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Sunday, February 3, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस की मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की कोशिशों को चंदर शेखर मेहता को मल्टीपल ट्रेजरर बनवाने की मुहिम के जरिये राजीव अग्रवाल और जेपी सिंह ने फेल किया

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चंदर शेखर मेहता और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजीव अग्रवाल की मिलीजुली कोशिशों से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए अपनी उम्मीदवारी खतरे में पड़ती दिख रही है, और वीके हंस इसके लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर जेपी सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें जमकर कोस रहे हैं । वीके हंस इसलिए और भड़के हुए हैं, क्योंकि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चक्कर में उन्होंने हाल ही में हरिद्वार में संपन्न हुई मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में एयर प्यूरीफायर गिफ्ट के रूप में बाँट दिए; उनका रोना है कि जेपी सिंह और राजीव अग्रवाल ने उनसे गिफ्ट तो बँटवा दिए हैं, लेकिन पर्दे के पीछे वह खेल कुछ और खेल रहे हैं । मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में वीके हंस को दो झटके एक साथ लगे - पहले तो वह यह सुन/देख का चकराए कि चंदर शेखर मेहता मीटिंग में पहुँचे हैं और मल्टीपल ट्रेजरर बनने के जुगाड़ में हैं; दूसरा झटका उन्हें राजीव अग्रवाल को अपने से दूर 'दिखने' की कोशिश करते देख लगा । राजीव अग्रवाल के प्रति तो वीके हंस ने कई लोगों के सामने चिल्ला कर अपनी नाराजगी भी प्रकट की । पूरे घटनाचक्र को मिला कर वीके हंस ने देखा, तो समझा/पाया कि इसके पीछे जेपी सिंह की शह है;और जेपी सिंह ने राजीव अग्रवाल को अगले लायन वर्ष में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवाने का ऑफर देकर वीके हंस को इस वर्ष मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की दौड़ से हटाने का प्रबंध कर लिया है ।
चंदर शेखर मेहता को मल्टीपल ट्रेजरर बनवाने की मुहिम के पीछे जेपी सिंह और राजीव अग्रवाल की सोची-समझी योजना को देखा/पहचाना जा रहा है । माना/कहा जा रहा है कि इसके जरिये अगले लायन वर्ष में राजीव अग्रवाल की मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की उम्मीदवारी के लिए हरदीप सरकारिया का वोट/समर्थन पक्का कर लिया गया है । हरदीप सरकारिया को चंदर शेखर मेहता के नजदीकी के रूप में देखा/पहचाना जाता है; ऐसे में यह उम्मीद करना स्वाभाविक भी है कि मल्टीपल ट्रेजरर बनने के ऐवज में चंदर शेखर मेहता अगले लायन वर्ष में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए हरदीप सरकारिया का वोट/समर्थन बिना किसी हील-हुज्जत के राजीव अग्रवाल को दिलवा ही देंगे । पर्दे के पीछे चले इस खेल को लेकर वीके हंस को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएल खट्टर के व्यवहार से भी शिकायत और नाराजगी है । केएल खट्टर को वीके हंस अपने बड़े समर्थक और शुभचिंतक के रूप में देखते/समझते हैं; लेकिन अब वीके हंस को लगता है कि केएल खट्टर ने उनके साथ धोखा किया है । उल्लेखनीय है कि चंदर शेखर मेहता हरिद्वार में संपन्न हुई मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में केएल खट्टर के साथ ही पहुँचे थे । इससे वीके हंस मान/समझ रहे हैं कि चंदर शेखर मेहता को मल्टीपल ट्रेजरर बनवाने की मुहिम की जानकारी केएल खट्टर को भी थी, जिसे केएल खट्टर ने उनसे छिपाया - और इस तरह उन्हें धोखा दिया । दरअसल चंदर शेखर मेहता के मल्टीपल ट्रेजरर बनने से वीके हंस का मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने का मामला अपने आप खत्म हो जाता है, क्योंकि एक ही डिस्ट्रिक्ट को मल्टीपल में दो पद तो नहीं ही मिल सकेंगे ।
चंदर शेखर मेहता को मल्टीपल ट्रेजरर बनवाने की मुहिम के जरिये वीके हंस को रास्ते से हटाने के खेल के प्रति आश्वस्त होने के कारण ही राजीव अग्रवाल ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए अभियान चला रहे वीके हंस से दूरी बनाने/दिखाने की कोशिश की । उल्लेखनीय है कि वीके हंस ने अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने के उद्देश्य से मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में एयर प्यूरीफायर गिफ्ट में देने की तैयारी की थी । इस तैयारी में वह चाहते थे कि गिफ्ट देने/बाँटने के काम में राजीव अग्रवाल उनके साथ रहें/दिखें, ताकि वह राजीव अग्रवाल के समर्थन के प्रति दूसरे लोगों को आश्वस्त कर सकें । वीके हंस ने राजीव अग्रवाल से साथ रहने के लिए बात भी कर ली, और राजीव अग्रवाल ने इसके लिए हामी भी भर दी; लेकिन वीके हंस जब गिफ्ट देने/बाँटने के काम पर निकले, तब राजीव अग्रवाल दाएँ/बाएँ हो गए । वीके हंस को राजीव अग्रवाल का यह रवैया नागवार लगा और उन्होंने कई लोगों के सामने ही राजीव अग्रवाल को जोर से चिल्ला कर हड़काया । वीके हंस का यह व्यवहार राजीव अग्रवाल को बुरा लगा और फिर वीके हंस को अकेले ही गिफ्ट देने/बाँटने का काम करना पड़ा । इस स्थिति के लिए लोगों ने वीके हंस को ही जिम्मेदार ठहराया; उनका कहना है कि वीके हंस को राजीव अग्रवाल के साथ बदतमीजी नहीं करना चाहिए थी । वीके हंस का कहना है कि राजीव अग्रवाल को यदि उनके साथ नहीं आना था, तो साफ मना कर देना चाहिए था । बाद में जब पर्दे के पीछे चले खेल की पूरी जानकारी वीके हंस को मिली, तो वह और नाराज हुए । उनका कहना है कि जेपी सिंह और राजीव अग्रवाल को उनके साथ यही धोखा करना था तब फिर उन्होंने मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में उनसे गिफ्ट बँटवा कर उनके पैसे क्यों खराब करवाए ? मल्टीपल काउंसिल में वीके हंस के साथ जो हुआ, उसे 'देख' कर वीके हंस अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और इस 'ठगी' के लिए जेपी सिंह और राजीव अग्रवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।

Monday, December 4, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच चल रही होड़ में हालात बदलने के बाद भी असमंजसता अभी बनी हुई है

नई दिल्ली । सुरेश बिंदल द्वारा आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेने तथा आनंद दुआ द्वारा अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू कर देने से डिस्ट्रिक्ट में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए गहमागहमी बढ़ भी गई है और थोड़ा उलझ भी गई है - इस उलझन में अपनी अलग अलख जलाए बैठे आरके शाह के लिए भी मौका बनता नजर आने लगा है । उल्लेखनीय है कि अभी तक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की सर्वसम्मत उम्मीदवारी को लेकर दिल्ली में ऊपरी तौर पर तो अनिश्चितता नजर आ रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच होड़ भी छिड़ी हुई थी । आरके अग्रवाल का समर्थन करने वाले तो कई थे, लेकिन सुरेश बिंदल के विरोध के चलते उनके नाम पर पूर्ण सहमति बनने में दिक्कत आती दिख रही थी; आनंद दुआ के नाम पर विरोध करने वाला तो कोई नहीं था, लेकिन उनकी सक्रियता के अभाव में उनका नाम आगे बढ़ाने वाला - यानि उनकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं था । आनंद दुआ को एक आदर्श उम्मीदवार के रूप में तो देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन उन्हें व्यावहारिक उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा पा रहा था । इसका एक बड़ा कारण यह था कि वह खुद अपनी उम्मीदवारी को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखा रहे थे । उनके नजदीकियों का कहना/बताना था कि आनंद दुआ उम्मीदवार तो बनना चाहते हैं, लेकिन वह किसी नेता से यह कहना नहीं चाहते हैं - क्योंकि वह जानते हैं कि वह यदि अपनी उम्मीदवारी के लिए पहल करेंगे और नेताओं से समर्थन मागेंगे, तो उम्मीदवार के रूप में उन्हें पैसे खर्च करने पड़ेंगे; वह लेकिन 'मुफ्त' में गवर्नर बनना चाहते हैं । इस चक्कर में कोई भी नेता आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ । आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच उलझे मामले को उलझा हुआ छोड़ कर नेताओं ने कोई और उम्मीदवार खोजने की कोशिश भी की, लेकिन जो मिला नहीं ।
इस बीच हालात ने पलटा खाया । आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे सुरेश बिंदल ने अंततः मन बदला और आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । इससे आरके अग्रवाल का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आया, तो आनंद दुआ ने भी 'किसी से न कहने' की जिद छोड़ी और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए निकल पड़े । हालात बदलने के बाद भी नतीजा लेकिन अभी भी उलझन भरा ही है और नेताओं के लिए किसी भी नतीजे पर पहुँचना मुश्किल बना हुआ है । एक पूर्व गवर्नर का कहना है कि किसी उम्मीदवार पर सर्वसम्मति बनाने के लिए कोई पहल नहीं करना चाहता है । नेताओं की स्थिति की सच्चाई दरअसल इसी बात में छिपी हुई है । इस बात से लग रहा है कि नेताओं ने अपने अपने उम्मीदवार तो चुन लिए हैं, लेकिन वह अपने अपने उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं  इसलिए वह अपने उम्मीदवार के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं । असल में, आरके अग्रवाल और आनंद दुआ में से किसी ने भी यह संकेत नहीं दिए हैं कि उनके नाम पर नेताओं के बीच यदि सर्वसम्मति नहीं बनी - तो भी वह किसी एक खेमे के भरोसे ही उम्मीदवार बनने को तैयार हैं । इसलिए उनके समर्थक नेता उनके नाम पर ज्यादा आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं, और मामला जहाँ का तहाँ ही अटका पड़ा है । सुरेश बिंदल की चंद्र शेखर मेहता के साथ अच्छी बनती है; समझा जाता है कि चंद्र शेखर मेहता ने हरियाणा में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया के नाम पर मोहर लगवाने से पहले सुरेश बिंदल सहित दिल्ली के दो-तीन अन्य नेताओं को विश्वास में ले लिया था - इससे एक संभावना यह बन रही है कि सुरेश बिंदल दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आरके अग्रवाल का नाम घोषित करवा लें । हालाँकि कइयों को इस बात पर शक भी है कि दिल्ली में सुरेश बिंदल की ऐसी स्थिति है कि वह अपनी बात मनवा लें, इसलिए शक यही है कि दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जो भी उम्मीदवार 'घोषित' होगा - वह वास्तव में एक खेमे का ही होगा, और दूसरे नेता तो उसे मजबूरी में ही समर्थन देंगे ।
इस स्थिति ने आरके शाह के लिए उम्मीदों के द्वार खोल दिए हैं । उल्लेखनीय है कि आरके शाह अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं जो अपनी उम्मीदवारी के लिए डटे हुए हैं और उसके लिए समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं । समर्थन जुटाने की आरके शाह की कोशिशें हालाँकि अभी तक सफल नहीं हो सकी हैं, लेकिन जमीनी हालात उनके लिए अनुकूल बनते दिख रहे हैं । दरअसल हरियाणा में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया का जिस मनमाने तरीके से चयन हुआ है, और जिसके चलते हरियाणा में लोग लीडरशिप के खिलाफ हो गए दिख रहे हैं - उसमें आरके शाह के लिए समर्थन बनने जैसे हालात छिपे नजर आ रहे हैं । हरियाणा में कई लोग लीडरशिप के नाम पर 'चार लोगों की मनमानी' के खिलाफ नाराजगी व्यक्त करते हुए सुने जा रहे हैं । दिल्ली में भी, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए यदि 'सचमुच' सर्वसम्मति नहीं बनी, तो विरोधी नेता आरके शाह की उम्मीदवारी को समर्थन दे सकते हैं । आरके शाह के रवैये से यह तो तय ही माना जा रहा है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिल्ली में दो उम्मीदवार तो होंगे ही, जिसके चलते हरियाणा की लीडरशिप पर दबाव होगा कि वह अपना ध्यान 'अपने' उम्मीदवार पर ही दे, और दिल्ली के झगड़े के पचड़े में न पड़े । यह स्थिति आरके शाह के अनुकूल बैठती है । स्थिति तो अनुकूल बैठी नजर आ रही है, लेकिन इस अनुकूल स्थिति को मैनेज करने तथा वोट में बदलने के लिए प्रेरित करने का काम आरके शाह कर पायेंगे या नहीं - यह सवाल जरूर लोगों को असमंजस में डाले हुए है । जाहिर है कि हालात साफ/स्पष्ट होने के लिए अभी थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ेगा ।

Saturday, December 2, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में पूर्व गवर्नर चंद्र शेखर मेहता की दिल्ली के लीडर्स के समर्थन के भरोसे सुरेश जिंदल और पुनीत बंसल का पत्ता कटवा कर हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बनवा लेने की कार्रवाई पर हरियाणा में नाराजगी और विरोध

सिरसा । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही हरियाणा लायंस फोरम में बिखराव और टकराव के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि हरियाणा लायंस फोरम की मीटिंग में ही हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुना गया है, लेकिन इस फैसले के सार्वजनिक होने के साथ ही हरियाणा के लायंस सदस्यों की तरफ से न सिर्फ इस फैसले की आलोचना होने लगी है, बल्कि हरियाणा लायंस फोरम के सांगठनिक स्वरूप पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं । इस फैसले को लेकर सुरेश जिंदल और पुनीत बंसल के नजदीकियों व समर्थकों में गहरी नाराजगी है - और इनकी तरफ से हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले को पक्षपातपूर्ण बताया जा रहा है । दिलचस्प नजारा यह देखने को मिल रहा है कि हरदीप सरकारिया के समर्थकों की तरफ से फैसले के विरोध में उठ रही आवाज़ों को दिल्ली के लायन नेताओं की शह और प्रेरणा के रूप में देखा/पहचाना और बताया जा रहा है । हरदीप सरकारिया के समर्थकों की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि दिल्ली के लायन लीडर्स हरियाणा में भी अपना दखल बनाए रखना चाहते हैं, और इसलिए वह नहीं चाहते हैं कि हरियाणा में लायंस सदस्यों के बीच एकता स्थापित हो - और इसीलिए वह हरदीप सरकारिया के नाम पर बनी एकता को तोड़ने की कोशिशों में जुट गए हैं । हालाँकि हरियाणा के ही कई नेताओं का मानना/कहना है कि दिल्ली के लायन लीडर्स का नाम लेकर हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी तय करने के मनमाने और पक्षपातपूर्ण फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता और हरियाणा की एकता के नाम पर इस फैसले को हरियाणा के लायंस सदस्यों के सिर जबर्दस्ती नहीं थोपा जा सकता है ।
उल्लेखनीय है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा में सुरेश जिंदल और पुनीत बंसल के नाम चर्चा में थे । सुरेश जिंदल और उनके समर्थकों का तर्क था कि वह चूँकि एक बार चुनाव लड़ चुके हैं, इसलिए अब जब मौका आया है तब उन्हें उम्मीदवार होना चाहिए और पिछली बार जो चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर जैसे पूर्व गवर्नर्स उन्हें सफलता नहीं दिलवा सके थे, उन्हें इस बार उनकी उम्मीदवारी की वकालत करना चाहिए । पुनीत बंसल पिछले दो-तीन वर्षों की अपनी निरंतर सक्रियता के भरोसे अपनी उम्मीदवारी का दावा ठोक रहे थे । उनका और उनके समर्थकों का कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट को इस समय ऐसे लीडर की जरूरत है, जिसका लोगों के बीच संपर्क और संलग्नता है -  इसलिए पुनीत बंसल ही उपयुक्त उम्मीदवार हो सकते हैं । इन दोनों की दावेदारी के बीच एक बात यह भी लोगों के बीच सुनी/कही जा रही थी कि पूर्व गवर्नर चंद्र शेखर मेहता किसी भी कीमत पर पुनीत बंसल को तो उम्मीदवार नहीं बनने देंगे । इस बात से सुरेश जिंदल और उनके समर्थकों को अपनी दाल गलती हुई दिख रही थी । लेकिन चंद्र शेखर मेहता ने अचानक से हरदीप सरकारिया का नाम आगे बढ़ा कर सुरेश जिंदल की दाल को गलने से पहले ही बिखेर देने का काम कर दिया । हरदीप सरकारिया का नाम आगे बढ़ा कर चंद्र शेखर मेहता ने पुनीत बंसल का शिकार करने के लिए घेराबंदी की । पुनीत बंसल की यह घेराबंदी करने के बाद भी उन्हें डर था कि दिल्ली के लायन लीडर्स पुनीत बंसल को शह और समर्थन देकर यदि उम्मीदवार बना/बनवा देते हैं, तब फिर उनके लिए मुसीबत हो जाएगी । वह भी मानते/जानते हैं कि चुनाव की नौबत यदि आई तो पुनीत बंसल और या सुरेश जिंदल के सामने हरदीप सरकारिया का टिक पाना मुश्किल क्या असंभव ही होगा ।
ऐसे में, हरदीप सरकारिया के जरिए पुनीत बंसल को 'ठिकाने' लगाने के लिए चंद्र शेखर मेहता को दिल्ली के लीडर्स के समर्थन की जरूरत थी । वह जान/समझ रहे थे कि दिल्ली के लीडर्स के समर्थन के बिना पुनीत बंसल या सुरेश जिंदल के लिए उम्मीदवार बनना असंभव होगा । चंद्र शेखर मेहता ने दिल्ली के लीडर्स का मूड भाँपने की जो कोशिश की, उसमें उन्हें यह जान/देख कर राहत मिली कि दिल्ली के हर प्रभावी लीडर ने उन्हें आश्वस्त किया कि हरियाणा को लेकर वह जो फैसला करेंगे, वह उन्हें मान्य होगा । दिल्ली के लायन लीडर्स से आश्वासन मिलने के बाद चंद्र शेखर मेहता निश्चिन्त हो गए और फिर उन्होंने सुरेश जिंदल को इग्नोर करके तथा पुनीत बंसल को फुसला करके हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी के नाम पर मोहर लगवा ली । हरियाणा लायंस फोरम के फैसले का दिलचस्प पक्ष यह है कि उसे फैसला अभी होने वाले सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए करना था, लेकिन उसने हरियाणा से अगले उम्मीदवार बारे में भी फैसला कर डाला । चंद्र शेखर मेहता ने पुनीत बंसल को फुसलाने के लिए उनसे वायदा कर दिया है कि हरियाणा का अगला नंबर जब आएगा, तब वह उनकी उम्मीदवारी को समर्थन देंगे - और इस वायदे के आधार पर हरियाणा लायंस फोरम ने अपने अगले उम्मीदवार के रूप में पुनीत बंसल के नाम की घोषणा कर दी है । यह कुछ कुछ ऐसा ही मामला है जैसे रोते बच्चे को चुप करवाने के लिए उसे झुनझुना पकड़ा दिया जाता है । पुनीत बंसल की भी मजबूरी है कि अगले उम्मीदवार रूपी झुनझुने को लेकर वह शांत हो जाएँ ।
हरदीप सरकारिया को उम्मीदवारी चुनने/बनाने के फैसले पर पुनीत बंसल और सुरेश जिंदल के समर्थकों व नजदीकियों के बीच तुरंत से जो नाराजगी देखने/सुनने को मिली है, वह हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी के लिए अभी तो कोई संकट बनती नहीं दिख रही है - दरअसल इसीलिए हरदीप सरकारिया के समर्थकों ने तुरंत से जबावी कार्रवाई करते हुए दिल्ली के लायन लीडर्स को निशाने पर ले लिया है । इसके जरिए उनकी कोशिश वास्तव में दिल्ली के लायन लीडर्स को हरियाणा से दूर करने/रखने की है । अपनी इस कोशिश में अभी वह सफल भी नजर आ रहे हैं । दिल्ली के लायन लीडर्स ने हरियाणा लायंस फोरम के फैसले का स्वागत ही किया है । लेकिन डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों का मानना/कहना है कि यह 'स्वागत' तभी तक है, जब तक कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिल्ली वाले एक उम्मीदवार का चयन नहीं कर लेते हैं । राजनीति जानने/समझने वाले लोगों को लगता है कि दिल्ली में भी यदि एकमत से किसी उम्मीदवार के बारे में फैसला हो गया, तब तो बबाल नहीं होगा और हरदीप सरकारिया को कोई चुनौती नहीं मिलेगी । लेकिन यदि दिल्ली में दो उम्मीदवार हो गए, जिनके पीछे दो खेमे बने - तब हरियाणा की राजनीति में भी पलटी लगेगी । क्योंकि तब चंद्र शेखर मेहता के सामने किसी एक उम्मीदवार और उसके खेमे को समर्थन देने की मजबूरी पैदा होगी, और तब दूसरा खेमा हरियाणा में किसी दूसरे उम्मीदवार को शह और समर्थन दे देगा । हरियाणा में भी और दिल्ली में भी हर कोई जानता/समझता है कि हरियाणा में यदि दो उम्मीदवार हुए और चुनाव की नौबत आई तो हरदीप सरकारिया के लिए मामला खासा मुश्किल हो जाएगा । वास्तव में इसीलिए हरियाणा लायंस फोरम में उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिल जाने के बाद भी हरदीप सरकारिया के लिए रास्ता अभी भी पूरी तरह क्लियर नहीं हुआ है ।

Wednesday, January 28, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में विक्रम शर्मा और आरके शाह की 'होशियारी' के चलते असहाय बने बैठे नेताओं को सुरेश जिंदल की कवायद से उम्मीद तो बनी है, लेकिन सुरेश जिंदल के केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता की 'पकड़' में होने के कारण यह उम्मीद उनके लिए अभी अधर में भी लटकी हुई है

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा और आरके शाह ने नेताओं को जैसा जो नाच नचाया हुआ है, उससे सुरेश जिंदल को अपना काम बनता हुआ दिख रहा है, और इसी उम्मीद में उन्होंने दिल्ली में कुछेक नेताओं से तार जोड़े हैं । तार जोड़ने की इस प्रक्रिया में उन्होंने नेताओं को अभी हालाँकि सिर्फ यही संकेत दिया है कि वह 'उपलब्ध' हैं । सुरेश जिंदल की इस प्रक्रिया को 'गर्म लोहे पर चोट मारने' वाली कहावत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के नेता - मजे की बात यह है कि दोनों पक्षों के नेता इस समय तक अपने आपको नितांत असहाय पा रहे हैं । यह उनकी असहायता का ही आलम है कि जनवरी का महीना खत्म हो रहा है और उनके पास कोई उम्मीदवार नहीं है तथा उनकी कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं है । कहा जा सकता है कि चुनावी राजनीति के परिदृश्य में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है और किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें ? हमेशा आपस में लड़ते रहने और एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे रहने वाले नेता अब एक दूसरे पर इस उम्मीद में निगाह जमाये हुए हैं कि कुछ करो भई ! यह हाल तब है जब कि इस वर्ष नेताओं को दो वर्षों के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तय करने हैं । 
नेताओं की बदकिस्मती यह है कि उन्होंने तो तय कर लिया है लेकिन आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि उन्होंने जिनके नाम तय किए हैं, वह नेताओं की शर्ते मानने को तैयार नहीं हो रहे हैं । लायन राजनीति में ऐसा कभी भी नहीं देखा गया है । यहाँ हमेशा उम्मीदवार नेताओं के पीछे भागते देखे जाते है, पर अभी यह हो रहा है कि नेता लोग उम्मीदवारों को ताकते बैठे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट के दिल्ली के नेताओं के बीच इस फार्मूले के लिए सहमति बन गई है कि वह विक्रम शर्मा और आरके शाह को बारी बारी से गवर्नर बनवा लेते हैं । डिस्ट्रिक्ट के हरियाणा के नेता हालाँकि दिल्ली के नेताओं के बीच बनी इस सहमति पर ऐतराज जता रहे हैं, लेकिन दिल्ली के नेता उनकी परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं । दिल्ली के नेता अपने इस फार्मूले को लेकर भारी उत्साह में हैं, लेकिन उनके इस उत्साह पर पानी डालने का काम किया है विक्रम शर्मा और आरके शाह ने । मामला दरअसल पैसों को लेकर अटक गया है । नेताओं का कहना है कि यह फार्मूला सफल तो हो जायेगा तथा यह दोनों ही गवर्नर बन जायेंगे, लेकिन इसके लिए इन्हें पैसे तो खर्च करने की पड़ेंगे । पैसों के मामले में विक्रम शर्मा और आरके शाह ने लेकिन चुप्पी साध ली है । उनकी चुप्पी ने नेताओं को असहाय बना दिया है । नेताओं ने अपने फार्मूले को चूँकि सार्वजनिक कर दिया है इसलिए दूसरे संभावित उम्मीदवार भी उनके पास नहीं आ रहे हैं ।
विक्रम शर्मा और आरके शाह वैसे तो कुछ नहीं कह रहे हैं, किंतु उनके नजदीकियों की तरफ से जो बातें सुनने को मिल रही हैं उनमें उनकी नाराजगी इस बात को लेकर दिख रही है कि नेताओं के फर्जी क्लब्स/वोटों के पैसे उनसे दो दो बार क्यों माँगे जा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि उम्मीदवार को जो पैसे खर्च करने होते हैं, उसमें एक बड़ा हिस्सा फर्जी क्लब्स/वोटों के ड्यूज चुकाने में होता है । विक्रम शर्मा और आरके शाह पिछले लायन वर्ष में इस मद में पैसे लगा चुके हैं; उनसे अब इस वर्ष दोबारा से पैसे माँगे जा रहे हैं । नजदीकियों के अनुसार, विक्रम शर्मा और आरके शाह को इस पर आपत्ति है और इसीलिए वह चुप लगा कर बैठ गए हैं । नजदीकियों के अनुसार, वह भी समझ तो रहे हैं कि यह पैसे तो उन्हें देने ही पड़ेंगे; फिर भी यदि वह चुप बैठ गए हैं तो इसलिए ताकि वह दूसरे खर्चों से बच सकें । दोनों ही जानते हैं कि नेताओं द्धारा तय किए गए फार्मूले पर वह यदि अभी से उत्साह दिखायेंगे तो नेता लोग उनसे फर्जी क्लब्स/वोटों के ड्यूज तो ले ही लेंगे, दूसरे और खर्चे भी करवाने लगेंगे । विक्रम शर्मा और आरके शाह समझ रहे हैं कि नेता लोगों के पास अपने उक्त फार्मूले को क्रियान्वित करवाने - यानि उन्हें ही गवर्नर बनवाने - के अलावा और कोई विकल्प नहीं है; इसलिए अभी चुप बैठ कर वह जितने जो पैसे बचा सकते हैं, बचा लें । विक्रम शर्मा और आरके शाह की इस चाल ने नेताओं को सचमुच में असहाय बना दिया है और नेता लोग घर बैठने को मजबूर हो गए हैं ।
नेताओं की इस मजबूरी में सुरेश जिंदल को अपना काम बनता हुआ दिख रहा है । उनके नजदीकियों का कहना है कि वह दिल्ली के नेताओं को यह ऑफर देना चाहते हैं कि इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा का जो नंबर है, वह नंबर यदि उन्हें दे दिया जाये तो वह सारा खर्चा उठाने के लिए तैयार हैं । उनके कुछेक नजदीकियों का यह भी सुझाव है कि वीके हंस के बाद वाले वर्ष में गवर्नर बनने के लिए जो भी इच्छुक हो, दिल्ली के नेता उसे तैयार कर लें और उससे भी पैसे खर्च करवाएँ - और मौज लें ! विक्रम शर्मा और आरके शाह यदि 'होशियारी' दिखा रहे हैं तो उन्हें किनारे करें । सुरेश जिंदल का संभावित ऑफर और उनके नजदीकियों का सुझाव तो अच्छा है, और दिल्ली के नेताओं के लिए उसे स्वीकार करना कोई मुश्किल भी नहीं होगा । समस्या लेकिन यह है कि सुरेश जिंदल दिल्ली के नेताओं के पास सचमुच में आते 'कैसे' हैं और 'किस जरिये से' आते हैं । सुरेश जिंदल अभी केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता के नजदीक 'देखे' जा रहे हैं । केएल खट्टर उनकी उम्मीदवारी को जिस तरह से आगे बढ़ा रहे हैं, उससे उनका काम बनने की बजाये बिगड़ता ज्यादा दिख रहा है । पिछली बार भी सुरेश जिंदल का मामला सिर्फ इसलिए ही बिगड़ गया था, क्योंकि उनकी उम्मीदवारी के लिए नेताओं के बीच ही ठीक तरह से समर्थन नहीं जुटाया जा सका था । पिछली बार के अपने उसी अनुभव से सबक लेकर सुरेश जिंदल इस बार सिर्फ केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता के भरोसे ही नहीं रहना चाहते हैं, और इसीलिए उन्होंने अपनी तरफ से भी दिल्ली के नेताओं से तार जोड़ने की कवायद शुरू की है ।
सुरेश जिंदल की इस कवायद से दिल्ली के नेताओं को विक्रम शर्मा व आरके शाह की 'होशियारी' से निपटने में मदद तो मिलेगी - लेकिन सुरेश जिंदल भी चूँकि कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रहे हैं, इसलिए दिल्ली के नेताओं को अभी असहाय ही बने रहना पड़ेगा । इसके अलावा, विक्रम शर्मा और आरके शाह से जब तक पूरी तरह जबाव न मिल जाए तब तक दिल्ली के नेताओं के लिए सुरेश जिंदल को हरी झंडी देना भी मुश्किल ही होगा । जाहिर है कि सारा मामला इस तरह पेचीदा हो गया है कि नेताओं को भी समझ में नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें ? डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में नेताओं को इतना असहाय शायद ही कभी देखा गया होगा ।

Wednesday, April 3, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में संजय खन्ना की उम्मीदवारी ने सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी और अजय बुद्धराज की नेतागिरी के लिए गंभीर खतरा पैदा किया

सिरसा । संजय खन्ना की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने सुरेश जिंदल और वीके हंस की उम्मीदवारी के लिए एक साथ गंभीर चुनौती पैदा की है । संजय खन्ना की उम्मीदवारी के चलते, वीके हंस की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग बुरी तरह फ्लॉप हुई तो सुरेश जिंदल अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में यहाँ मीटिंग करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे हैं । दोनों ही खेमों के नेता संजय खन्ना को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने और अपने अपने समर्थन में खींचने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन संजय खन्ना किसी के 'हाथ' नहीं आ रहे हैं । सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी के प्रमुख सेनापति अजय बुद्धराज हालाँकि दावा कर रहे हैं कि ऐन मौके पर संजय खन्ना अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे और सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी के प्रति अपना समर्थन घोषित करेंगे । अपने इस दावे के संबंध में अजय बुद्धराज के पास जोरदार तर्क भी है और वह यह कि चूँकि चंद्रशेखर मेहता का सिरसा में राज है और वह उनके साथ हैं, इसलिए चंद्रशेखर मेहता ही संजय खन्ना की उम्मीदवारी को वापस करवायेंगे और तब संजय खन्ना के पास सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा ।
संजय खन्ना को लेकर कई लोगों को लगता है कि अजय बुद्धराज और चंद्रशेखर मेहता ने मिलकर उन्हें ऐसा फँसाया है कि उनके लिए ज्यादा विकल्प बचे ही नहीं रहे हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में इस वर्ष के शुरू के महीनों में लोगों का विश्वास था कि अजय बुद्धराज वाला खेमा संजय खन्ना को उम्मीदवार बनाएगा । लेकिन जब उम्मीदवार सचमुच तय करने का समय आया तो अजय बुद्धराज ने सभी को आश्चर्य में डालते हुए सुरेश जिंदल को उम्मीदवार चुना और संजय खन्ना को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ । अजय बुद्धराज से भी ज्यादा निराशा संजय खन्ना को चंद्रशेखर मेहता के रवैये से हुई - क्योंकि सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी को चंद्रशेखर मेहता के समर्थन के दावे भी किये गए । चंद्रशेखर मेहता के रवैये से निराश संजय खन्ना ने लेकिन हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने सिरसा में लोगों को अपने समर्थन में जुटा कर चंद्रशेखर मेहता पर अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में रहने के लिए दबाव बनाया । यह दबाव उस समय दिखा भी जब हरियाणा फोरम के नेताओं के साथ खड़े होने के लिए चंद्रशेखर मेहता ने संजय खन्ना को उम्मीदवार बनाये जाने की शर्त रखी । अजय बुद्धराज और उनके समर्थकों का हालाँकि कहना था और है कि चंद्रशेखर मेहता ने हरियाणा फोरम के नेताओं से जान छुड़ाने के लिए संजय खन्ना की उम्मीदवारी का नाम लिया है और चंद्रशेखर मेहता यह भी जानते हैं कि संजय खन्ना के बस की उम्मीदवार बने रहना है ही नहीं और तब चंद्रशेखर मेहता उनके साथ आ जायेंगे । आजकल अजय बुद्धराज और चंद्रशेखर मेहता सार्वजानिक रूप से एक दूसरे को दी गईं गलियों को भूलकर जिस तरह एक साथ होने की कोशिश कर रहे हैं, उसे देखते हुए हो सकता है कि अजय बुद्धराज का यह कहना सच ही हो कि चंद्रशेखर मेहता ने हरियाणा फोरम के नेताओं को और संजय खन्ना को एक साथ उल्लू बनाया है । 
संजय खन्ना के रवैये ने लेकिन चंद्रशेखर मेहता की अजय बुद्धराज द्धारा बताई जा रही इस रणनीति को फेल करने की तैयारी की हुई है । संजय खन्ना ने दावा किया हुआ है और अपने इस दावे को उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक के सामने भी दोहराया है कि वह अपनी उम्मीदवारी को किसी भी कीमत पर वापस नहीं लेंगे । संजय खन्ना और उनके समर्थकों का सोचना यह है कि दीपक तलवार, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा के वीके हंस की उम्मीदवारी के समर्थन में जाने से सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी को दिल्ली में मिल सकने वाले समर्थन-आधार को जो नुकसान पहुँचा है, उसके बाद संजय खन्ना की उम्मीदवारी के लिए चांस बढ़ गया है । दरअसल दीपक तलवार, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा ने जो झटका दिया है उसके बाद अजय बुद्धराज के लिए सुरेश जिंदल को चुनाव जितवाने से ज्यादा एक नेता के रूप में अपनी साख बचाना ज्यादा जरूरी हो गया है । अपनी साख बचाने के वास्ते अजय बुद्धराज के लिए चंद्रशेखर मेहता का समर्थन पाना जरूरी हो गया है । संजय खन्ना और उनके समर्थकों का मानना यह है कि संजय खन्ना की उम्मीदवारी के होते हुए चंद्रशेखर मेहता के लिए उन्हें छोड़ कर अजय बुद्धराज के साथ जाना मुश्किल होगा - और तब अजय बुद्धराज को सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी का समर्थन छोड़ कर उनकी उम्मीदवारी के समर्थन के लिए मजबूर होना पड़ेगा ।
संजय खन्ना और उनके समर्थकों के अनुसार अजय बुद्धराज भी और चंद्रशेखर मेहता भी यह अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि हरियाणा फोरम की राजनीति से निपटने के लिए उन दोनों का साथ होना जरूरी है । चंद्रशेखर मेहता के लिए संजय खन्ना की उम्मीदवारी को छोड़ कर अजय बुद्धराज के साथ जाना मुश्किल होगा; यदि वह ऐसा करते हैं तो सिरसा के लोगों के बीच उनकी पोल खुल जायेगी और सिरसा के नाम पर चलने वाली उनकी राजनीति चौपट हो जायेगी - हाँ, लेकिन यदि संजय खन्ना अपनी उम्मीदवारी खुद ही छोड़ दें तो बात अलग है; लेकिन अजय बुद्धराज के लिए सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी का साथ छोड़ना कोई मुश्किल नहीं होगा । अजय बुद्धराज का सुरेश जिंदल के साथ किसी भी तरह का कोई संबंध तो रहा नहीं है; सुरेश जिंदल को तो उन्होंने अपनी राजनीति चलाने के लिए उम्मीदवार बनाया है । सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी में उन्हें यदि अपनी राजनीति चलती हुई नहीं दिखेगी तो सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी को छोड़ने में भी उन्हें देर नहीं लगेगी । इसी अनुमान और गणित के भरोसे संजय खन्ना को अपनी उम्मीदवारी को बनाये रखने में अपना काम बनता दिख रहा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों और नेताओं के 'स्वार्थों' को समझने वाले लोगों को भी लगता है कि संजय खन्ना के लिए स्थितियाँ अभी भले ही अनुकूल न दिख रही हों, लेकिन यदि वह अपनी उम्मीदवारी को बनाये रखते हैं और चंद्रशेखर मेहता को अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में बनाये रख पाते हैं - तो चुनाव का दिन आते-आते वह सुरेश जिंदल की उम्मीदवारी के समर्थक अजय बुद्धराज सहित दूसरे नेताओं का भी समर्थन प्राप्त कर लेंगे । यह देखना दिलचस्प होगा कि संजय खन्ना को जो मौका मिला है, उसका वह कैसे इस्तेमाल करते हैं - और कर भी पाते हैं या नहीं ?