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Tuesday, January 28, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में उम्मीदवार के रूप में बिना कुछ किए-धरे इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की जितेंद्र चौहान की कोशिशों में मल्टीपल की चुनावी राजनीति के बड़े नेता अपने आप को ठगा हुआ पा रहे हैं 

आगरा । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीलाढाला रवैया अपनाने के चलते जितेंद्र चौहान ने मल्टीपल के बड़े नेताओं को खासा संकट में डाल दिया है, और उन्हें इस संकट से निकलने का कोई उपाय भी नहीं सूझ रहा है । मल्टीपल में यूँ तो जितेंद्र चौहान को ही इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और मल्टीपल के बड़े नेताओं का भी समर्थन उन्हें है - लेकिन चूँकि वह खुद अपनी उम्मीदवारी को लेकर सक्रिय नहीं हैं, इसलिए मल्टीपल के नेताओं को डर हो रहा है कि जितेंद्र चौहान के ढीलेढाले रवैये के कारण कहीं कोई विरोधी उम्मीदवार फायदा न उठा ले जाए । इसीलिए मल्टीपल के बड़े नेताओं ने वैकल्पिक उम्मीदवार की तलाश भी शुरू कर दी है; हालाँकि उनकी तलाश में कई 'अगर' और 'मगर' जुड़े हुए हैं और फिलहाल उनकी तलाश पूरी होती हुई नहीं दिख रही है । मल्टीपल के बड़े नेता अपनी तलाश में अच्छे से इसलिए जुट भी नहीं पा रहे हैं, क्योंकि जितेंद्र चौहान ने अभी मैदान छोड़ा नहीं है और नेता लोग भी अभी जितेंद्र चौहान को छोड़ना नहीं चाहते हैं । मजे की बात यह भी है कि जितेंद्र चौहान के ढीलेढाले रवैये और मल्टीपल के बड़े नेताओं की असमंजसता के कारण बनी स्थिति का फायदा उठाने की कोई कोशिश तेजपाल खिल्लन और या अरविंद संगल जैसे विरोधी उम्मीदवारों की तरफ से भी होती नहीं दिख रही है । मल्टीपल के बड़े नेताओं की वैकल्पिक उम्मीदवार की तलाश में अरुण मित्तल के नाम की चर्चा चली भी थी, लेकिन अपने डिस्ट्रिक्ट में मुकेश गोयल के साथ राजनीतिक नजदीकियत रखने/'दिखाने' की उनकी कोशिशों को देखते हुए उक्त चर्चा में उनका नाम तुरंत से कट भी गया ।
जितेंद्र चौहान के ढीलेढाले रवैये ने मल्टीपल के बड़े नेताओं के साथ-साथ उनके नजदीकियों को भी हैरान किया हुआ है । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि जितेंद्र चौहान के लिए सारा मामला जब पूरी तरह से आसान बना हुआ है, तब फिर वह कोई सक्रियता नहीं दिखा कर - अपने लिए खुद ही मुश्किलें क्यों पैदा कर रहे हैं ? उनके कुछेक नजदीकियों का अनुमान है कि चूँकि सारा मामला बहुत आसान है, इसलिए जितेंद्र चौहान को लग रहा है कि उन्हें कुछ भी करने की जरूरत भला क्या है - और वह तो घर बैठे ही इंटरनेशनल डायरेक्टर बन जायेंगे । नजदीकियों को लगता है कि जितेंद्र चौहान इसलिए भी चुप बैठे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि वह यदि उम्मीदवार के रूप में सक्रिय होते हैं, तो छोटे/बड़े नेता उनकी जेब ढीली करवाने में लग जायेंगे । नजदीकियों का कहना है कि जितेंद्र चौहान इंटरनेशनल डायरेक्टर तो बनना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए अपना ज्यादा समय और पैसा खर्च नहीं करना चाहते हैं । जितेंद्र चौहान को यह भी समझ में आ रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद को लेकर मल्टीपल में राजनीतिक समीकरण के जो हालात बने हुए हैं, उनमें बड़े नेताओं के सामने उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने/बनवाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है - इसलिए वह निश्चिंत होकर बैठे हैं ।
मल्टीपल में तेजपाल खिल्लन, अरविंद संगल तथा अरुण मित्तल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के अन्य संभावित उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इन तीनों में तेजपाल खिल्लन और अरविंद संगल मल्टीपल के बड़े नेताओं की आँखों में बुरी तरह खटकते हैं; और माना/समझा जाता है कि बड़े नेता इन्हें तो किसी भी कीमत पर इंटरनेशनल डायरेक्टर नहीं बनने देंगे । इन दोनों को भी इस बात का पता है, और इसी कारण से यह दोनों अपनी अपनी उम्मीदवारी बनाये रखने के बावजूद उम्मीदवार के रूप में जरा भी सक्रिय नहीं हैं । अरुण मित्तल के जरूर मल्टीपल के बड़े नेताओं के साथ अच्छे संबंध हैं और इन्हीं अच्छे संबंधों के कारण बड़े नेताओं के बीच जब जितेंद्र चौहान के अलावा दूसरे उम्मीदवार की खोज शुरू हुई, तो अरुण मित्तल का नाम लिया/सुना गया । लेकिन अपने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अरुण मित्तल जिस तरह से मुकेश गोयल के नजदीक होते गए और 'दिख' रहे हैं, उसके चलते बड़े नेताओं ने उनके नाम पर फिर विराम लगा दिया । उल्लेखनीय है कि अपने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अरुण मित्तल ने पहले तटस्थ रहने के संकेत दिए थे, और वह दोनों खेमों के आयोजनों में नजर आ रहे थे - लेकिन फिर वह मुकेश गोयल की तरफ ही पूरी तरह शिफ्ट हो गए । मल्टीपल की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के बीच चूँकि मुकेश गोयल का खासा विरोध है, इसलिए मुकेश गोयल के साथ दिखने के चक्कर में उनके बीच अरुण मित्तल का पत्ता भी कट गया । इन स्थितियों ने जितेंद्र चौहान को इस बात के लिए और भी आश्वस्त कर दिया है कि वह बिना कुछ किए-धरे ही इंटरनेशनल डायरेक्टर बन जायेंगे । जितेंद्र चौहान के इस रवैये से मल्टीपल के बड़े नेता अपने आप को ठगा हुआ पा रहे हैं । 

Wednesday, June 27, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की तरफ से डायरेक्टर बनने की जेपी सिंह की तैयारी को रोकने की अरविंद संगल की कोशिश फेल तो हुई ही, अदालत से अरविंद संगल को कड़ी फटकार और खानी पड़ी

नई दिल्ली । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकने की कोशिश में अरविंद संगल को अदालत से जो फटकार पड़ी है, उससे एक बार फिर साबित हो गया है कि झूठ और 'ठगी' के सहारे ज्यादा दिनों तक राजनीति नहीं की जा सकती है । लायंस इंटरनेशनल की कन्वेंशन में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जेपी सिंह की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के खिलाफ बीती 31 मई को अदालत से स्टे ले कर अरविंद संगल ने जो बड़ा 'धमाका' करने का भ्रम फैलाया था, उसका नकली धुँआ 25 जून को आए एक अन्य अदालती फैसले से हवा हो गया है । इस मामले में गंभीर पहलू यह सामने आया है कि मामला सिर्फ कानूनी हार-जीत का ही नहीं है, कानूनी मामले में 'ठगी' करने का भी है । अरविंद संगल यदि सिर्फ कानूनी लड़ाई हारे होते, तो बात ज्यादा गंभीर नहीं बनती; अरविंद संगल के लिए फजीहत की बात यह हुई कि कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने जिस तरह के दाँव-पेंच इस्तेमाल किए, उसके चलते उन्हें अदालत की फटकार भी खानी पड़ी । अदालती फैसले में अरविंद संगल पर अदालत को गुमराह करने तथा अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का गंभीर आरोप लगाया गया है । स्वयं अदालत के इस आरोप से साबित होता है कि अरविंद संगल एक पहले से ही हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे, जिसमें कुछ देर के लिए उन्होंने भले ही सनसनी पैदा कर दी थी - लेकिन जिसमें अंततः उन्हें कुछ मिलना नहीं था । लगता है कि जेपी सिंह और उनके पीछे खड़ी लीडरशिप का विरोध कर रहे तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल को भी इस बात का आभास था, और इसीलिए वह अरविंद संगल से दूरी न सिर्फ बना चुके थे, बल्कि 'दिखा' भी रहे थे । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकने की लड़ाई में अरविंद संगल को लायंस लोगों के बीच 'चोट्टे' के रूप में कुख्यात एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ही सहयोग मिल पाया ।
25 जून के अदालती फैसले में अरविंद संगल को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि जिन तथ्यों और तर्कों के आधार पर जेपी सिंह को मिले मल्टीपल एंडोर्समेंट को रद्द करवाने की कार्रवाई करीब एक वर्ष पहले अदालती फैसले में असफल हो गई थी, उन्हीं तथ्यों और तर्कों के साथ करीब एक वर्ष बाद फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया और पिछली अदालती कार्रवाई को छिपाया गया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए हुए एंडोर्समेंट को लेकर खासे आरोप और हंगामे रहे थे; और इस हंगामे का कभी पर्दे के पीछे से तो कभी सामने आकर नेतृत्व करते हुए तेजपाल खिल्लन मामले को अदालत भी ले गए थे, लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि जेपी सिंह को मिले एंडोर्समेंट को अदालती कार्रवाई के जरिए रोका नहीं जा सकेगा - इसलिए जेपी सिंह के मामले को छोड़ दिया गया और मान लिया गया कि जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही जायेंगे । इस बीच लीडरशिप के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट अशोक मेहता तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी के साथ विभिन्न कारणों से तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल की नजदीकी बनी; अशोक मेहता और राजू मनवानी ने संतोष शेट्टी को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की लड़ाई के जरिये लीडरशिप को टक्कर देने की तैयारी की हुई थी । समझा जाता है कि उन्हें लगा कि जेपी सिंह को अदालती मामले में फँसा कर वह संतोष शेट्टी को कामयाबी दिलवा देंगे, और इसीलिए मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में जेपी सिंह के एंडोर्समेंट के मामले को फिर से 'जिंदा' कर दिया गया । यह काम अरविंद संगल को मोहरा बना कर किया गया । पिछले करीब एक महीने में पड़ी अदालती तारीखों में कई मौकों पर अरविंद संगल जिस तरह अनुपस्थित दिखे, उससे लोगों को आभास मिला कि यह मुकदमा अरविंद संगल को मोहरा बना कर वास्तव में 'कोई और' लड़ रहा है । यह 'कोई और' इतना होशियार भी था कि उसे पता था कि मामले में कुछ होना नहीं है और इसीलिए वह सामने भी नहीं आया ।
अरविंद संगल को मोहरा बना कर लड़ी गई इस लड़ाई में कोशिश सिर्फ यह 'दिख' रही थी कि अदालत को गुमराह करके तथा अदालती प्रक्रिया का दुरूपयोग करके जेपी सिंह का रास्ता यदि रोक लिया जाये, तो हो सकता है कि संतोष शेट्टी का 'काम' बन जाए । 25 जून के फैसले से साबित हुआ कि अदालत ने इस चालबाजी को पकड़ लिया । अदालती फैसले में अरविंद संगल को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि मामले से जुड़े सारे तथ्य पिछले करीब एक वर्ष से सभी की जानकारी में थे, और यदि अरविंद संगल को सचमुच न्याय चाहिए था तो वह पिछले एक वर्ष से क्या कर रहे थे; और वह 31 मई को ही अदालत क्यों आए, जो कि छुट्टियाँ शुरू होने से पहले का अंतिम कार्यदिवस था । इसमें भी, मामले से जुड़ी पिछली अदालती कार्रवाई और उसमें हुए फैसले को छिपाया गया । 25 जून के अदालती फैसले ने इस बात की पोल भी खोली है कि लीडरशिप से लड़ने की कोशिश करने वाले नेताओं के पास न तो पर्याप्त तथ्य हैं, और न उन तथ्यों को इस्तेमाल करने की समझ है और न लड़ाई में निरंतरता बनाए रखने का हौंसला है । इसके चलते वह अपनी कोई मजबूत टीम भी नहीं बना पाते हैं, और इस कारण जरूरत पड़ने पर मौकापरस्त व चोट्टे किस्म के लोगों पर उन्हें निर्भर होना पड़ता है । ऐसे में, लीडरशिप से बार बार उन्हें 'पिटना' पड़ता है, और लीडरशिप की मनमानियों तथा बेईमानियों के खिलाफ होने या हो सकने वाली लड़ाई कमजोर पड़ती है । 25 जून के अदालती फैसले में अरविंद संगल के लिए तो 'प्याज भी खाने और जूते भी खाने' वाला किस्सा ही चरितार्थ हुआ है ।

Friday, April 13, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में अनीता गुप्ता व अरविंद संगल के समर्थन के भरोसे अश्वनी काम्बोज द्वारा शिव कुमार चौधरी की ब्लैकमेलिंग के सामने झुकने से इंकार करने के बाद भी धीरज गोयल उम्मीदवार बने रहेंगे क्या ?

देहरादून । अश्वनी काम्बोज के मुकेश गोयल खेमे में चले जाने से अनाथ और बर्बाद हुए विरोधी खेमे के नेताओं ने धीरज गोयल को आगे करके अश्वनी काम्बोज को ब्लैकमेल करने की जो तैयारी की है, उसने विरोधी खेमे के पूर्व गवर्नर्स और अश्वनी काम्बोज के बीच आँख-मिचौली वाला खेल शुरू कर दिया है । दरअसल अश्वनी काम्बोज ने अभी तो विरोधी खेमे के पूर्व गवर्नर्स की चाल में फँसने से इंकार किया हुआ है, लेकिन विरोधी खेमे के पूर्व गवर्नर्स ने भी खम ठोकी हुई है कि अश्वनी काम्बोज बचते कैसे हैं ? विरोधी खेमे के पूर्व गवर्नर्स में हालाँकि इस बात को लेकर मतभेद हैं कि अश्वनी काम्बोज को आखिर कितना ठगा जाए । विरोधी खेमे के अधिकतर पूर्व गवर्नर्स तो चाहते हैं कि अश्वनी काम्बोज डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में उनके और उनके लोगों के लिए कमरों और खाने के साथ-साथ पीने की व्यवस्था कर दें; लेकिन लायनिज्म को धंधा और कमाई का जरिया बना लेने वाले इसी वर्ष पूर्व हुए गवर्नर शिव कुमार चौधरी इस सब के साथ-साथ कुछ और कमाई कर लेने की योजना पर काम कर रहे हैं । दरअसल इसी योजना के तहत उन्होंने धीरज गोयल का नामांकन करा दिया था । एक कुशल धंधेबाज की तरह उन्होंने पहले ही भाँप लिया था कि अश्वनी काम्बोज हो सकता है कि उनके हाथ से निकल जाएँ - अश्वनी काम्बोज या तो मैदान छोड़ जाते और या वह करते, जो उन्होंने किया । शिव कुमार चौधरी पहले वाली स्थिति में धीरज गोयल का इस्तेमाल करते हुए राजेश गुप्ता से पैसे ऐंठने का जुगाड़ लगाते, और दूसरी स्थिति में अश्वनी काम्बोज की जेब काटने की तैयारी करते । मजे की बात यह है कि धीरज गोयल की उम्मीदवारी की अभी तक कोई चर्चा नहीं थी, लेकिन अश्वनी काम्बोज के मुकेश गोयल खेमे में आते और चुनाव की संभावना खत्म होने के हालात बनते ही धीरज गोयल की उम्मीदवारी दिखाई देने लगी ।
शिव कुमार चौधरी की तरफ से अश्वनी काम्बोज से धीरज गोयल को 'बैठाने' की कीमत माँगी जा रही है । अश्वनी काम्बोज को गणित बताया/समझाया जा रहा है कि उन्होंने यदि धीरज गोयल को नहीं बैठाया, तो चुनाव में उन्हें ज्यादा पैसा भी खर्च करना पड़ेगा और भाग-दौड़ भी करना पड़ेगी; पैसा हमें दे दो और भाग-दौड़ से बच लो । अश्वनी काम्बोज के नजदीकियों के अनुसार, अश्वनी काम्बोज लेकिन शिव कुमार चौधरी की इस ब्लैकमेलिंग के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं; अश्वनी काम्बोज का कहना है कि शिव कुमार चौधरी की ब्लैकमेलिंग के सामने यदि वह अभी झुके और उनकी 'माँग' मानी तो फिर शिव कुमार चौधरी आगे भी उन्हें तरह-तरह से ब्लैकमेल करते रहेंगे । अश्वनी काम्बोज का कहना है कि शिव कुमार चौधरी यदि धीरज गोयल को चुनाव लड़ाना ही चाहते हैं तो लड़ा लें । चुनाव होने पर उन्हें ज्यादा भाग-दौड़ करने के साथ-साथ ज्यादा पैसा खर्च करना होगा, तो वह कर लेंगे - लेकिन शिव कुमार चौधरी की ब्लैकमेलिंग के सामने समर्पण नहीं करेंगे । शिव कुमार चौधरी की ब्लैकमेलिंग के सामने झुकने से इंकार करने का साहस अश्वनी काम्बोज को अनीता गुप्ता और अरविंद संगल से भी मिल रहा है ।
अनीता गुप्ता और अरविंद कंसल ने अश्वनी काम्बोज को आश्वस्त किया हुआ है कि धीरज गोयल के बस की चुनाव लड़ना है ही नहीं, और वह शिव कुमार चौधरी की बातों में आकर उम्मीदवार तो बन गए हैं - लेकिन चुनाव लड़ने की सक्रियता नहीं दिखा सकेंगे । अनीता गुप्ता और अरविंद संगल ने अश्वनी काम्बोज को समझाया है कि विरोधी खेमे के समर्थक लोगों की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में रहने/खाने की व्यवस्था यदि हो जाती है तो धीरज गोयल को शिव कुमार चौधरी का 'आदमी' होने के नाते कोई पास भी नहीं बैठायेगा । अश्वनी काम्बोज इसके लिए तैयार हैं । उनका कहना है कि एक उम्मीदवार के रूप में उन्हें जेनुइन रूप में खिलाने, पिलाने और ठहराने की जो व्यवस्था करनी है उसमें वह कोई पक्षपात नहीं करेंगे - लेकिन किसी पूर्व गवर्नर से ब्लैकमेल नहीं होंगे । अनीता गुप्ता व अरविंद संगल के समर्थन के भरोसे शिव कुमार चौधरी की ब्लैकमेलिंग के सामने अश्वनी काम्बोज ने जिस दृढ़ता के साथ झुकने से इंकार करने वाला तेवर दिखाया है, उसके चलते शिव कुमार चौधरी को धीरज गोयल के सहारे बनाई गई अपनी स्कीम फेल होती हुई ही नजर आ रही है । धीरज गोयल भी लगता है कि समझ रहे हैं कि शिव कुमार चौधरी जैसे बदनाम व्यक्ति की संगत में वह सिर्फ फजीहत का ही शिकार बनेंगे - इसलिए उम्मीद की जा रही है कि राजेश गुप्ता और अश्वनी काम्बोज की तरह वह भी जल्दी ही शिव कुमार चौधरी की 'पकड़' से छूट लेंगे और उनके सहारे अश्वनी काम्बोज को ब्लैकमेल करने की शिव कुमार चौधरी की योजना धरी की धरी ही रह जाएगी ।

Sunday, April 1, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में इंटरनेशनल डायरेक्टर ऐंडॉर्सी के मामले में अनीता गुप्ता की दुत्कार के चलते घर/घाट से बेदखल शिव कुमार चौधरी की बदतमीजीपूर्ण प्रतिक्रिया से बचने के लिए ही अश्वनी काम्बोज चुनावी मीटिंग्स करने से बच रहे हैं क्या ?

देहरादून । 'ईंधन' की कमी का शिकार बताई जा रही राजेश गुप्ता की चुनावी गाड़ी को तो उसका 'ड्राईवर' जोर-शोर से सीटी बजाता और धुआँ छोड़ता हुआ - और कईयों का धुआँ निकालता हुआ - लेकर चल पड़ा है, लेकिन अश्वनी काम्बोज की चुनावी गाड़ी अभी भी कहीं अटकी पड़ी लग रही है । अश्वनी काम्बोज के नजदीकियों का कहना/बताना हालाँकि यह है कि उनकी चुनावी गाड़ी भी चल तो रही है, लेकिन वह शोर करने से बच रही है । यह बात लोगों को लेकिन हजम नहीं हो रही है; क्योंकि वह जानते/समझते हैं कि 'चुनावी गाड़ी' के चलने में शोर का ही तो महत्त्व होता है । माना/समझा जाता है कि चुनावी गाड़ी चले भले ही धीरे धीरे, लेकिन उसे शोर जोर से करना चाहिए और धुआँ भी छोड़ना चाहिए - ताकि दूसरों का धुआँ निकले । अश्वनी काम्बोज और उनके साथी यदि चुनावी राजनीति की इतनी सामान्य-सी बात भी नहीं समझ रहे हैं, तो फिर तो उनकी चुनावी गाड़ी के पिछले वर्ष के चुनाव जैसा हाल ही होने का डर व्यक्त किया जा सकता है । राजनीति जानने और समझने वाले अश्वनी काम्बोज के समर्थकों का कहना/बताना लेकिन यह भी है कि अपने 'कुनबे' की फूट को छिपाए रखने के लिए अश्वनी काम्बोज बड़ी मीटिंग को आयोजित करने से बच रहे हैं, और वन-टू-वन अभियान पर ही लगे हुए हैं । अश्वनी काम्बोज को डर है कि जिस दिन उनकी उम्मीदवारी के प्रमोशन की मीटिंग होगी, उसी दिन उनके 'कुनबे' का झगड़ा सभी के सामने आ जायेगा । अश्वनी काम्बोज के चुनाव अभियान में तवज्जो न मिलने से निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी बुरी तरह से खफा चल रहे हैं और मौके की तलाश में हैं कि कब उन्हें अश्वनी काम्बोज की उम्मीदवारी की बागडोर सँभाले रखने वाली पूर्व गवर्नर अनीता गुप्ता से हिसाब बराबर करने का मौका मिले ।
दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर ऐंडॉर्सी की चुनावी राजनीति में अनीता गुप्ता की दुत्कार ने शिव कुमार चौधरी की हालत धोबी के उस कुत्ते जैसी कर दी है, जो न घर का रहा और न घाट का । उल्लेखनीय है कि शिव कुमार चौधरी ने बड़े जोरशोर के साथ इंटरनेशनल डायरेक्टर ऐंडॉर्सी के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की थी । उन्हें उम्मीद थी कि अश्वनी काम्बोज की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए उनके समर्थन को पक्का करने के लालच में अनीता गुप्ता उन्हें समर्थन देंगी । विरोधी खेमे की तरफ से इंटरनेशनल डायरेक्टर ऐंडॉर्सी के लिए अरविंद संगल का नाम आने की संभावना थी; लेकिन शिव कुमार चौधरी को विश्वास था कि अनीता गुप्ता जब उन्हें समर्थन दे देंगी, तब अरविंद संगल अपना नाम आगे लाने की हिम्मत नहीं करेंगे । यह विश्वास शिव कुमार चौधरी को इसलिए भी था, क्योंकि उन्हें अनीता गुप्ता और अरविंद संगल के बीच छत्तीस के रिश्ते का पता था, और वह मान कर चल रहे थे कि अरविंद संगल का समर्थन तो अनीता गुप्ता हरगिज नहीं करेंगी । लेकिन अनीता गुप्ता ने जब उन्हें दुत्कार कर अरविंद संगल को समर्थन देने का फैसला सुनाया, तो शिव कुमार चौधरी 'घर' और 'घाट' के बीच कूँ कूँ करते सुनाई/दिखाई पड़े - और इंटरनेशनल डायरेक्टर ऐंडॉर्सी के चुनाव में नामांकन करने तक की हिम्मत नहीं दिखा सके । जोरशोर से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करने वाले शिव कुमार चौधरी को अपनी उम्मीदवारी की बात से जिस तरह पीछे हटने और मुँह छिपाने के लिए मजबूर होना पड़ा, उससे डिस्ट्रिक्ट में उनकी राजनीतिक हैसियत की पोल भी खुल गई - और इस पोल खुलने के चलते हुई फजीहत के लिए शिव कुमार चौधरी ने अनीता गुप्ता को जिम्मेदार माना/ठहराया ।
दरअसल, अनीता गुप्ता के फैसले से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यही संदेश गया और साबित हुआ कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में अश्वनी काम्बोज की उम्मीदवारी के लिए वह शिव कुमार चौधरी की बजाये अरविंद संगल के समर्थन को ज्यादा जरूरी मानती और अहमियत देती हैं । ऐसी फजीहत तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में शायद ही कभी किसी की हुई होगी । इसी समय में लोगों को यह भी देखने को मिल रहा है कि राजेश गुप्ता और अश्वनी काम्बोज के रूप में जिन लोगों को शिव कुमार चौधरी ने गवर्नर बनने का चस्का लगाया, वह दोनों ही गवर्नर बनने की दौड़ में शामिल रहते हुए शिव कुमार चौधरी की छाया से भी बच रहे हैं । शिव कुमार चौधरी को सबसे बड़ा झटका तो अश्वनी काम्बोज की तरफ से लग रहा है । अश्वनी काम्बोज यूँ तो उसी खेमे के उम्मीदवार हैं, शिव कुमार चौधरी जिस खेमे के नेता 'बनने' की कोशिश कर रहे हैं - लेकिन फिर भी अश्वनी काम्बोज उनसे बचने और दूर रहने की कोशिश कर रहे हैं । मजे की बात यह देखने में आ रही है कि शिव कुमार चौधरी तो जबर्दस्ती अश्वनी काम्बोज के गले लगने/पड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन अश्वनी काम्बोज उनसे बचने की कोशिश करते हैं । राजेश गुप्ता की तरह, अपने अनुभव से अश्वनी काम्बोज ने भी समझ लिया है कि शिव कुमार चौधरी के साथ रहे तो जीवन में कभी गवर्नर नहीं बन सकेंगे । अनीता गुप्ता ने भी उनसे कहा हुआ है कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट के रंगा-बिल्ला से बच कर रहना है । दरअसल, अश्वनी काम्बोज और अनीता गुप्ता जान/समझ रहे हैं कि रंगा-बिल्ला के पास जो छह/आठ वोट हैं भी, वह अश्वनी काम्बोज के पक्ष में पड़ने के लिए मजबूर ही हैं - इसलिए उन्हें तवज्जो देने की जरूरत ही नहीं है । उन्हें हालाँकि यह डर भी है कि चुनावी मीटिंग्स में शिव कुमार चौधरी को यदि तवज्जो नहीं दी गई, तो वह अपने बदतमीजीपूर्ण व्यवहार से मीटिंग्स खराब भी कर सकता है । अनीता गुप्ता और अश्वनी काम्बोज जान/समझ रहे हैं कि शिव कुमार चौधरी अपनी घटिया सोच और व्यवहार से कुछ अच्छा तो नहीं ही कर सकता है, लेकिन खराब जरूर कर सकता है । वास्तव में, इसीलिए अश्वनी काम्बोज की उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मीटिंग्स करने से अभी बचा जा रहा है - क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनके अपने खेमे के नेताओं के झगड़े लोगों के सामने आ जायेंगे ।

Friday, January 22, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में अरविंद संगल की पत्नी को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का ऑफर देकर अरविंद संगल को अपनी तरफ करने का शिवकुमार चौधरी का दाँव अभी तो सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है

गाजियाबाद । अरविंद संगल की पत्नी को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का लालच देकर शिवकुमार चौधरी ने अरविंद संगल को अपनी तरफ करने का जो दाँव चला है, उसने उन महिलाओं को खासा भड़का दिया है - शिवकुमार चौधरी जिन्हें पिछले कुछ समय से डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने की बात कह/कर रहे थे । इसी से भेद खुला कि शिवकुमार चौधरी तो पिछले कुछ समय से तीन-चार महिलाओं को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का झाँसा दे रहे थे । यह भेद खुलने से अरविंद संगल भी सावधान हो गए हैं, और उनके सावधान होने से शिवकुमार चौधरी का गेम-प्लान भी बिगड़ गया है । अरविंद संगल के रवैये ने दरअसल शिवकुमार चौधरी के 'मुकेश गोयल विरोधी मंच' को शुरू से ही झटका दिया हुआ है । शिवकुमार चौधरी ने उम्मीद की थी कि वह जैसे ही मुकेश गोयल विरोधी मंच की घोषणा करेंगे, वैसे ही उन्हें पहला समर्थन अरविंद संगल का मिलेगा - अरविंद संगल ने लेकिन उनके अभियान के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । अरविंद संगल के नजदीकियों के अनुसार इसके दो कारण रहे : एक यह कि शिवकुमार चौधरी ने जिस गुपचुप तरीके से रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया, उससे अरविंद संगल को लगा कि शिवकुमार चौधरी ने अपने कुछेक स्वार्थों की पूर्ति के लिए रेखा गुप्ता को मोहरा बनाया है; दूसरे, उनका आकलन है कि रेखा गुप्ता चुनाव-अभियान के प्रेशर को झेल नहीं पायेंगी और अंततः चुनावी दौड़ से बाहर ही होंगी । इसके अलावा, अरविंद संगल इस बात को लेकर शिवकुमार चौधरी से खफा भी थे कि अपने गवर्नर-काल के तमाम महत्वपूर्ण पद वह मुकेश गोयल के कहने से पहले ही बाँट चुके हैं, तथा उसके पैसे भी बसूल कर चुके हैं; और इस बारे में उन्हें पूछा तक नहीं । शिवकुमार चौधरी जिस तरह मुकेश गोयल के प्रति अपना अवसरवादी रवैया दिखाते रहे हैं - कभी उन्हें गाली देने लगते हैं, और कभी उनकी खुशामद में लगे नजर आते हैं; उससे भी अरविंद संगल ने शिवकुमार चौधरी को भरोसा करने लायक नहीं समझा ।
अरविंद संगल का भरोसा जीतने के लिए ही शिवकुमार चौधरी ने अरविंद संगल की पत्नी को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का ऑफर दिया । शिवकुमार चौधरी की बदकिस्मती रही कि अपने नजदीकियों के बीच अभी वह यह दावा कर ही रहे थे कि अपने इस ऑफर के जरिए वह अरविंद संगल को अपने साथ ले आयेंगे कि तभी यह भेद खुल गया कि डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन का ऑफर तो वह पहले ही तीन-चार महिलाओं को दे चुके हैं । यह भेद खुलने के बाद अरविंद संगल की तरफ से शिवकुमार चौधरी को कोई उत्साहित करने वाला जबाव नहीं मिला, और शिवकुमार चौधरी के लिए भी यह मुश्किल हुआ कि अरविंद संगल के सामने वह अपने ऑफर को विश्वसनीय रूप दे सकें । डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन के मामले में ही नहीं, बल्कि अन्य कई महत्वपूर्ण पदों के मामले में शिवकुमार चौधरी के सामने यही समस्या है । अगले लायन वर्ष के अपने गवर्नर-काल के अधिकतर महत्वपूर्ण पद वह पहले ही 'बेच' चुके हैं - जिन्हें वह दोबारा दोबारा 'बेचने' के प्रयास कर रहे हैं । लायन राजनीति में पद 'बेच' कर वोट खरीदने का फार्मूला बड़ा पुराना फार्मूला है - शिवकुमार चौधरी ने भी इस फार्मूले को अपनाया; उनके सामने समस्या लेकिन यह पैदा हुई कि पदों का सौदा तो वह पहले ही कर चुके हैं । लोगों के बीच चर्चा है कि वह चार-पाँच लोगों को तो वह कैबिनेट सेक्रेटरी ही बना चुके हैं । उल्लेखनीय है कि लायंस इंटरनेशनल सिर्फ एक कैबिनेट सेक्रेटरी को ही मान्यता देता है; कुछेक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर लेकिन पैसा उगाहने के लिए एक से अधिक कैबिनेट सेक्रेटरी बना लेते/देते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'जानते' हैं कि लोग डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में अपना नाम/फोटो छपा देखने के लिए इतने उत्साहित होते हैं कि उन्हें 'शिकारपुर का' बनाना बड़ा आसान होता है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी धाक जमाने के लिए शिवकुमार चौधरी ने भी यही आसान रास्ता चुन लिया है ।
इस आसान रास्ते को अपनाने के मामले में शिवकुमार चौधरी के सामने किंतु बड़ी मुसीबत यह आ रही है कि डिस्ट्रिक्ट में लोग यह जानते हैं कि वह अपने गवर्नर-काल के अधिकतर महत्वपूर्ण पद 'बेच' चुके हैं, और पैसा भी बसूल कर चुके हैं - लिहाजा अब लोग आसानी से उनके झाँसे में नहीं आ रहे हैं । इससे भी बड़ी समस्या है कि अब जिन लोगों को जो भी और जैसे भी पद मिल भी रहे हैं, वह पद के बदले में माँगे जा रहे पैसे देने से बचने की कोशिश कर रहे हैं । लोगों का कहना है कि शिवकुमार चौधरी उनका वोट पाने/लेने के लिए उन्हें पद दे रहे हैं, इसलिए पैसे की उम्मीद क्यों कर रहे हैं ? शिवकुमार चौधरी पैसा छोड़ने को भी तैयार नहीं दिख रहे हैं । इस चक्कर में उन्हें फिलहाल पद लेने वाले लोग मिल नहीं पा रहे हैं । हालाँकि वह आश्वस्त हैं कि डिस्ट्रिक्ट में 'शिकारपुर के' लोगों की कमी नहीं है, उन्हें ऐसे लोग अवश्य ही मिलेंगे जो पद के बदले में पैसा भी देंगे और वोट भी देंगे । यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि शिवकुमार चौधरी के हाथों कौन कौन 'शिकारपुर का' बनता है ?