Monday, March 30, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के लिए यह सवाल मुसीबत बना हुआ है कि पिछले वर्षों में वह जब अपने तीन तीन उम्मीदवारों को चुनाव नहीं जितवा सके और लगातार पराजित होते रहे हैं, तो इस बार कुँवर बीएम सिंह को चुनाव वह कैसे जितवा देंगे ?

वाराणसी । प्रभात चतुर्वेदी और कुँवर बीएम सिंह के बीच सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव से पहले की स्थितियों को लेकर प्रस्तुत की गईं अपनी रिपोर्ट्स पर 'रचनात्मक संकल्प' को दोनों ही पक्षों की आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है । मजे की बात है कि दोनों ही पक्षों का आरोप है कि 'रचनात्मक संकल्प' स्थिति की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर रहा है । कुँवर बीएम सिंह की तरफ के लोगों का आरोप है कि 'रचनात्मक संकल्प' कुँवर बीएम सिंह की स्थिति को कमजोर करके आँक रहा है, जबकि उनकी स्थिति बहुत ही मजबूत है । प्रभात चतुर्वेदी की तरफ के लोगों का आरोप है कि 'रचनात्मक संकल्प' प्रभात चतुर्वेदी की स्थिति की उस मजबूती को नहीं पहचान और 'दिखा' रहा है, जितनी मजबूत वह वास्तव में है । यूँ तो चूँकि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले हर चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार को पूरा पूरा भरोसा होता है कि चुनावी नतीजा उसके ही पक्ष में आयेगा और वही जीतेगा, इसलिए दोनों उम्मीदवारों के समर्थक नेता यदि अपनी अपनी जीत का दावा कर रहे हैं - तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है । लेकिन चुनाव जीतता तो कोई एक ही है - जाहिर है कि महत्व उम्मीदवारों के समर्थक नेताओं के दावे का उतना नहीं है, जितना दिखने वाली जमीनी सच्चाई का और बुनियादी सवालों के मिलने वाले जबावों का है ।
बहरहाल, पहले दोनों उम्मीदवारों के समर्थक नेताओं के दावों की पड़ताल करते हैं । कुँवर बीएम सिंह की तरफ से डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ लायन राधे मारवाह ने फोन करके 'रचनात्मक संकल्प' में प्रकाशित अभी तक की रिपोर्ट्स को एकतरफा बताते हुए सीधा दावा किया कि कुँवर बीएम सिंह को 150 के करीब वोट मिल रहे हैं । प्रभात चतुर्वेदी की तरफ के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर अशोक सिंह ने ईमेल भेज कर दावा किया कि प्रभात चतुर्वेदी को 130 से 150 के बीच वोट मिलेंगे । अब इनमें से किसके दावे को सही माना जाये ? या किसका दावा सही है, इसे नापने/समझने का आधार क्या हो ? हालाँकि इन दोनों लोगों ने अपने अपने दावे को लेकर अपने अपने आधार प्रस्तुत किए हैं । राधे मारवाह ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया कि कुँवर बीएम सिंह को इलाहाबाद में एक नितिन यशार्थ के क्लब को छोड़ कर बाकी सभी क्लब्स का समर्थन प्राप्त है; सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर में पूरा पूरा समर्थन है; गोरखपुर क्षेत्र और वाराणसी में आधे से ज्यादा वोट मिलेंगे; दक्षिण क्षेत्र में रेनुकूट को छोड़ कर बाकी सभी क्लब के वोट मिलेंगे । राधे मारवाह ने यहाँ तक दावा किया कि रेनुकूट के प्रभात चतुर्वेदी के क्लब के भी चार-पाँच वोट कुँवर बीएम सिंह को मिल सकते हैं । इस दावे के संदर्भ में उनका तर्क रहा कि रेनुकूट क्लब में हिंडाल्को वालों व गैर-हिंडाल्को वालों के बीच तनातनी रहती है, जिसका फायदा कुँवर बीएम सिंह को मिलेगा । प्रभात चतुर्वेदी को मिलने वाले वोटों का गणित बताते हुए डॉक्टर अशोक सिंह ने दावा किया कि प्रभात चतुर्वेदी को वाराणसी के 24 तथा इलाहाबाद के 5 क्लब्स के, सुल्तानपुर व प्रतापगढ़ के आधे-आधे तथा गोरखपुर के सभी वोट मिलेंगे । जौनपुर और दक्षिण क्षेत्र के ज्यादातर वोट प्रभात चतुर्वेदी के खाते में जाने का डॉक्टर अशोक सिंह ने दावा किया ।
कुँवर बीएम सिंह के संदर्भ में राधे मारवाह के दावे को और प्रभात चतुर्वेदी के संदर्भ में डॉक्टर अशोक सिंह के गणित पर यदि विश्वास किया जाये, तो वोटों की गिनती तीन सौ तक पहुँचती है । समस्या की बात लेकिन यह है कि वोट तो कुल 210 के आसपास ही हैं । राधे मारवाह भी और डॉक्टर अशोक सिंह भी वरिष्ठ व अनुभवी व्यक्ति हैं - हम विश्वास करते हैं कि दोनों में से कोई भी हवा में बात नहीं कर रहा है; और दोनों लोग जो दावा कर रहे हैं वह क्लब्स के पदाधिकारियों व अन्य प्रमुख सदस्यों से मिले फीडबैक के आधार पर ही उन्होंने बनाया होगा । यानि, बहुत से क्लब्स के पदाधिकारी दोनों उम्मीदवारों और उनके समर्थक नेताओं को समर्थन देने की बात कर रहे हैं । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में डिस्ट्रिक्ट के जो लोग दोनों को वोट देने की बात कह रहे हैं, उनका वोट वास्तव में जायेगा तो किसी एक को ही । उनका वोट सचमुच में किसे जायेगा, यह पहचानना/समझना उम्मीदवारों व उनके समर्थकों के साथ-साथ दूसरों के लिए भी बहुत मुश्किल है - मुश्किल क्या, असंभव ही है । यह पहचानना/समझना क्लब्स के स्तर पर ही मुश्किल और/या असंभव नहीं है, बल्कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के स्तर पर भी यही सीन है । डॉक्टर अशोक सिंह का दावा है कि 16 पूर्व गवर्नर्स प्रभात चतुर्वेदी के समर्थन में हैं; तो राधे मारवाह ने बताया कि 15 पूर्व गवर्नर्स कुँवर बीएम सिंह को वोट देंगे । यानि करीब 8/9 पूर्व गवर्नर्स ऐसे हैं, जो दोनों पक्षों को गोली दिए हुए हैं - और दोनों तरफ के लोग उन्हें अपने अपने साथ मान रहे हैं ।
जाहिर है कि चुनावी नतीजा हमेशा 'दिखने' वाले तथ्यों पर ही निर्भर नहीं होता है - वास्तव में वह कई 'छिपे' किस्म के तथ्यों पर आधारित होता है । हर चुनाव की एक अलग केमिस्ट्री होती है, हर वोट की भी एक अलग केमिस्ट्री होती है । वोट की और चुनाव की रहस्यमयी केमिस्ट्री का ताजा उदाहरण देखने के लिए दिल्ली के विधानसभा चुनाव को याद किया जा सकता है । लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें जीतने वाली और 70 विधानसभा सीटों में से 60 में सबसे आगे रहने वाली भारतीय जनता पार्टी - किसने कल्पना भी की होगी कि - मात्र सात महीने बाद हो रहे विधानसभा के चुनाव में कुल तीन सीट ही पा सकेगी । लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई के पिछले वर्षों के चुनावी परिदृश्य को याद करें, तो क्या यह बहुत रहस्यपूर्ण नहीं लगता कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जिस जगदीश गुलाटी/वीरेंद्र गोयल खेमे को खासा मजबूत माना/समझा जाता रहा है, उस खेमे के उम्मीदवार पिछले तीन चुनावों से लगातार हार रहे हैं ?
कुँवर बीएम सिंह और प्रभात चतुर्वेदी के बीच हो रहे चुनाव का नतीजा तो 12 अप्रैल को पता चलेगा, लेकिन वह नतीजा क्या हो सकता है - इसका कोई भी अनुमान परसेप्शन (अवधारणा) और सेंटीमेंट्स के आधार पर ही लगाया जा सकता है । कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की तरफ से अभी तक भी इस सवाल का कोई तर्कपूर्ण और संतोषजनक जवाब नहीं मिला है कि जगदीश गुलाटी/वीरेंद्र गोयल के नेतृत्व वाला जो खेमा पिछले वर्षों में अमित मोटवानी, प्रदीप जायसवाल, मुकेश पाठक को चुनाव नहीं जितवा सका है और लगातार पराजित होता रहा है, वह इस बार कुँवर बीएम सिंह को कैसे और क्यों चुनाव जितवा देगा ? एक और सेंटीमेंट कुँवर बीएम सिंह के समर्थकों के लिए बड़ी चुनौती है - कुँवर बीएम सिंह को इस बात से तो फायदा मिलता दिख रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आनंद श्रीवास्तव का समर्थन उनके साथ है; लेकिन फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश अग्रवाल और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुलस्यान को प्रभात चतुर्वेदी के साथ देखा/पहचाना जा रहा है । कुँवर बीएम सिंह के समर्थकों के लिए चुनौती इसलिए है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट के लोग मौजूदा गवर्नर की बजाये आने वाले गवर्नर के साथ ज्यादा रहना/दिखना पसंद करते हैं । यह बातें मुकाबले में कुँवर बीएम सिंह को पीछे धकेलती हैं । इन बातों के प्रभाव को निष्प्रभावी बनाने के लिए उनके समर्थक नेता हालाँकि प्रयास तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन उनके लिए मुसीबत की बात यह भी है कि प्रभात चतुर्वेदी के समर्थक नेता भी आश्वस्त होकर नहीं बैठे हुए हैं ।
दोनों उम्मीदवारों और उनके समर्थक नेताओं की सक्रियता को देखते हुए अधिकतर लोग - और वह लोग भी जिन्हें प्रभात चतुर्वेदी जीतते हुए दिख रहे हैं - मान रहे हैं कि चुनाव काँटे का है । जाहिर है कि अगले दस-बारह दिन खासी गहमा-गहमी वाले होंगे । अपने स्रोतों से मिलने वाले फीडबैक के जरिए इस गहमा-गहमी पर हमारी तो नजर होगी ही, आप भी फीडबैक देते रहेंगे तो स्थितियों को पहचानने/समझने में और मदद मिलेगी ।

Sunday, March 29, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में पेट्स में दिए जाने वाले गिफ्ट को स्पॉन्सर करने के मनमाने तरीके से लिए गए फैसले को लेकर फरीदाबाद में बबाल और निशाने पर विनय भाटिया

फरीदाबाद । पेट्स में प्रतिभागियों को दी जाने वाली किट के लिए गिफ्ट स्पॉन्सर करने को लेकर फरीदाबाद में बबाल हो गया है । पेट्स में जाने वाले लोगों के बीच इस बात को लेकर गहरी नाराजगी पैदा हो गई है कि तीन-चार लोगों ने मनमाने तरीके से गिफ्ट का खर्च उनके ऊपर डाल दिया है । उल्लेखनीय है कि तीन-चार लोगों ने मनमाने तरीके से फैसला किया और पेट्स में जाने वाले लोगों को गिफ्ट के खर्च के नाम पर पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये देने का फरमान सुना दिया गया है । इन लोगों की शिकायत है कि गिफ्ट स्पॉन्सर करने का फैसला लेते समय तो इनसे कोई सलाह नहीं ली गई; और अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए फरीदाबाद की तरफ से गिफ्ट स्पॉन्सर करने के लिए हामी भर दी । इस स्पॉन्सरशिप का पैसा कैसे इकठ्ठा हो, इसके लिए भी सभी की सलाह लेना जरूरी नहीं समझा गया - और मनमाने तरीके से स्पॉन्सरशिप के खर्चे का बोझ पेट्स में जाने वाले लोगों के सिर मढ़ दिया गया । पेट्स के गिफ्ट स्पॉन्सर करने को चूँकि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत होने वाली विनय भाटिया की उम्मीदवारी के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है, इसलिए जो बबाल पैदा हुआ है उसके निशाने पर विनय भाटिया भी आ गए हैं ।
दरअसल पिछले एक आयोजन में रवि दयाल के क्लब द्धारा गिफ्ट स्पॉन्सर करने के बाद से ही विनय भाटिया द्धारा भी अगले किसी आयोजन में गिफ्ट स्पॉन्सर करने की चर्चा थी । उल्लेखनीय है कि रवि दयाल को भी अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । ऐसे में यह स्वाभाविक रूप से जरूरी हो गया माना गया कि जो काम रवि दयाल ने किया, वही काम विनय भाटिया भी करें । इसी जरूरत के चलते पेट्स में गिफ्ट स्पॉन्सर करने की जिम्मेदारी फरीदाबाद के नाम पर ले ली गई । एक आम धारणा है कि इस तरह की स्पॉन्सरशिप से यदि किसी उम्मीदवार का नाम जुड़ा होता है तो उसका खर्च वह उम्मीदवार और या उसका क्लब ही वहन करता है । रवि दयाल के क्लब ने जो गिफ्ट स्पॉन्सर किए उसका खर्च रवि दयाल ने वहन किया या उनके क्लब ने - यह वह जानें; विनय भाटिया की तरफ से स्पॉन्सर किए जाने वाले गिफ्ट का खर्चा फरीदाबाद के लोगों के सिर पर जिस तरह से डाल दिया गया - उसे लेकर फरीदाबाद के लोगों के बीच ही नाराजगी है । नाराज लोगों का कहना है कि विनय भाटिया को अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के लिए जो उपक्रम करने हैं, उनका खर्चा उन्हें खुद ही उठाना चाहिए; और किसी काम में उन्हें यदि दूसरों की मदद चाहिए भी तो उस काम को लेकर उन्हें दूसरों से कम-से-कम बात तो करना चाहिए - खर्चा जबरदस्ती दूसरों पर थोपना तो नहीं चाहिए ।
इस बबाल के चलते फरीदाबाद में लोग अब यह कहने लगे हैं कि विनय भाटिया कुछेक ऐसे स्वयंभू नेताओं के चंगुल में फँस गए हैं, जो किसी के लिए भी कुछ भी कहने/सुनने को और फरीदाबाद के नाम पर कोई भी फैसला करने को अपना अधिकार मानते/समझते हैं । ऐसे ही लोगों के कहने में आकर विनय भाटिया ने पहले तो फरीदाबाद के लोगों से बिना विचार-विमर्श किए पेट्स में फरीदाबाद की तरफ से गिफ्ट स्पॉन्सर करने का फैसला कर लिया; और उसके बाद गिफ्ट का खर्च फरीदाबाद के लोगों के जिम्मे डालने में भी उनसे कोई विचार-विमर्श नहीं किया । लोगों का कहना है कि विनय भाटिया और उनके साथ लगे फरीदाबाद के स्वयंभू नेताओं की इस तरह की मनमानियों का विरोध हो सकता है कि लोग अभी खुल कर न करें, लेकिन विनय भाटिया को समझना चाहिए कि इस तरह की मनमानियों के चलते वह लोगों को अपने से दूर कर लेंगे - जिससे उन्हें चुनाव में समस्या होगी । विनय भाटिया के नजदीकियों को भी लगता है कि उनके सामने सचमुच में यह बड़ी चुनौती है कि फरीदाबाद में वह किसकी कितनी बात मानें और कब मानें ? विनय भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले दिल्ली के लोगों का भी मानना और कहना है कि फरीदाबाद में अपने ही समर्थक नेताओं के मनमाने रवैये के कारण विनय भाटिया फरीदाबाद के ही दूसरे लोगों के बीच जिस तरह से निशाना बनाये जाने लगे हैं - वह अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी के संदर्भ में कोई अच्छे संकेत नहीं हैं ।

Saturday, March 28, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में एलएलएम की ऊँची पढ़ाई का वास्ता देकर समर्थन जुटाने की कोशिश के चलते संदीप सहगल और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की बढ़ी मुसीबत के बीच अशोक अग्रवाल ने खासे धूमधाम के साथ उम्मीदवारी का पर्चा भरा

लखनऊ । संदीप सहगल को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए बेहतर उम्मीदवार बताने के लिए उनके पढ़े-लिखे होने का जो तथ्य इस्तेमाल किया गया, उसने लोगों के बीच उल्टा ही असर किया है । लोगों को यह कहने का मौका मिला है कि संदीप सहगल की जिस पढ़ाई को गर्व के साथ उनकी उपलब्धि के रूप में बताया जा रहा है, उसी पढ़ाई से जुड़े प्रोफेशन में ही वह फिर टिके क्यों नहीं रह सके और क्यों उन्हें दूसरे कामकाजों की तरफ जाना पड़ा ? इसी से सवाल पैदा होता है कि इस बात की क्या गारंटी है कि यदि उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी मिली तो कहीं वह ऐसा ही सौतेलापन अपनी गवर्नरी के साथ भी नहीं दिखायेंगे ? उल्लेखनीय है कि संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने उनके पढ़े-लिखे होने का वास्ता देकर उनके एलएलएम होने की जानकारी लोगों को दी । संदीप सहगल वकील हैं, यह तो लोगों को पता रहा है; लेकिन वह सिर्फ एलएलबी नहीं हैं, बल्कि उन्होंने उसके बाद एलएलएम तक की पढ़ाई भी की है - यह अधिकतर लोगों को नहीं पता था । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में किसी उम्मीदवार के एलएलएम की पढ़ाई करने या न करने का क्या मतलब हो सकता है - यह तो किसी को भी नहीं पता; लेकिन संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को ऐसा लगा कि यह जानकारी देकर वह लोगों के बीच संदीप सहगल के लिए समर्थन व स्वीकार्यता और बढ़ा लेंगे । किंतु उनका यह होशियारी भरा दाँव उल्टा पड़ गया है ।
लोगों के बीच चर्चा यह चली है कि महत्व इस बात का है कि एलएलएम की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने किया क्या ? लोगों को जो जानकारी है उसके अनुसार संदीप सहगल वकील होने के साथ-साथ कुछेक दूसरे काम-धंधे भी करते हैं । दूसरे काम-धंधों की तरफ संदीप सहगल को क्यों जाना पड़ा, इसकी कोई जानकारी तो लोगों को नहीं है - लेकिन लोगों का अनुमान है कि और ज्यादा कमाई के उद्देश्य से ही संदीप सहगल ने दूसरे काम-धंधों को अपनाया होगा । ऐसा करके उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है - लेकिन ऐसा करने के बाद उन्हें एलएलएम करने पर कम-से-कम इतराने का काम तो नहीं करना चाहिए । बहुत आदर्शात्मक तरीके से सोचें/देखें तो उन्होंने जो किया है उसे अपनी पढ़ाई के साथ विश्वासघात करने वाली श्रेणी में रखा जा सकता है । उन्होंने एलएलएम किया है तो वकालत के क्षेत्र में ही उन्हें झंडे गाड़ने चाहिए थे; वकालत के क्षेत्र में ही उन्हें नाम और दाम कमाने चाहिए थे । बहुत से लोग हैं जिन्होंने वकालत के क्षेत्र में ही नाम और दाम कमाए हैं । एक बार फिर दोहरायेंगे कि संदीप सहगल ने दूसरे काम-धंधों में हाथ आजमाया है, तो दुनियादारी के लिहाज से कुछ भी गलत नहीं किया है । सवाल सिर्फ यह है कि अपनी जिस ऊँची पढ़ाई पर वह पूरा भरोसा नहीं कर पाए; जीवन में उन्हें जो चाहिए था उसे वह अपनी पढ़ाई के प्रोफेशन से प्राप्त करने का हौंसला नहीं बनाये रख पाए - तब फिर अपनी उस पढ़ाई को एक उपलब्धि के रूप में दिखाने/जताने का मतलब आखिर क्या है ? जाहिर है कि उनकी ऊँची पढ़ाई उनके लिए एक सजावटी वस्तु से अधिक कुछ नहीं है ।
इसी से लोगों को यह कहने और पूछने का मौका मिला है कि संदीप सहगल ने जिस तरह अपनी पढ़ाई के साथ 'विश्वासघात' किया है और उसे मात्र एक सजावटी वस्तु बना कर रख छोड़ा है; कहीं वह - यदि मिली तो - डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी के साथ भी तो ऐसा नहीं करेंगे ? इस कहने/पूछने ने संदीप सहगल और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की मुसीबत बढ़ा दी है । मजे की बात यह हुई है कि संदीप सहगल की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों का ही कहना है कि यह मुसीबत संदीप सहगल और उनके समर्थक नेताओं ने खुद ही आमंत्रित की है । दूसरे कुछेक लोगों को लगता है कि एलएलएम वाली बात बता कर समर्थन जुटाने की कोशिश संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की बौखलाहट का सुबूत पेश कर रही है । समर्थकों का ही सुझाव है कि चुनाव-अभियान के अंतिम दिनों में संदीप सहगल और उनके समर्थक नेताओं को बहुत सावधानी से बातें करने की जरूरत है, और बौखलाहट में बेसिरपैर की बातें करने या तर्कबाजी करने से उल्टा असर हो सकता है - जैसा कि एलएलएम की जुमलेबाजी करने के चक्कर में हो गया है ।
संदीप सहगल और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेता जहाँ अपने द्धारा खुद बुलाई गई मुसीबत से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, वहाँ अशोक अग्रवाल ने अपने समर्थक नेताओं व क्लब्स के पदाधिकारियों व अन्य प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति के बीच सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का पर्चा भरा । पर्चा भरने के दौरान उनका हौंसला बढ़ाने के लिए तथा उनके प्रति अपने समर्थन को जाहिर करने के लिए दो सौ से ज्यादा लायन नेता व सदस्य मौजूद थे । यह संख्या इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि उस समय एक तरफ तो नवरात्र का त्यौहार था और उसके साथ साथ उस समय भारत व आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट के विश्व कप का सेमीफाइनल मैच खेला जा रहा था । इसके बावजूद अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन 'दिखाने' के लिए लखनऊ के दो सौ से अधिक लायन आये - इसे देख/जान कर अशोक अग्रवाल के खेमे में उत्साह और बढ़ा है । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए विशाल सिन्हा और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अशोक अग्रवाल द्धारा अपनी अपनी उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करने के दौरान के कुछ दृश्य इन तस्वीरों में देखे जा सकते हैं :






Friday, March 27, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनावी अभियान में प्रभात चतुर्वेदी से बुरी तरह पिछड़ते दिख रहे कुँवर बीएम सिंह की, कॉन्फ्रेंस चेयरमैन का पद बचाने की मजबूरी में सक्रिय हुए मंगल सोनी वाराणसी में कोई मदद वास्तव में कर सकेंगे क्या ?

वाराणसी । कॉन्फ्रेंस चेयरमैन पद से हटाने की धमकी का इस्तेमाल करने के जरिये मंगल सोनी को सक्रिय करने में जगदीश गुलाटी खेमे को जो कामयाबी मिली है, उसके कारण उनके खेमे में छाई हुई मुर्दनी कुछ कम हुई है और वह पुनः लोगों को उत्साहित करने में जुट गए हैं । उल्लेखनीय है कि मंगल सोनी की निष्क्रियता ने कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी का झंडा उठाये जगदीश गुलाटी खेमे को बुरी तरह निराश किया हुआ था । दरअसल वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते जगदीश गुलाटी खेमे के नेता मंगल सोनी पर निर्भर कर रहे थे । यूँ तो वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह की उपस्थिति को पिछले दिनों सघन बनाने तथा उनको सम्मानित करने की कार्रवाईयाँ हुई हैं; और दीपक वधावन व मुकुंदलाल टंडन जैसे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह के लिए वोट इकट्ठे करने के अभियान में भी लगे हुए थे, लेकिन जगदीश गुलाटी को इन दोनों पर भरोसा नहीं हो रहा था । भरोसे के लिए ही वह मंगल सोनी को सक्रिय होते हुए देखना चाह रहे थे । मंगल सोनी सक्रिय हों, इसके लिए जगदीश गुलाटी ने उन्हें कॉन्फ्रेंस चेयरमैन बनवा दिया था । जगदीश गुलाटी को विश्वास था कि कॉन्फ्रेंस चेयरमैन का पद पाकर मंगल सोनी उनके कहे अनुसार काम करने को तैयार हो जायेंगे । मंगल सोनी लेकिन कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के पक्ष में कुछ करते हुए दिखे नहीं । मंगल सोनी ने पहले तो एक पारिवारिक फंक्शन में व्यस्त होने का बहाना बनाया । पारिवारिक फंक्शन के हो जाने के बाद भी मंगल सोनी जब कुछ करते हुए नहीं दिखे, तब जगदीश गुलाटी का माथा ठनका ।
जगदीश गुलाटी को तब मंगल सोनी की 'बाँह मरोड़ने' की जरूरत महसूस हुई । इसी जरूरत को पूरा करते हुए मंगल सोनी को संदेश पहुँचा दिया गया कि वह यदि कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के काम में नहीं लगे तो कॉन्फ्रेंस चेयरमैन का पद उनसे वापस ले लिया जायेगा । यह धमकी काम कर गई और पद बचाने के लिए मंगल सोनी मैदान में कूद पड़ने के लिए मजबूर हुए । मंगल सोनी की देखरेख में वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह की तरफ से पार्टी करने की तैयारी शुरू हो गई है । इसके लिए बढ़िया होटल और बढ़िया कैटरर तय कर लिया गया है तथा प्रयास किए जा रहे हैं कि इस पार्टी में प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार प्रभात चतुर्वेदी के आयोजन में शामिल हुए लोगों से ज्यादा लोग इकठ्ठा हों । जगदीश गुलाटी खेमे का प्रयास है कि वाराणसी की मीटिंग में ज्यादा से ज्यादा लोगों की भीड़ को जुटाया जाये, ताकि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यह संदेश दिया जा सके कि वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के लिए भी अच्छा-खासा समर्थन है । 
वाराणसी में अशोक सिंह के नेतृत्व में प्रभात चतुर्वेदी के लिए समर्थन जुटाने की जो मुहिम चली/बनी है, और इस मुहिम को जिस तरह से जो सफलता मिलती दिखी है - उसके चलते जगदीश गुलाटी को कुँवर बीएम सिंह के लिए वाराणसी में मंगल सोनी और उनकी देखरेख में होने वाली पार्टी पर ही भरोसा रह गया है । जगदीश गुलाटी को लगता है कि बढ़िया होटल में बढ़िया खिला-पिला कर वह कुँवर बीएम सिंह को वाराणसी में वोट दिलवा देंगे । वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी की जिम्मेदारी मंगल सोनी द्धारा ले लेने के बाद से कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों में कुछ जोश तो भरा है, लेकिन इन समर्थकों में जो लोग राजनीति की हकीकत को समझते हैं उन्हें ज्यादा कुछ बदला या बदलता हुआ नहीं दिख रहा है । इनका कहना है कि मुकुंदलाल टंडन और दीपक वधावन आदि ने पहले से ही वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह के समर्थन में मोर्चा सँभाला हुआ था और यहाँ जितना जो समर्थन जुटाया जा सकता था, वह जुटा लिया था । मंगल सोनी के लिए इसमें कोई बढ़ोत्तरी कर पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही होगा । दरअसल मंगल सोनी का लोगों के साथ जो उपेक्षापूर्ण रवैया रहता है, वह जिस तरह लोगों से दूर दूर रहते हैं - उसके कारण लायन राजनीति में उनका जो प्रभाव पहले कभी था भी, वह धीरे-धीरे कम होता गया है ।
मंगल सोनी से ज्यादा जुगाड़ तो दीपक वधावन के पास है, जिसे उन्होंने अपनी सक्रियता से बनाया है । दीपक वधावन चूँकि सक्रिय रहते हैं, इसलिए लोगों के साथ उनके मेलजोल वाले संबंध हैं । वाराणसी में कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के लिए अभी तक जो समर्थन बना/मिला है, उसमें काफी हद तक दीपक वधावन का ही काम और सहयोग है । यह जरूर है कि मंगल सोनी के सक्रिय होने से दीपक वधावन द्धारा जुटाए गए समर्थन को मजबूती मिल गई है और वह विश्वसनीय बन गया है । यह बात सभी मानते और कहते हैं कि वाराणसी की चुनावी राजनीति में सक्रियता भले ही दीपक वधावन की ज्यादा हो - लेकिन साख, विश्वास और भरोसा उनकी तुलना में मंगल सोनी का ज्यादा है । इसलिए मंगल सोनी भले ही कुँवर बीएम सिंह के लिए वोटों का और जुगाड़ न कर सकें, लेकिन दीपक वधावन ने जो वोट जुटाए हुए हैं उन्हें पक्का करने का काम अवश्य ही कर लेंगे । समस्या किंतु यह है कि इतने भर से तो कुँवर बीएम सिंह का काम बनता हुआ नहीं दिख रहा है । वाराणसी में अशोक सिंह के नेतृत्व में प्रभात चतुर्वेदी की उम्मीदवारी के पक्ष में जो फील्डिंग सजाई गई है, तथा वाराणसी के अधिकतर पुराने और नए 'गवर्नरों' ने जिस तरह प्रभात चतुर्वेदी की उम्मीदवारी के समर्थन में मोर्चा सँभाला हुआ है, उससे निपट पाना और मुकाबला कर पाना कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के लिए खासा चुनौतीपूर्ण ही है ।
कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों के लिए डिस्ट्रिक्ट का दक्षिण क्षेत्र सबसे बड़ी मुसीबत बना हुआ है । यूँ तो यहाँ के सबसे बड़े नेता वीरेंद्र गोयल उनके समर्थन में हैं, लेकिन फिर भी इस क्षेत्र के करीब 40 वोटों में से 35 से ज्यादा वोट प्रभात चतुर्वेदी के पक्ष में जाते दिख रहे हैं । इलाहाबाद में जगदीश गुलाटी के जो विरोधी हैं उन्होंने कुँवर बीएम सिंह के खिलाफ मोर्चा सँभाल लिया है । डिस्ट्रिक्ट के दक्षिण क्षेत्र में तथा इलाहाबाद में कुँवर बीएम सिंह की स्थिति के पतली होने की जानकारी चूँकि वाराणसी के लोगों को भी मिल रही है, इसलिए उनमें यह फीलिंग आ रही है कि प्रभात चतुर्वेदी के समर्थन में रहने में ही फायदा है । वाराणसी के लायन सदस्यों के बीच फैला यह अंडरकरेंट कुँवर बीएम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है । ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कॉन्फ्रेंस चेयरमैन का पद बचाने के मजबूरी में सक्रिय हुए मंगल सोनी के नेतृत्व में एक बड़े होटल और एक बड़े कैटरर की जो सेवाएँ ली जा रही हैं, उसका कैसा/क्या असर पड़ेगा - और पड़ेगा भी कि नहीं ?

Wednesday, March 25, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए फरीदाबाद का पूरा पूरा समर्थन पाने के लिए विनय भाटिया के सामने केसी लखानी और नवदीप चावला के साथ साथ फरीदाबाद के दूसरे नेताओं को भी बराबर बराबर तवज्जो देने की चुनौती

फरीदाबाद । विनय भाटिया की अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी के समर्थन के संदर्भ में फरीदाबाद की एकता में सेंध लगने की आहट ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों को चौकन्ना कर दिया है । नवदीप चावला के पिता विश्वनाथ चावला के निधन का शोक मनाने जुटे फरीदाबाद के रोटेरियंस के बीच होने वाली चर्चाओं में शामिल रहे लोगों ने पाया कि विनय भाटिया फरीदाबाद में अपनी उम्मीदवारी का झंडा जिस तरह केसी लखानी को सौंपते हुए नजर आ रहे हैं, उससे कुछेक लोग अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं और विनय भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति उनके स्वर व तेवर बदले बदले से 'दिखने' लगे हैं । फरीदाबाद की चुनावी राजनीति को नजदीक से देखने/समझने वाले लोगों का कहना है कि फरीदाबाद में रोटरी - और रोटरी की राजनीति एक नई शक्ल लेने/बनाने की प्रक्रिया में है; और प्रक्रिया में होने के चलते वह बड़े नाजुक दौर में है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए विनय भाटिया की उम्मीदवारी इस नाजुकता को और नाजुक बना देती है । इसलिए लोगों को लगता है कि एक उम्मीदवार के रूप में विनय भाटिया को बहुत सावधानी के साथ अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान चलाना होगा ।
विनय भाटिया की उम्मीदवारी के संदर्भ में फरीदाबाद में उथल-पुथल का संकेत पाने वाले एक वरिष्ट रोटेरियन ने भारतीय परिवारों में रिश्तों में होने वाली उथल-पुथल का उदाहरण देकर मामले को समझने/समझाने का प्रयास किया । उनका कहना रहा कि परिवार में सभी रिश्तेदार आपसे तब तक खुश बने रहते हैं जब तक आप अपने बेटे की शादी नहीं करते हैं । बेटे की शादी में कई रिश्तेदार यह शिकायत करने लगते हैं कि उनका उचित सम्मान नहीं हुआ - और इस शिकायत के साथ वह नाराज हो जाते हैं । फूफा किस्म के रिश्तेदार शिकायत करने और नाराज होने वाले लोगों में सबसे ज्यादा तथा सबसे आगे होते हैं । विनय भाटिया अभी तक एक कार्यकर्ता थे, सभी के साथ मिलकर काम कर रहे थे - इसमें किसी के शिकायत करने और नाराज होने का कोई मौका ही नहीं था; मौका तो अब आया है जब वह उम्मीदवार बने हैं । रोटरी के 'फूफा' लोग अब यह देखेंगे कि एक उम्मीदवार के रूप में विनय भाटिया उन्हें कितनी अहमियत दे रहे हैं । फूफा लोगों का नाटक यह भी रहता है कि उन्हें चाहें जितनी भी अहमियत दो, लेकिन फिर भी उन्हें शिकायत बनी ही रहती है ।
विनय भाटिया के लिए समस्या की बात इसलिए हुई है कि फरीदाबाद में रोटरी की राजनीति में केसी लखानी के रूप में एक नए 'फूफा' का अवतार हुआ है । केसी लखानी चाहते हैं कि उन्हें बड़ा फूफा माना जाए - उनकी इस चाहत को फरीदाबाद में लोगों ने पूरा भी कर दिया । इससे हालाँकि जो कुछेक लोग फरीदाबाद में रोटरी की राजनीति के फूफा बनने की लाइन में थे, उन्हें झटका लगा - किंतु इस झटके को उन्होंने झेल लिया । समस्या तब शुरू हुई जब केसी लखानी की ऊँगली पकड़ कर दूसरे लोग आगे आ गए तथा पहले वाले लोगों को उनके लिए जगह बनाने के लिए और पीछे हटना पड़ा । उल्लेखनीय है कि अभी करीब दो वर्ष पहले तक फरीदाबाद में रोटरी की राजनीति में जीतेंद्र गुप्ता और पप्पुजीत सिंह सरना का नाम आता था । धीरज भूटानी, मनमोहन गुप्ता, अमित अरोड़ा, तीरथराज अरोड़ा, सुधीर आर्य, सुमंत अवस्थी, जतिंदर सिंह छाबड़ा, सतीश गुसाईं, संदीप गोयल, आशीष गुप्ता, संतगोपाल गुप्ता, सुनील गुप्ता, विजय जिंदल, कृष्ण कौशिक, अमरजीत सिंह लाम्बा, जयप्रकाश मल्होत्रा, तजिंदर मलिक, राजेश मैंदीरत्ता, मनोहर पुनिआनी, दिनेश रघुवंशी, जगदीश सहदेव, सुरजीत सिंह सैनी आदि को भी बड़ी भूमिका निभाने के लिए तथा अपने अपने लिए जगह बनाने के प्रयासों में सक्रिय होता देखा जा रहा था । नवदीप चावला ने लेकिन अचानक से प्रकट होकर इन सब को पीछे धकेल दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनोद बंसल ने नवदीप चावला को जो तवज्जो दी, तो फिर दूसरे लोग पीछे हो गए ।
नवदीप चावला ने छलाँग तो ऊँची लगाई, हालाँकि फिर भी राजनीतिक रूप से पप्पुजीत सिंह सरना और जीतेंद्र गुप्ता को माइनस करने में वह सफल नहीं हो पाए थे । इसका मौका उन्हें केसी लखानी के सक्रिय होने से मिला । प्रोफेशनल कारणों से नवदीप चावला को केसी लखानी के यहाँ दूसरों के मुकाबले ज्यादा तवज्जो मिली । इसका नतीजा यह हुआ कि केसी लखानी फरीदाबाद में रोटरी की राजनीति में जब सबसे बड़े फूफा बने तो नवदीप चावला को छोटे फूफा का दर्जा मिला और बाकी लोग उनकी हाँ में हाँ मिलाने की भूमिका निभाने वाले बन कर रह गए । अपनी अपनी भूमिकाओं और अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं से पीछे धकेल दिए गए इन लोगों को अपने समर्थन में बनाये रखना डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में विनय भाटिया के लिए वास्तव में गंभीर चुनौती होगी । नवदीप चावला के पिता विश्वनाथ चावला के निधन का शोक मनाने के लिए जुटे फरीदाबाद के रोटेरियंस के बीच जिस तरह की जो बातें हुईं उनमें विनय भाटिया के लिए यही चेतावनी छिपी महसूस की गई कि विनय भाटिया ने यदि केसी लखानी और नवदीप चावला पर भरोसा करने के साथ साथ दूसरे लोगों को इग्नोर करने का काम किया, तो उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में फरीदाबाद की एकता को वह दाँव पर लगाने का खतरा मोल लेंगे ।

Tuesday, March 24, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में लखनऊ क्षेत्र के ज्यादा से ज्यादा वोट जुटाने की कोशिशों के चलते अशोक अग्रवाल और उनके समर्थक नेताओं ने लखनऊ में जो सक्रियता बनाई और बढ़ाई है, उसे देखते हुए संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की चिंता और ज्यादा गहरा गई है

लखनऊ । लायंस विचार मंच द्धारा आयोजित आशीर्वाद समारोह में लायंस नेताओं और लखनऊ के क्लब्स के पदाधिकारियों तथा अन्य प्रमुख सदस्यों की जो भारी उपस्थिति देखने को मिली, उससे सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थक खासे गदगद हैं । उनकी तरफ से दावा किया गया है कि तीन-चार क्लब को छोड़ कर लखनऊ के बाकी सभी क्लब्स के पदाधिकारी या अन्य प्रमुख लोग इस समारोह में शामिल हुए; जो दिखाता है कि लखनऊ में अशोक अग्रवाल के लिए भारी समर्थन है । इस समारोह के बहाने प्रकट दिखे लखनऊ के समर्थन ने अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थकों को दरअसल इसलिए भी उत्साहित किया है क्योंकि लखनऊ में कुल वोटों के आधे से भी अधिक वोट हैं । उल्लेखनीय है कि चुनाव में दो सौ से कुछ कम वोट पड़ने हैं, जिनमें एक सौ से अधिक वोट लखनऊ के हैं । इस समारोह से लखनऊ में अशोक अग्रवाल का पलड़ा भारी होने का जो सुबूत दिखा/मिला है, उसे देख कर अशोक अग्रवाल के समर्थक बड़ी जीत का अनुमान लगा रहे हैं । 
 मजे की बात यह है कि संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक भी पहले से ही लखनऊ में अशोक अग्रवाल की बढ़त को पहचान और स्वीकार कर रहे थे । हालाँकि इस बढ़त का अंतर वह मामूली ही बता रहे थे । उनके अनुसार, लखनऊ में अशोक अग्रवाल को पचपन से साठ प्रतिशत समर्थन है । संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों को यद्यपि उम्मीद थी कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता के समर्थन के चलते वह इस अंतर को और कम कर लेंगे और संभव है कि वह लखनऊ में अशोक अग्रवाल से आगे भी निकल जाएँ । किंतु पिछले दिनों अपनी उम्मीदवारी के नामांकन के समय संदीप सहगल द्धारा किए गए शो और अब अशोक अग्रवाल के शो को जिन लोगों ने देखा है, उनका यही मानना और कहना है कि लखनऊ में अशोक अग्रवाल के साथ ज्यादा लोग व क्लब्स खड़े दिख रहे हैं । कितने ज्यादा - हालाँकि इसे लेकर मतभेद है । अशोक अग्रवाल के समर्थकों का दावा है कि लखनऊ में अस्सी प्रतिशत वोट उनके साथ हैं; लेकिन संदीप सहगल के समर्थक चालीस से पैंतालिस प्रतिशत वोटों पर अपना दावा अभी भी जता रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि अशोक अग्रवाल और संदीप सहगल - दोनों के समर्थक उन लोगों को अपने साथ मान रहे हैं, जो दोनों तरफ के आयोजनों में दिख रहे हैं । उल्लेखनीय है कि लखनऊ में कुछ लोग ऐसे हैं जो संदीप सहगल के कार्यक्रम में भी शामिल हुए और फिर अशोक अग्रवाल के समारोह में भी सक्रिय दिखे । दोनों उम्मीदवारों के समर्थक नेता ऐसे लोगों को अपने अपने साथ मान रहे हैं; और इसके पक्ष में तर्कपूर्ण तरीके से दावा कर रहे हैं कि ऐसे लोगों ने उन्हें आश्वस्त किया हुआ है कि वह दिखें चाहें जहाँ, वोट 'आप' ही को देंगे । संदीप सहगल के समर्थकों के सामने लेकिन एक बड़ी समस्या यह है कि जो लोग दोनों तरफ दिख रहे हैं, उनका वोट देने का आश्वासन तो चलो वह मान लें; लेकिन जो उनके यहाँ उपस्थित न होकर अशोक अग्रवाल के समारोह में दिखे हैं, उनके आश्वासन पर वह कैसे भरोसा करें ? दरअसल इसी तथ्य ने अशोक अग्रवाल के समर्थकों के दावे को ज्यादा व्यावहारिक माना है । लखनऊ में तो तटस्थ किस्म के लोग हैं, उनका आकलन है कि लखनऊ में अशोक अग्रवाल को सत्तर प्रतिशत वोट तो पक्के मिल रहे हैं । चुनाव में अभी जो दिन बचे हैं, उनमें वह अपने वोटों के प्रतिशत को और बढ़ा भी सकते हैं ।
संभवतः इसीलिए अशोक अग्रवाल के समर्थक नेताओं ने लखनऊ पर अपना सारा जोर लगा दिया है । उन्होंने अभी विचार मंच के नाम पर समारोह किया है । 26 मार्च को नामांकन के नाम पर लोगों के बीच अपनी पैठ को और मजबूत बनाने का काम होगा; और फिर उसके बाद भी एक मीटिंग करने की तैयारी की बात सुनी जा रही है । लखनऊ में इस तरह अशोक अग्रवाल के समर्थकों ने जो सक्रियता दिखाई है - या दिखाने की तैयारी की है, उसके कारण संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच चिंता पैदा हुई है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों का जो गणित है, उसमें लखनऊ का ज्यादा - ज्यादा क्या, बहुत ज्यादा महत्व है । संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेता जिस तराई क्षेत्र और अवध क्षेत्र के भरोसे हैं, वहाँ के वोटों की संख्या लखनऊ और शाहजहाँपुर के वोटों की संख्या के आधे से भी कम है । संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी यह गणित डराने लगा है कि तराई क्षेत्र और अवध क्षेत्र में सत्तर-पिचहत्तर प्रतिशत वोट यदि सचमुच में उन्हें मिल भी जाते हैं, तब भी जीतने के लिए लखनऊ-शाहजहाँपुर में पैंतालिस से पचास प्रतिशत वोटों का इंतजाम उन्हें करना ही होगा । लखनऊ में अशोक अग्रवाल और उनके समर्थक नेताओं की जो सक्रियता बनी और बढ़ी है, उसे देखते हुए संदीप सहगल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की चिंता और ज्यादा गहरा गई है ।




 


Sunday, March 22, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के खर्चे को लेकर शुरू हुए बबाल के पीछे मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए राजीव मित्तल की उम्मीदवारी के अभियान पर प्रतिकूल असर डालने और उनके अभियान को नुकसान पहुँचाने का उद्देश्य तो कहीं नहीं है ?

नई दिल्ली । राजीव मित्तल अपने गवर्नर-काल की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार बीएम शर्मा के खर्चे पर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की अपनी उम्मीदवारी का प्रमोशन करने के आरोप के घेरे में आ फँसे हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच यह आवाज उठी है, जो कई मौकों पर सुनी गई है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को राजीव मित्तल ने चूँकि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिहाज से डिजाइन और आयोजित किया, इसलिए उसमें हुए खर्चे को भी उन्हें शेयर करना चाहिए । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन में पिछले कुछ वर्षों से यह एक अलिखित नियम बना हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का खर्चा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के जिम्मे रहता है । इसी अलिखित नियम के चलते इस वर्ष की ड्रिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का खर्च इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार बीएम शर्मा के जिम्मे था । बीएम शर्मा इस खर्च को वहन करने के लिए तैयार थे और उन्होंने वह किया भी । समस्या लेकिन इस कारण से पैदा हुई कि बीएम शर्मा ने जितने खर्च की उम्मीद की थी, या हिसाब लगाया था - वास्तव में खर्चा उससे कहीं ज्यादा हुआ । माना/समझा यह गया कि यह खर्चा इसलिए ज्यादा हुआ, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राजीव मित्तल ने अपने गवर्नर-काल की इस डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन के रूप में डिजाइन और आयोजित किया ।
राजीव मित्तल ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के उम्मीदवार के रूप में मल्टीपल के नेता लोगों को अपना जलवा दिखाने के उद्देश्य से अपने गवर्नर-काल की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को डिजाइन किया तथा मल्टीपल के तमाम बड़े नेताओं की उपस्थिति को संभव करने का प्रयास किया । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जोए प्रेस्टन की उपस्थिति के चलते राजीव मित्तल के लिए मल्टीपल के नेताओं को अपने इस 'शो' तक खींच लाना आसान तो हुआ, लेकिन उनकी इस कवायद ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का खर्चा खासा बढ़ा दिया । इसका बोझ बीएम शर्मा की जेब पर पड़ा । बीएम शर्मा ने हालाँकि खर्चे को लेकर अपनी तरफ से कोई शिकायत नहीं की है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोग जिस तरह उनके साथ हमदर्दी दिखाते हुए राजीव मित्तल से डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के खर्चे में कंट्रीब्यूट करने की माँग कर रहे हैं, उससे लग रहा है कि अपने नजदीकियों के बीच उन्होंने शायद खर्चे को लेकर रोना रोया होगा । डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोगों को यद्यपि यह भी लगता है कि हो सकता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजीव मित्तल से किसी तरह की खुन्नस रखने वाले लोग बीएम शर्मा के साथ हमदर्दी दिखाने की आड़ में अपनी भड़ास निकाल रहे हों ।
राजीव मित्तल से डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के खर्चे में कंट्रीब्यूट करने की माँग करने वाले लोगों का 'टारगेट' चाहें जो हो, दूसरे कई लोगों को भी लगता है और वह कहते भी हैं कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को राजीव मित्तल ने जब मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल किया है - और उसके कारण डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के आयोजन में खर्चा ज्यादा हुआ है, तो ज्यादा हुआ खर्चा राजीव मित्तल को वहन करना ही चाहिए । इस तरह की बातों ने राजीव मित्तल के सहयोगियों व समर्थकों को परेशान किया हुआ है । उन्हें डर हुआ है कि इस तरह की बातें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए राजीव मित्तल की उम्मीदवारी के अभियान पर प्रतिकूल असर डालेंगी और उनके अभियान को नुकसान पहुँचाने का काम करेंगी । डिस्ट्रिक्ट में राजीव मित्तल के सहयोगियों व समर्थकों को यह आशंका भी है कि इस तरह की बातों के पीछे कहीं मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए राजीव मित्तल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का उद्देश्य ही तो नहीं है ? डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों के बीच भी यही सवाल चर्चा में है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में राजीव मित्तल को उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट में फँसाने/घेरने का लक्ष्य लेकर ही तो इस तरह की बातें नहीं हो रही हैं कहीं ?
यदि सचमुच ऐसा है, तो मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में अच्छी पटाखेबाजी होने का अनुमान लगाया जा रहा है ।