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Friday, November 25, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मुकेश गोयल की उम्मीदवारी आने से जेपी सिंह के लिए अपनी राजनीति चलाने और उसके लिए खर्चा जुटाने का काम थोड़ा आसान हो गया है

नई दिल्ली । यशपाल अरोड़ा की जगह मुकेश गोयल के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार हो जाने से जेपी सिंह और उनके समर्थकों को गुरचरण सिंह भोला के लिए उम्मीद नजर आने लगी है । गुरचरण सिंह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जेपी सिंह के उम्मीदवार हैं । जेपी सिंह की तरफ से पहले रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी थी, किंतु अचानक से उनके पीछे हटने के बाद जेपी सिंह को अपने ही क्लब के सदस्य गुरचरण सिंह को उम्मीदवार बनाना पड़ा । गुरचरण सिंह जब उम्मीदवार बने, तब प्रतिद्धंद्धी खेमे की तरफ से यशपाल अरोड़ा उम्मीदवार थे - जो पिछले करीब पाँच-छह महीने से अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में लगे हुए थे । यशपाल अरोड़ा के सामने गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को किसी ने भी उत्साह और/या उम्मीद के साथ नहीं लिया; और हर किसी का मानना व कहना रहा कि गुरचरण सिंह को जेपी सिंह अपने राजनीतिक स्वार्थ में इस्तेमाल कर रहे हैं । जेपी सिंह के नजदीकियों की तरफ से ही सुना गया कि जेपी सिंह को अपनी राजनीति के लिए बलि का एक बकरा चाहिए, जो उन्हें गुरचरण सिंह के रूप में मिल गया है । चर्चा तो यह भी सुनी/सुनाई गई कि रमेश अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी वापस ही इसलिए ली, क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि जेपी सिंह उनकी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी गंभीर नहीं हैं, तथा उनकी उम्मीदवारी की आड़ में वास्तव में अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में हैं ।
जेपी सिंह को दरअसल डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में वापसी करने के लिए इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए एक उम्मीदवार की जरूरत महसूस हुई । उनका आकलन है कि पिछले लायन वर्ष में उनकी जो ऐतिहासिक फजीहत हुई है, उसका कारण सिर्फ यह है कि उनके पास सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार नहीं था । इस कारण उनके समर्थक डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में नहीं पहुँचे, और विरोधी खेमे के लोगों ने इसी बात का फायदा उठा कर उनकी ऐसी गत बना दी, जैसी कि लायन-इतिहास में किसी की नहीं बनी होगी । पिछले वर्ष हुई दुर्गति के अनुभव से जेपी सिंह ने समझ लिया है कि उन्हें यदि सचमुच इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनना है, तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव में उन्हें अपना एक प्यादा खड़ा करना ही होगा । इससे वह दो फायदे एकसाथ उठा सकते हैं : एक तो यह कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई के चक्कर में वह अपने समर्थकों को एकजुट व सक्रिय रख सकेंगे, तथा दूसरा यह कि अपने चुनाव का खर्चा भी वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के मत्थे मढ़ सकेंगे । ब्लड बैंक की जिम्मेदारी छिन जाने से जेपी सिंह की कमाई पर जो प्रतिकूल असर पड़ा है, उसके बाद तो जेपी सिंह को इस बात की और ज्यादा जरूरत पड़ी है कि कोई दूसरा उनकी राजनीति का खर्चा वहन करे । इसी आधार पर, गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को जेपी सिंह की इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी चुने जाने की रणनीतिक व 'आर्थिक' तैयारी के रूप में देखा गया । 
प्रतिद्धंद्धी खेमे में यशपाल अरोड़ा की जगह मुकेश गोयल के उम्मीदवार बनने से गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को लोग लेकिन थोड़ी गंभीरता से देखने लगे हैं । यशपाल अरोड़ा के मुकाबले गुरचरण सिंह को जहाँ चुनावी मुकाबले से कतई बाहर देखा/पहचाना जा रहा था; वहाँ मुकेश गोयल के सामने उन्हें मुकाबले में देखा/पहचाना जाने लगा है । दरअसल लोगों के बीच एक्सपोजर के मामले में मुकेश गोयल और गुरचरण सिंह की स्थिति लगभग एक जैसी ही है; इसलिए इन दोनों के बीच उतना फर्क नहीं है, जितना फर्क यशपाल अरोड़ा और गुरचरण सिंह में था । यशपाल अरोड़ा ने लोगों के बीच जो काम किया हुआ था, उसका फायदा मुकेश गोयल को मिलेगा जरूर - और उसी फायदे के चलते वह गुरचरण सिंह से आगे भी नज़र आ रहे हैं । गुरचरण सिंह के समर्थकों को लेकिन लग रहा है कि मुकेश गोयल अभी आगे भले ही दिख रहे हों, किंतु वह इतना आगे भी नहीं हैं कि गुरचरण सिंह के लिए उन्हें 'पकड़ना' बिलकुल असंभव ही हो । मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को हालाँकि सत्ता खेमे के उम्मीदवार होने का एक बड़ा फायदा भी है । इसीलिए कई लोगों को लग रहा है कि चुनावी मुकाबले में आ जाने के बाद भी गुरचरण सिंह के लिए मुकेश गोयल से आगे निकल पाना मुश्किल ही होगा । 
सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मुकेश गोयल और गुरचरण सिंह के बीच होते दिख रहे चुनाव में किसका पलड़ा भारी साबित होगा, यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों उम्मीदवार अपने अपने प्रचार-अभियान को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं और अपने अपने मौकों का किस प्रकार फायदा उठाते हैं; लेकिन यशपाल अरोड़ा की जगह मुकेश गोयल की उम्मीदवारी आने से जेपी सिंह को एक बड़ा फायदा यह जरूर होता हुआ देखा जा रहा है कि अब उन्हें गुरचरण सिंह को झाँसे में रखने के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करना पड़ेगी । जेपी सिंह के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि गुरचरण सिंह को उम्मीदवारी के लिए राजी कर लेने के बाद भी जेपी सिंह को भरोसा नहीं था कि वह गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को ज्यादा दिनों तक 'बनाए' रख सकेंगे; लेकिन यशपाल अरोड़ा के चुनावी मैदान से हटने के बाद जो स्थितियाँ बनी हैं, उसमें अब गुरचरण सिंह को भी अपने लिए उम्मीद दिखने लगी है - और इस बात ने जेपी सिंह को बड़ी राहत दी है । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए अपनी राजनीति चलाने और उसके लिए खर्चा जुटाने के लिए गुरचरण सिंह को राजी करना अब जेपी सिंह के लिए आसान हो गया है ।

Saturday, April 2, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के चक्कर में जेपी सिंह द्वारा मदन बत्रा के साथ की गई धोखाधड़ी को देखते हुए यशपाल अरोड़ा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी 'तैयारी' इंद्रजीत सिंह के भरोसे सफल होती दिख रही है

नई दिल्ली । जेपी सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के लिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर मदन बत्रा की उम्मीदवारी की जिस तरह से बलि चढ़ाई है, उसे 'देख' कर रमेश अग्रवाल को अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने जाने की अपनी 'तैयारी' खतरे में पड़ी नजर आने लगी है । रमेश अग्रवाल अगले लायन वर्ष में जेपी सिंह के भरोसे सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की 'तैयारी' में सुने/देखे जा रहे हैं, लेकिन मदन बत्रा के हश्र के देखते हुए उनके नजदीकियों को डर हो गया है कि रमेश अग्रवाल का हाल कहीं मदन बत्रा जैसा ही न हो - और कहीं उन्हें भी जेपी सिंह से धोखा न मिले । उल्लेखनीय है कि मौजूदा लायन वर्ष में मदन बत्रा ने जेपी सिंह के भरोसे ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की तैयारी की हुई थी । जेपी सिंह उनके लिए 'बैटिंग' कर भी रहे थे; डिस्ट्रिक्ट में जेपी सिंह की जो राजनीतिक साख है - उससे खुद मदन बत्रा तथा उनके नजदीकियों सहित दूसरे लोगों को भी मदन बत्रा की दाल गल जाने का भरोसा था । लेकिन फैसले की घड़ी आते आते पलड़ा जिस तरह रवि मेहरा के पक्ष में झुक गया, उससे सभी को झटका लगा और जेपी सिंह की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई । मदन बत्रा के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि जेपी सिंह ऐन मौके पर मदन बत्रा को धोखा नहीं देते, तो मदन बत्रा - रवि मेहरा को अच्छी चुनावी टक्कर देते । जेपी सिंह के पलटी मारने से मदन बत्रा को भी अपने पैर पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
डिस्ट्रिक्ट में हर किसी का मानना और कहना है कि जेपी सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के लिए रवि मेहरा के समर्थकों के साथ सौदा कर लिया, तथा मदन बत्रा को उन्होंने बीच मँझदार में ही छोड़ दिया । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, रवि मेहरा के समर्थकों ने जेपी सिंह को साफ साफ बता दिया कि उन्होंने यदि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मदन बत्रा का समर्थन करना जारी रखा, तो वह इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के लिए उम्मीदवार खड़ा करेंगे - और जेपी सिंह को फिर चुनाव लड़ना होगा । रवि मेहरा के समर्थकों की यह धमकी काम कर गई, और जेपी सिंह ने मदन बत्रा की उम्मीदवारी के समर्थन से तुरंत हाथ खींच लिए । जेपी सिंह के नजदीकियों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के लिए अपने ही डिस्ट्रिक्ट में चुनाव का सामना करने की संभावना ने जेपी सिंह को वास्तव में डरा दिया : जेपी सिंह को डर यह हुआ कि चुनाव में वह यदि हार गए, तो इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने का उनका सपना चकनाचूर हो जायेगा; और यदि नहीं भी हारे, तो भी मल्टीपल में यह संदेश तो जायेगा ही कि जेपी सिंह को अपने ही डिस्ट्रिक्ट में पूरा पूरा समर्थन नहीं है । इसलिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में समर्पण कर देने तथा मदन बत्रा की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हट जाने में ही उन्हें अपनी भलाई नजर आई । पिछले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में नरेंद्र गोयल ने जेपी सिंह की जैसी फजीहत की थी, उसका सबक याद रखने के कारण ही जेपी सिंह ने इस वर्ष पंगा लेने का साहस नहीं किया - जिसका नतीजा यह हुआ कि मदन बत्रा की नाव बीच मँझदार में डूब बैठी ।
मदन बत्रा के साथ जो हुआ, उसे देख कर रमेश अग्रवाल और उनके नजदीकियों को अगले लायन वर्ष की अपनी 'तैयारी' खतरे में पड़ती दिख रही है । दरअसल अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए यशपाल अरोड़ा भी तैयारी करते हुए सुने/देखे जा रहे हैं - जिन्हें विनय गर्ग और इंद्रजीत सिंह का समर्थन बताया जाता है । यशपाल अरोड़ा को इंद्रजीत सिंह के 'आदमी' के रूप में पहचाना जाता है । वैसे तो इंद्रजीत सिंह भी जेपी सिंह के 'आदमी' के रूप में देखे/समझे जाते रहे हैं, लेकिन इंद्रजीत सिंह तथा यशपाल अरोड़ा के नजदीकियों का कहना है कि इंद्रजीत सिंह उनके गुलाम बन कर तो नहीं ही रहेंगे । कुछेक मौकों पर इंद्रजीत सिंह को जेपी सिंह से 'दूर जाते' देखा/पाया भी गया है । ऐसे मौकों पर जेपी सिंह के 'लोगों' ने जब इंद्रजीत सिंह को याद दिलाया कि वह जेपी सिंह के कारण ही गवर्नर बने हैं, तो इंद्रजीत सिंह से उन्हें सुनने को मिला कि - लेकिन जेपी सिंह उसकी पूरी कीमत बसूल तो चुके हैं । इस तरह की बातों से ही डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में इंद्रजीत सिंह किसी भी तरह से जेपी सिंह के 'यस मैन' बनकर तो नहीं ही रहेंगे । विनय गर्ग तो घोषित रूप से जेपी सिंह विरोधी खेमे के हैं । यही चीज अगले लायन वर्ष में रमेश अग्रवाल पर यशपाल अरोड़ा का पलड़ा भारी बनाती है । रमेश अग्रवाल को ले दे कर एक जेपी सिंह का ही भरोसा है - लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के चक्कर में जेपी सिंह द्वारा मदन बत्रा के साथ की गई धोखाधड़ी को देखते हुए रमेश अग्रवाल को वह भरोसा भी छिनता हुआ नजर आ रहा है ।       
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति से परिचित लोगों के अनुसार हालाँकि अभी से इस तरह का नतीजा निकालना जल्दबाजी करना होगा । उनका कहना है कि अगले लायन वर्ष की चुनावी राजनीति का सारा खेल इस बात पर निर्भर करेगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय गर्ग कैसा काम करते हैं, और किस किस के साथ अच्छे संबंध बना कर रखते हैं; तथा इंद्रजीत सिंह व यशपाल अरोड़ा का वह कैसे इस्तेमाल करते हैं ? पिछले लायन वर्ष में जेपी सिंह की फजीहत करने में नरेंद्र गोयल भले ही कामयाब रहे थे; और इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के संदर्भ में रवि मेहरा के समर्थक जेपी सिंह को झुकाने में भले ही सफल रहे हों - लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विनय गर्ग और इंद्रजीत सिंह भी जेपी सिंह को 'गरीब की जोरू' समझ लेंगे ? विनय गर्ग, इंद्रजीत सिंह और यशपाल अरोड़ा की कोई भी गलती जेपी सिंह को खेल कर देने का पर्याप्त मौका देगी - और जेपी सिंह के मौके में से ही फिर रमेश अग्रवाल के लिए भी रास्ता निकल सकेगा । यद्यपि यह भी सच है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के चक्कर में जेपी सिंह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में भारी दबाव में आ गए हैं, और ऐसे में कोई भी उन्हें आँखें दिखाने लगा है । जेपी सिंह की इस मजबूरी ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ पर तो ला ही दिया है ।

Saturday, March 26, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में पवन आहुजा के रूप में मुसीबत और चुनौती को आमंत्रित करने का काम क्या सचमुच खुद बिरिंदर सिंह सोहल ने ही किया है ?

लुधियाना । पवन आहुजा की नाटकीय तरीके से अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में न सिर्फ गर्मी ला दी है, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल को भी विवाद के घेरे में ला दिया है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दूसरे - और पुराने उम्मीदवार बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों का आरोप है कि उन्होंने चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल तथा उनके साथी पूर्व गवर्नर्स व अन्य कई खास लोगों की कमरों तथा खाने-पीने की नाजायज माँगों को पूरा करने के लिए सहमति नहीं दी, इसलिए रनवीर उप्पल तथा उनके साथी पूर्व गवर्नर्स ने न केवल डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की जगह व तारीख बदल दी, बल्कि पवन आहुजा को जबरदस्ती का उम्मीदवार भी बना दिया है । उल्लेखनीय है कि पहले डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस दो-तीन अप्रैल को मनाली में होने की घोषणा की गई थी । किंतु पिछले दिनों अचानक से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल ने इमरजेंसी मीटिंग बुला कर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की तारीख 24 अप्रैल तथा जगह चंडीगढ़ कर दी । डिस्ट्रिक्ट के लोग जब तक यह समझने की कोशिश करते कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल को यह सब करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी, तब तक एक दूसरी अप्रत्याशित घटना यह घटी कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरीश दुआ के क्लब के पवन आहुजा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में कूद पड़े । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए नाटकीय तरीके से प्रस्तुत हुई पवन आहुजा की उम्मीदवारी पर लोगों को आश्चर्य दरअसल इसलिए हुआ, क्योंकि इससे पहले उनकी उम्मीदवारी की कोई चर्चा तक नहीं थी - और बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट में सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन मिलता दिख रहा था तथा बिरिंदर सिंह सोहल सर्वसम्मति से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित होते हुए नजर आ रहे थे ।
किंतु बिरिंदर सिंह सोहल कामयाबी तक जब पहुँचने ही वाले थे कि उनके लिए हालात नाटकीय तरीके से बदल गए और उन्होंने अपने आपको चारों तरफ से घिरा हुआ पाया । कल तक जो लोग उनके समर्थक, सहयोगी और दोस्त बने हुए थे - उनमें से कई उनके विरोधी बन गए; और पवन आहुजा के रूप में सीधी चुनौती उनके सामने आ खड़ी हुई । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को लेकर होने वाली जो राजनीति अभी तक ठंडी-ठंडी पड़ी थी, उसमें बदली परिस्थितियों के चलते खासी गर्मी पैदा हो गई । इस गर्मी को और गर्म करने का काम किया बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों ने - जिनका आरोप रहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल और उनके साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स अपने लिए तथा अपने कुछेक खास लोगों के लिए मनाली के खास होटलों में ठहरने व खाने-पीने का विशेष इंतजाम करने की जिम्मेदारी बिरिंदर सिंह सोहल पर थोप रहे थे, जिसे पूरा करने से बिरिंदर सिंह सोहल ने इंकार कर दिया, तो बदला लेने के लिए उन्होंने बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थन हाथ खींच लिया । बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों का आरोप है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल तथा उनके साथी पूर्व गवर्नर्स ने पवन आहुजा से पूरे खर्चे-पानी का हिसाब फिक्स करके उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में जितवाने का आश्वासन देकर उम्मीदवार बना दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल तथा उनके साथी पूर्व गवर्नर्स की तरफ से बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों के आरोपों का करारा जबाव सुनने को मिला - जिसमें कहा/बताया गया कि सर्वसम्मत समर्थन मिलने से बिरिंदर सिंह सोहल तथा उनके नजदीकी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इतने अहंकार में आ गए थे कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल पर हावी होने की तथा डिस्ट्रिक्ट को अपनी मर्जी से चलाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं; उनके रवैये को चूँकि किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था, इसलिए बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी पर बनी सर्वसम्मति को भंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल तथा कुछेक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की तरफ से कहा/बताया गया है कि बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी पर बनी आम सहमति को बिरिंदर सिंह सोहल तथा उनके नजदीकी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने डिस्ट्रिक्ट पर अपनी मनमानी थोपने तथा डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रमों को अपनी मनमर्जी से चलाने के लाइसेंस के रूप में समझ लिया; बिरिंदर सिंह सोहल ने तो अपने आपको डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ही समझ लिया था - जिसे देख कर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई । कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को लगा कि बिरिंदर सिंह सोहल के जब 'अभी' यह तेवर हैं, तो चुने जाने के बाद तो वह किसी को कुछ समझेंगे ही नहीं । दबे स्वर में हालाँकि बिरिंदर सिंह सोहल और उनके समर्थकों के आरोपों को भी कुछ हद तक स्वीकार किया गया और माना गया कि इंतजाम संबंधी मामलों में भी बिरिंदर सिंह सोहल का रवैया सहयोगात्मक नहीं रहा ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रनवीर उप्पल के नजदीकियों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजन से जुड़े कुछेक खर्चों को पूरा करने की जिम्मेदारी उम्मीदवार के रूप में बिरिंदर सिंह सोहल ने पहले तो ले ली थी, किंतु जब उन जिम्मेदारियों को निभाने का समय आया - तो वह तरह तरह की बहानेबाजी करके उन जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करने लगे । उनके इस रवैये के कारण मनाली में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस कर पाना संभव नहीं रह गया, और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को चंडीगढ़ लाना/करना मजबूरी हो गया । मजे की बात यह है कि बिरिंदर सिंह सोहल के कुछेक समर्थकों का ही कहना है कि अपने व्यवहार और कुछ पैसे बचाने के चक्कर में बिरिंदर सिंह सोहल ने अपने ही पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मार ली है, और पास आती गवर्नरी को अपने से दूर कर लिया है । उनके साथ हमदर्दी रखने/दिखाने वाले लोगों का ही कहना है कि बिरिंदर सिंह सोहल के पिता केएस सोहल भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहे हैं और तीसरी/चौथी बार में वह सफल हो पाए थे - इस नाते से उन्हें तो गवर्नरी की राजनीति के अच्छे-बुरे पक्षों की जानकारी व पहचान होनी ही चाहिए थी और सावधान रहना चाहिए था । बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों व शुभचिंतकों का ही कहना है कि बिरिंदर सिंह सोहल पता नहीं क्यों, यह समझने में फेल हो गए कि लायन राजनीति का जो ट्रेंड बना हुआ है, उसे आप चाहें पसंद करें या न करें - एक उम्मीदवार के रूप में आपको उनका पालन करना ही होगा ! बिरिंदर सिंह सोहल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उनके विरोधी तो विरोधी, उनके समर्थक व शुभचिंतक भी उनके मुसीबत में फँसने के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।
पवन आहुजा ने इस बीच लोगों से संपर्क साधने तथा उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने के जो प्रयास किए हैं, और उसके उन्हें जो सकारात्मक नतीजे मिलते दिख रहे हैं - उसने बिरिंदर सिंह सोहल के लिए हालात खासे चुनौतीपूर्ण बना दिए हैं । बिरिंदर सिंह सोहल और पवन आहुजा के बीच बिछी चुनावी बिसात ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गर्मी तो पैदा कर ही दी है, साथ ही साथ नए राजनीतिक समीकरण बनने/बनाने की संभावनाएँ भी पैदा कर दी हैं ।

Thursday, March 24, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन की चुनावी राजनीति में सुनील निगम और शिव कुमार चौधरी को लगे तगड़े वाले झटके की खबर में मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी तथा नेता जिस तरह से दिलचस्पी लेते देखे जा रहे हैं - उससे उनकी मल्टीपल की चुनावी राजनीति भी चौपट हो गई नजर आ रही है

गाजियाबाद । विनय मित्तल को डिस्ट्रिक्ट ही नहीं, बल्कि मल्टीपल में मिली ऐतिहासिक जीत के साथ फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी की और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उनके उम्मीदवार के रूप में रेखा गुप्ता की जो चुनावी दुर्गति हुई है, उसने मल्टीपल की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं को खासा हैरान किया है । मजे की बात यह है कि उनकी इस हैरानी के लिए खुद शिव कुमार चौधरी ही जिम्मेदार हैं । मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं के अनुसार, शिव कुमार चौधरी दरअसल उनके सामने अपनी राजनीति की और लोगों के बीच अपने असर/प्रभाव की ऐसी ऐसी तथा इतनी डींगें हाँकते/मारते रहे हैं कि अब जब असलियत सामने आई तो पता चला कि शिव कुमार चौधरी के लिए किसी को चुनाव जितवा पाना तो दूर की बात, उनका खुद का जीतना मुश्किल भरा है । विरोधी पक्ष के कुछेक लोगों को अब इस बात का अफसोस हो रहा है कि उन्होंने शिव कुमार चौधरी के खिलाफ नेगेटिव वोट डालने/डलवाने का कैम्पेन क्यों नहीं चलाया ? उन्हें लग रहा है कि वह यदि थोड़ी सी भी दिलचस्पी लेते तो शिव कुमार चौधरी के खिलाफ 51 प्रतिशत से अधिक वोट पड़ जाते । बिना कोई विरोधी कैम्पेन चलाए ही, स्वतःस्फूर्त तरीके से लोगों के बीच पनपे/पैदा हुए विरोध के चलते शिव कुमार चौधरी को जब इतने नेगेटिव वोट पड़ गए कि वह गवर्नर पद 'हारने' से बस बाल बाल ही बच सके - तो समझा जा सकता है कि लोगों के बीच उनके प्रति कितनी नापसंदगी है और उनका कितना विरोध है । मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं व पदाधिकारियों को यह जान कर तो और भी हैरानीभरा झटका लगा है कि शिव कुमार चौधरी तथा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उनके उम्मीदवार को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल तथा आपने आप को भावी इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में 'देख' रहे अरविंद संगल व अरुण मित्तल सहित डिस्ट्रिक्ट के कई अन्य तुर्रमखाँ पूर्व गवर्नर्स सहित मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील निगम का खुला व सक्रिय समर्थन मिल रहा था - लेकिन फिर भी वह रिकॉर्ड-तोड़ चुनावी दुर्गति का शिकार हुए ।
मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के नेताओं को शिव कुमार चौधरी की इस रिकॉर्ड-तोड़ चुनावी दुर्गति में दरअसल इसलिए दिलचस्पी हुई है, क्योंकि शिव कुमार चौधरी ने अपने आप को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की चुनावी राजनीति में इन्वॉल्व किया हुआ था, और वह यह इंप्रेशन देने का प्रयास कर रहे थे कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में वह बड़ी और निर्णायक भूमिका निभायेंगे । मल्टीपल के दो-तीन फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ ग्रुप 'बना' कर वह मल्टीपल की राजनीति में अपनी भूमिका 'बनाने' का प्रयास कर रहे थे । शिव कुमार चौधरी के इस प्रयास के भरोसे ही सुनील निगम भी मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने का 'सपना' देखने लगे थे । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को अपनी मुट्ठी में करने की सुनील निगम और शिव कुमार चौधरी की तिकड़मी कोशिशों को लेकिन जैसा करारा झटका लगा है, उससे मल्टीपल की इनकी राजनीति भी चौपट हो गई है ।
सुनील निगम और शिव कुमार चौधरी की जोड़ी तथा उनके समर्थक तुर्रमखाँ नेताओं को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जो जोर का झटका लगा है, वह सिर्फ वोटों की गिनती के मामले में मिली हार ही नहीं है - बल्कि सोच की, मानसिकता की और रणनीति के मामले में मिली हार भी है । इस 'हार' का पहला संकेत तभी मिल गया था, जब विनय मित्तल के मुकाबले पर रेखा गुप्ता को उम्मीदवार के रूप में लाया गया । इस 'फैसले' की प्रेरणा के पीछे विनय मित्तल की स्थिति व हैसियत को कम आँकने की 'मूर्खता' काम कर रही थी । सिर्फ इस तथ्य को ही अनदेखा नहीं किया गया कि विनय मित्तल पिछले कई वर्षों से डिस्ट्रिक्ट की चुनावी लड़ाई के मैनेजमेंट के मुख्य साझीदार रहे हैं, और इस नाते से चुनावी मोर्चे की 'संकरी गलियों' से तथा चुनावी लड़ाई को प्रभावित करने वाले उतार-चढ़ावों से भी अच्छे से परिचित हैं - बल्कि इस सच्चाई से भी ऑंखें मूँद ली गईं कि विनय मित्तल और मुकेश गोयल की जोड़ी एक और एक दो का नहीं, बल्कि ग्यारह का जोड़ बनाती है । अनीता गुप्ता, एलएम जखवाल व सुनील जैन जैसे 'खाड़कू' टाइप के नेताओं ने विनय मित्तल की उम्मीदवारी को और ताकत दे दी थी । रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को बड़बोले शिव कुमार चौधरी का समर्थन था, जो डिस्ट्रिक्ट के कई एक 'फूफा' टाइप के पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने में तो कामयाब रहे थे - लेकिन जिस तरह भारतीय परिवारों में फूफा नाम के रिश्तेदार कुछ करने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी खातिर/तवज्जो की चिंता करने और इसमें कमी रह जाने पर अच्छे भले काम में विध्न-बाधा डालने से भी परहेज न करने के चलते बदनाम रहे हैं, उसी तर्ज पर 'फूफा' टाइप के पूर्व गवर्नर्स से रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को न तो कोई मदद मिलना थी - और वास्तव में न वह मिली ही ।
शिव कुमार चौधरी तथा कई एक पूर्व गवर्नर्स का समर्थन रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को मिल तो गया, किंतु वह चुनावी रणनीति बनाने तथा उसे क्रियान्वित करने में बुरी तरह विफल रहा । चुनाव वाले दिन की घटना से इसे समझा जा सकता है : चुनाव से पिछली शाम/रात मुकेश गोयल ने क्रेडेंशियल जारी करने की माँग की, जिसे रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक खेमे ने मान लिया; किंतु सुबह होते होते विनय मित्तल की उम्मीदवारी के समर्थक खेमे के नेताओं ने भाँप लिया कि यह माँग उन्हें उल्टी पड़ गई है क्योंकि रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों ने मौके का फायदा उठा कर अपने पक्ष के ज्यादा क्रेडेंशियल जारी कर दिए हैं । विनय मित्तल के समर्थक नेताओं ने तुरंत पैंतरा बदला और वह क्रेडेंशियल जारी करने का विरोध करने लगे । इस मुद्दे पर अनीता गुप्ता ने जो तांडव रचा और एलएम जखवाल व सुनील जैन ने उनके इस तांडव के लिए जैसी फील्डिंग सजाई, उसे देख कर रेखा गुप्ता के समर्थकों के छक्के छूट गए । वह बेचारे बस यही रट लगाते रहे कि क्रेडेंशियल जारी करने की माँग मुकेश गोयल ने ही तो की थी । वह यह समझने में पूरी तरह विफल रहे कि अनीता गुप्ता, एलएम जखवाल व सुनील जैन की तिकड़ी जो कर रही है, वह दरअसल सुविचारित तरीके से तैयार किया गया 'माइंड-गेम' है, जिसका उद्देश्य लोगों के बीच यह प्रभाव बनाना/दिखाना है कि वह दूसरे पक्ष पर भारी हैं । क्रेडेंशियल के मुद्दे पर रेखा गुप्ता के समर्थकों ने जिस तरह से समर्पण किया, उससे विनय मित्तल के समर्थकों का उद्देश्य पूरा हो गया । चुनाव वाले दिन लोगों के बीच चर्चा सुनी गई कि रेखा गुप्ता के समर्थकों ने कुछेक गुंडे टाइप के लोगों को बुलाया हुआ है; विनय मित्तल के समर्थकों ने इसका दो तरीके से इंतजाम किया - उन्होंने भी कुछेक गुंडे टाइप के लोगों को तो बुलाया ही, साथ ही पुलिस भी बुला ली । विनय मित्तल के समर्थकों के इस दोतरफा इंतजाम को देख कर रेखा गुप्ता के समर्थकों के पसीने छूट गए । हालात को प्रतिकूल देख कर सुशील अग्रवाल, कुञ्ज बिहारी अग्रवाल, अरविंद संगल आदि तो पतली गली से निकल भागे; मुकाबला करने के लिए अरुण मित्तल, सुनील निगम, शिव कुमार चौधरी रह गए । विनय मित्तल के समर्थकों को जब यह अहसास हुआ कि यह लोग भी चुनावी प्रक्रिया को पूरी किए बिना 'निकलने' के चक्कर में हैं, तो मुकेश गोयल ने मोर्चा संभाला और उन्होंने इन्हें बता दिया कि चुनावी प्रक्रिया यदि पूरी नहीं की गई, तो वह निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील जैन को जिम्मेदारी सौंप कर चुनावी प्रक्रिया पूरी करा लेंगे और शिव कुमार चौधरी को 51 प्रतिशत से अधिक नेगेटिव वोट रिपोर्ट करवा/दिखवा देंगे । मुकेश गोयल की यह धमकी काम कर गई, तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुनील निगम ने 'अपने' उम्मीदवार की हार स्वीकार करने और उसकी सार्वजनिक घोषणा करने की औपचारिकता निभाई ।
सुनील निगम और शिव कुमार चौधरी को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जो तगड़ा वाला झटका लगा है, उसकी खबर में मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी तथा नेता जिस तरह से दिलचस्पी लेते देखे जा रहे हैं - उससे उनकी मल्टीपल की चुनावी राजनीति भी चौपट हो गई नजर आ रही है ।

Monday, March 21, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में विनय मित्तल के सामने शिव कुमार चौधरी के भरोसे उम्मीदवार बनीं रेखा गुप्ता को बेहद शर्मनाक व डिस्ट्रिक्ट के इतिहास की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा

गाजियाबाद । विनय मित्तल की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर हुई जीत के 'आंकड़े' ने उन लोगों की आँख पर बँधी पट्टी को हटाने भर का काम किया है, जो दीवार पर साफ-साफ लिखी इबारत को अपने झूठे अहंकार के चलते पढ़ने से इंकार कर रहे थे । कुछेक नेता साफ साफ दिख रही सच्चाई को स्वीकार करने से इसलिए भी इंकार कर रहे थे, क्योंकि तब रेखा गुप्ता रूपी एटीएम से उन्हें पैसे मिलने बंद हो जाते । लेकिन अब चुनावी नतीजा सामने है, जिसमें रेखा गुप्ता 165 वोटों से पराजित घोषित हुईं हैं । रेखा गुप्ता को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने उम्मीदवार बनाया था, और रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी की बागडोर पूरी तरह से शिव कुमार चौधरी के हाथ में ही थी । रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल का तथा डिस्ट्रिक्ट के सबसे वरिष्ठ पूर्व गवर्नर कुंजबिहारी अग्रवाल सहित अन्य कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन था; और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील निगम भी उन्हें वोट दिलाने की होड़ में लगे हुए थे - तब भी रेखा गुप्ता को कुल 107 वोट मिल सके, और विनय मित्तल को मिले 272 वोटों की तुलना में वह 165 वोट पीछे रह गईं । बात सिर्फ यह नहीं है कि अपने आप को डिस्ट्रिक्ट का तुर्रमखाँ समझने वाले तमाम नेताओं के समर्थन के बावजूद रेखा गुप्ता सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव हार गईं - बड़ी बात यह है कि अपने आपको तुर्रमखाँ समझने वाले तमाम नेताओं के समर्थन के बावजूद रेखा गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में हार का एक बड़ा रिकॉर्ड बनाया है । उनकी हार सिर्फ शर्मनाक हार नहीं है, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी हार भी है ।
यानि विनय मित्तल सिर्फ सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव भर नहीं जीते हैं, उन्होंने डिस्ट्रिक्ट में जीत का एक बड़ा रिकॉर्ड भी बनाया है - और इस तरह से उन्होंने अपने विरोधियों को उनकी असल राजनीतिक औकात दिखाने का काम भी किया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में अभी तक बड़ी जीत का रिकॉर्ड सुशील अग्रवाल और अरुण मित्तल के नाम पर था । सुशील अग्रवाल ने अपना चुनाव 80 वोटों से जीता था, और अरुण मित्तल ने 83 वोटों से जीत हासिल की थी । विनय मित्तल ने लेकिन 165 वोटों से जीत प्राप्त करके इन दोनों के जीत के अंतर को बहुत पीछे छोड़ दिया है और डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के इतिहास में सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है ।
विनय मित्तल की चुनावी जीत को लेकर - रेखा गुप्ता से पैसे खींचने वाले तथा उनके पैसे पर अपनी राजनीति चमकाने में लगे कुछेक लोगों के अलावा - किसी को भी शक नहीं था । दरअसल व्यक्तित्व के मामले में, कामकाज के मामले में, लोगों के बीच पहचान के मामले में, लोगों से संपर्क व दोस्ती रखने के मामले में रेखा गुप्ता का विनय मित्तल से कोई मुकाबला ही नहीं था; लोगों को हैरानी ही हुई थी कि पता नहीं किस गलतफहमी में रेखा गुप्ता ने विनय मित्तल के मुकाबले उम्मीदवार बनने का फैसला कर लिया ? कोढ़ में खाज की बात यह हुई कि रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के मुख्य सिपहसालार शिव कुमार चौधरी बने । शिव कुमार चौधरी ने अपनी बातों और अपने व्यवहार से डिस्ट्रिक्ट में अपने विरोधी ही बनाए हैं; जिसके चलते लोगों ने मान/जान लिया कि रेखा गुप्ता ने अपनी हार का अंतर बढ़ा लिया है । उल्लेखनीय है कि रेखा गुप्ता की हार के अंतर ने हर किसी को हैरान किया है । मजे की बात यह है कि विनय मित्तल के समर्थकों/शुभचिंतकों तक को इस अंतर से जीतने की उम्मीद नहीं थी । दोनों तरफ के लोग हार/जीत के इतने बड़े अंतर के लिए शिव कुमार चौधरी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । लोगों का कहना है कि शिव कुमार चौधरी ने जब जब मुँह खोला, रेखा गुप्ता को मिलने वाले वोटों को घटाने का ही काम किया ।
शिव कुमार चौधरी की बातों व उनके व्यवहार ने खुद उन्हें भी नुकसान पहुँचाया । रेखा गुप्ता को जितने वोट मिले, शिव कुमार चौधरी को उससे ज्यादा नेगेटिव वोट मिले । उन्हें 150 से ज्यादा नेगेटिव वोट मिले । डिस्ट्रिक्ट के चुनावी इतिहास में यह भी एक नया रिकॉर्ड बना है । इस तरह सबसे ज्यादा नेगेटिव वोट पाकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने वाले शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में अपना नाम लिखवाया ।
विनय मित्तल और रेखा गुप्ता के बीच हुआ चुनाव इस बात के लिए भी याद रखा जायेगा कि यह चुनाव खासे हंगामाई तरीके से संपन्न हुआ । रेखा गुप्ता के समर्थकों की तरफ से बदतमीजी व बेईमानी करने के इंतजामों की भनक मिलते ही विनय मित्तल के समर्थकों ने पुलिस बुलवा ली, और फिर पुलिस की देखरेख में चुनावी प्रक्रिया संपन्न हुई । रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों की हरकतों को देख कर विनय मित्तल की उम्मीदवारी के समर्थकों ने अंदाजा लगाया कि अपनी हार को सुनिश्चित जान कर रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेता गड़बड़ी करके चुनाव को टलवा सकते हैं, इसलिए उन्होंने खासी होशियारी से कभी गर्म तो कभी नर्म रवैया अपना कर चुनावी प्रक्रिया को संपन्न करवाया । वोटिंग के दौरान लोगों के बीच यह चर्चा भी सुनी गई कि अपनी हार को सन्निकट देख/भाँप कर रेखा गुप्ता चुनाव से पहले अपनी उम्मीदवारी छोड़ देने के बारे में सोच रही थीं, लेकिन उनके समर्थक कुछेक नेताओं ने उन्हें आश्वस्त किया कि उम्मीदवारी ऐसे मत छोड़ो, छोड़ने के बदले में वह उन्हें विनय मित्तल से पैसे दिलवा देंगे । विनय मित्तल की तरफ से लेकिन इस तरह की सौदेबाजी करने से स्पष्ट इंकार कर दिया गया । उम्मीदवार के रूप में रेखा गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की इस चुनाव में जो हालत हुई है, वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का एक दिलचस्प अध्याय बन गया है ।

Saturday, August 29, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में भारी छूट के साथ घर खरीदने का ऑफर देकर अजय सिंघल मुसीबत में फँसे

गाजियाबाद । अजय सिंघल सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपने प्रोजेक्ट को बेचने निकल पड़ने के कारण लोगों की भारी आलोचना का निशाना बन रहे हैं । शिकायती अंदाज में लोगों का पूछना/कहना है कि अजय सिंघल क्या इसीलिए (सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट) गवर्नर बने हैं ? कुछेक लोगों ने बहुत ही तल्ख़ लहजे में आरोप लगाया है कि इस तरह तो अजय सिंघल लायनिज्म को धंधा करने का जरिया बना देंगे । कुछेक लोगों ने हालाँकि अजय सिंघल का बचाव करने का प्रयास भी किया और तर्क दिया कि लायनिज्म की स्थापना ही एक दूसरे के बीच अपने अपने बिजनेस को प्रमोट करने के उद्देश्य से हुई थी, इसलिए अजय सिंघल ने जो कुछ किया है उसमें कुछ भी गलत नहीं है । इन्हीं लोगों ने यह कह कर मामले को राजनीतिक ट्विस्ट देने का प्रयास भी किया कि अजय सिंघल से ईर्ष्या करने वाले उनके आसपास के लोग इस मामले में लोगों को भड़का रहे हैं, और अजय सिंघल को बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं । आलोचकों व समर्थकों के बीच कुछेक तटस्थ किस्म के लोगों का मानना और कहना है कि अजय सिंघल से गलती तो हुई है, लेकिन वह इतनी बड़ी नहीं है कि उन्हें जोरशोर से निशाना बनाया जाए । इनका कहना है कि लायनिज्म में कई बेईमान किस्म के लोग हैं, जो लायनिज्म में अपनी पोजीशन का फायदा उठाते हुए लोगों को अपने बिजनेस के माध्यम से ठगने के काम में लगे रहते हैं; प्रॉपर्टी के बिजनेस में इस तरह की ठगी बहुत होती है - इसलिए अजय सिंघल को सावधानी के साथ लायनिज्म और बिजनेस में सामंजस्य बैठाना चाहिए । अभी उन्होंने जो किया है उसमें वह जरूरी सामंजस्य असंतुलित तो हुआ है, किंतु वह असंतुलन इतना बड़ा भी नहीं है कि उन्हें सीधे कठघरे में ही खड़ा कर दिया जाए । अजय सिंघल को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करने वाले लोगों का कहना किंतु यह है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अजय सिंघल को यदि अभी ही नहीं चेक किया गया, तो वह लायनिज्म को धंधा ही बना देंगे ।   
यह बबाल अजय सिंघल द्वारा लोगों को भेजी गई उस ईमेल से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने अपने आपको डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में प्रस्तुत करते हुए अपने प्रोजेक्ट में घटी कीमत पर घर खरीदने का ऑफर दिया । यह ईमेल पाकर कई लोग भड़क गए और उनका आरोप रहा कि लायनिज्म की साख व विश्वसनीयता की आड़ लेकर अजय सिंघल अपना प्रोजेक्ट बेचने का प्रयास कर रहे हैं । यह आरोप लगाने वाले लोगों का कहना रहा कि उन्हें यह बात अच्छी तरह से पता है कि गवर्नर बनने के बाद अजय सिंघल अपना बिजनेस बंद नहीं कर देंगे; वह यह भी समझते हैं कि लायनिज्म में उनके परिचय का जो विस्तार होगा, उसका फायदा अजय सिंघल निश्चित रूप से अपने बिजनेस में उठायेंगे ही - लेकिन वह यह उम्मीद जरूर करते हैं कि अजय सिंघल अपने बिजनेस और अपनी गवर्नरी को एक साथ मिला नहीं देंगे, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'रूप में' बिजनेस नहीं करेंगे । लोगों का कहना रहा कि हर गवर्नर कोई न कोई बिजनेस करता ही है; लेकिन वह बिजनेस और लायनिज्म में एक विभाजन रेखा भी बना कर रखता है । अजय सिंघल ने चूँकि इस विभाजन रेखा को खत्म कर दिया, इसलिए वह लोगों के निशाने और आरोपों के घेरे में आ गए । 
अजय सिंघल लोगों के निशाने और आरोपों के घेरे में इसलिए भी आ गए, क्योंकि लोगों ने उन्हें लायनिज्म में खूब खूब सक्रियता के साथ देखा है । लायनिज्म में सक्रियता बनाने और लायनिज्म में संपर्कों का दायरा बनाने/बढ़ाने में अजय सिंघल ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है, वह वास्तव में एक बेमिसाल उदाहरण है । ऐसा उदाहरण अभी तक प्रायः उन थोड़े से लोगों ने ही प्रस्तुत किया है, जो लायनिज्म के साथ सचमुच में जुड़ कर यहाँ एक लंबी पारी खेलना चाहते हैं । अजय सिंघल ने सक्रियता तो दिखाई है, संपर्क बनाने में उत्साह भी दिखाया है - लेकिन लायनिज्म के साथ वास्तव में 'जुड़ने' का कोई संकेत नहीं दिया है । उनके नजदीकियों के हवाले से उनकी सक्रियता का नतीजा यह निकला/निकाला गया कि लायनिज्म में वह 'जुड़ने' नहीं, एन्जॉय करने के उद्देश्य से आए हैं । किंतु अजय सिंघल को आरोपों के घेरे में लेने वाली ईमेल से लोगों के बीच संदेह यह बना है कि लायनिज्म में कहीं वह बिजनेस करने के इरादे से तो नहीं आए हैं ? उक्त ईमेल को पाने वाले लोगों में कईयों को लगने लगा है कि अजय सिंघल की सक्रियता और संपर्क बनाने की मुहिम के पीछे बिजनेस ही मुख्य प्रेरक शक्ति है । 
कई लोगों का हालाँकि यह भी कहना है कि लायनिज्म में अजय सिंघल की सक्रियता और संपर्क बनाने की मुहिम के पीछे बिजनेस यदि मुख्य प्रेरक शक्ति हैं भी, तो यह कोई बुरी बात नहीं है; बुरी बात लेकिन यह है कि उन्होंने इसे बहुत ही फूहड़ तरीके से अंजाम देने की कोशिश की है - जिसमें उनके हाथ सिर्फ बदनामी ही लगनी है । यही हुआ भी है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में भारी छूट के साथ घर खरीदने का ऑफर देकर अजय सिंघल ने सचमुच में मुसीबत तो मोल ले ही ली है ।