Saturday, August 12, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में 'अधिकृत उम्मीदवार' नहीं, तो 'चेलैंज' का जुमला उछाल कर अशोक गुप्ता ने फुल रौनक का माहौल बनाया

जयपुर । अशोक गुप्ता की तरफ से नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार न चुने जाने की स्थिति में चेलैंज करने की बात आने से जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव का परिदृश्य खासा रोमांचक हो गया है । अशोक गुप्ता की तरफ से इस तरह की बात आने से लोगों को लगा है कि अशोक गुप्ता ने नोमीनेटिंग कमेटी में अपनी पराजय अभी से स्वीकार कर ली है, और उन्होंने उसके आगे की तैयारी शुरू कर दी है । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का हालाँकि यह भी कहना है कि चेलैंज करने की बात फैला/फैलवा कर अशोक गुप्ता ने वास्तव में नोमीनेटिंग कमेटी में अपने लिए समर्थन बनाने/बढ़ाने की चाल चली है । इन नजदीकियों का कहना है कि नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों से बात करने में मिले/हुए अनुभवों से अशोक गुप्ता को इस बात का आभास तो हो ही गया है कि नोमीनेटिंग कमेटी में उनकी दाल नहीं गलने वाली है; ऐसे में उन्हें लगा है कि चेलैंज करने की बात करके वह नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को 'प्रभावित' कर सकते हैं । अशोक गुप्ता को लगता है कि उनके द्वारा चेलैंज करने की बात सुन कर नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को अपनी अपनी निरर्थकता का अहसास होगा; उन्हें लगेगा कि उनके द्वारा चुना गया अधिकृत उम्मीदवार यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही नहीं पायेगा, तो फिर वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए किसी और की बजाए अशोक गुप्ता को ही अधिकृत उम्मीदवार क्यों न चुनें ?
अशोक गुप्ता की यह चाल सफल होगी या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - चाल के तहत अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की बात फैला/फैलवा कर अशोक गुप्ता ने लेकिन अभी चुनावी माहौल को गर्म जरूर कर दिया है । अशोक गुप्ता के कुछेक अन्य नजदीकियों का मानना/कहना यह भी है कि चेलैंज करने की बात एक झाँसापट्टी ही है, क्योंकि अपने डिस्ट्रिक्ट में वह भले ही बड़े तुर्रमखाँ हों - लेकिन दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में उनकी कोई पहचान ही नहीं है; और यह बात खुद अशोक गुप्ता को भी समझ में आ रही है । नोमीनेटिंग सदस्यों के बीच अपने लिए अजनबीपन पाकर अशोक गुप्ता को तगड़ा झटका लगा है; नोमीनेटिंग कमेटी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ही हैं - इसलिए विचार करने की बात यही है कि जब जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स ही अशोक गुप्ता को ज्यादा नहीं जानते/पहचानते हैं, तो क्लब्स के लोग ही उन्हें क्या और कितना जानते होंगे ? अशोक गुप्ता की सक्रियता व उनकी गतिविधियों से परिचित लोगों का कहना है कि अशोक गुप्ता ने रोटरी के बड़े बड़े नेताओं को डॉक्टरेट की टोपी पहना पहना कर उनके बीच तो अपने आप को परिचित करवाया है, लेकिन बाकी रोटेरियंस को उन्होंने कभी कोई तवज्जो नहीं दी; अपने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति और व्यवस्था में पकड़ बनाए रखने की चालबाजियों में तो अशोक गुप्ता ने खूब मन लगाया है, लेकिन रोटरी में वह ऐसा कोई योगदान नहीं दे/कर सके हैं - जो दूसरों को प्रभावित और प्रेरित कर सके ।
दरअसल इसीलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों में अशोक गुप्ता को सबसे कमजोर 'व्यक्तित्व' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों में सुरेंद्र सेठ जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के खास और आम लोगों के बीच एक प्रभावी वक्ता के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं; दीपक कपूर का पोलियो के काम के चलते नाम है; रंजन ढींगरा ने जल-संरक्षण के काम के जरिए तथा एक अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान और साख तो बनाई हुई है ही, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के समर्थन के चलते भी लोगों के बीच उन्हें गंभीरता से लिया जाता है; भरत पांड्या के साथ पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन - और अशोक महाजन के कारण पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू का समर्थन है । एक अकेले अशोक गुप्ता ऐसे हैं, जिनका न तो कोई 'काम' है और न जिनके समर्थन में कोई नेता है । वास्तव में यह अशोक गुप्ता के छोटे नजरिए और अव्यावहारिक रवैए का परिणाम है । अशोक गुप्ता ने यूँ तो रोटरी को अपना बहुत समय, अपनी बहुत एनर्जी और अपने बहुत 'साधन' दिए हैं - लेकिन उनका नजरिया और उनका रवैया ऐसा रहा है कि सब कुछ 'लुटाने' के बाद भी वह रोटरी समुदाय में किसी को प्रभावित नहीं कर सके हैं - और यही कारण है कि रोटरी के बड़े नेताओं के साथ-साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच उनकी न तो कोई पहचान बन सकी, और न वह अपना कोई खैरख्वाह बना सके हैं ।
इस सच्चाई से सामना होते ही अशोक गुप्ता को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी के अभियान में पैंतरा बदलने की जरूरत महसूस हुई; और लगता है कि इसी जरूरत के चलते उन्होंने 'अधिकृत उम्मीदवार' नहीं - तो 'चेलैंज' का जुमला उछाल दिया है । उनकी दशा को जानने/पहचानने वाले लोगों का कहना है कि चेलैंज करना - यानि चेलैंज करने के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाना तो अशोक गुप्ता के लिए असंभव ही होगा और यह बात वह भी जानते/समझते हैं; इसलिए लगता यही है कि चेलैंज की बात दरअसल उनकी तरफ से गीदड़ भभकी ही है - अशोक गुप्ता उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी इस गीदड़ भभकी से 'डर' कर नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य उन्हें ही अधिकृत उम्मीदवार चुन लेंगे । मजे की बात यह सुनने/देखने को मिल रही है कि अशोक गुप्ता की देखादेखी दूसरे उम्मीदवार भी चेलैंज करने की बात करने लगे हैं - यानि जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में फुल रौनक देखने को मिलेगी ।

Friday, August 11, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल पर लायनिज्म को पिकनिक मनाने का जरिया तथा दूसरों के पैसे पर अपने और अपने संगी-साथियों के मौज-मजे का इंतजाम कर लेने को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ड्यूटी समझ लेने का आरोप

आगरा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह दुबई में करने तथा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी को शह देने के मामले में डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों की आलोचना का शिकार बन रहे हैं । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि इन दोनों मामलों में पारस अग्रवाल ने जो रवैया दिखाया है, उससे लगता है कि वह भी निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल के पदचिन्हों पर हैं; उन्हें डर है कि पारस अग्रवाल कहीं सीपी सिंघल से भी गए-गुजरे न साबित हों ! इन दोनों ही मामलों में पैसों के 'घपलेबाज' इस्तेमाल को प्रेरक तत्त्व के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । मजे की बात है कि डिस्ट्रिक्ट के दो वरिष्ठ और नियम-कानून की फिक्र करने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जगदीश मेहरा और अशोक कपूर इस बात की लगातार वकालत करते रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह डिस्ट्रिक्ट की भौगोलिक सीमा में ही होना चाहिए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में पारस अग्रवाल ने उनकी बात का भी मान रखने की कोई परवाह नहीं की । पारस अग्रवाल की इस हरकत पर परिवार में उपेक्षा का शिकार होते और असहाय पड़ते बड़े-बुजुर्गों की तरह इन दोनों ने तो चुप्पी साध ली है; किंतु दूसरे कुछेक पूर्व गवर्नर्स पारस अग्रवाल की हरकत पर बुरी तरह नाराज हैं । हालाँकि पारस अग्रवाल को उनकी नाराजगी की कोई परवाह नहीं है; उनकी तरफ से सुनने को मिला है कि जिन पूर्व गवर्नर्स को मुफ़्त में दुबई जाने का मौका नहीं मिल रहा है, वही लोग दुबई में अधिष्ठापन समारोह किए जाने का विरोध कर रहे हैं ।
दुबई में हो रहे अधिष्ठापन समारोह के विवाद में फँसने का कारण दरअसल इसी तरह के आरोप-प्रत्यारोप हैं । पारस अग्रवाल ने दुबई के जिस पैकेज के लिए हरी झंडी दी, उसे महँगा बताते हुए आरोप लगाया गया है कि पारस अग्रवाल ने अपने कुछेक चहेतों को मुफ़्त में दुबई ले जाने की व्यवस्था करने के लिए ही महँगे पैकेज को स्वीकार किया और अपनाया । इस तरह की बातों के चलते दुबई में होने वाले अधिष्ठापन समारोह में जाने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भी निशाने पर आ गए हैं - उन पर आरोप लग रहे हैं कि मुफ़्त में दुबई जाने के चक्कर में उन्होंने पारस अग्रवाल को यह समझाने/बताने की जरूरत भी नहीं समझी कि पिकनिक मनाने दुबई जाना ही है तो कभी भी चले जाना और लोगों को ले जाना; लेकिन डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह ऐसी जगह पर करो, जहाँ कि डिस्ट्रिक्ट के ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हो सकें । आरोपपूर्ण चर्चाएँ हैं कि लगता है कि पारस अग्रवाल ने लायनिज्म को पिकनिक मनाने का ही जरिया मान/समझ लिया है और दूसरों के पैसे पर अपने और अपने संगी-साथियों के मौज-मजे का इंतजाम कर लेने को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ड्यूटी समझ लिया है ।
पारस अग्रवाल को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी को शह देने के कारण भी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है । दरअसल श्याम बिहारी अग्रवाल की नजदीकियत सीपी सिंघल के साथ देखते हुए कोई भी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने को तैयार नहीं हो रहा है । हर किसी का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जिस तरह से सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट का और लायनिज्म का नाम खराब किया है, श्याम बिहारी अग्रवाल तो उनसे भी बुरे साबित होंगे । इसी कुख्याति के चलते श्याम बिहारी अग्रवाल को अपने ही शहर - हाथरस के अकेले पूर्व गवर्नर अशोक कपूर का भी समर्थन नहीं मिल पा रहा है । श्याम बिहारी अग्रवाल लेकिन खुशकिस्मत हैं कि उन्हें पारस अग्रवाल के रूप में एक समर्थक मिल गया है । पारस अग्रवाल ने अपने बॉन वॉएज में फैलोशिप का मौका श्याम बिहारी अग्रवाल को देकर उनके प्रति अपने समर्थन का सार्वजनिक प्रदर्शन पहले ही कर दिया था । इसके बाद वृन्दावन में हुई स्कूलिंग में भी लोगों को शराब पिलवाने की जिम्मेदारी पारस अग्रवाल ने श्याम बिहारी अग्रवाल को ही सौंपी । धार्मिक नगरी होने के कारण वृन्दावन में शराब पिलवाने का काम खुले में तो नहीं हो सकता था, लिहाजा पारस अग्रवाल ने श्याम बिहारी अग्रवाल को सलाह दी कि कुछेक नेताओं के गले के नीचे जब तक शराब नहीं उतरेगी तब तक उनका लायनिज्म तो पूरा नहीं होगा - इसलिए अपनी गाड़ी में शराब का पूरा पूरा इंतजाम रखो और अच्छे से लायनिज्म की सेवा करो । स्कूलिंग में शामिल हुए लोग बताते हैं कि श्याम बिहारी अग्रवाल ने सेवा में वास्तव में कोई कमी नहीं रहने दी ।
उल्लेखनीय है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अलीगढ़ के अजय सनाढ्य को कई पूर्व गवर्नर्स का खुला समर्थन मिल रहा है; और माना/समझा जा रहा था कि वह निर्विरोध ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुन लिए जायेंगे । लेकिन श्याम बिहारी अग्रवाल को शह देकर पारस अग्रवाल ने चुनावी मुकाबले की स्थिति बना दी है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि चुनाव के नजदीक आते आते हो सकता है कि पारस अग्रवाल भी अजय सनाढ्य के समर्थक बन जाएँ - अभी लेकिन वह श्याम बिहारी अग्रवाल को इसलिए शह दे रहे हैं ताकि उन्हें दोनों से ही खर्चे करवाने का मौका मिलता रहे । पारस अग्रवाल को डर है कि यदि अजय सनाढ्य अकेले उम्मीदवार रहे, तो वह उनकी परवाह नहीं करेंगे और उनकी नहीं सुनेंगे । अजय सनाढ्य की गर्दन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए ही पारस अग्रवाल ने श्याम बिहारी अग्रवाल को शह देकर उम्मीदवार बना दिया है ।
पारस अग्रवाल की इस तरह की चालबाजियों को देख कर ही लोगों को लग रहा है कि पारस अग्रवाल की भी सोच बिलकुल निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल जैसी ही है और चालाकियों व बेईमानियों में लगता है कि वह सीपी सिंघल के भी गुरु साबित होंगे ।

Thursday, August 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूजा अग्रवाल बंसल के जबावी पत्र से चेयरमैन राकेश मक्कड़ और सेक्रेटरी राजिंदर अरोड़ा की मुश्किलें और बढ़ीं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पूर्व कार्यकारी चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने अपने ऊपर लगे आरोपों का करीब 350 पृष्ठों में जो जबाव दिया है, वह मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ और सेक्रेटरी राजिंदर अरोड़ा की कारस्तानियों के साथ-साथ बेवकूफियों की भी अच्छे से पोल खोलता है । पूजा अग्रवाल बंसल ने अपने जबाव में जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं, वह काउंसिल के पदाधिकारी के रूप में राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा के निकम्मेपन का तो सुबूत पेश करते ही हैं, यह भी दिखाते हैं कि बातों और तथ्यों के मामले में यह लोग झूठ और बेवकूफी की चरमसीमा को प्राप्त हैं । पूजा अग्रवाल बंसल ने इनके द्वारा लगाए गए हर आरोप का प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव दिया है और अपने हर प्वाइंट का सुबूत प्रस्तुत किया है । उन्होंने राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा को चुनौती दी है कि वह उनके द्वारा दिए गए तथ्यों को गलत साबित करें, अन्यथा अपने आरोप वापिस लें । पूजा अग्रवाल बंसल ने साफ कहा है कि राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने यदि ऐसा नहीं किया, तो वह इनके खिलाफ उचित कार्रवाई करेंगी । 
पूजा अग्रवाल बंसल के जबावी हमले ने राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा को गिड़गिड़ाने के लिए मजबूर कर दिया है और अब वह लोगों से कहते फिर रहे हैं कि पूजा अग्रवाल बंसल ने अपने जबाव की कॉपी सेंट्रल काउंसिल और पाँचों रीजनल काउंसिल के सभी सदस्यों के साथ-साथ इंस्टीट्यूट के सभी पूर्व प्रेसीडेंट्स तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पूर्व चेयरमैन्स को भेज कर प्रोफेशन के लोगों के बीच उनकी सार्वजनिक रूप से बेइज्जती की है । इस पर पूजा अग्रवाल बंसल की तरफ से सुनने को मिला है कि इन्होंने उन पर आरोप लगाते हुए जो मेल लिखा था, उसकी कॉपी भी इन्होंने काउंसिल के कई सदस्यों को भेजी थी - इसलिए उनके लिए भी जरूरी हुआ कि वह इंस्टीट्यूट से संबद्ध सभी लोगों को सच्चाई से अवगत कराएँ और सभी लोगों को यह जानकारी उपलब्ध करवाएँ कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में आखिर हो क्या रहा है ? जाहिर है कि आरोपों के जरिए विरोधी को बदनाम करने का खेल राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा की जोड़ी ने शुरू किया था - लेकिन उन्होंने इतनी बेवकूफी से इस खेल में हाथ डाला कि पूजा अग्रवाल बंसल ने पलटवार करते हुए खेल में उनकी ही गर्दन फँसा दी है ।
राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने पूजा अग्रवाल बंसल को आरोपों की जो फेहरिस्त दी, वह इतनी बेवकूफी से तैयार की गयी थी कि उनके आरोप झूठ का पुलिंदा बन कर रह गए - इसीलिए पूजा अग्रवाल बंसल को पलटवार करने का बढ़िया मौका मिला और उन्होंने राकेश मक्कड़ व राजिंदर अरोड़ा के आरोपों की तथ्यों और सुबूतों के साथ धज्जियाँ उड़ा दीं । राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने अपने आरोप पत्र में सबसे गंभीर आरोप लगाया कि पूजा अग्रवाल बंसल बेकार की बातों को लेकर मेल लिखती रहती हैं और इस तरह नॉन-कंस्ट्रक्टिव बातों में अपना और दूसरों का समय खराब करती हैं । इसके जबाव में पूजा अग्रवाल बंसल ने सिलसिलेबार तरीके से अपनी 26 मेल्स का जिक्र किया है और पूछा है कि इनमें जिन भी विषयों पर बात की गयी है, उनमें कौन सी बात बेकार की और या नॉन-कंस्ट्रक्टिव है ? काउंसिल को समय न देने के आरोप पर पूजा अग्रवाल बंसल ने रिकॉर्ड बताते हुए दावा किया कि काउंसिल की मीटिंग्स में पिछले वर्ष उनकी नब्बे प्रतिशत और इस वर्ष अभी तक सौ प्रतिशत उपस्थिति है - जाहिर है कि काउंसिल को समय न देने का आरोप पूरी तरह झूठ है ? मीटिंग्स में देर से आने और जल्दी चले जाने के आरोप पर पूजा अग्रवाल बंसल ने दावा किया कि काउंसिल की मीटिंग्स के रिकॉर्ड देखे जा सकते हैं जिनके अनुसार अधिकतर मीटिंग्स में 'वोट ऑफ थैंक्स' उन्होंने दिया है, जो मीटिंग का अंतिम एजेंडा होता है । राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा द्वारा लगाए गए अन्य आरोपों को भी प्वाइंट टू प्वाइंट झूठा साबित करते हुए पूजा अग्रवाल बंसल ने जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं, उनसे साबित होता है कि राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी होने के बावजूद दूसरों को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक झूठ बोल सकते हैं ।
राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा की फितरत को न जानने/पहचानने वाले लोगों को हैरानी है कि यह कैसे लोग हैं; इन्हें इतनी भी अक्ल नहीं है कि काउंसिल के ही सदस्य के खिलाफ झूठे आरोप लगाओगे तो वह पलभर में ही झूठ की पोल खोल देगा । इनके नजदीकियों का कहना है कि 4 अगस्त की रीजनल काउंसिल की मीटिंग में पूजा अग्रवाल बंसल पर चुप रहने का दबाव बनाने के उद्देश्य से राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने एक अगस्त को उन्हें आरोप पत्र थमा दिया था । रीजनल काउंसिल के इन दोनों पदाधिकारियों ने उम्मीद की थी कि आरोप पत्र से पूजा अग्रवाल बंसल दबाव में आ जायेंगी और मीटिंग में चुप रहेंगी । लेकिन हुआ उल्टा ही । पूजा अग्रवाल बंसल ने 4 अगस्त की मीटिंग में तो राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा की कारस्तानियों को लेकर मोर्चा संभाला ही, आरोप पत्र का प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव देकर भी इनके लिए मुसीबत और बढ़ा दी है । झूठे आरोपों को लेकर पूजा अग्रवाल बंसल ने तो कार्रवाई करने की चेतावनी दी ही हुई है; दूसरे लोगों का भी कहना है कि राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा में यदि जरा सी भी शर्महया हो और उनकी औकात हो तो उन्हें जल्दी से जल्दी पूजा अग्रवाल बंसल के द्वारा प्रस्तुत तथ्यों का उन्हीं की ही तरह प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव देना चाहिए अन्यथा झूठे आरोप लगाने के लिए उनसे माफी माँगनी चाहिए । राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा को जानने/पहचानने वाले लोगों का मानना और कहना लेकिन यह है कि समझदारी के मामले में इनकी 'औकात' ऐसी नहीं है कि यह प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव दे सकें; यह निहायत बेशर्म लोग हैं, इसलिए अपने झूठे आरोपों पर यह माफी भी नहीं माँगेंगे - यह तो बस अपनी हरकतों से काउंसिल, प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट को बदनाम करने के साथ-साथ अपनी खुद की फजीहत भी करवाते रहेंगे । यानि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अभी और तमाशे देखने/सुनने को मिलते रहेंगे ।

Wednesday, August 9, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल की बातों और हरकतों के प्रति क्लब्स के पदाधिकारियों के बीच बढ़ती नाराजगी के आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी पर भारी पड़ने का खतरा बढ़ता दिखा

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में उत्तर प्रदेश के क्लब्स की एकजुटता बनाने की जो कोशिश की है, उसे अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे उत्तर प्रदेश के संभावित उम्मीदवारों की तरफ से तगड़ा झटका लग रहा है । अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवारी की तैयारी करने वाले संभावित उम्मीदवारों को डर है कि इस बार यदि आलोक गुप्ता जीतते हैं तो 'हर वर्ष उत्तर प्रदेश से ही गवर्नर क्यों' की भावना के चलते उनके लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है । अगले वर्ष की अपनी मुसीबत को टालने के लिए ही अगले वर्ष उम्मीदवार होने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों और उनके समर्थकों ने आलोक गुप्ता के पक्ष में उत्तर प्रदेश के क्लब्स को एक करने के लिए चलाई जा रही सतीश सिंघल की मुहिम में पंक्चर करने का काम शुरू कर दिया है । मजे की बात यह है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए दिल्ली के कुछेक क्लब्स पहले से ही 'हर वर्ष उत्तर प्रदेश से ही गवर्नर क्यों' की मुहिम चलाए हुए थे, जिसका मुकाबला करने के लिए ही सतीश सिंघल ने उत्तर प्रदेश के क्लब्स को एकजुट करने की कोशिशें शुरू की - उनके यह कोशिशें सिरे चढ़तीं, कि उत्तर प्रदेश के ही अगले संभावित उम्मीदवारों ने उनकी कोशिशों को झटका दे दिया है ।
आलोक गुप्ता के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए सतीश सिंघल की एक अन्य तरकीब का दिल्ली के क्लब्स पहले ही कबाड़ा कर चुके हैं । उक्त तरकीब के तहत सतीश सिंघल ने क्लब्स के पदाधिकारियों को फरमान जारी किया कि अपने अधिष्ठापन कार्यक्रम में वह डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्यों को भी आमंत्रित करें और उनका स्वागत करें । आलोक गुप्ता चूँकि डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्य हैं - इसलिए उक्त फरमान के जरिए सतीश सिंघल ने क्लब्स को दरअसल आलोक गुप्ता को आमंत्रित करने तथा उनका स्वागत करने के लिए मजबूर करने का काम किया । क्लब्स ने खासकर दिल्ली के क्लब्स ने सतीश सिंघल की इस तरकीब का तोड़ यह निकाला कि उन्होंने अपने अधिष्ठापन कार्यक्रमों में आलोक गुप्ता के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार ललित खन्ना को भी आमंत्रित किया और उनका स्वागत किया - इससे सतीश सिंघल की तरकीब पूरी तरह पिट गयी ।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली के क्लब्स और उनके पदाधिकारी राजनीतिक उठापटक के खेल में ज्यादा नहीं फँसते हैं और ज्यादा राजनीति करने वालों को बड़ी नीची निगाह से देखते हैं । सतीश सिंघल ने डेढ़ महीने से भी कम के अभी तक के अपने गवर्नर-काल में 'काम कम, बातें ज्यादा' करने वाले गवर्नर की पहचान बनायी है; अपने भाषणों में वह इतनी लंबी-लंबी फेंकते हैं कि लोग उन्हें 'फेंकू' कहने लगे हैं - ऐसे में, सतीश सिंघल जब राजनीतिक चालबाजी दिखाते हैं तब क्लब्स के पदाधिकारी उनके प्रति और ज्यादा नकारात्मक भाव से भर जाते हैं । क्लब्स के पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के प्रति सीधा सीधा विरोध तो प्रकट नहीं करते हैं, इसलिए कोई भी सतीश सिंघल से सामने सामने तो विरोध और नाराजगी की बात नहीं करता है - लेकिन पीठ पीछे अधिकतर क्लब्स के पदाधिकारी सतीश सिंघल का मजाक बनाते/उड़ाते हैं ।
सतीश सिंघल के प्रति क्लब्स के पदाधिकारियों के इस रवैये को देखते/समझते हुए आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों ने डर भी व्यक्त किया है कि सतीश सिंघल की कारस्तानियाँ कहीं आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी पर भारी न पड़ें । उनका कहना है कि आलोक गुप्ता अपनी सक्रियता, अपने व्यवहार और अपने रवैये से लोगों के बीच पैठ बनाते हुए अपने लिए समर्थन का भाव बनाते हैं - लेकिन सतीश सिंघल की बेवकूफीभरी बातें और उनकी हरकतें लोगों को इर्रिटेट कर देती हैं । आलोक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाने हेतु सतीश सिंघल ने जो जो कदम उठाए हैं, उनका उल्टा ही असर देखने को मिला है । उत्तर प्रदेश के क्लब्स को आलोक गुप्ता के पक्ष में एकजुट करने की सतीश सिंघल की कोशिशों का भी नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है : जब तक आलोक गुप्ता अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब तक उन्हें उत्तर प्रदेश के क्लब्स से अच्छा समर्थन मिलने की बातें सुनी जा रही थीं; लेकिन जैसे ही सतीश सिंघल ने उत्तर प्रदेश की एकजुटता का राग आलापना शुरू किया, वैसे ही आलोक गुप्ता के लिए मामला उल्टा पड़ने लगा ।
सतीश सिंघल ने उत्तर प्रदेश में आलोक गुप्ता के लिए समर्थन मजबूत करने/बनाने के लिए एकजुटता की जो तरकीब लगाई, उसे पहला झटका नोएडा के क्लब्स की तरफ से मिला - जिन्होंने अपने आप को उत्तर प्रदेश में 'मानने' को लेकर ऐतराज जताया । नोएडा के लोग यूँ भी अपने आप को उत्तर प्रदेश की बजाए दिल्ली के ज्यादा 'नजदीक' समझते हैं । आलोक गुप्ता अपने प्रयत्नों से नोएडा के क्लब्स में अपने लिए समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे थे, उसका सकारात्मक असर होता हुआ दिख रहा था - लेकिन सतीश सिंघल की कारस्तानी ने सब गुड़ गोबर कर दिया । सतीश सिंघल की कारस्तानी ने ही अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों को उकसाया है - उन्हें लगा है कि उत्तर प्रदेश को एकजुट करके यदि आलोक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाया गया, तो अगले वर्ष उनके लिए मुसीबत हो जाएगी । सतीश सिंघल, सुभाष जैन, दीपक गुप्ता के रूप में उत्तर प्रदेश से ही जिस तरह से गवर्नर्स की लाइन है - उसे लेकर दिल्ली के क्लब्स के लोगों में पहले ही बेचैनी है और वह डिस्ट्रिक्ट में स्वयं को उपेक्षित स्थिति में पा रहे हैं । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में की जा रही हरकतें दिल्ली के क्लब्स के पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ सदस्यों के जले पर नमक रगड़ने जैसा काम कर रही हैं । अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे उत्तर प्रदेश के संभावित उम्मीदवारों ने इस स्थिति को अपने लिए गंभीर खतरे के रूप में देखा/पहचाना है - और इस कारण से उत्तर प्रदेश को आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में एकजुट करने की सतीश सिंघल की योजना पानी फिरता नजर आ रहा है ।

Saturday, August 5, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पुलिस कार्रवाई की धमकी के बाद राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर की बदतमीजी पर विराम लगा और राकेश मक्कड़ विरोधी सदस्यों की माँगे मानने के लिए मजबूर हुए

नई दिल्ली । राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में जो निर्लज्ज किस्म का लफंगापन प्रदर्शित किया, उसे रोकने के लिए काउंसिल सदस्यों को पुलिस बुलाने की धमकी देनी पड़ी - और तब मीटिंग में शांति स्थापित हो सकी और उसमें सदस्यों को अपनी अपनी बात कहने/रखने का मौका मिल सका । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल क्या, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि पदाधिकारियों के रवैये के खिलाफ काउंसिल  सदस्यों को ही पुलिस बुलाने की जरूरत महसूस हुई । मीटिंग में राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर के व्यवहार के बारे में जिस किसी ने भी सुना, उसकी यही प्रतिक्रिया रही कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में इन्हें वोट देने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने काउंसिल के लिए सदस्य चुने हैं या लफंगे चुने हैं ? राजेंद्र अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेक्रेटरी हैं और नितिन कँवर निकासा चेयरमैन हैं; यह दोनों यूँ तो मीटिंग में चीख-चिल्लाहट के जरिए और मेजें थपथपा कर शोर-शराबा करने तथा अपशब्दों व गालियों के जरिये दूसरों को चुप करने का काम करने के लिए कुख्यात रहे हैं, लेकिन कल की मीटिंग में तो इन दोनों ने हद ही कर दी - अपने लफंगई व्यवहार से यह दूसरे सदस्यों को लगातार अपमानित करते जा रहे थे और उन्हें बोलने ही नहीं दे रहे थे; इनके व्यवहार से दो-तीन बार तो ऐसे हालात बने कि लगा कि मीटिंग में मार-पिटाई हो जाएगी ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन द्वारा मीटिंग में भेजे गए ऑब्जर्वर्स की उपस्थिति की भी इन्होंने परवाह नहीं की । इनके व्यवहार से तंग आकर काउंसिल के कुछेक सदस्यों ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर से इनकी शिकायत की, उन्होंने लेकिन यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि मीटिंग में उन्होंने ऑब्जर्वर्स भेज दिए हैं और इससे ज्यादा वह कुछ नहीं कर सकते हैं । शिकायत करने गए काउंसिल सदस्यों ने तब वी सागर को दो-टूक शब्दों में बता दिया कि आप कुछ नहीं कर सकते हैं, तो हम पुलिस में रिपोर्ट कर रहे हैं और पुलिस बुला रहे हैं । यह बात कही तो गयी थी इंस्टीयूट के सेक्रेटरी वी सागर से उनके ऑफिस में, लेकिन यह बात तुरंत राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर तक पहुँची - जिसका नतीजा यह देखने में आया कि फिर इन्होंने मीटिंग में कोई बदतमीजी नहीं की और मीटिंग में सचमुच कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले हुए । लगता है कि इनके रिंग मास्टर राजेश शर्मा, जो मीटिंग के दौरान मीटिंग-स्थल के आसपास ही बने हुए थे और इन्हें लगातार निर्देश दे रहे थे, ने इन्हें चेता दिया होगा कि पुलिस को 'बेस' पसंद है और वह 'बेस' सुजा देती है, इसलिए अब कोई ऐसी हरकत न करना कि अपने अपने 'बेस' को सुजवा लो और बैठने लायक न रहो । राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने पॉवर ग्रुप के रिंग मास्टर राजेश शर्मा की चेतावनी को गंभीरता से लिया और अपने अपने 'बेस' की चिंता करते हुए मीटिंग में अपनी बदतमीजी पर ब्रेक लगाया ।
इसके बाद मीटिंग का पूरा नजारा बदल गया । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने अपनी बेईमानीपूर्ण हरकतों के लिए बार-बार माफी माँगी; अपने भाई को काउंसिल की कोचिंग क्लास देने के लिए उन्होंने मासूम-सा तर्क दिया कि उन्हें उस नियम के बारे में पता नहीं था जिसके अनुसार वह अपने भाई को क्लास नहीं दे सकते हैं । पिछले वर्ष के एकाउंट काउंसिल सदस्यों को ही दिखाने से लगातार इंकार करते रहे राकेश मक्कड़ फिर एकाउंट दिखाने के लिए भी राजी हो गए । रीजनल काउंसिल के हर उस फैसले के पूरे विवरण देने के लिए भी उन्होंने सहमति व्यक्त की, जिसमें पैसों का लेन-देन होता है । कल हुई नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग दरअसल इसीलिए महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि उसमें पॉवर ग्रुप की बेईमानियों के हिसाब-किताब के बारे में फैसला होना था । राजेश शर्मा द्वारा नियंत्रित और राकेश मक्कड़ द्वारा संचालित काउंसिल का पॉवर ग्रुप इसीलिए काउंसिल की मीटिंग करने से बच रहा था । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को बार बार मेल लिखे जा रहे थे कि वह हस्तक्षेप करें और रीजनल काउंसिल की मीटिंग करवाएँ, लेकिन इसके बावजूद मीटिंग करने से बचा जा रहा था । रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग करवाने की माँग करते हुए प्रेसीडेंट को मेल लिखना लगातार जारी रखा और उनकी बारहवीं मेल के बाद मीटिंग करने का फैसला हुआ ।
मीटिंग के लिए मजबूर होने के बाद भी राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ की जोड़ी अपनी हरकत से बाज नहीं आई और उसने मीटिंग का एजेंडा तय नहीं होने दिया । काउंसिल के विरोधी सदस्यों को आभास था कि मीटिंग में हुड़दंगबाजी करके यह अपनी बेईमानियों के मामलों को एजेंडा नहीं बनने देंगे, इसलिए उन्होंने ऑब्जर्वर की माँग की । इंस्टीट्यूट प्रशासन ने दो ऑब्जर्वर नियुक्त कर दिए । राजेश शर्मा की शह पर राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने ऑब्जर्वर्स की मौजूदगी की भी परवाह नहीं की और अपनी बदतमीजियों से मीटिंग में कोई बात ही नहीं होने दी । अपनी बदतमीजियों का निशाना बनाने से उन्होंने अपने ग्रुप के महत्त्वपूर्ण सदस्य और वाइस चेयरमैन विवेक खुराना तक को नहीं छोड़ा; विवेक खुराना का 'कुसूर' सिर्फ इतना था कि वह लगातार नियमानुसार काम करने की वकालत कर रहे थे - जो राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने विवेक खुराना को कई बार धमकाया । उनकी हरकतों के कारण एक-डेढ़ घंटे की मीटिंग छह घंटे चली - और छह घंटे की मीटिंग में भी कई-एक फैसले तब संभव हो सके जब पुलिस कार्रवाई की धमकी के बाद राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने अपने अपने 'बेस' की चिंता करते हुए अपनी बदतमीजियों पर ब्रेक लगाया ।
चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने कल हुई मीटिंग में काउंसिल के विरोधी खेमे के सदस्यों की कई माँगों को सिद्धांततः स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन विरोधी खेमे के कुछेक सदस्यों को शक है कि उन्हें सचमुच अमल में लाने से बचने के लिए वह कोई हरकत न कर दें, इसलिए वह राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथियों की हरकतों पर नजर रखने की जरूरत भी समझ रहे हैं । राकेश मक्कड़ अपनी हरकतों से अपनी और काउंसिल की खासी फजीहत करवा चुके हैं, और अपनी हरकतों पर पर्दा डालने की उनकी हर कोशिश लगातार फेल होती जा रही है - इससे उम्मीद हालाँकि यह भी की जा रही है कि इससे सबक लेते हुए राकेश मक्कड़ अब अपनी बात पर ईमानदारी से अमल करेंगे । देखना दिलचस्प होगा कि राकेश मक्कड़ लगातार हो रही अपनी फजीहत से सचमुच सबक लेंगे या अपनी बेईमानीपूर्ण हरकतों को जारी रखेंगे ?

Thursday, August 3, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में गुरनाम सिंह और उनके लोगों की चालबाजियों ने कमल शेखर गुप्ता को क्या सचमुच केएस लूथरा खेमे से बाहर करवा दिया है ?

लखनऊ । अशोक अग्रवाल को लखनऊ में आयोजित डिस्ट्रिक्ट के तीज फंक्शन में मिली तवज्जो को देख कर कमल शेखर गुप्ता को केएस लूथरा खेमे से उम्मीदवारी का टिकट मिलने की उम्मीद को तगड़ा झटका लगा है, जिसकी प्रतिक्रिया में उनके नजदीकियों ने केएस लूथरा पर धोखाधड़ी का आरोप तक लगाना शुरू कर दिया है । समझा जाता है कि यह गुरनाम सिंह और उनके लोगों की चाल है, जिसके तहत पहले तो उन्होंने केएस लूथरा खेमे में कमल शेखर गुप्ता के प्रति संदेह की बीज डाले और अब वह कमल शेखर गुप्ता को केएस लूथरा के खिलाफ भड़का रहे हैं । कमल शेखर गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि अभी तक तो केएस लूथरा का रवैया सकारात्मक ही दिख रहा था - वह कमल शेखर गुप्ता को सलाह और निर्देश दे रहे थे तथा कमल शेखर गुप्ता भी उनकी बातें और उनके निर्देश मान रहे थे; ऐसे में उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के तीज फंक्शन में उन्होंने अचानक से अशोक अग्रवाल को 'सिर' पर क्यों उठा लिया ?
डिस्ट्रिक्ट के तीज फंक्शन में अशोक अग्रवाल को जो इम्पोर्टेंस मिली, उसे देख/जान कर हर किसी को लगा है कि जैसे इस वर्ष होने वाले सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के लिए केएस लूथरा ने अशोक अग्रवाल को अपना उम्मीदवार बनाने का निश्चय कर लिया है । चूँकि हर किसी को ऐसा लगा है, इसलिए कमल शेखर गुप्ता और उनके संगी-साथियों ने अपने आप को मुसीबत में घिरा पाया है - क्योंकि केएस लूथरा का समर्थन पाने की उन्होंने काफी उम्मीद लगाई हुई थी । उन्हें पिछले कुछ दिनों से यह तो सुनने को मिल रहा था कि केएस लूथरा उनसे इस बात पर खफा हैं कि वह गुपचुप रूप से गुरनाम सिंह तथा उनके लोगों से तार जोड़े हुए हैं । हालाँकि कमल शेखर गुप्ता की तरफ से केएस लूथरा को समझाने की कोशिश हो रही थी कि हाल-फिलहाल में उनकी गुरनाम सिंह और या उनके लोगों से जो बातें/मुलाकातें हुई हैं, वह संयोगवश हुई हैं और उनका कोई राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए । लेकिन लगता है कि वह केएस लूथरा को समझा सकने में असफल रहे हैं ।
मजे की बात यह रही कि इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए जो तीन लोग सामने आए वह सभी केएस लूथरा का समर्थन पाने के लिए प्रयास करते नजर आए । केएस लूथरा ने भी इस स्थिति का फायदा उठाया और जल्दी से किसी एक को अपनाने का फैसला करने से उन्होंने इंकार किया - उनकी तरफ से कहा/बताया गया कि वह उचित समय पर 'अपने उम्मीदवार' के बारे में फैसला करेंगे । समझा गया कि इस तरकीब से उन्होंने तीनों संभावित उम्मीदवारों को अपनी मुट्ठी में बनाए रखने और उन्हें अपने तरीके से इस्तेमाल करते रहने का प्रयास किया । पीएसटी स्कूलिंग में कुछ छिपाने और कुछ दिखाने वाले अंदाज में मीरा सेठ से स्पॉन्सर कराई गयी शराब को लेकर जो बबाल मचा, उससे लगा कि केएस लूथरा के लिए अपनी तरकीब को ज्यादा समय तक चला पाना संभव नहीं होगा । उस बबाल के चलते मीरा सेठ अपनी उम्मीदवारी से पीछे सरकती हुईं नजर आईं तो मुकाबले में अशोक अग्रवाल और कमल शेखर गुप्ता बचे रह गए । क्लब के अधिष्ठापन समारोहों में कमल शेखर गुप्ता को जो तवज्जो मिलती दिखी, उससे लगा कि वह केएस लूथरा के उम्मीदवार हो सकते हैं । लेकिन इसी बीच इन खबरों ने चर्चा पकड़ी कि कमल शेखर गुप्ता ने गुरनाम सिंह के साथ भी तार जोड़े हुए हैं, और वह शायद इस प्रयास में हैं कि पिछले लायन वर्ष में जिस तरह मनोज रुहेला को दोनों खेमों का समर्थन मिला और वह चुनाव का सामना किए बिना ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन गए - वैसे ही उनका काम भी बन जाए और वह भी बिना चुनाव के ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुन लिए जाएँ ।
गुरनाम सिंह के साथ कमल शेखर गुप्ता के मेलमिलाप की खबरों को लगता है कि केएस लूथरा ने गंभीरता से लिया । कुछेक लोगों का कहना है कि गुरनाम सिंह ने ही अपने लोगों के जरिए केएस लूथरा तक कमल शेखर गुप्ता की मेलमिलाप की खबरों को पहुँचवाया, ताकि कमल शेखर गुप्ता का पत्ता वहाँ से कटे और कमल शेखर गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को झंडा उनके हवाले करें । गुरनाम सिंह और उनके लोग चाहते ही थे कि केएस लूथरा 'अपने उम्मीदवार' का फैसला जल्दी करें, ताकि दूसरा उम्मीदवार उनके पास आए । केएस लूथरा उन्हें यह मौका दे नहीं रहे थे; तब गुरनाम सिंह और उनके लोगों ने कमल शेखर गुप्ता की भलमनसाहत का फायदा उठाया और उन्हें बताए बिना उनका इस्तेमाल करते हुए उन्हें केएस लूथरा खेमे में बदनाम कर दिया । केएस लूथरा को कमल शेखर गुप्ता के गुरनाम सिंह के साथ मेलमिलाप करने की खबरें मिलीं, तो उन्होंने अशोक अग्रवाल पर ध्यान केंद्रित किया और उन्हें बढ़ावा देना शुरू किया - जिसकी परिणति तीज फंक्शन में देखने को मिली । कमल शेखर गुप्ता के लिए यह समझना ही मुश्किल हुआ कि उनके साथ हुआ क्या; और उनके साथ खेल कौन रहा है - केएस लूथरा या गुरनाम सिंह ? कमल शेखर गुप्ता के नजदीकियों को अभी तो केएस लूथरा ही खलनायक नजर आ रहे हैं, और इस स्थिति में गुरनाम सिंह और उनके लोगों को 'अपना काम' बनता हुआ दिख रहा है । 

Tuesday, August 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ की वकालत करने के कारण नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी को लेकर विवाद भड़का

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ की वकालत के चक्कर में विजय झालानी खासे विवाद में फँस गए हैं । राकेश मक्कड़ की तरफ से सुनने को मिला कि 4 अगस्त को होने वाली रीजनल काउंसिल की मीटिंग में विजय झालानी उनकी मदद के लिए उपस्थित रहेंगे, तो काउंसिल के कुछेक सदस्य भड़क उठे और उनकी तरफ से सुनाई दिया कि विजय झालानी यदि उक्त मीटिंग में आए और उन्होंने राकेश मक्कड़ का बचाव करने का प्रयास किया तो उनका विरोध किया जाएगा । इन बातों के बीच विजय झालानी ने लोगों को कहा/बताया है कि 4 अगस्त को दिल्ली से बाहर होने के कारण उनका मीटिंग में शामिल हो सकना संभव ही नहीं होगा । इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए विजय झालानी ने यह भी साफ कहा कि उनका राकेश मक्कड़ से कोई संबंध नहीं है और उन्होंने कभी भी राकेश मक्कड़ का बचाव करने का प्रयास नहीं किया है । उनका कहना है कि उन्हें नहीं पता कि राकेश मक्कड़ अपने साथ उनका नाम क्यों जोड़ते हैं, और क्यों कुछेक सदस्य उन्हें बदनाम करने का प्रयास करते हैं ? इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए उन्होंने दृढ़ता से कहा और दावा किया कि 4 अगस्त को वह यदि दिल्ली में होते भी, तो भी वह रीजनल काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं होते ।
विजय झालानी के स्पष्ट इंकार के बावजूद उन्हें लेकर विवाद यदि भड़का हुआ है, तो इसका कारण यह है कि सेंट्रल काउंसिल के कुछेक सदस्य भी इस विवाद को हवा देने में लगे हैं - जिनका कहना है कि कॉमन सेंस की बात है कि विवाद का यदि धुँआ है तो आग कहीं न कहीं तो होगी ही न ! विजय झालानी इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य हैं । रीजनल काउंसिल के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल के भी कई सदस्यों का आरोप है कि नॉमिनेटेड सदस्य को अपनी जिस विशेष स्थिति तथा गरिमा का ध्यान रखना चाहिए, विजय झालानी प्रायः उसका उल्लंघन करते हैं और रीजनल काउंसिल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं । इस चक्कर में पिछली एक मीटिंग में रीजनल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य राजिंदर नारंग के साथ उनकी खासी झड़प भी हो गयी थी । काउंसिल सदस्यों का कहना है कि दूसरे नॉमिनेटेड सदस्य यदा-कदा ही इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में नजर आते हैं, लेकिन विजय झालानी यहाँ अक्सर ही मौजूद रहते हैं और अपना ज्यादातर समय नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यालय में बिताते हैं । राकेश मक्कड़ के चेयरमैन बनने के बाद से तो विजय झालानी का इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यालय में उठना-बैठना और बढ़ गया है; राकेश मक्कड़ को उनके खाने-पीने की व्यवस्था करते/करवाते अक्सर ही देखा गया है ।
राकेश मक्कड़ की बड़ी समस्या यह है कि वह बेईमानियाँ और साजिशें तो कर सकते हैं, लेकिन अपने बचाव में अपनी वकालत नहीं कर सकते - इसलिए उन्हें हमेशा एक 'वकील' की जरूरत पड़ती है । विजय झालानी को उन्होंने अपने एक वकील के रूप में कुछेक मौकों पर इस्तेमाल किया । उनकी वकालत करने के कारण विजय झालानी की एक मीटिंग में राजिंदर नारंग से जो झड़प हुई थी, उसके बाद विजय झालानी हालाँकि राकेश मक्कड़ की वकालत करते हुए कहीं नहीं सुने/देखे गए हैं । किंतु 4 अगस्त को होने वाली मीटिंग में उनकी उपस्थिति की बात करके राकेश मक्कड़ ने उन्हें लेकर विवाद को खासा भड़का दिया है । उक्त मीटिंग में राकेश मक्कड़ के वकील की भूमिका सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा निभा सकते थे, लेकिन सीए डे फंक्शन में हुई बदइंतजामी और बेईमानी के आरोपों में राजेश शर्मा इस कदर घिरे हुए हैं कि अभी वह पर्दे के पीछे रहने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं । ऐसे में, राकेश मक्कड़ ने 4 अगस्त की मीटिंग में विजय झालानी को आगे रखने की योजना बनाई थी; उनकी इस योजना की भनक काउंसिल के दूसरे सदस्यों को लगी तो उन्होंने भी विजय झालानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया । विजय झालानी ने 4 अगस्त की रीजनल काउंसिल की मीटिंग से दूर रहने की घोषणा करके इस विवाद को थामने का प्रयास तो किया है, लेकिन नॉमिनेटेड सदस्य होने के बावजूद नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कामकाज में उनके द्वारा दिखाई जाती रही दिलचस्पी को देखते तथा याद करते हुए काउंसिल सदस्य विवाद को हवा देते हुए नजर आ रहे हैं - ताकि वह विजय झालानी को रीजनल काउंसिल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से सचमुच में रोके रख सकें ।