Monday, March 31, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के गाजियाबाद में होने को आधी लड़ाई जीत लेने के दावे को, पूरी लड़ाई जीतने की उनकी राह में बाधा बनाने की अवतार कृष्ण के समर्थकों की तैयारी ने शिव कुमार चौधरी और उनके समर्थकों के सामने सचमुच में एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है

देहरादून । अवतार कृष्ण के समर्थकों ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के बाबत निकली कॉल की वैधता को लायंस इंटरनेशनल में चुनौती देकर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव को और गंभीर तो बना ही दिया है, साथ ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दूसरे उम्मीदवार शिव कुमार चौधरी और उनके समर्थकों के सामने एक कठिन चुनौती भी पैदा कर दी है । अवतार कृष्ण के समर्थकों द्धारा लायंस इंटरनेशनल में की गई शिकायत में पहली आपत्ति तो फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील जैन द्धारा कार्यवाहक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में निकाली गई कॉल को रद्द करने के फैसले पर की गई है; और दूसरी आपत्ति सुधीर जनमेजा द्धारा कथित रूप से तैयार की गई कॉल को मान्य कॉल का दर्जा देने को लेकर है । पहली शिकायत के संदर्भ में तर्क दिया गया है कि सुनील जैन ने जो कॉल निकाली थी, वह कार्यवाहक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में निकाली थी और कार्यवाहक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी निभाने का अधिकार उन्हें लायंस इंटरनेशनल ने दिया था । लायंस इंटरनेशनल द्धारा दी गई जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए सुनील जैन ने जो कॉल निकाली, उसे रद्द करने का अधिकार लायंस इंटरनेशनल के नियम के अनुसार किसी को नहीं है । लायंस इंटरनेशनल के नियम के अनुसार, उस कॉल में संशोधन तो किया जा सकता है लेकिन उसे रद्द नहीं किया जा सकता है । यही हवाला देते हुए लायंस इंटरनेशनल से माँग की गई है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का आयोजन सुनील जैन वाली कॉल के अनुसार किए जाने को सुनिश्चित किया जाना चाहिए ।
इस माँग को और तर्कपूर्ण बनाने के लिए दूसरी शिकायत में कहा गया है कि जिस कॉल को मान्य कॉल का दर्जा दिया गया है, उसमें फर्जीवाड़ा है । सुधीर जनमेजा द्धारा कथित रूप से तैयार बताई गई इस कॉल में कुछेक ऐसी एंट्रीज हैं, जो 'जिन्दा' सुधीर जनमेजा कर ही नहीं सकते थे । जाहिर है कि जिस कॉल को सुधीर जनमेजा द्धारा तैयार बताया गया है, उसमें उनके निधन के बाद हेराफेरी की गई है । अपने नजदीकियों द्धारा की गई इस हेराफेरी के बारे में जानकार सुधीर जनमेजा की आत्मा को कितना कष्ट पहुँचा होगा, यह तो पता नहीं; किंतु हेराफेरी के तथ्यों के सामने आने से मान्य कॉल संदेह के घेरे में जरूर आ गई है । संदेह पैदा करने वाले तथ्यों को रेखांकित करते हुए ही, अवतार कृष्ण के समर्थकों ने मान्य कॉल को अमान्य करने की माँग की है । अवतार कृष्ण के समर्थकों द्धारा लायंस इंटरनेशनल में की गई इन शिकायतों ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को लेकर - और उसके गाजियाबाद में होने को लेकर शक पैदा कर दिया है । इस पैदा हुए शक ने गाजियाबाद में शिव कुमार चौधरी द्धारा की जा रही तैयारियों के बेकार हो जाने का खतरा खड़ा कर दिया है ।
अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थकों को इसमें स्वाभाविक रूप से अपना फायदा दिख रहा है । वह लेकिन सिर्फ इस तरह से फायदा पाने के इंतजार में ही नहीं हैं; उन्होंने उस स्थिति में भी फायदा उठाने की तैयारी की हुई है जबकि उनकी शिकायतों का लायंस इंटरनेशनल कोई संज्ञान ही न ले । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थकों को दरअसल इस बात से कोई समस्या नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस गाजियाबाद में हो रही है - इससे तो उन्हें बल्कि फायदा होता दिख रहा है क्योंकि गाजियाबाद के दो प्रमुख लायन - अरुण मित्तल और सुनील निगम - तो खुल कर अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस होने से शिव कुमार चौधरी का खर्चा यदि कम होगा, तो अवतार कृष्ण का भी खर्चा कम होगा । गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस होने के फायदे उठाते हुए, अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थक लायंस इंटरनेशनल में शिकायत करके तो वास्तव में गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस होने का ठीकरा शिव कुमार चौधरी और उनके समर्थकों के सिर फोड़ना चाहते हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोग डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के किसी हिल स्टेशन पर होने का इंतजार करते हैं । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के बहाने कई लोगों को परिवार सहित हिल स्टेशन पर पिकनिक मनाने का मौका मिल जाता है । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थक डिस्ट्रिक्ट में लोगों को यह बताना चाहते हैं कि पिकनिक मनाने का यह मौका इस बार उन्हें शिव कुमार चौधरी और उनके समर्थकों के कारण नहीं मिल पा रहा है ।
अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थकों ने लोगों को यह बताने का मौका बनाने के लिए ही लायंस इंटरनेशनल में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस से संबंधित कॉल को लेकर शिकायत की है । इस तरह से उन्होंने अपने दोनों हाथों में लड्डू रख लिए हैं । उनकी शिकायत स्वीकार की जाती है तो भी, और अगर नहीं की जाती है तो भी - उनके पास लोगों को यह बताने/दिखाने का मौका रहेगा कि उन्होंने तो डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस मसूरी में करवाने की बात की थी, लेकिन दूसरे खेमे के लोगों ने यह नहीं होने दिया । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थकों को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के बहाने हिल स्टेशन में परिवार के साथ पिकनिक मनाने का अवसर छिनने से लोगों के बीच पैदा हुई नाराजगी को वह अवतार कृष्ण के समर्थन में बदल सकेंगे । मजे की बात है कि अवतार कृष्ण के समर्थकों को यह मौका शिव कुमार चौधरी के समर्थकों ने खुद ही दिया है । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के गाजियाबाद में होने के फैसले पर मुहर लगने के तुरंत बाद शिव कुमार चौधरी के समर्थकों ने दावा करना शुरू कर दिया था कि आधी लड़ाई तो उन्होंने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के गाजियाबाद में होने के फैसले पर मुहर लगने के साथ ही जीत ली है । आधी लड़ाई के जीत लेने का यह दावा लेकिन अवतार कृष्ण के समर्थकों की चाल के चलते अब उल्टा पड़ता दिख रहा है । शिव कुमार चौधरी के समर्थकों के आधी लड़ाई जीत लेने के इस दावे को पूरी लड़ाई जीतने की उनकी राह में बाधा बनाने की अवतार कृष्ण के समर्थकों की तैयारी ने शिव कुमार चौधरी और उनके समर्थकों के सामने सचमुच में एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है ।

Wednesday, March 26, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में जब तक दूसरे उम्मीदवारों की जेब से पैसा निकलना था, विशाल सिन्हा तब तक उनसे उम्मीदवारी का 'फर्ज' अदा करवाते रहे; लेकिन अब जब उनके लिए अपनी जेब से पैसा निकालने का मौका आया तो वह लोगों को मुफ्तखोरी न करने की नसीहत देने लगे हैं

लखनऊ । विशाल सिन्हा ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जाने की इच्छा रखने वाले को बता/जता दिया है कि जो कोई भी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जाना चाहता है उसे अपनी जेब से ढाई हजार रुपये खर्च करने होंगे । विशाल सिन्हा ने किन्हीं किन्हीं लोगों से साफ साफ यह कह भी दिया है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जिन लोगों को मुफ्तखोरी की आदत हो गई है उन्हें इस बार डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जाने का विचार त्याग ही देना चाहिए । विशाल सिन्हा के इस रवैये पर लोग भड़के हुए हैं । उनका कहना है कि पिछले तो विशाल सिन्हा डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में चलने/पहुँचने के लिए लोगों की खुशामद कर रहे थे और उसमें जाने वाले लोगों का खर्चा उठा रहे थे - इस बार फिर उनका रवैया बदला हुआ क्यों है ? विशाल सिन्हा ने पिछले वर्ष तो लोगों को खुशी खुशी मुफ्तखोरी करवाई थी, तब फिर इस बार वह मुफ्तखोरी की बात करते हुए लोगों को अपमानित करने का काम क्यों कर रहे हैं । जो भी लोग यह सवाल उठा रहे हैं, वही खुद ही इसका जबाव भी दे रहे हैं : उनका कहना है कि पिछली बार विशाल सिन्हा को चूँकि चुनाव लड़ना था और उसके लिए उन्हें लोगों के वोट चाहिए थे - इसलिए वह अपने खर्चे पर लोगों को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में ले गए थे; इस बार लेकिन उन्हें चुनाव तो लड़ना नहीं है, वह तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन ही गए हैं, लिहाजा उन्हें लोगों को अपमानित करने का अधिकार मिल गया है ।
विशाल सिन्हा ने दरअसल इसीलिए इस बार शुरू से यह कोशिश की कि इस बार उन्हें चुनाव न लड़ना पड़े । एके सिंह की उम्मीदवारी के सामने आने के बाद तो विशाल सिन्हा का सारा जोर इस बात पर केंद्रित हो गया कि किसी भी तरह से एके सिंह की उम्मीदवारी वापस हो ताकि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन सकें । विशाल सिन्हा दरअसल जानते थे कि यदि चुनाव की नौबत आई तो पहले तो उनके लिए चुनाव लड़ना ही संभव नहीं होगा; और यदि किसी तरह से उन्होंने चुनाव लड़ भी लिया तो जीतना मुश्किल होगा । इसीलिए विशाल सिन्हा ने रोना-धोना मचाकर अपने लिए सहानुभूति जुटाई और एके सिंह की उम्मीदवारी को वापस करवा दिया । उस प्रक्रिया में विशाल सिन्हा और उनके राजनीतिक गुरु गुरनाम सिंह ने हालाँकि सभी लोगों को यह आश्वासन दिया था कि चुनाव न होने की स्थिति में भी विशाल सिन्हा एक उम्मीदवार की 'जिम्मेदारियों' का निर्वाह करेंगे । पर अब जब एक उम्मीदवार के रूप में उनके सामने जिम्मेदारियों का निर्वाह करने का मौका आया है तो विशाल सिन्हा के तेवर बदल गए हैं और एक उम्मीदवार के रूप में उनसे 'उम्मीद' करने वाले लोगों को वह मुफ्तखोर का नाम देकर अपमानित करने में जुट गए हैं ।
यूँ अगर देखें तो विशाल सिन्हा 'जो' कर रहे हैं उसमें गलत कुछ भी नहीं है । एक उम्मीदवार को किसी के भी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जाने/पहुँचने का खर्च भला क्यों उठाना चाहिए ? इसलिए विशाल सिन्हा यदि यह कह रहे हैं कि वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जाने/पहुँचने वाले लोगों का खर्च नहीं उठायेंगे और यह खर्च स्वयं जाने/पहुँचने वाले को ही वहन करना होगा - तो इसमें वास्तव में गलत कुछ भी नहीं है । लेकिन फिर भी लोगों को यदि विशाल सिन्हा का रवैया पसंद नहीं आ रहा है तो इसका कारण यही है कि विशाल सिन्हा के रवैये में उन्हें 'नौ सौ चूहे खा चुकी बिल्ली के हज पर जाने' वाला मामला दिख रहा है । यही विशाल सिन्हा हैं जिन्होंने पिछले वर्ष लोगों की खूब आवभगत की थी और एक उम्मीदवार का 'फर्ज' निभाया था । सिर्फ यही नहीं, उससे पिछले वर्षों में वह उम्मीदवारों से यह 'फर्ज' निभववाते रहे हैं । लोगों का सवाल यही है कि विशाल सिन्हा के लिए जो बात पिछले कई वर्षों से ठीक और जरूरी रही है, वह इस बार गलत कैसे हो गई है ? लोगों को इसमें विशाल सिन्हा का अवसरवादी रवैया ही दिख रहा है । जब तक दूसरे उम्मीदवारों की जेब से पैसा निकलना था, विशाल सिन्हा तब तक उनसे उम्मीदवारी का 'फर्ज' अदा करवाते रहे; लेकिन अब जब उनके लिए अपनी जेब से पैसा निकालने का मौका आया तो वह लोगों को मुफ्तखोरी न करने की नसीहत देने लगे हैं ।
विशाल सिन्हा के इस रवैये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल और डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेता गुरनाम सिंह के सामने बड़ी समस्या खड़ी कर दी है । अनुपम बंसल की समस्या यह है कि विशाल सिन्हा के इस रवैये के चलते उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का कबाड़ा हो गया है; और गुरनाम सिंह की समस्या यह है कि उन्हें लोगों के इस सवाल का कोई जबाव नहीं सूझ रहा है और उन्हें इस सवाल के चलते मुँह छिपाना पड़ रहा है कि पिछले तमाम वर्षों से जो 'काम' वह दूसरे उम्मीदवारों से करवाते रहे हैं, वही काम वह अब विशाल सिन्हा से क्यों नहीं करवा रहे हैं ?

Tuesday, March 25, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के पीछे उनके समर्थक नेताओं के जुटने और शिव कुमार चौधरी को उनके नेताओं द्धारा अकेला छोड़ दिए जाने के कारण डिस्ट्रिक्ट में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है

गाजियाबाद । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से गाजियाबाद में हुई मीटिंग को जो जोरदार सफलता मिली है, उसने उनकी उम्मीदवारी के विरोधियों के तो तोते उड़ा ही दिए हैं - उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों को भी हैरान किया है । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के उद्देश्य से हुई इस मीटिंग की तैयारी से जुड़े एक प्रमुख वरिष्ठ लायन ने इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए स्वीकार किया कि मीटिंग के इतना कामयाब होने की तो उन्हें भी उम्मीद नहीं थी । उन्होंने बताया कि उन्होंने मीटिंग में 15 से 20 क्लब के करीब एक सौ लोगों के जुटने की उम्मीद की थी । मीटिंग में लेकिन 31 क्लब के दो सौ से अधिक लोग पहुँचे । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थक गाजियाबाद में हुई मीटिंग की इस कामयाबी से बम-बम हैं । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थकों का जोश यह जान कर और बढ़ा है कि ठीक उसी समय हरिद्धार में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दूसरे उम्मीदवार शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से आयोजित हुई मीटिंग में कुल 7 क्लब्स के 30 से 35 लोग ही पहुँचे ।
दोनों मीटिंग्स में उपस्थित क्लब्स तथा लायन सदस्यों की संख्या का यह अंतर हालाँकि इसलिए कोई मायने नहीं रखता - क्योंकि गाजियाबाद क्षेत्र में हरिद्धार क्षेत्र से ज्यादा क्लब्स हैं; इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि गाजियाबाद में मीटिंग हरिद्धार से बड़ी ही होगी । लेकिन फिर भी दोनों मीटिंग्स में उपस्थित क्लब्स और लायन सदस्यों की संख्या का भारी अंतर इसलिए मायने रखता है - क्योंकि यह अंतर दरअसल दोनों मीटिंग्स के पीछे की तैयारियों और तैयारियों में जुटे लोगों की प्रतिबद्धतता को प्रकट करता है । गाजियाबाद में अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए हुई मीटिंग को सफल बनाने में उनके सभी समर्थक जी-जान से लगे थे, जबकि हरिद्धार में शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए हुई मीटिंग की तैयारी से उनके समर्थक नेता दूर ही रहे । तैयारी से ही दूर नहीं रहे, वह मीटिंग से भी दूर रहे - जबकि अवतार कृष्ण की मीटिंग में उनके कई समर्थक नेता मौजूद थे । हरिद्धार की मीटिंग के लिए सिर्फ क्लब्स के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष को ही आमंत्रित किया गया था - हालाँकि कुछेक दूसरे लोग बिन बुलाये आ जरूर गए थे । हरिद्धार की मीटिंग की जिस तरह से तैयारी हुई और जिस तरह से वह हुई, उसे देख/जान कर यही संदेश लोगों के बीच गया कि जैसे उसे बड़े बेमन से आयोजित किया गया है, जबकि गाजियाबाद की मीटिंग की तैयारी में और उसके होने में पूरा पूरा जोश और उत्साह पाया/महसूस किया गया ।
हरिद्धार में आयोजित शिव कुमार चौधरी की मीटिंग से उनकी उम्मीदवारी के समर्थक बताये जा रहे नेताओं के गायब रहने को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच बड़ी हैरानी के साथ देखा जा रहा है । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में जिन बड़े-बड़े नेताओं के नाम लिए जा रहे हैं, उनमें से कोई भी उनकी मीटिंग में आखिर क्यों नहीं पहुँचा ? शिव कुमार चौधरी की मीटिंग में उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में बताये जा रहे नेताओं में से किसी के भी न पहुँचने की खबर ने शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थकों को धक्का पहुँचाया है - उन्हें लग रहा है कि नेता लोग कहीं शिव कुमार चौधरी के साथ कोई खेल तो नहीं खेल रहे हैं; और/या शिव कुमार चौधरी ही नेताओं की मदद नहीं ले पा रहे हैं ?
यह सवाल गाजियाबाद में अवतार कृष्ण की मीटिंग के कामयाब होने के कारण भी पैदा हुआ है । गाजियाबाद क्षेत्र मुकेश गोयल के प्रभाव वाला वाला क्षेत्र माना जाता है, और शिव कुमार चौधरी के दावे के अनुसार मुकेश गोयल का समर्थन उनके साथ है । मुकेश गोयल अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में प्रतिपक्षी उम्मीदवार की मीटिंग फेल कराने के बड़े कुशल खिलाड़ी रहे हैं - उनका फ़तवा जारी होता है तो उनके समर्थक क्लब के लोग प्रतिपक्षी उम्मीदवार की मीटिंग में नहीं जाते हैं । ऐसे में यह सवाल उठा है कि मुकेश गोयल यदि सचमुच शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के साथ हैं तो उन्होंने अपने समर्थक क्लब्स के लोगों को अवतार कृष्ण की मीटिंग में जाने से रोका क्यों नहीं ? कुछेक लोगों को तो यह भी लगता है कि अवतार कृष्ण की मीटिंग को सफल बनाने में पर्दे के पीछे से मुकेश गोयल ने भी भूमिका निभाई है । मुकेश गोयल के नजदीकियों का कहना है कि शिव कुमार चौधरी चूँकि मुकेश गोयल को उचित तवज्जो नहीं दे रहे हैं, इसलिए मुकेश गोयल उनके लिए सचमुच में कुछ करने से बचते हुए दिख रहे हैं । इसी कारण से, गाजियाबाद क्षेत्र में अपने समर्थक क्लब्स के लिए उन्होंने अवतार कृष्ण की मीटिंग से दूर रहने का फ़तवा जारी नहीं किया ।
गाजियाबाद में अवतार कृष्ण की और हरिद्धार में शिव कुमार चौधरी की मीटिंग में जो भारी अंतर अभी देखा/पाया गया है, उससे कोई नतीजा निकालना अभी जल्दबाजी करना होगा । लेकिन अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के पीछे उनके समर्थक नेताओं के जुटने और शिव कुमार चौधरी को उनके नेताओं द्धारा अकेला छोड़ दिए जाने के कारण डिस्ट्रिक्ट में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव खासा दिलचस्प जरूर हो गया है । 

Sunday, March 23, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में राकेश त्रेहन और नरेश गुप्ता की जोड़ी ने लायंस क्लब दिल्ली किरण के एक प्रोजेक्ट के जरिये हर्ष बंसल, डीके अग्रवाल, सुरेश बिंदल और अजय बुद्धराज को ऐसी 'गुप्त' चोट पहुँचाई है कि यह बेचारे खुल कर कराह भी नहीं पा रहे हैं

नई दिल्ली । लायंस क्लब दिल्ली किरण द्धारा आयोजित 'रक्तदान शिविर' के जरिये निवृत्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन ने अपने ही साथी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को जिस तरह उनकी औकात दिखा कर चोट पहुँचाई है, उससे उनके साथी गवर्नर्स बुरी तरह भन्नाए हुए हैं । मजे की बात यह हुई कि इस आयोजन के जरिये राकेश त्रेहन ने तैयारी तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को चोट पहुँचाने की - की थी, लेकिन चोट लगी राकेश त्रेहन के साथी पूर्व गवर्नर्स को । हर्ष बंसल, डी के अग्रवाल, अजय बुद्धराज आदि ने शिकायत की कि डिस्ट्रिक्ट के एक महत्वपूर्ण क्लब के आयोजन के निमंत्रण पत्र में बीस लोगों के नाम प्रकाशित हुए, लेकिन उनके नाम के लिए उसमें जगह नहीं बन सकी । राकेश त्रेहन ने तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि निमंत्रण पत्र में किसके नाम प्रकाशित होंगे, यह फैसला तो क्लब के पदाधिकारियों तथा आयोजन के कर्ता-धर्ताओं का था । उन्होंने हर्ष बंसल, डी के अग्रवाल, अजय बुद्धराज का नाम यदि नहीं प्रकाशित किया तो इसमें वह क्या कर सकते हैं ? क्लब के पदाधिकारियों और आयोजन के कर्ता-धर्ताओं ने लेकिन सच्चाई बता कर सारी पोल खोल दी । उनका कहना था कि इस आयोजन के जरिये वह तो कोई राजनीति नहीं करना चाहते थे, लेकिन नरेश गुप्ता और राकेश त्रेहन ने उन्हें मजबूर किया कि जैसा वह कहें, उन्हें वैसा ही करना पड़ेगा । नरेश गुप्ता अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे, इसलिए क्लब के पदाधिकारियों व आयोजन के कर्ता-धर्ताओं के लिए उनकी बात मानना तो मजबूरी थी ही; और नरेश गुप्ता ने उन्हें मजबूर किया कि उन्हें राकेश त्रेहन के दिशा-निर्देशन में ही सभी काम करने हैं ।
राकेश त्रेहन के लिए यह आयोजन यह 'दिखाने' का अच्छा अवसर था कि नरेश गुप्ता पूरी तरह उनकी गिरफ्त में हैं और अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ताज भले ही नरेश गुप्ता के सिर पर होगा, लेकिन गवर्नरी वह करेंगे । नरेश गुप्ता पूरी तरह सिर्फ और सिर्फ उनकी कठपुतली होंगे - इस बात को दिखाने/जताने के लिए राकेश त्रेहन को यह जरूरी लगा कि निमंत्रण पत्र में हर्ष बंसल, डी के अग्रवाल, अजय बुद्धराज आदि का नाम गलती से भी प्रकाशित न हो जाये । इन तीनों से भी ज्यादा बुरी गत तो बेचारे सुरेश बिंदल की बनी । दिलचस्प तथ्य यह है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश बिंदल आयोजक क्लब - लायंस क्लब दिल्ली किरण के ही सदस्य हैं, लेकिन इस आयोजन के निमंत्रण पत्र में उनका नाम निवेदकों की भीड़ के बीच डाला हुआ था । यहाँ सुरेश बिंदल को बेचारा इसलिए कहा गया है कि नरेश गुप्ता के गवर्नर-काल में सुरेश बिंदल ने अपनी चलने की उम्मीद संजोई हुई थी, लेकिन नरेश गुप्ता ने राकेश त्रेहन के साथ मिल कर उन्हें बिलकुल किनारे पर ही धकेल दिया है ।
लायंस क्लब दिल्ली किरण के इस आयोजन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा का भी नाम नहीं दिया गया । इसे लेकिन ज्यादा बड़ी बात के रूप में नहीं देखा/समझा गया - क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में सभी जानते हैं कि लायंस क्लब दिल्ली किरण का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के साथ शुरू से ही विरोध का संबंध रहा है । विरोध के इसी संबंध के चलते लायंस क्लब दिल्ली किरण के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को - तथा उनके समर्थक दिल्ली के तीनों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक तलवार, अरुण पुरी व दीपक टुटेजा को नहीं बुलाया गया था । लायंस क्लब दिल्ली किरण के कर्ता-धर्ता यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा तथा उनके नजदीकियों के साथ विरोध का संबंध रखे हुए हैं और पहले से ही उन्हें अपने आयोजनों में आमंत्रित करने से बचते रहे हैं, तो इस बार भी उन्हें न आमंत्रित किये जाने में कोई हैरानी की बात नहीं है । लेकिन अपने अधिष्ठापन कार्यक्रम में हर्ष बंसल, डीके अग्रवाल, अजय बुद्धराज आदि को इज्जत के साथ बुलाने वाले तथा उनका नाम निमंत्रण पत्र में प्रकाशित करने वाले वाले क्लब के पदाधिकारियों ने अब अपने एक प्रमुख कार्यक्रम में उन्हें - तथा अपने ही क्लब के सुरेश बिंदल को जिस तरह से बेइज्जत करने का प्रयास किया है, उसकी चर्चा छिड़ने पर उन्होंने इस सब के लिए राकेश त्रेहन को जिम्मेदार ठहराया है ।
राकेश त्रेहन और नरेश गुप्ता की जोड़ी ने लायंस क्लब दिल्ली किरण के एक प्रोजेक्ट को जिस तरह हर्ष बंसल, डीके अग्रवाल, सुरेश बिंदल और अजय बुद्धराज का धुआँ निकालने के एक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया है - उसके चलते डिस्ट्रिक्ट में एक दिलचस्प नजारा प्रस्तुत हुआ है । नरेश गुप्ता के साथ मिल कर राकेश त्रेहन ने इन्हें ऐसी 'गुप्त' चोट पहुँचाई है कि यह बेचारे भन्नाए हुए तो हैं, लेकिन खुल कर कराह नहीं पा रहे हैं ।  

Saturday, March 22, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में कुछेक लोगों के हाथों के कठपुतली बन कर काम/व्यवहार कर रहे फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता वास्तव में अपने गवर्नर-काल के लिए काँटे ही बो रहे हैं

नई दिल्ली । नरेश गुप्ता ने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजन को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के खिलाफ लायंस इंटरनेशनल में हुई शिकायत के पक्ष में हलफनामा देकर एक अनोखा इतिहास रचा/बनाया है । उल्लेखनीय है कि यूँ तो कई डिस्ट्रिक्ट्स में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के बीच तनातनी के संबंध रहते हैं और अक्सर ही वह एक दूसरे को फूटी आँख से भी देखने को तैयार नहीं होते हैं - लेकिन फिर भी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ऐसा कुछ भी करने से हमेशा ही बचता है, जिससे वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के खिलाफ खड़ा हुआ साफ-साफ 'दिखे' । प्रायः यही देखा गया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ चाहें कितने भी तल्ख़ संबंध हों, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उन तल्ख़ संबंधों पर पर्दा डाले रखने का प्रयास करता है । नरेश गुप्ता ने लेकिन उस पर्दे को गिरा देने का रिकॉर्ड और ऐतिहासिक काम किया है । नरेश गुप्ता के इस रवैये पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को इसलिए भी हैरानी है क्योंकि नरेश गुप्ता और विजय शिरोहा के बीच ऐसी किसी तनातनी का कोई मामला कभी किसी के सामने आया भी नहीं है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दोनों हालाँकि परस्पर विरोधी खेमे में रहे हैं, लेकिन इसके अलावा दोनों के बीच किसी तरह के टकराव के कोई संकेत किसी को नहीं मिले हैं । यहाँ तक कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में हुए चुनाव से पहले, विजय शिरोहा के खेमे की तरफ से नरेश गुप्ता के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग होने की जो बात हो रही थी, उस पर विजय शिरोहा ने ही अपनी पहल से धूल डलवाई थी । विजय शिरोहा ने खुद आगे बढ़ कर नरेश गुप्ता को आगाह भी किया था कि कुछेक लोग उनके व्यवहार से नाराज हैं और उनके खिलाफ नेगेटिव वोट करना चाहते हैं, इसलिए उन्हें थोड़ा सावधान होकर स्थितियों को संभाल लेना चाहिए । इस तरह, विरोधी खेमे में होने के बावजूद विजय शिरोहा ने तो नरेश गुप्ता के प्रति हमदर्दी और सहयोग व समर्थन का भाव ही रखा था - लोगों को आश्चर्य इसी बात का है कि आखिर तब फिर नरेश गुप्ता को विजय शिरोहा के विरोध में 'रिकॉर्ड' पर जाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी और उन्होंने सहयोग/समर्थन की दोस्ताना भावना की बात तो छोड़िये डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म की गरिमा तक को दाग लगाने से परहेज नहीं किया ?
नरेश गुप्ता ने इसका बड़ा मासूम सा जबाव दिया है । जिसने भी उनसे इस बारे में पूछा, उससे उन्होंने यही कहा है कि वह विजय शिरोहा के खिलाफ बिलकुल नहीं हैं, और वह कुछ लोगों की बातों में आ गये, जिन्होंने उन्हें भावनात्मक रूप से बहला कर उनसे हलफनामे पर हस्ताक्षर करवा लिए । क्या यह उस व्यक्ति का जबाव है - और हरकत है जो तीन महीने बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालेगा ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद एक जिम्मेदारी का पद है - तीन महीने बाद एक ऐसा व्यक्ति इस पद पर बैठेगा जो लोगों की बातों में आ जाता है और भावनात्मक रूप से बहला लिया जाता है और जिससे ऐसा काम करवा लिया जाता है जिसके होने पर डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म को तो लज्जित होना ही पड़ता है, खुद वह भी लज्जित-सा महसूस करता है और उस काम को करने के बाद तरह-तरह की बहानेबाजी करके मुँह छिपाने की कोशिश करता है । यहाँ पिछले लायन वर्ष का एक प्रसंग याद करना प्रासंगिक होगा : पिछले लायन वर्ष में तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन और तत्कालीन फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के बीच संबंध तब तक बहुत ही तल्ख़ हो चुके थे, जब राकेश त्रेहन को मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद की अपनी उम्मीदवारी के प्रस्तोता के रूप में विजय शिरोहा के हस्ताक्षर चाहिए थे । विजय शिरोहा ने राकेश त्रेहन के साथ अपने सारे झगड़े-झंझट को किनारे करके राकेश त्रेहन की उम्मीदवारी के पर्चे पर हस्ताक्षर किये थे । विजय शिरोहा के नजदीकियों ने कई कई बातों का हवाला देकर उन्हें हस्ताक्षर करने से रोकने की बहुतेरी कोशिश की थी, लेकिन विजय शिरोहा का एक ही जबाव था कि डिस्ट्रिक्ट के झगड़े को वह मल्टीपल तक नहीं ले जायेंगे । उनका कहना था कि वह नहीं चाहते हैं कि मल्टीपल में लोग यह कहें कि विजय शिरोहा के हस्ताक्षर नहीं करने से राकेश त्रेहन मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए नामांकन नहीं भर सके ।
विजय शिरोहा के इस रवैये की तुलना में नरेश गुप्ता का रवैया क्या है ? नरेश गुप्ता खुलेआम यह ऐलान कर रहे हैं कि विजय शिरोहा यदि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाहेंगे और इसके लिए उनके हस्ताक्षर चाहेंगे, तो वह हरगिज हस्ताक्षर नहीं करेंगे । यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि नरेश गुप्ता और विजय शिरोहा के बीच संबंध उतने तल्ख़ भी नहीं हैं, जितने कि विजय शिरोहा और राकेश त्रेहन के बीच थे - लेकिन फिर भी विजय शिरोहा ने तो राकेश त्रेहन की उम्मीदवारी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए थे, जबकि नरेश गुप्ता ने विजय शिरोहा की उम्मीदवारी के कागज पर हस्ताक्षर न करने का ऐलान किया है । इसी से जाहिर है कि नरेश गुप्ता कितनी छोटी सोच और कितने छोटे मन के व्यक्ति हैं । डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि कई लोगों का कहना है कि नरेश गुप्ता इतने बुरे व्यक्ति नहीं हैं, उनकी संगत दरअसल ख़राब है और ख़राब संगत ने ही उनकी सोचने/समझने की और अपने भले/बुरे को पहचानने की शक्ति को उनसे छीन लिया है । हो सकता है कि यह बात सच हो, लेकिन ख़राब संगत तो उन्होंने खुद ही चुनी है - इसके लिए किसी और को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता है ।
संगत की बात पर नरेश गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की राह पर आने के किस्से को जानना प्रासंगिक होगा । सुभाष गुप्ता के निधन से खाली हुए पद को भरने का जब मौका आया था तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश त्रेहन ने खाली हुए पद पर ओंकार सिंह को बैठाने की तैयारी की थी । विजय शिरोहा ने इसका विरोध किया था । विजय शिरोहा का ओंकार सिंह के साथ कोई विरोध नहीं था । उन्हें लेकिन यह बात पसंद नहीं आई थी कि सुभाष गुप्ता की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी और ओंकार सिंह ने उनके निधन से खाली हुई जगह को प्राप्त करने के लिए लॉबीइंग शुरू कर दी । इसी बीच डिस्ट्रिक्ट में यह चर्चा फैली कि ओंकार सिंह को सुभाष गुप्ता के निधन से खाली हुई जगह देने/दिलवाने के बदले में राकेश त्रेहन ने उनसे मोटी रकम का सौदा कर लिया है । इस चर्चा के कारण ओंकार सिंह को लेकर राकेश त्रेहन अलग-थलग और अकेले पड़ गए । इस बीच दीपक टुटेजा ने सुभाष गुप्ता के किसी नजदीकी को ही उनकी जगह देने का सुझाव रखा, जिसका विजय शिरोहा ने जोरशोर से स्वागत/समर्थन किया । दीपक टुटेजा और विजय शिरोहा की इस पहल को दूसरे लोगों ने भी पसंद किया और बात जब इस पहल पर आगे बढ़ी तो नरेश गुप्ता का नाम सामने आया और सुभाष गुप्ता की जगह उन्हें मिली । इस आधार पर नरेश गुप्ता को दीपक टुटेजा और विजय शिरोहा के नजदीक होना चाहिए था, नरेश गुप्ता लेकिन उन राकेश त्रेहन के नजदीक हो गए जो उन्हें मिली 'जगह' ओंकार सिंह को दिलाना चाहते थे - विजय शिरोहा अड़ंगा न लगाते तो दिला ही देते । नरेश गुप्ता को दीपक टुटेजा और विजय शिरोहा के नजदीक होना चाहिए था, लेकिन वह राकेश त्रेहन के नजदीक हो गए - यह भी कोई बड़ी बात नहीं है । पक्ष-विपक्ष समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं । लेकिन नरेश गुप्ता जिस तरह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को लेकर विजय शिरोहा के खिलाफ की गई शिकायत में पार्टी बन गए हैं और जिस तरह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए विजय शिरोहा की संभावित उम्मीदवारी के पर्चे पर हस्ताक्षर न करने की खुली घोषणा कर रहे हैं - उससे वास्तव में वह अपने 'चरित्र' का ही परिचय दे रहे हैं ।
नरेश गुप्ता के प्रति समर्थन और हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि नरेश गुप्ता जिस तरह से कुछेक लोगों के हाथों के कठपुतली बन कर काम/व्यवहार कर रहे हैं, उसके चलते वह वास्तव में अपने गवर्नर-काल के लिए काँटे बो रहे हैं । उनका गवर्नर-काल अच्छा चले, इसके लिए जरूरी है कि वह किसी या किन्हीं लोगों के साथ दुश्मनी जैसा व्यवहार न करें और सभी के साथ बना कर रखें । उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का ही कहना है कि वह चाहें किसी के भी साथ रहें, अपने भले-बुरे का ध्यान जरूर रखें - ध्यान सिर्फ इस बात का रखें कि वह जिनके साथ हैं वह अपना स्वार्थ साधने के लिए उनका इस्तेमाल तो नहीं कर रहे हैं । चाहें यह सलाह देने वाले लोग हों, और या दूसरे लोग हों - अभी तो सभी यही मान/समझ रहे हैं कि नरेश गुप्ता दूसरों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं और इस तरह अपने लिए मुसीबतों को ही तैयार कर रहे हैं ।

Friday, March 21, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में बदनाम और अपमानित करने वाली चिट्ठियों के पीछे विजय शिरोहा को ब्लैकमेल करके उनसे विक्रम शर्मा के चुनाव में खर्च हुए पैसे बसूलने की राकेश त्रेहन की चाल है क्या ?

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा ने अपने क्लब - लायंस क्लब नई दिल्ली गीतांजली - के अध्यक्ष सतीश दिवाकर को आश्वस्त किया है कि उनके नाम से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को परेशान, बदनाम और अपमानित वाले जो पत्र लिखे जा रहे हैं, उनसे उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा और इसलिए अपने नाम को इस्तेमाल होने को लेकर उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है । विक्रम शर्मा ने उन्हें बताया है कि यह सब जो चिट्ठीबाजी हो रही है, यह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन की रणनीति का हिस्सा है और इस सब के जरिये राकेश त्रेहन दबाव बना कर विजय शिरोहा से उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में खर्च हुई उनकी रकम को वापस दिलवायेंगे । विक्रम शर्मा ने अभी हाल ही में अपने क्लब के अध्यक्ष तथा कुछेक अन्य सदस्यों से जो कुछ कहा है उसका मतलब यही है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को निशाना बना कर जो चिट्ठियाँ प्रसारित/प्रचारित की जा रही हैं, उसके पीछे असल उद्देश्य विजय शिरोहा और आरके शाह से पैसा ऐंठना है । विक्रम शर्मा के अनुसार, राकेश त्रेहन ने उन्हें भरोसा दिया है कि वह अलग-अलग नामों से रोजाना चिट्ठियाँ लिख लिख कर विजय शिरोहा को इतना परेशान कर देंगे कि विजय शिरोहा समझौता करने की बात करने लगेंगे और तब वह विजय शिरोहा से विक्रम शर्मा के चुनाव में खर्च हुए पैसे की भरपाई करने की माँग करेंगे ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजन को लेकर विक्रम शर्मा की तरफ से लायंस इंटरनेशनल में औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज करवाई गई है और इस शिकायत में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को अमान्य करने की माँग की गई है । शिकायत करने/करवाने वालों को यदि अपने तथ्यों और लायंस इंटरनेशनल के न्याय-विवेक पर भरोसा है, तो उन्हें लायंस इंटरनेशनल से फैसला होने का इंतजार करना चाहिए । लेकिन फैसले का इंतजार करने की बजाये, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को जिस तरह से बदनाम करने की मुहिम छेड़ दी गई है, उससे साफ है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजन को लेकर शिकायत करने/करवाने वालों को अच्छी तरह पता है कि उनकी शिकायत में कोई दम नहीं है और लायंस इंटरनेशनल से उन्हें कोई राहत नहीं मिलने वाली है । इसीलिए उस शिकायत की आड़ लेकर उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के खिलाफ हमला बोल दिया है, ताकि उन्हें ब्लैकमेल किया जा सके । राकेश त्रेहन की यह रणनीति विक्रम शर्मा को पसंद आ रही है - उन्हें लग रहा है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो वह नहीं बन पाये, कम से कम उनका जो पैसा खर्च हुआ है, वही वापस मिल जाये ।
विक्रम शर्मा को अपने क्लब के अध्यक्ष सतीश दिवाकर से यह सब बातें कहने/बताने की जरूरत दरअसल इसलिए पड़ी, क्योंकि सतीश दिवाकर ने उनसे यह डर व्यक्त किया कि उनके नाम से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के बारे में जो बेबुनियाद और भद्दी बातें कही/लिखी जा रही हैं उसके कारण कहीं वह मुसीबत में न पड़ जाएँ । सतीश दिवाकर ने डर व्यक्त किया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा ने यदि उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई कर दी, तो वह बचेंगे कैसे ? क्लब के कुछेक दूसरे सदस्यों ने भी विक्रम शर्मा से इस बात के लिए विरोध जताया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के साथ निजी खुन्नस निकालने में लगे डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेताओं के जरिये वह सतीश दिवाकर के नाम को क्यों इस्तेमाल होने दे रहे हैं । इस पर ही विक्रम शर्मा ने उनके सामने यह खुलासा किया कि यह सब जो हो रहा है वह राकेश त्रेहन के द्धारा ही हो रहा है और राकेश त्रेहन ने मुझसे कहा है कि इससे किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा और मेरे जो पैसे चुनाव में खर्च हुए हैं वह मुझे विजय शिरोहा से मिल जायेंगे । क्लब के सदस्यों ने कहा भी कि राकेश त्रेहन जो काम दूसरे लोगों के नाम से कर रहे हैं, वही काम वह अपने नाम से क्यों नहीं करते हैं ? विक्रम शर्मा इस बात का कोई जबाव नहीं दे सके ।
विक्रम शर्मा से यह भी कहा गया कि चुनाव में उनके जो पैसे खर्च हुए हैं, वह डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेताओं के असली और नकली क्लब्स के ड्यूज देने में ही तो खर्च हुए हैं; तो जिन नेताओं ने अपने क्लब के ड्यूज के पैसे उनसे लिए हैं, वह उन्हें उनके पैसे वापस क्यों नहीं कर देते ? विक्रम शर्मा से कहा गया कि जो राकेश त्रेहन आपको विजय शिरोहा से पैसे दिलाने की बात कर रहे हैं, वह राकेश त्रेहन अपने असली और नकली क्लब्स के ड्यूज के उनसे लिए गए पैसे उन्हें वापस क्यों नहीं करते हैं ? विक्रम शर्मा इन बातों को सुनकर भी चुप ही रहे । विक्रम शर्मा लगातार एक ही बात कहते रहे कि राकेश त्रेहन ने उन्हें विश्वास दिलाया है कि वह विजय शिरोहा की ऐसी हालत कर देंगे, कि वह समझौता करने के लिए मजबूर होंगे और तब विजय शिरोहा को ब्लैकमेल करके उनसे वह सारे पैसे बसूल लिए जायेंगे जो चुनाव में खर्च हुए हैं ।
मजे की बात यह है कि विजय शिरोहा के खिलाफ चलाये जा रहे निंदा अभियान में प्रायः नकली क्लब्स के पदाधिकारियों को ही इस्तेमाल किया जा रहा है और इस तरह उन्हें एक संभावित मुश्किल की तरफ धकेला जा रहा है । नकली क्लब्स के जो पदाधिकारी बेचारे कभी किसी आयोजन में नहीं नजर आये और या जिन्होंने लायनिज्म के काम के लिए कभी चार लाइनें नहीं लिखीं, वह प्रायः रोज लंबे-लंबे पत्र लिख रहे हैं और उनमें लगभग एक सी ही भाषा है, एक सी ही बातें हैं, एक से ही तर्क हैं और एक से ही निशाने हैं । डिस्ट्रिक्ट में चर्चा है कि इन पत्रों के पीछे राकेश त्रेहन और हर्ष बंसल ही हैं । कुछेक पत्रों के पीछे अजय बुद्धराज और डीके अग्रवाल को भी पहचाना गया है । दिलचस्प बात यह है कि आपसी बातचीत में राकेश त्रेहन इन पत्रों के पीछे अजय बुद्धराज और डीके अग्रवाल के होने की बात करते हैं, तो अजय बुद्धराज और डीके अग्रवाल इन पत्रों को राकेश त्रेहन और हर्ष बंसल की कारस्तानी के रूप में देखते/बताते हैं । जाहिर है कि इन पत्रों के जरिये सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को ही बदनाम करने की कोशिश नहीं की जा रही है, बल्कि अपने साथियों को भी बदनाम करने का मौका बना लिया जा रहा है ।

Thursday, March 20, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में कॉन्फ्रेंस के गाजियाबाद में होने से शिव कुमार चौधरी के सामने सिर्फ समर्थक नेताओं को ही साधे रखने की चुनौती नहीं है, कार्यवाहक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गुरी जनमेजा के साथ निभाना भी एक बड़ी समस्या होगी

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजन की जगह के बदल कर गाजियाबाद हो जाने को शिव कुमार चौधरी के समर्थक आधी लड़ाई जीत लेने के रूप में भले ही देख रहे हों, लेकिन चुनावी राजनीति के अनुभवी लोगों का मानना और कहना है कि गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस होने से शिव कुमार चौधरी को वास्तव में नुकसान होने का ज्यादा खतरा है । सबसे बड़ा खतरा तो यही है कि कॉन्फ्रेंस पर कब्जे को लेकर उनके दोनों समर्थक खेमे - मुकेश गोयल खेमा और कुंजबिहारी अग्रवाल खेमा - आपस में भिड़ेंगे, जिसका खामियाजा शिव कुमार चौधरी को उठाना पड़ सकता है । मजे की बात यह है कि कॉन्फ्रेंस गाजियाबाद में करवाने को लेकर मुकेश गोयल भी उत्सुक थे, और कुंजबिहारी अग्रवाल तथा सुशील अग्रवाल भी यही चाहते थे । मुकेश गोयल इसलिए उत्सुक थे जिससे कि कॉन्फ्रेंस पर कब्जा करने में उन्हें आसानी होगी और कॉन्फ्रेंस पर कब्जे के जरिये वह दिखा/जता सकेंगे कि डिस्ट्रिक्ट उनके कहे में है; कुंजबिहारी अग्रवाल और सुशील अग्रवाल की रणनीति में यह था कि गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस करवा कर और मुकेश गोयल को किनारे बैठा कर वह मुकेश गोयल के 'राजनीतिक खात्मे' का सार्वजनिक प्रदर्शन कर सकेंगे । उन्हें विश्वास है कि गाजियाबाद इलाका भले ही मुकेश गोयल का हो, लेकिन इस बार की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस पर कब्ज़ा मुकेश गोयल का नहीं बल्कि उनका होगा । अपना-अपना लक्ष्य पाने की कोशिश में यह दोनों भिड़ेंगे, जिसके चलते नुकसान शिव कुमार चौधरी का होगा ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में मुकेश गोयल को राजनीतिक रूप से निपटाने की कुंजबिहारी अग्रवाल और सुशील अग्रवाल की पुरानी हसरत है, जो इस बार उन्हें पूरी होती हुई दिख रही है । दिलचस्प संयोग यह है कि शिव कुमार चौधरी अभी भले ही मुकेश गोयल की मदद ले रहे हों, लेकिन कुछ समय पहले तक वह यही घोषणा किया करते थे कि वह तो उम्मीदवार इसीलिए बने हैं ताकि मुकेश गोयल की राजनीतिक चौधराहट का खात्मा कर सकें । मुकेश गोयल के लिए चुनौती यह हो गई है कि उन्होंने अपने लोगों को तो अपना दुश्मन बना लिया है, और अब अपने घोषित दुश्मनों के साथ मिल कर उन्हें अपनी राजनीतिक जमीन बचानी है । मुकेश गोयल को 'दुश्मनों' ने बाहर से भी घेर लिया है और भीतर से भी निशाने पर ले लिया है । हालाँकि उनके 'दुश्मनों' का ही यह भी मानना और कहना है कि मुकेश गोयल को निपटाना आसान नहीं है, और वह अपने बच निकलने की राह बना ही लेते हैं । डर लेकिन यही है कि मुकेश गोयल के बच निकलने की राह कहीं शिव कुमार चौधरी के अरमानों पर रोलर चला कर न बने !
शिव कुमार चौधरी के लिए मुसीबत की बात दरअसल यही है कि उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करते 'दिख' रहे नेता उन्हें चुनवाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें चुनवाने की आड़ में अपने अपने राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने की जुगाड़ में हैं । ऐसे में खतरा यही है कि उनके समर्थन में दिखने वाले जिस भी नेता को अपना लक्ष्य प्राप्त होता नहीं दिखेगा, तो वह कूद कर दूसरी तरफ जाने में देर नहीं लगायेगा । इसके लिए नेताओं ने पहले से व्यवस्था भी बना ली है - कुंजबिहारी अग्रवाल ने शिव कुमार चौधरी से नजदीकी बनाई हुई है तो सुशील अग्रवाल ने सुनील जैन से तार जोड़े हुए हैं । मुकेश गोयल तो सार्वजानिक रूप से कहते ही हैं - 'जिसमें मेरा फायदा, वही मेरा कायदा ।' मुकेश गोयल के एक अत्यंत नजदीकी का कहना है कि मुकेश गोयल यदि अभी हाल तक उन्हें खुलेआम गालियाँ देते रहे शिव कुमार चौधरी के साथ आ सकते हैं, तो स्थितियाँ प्रतिकूल होने पर उन्हें दूसरी तरफ जाने में देर क्यों लगेगी ? जाहिर है कि अपने समर्थकों को अपने साथ बनाये रखने की जिम्मेदारी शिव कुमार चौधरी को ही निभानी है । उनके समर्थक दोनों खेमों के नेताओं में आपसी उठापटक न हो, इसकी चिंता जब अभी हाल ही में मुजफ्फरनगर की एक मीटिंग में सामने आई तो उस मीटिंग में उपस्थित नेताओं ने एक स्वर में साफ साफ यह कह कर अपने हाथ झाड़ लिए कि मुकेश गोयल को संभालने की जिम्मेदारी विनीत शर्मा को ही लेनी होगी । विनीत शर्मा के यूँ तो मुकेश गोयल के साथ बहुत गहरे संबंध हैं और इन्हीं संबंधों की बदौलत उन्होंने मुकेश गोयल का समर्थन शिव कुमार चौधरी के लिए संभव बनाया है - लेकिन उक्त गहरे संबंधों के बावजूद पिछले वर्षों में कुछेक बार वह मुकेश गोयल के खिलाफ भी खड़े दिखे हैं; इसीलिए शिव कुमार चौधरी के साथ मुकेश गोयल के बने रहने में विनीत शर्मा के गहरे संबंध कोई गारंटी नहीं हैं ।
शिव कुमार चौधरी के सामने सिर्फ नेताओं को ही साधे रखने की चुनौती नहीं है । कार्यवाहक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गुरी जनमेजा और उनकी कोर टीम के सदस्यों के साथ निभाना भी उनके लिए एक बड़ी समस्या होगी । सुधीर जनमेजा के साथ शिव कुमार चौधरी के बिगड़े संबंधों के 'कारणों' के गवाह चूँकि गुरी जनमेजा और उनकी कोर टीम के सदस्य रहे हैं, इसलिए वह शिव कुमार चौधरी से उनका बदला भी लेना चाहेंगे और शिव कुमार चौधरी को अपने कब्जे में भी रखना चाहेंगे । उम्मीदवार के रूप में शिव कुमार चौधरी ने जो एक फार्मूला अपनाया - कि सामने वाले को पहले सब्जबाग दिखाओ और फिर जब सचमुच कुछ करने का मौका आये तो बच निकलो - उसका शिकार उन्होंने सुधीर जनमेजा को भी बनाया । हालाँकि होशियारी सिर्फ शिव कुमार चौधरी ने ही नहीं दिखाई थी, सुधीर जनमेजा ने भी दिखाई थी - लेकिन जो संबंध बनाने की कोशिश शिव कुमार चौधरी ने की थी, उसे निभाने की ज्यादा जिम्मेदारी भी उन्हीं की थी । सुधीर जनमेजा की 'गलती' यही थी कि शिव कुमार चौधरी जिस तरह उन्हें इस्तेमाल करना चाहते थे, सुधीर जनमेजा उसकी पूरी कीमत उनसे बसूल करना चाहते थे । शिव कुमार चौधरी उन्हें इस्तेमाल तो करना चाहते थे, लेकिन उसकी कीमत नहीं देना चाहते थे - और यहीं बात बिगड़ गई । लगभग वही स्थिति अब है । शिव कुमार चौधरी गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस होने का फायदा उठाना चाहते हैं और इसकी कीमत भी देने की बात कर रहे हैं । सुनने में आया है कि उनकी तरफ से गुरी जनमेजा को बता दिया गया है कि कॉन्फ्रेंस का खर्चा वह कर देंगे । आशंका यह है कि यह 'खर्चा' वाला मामला बबाल पैदा कर सकता है - क्योंकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि 'खर्चा' कितना होगा; और 'खर्चे' का हिसाब किसका माना जायेगा । सुधीर जनमेजा 'खर्चे' का जो हिसाब देते/बताते थे, वह कभी किसी की समझ में नहीं आया; गुरी जनमेजा जो 'खर्चा' बतायेंगी, वह शिव कुमार चौधरी को समझ में आ जायेगा - यह एक बड़ा प्रश्न है । और यही प्रश्न शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के लिए बड़ी चुनौती है ।
इसीलिए कई लोगों को लग रहा है कि गाजियाबाद में कॉन्फ्रेंस होने से शिव कुमार चौधरी को लाभ कम, नुकसान ज्यादा होने का खतरा है । रोचक तथ्य यह है कि इस खतरे को उन्होंने खुद ही आमंत्रित किया है और शायद अभी वह इस खतरे को समझ/पहचान भी नहीं पा रहे हैं ।