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Saturday, April 4, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में विदेश से लौटे राजा साबू और उनकी मेडीकल मिशन की टीम के सदस्यों की गैरजिम्मेदारी कनिका कपूर और तबलीगी जमात की तरह देश में रोटरी व रोटेरियंस की भी बदनामी करवा सकती थी, वह तो कहो कि किस्मत से बच गए

चंडीगढ़ । पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू कोरोना वायरस के प्रकोप से पैदा हुए हालात से निपटने में मदद की अपील करके एक बार फिर मुसीबत में घिर गए हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना है कि उनकी अपील वास्तव में हर मौके का फायदा उठा लेने के उनके तौर-तरीके का नया उदाहरण है । राजा साबू के इस तौर-तरीके से परिचित डिस्ट्रिक्ट के लोगों का कहना है कि राजा साबू यदि कोरोना के खतरे को लेकर यदि सचमुच सावधान होते तो मेडीकल मिशन के तहत टीम लेकर जिम्बाब्वे नहीं जाते । राजा साबू बड़े जागरूक व्यक्ति हैं; दुनिया के विभिन्न देशों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वह जानकारी रखते हैं, और उस जानकारी के आधार पर ही वह विभिन्न देशों में मेडीकल मिशन के तहत टीम लेकर जाते हैं । ऐसे में, ऐसा नहीं हो सकता कि दुनिया के देशों में कोरोना का जो प्रकोप जनवरी से सामने आने लगा था - राजा साबू उससे परिचित नहीं होंगे; लेकिन फिर भी वह मार्च के पहले डेढ़ सप्ताह के दौरान जिम्बाब्वे मेडीकल मिशन की टीम लेकर गए । 11/12 मार्च को विदेश से वापस लौटने पर उन्होंने इस बात की भी जरूरत नहीं समझी कि वह अपनी और अपनी टीम के सदस्यों की मेडीकल जाँच करवाएँ । अब जब यह साबित हो चुका है कि भारत में कोरोना का प्रवेश मार्च में विदेश से लौटने वाले लोगों के सौजन्य से हुआ है, तब यह समझना मुश्किल नहीं है कि राजा साबू ने कोरोना को लेकर कितना बड़ा खिलवाड़ किया है । सिर्फ इतना ही नहीं, 11/12 मार्च को विदेश से लौटने के बाद भी राजा साबू और उनकी टीम के कई सदस्य भीड़भाड़ वाले आयोजनों में शामिल हुए, और उन्होंने जरा भी सावधानी नहीं अपनाई ।    
यह सिर्फ किस्मत की बात ही रही कि मेडीकल मिशन के तहत विदेश गए और लौटे रोटेरियंस कोरोना के संक्रमण लिए जिम्मेदार नहीं बने, अन्यथा कनिका कपूर और तबलीगी जमात की तरह देश में रोटरी व रोटेरियंस की भी थू थू हो रही होती । कह सकते हैं कि रोटरी और रोटेरियंस बस किस्मत के भरोसे ही कनिका कपूर और तबलीगी जमात जैसी बदनामी पाने से बच गए, अन्यथा राजा साबू ने अपनी तरफ से उनके जैसी हरकत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । इस तरह राजा साबू कोरोना प्रकोप के मामले में एक जिम्मेदार नागरिक व एक जिम्मेदार रोटेरियन की तरह व्यवहार करने में पूरी तरह विफल रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि वही राजा साबू अब कोरोना प्रकोप के मामले में राहत कार्यों की बात करके मसीहा बनने की कोशिश कर रहे हैं - और इस तरह अपनी स्वार्थी व गैरजिम्मेदाराना हरकतों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को यह देख कर भी हैरानी हो रही है कि राजा साबू की चालबाजियों को उनके समर्थक रहे लोगों का तो समर्थन मिल ही रहा है, पिछले तीन-चार वर्षों से उनकी चालबाजियों के शिकार रहे तथा उनसे लड़ते रहे लोगों का भी सहयोग/समर्थन मिल रहा है । पिछले तीन-चार वर्षों में मेडीकल मिशन पर लगातार सवाल उठाने वाले नेता लोगों ने; और यहाँ तक कि राजा साबू पर मेडीकल मिशन के बहाने बिजनेस डील करने के आरोप लगाने वाले नेता लोग भी अब राजा साबू के साथ खड़े नजर आ रहे हैं ।
ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लग रहा है कि पिछले तीन-चार वर्षों में राजा साबू की चालबाजियों के शिकार रहे और उनसे लड़ते रहे नेताओं ने भी या तो किसी मजबूरी में और या किसी स्वार्थ में राजा साबू के सामने समर्पण कर दिया है । इसी समर्पण का नतीजा है कि राजा साबू के कब्जे में बने रोटरी ट्रस्टों की कमान डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों को सौंपने की माँग को छोड़ दिया गया है; राजा साबू के कब्जे वाले ट्रस्टों के पास करीब तीन/सवा तीन करोड़ रुपयों के होने का हिसाब बताया जाता रहा था, लेकिन अब उस हिसाब को भी भुला दिया गया है; राजा साबू के नजदीकी पूर्व गवर्नर मनप्रीत सिंह गंधोके को डिस्ट्रिक्ट एकाउंट से गैरकानूनी रूप से दिए गए रुपयों को वापस माँगने में पिछले वर्ष तक तो बड़ी गर्मी थी, लेकिन उस मामले में भी अब ठंड पड़ती दिख रही है । लोगों का कहना है कि कोरोना प्रकोप से लड़ने के लिए दान देने की अपील करने वाले राजा साबू अपने कब्जे वाले ट्रस्टों में रखे हुए करीब तीन/सवा तीन करोड़ रुपयों को क्यों नहीं खर्च करते हैं - उक्त रकम को आखिर वह क्यों दबा कर बैठे हुए हैं ? इस तरह की बातों/चर्चाओं के बीच राजा साबू के कुछेक शुभचिंतकों का यह कहना भी खासा मजेदार है कि राजा साबू मसीहा बनने/दिखने की कोशिश में यह भूल जाते हैं कि उनके तौर-तरीकों की पोल अब खुल चुकी है, इसलिए उनकी कोशिश लोगों को भड़का देती है और फिर लोग उनकी फजीहत में जुट जाते हैं । शुभचिंतकों की सलाह है कि राजा साबू ने अब जब अपने विरोधी रहे नेताओं को भी पटा लिया है, और उन्हें अपने साथ मिला लिया है - तो चुपचाप उनसे अपने काम निकालें और मौज करें; पब्लिकली मसीहा बनने की कोशिश न करें; क्योंकि तब लोग उनकी कारस्तानियों और बेईमानियों की चर्चा करने लगते हैं । उल्लेखनीय है कि कोरोना मामले में राजा साबू ने गैरजिम्मेदारी का जो व्यवहार किया, उस पर लोगों का ध्यान नहीं गया था; लेकिन राजा साबू ने जैसे ही रूप बदल कर जिम्मेदार 'दिखने' की कोशिश की है, लोगों ने तुरंत उनका अवसरवादी दोहरा रूप 'पकड़' लिया और उनके लिए मामला उल्टा पड़ गया ।

Friday, August 30, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के नाम पर पैसा इकट्ठा करने की राजा साबू की अपील को लोगों ने 'धंधे' का नाम दिया, जिसके बाद बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जितेंद्र ढींगरा ने पैसों की बजाये सामान जुटाने की अपील करके राजा साबू की पैसा जुटाने की कोशिश पर पानी फेरा

चंडीगढ़ । पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए पैसे जुटाने की अपील करके भारी फजीहत का शिकार बन गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जितेंद्र ढींगरा ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए पैसों की बजाए सामान जुटाने की अपील करके राजा साबू की पैसे इकट्ठा करने की योजना पर पानी भी फेर दिया है । डिस्ट्रिक्ट के लोगों का कहना है कि उत्तराखंड के बाढ़ पीड़ितों के लिए इकट्ठा की गई रकम में से जो करीब तीन करोड़ रुपए बचे हुए हैं, राजा साबू उस पैसे को पंजाब के बाढ़ पीड़ितों के लिए क्यों नहीं रिलीज करते - ताकि बाढ़ पीड़ितों को तत्काल राहत पहुँचाई जा सके । उक्त करीब तीन करोड़ रुपयों पर कुंडली मारे बैठे राजा साबू तथा उनके नजदीकी पूर्व गवर्नर्स ने लोगों की यह माँग सुनकर अपनी अपनी जुबानें सिल ली हैं, और चुप्पी साध ली है । डिस्ट्रिक्ट के लोगों का यह भी कहना है कि पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मुसीबतों को देखते हुए राजा साबू को जिम्बाब्वे मेडीकल मिशन को रद्द करके उसमें खर्च होने वाले पैसे को पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए देना चाहिए । डिस्ट्रिक्ट के लोगों की इस माँग ने राजा साबू की ड्रामेबाजी तथा रोटरी को लूट-खसोट व मौज-मजे का जरिया मानने/बनाने की चालबाजियों को उद्घाटित करने का काम किया है । लोगों का आरोप है कि प्राकृतिक आपदाओं के पीड़ितों तथा बीमारों की मदद को राजा साबू तथा उनके साथी गवर्नर्स ने 'धंधा' बना लिया है । 
उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में पानीपत में आयोजित हुए मेंबरशिप डेवलपमेंट सेमीनार में राजा साबू ने अपने भाषण को नाटकीय रूप देते हुए पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए पैसे इकट्ठे करने की भावुकता भरी अपील की । डिस्ट्रिक्ट के लोग अब राजा साबू की नाटकबाजियों को खूब समझ/पहचान चुके हैं, इसलिए उन्होंने तुरंत ही कहना/पूछना शुरू कर दिया कि राजा साबू को सचमुच पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की चिंता है, या बाढ़ पीड़ितों के नाम पर पैसे इकट्ठे करने की चिंता है - और यदि उन्हें सचमुच पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की चिंता है तो उत्तराखंड बाढ़ पीड़ितों के लिए इकट्ठे हुए पैसों में से बाकी बचे करीब तीन करोड़ रुपए तथा जिम्बाब्वे दौरे में खर्च होने वाले पैसे को तुरंत से पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए उन्हें दे देने चाहिए । गौरतलब है कि कुछेक वर्ष पहले उत्तराखंड में बाढ़ ने जब विनाशलीला रची थी, तब राजा साबू की चेयरमैनी में एक प्रोजेक्ट-ट्रस्ट बना था, जिसमें करोड़ों रुपए इकट्ठा हुए थे । उस प्रोजेक्ट को बंद हुए करीब दो वर्ष हो चुके हैं, जिसका हिसाब-किताब भी दिया जा चुका है । उस हिसाब-किताब के अनुसार ही, दो करोड़ 83 लाख रुपए बचे हुए हैं । राजा साबू ने कभी किसी को नहीं बताया कि उस रकम का आखिर होगा क्या ? डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना है कि राजा साबू अब जब पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की परेशानियों से व्यथित हैं और उनकी मदद करना चाहते हैं, तो उक्त रकम को तुरंत से पंजाब के बाढ़ पीड़ितों के लिए रिलीज क्यों नहीं करते हैं और उक्त रकम को क्यों दबाए बैठे हैं ?
डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के सदस्य एमपी गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जितेंद्र ढींगरा को लिखे एक पत्र में राजा साबू तथा उनके साथी पूर्व गवर्नर्स द्वारा दबाई गई रकम का हवाला देते हुए कुल करीब साढ़े तीन करोड़ रुपए का जोड़ लगाया है; उनका कहना है कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स से उक्त पैसों को बसूल करके पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद करना चाहिए । पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के नाम पर राजा साबू द्वारा पैसे इकट्ठे करने की अपील पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को भड़का देख कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जितेंद्र ढींगरा ने घोषणा कर दी है कि डिस्ट्रिक्ट में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए कोई नगद पैसा इकट्ठा नहीं किया जायेगा, और सिर्फ सामान के रूप में ही मदद जुटाई और की जाएगी । जितेंद्र ढींगरा की इस घोषणा से राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स की पंजाब के बाढ़ पीड़ितों की मदद के नाम पर पैसा इकट्ठा करने की योजना को गहरा धक्का लगा है । इसके साथ ही, डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) के रूप में टीके रूबी ने पंजाब और महाराष्ट्र में बाढ़ की विनाशलीला को देखते हुए जिम्बाब्वे मेडीकल मिशन में खर्च होने वाले पैसे को बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए खर्च करने का वास्ता देकर उक्त मिशन को हरी झंडी देने से इंकार किया हुआ है; लेकिन राजा साबू और 'मेडीकल मिशन' के खेल में शामिल उनके सहयोगी मधुकर मल्होत्रा तरह तरह से टीके रूबी पर जिम्बाब्वे मेडीकल मिशन को हरी झंडी देने के लिए दबाव बना रहे हैं, और उन्हें 'ब्लैकमेल' करने की कोशिश कर रहे हैं । प्राकृतिक आपदाओं के अवसरों पर सरकारी अधिकारियों, ठेकेदारों व नेताओं को लूट-खसोट मचाते तो 'देखा'/पहचाना गया है; रोटरी में राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स को उनके जैसी हरकतें करते देखना रोटरी की पहचान व प्रतिष्ठा के संदर्भ में बहुत ही शर्मनाक है ।  
[मेडीकल मिशन में वॉलिंटियर के नाम पर शामिल होकर राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स क्या करते हैं, इसका आभास इस रिपोर्ट के साथ प्रकाशित राजा साबू व मधुकर मल्होत्रा की तस्वीर को देख कर पाया/समझा जा सकता है !] 

Thursday, November 2, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में उद्घाटित हुए ग्लोबल ग्राँट के विवरण में राजा साबू के क्लब के किस्से किसी तिलस्मी कहानी जैसा ही रोमांच देने के साथ-साथ किसी तिलस्मी कहानी के 'रोटरी के लुटेरे' जैसे किसी शीर्षक का फील दे रहे हैं

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट जीएमएल के नए अंक में डिस्ट्रिक्ट में आने वाले ग्लोबल ग्रांट के पैसों का विवरण प्रकाशित होने से राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स जिस बुरी तरह से भड़के हुए हैं, उससे ही जाहिर हो रहा है कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को क्यों डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में कठपुतलियाँ ही चाहिए होती हैं - और क्यों उन्होंने पिछले करीब ढाई वर्षों से टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर न बनने देने के लिए तरह तरह की अड़ंगेबाजी के जरिए मोर्चा खोला हुआ था ? ग्लोबल ग्रांट के नाम पर डिस्ट्रिक्ट में कितनी रकम आ रही है, किसके पास आ रही है, और किस उद्देश्य के लिए आ रही है - इसे डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपाकर रखना राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए जरूरी क्यों है; और इसके जाहिर होने पर वह इतने भड़के हुए क्यों हैं ? इस सवालों का जबाव डिस्ट्रिक्ट जीएमएल के नए अंक में ग्लोबल ग्रांट के विवरणों पर सरसरी सी नजर डाल कर ही मिल जाता है । यह विवरण तिलस्मी कहानियों के किस्सों से कम रोचक नहीं है । आखिर कौन यह जान कर रोमांचित नहीं होगा कि राजा साबू के क्लब ने यूगाँडा में ब्लड बैंक खोलने के लिए 4 लाख 94 हजार 804 डॉलर इकट्ठा किए, जिसकी आधी रकम ग्लोबल ग्राँट के रूप में है । डिस्ट्रिक्ट तो छोड़िये, राजा साबू के क्लब में अधिकतर लोगों को यह नहीं पता होगा कि यूगाँडा आखिर है कहाँ और वहाँ ब्लड बैंक खोलने की क्या/क्यों जरूरत है ? मानवीय आधार पर सोचें तो मान सकते हैं कि निश्चित ही जरूरत होगी, ब्लड बैंक की जरूरत आखिर कहाँ नहीं है ? पर सवाल यह है कि राजा साबू के क्लब के सदस्यों को आखिर कैसे पता चला कि यूगाँडा में ब्लड बैंक की जरूरत है ? क्लब के सदस्यों का कहना है कि इस तरह की बातें राजा साबू ही 'तय' करते हैं; राजा साबू ने कह दिया कि यूगाँडा में ब्लड बैंक बनवाना है, तो बस ग्लोबल ग्राँट के लिए आवेदन कर दिया गया और पैसे निकलवाने का काम अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते हुए राजा साबू ने कर दिया ।
मजे की बात यह है कि राजा साबू के क्लब ने यूगाँडा में ब्लड बैंक बनवाने के लिए अपनी तरफ से कुल 10 हजार डॉलर ही दिए हैं । राजा साबू के क्लब का यह किस्सा लेकिन निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा की कारस्तानी के सामने कुछ भी नहीं - उन्होंने तो राजा साबू को भी पीछे छोड़ दिया है । ग्लोबल ग्राँट के विवरण बता रहे हैं कि रमन अनेजा ने तो अपने क्लब - रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन में यूगाँडा मेडीकल मिशन के नाम पर एक लाख 92 हजार डॉलर झटक लिए । पानीपत मिडटाउन के सदस्य बेचारे पूछ रहे हैं कि यूगाँडा है कहाँ ?  क्लब के सदस्यों को यूगाँडा मेडीकल मिशन के नाम पर इकट्ठा की गई रकम की भनक न मिल सके, इसके लिए रमन अनेजा ने इस मिशन के लिए क्लब से लेकिन इकन्नी भी नहीं ली । रमन अनेजा के इस मिशन के पीछे भी 'प्रेरणा' राजा साबू की ही बताई जा रही है । राजा साबू का यह 'यूगाँडा प्रेम' डिस्ट्रिक्ट में किसी को समझ नहीं आया, लेकिन रोटरी के बड़े नेता इस प्रेम की जो कहानी सुनाते हैं - वह राजा साबू के खेल को बेनकाब करती है । राजा साबू की यह प्रेम कहानी वास्तव में, वर्ष 2018-19 के लिए इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने गए सेमुअल ओवोरि से तार जोड़ने की राजा साबू की कोशिश की कहानी है । यूगाँडा के प्रमुख रोटेरियन सेमुअल ओवोरि के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लगते ही राजा साबू ने उनसे नजदीकी बनाने के प्रयास तेज कर दिए और इसके लिए उन्होंने यूगाँडा में सेवा कार्य 'करने' को जरिया बनाया । मेडीकल मिशन और ब्लड बैंक के नाम पर राजा साबू को सेमुअल ओवोरि से यूगाँडा में बार-बार मिलने का और बात करने का मौका मिलता - और इस तरह वह सेमुअल ओवोरि के निकट आते और उनके प्रेसीडेंट-काल में फायदा उठाते । लेकिन सेमुअल ओवोरि के साथ-साथ राजा साबू की भी बदकिस्मती यह रही कि सेमुअल ओवोरि की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई - और तब राजा साबू की बड़ी होशियारी से तैयार की गयी सारी योजना भी मिट्टी में दफ़्न हो गई ।
राजा साबू के लिए दोहरी मुसीबत की बात यह रही कि एक तरफ तो उनकी योजना पिट गई, और दूसरी तरफ ग्लोबल ग्राँट का विवरण सामने आने से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सामने उनकी योजना की पोल-पट्टी भी खुल गई । लोगों को तथ्यों के साथ पहली बार पता चला कि राजा साबू कैसे रोटरी के पैसे पर अपनी राजनीति करते हैं ? सेमुअल ओवोरि रोटरी के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने जा रहे थे, तो क्या उनकी ऐसी हैसियत नहीं थी कि वह यूगाँडा में एक ब्लड बैंक बनवा लेते ? रोटरी के अलावा, वह यूगाँडा की एक बड़ी हस्ती थे - वहाँ वह एक सेलीब्रिटी बैंकर थे, जो देश के नामी बैंकों में डायरेक्टर, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर तथा मैनेजिंग डायरेक्टर जैसे प्रमुख पदों पर रह चुके थे । ऐसे में सहज ही समझा जा सकता है कि यूगाँडा में ब्लड बैंक या मेडीकल मिशन के नाम पर कुछ करने की जरूरत होती तो क्या सेमुअल ओवोरि को सचमुच राजा साबू और रमन अनेजा जैसे लोगों से कहना पड़ता । राजा साबू ने जो किया, वह तो सेमुअल ओवोरि के जबर्दस्ती गले पड़ने जैसी बात हुई । इसमें भी राजा साबू यदि अपने पैसे खर्च करते, तो भी चलो कोई बात होती - रोटरी के पैसों पर अपना राजनीतिक भविष्य सँवारने की राजा साबू की कोशिश की पोल खोलता ग्लोबल ग्राँट का विवरण किसी तिलस्मी कहानी से कम रोचक नहीं है, जिसका शीर्षक 'रोटरी के लुटेरे' जैसा कुछ हो सकता है ।
ग्लोबल ग्राँट की तिलस्मी कहानी में रोचक किस्से और भी हैं । एक किस्सा यह भी है कि राजा साबू के क्लब ने कोरिया में गार्डनिंग इकोनॉमिक एक्टिविटीज के नाम पर ग्राँट सहित एक लाख 66 हजार डॉलर इकट्ठा किए, जिसमें क्लब का सहयोग मात्र तीन हजार डॉलर का है । राजा साबू के क्लब के दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधुकर मल्होत्रा ने एक लाख 88 हजार 500 डॉलर मंगोलिया मेडीकल मिशन के नाम पर ग्राँट सहित लिए, अपने क्लब से लेकिन इस मिशन में उन्होंने इकन्नी भी नहीं दी । मंगोलिया मेडीकल मिशन के लिए क्लब से इकन्नी भले ही न ली गई हो, लेकिन मंगोलिया के हवाई टिकिट क्लब की एक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कवल बेदी की कंपनी से खरीदे सुने गए हैं । मंगोलिया मेडीकल मिशन में मधुकर मल्होत्रा अपनी पत्नी और राजा साबू के साथ वॉलिंटियर के रूप में गए, जहाँ पर 'पिकनिक' मनाते हुए इनकी तस्वीरों को देख कर डिस्ट्रिक्ट के लोग पहले से ही भड़के हुए थे । जीएमएल में ग्राँट के विवरण देख कर लोगों को लग रहा है कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने रोटरी के नाम पर रोटरी के पैसों से अपने बिजनेस बढ़ाने, पिकनिक मनाने तथा अपना राजनीतिक भविष्य सँवारने को ही अपना प्रमुख उद्देश्य बना लिया है ।

Saturday, September 23, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू व यशपाल दास तथा उनके साथी गवर्नर्स सीधे-सीधे हिसाब-किताब देने के नाम पर अपनी छवि खराब होने/करने का रोना क्यों रो रहे हैं ?

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी ने डिस्ट्रिक्ट और डिस्ट्रिक्ट में रोटरी के नाम पर चल रही संस्थाओं के हिसाब-किताब सँभालने की छोटी-सी कोशिश क्या की, कि डिस्ट्रिक्ट के बड़े बड़े महारथी 'नंगे' होते चले जा रहे हैं । टीके रूबी ने निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा से 'रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3080 ट्रस्ट' के अकाउंट के बारे में पत्र लिख कर पूछा, तो रमन अनेजा की तरफ से उन्हें जबाव मिला कि उक्त ट्रस्ट का काम पूर्व गवर्नर शाजु पीटर देखते हैं और उसका अकाउंट उन्हीं से मिलेगा । तब टीके रूबी ने शाजु पीटर का दरवाजा खटखटाया, लेकिन शाजु पीटर से यह सुन  कर वह अवाक् रह गए कि उक्त ट्रस्ट से उनका कोई वास्ता नहीं है और इसलिए उसके अकाउंट से भी उनका कोई लेना-देना नहीं है । अपनी जिम्मेदारी से बचने/भागने और दूसरे पर थोपने का यह सर्कस मजेदार है - करीब तीन महीने पहले तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर रहे रमन अनेजा ने क्या अपने आप को या किसी और को बचाने के लिए झूठे ही शाजु पीटर का नाम लिया है, या शाजु पीटर झूठ बोल रहे हैं ? 'रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3080 ट्रस्ट' के अकाउंट में आखिर ऐसा क्या झोलझाल है कि डिस्ट्रिक्ट के इन दोनों बड़े लोगों को इस तरह से सच्चाई छिपाना पड़ रहा है - और कोई माई का लाल अभी तक सामने नहीं आया है जो कहे कि ट्रस्ट का हिसाब-किताब मेरे पास है, और मैं उसका अकाउंट देता हूँ । डिस्ट्रिक्ट ट्रस्ट का हिसाब-किताब किसके पास है, यह पता लगाने का काम क्या अब सीबीआई को सौंपना पड़ेगा ?
इस तरह के मामलों में चटक मजेदारी का तड़का पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास ने यह कहते हुए लगाया है कि टीके रूबी लोगों के बीच पूर्व गवर्नर्स की छवि खराब करने तथा उन्हें बदनाम करने का काम कर रहे हैं । किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है कि पूर्व गवर्नर्स का जो नंगापन सामने आ रहा है, उसके लिए टीके रूबी को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में टीके रूबी तो डिस्ट्रिक्ट का हिसाब/किताब व्यवस्थित करते हुए विभिन्न कमेटियों और ट्रस्टों के अकाउंट माँग रहे हैं, अब इसके जबाव में सीधे सीधे एकाउंट देने की बजाए कमेटियों और ट्रस्टों पर कुंडली मारे बैठे पूर्व गवर्नर्स यदि अपने या दूसरे के कपड़े उतारने में जुट गए हैं तो इसके लिए टीके रूबी को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है ? वह तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपना काम कर रहे हैं । ऐसे में, टीके रूबी पर पूर्व गवर्नर्स की छवि खराब करने का यशपाल दास का आरोप ही संदेह के घेरे में आ जाता है - और लोगों को लगता है कि यशपाल दास अपनी और अपने साथी गवर्नर्स की कारस्तानियों पर पर्दा डालने के लिए टीके रूबी को निशाना बना रहे हैं । लोगों को याद नहीं है कि यशपाल दास ने कभी दिलीप पटनायक पर सवाल उठाया हो, जिन्हें अपने गवर्नर-काल के हिसाब/किताब की गड़बड़ियों पर पर्दा डालने के लिए दो दो बैलेंसशीट तैयार करवाना पड़ी थीं; रमन अनेजा की कारस्तानी पर भी यशपाल दास चुप बने हुए हैं, जिन्होंने अपने गवर्नर-काल के हिसाब/किताब को लेकर गजब किस्म की नाटकबाजी की हुई है - उल्लेखनीय है कि रमन अनेजा को मौजूदा रोटरी वर्ष की फाइनेंस कमेटी को अपने गवर्नर-काल का हिसाब/किताब देना है; रमन अनेजा ने लेकिन फाइनेंस कमेटी को हिसाब/किताब न देकर सुभाष गर्ग को दे दिया - सुभाष गर्ग ने उसे हेमंत अरोड़ा को भेज दिया, हेमंत अरोड़ा पूछ रहे हैं कि यह मुझे क्यों दे दिया, मेरा इससे क्या मतलब, मैं इसका क्या करूँ ? लोगों के बीच पूर्व गवर्नर्स की छवि खराब करने वाली रमन अनेजा की इस हरकत पर तो यशपाल दास चुप बने हुए हैं, और आरोप टीके रूबी पर लगा रहे हैं ।
हिसाब/किताब को लेकर नाटकबाजी करने के मामले में तो यशपाल दास ने रमन अनेजा को भी पछाड़ दिया है । उल्लेखनीय है कि पिछले दो वर्षों में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में खुद यशपाल दास ने लोगों के बीच घोषणा की कि रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट वह या तो ईमेल के जरिए लोगों को भेजेंगे और या जीएमएल में प्रकाशित करवायेंगे । उनकी इसी घोषणा का उल्लेख करते हुए टीके रूबी ने जीएमएल के अगले अंक के लिए उनसे उक्त ट्रस्ट के अकाउंट भेजने का अनुरोध किया । टीके रूबी ने तो उम्मीद की थी कि उनके अनुरोध पर यशपाल दास की तरफ से उन्हें खुशी खुशी अकाउंट मिल जायेंगे, लेकिन यशपाल दास को तो नाटक दिखाना था - सो उन्होंने टीके रूबी को लंबा/चौड़ा पत्र लिख मारा जिसमें विस्तार से बताया कि राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू की चेयरमैनी वाले उक्त ट्रस्ट में कौन कौन हैं और ट्रस्ट ने क्या क्या किया है; यशपाल दास ने यह भी बताया कि ट्रस्ट की हर वर्ष बैलेंसशीट तैयार होती है जिसे ट्रस्टियों को भेजा जाता है; उन्होंने यह भी बताया कि ट्रस्ट के अकाउंट जल्दी ही रोटरी न्यूज में प्रकाशित किए/करवाए जायेंगे; यशपाल दास ने और भी बहुत कुछ बताया, पर जीएमएल के लिए अकाउंट नहीं दिए - अपने पत्र में उन्होंने टीके रूबी पर आरोप और मढ़ दिया कि वह लोगों के बीच उनकी छवि खराब कर रहे हैं । उक्त ट्रस्ट का हिसाब/किताब जीएमएल में प्रकाशित करने का आईडिया यशपाल दास का ही था, अपना यह आईडिया उन्होंने खुद ही लोगों के सामने जाहिर किया था - टीके रूबी तो उनके ही आईडिया को अमल में लाने का प्रयास कर रहे थे । ऐसे में यशपाल दास का भड़कना किसी को भी समझ में नहीं आया - 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाली कहावत लोगों को लेकिन जरूर याद आई है ।
इस बीच मेडीकल मिशन टीम के साथ वॉलिंटियर के रूप में मंगोलिया गए राजा साबू और मधुकर मल्होत्रा की तस्वीरें लोगों को देखने को मिली हैं, जिनमें यह दोनों पर्यटन करते और मौज-मजा करते देखे गए हैं । लोगों के लिए हमेशा ही यह उत्सुकता का विषय रहा है कि मेडीकल मिशन में वॉलिंटियर के रूप में यह दोनों करते क्या होंगे ? तस्वीरों को देख कर भेद खुला है कि यह वास्तव में क्या करते हैं । इनके क्लब के कई लोगों का कहना है कि उनका भी मन है कि वह भी वॉलिंटियर के रूप में मेडीकल मिशन में जाएँ - पर राजा साबू और मधुकर मल्होत्रा के होते हुए हुए 'सेवा' और कोई कैसे कर सकता है ? लेकिन खबरदार, राजा साबू और मधुकर मल्होत्रा की इस सेवा में किसी ने भी 'मेवा' 'देखने' की कोशिश की - और यह सवाल उठाया कि मंगोलिया मेडीकल मिशन में कितनी रकम खर्च हुई है और कैसे-कैसे खर्च हुई है; ऐसा हुआ तो यही समझा जायेगा कि वह इन बेचारों की छवि खराब करने तथा इन्हें बदनाम करने का काम कर रहा है ।

Saturday, January 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में 'वीटीटी कम मेडिकल मिशन' के कामकाज को तथा उसके हिसाब-किताब को छिपाए रखने में राजा साबू का स्वार्थ आखिर क्या है ?

चंडीगढ़ । राजेंद्र उर्फ राजा साबू के अपनी पत्नी के साथ मेडिकल मिशन में वॉलिंटियर बन कर जाने तथा मिशन के खर्चे से जुड़े तथ्यों को छिपाने के प्रयासों के चलते 'वीटीटी कम मेडिकल मिशन' जैसा शानदार प्रोजेक्ट संदेहों के घेरे में आ गया है । उल्लेखनीय है कि इस मिशन के तहत वीटीटी कम मेडिकल टीम अफ्रीकी देशों में जाती है, और इस टीम में जाने वाले अनुभवी डॉक्टर्स वहाँ के स्थानीय डॉक्टर्स को अलग अलग तरह की सर्जरी के लिए ट्रेंड करते हैं - और ट्रेंड करने की प्रक्रिया में वहाँ के मरीजों की सर्जरी करते हैं । टीम में शामिल डॉक्टर्स की मदद करने तथा स्थानीय रोटेरियंस के साथ मिलकर उनके काम को संयोजित करने के लिए टीम में कुछेक रोटरी वॉलिंटियर्स भी होते हैं । अभी पिछले सितंबर में मलावी तथा उसके बाद नवंबर में इथिओपिया वीटीटी कम मेडिकल टीम गई थी । अगले माह, फरवरी में एक टीम के रवांडा जाने की योजना सुनी जा रही है । इस कार्यक्रम को अपनी ही तरह के एक अनोखे कार्यक्रम के रूप में देखा/पहचाना गया तथा इसे खासी प्रशंसा भी मिली है । प्रशंसा के साथ साथ लेकिन लोगों के बीच लेकिन अब यह सवाल भी उठने लगे हैं कि टीम में वॉलिंटियर्स के रूप में राजा साबू और उनकी पत्नी क्यों जुड़ जाते हैं ? पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जैसे उनके ओहदे को तथा उनकी उम्र को देखते हुए उनके वॉलिंटियर्स बनने का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है । पहली बात तो यह भी है कि टीम के डॉक्टर्स को आखिर ऐसी क्या मदद की जरूरत पड़ती होगी, जिसके लिए वॉलिंटियर्स चाहिए होते हों - और वह भी राजा साबू व उषा साबू जैसे वॉलिंटियर्स ? इस सवाल में ही सवाल का जबाव छिपा है - जिसे 'पढ़ने' में लोगों ने कोई गलती नहीं की और मान लिया गया है कि वॉलिंटियर्स तो लगता है कि सिर्फ पिकनिक मनाने और या अपना धंधा जमाने के चक्कर में ही जाते हैं । 
टीम में जाने वाले वॉलिंटियर्स का चयन कैसे होता है, यह भी एक रहस्य है । लोगों की शिकायत है कि उन्हें तो पता ही नहीं चलता है कि कहीं जाने के लिए कोई टीम बन रही है, जिसके लिए वॉलिंटियर्स चाहिए हैं । सारा कुछ बहुत ही गोपनीय तरीके से कर लिया जाता है । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन तक को 'वीटीटी कम मेडिकल मिशन' की गतिविधियों की पूरी जानकारी नहीं है । इसके बारे में जब भी उनसे पूछा गया, पूछने वाले को यही जबाव सुनने को मिला कि इसके बारे में साबू जी से ही पूछो । डेविड हिल्टन का कहना रहा कि उन्हें तो उतना ही पता है, जितना साबू जी बताते हैं और वह उसी कार्यक्रम में शामिल हो पाते हैं - जिसमें शामिल होने के लिए साबू जी उनसे कहते हैं । डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स तो इस कार्यक्रम को लेकर पूरी तरह ही अनजान हैं । एक मधुकर मल्होत्रा जरूर इस कार्यक्रम के बारे में जानते हुए 'दिखते' हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि उनसे भी जब इसके बारे में पूछो तो वह जबाव देने से बचने लगते हैं । वीटीटी कम मेडिकल मिशन से जुड़ी बातों को - उसकी गतिविधियों की विस्तृत जानकारी तथा उसके खर्च संबंधी ब्यौरों पर जिस तरह से पर्दा डाल कर रखा जा रहा है, उससे लोगों के बीच संदेह और सवाल लगातार बढ़ते जा रहे हैं । 
वीटीटी कम मेडिकल मिशन को राजा साबू के 'मिशन' के रूप में प्रचारित किया जाता है; और इसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की जो थोड़ी सी भूमिका है भी वह सिर्फ इस कारण से है कि उनके इस मिशन के लिए जो पैसे आते हैं उसके आने को संभव करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं । इस मिशन से जुड़े सभी तथ्यों को अपने सीने से चिपकाए रखने तथा वॉलिंटियर्स टीम में अपनी पत्नी सहित अपने को शामिल कर लेने के कारण राजा साबू लोगों के निशाने पर हैं । राजा साबू ने इस मिशन को टीआरएफ से अलग रखने की जो 'होशियारी' दिखाई है, उससे भी मामला संदेहास्पद बना है । दरअसल इस मिशन के लिए टीआरएफ से पैसा मिलता तो उसका बाकायदा हिसाब देना पड़ता, राजा साबू ने इस पचड़े में पड़ने की बजाए दूसरे देशों के क्लब्स से संपर्क साध कर पैसा उगाहने को ज्यादा सुरक्षित समझा - जिसमें 'ठीक' से हिसाब देने/बताने की कोई जरूरत ही नहीं होती है । इससे ही लोगों को लग रहा है कि वीटीटी कम मेडिकल मिशन की आड़ में कहीं पैसा कमाने/बनाने, अपने काम-धंधों के लिए मौका देखने/बनाने और अपनी पिकनिक मनाने का काम तो नहीं किया जा रहा है । 
वीटीटी कम मेडिकल मिशन को लेकर लोगों के बीच पैदा हो रहे संदेहों को दूर करने का एक ही तरीका है - और वह यह कि राजा साबू इस मिशन के काम करने के तरीके को पारदर्शी बना दें, तथा इसके खर्चे के हिसाब को सबके सामने रख दें । राजा साबू लेकिन ऐसा कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । मिशन के लिए दूसरे देशों के क्लब्स से पैसा मिलने की बात की जाती है - वह कितना होता है और वह कैसे खर्च होता है, इसे पूछे जाने वाले सवालों का जबाव किसी को नहीं मिला है । राजा साबू ने अपने इस रवैये से वीटीटी कम मेडिकल मिशन जैसे एक शानदार प्रोजेक्ट को विवाद का और संदेहों का मिशन बना दिया है ।