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Sunday, August 23, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए हुए एंडोर्समेंट को लेकर उड़ी एक 'फर्जी' खबर पर जितेंद्र चौहान तथा क्षितिज शर्मा द्वारा दिखाई गई बौखलाहट ने एंडोर्समेंट को लोगों के बीच संदेहपूर्ण तथा जितेंद्र चौहान को फजीहत का शिकार बनाया 

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन क्षितिज शर्मा की ओवर-स्मार्ट बनने/दिखने तथा गैरजरूरी रूप से सक्रियता दिखाने की कोशिश ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के मल्टीपल एंडॉर्सी जितेंद्र चौहान की मल्टीपल के लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि देश के लायन नेताओं और पदाधिकारियों के बीच खासी फजीहत कर/करवा दी है । मामला लायंस इंटरनेशनल द्वारा जितेंद्र चौहान को एंडॉर्सी रजिस्टर करने से इंकार करने की तथाकथित खबर को लेकर था । जब एक फर्जी वॉट्सऐप एकाउंट से यह खबर लोगों तक पहुँची, तब अधिकतर लोगों ने इसे झूठी खबर के रूप में ही लिया/पहचाना, और इस पर कोई ध्यान नहीं दिया । हाँ, वॉट्सऐप पर समय बिताने वाले कुछ ठलुए किस्म के लोगों ने इसे इधर-उधर फॉरवर्ड जरूर किया, लेकिन यह खबर लोगों के बीच कोई इश्यू नहीं बन पाई । किंतु मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन क्षितिज शर्मा ने जिस तत्परता के साथ उक्त खबर का संज्ञान लिया, और इसका 'आधिकारिक खंडन' किया - उसके चलते उक्त खबर अचानक से 'महत्त्वपूर्ण' हो उठी और गंभीर चर्चा के केन्द्र में आ गई । जो लोग उक्त खबर को फर्जी मान रहे थे, क्षितिज शर्मा के 'आधिकारिक खंडन' के बाद उन्हें भी लगने लगा कि दाल में जरूर कुछ काला है । फिर तो हर किसी को लगने लगा कि जितेंद्र चौहान के एंडॉर्सी 'होने' में जरूर कोई लफड़ा है - अन्यथा मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन को एक लंबी चिट्ठी लिखने और खबर का 'आधिकारिक खंडन' करने की कोई जरूरत नहीं थी ।
कई लोगों का यह भी कहना रहा कि क्षितिज शर्मा को उक्त खबर का 'आधिकारिक खंडन' करने का कोई अधिकार ही नहीं है - खबर में चूँकि लायंस इंटरनेशनल का हवाला दिया गया है, इसलिए 'आधिकारिक खंडन' करने का अधिकार तो लायंस इंटरनेशनल कार्यालय में बैठे पदाधिकारियों का है । क्षितिज शर्मा यह कर सकते थे कि उन पदाधिकारियों से खंडन लेकर उसे प्रसारित करते और या ऐसा कोई डॉक्यूमेंट प्रस्तुत करते, जिससे साबित होता कि लायंस इंटरनेशनल ने जितेंद्र चौहान को मल्टीपल एंडॉर्सी रजिस्टर कर लिया है । ऐसा न करके, और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर क्षितिज शर्मा ने जो किया उससे वैसा ही किस्सा बना जिसमें पूछा गया कि 'आप कौन हैं', तो जबाव मिला 'मैं मिस्टर खामखाँ हूँ ।' सिर्फ इतना ही नहीं, क्षितिज शर्मा ने जिस अंदाज में संदेश लिखा उसमें उनकी खीझ, उनका चिड़चिड़ापन और उनकी बौखलाहट भी 'नजर' आई । अपनी खीझ, चिड़चिड़ाहट तथा बौखलाहट में क्षितिज शर्मा लगता है कि इस बात को पूरी तरह से भूले ही रहे कि वह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जैसे जिम्मेदार पद पर हैं, और आधिकारिक रूप से उनके लिखे/कहे में तथ्य व गरिमा होना ही चाहिए और उन्हें 'टू द प्वाइंट' बात लिखना/कहना चाहिए । लोगों का यह भी मानना और कहना है कि क्षितिज शर्मा को एक फर्जी अकाउंट से आने वाली झूठी खबर पर रिएक्ट ही नहीं करना चाहिए था, और उसे इग्नोर करना चाहिए था । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में क्षितिज शर्मा ने लेकिन रिएक्ट करके उक्त खबर को न सिर्फ महत्त्वपूर्ण बना दिया बल्कि एक नॉन-इश्यू को इश्यू बना दिया और जितेंद्र चौहान की खासी फजीहत करवा दी है ।
मजे की बात यह है, जैसा कि मल्टीपल में क्षितिज शर्मा के नजदीकियों का कहना है, कि क्षितिज शर्मा पर उक्त खबर का 'आधिकारिक खंडन' करने के लिए जितेंद्र चौहान ने ही दबाव बनाया था । कुछेक लोगों का कहना है कि उक्त फर्जी खबर के प्रसारित होने के बाद जितेंद्र चौहान ही बुरी तरह बौखला गए थे, और कई लोगों को फोन कर बैठे थे । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मल्टीपल एंडोर्समेंट को लेकर हुए चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी रहे दीपक तलवार के नजदीकियों का कहना/बताना है कि जितेंद्र चौहान ने बौखलाहट में दीपक तलवार को भी यह पूछते हुए फोन किया कि उक्त खबर उन्होंने तो नहीं दी है । जितेंद्र चौहान की इस फोनबाजी ने तथा उसके बाद सामने आए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में क्षितिज शर्मा के 'आधिकारिक खंडन' ने एक बेबात की बात को लोगों के बीच मुद्दा बना दिया, और अब तो जितेंद्र चौहान के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लगने लगा है कि जितेंद्र चौहान के मल्टीपल एंडोर्समेंट में अवश्य ही कुछ लोचा है - जिसके चलते जितेंद्र चौहान उक्त खबर के सामने आने के बाद बुरी तरह से बौखला उठे हैं । जितेंद्र चौहान के नजदीकियों का भी मानना और कहना है कि उक्त खबर ने नहीं, बल्कि खबर पर जितेंद्र चौहान तथा क्षितिज शर्मा की तरफ से हुई 'कार्रवाई' ने जितेंद्र चौहान के एंडोर्समेंट को मल्टीपल के लोगों के बीच न सिर्फ संदेहपूर्ण बना दिया है, बल्कि जितेंद्र चौहान को फजीहत का शिकार भी बना दिया है ।  

Wednesday, June 27, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की तरफ से डायरेक्टर बनने की जेपी सिंह की तैयारी को रोकने की अरविंद संगल की कोशिश फेल तो हुई ही, अदालत से अरविंद संगल को कड़ी फटकार और खानी पड़ी

नई दिल्ली । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकने की कोशिश में अरविंद संगल को अदालत से जो फटकार पड़ी है, उससे एक बार फिर साबित हो गया है कि झूठ और 'ठगी' के सहारे ज्यादा दिनों तक राजनीति नहीं की जा सकती है । लायंस इंटरनेशनल की कन्वेंशन में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जेपी सिंह की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के खिलाफ बीती 31 मई को अदालत से स्टे ले कर अरविंद संगल ने जो बड़ा 'धमाका' करने का भ्रम फैलाया था, उसका नकली धुँआ 25 जून को आए एक अन्य अदालती फैसले से हवा हो गया है । इस मामले में गंभीर पहलू यह सामने आया है कि मामला सिर्फ कानूनी हार-जीत का ही नहीं है, कानूनी मामले में 'ठगी' करने का भी है । अरविंद संगल यदि सिर्फ कानूनी लड़ाई हारे होते, तो बात ज्यादा गंभीर नहीं बनती; अरविंद संगल के लिए फजीहत की बात यह हुई कि कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने जिस तरह के दाँव-पेंच इस्तेमाल किए, उसके चलते उन्हें अदालत की फटकार भी खानी पड़ी । अदालती फैसले में अरविंद संगल पर अदालत को गुमराह करने तथा अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का गंभीर आरोप लगाया गया है । स्वयं अदालत के इस आरोप से साबित होता है कि अरविंद संगल एक पहले से ही हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे, जिसमें कुछ देर के लिए उन्होंने भले ही सनसनी पैदा कर दी थी - लेकिन जिसमें अंततः उन्हें कुछ मिलना नहीं था । लगता है कि जेपी सिंह और उनके पीछे खड़ी लीडरशिप का विरोध कर रहे तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल को भी इस बात का आभास था, और इसीलिए वह अरविंद संगल से दूरी न सिर्फ बना चुके थे, बल्कि 'दिखा' भी रहे थे । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकने की लड़ाई में अरविंद संगल को लायंस लोगों के बीच 'चोट्टे' के रूप में कुख्यात एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ही सहयोग मिल पाया ।
25 जून के अदालती फैसले में अरविंद संगल को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि जिन तथ्यों और तर्कों के आधार पर जेपी सिंह को मिले मल्टीपल एंडोर्समेंट को रद्द करवाने की कार्रवाई करीब एक वर्ष पहले अदालती फैसले में असफल हो गई थी, उन्हीं तथ्यों और तर्कों के साथ करीब एक वर्ष बाद फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया और पिछली अदालती कार्रवाई को छिपाया गया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए हुए एंडोर्समेंट को लेकर खासे आरोप और हंगामे रहे थे; और इस हंगामे का कभी पर्दे के पीछे से तो कभी सामने आकर नेतृत्व करते हुए तेजपाल खिल्लन मामले को अदालत भी ले गए थे, लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि जेपी सिंह को मिले एंडोर्समेंट को अदालती कार्रवाई के जरिए रोका नहीं जा सकेगा - इसलिए जेपी सिंह के मामले को छोड़ दिया गया और मान लिया गया कि जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही जायेंगे । इस बीच लीडरशिप के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट अशोक मेहता तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी के साथ विभिन्न कारणों से तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल की नजदीकी बनी; अशोक मेहता और राजू मनवानी ने संतोष शेट्टी को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की लड़ाई के जरिये लीडरशिप को टक्कर देने की तैयारी की हुई थी । समझा जाता है कि उन्हें लगा कि जेपी सिंह को अदालती मामले में फँसा कर वह संतोष शेट्टी को कामयाबी दिलवा देंगे, और इसीलिए मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में जेपी सिंह के एंडोर्समेंट के मामले को फिर से 'जिंदा' कर दिया गया । यह काम अरविंद संगल को मोहरा बना कर किया गया । पिछले करीब एक महीने में पड़ी अदालती तारीखों में कई मौकों पर अरविंद संगल जिस तरह अनुपस्थित दिखे, उससे लोगों को आभास मिला कि यह मुकदमा अरविंद संगल को मोहरा बना कर वास्तव में 'कोई और' लड़ रहा है । यह 'कोई और' इतना होशियार भी था कि उसे पता था कि मामले में कुछ होना नहीं है और इसीलिए वह सामने भी नहीं आया ।
अरविंद संगल को मोहरा बना कर लड़ी गई इस लड़ाई में कोशिश सिर्फ यह 'दिख' रही थी कि अदालत को गुमराह करके तथा अदालती प्रक्रिया का दुरूपयोग करके जेपी सिंह का रास्ता यदि रोक लिया जाये, तो हो सकता है कि संतोष शेट्टी का 'काम' बन जाए । 25 जून के फैसले से साबित हुआ कि अदालत ने इस चालबाजी को पकड़ लिया । अदालती फैसले में अरविंद संगल को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि मामले से जुड़े सारे तथ्य पिछले करीब एक वर्ष से सभी की जानकारी में थे, और यदि अरविंद संगल को सचमुच न्याय चाहिए था तो वह पिछले एक वर्ष से क्या कर रहे थे; और वह 31 मई को ही अदालत क्यों आए, जो कि छुट्टियाँ शुरू होने से पहले का अंतिम कार्यदिवस था । इसमें भी, मामले से जुड़ी पिछली अदालती कार्रवाई और उसमें हुए फैसले को छिपाया गया । 25 जून के अदालती फैसले ने इस बात की पोल भी खोली है कि लीडरशिप से लड़ने की कोशिश करने वाले नेताओं के पास न तो पर्याप्त तथ्य हैं, और न उन तथ्यों को इस्तेमाल करने की समझ है और न लड़ाई में निरंतरता बनाए रखने का हौंसला है । इसके चलते वह अपनी कोई मजबूत टीम भी नहीं बना पाते हैं, और इस कारण जरूरत पड़ने पर मौकापरस्त व चोट्टे किस्म के लोगों पर उन्हें निर्भर होना पड़ता है । ऐसे में, लीडरशिप से बार बार उन्हें 'पिटना' पड़ता है, और लीडरशिप की मनमानियों तथा बेईमानियों के खिलाफ होने या हो सकने वाली लड़ाई कमजोर पड़ती है । 25 जून के अदालती फैसले में अरविंद संगल के लिए तो 'प्याज भी खाने और जूते भी खाने' वाला किस्सा ही चरितार्थ हुआ है ।

Sunday, May 28, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की राजनीति में अपनी हार को जीत में बदलने की तेजपाल खिल्लन की हंगामाई 'तरकीब' में नरेश अग्रवाल को गालियाँ सुनने के साथ-साथ हाथापाई का भी शिकार होना पड़ा

जीरकपुर । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी संभालने जा रहे नरेश अग्रवाल अपने ही मल्टीपल - मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की वार्षिक कॉन्फ्रेंस में लोगों के गुस्से का इस हद तक शिकार हो गए कि उन्हें लोगों की गालियाँ सुनने के साथ-साथ उनकी धक्का-मुक्की का भी निशाना बनना पड़ा । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछेक लोगों ने नरेश अग्रवाल के साथ धक्का-मुक्की करते हुए उन्हें 'अपनी तरफ' खींचने की कोशिश की, जिसके चलते वह लात-घूँसों का भी शिकार हो गए । प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अन्य कुछेक लोग बीच-बचाव न करते और नरेश अग्रवाल को सुरक्षा घेरे में न लेते, तो उन्हें गहरी चोटें आ सकती थीं । गौरतलब है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होने के नाते रहने वाली व्यस्तता के कारण अगले लायन वर्ष में नरेश अग्रवाल के लिए अपने मल्टीपल के लोगों से मिलना-जुलना संभव नहीं हो सकेगा, इसलिए इस बार की मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में उनकी उपस्थिति का खास महत्त्व था । उनकी उपस्थिति को संभव करने के लिए ही कॉन्फ्रेंस की तारीखें उनकी उपलब्धतता को ध्यान में रख कर तय की गईं थीं । मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में नरेश अग्रवाल की उपस्थिति को लेकर मल्टीपल के लोग भी खासे उत्साहित थे - और खुद नरेश अग्रवाल भी खासे जोश में थे; इस उत्साह और जोश के कारण इस बार की मल्टीपल कॉन्फ्रेंस के ऐतिहासिक होने का अनुमान लगाया जा रहा था । लेकिन मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में जो नजारा बना, और नरेश अग्रवाल को लोगों के गाली-गलौच भरे हिंसक गुस्से का जिस तरह शिकार होना पड़ा - उसके चलते इस बार की मल्टीपल कॉन्फ्रेंस ऐतिहासिक तो हो गई, लेकिन यह इतिहास का यह अध्याय लायंस इंटरनेशनल के इतिहास  कलंक की तरह ही याद किया जायेगा । लायंस इंटरनेशनल के अभी तक के सौ वर्षों के इतिहास में इससे पहले शायद ही किसी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट को अपने ही मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में ऐसे अपमानजनक हिंसक हादसे का शिकार होना पड़ा हो ।
नरेश अग्रवाल के साथ उनके अपने ही मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में जो बदतमीजी हुई, उसके लिए तमाम लोग नरेश अग्रवाल को ही जिम्मेदार कह/बता रहे हैं । कॉन्फ्रेंस में हुए झगड़े-झंझट के लिए फौरी तौर पर भले ही मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी विवाद को कारण के रूप में देखा/बताया जा रहा हो, लेकिन हालात को इस स्थिति तक पहुँचाने में पूरे वर्ष की घटनाओं की भूमिका रही है । वास्तव में यह पूरा वर्ष ही मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में खासा उथल-पुथल भरा रहा - एक लीडर के रूप में नरेश अग्रवाल जिसमें हस्तक्षेप करने और हालात को बिगड़ने से बचाने में कतई असफल रहे; सच बल्कि यह है कि उन्होंने हस्तक्षेप करने की जरूरत ही नहीं समझी । दो-तीन डिस्ट्रिक्ट में चोट्टे किस्म के लोग गवर्नर बने, जिनका सारा ध्यान पैसे बनाने पर रहा और जिन्होंने ड्यूज तक हड़प लेने की हरकतें कीं, और लायंस इंटरनेशनल उन्हें बस चिट्ठियाँ लिखता रह गया । ड्यूज हड़पने की उनकी कार्यवाईयाँ मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव को प्रभावित करने के हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करने की बातें खुलेआम होने लगीं - इंटरनेशनल पदाधिकारी के रूप में नरेश अग्रवाल तब भी आँखें बंद किए बैठे रहे । हद की बात यह रही कि मल्टीपल की चुनावी राजनीति में नरेश अग्रवाल एक पक्ष की तरफ झुके हुए तो नजर आए - लेकिन उस एक पक्ष के खिलाफ किस किस तरह की बातें हो रही हैं और किस किस तरह के गठजोड़ बन रहे हैं, इसे लेकर वह पूरी तरह लापरवाह बने रहे । लोगों का मानना और कहना है कि मल्टीपल की चुनावी राजनीति में नरेश अग्रवाल जो कुछ भी करना/पाना चाहते थे, उसके लिए वह यदि थोड़ा पहले से सक्रिय होते - और मल्टीपल में बन रहे हिंसक माहौल को भाँपते हुए पहले से ही कदम उठा लेते, तो वह मल्टीपल में आराम से अपने पसंदीदा चुनावी नतीजे भी पा लेते और फजीहत का शिकार भी न बनते ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद को लेकर तेजपाल खिल्लन ने जो और जिस तरह की राजनीति की, उसे देख कर बहुत पहले से ही लोगों की समझ में आ गया था कि वह वास्तव में एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, और अपनी निश्चित हार को छिपाने के लिए मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में फसाद खड़ा करने की तैयारी कर रहे हैं । नरेश अग्रवाल और मल्टीपल काउंसिल के पदाधिकारियों को शायद यह आभास तो था कि कॉन्फ्रेंस में हंगामा तो होगा, लेकिन उन्हें भी यह उम्मीद नहीं थी कि कॉन्फ्रेंस में लायंस के भेष में आए कुछ लोग सड़कछाप लफंगों की तरह व्यवहार करेंगे - और नरेश अग्रवाल सहित मल्टीपल के तथा इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों तक से बदतमीजी करेंगे । तेजपाल खिल्लन के लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव प्रतिष्ठा का चुनाव बन गया था, लेकिन वहाँ चूँकि उनके हाथ कुछ लगने वाला नहीं था - इसलिए उन्होंने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव की आड़ में राजनीति खेलने की तैयारी की, और इस तैयारी में मल्टीपल के उन्हीं चोट्टे गवर्नर्स के साथ गठजोड़ बनाया, जो ड्यूज न जमा करा कर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव को प्रभावित करने की बात कर रहे थे । अलग अलग कारणों से लीडरशिप से नाराज होने वाले लोगों को जोड़ कर तेजपाल खिल्लन ने कॉन्फ्रेंस में हंगामा कराने के जरिए लीडरशिप को ब्लैकमेल करने की जो तैयारी की, उसका अनुमान लगाने में नरेश अग्रवाल तथा लीडरशिप के अन्य लोग पूरी तरह विफल रहे और अपनी फजीहत करा बैठे ।

Wednesday, May 24, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव से वीएस कुकरेजा ने जब अपने आप को बाहर मान/समझ लिया है, तब भी तेजपाल खिल्लन फर्जी तौर-तरीके से उनकी उम्मीदवारी के बारे में झूठ फैलाने के काम में आखिर क्यों लगे हुए हैं ?

नई दिल्ली । वीएस कुकरेजा को इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडॉर्सी चुनवाने/बनवाने की जिम्मेदारी लेकर तेजपाल खिल्लन ऐसी मुसीबत फँस गए हैं कि उनसे न निगलते बन रहा है, और न उगलते - इस मामले में मल्टीपल के अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स जिस तरह जेपी सिंह के प्रति समर्थन व्यक्त कर रहे हैं, उससे जेपी सिंह के सामने तेजपाल खिल्लन कच्चे खिलाड़ी भी साबित हो रहे हैं । तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों के अनुसार, तेजपाल खिल्लन भी महसूस कर रहे हैं कि वीएस कुकरेजा के चक्कर में उन्होंने नाहक ही मल्टीपल में अपने लिए फजीहत का मौका बनवा लिया है । इन दोनों के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के लोगों का हालाँकि कहना है कि इस मामले में तेजपाल खिल्लन दरअसल अपने ही जाल में फँस गए हैं; तेजपाल खिल्लन अपनी राजनीति चलाने/बढ़ाने/दिखाने के लिए एक 'मुर्गा' खोजते हैं - इसी तर्ज पर उन्होंने वीएस कुकरेजा में हवा भरी, लेकिन वीएस कुकरेजा कुछ अपनी बेवकूफी में और कुछ अपने सयानेपन में उनका 'मुर्गा' नहीं बन पाए; और इस कारण तेजपाल खिल्लन के लिए चिकेन की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया है । इसका नतीजा है कि मल्टीपल के दस में से जिन तीन डिस्ट्रिक्ट्स में तेजपाल खिल्लन ने एक एक ग्रुप का - यानि आधे/आधे लोगों का अलग अलग कारणों से जो समर्थन जुटाया भी है, उस 'समर्थन' को मौके पर पहुँचाने को लेकर ही उनके पसीने छूट रहे हैं ।
हद की बात तो यह है कि तेजपाल खिल्लन और वीएस कुकरेजा के अपने डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन से ज्यादा लोग मल्टीपल कन्वेंशन में जाने को लेकर उत्साहित नहीं दिख रहे हैं । इस तरह के मामलों में लोगों को उत्साहित करने के लिए दरअसल 'रिवाज' यह बना हुआ है कि लोगों को बताया जाये कि उनका रजिस्ट्रेशन करवा लिया गया है, और उनके ठहरने के लिए कमरे बुक हो चुके हैं । तेजपाल खिल्लन और वीएस कुकरेजा की तरफ से चूँकि ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है, इसलिए अलग अलग कारणों से उनके समर्थन में बने दिख रहे लोग भी निराश हैं । दिलचस्प नजारा यह है कि इनके अपने डिस्ट्रिक्ट से ज्यादा उछल-कूद तो डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू और डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के एक एक खेमे के गवर्नर्स दिखा रहे हैं - लेकिन उनके बीच भी इस बात को लेकर निराशा है कि तेजपाल खिल्लन और वीएस कुकरेजा की तरफ से कोई 'ऑफर' ही नहीं मिल रहा है; कुछेक लोगों ने तो इनसे शिकायत भी की है कि 'रिवाज' के अनुसार यदि ऑफर नहीं दोगे, तो लोग 'वोट, सपोर्ट और इलेक्ट' करवाने क्यों आयेंगे ? वीएस कुकरेजा का कहना है कि वह जब उम्मीदवार ही नहीं रह गए हैं, तो फिर उम्मीदवार द्वारा निभाया जाने वाला 'रिवाज' वह भला क्यों पूरा करें ? उनकी बात भी ठीक है, और उसमें दम है ।
लेकिन इस ठीक बात के चक्कर में डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन व डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू और डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के उन गवर्नर्स ने अपनी स्थिति हास्यास्पद बना ली है, जो सोशल मीडिया में वीएस कुकरेजा के लिए 'वोट-सपोर्ट-इलेक्ट' के पोस्टर लहरा रहे हैं । यह बेचारे पोस्टर तो लहरा रहे हैं, किंतु इनके पास इस बात का जबाव नहीं है कि वीएस कुकरेजा का जब नामांकन ही रिजेक्ट हो गया है, जिसके चलते वह उम्मीदवार ही नहीं रह गए हैं - तो उन्हें वोट कैसे दे पाओगे, कैसे उन्हें इलेक्ट करोगे ? जाहिर है कि वीएस कुकरेजा के समर्थन के नाम पर एक निर्लज्ज किस्म की मूर्खता का प्रदर्शन हो रहा है । कुछेक गवर्नर्स का गहरी नाराजगी के साथ हालाँकि कहना यह भी है कि उनके नाम से वीएस कुकरेजा को 'वोट-सपोर्ट-इलेक्ट' वाले पोस्टर उन्होंने नहीं निकाले हैं, बल्कि उनके नाम से किसी ने फर्जीवाड़ा किया है ।
इस फर्जीवाड़े के लिए तेजपाल खिल्लन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । लोगों का कहना है कि तेजपाल खिल्लन दावा कर रहे हैं कि वीएस कुकरेजा अभी भी उम्मीदवार हैं और उनकी उम्मीदवारी को रद्द नहीं किया जा सकता है । वह तर्क दे रहे हैं कि दीपक तलवार की चेयरमैनी वाली नोमीनेशन कमेटी का गठन ही गैरकानूनी है, और इस कमेटी को नामांकन रद्द करने का अधिकार ही नहीं है । तेजपाल खिल्लन ने कोशिश की थी कि इस कमेटी के को-चेयरमैन राजीव मित्तल कमेटी के गैरकानूनी होने का वास्ता देकर कमेटी और अपने पद से इस्तीफा दे दें । राजीव मित्तल ने लेकिन उनकी बात मानने से साफ इंकार कर दिया । राजीव मित्तल, तेजपाल खिल्लन के डिस्ट्रिक्ट के ही पूर्व गवर्नर हैं; इसलिए उनके इंकार ने तेजपाल खिल्लन की और फजीहत कर दी है । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जेसी वर्मा भी तेजपाल खिल्लन के डिस्ट्रिक्ट के ही हैं, लेकिन उनकी तरफ से भी तेजपाल खिल्लन की फजीहत करने/कराने का कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट में तेजपाल खिल्लन ने राजीव मित्तल और जेसी वर्मा की ऐसीतैसी कर रखी है, सो इन्हें अब तेजपाल खिल्लन से बदला लेने का मौका मिल रहा है - और यह कोई मौका छोड़ भी नहीं रहे हैं । इनके रवैये ने मल्टीपल में नेतागिरी जमाने/दिखाने की तेजपाल खिल्लन की कोशिशों को पलीता लगा दिया है ।
तेजपाल खिल्लन के लिए मुसीबत और फजीहत की बात यह भी हुई है कि वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को लेकर वह दूसरों को तो आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन खुद वीएस कुकरेजा को उनके दावे और उनकी बातों पर भरोसा नहीं हो रहा है - और यही कारण है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर वह खुद ही उत्साहित नहीं रह गए हैं, और लोगों से बचने/छिपने में ही लगे हुए हैं । अभी हाल ही में संपन्न हुई डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में उन्हें बड़े सम्मान के साथ आमंत्रित किया गया था; डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के निमंत्रण पत्र पर उनका नाम और फोटो था तथा बैकड्रॉप बैनर में भी उनका नाम और फोटो था - किंतु वीएस कुकरेजा कॉन्फ्रेंस में पहुँचे ही नहीं । उन्हें अपने उम्मीदवार होने का सचमुच भरोसा होता, तो क्या वह ऐसा कर सकते थे ? उनकी अनुपस्थिति में जेपी सिंह ने दोहरा फायदा उठाया - और उस एक आयोजन से मल्टीपल के डिस्ट्रिक्ट्स में यह साफ संदेश गया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ से वीएस कुकरेजा ने अपने आपको बाहर मान लिया है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एक अकेले उम्मीदवार जेपी सिंह ही हैं । 'मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त' वाली तर्ज पर मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव का दिलचस्प नजारा है कि वीएस कुकरेजा तो अपनी तथाकथित उम्मीदवारी को लेकर चुप बने हुए हैं और लोगों से बचते/छिपते फिर रहे हैं, जबकि तेजपाल खिल्लन फर्जी तौर-तरीके से उनकी उम्मीदवारी के बारे में झूठ फैलाने के काम में लगे हुए हैं ।

Saturday, May 20, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल के लीगल अधिकारी स्कॉट ड्रमहेलर के स्पष्टीकरण से मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के विवाद में अपनी भूमिका पर पर्दा डालने की कोशिश ने चेयरमैन जेसी वर्मा की कारस्तानी को और उभारने का ही काम किया है

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जेसी वर्मा लायंस इंटरनेशनल के लीगल डिपार्टमेंट की सबसे बड़ी 'तोप' स्कॉट ड्रमहेलर को आगे करके इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर अपनी शीर्षासनी कलाबाजी को छिपाने की जो कोशिश कर रहे हैं, उससे अपनी स्थिति को उन्होंने और हास्यास्पद बना लिया है । उल्लेखनीय है कि जेसी वर्मा दिखाने/जताने की कोशिश तो यह करते हैं कि वह बहुत नियमानुसार काम करने वाले व्यक्ति हैं, लेकिन इस मामले में उन्होंने जिस तरह से रंग बदले हैं - उससे वह कठपुतली चेयरमैन ही साबित हुए हैं । उनके लिए फजीहत की बात यह हुई है कि इस मामले में अपने आप को पाक-साफ दिखाने की वह जितनी ज्यादा कोशिश कर रहे हैं, उतने ही ज्यादा वह इसमें फँसते जा रहे हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर सवाल उठा रहे लायन सदस्यों और पदाधिकारियों का मुँह बंद करने के लिए जेसी वर्मा ने अब स्कॉट ड्रमहेलर का एक तथाकथित स्पष्टीकरण पेश किया है, इस स्पष्टीकरण ने लेकिन जेसी वर्मा की मुश्किलों को कम करने की बजाए बढ़ा और दिया है । दरअसल स्कॉट ड्रमहेलर के इस स्पष्टीकरण में ऐसी कोई नई बात सामने नहीं आई है, जो पहले से ही लोगों की - और या खुद जेसी वर्मा की जानकारी में नहीं थी । स्कॉट ड्रमहेलर ने अपने इस स्पष्टीकरण में साफ कहा है कि मौजूदा इंटरनेशनल कॉन्स्टीट्यूशन तथा बाई-लॉज और बोर्ड पॉलिसी के अनुसार इंटरनेशनल बोर्ड के किसी सदस्य के मल्टीपल से कोई दूसरा बोर्ड का सदस्य नहीं हो सकता है ।
इसमें नई बात भला क्या है ? वास्तव में तो इसी नियम का हवाला देते हुए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में जेसी वर्मा ने इस वर्ष इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव कराने से इंकार किया हुआ था । उल्लेखनीय है कि मल्टीपल काउंसिल की 6 से 8 मार्च के बीच शिमला में हुई तीसरी कैबिनेट मीटिंग में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल ने मल्टीपल की रिऑर्गेनाइजेशन रिपोर्ट पेश करते हुए साफ शब्दों में बताया था कि नरेश अग्रवाल के जून 2019 तक इंटरनेशनल बोर्ड का सदस्य होने के कारण मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एंडोर्समेंट नहीं दिया जा सकता है । यह बात उक्त मीटिंग के जारी किए गए मिनिट्स में भी दर्ज है । अब नियम तो जो पहले था, वही अब भी है - स्कॉट ड्रमहेलर जो नियम बता रहे हैं, उसी नियम का हवाला देते हुए ही तो जेसी वर्मा पहले बता रहे थे कि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव नहीं हो सकता है, और अब जब चुनाव करवाया जा रहा है तब भी जेसी वर्मा स्पष्टीकरण के नाम पर उसी नियम को रेखांकित करता स्कॉट ड्रमहेलर का मेल-संदेश लोगों के मुँह पर चिपकाने की कोशिश कर रहे हैं । जेसी वर्मा की इस हरकत से ऐसा लगता है कि जैसे मल्टीपल के लायन सदस्यों और पदाधिकारियों को उन्होंने 'शिकारपुर' का समझा हुआ है ।
पहले इंकार करने - और फिर अचानक से कलाबाजी खाते हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव कराए जाने को लेकर जो भी सवाल उठ रहे हैं, उनका जबाव मल्टीपल चेयरमैन होने के नाते जेसी वर्मा को देना है; इंटरनेशनल कार्यालय से स्पष्टीकरण लेने की आड़ में वह अपनी कलाबाजी की हरकत पर पर्दा नहीं डाल सकते हैं । यह उन्हें ही बताना है कि पिछले दो महीने में जब इंटरनेशनल कॉन्स्टीट्यूशन तथा बाई-लॉज और बोर्ड पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तब मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करवाने को लेकर उनके रवैये में ठीक शीर्षासनी बदलाव कैसे और क्यों हो गया है ? आखिर किसने उनकी गर्दन पकड़ कर उनसे यह शीर्षासन करवा दिया है, और क्यों वह इसके लिए तैयार हो गए हैं ?
मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में अचानक से इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करवाने के फैसले को लेकर बबाल दरअसल इसलिए भी ज्यादा मचा हुआ है, क्योंकि इस अचानक लिए फैसले के बाद एक जेपी सिंह को छोड़ कर बाकी सभी उम्मीदवार - चुनावी मुकाबले से बाहर खड़े कर दिए गए हैं । इसी से लोगों के बीच संदेह पैदा हुआ है कि जेसी वर्मा की देख-रेख में यह सारी कलाबाजी जेपी सिंह को बिना चुनावी मुकाबले के इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने/बनवाने की कवायद का हिस्सा है । अब इसे मजाक कहा जायेगा या सोची/समझी साजिश माना जायेगा कि मल्टीपल के पदाधिकारी साठ दिन पहले तक कह रहे थे कि मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव नहीं होगा; और अब वह उम्मीदवारों के नामांकन इस आधार पर खारिज कर रहे हैं कि उन्होंने साठ दिन पहले अपनी उम्मीदवारी के लिए इन्टेंशन नहीं दी । दावा किया जा रहा है कि एक अकेले जेपी सिंह ने साठ दिन पहले इन्टेंशन दी थी, और इस आधार पर उनका नामांकन सही है; सवाल यह है कि साठ दिन पहले जब मल्टीपल के पदाधिकारी इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव न होने की बात कह रहे थे, तब साठ दिन पहले जेपी सिंह की इन्टेंशन वह स्वीकार क्यों कर रहे थे ? इन सवालों का जबाव मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में जेसी वर्मा को देना है; स्कॉट ड्रमहेलर को नहीं देना है - और उन्होंने दिया भी नहीं है ।
स्कॉट ड्रमहेलर ने लगता है कि समझ लिया है कि मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर जो नाटक हो रहा है, उसके असली सूत्रधार अगले लायन वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होने जा रहे नरेश अग्रवाल हैं; इसलिए जेसी वर्मा को संबोधित मेल के अंत में उन्होंने नरेश अग्रवाल को भी मामले में घसीट लिया है । स्कॉट ड्रमहेलर का मेल-संदेश लोगों को भेज कर जेसी वर्मा ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के विवाद में अपनी भूमिका पर पर्दा डालने की जो कोशिश की है, वह उल्टी ही पड़ी है - और स्टॉक ड्रमहेलर के तथाकथित स्पष्टीकरण ने जेसी वर्मा की कारस्तानी को और उभारने का ही काम किया है ।
जेसी वर्मा को संबोधित स्कॉट ड्रमहेलर का मेल-संदेश :

Sunday, May 14, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव पर अवैध और मनमाने तरीके से होने का आरोप लगा और इसके पीछे नरेश अग्रवाल की मिलीभगत को देखा/पहचाना जा रहा है

नई दिल्ली । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए होने वाला चुनाव क्या अवैध रूप से किया/करवाया जा रहा है - जो कि लायंस इंटरनेशनल के नियमों की खुल्लम-खुल्ला अवहेलना है ? यह सवाल मल्टीपल के कई पदाधिकारियों और नेताओं को मथ रहा है । इससे भी ज्यादा महत्त्व का सवाल यह खड़ा हुआ है कि इस मामले में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होने जा रहे नरेश अग्रवाल की भी मिलीभगत है क्या ? क्योंकि कोई भी इस बात पर तो यकीन नहीं ही करेगा कि नरेश अग्रवाल को विश्वास में लिए बिना - और या उनकी अनुमति लिए बिना तो इतना बड़ा 'खेल' नहीं ही हो रहा होगा । उल्लेखनीय है कि मल्टीपल काउंसिल की 6 से 8 मार्च के बीच शिमला में हुई तीसरी कैबिनेट मीटिंग में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल ने मल्टीपल की रिऑर्गेनाइजेशन रिपोर्ट पेश करते हुए साफ शब्दों में बताया था कि नरेश अग्रवाल के जून 2019 तक इंटरनेशनल बोर्ड का सदस्य होने के कारण मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एंडोर्समेंट नहीं दिया जा सकता है । यह बात उक्त मीटिंग के जारी किए गए मिनिट्स में भी दर्ज है । इसके बावजूद मल्टीपल की चौथी कैबिनेट मीटिंग के साथ ही होने वाली मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एंडोर्समेंट देने की तैयारी की जा रही है । आरोप यह सुना जा रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के दूसरे संभावित उम्मीदवारों को धोखे में रखकर उन्हें जेपी सिंह के 'सामने' से हटाने और इस तरह जेपी सिंह के लिए मुकाबले को आसान बनाने की खातिर यह 'खेल' रचा गया है । 'नोटिस ऑफ इन्टेंशन' तथा नोमीनेशन के नियमों का हवाला देते हुए जिस तरह से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के दूसरे अधिकतर उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए गए हैं, उससे भी जाहिर हो रहा है कि मनमाने तरीके से इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करवाने के पीछे जेपी सिंह को फायदा पहुँचाने की नीयत काम कर रही है ।
मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करवाने की तैयारी में लगे मल्टीपल काउंसिल के पदाधिकारी तथा दूसरे नेता इस तैयारी को जायज ठहराने के लिए लायंस इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की 24 से 27 मार्च के बीच ग्रीक के एथेंस में हुई मीटिंग में लिए फैसले का हवाला दे रहे हैं । उनका कहना है कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने अपनी इस मीटिंग में नियमों में जो फेरबदल करने का फैसला लिया है, उसके चलते मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करवाया जा सकता है । लेकिन एथेंस में हुई बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग के जो तथ्य 'रचनात्मक संकल्प' को मिले हैं, वह एक अलग और विपरीत कहानी ही कहते हैं । उक्त मीटिंग में कॉन्स्टीट्यूशन व बाई-लॉज कमेटी के जिन दस मामलों में फैसला हुआ है, उसमें नौवें और दसवें नंबर पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर होने वाले संशोधनों का जिक्र है - जिनमें 2017 की इंटरनेशनल कन्वेंशन में इंटरनेशनल बाई-लॉज के आर्टिकल II के सेक्शन 5 (C) और सेक्शन 4 में संशोधन करने के लिए प्रस्ताव रखने की बात स्वीकार की गई है । (स्नैपशॉट देखें) यानि नियमों में फेरबदल करने की बात इंटरनेशनल बोर्ड ने अभी सिद्धांततः स्वीकार की है, और इस फेरबदल को इंटरनेशनल कन्वेंशन में रखने की बात स्वीकार की है - इंटरनेशनल कन्वेंशन में यह फेरबदल स्वीकार होंगे, तब यह नियम/कानून का रूप बनेंगे, और उसके बाद से लागू होंगे । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की कॉन्फ्रेंस, जिसमें इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव होना है - शिकागो में होने वाली 2017 की इंटरनेशनल कन्वेंशन से करीब एक महीने पहले ही हो जाएगी । ऐसे में सवाल यही है कि 30 जून से 4 जुलाई के बीच होने वाली इंटरनेशनल कन्वेंशन में जो नियम 'बनेगा', उस नियम के अनुसार 26 से 28 मई के बीच होने वाली मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में कार्रवाई कैसे हो सकती है - 26 से 28 मई के बीच होने वाली मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में तो लायंस इंटरनेशनल के मौजूदा नियमों के अनुसार ही कार्रवाई हो सकती है ।
मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के पदाधिकारी और पर्दे के पीछे से उन्हें कठपुतली की तरह चलाने वाले नेताओं ने लेकिन यह कमाल कर दिखाने की तैयारी शुरू कर दी है कि - लायंस इंटरनेशनल में नियम बाद में बनेगा, उस पर अमल पहले ही कर लिया जाएगा । सामान्य स्थितियों में ऐसा हो सकना असंभव ही होता है, किंतु मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के नेताओं और उनके कठपुतले पदाधिकारियों ने ऐसा करने की तैयारी शुरू कर दी है - तो माना जाना चाहिए कि उनका कॉन्फीडेंस लेबल काफी ऊँचा है । उनके इस ऊँचे और मनमाने कॉन्फीडेंस लेबल को नरेश अग्रवाल की 'ताकत' से खाद-पानी मिलता नजर आ रहा है । समझा जाता है कि 'सैयां भये कोतवाल, तो फिर डर काहे का' वाली तर्ज पर मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव करवाने वाले लोगों को पूरा पूरा भरोसा है कि अगले लायन वर्ष में चूँकि नरेश अग्रवाल ही इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के पद पर होंगे, इसलिए वह उनकी नियम-विरुद्ध हुई मनमानी कार्रवाई पर लायंस इंटरनेशनल की मुहर लगवा कर उनकी अवैध कार्रवाई को वैध बनवा ही देंगे । 
लेकिन मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 317 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एंडोर्समेंट लेने वाले डिस्ट्रिक्ट 317 बी के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वासुदेव वलवलकर का इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा जो हाल हुआ है, वह एक सबक भी है कि नियम विरुद्ध मनमानियाँ फजीहत का कारण भी बन जाती हैं । दिलचस्प संयोग की और मजे की बात है कि वासुदेव वलवलकर के मामले में भी फैसला 24 से 27 मार्च के बीच एथेंस में हुई उसी बोर्ड मीटिंग में हुआ है, जिसके संदर्भित फैसलों की मनमानी व्याख्या करते हुए मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव कराने की तैयारी की जा रही है । इस दिलचस्प संयोग में कहीं यह संकेत तो नहीं छिपा है कि इंटरनेशनल बोर्ड का मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 317 के झंझट से पीछा छूटने के साथ साथ ही मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के संभावित झंझट की नींव पड़ गई है - क्योंकि मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में कुछेक लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि मल्टीपल में इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव सचमुच यदि हुआ, तो वह उसके खिलाफ इंटरनेशनल बोर्ड में अपील करेंगे और देखेंगे कि नरेश अग्रवाल के नाम पर कुछ लोग मल्टीपल में कैसे मनमानी करते हैं ?

Saturday, May 13, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में तेजपाल खिल्लन के फजीहत का शिकार बनने की स्थिति ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में अनिल तुलस्यान का पलड़ा भारी किया

नई दिल्ली । तेजपाल खिल्लन की राजनीतिक दादागिरी को उनके ही डिस्ट्रिक्ट के एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेसी वर्मा से ऐसी पटखनी मिलेगी कि तेजपाल खिल्लन के लिए मुँह छिपाना मुश्किल हो जायेगा - यह किसी ने नहीं सोचा था । जेसी वर्मा इस समय मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन हैं, जिन्होंने इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव के मामले में तेजपाल खिल्लन की राजनीति की हवा चुपके से ऐसी टाइट की है कि तेजपाल खिल्लन के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि फजीहत से वह बचें तो कैसे ? तेजपाल खिल्लन पिछले कुछ दिनों से वीएस कुकरेजा को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने/बनवाने के अपने अभियान का गुब्बारा फुलाए हुए थे, लेकिन जेसी वर्मा ने सुई चुभा कर उनके गुब्बारे की सारी हवा निकाल दी है । दरअसल हुआ यह है वीएस कुकरेजा की तरफ से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के लिए मल्टीपल को साठ दिन पहले नोटिस ऑफ इन्टेंशन नहीं मिला है, जिसके कारण इस वर्ष उनकी उम्मीदवारी मान्य नहीं रह जाती है । वीएस कुकरेजा वैसे तो अपने आप को बड़ा कानूनची समझते हैं, और मौकों पर यह जताने/बताने से भी नहीं चूकते हैं कि लायंस इंटरनेशनल के नियम उनसे ज्यादा कोई नहीं जानता है - पर अपने ही मामले में वह नियम का पालन न करने की बेवकूफी कर बैठे ।
कानूनची व्यक्ति के साथ एक दिक्कत और होती है, और वह यह कि वह अपनी बेवकूफी को स्वीकार नहीं करता है, और कानूनी दाँवपेंचों के सहारे अपनी बेवकूफी को सही साबित करने का प्रयास करता है । वीएस कुकरेजा ने भी यही किया । उन्होंने पाया कि मल्टीपल में जो नियम साठ दिन का है, वह  इंटरनेशनल में 45 दिन का है । इस नियम की आड़ में वीएस कुकरेजा ने अपनी बेवकूफी छिपाने की कोशिश करते हुए लायंस इंटरनेशनल में गुहार लगाई कि उनके द्वारा दिया गया 'नोटिस ऑफ इन्टेंशन' चूँकि 45 दिन वाली शर्त को पूरा करता है, इसलिए उनकी उम्मीदवारी मान्य की/करवाई जाए । लायंस इंटरनेशनल ने लेकिन उन्हें दो-टूक बता दिया है कि चुनाव इंटरनेशनल में नहीं होना है, मल्टीपल में होना है - इसलिए उनके मामले में मल्टीपल का नियम लागू होगा । दीपक तलवार की चेयरमैनी वाली नोमीनेटिंग कमेटी की चूँकि अभी तक मीटिंग नहीं हुई है, इसलिए वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी अभी रिजेक्ट तो नहीं हुई है - लेकिन 'नोटिस ऑफ इन्टेंशन' के मामले में नियम का पालन न होने के कारण वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी स्वीकार होने का कोई कारण नहीं दिख रहा है । वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी के पेपर ही रिजेक्ट हो जाने से होने वाली फजीहत से बचने के लिए तेजपाल खिल्लन सम्मानजनक ढंग से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी पचड़े से बाहर निकलने के लिए कोई फार्मूला खोज रहे हैं, जिसके लिए दीपक तलवार भी उन्हें मौका दे रहे हैं - और इसीलिए नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग को वह टालते जा रहे हैं ।
तेजपाल खिल्लन के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि इस फजीहत से उन्हें बचाने में उनके  डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स जेसी वर्मा और राजीव मित्तल उनकी मदद कर सकते हैं - लेकिन तेजपाल खिल्लन इन दोनों की ही डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह से बेइज्जती करते रहे हैं, उसके कारण इन दोनों को भी मौका मिला है कि यह तेजपाल खिल्लन को मजा चखाएँ । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में जेसी वर्मा चाहें तो वीएस कुकरेजा के 'नोटिस ऑफ इन्टेंशन' को साठ दिन पहले आया हुआ बता सकते हैं; लायन-राजनीति में इस तरह की 'बेईमानियाँ' आम बात है । नोमीनेटिंग कमेटी में को-चेयरमैन के रूप में राजीव मित्तल के पास भी मौका है कि वह वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को मान्य करवा दें - खुद उनकी तरफ से लोगों के बीच कहा/सुना भी गया है कि इस वर्ष हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में नियमों के मामले में लोचा ही लोचा है, इसलिए कई मामलों में नोमीनेटिंग कमेटी को नियमों की अनदेखी करनी ही पड़ेगी; ऐसे में, वीएस कुकरेजा के मामले में भी नियमों की अनदेखी की जा सकती है । किंतु वीएस कुकरेजा और तेजपाल खिल्लन ने अपने अपने रवैये और व्यवहार से जिस तरह लोगों को अपना विरोधी बनाया हुआ है, उसे देखते हुए उम्मीद कम ही है कि कोई भी उनके प्रति रियायत करना चाहेगा । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि अभी कुछ दिन पहले ही तेजपाल खिल्लन की ओछी किस्म की व्यूह-रचना के कारण ही ऐसी स्थिति बनी कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन होने के बावजूद जेसी वर्मा अपने ही डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हो सके । जेसी वर्मा के नजदीकियों का कहना है कि जेसी वर्मा उस अपमान को भूले नहीं हैं, और अब जब उन्हें मौका मिला है तो वह तेजपाल खिल्लन की फजीहत करने का यह मौका छोड़ेंगे नहीं ।
तेजपाल खिल्लन को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी मैदान में लड़ाई शुरू होने से पहले ही जो तगड़ा वाला झटका लगा है, उसे और विस्तार देने के लिए मल्टीपल के उनके विरोधी नेताओं ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में उन्हें पछाड़ने के लिए भी उनकी घेराबंदी शुरू कर दी है । तेजपाल खिल्लन के उम्मीदवार विनय गर्ग के मुकाबले मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में अनिल तुलस्यान के लिए समर्थन जुटाने के काम में मल्टीपल के कई नेता जिस तरह से सक्रिय हुए हैं, उसके कारण अनिल तुलस्यान का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आ रहा है । दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में जेपी सिंह के एक पक्ष होने - और मजबूत व महत्त्वपूर्ण पक्ष होने के कारण मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में विनय गर्ग को एक बड़े खतरे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; इस कारण से विनय गर्ग के खिलाफ कई सेंटीमेंट्स इकट्ठा हो गए हैं : किन्हीं को शिकायत है कि विनय गर्ग बिलकुल भी सक्रिय नहीं रहते हैं और उन्हें उचित तवज्जो नहीं देते हैं; किन्हीं को इस बात से परेशानी है कि विनय गर्ग तो तेजपाल खिल्लन की कठपुतली बन कर ही रहेंगे; किन्हीं को डर है कि विनय गर्ग का तो एकमात्र एजेंडा जेपी सिंह और उनके समर्थकों के साथ बदला लेने का रहेगा; विनय गर्ग के प्रति यह सारी शिकायतें, परेशानियाँ और डर अनिल तुलस्यान के लिए जैसे वरदान बन कर आईं हैं । मजे की बात यह हुई है कि अलग अलग कारणों से लीडरशिप के लोग भी और लीडरशिप के विरोधी रहे लोग भी अनिल तुलस्यान की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में लगे नजर आ रहे हैं । दरअसल अलग अलग कारणों से तेजपाल खिल्लन के विरोधियों को लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के मामले में तेजपाल खिल्लन जिस फजीहत का शिकार हो रहे हैं, उसे और विस्तार देने तथा पुख्ता करने के लिए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में भी उन्हें पछाड़ना जरूरी है - और इसी बात ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में पलड़े को अनिल तुलस्यान की तरफ भारी बनाते हुए झुका दिया है ।

Thursday, May 11, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में लीडरशिप के अन्य नेताओं के साथ-साथ नरेश अग्रवाल का भी बेगाना-सा व्यवहार जेपी सिंह के लिए मुश्किलों को बढ़ाने वाला है

नई दिल्ली । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडॉर्सी पद के चुनावी संग्राम में लीडरशिप ने - खासकर नरेश अग्रवाल ने जिस तरह अकेला छोड़ दिया लगता है, उसके चलते मल्टीपल की चुनावी राजनीति खासी रोमांचक हो गयी है । गौरतलब है कि जेपी सिंह को लीडरशिप के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है और लोगों के बीच माना जाता है कि नरेश अग्रवाल की आँखों में बसने वालों में विनोद खन्ना के बाद जेपी सिंह का ही नंबर आता है । लायन-व्यवस्था में जेपी सिंह की चमत्कारी सफलता में लीडरशिप के साथ उनकी नजदीकी को ही कारण के रूप में देखा/पहचाना जाता है । लीडरशिप के साथ नजदीकी के चलते ही लायन-व्यवस्था में जेपी सिंह की पहुँच और हैसियत कई एक पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर्स से भी ज्यादा मानी/समझी और पहचानी जाती है । लेकिन लायन राजनीति में सारी 'पहुँचें' और 'हैसियतें' चकरघिन्नी बन जाती हैं - और शायद यही कारण है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडॉर्सी पद के चुनाव में लीडरशिप के बड़े से लेकर छोटे नेता तक जेपी सिंह की मदद करने की बजाए उनसे अपने अपने पिछले हिसाब चुकता करने की तैयारी में देखे जा रहे हैं । लीडरशिप के नेताओं के इस रवैये ने जेपी सिंह के लिए आसान समझे जा रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को खासा मुश्किल और चुनौतीपूर्ण बना दिया है ।
जेपी सिंह के लिए मुसीबतों का पिटारा एक तो इस बात से खुला है कि मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इस वर्ष कई मुद्दे एक साथ ले आए जा रहे हैं - इस वर्ष मल्टीपल के विभाजन का मुद्दा भी महत्त्वपूर्ण बना दिया गया है, और साथ ही मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों को और ज्यादा अधिकार देने/दिलाने के कई प्रस्ताव रखे जा रहे हैं । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव को लेकर इस वर्ष जो समीकरण बन रहा है, वह भी जेपी सिंह के लिए मुसीबत बढ़ाने वाला साबित हो रहा है । जेपी सिंह के लिए मुसीबत की बात यह हो रही है कि इन मामलों में जिस तरह के राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं, वह जेपी सिंह की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के लिए सीधा खतरा बन रही है । मल्टीपल के विभाजन और मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों के अधिकार बढ़ाने के मुद्दे पर डिस्ट्रिक्ट्स में लीडरशिप को निशाना बनाया जा रहा है; अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में मल्टीपल के विभाजन को लेकर विरोध है और उन्होंने अपने विरोध को मुखर रूप में प्रकट भी कर दिया है । मल्टीपल पदाधिकारियों के अधिकार बढ़ाने के मुद्दे पर मुकेश गोयल की तरफ से जिस तरह का तीखा विरोध आया है, और उनके विरोध को मल्टीपल में जिस तरह का समर्थन मिलता दिख रहा है - उसने मल्टीपल में लीडरशिप विरोधी हवा बनाने का काम किया है । जेपी सिंह को चूँकि लीडरशिप के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है, इसलिए लीडरशिप के खिलाफ फूटने वाले गुस्से में उनके ही 'निशाना' बनने की स्थिति बनती है । इस स्थिति से निपटना जेपी सिंह के लिए बड़ी चुनौती है ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव ने जेपी सिंह के लिए और भी बड़ा खतरा खड़ा किया हुआ है । इस मामले में तेजपाल खिल्लन ने जेपी सिंह को उनके अपने ही 'घर' में जिस तरह से घेर लिया है, उससे जेपी सिंह के लिए काफी विकट स्थिति बन गई है । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए विनय गर्ग और अनिल तुलस्यान के बीच मुकाबला सज रहा है । विनय गर्ग की उम्मीदवारी का झंडा तेजपाल खिल्लन ने उठाया हुआ है; विनय गर्ग, जेपी सिंह के डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं - और दोनों के बीच छत्तीस का संबंध है । तेजपाल खिल्लन ने इसी बात का फायदा उठाया हुआ है । खतरे को पहचानते हुए जेपी सिंह की तरफ से विनय गर्ग के साथ संबंधों की खटास को कम करने की हालाँकि कोशिशें तो हुईं - लेकिन एक तो चूँकि खटास बहुत ज्यादा है, और दूसरे जेपी सिंह की तरफ से कोशिशें भी ढीली-ढाली सी ही रहीं : इसलिए बात बन नहीं पाई । इस मामले में कई लोगों को लगता है कि लीडरशिप यदि चाहे और कोशिश करे, तो अनिल तुलस्यान के लिए समर्थन जुटाने का काम करके विनय गर्ग को - और उनके बहाने वास्तव में तेजपाल खिल्लन को दबाव में लाने का काम कर सकती है, और इस तरह जेपी सिंह की मदद सकती है; लेकिन लीडरशिप की तरफ से ऐसी कोई कोशिश चूँकि होती हुई नहीं दिख रही है, इसलिए लोगों को यह भी लग रहा है कि लीडरशिप शायद जेपी सिंह की मदद करना ही नहीं चाहती है । लोगों के बीच बन रही यह सोच और भावना जेपी सिंह के लिए बड़ा और दोहरा खतरा खड़ी कर रही है । मजे की बात यह है कि खुद जेपी सिंह भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में वह अपनी क्या भूमिका रखें और कैसे हस्तक्षेप करें ? वह शायद तटस्थ होने और 'दिखने' की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस कोशिश में वह उन लोगों का भी समर्थन खोते नजर आ रहे हैं, जो विनय गर्ग और तेजपाल खिल्लन के विरोध में हैं । मल्टीपल काउंसिल का इस वर्ष का चुनाव सिर्फ मल्टीपल के पदाधिकारियों का ही चुनाव नहीं करेगा, बल्कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भी चुनावी समीकरण तय करेगा - इसीलिए इस चुनाव में जेपी सिंह की महत्त्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए थी, जो नहीं है; और यह बात इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एक उम्मीदवार के रूप में जेपी सिंह की कमजोरी को दिखाती है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जेपी सिंह की उम्मीदवारी के संबंध में नरेश अग्रवाल का रवैया भी संदेहास्पद लग रहा है । जानकारों का मानना और कहना है कि नरेश अग्रवाल जिस क्षण चाहेंगे - उस क्षण वीएस कुकरेजा और तेजपाल खिल्लन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेंगे । जानकारों का ही कहना है कि नरेश अग्रवाल को इनसे कुछ कहना भी नहीं पड़ेगा, उनका सिर्फ इशारा ही काफी होगा । किंतु वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को लेकर तेजपाल खिल्लन जिस तरह से आगे बढ़ रहे हैं, उससे लग रहा है कि उन्हें आगे बढ़ने से रोकने में नरेश अग्रवाल की भी कोई दिलचस्पी नहीं है । जेपी सिंह के साथ नरेश अग्रवाल के संबंधों का जिन लोगों को पता है, उन्हें नरेश अग्रवाल का यह रवैया खासा हैरानी भरा लग रहा है । जेपी सिंह के प्रति नरेश अग्रवाल का यह बेगाना-सा व्यवहार इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार के रूप में भी जेपी सिंह के लिए मुश्किलों को बढ़ाने वाला है ।

Saturday, May 6, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव में वीएस कुकरेजा सचमुच उम्मीदवार बने रहेंगे, या जेपी सिंह के साथ कोई सौदा करके तेजपाल खिल्लन उनकी उम्मीदवारी वापस करवा देंगे

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडॉर्सी पद के लिए चुनाव अभियान पर निकलने की तैयारी कर रहे वीएस कुकरेजा के 'चुनावी रथ' के चोरी हो जाने को उनके शुभचिंतकों और समर्थकों ने एक बुरे संकेत के रूप में देखा/पहचाना है - और चुनाव के प्रति और गंभीर व सतर्क होने की जरूरत को रेखांकित किया है । उल्लेखनीय है कि अपनी जिस इनोवा कार के सहारे वीएस कुकरेजा को अपने चुनाव अभियान पर निकलना था, उसके चोरी हो जाने की खबर उन्होंने खुद ही लोगों को दी है । यह ठीक है कि उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को विश्वास है कि चुनावी जरूरत के बीच इस मुसीबत को वीएस कुकरेजा हैंडल कर लेंगे और इसके कारण अपने चुनाव अभियान को प्रभावित नहीं होने देंगे, लेकिन फिर भी उन्हें यह भी आशंका हुई है कि किन्हीं अदृश्य शक्तियों ने वीएस कुकरेजा के चुनाव अभियान में बाधा खड़ी करने के उद्देश्य से तो उनकी इनोवा की चोरी नहीं करवा दी । हालाँकि लायन राजनीति बहुत गंदी होती जा रही है और उसमें बहुत बहुत घटियापन भी होने लगा है - किंतु शुक्र है कि वीएस कुकरेजा या उनके समर्थक/शुभचिंतक इनोवा की चोरी को दिल्ली में होने वाली वाहन-चोरी की घटनाओं की श्रृंखला के रूप में ही देख/पहचान रहे हैं और उनकी तरफ से इसके पीछे विरोधियों का हाथ होने का शक प्रकट नहीं किया गया है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मल्टीपल में एंडोर्स होने के लिए यूँ तो कई उम्मीदवार हैं, लेकिन अभी मुख्य मुकाबला वीएस कुकरेजा और जेपी सिंह के बीच होने की संभावना व्यक्त की जा रही है । वीएस कुकरेजा को हालाँकि एक डमी उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, और लोगों के बीच चर्चा रही है कि उन्हें तेजपाल खिल्लन ने अपने कई कई कारनामों को संभव करने के लिए विजुका के रूप में रूप 'खड़ा' किया हुआ है, और वह कभी भी वीएस कुकरेजा को पीछे खींच सकते हैं - लेकिन अभी उनकी तरफ से जिस तरह की तैयारी होती सुनी गई है, उससे लग रहा है कि तेजपाल खिल्लन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट को लेकर गंभीर हैं । तेजपाल खिल्लन की गंभीरता को देखते हुए भी जेपी सिंह लेकिन चूँकि अभी तक गंभीर होते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए लोगों को हैरानी है । इस हैरानी में लोगों को लग रहा है कि जेपी सिंह ने शायद तेजपाल खिल्लन की 'गंभीरता' को खत्म करने का कोई रामबाण खोजा हुआ है, और उन्हें विश्वास है कि उचित समय पर वह उसका इस्तेमाल करेंगे - और तेजपाल खिल्लन का 'गुस्सा' शांत कर देंगे । जेपी सिंह अभी 'उस' रामबाण का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, तो शायद इसलिए कि वह देख लेना चाहते हैं कि तेजपाल खिल्लन के भरोसे वीएस कुकरेजा कितना ऊपर तक उड़ पाते हैं ? जेपी सिंह के नजदीकियों के अनुसार, जेपी सिंह को लगता है कि हो सकता है कि वीएस कुकरेजा ज्यादा ऊपर तक न उड़ पाएँ और खुद ही नीचे बैठ जाएँ ?
वीएस कुकरेजा को लेकर दरअसल उनके हो सकने वाले समर्थकों को भी शक है कि वह मुकाबले में बने भी रह सकेंगे क्या ? जो लोग उन्हें जानते हैं, उनका कहना है कि एक उम्मीदवार के रूप में व्यवहार कर सकना उनके लिए संभव ही नहीं है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को अफोर्ड करना उनके बस की बात नहीं है । वीएस कुकरेजा के पास बस एक ही ताकत है - और वह है तेजपाल खिल्लन का संग/साथ । लेकिन चूँकि वह पूरी तरह से तेजपाल खिल्लन के भरोसे हैं - इसलिए लोगों के बीच लाख टके का सवाल यह है कि तेजपाल खिल्लन का संग/साथ वीएस कुकरेजा की ताकत साबित होगा, या उनकी कमजोरी । दरअसल हर किसी को लग रहा है कि वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को तेजपाल खिल्लन अपने स्वार्थ के लिए बनाए हुए हैं, और जब भी उन्हें यह लगेगा कि वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को छोड़ देने से उनका स्वार्थ पूरा हो जाएगा - वह वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को छोड़ देने में देर नहीं लगायेंगे ।
तेजपाल खिल्लन का स्वार्थ क्या है - इसे लेकर जितने मुँह उतनी बातें हैं । तेजपाल खिल्लन के 'व्यवहार' को देखते रहे लोगों को कहना है कि वह वास्तव में हीनग्रंथि का शिकार हैं । उनके साथ बिडंवना यह है कि हालाँकि मल्टीपल में वह सबसे समर्थ लायन नेता हैं - लायन राजनीति करने के लिए जो कुछ भी चाहिए होता है, वह उनके पास प्रचुर मात्रा में है; लेकिन फिर भी उनकी राजनीतिक पहचान और हैसियत एक डिस्ट्रिक्ट के एक नेता भर की है - दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के साथ साथ उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में लोग उन्हें लायनिज्म के एक व्यापारी के रूप में जानते/पहचानते हैं और इसी नाते लीडरशिप भी उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं देती है । तेजपाल खिल्लन ने अपने डिस्ट्रिक्ट में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर केएम गोयल की बुरी हालत कर रखी है; लायन राजनीति करने के लिए जो कुछ भी चाहिए होता है, केएम गोयल के पास उसमें से कुछ भी नहीं है - लेकिन फिर भी लोगों के बीच और लीडरशिप में केएम गोयल की पहचान और हैसियत तेजपाल खिल्लन से कहीं कहीं ज्यादा है । तेजपाल खिल्लन के फ्रस्ट्रेशन का आलम यह है कि अपने डिस्ट्रिक्ट में वह अपनी मर्जी से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनाते/बनवाते हैं, लेकिन फिर भी वह दोबारा से खुद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए लाइन में लग गए हैं । यह बात वास्तव में उनकी छोटी सोच और विकल्पहीनता के शिकार होने का ही सुबूत है । दरअसल इसीलिए हर तरह से समर्थ होने के बावजूद वह ऐसा कोई काम नहीं कर सके हैं, जिससे लोगों के बीच उनकी खास पहचान बन सके और उनके लिए सम्मान बने । कुल मिलाकर लायन राजनीति में भी वह सिर्फ एक सौदागर ही बन सके हैं - राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं कि राजनीति के सौदागरों के साथ कैसे सौदा किया जाता है ।
तेजपाल खिल्लन के तौर-तरीकों से परिचित लोगों को इसीलिए लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भी तेजपाल खिल्लन कोई न कोई सौदा कर लेंगे और तब वीएस कुकरेजा के सामने अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा । जेपी सिंह जिस तरह से वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी के प्रति निश्चिन्त से बने नजर आ रहे हैं, उससे भी लोगों को लग रहा है कि उन्हें विश्वास है कि वीएस कुकरेजा के साथ चुनाव की नौबत नहीं आएगी । लोगों को भी लगता है कि जेपी सिंह जिस दिन नरेश अग्रवाल से तेजपाल खिल्लन की बात/मुलाकात करवा देंगे और उनसे तेजपाल खिल्लन को 'तवज्जो' दिलवा देंगे, उस दिन तेजपाल खिल्लन - वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को वापस करवा कर जेपी सिंह की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेंगे । हालाँकि तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों का कहना है कि इस बार जेपी सिंह और या नरेश अग्रवाल के लिए तेजपाल खिल्लन से सौदा करना आसान नहीं होगा, और तेजपाल खिल्लन आसानी से जेपी सिंह को सफल नहीं होने देंगे । लोगों के अपने अपने दावे हैं - उन दावों की सच्चाई अगले कुछ दिनों में जेपी सिंह और वीएस कुकरेजा की तरफ की तैयारी को देख कर ही पहचानी जा सकेगी; और तभी संकेत मिलेगा कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई किस दिशा में आगे बढ़ती है ।

Tuesday, March 28, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में ब्लड बैंक के मामले में जेपी सिंह और उनके भक्तों ने बैठे-बिठाए खुद ही मुसीबत और फजीहत को आमंत्रित कर अपने लिए पिछले वर्ष जैसे ही हालात बना लिए हैं क्या ?

नई दिल्ली । जेपी सिंह के 'सेनानियों' की वाट्स-ऐप पर जारी छिछोरपंती ने जिस तरह से ब्लड बैंक से जुड़े आरोपों की चपेट में एक बार फिर जेपी सिंह को ले लिया है, उससे लगता है कि पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी जेपी सिंह के भक्त ही उनकी फजीहत का कारण बनेंगे । उल्लेखनीय है कि ब्लड बैंक का मामला पूरी तरह से शांत हो गया था, किंतु जेपी सिंह के भक्तों को पता नहीं किस च्यूंटी ने काटा कि वह ब्लड बैंक का मामला फिर से चर्चा में ले आए । दरअसल ब्लड बैंक से जुड़ी जेपी सिंह की बदनामी के दाग को धोने की कोशिश में जेपी सिंह के भक्तों ने ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन को ललकारा कि ब्लड बैंक में पैसा बनाने के जो आरोप जेपी सिंह पर लगाए गए थे, उन आरोपों को अभी तक साबित क्यों नहीं किया गया है ? यह सवाल तो अपने आप में में बड़ा वाजिब है, लेकिन दुस्साहस भरा है, और बहुत ही गलत समय पर पूछा गया । यह ऐसी ही बात हुई कि चोरी के आरोप में पकड़ा गया व्यक्ति यदि सुबूतों के अभाव में छूट जाता है, तो फिर वह आरोप लगाने और पकड़ने वालों को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करने लगे । उसकी कोशिश जायज हो सकती है, लेकिन उसे समझना चाहिए कि यह वास्तव में व्यवस्था की एक बड़ी खामी है - जिसमें हम कभी शिकार 'करते' हैं, तो कभी शिकार 'बनते' हैं । इसलिए इसे लेकर ज्यादा हायतौबा नहीं मचाना चाहिए । जेपी सिंह और उनके भक्त लेकिन इस सबक को भूल गए, और बदले में अपनी बेवकूफाना हरकतों से अपने लिए और ज्यादा फजीहत व मुसीबत को आमंत्रित कर बैठे । 
जेपी सिंह के सेनानियों की वाट्स-ऐप पर ललकार सुनी तो ब्लड बैंक का मौजूदा प्रबंधन भी चार पृष्ठों की चिट्ठी के साथ मैदान में उतर आया । इस चिट्ठी ने ब्लड बैंक की बदनामी के संदर्भ में जेपी सिंह के बचे-खुचे कपड़े भी उतार लिए । इस चिट्ठी ने दरअसल ब्लड बैंक से जुड़े आरोपों को क्रमबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण काम किया, जिसके कारण जेपी सिंह के लिए भ्रष्ट-आचरण के आरोपों से बचना और मुश्किल हो गया । इस चिट्ठी में कहा/बताया गया कि ब्लड बैंक में पैसा बनाने का आरोप तो प्रतिप्रश्न था, जिसका मुख्य प्रश्न यह था कि वर्ष 2013-14 में एक करोड़ 33 लाख रुपए का लाभ दर्ज करने वाले ब्लड बैंक को अगले ही वर्ष 80 लाख रुपए का भारी घाटा क्यों और कैसे हो जाता है ? ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन ने उक्त तथ्य को रेखांकित करते हुए इस बात को भी स्पष्ट किया कि इस सवाल का जबाव जेपी सिंह को ही देना है - कल भी उन्हें ही देना था, और आज भी उन्हें ही देना है । इस दो-टूक जबाव ने एक बार फिर जेपी सिंह को कठघरे में खड़ा कर दिया । मजे की बात यह रही कि कठघरे से निकलने की कोशिश में जेपी सिंह पहले यह जबाव दे चुके थे कि वर्ष 2013-14 में दिल्ली में चूँकि डेंगू का प्रकोप ज्यादा था, इसलिए ब्लड बैंक का धंधा अच्छा चला और उसे तगड़ा फायदा हुआ, लेकिन उसके अगले वर्ष चूँकि डेंगू का प्रकोप ज्यादा नहीं था, इसलिए ब्लड बैंक का धंधा पिटा और उसे घाटा हुआ । कई लोगों ने जेपी सिंह के इस तर्क को स्वीकार कर लिया था और मान लिया था कि डेंगू के बढ़ने/घटने के कारण ही ब्लड बैंक का नफा-नुकसान प्रभावित हुआ है, और इसका जेपी सिंह की प्रबंधकीय अक्षमता तथा ब्लड बैंक में की गई उनकी लूट-खसोट से कोई संबंध नहीं है ।
ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन की चार पृष्ठीय चिट्ठी ने लेकिन जेपी सिंह के इस झूठ को भी बेनकाब कर दिया । मौजूदा प्रबंधन ने चार वर्षों का हिसाब देते हुआ सवाल उठाया कि यदि डेंगू ही ब्लड बैंक के नफे-नुकसान का कारण है, तो वर्ष 2015-16 में डेंगू का प्रकोप होने के बाद भी ब्लड बैंक का लाभ 37 लाख रुपए ही क्यों रह गया - जबकि वर्ष 2013-14 में यह एक करोड़ 33 लाख रुपए था । प्रबंधन ने मौजूदा वर्ष के दस महीनों का आँकड़ा देते हुए बताया कि इस वर्ष डेंगू का प्रकोप न होने के बावजूद दस महीने में 80 लाख रुपए लाभ दर्ज किया गया है । इन तथ्यों से सवाल पैदा हुआ कि डेंगू न होने के बाद भी मौजूदा प्रबंधन यदि दस महीनों में ही 80 लाख रुपए कमा लेता है, तो जेपी सिंह के प्रबंधन को पूरे वर्ष में 80 लाख रुपए खोने क्यों पड़े थे ? यह सवाल इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि जेपी सिंह के साथ ब्लड बैंक के प्रबंधन में जुड़े लोगों का साफ कहना रहा है कि ब्लड बैंक में होने वाली खरीद-बेच की सारी डील जेपी सिंह अकेले ही करते थे, और उन्हें किसी भी स्तर पर डील में शामिल नहीं होने देते थे ।
ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन की चार पृष्ठीय चिट्ठी ने जेपी सिंह की हरकतों की और बचाव में दिए उनके जबाव की जो पोल खोली, तो जेपी सिंह और उनके भक्तों को लगा कि वह जैसे 'रंगे हाथ' पकड़ लिए गए हैं । तब उन्होंने इस बात का शोर मचाया कि वर्ष पूरा होने से पहले ही लाभ के आंकड़े देकर ब्लड बैंक प्रबंधन राजनीति कर रहा है; इस पर उन्हें सुनने को मिला कि जेपी सिंह तो वर्ष पूरा हो जाने के बाद - बार बार माँगने के बाद भी हिसाब नहीं देते थे, हिसाब देने में आपत्ति की क्या बात है ? और रही राजनीति की बात, तो इसकी शुरुआत तो खुद जेपी सिंह और उनके भक्तों ने ही की है । जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि जेपी सिंह और उनके भक्त अपने ही बिछाए जाल में खुद ही फँस गए हैं । इस प्रसंग ने पिछले वर्ष के घटना-चक्र को एक बार फिर से प्रासंगिक और उल्लेखनीय बना दिया है । जेपी सिंह के साथ सच्ची हमदर्दी रखने वाले लोगों को ही कहना/बताना है कि पिछले वर्ष जेपी सिंह के लिए हालात शुरू में ज्यादा बुरे नहीं थे, किंतु उनकी और उनके भक्तों की बड़बोली और बेवकूफाना हरकतों के चलते हालात लगातार बिगड़ते चले गए - जिसका नतीजा हुआ कि वह अपने आप से ही हार गए । ब्लड बैंक के मामले में अभी जिस तरह से जेपी सिंह और उनके भक्तों ने बैठे-बिठाए खुद ही मुसीबत और फजीहत को आमंत्रित कर लिया है, उससे लग रहा है कि जेपी सिंह और उनके भक्तों ने पिछले वर्ष की फजीहत से कोई सबक नहीं सीखा है - और इस वर्ष भी अपने लिए वह पिछले वर्ष जैसे ही हालात बना रहे हैं ।

Sunday, December 4, 2016

लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए तेजपाल खिल्लन का समर्थन जुटाने के चक्कर में जेपी सिंह को खासा तगड़ा वाला झटका दिया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने सोलन में 9 से 11 दिसंबर के बीच आयोजित हो रहे डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में जेपी सिंह की बजाए वीएस कुकरेजा को आमंत्रित करके जेपी सिंह को न सिर्फ तगड़ा झटका दिया है, बल्कि जेपी सिंह को डिस्ट्रिक्ट में उनकी हैसियत बताने/दिखाने का भी काम किया है । उल्लेखनीय है कि जेपी सिंह और वीएस कुकरेजा को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए संभावित उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - इस नाते से जेपी सिंह के अपने ही डिस्ट्रिक्ट में उनकी बजाए वीएस कुकरेजा को तवज्जो मिलने की बात जेपी सिंह की किरकिरी करने/कराने वाली बात तो है ही । मजे की बात यह भी है कि जीएलटी एरिया लीडर होने के नाते जेपी सिंह ही लीडरशिप इंस्टीट्यूट में शामिल होने की पात्रता रखते हैं; वीएस कुकरेजा तो जीएमटी एरिया लीडर हैं - उनका लीडरशिप इंस्टीट्यूट में भला क्या काम ? जाहिर है कि विनय गर्ग ने 'अंधेर नगरी और चौपट राजा' वाला जो सीन बनाया है, उसके पीछे की एकमात्र प्रेरणा राजनीति ही है - और इसी 'राजनीति' ने जेपी सिंह के लिए खतरे की घंटी बजाई है । गौर करने वाली बात यह भी है कि अभी छह दिन पहले ही करनाल में आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट की दूसरी मीटिंग में जेपी सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की थी । छह दिन के अंदर अंदर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने लेकिन डिस्ट्रिक्ट के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में उनकी बजाए वीएस कुकरेजा को तवज्जो देकर उनके रास्ते में धान बो देने जैसा काम किया है ।
विनय गर्ग की इस कार्रवाई से जेपी सिंह की उन्हें अपने साथ लाने की योजना भी खटाई में पड़ गई दिख रही है । जेपी सिंह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी राजनीति का हवाला देते हुए विनय गर्ग को अपने नजदीक करने का जुगाड़ बैठा रहे थे; वह लोगों को बता रहे थे कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने के लिए विनय गर्ग को उनके समर्थन की जरूरत पड़ेगी ही, और इसी जरूरत के चलते विनय गर्ग उनकी शरण में आने के लिए मजबूर होंगे । विनय गर्ग पर दबाव बनाने के लिए जेपी सिंह ने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह के साथ अपने सुधरते संबंधों का भी इस्तेमाल किया । जेपी सिंह ने सच तथा तर्कपूर्ण नजर आती बातों के जरिए संदेश देने की कोशिश की कि इंद्रजीत सिंह अभी भले ही विनय गर्ग के साथ रहने की कसमें खाते दिख रहे हों, लेकिन समय आने पर उनका रवैया बदला हुआ भी नजर आ सकता है । लेकिन लगता है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की राजनीति ही जेपी सिंह को उल्टी पड़ गई है । दरअसल मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की राजनीति के जरिए राजनीति करने का काम तेजपाल खिल्लन भी कर रहे हैं, और मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनावी गणित में उनका पलड़ा फिलहाल जेपी सिंह से भारी देखा/पहचाना जा रहा है । जेपी सिंह को जीएलटी एरिया लीडर होने के बावजूद अपने ही डिस्ट्रिक्ट के लीडरशिप इंस्टीट्यूट में कोई जगह नहीं मिली है - इसके पीछे तेजपाल खिल्लन का हाथ बताया/समझा जा रहा है ।
वीएस कुकरेजा को तेजपाल खिल्लन के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । विनय गर्ग ने 'अपने' लीडरशिप इंस्टीट्यूट में जेपी सिंह की बजाए वीएस कुकरेजा को जो तरज़ीह दी है, उसमें उनके मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए तेजपाल खिल्लन के साथ सौदेबाजी होने के संकेत देखे/पहचाने जा रहे हैं । विनय गर्ग को लगता है कि वीएस कुकरेजा को तरजीह देकर वह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए तेजपाल खिल्लन का समर्थन जुटा लेंगे । तेजपाल खिल्लन का अपने डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ अपने पास दो-एक और डिस्ट्रिक्ट्स के वोट होने का दावा है; जेपी सिंह वोट के मामले में बिलकुल खाली हैं - ऐसे में विनय गर्ग को यदि जेपी सिंह की बजाए तेजपाल खिल्लन के 'नजदीक' होने की कोशिश करने में फायदा दिख रहा है, तो यह बड़ा स्वाभाविक ही है । विनय गर्ग को हालाँकि कुछेक लोगों ने चेताया भी है कि तेजपाल खिल्लन लायनिज्म के बड़े 'व्यापारी' हैं, इसलिए उन पर ज्यादा भरोसा मत करना - उनका कुछ ठीक नहीं है कि वह कब क्या करें ? विनय गर्ग को डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा के अनुभव से सबक लेने का सुझाव भी दिया गया है ।
उल्लेखनीय है कि विशाल सिन्हा कई लोगों से तेजपाल खिल्लन की धोखाधड़ी का रोना रो चुके हैं । विशाल सिन्हा का कहना रहा है कि तेजपाल खिल्लन के कहने पर वह वीएस कुकरेजा को डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में ताशकंद ले गए थे, और वीएस कुकरेजा पर काफी पैसे खर्च किए थे । उन्हें उम्मीद थी कि इसके बदले में तेजपाल खिल्लन मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनकी मदद करेंगे, किंतु इस बारे में बात करने पर तेजपाल खिल्लन ने उन्हें टका-सा जबाव दे दिया कि मल्टीपल में उनकी बहुत बदनामी है, उनका फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ही उनके साथ नहीं है, इसलिए वह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने का सपना देखना छोड़ ही दें । तेजपाल खिल्लन से यह सुनकर विशाल सिन्हा हैरान रह गए और उन्होंने अपने आपको ठगा हुआ महसूस किया । विशाल सिन्हा की शिकायत है कि तेजपाल खिल्लन ने वीएस कुकरेजा पर उनसे बहुत से पैसे भी खर्च करवा लिए, और फिर उन्हें टका-सा जबाव देकर टरका भी दिया । विशाल सिन्हा के साथ जो हुआ, उसका हवाला देते हुए कुछेक लोगों ने विनय गर्ग को तेजपाल खिल्लन से सावधान रहने का तथा पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर न करने/रहने का सुझाव दिया है । लोगों का सुझाव अपनी जगह पर है, विनय गर्ग ने लेकिन अभी तेजपाल खिल्लन पर भरोसा करने का फैसला किया है ।
जेपी सिंह को अपने ही डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग से जो झटका लगा है, उससे निपटने/उबरने की कोशिश में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी की उम्मीदवारी में दिलचस्पी लेना शुरू किया है । अभी हाल ही में श्रीलंका में संपन्न हुई इसामे फोरम की मीटिंग में योगेश सोनी की सक्रियता से तथा उनके अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आनंद साहनी के साथ सहयोगात्मक संबंधों को देख कर जेपी सिंह लगता है कि काफी प्रेरित हुए हैं; और उन्हें लगा है कि वह योगेश सोनी के भरोसे मल्टीपल में राजनीति कर सकते हैं । कुछेक लोगों को हालाँकि लगता है कि योगेश सोनी के व्यक्तित्व में आक्रामकता का अभाव है; योगेश सोनी सीधे-सादे भले से व्यक्ति हैं और इस कारण से चुनावी राजनीति में वह कमजोर पड़ जाते हैं । किंतु अन्य कई लोगों का मानना और कहना है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की चुनावी राजनीति एक अलग तरह की राजनीति की 'माँग' करती है, और यहाँ सीधे-सादे भले से लोग तेज-तर्रारों पर भारी साबित होते हैं । इस संबंध में स्वर्गीय जगदीश राय गोयल का नाम खास तौर से लिया जाता है; उनका जैसा व्यक्तित्व था, उसे देखते हुए कोई उम्मीद नहीं कर सकता था कि उनके जैसा व्यक्ति मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बन सकेगा - पर वह बने । इसी आधार पर माना/कहा जा रहा है कि जिन बातों को योगेश सोनी की कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, हो सकता कि वही उनकी ताकत साबित हों ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की राजनीति में हालात किस दिशा में आगे बढ़ेंगे, इसका पता तो तब चलेगा जब उम्मीदवारों की सक्रियता पर्दे के पीछे से निकल कर सचमुच में लोगों के सामने आयेंगी; इस राजनीति के चक्कर ने अभी लेकिन जेपी सिंह को अपने ही डिस्ट्रिक्ट में बेगाना बना दिया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने उन्हें जो झटका दिया है, उससे उबरने में जेपी सिंह को थोड़ा समय तो लगेगा ही । देखना दिलचस्प होगा कि विनय गर्ग से मिले इस झटके को निष्प्रभावी करने के लिए वह क्या करते हैं ?

Monday, May 30, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में लायंस ब्लड बैंक के नए पदाधिकारियों तथा उनके नजदीकियों की बातों से लगता है कि वह जेपी सिंह को जल्दी से 'छोड़ेंगे' नहीं

नई दिल्ली । जेपी सिंह को अंततः अपने 'कमाऊ पूत' लायंस ब्लड बैंक से भी हाथ धोना पड़ा, और लोगों के जबर्दस्त विरोध के चलते उन्हें बेआबरू होकर लायंस ब्लड बैंक के कूचे से बाहर आने के लिए मजबूर होना पड़ा । गौर करने की मजे की बात यह है कि लायंस ब्लड बैंक को संचालित करने वाले लायंस सर्विस ट्रस्ट की वार्षिक आम सभा में किसी ने भी जेपी सिंह एंड टीम को ब्लड बैंक पर से कब्ज़ा छोड़ने के लिए नहीं कहा था, वार्षिक आम सभा में तो लोग लायंस ब्लड बैंक के खातों की गड़बड़ियों व बेईमानियों पर सवाल उठा रहे थे । जेपी सिंह एंड टीम ने उन सवालों का सामना करने व उनका जबाव देने की बजाए वार्षिक आम सभा से निकल भाग लेने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी - उन्होंने समझ लिया कि लोगों के सवालों के जरिए जिस तरह की गड़बड़ियों व बेईमानियों की पोल खुल रही है, उसके चलते उनके लिए लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा बनाए रख पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही होगा । लिहाजा मौके की नजाकत को पहचानते हुए जेपी सिंह एंड टीम ने लायंस ब्लड बैंक पर अपनी चौधराहट बचाए/बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं किया और लायंस सर्विस ट्रस्ट की वार्षिक आम सभा से चुपचाप निकल भागे । उन्हें विश्वास है कि लायंस ब्लड बैंक पर अपने कब्ज़े को वह आसानी से छोड़ देंगे, तो ब्लड बैंक के लाखों/करोड़ों की घपलेबाजी का हिसाब देने से बच जायेंगे - और यह कोई घाटे का सौदा नहीं है । लायंस ब्लड बैंक की आड़ में लूट-खसोट करने के लगातार लगते रहे आरोपों पर जेपी सिंह हमेशा यही कहते/बताते रहे हैं कि इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है, और विरोधी पक्ष की तरफ से यह आरोप लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से लगाए जा रहे हैं ।
इसी सोच के चलते जेपी सिंह को विश्वास है कि विरोधी पक्ष को अब जब लायंस ब्लड बैंक का कब्ज़ा मिल गया है, तो वह अपने ही द्वारा लगाए गए आरोपों को भूल जायेंगे । लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा पाने वाले नए पदाधिकारियों का कहना लेकिन यह है कि पदाधिकारी बनने से उनके लिए लायंस ब्लड बैंक में की जा रही धाँधलियों की जाँच करना तथा उन्हें पकड़ना आसान हो जायेगा, और तब वह घपला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे । लायंस ब्लड बैंक के नए पदाधिकारियों का दावा है कि ब्लड बैंक में घपलेबाजी करने वाला कोई भी व्यक्ति, चाहें वह कितना भी बड़ा हो और या बड़े लोगों का चहेता हो, बचेगा नहीं । लायंस ब्लड बैंक के नए पदाधिकारियों तथा उनके नजदीकियों की बातों से लगता है कि वह जेपी सिंह को जल्दी से 'छोड़ेंगे' नहीं । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए जेपी सिंह की जो फजीहत हुई, और उसके बाद लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़े की लड़ाई में जेपी सिंह ने जितनी जल्दी हार मान ली - उससे जेपी सिंह के विरोधियों के हौंसले खासे बुलंद हैं । उन्हें लगता है कि यह अच्छा मौका है कि वह जेपी सिंह को इतना पीछे धकेल दें, कि फिर वह आगे न आ सकें । दरअसल उन्हें भी लगता है कि जेपी सिंह अभी हारे तो जरूर हैं, लेकिन पूरी तरह से 'ख़त्म' नहीं हुए हैं । जेपी सिंह उचित मौके का इंतजार करेंगे, तथा जैसे ही परिस्थितियाँ अनुकूल होंगी, जेपी सिंह वापसी के लिए प्रयास करेंगे ।
जेपी सिंह के नजदीकियों का कहना भी है कि लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़े की लड़ाई में जेपी सिंह एंड टीम अभी इसीलिए पीछे हटी है, क्योंकि परिस्थितियाँ अभी पूरी तरह उनके खिलाफ हैं और वह जान/समझ रहे हैं कि अभी वह यदि लड़ाई लड़ेंगे भी तो निश्चित ही हारेंगे । हारने की इस निश्चितता को पहचानते हुए ही जेपी सिंह एंड टीम ने लड़ने की बजाए समर्पण करने की रणनीति अपनाई । उनका सोचना और कहना है कि विरोधी पक्ष को अभी तक तो सिर्फ आरोप लगाने होते थे, सो वह बहुत जोश में रहते थे; पर अब जब उन्हें काम करना पड़ेगा - तो आधा जोश तो उनका वैसे ही हवा हो जायेगा । जेपी सिंह तथा उनके नजदीकियों को लगता है कि विरोधी पक्ष के लोगों ने लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा तो ले लिया है, पर अब जब वह काम करेंगे तो गलतियाँ भी करेंगे - तब आरोप लगाने का मौका उन्हें मिलेगा; और तभी जेपी सिंह एंड टीम को वापसी करने का अवसर मिलेगा । जेपी सिंह को लगता है कि उन्हें यदि फिर से अपनी चौधराहट को पाना है, तो कुछ समय के लिए उन्हें राजनीतिक पचड़ों से दूर रहना चाहिए । राजनीति के चक्कर में उन्होंने अपने तमाम दुश्मन बना लिए हैं । उन्हें उम्मीद है कि राजनीतिक पचड़ों से वह दूर रहेंगे, तो उनके दुश्मनों की संख्या भी कम होगी । जेपी सिंह की इस सोच में लेकिन विरोधाभास यह है कि वह यदि राजनीति से दूर रहेंगे, तो लोगों के बीच अपना प्रभाव कैसे बनायेंगे ? अभी तक उन्होंने अपना जो प्रभाव बनाया था, वह राजनीति करके ही तो बनाया था । जाहिर है कि खोट राजनीति में नहीं, बल्कि राजनीति के 'तरीके' में है । जेपी सिंह का राजनीति का जो तरीका रहा, वह अभी तक भले ही कामयाब रहा हो - लेकिन अब उनका तरीका पिटने लगा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के 'चुनाव' में जेपी सिंह की जो फजीहत हुई, वह इस बात का सुबूत है कि जेपी सिंह के राजनीतिक हथकंडे अब पुराने पड़ गए हैं, तथा उनके भरोसे अब उन्हें कामयाबी नहीं मिलने वाली है । लायंस ब्लड बैंक की आड़ में घपलेबाजी के जो आरोप उनपर रहे हैं, और जिन आरोपों के कारण बने दबाव के चलते लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा छोड़ने के लिए वह मजबूर हुए - उससे जेपी सिंह की राजनीतिक परेशानी में और इजाफा हुआ है ।
लायंस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा करने के साथ ही विरोधी पक्ष के लोगों ने जिस तरह के तेवर दिखाए हैं, और जेपी सिंह को और और पीछे धकेलने के प्रति अपने 'उद्देश्य' को जाहिर किया है, उससे लग रहा है कि जेपी सिंह के खिलाफ उनका अभियान अभी जारी रहेगा । लायंस सर्विस ट्रस्ट की सदस्यता को लेकर नए पदाधिकारियों ने तुरंत से जो कदम उठाए हैं, उससे लायंस सर्विस ट्रस्ट तथा लायंस ब्लड बैंक में फिर से घुसपैठ करना जेपी सिंह के लिए मुश्किल ही होगा । जेपी सिंह ने अपनी राजनीति ज़माने में इन दोनों संस्थाओं का जमकर फायदा उठाया है । आगे की राजनीतिक यात्रा उन्हें इनकी मदद के बिना ही करना होगी - जाहिर है कि जेपी सिंह के लिए आगे की राजनीतिक यात्रा आसान नहीं होगी । उनके विरोधी जल्दी जल्दी प्राप्त की गईं दो दो जीतों के कारण जिस तरह के जोश में हैं, और जेपी सिंह को पूरी तरह मटिया देने के हुंकारे भर रहे हैं - उसे देख/सुनकर तो जेपी सिंह की आगे की राजनीतिक यात्रा बहुत ही चुनौतीपूर्ण लग रही है । आगे क्या होगा; जेपी सिंह अपनी राजनीतिक वापसी कर पायेंगे या नहीं, यह तो आगे पता चलेगा - किंतु अभी जो बात पता चल रही है वह यह है कि डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में आगे बहुत दिलचस्प नज़ारे देखने को जरूर मिलेंगे ।

Tuesday, April 26, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनाव में अनुपम बंसल पर प्राप्त की गई केएस लूथरा की धमाकेदार जीत ने विशाल सिन्हा के राजनीतिक मंसूबों को पूरी तरह से धूल में मिला दिया है

लखनऊ । केएस लूथरा ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनाव में अनुपम बंसल को जो जोरदार मात दी है, उसने विशाल सिन्हा के राजनीतिक मंसूबों पर पानी फेरने तथा उनके 'राजनीतिक धंधे' को पूरी तरह चौपट कर देने का काम किया है । विशाल सिन्हा अगले लायन वर्ष के अपने गवर्नर-काल में कुछेक लोगों को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए यह कहते हुए प्रेरित कर रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मेरा सहयोग/समर्थन रहेगा, तो चुनाव जीतना आसान रहेगा । लेकिन विशाल सिन्हा के तमाम समर्थन और उनकी निरंतर सक्रियता के बावजूद अनुपम बंसल जिस भारी अंतर से केएस लूथरा से चुनाव हार गए हैं, उसे देखते हुए विशाल सिन्हा के सामने संकट यह पैदा हुआ है कि ऐसे में डिस्ट्रिक्ट में कौन होगा जो उनके समर्थन पर भरोसा करेगा ? हर किसी के मन में और जुबान पर यही सवाल है कि विशाल सिन्हा जब अपने सबसे खास दोस्त अनुपम बंसल को चुनाव नहीं जितवा सके, तो फिर वह और किसे चुनाव जितवा सकेंगे ? विशाल सिन्हा के लिए मुसीबत की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों का मानना और कहना है कि अनुपम बंसल की इतनी बुरी हार के लिए वास्तव में विशाल सिन्हा ही जिम्मेदार हैं । डिस्ट्रिक्ट में अपने रवैये और व्यवहार से विशाल सिन्हा ने दरअसल अपनी एक नकारात्मक पहचान ही बनाई है - कुछेक लोगों को हालाँकि उम्मीद थी कि विशाल सिन्हा जब एक कार्यकर्ता का चोला छोड़ कर 'नेता' बनने की तरफ अग्रसर होंगे तो वह अपने रवैये व व्यवहार में सुधार करेंगे तथा सचमुच एक 'जेंटिलमैन' बनने का प्रयास करेंगे; किंतु ऐसी उम्मीद रखने वालों को निराशा ही हाथ लगी है । इसका खामियाजा हालाँकि खुद विशाल सिन्हा ने ही भुगता है । विशाल सिन्हा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का अपना पहला चुनाव, निहायत कमजोर 'दिख' रहे शिव कुमार गुप्ता से हार गए - यह केएस लूथरा की विशाल सिन्हा को पहली चोट थी । दूसरी बार में विशाल सिन्हा तब सफल हो सके, जब उन्होंने केएस लूथरा की हर रोज सुबह-शाम पूजा की और उन्हें अपने समर्थन के लिए मनाया । तीसरी बार अशोक अग्रवाल की हार के रूप में विशाल सिन्हा को केएस लूथरा ने एक बार फिर 'धोया' । अब की बार, विशाल सिन्हा ने केएस लूथरा के साथ अपना पिछला 'हिसाब-किताब' बराबर करने की भारी तैयारी की - लेकिन केएस लूथरा ने एक बार फिर उन्हें ऐसी जोरदार पटकनी दी, जिसकी चोटें ठीक होने में बहुत समय लगेगा ।
अबकी बार, केएस लूथरा से बदला ले लेने का विशाल सिन्हा को पूरा भरोसा था । वह चूँकि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, इसलिए उन्हें भरोसा रहा कि अगले लायन वर्ष की अपनी डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट के पद 'बेच' कर वह अनुपम बंसल के लिए वोट खरीद लेंगे - और केएस लूथरा से अपना पिछला सारा हिसाब-किताब बराबर कर लेंगे । उनके इस भरोसे को और भरोसा नीरज बोरा का समर्थन मिलने से मिला । अनुपम बंसल को चूँकि गुरनाम सिंह के उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा था, और नीरज बोरा को गुरनाम सिंह के विरोधी के रूप में पहचाना जाता रहा है - इसलिए नीरज बोरा को जब अनुपम बंसल के समर्थन में देखा गया, तो अनुपम बंसल का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आया । गुरनाम सिंह, नीरज बोरा और विशाल सिन्हा की तिकड़ी ने एक बड़ा काम यह किया कि कैबिनेट सेक्रेटरी लालजी वर्मा व चीफ एडवाइजर एचएन सिंह को अनुपम बंसल की उम्मीदवारी के पक्ष में सक्रिय कर/करा दिया । इन तिकड़ी का वास्तविक उद्देश्य दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता का समर्थन पाना था, जो तटस्थ भूमिका में थे - और जिनकी तटस्थ भूमिका तिकड़ी को पसंद नहीं आ रही थी । शिव कुमार गुप्ता पर दबाव बनाने लिए इस तिकड़ी ने उनके दोनों प्रमुख सहयोगियों - लालजी वर्मा व एचएन सिंह को उनके खिलाफ कर दिया । गुरनाम सिंह, नीरज बोरा व विशाल सिन्हा ने केएस लूथरा को डिस्ट्रिक्ट में अकेला व अलग-थलग कर देने के उद्देश्य से खासा पक्का और ठोस जाल बुना - लेकिन वह केएस लूथरा को जाल में कैद नहीं कर पाए । उलटे केएस लूथरा ने ही उन्हें उनके बनाए जाल में ऐसा फँसा दिया है कि उसमें से निकल पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है ।
मजे का सीन यह बना है कि अनुपम बंसल के ही कुछेक नजदीकी अनुपम बंसल की भारी हार के लिए विशाल सिन्हा को कोस रहे हैं । उनका कहना है कि अनुपम बंसल को उम्मीदवार बनाने से लेकर उन्हें जितवाने की कोशिश करने के नाम पर विशाल सिन्हा ने जो हरकतें कीं, उनने लोगों को नाराज करने का काम ही किया, जिसका फायदा केएस लूथरा ने उठाया । दरअसल अनुपम बंसल की उम्मीदवारी और उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में जो 'शिवजी की बारात' बनी, उसे एक अवसरवादी गठजोड़ के रूप में देखा/पहचाना गया - जिसके बस की केएस लूथरा तथा उनकी राजनीति से निपटना था ही नहीं । केएस लूथरा ने पिछले वर्षों में बार-बार अपने आप को आम लायन से जुड़ा हुआ साबित किया है; पिछले वर्षों में जब भी मुकाबले की स्थिति बनी है, केएस लूथरा ने हर बार साबित किया है कि वह 'जनता के आदमी' हैं और आम लायन सदस्य की नब्ज पहचानते हैं - और उन्हें तिकड़मों से नहीं हराया जा सकता । विशाल सिन्हा बार बार, कई बार केएस लूथरा से 'पिटे' हैं, पर फिर भी वह इस बात को नहीं समझ सके । विशाल सिन्हा से भी ज्यादा दिलचस्प नजारा लालजी वर्मा व एचएन सिंह ने पेश किया : डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस से छह दिन पहले तक यह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ मिल कर चुनाव की तैयारी कर/करवा रहे थे, उसके बाद इन्होंने अनुपम बंसल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया और उनके लिए वोट जुटाने/माँगने के काम पर लगे; किंतु अब जब अनुपम बंसल चुनाव बुरी तरह हार गए तो यह लोगों को ज्ञान बाँट रहे हैं कि इस चुनाव का तो कोई औचित्य ही नहीं था और यह चुनाव करा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने लोगों को गुमराह किया है । कोई इनसे पूछे कि भाई जब आपको इतना ज्ञान है, तो यह आपने चुनाव से पहले लोगों को क्यों नहीं बताया; आपने अनुपम बंसल तथा उनके समर्थक नेताओं को क्यों नहीं आगाह किया कि इस चुनाव का कोई औचित्य नहीं है, इसके चक्कर में अपनी फजीहत क्यों करवा रहे हो ? इनके अनुसार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने लोगों को गुमराह किया, पर यह इस सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं कि यह खुद गुमराह क्यों हुए ? इस सवाल का जबाव यह कभी नहीं देंगे - इन्हें दरअसल अपनी खीझ मिटानी है जो इनके समर्थन के बावजूद अनुपम बंसल के बुरी तरह हार जाने से पैदा हुई है ।
इनसे भी बुरी स्थिति लेकिन बीएन चौधरी की हुई है । बीएन चौधरी ने विशाल सिन्हा के गवर्नर-काल में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की तैयारी कर ली थी, और इस तैयारी के तहत ही उन्होंने विशाल सिन्हा के गवर्नर-काल के कैबिनेट सेक्रेटरी का पदभार भी सँभाल लिया है । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने कुछेक मौकों पर उनकी उम्मीदवारी की घोषणा भी कर दी है । लेकिन अनुपम बंसल की जो बुरी गत बनी है, उसे देख कर बीएन चौधरी का सारा जोश हवा होता हुआ नजर आ रहा है । उन्हें लग रहा है कि विशाल सिन्हा के चक्कर में वह अपनी अनुपम बंसल जैसी फजीहत क्यों करवाएँ ? बीएन चौधरी के बदले बदले मिजाज को देख कर विशाल सिन्हा ने कुछेक दूसरे संभावित उम्मीदवारों पर डोरे डालने की कोशिश की, लेकिन कोई भी विशाल सिन्हा को फँसता हुआ नहीं दिख रहा है । विशाल सिन्हा की समस्या यह है कि वह संभावित उम्मीदवारों से आखिर किस मुँह से कहें कि चिंता मत करो, मैं मदद करूँगा - क्योंकि सभी ने देख ही लिया है कि विशाल सिन्हा की मदद के बाद बेचारे अनुपम बंसल का अंततः क्या हाल हुआ है । जाहिर तौर पर इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनाव में अनुपम बंसल पर प्राप्त की गई केएस लूथरा की धमाकेदार जीत ने विशाल सिन्हा के तमाम राजनीतिक मंसूबों को फिलहाल तो धूल में मिला दिया है ।

Monday, April 25, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी मामले में जेपी सिंह की ऐतिहासिक फजीहत करने/कराने के बाद, उनके विरोधियों ने उन्हें ब्लड बैंक के मामले में घेरने की तैयारी शुरू की

नई दिल्ली । जेपी सिंह ने लायंस की चुनावी राजनीति में एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया है - इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए वह अकेले उम्मीदवार थे, लेकिन फिर भी वह चुनाव हार गए । इस तरह जेपी सिंह को किसी और ने नहीं हराया, बल्कि खुद उन्होंने ही अपने आप को हरा दिया । कुछेक लोगों का कहना है कि जेपी सिंह की खुद की हरकतों व कारस्तानियों ने ही उन्हें चुनाव में हरा दिया है । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने की जेपी सिंह की तैयारी को इस तरह से जो 'जोर का झटका' लगा है, उसने आरोपों-प्रत्यारोपों की एक नई सीरीज शुरू कर दी है : जेपी सिंह ने लायन राजनीति में हुई अपनी 'इस सबसे बड़ी दुर्गति' के लिए अपने समर्थकों व नजदीकियों को ही जिम्मेदार ठहराया है, जबकि उनके समर्थकों व नजदीकियों के अनुसार जेपी सिंह अपनी खुद की करनी तथा ब्लड बैंक की कमाई 'हड़पने' के आरोपों के कारण इस दशा को प्राप्त हुए हैं । जेपी सिंह का कहना है कि अपने विरोधियों की उन्हें पहचान थी, किंतु वह संख्या में इतने कम थे और हैं कि वह चुनावी हार का कारण नहीं हो सकते - उन्हें तो अपने समर्थकों व नजदीकियों से ही धोखा मिला है । जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के मामले में मिले झटके के लिए मुख्य रूप से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रमोद सपरा तथा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह की भूमिका को जिम्मेदार मानते हैं; उनका कहना है कि ऐन मौके पर इन दोनों ने उन्हें धोखा दिया - जिसके चलते उनके लिए हालात मुश्किल हो गए । इन दोनों की तरफ से लेकिन जेपी सिंह के इस आरोप का मजाक उड़ाया जा रहा है : इनका कहना है कि जेपी सिंह बड़े नेता हैं, वह डिस्ट्रिक्ट की और मल्टीपल की तथा उससे और ऊपर की राजनीति चलाते हैं - हमारे जैसे छोटे नेता उनकी अपनी हार का कारण भला कैसे हो सकते हैं ? दूसरे कई लोगों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के मुद्दे पर मिली हार ने जेपी सिंह को वास्तव में आईना दिखाया है, और आईने में अपनी बिगड़ी तस्वीर के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने की बजाए उन्हें अपने गिरेबान में झाँकना/देखना चाहिए । जेपी सिंह के लिए बदकिस्मती की बात यह है कि इस समय जबकि वह अपने लायन जीवन के सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं, तब उनके प्रति हमदर्दी दिखाने के लिए कोई नहीं है और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के रूप में देखे जाने वाले लोग भी उनकी दशा पर मजे ले रहे हैं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की राजनीति लगता है कि जेपी सिंह का बंटाधार करेगी । विडंबना की बात यह है कि मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जेपी सिंह को सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप देखा/पहचाना जा रहा है, लेकिन अपने खुद के डिस्ट्रिक्ट में जेपी सिंह को न सिर्फ नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं, बल्कि उसके बाद भी उन्हें फजीहत का शिकार होना पड़ रहा है । अब किसी उम्मीदवार की इससे बड़ी फजीहत और क्या होगी कि वह अकेला उम्मीदवार होता है, लेकिन फिर भी वह चुनाव हार जाता है । जेपी सिंह के साथ के लोगों का ही कहना है कि इस स्थिति के लिए खुद जेपी सिंह ही जिम्मेदार हैं । दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए रमेश नांगिया की प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी से जेपी सिंह जिस बुरी तरह से डर गए - फिर वही डर उन्हें ले डूबा । रमेश नांगिया के ही कुछेक समर्थकों का कहना है कि उन्हें रमेश नांगिया के जीतने की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी, लेकिन जेपी सिंह ने रमेश नांगिया की उम्मीदवारी सामने आने पर जिस तरह की घबराहट दिखाई और जिस तरह की बेबकूफियाँ कीं - उससे जेपी सिंह ने अपने प्रति विरोध को संगठित व आक्रामक बनाने का काम किया, और जिसका नतीजा हुआ कि रमेश नांगिया को चुनावी मैदान से हटवा देने के बाद भी वह चुनाव हार गए । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को जानने/समझने वाले लोगों का मानना और कहना है कि रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को लेकर जेपी सिंह अपनी घबराहट न दिखाते, और लोगों के बीच अपना समर्थन मजबूत करने तथा बढ़ाने में जुटते तो रमेश नांगिया को हरा कर वही चुनाव जीतते - लेकिन जेपी सिंह अपनी उम्मीदवारी के लिए काम करने की बजाए रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को वापस कराने और रद्द कराने की तिकड़मों में लग गए । इससे लोगों के बीच यही संदेश गया कि वह रमेश नांगिया की उम्मीदवारी से डर गए हैं । इस संदेश का सीधा और गहरा असर यह हुआ कि जेपी सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों के हौंसले पस्त पड़े, जबकि उनके विरोधियों में खासा जोश भर गया ।
इस असर को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के पहले दिन रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को रद्द करने की कार्रवाई से और पंख लगे । जेपी सिंह ने सोचा तो यह था कि वह रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को ही रद्द करवा देंगे, तो चुनाव का झँझट ही खत्म हो जायेगा और उनकी हार का खतरा पूरी तरह टल जायेगा । जेपी सिंह ही क्या, अन्य कोई भी नहीं जानता था कि इस तिकड़म से जेपी सिंह सिर्फ अपनी हार को ही नहीं, इतिहास बनाने वाली अपनी फजीहत को भी आमंत्रित कर रहे हैं । चुनाव हो जाता, और जेपी सिंह हार जाते - तो यह चुनावी दुनिया की एक सामान्य घटना होती; लेकिन जो हुआ वह ऐतिहासिक इसलिए हुआ क्योंकि उम्मीदवार एक ही था, अकेला था - लेकिन फिर भी हार गया । अपनी स्थापना के सौंवे वर्ष में प्रवेश करने जा रहे लायंस इंटरनेशनल के इतिहास में जेपी सिंह संभवतः पहले और अकेले उम्मीदवार होंगे, जो अकेले उम्मीदवार होने के बावजूद चुनाव हार गए । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के पहले दिन रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को रद्द करने/कराने की कार्रवाई का जो जोरदार विरोध हुआ, उससे भी जेपी सिंह ने कोई सबक नहीं लिया । जेपी सिंह ने मान लिया कि रमेश नांगिया के उम्मीदवार न रहने से उनका एंडोर्सी बनना अब सुनिश्चित ही है, और इसलिए लोगों की नाराजगी व उनके विरोध की उन्हें परवाह करने की क्या जरूरत है ? इसी विश्वास के चलते उन्होंने विरोध करने वाले लोगों की वॉयस वोट कराने की माँग को मान लेने दिया । वॉयस वोटिंग में जब उनके समर्थन में पड़े वोटों की संख्या (98) उनके विरोध में पड़े वोटों की संख्या (116) से 18 कम निकली - तो जेपी सिंह के तोते उड़ गए । इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने की जेपी सिंह की तैयारी पर जो 'वाट लगी', वह सिर्फ चुनाव हारने का मामला भर नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक किस्म की फजीहत है । जेपी सिंह की यह जो फजीहत हुई है, लायंस इंटरनेशनल के इतिहास में उनके जैसी ऐसी फजीहत शायद ही कभी किसी की हुई होगी ।
जेपी सिंह के लिए मुसीबत की बात यह है कि उनका जो यह हाल हुआ है, उससे डिस्ट्रिक्ट में उनके विरोधियों के हौंसले खासे मजबूत हुए हैं - और इन मजबूत हौंसलों के बल पर उनके विरोधी अब उन्हें ब्लड बैंक के मामले में घेरने की तैयारी कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि ब्लड बैंक में जेपी सिंह की बेईमानी तथा लूट के किस्से यूँ तो बहुत मशहूर हैं, लेकिन इन किस्सों को कहने/बताने वाले लोग इस मामले में जेपी सिंह को कभी घेर नहीं पाए । लगता है कि अब उन्हें मौका मिला है, और इस मौके का इस्तेमाल करने के लिए वह अपनी अपनी कमर कसने लगे हैं । जेपी सिंह के सामने मुसीबत यह है कि ब्लड बैंक पर अपना कब्जा यदि वह छोड़ भी देते हैं, तो यहाँ की गई गड़बड़ियों को मुद्दा बना कर उनके विरोधी उनका लायन राजनीति का कैरियर खत्म करने की कार्रवाई करेंगे; और यदि वह ब्लड बैंक पर अपना कब्जा बनाए रखने का प्रयास करते हैं - तो उनका यह प्रयास उनकी राजनीति को एक अलग तरीके से कमजोर करेगा । कई लोग मानते/कहते ही हैं कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी मामले में जेपी सिंह की हुई फजीहत की जड़ में ब्लड बैंक की राजनीति ही है । ऐसे में जेपी सिंह के लिए एक तरफ कुँआ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है - जिसे इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनावी नतीजे ने और भी संगीन बना दिया है ।