Showing posts with label SURESH BINDAL. Show all posts
Showing posts with label SURESH BINDAL. Show all posts

Tuesday, December 12, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में आनंद दुआ के नाम पर बिछाई जा रही दिल्ली के पाँच सदस्यीय गुट की राजनीतिक बिसात को सुरेश बिंदल और केएल खट्टर की मिलीजुली चाल ने सचमुच पलट दिया है क्या ?

नई दिल्ली । आनंद दुआ की परेशानी और बेचैनी यह देख/जान कर बढ़ती जा रही है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू कर देने के बाद भी उनके समर्थक नेता उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी नहीं दे रहे हैं, जिसके चलते उनकी उम्मीदवारी का मामला उलझता ही जा रहा है । आनंद दुआ ने अपने नजदीकियों से यह कहते/बताते हुए अपना संपर्क अभियान शुरू किया था कि दिल्ली के पाँच पूर्व गवर्नर्स - डीके अग्रवाल, दीपक तलवार, अजय बुद्धराज, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा - के गुट ने उनकी उम्मीदवारी को समर्थन घोषित करने का भरोसा उन्हें दिया है । दरअसल इस भरोसे के बाद ही आनंद दुआ ने अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू किया था । आनंद दुआ के नजदीकियों का कहना/बताना है कि उक्त पाँच पूर्व गवर्नर्स ने आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने का फैसला कर लिया है, और अपने इस फैसले की घोषणा सार्वजनिक करने के लिए वह बस 'उचित समय' का इंतजार कर रहे हैं । 'उचित समय' का इंतजार लेकिन जिस तरह से बढ़ता जा रहा है, उसे 'देख' कर आनंद दुआ की बेचैनी और परेशानी बढ़ने लगी है । उनके नजदीकियों ने भी उनसे पूछना शुरू कर दिया है कि जिन पूर्व गवर्नर्स ने उन्हें समर्थन देने का भरोसा दिया था, वह कहीं उनका पोपट तो नहीं बना रहे हैं । इस गुट का समर्थन पाने के लिए योगेश भसीन द्वारा शुरू की गई कोशिशों को तथा योगेश भसीन की कोशिशों के शुरू होने के बाद गुट के नेताओं के बदले हुए तथा टालमटोल वाले रवैये को देखते हुए आनंद दुआ का माथा ठनका है और वह असमंजस में पड़ गए हैं ।
आनंद दुआ के नजदीकियों के अनुसार, आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने का वायदा करने वाले पूर्व गवर्नर्स अपना वायदा पूरा करने के लिए तैयार तो हैं, लेकिन वह इस बात से डरे हुए भी हैं कि चुनाव की नौबत आने पर आनंद दुआ कहीं मैदान तो नहीं छोड़ जायेंगे - और इस तरह कहीं उनकी फजीहत तो नहीं करा बैठेंगे ? इसी डर के कारण दिल्ली के उक्त पाँच पूर्व गवर्नर्स का गुट वायदा करने के बावजूद आनंद दुआ की उम्मीदवारी को अपने समर्थन की घोषणा करने से अभी बच रहा है । दरअसल सुरेश बिंदल की राजनीतिक चाल और हरियाणा में मची उथल-पुथल ने उन्हें बचाव की मुद्रा में ला दिया है । उल्लेखनीय है कि अभी करीब दस दिन पहले तक दिल्ली में उम्मीदवारों का जो राजनीतिक समीकरण था, वह दिल्ली के उक्त पाँच पूर्व गवर्नर्स के गुट के अनुकूल था । आनंद दुआ और आरके अग्रवाल के रूप में जिन दो उम्मीदवारों को सशक्त उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, वह इस गुट के भरोसे ही आगे कदम बढ़ाने का संकेत दे चुके थे । इस गुट के नेताओं को जिन सुरेश बिंदल से चुनौती मिलने का डर था, उन सुरेश बिंदल ने आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति अपनी नापसंदगी जाहिर कर दी थी - जिसके बाद उक्त गुट ने आनंद दुआ की उम्मीदवारी को हरी झंडी देने का फैसला कर लिया था । इस फैसले के तहत ही आनंद दुआ को सक्रिय होने की सलाह दी गई, और आनंद दुआ ने भी अपने आप को उम्मीदवार मानते हुए संपर्क अभियान शुरू कर दिया । आनंद दुआ और उन्हें उम्मीदवार बनाने का फैसला करने वाले पाँच पूर्व गवर्नर्स के गुट को विश्वास था कि दिल्ली में कोई भी पूर्व गवर्नर आनंद दुआ की उम्मीदवारी का विरोध नहीं करेगा, और उस स्थिति में कोई दूसरा उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेगा - इसलिए फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आनंद दुआ को रास्ता पूरी तरह साफ मिलेगा ।
लेकिन सुरेश बिंदल की राजनीतिक चाल ने आनंद दुआ और उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठाने को तैयार बैठे पाँच पूर्व गवर्नर्स के गुट की तैयारी को झटका दे दिया । आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति नापसंदगी जाहिर करने के बावजूद, आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी को समर्थन देने के क्लब के फैसले का वास्ता देकर सुरेश बिंदल ने आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठाने का संकेत देकर उक्त गुट को आनंद दुआ की उम्मीदवारी की घोषणा करने से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया । दरअसल उक्त गुट के नेताओं को यह भरोसा नहीं है कि चुनाव की स्थिति आने पर भी आनंद दुआ उम्मीदवार बने रहेंगे, और चुनाव लड़ने को तैयार होंगे ? आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर सुरेश बिंदल ने यदि पलटी मारी है, तो इसे एक बड़ी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुरेश बिंदल के चूँकि हरियाणा की राजनीति की कमान सँभाले बैठे केएल खट्टर के साथ नजदीकी संबंध हैं, इसलिए आशंका व्यक्त की जा रही है कि आरके अग्रवाल को लेकर सुरेश बिंदल ने जो चाल चली है - कहीं सुरेश बिंदल और केएल खट्टर की मिलीजुली चाल तो नहीं है ? हरियाणा में हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी को लेकर जो बवाल मचा हुआ है, केएल खट्टर को उसके पीछे दिल्ली के उक्त पाँच सदस्यीय गुट का हाथ दिखता है - इसलिए भी दिल्ली की राजनीति में केएल खट्टर के नाक घुसाने को बदला लेने की करवाई के रूप में देखा/समझा जा रहा है । इससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति एक बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ती दिख रही है । दिल्ली के उक्त पाँच सदस्यीय गुट को राजनीतिक लड़ाई लड़ने में तो परहेज नहीं है, राजनीतिक लड़ाई में उसे अपना पलड़ा भारी ही नजर आ रहा है - लेकिन उस लड़ाई के लिए जो 'ईंधन' चाहिए होगा, आनंद दुआ की तरफ से उसकी 'सप्लाई' को लेकर वह आशंकित हैं । इसी आशंका के चलते उन्होंने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आनंद दुआ की उम्मीदवारी को समर्थन देने की घोषणा को रोक दिया है ।
आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने को तैयार बैठे दिल्ली के पाँच सदस्यीय गुट के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी को लेकर हरियाणा में जो उबाल आ रहा था, वह ठंडा पड़ता दिख रहा है; पाँच सदस्यीय गुट के नेताओं को उम्मीद थी कि उक्त उबाल के कारण केएल खट्टर उनके सामने समर्पण करेंगे और उनके साथ जुड़ेंगे, केएल खट्टर ने लेकिन सुरेश बिंदल के साथ जुड़ने को महत्ता दी है । इससे दिल्ली के पाँच सदस्यीय गुट को अपनी राजनीति फेल होती हुई नजर आ रही है । मजे की बात यह है कि जमीनी स्थिति अभी भी उनके अनुकूल है; हरियाणा में लोग हरियाणा की लीडरशिप के फैसले के खिलाफ बगावत करने को तैयार बैठे हैं, और इसके लिए दिल्ली के उक्त पाँच सदस्यीय गुट के इशारे का इंतजार कर रहे हैं - दिल्ली में भी बाकी नेताओं के बीच चूँकि बिखराव की स्थिति है, इसलिए इस गुट के पास समर्थन जुटाने का अच्छा मौका है । लेकिन इन नेताओं को ही यह भी लग रहा है कि इस अच्छे मौके को हथियाने/पाने के लिए जो कसरत करना पड़ेगी, वह आनंद दुआ के भरोसे/सहारे नहीं सकती है । ऐसे में, लगता है कि दिल्ली का पाँच सदस्यीय गुट अपने ही बिछाए राजनीतिक जाल में खुद फँस गया है । इस स्थिति में योगेश भसीन को अपने लिए मौका नजर आया है; उन्हें लगा है कि अपने आप को मुसीबत से बचाने/निकालने के लिए दिल्ली का उक्त पाँच सदस्यीय गुट शायद उन्हें ही सहारा बना ले - इसलिए योगेश भसीन ने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी सक्रियता दिखा/बढ़ा कर अपनी तरफ से सहारा बनने का संकेत दे दिया है । योगेश भसीन की सक्रियता ने आनंद दुआ तथा उनके नजदीकियों को और चिंतित कर देने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के ताने-बाने को और दिलचस्प बना दिया है ।

Monday, December 4, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच चल रही होड़ में हालात बदलने के बाद भी असमंजसता अभी बनी हुई है

नई दिल्ली । सुरेश बिंदल द्वारा आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेने तथा आनंद दुआ द्वारा अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू कर देने से डिस्ट्रिक्ट में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए गहमागहमी बढ़ भी गई है और थोड़ा उलझ भी गई है - इस उलझन में अपनी अलग अलख जलाए बैठे आरके शाह के लिए भी मौका बनता नजर आने लगा है । उल्लेखनीय है कि अभी तक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की सर्वसम्मत उम्मीदवारी को लेकर दिल्ली में ऊपरी तौर पर तो अनिश्चितता नजर आ रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच होड़ भी छिड़ी हुई थी । आरके अग्रवाल का समर्थन करने वाले तो कई थे, लेकिन सुरेश बिंदल के विरोध के चलते उनके नाम पर पूर्ण सहमति बनने में दिक्कत आती दिख रही थी; आनंद दुआ के नाम पर विरोध करने वाला तो कोई नहीं था, लेकिन उनकी सक्रियता के अभाव में उनका नाम आगे बढ़ाने वाला - यानि उनकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं था । आनंद दुआ को एक आदर्श उम्मीदवार के रूप में तो देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन उन्हें व्यावहारिक उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा पा रहा था । इसका एक बड़ा कारण यह था कि वह खुद अपनी उम्मीदवारी को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखा रहे थे । उनके नजदीकियों का कहना/बताना था कि आनंद दुआ उम्मीदवार तो बनना चाहते हैं, लेकिन वह किसी नेता से यह कहना नहीं चाहते हैं - क्योंकि वह जानते हैं कि वह यदि अपनी उम्मीदवारी के लिए पहल करेंगे और नेताओं से समर्थन मागेंगे, तो उम्मीदवार के रूप में उन्हें पैसे खर्च करने पड़ेंगे; वह लेकिन 'मुफ्त' में गवर्नर बनना चाहते हैं । इस चक्कर में कोई भी नेता आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ । आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच उलझे मामले को उलझा हुआ छोड़ कर नेताओं ने कोई और उम्मीदवार खोजने की कोशिश भी की, लेकिन जो मिला नहीं ।
इस बीच हालात ने पलटा खाया । आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे सुरेश बिंदल ने अंततः मन बदला और आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । इससे आरके अग्रवाल का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आया, तो आनंद दुआ ने भी 'किसी से न कहने' की जिद छोड़ी और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए निकल पड़े । हालात बदलने के बाद भी नतीजा लेकिन अभी भी उलझन भरा ही है और नेताओं के लिए किसी भी नतीजे पर पहुँचना मुश्किल बना हुआ है । एक पूर्व गवर्नर का कहना है कि किसी उम्मीदवार पर सर्वसम्मति बनाने के लिए कोई पहल नहीं करना चाहता है । नेताओं की स्थिति की सच्चाई दरअसल इसी बात में छिपी हुई है । इस बात से लग रहा है कि नेताओं ने अपने अपने उम्मीदवार तो चुन लिए हैं, लेकिन वह अपने अपने उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं  इसलिए वह अपने उम्मीदवार के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं । असल में, आरके अग्रवाल और आनंद दुआ में से किसी ने भी यह संकेत नहीं दिए हैं कि उनके नाम पर नेताओं के बीच यदि सर्वसम्मति नहीं बनी - तो भी वह किसी एक खेमे के भरोसे ही उम्मीदवार बनने को तैयार हैं । इसलिए उनके समर्थक नेता उनके नाम पर ज्यादा आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं, और मामला जहाँ का तहाँ ही अटका पड़ा है । सुरेश बिंदल की चंद्र शेखर मेहता के साथ अच्छी बनती है; समझा जाता है कि चंद्र शेखर मेहता ने हरियाणा में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया के नाम पर मोहर लगवाने से पहले सुरेश बिंदल सहित दिल्ली के दो-तीन अन्य नेताओं को विश्वास में ले लिया था - इससे एक संभावना यह बन रही है कि सुरेश बिंदल दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आरके अग्रवाल का नाम घोषित करवा लें । हालाँकि कइयों को इस बात पर शक भी है कि दिल्ली में सुरेश बिंदल की ऐसी स्थिति है कि वह अपनी बात मनवा लें, इसलिए शक यही है कि दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जो भी उम्मीदवार 'घोषित' होगा - वह वास्तव में एक खेमे का ही होगा, और दूसरे नेता तो उसे मजबूरी में ही समर्थन देंगे ।
इस स्थिति ने आरके शाह के लिए उम्मीदों के द्वार खोल दिए हैं । उल्लेखनीय है कि आरके शाह अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं जो अपनी उम्मीदवारी के लिए डटे हुए हैं और उसके लिए समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं । समर्थन जुटाने की आरके शाह की कोशिशें हालाँकि अभी तक सफल नहीं हो सकी हैं, लेकिन जमीनी हालात उनके लिए अनुकूल बनते दिख रहे हैं । दरअसल हरियाणा में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया का जिस मनमाने तरीके से चयन हुआ है, और जिसके चलते हरियाणा में लोग लीडरशिप के खिलाफ हो गए दिख रहे हैं - उसमें आरके शाह के लिए समर्थन बनने जैसे हालात छिपे नजर आ रहे हैं । हरियाणा में कई लोग लीडरशिप के नाम पर 'चार लोगों की मनमानी' के खिलाफ नाराजगी व्यक्त करते हुए सुने जा रहे हैं । दिल्ली में भी, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए यदि 'सचमुच' सर्वसम्मति नहीं बनी, तो विरोधी नेता आरके शाह की उम्मीदवारी को समर्थन दे सकते हैं । आरके शाह के रवैये से यह तो तय ही माना जा रहा है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिल्ली में दो उम्मीदवार तो होंगे ही, जिसके चलते हरियाणा की लीडरशिप पर दबाव होगा कि वह अपना ध्यान 'अपने' उम्मीदवार पर ही दे, और दिल्ली के झगड़े के पचड़े में न पड़े । यह स्थिति आरके शाह के अनुकूल बैठती है । स्थिति तो अनुकूल बैठी नजर आ रही है, लेकिन इस अनुकूल स्थिति को मैनेज करने तथा वोट में बदलने के लिए प्रेरित करने का काम आरके शाह कर पायेंगे या नहीं - यह सवाल जरूर लोगों को असमंजस में डाले हुए है । जाहिर है कि हालात साफ/स्पष्ट होने के लिए अभी थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ेगा ।

Friday, October 20, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की चुनावी राजनीति में सीमेंट की एजेंसी दिलवाने की बात को मुद्दा बना कर सुरेश बिंदल क्या सचमुच संकरन जयरमन की उम्मीदवारी को केएल खट्टर का समर्थन दिलवा सकेंगे ?

नई दिल्ली । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के मामले में विपिन शर्मा को पीछे हटता देख सुरेश बिंदल ने संकरन जयरमन की उम्मीदवारी को हवा दी है, और दावा करना शुरू किया है कि केएल खट्टर अपना और हरियाणा के दूसरे पूर्व गवर्नर्स का समर्थन संकरन जयरमन को दिलवायेंगे । सुरेश बिंदल के दावे के अनुसार तो उनकी केएल खट्टर से इस बारे में बात भी हो गई है, और उनसे आश्वासन मिलने के बाद ही वह जयरमन की उम्मीदवारी को लेकर आगे बढ़े हैं । अपने दावे को विश्वसनीय बनाने/दिखाने के लिए सुरेश बिंदल ने तर्क भी जोरदार दिया है और वह यह कि केएल खट्टर को जेके सीमेंट की एजेंसी जयरमन के कारण ही मिली है, इसलिए केएल खट्टर उस अहसान का बदला चुकाने के लिए क्या इतना भी नहीं करेंगे ? सुरेश बिंदल का दावा भले ही है, लेकिन केएल खट्टर के लिए सीमेंट की एजेंसी मिलने के अहसान के ऐवज में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जयरमन की उम्मीदवारी का सचमुच समर्थन करना और दूसरे नेताओं से भी समर्थन दिलवाना आसान नहीं होगा ।
दरअसल केएल खट्टर के लिए प्राथमिकता सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा से 'अपना' उम्मीदवार तय करने - और उसे जितवाने की है । हरियाणा में लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, केएल खट्टर की पसंद तो सुरेश जिंदल हैं - लेकिन वहाँ 'दम' पुनीत बंसल में नजर आ रहा है । ऐसे में, केएल खट्टर के सामने दिल्ली के ऐसे उम्मीदवार का समर्थन करने की मजबूरी आएगी, जिसके समर्थक नेता सुरेश जिंदल को 'जितवा' सकते हों । सुरेश बिंदल पर तो केएल खट्टर को भरोसा नहीं है; उन्हें दूर दूर तक यह उम्मीद नहीं है कि सुरेश जिंदल दिल्ली में सुरेश जिंदल को इतना समर्थन दिलवा सकेंगे कि सुरेश जिंदल की चुनावी नैय्या पार हो जाए । केएल खट्टर को इस बारे में यदि जरा सी भी उम्मीद होती तो सुरेश बिंदल के साथ उनका 'समझौता' हो गया होता और सुरेश बिंदल को अकेले ही दावा नहीं करना पड़ता । जयरमन की उम्मीदवारी के संदर्भ में सुरेश जिंदल के दावे पर चूँकि केएल खट्टर ने ही चुप्पी साधी हुई है, इसलिए उनका दावा लोगों के बीच संदेहास्पद ही बना हुआ है ।
सुरेश बिंदल के लिए मुसीबत की बात यह बनी हुई है कि विपिन शर्मा ने अपनी उम्मीदवारी को अभी पूरी तरह से वापस नहीं लिया है, और वह पुनर्वापसी के मौके की तलाश में हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रामलीला के एक आयोजन में पूर्व गवर्नर्स के सम्मान का जो एक कार्यक्रम उन्होंने रखा था, उसके फ्लॉप होने पर विपिन शर्मा को यह बात तो अच्छे से समझ में आ गई थी कि सुरेश बिंदल के भरोसे तो वह गवर्नर नहीं बन सकेंगे - और इसीलिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के संकेत दे दिए थे । डिस्ट्रिक्ट के चुनावी महाभारत में पाँच पाँडवों वाली भूमिका निभा रहे डीके अग्रवाल, दीपक तलवार, अजय बुद्धराज, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा ने उक्त कार्यक्रम का बहिष्कार करके यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि सुरेश बिंदल के उम्मीदवार के रूप में विपिन शर्मा को वह कतई कोई तवज्जो नहीं देंगे । विपिन शर्मा ने भी उनके इस संकेत को 'सम्मान' देते हुए 'जता' दिया कि उनसे तवज्जो नहीं मिलने की सूरत में वह भी उम्मीदवार नहीं बनेंगे । विपिन शर्मा के नजदीकियों का कहना है कि उनके इस 'रिएक्शन' को पाँडवों वाली टीम ने सकारात्मक तरीके से लिया है, और उनकी तरफ से विपिन शर्मा को संदेश भिजवाया गया है कि उन्हें विपिन शर्मा से कोई समस्या नहीं है । इस बात से विपिन शर्मा को उम्मीद बनी है कि वह यदि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में पाँडवों वाली टीम का समर्थन जुटा लें, तो फिर सुरेश बिंदल को भी अपनी उम्मीदवारी के लिए राजी कर ही लेंगे ।
पाँडवों वाली टीम का समर्थन जुटाने के लिए आरके शाह और राजीव अग्रवाल भी प्रयास कर रहे हैं । पूर्व गवर्नर राजिंदर बंसल के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाने के कारण आरके शाह दिल्ली और हरियाणा के नेताओं के बीच फुटबॉल बने हुए हैं - दिल्ली के नेता उनसे कह रहे हैं कि पहले राजिंदर बंसल के जरिए हरियाणा के नेताओं का समर्थन घोषित करवाओ, उधर हरियाणा के नेता कह रहे हैं कि पहले दिल्ली में तो अपने लिए समर्थन घोषित करवाओ । नेताओं के इस रवैये से तंग आकर ही आरके शाह ने घोषित कर दिया है कि उन्हें चाहें किसी का भी समर्थन न मिले, वह तो उम्मीदवार बनेंगे ही । चुनावी नजरिये से सबसे अनुकूल स्थिति राजीव अग्रवाल की समझी जा रही है, हालाँकि इस अनुकूल स्थिति में भी उनके लिए आश्वस्त और सुरक्षित होने वाला मौका अभी नहीं बन सका है - और उनकी अनुकूल स्थिति पर तलवार लगातार लटकी हुई भी है । दरअसल तमाम अनुकूल स्थिति के बावजूद राजीव अग्रवाल अपना कोई 'वकील' तैयार नहीं कर सके हैं, जो नेताओं के बीच उनकी उम्मीदवारी की जोरशोर से वकालत करे । स्थितियाँ फिलहाल राजीव अग्रवाल के अनुकूल हैं, लेकिन बनते/बिगड़ते समीकरणों के बीच कौन जानता है कि स्थितियाँ कब पलटी मार जाएँ ? राजीव अग्रवाल के लिए तो मुसीबत व चुनौती की बात यह हुई है कि उनके 'क्षेत्र' से ही दो दो और उम्मीदवार मैदान में हैं, जो दिख भले ही कमजोर रहे हों - लेकिन चुनावी समीकरणों को बनाने/बिगाड़ने का काम तो कर ही सकते हैं ।

Saturday, December 27, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में दिल्ली और हरियाणा से बारी-बारी से गवर्नर बनने की व्यवस्था को तोड़ने की विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की कोशिश के खिलाफ हरियाणा के लोगों में नाराजगी और विरोध

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा की 'फार्मूलेबाज' उम्मीदवारी के खिलाफ उम्मीदवार लाने की हरियाणा के लायन सदस्यों की तैयारी ने दिल्ली के लायन नेताओं द्धारा पकाई जा रही खिचड़ी में धूल पड़ने का खतरा पैदा कर दिया है । विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं - हर्ष बंसल, राकेश त्रेहन, अजय बुद्धिराज, सुरेश बिंदल आदि ने विक्रम शर्मा को गवर्नर बनवाने के लिए जो फार्मूला तैयार किया है उसमें हरियाणा के साथ की जाने वाली धोखाधड़ी को लेकर हरियाणा के लायन सदस्यों के बीच खासी नाराजगी और विरोध है । इसी नाराजगी और विरोध के चलते हरियाणा के लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि वह देखते हैं कि विक्रम शर्मा कैसे गवर्नर बनते हैं ?
उल्लेखनीय है कि विक्रम शर्मा को गवर्नर बनवाने के लिए उनके समर्थक नेताओं ने अभी तक जो भी चाल चली है, वह उल्टी ही पड़ी है और पास आती दिख रही गवर्नर की कुर्सी विक्रम शर्मा से और दूर होती गई है । अपने तमाम फार्मूलों के पिटते जाने के बाद विक्रम शर्मा के समर्थक नेता पिछले दिनों एक नया फार्मूला लेकर आये हैं : अपने इस नए फार्मूले में उन्होंने आरके शाह के समर्थक नेताओं की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और प्रस्ताव रखा है कि हम लोग आपस में लड़ने की बजाये दोस्ती कर लेते हैं तथा विक्रम शर्मा व आरके शाह को बारी बारी से आगे-पीछे गवर्नर बना लेते हैं । आरके शाह के समर्थक नेताओं ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह अभी रिजेक्ट तो नहीं किया है, लेकिन स्वीकार करने के लिए हामी भी नहीं भरी है । उनका कहना है कि जिन भी नेताओं ने यह फार्मूला तैयार किया है वह नेता ही इस फार्मूले पर पहले हरियाणा के लोगों की सहमति बनाये तब इसे स्वीकार करने के बारे में सोचा जा सकता है ।
दरअसल विक्रम शर्मा के समर्थक नेताओं ने जो फार्मूला तैयार किया है, वह हरियाणा के साथ धोखा करता है । डिस्ट्रिक्ट में चूँकि दिल्ली और हरियाणा से बारी-बारी से गवर्नर बनने की व्यवस्था बनी हुई है, इसलिए विक्रम शर्मा के समर्थक नेताओं के द्धारा तैयार किया गया फार्मूला हरियाणा के लोगों का हक मारता है तथा हरियाणा के लोगों के साथ धोखा करता है । इस फार्मूले को तैयार करने वाले हर्ष बंसल, राकेश त्रेहन, अजय बुद्धिराज, सुरेश बिंदल आदि का मानना और कहना है कि सत्ता के साथ रहने की कोशिश में चंद्रशेखर मेहता तो झक मार कर इस फार्मूले का समर्थन करने को मजबूर होंगे और फिर बाकी बचे लोगों की परवाह करने की जरूरत नहीं है । इन नेताओं के इस रवैये से हरियाणा के लोगों में नाराजगी पैदा हुई है । नाराजगी के चलते ही हरियाणा के लोगों ने विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी की राह में रोड़े डालने की तरकीबों पर विचार करना शुरू कर दिया है और कहना शुरू कर दिया है कि वह देखते हैं कि विक्रम शर्मा कैसे गवर्नर बनते हैं ?
हरियाणा के लायन नेताओं के बीच जो चर्चा है, उसके अनुसार वह विक्रम शर्मा के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा करने की तैयारी कर रहे हैं । इस तैयारी से जुड़े एक बड़े लायन नेता का कहना है कि विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी जिस भी पद/वर्ष के लिए प्रस्तुत होगी, हरियाणा से उनके खिलाफ उम्मीदवार आयेगा । विक्रम शर्मा के खिलाफ उम्मीदवार लाने की तैयारी करने वाले लोगों का मानना और कहना है कि हरियाणा के साथ जो धोखाधड़ी करने की तैयारी की जा रही है, उससे हरियाणा के लोग तो आहत होंगे ही और दिल्ली में भी कई लोग इसे पसंद नहीं करेंगे और ऐसे में विक्रम शर्मा के खिलाफ उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना जरा भी मुश्किल नहीं होगा । हरियाणा के लायन सदस्यों के बीच विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के खिलाफ बढ़ती नाराजगी ने विक्रम शर्मा के समर्थक नेताओं के फार्मूले को ही संदेह के घेरे में ला दिया है ।

Friday, January 11, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की लड़ाई में नरेश गुप्ता के जरिये सत्ता खेमे के नेताओं ने सुरेश बिंदल को क्या 'पप्पू' बना दिया है

नई दिल्ली । नरेश गुप्ता को आगे करके डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के नेताओं ने एक तरफ विपक्षी नेताओं को तो दूसरी तरफ अलग होने की कोशिश करते दिख रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन को दबाव में ले लिया है । मजे की बात यह है कि दो दिन पहले दिल्ली के पूर्व गवर्नरों की मीटिंग में नरेश गुप्ता का नाम जिन सुरेश बिंदल ने आगे किया था, वही सुरेश बिंदल अपने लोगों के बीच नरेश गुप्ता को लेकर अपनी नापसंदगी व्यक्त कर रहे हैं । सुरेश बिंदल के कुछेक नजदीकी बता रहे हैं कि नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी सुरेश बिंदल के गले में ऐसी फँसी है जिसे सुरेश बिंदल के लिए न उगलते बन रहा है और न निगलते बन रहा है । उल्लेखनीय है कि सुरेश बिंदल ने पहले अपने क्लब के एस जयरमन का नाम आगे बढ़ाया था लेकिन किसी का समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्हें मुहँकी खानी पड़ी । नेता बनने की कोशिश में सुरेश बिंदल ने तब लायंस क्लब दिल्ली प्रभात के प्रमोद अग्रवाल और देवेंद्र जैन को राजी करने का प्रयास किया । इन दोनों ने लेकिन इस झमेले में पड़ने से इंकार कर दिया । सुरेश बिंदल भी तब यह सोच कर चुप बैठ गए कि अभी उनकी किस्मत में 'डिस्ट्रिक्ट का नेता' बनना है नहीं । नरेश गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, यही वजह रही कि जब नरेश गुप्ता ने सुरेश बिंदल से उनका नाम आगे बढ़ाने के लिए कहा, तो सुरेश बिंदल ने साफ इंकार कर दिया । सुरेश बिंदल ने नरेश गुप्ता की सिफारिश करने वाले प्रभात क्लब के सदस्यों से कहा भी कि इसे कौन उम्मीदवार स्वीकार करेगा ? नरेश गुप्ता और उनके समर्थकों ने सुरेश बिंदल को किसी तरह बड़ी मुश्किल से इस बात के लिए राजी किया कि वह नरेश गुप्ता का नाम आगे तो बढ़ायें ।
सुरेश बिंदल ने पूर्व गवर्नर्स की मीटिंग में बहुत ही बेमन से नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी की बात रखी । लेकिन वह यह देख कर हैरान रह गए कि मीटिंग में मौजूद सभी पूर्व गवर्नर्स ने नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति सकारात्मक रवैया ही दिखाया । सुरेश बिंदल के लिए चौंकने की बात यह रही कि सत्ता खेमे के मुखिया डीके अग्रवाल ने तो आगे बढ़ कर यह सुझाव भी दिए कि नरेश गुप्ता को किस तरह अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए काम करना चाहिए । सुरेश बिंदल जब तक माजरा समझते, तब तक नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी की बात पूर्व गवर्नर्स के बीच स्थापित हो चुकी थी । दरअसल उस मीटिंग में और किसी उम्मीदवार का नाम ही नहीं लिया गया । एक अकेले नरेश गुप्ता का नाम आया और किसी ने भी उनके नाम पर नकारात्मक रवैया नहीं दिखाया । नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी को लेकर नकारात्मक बातें होना तो बाद में शुरू हुईं; और यह नकारात्मक बातें सुरेश बिंदल के प्रभाव वाले क्लब्स के लोगों की ही तरफ से ज्यादा आईं । अधिकतर लोगों को लगता है कि नरेश गुप्ता तो ज्यादा सक्रिय ही नहीं हैं; न वह डिस्ट्रिक्ट में लोगों को जानते/पहचानते हैं, और न लोग ही उन्हें जानते/पहचानते हैं - ऐसे में वह कैसे गवर्नर बन सकते हैं और कैसे और क्यों सुरेश बिंदल ने उनका नाम आगे बढ़ाया ।
नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी से हतप्रभ लोगों को लगता है कि सत्ता खेमे के कुछेक नेताओं ने बड़ी होशियारी से नरेश गुप्ता को तैयार करके सुरेश बिंदल के जरिये उनका नाम आगे बढ़वाया है; और इस तरह सत्ता खेमे के नेताओं ने नरेश गुप्ता के जरिये सुरेश बिंदल को 'पप्पू' बना दिया । सत्ता खेमे के सामने समस्या दरअसल यह है कि उनके पास 'अपना' कोई उम्मीदवार ही नहीं है । दूसरे लोगों के बीच सत्ता खेमे के उम्मीदवार के रूप में जिन ओंकार सिंह को देखा/पहचाना भी जा रहा है; सत्ता खेमे में ही उन्हें राकेश त्रेहन के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है और यही बात उनके विरोध का कारण बनी हुई है । सत्ता खेमे में ओंकार सिंह से किसी को शिकायत नहीं है, लेकिन राकेश त्रेहन के नजदीक होना ही उनके लिए मुसीबत बन गया है । सत्ता खेमे के नेताओं की चिंता यह भी है कि राकेश त्रेहन कहीं विपक्षी खेमे के साथ मिल कर ओंकार सिंह को न नोमिनेट करवा लें - इसलिए उन्हें एक ऐसा उम्मीदवार चाहिए, जिसके नाम पर विपक्षी खेमा ऐतराज न व्यक्त कर सके । समझा जाता है कि इसी चाहत में उनकी निगाह नरेश गुप्ता पर पड़ी । कहने/दिखाने को तो नरेश गुप्ता विपक्षी खेमे के हैं, लेकिन सत्ता खेमे के नेता उन्हें विपक्षी खेमे में अपने 'आदमी' के रूप में देखते/पहचानते हैं । सत्ता खेमे के नेताओं ने जिस होशियारी के साथ नरेश गुप्ता को सुरेश बिंदल के गले में फँसाया है, उसके चलते सुरेश बिंदल अपने आपको ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि सत्ता खेमे के नेताओं ने अपनी इस चाल से अपने दोनों हाथों में पत्ते कर लिए हैं - उन्हें यदि नरेश गुप्ता के रवैये को लेकर कोई समस्या हुई तो वह यह कह/बता कर बच निकल सकते हैं कि उनकी उम्मीदवारी से सुरेश बिंदल ही बिदके हुए थे; और यदि उन्हें कोई बेहतर विकल्प नहीं मिला और वह नरेश गुप्ता को ही नोमिनेट करवाने के लिए मजबूर हुए तो सुरेश बिंदल के बिदकने की परवाह करने की उन्हें कोई जरूरत नहीं है । सत्ता खेमे के एक प्रमुख नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से साफ कहा कि होगा वह जो 'वे' चाहेंगे; दूसरे लोगों का कहना लेकिन यह है कि मौटे तौर पर तो यह बात सच है कि होगा वही, जो 'वे' चाहेंगे लेकिन सत्ता खेमे के लोगों के बीच जिस तरह की उठा-पटक और विकल्पहीनता की स्थिति है उसे समझते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि 'वे' जो चाहेंगे उसे खुशी से चाहेंगे या मजबूरी में स्वीकार करेंगे ?