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Thursday, March 12, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए संदीप सहगल की उम्मीदवारी के नामांकन के मौके पर समर्थकों की बजाये 'विरोधियों' की ज्यादा उपस्थिति चुनाव में दोनों उम्मीदवारों के समर्थकों के पाला बदलने के किसी बड़े उलट-फेर का तो संकेत नहीं है

लखनऊ । संदीप सहगल की उम्मीदवारी का नामांकन यूँ तो खासे जोरशोर और कई एक बड़े नेताओं की उपस्थिति तथा विभिन्न क्लब्स से आये/जुटे लोगों की बड़ी भीड़ के साथ जमा किया गया, लेकिन उस बड़ी भीड़ में समर्थकों की बजाये 'विरोधियों' की मौजूदगी ने सभी का ध्यान खींचा और फिर यही बात लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए शिव कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ साथ सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए संदीप सहगल की उम्मीदवारी के नामांकन के समय भूपेश बंसल, केएस लूथरा, जीएन मेहरोत्रा, वीएस दीक्षित, एचएस सच्चर जैसे पूर्व गवर्नर्स मौजूद थे; तो लायंस क्लब लखनऊ, लखनऊ अभिलाषा, लखनऊ अंबर ब्ल्यू, लखनऊ आशीर्वाद, लखनऊ आस्था, लखनऊ आशीष, लखनऊ कैण्ट, लखनऊ ईस्ट गोमती, लखनऊ गोमती, लखनऊ ग्रेटर, लखनऊ इंदिरा, लखनऊ महानगर, लखनऊ इंटेलीजेंसिया, लखनऊ मैत्री, लखनऊ मेट्रोपोलिटन, लखनऊ अवध, लखनऊ अवध प्रेरणा, लखनऊ प्रतिष्ठा, लखनऊ राजधानी, लखनऊ राजधानी अनिंद, लखनऊ राजश्री, लखनऊ संस्कृति,लखनऊ सेवा, लखनऊ शान-ए-अवध डायमंड, लखनऊ शान-ए-अवध गोल्ड, लखनऊ शिवालिक, लखनऊ तहजीब, लखनऊ सुरभि, बाराबंकी, गोंडा, काशीपुर ग्रेटर, काशीपुर सेंट्रल, काशीपुर डायमंड, काशीपुर सिटी, जसपुर आदि क्लब्स के पदाधिकारी तथा अन्य लोग भी साथ में थे ।
उम्मीदवारी के नामांकन के समय बड़े नेताओं तथा विभिन्न क्लब्स के लोगों की मौजूदगी ने संदीप सहगल के समर्थकों को पहली नजर में तो खासा उत्साहित किया, लेकिन बाद में जैसे जैसे वहाँ मौजूद लोगों को 'पहचानना' शुरू किया गया - तो पहली नजर में पैदा हुआ और बना उत्साह हल्का पड़ता गया । नामांकन के समय मौजूद क्लब्स के लोगों को बाद में जब 'पहचानना' शुरू किया गया, तब यह 'जान' कर संदीप सहगल के समर्थकों को खासी हैरानी हुई कि लखनऊ के जिन क्लब्स व लोगों को संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/समझा जा रहा है, वह तो उक्त मौके पर नदारत थे; और जो वहाँ उपस्थित थे उनमें से कइयों को प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार अशोक अग्रवाल के समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । कुछेक क्लब्स और लोगों को तो अशोक अग्रवाल के ऐसे कट्टर समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता है जिनके बारे में संदीप सहगल के समर्थक नेताओं को पूरा पूरा विश्वास है कि वह संदीप सहगल की उम्मीदवारी के नामांकन के समय मौजूद भले ही थे, लेकिन उनका वोट पक्के तौर पर अशोक अग्रवाल के साथ ही है । इसी बिना पर संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक बड़े नेताओं ने इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए स्वीकार किया कि जो लोग संदीप सहगल की उम्मीदवारी के नामांकन के मौके पर उपस्थित थे, उनमें से कई अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के नामांकन के समय भी उपस्थित हो सकते हैं ।
संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों को हालाँकि इस बात से ज्यादा हैरानी नहीं है कि अशोक अग्रवाल के समर्थक समझे जाने वाले क्लब्स व लोग संदीप सहगल की उम्मीदवारी के नामांकन के मौके पर उपस्थित हुए; उनको हैरानी और चिंता इस बात से हुई है कि लखनऊ में जिन लोगों को संदीप सहगल के साथ समझा जाता है, वह इस मौके पर गायब क्यों रहे ? तो क्या दोनों उम्मीदवारों के समर्थकों में कोई बड़ा उलट-फेर हो रहा है - और क्या इनके समर्थकों के उनके साथ और उनके समर्थकों के इनके साथ आने की संभावना बन रही है ? यह तो हालाँकि दूर की कौड़ी है, लेकिन संदीप सहगल के समर्थकों के बीच इस बात को लेकर चिंता तो प्रकट हुई ही है कि संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थन में समझे जाने वाले लखनऊ के क्लब्स और लोग इस महत्वपूर्ण मौके से दूर दूर क्यों रहे ? इसी चिंता में संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने अब यह हिसाब-किताब लगाना शुरू किया है कि संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक समझे जाने वाले जो लोग इस मौके पर उपस्थित नहीं हुए, वोटिंग के मौके पर वह कहीं धोखा तो नहीं देंगे ?

Monday, March 9, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में लखनऊ में अशोक अग्रवाल से पिछड़ रहे संदीप सहगल के समर्थकों ने नीरज बोरा, भूपेश बंसल और शिव कुमार गुप्ता को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया

लखनऊ । नीरज बोरा, भूपेश बंसल और शिव कुमार गुप्ता से अपेक्षित मदद न मिलने के कारण संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच निराशा पैदा हो रही है, और उनके बीच शिकायतें सुनी जा रही हैं कि इन लोगों को जितनी सक्रियता दिखानी चाहिए ये लोग उतनी सक्रियता दिखा नहीं रहे हैं । संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों का कहना है कि इन तीनों के ढीले-ढाले रवैये के कारण लखनऊ में संदीप सहगल की उम्मीदवारी के पक्ष में उतना समर्थन भी नहीं जुटाया जा पा रहा है, जितना कि आसानी से जुटाया जा सकता है ।
संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों को यह शिकायत इसलिए भी करनी पड़ रही है क्योंकि वह देख रहे हैं कि उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार अशोक अग्रवाल के समर्थन में गुरनाम सिंह के साथ-साथ संजय चोपड़ा, विशाल सिन्हा और अनुपम बंसल ने भी जी-तोड़ प्रयास जारी रखे हुए हैं, जिसके चलते लखनऊ में अशोक अग्रवाल का पलड़ा काफी भारी होता जा रहा है । उल्लेखनीय है कि संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक बड़े नेता भी लगातार यह मानते और कहते रहे हैं कि लखनऊ में संदीप सहगल के मुकाबले अशोक अग्रवाल को बढ़त है । यह स्वीकार करने के साथ साथ वह हालाँकि यह दावा भी करते रहे हैं कि अशोक अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे वह कम कर लेंगे । अशोक अग्रवाल की बढ़त को कम करने के लिए संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नीरज बोरा, भूपेश बंसल और शिव कुमार गुप्ता पर निर्भर थे । उन्हें भरोसा था कि इन लोगों की सक्रियता से वह लखनऊ में संदीप सहगल को अशोक अग्रवाल से ज्यादा पीछे नहीं रहने देंगे । किंतु चुनाव का समय जैसे जैसे नजदीक आ रहा है वैसे वैसे संदीप सहगल के समर्थकों को यह देख कर निराशा हो रही है कि ये तीनों लोग अपेक्षित मदद नहीं कर रहे हैं ।
संदीप सहगल के समर्थकों को पिछले दिनों असल में उस समय बड़ा झटका लगा जब उन्हें पता चला कि लखनऊ के एक क्लब के कार्यक्रम का निमंत्रण प्राप्त करने की कोशिश करने के बाद भी संदीप सहगल को निमंत्रण नहीं मिला । इस जानकारी का लखनऊ से बाहर के, तराई क्षेत्र के लोगों के बीच नकारात्मक संदेश गया; और वहाँ लोगों को यह कहते हुए सुना गया कि संदीप सहगल के लखनऊ के समर्थक नेता यदि उन्हें किसी क्लब के कार्यक्रम का निमंत्रण भी नहीं दिलवा सकते हैं, तो फिर वोट कैसे दिलवायेंगे ? संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों ने हालाँकि यह तर्क देकर लोगों को कनविंस करने की कोशिश तो की कि केएस लूथरा के साथ अपने विरोध के चलते उक्त क्लब के पदाधिकारी संदीप सहगल को निमंत्रण देने के लिए तैयार नहीं हुए; लेकिन लोगों के बीच सवाल फिर भी बना रहा कि उक्त क्लब के पदाधिकारियों का विरोध यदि केएस लूथरा के साथ है भी तो नीरज बोरा, भूपेश बंसल और शिव कुमार गुप्ता तो निमंत्रण दिलाने के लिए प्रयास कर सकते थे ? इन्होंने प्रयास क्यों नहीं किया ? शिव कुमार गुप्ता तो फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, तीन-चार महीने बाद वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होंगे - वह यदि सचमुच चाहते और कोशिश करते तो संदीप सहगल को निमंत्रण तो मिल ही जाता और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच नकारात्मक संदेश नहीं जाता ।
संदीप सहगल की उम्मीदवारी के अभियान में दरअसल झंझट इस कारण भी बना दिख रहा है कि सारा बोझ एक अकेले केएस लूथरा के सिर आ पड़ा है, और दूसरे समर्थक नेताओं का उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है । ले दे कर एक एचएस सच्चर और संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय हैं, लेकिन वह चुनावी राजनीति की वास्तविकताओं और जुगाड़ों की व्यवस्था से इस कदर अनजान हैं कि उनका काम भी केएस लूथरा को ही करना पड़ रहा है । संदीप सहगल की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए पहले यह व्यवस्था बनाई गई थी कि तराई क्षेत्र का काम एचएस सच्चर देखेंगे और लखनऊ का जिम्मा केएस लूथरा सँभालेंगे । लेकिन जब 'सचमुच का काम' करने का समय आया तो पता चला कि एचएस सच्चर को न तो ज्यादा कुछ पता है और न ही उनके लिए लोगों का साधना संभव होगा । तब केएस लूथरा को आगे आकर उनकी जिम्मेदारी सँभालनी पड़ी । तराई क्षेत्र के क्लब्स में केएस लूथरा का अच्छा परिचय और प्रभाव भी है; वहाँ वही स्थितियों को नियंत्रित भी कर सकते हैं । केएस लूथरा ने तराई क्षेत्र में जिम्मेदारी सँभाली तो लखनऊ का काम पिछड़ गया । कहने को तो लखनऊ में नीरज बोरा, भूपेश बंसल और शिव कुमार गुप्ता को संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/पहचाना जाता है । लेकिन नीरज बोरा और भूपेश बंसल चूँकि चुनावी राजनीति की जरूरत के हिसाब से सक्रिय होने का मिजाज नहीं रखते हैं, इसलिए उनके केएस लूथरा के पूरक बनने की किसी ने उम्मीद भी नहीं की; शिव कुमार गुप्ता फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते खुल कर ज्यादा कुछ करने से बचते हुए दिखे हैं ।
संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों की शिकायत यही है कि अशोक अग्रवाल को तो अपने समर्थक नेताओं - गुरनाम सिंह, अनुपम बंसल, संजय चोपड़ा, विशाल सिन्हा आदि का खुला और सक्रिय समर्थन मिल रहा है; जबकि संदीप सहगल एक अकेले केएस लूथरा के भरोसे छोड़ दिए गए हैं तथा उनके बाकी समर्थक नेता 'इस' कारण से या 'उस' कारण से या तो चुप बैठे हैं और या उतने सक्रिय नहीं हैं जितना सक्रिय उनको होना चाहिए । शिव कुमार गुप्ता को तो संदीप सहगल की उम्मीदवारी के बड़े घनघोर समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है; इसलिए उनको भी ज्यादा सक्रिय न होता देख संदीप सहगल के समर्थकों के बीच असमंजस बना है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अशोक अग्रवाल और संदीप सहगल के बीच होने वाले चुनाव में लखनऊ का खास रोल है, जहाँ कि अशोक अग्रवाल का पलड़ा पहले से ही भारी देखा/पहचाना जा रहा है । ऐसे में, संदीप सहगल को जिन लोगों से मदद की उम्मीद है उन लोगों से अपेक्षित मदद न मिलती देख कर संदीप सहगल के समर्थकों का निराश होना स्वाभाविक ही है । संदीप सहगल के कुछेक समर्थकों ने इसके लिए नीरज बोरा, भूपेश बंसल और शिव कुमार गुप्ता को जिस तरह से निशाने पर लेना शुरू कर दिया है, उससे सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है ।

Thursday, October 3, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में एके सिंह की उम्मीदवारी की आहट ने विशाल सिन्हा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने की गुरनाम सिंह की तैयारी में रोड़ा डाला

लखनऊ । एके सिंह ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के संकेत देकर गुरनाम सिंह के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है । गुरनाम सिंह के सामने संकट इसलिए क्योंकि गुरनाम सिंह के सामने इस बार विशाल सिन्हा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने की चुनौती पहले से ही है । विशाल सिन्हा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने की जिम्मेदारी गुरनाम सिंह ने ली तो पिछले लायन वर्ष में थी, लेकिन पिछले लायन वर्ष में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था । गुरनाम सिंह के सामने चुनौती यह है कि कहीं इस बार भी वह विशाल सिन्हा को नहीं जितवा/चुनवा नहीं पाए तो लायन राजनीति में उनकी चौधराहट ही समाप्त हो जायेगी । एके सिंह की उम्मीदवारी की तैयारी ने इसीलिये गुरनाम सिंह के सामने बड़ी समस्या पैदा कर दी है ।
मजे की बात यह है कि पिछले वर्ष गुरनाम सिंह ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को बताया करते थे कि अगले वर्ष, अनुपम बंसल के गवर्नर-काल में वह एके सिंह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवायेंगे । एके सिंह ने गुरनाम सिंह की पिछले वर्ष की घोषणा को ही आधार बना कर अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने की तैयारी शुरू कर दी है । गुरनाम सिंह का कहना है कि उन्होंने पिछले वर्ष एके सिंह को इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने की बात कही तो थी, लेकिन चूँकि पिछले वर्ष विशाल सिन्हा नहीं जीत पाए इसलिए अब इस वर्ष पहले तो विशाल सिन्हा को चुनवाना है । इस पर एके सिंह का कहना है कि विशाल सिन्हा यदि इस बार भी नहीं जीत पाये, तो अगले वर्ष भी फिर वही उम्मीदवार होंगे और इस तरह तो उनका नंबर और आगे खिसक जायेगा । एके सिंह का कहना है कि उनकी उम्र ऐसी नहीं है कि वह और कई वर्ष इंतजार करें, जबकि विशाल सिन्हा तो अभी नौजवान हैं, वह इंतजार कर सकते हैं । एके सिंह का यह भी तर्क है कि पिछले वर्ष विशाल सिन्हा तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद चुनाव नहीं जीत सके, इसलिए उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाने के लिए अभी और काम करना चाहिए तथा उसके बाद अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करना चाहिए ।
एके सिंह के इस तर्क के प्रति डिस्ट्रिक्ट के उन लोगों ने भी अपना समर्थन व्यक्त किया है जो गुरनाम सिंह के साथ समझे/पहचाने जाते हैं - गुरनाम सिंह को इसीलिए एके सिंह की उम्मीदवारी में अपने लिए खतरे की घंटी सुनाई दे रही है । गुरनाम सिंह हालाँकि ऊपर-ऊपर तो लोगों को यह दिखाने/जताने का प्रयास कर रहे हैं कि वह एके सिंह को इस वर्ष उम्मीदवार न बनने के लिए समझा लेंगे और एके सिंह वही करेंगे जो वह कहेंगे; लेकिन भीतर ही भीतर गुरनाम सिंह डरे हुए भी हैं और इसीलिये वह एके सिंह को तरह-तरह से मनाने की कोशिश कर रहे हैं । गुरनाम सिंह ने एके सिंह को फार्मूला सुझाया है कि अगले लायन वर्ष में चूँकि लखनऊ से बाहर के क्लब्स से उम्मीदवार आने का नंबर है, इसलिए वह बाराबंकी या आसपास के किसी इलाके के क्लब में अपना ट्रांसफर ले लें और इस तरह वह अगले ही वर्ष उम्मीदवार हो सकेंगे और उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवा दिया जायेगा । एके सिंह ने लेकिन इस तरह की बेईमानी करके लखनऊ से बाहर के क्लब्स का अधिकार चुराने से साफ इंकार कर दिया है । गुरनाम सिंह को लगने लगा है कि एके सिंह को भूपेश बंसल, नीरज बोरा, केएस लूथरा, शिव कुमार गुप्ता आदि से हवा मिल गई है - और इसलिए एके सिंह उनके द्धारा समझाए जाने के बावजूद अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने को तैयार नहीं हो रहे हैं ।
एके सिंह की उम्मीदवारी में गुरनाम सिंह के लिए खतरा देख रहे डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों का गणित यह है कि पिछले वर्ष विशाल सिन्हा को जो सौ वोट मिले थे, उनमें से पच्चीस से तीस वोट तो एके सिंह के ही थे । ऐसे में, एके सिंह के उम्मीदवार होने की स्थिति में तो विशाल सिन्हा को पिछले वर्ष के मुकाबले और बड़ी पराजय का सामना करना पड़ेगा । एके सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल से जिस तरह की तवज्जो मिल रही है, उसे देख/पहचान कर भी विशाल सिन्हा व गुरनाम सिंह के नजदीकियों को खतरा बिलकुल नजदीक दिख रहा है । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा का हालाँकि दावा है कि अनुपम बंसल उनके साथ धोखा नहीं करेंगे । उनका दावा अपनी जगह ठीक है - पर बात धोखे की नहीं है; बल्कि एक दूसरे की जरूरतों को समझने की है ।
उल्लेखनीय है कि हर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुछ 'जरूरतें' होती हैं, जिन्हें उम्मीदवार पूरी करता है । अनुपम बंसल और विशाल सिन्हा की चाहें कैसी और कितनी भी दोस्ती हो, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अनुपम बंसल को चूँकि 'उम्मीदवार' विशाल सिन्हा से 'वह' सहयोग नहीं मिल रहा है जिसकी जब-तब उन्हें जरूरत होती है । अनुपम बंसल दरअसल इसीलिये एके सिंह को तवज्जो देने के लिए 'मजबूर' हुए क्योंकि उनकी डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी की जरूरतों को एके सिंह पूरा करने के लिए सहज रूप से तैयार हो गए । एके सिंह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल से मिली तवज्जो को पाकर ही तो विशाल सिन्हा की राह का रोड़ा बन गए हैं । जिस दोस्ती का वास्ता देकर विशाल सिन्हा, अनुपम बंसल के अपने साथ रहने का दावा कर रहे हैं; विडंबना यह है कि उन्हीं अनुपम बंसल ने तो एके सिंह को विशाल सिन्हा की राह का रोड़ा बनने का मौका और हौंसला दिया है ।
एके सिंह की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी की तैयारी क्या गुल खिलाती है, और एके सिंह कहीं गुरनाम सिंह की झाँसापट्टी में आ तो नहीं जायेंगे - यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा; लेकिन उनकी उम्मीदवारी की संभावना से गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा जिस तरह परेशान हो उठे हैं - उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों को एक बात तो साफ दिखने लगी है कि एके सिंह यदि सचमुच अपनी उम्मीदवारी पर टिके रहे तो गुरनाम सिंह को एक बार फिर पराजय का सामना करना पड़ेगा । एके सिंह के लिए स्थितियाँ सचमुच अनुकूल हैं : पिछली बार जीतने/जितवाने वाले लोगों का समर्थन तो उन्हें मिलेगा ही; पच्चीस से तीस वह वोट जो उनके कारण विशाल सिन्हा को मिले थे, उनकी जीत के अंतर को बढ़ाने का ही काम करेंगे । एक मनोवैज्ञानिक फायदा भी उन्हें मिलेगा । पिछली बार विशाल सिन्हा को कई वोट इस कारण भी मिले क्योंकि किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि गुरनाम सिंह के उम्मीदवार होने के कारण वह हार भी सकते हैं । गुरनाम सिंह की जो मुट्ठी बंद होने के कारण पिछले वर्ष लाख की थी, अब खुल जाने के बाद वह खाक की हो गई है । इन्हीं सब वजहों से गुरनाम सिंह भी समझ रहे हैं कि एके सिंह के उम्मीदवार होने की स्थिति में उनके लिए विशाल सिन्हा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवा पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही होगा । इसीलिये वह एके सिंह को इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी न प्रस्तुत करने के लिए मनाने/पटाने में हर तरह से लगे हुए हैं ।

Saturday, May 4, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने की तैयारी कर रहे अनुपम बंसल क्या अपना क्लब छोड़ने की फ़िराक में हैं ?

लखनऊ । लखनऊ में एक नए क्लब के बनने की चर्चा के साथ अनुपम बंसल के लायंस क्लब लखनऊ अभिलाषा छोड़ने की कानाफूसी तेज हो गई है । उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों संपन्न हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हुए चुनाव में विशाल सिन्हा की पराजय के बाद गुरनाम सिंह खेमे की तरफ से भूपेश बंसल के लिए जिस तरह की गाली-गलौज की गई, उसे देखते हुए अनुपम बंसल के लिए अपने क्लब में बने रह पाना मुश्किल लग रहा है । अनुपम बंसल का क्लब दरअसल उनका कम और भूपेश बंसल का ज्यादा माना जाता है - यह बात अनुपम बंसल के लिए इसलिए और भी मुसीबतभरी है क्योंकि उन्हें गुरनाम सिंह के साथ ही रहना है । अनुपम बंसल के अभी तक के रवैये से लोगों ने यही निष्कर्ष निकाला हुआ है कि अनुपम बंसल के सामने गुरनाम सिंह और भूपेश बंसल में से किसी एक को चुनने की नौबत आई तो वह गुरनाम सिंह को ही चुनेंगे । विशाल सिन्हा की चुनावी हार से गुरनाम सिंह की राजनीतिक चौधराहट का जो रायता फैला है उसे समेटने का वह हर संभव प्रयास करेंगे ही और इस प्रयास में उन्हें भूपेश बंसल से ही चुनौती मिलने का डर है । अपनी राजनीतिक चौधराहट के फैले रायते को समेटने में गुरनाम सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अनुपम बंसल की मदद चाहिए ही होगी, इसलिए गुरनाम सिंह की कोशिश है कि अनुपम बंसल पूरी तरह से भूपेश बंसल की छाया से बाहर आ जाये । अब जब गुरनाम सिंह ऐसा चाहते हैं, तो अनुपम बंसल को यह करना ही होगा ।
अनुपम बंसल ने अपने तमाम फैसलों से भूपेश बंसल को अलग-थलग ही रखा है और दूसरे लोगों की तरह भूपेश बंसल को भी अनुपम बंसल के तमाम फैसलों की जानकारी तभी मिली - जब वह लिए जा चुके थे । अपनी इस उपेक्षा के बावजूद भूपेश बंसल ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे क्लब में अनुपम बंसल के लिए समस्या पैदा हो । अनुपम बंसल के लिए क्लब में लेकिन समस्याएँ तो फिर भी पैदा हुईं - और अनुपम बंसल ने उनके लिए भूपेश बंसल को ही जिम्मेदार माना । पिछले दिनों संपन्न हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में अनुपम बंसल समर्थन तो कर रहे थे विशाल सिन्हा का, लेकिन उनके क्लब के वोट जा रहे थे शिव कुमार गुप्ता के पास - क्योंकि क्लब के वोटों पर कब्ज़ा भूपेश बंसल का था । भूपेश बंसल से कह-सुन कर अनुपम बंसल ने हालाँकि क्लब के पाँच वोटों में से दो वोट ले लिए थे, लेकिन इस सब चक्कर में अनुपम बंसल की किरकिरी भी हुई ही । अनुपम बंसल ने क्लब के लोगों को और भूपेश बंसल को तवज्जो नहीं दी, तो क्लब के लोगों ने भी उन्हें अकेला छोड़ दिया । अनुपम बंसल और संजय चोपड़ा व शिव कुमार गुप्ता को सम्मानित करने के वास्ते होने वाले कार्यक्रम की तैयारी के लिए जो मीटिंग बुलाई गई उसमें अनुपम बंसल के क्लब से कोई भी नहीं पहुंचा । अनुपम बंसल के लिए सार्वजनिक रूप से यह खासा तगड़ा झटका था । अनुपम बंसल को खुश करने में तथा अनुपम बंसल को भूपेश बंसल से दूर करने में लगे लोगों ने इस झटके के पीछे भूपेश बंसल को पहचाना और बताया । शायद, अनुपम बंसल ने भी उनकी बात को सच माना । हालाँकि क्लब के लोगों का कहना रहा कि अनुपम बंसल ने अपने रवैये से और गुरनाम सिंह के साथ बने रहने के अपने फैसले से क्लब के लोगों को अपने खिलाफ कर लिया है ।
कारण चाहे जो भी हो, यह सभी को दिखने लगा कि अनुपम बंसल के गुरनाम सिंह के साथ होने के कारण अपने क्लब में 'बने' रहना मुश्किल ही होगा - बने भी रहेंगे तो गुरनाम सिंह की मनमानियों को पूरा नहीं करवा सकेंगे । इसीलिये गुरनाम सिंह भी अनुपम बंसल पर दबाव बना रहे थे कि वह लायंस क्लब लखनऊ अभिलाषा छोड़ें तथा अन्य किसी क्लब में जाएँ या कोई नया क्लब बनाएँ । इस बीच एक नया क्लब बनने की सुगबुगाहट शुरू हुई जिसके पीछे अनुपम बंसल के नजदीकियों को देखा/पहचाना गया है । इससे इस बात को बल मिला कि इस नए क्लब के बनने के बाद अनुपन बंसल इसमें अपना ट्रांसफर ले लेंगे । इस मुद्दे पर अनुपम बंसल ने हालाँकि चुप्पी ही बनाये रखी है, लेकिन अधिकतर लोगों का यही मानना और कहना है कि लायंस क्लब लखनऊ अभिलाषा में अनुपम बंसल के दिन बस अब गिने-चुने ही हैं । 

Thursday, March 21, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में केएस लूथरा की समझ और हौंसले की जीत तथा गुरनाम सिंह की हार में अनुपम बंसल को बड़ी राहत मिली है

लखनऊ । गुरनाम सिंह के उम्मीदवार विशाल सिन्हा की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में हुई पराजय ने अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने वाले अनुपम बंसल को बड़ी राहत पहुँचाई है । हालाँकि पहली नजर में विशाल सिन्हा की पराजय अनुपम बंसल के लिए एक सदमे और झटके की तरह है - अनुपम बंसल ने चूँकि हमेशा ही विशाल सिन्हा को अपने खास दोस्त के रूप में सार्वजनिक रूप से 'स्वीकार' किया है और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी का खुल कर समर्थन किया; इसलिए विशाल सिन्हा की पराजय अनुपम बंसल के लिए तात्कालिक रूप से एक बड़ा सदमा और झटका है । लेकिन कुल मिलाकर विशाल सिन्हा की पराजय को अनुपम बंसल के लिए एक बड़ी राहत के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है तो इसका कारण मानवीय स्वभाव की उस विशेषता में है जिसे मशहूर अभिनेता आमिर खान की लोकप्रिय फिल्म 'थ्री इडियट्स' में कुछ इस तरह व्याख्यायित किया गया कि - दोस्त यदि पीछे रह जाये तो दुःख होता है, लेकिन यदि वही दोस्त आगे निकल जाये तो 'ज्यादा' दुःख होता है ।
मानवीय स्वभाव की इसी विशेषता के चलते विशाल सिन्हा की पराजय अनुपम बंसल के लिए सदमे और झटके की तरह है; लेकिन विशाल सिन्हा यदि जीतते तो अनुपम बंसल को ज्यादा बड़े सदमे और झटके का शिकार होना पड़ता । विशाल सिन्हा की पराजय को केएस लूथरा के प्रति गुरनाम सिंह के और भूपेश बंसल के प्रति विशाल सिन्हा के रवैये के एक नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । यह सच है कि केएस लूथरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने में गुरनाम सिंह का बहुत सहयोग था; लेकिन सच यह भी है कि फिर केएस लूथरा को तरह-तरह से अपमानित करने और परेशान करने में भी गुरनाम सिंह ने कोई कसर नहीं छोडी । केएस लूथरा का कसूर क्या था ? सिर्फ इतना ही न कि अपनी कैबिनेट के कुछ पद उन्होंने गुरनाम सिंह के कहे अनुसार नहीं दिए । और भूपेश बंसल का क्या कसूर था ? सिर्फ यही न कि उन्होंने इन्स्टालेशन चेयरपर्सन तथा कांफ्रेंस चेयरपर्सन बनने के केएस लूथरा के ऑफर को स्वीकार कर लिया । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा को चूँकि यह पसंद नहीं आया, सो वह भूपेश बंसल के खिलाफ पिल पड़े । इन प्रसंगों ने लोगों के बीच यही सन्देश दिया कि जो कोई इनकी बात नहीं मानेगा, उसकी यह बुरी गत बनायेंगे । इसी आधार पर अनुपम बंसल के लिए गंभीर आफतों को आया देखा जा रहा था । तमाम लोगों का मानना और कहना था कि गुरनाम सिंह ने केएस लूथरा की जो दशा की, अनुपम बंसल की उससे भी बुरी दशा करते । भूपेश बंसल का बदला भी गुरनाम सिंह को अनुपम बंसल से ही लेना होता और तब अनुपम बंसल की दोहरी मुसीबत होती ।
विशाल सिन्हा की पराजय से गुरनाम सिंह को जो झटका लगा है, उसके बाद लेकिन अब अनुमान लगाया जा रहा है कि गुरनाम सिंह हालात की नजाकत को समझेंगे और अनुपम बंसल के प्रति वैसा रवैया नहीं अपनायेंगे, जैसा कि उन्होंने केएस लूथरा के साथ किया । विशाल सिन्हा की पराजय के कारण गुरनाम सिंह की जो राजनीतिक किरकिरी हुई है उसके लिए सिर्फ और सिर्फ गुरनाम सिंह के रवैये को ही जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है । केएस लूथरा उनके अच्छे-खासे भक्त थे, और वह गुरनाम सिंह के तमाम आपत्तिजनक व्यवहार को भी झेल ले रहे थे; लेकिन गुरनाम सिंह ने उन्हें पूरी तरह दबा कर रखने की जो कोशिश की, उसने उलटे उन्हीं को चोट पहुँचा दी है । केएस लूथरा से उन्हें जो चोट मिली है, उसके असर के कारण अब उनके लिए अनुपम बंसल को दबा कर रखना मुश्किल ही होगा । स्वाभाविक रूप से यह अनुपम बंसल के लिए बड़ी राहत की बात होगी ।
विशाल सिन्हा की पराजय को विशाल सिन्हा की नहीं, बल्कि गुरनाम सिंह की पराजय के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । विशाल सिन्हा की इस पराजय ने इस बात को साबित किया है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच गुरनाम सिंह के तौर-तरीकों को लेकर भारी नाराजगी है और गुरनाम सिंह लोगों का मन और मूड भाँपने में पूरी तरह विफल रहे हैं । गुरनाम सिंह ने केएस लूथरा की सामर्थ्य और उनके हौंसले को पहचानने/समझने में भी बड़ी गलती की । उल्लेखनीय है कि शिव कुमार गुप्ता की जीत का भरोसा खुद शिव कुमार गुप्ता और उनके दूसरे समर्थकों व शुभचिंतकों तक को नहीं था; एक अकेले केएस लूथरा को शिव कुमार गुप्ता के जीतने का भरोसा था और वही शिव कुमार गुप्ता तथा अपने साथियों/सहयोगियों का हौंसला बनाये हुए थे । चुनाव से पहले की उनकी बातों में छिपे अर्थों को यदि समझने की कोशिश करें तो पायेंगे कि उन्हें भी भरोसा इस बात का था कि डिस्ट्रिक्ट में लोग गुरनाम सिंह की मनमानियों से चूँकि ज्यादा परेशान हैं, इसलिए लोग गुरनाम सिंह के उम्मीदवार को हराने के लिए किसी को भी जितवायेंगे । जाहिर तौर पर यह शिव कुमार गुप्ता की जीत नहीं है, यह विशाल सिन्हा की हार भी नहीं है - यह गुरनाम सिंह की हार है और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के मन और मूड को पहचानने की केएस लूथरा की समझ और परख तथा प्रतिकूल स्थितियों में भी बनाये रखे गए हौंसले और हिम्मत की जीत है ।
यह अनुपम बंसल की भी 'जीत' है - जो किस्मत से उन्हें मिली है । यह सच है कि जो हारा है वह उनका खास दोस्त है और उनका वह खास दोस्त उनके खुले समर्थन के बावजूद हारा है - लेकिन फिर भी उनके खास दोस्त की हार में उनके लिए बड़ी राहत छिपी है । उम्मीद है कि अनुपम बंसल को अब गुरनाम सिंह के उन दबावों का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिन दबावों का केएस लूथरा को करना पड़ा है । गुरनाम सिंह के फिजूल के दबाव नहीं होंगे तो अनुपम बंसल के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में कुछ अच्छा और सार्थक करना संभव हो सकेगा ।

Monday, February 11, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में विशाल सिन्हा ने पिकनिक कार्यक्रम के जरिये अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने और 'दिखाने' का काम जोरदार तरीके से किया है

लखनऊ । विशाल सिन्हा ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में लखनऊ में एक बड़ा 'प्रदर्शन' किया । उनके द्धारा आयोजित पिकनिक कार्यक्रम में दो क्लब्स को छोड़ कर लखनऊ के अन्य सभी क्लब्स के लोगों की हुई भागीदारी ने एक उम्मीदवार के रूप में विशाल सिन्हा की सक्रियता और संलग्नता को तो जाहिर किया ही - साथ ही यह 'संदेश' भी दिया कि जरूरत पड़ने पर वह अपने से नाराज और विरोधी लोगों को भी मना सकते हैं और अपने साथ जोड़ सकते हैं । विशाल सिन्हा द्धारा आयोजित पिकनिक कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कई ऐसे प्रमुख लोगों को भी दिलचस्पी के साथ सक्रिय देखा गया जिन्हें विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी के खिलाफ और शिव कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में समझा/पहचाना जाता है । शिव कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों ने हालाँकि यह कहते हुए पिकनिक के प्रभाव को कम करने की कोशिश की है कि पिकनिक में कई क्लब्स के लोगों को तरह-तरह से फुसला कर तथा तरह-तरह के भावनात्मक दबावों से घेर-घार कर इकठ्ठा किया गया - ताकि उन्हें अपने समर्थन में 'दिखाया' जा सके । शिव कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों ने यह तर्क भी दिया है कि विशाल सिन्हा द्धारा आयोजित पिकनिक कार्यक्रम में शामिल होने का मतलब यह नहीं हो जाता है कि पिकनिक कार्यक्रम में जो लोग शामिल हुए वह वोट भी विशाल सिन्हा को ही देंगे ।
विशाल सिन्हा द्धारा आयोजित पिकनिक कार्यक्रम की सफलता की जो व्याख्या विशाल सिन्हा और उनके समर्थक तथा शिव कुमार गुप्ता और उनके समर्थक कर रहे हैं उसे यदि अनदेखा भी करें और उन लोगों की बातों पर ध्यान दें जो अभी किसी भी तरफ नहीं हैं - तो पिकनिक कार्यक्रम की सफलता से विशाल सिन्हा ने यह साबित तो कर ही दिया है कि लोगों को अपने साथ जोड़ने और 'दिखाने' का हुनर उन्हें आता है और अपने इसी हुनर का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में लोगों के भारी जमावड़े को संभव कर दिखाया । यह ठीक है कि पिकनिक कार्यक्रम की जोरदार सफलता के बावजूद एक उम्मीदवार के रूप में उनकी चुनौतियाँ ख़त्म नहीं हो गईं हैं - पिकनिक कार्यक्रम में भूपेश बंसल की अनुपस्थिति ने उनकी चुनौतियों को बरक़रार रखने का ही काम किया है । विद्या शंकर दीक्षित और नीरज बोरा की अनुपस्थिति को तो विशाल सिन्हा और उनके समर्थकों ने यह कह कर तवज्जो नहीं दी कि यह दोनों चूँकि शिव कुमार गुप्ता के क्लब में हैं, इसलिए इन्हें तो इस पिकनिक कार्यक्रम में नहीं ही आना था; लेकिन भूपेश बंसल की अनुपस्थिति को लेकर विशाल सिन्हा के समर्थकों के बीच कुछ निराशा का-सा माहौल था । विशाल सिन्हा ने हालाँकि यह बता कर अपने समर्थकों की निराशा को कम करने का प्रयास किया कि भूपेश बंसल ने उनसे पहले ही कह दिया था कि पिकनिक वाले दिन उन्हें बाहर जाना है, इसलिए उस दिन लखनऊ में न रहने के कारण वह पिकनिक में नहीं आ सकेंगे ।
भूपेश बंसल की अनुपस्थिति के कारण विशाल सिन्हा के 'प्रदर्शन' में जो कमी रह गई, उसे अनुपम बंसल की सक्रियता भरी मौजूदगी ने काफी हद तक भरने का काम किया । भूपेश बंसल के 'तेवरों' से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी को अनुपम बंसल के समर्थन को लेकर शंकाएँ पैदा होने लगी थीं । यह शंकाएँ दरअसल इसलिए पैदा हो रही थीं, क्योंकि अनुपम बंसल से जब भी कोई उनके फैसले के बारे में पूछता था, तो अनुपम बंसल यह कह कर बच निकलने की कोशिश करते कि 'जैसा भाई साहब कहेंगे' । 'भाई साहब' से उनका आशय भूपेश बंसल से होता । विशाल सिन्हा के समर्थकों के बीच चूँकि 'भाई साहब' की भूमिका ही संदिग्ध थी, इसलिए अनुपम बंसल की भूमिका को लेकर भी संदेह होने लगे । विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन दिखाने के उद्देश्य से आयोजित हुई पिकनिक में अपनी सक्रिय भागीदारी से अनुपम बंसल ने लेकिन सारे संदेहों को दूर कर दिया है और विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी के प्रति अपना समर्थन स्पष्ट कर दिया है । अनुपम बंसल की उपस्थिति के जरिये विशाल सिन्हा और उनके समर्थकों ने लोगों को यह संदेश देने का प्रयास भी किया है कि अब जब अनुपम बंसल उनके पक्ष में खुल कर आ गये हैं, तो आने वाले दिनों में भूपेश बंसल भी उनके साथ ही खड़े दिखेंगे ।
पिकनिक कार्यक्रम के जरिये विशाल सिन्हा ने अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने और दिखाने का जो आयोजन किया है, उससे साफ है कि अपनी 'लड़ाई' को भले ही वह जीता हुआ मान रहे हों, लेकिन फिर भी वह महसूस कर रहे हैं कि उनकी लड़ाई एकतरफा नहीं है और अपनी जीत को सचमुच सुनिश्चित करने के लिए उन्हें लगातार लोगों के बीच रहना होगा और किसी भी कारण से नाराज हो सकने वाले लोगों को अपने साथ जोड़े रखना होगा । पिकनिक कार्यक्रम के जरिये उन्होंने लोगों को अपने साथ दिखाने में अभी तो सफलता पाई है, लेकिन देखना होगा कि इस सफलता को बनाये रखने के लिए वह आगे क्या करते हैं ?
विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई पिकनिक के कुछ जीवंत दृश्य :







Tuesday, January 29, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में अपनी राजनीति को बचाने के लिए गुरनाम सिंह ने भूपेश बंसल और अनुपम बंसल के बीच झगड़ा पैदा करने की चाल चली है

लखनऊ । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा अपने फायदे के लिए क्या पूर्व गवर्नर भूपेश बंसल और अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने की तैयारी कर रहे उनके भाई अनुपम बंसल के बीच झगड़ा करवाने की कोशिश कर रहे हैं ? लोगों के बीच यह सवाल इसलिए पैदा हुआ क्योंकि पिछले कुछ समय से गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा की तरफ से लोगों को बताया जा रहा है कि भूपेश बंसल भले ही केएस लूथरा के साथ हों, लेकिन अनुपम बंसल को भूपेश बंसल का यह रवैया पसंद नहीं है और अनुपम बंसल पूरी तरह से गुरनाम सिंह के साथ हैं । मजे की बात यह है कि भूपेश बंसल और अनुपम बंसल ने अपने आप को विशाल सिन्हा और शिव कुमार गुप्ता के बीच होने वाले चुनावी झमेले से दूर ही रखा हुआ है - लेकिन फिर भी गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा उन्हें अपने समर्थन में होने का झूठा प्रचार लगातार किये जा रहे हैं । भूपेश बंसल के बारे में किये जा रहे उनके झूठे प्रचार की पोल तो इस बात से खुल गई है कि उनकी लाख कोशिशों के बाद भी भूपेश बंसल ने कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन का पद नहीं छोड़ा है । भूपेश बंसल के कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन के पद को न छोड़ने के फैसले को गुरनाम सिंह के समानांतर सत्ता केंद्र बनने के उनके प्रयास के रूप में देखा/पहचाना गया है ।
भूपेश बंसल ने हालाँकि लगातार यह कहा/बताया है कि कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन का पद उन्होंने सिर्फ इसलिए स्वीकार किया है, ताकि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को डिस्ट्रिक्ट की और लायनिज्म की परंपरा व मर्यादा के अनुसार आयोजित किया जा सके । भूपेश बंसल ने जोर देकर कहा कि केएस लूथरा को हमीं लोगों ने दिन-रात एक करके गवर्नर बनाया/बनवाया है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी मदद करना भी हमारा फ़र्ज़ है और हम उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकते हैं । भूपेश बंसल का कहना है कि उनके कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन बनने के पीछे कोई राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए । लोग लेकिन उनके कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन बनने के फैसले के पीछे राजनीति देख रहे हैं । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा को उनका यह फैसला अभी तक भी हज़म नहीं हो सका है । विशाल सिन्हा ने तो भूपेश बंसल पर इस बात के लिए पूरा दबाव बनाया कि वह कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन का पद स्वीकार न करें । भूपेश बंसल ने विशाल सिन्हा को हड़काया भी कि तुम खुद तो पद प्राप्त करने के लिए तिकड़में करते रहते हो, और मुझसे कह रहे हो कि मैं पद न लूँ । भूपेश बंसल ने उन्हें साफ शब्दों में जता/बता दिया कि तुम्हें मुझसे यह कहने का कोई हक़ नहीं है कि मैं कहाँ क्या पद लूँ या न लूँ । लेकिन विशाल सिन्हा फिर भी भूपेश बंसल पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहे । गुरनाम सिंह ने भी विशाल सिन्हा का समर्थन किया - लेकिन भूपेश बंसल ने किसी की नहीं सुनी ।
भूपेश बंसल को कॉन्फ्रेंस चेयरपरसन न बनने के लिए राजी करने में असफल रहने के बाद गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा की जोड़ी ने नई चाल चली । अब उन्होंने भूपेश बंसल को बदनाम करने की मुहिम शुरू की । उन्होंने प्रचारित किया कि भूपेश बंसल डिस्ट्रिक्ट के नेता बनना चाहते हैं और गुरनाम सिंह की जगह लेना चाहते हैं । इसी प्रचार-क्रम में उन्होंने कहा/बताया कि भूपेश बंसल को भारी गलतफहमी है कि अगले वर्ष जब अनुपम बंसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे तब डिस्ट्रिक्ट में उनकी चलेगी । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने लोगों के बीच दावा किया हुआ है कि सब देखेंगे कि अनुपम बंसल के गवर्नर-काल में भी चलेगी गुरनाम सिंह की ही और भूपेश बंसल को कोई पूछेगा भी नहीं । उल्लेखनीय है कि भूपेश बंसल और अनुपम बंसल रिश्ते में भाई हैं और एक ही क्लब में हैं । इस तथ्य के संदर्भ में गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा की इस तरह की बातों को भूपेश बंसल और अनुपम बंसल के बीच झगड़ा पैदा करने की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना गया है ।
गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा को ऐसा करना दरअसल इसलिए जरूरी लग रहा है क्योंकि वह मान और समझ रहे हैं कि भूपेश बंसल भले ही चुनावी राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभा रहे हैं - लेकिन लोगों के बीच उन्हें केएस लूथरा के साथ होने के कारण शिव कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/पहचाना जा रहा है । ऐसे में उन्हें डर इस बात का हुआ है कि भूपेश बंसल के साथ कहीं अनुपम बंसल को भी शिव कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में न देखा/पहचाना जाना लगे ? यह डर इसलिए भी हुआ क्योंकि अनुपम बंसल ने भी अपने आप को विशाल सिन्हा और शिव कुमार गुप्ता के बीच के चुनावी मुकाबले में किसी एक तरफ 'दिखने' से बचाया हुआ है । अनुपम बंसल ने ऐसा इसलिए किया हुआ है, ताकि उन्हें नेगेटिव वोट न पड़ें । अनुपम बंसल की इस 'राजनीति' में गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा को लेकिन अपनी राजनीति पिटती हुई दिख रही है । अपनी राजनीति को बचाने के लिए गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने भूपेश बंसल और अनुपम बंसल के बीच झगड़ा पैदा करने और उस 'झगड़े' को प्रचारित करने की चाल चल दी है । देखने की बात होगी कि गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा की इस चाल का भूपेश बंसल और अनुपम बंसल कैसे और क्या जबाव देते हैं ?