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Friday, September 7, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में पुणे में संजय पवार को धोखे में रख कर सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत की गई सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी ने वोटों के समीकरण को ऐसा गड़बड़ाया है कि संजय पवार के साथ-साथ शेखर चितले के लिए भी मुसीबत पैदा हो गई लगती है

पुणे । सर्वेश जोशी ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके न सिर्फ संजय पवार, बल्कि शेखर चितले की उम्मीदवारी के लिए भी मुसीबतें खड़ी कर दी हैं । सबसे बुरा तो संजय पवार के साथ हुआ - वह बेचारे इस उम्मीद में थे कि सर्वेश जोशी उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे और उन्हें वोट दिलवायेंगे; पर अब जब सर्वेश जोशी खुद ही उम्मीदवार हो गए हैं, तो संजय पवार की सारी उम्मीदें बुरी तरह ध्वस्त हो गई हैं । संजय पवार को पुणे में सर्वेश जोशी के नजदीकी के रूप में देखा/पहचाना जाता है, और इस नाते हर किसी को विश्वास था कि संजय पवार यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं, तो निश्चित ही सर्वेश जोशी से विचार-विमर्श करके और उनकी सहमति मिलने पर ही कर रहे होंगे । उल्लेखनीय है कि पुणे में इंस्टीट्यूट की छोटी से बड़ी चुनावी राजनीति तक को जानने/समझने वाले लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार एसबी जावरे ने यशवंत कसार के जरिये सर्वेश जोशी की रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए जो फंदा तैयार किया था, उससे निपटने के लिए सर्वेश जोशी ने ही संजय पवार को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया था । उनकी तरकीब काम कर गई थी और एसबी जावरे अपने 'फंदे' को उतारने/लपेटने के लिए मजबूर हो गए थे - और सर्वेश जोशी किसी तरह रीजनल काउंसिल की अपनी सदस्यता बचा लेने में कामयाब हो गए थे । लोगों को उम्मीद भी थी और विश्वास भी था कि संजय पवार के पिछली बार किए गए इस अहसान को सर्वेश जोशी याद रखेंगे और इस बार सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली संजय पवार की उम्मीदवारी के समर्थन में काम करेंगे । सर्वेश जोशी ने लेकिन सभी उम्मीदों और विश्वासों को ठेंगा दिखाते हुए सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी ही उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी है । इससे लोगों को लगा है कि सर्वेश जोशी अभी तक संजय पवार को सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल ही कर रहे थे, और संजय पवार के साथ उनकी नजदीकी सिर्फ एक धोखा थी ।
सर्वेश जोशी की इस हरकत से सेंट्रल काउंसिल के लिए चुनावी तैयारी कर रहे संजय पवार को तो झटका लगा ही है, शेखर चितले की तैयारी के लिए भी मुसीबत पैदा हुई है । शेखर चितले को एसबी जावरे के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और इस नाते सर्वेश जोशी तथा संजय पवार के बीच के झगड़े का उनकी उम्मीदवारी पर यूँ तो कोई सीधा प्रभाव पड़ता नजर नहीं आता है - लेकिन सर्वेश जोशी से मिले धोखे से संजय पवार के प्रति जो हमदर्दी पैदा हुई दिख रही है, उसे शेखर चितले के लिए जरूर एक चुनौती के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । खुद शेखर चितले के समर्थकों को लग रहा है कि सर्वेश जोशी के 'व्यवहार' की प्रतिक्रिया में संजय पवार जिस तरह से 'विक्टिम कॉर्ड' खेल रहे हैं, उससे वह लोगों की हमदर्दी पा लेंगे - और जो शेखर चितले को भी नुकसान पहुँचाने का काम करेगी । शेखर चितले को एसबी जावरे का समर्थन जरूर है और एसबी जावरे उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास भी करेंगे ही - लेकिन लोगों को लगता नहीं है कि एसबी जावरे उन्हें अपने जैसा समर्थन दिलवा सकेंगे । शेखर चितले की लोगों के बीच कोई ज्यादा सक्रियता और संलग्नता भी नहीं रही है - लोग उन्हें एसबी जावरे के नजदीकी होने के नाते ही जानते/पहचानते हैं । शेखर चितले के समर्थकों को लगता है और उनका कहना भी है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए यदि चुनाव सीधे-सीधे शेखर चितले और संजय पवार के बीच हो रहा होता, तो शेखर चितले निश्चित ही बेहतर स्थिति में होते - लेकिन सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी ने वोटों के समीकरण को ऐसा गड़बड़ाया है कि संजय पवार के साथ-साथ शेखर चितले के लिए भी मुसीबत पैदा हो गई है ।
मजे की बात यह है कि पुणे में सेंट्रल काउंसिल के तीनों उम्मीदवारों में सर्वेश जोशी को बाकी दोनों से बेहतर स्थिति में देखा/आँका जा रहा है, लेकिन फिर भी किसी को यकीन नहीं है कि वह सेंट्रल काउंसिल में जा सकेंगे । सर्वेश जोशी के विरोधियों के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले लोगों का भी मानना और कहना है कि सर्वेश जोशी रीजनल काउंसिल सदस्य और पदाधिकारी के रूप में लोगों को चूँकि लगातार 'दिखते' रहे हैं, इसलिए लोगों के बीच उनका 'परिचय' है और सीनियर्स के साथ-साथ नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उन्हें जानते/पहचानते हैं; जबकि संजय पवार और शेखर चितले को तो अभी लोगों के बीच पहचान व परिचय बनाने का ही काम करना है - इस नाते सर्वेश जोशी फिलहाल तो संजय पवार और शेखर चितले से बेहतर स्थिति में हैं । लेकिन इन्हीं लोगों का मानना और कहना यह भी है कि सर्वेश जोशी ने रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में चूँकि कुछ भी उल्लेखनीय काम नहीं किया है, और न वह किसी के काम ही आये हैं - जिस कारण उनके संगी/साथी ही उनका साथ छोड़ते गए हैं, इसलिए सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में वोट जुटा पाना उनके लिए मुश्किल ही होगा । लोग याद कर रहे हैं कि पिछली बार सर्वेश जोशी रीजनल काउंसिल की अपनी सदस्यता ही मुश्किल से बचा पाए थे; पुणे के उम्मीदवारों में ही वह पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में सत्यनारायण मूंदड़ा और अंबरीश वैद्य से पीछे रहते हुए तीसरे नंबर पर रहे थे । लोगों का तर्क है कि पिछली बार जो व्यक्ति रीजनल काउंसिल की अपनी सदस्यता को मुश्किल से बचा पाया हो, वह सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में क्या झंडा गाड़ पायेगा - इसे सहज ही समझा जा सकता है । संजय पवार और शेखर चितले के सामने समस्या यह है कि अभी उन्हें सर्वेश जोशी से भी पीछे समझा/देखा जा रहा है; ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दोनों अपना अपना प्रचार अभियान किस तरह संयोजित करते और चलाते हैं, ताकि यह कम-अस-कम चुनावी मुकाबले में आते हुए तो नजर आएँ ।

Saturday, September 19, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की पुणे ब्रांच में 'मराठा राजनीति' करने का आरोप झेल रहे एसबी जावरे गैर मराठों की नाराजगी से बचने के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी की बलि चढ़ाने के लिए अंततः मजबूर हुए

पुणे । यशवंत कसार ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को वापस लेकर लोगों को उससे ज्यादा चौंकाया है, जितना कि उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करके चौंकाया था । यशवंत कसार की उम्मीदवारी की प्रस्तुति और फिर अब अचानक तरीके से हुई उसकी वापसी ने पुणे में लोगों को चर्चा का मौका इसलिए दिया - क्योंकि दोनों ही 'फैसलों' के पीछे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य एसबी जावरे को ही देखा/पहचाना जा रहा है । पुणे में लोगों ने इस बात पर भी बहुत माथापच्ची की कि एसबी जावरे ने आखिर क्या सोच कर यशवंत कसार को रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनवाया, और अब लोगों के बीच यह सवाल चर्चा में है कि एसबी जावरे ने आखिर क्यों रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस करा दिया ? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं और चर्चा में हैं क्योंकि चुनावी संदर्भ में न तो एसबी जावरे के सामने जीतने की समस्या है, और न यशवंत कसार के लिए जीतना कोई बड़ी चुनौती थी । उनके विरोधी भी मानते और कहते हैं कि एसबी जावरे यदि घर भी बैठ जाएँ तो भी चुनाव जीत जायेंगे, और यशवंत कसार को भी वह आसानी से चुनाव जितवा लेंगे । तब फिर एसबी जावरे को इतनी नाटक-नौटंकी करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ? इस 'क्यों' 'क्यों' 'क्यों' का कोई आधिकारिक जबाव लोगों को न तो मिला है, और न ही कभी मिलेगा; इसलिए सारा माजरा 'बिटविन द लाइंस' में ही समझना होगा और इसी कारण से पुणे में चर्चाओं का बाजार खासा गर्म है ।
पुणे में बहुत से लोगों का मानना और कहना है कि एसबी जावरे ने यशवंत कसार की उम्मीदवारी के जरिए दरअसल कई 'काम' करने चाहे थे - उन्होंने एक तरफ तो सर्वेश जोशी और अंबरीश वैद्य के पर कतरने की 'फील्डिंग' लगाई थी, और दूसरी तरफ रीजनल काउंसिल में अपना सीधा दखल रखने/बनाने का मौका देखा था । सर्वेश जोशी के पिछली बार के बहुत से समर्थक चूँकि साथ छोड़ गए हैं, इसलिए उनके सामने इस बार अपनी सीट बचाने की गंभीर चुनौती वैसे ही है; ऐसे में एसबी जावरे को लगा कि यशवंत कसार की उम्मीदवारी के जरिए वह सर्वेश जोशी की संभावनाओं को और धक्का देंगे, तथा सर्वेश जोशी को निपटाने का श्रेय ले लेंगे । इससे पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उनकी 'चौधराहट' और बढ़ेगी । यशवंत कसार के जरिए लेकिन एसबी जावरे ने मुख्य रूप से अंबरीश वैद्य का शिकार करने की योजना बनाई थी । उल्लेखनीय है कि अंबरीश वैद्य को पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में एक बड़ी संभावना के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । माना जा रहा है कि रीजनल काउंसिल के चुनाव में उन्हें काफी वोट मिलेंगे, और पुणे ब्रांच के चुनाव के नतीजे को दोहराते हुए वह एक खासी बड़ी जीत प्राप्त करेंगे । एसबी जावरे को इससे तो कोई समस्या नहीं है; किंतु उनकी चिंता इस आशंका से है कि अगली बार यशवंत वैद्य सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनेंगे । एसबी जावरे की तरफ से सेंट्रल काउंसिल के लिए अगली बार शेखर चितले की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने की चर्चा है । अगली बार अंबरीश वैद्य कोई चुनौती खड़ी न कर सकें, इसके लिए एसबी जावरे को अंबरीश वैद्य के पर अभी से कतर देना जरूरी लगा ।
इसके लिए एसबी जावरे ने यशवंत कसार को मोहरा बनाया । उन्हें उम्मीद रही कि पुणे ब्रांच के चेयरमैन के रूप में यशवंत कसार युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट लेकर अंबरीश वैद्य को नुकसान पहुँचायेंगे । यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते अंबरीश वैद्य चुनाव हार जायेंगे, यह उम्मीद तो एसबी जावरे को नहीं रही; लेकिन यह विश्वास उन्हें जरूर रहा कि यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते अंबरीश वैद्य के वोट कम जरूर होंगे । एसबी जावरे का यही उद्देश्य भी था । उनका आकलन रहा कि रीजनल काउंसिल के चुनाव में अंबरीश वैद्य को यदि ज्यादा बड़ी जीत प्राप्त करने से रोका जा सका, तो पुणे की इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अंबरीश वैद्य का जो ऑरा बना हुआ है, उसे मिटाया जा सकेगा - और उससे पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति पर अपनी पकड़ को यथावत भी बनाया रखा जा सकेगा । एसबी जावरे को विश्वास रहा कि इस सबके चलते पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अंबरीश वैद्य उनके लिए आगे कभी बड़ी चुनौती भी नहीं बन पायेंगे । समझा जाता है कि पुणे में इंस्टीट्यूट की भविष्य की राजनीति की बागडोर को अपने हाथों में सुरक्षित करने के लिए ही एसबी जावरे को अंबरीश वैद्य को अभी से घेरना जरूरी लगा, और इसके लिए ही उन्होंने यशवंत कसार को मोहरा बनाया । 
संजय पवार की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी ने लेकिन एसबी जावरे की दूसरों की राजनीतिक घेराबंदी करने की 'तैयारी' की हवा निकाल दी । समझा जाता है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के जरिए सर्वेश जोशी ने एसबी जावरे को उन्हीं की 'तरकीब' से जबाव देने का प्रयास किया । संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे की जीत पर तो कोई संकट आया नहीं दिखता है, लेकिन उनके वोटों की संख्या लोगों को अवश्य घटती हुई नजर आ रही है । संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे को बड़ी चुनौती मिलती भले ही न दिख रही हो - लेकिन संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे को एक दूसरा बड़ा संकट सामने खड़ा जरूर दिखाई दिया । यह संकट जातीय ध्रुवीकरण से पैदा हो सकने वाली स्थिति का है । चार्टर्ड एकाउंटेंट जैसे प्रोफेशन में जातीय गोलबंदी की कोई भूमिका होनी तो नहीं चाहिए, लेकिन चुनावी खिलाड़ियों द्वारा सफलता के फार्मूले बनाने में जिस तरह जाति का सहारा लिया जाता है, उससे इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में जातीय गोलबंदी की महत्वपूर्ण भूमिका बन गई है । एसबी जावरे ने जिस तरह यशवंत कसार को आगे किया, और उनसे 'निपटने' के लिए जिस तरह संजय पवार आगे आए या किए गए - उससे पुणे के गैर मराठा लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई । इन तीनों के मराठा होने के कारण गैर मराठा लोगों को लगा कि पुणे में इंस्टीट्यूट की राजनीति क्या सिर्फ मराठा ही करेंगे ? गैर मराठा लोगों के बीच उठे इस सवाल से पैदा हो सकने वाले खतरे को एसबी जावरे ने समय रहते भाँप लिया और तुरंत कार्रवाई करते हुए यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस करवा दिया । पुणे में सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में एसबी जावरे पर एक बड़ा गंभीर आरोप मराठावाद फैलाने का है । 
इसे पुणे ब्रांच में एसबी जावरे द्वारा की गई राजनीति से समझा जा सकता है । पुणे में मराठा वोट मुश्किल से आठ/दस प्रतिशत होंगे, किंतु एसबी जावरे की दिलचस्पीपूर्ण सक्रियता से पुणे ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी में इस बार आठ में से तीन मराठा सदस्य चुन कर आए । इन तीनों को वोट हालाँकि कम मिले -  इन तीनों को मिले वोटों का कुल जोड़ अकेले अंबरीश वैद्य को मिले वोटों से कम रहा । इसके बावजूद एसबी जावरे की राजनीति के चलते इनमें से दो ब्रांच के चेयरमैन बने, और इस वर्ष तो पक्षपात इस हद तक हुआ है कि चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के पद मराठा सदस्यों के पास हैं । ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले तीन गैर मराठा सदस्यों में से दो को ब्रांच की गतिविधियों में बिलकुल अलग-थलग रखा गया । ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वालों में तीसरे नंबर पर रहीं रेखा धमनकर को पिछली बार चेयरपरसन बनाने के लिए तर्क दिए गए कि उनका ब्रांच में यह दूसरा टर्म है, और उन्हें चेयरपरसन बना कर पुणे में महिला चेयरपरसन बनने/बनाने का इतिहास बनाया जा सकता है - लेकिन एसबी जावरे ने इन तर्कों को यह कह कर खारिज कर दिया कि 'उनकी राजनीति' में रेखा धमनकर के लिए कोई जगह है नहीं । एसबी जावरे की मराठा राजनीति के तहत ही ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले अंबरीश वैद्य को तीनों वर्ष पूरी तरह किनारे बैठाए रखा गया । 
पुणे ब्रांच में एसबी जावरे द्वारा की गई इस राजनीति के प्रति गैर मराठा लोगों के बीच नाराजगी के स्वर तो हैं, किंतु वह न तो संगठित हैं और न बहुत मुखर हैं । यशवंत कसार और संजय पवार की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारियों से लेकिन उस नाराजगी के भड़कने का मौका बनता दिखा । संजय पवार की उम्मीदवारी में हालाँकि एसबी जावरे का कोई हाथ नहीं है, किंतु संजय पवार की उम्मीदवारी को चूँकि एसबी जावरे की 'राजनीति' के प्रतिफल के रूप में ही देखा/पहचाना गया है - इसलिए उस नाराजगी का ठीकरा एसबी जावरे के सिर पर फूटने का खतरा नजर आया । एसबी जावरे ने इस खतरे को तुरंत से पहचान लिया, और खतरे को टालने के लिए तुरंत से यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस कर/करा दिया । एसबी जावरे ने अपनी जान बचाने के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी की जो बलि ली है, उसने फिलहाल सर्वेश जोशी और अंबरीश वैद्य को बड़ी राहत दी है । 

Wednesday, September 9, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए संजय पवार की उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के जरिए एसबी जावरे को घेर कर यशवंत कसार को मिल सकने वाले समर्थन को कमजोर करने की सर्वेश जोशी द्वारा चली गई चाल ने पुणे में चुनावी राजनीति के परिदृश्य को रोमांचक बनाया

पुणे । संजय पवार की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के साथ ही सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी की 'पोजीशन' को लेकर घिरे हुए अनिश्चय के बादल पूरी तरह छंट गए हैं, और पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य लगभग साफ हो गया है । उल्लेखनीय है कि पुणे के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पिछले कई दिनों से सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर यह अनिश्चय बना हुआ था कि वह रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार होंगे, और या सेंट्रल काउंसिल के लिए । दरअसल रीजनल काउंसिल के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने से रीजनल काउंसिल में सर्वेश जोशी की सीट खतरे में पड़ती/फँसती हुई दिख रही है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी को लेकर सर्वेश जोशी ने एसबी जावरे के प्रति गुस्सा और नाराजगी व्यक्त की है - उन्हें लगता है कि रीजनल काउंसिल से उन्हें बाहर धकेलने के लिए ही एसबी जावरे ने यशवंत कसार को उम्मीदवार बनाया/बनवाया है । सर्वेश जोशी की इस बात से पुणे में उनके विरोधी भी बहुत हद तक सहमत हैं । इससे सर्वेश जोशी को बल मिला, तथा एसबी जावरे के प्रति उनकी नाराजगी और परवान चढ़ी । एसबी जावरे के प्रति सर्वेश जोशी की नाराजगी के जाहिर होने के साथ-साथ पुणे में सर्वेश जोशी की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी की चर्चा भी गर्म होने लगी । सर्वेश जोशी ने अपनी तरफ से इस चर्चा को ठंडा करने की कोई कोशिश नहीं की; उनके नजदीकियों ने बल्कि यह कहते हुए इस चर्चा में और उबाल पैदा किया कि सर्वेश जोशी का उद्देश्य अब अपना चुनाव जीतना नहीं रह गया है, बल्कि उनका उद्देश्य अब एसबी जावरे को सबक सिखाना हो गया है । सर्वेश जोशी के कुछेक समर्थकों ने तो बाकायदा लोगों को बताया कि एसबी जावरे ने यशवंत कसार के जरिए सर्वेश जोशी के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसका बदला सर्वेश जोशी सेंट्रल काउंसिल लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके लेंगे । नजदीकियों व समर्थकों की इसी तरह की बातों के कारण सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर पुणे में संशय के बादल घिरे और कन्फ्यूजन पैदा हुआ । 
संजय पवार की उम्मीदवारी ने लेकिन इस कन्फ्यूजन को दूर कर दिया है । सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर कन्फ्यूजन भले ही दूर हो गया है, किंतु संजय पवार की उम्मीदवारी से सर्वेश जोशी की 'राजनीति' पर मोहर भी लग गई है । संजय पवार को सर्वेश जोशी के 'आदमी' के रूप देखा/पहचाना जाता है - और इसी आधार पर माना/कहा जा रहा है कि सर्वेश जोशी ने संजय पवार को एसबी जावरे की नाक में दम करने के लिए ही उम्मीदवार बनाया/बनवाया है । एसबी जावरे के कट्टर से कट्टर विरोधी और आलोचक भी मान रहे हैं तथा कह रहे हैं कि एक उम्मीदवार के रूप में संजय पवार कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर पायेंगे तथा जीत से बहुत दूर ही छूट जायेंगे । मजे की बात यह है कि संजय पवार और सर्वेश जोशी के नजदीकी भी/ही यह कह/बता रहे हैं कि संजय पवार का उद्देश्य चुनाव जीतना है भी नहीं - इसीलिए अपनी उम्मीदवारी घोषित करने के बावजूद संजय पवार अपनी उम्मीदवारी के अभियान चलाने को लेकर गंभीर नहीं हुए हैं । इन नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के जरिए सर्वेश जोशी ने एसबी जावरे की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने की व्यूह-रचना की है । सर्वेश जोशी ने संजय पवार को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया ही इसलिए है क्योंकि संजय पवार, एसबी जावरे की ही जाति के हैं; और संजय पवार इस नाते से एसबी जावरे को मिलने वाले वोटों में तोड़फोड़ मचायेंगे । किसी को भी यह उम्मीद तो नहीं है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के सहारे एसबी जावरे को चुनाव हरवाया जा सकता है, लेकिन सर्वेश जोशी और संजय पवार के कुछेक समर्थकों को यह विश्वास जरूर है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के भरोसे एसबी जावरे के वोटों को कम अवश्य किया जा सकेगा, तथा एसबी जावरे को अपने चुनाव अभियान को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर किया जा सकेगा । 
एसबी जावरे को संजय पवार की उम्मीदवारी के मार्फ़त सेंट्रल काउंसिल के अपने चुनाव में 'फँसा' कर सर्वेश जोशी ने दरअसल रीजनल काउंसिल के अपने चुनाव को सुरक्षित बनाने का दाँव चला है । उनका आकलन है कि एसबी जावरे अपने चुनाव में व्यस्त होंगे, तो यशवंत कसार के लिए कम समय निकाल सकेंगे । यशवंत कसार को एसबी जावरे के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी को सर्वेश जोशी के लिए बड़े खतरे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सर्वेश जोशी पिछली बार लुढ़कते/पुढ़कते ही जीत प्राप्त कर सके थे - और 21वें नंबर पर रहे थे । इस बार के चुनाव आते आते तक सर्वेश जोशी ने अपनी पिछली बार के बहुत से समर्थकों को अलग अलग कारणों से खो दिया है, जिस कारण उनके लिए अपनी सीट बचा पाना पहले से ही मुश्किल हो रहा था । यशवंत कसार की उम्मीदवारी ने उनकी मुसीबतों को और बढ़ाने का ही काम किया है । दरअसल यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते सर्वेश जोशी के सामने पिछली बार उन्हें मिले मराठा वोटों के छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है - इसके चलते सर्वेश जोशी के लिए रीजनल काउंसिल में अपनी सीट बचा पाना वास्तव में मुश्किल हो गया है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी को चूँकि एसबी जावरे की प्रेरणा व प्रोत्साहन से प्रस्तुत हुआ माना/देखा जा रहा है, इसलिए आशंका और डर यह भी है कि एसबी जावरे ने यदि यशवंत कसार की खुली वकालत कर दी, तो फिर सर्वेश जोशी को कोई नहीं बचा सकेगा । 
एसबी जावरे किसी भी तरह से यशवंत कसार की मदद न कर सकें, इस वास्ते उन्हें घेरने के लिए सर्वेश जोशी ने संजय पवार को 'फील्डिंग' पर लगाया है । सर्वेश जोशी के समर्थकों का कहना है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के जरिए एसबी जावरे को घेर कर यशवंत कसार को मिल सकने वाले समर्थन को कमजोर करने की चाल चली गई है । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि एसबी जावरे को संदेश भेजा गया है कि वह यदि यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस कर/करा लें, तो संजय पवार की उम्मीदवारी भी वापस हो जाएगी - और एसबी जावरे बड़ी जीत प्राप्त करने की अपनी तैयारी को सफल कर सकेंगे । इसीलिए उम्मीदवारी घोषित करने के बावजूद संजय पवार अपनी उम्मीदवारी के अभियान को लेकर सुस्त बने हुए हैं - दरअसल उन्हें लगता है कि एसबी जावरे 'उनके' ऑफर को स्वीकार कर लेंगे और यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस कर/करा लेंगे; इसलिए अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्हें कुछ करने की जरूरत ही क्या है ? एसबी जावरे और यशवंत कसार के समर्थकों ने हालांकि यशवंत कसार की उम्मीदवारी वापस होने की संभावना से स्पष्ट रूप से इंकार किया है । उनका कहना है कि संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे की उम्मीदवारी की जीत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, और यशवंत कसार को भी लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी के लिए अच्छा समर्थन मिल रहा है, इसलिए सर्वेश जोशी की चाल में फँसने की उन्हें कोई जरूरत नहीं है । संजय पवार के जरिए सर्वेश जोशी ने जो चाल चली है, उससे उन्हें सचमुच क्या फायदा मिलेगा - यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन उनकी इस चाल से पुणे में चुनावी राजनीति का परिदृश्य रोमांचक जरूर हो गया है । 

Friday, August 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य एसबी जावरे ने रीजनल काउंसिल के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करवा कर अपनी जो दिलचस्पी व सक्रियता दिखाई है, उसने पुणे की चुनावी राजनीति को खासा दिलचस्प बना दिया है

पुणे । यशवंत कसार ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के संकेत देकर पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को खासा दिलचस्प बना दिया है । यशवंत कसार अभी इंस्टीट्यूट की पुणे ब्रांच के चेयरमैन पद पर हैं । यशवंत कसार ने हालाँकि अभी सिर्फ अपने नजदीकियों को ही अपनी उम्मीदवारी की जानकारी दी है; और सभी को इससे अवगत कराने के लिए उचित मौके का इंतजार कर रहे हैं । अपने समर्थकों को उन्होंने बताया है कि वह जल्दी ही औपचारिक रूप से सभी को अपनी उम्मीदवारी की सूचना देंगे । यशवंत कसार को सेंट्रल काउंसिल सदस्य एसबी जावरे के नजदीकी के रूप में देखा/पहचाना जाता है, और माना जा रहा है कि उनको उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए एसबी जावरे ने ही प्रोत्साहित किया है । पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लगता है कि रीजनल काउंसिल में और रीजनल काउंसिल के माध्यम से पुणे ब्रांच में अपना दबदबा रखने के लिए एसबी जावरे को रीजनल काउंसिल में चूँकि अपना एक 'आदमी' चाहिए, इसलिए ही उन्होंने यशवंत कसार को रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनवा दिया है । दरअसल अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने, तथा उनके जीतने की उम्मीद के बाद पुणे की चुनावी राजनीति में समीकरणों के बदलने की जो स्थितियाँ बनीं - उसके बाद एसबी जावरे के लिए पुणे में इंस्टीट्यूट की राजनीति में अपना दखल बनाए रखने के लिए 'कुछ' करना जरूरी लगा; और उनकी इस जरूरत के नतीजे के रूप में ही यशवंत कसार की उम्मीदवारी सामने आई है ।  
यशवंत कसार की उम्मीदवारी को सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी के लिए चुनौती और खतरे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । माना जा रहा है कि जो मराठा वोट पिछली बार सर्वेश जोशी को मिले थे, वह इस बार यशवंत कसार को मिलेंगे - इसलिए भी मिलेंगे, क्योंकि एसबी जावरे भी उसके लिए प्रयास करेंगे । सर्वेश जोशी को हालाँकि विश्वास है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पढ़े-लिखे होते हैं और वह जातीय गोलबंदी में नहीं फँसते हैं, इसलिए मराठावाद के नाम पर यशवंत कसार उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा पायेंगे । सर्वेश जोशी को भले ही इसका विश्वास हो, लेकिन उनके साथियों/समर्थकों सहित अन्य दूसरे लोगों को उनका तर्क हजम नहीं हो रहा है । यद्यपि यह सच है कि सिर्फ जातीय आधार पर चुनाव जीते/ हारे नहीं जाते हैं - लेकिन चुनावी समर्थन जुटाने में जातीय गोलबंदी भूमिका निभाती अवश्य है - और कभी कभी तो वह भूमिका महत्वपूर्ण भी हो जाती है । सर्वेश जोशी और यशवंत कसार सिर्फ जातीय आधार पर ही एक दूसरे से नहीं भिड़ेंगे, बल्कि अपने अपने काम के सहारे भी एक दूसरे से मुकाबला करेंगे । सर्वेश जोशी को जहाँ रीजनल काउंसिल सदस्य होने के कारण फायदा मिलेगा, वहाँ यशवंत कसार को पुणे ब्रांच का चेयरमैन होने का लाभ मिलने का भरोसा है । यशवंत कसार पुणे ब्रांच में चेयरमैन पद की जिम्मेदारी सँभालने वाले सबसे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, इस नाते से वह युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके प्रेरणा स्रोत भी बने हैं और उनके बीच लोकप्रिय भी हुए हैं । पुणे से सेंट्रल काउंसिल सदस्य एसबी जावरे का उन्हें जो समर्थन है, उसके चलते उन्हें सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का सहयोग व समर्थन मिलने का भरोसा है । 
यशवंत कसार पुणे ब्रांच के चेयरमैन के रूप में किए जा रहे अपने कामों तथा अपनी सक्रियता के बल पर पुणे से बाहर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की उम्मीद तो कर सकते हैं, लेकिन उनकी सारी चुनावी निर्भरता पुणे पर ही होगी; उधर रीजनल काउंसिल का सदस्य होने के नाते सर्वेश जोशी के लिए पुणे से बाहर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन जुटाना ज्यादा मुश्किल तो नहीं होना चाहिए, किंतु उनके लिए मुश्किल की बात यह होगी कि रीजनल काउंसिल की अपनी सीट बचाने के लिए उन्हें पुणे के बाहर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन हर हाल में जुटाना ही होगा । यशवंत कसार की उम्मीदवारी ने सर्वेश जोशी के लिए दरअसल समस्या यह खड़ी कर दी है कि पुणे में उनकी 'जगह' को छोटा कर दिया है । ऐसे में, सर्वेश जोशी के लिए दोहरी समस्या यह बनी है कि एक तरफ तो उन्हें पुणे में अपनी 'जगह' बचानी है, और दूसरी तरफ पुणे से बाहर अपने लिए समर्थन जुटाना है । यशवंत कसार के लिए चुनौती की बात यह होगी - और इसी बात पर उनकी सफलता निर्भर है कि पुणे में सर्वेश जोशी की जो 'जगह' है, उसमें वह कितनी जगह पर अपना कब्जा कर सकते हैं ? इन दोनों के लिए ही मुसीबत की बात यह भी होगी कि इन्हें जिन लोगों के पहली वरीयता के वोट मिलेंगे, उनके दूसरी वरीयता के वोट इनके बीच आपस में एक्सचेंज शायद नहीं होंगे - और इस कारण से इन्हें दूसरे के पहले आउट होने का फायदा भी नहीं मिल पायेगा । 
यशवंत कसार की उम्मीदवारी से सत्यनारायण मूंदड़ा और अंबरीश वैद्य को यूँ तो सीधी टक्कर मिलती नहीं दिख रही है; लेकिन यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते पुणे में राजनीति और वोटों का जो नया समीकरण बनेगा - उसके कारण उनकी स्थिति में अवश्य ही कुछ उलट-फेर होने का अनुमान लगाया जा रहा है, और इस नाते से उन्हें अपनी चुनावी रणनीति व तैयारी में कुछ बदलाव करने पड़ सकते हैं । ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दोनों यशवंत कसार की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी को किस तरह से देख रहे हैं और उनकी उम्मीदवारी के कारण बदली हुई स्थिति में अपनी भूमिकाओं को कैसे देखते हैं । सत्यनारायण मूंदड़ा का जो 'स्टाइल' है, उसमें तो कोई बदलाव भला क्या आ सकेगा - किंतु यह देखना जरूर महत्वपूर्ण होगा कि उनके स्टाइल को तमाम आलोचनाओं के बावजूद जो सफलता मिलती रही है, क्या वह बरक़रार रह पायेगी ? अंबरीश वैद्य ने अपना एक अलग तरह का ऑडियंस बनाया है - जिसके भरोसे से उन्होंने पिछली बार पुणे ब्रांच के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट प्राप्त किए थे; पुणे ब्रांच में लेकिन वह अलग-थलग रहे । अलग-थलग रहने के बावजूद अंबरीश वैद्य ने प्रोफेशन और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के लिए एक बड़ा मौलिक किस्म का 'विज़न' दिया है - उनके सामने चुनौती किंतु यह है कि वह लोगों के बीच अपने इस 'विज़न' की महत्ता को स्थापित कर सकें और उसे स्वीकार्य बना सकें । कुछ लोगों को लग रहा है कि अंबरीश वैद्य की 'हवा' तो अच्छी बनी हुई है, किंतु इस हवा को चुनावी समर्थन और वोट में बदलने की तरकीब उन्हें अभी अपनानी है । अंबरीश वैद्य के कुछेक नजदीकियों का ही कहना है कि अंबरीश वैद्य लगता है कि अभी अति-आत्मविश्वास के शिकार हैं, और इसके चलते ही अपनी चुनावी तैयारियों को लेकर गंभीर नहीं हुए हैं । अभी तक तो इस रवैये के बावजूद अंबरीश वैद्य के लिए कोई समस्या नहीं थी, लेकिन अब यशवंत कसार की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के बाद जो हालात बनते दिख रहे हैं - उसमें अंबरीश वैद्य के सामने अपनी चुनावी तैयारियों को संयोजित व संगठित करने की जिम्मेदारी आ पड़ी है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी के जरिए एसबी जावरे ने रीजनल काउंसिल के चुनाव में जो दिलचस्पी व सक्रियता दिखाई है, उसने पुणे की चुनावी राजनीति को खासा दिलचस्प बना दिया है । 

Monday, July 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी ने पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को उलझाया

पुणे । अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी से वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए पुणे में होने वाली चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा हो गई है । यूँ तो अंबरीश वैद्य को पुणे के उस खेमे के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, जिस खेमे की तरफ से पिछली बार विजयकांत कुलकर्णी ने उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी और रीजनल काउंसिल में जगह बनाने में असफल रहे थे - इस नाते से कुछेक लोगों को अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी से पुणे के सत्ता समीकरणों में कोई बड़ा उलटफेर होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है; किंतु अन्य कई लोगों को अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी में पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का भविष्य आकार लेता हुआ 'दिखाई' दे रहा है । जो लोग अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी को एक सामान्य चुनावी कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं, उनका कहना है कि विजयकांत कुलकर्णी पुणे ब्रांच के चेयरमैन रह चुकने के बाद भी जब रीजनल काउंसिल का चुनाव नहीं जीत सके - तो अंबरीश वैद्य ही क्या खास कर लेंगे ? इस बार चूँकि दिलीप ऑप्टे रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं दिख रहे हैं, इसलिए हो सकता है कि अंबरीश वैद्य आसानी से चुनाव जीत जाएँ - पर इसमें क्या खास बात है ? दिलीप ऑप्टे पिछली बार चुनाव यदि नहीं लड़ते, तो हो सकता है कि विजयकांत कुलकर्णी भी चुनाव जीत जाते । पिछली बार पुणे से रीजनल काउंसिल के लिए छह उम्मीदवार थे, जिसमें से तीन रीजनल काउंसिल में जगह बनाने में कामयाब रहे थे; इस बार पुणे में रीजनल काउंसिल के लिए चार उम्मीदवार रहने की उम्मीद है, इसलिए अंबरीश वैद्य के रीजनल काउंसिल में जगह पाने को लेकर किसी को कोई शक नहीं है । इसके बावजूद कुछेक लोगों को अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी में कोई खास बात नहीं लग रही है, जबकि कई लोग हैं जो अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी को लेकर बहुत रोमांच महसूस कर रहे हैं । 
पुणे में जिन लोगों को अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी में बहुत रोमांच महसूस हो रहा है, वह दरअसल अंबरीश वैद्य के व्यक्तित्व, प्रोफेशन को लेकर उनकी सोच तथा काम करने के उनके तरीके से बहुत प्रभावित हैं - और विश्वास करते हैं कि अंबरीश वैद्य अपनी सक्रियता को यदि सचमुच चुनावी समर्थन यानि वोटों में बदल सके, तो इंस्टीट्यूट में पुणे को एक खास जगह और पहचान दिलवायेंगे । पुणे के जो लोग यह काम कर सकते थे, दुर्भाग्य से वह चुनावी पचड़े से दूर रहे; और जो पचड़े में कूदे भी उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिली; और जिन्हें चुनावी सफलता मिली, वह 'छोटे' कद के साबित हुए । रीजनल काउंसिल के चुनाव में पिछली बार सत्यनारायण मुंदड़ा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन वह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए कुछ भी डिलीवर करने में विफल रहे हैं । हालाँकि वह लोगों के काम तो खूब आते हैं, लेकिन वह जिस तरह के काम करने में दिलचस्पी लेते हैं उनका प्रोफेशन व इंस्टीट्यूट को नई दिशा या विज़न देने से कोई वास्ता नहीं है । पहली वरीयता के वोटों में दिलीप ऑप्टे से पीछे रहने के बावजूद कुल वोटों की गणना में दूसरे नंबर पर रहने वाले सर्वेश जोशी अपनी अतिमहत्वाकांक्षा के ऐसे शिकार हुए कि कुछ करना/कराना तो दूर, अपने दोस्तों और सहयोगियों तक को खो बैठे । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में दूसरे स्थान पर रहते हुए वोटों की कुल गणना में तीसरे स्थान पर खिसके दिलीप ऑप्टे यह समझने में ही विफल रहे कि वह करें तो क्या करें ? रीजनल काउंसिल में अपनी कोई भूमिका खोजने में विफल रहे दिलीप ऑप्टे के बारे में माना जा रहा है कि वह सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बारे में सोच रहे हैं । 
दिलीप ऑप्टे लेकिन सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी को लेकर कुछ उलझन में हैं । दिलीप ऑप्टे की चूँकि मुंबई में भी सक्रियता है, इसलिए उनके कुछेक समर्थक उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए उत्साहित कर रहे हैं । सेंट्रल काउंसिल में वेस्टर्न रीजन की तीन सीटों के खाली होने का वास्ता देकर कुछेक समर्थक दिलीप ऑप्टे को सेंट्रल काउंसिल के लिए कूद पड़ने की सलाह दे रहे हैं । किंतु उनके अन्य कुछेक समर्थकों का सुझाव है कि उन्हें यदि सचमुच में सेंट्रल काउंसिल में आने का मन है, तो उन्हें उसके लिए अगली बार प्रयास करना चाहिए - जब एसबी जावरे की सीट खाली होगी । यह सुझाव देने वालों का तर्क है कि इस बार यदि वह सफल नहीं हो पाए, तो फिर उनका राजनीतिक जीवन खत्म हुआ ही समझो; इसलिए दिलीप ऑप्टे के लिए इनकी सलाह है कि इस बार उन्हें रीजनल काउंसिल में ही आना चाहिए जिससे कि अगली बार सेंट्रल काउंसिल में आने की उनकी तैयारी में निरंतरता बनी रहे । इन्होंने दिलीप ऑप्टे को सावधान भी किया है कि रीजनल काउंसिल में उनकी जगह यदि अंबरीश वैद्य ने ले ली, तो फिर अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए अंबरीश वैद्य आयेंगे और तब अंबरीश वैद्य का ही पलड़ा भारी साबित होगा । जो लोग इस बार दिलीप ऑप्टे के लिए सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार होने की वकालत कर रहे हैं, उनका कहना है कि सेंट्रल काउंसिल का चुनाव इस बार वह यदि नहीं भी जीत पाते हैं तो अगली बार के लिए तो उनका दावा मजबूत हो ही जायेगा - और यदि जीत गए, तो फिर उनकी राजनीति सुरक्षित है ही । इनका डर दरअसल यह है कि रीजनल काउंसिल का चुनाव न लड़ने में भी घाटा है, और लड़ने में खतरा यह है कि दिलीप ऑप्टे यदि नहीं जीत सके, तो फिर उनके लिए सब खत्म जायेगा । रीजनल काउंसिल का चुनाव न लड़ने और या हारने से बेहतर दिलीप ऑप्टे के लिए सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हारना होगा । समर्थकों के अलग अलग सुझावों ने दिलीप ऑप्टे को और भी ज्यादा कन्फ्यूज कर दिया है ।   
उनका यह कन्फ्यूजन वास्तव में अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी ने और बढ़ा दिया है । पुणे में जो लोग अंबरीश वैद्य को जानते/पहचानते हैं, और उनकी सक्रियता को देखते रहे हैं उनका मानना और कहना है कि अंबरीश वैद्य इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में लंबी पारी खेलने के लिए उतरे हैं । इसके लिए उन्होंने पर्याप्त 'होमवर्क' किया है और एक एक कदम करके अपनी राजनीतिक यात्रा पर बढ़ रहे हैं । पिछली बार ब्रांच का चुनाव लड़ने से पहले उन्होंने पर्दे के पीछे से अपने साथियों के चुनाव के संचालन में हिस्सेदारी की थी और इस तरह चुनावी प्रक्रिया को नजदीक से देखने/समझने का प्रयास किया था । उन्होंने सीखा कि कैसे अपने आप को डी-ग्रेड किए बिना भी लोगों के बीच अपनी साख और स्वीकार्यता बनाई जा सकती है, तथा वोट प्राप्त किए जा सकते हैं । पिछली बार इंदौर ब्राँच के चुनाव में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले थे । इसके बावजूद अंबरीश वैद्य ब्राँच में सत्ता की लड़ाई में नहीं पड़े/फँसे और ब्राँच में कोई पद पाए बिना भी प्रोफेशन से जुड़े लोगों के बीच काम करते रहे और उन्हें प्रोफेशन के प्रति जागरूक व जिम्मेदार बनने के लिए प्रेरित करते रहे । लोगों ने भी अंबरीश वैद्य में एक नए तरह के 'नेता' को देखा/पहचाना - और माना कि उन्हें अंबरीश वैद्य जैसी सोच और सक्रियता रखने वाला नेता ही चाहिए । अंबरीश वैद्य ने एक बिलकुल नई तरह की राजनीति की नींव रखी है - और उन्हें अभी तक उसके सकारात्मक नतीजे ही मिले हैं । रीजनल काउंसिल के लिए - अभी जो स्थिति है उसमें - उनकी जीत को लेकर शायद ही किसी को कोई शक हो । लोगों को बल्कि लग यह रहा है कि अंबरीश वैद्य की जिस तरह की सक्रियता है, उसमें रीजनल काउंसिल का चुनाव जीतने के बाद की राजनीति को साधने की तैयारी ज्यादा है । दरअसल इसीलिए रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अंबरीश वैद्य की उम्मीदवारी ने पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है ।