नई दिल्ली | इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दुर्गा दास अग्रवाल को अपनी ही टीम के प्रमुख पदाधिकारियों से जो चुनौती मिली है, उसके चलते नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का कामकाज तो ठप्प हो ही गया है, दुर्गा दास अग्रवाल की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी का अभियान भी मुसीबत में फँस गया है | इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में ऐसा ड्रामा पहले शायद ही कभी हुआ होगा | उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दुर्गा दास अग्रवाल पर काउंसिल के पैसों के दुरूपयोग का आरोप लगाते हुए काउंसिल के ट्रेजरार दीन दयाल अग्रवाल ने कुछेक भुगतान करने से इंकार कर दिया | दुर्गा दास अग्रवाल ने दीन दयाल अग्रवाल से मिली इस चुनौती से निपटने के लिए लेकिन जो फार्मूला अपनाया, वह उन्हें उल्टा पड़ गया | दुर्गा दास अग्रवाल ने ट्रेजरार के अधिकार वाइस चेयरमैन गोपाल केडिया को भी यह सोच कर दे दिए कि दीन दयाल अग्रवाल जो भुगतान करने से इंकार करेंगे, वह भुगतान गोपाल केडिया से करवा लेंगे | काउंसिल के ट्रेजरार दीन दयाल अग्रवाल को तो दुर्गा दास अग्रवाल का यह फार्मूला नागवार गुजरा ही, काउंसिल के सचिव प्रमोद कुमार माहेश्वरी ने भी चेयरमैन के रूप में दुर्गा दास अग्रवाल द्धारा लिए गए इस फैसले का विरोध किया | प्रमोद कुमार माहेश्वरी और दीन दयाल अग्रवाल ने दुर्गा दास अग्रवाल के फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया | अदालत तक बात पहुँचने की जानकारी मिलते ही दुर्गा दास अग्रवाल दबाव में आ गए और उन्होंने गोपाल केडिया को ट्रेजरार के दिए अधिकार वापस ले लिए | दुर्गा दास अग्रवाल ने ऐसा करके मामले को और बढ़ने व गंभीर रूप लेने से तो बचा लिया, लेकिन तब तक प्रमोद कुमार माहेश्वरी और दीन दयाल अग्रवाल लोगों के बीच उन्हें कठघरे में खड़े करने में कामयाब हो चुके थे |
प्रमोद कुमार माहेश्वरी और दीन दयाल अग्रवाल का आरोप रहा कि दुर्गा दास अग्रवाल काउंसिल के पैसों का मनमाना दुरूपयोग कर रहे हैं और सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए अभियान चलाने में रीजनल काउंसिल के पैसों का इस्तेमाल कर रहे हैं | इनका आरोप रहा कि खर्चों के हिसाब-किताब के बारे में काउंसिल के दूसरे पदाधिकारियों से पूछना/बताना तो दूर, खर्चों के बारे में की गई पूछताछों व आपत्तियों का भी जबाव देना उन्होंने जरूरी नहीं समझा | इन्होंने आरोप लगाया कि दुर्गा दास अग्रवाल द्धारा किए जा रहे अनाप-शनाप खर्चों को नियंत्रित करने के लिए ट्रेजरार के रूप में दीन दयाल अग्रवाल ने कुछेक भुगतान रोक दिए तो दुर्गा दास अग्रवाल ने गैरकानूनी तरीके से गोपाल केडिया को भी ट्रेजरार के अधिकार दे दिए, ताकि वह काउंसिल के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करते रह सकें | दुर्गा दास अग्रवाल ने इस तरह के आरोपों को बेबुनियाद बताया और दावा किया कि दीन दयाल अग्रवाल और प्रमोद कुमार माहेश्वरी ने अपनी मनमानी और दादागिरी चलाने के लिए अपने पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह करने से इंकार किया और एक तरह से काउंसिल को बंधक बनाने की कोशिश की है | दुर्गा दास अग्रवाल के नजदीकियों ने इस सारे झमेले के लिए सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को जिम्मेदार ठहराया | उन्होंने आरोप लगाया कि प्रमोद माहेश्वरी और दीन दयाल अग्रवाल दरअसल सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के हाथों की कठपुतली बन गए हैं और उनके ही इशारों पर रीजनल काउंसिल की गतिविधियों को बाधित कर रहे हैं | दुर्गा दास अग्रवाल के नजदीकियों का कहना रहा कि चूँकि दुर्गा दास अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार हो गए हैं, जो कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों को पसंद नहीं आ रहा है - और इसीलिए उन्होंने दीन दयाल अग्रवाल और प्रमोद कुमार माहेश्वरी के जरिये दुर्गा दास अग्रवाल के लिए मुसीबतें खड़ी करवा दीं | दुर्गा दास अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि दुर्गा दास अग्रवाल के लिए मुसीबतें खड़ी करवाने वाले लोगों ने लेकिन यह नहीं सोचा कि वह जो कर रहे हैं, उसके चलते रीजनल काउंसिल का मजाक बन गया है |
रीजनल काउंसिल का जो मजाक बना है, उसके लिए कई लोग दुर्गा दास अग्रवाल की महत्वाकांक्षा को भी जिम्मेदार ठहराते हैं | आरोप है कि रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने के लिए दुर्गा दास अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों का समर्थन जुटाने हेतु उनके साथ कई तरह के समझौते किए - लेकिन चेयरमैन बनते ही वह समझौतों की बातों से मुकर गए और अपनी मनमानी करने लगे | आरोपों में जिन समझौतों का जिक्र सुनने में आया है उनमें प्रमुख बात यही थी कि दुर्गा दास अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं बनेंगे और चेयरमैन के रूप में जो काम करेंगे सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों के साथ सलाह मशविरा कर करेंगे | दुर्गा दास अग्रवाल ने लेकिन चेयरमैन बनते ही सबसे पहला काम यह किया कि सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की और उसके बाद - उन पर गंभीर आरोप यह रहा कि रीजनल काउंसिल के कार्यक्रमों को उन्होंने अपने चुनाव अभियान की तरह संयोजित करना शुरू किया | कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि दीन दयाल अग्रवाल और प्रमोद कुमार माहेश्वरी इसलिए दुर्गा दास अग्रवाल के खिलाफ नहीं हुए कि इन्होंने सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों के साथ किन्हीं कथित समझौतों का उल्लंघन किया, बल्कि इसलिए खिलाफ हुए क्योंकि इन्होंने पाया कि दुर्गा दास अग्रवाल ने काउंसिल में अपना गुट बना लिया और इन्हें पूरी तरह इग्नोर कर रहे हैं | इन्हीं कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि दुर्गा दास अग्रवाल चाहते तो खटपट शुरू होते और सामने आते ही हालात को संभाल सकते थे, पर उन्हें शायद उम्मीद नहीं होगी कि मामला इतना बढ़ जायेगा | गोपाल केडिया को ट्रेजरार के अधिकार देकर तो उन्होंने ब्लंडर कर दिया | दुर्गा दास अग्रवाल के इस कदम से दीन दयाल अग्रवाल और प्रमोद कुमार माहेश्वरी के आरोपों को खासा बल मिला - जिस कारण दुर्गा दास अग्रवाल के लिए हालात प्रतिकूल बने | दुर्गा दास अग्रवाल ने इस बात को तुरंत समझ भी लिया - यही कारण है कि उन्होंने गोपाल केडिया को ट्रेजरार के दिए अधिकार वापस लेने में भी देर नहीं लगाई | लेकिन तब तक उनके बारे में नकारात्मक माहौल बन चुका था |
दुर्गा दास अग्रवाल के नजदीकियों तक का मानना और कहना है कि जो हुआ है उससे दुर्गा दास अग्रवाल की ही फजीहत हुई है और सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत की गई उनकी उम्मीदवारी पर ग्रहण लग गया है | दुर्गा दास अग्रवाल की फजीहत में सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों का कोई हाथ हो या न हो, किंतु उसमें उन्हें फायदा होता हुआ जरूर दिख रहा है | सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों के अलावा, सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार प्रस्तुत करने वाले आरके गौड़ ने भी राहत महसूस की होगी | दरअसल सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाले चुनाव में आरके गौड़ को सबसे नजदीकी चुनौती दुर्गा दास अग्रवाल से ही मिलने का खतरा पैदा हो गया था | दोनों के समर्थन आधार की एक समान भौगोलिक स्थिति के कारण ही नहीं, दोस्तों की लगभग एक-सी सूची के कारण भी आरके गौड़ को दुर्गा दास अग्रवाल की उम्मीदवारी से सीधी चुनौती मिलने की आशंका व्यक्त की जा रही थी | लेकिन नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में मचे घमासान में दुर्गा दास अग्रवाल की जैसी जो फजीहत हुई है, उसके चलते आरके गौड़ को राहत मिलने की उम्मीद बनी है |
Sunday, August 5, 2012
Saturday, July 14, 2012
विनोद बंसल क्या वीरेंद्र 'बॉबी' जैन को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने के लिए मजबूर होंगे ?
नई दिल्ली | विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर वीरेंद्र उर्फ़ बॉबी जैन तथा असित मित्तल के बीच बुरी तरह फँस गए हैं और इस कारण उनके लिए यह फैसला करना मुश्किल हो रहा है कि वह अपने गवर्नर काल के लिए किसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाये | उनके नजदीकियों और उनकी महत्वाकांक्षाओं को समझने का दावा करने वाले लोगों का कहना है कि वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद देना तो ऐसे वरिष्ठ रोटेरियन को चाहते हैं, जिसकी ऊँगली पकड़ कर वह रोटरी की 'आगे' की यात्रा को सुगमता के साथ जारी रख सकें; लेकिन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद को लेकर बॉबी जैन और असित मित्तल ने उनकी ऐसी जान खाई हुई है कि जो वह चाहते हैं उसे पूरा करने में उनके पसीने छूट रहे हैं | दरअसल बॉबी जैन और असित मित्तल - दोनों को पता है कि विनोद बंसल के समय ही वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की उम्मीद कर सकते हैं - इसके बाद तो फिर उनके सामने कोई मौका नहीं आयेगा | इसलिए दोनों ही विनोद बंसल को गवर्नर बनवाने में मदद करने की कीमत के रूप में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद पा लेना चाहते हैं |
विनोद बंसल के नजदीकियों के अनुसार, विनोद बंसल लेकिन इन दोनों में से किसी को भी डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर नहीं बनाना चाहते है | असित मित्तल की तो बदनामी उनके आड़े आ रही है - असित मित्तल ने अपना गवर्नर काल ही जैसे तैसे 'छिप-छिपा' कर पूरा किया है, विनोद बंसल उससे परिचित हैं; पिछले वर्ष असित मित्तल के चक्कर में रवि चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करके विनोद बंसल ने जो बदनामी पाई, उसका सबक भी वह भूले नहीं होंगे - इसलिए किसी को विश्वास नहीं है कि विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद असित मित्तल को सौपेंगे | बॉबी जैन को लेकर भी तमाम झंझट हैं : एक झंझट तो यही है कि डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख नेताओं के साथ बॉबी जैन का छत्तीस का ही रिश्ता रहा है, दूसरा झंझट यह है कि बॉबी जैन काफी समय से डिस्ट्रिक्ट में चूँकि सक्रिय ही नहीं हैं - इसलिए अधिकतर लोगों को न वह जानते/पहचानते हैं और न अधिकतर लोग उन्हें जानते/पहचानते हैं | लोग जान/समझ रहे हैं कि बॉबी जैन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होंगे, तो बस नाम के ही होंगे - काम सब विनोद बंसल को खुद ही करना होगा | दूसरे यह जान/समझ रहे हैं, तो विनोद बंसल भी यह जान/समझ रहे होंगे | शायद इसीलिए वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर फैसला नहीं कर पायें हैं |
विनोद बंसल 16 जुलाई को अपनी टीम के संभावित साथियों के साथ पहली मीटिंग कर रहे हैं - इस समय तक उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का चयन कर लेना चाहिए | लेकिन उन्होंने ही कहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का फैसला होने में अभी कुछ समय और लगेगा | जिन भी लोगों ने उनसे इस बारे में बात की है - उन सभी को उन्होंने ऐसा ही जवाब दिया है | इसी से समझा जा सकता है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर वह कितने दवाब में हैं ?
विनोद बंसल के नजदीकियों को लगता है कि बॉबी जैन का दवाब झेल पाना विनोद बंसल के लिए मुश्किल ही होगा और इसलिए बहुत संभव है कि बॉबी जैन ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनें | विनोद बंसल के नजदीकियों के अनुसार, बॉबी जैन चूँकि विनोद बंसल के क्लब के ही हैं, और इस बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के मिल सकने वाले मौके को चूँकि वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते हैं इसलिए उन्होंने विनोद बंसल को संकेत पहुँचवा दिए हैं कि यदि वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर नहीं बनाये गए तो विनोद बंसल के लिए क्लब में रहना मुश्किल हो जायेगा - और इसलिए विनोद बंसल को मन मार कर बॉबी जैन को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना ही पड़ेगा |
विनोद बंसल की क्षमताओं व सामर्थ्य से परिचित लोगों का मानना और कहना लेकिन यह है कि विनोद बंसल किसी दवाब में आने वाले व्यक्ति नहीं हैं - और वह वही करेंगे जो उन्हें ठीक लगेगा | विनोद बंसल क्या करेंगे और किसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे - यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा : लेकिन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर जो बेवजह का बवाल बन गया है - उसे बनाने की जिम्मेदारी तो विनोद बंसल की ही है | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर तय करने के मामले को लटकाए रख कर उन्होंने लोगों को अनुमान लगाने के मौके दिए - जिससे फिर बात का बतंगड़ बनना ही था और वह बना भी | विनोद बंसल के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर फैसला जितना टालेंगे उतनी ही बातें बनेगीं | समस्या का चक्रव्यूह लेकिन यही है कि विनोद बंसल फैसला कर इसीलिए नहीं पा रहे हैं क्योंकि उन पर तरह-तरह के दवाब हैं, और चूँकि फैसला नहीं कर पा रहे हैं इसलिए दवाब और बढ़ते जा रहे हैं |
विनोद बंसल के नजदीकियों का कहना है कि विनोद बंसल ने यदि दवाबों की परवाह किए बिना फैसला किया तो कोई तीसरा व्यक्ति ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनेगा; लेकिन यदि वह दवाब में आये तो वीरेंद्र उर्फ़ बॉबी जैन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनेंगे | असित मित्तल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की किसी को उम्मीद नहीं है | लोगों का मानना है कि असित मित्तल कोशिश चाहें जितनी कर रहे हों, विनोद बंसल उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने का खतरा नहीं उठायेंगे |
Wednesday, July 11, 2012
विनोद बंसल की गुपचुप तरीके से की जा रही मीटिंग की तैयारी में, अपने को उनका बहुत खास समझने वाले कई लोगों ने ठगा-सा महसूस किया है
नई दिल्ली | विनोद बंसल की डिस्ट्रिक्ट टीम का सदस्य बनने की तैयारी में 'बैठे' कई लोगों को यह जान कर खासा तगड़ा झटका लगा है कि 16 जून को आयोजित की जा रही अपनी पहली अनौपचारिक मीटिंग का निमंत्रण विनोद बंसल ने उन्हें दिया ही नहीं है | विनोद बंसल के इस रवैये को देख कई लोग अपने आप को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं | उनके लिए समस्या यह हो गई है कि विनोद बंसल के साथ अपनी नजदीकियत की जिस तरह की डींगें वह जिन लोगों के बीच हाँक चुके हैं - उन लोगों को वह अब क्या मुँह दिखायेंगे ? कुछेक लोगों ने तो कहना शुरू भी कर दिया है कि विनोद बंसल से उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी - उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में मदद करने का विनोद बंसल इस तरह से उन्हें ईनाम देंगे ?
विनोद बंसल की भी समस्या है ! विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव जीतने के लिए बहुत से लोगों की मदद की जरूरत थी | इस जरूरत को पूरा करने के लिए - जैसा कि प्रत्येक उम्मीदवार करता, विनोद बंसल ने भी किया और लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाये | लोगों के साथ उनके जो अच्छे संबंध बने, उसका फायदा उन्हें तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी जीत के रूप में मिल गया; उनकी चुनावी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को फायदा बसूल करने के लिए लेकिन इंतजार करना था | विनोद बंसल की चुनावी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों ने इंतजार किया भी - और उनके लिए जैसे-जैसे फायदा लेने का समय नज़दीक आता गया, वह तैयारी में जुटने लगे और विनोद बंसल के निमंत्रण की प्रतीक्षा करने लगे | कईयों को लेकिन यह जान कर खासा तगड़ा झटका लगा कि विनोद बंसल 16 जुलाई को अपनी टीम के संभावित सदस्यों के साथ जो मीटिंग कर रहे हैं उसके बारे में विनोद बंसल ने उन्हें हवा भी नहीं लगने दी है | विनोद बंसल का यह रवैया उन लोगों को ज्यादा बुरा लगा जो इस बीच उनके संपर्क में थे, लेकिन फिर भी विनोद बंसल ने उन्हें 16 जुलाई के आयोजन की भनक नहीं लगने दी |
समस्या दरअसल इसलिए ज्यादा गंभीर हुई है - जैसा कि विनोद बंसल के नज़दीकी एक वरिष्ठ रोटेरियन का कहना है कि - विनोद बंसल अपने व्यवहार से दूसरों में एक खास उम्मीद पैदा कर देते हैं; वह जताते तो ऐसा हैं जैसे कि सामने वाले को वह बहुत महत्व देते हैं - लेकिन जब सचमुच महत्व देने की बारी आती है तो सामने वाले को पता चलता है कि विनोद बंसल तो उसे पहचान ही नहीं रहे हैं | तब सामने वाला अपने को ठगा-सा महसूस करता है | सामान्य रूप से कहें तो कह सकते हैं कि बातों के लच्छों में विनोद बंसल दूसरों को झाड़ पर ऐसा चढ़ाते हैं कि चढ़ने वाला फिर आगा-पीछा नहीं देखता - वह तो चढ़ने के बाद पाता है कि विनोद बंसल का तो कहीं कोई अता-पता ही नहीं है | 16 जुलाई की मीटिंग से दूर रखे गए कई लोगों का कहना है कि विनोद बंसल ने उन्हें कई-कई बार की बातचीत में यह महसूस कराया हुआ है जैसे उनके सहयोग के भरोसे ही विनोद बंसल अपनी गवर्नरी चला पायेंगे - लेकिन जब सचमुच सहयोग लेने का मौका आया तो विनोद बंसल ने उन्हें पूछा तो नहीं ही, मीटिंग की जानकारी तक भी उनसे छिपा कर रखी |
विनोद बंसल के इस रवैये ने अपने को उनका बहुत खास समझने वाले कई लोगों को तगड़ा झटका दिया है और निराश किया है |
Saturday, June 30, 2012
रमेश अग्रवाल ने असित मित्तल को नीचा दिखाने की अपनी कारस्तानी को सही साबित करने के लिए शेखर मेहता के नाम का इस्तेमाल किया
नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के अपने कार्यकाल की शुरुआत इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता की उपस्थिति में करने की योजना बनाई और साथ ही साथ उन्हें अपनी चालबाजियों का शिकार भी बना लिया | असित मित्तल को नीचा दिखाने की अपनी कार्रवाई में रमेश अग्रवाल ने जिस तरह शेखर मेहता का नाम इस्तेमाल किया, उससे रमेश अग्रवाल ने एक फिर साबित किया कि उनकी चालबाजियों का शिकार होने से कोई भी नहीं बच सकता है | रमेश अग्रवाल ने अपने प्रायः हर काम में जिस तरह से घटियापन दिखाया है और जिस तरह से वह लगातार उन लोगों को भी नाराज़ करते जा रहे हैं जिनकी एक समय वह खुशामद और चापलूसी किया करते थे - उससे लोगों को यह देख कर तो कोई हैरानी नहीं हुई कि रमेश अग्रवाल ने असित मित्तल को एक फिर नीचा दिखाया; लेकिन यह किसी ने नहीं सोचा था कि रमेश अग्रवाल अपना घटियापन दिखाने के चक्कर में शेखर मेहता तक को नहीं बख्शेंगे | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल ने एक से एक मूरखतापूर्ण नजारों को प्रस्तुत किया है, जिसकी श्रृंखला में उन्होंने ऐलान किया कि वह तीस जून के कार्यक्रम में कॉलर एक्सचेंज नहीं करेंगे | कई एक लोगों के सामने रमेश अग्रवाल ने यह कहने/बताने में भी कोई संकोच नहीं किया कि लोगों के बीच असित मित्तल की जिस तरह की बदनामी है, उसे देखते हुए उनसे कॉलर एक्सचेंज करना उन्हें अपमानित होने जैसा लगता है | उल्लेखनीय है कि असित मित्तल की बिजनेस संबंधी बेईमानियों को लेकर रमेश अग्रवाल उन्हें पहले भी कई बार जलील कर चुके हैं |
रमेश अग्रवाल को तीस जून के बाद असित मित्तल को जलील करने का मौका चूँकि नहीं मिलता, इसलिए उन्होंने तीस जून को मिल सकने वाले मौके का इस्तेमाल कर लेने में भी कोई चूक नहीं की | उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में यह प्रथा भी है और तकनीकी रूप से देखें तो यह सही भी है कि चूँकि तीस जून तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का अंतिम कार्यदिवस होता है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहते हुए वह पद की जिम्मेदारी आने वाले गवर्नर को सौंप दे | रमेश अग्रवाल ने लेकिन न डिस्ट्रिक्ट की प्रथा का सम्मान किया और न व्यावहारिकता को अपनाया | तीस जून को उन्होंने जब कॉलर एक्सचेंज नहीं किया है, तो एक जुलाई को वह किस्से कॉलर एक्सचेंज करेंगे - भूतपूर्व हो चुके गवर्नर असित मित्तल से ? एक जुलाई को असित मित्तल तो गवर्नर हैं नहीं, कॉलर उनके पास है ही नहीं - उसे तो वह उतार चुके हैं; अब जो चीज उनके पास है नहीं, उसे वह दे कैसे सकते हैं ? लेकिन रमेश अग्रवाल की जिद है कि वह एक जुलाई को कॉलर लेंगे - लेंगे लेकिन किससे ? नियम और संविधान के संदर्भ में इस बात को यदि देखें तो यह 'संवैधानिक संकट' जैसा मामला है | रमेश अग्रवाल ने जिसे अपनी जिद और असित मित्तल को जलील करने की अपनी कोशिश में पैदा किया है |
रमेश अग्रवाल के नजदीकियों तथा डिस्ट्रिक्ट के कुछेक बड़े नेताओं ने उन्हें ऐसा न करने को लेकर समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी; बल्कि उन्होंने सभी को यह कह कर चुप करा दिया कि इस बारे में उन्होंने इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता से बात कर ली है, जो एक जुलाई के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हैं; और जिन्होंने कहा है कि ऐसा हो सकता है | रोटरी में नियमों के साथ खिलवाड़ चूँकि कोई भी कर सकता है, इसलिए लोगों ने भी मान लिया कि शेखर मेहता ने भी हाँ कह दी होगी | और फिर क्या पता कि रमेश अग्रवाल ने सचमुच उनसे पूछा भी है या नहीं, और यदि पूछा भी है तो उन्हें पूरी बात तो नहीं ही बताई होगी | इस बात पर तो कोई भी विश्वास नहीं करेगा कि रमेश अग्रवाल ने शेखर मेहता को बताया होगा कि उन्हें चूँकि असित मित्तल को नीचा दिखाना है, इसलिए वह तीस जून को नहीं, बल्कि एक जुलाई को कॉलर पहनेंगे और शेखर मेहता ने उन्हें कह दिया होगा कि हाँ, आप ऐसा कर सकते हो | जाहिर है कि रमेश अग्रवाल ने असित मित्तल को नीचा दिखाने की कोशिश में की गई अपनी एक मूरखतापूर्ण कारस्तानी को सही साबित करने के लिए शेखर मेहता को या तो धोखा दिया है और या उनके नाम का इस्तेमाल किया है |
रमेश अग्रवाल ने अपनी हरकतों से लगातार लोगों को अपमानित ही किया है, जिसका नतीजा है कि उनसे हमदर्दी रखने वाले और उनके काम आने वाले कई लोग उनका साथ छोड़ चुके हैं | इससे कोई सबक न लेते हुए रमेश अग्रवाल जिस तरह अपनी कारगुजारियों को अंजाम देते जा रहे हैं तथा इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता तक का नाम इस्तेमाल कर रहे हैं और रोटरी को कलंकित कर रहे हैं उससे लोगों को लग रहा है कि रमेश अग्रवाल के गवर्नर-काल में उन्हें और-और नज़ारे देखने को मिलेंगे |
Friday, June 29, 2012
रवींद्र सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने की सुगबुगाहट ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है
नई दिल्ली/गाजियाबाद | रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की चर्चा ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ दे दिया है | मजे की बात यह है कि खुद रवींद्र सिंह अपनी उम्मीदवारी को लेकर अभी बहुत सक्रिय नहीं दिख रहे हैं | इसके बावजूद उनकी उम्मीदवारी की चर्चा है - और उन लोगों के बीच है, पिछले चुनाव में जो संजय खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में थे | दरअसल इसी एक बात ने रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की चर्चा को महत्वपूर्ण बना दिया है | गौर करने की बात यह है कि अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जो भी नाम चर्चा में हैं, वह सभी घूम-फिर कर उन्हीं नेता-लोगों के नज़दीक हैं जो पिछले चुनाव में रवि चौधरी के समर्थन में थे | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई को यदि खेमेबाजी के ऐंगल से देखते हैं तो पाते हैं कि पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे से अभी तक कोई उम्मीदवार सामने नहीं आया है | ऐसे में, पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे के मुख्य कर्ता-धर्ता यदि रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की बात करते सुने जा रहे हैं, तो इससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में नया मोड़ आना स्वाभाविक ही है | उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे के लोग अभी तक रवि भाटिया की उम्मीदवारी को समर्थन देने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन रवि भाटिया की उम्मीदवारी को चूँकि उनके क्लब से हरी झंडी नहीं मिली, लिहाजा पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे के लोगों की उम्मीदें अब रवींद्र सिंह पर आ टिकी है |
यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि रवींद्र सिंह पहले हालाँकि उसी 'गिरोह' के सदस्य थे, जो गिरोह पिछले चुनाव में रवि चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में था | एक समय था जब रवींद्र सिंह, मुकेश अरनेजा की आँख का तारा हुआ करते थे; नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य के रूप में रवींद्र सिंह ने असित मित्तल की उम्मीदवारी का खुला समर्थन किया था; रमेश अग्रवाल के चुनाव में समर्थन जुटाने के लिए रवींद्र सिंह ने दिन-रात भाग-दौड़ की थी; और विनोद बंसल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की राह को आसान बनाने के लिए अपनी उम्मीदवारी की बलि दे दी थी, जिसके लिए विनोद बंसल ने सार्वजानिक रूप से उनका आभार व्यक्त किया था - लेकिन रवींद्र सिंह को मुकेश अरनेजा, असित मित्तल और रमेश अग्रवाल से बदले में सिर्फ धोखा ही मिला | जल्दी ही यह भी देख/जान लिया जायेगा कि विनोद बंसल ने जिन रवींद्र सिंह का सार्वजानिक रूप से सबसे पहले आभार व्यक्त किया था, गवर्नर के रूप में उनका उन्हीं रवींद्र सिंह के प्रति कैसा-क्या रवैया रहता है ? मुकेश अरनेजा, असित मित्तल और रमेश अग्रवाल से मिले धोखे के कारण ही रवींद्र सिंह पिछले चुनाव के आते-आते तक 'गिरोह' से अलग हो गए थे | क्या यह सिर्फ संयोग है कि 'गिरोह' के उम्मीदवार रवि चौधरी की उम्मीदवारी में घोषित रूप से पलीता लगाने की शुरुआत रवींद्र सिंह के क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरीटेज से ही हुई थी ?
संजय खन्ना की चुनावी जीत में रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरीटेज की सुस्पष्ट आक्रामक पहल की मुख्य भूमिका थी | रवींद्र सिंह के क्लब के अध्यक्ष अरविंद सिंघल ने जिस तरह 'गिरोह' की तरफ से पड़े तमाम दबावों, लालचों और सिफारिशों का सामना करते हुए अपने 'लक्ष्य' को नहीं छोड़ा - उसके पीछे रवींद्र सिंह की सोची-विचारी रणनीति से मिल रही 'ताकत' ही काम कर रही थी | रवींद्र सिंह ने अपनी रणनीति का नज़ारा हालाँकि इससे पिछले वर्ष ही दिखा दिया था, जब उनकी उम्मीदवारी विनोद बंसल की राह में रोड़ा बन रही थी | विनोद बंसल की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे 'गिरोह' के नेता पहले तो रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहे थे और चूँकि वह दूसरों की खिल्ली उड़ाने में बड़े एक्सपर्ट हैं, इसलिए वह रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की खिल्ली ही उड़ा रहे थे | लेकिन जब उन्हें रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी के कारण विनोद बंसल की उम्मीदवारी में फच्चर फंसता हुआ नज़र आया तो वह रवींद्र सिंह को मनाने में जुटे | रवींद्र सिंह चूँकि भले व्यक्ति हैं, इसलिए वह जल्दी से मान भी गए | रवींद्र सिंह माने, तो विनोद बंसल का रास्ता साफ हुआ | रवि चौधरी के समय में, 'गिरोह' के लोगों ने एक फिर रवींद्र सिंह को हलके में लिया | विनोद बंसल के समय में, कुछ समय बाद 'गिरोह' के नेताओं को अक्ल आ गई थी और उन्होंने रवींद्र सिंह की अहमियत को समझ लिया था - लिहाजा विनोद बंसल का काम बन गया था | लेकिन रवि चौधरी के समय रवींद्र सिंह की अहमियत को समझने/पहचानने में गिरोह के नेता चूक गए - जिसका नतीजा हुआ कि उम्मीदवार के रूप में रवि चौधरी चारों खाने चित्त नज़र आये | यही तथ्य चुनावी राजनीति की उठा-पटक में रवींद्र सिंह को और उनकी रणनीतिक सोच को महत्वपूर्ण बनाता है |
यही कारण है कि रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की संभावनापूर्ण चर्चा ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ दे दिया है | जैसा कि पहले कहा गया है कि रवींद्र सिंह अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद बहुत सक्रिय नहीं हैं - कुछ लोग इसके पीछे पिछले दिनों उनके बीमार पड़ने में देखते हैं तो कुछ लोग इसमें उनकी रणनीतिक चतुराई को पहचानने/समझने का प्रयास करते हैं | उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रवींद्र सिंह पहले तो बीमार पड़े और फिर बीमारी के चलते कमजोरी का शिकार बने - इस कारण उनकी सक्रियता में स्वाभाविक रूप से कमी आई | उनकी उम्मीदवारी की संभावना को लेकर जिन लोगों ने भी सीधे उनसे बात की - इस संबंध में उनसे बात करने वाले लोगों में इन पंक्तियों का लेखक भी है - उन्हें रवींद्र सिंह ने रहस्यभरा गोल-मोल सा जबाव दिया - इससे उनकी उम्मीदवारी को लेकर बात और भी गंभीर हो गई | रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी में 'उम्मीद' देख रहे, संजय खन्ना को चुनाव जितवाने वाले खेमे के कर्ता-धर्ताओं का मानना और कहना है कि पिछली बार एक खेमे के रूप में उन्हें जो जोरदार चुनावी जीत मिली है, उसे जाया नहीं जाने देना चाहिए तथा खेमे की तरफ से अपना उम्मीदवार लाना चाहिए और इसीलिए रवींद्र सिंह को उम्मीदवार बनाने की तैयारी की जा रही है | रवींद्र सिंह को उम्मीदवार बनाने की तैयारी में जुटे, संजय खन्ना को चुनाव जितवाने वाले खेमे के कर्ता-धर्ता रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी पर दरअसल इसलिए जोर दे रहे हैं क्योंकि एक रोटेरियन के रूप में रवींद्र सिंह की कर्मभूमि वही गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश रहा है, जिसने संजय खन्ना को चुनाव जितवाने में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाई | उन्हें यह भी लगता है कि पिछली बार गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश पहले भले ही रवि चौधरी की उम्मीदवारी के साथ दिखता रहा हो, लेकिन जैसे ही संजय खन्ना की सक्रियता बढ़ी वह संजय खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में आ खड़ा हुआ | इससे यही साबित हुआ है कि रवि चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे 'गिरोह' के जो नेता गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश में अपना समर्थन मानते हैं, उनका वह समर्थन है नहीं | ऐसे में, गाजियाबाद में भले ही पहले से उम्मीदवार हैं पर वह चूँकि 'गिरोह' के 'इस' या 'उस' नेता के भरोसे हैं, इसलिए रवींद्र सिंह के लिए अच्छा मौका हो सकता है | रवींद्र सिंह ने विनोद बंसल के लिए 'जो' किया था, उसे ध्यान में रखते हुए यह उम्मीद भी की जा सकती है कि विनोद बंसल का समर्थन उन्हें मिल जाये | यह उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि 'गिरोह' में रहने के कारण विनोद बंसल को जिस बदनामी का शिकार होना पड़ा उससे यह उम्मीद भी की जाती है कि विनोद बंसल अब गिरोह के साथ नहीं रहना चाहेंगे | समय की नजाकत को पहचानते हुए विनोद बंसल ने 'गिरोह' के नेताओं से पीछा छुड़ाने और संजय खन्ना के साथ 'दिखने' की जो कोशिशें शुरू की हैं - उन कोशिशों में भी संजय खन्ना को चुनाव जितवाने वाले खेमे के कर्ता-धर्ताओं को रवींद्र सिंह के रूप में अपने उम्मीदवार के लिए उम्मीद नज़र आ रही है | इसी उम्मीद के चलते रवींद्र सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने की सुगबुगाहट ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है |
Wednesday, June 27, 2012
'गंदी राजनीति' और 'षड्यंत्र' का शिकार बने अरुण जैन, सुधीर मंगला की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बने
नई दिल्ली | अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटाये जाने का मामला सुधीर मंगला के लिए आफत बनता दिख रहा है | सुधीर मंगला के लिए राहत की बात यही है कि अरुण जैन को क्लब में कोई समर्थन नहीं मिला और अरुण जैन अलग-थलग ही नज़र आये हैं | लेकिन अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटाये जाने को लेकर जिस तरह की चिट्ठी-पत्री शुरू हो गई है और उसमें जिस तरह से सुधीर मंगला को सीधा निशाना बनाया जा रहा है - उससे सुधीर मंगला के लिए मुसीबत खड़ी हो गई दिख रही है | 'रचनात्मक संकल्प' को एक बेनामी चिट्ठी मिली है जिसमें अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटाये जाने के लिए सुधीर मंगला को जिम्मेदार बताया गया है | इस बेनामी चिट्ठी में सुधीर मंगला पर गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि सुधीर मंगला ही रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी में हुए विभाजन के लिए जिम्मेदार थे और अब उनकी राजनीति रोटरी क्लब दिल्ली लुटियन को भी 'लुटाने' को तैयार है | सुधीर मंगला और क्लब के दूसरे सदस्य इस चिट्ठी के पीछे अरुण जैन को 'देखते' हैं, लेकिन अरुण जैन इस चिट्ठी के पीछे किसी भी रूप में होने से इंकार करते हैं | अरुण जैन लेकिन अपनी अध्यक्षी जाने का जो जो कारण बताते हैं, कमोवेश वही कुछ इस चिट्ठी में कहा/लिखा गया है |
अरुण जैन क्लब के पदाधिकारियों के इस दावे को बिलकुल झूठा बताते हैं कि उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया है | उल्लेखनीय है कि बबाल से और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सवालों से बचने के लिए क्लब के पदाधिकारियों ने दावा किया कि समय की कमी के चलते अरुण जैन ने खुद ही अध्यक्ष पद से हटने की पेशकश की थी और उन्होंने अपनी इच्छा से ही अध्यक्ष पद छोड़ा है | अरुण जैन का कहना है कि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने के लिए उनके पास समय की कोई कमी नहीं है और उन्होंने न कभी अध्यक्ष पद छोड़ने की बात कही और न इस्तीफ़ा दिया | अरुण जैन का कहना है कि उन्हें गंदी राजनीति का शिकार बनाया गया और नियमों को ठेंगा दिखा कर षड्यंत्रपूर्ण तरीके से अध्यक्ष पद से हटाया गया है | किसने 'गंदी राजनीति' या 'षड्यंत्र' किया, अरुण जैन आपसी बातचीत में यह नहीं बताते | वह यही कह कर किसी का नाम लेने से बचते हैं कि 'आप सब जानते हैं |' लेकिन उनका पक्ष लेते हुए जो चिट्ठी सामने आई है उसमें - जो हुआ, उसके लिए सुधीर मंगला को जिम्मेदार ठहराया गया है | चिट्ठी में कहा गया है कि अरुण जैन तो पूरी मेहनत से न सिर्फ अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभा रहे थे, बल्कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए भी प्रयास कर रहे थे | चिट्ठी में कहा गया है कि क्लब के कुछेक सदस्य अरुण जैन को सहयोग तो नहीं ही कर रहे थे, तरह-तरह की बातों को फैला कर उन्हें बदनाम और कर रहे थे | अरुण जैन को यह देख/जान कर और बुरा लगा कि क्लब के ऐसे सदस्यों को सुधीर मंगला भी शह और समर्थन दे रहे हैं | अरुण जैन ने कई बार सुधीर मंगला को आगाह किया कि क्लब के कुछेक सदस्यों का जो रवैया और तरीका है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी मुश्किल में पड़ जा सकती है, लेकिन सुधीर मंगला ने कभी भी उनकी बातों को तवज्जो नहीं दी; बल्कि अरुण जैन को ही ऐसी-ऐसी बातों के लिए जिम्मेदार ठहराया जिनके लिए अरुण जैन किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं थे |
अरुण जैन को सुधीर मंगला से इस बात की गंभीर शिकायत रही कि सुधीर मंगला क्लब के उन लोगों के ज्यादा नज़दीक रहे जो अरुण जैन को न तो सहयोग करने को तैयार थे, और न अरुण जैन को काम करने दे रहे थे | अरुण जैन के हर फैसले पर ऊँगली उठाना और ऐतराज करना जिन्होंने अपना धर्म बना लिया था; तरह-तरह की बातें फैला कर जो लगातार अरुण जैन को बदनाम कर रहे थे | यह बात तो खुद सुधीर मंगला ने कही/बताई कि अरुण जैन अक्सर उनसे कहते थे कि क्लब में कुछेक लोग उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं | सुधीर मंगला का कहना लेकिन यह रहा कि अरुण जैन जब भी उनसे यह बात कहते, वह उनसे पूछते कि कौन उन्हें काम नहीं करने दे रहा है; अरुण जैन ने लेकिन उन्हें कभी किसी का नाम नहीं बताया | सुधीर मंगला का कहना है कि ऐसे में वह क्या कर सकते थे | सुधीर मंगला को हैरानी है कि अरुण जैन अपनी दशा के लिए उन्हें क्यों जिम्मेदार ठहरा रहे हैं | सुधीर मंगला को भले ही हैरानी हो, लेकिन अरुण जैन की तरफ से उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है | रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी में हुए विभाजन के लिए सुधीर मंगला को जिम्मेदार ठहरा कर तथा सुधीर मंगला पर 'गंदी राजनीति' व 'षड्यंत्र' करने का आरोप मढ़ कर यह जता दिया गया है कि अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटा देने की कार्रवाई सुधीर मंगला के लिए मुसीबत बन गई है |
Sunday, June 24, 2012
डॉक्टर सुब्रमणियन लीडर/गवर्नर बनना चाहते हैं या ऐनटरटेनर ?
नई दिल्ली | डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी जिस गायकी को एक उम्मीदवार के रूप में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई में अपना हथियार बनाने की रणनीति बनाई थी, उसने उनकी उम्मीदवारी को चोट पहुँचाने का ही काम किया है | उल्लेखनीय है कि 23 जून को इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में अपनी गायकी के कार्यक्रम के जरिये डॉक्टर सुब्रमणियन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने की जोरदार तैयारी की थी | किंतु उनके कार्यक्रम में न तो उनकी तैयारी की अपेक्षानुसार रोटेरियन पहुँचे और जो पहुँचे भी उन्होंने भी पाया/माना कि इस एक कार्यक्रम से अपनी उम्मीदवारी का प्रमोशन शुरू करके डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी का बँटा धार कर लिया है | डॉक्टर सुब्रमणियन के शुभचिंतकों ने भी माना और कहा है कि इस कार्यक्रम के जरिये डॉक्टर सुब्रमणियन ने रोटेरियंस को अपनी उम्मीदवारी के प्रति उत्सुक और उत्साहित करने की जो कोशिश की, वह कोशिश न सिर्फ विफल रही बल्कि उसने उल्टा असर ही पैदा किया है | कुछ लोग मजाक में, तो कुछ गंभीरता के साथ यह पूछने/समझने में लग गए हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन लीडर/गवर्नर बनना चाहते हैं या ऐनटरटेनर ? वह अच्छा गाते हैं - यह जान कर रोटेरियंस उन्हें अपना गवर्नर भला क्यों चुनें ?
डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई कि उसी 23 जून को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के एक दूसरे उम्मीदवार जेके गौड़ ने भी अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, जो अप्रत्याशित रूप से सफल रहा | जेके गौड़ की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से आयोजित हुए कार्यक्रम में न केवल रोटेरियंस की उपस्थिति अच्छी दिखी, बल्कि हर किसी ने जेके गौड़ और उनके संगी-साथियों की व्यवहार कुशलता की जम कर तारीफ भी की और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में जेके गौड़ की सक्रियता व रोटेरियंस के बीच पैठ बनाने की कोशिशों को सकारात्मक रूप से रेखांकित भी किया | 23 जून से पहले जो रोटेरियंस डॉक्टर सुब्रमणियन और जेके गौड़ के बीच तुलना करते हुए डॉक्टर सुब्रमणियन को ज्यादा नंबर देते थे, 23 जून को हुए दोनों कार्यक्रमों की रिपोर्ट जानने के बाद यह कहते हुए सुने गए हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन को चुनावी राजनीति के तौर-तरीकों की जरा भी समझ नहीं है और कि वह अपनी उम्मीदवारी का कबाड़ा खुद ही कर लेंगे | डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए ज्यादा झटके की बात यह भी रही कि उन्होंने जिन भी रोटेरियंस को अपना गाना सुनने के लिए आमंत्रित किया, उनमें से कइयों से उन्हें यह सुनने को मिला कि उन्हें तो जेके गौड़ के कार्यक्रम में जाना है | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में, डॉक्टर सुब्रमणियन के कार्यक्रम की विफलता से निराश डॉक्टर सुब्रमणियन के नजदीकियों ने विफलता के लिए एक मजेदार कारण यह बताया कि कार्यक्रम के निमंत्रण कार्ड में चूँकि डिनर का जिक्र नहीं था, इसलिए रोटेरियंस ने इस कार्यक्रम में आने में दिलचस्पी नहीं दिखाई | ऐसा तर्क देने वाले डॉक्टर सुब्रमणियन के नजदीकियों से पूछा लेकिन यह गया कि यदि उन्हें लगता है कि रोटेरियंस डिनर के लालच में ही कार्यक्रम में आते हैं तो उन्होंने रोटेरियंस को डिनर का लालच दिया क्यों नहीं ?
डॉक्टर सुब्रमणियन से अभी तक लोगों को यह शिकायत थी कि वह यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार हैं तो एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय क्यों नहीं हो रहे हैं | इस तरह की शिकायत करने वाले लोगों को लेकिन यह देख/जान कर घोर निराशा ही हुई है कि डॉक्टर सुब्रमणियन एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय भी हुए तो इस तरह कि उन्होंने रोटेरियंस को अपने से दूर करने का ही काम किया और रोटेरियंस को यह दिखाने/जताने का ही काम किया कि उन्हें चुनावी राजनीति के 'तौर-तरीके' न तो पता हैं और न ही वह उन्हें जानना/समझना चाहते हैं | अधिकतर रोटेरियंस को शक/संदेह है कि डॉक्टर सुब्रमणियन एक उम्मीदवार के रूप में काम कर पायेंगे | 23 जून को हुए कार्यक्रम के जरिये डॉक्टर सुब्रमणियन ने एक उम्मीदवार के रूप में अपनी जिस तरह की सोच और तैयारी को प्रदर्शित किया है उससे उन रोटेरियंस का शक/संदेह इस विश्वास में बदलता हुआ नजर आ रहा है कि डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए एक उम्मीदवार के रूप में काम कर पाना सचमुच बहुत ही मुश्किल होगा | 23 जून को हुए दोनों कार्यक्रमों की रोटेरियंस के बीच जो तुलना हुई है उसमें जेके गौड़ का पलड़ा डॉक्टर सुब्रमणियन से भारी हो गया है | डॉक्टर सुब्रमणियन के शुभचिंतकों का भी मानना और कहना है कि डॉक्टर सुब्रमणियन ने इस असफलता से यदि कोई सबक नहीं सीखा तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई में बने रहना उनके लिए सचमुच मुश्किल हो जायेगा |
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