Wednesday, April 18, 2012

राकेश त्रेहन जिन केएल खट्टर के कारण तरह-तरह से अपमानित होते रहे हैं, मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए अब उन्हीं केएल खट्टर का समर्थन करेंगे क्या

नई दिल्ली | केएल खट्टर मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनने के लिए अब उन्ही राकेश त्रेहन की खुशामद में जुट गए हैं, जिन राकेश त्रेहन के खिलाफ अभी हाल तक उन्होंने जबरदस्त निंदा अभियान चलाया था और जिनके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक नेगेटिव वोटिंग करवाई थी | केएल खट्टर ने अपने नजदीकियों को तथा दूसरे अन्य लोगों को विश्वास दिलाया है कि उन्होंने राकेश त्रेहन के साथ भले ही कितना ही घटियापन किया हो, लेकिन फिर भी वह राकेश त्रेहन से अपनी उम्मीदवारी की चिठ्ठी पर हस्ताक्षर करवा लेंगे | यहाँ मजे की बात यह है कि राकेश त्रेहन के नजदीकियों को तो केएल खट्टर के इस दावे के पूरा होने का कुछ-कुछ भरोसा है, लेकिन केएल खट्टर के नजदीकियों को ऐसा भरोसा नहीं है | दरअसल राकेश त्रेहन के नजदीकियों ने उन्हें बार-बार समझाया था कि केएल खट्टर और उनके ग्रुप के लोग किसी भी तरह से विश्वास करने योग्य नहीं हैं; लेकिन राकेश त्रेहन कभी छुप कर तो कभी चालाकी से केएल खट्टर और उनके ग्रुप के नेताओं से संबंध जोड़े रहे थे | पता नहीं क्यों, राकेश त्रेहन को यह विश्वास रहा कि केएल खट्टर और उनके ग्रुप के नेता दूसरों के साथ भले ही घटियापन करते/दिखाते रहे हों, लेकिन उनके साथ घटियापन नहीं करेंगे | नेगेटिव वोटिंग को लेकर भी राकेश त्रेहन को पक्का विश्वास था कि विजय शिरोहा के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग भले ही हो, लेकिन उनके खिलाफ नेगेटिव वोटिंग नहीं होगी | इसके लिए उन्होंने अपने लोगों को अँधेरे में रख कर चंद्रशेखर मेहता से तार भी जोड़ लिए थे - किंतु उसका कोई फायदा नहीं हुआ और जितने नेगेटिव वोट विजय शिरोहा को पड़े, उतने ही नेगेटिव वोट राकेश त्रेहन को भी मिले | सभी का - पक्ष और विपक्ष के सभी लोगों का मानना है कि केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता ने मिल कर राकेश त्रेहन को उल्लू बनाया | राकेश त्रेहन के नजदीकियों को लगता है कि इससे राकेश त्रेहन को शायद सबक मिला हो कि केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता किसी भी तरह से विश्वास करने योग्य नहीं हैं | राकेश त्रेहन के कुछेक नजदीकियों को हालाँकि अभी भी शक है कि पता नहीं राकेश त्रेहन ने अब भी सबक सीखा है या नहीं ? केएल खट्टर ने अपनी उम्मीदवारी के आवेदन पर राकेश त्रेहन के हस्ताक्षर करवा लेने का जो विश्वास जताया है, उससे राकेश त्रेहन पर शक करने वाले नजदीकियों का शक और बढ़ गया है | सभी के लिए यह उत्सुकता का विषय है कि केएल खट्टर और उनके संगी-साथियों से बार-बार अपमानित होते रहने के बावजूद उनके साथ तार जोड़े रखने वाले राकेश त्रेहन अब भी उनके काम आयेंगे क्या ?
केएल खट्टर भी मजेदार व्यक्ति हैं | सिर्फ इसलिए ही नहीं कि जिन राकेश त्रेहन को वह बार-बार और तरह-तरह से अपमानित करते/करवाते रहे हैं, उन्हीं राकेश त्रेहन से वह समर्थन की उम्मीद भी कर रहे हैं; बल्कि इसलिए भी कि कई बार विभिन्न मौकों पर यह कह चुकने - कि लायनिज्म में आकर उन्होंने बड़ी गलती की और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनना तो उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल रही - के बावजूद अब वह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन की चुनावी दौड़ में शामिल हो गए हैं | हालाँकि उनके नजदीकियों का कहना है कि वह भी जानते हैं कि उनके चेयरपरसन बनने की तो कोई संभावना नहीं है, वह तो बस काउंसिल में किसी भी पद की जुगाड़ में हैं | लेकिन इसके लिए भी शामिल तो उन्हें चेयरपरसन पद की दौड़ में होना पड़ेगा | केएल खट्टर मान कर चल रहे हैं कि वह चेयरपरसन पद के लिए अपना दावा पेश करेंगे तब कहीं यह संभावना बनेगी कि वह काउंसिल में कोई पद पा लें | इस कोशिश में उनके लिए मुसीबत की बात यह रही कि जिन लोगों का उन्हें सहयोग और समर्थन चाहिए उन लोगों तक उनकी बदनामी उनसे पहले पहुँची हुई थी | चेयरपरसन - या कुछ भी - बनने के लिए उन्होंने जिस किसी के यहाँ भी गुहार लगाई उसी ने उन्हें उलाहना दिया कि अपने डिस्ट्रिक्ट में तो कोई तुम्हारे साथ है नहीं - वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर फर्स्ट और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड तुम्हारे खिलाफ हैं; ऐसे में कैसे कुछ बनोगे ? मल्टीपल में लोगों को पता हो गया है कि केएल खट्टर ने अपने व्यवहार से अधिकतर लोगों को, खास करके काम के लोगों को अपने खिलाफ किया हुआ है | वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर फर्स्ट राकेश त्रेहन और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड विजय शिरोहा को तो छोड़िये, अभी हाल ही में जो सुभाष गुप्ता वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड पद के लिए चुने गए हैं और जिन्हें चुनवाने का श्रेय केएल खट्टर लेने का प्रयास करते रहे हैं, वह सुभास गुप्ता भी केएल खट्टर के कट्टर खिलाफ हो गए हैं | इसी का नतीजा है कि अपने चुने जाने की खुशी में सुभाष गुप्ता ने जो पार्टी दी न तो उसमें उन्होंने केएल खट्टर को बुलाया और न अपने एक पारिवारिक समारोह में उन्हें निमंत्रित करने की जरूरत समझी | सुभाष गुप्ता का कहना है कि केएल खट्टर ने उम्मीदवार के रूप में उन्हें तरह-तरह से जमकर चूसा और हर तरह से तंग किया |
केएल खट्टर की (कु)ख्याति चूँकि मल्टीपल के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में जा पहुँची है, इसलिए उन्हें कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; लेकिन फिर भी उन्हें उम्मीद है कि उन्हें मल्टीपल काउंसिल में कोई न कोई पद मिल ही जायेगा | केएल खट्टर ने अपने नजदीकियों से कहा है कि मल्टीपल काउंसिल में पदों की बंदरबांट करने वाले नेताओं को उन्होंने पटा लिया है और उन्हें कुछ न कुछ अवश्य ही मिल जायेगा | अपने नजदीकियों से तो उन्होंने यहाँ तक दावा किया है कि राकेश त्रेहन यदि उनके आवेदन पर समर्थन-हस्ताक्षर नहीं भी करते हैं तो भी वह मल्टीपल काउंसिल में किसी न किसी पद पर होंगे ही | किंतु फिर भी वह राकेश त्रेहन को समर्थन-हस्ताक्षर के लिए पटाने में लग गए हैं, क्योंकि वह भी जान रहे हैं कि बिना राकेश त्रेहन के समर्थन-हस्ताक्षर के उनका दावा कमजोर पड़ेगा |
राकेश त्रेहन की खुशामद में केएल खट्टर को जुटा देख कर लोगों की उत्सुकता यह जानने को लेकर बढ़ गई है कि केएल खट्टर के हाथों तरह-तरह से अपमानित होते रहने वाले राकेश त्रेहन उनके लिए अपना समर्थन हस्ताक्षरित करेंगे या नहीं ?

Monday, April 9, 2012

मुकेश अरनेजा ने अपनी फितरत के अनुरूप ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर रमेश अग्रवाल से धोखा किया और रमेश अग्रवाल को पचास हजार रुपये की चपत लगवाई

नई दिल्ली | ललित खन्ना की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी की तैयारी की बात को रमेश अग्रवाल से छिपा कर मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल को जो 'धोखा' देने की कोशिश की है, उससे रमेश अग्रवाल ने अपने आप को ठगा हुआ पाया है | इस मुद्दे को लेकर रमेश अग्रवाल के दो नजदीकियों के बीच हुई बातचीत को सुना गया जिसमें एक ने कहा कि 'सुनते हैं कि डायन भी पड़ोस का एक घर छोड़ देती है, लेकिन मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल को भी नहीं छोड़ा'; दूसरे ने तुरंत चुटकी ली कि 'मुकेश अरनेजा डायन थोड़े ही हैं, वह क्यों एक भी घर छोड़े ?' उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल ने अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनने वाले लोगों को चिन्हित करने पर खासा जोर दिया हुआ है और उनके साथ 'लूटो और दूर दिखने की कोशिश करो' वाला संबंध अपनाया हुआ है | पेट्स में संभावित उम्मीदवार जा सकें इसके लिए संभावित उम्मीदवारों से पचास-पचास हज़ार रुपये अतिरिक्त बसूलने वाले रमेश अग्रवाल पेट्स में यह देख/जान कर हैरान रह गए कि वहाँ मुकेश अरनेजा के मुँहबोले ललित खन्ना भी अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बताते हुए अपना चुनाव अभियान चला रहे हैं | हैरान होने का कारण यह रहा कि रमेश अग्रवाल ने मिले फीडबैक के आधार पर जिन लोगों को अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार के रूप में चिन्हित किया है उनमें ललित खन्ना का नाम है ही नहीं | इसी कारण से उन्होंने संभावित उम्मीदवारों को दूर 'रखने' का जो नाटक रचा हुआ है, उस नाटक को वह ललित खन्ना के साथ नहीं रच पाये और न ही ललित खन्ना से वह पचास हज़ार रुपये बसूल कर पाये | रमेश अग्रवाल इस बात पर बहुत ही भन्नाए हुए रहे कि मुकेश अरनेजा ने उन्हें पचास हजार रुपये की चपत लगवा दी | ललित खन्ना ने जिस होशियारी के साथ अपने आप को रमेश अग्रवाल के हाथों लुटने से बचाया और रमेश अग्रवाल को उल्लू बनाया - रमेश अग्रवाल उसके पीछे मुकेश अरनेजा के 'धोखेबाजी के तरह-तरह के आइडियाज़ से भरे दिमाग' को जिम्मेदार मान रहे हैं | रमेश अग्रवाल को विश्वास है कि ललित खन्ना ने उनके साथ जो चाल चली है, उसे चलने की हिम्मत मुकेश अरनेजा ने ही उन्हें दी है |
रमेश अग्रवाल ही क्या, कोई भी यह नहीं स्वीकार करेगा कि ललित खन्ना ने पेट्स में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए जो अभियान चलाया उसकी उन्होंने पहले से तैयारी नहीं की होगी और उनकी उस तैयारी के बारे में मुकेश अरनेजा को नहीं पता होगा | रमेश अग्रवाल के लिए शिकायत की और निराशा की बात यही है कि तमाम दवाबों व प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद उन्होंने मुकेश अरनेजा को इस विश्वास के भरोसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया था कि मुकेश अरनेजा कम-से-कम उन्हें धोखा नहीं देंगे; लेकिन मुकेश अरनेजा अपनी फितरत से बाज नहीं आये और उन्होंने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर रमेश अग्रवाल से धोखा किया | उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी की संभावना काफी समय से व्यक्त की जा रही थी | मुकेश अरनेजा ही लोगों को बताते थे कि ललित को तो वह जब चाहेंगे, तब उम्मीदवार बना देंगे | ललित खन्ना क्लब की राजनीति में मुकेश अरनेजा के प्रमुख सिपाही हैं और मुकेश अरनेजा की हिफाजत में तथा उनके कहने से किसी की भी ऐसी-तैसी करने को हमेशा तैयार रहते हैं | क्लब के लोगों का ही कहना है कि ललित खन्ना वैसे बहुत बढ़िया व्यक्ति हैं, बहुत मिलनसार हैं, बहुत मीठा बोलते हैं - लेकिन मुकेश अरनेजा की राजनीति को ज़माने के लिए वह किसी भी तरह का तांडव करने से पीछे नहीं रहते हैं | ललित खन्ना और मुकेश अरनेजा के बीच की जो केमिस्ट्री है, उसे जानने/पहचानने वाले लोगों को पूरा विश्वास है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी की तैयारी मुकेश अरनेजा की देख-रेख में ही संपन्न हुई होगी | रमेश अग्रवाल को भी यही विश्वास है और इसीलिए वह मुकेश अरनेजा द्धारा उनके साथ किए गए घटियापन को लेकर निराश और नाराज़ हैं |
ललित खन्ना और मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि ललित खन्ना अभी अपनी उम्मीदवारी की बात भले ही कर रहे हों और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हों - लेकिन दरअसल अभी वह स्थितियों का जायेजा ले रहे हैं | संभवतः इसीलिए उन्होंने और मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल को न बताया हो - उन्होंने तय किया हो कि वह पहले स्थितियों को समझ लें; और अभी पचास हजार रुपये रमेश अग्रवाल को देने से बच भी जाएँ | ललित खन्ना को जानने वाले लोगों का कहना है कि ललित खन्ना में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की इच्छा तो बहुत है, किंतु उम्मीदवार बनने की काबिलियत उनमें नहीं है | वह मुकेश अरनेजा के 'खाड़कू' की भूमिका तो अच्छे से निभा सकते हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार की 'जरूरतों' को पूरा करना उनके बस की बात नहीं है | मुकेश अरनेजा के चक्कर में ललित खन्ना ने अपनी स्थिति को हास्यास्पद ही बनाया हुआ है | इसका नज़ारा यह है कि पेट्स में तो ललित खन्ना ने अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के उम्मीदवार के रूप में पेश किया और समर्थन जुटाने के लिए अभियान चलाया, किंतु पेट्स के लिए रवाना होने से कुछ ही दिन पहले वह क्लब में प्रेसीडेंट नोमीनी बने | अब ऐसे व्यक्ति की राजनीतिक समझ या अक्ल को आप क्या कहेंगे जो जिस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर रहा होगा, उस वर्ष वह अपने क्लब का प्रेसीडेंट इलेक्ट होगा ? इसी बात से ललित खन्ना के नजदीकियों की इस बात में दम लगता है कि ललित खन्ना के बस की उम्मीदवार बनना है नहीं | यह बात शायद उन्हें भी पता है और इसीलिए उन्होंने रमेश अग्रवाल द्धारा मांगे जाने वाले पचास हजार रुपये होशियारी से बचा लिए | पचास हजार रुपये की 'दिन-दहाड़े' लगाई गई इस चपत के लिए रमेश अग्रवाल लेकिन ललित खन्ना की बजाये मुकेश अरनेजा को ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं |
|| रमेश अग्रवाल की धूर्तता का नायाब उदाहरण ||
नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने पेट्स में अपनी धूर्तता का एक नायाब नमूना प्रस्तुत किया | उन्होंने अपने भाषण में जोर देकर कहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव में किसी भी उम्मीदवार का पक्ष नहीं लेंगे और उम्मीदवारों से दूरी बना कर रखेंगे | उन्होंने अपनी टीम के सदस्यों को भी चेतावनी के लहजे में आगाह किया कि वह भी उम्मीदवारों से दूर रहें | यह सुनते ही लोगों में इस बात की चर्चा शुरू हो गई कि रमेश अग्रवाल यदि सचमुच इतने ही ईमानदार हैं तो फिर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवार यहाँ - पेट्स में क्यों आमंत्रित किए गए हैं ? रमेश अग्रवाल की कथनी और करनी का भेद साक्षात् लोगों के सामने था - लेकिन रमेश अग्रवाल की बेशर्मी का आलम यह था कि वह लगातार उम्मीदवारों से दूर रहने की बात किए जा रहे थे | पेट्स में संभावित उम्मीदवारों का कोई काम नहीं था, उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली थी, पेट्स में उनके उपस्थित होने का कोई कारण नहीं था - लेकिन फिर भी वह पेट्स में बुलाये गए थे | क्यों ? इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि पेट्स में उपस्थित होने की अनुमति देने के बदले में रमेश अग्रवाल ने संभावित उम्मीदवारों से पचास-पचास हजार रुपये अतिरिक्त बसूले | बेईमानी का - पैसे बसूलने का ऐसा नायाब तरीका इससे पहले किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने नहीं अपनाया है | 'रंगे हाथ' पकड़े जाने के बावजूद रमेश अग्रवाल द्धारा की जा रही उम्मीदवारों से दूरी बनाये रखने की बात को लोगों ने उनकी धूर्तता के एक नायाब सुबूत के रूप में ही देखा/पहचाना |

Wednesday, April 4, 2012

देखा असर ....................! रमेश अग्रवाल ने अपनी आलोचना से कुछ सबक तो सीखा है, लेकिन 'हेराफेरी' से वह सचमुच बाज आयेंगे क्या ?

नई दिल्ली | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को हेराफेरीपूर्ण तरीके से 'मौका' देने को लेकर रमेश अग्रवाल की चारों तरफ जो थू थू हुई, उससे सबक लेकर रमेश अग्रवाल ने पेट्स की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टीम के सदस्यों की अभी हाल ही में जो मीटिंग बुलाई उसमें उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाया | उल्लेखनीय है कि अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी होड़ से दूर और तटस्थ दिखाने के चक्कर में रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को अपनी टीम में शामिल करने से तो इंकार कर दिया, लेकिन अपने सभी कार्यक्रमों में उन्हें नियमित रूप से शामिल करते रहे | रमेश अग्रवाल ने गजब तो यह किया कि पहले ऐजी एंड डिस्ट्रिक्ट कोर टीम ट्रेनिंग सेमिनार में तथा बाद में डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमिनार (DTTS) में उन्होंने संभावित उम्मीदवारों को भी शामिल किया | सबसे पहले 'रचनात्मक संकल्प' ने यह सवाल उठाया था कि रमेश अग्रवाल ने जिन लोगों को अपनी टीम का सदस्य बनाने से इंकार कर दिया है, उन लोगों को 'कोर टीम सेमिनार' व 'डिस्ट्रिक्ट टीम सेमिनार' में आमंत्रित करने के पीछे आखिर उद्देश्य क्या है ? रमेश अग्रवाल के नजदीकियों के हवाले से ही 'रचनात्मक संकल्प' ने बताया था कि इसके पीछे उद्देश्य दरअसल संभावित उम्मीदवारों से पेट्स के लिए पैसा ऐंठना है | 'रचनात्मक संकल्प' में यह बात सामने आने के बाद रमेश अग्रवाल की चौतरफा आलोचना हुई | दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के रमेश अग्रवाल के साथी गवर्नर्स ने भी आश्चर्य से पूछना/कहना शुरू किया कि रमेश अग्रवाल बातें तो बड़ी ऊँची ऊँची करते हैं, हरकतें उनकी ऐसी हेराफेरी वाली हैं ? रमेश अग्रवाल को अपने डिस्ट्रिक्ट में भी पूर्व गवर्नर्स की आलोचना का शिकार होना पड़ा | पूर्व गवर्नर्स के साथ की गई मीटिंग में रमेश अग्रवाल ने होशियारी तो दिखाई कि नियम और व्यवस्था की बात करने वाले पूर्व गवर्नर्स को उन्होंने मीटिंग में बुलाया ही नहीं, और सिर्फ उन्हीं पूर्व गवर्नर्स को बुलाया जिनसे उन्हें उम्मीद थी कि वह उनकी आलोचना नहीं करेंगे | इतनी होशियारी करने के बाद भी रमेश अग्रवाल आलोचना से बच नहीं पाये | रमेश अग्रवाल की इस बात के लिए अच्छी खिंचाई हुई कि जिन लोगों को उन्होंने खुद ही तो अपनी टीम में शामिल नहीं किया, फिर क्यों उन्हीं लोगों को वह अपनी टीम के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए बुलाते हैं ?
रमेश अग्रवाल ने समझ लिया कि 'रचनात्मक संकल्प' ने जो मुद्दा उठाया उस मुद्दे का व्यापक असर हुआ है और उसने उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में और दूसरे डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स के बीच उनकी खासी फजीहत करा दी है | इससे उन्होंने सबक लिया और पहली बार - पहली बार उन्होंने अपने किसी कार्यक्रम में उन लोगों को शामिल नहीं किया जो उनकी टीम में नहीं हैं |
तो क्या रमेश अग्रवाल पर सचमुच असर हुआ है ? रमेश अग्रवाल वह नौटंकीपना अब नहीं दिखायेंगे जो अभी हाल तक वह दिखाते रहे हैं ?
रमेश अग्रवाल को जानने वाले लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल पर अभी असर होता हुआ जरूर दिखा है, लेकिन यह असर ज्यादा दिन तक बना नहीं रह पायेगा; क्योंकि रमेश अग्रवाल उन लोगों में से हैं जिनके बारे में मशहूर कहावत कही गई है कि 'चोर चोरी से जाये, पर हेराफेरी से न जाये' | रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि रमेश अग्रवाल ने पेट्स की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टीम के सदस्यों की मीटिंग में भले ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाया है, लेकिन पेट्स में संभावित उम्मीदवारों की उपस्थिति को आप अवश्य ही देखेंगे | पेट्स, जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि प्रेसीडेंट इलेक्ट सेमिनार है - जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट की उपस्थिति होनी होती है | इस कार्यक्रम को संभव बनाने तथा अच्छे से आयोजित करने के लिए कुछेक लोगों का सहयोग चाहिए होता है - जिन लोगों को सहयोग करने के लिए चुना जाता है उनकी उपस्थिति की बात भी समझ में आती है | लेकिन जिन लोगों को सहयोग के लिए नहीं चुना जाता, जिन लोगों का पेट्स में कोई काम नहीं है - पेट्स में उनकी उपस्थिति का क्या अर्थ है ? पेट्स की तैयारियों से जुड़े रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों का पेट्स में कोई काम नहीं है, पेट्स की तैयारी से जुड़ी मीटिंग में रमेश अग्रवाल ने उन्हें बुलाया भी नहीं - लेकिन पेट्स में वह उपस्थित होंगे | इसलिए होंगे - क्योंकि रमेश अग्रवाल उनसे मोटा पैसा ऐंठ चुके हैं |
रमेश अग्रवाल लेकिन जिन संभावित उम्मीदवार से पैसा नहीं ऐंठ पाये - जैसे रवि भाटिया से, उन रवि भाटिया का पेट्स के लिए रजिस्ट्रेशन करने में अड़ंगे डाल रहे हैं | रवि भाटिया पेट्स में जा सकें इसके लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रयासों के बाद भी रवि भाटिया का पेट्स में जाना अभी तक तो मुश्किल ही बना हुआ है | इस तरह रमेश अग्रवाल ने 'दिखा' दिया है कि रोटरी को धंधा बना देने और पक्षपात करने जैसे आरोपों से बचने के लिए वह एक कदम आगे तो बढ़ाते हैं लेकिन फिर तुरंत ही दो कदम पीछे खींच लेते हैं - 'हेराफेरी' की आदत आसानी से छूटती जो नहीं |

Saturday, March 24, 2012

एच कृष्णामूर्ति की उम्मीदवारी की वापसी ने पंजाब नेशनल बैंक के शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स चुनाव को संदेहास्पद बनाया

चंडीगढ़/नई दिल्ली | पंजाब नेशनल बैंक में शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स के चुनाव की प्रक्रिया को लेकर शिकायत की गई है | एक उम्मीदवार एच कृष्णामूर्ति द्धारा चुनाव से चार दिन पहले नाम वापस लेने को आधार बनाते हुए चंडीगढ़ की संस्था 'एसोसियेशन ऑफ कंपनी मैनेजमेंट' द्धारा मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स तथा मिनिस्ट्री ऑफ फाईनेंस को लिखी शिकायत में कहा गया है कि चुनाव में बैंक प्रबंधन की दिलचस्पी से नाराज होकर ही एच कृष्णामूर्ति ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेने का फैसला किया था | उल्लेखनीय है कि पंजाब नेशनल बैंक में शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स के तीन पदों के लिए ग्यारह उम्मीदवारों के नामांकन सही घोषित किए गए थे | बैंक की नोमीनेशन कमेटी ने करीब एक माह पहले लखनऊ से गोपालकृष्ण लाठ, कच्छ से पंकज ठक्कर, चंडीगढ़ से डीके सिंगला, बंगलौर से एच कृष्णामूर्ति, जयपुर से सुभाष चंद्र बापना, गाजियाबाद से विनय मित्तल और सुनील गुप्ता, नई दिल्ली से महेश प्रसाद मेहरोत्रा तथा पंकज अग्रवाल, कानपुर से श्रीकांत मिश्र तथा मुंबई से माधवन नायर गोपीनाथ के नामांकनों को 'फिट एंड प्रोपर' घोषित किया था | प्रत्येक उम्मीदवार अपनी-अपनी क्षमता व अपने-अपने तरीके से वोट जुटाने तथा अपनी जीत को सुनिश्चित करने की कोशिश में लगा था - शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स के चुनाव में पर्दे के पीछे जैसा जो खेल होता है वह खेल शांतिपूर्वक चल रहा था कि चुनाव से चार दिन पहले एच कृष्णामूर्ति ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर शांतिपूर्वक चल रहे खेल में हलचल मचा दी | मजे की बात यह है कि एच कृष्णामूर्ति ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेने का कोई कारण नहीं बताया है लेकिन उनसे परिचित होने का दावा करने वाले लोगों का कहना रहा कि शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स के चुनाव में पंजाब नेशनल बैंक प्रबंधन को खुली दिलचस्पी लेते देख एच कृष्णामूर्ति को चुनाव में खुला पक्षपात होता हुआ नज़र आया और अपना विरोध दर्ज कराने के उद्देश्य से ही उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को चुनाव से चार दिन पहले वापस ले लिया |
एच कृष्णामूर्ति द्धारा अपनी उम्मीदवारी वापस लेने से पंजाब नेशनल बैंक के शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स के चुनाव संदेह के खुले घेरे में आ गए - क्योंकि जो भी उम्मीदवार थे उनमें एच कृष्णामूर्ति की एक अलग और खास हैसियत व पहचान है | टीचिंग, रिसर्च व कंसल्टिंग में तीस से अधिक वर्षों का अनुभव रखने वाले एच कृष्णामूर्ति ने मद्रास यूनीवर्सिटी से बीई (आनर्स) तथा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से एमई किया है | वह इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के सुपरकम्प्यूटर एजूकेशन एंड रिसर्च सेंटर में प्रिंसीपल रिसर्च साइंटिस्ट के पद पर हैं | कम्यूनिकेशन, नेटवर्किंग और बैंकिंग टेकनोलॉजी उनकी दिलचस्पी और सक्रियता के विषय व क्षेत्र हैं | पिछले पंद्रह वर्षों से वह कई सरकारी संस्थाओं में सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं | टेक्नीकल एडवाइजरी ग्रुप तथा टेक्नोलॉजी से संबद्ध स्टैंडिंग कमेटी में सदस्य के रूप में वह आरबीआई, सेबी और इरडा जैसी संस्थाओं से जुड़े हैं | आई डी आर बी टी की गवर्निंग काउंसिल में वह वर्ष 2002-05 में सदस्य रह चुके हैं तथा अब यहाँ स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं | आई डी आर बी टी के भविष्य के लिए रोडमेप तैयार करने के उद्देश्य से हाल ही में गठित डॉक्टर सी रंगराजन कमेटी के वह सदस्य बनाये गए हैं | पेट्रोलियम, कोल व स्टील क्षेत्र की कई कंपनियों को वह टेक्नीकल सुझाव व सलाह देते रहे हैं तथा सलाहकार के रूप में वह बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र की कई संस्थाओं में भी सक्रिय रहे हैं |
एक अलग और खास हैसियत व पहचान रखने वाले एच कृष्णामूर्ति के नाम वापस लेने के साथ ही पंजाब नेशनल बैंक में हुए शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स के चुनाव संदेह के घेरे में आ गए | एच कृष्णामूर्ति के नाम वापस लेने को ही आधार बनाते हुए चुनावी प्रक्रिया की और उसमें बैंक प्रबंधन की भूमिका की जाँच की मांग उठने लगी है | चंडीगढ़ की संस्था 'एसोसियेशन ऑफ कंपनी मैनेजमेंट' द्धारा मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स तथा मिनिस्ट्री ऑफ फाईनेंस को लिखे अपने पत्र में शेयरहोल्डर्स डायरेक्टर्स के चुनाव में पंजाब नेशनल बैंक प्रबंधन की भूमिका की जाँच की मांग की गई है |

Tuesday, March 13, 2012

संभावित उम्मीदवारों से पैसे एँठने की कोशिश में रमेश अग्रवाल ने अपने ही बनाये नियम की धज्जियाँ उड़ाईं

नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल बड़ी-बड़ी बातें करते-करते अब छोटी-छोटी हरकतों को करने पर उतर आये हैं | रमेश अग्रवाल ने 'दिखाया' था और दावा किया था कि उनके गवर्नर-काल में जो रोटेरियन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे होंगे, उन्हें वह अपनी टीम का सदस्य नहीं बनायेंगे और डिस्ट्रिक्ट के आधिकारिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति को प्रोत्साहित नहीं करेंगे | लेकिन अभी हाल ही में संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमिनार(डीटीटीएस) में ऐसे रोटेरियंस उपस्थित व सक्रिय दिखे जो रमेश अग्रवाल के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी करते देखे/सुने जा रहे हैं | और यह तब हुआ जब रमेश अग्रवाल ने इन रोटेरियंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में चिन्हित करते हुए इन्हें अपनी डिस्ट्रिक्ट टीम का सदस्य बनाने से इंकार कर दिया है | हर किसी के लिए हैरानी की बात रही कि रमेश अग्रवाल ने जब इन्हें अपनी डिस्ट्रिक्ट टीम में ही शामिल नहीं किया तब फिर इन्हें डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमिनार में क्या करने के लिए बुलाया ? रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि रमेश अग्रवाल इन लोगों से पैसे एँठने की फ़िराक में हैं और इसीलिए डिस्ट्रिक्ट टीम का सदस्य न होने के बावजूद इन्हें डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमिनार में बुलाया गया और इन्हें तवज्जो दी गई |
रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि रमेश अग्रवाल पेट्स (प्रेसीडेंट इलेक्ट ट्रेनिंग सेमिनार) के खर्चों को पूरा करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवारों की जेबें ढीली कराने की कोशिश में हैं और इसलिए खुद अपने द्धारा बनाई गई व्यवस्था के अनुसार जिन लोगों को उन्हें अपने कार्यक्रमों में शामिल नहीं करना चाहिए था, उन्हें चोर दरवाजे से शामिल कर लिया | रमेश अग्रवाल के इन्हीं नजदीकियों का कहना है कि रमेश अग्रवाल पेट्स में संभावित उम्मीदवारों से स्पॉन्सरशिप लेने की जुगाड़ बैठा रहे हैं, इसीलिए डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमीनार में उन्हें बुलाया गया | पेट्स की तैयारी से जुड़े लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को पेट्स में भी आमंत्रित करेंगे और उसके बदले में उनसे पैसे बसूलेंगे | लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल को यदि लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों के बिना उनका 'काम नहीं चलेगा' और उन्हें संभावित उम्मीदवारों से पैसे बसूलते रहना है और इसके लिए उन्हें अपने कार्यक्रमों में शामिल करते रहना पड़ेगा, तो उन्हें संभावित उम्मीदवारों को अपनी टीम में रख लेना चाहिए | लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल जो कर रहे हैं - उससे उनकी बेवकूफी, उनका दोहरा चरित्र, उनका पाखंड और उनका नौटंकीपना ही जाहिर हो रहा है | रमेश अग्रवाल ने अपनी इस तरह की हरकतों से अपना मजाक बनवा लिया है | पहले प्रेसीडेंट इलेक्ट मीटिंग में प्रेसीडेंट इलेक्ट को ही शामिल करने से इंकार करके उन्होंने अपने को बदनाम करवाया था, और अब डिस्ट्रिक्ट टीम में शामिल करने से इंकार किए गए लोगों को डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमीनार में बुला कर उन्होंने अपनी फजीहत करा ली है |
रमेश अग्रवाल की इस हरकत को लेकर कुछेक लोगों ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा से फरियाद की थी कि वह रमेश अग्रवाल को समझायें कि उनकी इस तरह की हरकतों से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा घटती है और डिस्ट्रिक्ट का नाम बदनाम होता है | मुकेश अरनेजा ने लेकिन यह कह कर मामले से पल्ला झाड़ लिया कि रमेश अग्रवाल ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया ही इस शर्त पर है कि वह उनके किसी फैसले में टांग नहीं अड़ायेंगे | मुकेश अरनेजा ने साफ कर दिया कि यदि वह रमेश अग्रवाल से कहेंगे कि इस तरह का शेखचिल्लीपना न करे तो वह मुझे ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा देगा - और मैं दोबारा से डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाया जाना नहीं चाहता हूँ | मुकेश अरनेजा ने कह दिया है कि रमेश अग्रवाल जो कर रहे हैं उससे उनकी ही बदनामी हो रही है, मेरा क्या जा रहा है - और यह भी कि मुझे तो सिर्फ एक ही चिंता करनी है कि मैं कहीं दोबारा से डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से न हटा दिया जाऊँ | मुकेश अरनेजा ने भी हालाँकि स्वीकार किया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को रमेश अग्रवाल ने यदि अपनी टीम में न रखने का फैसला किया है तो उन्हें अपने कार्यक्रमों में भी संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाना या शामिल करना चाहिए; और यदि संभावित उम्मीदवारों के बिना उनका काम नहीं चलना है तो संभावित उम्मीदवारों को उन्हें अपनी टीम में शामिल कर लेना चाहिए | हर किसी का यही मानना और कहना है कि रमेश अग्रवाल जो भी फैसला करना चाहें, करें - लेकिन वह अपने फैसले पर अमल करते हुए भी दिखें | अपने ही फैसलों की धज्जियाँ उड़ाते हुए उन्हें नहीं दिखना चाहिए - क्योंकि उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का और उनका खुद का मजाक बनता है |

Sunday, March 11, 2012

अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी ने डिस्ट्रिक्ट में मिली चुनावी हार से लगता है कि कोई सबक नहीं सीखा है

मुंबई | श्याम मालपानी और अरूणा ओसवाल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट से एंडोर्समेंट लेने वाले राजू मनवानी की उम्मीदवारी के खिलाफ अभियान में शामिल होकर लायन सदस्यों की निगाह में अपने आप को और नीचे गिरा लिया है | उल्लेखनीय है कि लायन राजनीति में यह शायद पहला मौका है जब लायनिज्म में अपनी पहचान रहने वाले लोग अपने ही डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्स किए गए उम्मीदवार के खिलाफ खुल कर काम कर रहे हैं | पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते श्याम मालपानी की और लायनिज्म में अच्छी-खासी दान-दक्षिणा देने के कारण अरूणा ओसवाल की अपनी पहचान है और आम लायन सदस्य उनसे टुच्ची बातों से ऊपर उठे होने की उम्मीद करते हैं | लेकिन इन्होंने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की बजाये - इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपने ही डिस्ट्रिक्ट द्धारा एंडोर्स किए गए उम्मीदवार राजू मनवानी की उम्मीदवारी के खिलाफ प्रचार करने के जरिये अपने आपको 'छोटा' साबित कर दिया है | उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ-साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने भी कहना शुरू कर दिया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के चलते इन दोनों ने पहले तो अपनी राजनीतिक फजीहत करवाई और अब यह दोनों एक लायन सदस्य के रूप में भी अपनी-अपनी किरकिरी करवाने में लगे हैं | इनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों तक का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए एंडोर्समेंट लेने के मामले में जो हुआ, उससे भी इन्होंने कोई सबक नहीं सीखा है और लगातार इस तरह की गतिविधियाँ चलाये हुए हैं कि लोगों के बीच समर्थन खोते जा रहे हैं | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि अपने डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्समेंट लेने के लिए अरूणा ओसवाल का राजू मनवानी से जो पहला चुनाव हुआ था, उसमें वह दो वोट से हारी थीं, लेकिन तीन-तिकड़म से दूसरे चुनाव की जो नौबत पैदा की गई उसमें वह पचास से भी ज्यादा वोटों से हारीं | इसका कारण यह रहा कि दूसरे चुनाव में अरूणा ओसवाल को ऐसे कई प्रमुख लोगों का समर्थन नहीं मिला, जो पहले चुनाव में उनके साथ थे | अरूणा ओसवाल और उनके तथाकथित शुभचिंतकों को सोचना चाहिए कि उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के जो लोग पहले चुनाव में उनके साथ थे, वह दूसरे चुनाव में उनका साथ क्यों छोड़ गए ?
अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी जैसे उनके समर्थकों ने लेकिन यह सोचने की कोई जरूरत नहीं समझी | लगातार दूसरे चुनाव में मिली पराजय से वह इस कदर बौखला गए कि जिन राजू मनवानी से उन्हें लगातार दूसरी बार मात मिली, उन राजू मनवानी को उन्होंने अपना निजी दुश्मन मान लिया और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वह खुलेआम राजू मनवानी को हरवाने की कोशिशों में लग गए हैं | डिस्ट्रिक्ट में उनके समर्थक लोगों का ही मानना और कहना है कि अपनी जिस 'सोच' के कारण अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी ने अपने डिस्ट्रिक्ट में अपनी फजीहत करवाई और अपने समर्थकों को खोया, उस 'सोच' से वह अभी भी मुक्त नहीं हो पाए हैं | उनके समर्थक रहे लोगों का मानना और कहना है कि अरूणा ओसवाल तथा श्याम मालपानी जैसे उनके समर्थक राजू मनवानी से मिली पहली पराजय को यदि एक सच्चे लायन की तरह स्वीकार कर लेते तो उन्हें दूसरी बार मिली पराजय से हुई फजीहत को नहीं झेलना पड़ता | चुनाव को लेकर एक 'व्यावहारिक आदर्श' की बात यह स्वीकार की जाती है कि चुनाव जीतने के लिए चाहे जो हथकंडा आजमा लिया जाये, चुनावी नतीजे को आदर और बड़प्पन के साथ स्वीकार कर लिया जाना चाहिए | अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा लिए/दिए गए फैसले के प्रति लेकिन न कोई आदर दिखाया और न कोई बड़प्पन | यह ठीक है कि उन्होंने जो कुछ किया वह उनका कानूनी अधिकार था और उनके इस अधिकार का सम्मान किया ही जाना चाहिए | अरूणा ओसवाल ने अपनी पराजय के फैसले को चुनौती दी, तो यह उनका कानूनी अधिकार था | उन्हें अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करने का पूरा हक़ था | यहाँ समझने की बात सिर्फ इतनी सी है कि जो लोग 'सेवा' और 'फैलोशिप' की बात करते हैं, उन्हें लोगों के फैसले को कानूनी दांव-पेंचों में नहीं उलझाना चाहिए | लोग इस तरह की हरकतों को पसंद नहीं करते हैं | कानूनी दांव-पेंचों का सहारा लेकर अरूणा ओसवाल डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा लिए/दिए गए फैसले को रद्द करवा देने में तो सफल हो गईं, लेकिन लोगों का विश्वास और समर्थन उन्होंने खो दिया | इसी का नतीजा रहा कि दूसरी बार हुए चुनाव में उनकी हार का अंतर पच्चीस गुना तक बढ़ गया |
अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी जैसे उनके समर्थकों ने पहली बार जो गलती की, वह उनके लिए ट्रैजडी साबित हुई - लेकिन उस गलती से सबक न लेते हुए वह दूसरी बार भी वही गलती कर रहे हैं, तो यह उनके लिए कॉमेडी साबित हो रही है | अपने ही डिस्ट्रिक्ट के होने के बावजूद यह दोनों जिस तरह राजू मनवानी की उम्मीदवारी के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं, उसे देख कर लोग इन पर हंस रहे हैं | लोगों का कहना है कि यह दोनों जब डिस्ट्रिक्ट में राजू मनवानी का कुछ नहीं कर पाए तो अब मल्टीपल में क्या कर लेंगे ? राजू मनवानी की खिलाफत करने के जरिये इन्होंने मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि जो अपने डिस्ट्रिक्ट के नहीं हो सकते हैं, वह दूसरों के क्या होंगे ? लोगों का कहना है कि इन्हें यदि राजू मनवानी पसंद नहीं हैं तो इन्हें राजू मनवानी की उम्मीदवारी का विरोध करने का पूरा-पूरा हक़ है, लेकिन इन्हें साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि राजू मनवानी उस डिस्ट्रिक्ट के उम्मीदवार हैं जिस डिस्ट्रिक्ट में यह भी हैं और जिस डिस्ट्रिक्ट ने इन्हें पद और पहचान दी है - इसलिए इन्हें डिस्ट्रिक्ट के फैसले का सम्मान और पालन करना चाहिए | लोगों का कहना है कि अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी को यदि अपने ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा राजू मनवानी के पक्ष में लिया/दिया गया फैसला पसंद और मंजूर नहीं है तो इन्हें डिस्ट्रिक्ट को छोड़ देना चाहिए - बजाये इसके कि यह अपने ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्धारा लिए/दिए गए फैसले के विरोध में खड़े दिखाई दें |
किसी भी चुनावी राजनीति में - और इस तरह लायन राजनीति में भी उम्मीदवारों को अपने 'नजदीकियों' के धोखे और विरोध का सामना करना ही पड़ता है | इसलिए यदि राजू मनवानी को अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी के विरोध का सामना करना पड़ रहा है तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है | राजू मनवानी को अपने डिस्ट्रिक्ट के और भी कुछेक लोगों के छिपे/खुले विरोध का सामना करना पड़ रहा है | इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी मुकाबले में उनके प्रतिद्धंद्धी ओम अग्रवाल को भी अपने डिस्ट्रिक्ट के कई एक लोगों के विरोध को झेलना पड़ रहा है | लेकिन अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी का मामला अलग है | लायनिज्म में यह दोनों बड़े नाम हैं और इनकी खास पहचान है | इसलिए यह जिस तरह अपने ही डिस्ट्रिक्ट के उम्मीदवार राजू मनवानी का विरोध कर रहे हैं, उसकी इनसे उम्मीद नहीं की जाती है | मजे की बात यह है कि इनके विरोध को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है : राजू मनवानी के समर्थक और ओम अग्रवाल के समर्थक इस बात पर एकराय हैं कि अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी जब अपने ही डिस्ट्रिक्ट में राजू मनवानी का कुछ नहीं बिगाड़ सके और अपनी ही फजीहत करा बैठे तो इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव को कैसे क्या प्रभावित कर सकेंगे ? इस तरह अरूणा ओसवाल और श्याम मालपानी का रवैया उनकी खुद की किरकिरी ही कर/करवा रहा है तथा लायन सदस्यों की निगाह में उन्हें छोटा बना रहा है |

Wednesday, March 7, 2012

इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई ओम अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए चुनौतियाँ कम नहीं हैं

अहमदाबाद/मुंबई | ओम अग्रवाल को आगे करके राजू मनवानी को घेरने में लगे नेताओं की सक्रियता और हर हथकंडा आजमाने की तैयारी के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में खासी गर्मी पैदा हो गई है | राजू मनवानी से हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि मल्टीपल के बड़े नेताओं का एक तबका राजू मनवानी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता है और इसके लिए उस तबके ने पहले अरूणा ओसवाल को मोहरा बनाया; लेकिन जब अरूणा ओसवाल को सामने करके भी उन्हें मात खानी पड़ी, तो अब वह ओम अग्रवाल को ले आये हैं | ओम अग्रवाल की उम्मीदवारी को सबसे गंभीर आरोप यही झेलना पड़ रहा है कि वह उम्मीदवार बने नहीं हैं - बल्कि उम्मीदवार उन्हें 'बनाया' गया है | उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए ओम अग्रवाल का नाम कभी भी चर्चा में नहीं था | अरूणा ओसवाल के लिए जब अपने डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्समेंट लेना संभव नहीं हुआ और उन्हें मल्टीपल के तमाम तुर्रमखां नेताओं के समर्थन के बावजूद राजू मनवानी के हाथों हार का सामना करना पड़ा - तो अपनी अपनी उम्मीदवारी को बढ़ा/दिखा रहे लोगों ने उन तुर्रमखां नेताओं का समर्थन जुटाने के लिए प्रयास किया | समर्थन मिला लेकिन उन ओम अग्रवाल को - जिनकी उम्मीदवारी की कहीं कोई चर्चा ही नहीं थी | ओम अग्रवाल और उनके समर्थक हालाँकि सफाई देते हुए बता रहे हैं कि ओम अग्रवाल तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए तबसे अपनी उम्मीदवारी जता रहे थे, जब वह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन थे | लेकिन पहले उन्हें नरेंद्र भंडारी का वास्ता देकर और फिर अरूणा ओसवाल का नाम लेकर अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत न करने के लिए मना लिया गया था - जिस कारण उनकी उम्मीदवारी की चर्चा लोगों के बीच नहीं हो सकी थी |
ओम अग्रवाल और उनके समर्थक जिस आरोप को धोने के लिए यह सफाई दे रहे हैं, वह आरोप इस सफाई से लेकिन और मजबूत ही हो रहा है | वह जो सफाई दे रहे हैं, उसका अर्थ भी यही निकल रहा है कि वह जब-जब उम्मीदवार होना चाहते थे, तब-तब बड़े नेताओं ने चूँकि उन्हें समर्थन नहीं दिया - उनकी बजाये पहले नरेंद्र भंडारी को और फिर अरूणा ओसवाल को दिया - इसलिए ओम अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत नहीं किया; लेकिन अब जब नेताओं ने उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए कहा तो वह उम्मीदवार बन गए हैं | मतलब साफ है कि ओम अग्रवाल उम्मीदवार बने नहीं हैं, बल्कि बनाये गए हैं | ओम अग्रवाल की एक व्यक्ति और एक लायन के रूप में बहुत तारीफ है - उनके काम को, उनके व्यवहार को, उनकी सामर्थ्य को, उनकी सोच को बहुत-बहुत ऊँचा बताया जा रहा है | ओम अग्रवाल के बारे में जो बताया जा रहा है, हो सकता है कि वह सच भी हो - लेकिन जो लोग उन्हें नहीं जानते हैं उनके सामने सवाल यही है कि ओम अग्रवाल जब इतने योग्य और प्रतिभाशाली हैं तो आज उनका गुड़गान कर रहे बड़े नेताओं ने उन्हें उस समय समर्थन क्यों नहीं दिया, जब वह उम्मीदवार बनना चाहते थे; उनकी जगह बड़े नेताओं ने पहले नरेंद्र भंडारी और फिर अरूणा ओसवाल को क्यों उम्मीदवार बनाया ? बड़े नेताओं ने क्या नरेंद्र भंडारी और अरूणा ओसवाल को उनसे ज्यादा योग्य और प्रतिभाशाली माना, और इसीलिए उनकी बजाये उन्हें उम्मीदवार बनाया ? लोगों के लिए यह समझना एक चुनौती बना हुआ है कि नरेंद्र भंडारी ने इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में किस योग्यता व प्रतिभा का परिचय दिया है ? हर किसी का मानना और कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में नरेंद्र भंडारी ने जो कुछ भी किया है, उसे तो कोई भी ऐरा-गैरा कर लेगा | अरूणा ओसवाल की लायन सदस्यों के बीच जो भी ख्याति है, वह सिर्फ और सिर्फ पैसे खर्च करने से जुड़ी है | तो क्या जो बड़े नेता पहले अरूणा ओसवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनवाने का 'ठेका' लिए हुए थे, और जिन्होंने अब ओम अग्रवाल को इंटरनेशनल चुनवाने के बीड़ा उठा लिया है - उनके लिए पैसा ही एकमात्र पैमाना है |
ऐसे में, ओम अग्रवाल के सामने चुनौती यह है कि जो लोग उन्हें अभी नहीं जानते हैं और उनकी प्रतिभा व योग्यता से परिचित नहीं हैं उन्हें वह यह बतायें/ समझायें कि जो बड़े नेता आज उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने का बीड़ा उठाये हुए हैं, उन्होंने पहले उनके मुकाबले नरेंद्र भंडारी तथा अरूणा ओसवाल को क्यों वरीयता दी ? किसी भी चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को दो 'दांत' चाहिए होते हैं : एक दिखाने के लिए और एक खाने के लिए | एक 'प्रतिभा' और 'योग्यता' उसे 'दिखाने' के लिए चाहिए होती है तथा एक 'प्रतिभा' और 'योग्यता' उसे 'इस्तेमाल' करना होती है | ओम अग्रवाल के सामने समस्या यह है कि जिस प्रतिभा व योग्यता को वह 'दिखाने' की कोशिश करते हैं उस पर सवाल खड़ा हो जाता है कि इस प्रतिभा और योग्यता के बावजूद जब वह अपने नजदीकियों व समर्थकों के बीच ही सेकेंड और थर्ड च्वाइस हैं, तो जो लोग उन्हें नहीं जानते हैं उनके बीच वह एकदम से फर्स्ट च्वाइस कैसे बनें ? अब रही उस प्रतिभा व योग्यता की बात, जिसे चुनाव जीतने के लिए 'इस्तेमाल' करना होता है - तो ओम अग्रवाल को लोगों की इस शंका का जबाव देना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का उम्मीदवार होने में ही उन्हें पाँच वर्ष क्यों लग गए ? और अब भी वह इसलिए उम्मीदवार हो सके हैं क्योंकि जिन लोगों से उन्हें अपनी उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिली है वह लोग जिन अरूणा ओसवाल को उम्मीदवार बनाना चाहते थे, वह अरूणा ओसवाल अपने डिस्ट्रिक्ट में ही एंडोर्समेंट नहीं ले सकीं और उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ से बाहर होना पड़ा | यानि ओम अग्रवाल मजबूरी में बनाये गए उम्मीदवार हैं |
ओम अग्रवाल उम्मीदवार भले ही मजबूरी में बने हों - लेकिन उन्होंने और उनका समर्थन करने वाले नेताओं ने पूरे दमखम के साथ इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लिया है | उन्हें पता है कि उनका चुनावी मुकाबला जिन राजू मनवानी के साथ है, उन राजू मनवानी की उम्मीदवारी की चर्चा लोगों के बीच काफी समय से है और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने को लेकर वह लोगों के बीच ठोस काम कर चुके हैं | राजू मनवानी की उम्मीदवारी की चूँकि पहले से सक्रियता रही है इसलिए अधिकतर जगहों पर लायन सदस्य उनके पक्ष में पोजीशन या तो ले चुके हैं और या हालात को समझने की कोशिश कर रहे हैं | ओम अग्रवाल की समस्या यह है कि अपनी उम्मीदवारी के बारे में देर से फैसला करने के कारण उनका दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के साथ कोई परिचय ही नहीं है | यही कारण है कि उन्हें अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में काम करने के लिए लायन ही नहीं मिल रहे हैं और उन्हें रिश्तेदारों की मदद लेनी पड़ रही है | जैसे कि अहमदाबाद में अपने डिस्ट्रिक्ट की कांफ्रेंस में एंडोर्समेंट लेने के अगले ही दिन ग्वालियर क्षेत्र में समर्थन जुटाने पहुंचे ओम अग्रवाल को अपने चुनाव की व्यवस्था की बागडोर किसी सक्रिय लायन सदस्य या नेता की बजाये अपने रिश्तेदार को सौंपनी पड़ी | इससे हालाँकि ओम अग्रवाल यह संदेश दे सके हैं कि चुनाव में वह हर किसी की मदद लेंगे | उन्होंने कई जगह कहा भी है कि चुनावी समर्थन जुटाने के लिए जो कुछ भी - जी हाँ जो कुछ भी करना होगा, उसे वह करेंगे | इससे एक बात साफ है कि 24 अप्रैल को होने वाला इंटरनेशनल डायरेक्टर पड़ का चुनाव खासा घमासानपूर्ण होगा |