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Saturday, January 27, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएल खट्टर की दिल्ली में दिखाई जा रही नेतागिरी ने राजीव अग्रवाल के लिए तो मुश्किलें बढ़ाई ही हैं, हरदीप सरकारिया के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग का खतरा भी पैदा किया

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएल खट्टर की दिल्ली में भी दिखाई जा रही नेतागिरी पर भड़कती नजर आ रही डिस्ट्रिक्ट की राजनीति और उसका हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी पर पड़ते संभावित प्रतिकूल असर ने राजीव अग्रवाल को भी मुसीबत में डालने का काम शुरू कर दिया है । इस मुसीबत में राजीव अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की आरके शाह के साथ सौदेबाजी करने की कोशिशों को लगे धक्के ने भी इजाफा किया है । दरअसल आरके शाह की सक्रियता को नेताओं ने अगले वर्ष के लिए समर्थन की हरी झंडी पाने की उनकी कोशिश के रूप में देखा/पहचाना है । अधिकतर नेताओं को लगता है कि आरके शाह को भी पता है कि उनके लिए चुनाव जीतना तो मुश्किल है, अपनी उम्मीदवारी से लेकिन वह राजीव अग्रवाल को और ज्यादा सक्रिय होने के लिए मजबूर जरूर कर देंगे - इसलिए अपनी सक्रियता के जरिये वह राजीव अग्रवाल के समर्थक नेताओं पर इस बात के लिए दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं कि वह अगले वर्ष के लिए उनकी उम्मीदवारी को समर्थन देने की घोषणा कर दें । मजे की बात यह सुनी जा रही है कि राजीव अग्रवाल खुद तो अपने समर्थक नेताओं पर आरके शाह के साथ 'समझौता' करने के लिए दबाव बना रहे हैं, ताकी उनकी मुसीबत टले - लेकिन उनके समर्थक नेता इसके लिए राजी नहीं हो रहे हैं । उनका मानना और कहना है कि आरके शाह को चुनाव लड़ने ही दिया जाए, ताकि उन्हें खुद भी पता चल जाए कि लोगों के बीच उनके लिए कितना समर्थन है ? आरके शाह को लेकर राजीव अग्रवाल और उनके समर्थक नेताओं के बीच का यह 'झगड़ा' अभी चल तो रहा है, लेकिन नेताओं को उम्मीद है कि वह आरके शाह को कोई तवज्जो नहीं देंगे - तो वह खुद ही चुनावी मैदान से हट जायेंगे ।
हालाँकि केएल खट्टर की दिल्ली में भी दिखाई जा रही नेतागिरी इस मामले को थोड़ा पेचीदा बना रही है । दिल्ली के कई नेता इस बात पर भड़के हुए हैं कि जब वह हरियाणा में किसी से बात नहीं कर रहे हैं, और हरियाणा की राजनीति का सारा दारोमदार उन्होंने हरियाणा के नेताओं के जिम्मे छोड़ दिया है - तब फिर केएल खट्टर दिल्ली में क्यों अपनी टाँग अड़ा रहे हैं ? केएल खट्टर ने दिल्ली में राजीव अग्रवाल के लिए समर्थन जुटाने के लिए कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों से बात की है । दिल्ली के नेताओं को जब इस बात का पता चला तो वह भड़के और कहने लगे कि दिल्ली में राजीव अग्रवाल को समर्थन दिलवाने का काम वह कर लेंगे; राजीव अग्रवाल की उन्हें ज्यादा ही चिंता है तो वह हरियाणा में उन्हें समर्थन दिलवाने का काम करें । केएल खट्टर की इस कार्रवाई को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजिंदर बंसल को नीचा दिखाने की कार्रवाई के रूप में भी देखा/पहचाना गया है । दरअसल राजिंदर बंसल को आरके शाह की उम्मीदवारी के समर्थन में समझा/पहचाना जा रहा है - हालाँकि राजिंदर बंसल ने अभी तक सार्वजनिक रूप से आरके शाह को समर्थन देने की कोई कोशिश की नहीं है । माना/समझा जा रहा है कि राजीव अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में बात करके केएल खट्टर ने लोगों के बीच यह संदेश देने का प्रयास किया है कि राजिंदर बंसल की चिंता करने की जरूरत नहीं है - हरियाणा के नेता पूरी तरह राजीव अग्रवाल के साथ हैं । राजीव अग्रवाल के समर्थक नेताओं का कहना है कि प्रयास तो उनका अच्छा है, लेकिन यह प्रयास दिल्ली की बजाए वह यदि हरियाणा में करते/दिखाते तो उनके प्रयास पर सवाल खड़े नहीं होते - और राजीव अग्रवाल का ज्यादा भला होता ।
केएल खट्टर के इस 'प्रयास' ने हरियाणा में हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने के मनमाने तरीके से नाराज लोगों को भड़काने का काम किया है - और वहाँ हरदीप सरकारिया के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग करने/करवाने की चर्चा शुरू हो गयी है । वहाँ लोगों का कहना है कि हरदीप सरकारिया के खिलाफ कोई उम्मीदवार यदि नहीं भी आ रहा है, तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि नेताओं की मनमानियाँ लोग चुपचाप सहते जायेंगे और हरदीप सरकारिया आसानी से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन जायेंगे । हरियाणा में वास्तव में समस्या यह हुई है कि जो लोग हरदीप सरकारिया को मनमाने तरीके से उम्मीदवार चुने जाने से खफा हैं, वह नेताओं के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए राजीव अग्रवाल को निशाना बना रहे हैं । राजीव अग्रवाल भी चूँकि 'नेताओं के उम्मीदवार' के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं, इसलिए हाल ही में हरियाणा में चलाए गए अपने संपर्क अभियान में उन्हें लोगों की बेरुखी और नाराजगी का शिकार बनना पड़ा । राजीव अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि अपने संपर्क अभियान में उन्हें नेताओं की तरफ से भी कोई मदद नहीं मिली । नेताओं ने वीके हंस पर दबाव बना कर उन्हें राजीव अग्रवाल के साथ जाने के लिए मजबूर तो कर दिया, लेकिन वीके हंस ने भी राजीव अग्रवाल के संपर्क अभियान को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया । उम्मीद तो हालाँकि की जा रही है कि धीरे-धीरे हालात सामान्य हो जायेंगे - लेकिन केएल खट्टर की दिल्ली में राजीव अग्रवाल को लेकर दिखाई गई सक्रियता ने अलग अलग कारणों से अलग अलग खेमों और समूहों में जो 'आग' लगाई है, उसने 'नेताओं के उम्मीदवार' के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हरदीप सरकारिया और राजीव अग्रवाल के सामने मुश्किलें खड़ी करने और उन्हें बढ़ाने का ही काम किया है ।

Monday, January 1, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने में हो देरी से बनी स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों में उलटफेर होने की परिस्थितियाँ बनाते हुए आरके शाह को चुनावी मुकाबले में 'स्पेस' दिया और महत्त्वपूर्ण बना दिया है

नई दिल्ली । आनंद दुआ और आरके अग्रवाल में से किसी एक को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने के मामले में दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं की बढ़ती असमंजसता ने डिस्ट्रिक्ट के चुनावी समीकरणों में उलटफेर का माहौल बनाना शुरू कर दिया है, जिसका फायदा उठाने के लिए आरके शाह की तरफ से तैयारी होती सुनी जा रही है । यही कारण है कि अभी तक जिन आरके शाह को 'न तीन में और न तेरह में' माना/देखा जा रहा था, वही आरके शाह अब एक महत्त्वपूर्ण कारक बन गए हैं - और दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेता उम्मीदवार चुनने में इस तथ्य को भी सामने रख रहे हैं कि आरके शाह की तरफ से मिलने वाली चुनौती से आनंद दुआ और आरके शाह में से कौन प्रभावी तरीके से निपट सकेगा । उम्मीदवार चुनने में देरी करके उम्मीदवारों को 'थका' देने और विरोध की संभावना को खत्म करने का जो फार्मूला दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं ने अपनाया, वही फार्मूला दरअसल अब उनके लिए मुसीबत बन गया है । दिल्ली में वास्तव में खतरा यह था कि आनंद दुआ और आरके अग्रवाल में से वह जिस किसी को उम्मीदवार नहीं चुनेंगे, वह बागी उम्मीदवार के रूप में खड़ा हो जायेगा - और तब दिल्ली में दो खेमे बन जायेंगे और अपनी अपनी जीत को लेकर खेमेबाजी शुरू हो जाएगी । इस संभावना को खत्म करने के लिए ही सोचा यह गया कि उम्मीदवार चुनने में देरी करके वह किसी एक को बागी हो सकने की तैयारी करने के लिए समय ही नहीं देंगे, और इस तरीके से दिल्ली में एकता 'बना' कर वह आरके शाह को भी अलग-थलग कर देंगे । पूर्व गवर्नर्स नेता अपने इस फार्मूले को कामयाब होते हुए तो देख रहे हैं, लेकिन उनकी इस कामयाबी ने एक अलग तरह का जो समीकरण बनाया है - उससे फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने को लेकर दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं की मुश्किलें कम होने की बजाए बढ़ और गई हैं ।
आनंद दुआ और आरके अग्रवाल में से किसी एक के बागी हो सकने की संभावनाओं को तो मामले को घसीट कर पूर्व गवर्नर्स नेताओं ने फ्यूज कर दिया है, लेकिन इस प्रक्रिया में दोनों की इतनी 'फजीहत' भी हो चुकी है कि दोनों में से कोई भी - और उसके समर्थक नेता भी - दूसरे की उम्मीदवारी को सहज रूप में स्वीकार नहीं कर सकेगा । अब जो स्थिति बनी है, आशंका है कि उसमें जो उम्मीदवार नहीं चुना जायेगा - वह घोषित रूप में तो बागी नहीं बनेगा, लेकिन उसका और उसके समर्थक नेताओं का व्यवहार जरूर बागियों जैसा हो जायेगा । यह स्थिति आरके शाह की 'राजनीतिक पूँजी' बनती है । आरके शाह इस राजनीतिक पूँजी को इस्तेमाल कर सकेंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; लेकिन इस स्थिति ने चुने जाने वाले उम्मीदवार के सामने अभी से ही मुसीबत तो खड़ी कर ही दी है । इस स्थिति ने उम्मीदवारों से भी ज्यादा नेताओं को मुसीबत में फँसा दिया है । नेताओं के लिए मुसीबत की बात यह हो गई है कि बड़े सोच-विचार के बाद वह जिस उम्मीदवार को चुनें, वह कहीं हालात का मुकाबला कर सकने में विफल रहा तो - उम्मीदवार से ज्यादा तो नेताओं की फजीहत होगी । हरियाणा के पूर्व गवर्नर्स नेता जिस तरह से दिल्ली के उम्मीदवारों में दिलचस्पी 'दिखा' रहे हैं, उसके कारण भी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के मामले में दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं के लिए मुसीबत बढ़ी है ।
केएल खट्टर ने सुरेश बिंदल के साथ दोस्ती निभाने के चक्कर में आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति दिलचस्पी दिखाई है, तो राजिंदर बंसल ने आरके शाह के प्रति अपने समर्थन को छिपाने का प्रयास तक नहीं किया है । अभी हाल ही में रोहतक में आयोजित हुए राजिंदर बंसल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह में दिल्ली से डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डीनेटर केएम गोयल के अलावा एक सिर्फ आरके शाह को ही निमंत्रण मिला था और वह शामिल हुए थे । उक्त समारोह में - हरियाणा के बाकी पूर्व गवर्नर्स नेताओं के भी शामिल होने के कारण - आरके शाह की मौजूदगी का खास राजनीतिक संदेश तो लोगों के बीच गया ही है । दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं को हालाँकि यह विश्वास है कि हरियाणा के पूर्व गवर्नर्स नेता 'उनके' और उनके उम्मीदवार के साथ ही रहेंगे । संभव है कि घोषित रूप में यह स्थिति बनी रहे, लेकिन चुनावी राजनीति के खिलाड़ी इस बात को अच्छी तरह से जानते/समझते हैं कि चुनावी राजनीति का परिणाम इससे तय नहीं होता है कि ऊपर ऊपर क्या हो रहा है या दिख रहा है - परिणाम इससे तय होता है कि अंदरूनी तौर पर क्या हो रहा है और वास्तविक सच्चाई क्या है । हरियाणा में वैसे भी आरके शाह के लिए अच्छा समर्थन आधार देखा/पहचाना जाता है । इसका नजारा विक्रम शर्मा और आरके शाह के बीच हुए पिछले चुनाव में देखा भी जा चुका है, जबकि पूर्व गवर्नर्स नेताओं का समर्थन विक्रम शर्मा के साथ था - लेकिन वोट आरके शाह को मिले थे और चुनाव वह जीते थे । इन हालातों में, दिल्ली में उम्मीदवार चुनने में हो देरी से बनी स्थिति ने आरके शाह को जिस तरह से चुनावी मुकाबले में 'स्पेस' दे दिया है, उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों में उलटफेर होने की परिस्थितियाँ बनी हैं और माहौल थोड़ा रोमांचपूर्ण होता दिख रहा है ।

Friday, December 29, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में प्रवीन राजगढ़िया के मामले में और अपने गवर्नर-काल के अकाउंट्स न देने के किस्से के फिर से उठने के कारण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएल खट्टर चौतरफा मुसीबत में फँसे

रोहतक । प्रवीन राजगढ़िया के साथ हरियाणा के लीडर्स की रोहतक में होने वाली मीटिंग के लगातार स्थगित होते जाने से प्रवीन राजगढ़िया के नजदीकियों और समर्थकों के बीच पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएल खट्टर के प्रति नाराजगी और विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है । प्रवीन राजगढ़िया के नजदीकियों की तरफ से केएल खट्टर पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए जा रहे हैं । रोहतक में पूर्व गवर्नर राजिंदर बंसल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह का निमंत्रण न मिलने के बाद से तो प्रवीन राजगढ़िया और उनके समर्थक बुरी तरह भड़के हुए हैं । उल्लेखनीय है कि उक्त समारोह में हरियाणा के चारों-पाँचों लीडर्स उपस्थित हुए थे । प्रवीन राजगढ़िया ने प्रयास किया था कि जब सभी लीडर्स रोहतक में आ ही रहे हैं, तो समारोह से पहले प्रस्तावित मीटिंग हो सकती है । केएल खट्टर ने मीटिंग हो पाने में तो असमर्थता व्यक्त कर ही दी; प्रवीन राजगढ़िया को अधिष्ठापन समारोह का निमंत्रण तक नहीं मिला । प्रवीन राजगढ़िया के लिए यह घटना काफी झटके वाली रही । उनकी तरफ से लोगों के बीच माहौल तो यह बनाया/दिखाया गया था कि हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने के तरीके पर उनकी तरफ से नाराजगी व्यक्त किए जाने से हरियाणा की लीडरशिप बुरी तरह से 'हिल' गई है, लेकिन देखने में यह आया कि उनकी नाराजगी के बावजूद लीडरशिप के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है । प्रवीन राजगढ़िया के नजदीकियों का कहना है कि रोहतक में होने वाली मीटिंग को लेकर केएल खट्टर जिस तरह से टालमटोल करते नजर आ रहे हैं, और बार-बार तरह तरह की बहानेबाजी करके मीटिंग के दिन को आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं - उससे अब लगने लगा है कि केएल खट्टर सिर्फ टाइम पास कर रहे हैं, और प्रवीन राजगढ़िया को बेवकूफ बना रहे हैं ।
प्रवीन राजगढ़िया के नजदीकियों और समर्थको को अब महसूस हो रहा है कि केएल खट्टर की बातों में आकर उन्होंने बड़ी गलती कर दी और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी जगहँसाई और फजीहत करवा ली है । प्रवीन राजगढ़िया के कुछेक नजदीकियों की तरफ से हालाँकि अभी भी दावा किया जा रहा है कि उनके चैप्टर को अभी बंद हुआ नहीं समझा जाए, और प्रवीन राजगढ़िया अपने साथ हुए 'खेल' का उचित समय पर बदला जरूर लेंगे । नजदीकियों का कहना है कि प्रवीन राजगढ़िया लीडर्स को पूरा समय देना चाहते हैं, ताकी बाद में वह यह न कह सकें कि वह तो बात करना चाहते थे - प्रवीन राजगढ़िया ने ही जल्दी मचा दी थी । इस मामले में केएल खट्टर भी खुद को बुरी तरह घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं । दरअसल इस मामले में हरियाणा के बाकी लीडर्स ने केएल खट्टर को अकेला छोड़ दिया है । बाकी लीडर्स अभी हरदीप सरकारिया को और उनके बाद पुनीत बंसल को समर्थन देने के मुद्दे पर पुनर्विचार करने के मूड में बिलकुल भी नहीं हैं । उनकी तरफ से केएल खट्टर को बता दिया गया है कि प्रवीन राजगढ़िया से उन्होंने जो कहा है, उसे वह खुद ही देखें । बाकी लीडर्स के इसी रवैये के चलते, प्रवीन राजगढ़िया से रोहतक में मीटिंग करने के वायदे को निभा पाना केएल खट्टर के लिए मुश्किल हो रहा है । केएल खट्टर के लिए मुसीबत की बात यह है कि बाकी लीडर्स की तरफ से उन्हें यह और सुनने को मिल रहा है कि प्रवीन राजगढ़िया को उन्होंने नाहक ही ज्यादा तवज्जो दे दी है, और मामले को थोड़ा टेढ़ा कर दिया है - अन्यथा प्रवीण राजगढ़िया कुछ दिन शोर मचा कर खुद ही शांत हो जाते । बाकी लीडर्स की नसीहत सुनते हुए केएल खट्टर ने लगता है कि उन्हीं का फार्मूला अपना लिया है और प्रवीन राजगढ़िया को कभी इग्नोर करने तो कभी 'चिंता मत करो' का झाँसा देकर लटकाए हुए हैं । केएल खट्टर की इस झाँसेबाजी से प्रवीन राजगढ़िया और उनके नजदीकी व समर्थक भड़के हुए तो बहुत हैं, लेकिन उनकी समझ में आ नहीं रहा है कि इस स्थिति में वह करें, तो आखिर क्या करें ?

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नई दिल्ली । केएल खट्टर पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर तथा डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डीनेटर केएम गोयल के आक्रामक रवैये के कारण एक अलग तरह की फजीहत के दरवाजे पर पहुँच गए हैं । केएल खट्टर के लिए यह फजीहत पूर्व गवर्नर हर्ष बंसल द्वारा केएम गोयल पर लगाए एक आरोप के चलते पैदा हुई है । हर्ष बंसल ने डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डीनेटर के रूप में केएम गोयल पर डिस्ट्रिक्ट के हिसाब-किताब में हेराफेरी करने की आशंका व्यक्त करते हुए अकाउंट्स समय से न देने का आरोप लगाया है । हर्ष बंसल का कहना है कि केएम गोयल की इस हरकत पर उनकी तरफ से यदि उचित स्पष्टीकरण नहीं आया, तो वह इस मामले को आगे ले जायेंगे । केएम गोयल ने अधिकृत रूप से तो इस आरोप का जबाव नहीं दिया है, लेकिन अलग अलग मौकों पर कुछेक लोगों के बीच उन्होंने अपने आक्रामक तेवर दिखाए और कहा कि हर्ष बंसल को समय से अकाउंट्स लेने/पाने का इतना शौक है तो पहले राकेश त्रेहन और केएल खट्टर से अकाउंट्स माँगे, जो अभी तक नहीं मिले हैं । केएम गोयल की तरफ से यहाँ तक कहा गया कि हर्ष बंसल की हिम्मत केएल खट्टर से अकाउंट्स माँगने की नहीं होगी, जिनसे वह एक बार पिट चुके हैं । केएम गोयल की यह बात हर्ष बंसल और केएल खट्टर, दोनों के लिए चुनौती की तरह है । हर्ष बंसल भले ही एक बार केएल खट्टर से पिट चुके हैं, लेकिन वह इतने बेशर्म किस्म के व्यक्ति के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं कि दोबारा भी पिटने के लिए तैयार हो जायेंगे । केएल खट्टर के लिए मुसीबत की बात यह है कि हर्ष बंसल यदि बेशर्मी पर सचमुच उतर ही आए तो उन्हें नाहक एक बार फिर फिजूल के विवाद और झगड़े में पड़ना पड़ेगा - और हो सकता है कि वह विवाद और झगड़ा खुद उनके लिए भी फजीहत का कारण बने, क्योंकि यदि अपने गवर्नर-काल के अकाउंट्स न देने का उन पर लगा केएम गोयल का आरोप सच है तो यह उनके लिए फजीहत का कारण तो बन ही जाएगा ।

Thursday, December 14, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार चुनने के तरीके पर नाराजगी जाता रहे प्रवीन राजगढ़िया को 'समझाबुझा' कर मामला सचमुच सेटल कर लिया गया है, या पिक्चर अभी बाकी है ?

रोहतक । हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने के तरीके को लेकर बबाल करने वाले वरिष्ठ लायन प्रवीन राजगढ़िया अचानक से चुप्पी साध कर अब खुद ही बबाल का कारण बन गए हैं । उनकी चुप्पी को लेकर तरह तरह की बातें हो रही हैं, जिन्हें भड़काने का काम लीडरशिप की तरफ से आने वाली उन बातों ने भी किया है - जिनमें दावा किया गया है कि प्रवीन राजगढ़िया को समझा लिया गया है और मामला सेटल हो गया है । इन बातों से लोगों के बीच सवाल पैदा हुआ है कि प्रवीन राजगढ़िया को आखिर क्या समझाया गया है और मामला किस शर्त पर सेटल हुआ है ? लोगों का कहना/पूछना है कि प्रवीन राजगढ़िया और लीडरशिप के नेताओं के बीच आखिर क्या सौदा/समझौता हुआ है, यह बात तो पता चलना चाहिए ? प्रवीन राजगढ़िया के नजदीकियों ने यह तो बताया था कि हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने के तरीके पर प्रवीन राजगढ़िया द्वारा आपत्ति करने और नाराजगी दिखाने के बाद पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएल खट्टर ने प्रवीन राजगढ़िया को फोन किया था । उनके बीच क्या बात हुई, यह तो पता नहीं चल सका - लेकिन देखने में यह आया कि उसके बाद प्रवीन राजगढ़िया ने पूरी तरह चुप्पी साध ली । उनके चुप्पी साध लेने के साथ-साथ ही लीडरशिप की तरफ से सुनने को मिला कि प्रवीन राजगढ़िया को मना लिया गया है और मामला सेटल हो गया है । इससे लीडरशिप को निशाना बनाने वाले प्रवीन राजगढ़िया खुद लोगों के निशाने पर आ गए और उनके बीच सवाल उठे कि उन्होंने लीडरशिप से सौदेबाजी करने के लिए ही बबाल खड़ा किया था क्या ?
प्रवीन राजगढ़िया को लोगों की आलोचना का शिकार बनता देख उनके नजदीकियों ने कहा/बताया है कि वह पारिवारिक फंक्शन में शामिल होने के लिए बाहर गए हैं और वहाँ व्यस्त हैं, इसलिए उनकी तरफ से कुछ कहा/सुना नहीं जा पा रहा है; और इसलिए उनकी चुप्पी के कोई मनमाने अर्थ नहीं निकाले जाने चाहिए । नजदीकियों की तरफ से यह दावा भी किया गया है कि प्रवीन राजगढ़िया कोई छिप कर सौदेबाजी करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, वह जो कुछ भी करेंगे सभी को बता कर और सभी को विश्वास में लेकर करेंगे । नजदीकियों ने यह भी बताया है कि केएल खट्टर से फोन पर उनकी जो बात हुई है, उसमें अभी यही तय हुआ है कि पारिवारिक फंक्शन से लौट कर उनकी लीडरशिप के नेताओं से रोहतक में मीटिंग होगी, जिसमें मामले पर विस्तृत विचार होगा । उल्लेखनीय है कि प्रवीन राजगढ़िया की मुख्य आपत्ति इस बात पर थी कि लीडरशिप के नाम पर पाँच लोग हरियाण के लायन सदस्यों की तरफ से फैसला नहीं ले सकते हैं, और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार का फैसला हरियाणा फोरम की मीटिंग में होना चाहिए । दरअसल हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार चुने जाने पर लोग भड़के इसीलिए क्योंकि हरदीप सरकारिया की लोगों के बीच कोई सक्रियता ही नहीं थी । मजे की बात यह रही कि हरदीप सरकारिया को चुनने के पहले भी उनके समर्थक पूर्व गवर्नर्स ने उन्हें सक्रिय करने तथा लोगों से मिल-जुल कर माहौल बनाने के लिए प्रेरित नहीं किया । इससे लोगों ने महसूस किया कि पूर्व गवर्नर्स ने मनमानी करते/दिखाते हुए एक ऐसा व्यक्ति उम्मीदवार के रूप में उनके सिर पर थोप दिया है, जो उन्हें तवज्जो देने की कोई जरूरत ही नहीं समझता है । प्रवीन राजगढ़िया ने लोगों की इसी भावना को अभिव्यक्त करते हुए लीडरशिप के फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया ।
प्रवीन राजगढ़िया के मोर्चा खोलने के बाद लीडरशिप ने एक काम यह तो किया कि उन्होंने हरदीप सरकारिया को सक्रिय किया है, जिसके चलते हरदीप सरकारिया ने हरियाणा में लोगों से बात/मुलाकात करना शुरू किया है और वह दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स से भी मिल गए हैं । इसी के साथ-साथ लीडरशिप की तरफ से यह कहना भी शुरू किया गया है कि उम्मीदवार का फैसला तो लीडरशिप को ही करना था, हरियाणा फोरम की मीटिंग में यह फैसला नहीं हो सकता है । प्रवीन राजगढ़िया तथा अन्य लोगों की हालाँकि माँग ही यह है कि उम्मीदवार का फैसला हरियाणा फोरम की मीटिंग में हो । हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार चुनने वाले पूर्व गवर्नर्स भी जानते/समझते हैं कि हरियाणा फोरम की मीटिंग में यदि उम्मीदवार चुनने की बात हुई तो हरदीप सरकारिया कतई उम्मीदवार नहीं चुने जा सकेंगे । इसीलिए उनकी कोशिश है कि उम्मीदवार तो उन्होंने चुन लिया है, अब हरियाणा फोरम में उनके फैसले पर मोहर लगा दी जाए । समझा जाता है कि प्रवीन राजगढ़िया को इसी बात के लिए राजी करने का प्रयास किया जायेगा । हरदीप सरकारिया के समर्थक पूर्व गवर्नर्स को विश्वास है कि प्रवीण राजगढ़िया को बहला/फुसला कर और या अगली बार उम्मीदवार बनाने का लालच देकर चुप करा लिया गया, तो फिर हरियाणा में और कोई उनके फैसले का विरोध नहीं करेगा । समस्या की बात लेकिन यह है कि हरदीप सरकारिया के समर्थक पूर्व गवर्नर्स अगली बार की उम्मीदवारी के लिए पुनीत बंसल के साथ वायदा कर चुके हैं; इसलिए सार्वजनिक रूप से उनके लिए प्रवीन राजगढ़िया से अगली बार का वायदा कर पाना तो संभव नहीं होगा - यह काम गुपचुप रूप से ही होगा । गुपचुप रूप से किए वायदे पर प्रवीन राजगढ़िया कितना भरोसा करेंगे, यह एक अलग सवाल है ।
प्रवीन राजगढ़िया के नजदीकियों के अनुसार, रोहतक में प्रवीन राजगढ़िया की पूर्व गवर्नर्स के साथ जो मीटिंग होनी है - लोगों की नजर अब उसके नतीजे पर है । हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार चुनने के तरीके पर प्रवीण राजगढ़िया ने जो आपत्ति और नाराजगी जाहिर की है तथा उम्मीदवार चुनने के लिए हरियाणा फोरम की मीटिंग बुलाने की जो माँग की हुई है - उसके पीछे उनका वास्तविक इरादा क्या है; क्या वह सचमुच हरियाणा के लायन सदस्यों की आवाज को सुनने की वकालत कर रहे हैं या अपने लिए कोई सौदेबाजी करने का मौका बना रहे हैं - यह जल्दी ही स्पष्ट हो जायेगा ।

Tuesday, December 12, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में आनंद दुआ के नाम पर बिछाई जा रही दिल्ली के पाँच सदस्यीय गुट की राजनीतिक बिसात को सुरेश बिंदल और केएल खट्टर की मिलीजुली चाल ने सचमुच पलट दिया है क्या ?

नई दिल्ली । आनंद दुआ की परेशानी और बेचैनी यह देख/जान कर बढ़ती जा रही है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू कर देने के बाद भी उनके समर्थक नेता उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी नहीं दे रहे हैं, जिसके चलते उनकी उम्मीदवारी का मामला उलझता ही जा रहा है । आनंद दुआ ने अपने नजदीकियों से यह कहते/बताते हुए अपना संपर्क अभियान शुरू किया था कि दिल्ली के पाँच पूर्व गवर्नर्स - डीके अग्रवाल, दीपक तलवार, अजय बुद्धराज, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा - के गुट ने उनकी उम्मीदवारी को समर्थन घोषित करने का भरोसा उन्हें दिया है । दरअसल इस भरोसे के बाद ही आनंद दुआ ने अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू किया था । आनंद दुआ के नजदीकियों का कहना/बताना है कि उक्त पाँच पूर्व गवर्नर्स ने आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने का फैसला कर लिया है, और अपने इस फैसले की घोषणा सार्वजनिक करने के लिए वह बस 'उचित समय' का इंतजार कर रहे हैं । 'उचित समय' का इंतजार लेकिन जिस तरह से बढ़ता जा रहा है, उसे 'देख' कर आनंद दुआ की बेचैनी और परेशानी बढ़ने लगी है । उनके नजदीकियों ने भी उनसे पूछना शुरू कर दिया है कि जिन पूर्व गवर्नर्स ने उन्हें समर्थन देने का भरोसा दिया था, वह कहीं उनका पोपट तो नहीं बना रहे हैं । इस गुट का समर्थन पाने के लिए योगेश भसीन द्वारा शुरू की गई कोशिशों को तथा योगेश भसीन की कोशिशों के शुरू होने के बाद गुट के नेताओं के बदले हुए तथा टालमटोल वाले रवैये को देखते हुए आनंद दुआ का माथा ठनका है और वह असमंजस में पड़ गए हैं ।
आनंद दुआ के नजदीकियों के अनुसार, आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने का वायदा करने वाले पूर्व गवर्नर्स अपना वायदा पूरा करने के लिए तैयार तो हैं, लेकिन वह इस बात से डरे हुए भी हैं कि चुनाव की नौबत आने पर आनंद दुआ कहीं मैदान तो नहीं छोड़ जायेंगे - और इस तरह कहीं उनकी फजीहत तो नहीं करा बैठेंगे ? इसी डर के कारण दिल्ली के उक्त पाँच पूर्व गवर्नर्स का गुट वायदा करने के बावजूद आनंद दुआ की उम्मीदवारी को अपने समर्थन की घोषणा करने से अभी बच रहा है । दरअसल सुरेश बिंदल की राजनीतिक चाल और हरियाणा में मची उथल-पुथल ने उन्हें बचाव की मुद्रा में ला दिया है । उल्लेखनीय है कि अभी करीब दस दिन पहले तक दिल्ली में उम्मीदवारों का जो राजनीतिक समीकरण था, वह दिल्ली के उक्त पाँच पूर्व गवर्नर्स के गुट के अनुकूल था । आनंद दुआ और आरके अग्रवाल के रूप में जिन दो उम्मीदवारों को सशक्त उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, वह इस गुट के भरोसे ही आगे कदम बढ़ाने का संकेत दे चुके थे । इस गुट के नेताओं को जिन सुरेश बिंदल से चुनौती मिलने का डर था, उन सुरेश बिंदल ने आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति अपनी नापसंदगी जाहिर कर दी थी - जिसके बाद उक्त गुट ने आनंद दुआ की उम्मीदवारी को हरी झंडी देने का फैसला कर लिया था । इस फैसले के तहत ही आनंद दुआ को सक्रिय होने की सलाह दी गई, और आनंद दुआ ने भी अपने आप को उम्मीदवार मानते हुए संपर्क अभियान शुरू कर दिया । आनंद दुआ और उन्हें उम्मीदवार बनाने का फैसला करने वाले पाँच पूर्व गवर्नर्स के गुट को विश्वास था कि दिल्ली में कोई भी पूर्व गवर्नर आनंद दुआ की उम्मीदवारी का विरोध नहीं करेगा, और उस स्थिति में कोई दूसरा उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेगा - इसलिए फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आनंद दुआ को रास्ता पूरी तरह साफ मिलेगा ।
लेकिन सुरेश बिंदल की राजनीतिक चाल ने आनंद दुआ और उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठाने को तैयार बैठे पाँच पूर्व गवर्नर्स के गुट की तैयारी को झटका दे दिया । आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति नापसंदगी जाहिर करने के बावजूद, आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी को समर्थन देने के क्लब के फैसले का वास्ता देकर सुरेश बिंदल ने आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठाने का संकेत देकर उक्त गुट को आनंद दुआ की उम्मीदवारी की घोषणा करने से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया । दरअसल उक्त गुट के नेताओं को यह भरोसा नहीं है कि चुनाव की स्थिति आने पर भी आनंद दुआ उम्मीदवार बने रहेंगे, और चुनाव लड़ने को तैयार होंगे ? आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर सुरेश बिंदल ने यदि पलटी मारी है, तो इसे एक बड़ी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुरेश बिंदल के चूँकि हरियाणा की राजनीति की कमान सँभाले बैठे केएल खट्टर के साथ नजदीकी संबंध हैं, इसलिए आशंका व्यक्त की जा रही है कि आरके अग्रवाल को लेकर सुरेश बिंदल ने जो चाल चली है - कहीं सुरेश बिंदल और केएल खट्टर की मिलीजुली चाल तो नहीं है ? हरियाणा में हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी को लेकर जो बवाल मचा हुआ है, केएल खट्टर को उसके पीछे दिल्ली के उक्त पाँच सदस्यीय गुट का हाथ दिखता है - इसलिए भी दिल्ली की राजनीति में केएल खट्टर के नाक घुसाने को बदला लेने की करवाई के रूप में देखा/समझा जा रहा है । इससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति एक बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ती दिख रही है । दिल्ली के उक्त पाँच सदस्यीय गुट को राजनीतिक लड़ाई लड़ने में तो परहेज नहीं है, राजनीतिक लड़ाई में उसे अपना पलड़ा भारी ही नजर आ रहा है - लेकिन उस लड़ाई के लिए जो 'ईंधन' चाहिए होगा, आनंद दुआ की तरफ से उसकी 'सप्लाई' को लेकर वह आशंकित हैं । इसी आशंका के चलते उन्होंने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आनंद दुआ की उम्मीदवारी को समर्थन देने की घोषणा को रोक दिया है ।
आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने को तैयार बैठे दिल्ली के पाँच सदस्यीय गुट के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी को लेकर हरियाणा में जो उबाल आ रहा था, वह ठंडा पड़ता दिख रहा है; पाँच सदस्यीय गुट के नेताओं को उम्मीद थी कि उक्त उबाल के कारण केएल खट्टर उनके सामने समर्पण करेंगे और उनके साथ जुड़ेंगे, केएल खट्टर ने लेकिन सुरेश बिंदल के साथ जुड़ने को महत्ता दी है । इससे दिल्ली के पाँच सदस्यीय गुट को अपनी राजनीति फेल होती हुई नजर आ रही है । मजे की बात यह है कि जमीनी स्थिति अभी भी उनके अनुकूल है; हरियाणा में लोग हरियाणा की लीडरशिप के फैसले के खिलाफ बगावत करने को तैयार बैठे हैं, और इसके लिए दिल्ली के उक्त पाँच सदस्यीय गुट के इशारे का इंतजार कर रहे हैं - दिल्ली में भी बाकी नेताओं के बीच चूँकि बिखराव की स्थिति है, इसलिए इस गुट के पास समर्थन जुटाने का अच्छा मौका है । लेकिन इन नेताओं को ही यह भी लग रहा है कि इस अच्छे मौके को हथियाने/पाने के लिए जो कसरत करना पड़ेगी, वह आनंद दुआ के भरोसे/सहारे नहीं सकती है । ऐसे में, लगता है कि दिल्ली का पाँच सदस्यीय गुट अपने ही बिछाए राजनीतिक जाल में खुद फँस गया है । इस स्थिति में योगेश भसीन को अपने लिए मौका नजर आया है; उन्हें लगा है कि अपने आप को मुसीबत से बचाने/निकालने के लिए दिल्ली का उक्त पाँच सदस्यीय गुट शायद उन्हें ही सहारा बना ले - इसलिए योगेश भसीन ने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी सक्रियता दिखा/बढ़ा कर अपनी तरफ से सहारा बनने का संकेत दे दिया है । योगेश भसीन की सक्रियता ने आनंद दुआ तथा उनके नजदीकियों को और चिंतित कर देने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के ताने-बाने को और दिलचस्प बना दिया है ।

Friday, October 20, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की चुनावी राजनीति में सीमेंट की एजेंसी दिलवाने की बात को मुद्दा बना कर सुरेश बिंदल क्या सचमुच संकरन जयरमन की उम्मीदवारी को केएल खट्टर का समर्थन दिलवा सकेंगे ?

नई दिल्ली । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के मामले में विपिन शर्मा को पीछे हटता देख सुरेश बिंदल ने संकरन जयरमन की उम्मीदवारी को हवा दी है, और दावा करना शुरू किया है कि केएल खट्टर अपना और हरियाणा के दूसरे पूर्व गवर्नर्स का समर्थन संकरन जयरमन को दिलवायेंगे । सुरेश बिंदल के दावे के अनुसार तो उनकी केएल खट्टर से इस बारे में बात भी हो गई है, और उनसे आश्वासन मिलने के बाद ही वह जयरमन की उम्मीदवारी को लेकर आगे बढ़े हैं । अपने दावे को विश्वसनीय बनाने/दिखाने के लिए सुरेश बिंदल ने तर्क भी जोरदार दिया है और वह यह कि केएल खट्टर को जेके सीमेंट की एजेंसी जयरमन के कारण ही मिली है, इसलिए केएल खट्टर उस अहसान का बदला चुकाने के लिए क्या इतना भी नहीं करेंगे ? सुरेश बिंदल का दावा भले ही है, लेकिन केएल खट्टर के लिए सीमेंट की एजेंसी मिलने के अहसान के ऐवज में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जयरमन की उम्मीदवारी का सचमुच समर्थन करना और दूसरे नेताओं से भी समर्थन दिलवाना आसान नहीं होगा ।
दरअसल केएल खट्टर के लिए प्राथमिकता सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा से 'अपना' उम्मीदवार तय करने - और उसे जितवाने की है । हरियाणा में लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, केएल खट्टर की पसंद तो सुरेश जिंदल हैं - लेकिन वहाँ 'दम' पुनीत बंसल में नजर आ रहा है । ऐसे में, केएल खट्टर के सामने दिल्ली के ऐसे उम्मीदवार का समर्थन करने की मजबूरी आएगी, जिसके समर्थक नेता सुरेश जिंदल को 'जितवा' सकते हों । सुरेश बिंदल पर तो केएल खट्टर को भरोसा नहीं है; उन्हें दूर दूर तक यह उम्मीद नहीं है कि सुरेश जिंदल दिल्ली में सुरेश जिंदल को इतना समर्थन दिलवा सकेंगे कि सुरेश जिंदल की चुनावी नैय्या पार हो जाए । केएल खट्टर को इस बारे में यदि जरा सी भी उम्मीद होती तो सुरेश बिंदल के साथ उनका 'समझौता' हो गया होता और सुरेश बिंदल को अकेले ही दावा नहीं करना पड़ता । जयरमन की उम्मीदवारी के संदर्भ में सुरेश जिंदल के दावे पर चूँकि केएल खट्टर ने ही चुप्पी साधी हुई है, इसलिए उनका दावा लोगों के बीच संदेहास्पद ही बना हुआ है ।
सुरेश बिंदल के लिए मुसीबत की बात यह बनी हुई है कि विपिन शर्मा ने अपनी उम्मीदवारी को अभी पूरी तरह से वापस नहीं लिया है, और वह पुनर्वापसी के मौके की तलाश में हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रामलीला के एक आयोजन में पूर्व गवर्नर्स के सम्मान का जो एक कार्यक्रम उन्होंने रखा था, उसके फ्लॉप होने पर विपिन शर्मा को यह बात तो अच्छे से समझ में आ गई थी कि सुरेश बिंदल के भरोसे तो वह गवर्नर नहीं बन सकेंगे - और इसीलिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के संकेत दे दिए थे । डिस्ट्रिक्ट के चुनावी महाभारत में पाँच पाँडवों वाली भूमिका निभा रहे डीके अग्रवाल, दीपक तलवार, अजय बुद्धराज, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा ने उक्त कार्यक्रम का बहिष्कार करके यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि सुरेश बिंदल के उम्मीदवार के रूप में विपिन शर्मा को वह कतई कोई तवज्जो नहीं देंगे । विपिन शर्मा ने भी उनके इस संकेत को 'सम्मान' देते हुए 'जता' दिया कि उनसे तवज्जो नहीं मिलने की सूरत में वह भी उम्मीदवार नहीं बनेंगे । विपिन शर्मा के नजदीकियों का कहना है कि उनके इस 'रिएक्शन' को पाँडवों वाली टीम ने सकारात्मक तरीके से लिया है, और उनकी तरफ से विपिन शर्मा को संदेश भिजवाया गया है कि उन्हें विपिन शर्मा से कोई समस्या नहीं है । इस बात से विपिन शर्मा को उम्मीद बनी है कि वह यदि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में पाँडवों वाली टीम का समर्थन जुटा लें, तो फिर सुरेश बिंदल को भी अपनी उम्मीदवारी के लिए राजी कर ही लेंगे ।
पाँडवों वाली टीम का समर्थन जुटाने के लिए आरके शाह और राजीव अग्रवाल भी प्रयास कर रहे हैं । पूर्व गवर्नर राजिंदर बंसल के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाने के कारण आरके शाह दिल्ली और हरियाणा के नेताओं के बीच फुटबॉल बने हुए हैं - दिल्ली के नेता उनसे कह रहे हैं कि पहले राजिंदर बंसल के जरिए हरियाणा के नेताओं का समर्थन घोषित करवाओ, उधर हरियाणा के नेता कह रहे हैं कि पहले दिल्ली में तो अपने लिए समर्थन घोषित करवाओ । नेताओं के इस रवैये से तंग आकर ही आरके शाह ने घोषित कर दिया है कि उन्हें चाहें किसी का भी समर्थन न मिले, वह तो उम्मीदवार बनेंगे ही । चुनावी नजरिये से सबसे अनुकूल स्थिति राजीव अग्रवाल की समझी जा रही है, हालाँकि इस अनुकूल स्थिति में भी उनके लिए आश्वस्त और सुरक्षित होने वाला मौका अभी नहीं बन सका है - और उनकी अनुकूल स्थिति पर तलवार लगातार लटकी हुई भी है । दरअसल तमाम अनुकूल स्थिति के बावजूद राजीव अग्रवाल अपना कोई 'वकील' तैयार नहीं कर सके हैं, जो नेताओं के बीच उनकी उम्मीदवारी की जोरशोर से वकालत करे । स्थितियाँ फिलहाल राजीव अग्रवाल के अनुकूल हैं, लेकिन बनते/बिगड़ते समीकरणों के बीच कौन जानता है कि स्थितियाँ कब पलटी मार जाएँ ? राजीव अग्रवाल के लिए तो मुसीबत व चुनौती की बात यह हुई है कि उनके 'क्षेत्र' से ही दो दो और उम्मीदवार मैदान में हैं, जो दिख भले ही कमजोर रहे हों - लेकिन चुनावी समीकरणों को बनाने/बिगाड़ने का काम तो कर ही सकते हैं ।

Wednesday, January 28, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में विक्रम शर्मा और आरके शाह की 'होशियारी' के चलते असहाय बने बैठे नेताओं को सुरेश जिंदल की कवायद से उम्मीद तो बनी है, लेकिन सुरेश जिंदल के केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता की 'पकड़' में होने के कारण यह उम्मीद उनके लिए अभी अधर में भी लटकी हुई है

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा और आरके शाह ने नेताओं को जैसा जो नाच नचाया हुआ है, उससे सुरेश जिंदल को अपना काम बनता हुआ दिख रहा है, और इसी उम्मीद में उन्होंने दिल्ली में कुछेक नेताओं से तार जोड़े हैं । तार जोड़ने की इस प्रक्रिया में उन्होंने नेताओं को अभी हालाँकि सिर्फ यही संकेत दिया है कि वह 'उपलब्ध' हैं । सुरेश जिंदल की इस प्रक्रिया को 'गर्म लोहे पर चोट मारने' वाली कहावत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के नेता - मजे की बात यह है कि दोनों पक्षों के नेता इस समय तक अपने आपको नितांत असहाय पा रहे हैं । यह उनकी असहायता का ही आलम है कि जनवरी का महीना खत्म हो रहा है और उनके पास कोई उम्मीदवार नहीं है तथा उनकी कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं है । कहा जा सकता है कि चुनावी राजनीति के परिदृश्य में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है और किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें ? हमेशा आपस में लड़ते रहने और एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे रहने वाले नेता अब एक दूसरे पर इस उम्मीद में निगाह जमाये हुए हैं कि कुछ करो भई ! यह हाल तब है जब कि इस वर्ष नेताओं को दो वर्षों के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तय करने हैं । 
नेताओं की बदकिस्मती यह है कि उन्होंने तो तय कर लिया है लेकिन आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि उन्होंने जिनके नाम तय किए हैं, वह नेताओं की शर्ते मानने को तैयार नहीं हो रहे हैं । लायन राजनीति में ऐसा कभी भी नहीं देखा गया है । यहाँ हमेशा उम्मीदवार नेताओं के पीछे भागते देखे जाते है, पर अभी यह हो रहा है कि नेता लोग उम्मीदवारों को ताकते बैठे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट के दिल्ली के नेताओं के बीच इस फार्मूले के लिए सहमति बन गई है कि वह विक्रम शर्मा और आरके शाह को बारी बारी से गवर्नर बनवा लेते हैं । डिस्ट्रिक्ट के हरियाणा के नेता हालाँकि दिल्ली के नेताओं के बीच बनी इस सहमति पर ऐतराज जता रहे हैं, लेकिन दिल्ली के नेता उनकी परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं । दिल्ली के नेता अपने इस फार्मूले को लेकर भारी उत्साह में हैं, लेकिन उनके इस उत्साह पर पानी डालने का काम किया है विक्रम शर्मा और आरके शाह ने । मामला दरअसल पैसों को लेकर अटक गया है । नेताओं का कहना है कि यह फार्मूला सफल तो हो जायेगा तथा यह दोनों ही गवर्नर बन जायेंगे, लेकिन इसके लिए इन्हें पैसे तो खर्च करने की पड़ेंगे । पैसों के मामले में विक्रम शर्मा और आरके शाह ने लेकिन चुप्पी साध ली है । उनकी चुप्पी ने नेताओं को असहाय बना दिया है । नेताओं ने अपने फार्मूले को चूँकि सार्वजनिक कर दिया है इसलिए दूसरे संभावित उम्मीदवार भी उनके पास नहीं आ रहे हैं ।
विक्रम शर्मा और आरके शाह वैसे तो कुछ नहीं कह रहे हैं, किंतु उनके नजदीकियों की तरफ से जो बातें सुनने को मिल रही हैं उनमें उनकी नाराजगी इस बात को लेकर दिख रही है कि नेताओं के फर्जी क्लब्स/वोटों के पैसे उनसे दो दो बार क्यों माँगे जा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि उम्मीदवार को जो पैसे खर्च करने होते हैं, उसमें एक बड़ा हिस्सा फर्जी क्लब्स/वोटों के ड्यूज चुकाने में होता है । विक्रम शर्मा और आरके शाह पिछले लायन वर्ष में इस मद में पैसे लगा चुके हैं; उनसे अब इस वर्ष दोबारा से पैसे माँगे जा रहे हैं । नजदीकियों के अनुसार, विक्रम शर्मा और आरके शाह को इस पर आपत्ति है और इसीलिए वह चुप लगा कर बैठ गए हैं । नजदीकियों के अनुसार, वह भी समझ तो रहे हैं कि यह पैसे तो उन्हें देने ही पड़ेंगे; फिर भी यदि वह चुप बैठ गए हैं तो इसलिए ताकि वह दूसरे खर्चों से बच सकें । दोनों ही जानते हैं कि नेताओं द्धारा तय किए गए फार्मूले पर वह यदि अभी से उत्साह दिखायेंगे तो नेता लोग उनसे फर्जी क्लब्स/वोटों के ड्यूज तो ले ही लेंगे, दूसरे और खर्चे भी करवाने लगेंगे । विक्रम शर्मा और आरके शाह समझ रहे हैं कि नेता लोगों के पास अपने उक्त फार्मूले को क्रियान्वित करवाने - यानि उन्हें ही गवर्नर बनवाने - के अलावा और कोई विकल्प नहीं है; इसलिए अभी चुप बैठ कर वह जितने जो पैसे बचा सकते हैं, बचा लें । विक्रम शर्मा और आरके शाह की इस चाल ने नेताओं को सचमुच में असहाय बना दिया है और नेता लोग घर बैठने को मजबूर हो गए हैं ।
नेताओं की इस मजबूरी में सुरेश जिंदल को अपना काम बनता हुआ दिख रहा है । उनके नजदीकियों का कहना है कि वह दिल्ली के नेताओं को यह ऑफर देना चाहते हैं कि इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा का जो नंबर है, वह नंबर यदि उन्हें दे दिया जाये तो वह सारा खर्चा उठाने के लिए तैयार हैं । उनके कुछेक नजदीकियों का यह भी सुझाव है कि वीके हंस के बाद वाले वर्ष में गवर्नर बनने के लिए जो भी इच्छुक हो, दिल्ली के नेता उसे तैयार कर लें और उससे भी पैसे खर्च करवाएँ - और मौज लें ! विक्रम शर्मा और आरके शाह यदि 'होशियारी' दिखा रहे हैं तो उन्हें किनारे करें । सुरेश जिंदल का संभावित ऑफर और उनके नजदीकियों का सुझाव तो अच्छा है, और दिल्ली के नेताओं के लिए उसे स्वीकार करना कोई मुश्किल भी नहीं होगा । समस्या लेकिन यह है कि सुरेश जिंदल दिल्ली के नेताओं के पास सचमुच में आते 'कैसे' हैं और 'किस जरिये से' आते हैं । सुरेश जिंदल अभी केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता के नजदीक 'देखे' जा रहे हैं । केएल खट्टर उनकी उम्मीदवारी को जिस तरह से आगे बढ़ा रहे हैं, उससे उनका काम बनने की बजाये बिगड़ता ज्यादा दिख रहा है । पिछली बार भी सुरेश जिंदल का मामला सिर्फ इसलिए ही बिगड़ गया था, क्योंकि उनकी उम्मीदवारी के लिए नेताओं के बीच ही ठीक तरह से समर्थन नहीं जुटाया जा सका था । पिछली बार के अपने उसी अनुभव से सबक लेकर सुरेश जिंदल इस बार सिर्फ केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता के भरोसे ही नहीं रहना चाहते हैं, और इसीलिए उन्होंने अपनी तरफ से भी दिल्ली के नेताओं से तार जोड़ने की कवायद शुरू की है ।
सुरेश जिंदल की इस कवायद से दिल्ली के नेताओं को विक्रम शर्मा व आरके शाह की 'होशियारी' से निपटने में मदद तो मिलेगी - लेकिन सुरेश जिंदल भी चूँकि कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रहे हैं, इसलिए दिल्ली के नेताओं को अभी असहाय ही बने रहना पड़ेगा । इसके अलावा, विक्रम शर्मा और आरके शाह से जब तक पूरी तरह जबाव न मिल जाए तब तक दिल्ली के नेताओं के लिए सुरेश जिंदल को हरी झंडी देना भी मुश्किल ही होगा । जाहिर है कि सारा मामला इस तरह पेचीदा हो गया है कि नेताओं को भी समझ में नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें ? डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में नेताओं को इतना असहाय शायद ही कभी देखा गया होगा ।

Thursday, September 26, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में हुआ हिसार-कांड नरेश गुप्ता को अपनी अपनी जेब में करने को लेकर राकेश त्रेहन, अजय बुद्धराज, हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल के बीच छिड़ी होड़ का नतीजा है क्या

हिसार/नई दिल्ली । नरेश गुप्ता को हिसार में केएल खट्टर से जो फटकार सुनने को मिली, हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल ने उसके लिए राकेश त्रेहन व अजय बुद्धराज को जिम्मेदार ठहराया है । हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल का कहना है कि राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज ने उनसे सलाह किये बिना, अपनी राजनीति चलाने के इरादे से नरेश गुप्ता को अकेले ही हिसार में लोगों से मिलने  भेज दिया; और इस बात की जरा भी परवाह नहीं की, कि नरेश गुप्ता को वहाँ किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है । हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल का मानना और कहना है कि नरेश गुप्ता को हिसार में केएल खट्टर तथा अन्य लोगों से जो खरी-खोटी सुननी पड़ी है, उससे सिर्फ नरेश गुप्ता की ही किरकिरी नहीं हुई है, बल्कि ग्रुप की और ग्रुप के नेताओं की भी फजीहत हुई है । हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल की इन बातों को सुन कर राकेश त्रेहन व अजय बुद्धराज को झटका लगा है । उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि नरेश गुप्ता के साथ हिसार में जो कुछ हुआ उसके लिए केएल खट्टर की आलोचना करने की बजाये ये दोनों उन्हें निशाना क्यों बना रहे हैं ? राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज ही नहीं, दूसरे अन्य कई लोगों को भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि नरेश गुप्ता को खरी-खोटी सुनाई तो केएल खट्टर ने है - लेकिन हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल इसके लिए राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज की लानत-मलानत करने में लगे हैं । आखिर माजरा है क्या ?
माजरा जो लोग समझ रहे हैं उनका कहना है कि यह सब खेल दरअसल नरेश गुप्ता को अपनी-अपनी गिरफ्त में लेने/रखने का है । बेचारे नरेश गुप्ता की मुसीबत यह है कि उन्हें इन चारों के बीच छिड़ी होड़ का शिकार होना पड़ रहा है । इन चारों के बीच होड़ इस बात को लेकर छिड़ी हुई है कि नरेश गुप्ता को कौन 'अपनी जेब में रख पाता है' । राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज के बीच केमिस्ट्री चूँकि अच्छी है, इसलिए उक्त होड़ में इनका पलड़ा भारी दिखता है - हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल एक तो अकेले अकेले हैं और दूसरे लोगों के बीच इनकी अलग अलग तरह की बदनामी है, जिस कारण नरेश गुप्ता को अपनी जेब में रखने की होड़ में ये राकेश त्रेहन-अजय बुद्धराज की जोड़ी के मुकाबले अपने आप को कमजोर पाते हैं । नरेश गुप्ता को हिसार जाने और वहाँ मीटिंग करने का सुझाव राकेश त्रेहन-अजय बुद्धराज की जोड़ी से मिला था और उनके इस कार्यक्रम के बारे में हर्ष बंसल व सुरेश बिंदल को अँधेरे में रखा गया था - इसलिए हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल इस कार्यक्रम से भड़के हुए थे । उनकी किस्मत से हिसार में नरेश गुप्ता की फजीहत हो गई - तो उन्हें यह बताने/जताने का सुनहरा मौका मिल गया कि नरेश गुप्ता यदि राकेश त्रेहन व अजय बुद्धराज के कहने पर चलेंगे तो इसी तरह अपमानित होते रहेंगे । हिसार में नरेश गुप्ता के साथ जो हुआ, उसके लिए राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज को जिम्मेदार ठहरा कर हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल ने दरअसल नरेश गुप्ता को उनकी पकड़ से छीन कर अपनी पकड़ में करने का दाँव चला है ।
नरेश गुप्ता को हिसार 'भेजने' के जरिये राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज ने जो राजनीतिक दाँव चला था - वह अपने आप में था बहुत बढ़िया, लेकिन अपने दाँव को अंजाम तक पहुँचाने की 'तैयारी' करने के मामले में चूँकि वह लापरवाही कर बैठे इसलिए उन्हें अपना दाँव उल्टा पड़ गया । नरेश गुप्ता को हिसार 'भेजने' के जरिये राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज ने दरअसल दो काम एक साथ साधने की योजना बनाई थी - एक तरफ तो वह नरेश गुप्ता को यह अहसास करा देना चाहते थे कि उन्हें उनके गवर्नर-काल की बहुत फिक्र है, और दूसरी तरफ उन्होंने नरेश गुप्ता के जरिये हरियाणा में दूसरे खेमे के ऐसे लोगों को अपने साथ करने की तरकीब लगाई थी जो कल तक उनके ही साथ थे । राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज समझ रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के गणित को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें हरियाणा में के दूसरी-तीसरी पंक्ति के अपने रूठे साथियों को मनाना पड़ेगा । दूसरी-तीसरी पंक्ति के लोगों को मनाने के लिए आने वाला गवर्नर बहुत काम आता है - यही सोच कर उन्होंने नरेश गुप्ता को हरियाणा में इस्तेमाल करने की योजना बनाई । नरेश गुप्ता इस्तेमाल होने के लिए तैयार हो जायें - इसके लिए राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज ने उन्हें पटटी यह पढ़ाई कि उन्हें हरियाणा में लोगों के साथ अपना मेलजोल बढ़ाना चाहिये, जिससे कि अगले लायन वर्ष में का उनका गवर्नर-काल अच्छा चले । नरेश गुप्ता को यह बात समझ में आई । किसी को भी आ जाती । बात अपने आप में है ही अच्छी ।
लेकिन अच्छी बातों के साथ अक्सर एक समस्या होती है - और वह यह कि अच्छी बातें प्रायः बुरे इरादों के साथ की जाती हैं, और इसीलिये वह न असर छोड़ती हैं और न सफल होती हैं । यहाँ भी यही हुआ । नरेश गुप्ता को हिसार 'भेजने' का जो 'कारण' बताया गया वह तो एक आवरण था, उसमें एक धोखा छिपा था - उसके पीछे असल उद्देश्य कुछ और था । इस फर्क के चलते नरेश गुप्ता के हिसार कार्यक्रम को लेकर कोई 'तैयारी' ही नहीं की जा सकी । की भी नहीं जा सकती थी । नरेश गुप्ता को हिसार 'भेजने' के पीछे राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज का जो असल उद्देश्य था, उसे वह हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल से भला कैसे बता सकते थे; नरेश गुप्ता से भी वह कैसे यह कह सकते थे कि आपसे जो करने को कहा जा रहा है उसमें आपका फायदा तो है ही, साथ में हमारा फायदा भी है । ऐसे में जो होना था, वही हुआ । नरेश गुप्ता चूँकि अपने को हिसार भेजे जाने का असल उद्देश्य नहीं समझ/पहचान पाये, इसलिए उन्होंने अपनी सरलता/सहजता में भाई-चारे की बातें कीं - जिन्हें सुन कर केएल खट्टर और वहाँ मौजूद दूसरे लोग उखड़ गए । नरेश गुप्ता को सीधे-सीधे बताया गया कि आप यहाँ बात तो भाई-चारे की कर रहे हो, लेकिन हर मामले में खड़े दिखते हो एक ग्रुप के नेताओं के साथ ! जिस तरह के उदाहरणों और सुबूतों के साथ नरेश गुप्ता के दोहरे रवैये को उनके सामने ही खोला गया - उन्हें सुन कर नरेश गुप्ता के पास चुप रहने के आलावा और कोई चारा ही नहीं बचा था । अपनी इस फजीहत के लिए नरेश गुप्ता ने किसे जिम्मेदार ठहराया है, यह तो अभी लोगों के सामने स्पष्ट नहीं हुआ है; लेकिन अपने आप को उनका शुभचिंतक बताने वाले हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल ने उनकी इस फजीहत के लिए साफ तौर पर राकेश त्रेहन और अजय बुद्धराज को जिम्मेदार बताया है । हिसार में हुई नरेश गुप्ता की फजीहत ने हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल को वास्तव में राकेश त्रेहन तथा अजय बुद्धराज के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने का अच्छा मौका दे दिया है । इस बहाने से, नरेश गुप्ता को अपनी अपनी जेब में करने को लेकर राकेश त्रेहन, अजय बुद्धराज, हर्ष बंसल और सुरेश बिंदल के बीच छिड़ी होड़ का जो नजारा लोगों के सामने आया है - उसने डिस्ट्रिक्ट में एक मनोरंजक दृश्य बनाया है ।

Wednesday, April 18, 2012

राकेश त्रेहन जिन केएल खट्टर के कारण तरह-तरह से अपमानित होते रहे हैं, मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए अब उन्हीं केएल खट्टर का समर्थन करेंगे क्या

नई दिल्ली | केएल खट्टर मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनने के लिए अब उन्ही राकेश त्रेहन की खुशामद में जुट गए हैं, जिन राकेश त्रेहन के खिलाफ अभी हाल तक उन्होंने जबरदस्त निंदा अभियान चलाया था और जिनके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक नेगेटिव वोटिंग करवाई थी | केएल खट्टर ने अपने नजदीकियों को तथा दूसरे अन्य लोगों को विश्वास दिलाया है कि उन्होंने राकेश त्रेहन के साथ भले ही कितना ही घटियापन किया हो, लेकिन फिर भी वह राकेश त्रेहन से अपनी उम्मीदवारी की चिठ्ठी पर हस्ताक्षर करवा लेंगे | यहाँ मजे की बात यह है कि राकेश त्रेहन के नजदीकियों को तो केएल खट्टर के इस दावे के पूरा होने का कुछ-कुछ भरोसा है, लेकिन केएल खट्टर के नजदीकियों को ऐसा भरोसा नहीं है | दरअसल राकेश त्रेहन के नजदीकियों ने उन्हें बार-बार समझाया था कि केएल खट्टर और उनके ग्रुप के लोग किसी भी तरह से विश्वास करने योग्य नहीं हैं; लेकिन राकेश त्रेहन कभी छुप कर तो कभी चालाकी से केएल खट्टर और उनके ग्रुप के नेताओं से संबंध जोड़े रहे थे | पता नहीं क्यों, राकेश त्रेहन को यह विश्वास रहा कि केएल खट्टर और उनके ग्रुप के नेता दूसरों के साथ भले ही घटियापन करते/दिखाते रहे हों, लेकिन उनके साथ घटियापन नहीं करेंगे | नेगेटिव वोटिंग को लेकर भी राकेश त्रेहन को पक्का विश्वास था कि विजय शिरोहा के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग भले ही हो, लेकिन उनके खिलाफ नेगेटिव वोटिंग नहीं होगी | इसके लिए उन्होंने अपने लोगों को अँधेरे में रख कर चंद्रशेखर मेहता से तार भी जोड़ लिए थे - किंतु उसका कोई फायदा नहीं हुआ और जितने नेगेटिव वोट विजय शिरोहा को पड़े, उतने ही नेगेटिव वोट राकेश त्रेहन को भी मिले | सभी का - पक्ष और विपक्ष के सभी लोगों का मानना है कि केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता ने मिल कर राकेश त्रेहन को उल्लू बनाया | राकेश त्रेहन के नजदीकियों को लगता है कि इससे राकेश त्रेहन को शायद सबक मिला हो कि केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता किसी भी तरह से विश्वास करने योग्य नहीं हैं | राकेश त्रेहन के कुछेक नजदीकियों को हालाँकि अभी भी शक है कि पता नहीं राकेश त्रेहन ने अब भी सबक सीखा है या नहीं ? केएल खट्टर ने अपनी उम्मीदवारी के आवेदन पर राकेश त्रेहन के हस्ताक्षर करवा लेने का जो विश्वास जताया है, उससे राकेश त्रेहन पर शक करने वाले नजदीकियों का शक और बढ़ गया है | सभी के लिए यह उत्सुकता का विषय है कि केएल खट्टर और उनके संगी-साथियों से बार-बार अपमानित होते रहने के बावजूद उनके साथ तार जोड़े रखने वाले राकेश त्रेहन अब भी उनके काम आयेंगे क्या ?
केएल खट्टर भी मजेदार व्यक्ति हैं | सिर्फ इसलिए ही नहीं कि जिन राकेश त्रेहन को वह बार-बार और तरह-तरह से अपमानित करते/करवाते रहे हैं, उन्हीं राकेश त्रेहन से वह समर्थन की उम्मीद भी कर रहे हैं; बल्कि इसलिए भी कि कई बार विभिन्न मौकों पर यह कह चुकने - कि लायनिज्म में आकर उन्होंने बड़ी गलती की और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनना तो उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल रही - के बावजूद अब वह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन की चुनावी दौड़ में शामिल हो गए हैं | हालाँकि उनके नजदीकियों का कहना है कि वह भी जानते हैं कि उनके चेयरपरसन बनने की तो कोई संभावना नहीं है, वह तो बस काउंसिल में किसी भी पद की जुगाड़ में हैं | लेकिन इसके लिए भी शामिल तो उन्हें चेयरपरसन पद की दौड़ में होना पड़ेगा | केएल खट्टर मान कर चल रहे हैं कि वह चेयरपरसन पद के लिए अपना दावा पेश करेंगे तब कहीं यह संभावना बनेगी कि वह काउंसिल में कोई पद पा लें | इस कोशिश में उनके लिए मुसीबत की बात यह रही कि जिन लोगों का उन्हें सहयोग और समर्थन चाहिए उन लोगों तक उनकी बदनामी उनसे पहले पहुँची हुई थी | चेयरपरसन - या कुछ भी - बनने के लिए उन्होंने जिस किसी के यहाँ भी गुहार लगाई उसी ने उन्हें उलाहना दिया कि अपने डिस्ट्रिक्ट में तो कोई तुम्हारे साथ है नहीं - वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर फर्स्ट और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड तुम्हारे खिलाफ हैं; ऐसे में कैसे कुछ बनोगे ? मल्टीपल में लोगों को पता हो गया है कि केएल खट्टर ने अपने व्यवहार से अधिकतर लोगों को, खास करके काम के लोगों को अपने खिलाफ किया हुआ है | वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर फर्स्ट राकेश त्रेहन और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड विजय शिरोहा को तो छोड़िये, अभी हाल ही में जो सुभाष गुप्ता वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड पद के लिए चुने गए हैं और जिन्हें चुनवाने का श्रेय केएल खट्टर लेने का प्रयास करते रहे हैं, वह सुभास गुप्ता भी केएल खट्टर के कट्टर खिलाफ हो गए हैं | इसी का नतीजा है कि अपने चुने जाने की खुशी में सुभाष गुप्ता ने जो पार्टी दी न तो उसमें उन्होंने केएल खट्टर को बुलाया और न अपने एक पारिवारिक समारोह में उन्हें निमंत्रित करने की जरूरत समझी | सुभाष गुप्ता का कहना है कि केएल खट्टर ने उम्मीदवार के रूप में उन्हें तरह-तरह से जमकर चूसा और हर तरह से तंग किया |
केएल खट्टर की (कु)ख्याति चूँकि मल्टीपल के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में जा पहुँची है, इसलिए उन्हें कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; लेकिन फिर भी उन्हें उम्मीद है कि उन्हें मल्टीपल काउंसिल में कोई न कोई पद मिल ही जायेगा | केएल खट्टर ने अपने नजदीकियों से कहा है कि मल्टीपल काउंसिल में पदों की बंदरबांट करने वाले नेताओं को उन्होंने पटा लिया है और उन्हें कुछ न कुछ अवश्य ही मिल जायेगा | अपने नजदीकियों से तो उन्होंने यहाँ तक दावा किया है कि राकेश त्रेहन यदि उनके आवेदन पर समर्थन-हस्ताक्षर नहीं भी करते हैं तो भी वह मल्टीपल काउंसिल में किसी न किसी पद पर होंगे ही | किंतु फिर भी वह राकेश त्रेहन को समर्थन-हस्ताक्षर के लिए पटाने में लग गए हैं, क्योंकि वह भी जान रहे हैं कि बिना राकेश त्रेहन के समर्थन-हस्ताक्षर के उनका दावा कमजोर पड़ेगा |
राकेश त्रेहन की खुशामद में केएल खट्टर को जुटा देख कर लोगों की उत्सुकता यह जानने को लेकर बढ़ गई है कि केएल खट्टर के हाथों तरह-तरह से अपमानित होते रहने वाले राकेश त्रेहन उनके लिए अपना समर्थन हस्ताक्षरित करेंगे या नहीं ?