किया ही जाना चाहिए | अरूणा ओसवाल ने अपनी पराजय के फैसले को चुनौती दी, तो यह उनका कानूनी अधिकार था | उन्हें अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करने का पूरा हक़ था | यहाँ समझने की बात सिर्फ इतनी सी है कि जो लोग 'सेवा' और 'फैलोशिप' की बात करते हैं, उन्हें लोगों के फैसले को कानूनी दांव-पेंचों में नहीं उलझाना चाहिए | लोग इस तरह की हरकतों को पसंद नहीं करते हैं | कानूनी दांव-पेंचों का सहारा लेकर अरूणा ओसवाल डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा लिए/दिए गए फैसले को रद्द करवा देने में तो सफल हो गईं, लेकिन लोगों का विश्वास और समर्थन उन्होंने खो दिया | इसी का नतीजा रहा कि दूसरी बार हुए चुनाव में उनकी हार का अंतर पच्चीस गुना तक बढ़ गया |
अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी जैसे उनके समर्थकों ने पहली बार जो गलती की, वह उनके लिए ट्रैजडी साबित हुई - लेकिन उस गलती से सबक न लेते हुए वह दूसरी बार भी वही गलती कर रहे हैं, तो यह उनके लिए कॉमेडी साबित हो रही है | अपने ही डिस्ट्रिक्ट के होने के बावजूद यह दोनों जिस तरह राजू मनवानी की उम्मीदवारी के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं, उसे देख कर लोग इन पर हंस रहे हैं | लोगों का कहना है कि यह दोनों जब डिस्ट्रिक्ट में राजू मनवानी का कुछ नहीं कर पाए तो अब मल्टीपल में क्या कर लेंगे ? राजू मनवानी की खिलाफत करने के जरिये इन्होंने मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि जो अपने डिस्ट्रिक्ट के नहीं हो सकते हैं, वह दूसरों के क्या होंगे ? लोगों का कहना है कि इन्हें यदि राजू मनवानी पसंद नहीं हैं तो इन्हें राजू मनवानी की उम्मीदवारी का विरोध करने का पूरा-पूरा हक़ है, लेकिन इन्हें साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि राजू मनवानी उस डिस्ट्रिक्ट के उम्मीदवार हैं जिस डिस्ट्रिक्ट में यह भी हैं और जिस डिस्ट्रिक्ट ने इन्हें पद और पहचान दी है - इसलिए इन्हें डिस्ट्रिक्ट के फैसले का सम्मान और पालन करना चाहिए | लोगों का कहना है कि अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी को यदि अपने ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा राजू मनवानी के पक्ष में लिया/दिया गया फैसला पसंद और मंजूर नहीं है तो इन्हें डिस्ट्रिक्ट को छोड़ देना चाहिए - बजाये इसके कि यह अपने ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा लिए/दिए गए फैसले के विरोध में खड़े दिखाई दें |
किसी भी चुनावी राजनीति में - और इस तरह लायन राजनीति में भी उम्मीदवारों को अपने 'नजदीकियों' के धोखे और विरोध का सामना करना ही पड़ता है | इसलिए यदि राजू मनवानी को अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी के विरोध का सामना करना पड़ रहा है तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है | राजू मनवानी को अपने डिस्ट्रिक्ट के और भी कुछेक लोगों के छिपे/खुले विरोध का सामना करना पड़ रहा है | इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी मुकाबले में उनके प्रतिद्धंद्धी ओम अग्रवाल को भी अपने डिस्ट्रिक्ट के कई एक लोगों के विरोध को झेलना पड़ रहा है | लेकिन अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी का मामला अलग है | लायनिज्म में यह दोनों बड़े नाम हैं और इनकी खास पहचान है | इसलिए यह जिस तरह अपने ही डिस्ट्रिक्ट के उम्मीदवार राजू मनवानी का विरोध कर रहे हैं, उसकी इनसे उम्मीद नहीं की जाती है | मजे की बात यह है कि इनके विरोध को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है : राजू मनवानी के समर्थक और ओम अग्रवाल के समर्थक इस बात पर एकराय हैं कि अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी जब अपने ही डिस्ट्रिक्ट में राजू मनवानी का कुछ नहीं बिगाड़ सके और अपनी ही फजीहत करा बैठे तो इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव को कैसे क्या प्रभावित कर सकेंगे ? इस तरह अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी का रवैया उनकी खुद की किरकिरी ही कर/करवा रहा है तथा लायन सदस्यों की निगाह में उन्हें छोटा बना रहा है |

Wednesday, March 7, 2012

इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई ओम अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए चुनौतियाँ कम नहीं हैं

अहमदाबाद/मुंबई | ओम अग्रवाल को आगे करके राजू मनवानी को घेरने में लगे नेताओं की सक्रियता और हर हथकंडा आजमाने की तैयारी के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में खासी गर्मी पैदा हो गई है | राजू मनवानी से हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि मल्टीपल के बड़े नेताओं का एक तबका राजू मनवानी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता है और इसके लिए उस तबके ने पहले अरूणा ओसवाल को मोहरा बनाया; लेकिन जब अरूणा ओसवाल को सामने करके भी उन्हें मात खानी पड़ी, तो अब वह ओम अग्रवाल को ले आये हैं | ओम अग्रवाल की उम्मीदवारी को सबसे गंभीर आरोप यही झेलना पड़ रहा है कि वह उम्मीदवार बने नहीं हैं - बल्कि उम्मीदवार उन्हें 'बनाया' गया है | उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए ओम अग्रवाल का नाम कभी भी चर्चा में नहीं था | अरूणा ओसवाल के लिए जब अपने डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्समेंट लेना संभव नहीं हुआ और उन्हें मल्टीपल के तमाम तुर्रमखां नेताओं के समर्थन के बावजूद राजू मनवानी के हाथों हार का सामना करना पड़ा - तो अपनी अपनी उम्मीदवारी को बढ़ा/दिखा रहे लोगों ने उन तुर्रमखां नेताओं का समर्थन जुटाने के लिए प्रयास किया | समर्थन मिला लेकिन उन ओम अग्रवाल को - जिनकी उम्मीदवारी की कहीं कोई चर्चा ही नहीं थी | ओम अग्रवाल और उनके समर्थक हालाँकि सफाई देते हुए बता रहे हैं कि ओम अग्रवाल तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए तबसे अपनी उम्मीदवारी जता रहे थे, जब वह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन थे | लेकिन पहले उन्हें नरेंद्र भंडारी का वास्ता देकर और फिर अरूणा ओसवाल का नाम लेकर अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत न करने के लिए मना लिया गया था - जिस कारण उनकी उम्मीदवारी की चर्चा लोगों के बीच नहीं हो सकी थी |
ओम अग्रवाल और उनके समर्थक जिस आरोप को धोने के लिए यह सफाई दे रहे हैं, वह आरोप इस सफाई से लेकिन और मजबूत ही हो रहा है | वह जो सफाई दे रहे हैं, उसका अर्थ भी यही निकल रहा है कि वह जब-जब उम्मीदवार होना चाहते थे, तब-तब बड़े नेताओं ने चूँकि उन्हें समर्थन नहीं दिया - उनकी बजाये पहले नरेंद्र भंडारी को और फिर अरूणा ओसवाल को दिया - इसलिए ओम अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत नहीं किया; लेकिन अब जब नेताओं ने उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए कहा तो वह उम्मीदवार बन गए हैं | मतलब साफ है कि ओम अग्रवाल उम्मीदवार बने नहीं हैं, बल्कि बनाये गए हैं | ओम अग्रवाल की एक व्यक्ति और एक लायन के रूप में बहुत तारीफ है - उनके काम को, उनके व्यवहार को, उनकी सामर्थ्य को, उनकी सोच को बहुत-बहुत ऊँचा बताया जा रहा है | ओम अग्रवाल के बारे में जो बताया जा रहा है, हो सकता है कि वह सच भी हो - लेकिन जो लोग उन्हें नहीं जानते हैं उनके सामने सवाल यही है कि ओम अग्रवाल जब इतने योग्य और प्रतिभाशाली हैं तो आज उनका गुड़गान कर रहे बड़े नेताओं ने उन्हें उस समय समर्थन क्यों नहीं दिया, जब वह उम्मीदवार बनना चाहते थे; उनकी जगह बड़े नेताओं ने पहले नरेंद्र भंडारी और फिर अरूणा ओसवाल को क्यों उम्मीदवार बनाया ? बड़े नेताओं ने क्या नरेंद्र भंडारी और अरूणा ओसवाल को उनसे ज्यादा योग्य और प्रतिभाशाली माना, और इसीलिए उनकी बजाये उन्हें उम्मीदवार बनाया ? लोगों के लिए यह समझना एक चुनौती बना हुआ है कि नरेंद्र भंडारी ने इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में किस योग्यता व प्रतिभा का परिचय दिया है ? हर किसी का मानना और कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में नरेंद्र भंडारी ने जो कुछ भी किया है, उसे तो कोई भी ऐरा-गैरा कर लेगा | अरूणा ओसवाल की लायन सदस्यों के बीच जो भी ख्याति है, वह सिर्फ और सिर्फ पैसे खर्च करने से जुड़ी है | तो क्या जो बड़े नेता पहले अरूणा ओसवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनवाने का 'ठेका' लिए हुए थे, और जिन्होंने अब ओम अग्रवाल को इंटरनेशनल चुनवाने के बीड़ा उठा लिया है - उनके लिए पैसा ही एकमात्र पैमाना है |
ऐसे में, ओम अग्रवाल के सामने चुनौती यह है कि जो लोग उन्हें अभी नहीं जानते हैं और उनकी प्रतिभा व योग्यता से परिचित नहीं हैं उन्हें वह यह बतायें/ समझायें कि जो बड़े नेता आज उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने का बीड़ा उठाये हुए हैं, उन्होंने पहले उनके मुकाबले नरेंद्र भंडारी तथा अरूणा ओसवाल को क्यों वरीयता दी ? किसी भी चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को दो 'दांत' चाहिए होते हैं : एक दिखाने के लिए और एक खाने के लिए | एक 'प्रतिभा' और 'योग्यता' उसे 'दिखाने' के लिए चाहिए होती है तथा एक 'प्रतिभा' और 'योग्यता' उसे 'इस्तेमाल' करना होती है | ओम अग्रवाल के सामने समस्या यह है कि जिस प्रतिभा व योग्यता को वह 'दिखाने' की कोशिश करते हैं उस पर सवाल खड़ा हो जाता है कि इस प्रतिभा और योग्यता के बावजूद जब वह अपने नजदीकियों व समर्थकों के बीच ही सेकेंड और थर्ड च्वाइस हैं, तो जो लोग उन्हें नहीं जानते हैं उनके बीच वह एकदम से फर्स्ट च्वाइस कैसे बनें ? अब रही उस प्रतिभा व योग्यता की बात, जिसे चुनाव जीतने के लिए 'इस्तेमाल' करना होता है - तो ओम अग्रवाल को लोगों की इस शंका का जबाव देना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का उम्मीदवार होने में ही उन्हें पाँच वर्ष क्यों लग गए ? और अब भी वह इसलिए उम्मीदवार हो सके हैं क्योंकि जिन लोगों से उन्हें अपनी उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिली है वह लोग जिन अरूणा ओसवाल को उम्मीदवार बनाना चाहते थे, वह अरूणा ओसवाल अपने डिस्ट्रिक्ट में ही एंडोर्समेंट नहीं ले सकीं और उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ से बाहर होना पड़ा | यानि ओम अग्रवाल मजबूरी में बनाये गए उम्मीदवार हैं |
ओम अग्रवाल उम्मीदवार भले ही मजबूरी में बने हों - लेकिन उन्होंने और उनका समर्थन करने वाले नेताओं ने पूरे दमखम के साथ इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लिया है | उन्हें पता है कि उनका चुनावी मुकाबला जिन राजू मनवानी के साथ है, उन राजू मनवानी की उम्मीदवारी की चर्चा लोगों के बीच काफी समय से है और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने को लेकर वह लोगों के बीच ठोस काम कर चुके हैं | राजू मनवानी की उम्मीदवारी की चूँकि पहले से सक्रियता रही है इसलिए अधिकतर जगहों पर लायन सदस्य उनके पक्ष में पोजीशन या तो ले चुके हैं और या हालात को समझने की कोशिश कर रहे हैं | ओम अग्रवाल की समस्या यह है कि अपनी उम्मीदवारी के बारे में देर से फैसला करने के कारण उनका दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के साथ कोई परिचय ही नहीं है | यही कारण है कि उन्हें अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में काम करने के लिए लायन ही नहीं मिल रहे हैं और उन्हें रिश्तेदारों की मदद लेनी पड़ रही है | जैसे कि अहमदाबाद में अपने डिस्ट्रिक्ट की कांफ्रेंस में एंडोर्समेंट लेने के अगले ही दिन ग्वालियर क्षेत्र में समर्थन जुटाने पहुंचे ओम अग्रवाल को अपने चुनाव की व्यवस्था की बागडोर किसी सक्रिय लायन सदस्य या नेता की बजाये अपने रिश्तेदार को सौंपनी पड़ी | इससे हालाँकि ओम अग्रवाल यह संदेश दे सके हैं कि चुनाव में वह हर किसी की मदद लेंगे | उन्होंने कई जगह कहा भी है कि चुनावी समर्थन जुटाने के लिए जो कुछ भी - जी हाँ जो कुछ भी करना होगा, उसे वह करेंगे | इससे एक बात साफ है कि 24 अप्रैल को होने वाला इंटरनेशनल डायरेक्टर पड़ का चुनाव खासा घमासानपूर्ण होगा |