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Wednesday, March 15, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को सुशील गुप्ता की चेतावनी के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मजबूत समझे/देखे जा रहे उम्मीदवारों को लगे झटके से फायदा अनूप मित्तल को मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता द्धारा कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को चुनावी राजनीति में दिलचस्पी लेने के लिए लगाई फटकार ने संजीव राय मेहरा तथा रवि दयाल की मुसीबत बढ़ाने का काम किया, तो उनकी इस मुसीबत में अनूप मित्तल को अपनी दाल गलाने का मौका मिल गया । उल्लेखनीय है कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को जब यह पता चला कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स अपने अपने उम्मीदवारों को समर्थन दिलवाने के लिए सक्रिय हैं, तो वह बुरी तरह नाराज हुए और उन्होंने उन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से अपनी नाराजगी व्यक्त की; सुशील गुप्ता का कहना रहा कि राजनीतिक खेमेबाजी के कारण रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों के बीच डिस्ट्रिक्ट 3011 की पहले से ही बहुत बदनामी है, और निवर्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रविंद्रन पता नहीं किस 'दुश्मनी' के चलते डिस्ट्रिक्ट पर निगाह लगाए हुए हैं, इसलिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी लेना डिस्ट्रिक्ट के लिए भी और खुद उनके लिए भी आत्मघाती साबित हो सकता है । सुशील गुप्ता की चेतावनी रही कि जिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बारे में प्रतिकूल रिपोर्ट्स 'ऊपर' गईं, उन्हें रोटरी इंटरनेशनल के असाइनमेंट्स मिलना मुश्किल हो जायेंगे । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी सुशील गुप्ता ने अपनी इस चेतावनी को दोहराया । सुशील गुप्ता की इस चेतावनी का असर होता हुआ दिखा भी, और जो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स 'छिप-छिपा' कर भी इस या उस उम्मीदवार के समर्थन में कुछ करने के लिए सक्रिय होते देखे/सुने जा रहे थे, वह पीछे हटते देखे/सुने गए ।
इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दो उम्मीदवारों - संजीव राय मेहरा तथा रवि दयाल पर बहुत ही बुरा असर डाला है । संजीव राय मेहरा तो पूरी तरह दो-तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर निर्भर हैं, जिनके पीछे हटने से संजीव राय मेहरा का पूरा अभियान ही ठहर-सा गया है । रवि दयाल ने उम्मीदवार के रूप में अपनी तरफ से यूँ तो काफी मेहनत की है, किंतु उनकी मेहनत को स्वीकार्यता पाने के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के समर्थन की दरकार है । दरअसल पिछले रोटरी वर्ष में चुनावी मुकाबले में पिछड़ जाने पर उन्होंने जिस तरह से कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगा कर उन्हें निशाना बनाया था, उसके कारण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनके खिलाफ रहे हैं । रवि दयाल के सामने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की इस खिलाफत और नाराजगी को दूर करने की गंभीर चुनौती है । सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की नाराजगी दूर करने की बजाए रवि दयाल की तरफ से आसान रास्ता यह निकाला गया कि उनके पक्के वाले समर्थक समझे जाने वाले दो-तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय होंगे, तो उनके प्रति नाराजगी और खिलाफत वाला परसेप्शन खत्म हो जायेगा और उनकी उम्मीदवारी के प्रति स्वीकार्यता का भाव पैदा होगा । किंतु सुशील गुप्ता की चेतावनी के चलते सब गुड़ गोबर हो गया लगता है ।
संजीव राय मेहरा और रवि दयाल की इस मुसीबत में अनूप मित्तल को अपनी दाल गलाने का मौका मिल गया । यूँ तो अनूप मित्तल की उम्मीदवारी को भी सात-आठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का सहयोग और समर्थन मिल रहा है, लेकिन वह पूरी तरह उन्हीं के समर्थन के भरोसे नहीं हैं । अनूप मित्तल की तरफ से होशियारी यह की गई कि समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से उन्हें जो फायदा हो सकता है, वह फायदा उनका नाम लेकर लेने का प्रयास अनूप मित्तल ने खुद किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स कहीं सीन में भी नहीं आए - और इस कारण वह बदनामी से तथा सुशील गुप्ता की फटकार खाने से भी बचे और उन्होंने काम भी 'कर लिया' । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से मिले सहयोग और समर्थन को अपनी सक्रियता तथा अपने प्रबंधन से अनूप मित्तल ने जिस तरह संयोजित किया, उसी का नतीजा रहा कि फरीदाबाद और रोहतक में जो प्रमुख होली मिलन कार्यक्रम हुए, उनमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल ही आमंत्रित किए गए । दिल्ली में तीन-चार बड़े और प्रमुख क्लब्स ने सदगुरु का जो कार्यक्रम आयोजित किया, उसमें भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल ही आमंत्रित हुए और पहुँचे ।
फरीदाबाद, रोहतक और दिल्ली के बड़े व प्रमुख क्लब्स के आयोजनों में जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल को ही उपस्थित देखा/पाया गया - और यह जाना गया कि इन आयोजनों में आमंत्रित ही एक अकेले उन्हीं को किया गया है; उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल की उम्मीदवारी का महत्त्व बढ़ गया । इसके अलावा, एक बड़ा काम यह और हुआ कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवारों - खासकर संजीव राय मेहरा, रवि दयाल और सुरेश भसीन ने जिस तरह फरीदाबाद व रोहतक के वोटरों पर निर्भरता दिखाई, उससे दिल्ली में इनके प्रति विरोध का भाव बना - और इसका फायदा अनूप मित्तल को मिलता नजर आ रहा है । दिल्ली के छह/सात प्रमुख क्लब्स ने पिछले दिनों एक मीटिंग की, जिसमें करीब 25/26 क्लब्स के प्रेसीडेंट्स उपस्थित हुए - जिसमें इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गई कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार समझने लगे हैं कि वह फरीदाबाद व रोहतक के वोटों से ही गवर्नर चुन लिए जायेंगे और इस तरह वह दिल्ली के क्लब्स की ताकत को कम करके देखते हैं । इस मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल को ही आमंत्रित किया गया था । इससे अनुमान लगाया गया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों द्धारा अपनी उपेक्षा को लेकर दिल्ली के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के बीच जो नाराजगी है, वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल की उम्मीदवारी के लिए जैसे वरदान का काम कर रही है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में हाल-फिलहाल के दिनों में जो घटना-चक्र रहा है, और कुछेक घटनाओं के कारण जिस तरह पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए चेतावनी घोषित करना पड़ी है, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मजबूत समझे/देखे जा रहे उम्मीदवारों को तगड़ा झटका लगा है - और इसका फायदा अनूप मित्तल को मिलता हुआ दिखा है । इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Saturday, March 11, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में संजीव राय मेहरा के चक्कर में विनय भाटिया की फरीदाबाद में हुई फजीहत अनूप मित्तल के लिए वरदान बन गई

फरीदाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया ने फरीदाबाद में संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की मुहिम के बुरी तरह फेल हो जाने के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहरा कर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में फरीदाबाद के रोटेरियंस का नेता बनने और 'दिखने' की विनय भाटिया की कोशिश जिस तरह उन्हें ही उल्टी पड़ी है, और फरीदाबाद में वह जिस तरह अलग-थलग पड़े हैं - और अपनी इस फजीहत को छिपाने के लिए उन्होंने जिस तरह विनोद बंसल के पीछे छिपने की कोशिश की है, उससे मामला दिलचस्प भी हो उठा है । फरीदाबाद में विनोद बंसल के जो दूसरे नजदीकी हैं, उनका साफ आरोप है कि विनय भाटिया ने अपने स्वार्थ में विनोद बंसल का नाम इस्तेमाल करते हुए उनका नाम और खराब करने की कोशिश की है । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल ने इस वर्ष अपने आप को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति से दूर रखा हुआ है - इतना दूर कि उन्होंने सीओएल के लिए अपनी उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए कोई हाथ-पैर नहीं मारे । ऐसे में, लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि जिन विनोद बंसल ने अपनी खुद की उम्मीदवारी हेतु समर्थन जुटाने के लिए 'राजनीति' नहीं की, वह विनोद बंसल किसी दूसरे के लिए राजनीति भला क्यों करेंगे ? लोगों की इसी समझ के चलते विनय भाटिया का झूठ आसानी से पकड़ा गया ।
विनय भाटिया की फजीहत लेकिन अनूप मित्तल के लिए वरदान बन गई । फरीदाबाद के लोगों ने अपने आप को विनय भाटिया की मुहिम से अलग और दूर दिखाने की कोशिश में जो मीटिंग की, उसमें उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल को आमंत्रित किया । इस 'घटना' से सुरेश भसीन और रवि दयाल को तगड़ा झटका लगा । यह दोनों फरीदाबाद में कुछ कुछ समर्थन मिलने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन विनय भाटिया से निपटने के चक्कर में फरीदाबाद के लोगों ने जो सक्रियता दिखाई - उसका फायदा उठाने में यह और फरीदाबाद के इनके समर्थक चूक गए, और तात्कालिक रूप से सारा फायदा अनूप मित्तल के हिस्से में आ गिरा । अनूप मित्तल के लिए सारा मामला 'विंडफॉल गेन' की तरह रहा ।
विनय भाटिया ने जिस अचानक तरीके से संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी का झंडा उठाया, उससे फरीदाबाद के लोगों को घोर आश्चर्य हुआ - किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हुआ कि फरीदाबाद में संजीव राय मेहरा के लिए जब कोई समर्थन ही नहीं है, तो विनय भाटिया ने क्या सोच कर उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । चर्चा चली कि संजीव राय मेहरा से चार्टर्ड एकाउंटेंसी से संबंधित प्रोफेशनल काम मिलने के लालच में विनय भाटिया ने उन्हें फरीदाबाद में समर्थन दिलवाने का सौदा कर लिया है । इस चर्चा से फरीदाबाद के लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई; खासकर क्लब्स के अध्यक्षों के बीच इस बात पर नाराजगी पैदा हुई कि विनय भाटिया अपने निजी स्वार्थ में उनके नाम और उनके अधिकार की सौदेबाजी कैसे कर सकते हैं ? क्लब्स के अध्यक्षों की नाराजगी के चलते फरीदाबाद के जो नेता लोग हैं, वह भी सावधान हुए और उन्होंने संजीव राय मेहरा के पक्ष में शुरू किए जाने वाले विनय भाटिया के अभियान से खुद को दूर कर लिया । इस स्थिति ने विनय भाटिया को फरीदाबाद में बुरी तरह अलग-थलग कर दिया । अपनी इस स्थिति के लिए विनय भाटिया ने विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहरा दिया । उनका आरोप रहा कि उन्हें इस मामले में विनोद बंसल से मदद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन मौके पर विनोद बंसल पीछे हट गए और वह अकेले पड़ गए ।
विनोद बंसल को मामले में लपेटने के कारण विनय भाटिया और मुसीबत में फँस गए । फरीदाबाद में कई लोगों ने इस बात के लिए विनय भाटिया को कोसा कि अपनी हरकत को जस्टीफाई करने के लिए वह विनोद बंसल को मामले में नाहक ही घसीट रहे हैं । लोगों का कहना है कि विनय भाटिया ने जब अपने आप को फँसा हुआ और अकेला पाया तो उन्होंने विनोद बंसल से मदद की गुहार की । विनोद बंसल को तब तक अपने दूसरे नजदीकियों से पता चल चुका था कि संजीव राय मेहरा को समर्थन दिलवाने की विनय भाटिया की मुहीम पूरी तरह पिट चुकी है - इसलिए उन्होंने विनय भाटिया की गुहार को अनसुना करने में ही अपनी भलाई देखी । विनय भाटिया की हरकत से सावधान हुए फरीदाबाद के क्लब्स के अध्यक्षों ने यह स्पष्ट करने और संदेश देने की जरूरत समझी कि उनके वोट का फैसला कोई और नहीं - बल्कि वह स्वयं करेंगे ! यह स्पष्ट करने और संदेश देने के लिए उन्होंने एक मीटिंग की, जिसमें फरीदाबाद के 16 में से 14 क्लब्स के अध्यक्ष जुटे - इस मीटिंग में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में से एक अकेले अनूप मित्तल को ही अपने बीच बुलाया । इस घटना ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवारों को बेचैन कर दिया है और डरा दिया है । उनकी चिंता यह सोच कर खासी बढ़ी है कि फरीदाबाद में अनूप मित्तल को यदि इतना बम्पर समर्थन है, तो फिर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल के मुकाबले में वह कैसे टिकेंगे ?

Monday, March 6, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन पाने के मामले में संजीव राय मेहरा तथा अनूप मित्तल को मिलती दिख रही असफलता रवि दयाल के लिए सुनहरा अवसर बन कर आई है

नई दिल्ली । रवि दयाल ने नाराज पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की नाराजगी को दूर करने के लिए जो प्रयास किए हैं, वह कुछ कुछ सफल होते दिखने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में रवि दयाल के समर्थकों और शुभचिंतकों का हौंसला काफी बढ़ा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स - जो अभी कुछ दिन पहले तक रवि दयाल को चुनावी मुकाबले में नहीं देख/पा रहे थे, अब जिस तरह से उनकी वकालत-सी करते सुने जा रहे है - उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में रवि दयाल के 'भाव' अचानक से बढ़ गए हैं । इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए एक पूर्व गवर्नर का कहना रहा कि रवि दयाल को संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल से तगड़ी चुनौती मिलती हुई दिख रही थी, लेकिन संजीव राय मेहरा के पूरी तरह फेल रहने और अनूप मित्तल के तेजी पकड़ने के बाद सुस्त पड़ने से रवि दयाल के लिए उक्त चुनौती उतनी तगड़ी नहीं बची है - जितनी कि वह पहले दिखाई दे रही थी । इस बीच रवि दयाल की सक्रियता में भी तेजी आई है और उनकी पत्नी ज्योत्स्ना दयाल ने भी मोर्चा संभाला है - तो लोगों को अचानक से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रवि दयाल के लिए स्थितियाँ अनुकूल बनती नजर आईं हैं ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए इस बार यूँ तो छह उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन मुकाबले में रवि दयाल, संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल को ही देखा/पहचाना जा रहा है । अनूप मित्तल ने हालाँकि देर से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, लेकिन अपनी जोरदार सक्रियता से वह जल्दी ही प्रमुख मुकाबलेबाजों में देखे जाने लगे । रवि दयाल ने पिछले वर्ष पराजय का शिकार होने के बाद जिस तरह से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर धोखेबाजी करने के आरोप लगाए थे, उसके कारण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनसे खफा थे और माना जा रहा था कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी राह में रोड़े अटकाने का काम तो जरूर ही करेंगे । संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल को उम्मीद थी कि रवि दयाल के प्रति पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की यह नाराजगी उनके लिए फायदे का कारण बनेगी - और उन्होंने इसके लिए भरसक प्रयास भी किया । लेकिन लगता है कि उनकी दाल गली नहीं है । संजीव राय मेहरा तो अपने ढीले-ढाले रवैये से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंप्रेस नहीं कर पाए, और अनूप मित्तल की ताबड़तोड़ तेजी ने लगता है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के ईगो को हर्ट किया है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के समर्थन के मामले में इन दोनों को मिलती दिख रही असफलता रवि दयाल के लिए सुनहरा अवसर बन कर आई है ।
संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के प्रति पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का झुकाव शुरू में दिखा भी था, लेकिन उन्होंने जब देखा कि संजीव राय मेहरा पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर हैं और खुद ज्यादा कुछ करने को तैयार नहीं हैं - और इस कारण लोगों के बीच उनकी कोई स्वीकार्यता बन ही नहीं रही है, तब फिर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी उम्मीदवारी से पीछे हटने लगे । इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए अनूप मित्तल ने कमर कसी, लेकिन परिस्थितियों ने उन पर कुछ ऐसा शिकंजा कसा - जिसका कि वह मुकाबला नहीं कर सके । अनूप मित्तल दरअसल बहुत 'महीन' तरीके से इस जाल में फँसे कि उन्हें निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना गया । यह जाल इतना महीन था कि अनूप मित्तल इसमें फँसने के खतरे को समझ/पहचान ही नहीं पाए । सुधीर मंगला की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच जैसी जो 'पहचान' है, उसके कारण अनूप मित्तल पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच अछूत बन गए । दूसरी बड़ी प्रतिकूल परिस्थिति अनूप मित्तल ने खुद बना ली - कहीं उन्होंने कह दिया कि वह यदि इस बार के चुनाव में सफल नहीं हुए तो अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार बनेंगे । उनकी इस घोषणा के कारण उन्हें अगले रोटरी वर्ष के उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा । कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने तो उन्हें सलाह भी दे डाली कि अगले रोटरी वर्ष के लिए कोई गंभीर उम्मीदवार नहीं दिख रहा है, इसलिए उन्हें अगले रोटरी वर्ष में ही उम्मीदवार होना चाहिए । इस तरह की बातों ने तेजी से आगे बढ़ते अनूप मित्तल के कदमों की रफ्तार को कम कर दिया । संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल की इस दशा ने रवि दयाल को चुनावी मुकाबले में वापस लाने का काम किया है ।
रवि दयाल अनुकूल परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए मुकाबले में वापस लौटते हुए भले ही दिख रहे हों, लेकिन उनके ही समर्थकों व शुभचिंतकों के अनुसार - उनके लिए हालात अभी भी पूरी तरह आसान और सुरक्षित नहीं हैं । असल में, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की बातों और बातों में व्यक्त किये जाने वाले समर्थन से माहौल तो बनता है - किंतु उससे वोट मिलने जरूरी नहीं हैं । वोट पाने के लिए एक अलग तरह के 'मैनेजमेंट' की जरूरत होती है । इस बार के चुनाव में एक तो उम्मीदवार ज्यादा हैं, और दूसरे किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में एकतरफा माहौल नहीं बन सका है - इस कारण डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे प्रभावित करने वाले नेता लोग असमंजस में हैं । इस असमंजसता के चलते नेता लोग स्टैंड नहीं ले पा रहे हैं और इस कारण मतदाता तबके को बँटा हुआ देखा/पाया जा रहा है । ऐसे में उम्मीदवारों के लिए जीतने लायक वोटों को प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती है । जैसे जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, उम्मीदवारों के लिए यह चुनौती और गंभीर होती जा रही है ।

Sunday, February 19, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच रवि दयाल के विरोध की 'आग' पर अपनी दाल गलने की उम्मीद लगाए बैठे संजीव राय मेहरा को अनूप मित्तल की सक्रियता से झटका लगा

नई दिल्ली । संजीव राय मेहरा की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तोता और समर्थक ही जैसे दुश्मन हो गए हैं । संजीव राय मेहरा के नजदीकियों के अनुसार, चुनाव के निर्णायक दौर में संजीव राय मेहरा लोगों के बीच अपने समर्थन को मजबूत करने तथा बढ़ाने का प्रयास करने की बजाए अपने समर्थक नेताओं को कोसने में अपना ज्यादा समय और एनर्जी लगा रहे हैं । उनकी शिकायत है कि चुनाव के निर्णायक दौर में उनके समर्थक नेताओं ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है और उनकी बिलकुल मदद नहीं कर रहे हैं । संजीव राय मेहरा की यह शिकायत इस समय इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि उनके समर्थक नेताओं का शुरू से ही मदद न करने वाला रवैया रहा है । उनके समर्थक नेता अलग अलग मौकों पर हमेशा उन्हें यही कहते रहे कि - तुम काम करो, उचित समय पर हम आगे आयेंगे । संजीव राय मेहरा की शिकायत है कि अब जब चुनाव में महीने भर से भी कम समय रह गया है, उनके समर्थक नेता यही राग आलापे जा रहे हैं और उनकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं । वह अभी भी यही कहते हुए बच निकल रहे हैं कि - तुम काम करो, हम उचित समय पर आगे आते हैं ।
संजीव राय मेहरा की नाराजगी के शिकार अशोक घोष, राजेश बत्रा, दीपक कपूर जैसे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स हो रहे हैं । संजीव राय मेहरा की शिकायत है कि इन्होंने उन्हें उम्मीदवार तो बनवा दिया, लेकिन अब जब उनकी उम्मीदवारी को उनके 'दिखने' वाले समर्थन की जरूरत है, तब वह बचते/छिपते फिर रहे हैं । राजेश बत्रा ने तो बीच में दो-एक बार संजीव राय मेहरा के लिए कुछ कहने/करने का काम किया भी था, लेकिन फिर वह भी पीछे हट गए । इन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के इस रवैये से संजीव राय मेहरा को वास्तव में दोहरा नुकसान हो रहा है : एक तरफ तो उन्हें इनकी मदद नहीं मिल रही है, और दूसरी तरफ लोगों के बीच संदेश यह जा रहा है कि इन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को संजीव राय मेहरा के लिए लोगों के बीच चूँकि कोई समर्थन नहीं दिख रहा है इसलिए वह सामने आ कर अपनी फजीहत नहीं कराना चाहते हैं । इन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के रवैये से लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि संजीव राय मेहरा को इनका समर्थन है भी, या संजीव राय मेहरा इनके समर्थन का झूठा दावा ही करते रहे हैं । लोगों को यह कहने का मौका भी मिल रहा है कि संजीव राय मेहरा एक उम्मीदवार के रूप में किए गए अपने काम से अपने समर्थक नेताओं तक को आश्वस्त नहीं कर पाए हैं, और इसीलिए उनके समर्थक नेताओं ने उनकी उम्मीदवारी से अपनी दूरी बनाई हुई है । संजीव राय मेहरा के लिए मुसीबत की बात यह बनी है कि उनके क्लब में दो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं - अशोक घोष और आशीष घोष; लेकिन दोनों में से कोई भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति समर्थन 'दिखाता' और लोगों का समर्थन जुटाता नजर नहीं आ रहा है । आशीष घोष को तो बल्कि उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार रवि दयाल की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
संजीव राय मेहरा के नजदीकियों के अनुसार, संजीव राय मेहरा चूँकि बहुत पुराने रोटेरियन हैं और पिछले कई वर्षों से वह लोगों के बीच ज्यादा सक्रिय भी नहीं रहे हैं - इसलिए उन्हें क्लब्स के मौजूदा सक्रिय व प्रभावी सदस्यों तथा पदाधिकारियों के साथ कनेक्ट करने और तालमेल बैठाने में समस्या आ रही है । पुरानी बातें याद करके और उन्हें बता बता कर क्लब्स के नए सदस्यों व पदाधिकारियों के बीच सम्मान तो पाया जा सकता है, लेकिन उनके वोट पाना मुश्किल लग रहा है । संजीव राय मेहरा की रोटरी में सक्रियता का इतिहास भी कोई उत्साहित करने वाला नहीं है, और वह बड़ी सुस्त रफ़्तार का शिकार रहा है । संजीव राय मेहरा ने रोटरी क्लब दिल्ली के सदस्य के रूप में वर्ष 1978 में रोटरी ज्वाइन की थी, लेकिन क्लब का अध्यक्ष बनने में उन्हें 25 वर्ष लग गए । वह वर्ष 2003 में क्लब के अध्यक्ष बने । इसके दो वर्ष बाद, वर्ष 2005 में वह असिस्टेंट गवर्नर बने और उसके बाद फिर गुम हो गए । ग्यारह वर्ष बाद वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए सामने आए हैं । रोटरी में उनकी सक्रियता का 'यह' इतिहास किसी को भी उत्साहित और प्रेरित करने में तो फेल है ही, साथ ही मुसीबत का कारण भी है - क्योंकि ग्यारह वर्ष बाद डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की मुख्यधारा में शामिल होने आए संजीव राय मेहरा न तो पिछले ग्यारह वर्षों में डिस्ट्रिक्ट में आए लोगों को जानते/पहचानते हैं और न इन ग्यारह वर्षों में रोटरी में आए 'बदलावों' से ही परिचित हैं । दरअसल यही कारण है कि वह लोगों के साथ कनेक्ट नहीं कर पा रहे हैं - और इस स्थिति को जानते/पहचानते हुए उनके समर्थक भी उनसे दूरी बनाए हुए हैं ।
संजीव राय मेहरा अपनी कमजोरियों को जानते/पहचानते हुए भी उम्मीदवार के रूप में कुछ समय पहले तक हालाँकि ज्यादा परेशान नहीं थे । उनका और उनके नजदीकियों का आकलन था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उम्मीदवार भले ही और तीन लोग भी हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला उनके और रवि दयाल के बीच ही है; और डिस्ट्रिक्ट के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का एक बड़ा समूह चूँकि रवि दयाल के खिलाफ है - इसलिए तमाम कमजोरियों के बावजूद उनकी चुनावी दाल गल जाएगी । लेकिन चुनावी लड़ाई में अचानक से हुई अनूप मित्तल की एंट्री ने उनका आकलन गड़बड़ा दिया है । अनूप मित्तल की उम्मीदवारी की प्रस्तुति तथा ताबड़तोड़ तरीके से चलाए गए उनके अभियान ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के लिए बन रहे समीकरणों को छिन्न-भिन्न कर दिया है । संजीव राय मेहरा के नजदीकियों का कहना है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच रवि दयाल के जिस विरोध को संजीव राय मेहरा अपनी 'पूँजी' मान/समझ रहे थे, उस पूँजी के अनूप मित्तल की तरफ भी आकर्षित होने का खतरा बढ़ गया है । समझा जाता है कि इस खतरे को भाँप कर ही संजीव राय मेहरा के समर्थक पूर्व गवर्नर्स 'आगे' बढ़ने से रुक गए हैं, वह अभी और देखना/समझना चाहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में डिस्ट्रिक्ट के लोगों तथा नेताओं का मूड किस दिशा में बढ़ रहा है ? समर्थक पूर्व गवर्नर्स के इस रवैये ने संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी को तगड़ी चोट पहुँचाई है, और इसीलिए संजीव राय मेहरा चुनाव के निर्णायक दौर में लोगों के बीच अपने समर्थन को मजबूत करने तथा बढ़ाने का प्रयास करने की बजाए अपने समर्थक नेताओं के खिलाफ भड़ास निकालने में अपना ज्यादा समय और एनर्जी लगा रहे हैं ।

Tuesday, January 24, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में संजय खन्ना से आकाँक्षित समर्थन न मिलता देख रवि दयाल और उनके नजदीकियों को डर हुआ है कि उनके साथ कहीं पिछले वर्ष जैसा ही धोखा न हो जाए

नई दिल्ली । संजय खन्ना से आकाँक्षित समर्थन न मिलता देख डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार रवि दयाल का धैर्य एक बार फिर उनका साथ छोड़ता दिख/लग रहा है । उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में जब डिस्ट्रिक्ट के कई नेताओं से मिले धोखे के कारण रवि दयाल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पिछड़ना पड़ा था, तब वह बहुत नाराज हुए थे और नाराजगी में उन्होंने कई नेताओं को निशाना बनाया था और रोटरी में लोगों के दोहरे चरित्र की शिकायत करते हुए उन्होंने अपने गुस्से को जाहिर किया था । निराशा और गुस्से में उन्होंने फिर कभी उम्मीदवार न बनने का फैसला भी सुना दिया था । किंतु तीन-चार महीने में उनका गुस्सा शांत हुआ और इस वर्ष फिर से उनकी उम्मीदवारी प्रस्तुत हुई । उन्हें उम्मीद बनी कि पिछली बार जिन लोगों ने उन्हें झाँसे में रखा और उनकी मदद का वायदा करने के बाद भी उनकी मदद नहीं की, वह इस वर्ष उनके साथ धोखा नहीं करेंगे । जिस तरह 'दूध का जला छाछ भी फूँक फूँक कर पीता है' - उसी तरह पिछले वर्ष धोखा खाए रवि दयाल इस वर्ष अपने समर्थक नेताओं को शुरू से परखने का प्रयास कर रहे हैं; और इस प्रयास में वह संजय खन्ना की भूमिका को लेकर सशंकित बताए/समझे जा रहे हैं । रवि दयाल के नजदीकियों का कहना है कि रवि दयाल को अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में संजय खन्ना से उपयोगी सुझाव तो जरूर मिले हैं, लेकिन संजय खन्ना उनकी 'वैसी' मदद करते हुए नहीं दिखे हैं, 'जैसी' मदद की रवि दयाल व उनके समर्थक उम्मीद लगाए बैठे हैं - और जो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रवि दयाल के लिए निर्णायक साबित हो सकती है ।
संजय खन्ना ने सीओएल के चुनाव के संदर्भ में जिस तरह से सुशील खुराना को समर्थन देकर विनोद बंसल को मुकाबले से बाहर हो जाने के लिए मजबूर कर दिया है - उसे देख/जान कर रवि दयाल को भी उम्मीद बंधी थी कि संजय खन्ना और सुशील खुराना की जोड़ी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उनकी भी नैय्या पार लगा/लगवा देगी । रवि दयाल की चिंता और निराशा यह देख कर लेकिन बढ़ती जा रही है कि संजय खन्ना उनके मामले में कोई दिलचस्पी लेते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । संजय खन्ना की जान को लेकिन अमरजीत सिंह भी हैं, जो चूँकि संजय खन्ना के ही क्लब के हैं - इसलिए वह संजय खन्ना पर अपना ज्यादा अधिकार समझते हैं; मजे की बात लेकिन यह है कि उनकी भी शिकायत है कि संजय खन्ना उनकी मदद नहीं कर रहे हैं । अमरजीत सिंह और उनके नजदीकियों का तो आरोप है कि संजय खन्ना उनकी बजाए रवि दयाल की मदद कर रहे हैं । दिलचस्प नजारा यह है कि अब यदि अमरजीत सिंह और रवि दयाल, दोनों को ही शिकायत है कि संजय खन्ना उनकी मदद नहीं कर रहे हैं - तो संजय खन्ना आखिर मदद किसकी कर रहे हैं ? संजय खन्ना को नजदीक से जानने वाले लोगों का कहना है कि संजय खन्ना किसी की मदद नहीं कर रहे हैं; दरअसल वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के चक्कर में फँसना ही नहीं चाहते हैं; उन्हें लगता है कि इस चक्कर में रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं के बीच बनी उनकी साख व पहचान खतरे में पड़ जाएगी - इसलिए वह इस चक्कर से दूर ही रहना चाहते हैं ।
यह 'तर्क' लेकिन उनकी मदद की उम्मीद लगाए बैठे रवि दयाल और उनके समर्थकों को कनविंस नहीं कर पा रहा है; उनका कहना है कि सीओएल के चुनाव में संजय खन्ना जब सुशील खुराना की मदद करते 'दिख' कर सुशील खुराना को बढ़त दिला सकते हैं, तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उनके सामने क्या समस्या है ? रवि दयाल और उनके नजदीकियों को यह संतोष जरूर है कि संजय खन्ना अपने क्लब के होने के बावजूद अमरजीत सिंह की कोई मदद नहीं कर रहे हैं; लेकिन इतना संतोष उन्हें काफी नहीं लग रहा है । रवि दयाल और उनके नजदीकियों को लग रहा है कि जिस तरह से संजय खन्ना और सुशील खुराना की जोड़ी ने सीओएल के चुनाव में अपना 'काम' बना लिया है, ठीक उसी तरह से यह जोड़ी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उनका काम बना सकती है; इसके साथ-साथ उन्हें लेकिन यह भी लग रहा है कि संजय खन्ना उनका काम बनाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं । रवि दयाल के कुछेक नजदीकियों को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट रवि चौधरी इसमें फच्चर फँसा रहे होंगे ।
रवि चौधरी और रवि दयाल की पुरानी खुन्नस है, जिसमें अब रवि चौधरी को बदला लेने का मौका मिल रहा है । रवि चौधरी ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की सिफारिश को दरकिनार रख कर जिस तरह से अपने ही क्लब के सदस्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंदर से खुन्नस निकाली हुई है; समझा जा रहा है कि उसे देखते/समझते हुए संजय खन्ना और सुशील खुराना ने अपने आप को रवि दयाल की उम्मीदवारी के लिए कुछ करने से रोका हुआ है - उन्हें लग रहा होगा कि रवि दयाल के चक्कर में वह रवि चौधरी के 'यहाँ' अपनी स्थिति रमेश चंदर जैसी क्यों बना लें ? ऐसी बातों से रवि दयाल और उनके नजदीकियों को लग रहा है कि उनकी उम्मीदवारी से दूर रहने के लिए संजय खन्ना या तो खुद कोई बहाना खोज लेते हैं, और या उनके विरोधी नए नए बहाने उन्हें सुझा देते हैं - और इस तरीके से उन्हें संजय खन्ना का समर्थन मिलते मिलते रह जाता है । ऐसे में, रवि दयाल और उनके नजदीकियों को यह भय सताने लगा है कि उनके साथ कहीं पिछले वर्ष जैसा ही धोखा न हो जाए ।

Thursday, November 10, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अनुकूल स्थिति के बावजूद सुरेश भसीन व रवि दयाल के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद अभी दूर की कौड़ी ही लग रहा है

नई दिल्ली । समर्थक पूर्व गवर्नर नेताओं के पीछे हटने तथा ठंडे पड़ने से संजीव राय मेहरा की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी खतरे में पड़ गई नजर आ रही है, जिसका फायदा उठाने के लिए सुरेश भसीन तथा रवि दयाल ने कमर तो कस ली है - किंतु उसके फायदे को लेकर खुद उनके समर्थक भी आश्वस्त नहीं हैं । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के 'पंडितों' का मानना और कहना है कि इस बार का चुनाव इन दोनों के लिए बहुत ही अनुकूल होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण भी है; महत्वपूर्ण इसलिए भी - कि इनमें से जो भी असफल रहा, उसके लिए गवर्नरी का रास्ता आगे फिर बंद ही समझो । इस लिहाज से इन दोनों के लिए यह आख़िरी मौका ही है । सुरेश भसीन और रवि दयाल ने इस बात को शायद खुद भी समझा हुआ है, और इसलिए अपनी अपनी तरफ से उन्होंने अपना अपना पूरा जोर लगाया हुआ है । हालाँकि दोनों के 'तौर-तरीकों' को देखते हुए राजनीतिक 'पंडितों' का कहना है कि दोनों ने ही अपने पिछले अनुभवों से कुछ नहीं सीखा है, और दोनों ही इस बार भी वही गलतियाँ दोहरा/तिहरा रहे हैं - जिनके कारण वह अभी तक सफलता से दूर बने हुए हैं । दोनों ने ही दरअसल इस सच्चाई को या तो समझा/पहचाना नहीं है, और या समझते/पहचानते हुए भी उसे क्रियान्वित करने की जरूरत नहीं समझी है - कि किसी भी चुनाव की तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में एक राजनीतिक समीकरण बनता है, और वही उम्मीदवार सफल हो सकने की उम्मीद कर सकता है जो अपने आप को 'उस' राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बना लेता है ।
रवि दयाल के साथ पिछले दिनों जो हुआ, उससे इस बात को समझा जा सकता है : रवि दयाल अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से पिछले दिनों फरीदाबाद के कुछेक प्रमुख लोगों से मिले, जिन्होंने एक पूर्व गवर्नर का नाम लेते हुए उनसे कहा कि हम तो 'उनके' कहे अनुसार फैसला करेंगे । यह सुनकर रवि दयाल पलटे और 'उन' पूर्व गवर्नर से मिलने के लिए जुगाड़ बैठाने में लग गए । रवि दयाल 'उन' पूर्व गवर्नर से मिल पाए या नहीं मिल पाए; और यदि मिल पाए तो फिर हुआ क्या - यह तो पता नहीं; किंतु जितना पता है, उससे ही साबित है कि रवि दयाल ने जिस क्रम में सक्रियता दिखाई - उसके कारण ही उन्हें खासी फजीहत का सामना करना पड़ा । रवि दयाल यदि लोगों के बीच बने/सधे राजनीतिक तारों को पहले से ही समझ/पहचान कर आगे बढ़ते तो और जो होता सो होता, उन्हें कम से कम राजनीतिक फजीहत का सामना तो नहीं ही करना पड़ता । यही कहानी सुरेश भसीन के साथ है । सुरेश भसीन एक उम्मीदवार के रूप में यूँ तो काफी सक्रिय हैं, लेकिन इस सक्रियता के बावजूद वह अपना विश्वसनीय समर्थन-आधार यदि नहीं बना पा रहे हैं, तो इसका सीधा सा कारण यही है कि उनकी सक्रियता राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रख कर संयोजित नहीं है ।
इन दोनों की इस दशा पर सटीक बैठती एक कहानी है : एक हष्ट-पुष्ट लकड़हारा लकड़ी के एक व्यापारी के पास काम माँगने गया । उसने व्यापारी को आश्वस्त किया कि वह मेहनत से काम करेगा । व्यापारी ने उसे एक नई कुल्हाड़ी दी और जंगल का पता बता दिया, जहाँ उसे पेड़ काटने थे । लकड़हारे ने बहुत मेहनत से काम किया और शाम तक उसने बीस पेड़ काट दिए । व्यापारी ने उसके काम से खुश होकर उसे मजदूरी के साथ-साथ ईनाम भी दिया । अगले दिन लेकिन वह अठारह पेड़ ही काट पाया । तीसरे दिन उसने और ज्यादा मेहनत से काम किया तथा जरा भी समय बर्बाद नहीं किया, किंतु कटे पेड़ों की संख्या सोलह ही रह गई । कटे पेड़ों की संख्या हर रोज कम होती जा रही थी, हालाँकि लकड़हारा पूरी मेहनत से काम कर रहा था । उसे यह बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था कि गड़बड़ क्या हो रही है ? कटे पेड़ों की संख्या जब छह/आठ रह गई, तब लकड़हारे ने व्यापारी के सामने अपनी व्यथा कही । व्यापारी ने उसकी पूरी बात सुनी और उससे पूछा कि उसने कुल्हाड़ी को धार कब दी थी ? इस कहानी का प्रतीकात्मक संदेश यही है कि सफलता सिर्फ मेहनत से नहीं मिलती है, मेहनत के औजारों की धार की भी सफलता में निर्णायक भूमिका होती है ।
सुरेश भसीन और रवि दयाल की स्थिति भी कहानी के लकड़हारे जैसी ही है : उम्मीदवार के रूप में इन दोनों के लिए स्थितियाँ खासी अनुकूल हैं, अपने चुनाव अभियान को लेकर यह मेहनत भी खूब कर रहे हैं - पर समस्या यह है कि अपनी उम्मीदवारी और अपने चुनाव अभियान में यह कोई 'धार' नहीं दिखा पा रहे हैं । रवि दयाल को फरीदाबाद के मामले में जो फजीहत झेलनी पड़ी, उसका कारण सिर्फ यही है । और इसी वजह से, तमाम मेहनत के बावजूद सुरेश भसीन उस अनुकूल स्थिति का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं - जो उनके ठीक सामने है ।
संजीव राय मेहरा एक उम्मीदवार के रूप में लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बना सकने में जिस तरह से असफल साबित हुए हैं, उससे उनके समर्थक गवर्नर्स को तगड़ा झटका लगा है तथा वह संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हटते नजर आ रहे हैं । उनके समर्थक पूर्व गवर्नर्स हालाँकि इस बात से भी परेशान हैं कि इस स्थिति का फायदा कहीं रवि दयाल को न मिल जाए; रवि दयाल को रोकने के लिए कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने सुरेश भसीन की तरफ 'देखना' शुरू किया है । सुरेश भसीन के लिए यह एक बहुत अनुकूल स्थिति है, लेकिन वह अभी तक यह कोशिश करते हुए नहीं दिखे हैं कि संजीव राय मेहरा से जो राजनीतिक समर्थन छूट रहा है, उसे वह अपनी तरफ कर लें । सुरेश भसीन के एक हमदर्द ने तो बड़ी पते की बात कही - कि सुरेश भसीन को इस बात का शायद अंदाजा भी नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाले लोगों के बीच उन्हें लेकर नकारात्मक भाव ही है । यानि सुरेश भसीन सिर्फ मेहनत पर भरोसा कर रहे हैं, और अपनी उम्मीदवारी तथा अपने अभियान को 'धार' देने की कोई जरूरत वह नहीं समझ रहे हैं ।
सुरेश भसीन की यह कमजोरी रवि दयाल की पूँजी बन सकती है, लेकिन चूँकि उनका भी तरीका सुरेश भसीन जैसा ही है - इसलिए उनकी स्थिति को लेकर खुद उनके हमदर्द ही आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं । रवि दयाल के सामने संकट अलग किस्म का है, और बड़ा है । पूर्व गवर्नर्स का एक बड़ा तबका उनके समर्थन में नहीं है, और कई तो  उनके खिलाफ हैं; जो उनके समर्थन में हो सकते थे - उनमें से कई अमरजीत सिंह तथा अतुल गुप्ता की उम्मीदवारी के कारण उनकी उम्मीदवारी के साथ नहीं हैं । उनके कुछेक हमदर्दों का कहना है कि रवि दयाल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्होंने अपनी मेहनत के आधार पर अपने आप को जीता हुआ मान लिया है तथा चुनावी राजनीति के ताने बाने को पूरी तरह अनदेखा कर दिया है । सुरेश भसीन की तरह रवि दयाल भी वोटर अध्यक्षों से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया से बाग-बाग हैं और अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त हैं । कहानी के लकड़हारे की तरह वह आश्वस्त हैं कि उन्हें सहृदय 'मालिक' मिल गए हैं, पेड़ों से लदा-फदा जंगल उनके सामने है और कुल्हाड़ी उनके हाथ में है - लिहाजा सफलता निश्चित ही उनके कदमों में होगी । पर सफलता का रास्ता इतना सीधा होता नहीं है ।
सुरेश भसीन और रवि दयाल की इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है । पूर्व गवर्नर्स चूँकि सीओएल तथा डायरेक्टर नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव का गणित बैठाने में व्यस्त हैं, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के चुनाव पर उनका अभी ज्यादा ध्यान नहीं है । समझा जा रहा है कि उन दो चुनावों से पूर्व गवर्नर्स की जो पोजीशनिंग बनेगी, उसका भी असर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के चुनाव पर पड़ेगा । इसीलिए माना/कहा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव अभी रंग बदलेगा - जो इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उम्मीदवार लोग डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सत्ता-समीकरणों में अपने आप को कैसे फिट करते हैं ।

Sunday, July 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए रवि दयाल की उम्मीदवारी के पुनः प्रस्तुत होने की सुगबुगाहट ने अतुल गुप्ता व सुरेश भसीन के सामने अपने अपने समर्थन आधार को बचाए रखने की गंभीर चुनौती पैदा की

नई दिल्ली । रवि दयाल की उम्मीदवारी की सुगबुगाहट ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के लगभग सेट हो चुके समीकरणों को गड़बड़ा दिया है, और इस गड़बड़ाहट में सुरेश भसीन व अतुल गुप्ता के सामने नई तरह की समस्याएँ पैदा हो गई हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष के चुनावी मुकाबले में पिछड़ जाने के बाद रवि दयाल राजनीति के कोपभवन में चले गए थे, और उनकी तरफ से लोगों को यही संदेश सुनने को मिला था कि चुनावी पचड़े में दोबारा से पड़ने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है । पिछले रोटरी वर्ष का चुनावी मुकाबला लेकिन जिस तरह से बदनामी के भँवर में फँसा, और रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड तक में जिसकी गूँज पहुँची; और चारों तरफ जिस तरह से यह बात फैली कि पिछले रोटरी वर्ष का चुनावी नतीजा पक्षपातपूर्ण बेईमानी से निकला था - उसे देख/पहचान कर रवि दयाल के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों ने रवि दयाल को दोबारा से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए राजी करने का प्रयास किया । उनका कहना रहा कि पिछले रोटरी वर्ष की चुनावी प्रक्रिया में हुई बेईमानी की जैसी जो पोल खुली है, उसके चलते रवि दयाल को सहानुभूति-लाभ मिल सकता है । रवि दयाल लेकिन फिर भी दोबारा से उम्मीदवार बनने को राजी नहीं हुए । अभी लेकिन अचानक से लोगों के बीच रवि दयाल की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की चर्चा सुनाई दी है । रवि दयाल के हवाले से कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस ने उनकी उम्मीदवारी प्रस्तुत होने का दावा भी किया है; उन्होंने बताया है कि खुद रवि दयाल ने उनसे कहा है कि वह उम्मीदवार हो रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि अभी भी कुछेक लोगों को रवि दयाल की उम्मीदवारी की प्रस्तुति को लेकर संदेह है; उनका कहना है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर रवि दयाल चूँकि पहले भी हाँ-न के चक्कर में फँसे रहे हैं, इसलिए एक उम्मीदवार के रूप में सचमुच सक्रिय होने पर ही मानियेगा कि वह उम्मीदवार हैं !
रवि दयाल सचमुच उम्मीदवार बनेंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन अचानक से शुरू हुई उनकी उम्मीदवारी की पुनः प्रस्तुति की चर्चाओं ने चुनावी राजनीति के संदर्भ में बन रहे मौजूदा रोटरी वर्ष के समीकरणों को गड़बड़ाने का काम जरूर किया है । समीकरणों के गड़बड़ाने में झटका सुरेश भसीन व अतुल गुप्ता को लगा दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चार वरिष्ठ रोटेरियंस के नाम चर्चा में थे : रोटरी क्लब दिल्ली के सुरेश भसीन, रोटरी क्लब नई दिल्ली के संजीव राय मेहरा, रोटरी क्लब दिल्ली हैरिटेज के अतुल गुप्ता और रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ ईस्ट के अमरजीत सिंह । इनमें अमरजीत सिंह एक उम्मीदवार के रूप में अपनी ऐसी सक्रियता नहीं दिखा सके हैं, जिसके भरोसे वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर लोगों को आश्वस्त कर सकें; उनके क्लब के जो बड़े नेता हैं, चूँकि वही उनकी उम्मीदवारी को लेकर बहुत आश्वस्त भाव से बात करते हुए नहीं देखे/सुने गए - इसलिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई लोगों के बीच कोई मूव नहीं बन सका । संजीव राय मेहरा को शुरू में बहुत दमदार उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना गया था, किंतु सक्रियता के मामले में वह चूँकि लोगों के बीच कोई प्रभाव नहीं बना सके हैं - इसलिए उन्हें अपने ही क्लब के सतिंदर नारंग की दशा को प्राप्त होते देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि कुछ वर्ष पहले सतिंदर नारंग भी उन्हीं नेताओं के भरोसे उम्मीदवार बने थे, जिन नेताओं के भरोसे संजीव राय मेहरा इस वर्ष चुनावी रिंग में उतरे हैं । सतिंदर नारंग हो और चाहें संजीव राय मेहरा हों - ये लोग डिस्ट्रिक्ट के बड़े लोग हैं और डिस्ट्रिक्ट के एक तबके में इनकी बड़ी प्रतिष्ठा है; चुनावी मुकाबले में लेकिन यह बड़ा'पन' और प्रतिष्ठा काम नहीं आती है । चुनावी 'जरूरतें' कुछ और होती हैं - समस्या की बात यह है कि इनके जैसे लोग इस जरूरत को समझ/पहचान नहीं पाते, और इसलिए चुनावी मुकाबले में मिसफिट रहते हैं । संजीव राय मेहरा ने चूँकि अपने आप को चुनावी मुकाबले के लिहाज से फिट बनाने की कोई कोशिश ही नहीं की, इसलिए तमाम अनुकूलताओं के बावजूद एक उम्मीदवार के रूप में लोगों के बीच उन्हें स्वीकार्यता नहीं मिल सकी है । इस स्थिति का उम्मीदवार के रूप में अतुल गुप्ता और सुरेश भसीन को फायदा मिला ।
अतुल गुप्ता ने एक उम्मीदवार के रूप में सक्रियता दिखा/जता कर लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी के प्रति भरोसा तो पैदा किया ही है, साथ ही कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का भी समर्थन जुटाया है - और इस तरह चुनावी मुकाबले में अपनी उम्मीदवारी को मजबूती दी है । सुरेश भसीन उम्मीदवार के रूप में सक्रियता के मामले में अतुल गुप्ता से आगे हैं, लेकिन उनके साथ सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि वह अभी तक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के किसी समूह का समर्थन नहीं जुटा सके हैं - जिसका नतीजा यह है कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी के प्रति स्वीकार्यता का भाव नहीं बन सका है । हालाँकि संभावना दिख रही है कि जो पूर्व गवर्नर्स अतुल गुप्ता का 'रास्ता' रोकना चाहेंगे, वह सुरेश भसीन की उम्मीदवारी का झंडा उठा सकते हैं । ऐसे पूर्व गवर्नर्स अभी हालाँकि संजीव राय मेहरा के साथ हैं; किंतु संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी चूँकि उनकी उम्मीदानुसार लोगों के बीच पकड़ बनाते हुए नहीं नजर आ रही है - इसलिए उनकी निगाह सुरेश भसीन की उम्मीदवारी की तरफ बढ़ी है । इस वर्ष की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई क्या शक्ल लेगी, इस बारे में अभी पक्के तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी करना होगा; लेकिन अभी की स्थितियों के आकलन के अनुसार, इस वर्ष अतुल गुप्ता और सुरेश भसीन के बीच चुनावी मुकाबला होता हुआ नजर आ रहा था - जिसे लेकिन रवि दयाल की उम्मीदवारी की पुनः प्रस्तुति की चर्चा ने डिस्टर्ब कर दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट में प्रायः हर राजनीतिक खेमे के लोगों के अनुसार, रवि दयाल की उम्मीदवारी यदि सचमुच प्रस्तुत होती है तो वह अतुल गुप्ता और सुरेश भसीन के बीच चुनावी मुकाबले के बनते समीकरण पर सीधी चोट करेगी । दरअसल अतुल गुप्ता और सुरेश भसीन की उम्मीदवारी के जो समर्थक व शुभचिंतक हैं - या हो सकेंगे, उनमें से अधिकतर के रवि दयाल की उम्मीदवारी के साथ जाने की संभावना है । हालाँकि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि रवि दयाल अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में किस तरह से कैम्पेन चलाते हैं । उम्मीदवारी को लेकर हाँ-न के चक्कर में उन्होंने अपना काफी समय बर्बाद कर लिया है; देखना होगा कि इसकी भरपाई वह कैसे करते हैं ? कुछेक लोगों का कहना है कि हालाँकि इससे पहले तो यह देखना होगा कि अपनी उम्मीदवारी की प्रस्तुति के लिए फिलहाल हामी भरने के बावजूद वह वास्तव में उम्मीदवार बने भी रहते हैं क्या ? रवि दयाल की उम्मीदवार सचमुच में प्रस्तुत होगी या नहीं, यह तो आगे आने वाले दिनों में पता चलेगा; अभी उनकी उम्मीदवारी की आहट ने लेकिन डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरण को अवश्य ही गड़बड़ा दिया है । रवि दयाल की उम्मीदवारी के पुनः प्रस्तुत होने की सुगबुगाहट ने अतुल गुप्ता व सुरेश भसीन के सामने अपने अपने मौजूदा व संभावित समर्थन आधार को बनाए/बचाए रखने की गंभीर चुनौती पैदा कर दी है ।

Monday, July 27, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में रवि दयाल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह की सफलता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में विनय भाटिया के लिए समस्या और चुनौती बनी

नई दिल्ली । रवि दयाल के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली मेगापोलिस के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों की जुटी भीड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत रवि दयाल की उम्मीदवारी का 'वजन' बढ़ाने का काम तो किया ही है - साथ ही उनके संभावित प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार विनय भाटिया के लिए खासी मुसीबत भी खड़ी कर दी है । हुआ दरअसल यह कि रवि दयाल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह का जलवा देख कर लोगों के बीच चर्चा छिड़ी कि विनय भाटिया के क्लब - रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी में अधिष्ठापन समारोह कब होगा । इस बारे में पक्की जानकारी तो किसी के पास नहीं थी, किंतु अधिकतर लोगों ने एक बात यह बताई कि विनय भाटिया अपने क्लब का अधिष्ठापन समारोह सितंबर माह के अंत में करने की सोच रहे हैं । इसका कारण वह यह बता रहे हैं कि तब तक क्लब्स में नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों के नाम तय हो जायेंगे और वह अधिष्ठापन समारोह में उन्हें भी खिला-'पिला' कर खुश कर लेंगे । यह जो 'कारण' सामने आया - उसने लेकिन एक उम्मीदवार के रूप में विनय भाटिया की किरकिरी कर दी । कई लोगों का कहना रहा कि देर से अधिष्ठापन समारोह करने का जो कारण विनय भाटिया बता रहे हैं - उसके जरिए वास्तव में वह यह दिखा/जता रहे हैं कि उन्हें न तो अधिष्ठापन समारोह की जरूरत व गरिमा का पता है, और न नोमीनेटिंग कमेटी के लिए चुने जाने वाले सदस्यों की इज्जत की परवाह है । लोगों का मानना और कहना है कि एक उम्मीदवार के रूप में विनय भाटिया की यह सोच ही उनकी उम्मीदवारी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है । 
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में विनय भाटिया को सबसे ज्यादा आलोचना अपने अपरिपक्व और बचकाने किस्म के व्यवहार के कारण ही झेलनी पड़ रही है । उनकी उम्मीदवारी के कई समर्थक व शुभचिंतक भी मानते/कहते हैं कि अपने व्यवहार के कारण विनय भाटिया अपने खेमे के लोगों का समर्थन भी खोते जा रहे हैं, लेकिन फिर भी कोई सबक नहीं सीख रहे हैं । उनके कुछेक समर्थकों ने बताया कि उन्होंने विनय भाटिया को जब समझाया, तो ऐसा लगा कि जैसे विनय भाटिया हालात की नाजुकता को समझ रहे हैं और एक उम्मीदवार के अनुरूप अपने आप को बदलने के लिए तैयार कर रहे हैं - लेकिन फिर देखने में आता है कि मामला जहाँ का तहाँ ही बना हुआ है । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थक उनके व्यवहार से लोगों के बीच पड़ रहे नकारात्मक असर से निपटने का तरीका तो अभी खोज नहीं पाए हैं; कि उनके क्लब के अधिष्ठापन समारोह को लेकर मजाक और शुरू हो गए हैं । इन मजाकों में फरीदाबाद के भी लोगों के शामिल हो जाने से इन मजाकों को न सिर्फ और हवा मिली बल्कि विश्वसनीयता भी प्राप्त हुई । 
रोटरी की चुनावी राजनीति में उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह उम्मीदवार की 'ताकत' को नापने/आँकने का एक पैमाना बन गया है - हालाँकि इस पैमाने के फूलप्रूफ होने का कोई सुबूत नहीं है । यूँ तो उम्मीदवार के क्लब में हुए अधिष्ठापन समारोह के आधार पर उम्मीदवार के जीतने/हारने का अनुमान लगाना फिजूल की कसरत ही होगी - लेकिन फिर भी यह समारोह उम्मीदवार की सोच, उसके नजरिए और अपनी उम्मीदवारी के प्रति उसकी गंभीरता का पैमाना अवश्य ही है । देखने की बात यह नहीं होती है कि उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह किस तामझाम से हुआ है; देखने की बात यह होती है कि अधिष्ठापन समारोह के जरिए उम्मीदवार लोगों को दिखाता/बताता क्या है ? विनय भाटिया के क्लब का अधिष्ठापन समारोह बिना तामझाम के, सामान्य तरीके से हो जाता - तो इतना बबाल नहीं मचता; क्योंकि तब मान लिया जाता कि अपने चुनाव अभियान में वह अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह को कोई अहमियत नहीं दे रहे हैं । लेकिन अभी जो कहा/बताया जा रहा है, उससे लोगों के बीच संदेश यह गया है कि विनय भाटिया अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह का राजनीतिक उपयोग तो करेंगे, किंतु इस उपयोग को ढंग से करने के लिए उनके पास आवश्यक तैयारी नहीं है; और इस चक्कर में वह अधिष्ठापन समारोह की जरूरत व गरिमा के साथ साथ अपने क्लब के पदाधिकारियों तथा चुनावी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों की इज्जत के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं । 
विनय भाटिया के समर्थक समझे जाने वाले लोगों ने ही बताया है कि विनय भाटिया तो चाहते थे कि उनके क्लब का अधिष्ठापन समारोह जल्दी हो; क्लब में उन्होंने सुझाव दिया था कि अधिष्ठापन समारोह क्लब के सदस्य करें, और फिर सितंबर माह के अंतिम सप्ताह में क्लब का एक बड़ा कार्यक्रम 'वह' करेंगे । क्लब के पदाधिकारियों ने लेकिन उन्हें स्पष्ट बता दिया कि अधिष्ठापन समारोह यदि बड़ा करना है, तो उसमें होने वाला अतिरिक्त खर्च उन्हें ही उठाना होगा । उनका तर्क रहा कि उम्मीदवार होने के नाते यह उनकी जरूरत है कि क्लब का अधिष्ठापन समारोह तामझाम से हो, लिहाजा इस तामझाम के चलते जो अतिरिक्त खर्चा आयेगा - उसे उन्हें ही उठाना पड़ेगा । क्लब के पदाधिकारियों का सुझाव था कि विनय भाटिया यदि अतिरिक्त खर्च उठाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो फिर वह अपने सामान्य तरीके से ही अधिष्ठापन समारोह कर लेते हैं, किंतु विनय भाटिया इस बात के लिए भी राजी नहीं हुए । उनका कहना रहा कि इससे एक उम्मीदवार के रूप में उनकी बड़ी फजीहत होगी । विनय भाटिया ने तब 'बीच का' रास्ता निकाला और वह यह कि सितंबर माह के अंतिम सप्ताह में नोमीनेटिंग कमेटी के लिए क्लब्स में चुने गए सदस्यों को 'निपटाने' के लिए वह जिस आयोजन के बारे में सोच रहे हैं, उसे अधिष्ठापन समारोह के रूप में ही कर लेंगे । इस तरह विनय भाटिया ने अपना काम तो बना लिया, किंतु क्लब के पदाधिकारियों को फँसा दिया । किसी भी अच्छे क्लब में नए पदाधिकारियों का अधिष्ठापन रोटरी वर्ष के शुरू के दिनों में ही हो जाता है, या हो जाना चाहिए - किंतु विनय भाटिया के रवैये के चलते रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के पदाधिकारियों को लंबे समय तक बिना अधिष्ठापित हुए लोगों के बीच रहना होगा । इस कारण से रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के नए पदाधिकारियों का रोटरी के प्रति सारा उत्साह फीका पड़ता जा रहा है । 
विनय भाटिया के क्लब का यह सारा झमेला सामने न आया होता, यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार रवि दयाल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह को लोगों के बीच चर्चा न मिली होती । उल्लेखनीय है कि अभी कुछ ही दिन पहले रवि दयाल के क्लब को प्लेटिनम क्लब का अवार्ड मिलने तथा खुद रवि दयाल को लीडरशिप एक्सीलेंस की ट्रॉफी मिलने के कारण लोगों के बीच व्यापक चर्चा मिली ही थी । और अब क्लब के अधिष्ठापन समारोह ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को प्रभावित किया ।डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति, इंतजाम, क्लब के पदाधिकारियों व सदस्यों की सक्रिय भागीदारी के लिहाज से हर किसी को अधिष्ठापन समारोह पूरी तरह परफेक्ट लगा और सभी ने माना कि इस आयोजन से रवि दयाल की उम्मीदवारी का वजन और बढ़ा ही है । इसी प्रक्रिया में विनय भाटिया की उम्मीदवारी का वजन नापने की कोशिश हुई, तो अधिष्ठापन समारोह को लेकर उनके क्लब में चल रहा झमेला सामने आया - जिससे उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को खासा तगड़ा वाला झटका लगा है । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थकों का ही कहना है कि क्लब के अधिष्ठापन समारोह को लेकर ही विनय भाटिया जब अपने क्लब को न तो प्रेरित कर पाए और न ही क्लब के सदस्यों का सहयोग जुटा पाए हैं, तब फिर अपनी उम्मीदवारी का अभियान वह कैसे संयोजित कर पायेंगे ? अधिष्ठापन समारोह के झमेले के बहाने से विनय भाटिया की उम्मीदवारी को लेकर जिस तरह की जो बातें सामने आईं हैं, उसके कारण फरीदाबाद के लोगों के बीच भी विनय भाटिया की उम्मीदवारी को लेकर गहरी नाराजगी और निराशा पैदा हुई है, और उनके बीच भी तरह तरह की बातें सुनाई देने लगी हैं - जो विनय भाटिया की उम्मीदवारी के संदर्भ में परेशानी खड़ी करने वाली हैं ।

Monday, June 29, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में अपने क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए विनय भाटिया की उम्मीदवारी के अभियान को जो तगड़ा झटका लगा है, उसके चलते व्यक्तित्व तथा लीडरशिप क्वालिटी के मामले में दूसरे उम्मीदवार रवि दयाल को उनपर बढ़त बनाते देखा जाने लगा है

नई दिल्ली । विनय भाटिया को डिस्ट्रिक्ट 3010 के थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में लोगों के बीच उस समय बड़ी किरकिरी का सामना करना पड़ा, जब किन्हीं किन्हीं लोगों ने उनसे पूछा कि - क्या बात है, यहाँ आपके क्लब का कोई और सदस्य नहीं दिख रहा है ? विनय भाटिया के लिए तब और मुसीबत खड़ी हुई जब फरीदाबाद के लोगों ने भी उनसे यह सवाल किया । फरीदाबाद के लोगों के यह पूछने में ऐसा लग रहा था, जैसे कि वह विनय भाटिया की फिरकी ले रहे हैं । विनय भाटिया के लिए लोगों के इस सवाल का जबाव देना मुश्किल तो हुआ ही, इस सवाल से बचने के लिए उन्हें लोगों से मुँह तक चुराना पड़ा । विनय भाटिया की तरफ से तो उक्त सवाल का कोई जबाव किसी को सुनने को नहीं मिला, किंतु क्लब के सदस्यों से बाद में कुछेक लोगों की जो बात हुई तो किसी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना पर दोष मढ़ा कि उन्होंने 'ठीक' से निमंत्रित ही नहीं किया; किसी ने क्लब के अध्यक्ष अनिल शर्मा को जिम्मेदार ठहराया कि उन्होंने न तो खुद कार्यक्रम में जाने में दिलचस्पी दिखाई और न दूसरों को ही प्रेरित किया; कई सदस्यों ने लेकिन इस स्थिति के लिए विनय भाटिया को दोष दिया - उनका कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार होने के नाते विनय भाटिया की यह 'जरूरत' बनती है कि रोटेरियंस के बीच उनके क्लब के सदस्यों की सक्रियता व संलग्नता 'नजर' आये, और इसके लिए उन्हें ही प्रयास करने होंगे । इस कहने के पक्ष में उनका तर्क रहा कि डिस्ट्रिक्ट के एक बड़े फंक्शन में क्लब के लोगों की अनुपस्थिति के कारण लोगों के 'निशाने' पर तो वह आये न ? किसी ने भी संजय खन्ना से तो नहीं ही पूछा कि विनय भाटिया के क्लब के सदस्य यहाँ क्यों नहीं दिख रहे हैं; या अनिल शर्मा का तो कुछ नहीं गया । लोगों के सवालों के सामने शर्मिंदगी तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार होने के नाते विनय भाटिया को ही उठानी पड़ी ।
विनय भाटिया को यह शर्मिंदगी इसलिए भी उठानी पड़ी, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के एक दूसरे उम्मीदवार रवि दयाल के क्लब के सदस्यों की कार्यक्रम में अच्छी भागीदारी और संलग्नता दिखाई दे रही थी । वैसे इस बात पर शायद ही कोई ध्यान देता - किसी भी कार्यक्रम में किसी को क्या पड़ी है कि वह इस बात का हिसाब लगाता फिरे कि किस क्लब से कौन आया है और कितने लोग आये हैं; लेकिन चूँकि विनय भाटिया के क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति लोगों की 'पकड़' में आ गई और वह चर्चा का विषय बन गई, तो फिर रवि दयाल के क्लब के लोगों को भी 'खोजा' जाने लगा और नोट किया गया कि रवि दयाल के क्लब के सदस्यों ने कार्यक्रम में अच्छी दिलचस्पी ली हुई है । फिर लोगों के बीच की चर्चाओं में डिस्ट्रिक्ट के हाल-फिलहाल के कुछेक कार्यक्रमों को भी याद किया गया और तुलनात्मक रूप से विनय भाटिया के क्लब की तुलना में रवि दयाल के क्लब के सदस्यों को ज्यादा सक्रिय, उत्साहित और संलग्न पाया गया । इससे तुरत-फुरत यह निष्कर्ष निकाला गया कि रवि दयाल लीडरशिप क्वालिटी के मामले में विनय भाटिया पर बहुत भारी पड़ते हैं । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव अभियान में शोर ज्यादा विनय भाटिया का सुना जा रहा है; और उनके अभियान को रवि दयाल के अभियान के मुकाबले ज्यादा बढ़त लिए देखा जाता रहा है । लेकिन डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में विनय भाटिया के क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति ने उनके अभियान को लेकर बन रहे सकारात्मक परसेप्शन को तगड़ा झटका दिया है, और लोग बात करने लगे हैं कि विनय भाटिया के अभियान में शोर सिर्फ शोर भर है, और उसके पीछे ठोस कुछ नहीं है । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लग रहा है कि विनय भाटिया कुछ 'सीख' नहीं रहे हैं और 'जरूरतों' को समझ नहीं रहे हैं - और इसलिए 'व्यक्तित्व' तथा लीडरशिप क्वालिटी के मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक दूसरे उम्मीदवार रवि दयाल से पिछड़ते जा रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में विनय भाटिया के क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति ने विनय भाटिया की उम्मीदवारी के अभियान को जो चोट पहुँचाई है, उसके लिए विनय भाटिया को ही जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है । क्लब के, फरीदाबाद के और डिस्ट्रिक्ट के लोगों का कहना है कि विनय भाटिया यदि थोड़ी सी भी दिलचस्पी लेते, तो डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में उन्हें लोगों के बीच शर्मिंदा न होना पड़ता । उल्लेखनीय है कि उनका क्लब एक अच्छे क्लब के रूप में पहचाना जाता है । पिछले रोटरी वर्ष में संदीप गोयल की अध्यक्षता में क्लब को इलीट क्लब अवार्ड मिला था; इस वर्ष अनिल शर्मा की अध्यक्षता में प्लेटिनम क्लब अवार्ड मिला है । पिछले रोटरी वर्ष में तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल से अवार्ड लेने के लिए संदीप गोयल के नेतृत्व में क्लब के कई लोग कार्यक्रम में पहुँचे थे; इस वर्ष लेकिन पिछले वर्ष जैसा माहौल नहीं बन पाया । हर किसी का मानना और कहना है कि पिछले वर्ष जैसे माहौल की इस वर्ष ज्यादा 'जरूरत' थी, लेकिन यह जरूरत जिन विनय भाटिया को थी - उन विनय भाटिया ने डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में पिछले वर्ष जैसा माहौल बनाने की कोई कोशिश ही नहीं की । इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि क्लब के कुछेक लोगों ने विभिन्न मौकों पर विनय भाटिया की उम्मीदवारी के अभियान से जुड़ने को लेकर जब उत्सुकता दिखाई, तो विनय भाटिया की तरफ से उन्हें कोई उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं मिली । इस बात को डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति से जोड़ कर देखें तो लगता है कि - और यह बात उनके क्लब के कुछेक लोग कहने भी लगे हैं कि - अपने चुनाव अभियान में विनय भाटिया को शायद अपने क्लब के सदस्यों की मदद चाहिए ही नहीं; और वह बस पप्पुजीत सिंह सरना, सुशील खुराना और दीपक तलवार की मदद से ही गवर्नर बन जाना चाहते हैं ।
विनय भाटिया को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव अभियान में अपने क्लब के सदस्यों की मदद चाहिए या नहीं, यह तो वही जानें - लेकिन उनकी क्लब के सदस्यों के साथ बढ़ती 'दिखती' दूरी और डिस्ट्रिक्ट के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उनके क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति से उनके बारे में जो नकारात्मक परसेप्शन बन रहा है - उसे, उनकी उम्मीदवारी के समर्थक व शुभचिंतक भी उनकी उम्मीदवारी के लिए घातक मान रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट थैंक्सगिविंग कार्यक्रम में अपने क्लब के सदस्यों की अनुपस्थिति के चलते विनय भाटिया की उम्मीदवारी के अभियान को जो तगड़ा झटका लगा है, उसे सँभालने के लिए विनय भाटिया आगे क्या कदम उठाते हैं - उठाते भी हैं या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा । 

Tuesday, May 26, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अपने हुड़दंगी आयोजनों के चलते बदनामी कमा और नुकसान उठा कर विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों ने हुड़दंग से फिलहाल तौबा तो की है, लेकिन उनकी मुश्किलें जहाँ की तहाँ ही बनी हुई हैं

फरीदाबाद/नई दिल्ली । विनय भाटिया को लोग चैन नहीं लेने दे रहे हैं, और इसलिए उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में वह करें तो आखिर क्या करें ? अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु जब वह जोरशोर से लगे थे, तब लोग शिकायत कर रहे थे कि इतना हुड़दंग क्यों मचाये हुए हो; लोगों की सलाह पर उन्होंने हुड़दंग मचाना बंद किया तो अब लोग शिकायती लहजे में पूछ रहे हैं कि ठंडे क्यों पड़ गए हो ? जाहिर है कि लोग उनकी किसी भी कार्रवाई से खुश नहीं हो रहे हैं; और इसीलिए उनके सामने यह सवाल बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है कि लोग आखिर उनसे चाहते क्या हैं ? लोगों को तो छोड़िये, डिस्ट्रिक्ट को 'चलाने' वाले प्रमुख पदाधिकारियों ने उनसे जैसे मुँह मोड़ लिया दिख रहा है - उससे तो उनके शुभचिंतकों तक के बीच गहरी निराशा पैदा हो गई है । डिस्ट्रिक्ट के फेसबुक पेज पर डिस्ट्रिक्ट असेम्बली की सात सौ से अधिक तस्वीरें लगी हैं, जिनमें विनय भाटिया कहीं भी नजर नहीं आ रहे हैं; जबकि इससे पहले के आयोजनों की जो तस्वीरें इस पेज पर हैं उनमें विनय भाटिया की धूम मची दिखती है । इसी से लोगों के बीच सवाल उठे कि डिस्ट्रिक्ट असेम्बली में विनय भाटिया ने दिलचस्पी नहीं ली, या उनकी दिलचस्पी में डिस्ट्रिक्ट चलाने वाले लोगों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई ? इसे विनय भाटिया की बदकिस्मती ही कहेंगे कि उन्होंने जो भी किया, उस पर विवाद हो गया - लोगों ने उसे अच्छा नहीं माना और उसके चलते उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में एक नकारात्मक प्रभाव बना । 
विनय भाटिया के कुछेक नजदीकियों का कहना लेकिन यह है कि शुरूआत में उनकी तरफ से जो हुड़दंग मचाया गया, वह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा भी था - जिसका उद्देश्य दरअसल रवि दयाल को 'डराना' था । उल्लेखनीय है कि उस समय रवि दयाल की उम्मीदवारी को लेकर असमंजस बना हुआ था और रवि दयाल खुद अपनी उम्मीदवारी को लेकर हाँ/ना की स्थिति में फँसे हुए थे । ऐसे में, विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों ने सोचा कि वह अपनी उम्मीदवारी का जोर दिखायेंगे तो रवि दयाल हतोत्साहित होंगे और चुनावी मैदान छोड़ देंगे । रवि दयाल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मैदान से बाहर करने/रखने के लिए विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों ने जो रणनीति बनाई, उसका लेकिन उलटा ही असर दिखाई दिया । विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों की तरफ से मचे हुड़दंग से पहले रवि दयाल की उम्मीदवारी को लेकर जो असमंजस था, वह हुड़दंग के बीच दूर हो गया और रवि दयाल चुनावी मैदान में आ डटे । विनय भाटिया के ही समर्थकों का मानना और कहना है कि उनकी रणनीति बूमरैंग कर गई और उम्मीदवार के रूप में रवि दयाल को डराने की बजाये ताकत दे गई । 
विनय भाटिया और उनके संगी-साथी दरअसल इस तथ्य को भूल बैठे कि हुड़दंग जब लाया जाता है और आता है, तब वह 'बेबकूफी' और 'बेहूदगी' नाम की अपनी चचेरी बहनों को अपने साथ लाता है । वह भले ही इस तथ्य को भूल बैठे, और उन्होंने सिर्फ हुड़दंग को बुलाया - लेकिन हुड़दंग अपने साथ बेबकूफी और बेहूदगी को लाना नहीं भूला । विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों ने जिस तरह की जो हुड़दंगी हरकतें कीं - उनमें बेबकूफी और बेहूदगी के जो निशान दिखे, उससे फरीदाबाद से लेकर डिस्ट्रिक्ट तक में लोग नाराज हुए । पेट्स से पहले फरीदाबाद में तो नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि फरीदाबाद में कुछेक लोगों ने पेट्स में विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों के साथ 'खड़े होने' तक से इंकार तक कर दिया । चारों तरफ किरकिरी हुई तो विनय भाटिया के ही कुछेक समर्थकों ने उन्हें सलाह दी कि इस तरह के हुड़दंग से फायदा कुछ नहीं होगा, उलटे नुकसान ही होगा - इसलिए इससे बचो । विनय भाटिया ने भी अपने अनुभव से समझा/पाया कि जो लोग यह सलाह दे रहे हैं, वह ठीक ही कह रहे हैं । इसलिए विनय भाटिया ने यह सलाह मानने में देर नहीं लगाई । 
विनय भाटिया ने लेकिन जब तक यह सलाह मानी और इस पर अमल किया, तब तक उनका बहुत नुकसान हो चुका था । अपने हुड़दंगी आयोजनों को संभव बनाने के लिए उन्होंने फरीदाबाद में लोगों से जिस तरह के 'सहयोग' माँगे, और इन सहयोगों को जुटाने के लिए जिस तरह की तरकीबें लड़ाई - उससे उन्होंने फरीदाबाद में तो कई लोगों को नाराज कर ही लिया; साथ ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच भी अपनी 'कमजोरियों' को जाहिर कर दिया । समझा जाता है कि इससे ही रवि दयाल और उनके समर्थकों को बल मिला और उन्होंने रवि दयाल की उम्मीदवारी के झंडे को चुनावी मैदान में मजबूती से गाड़ दिया ।
जो हुआ, सो हुआ । बदनामी कमा और नुकसान उठा कर विनय भाटिया और उनके संगी-साथियों ने हुड़दंग से फिलहाल तौबा की । विनय भाटिया अपनी उम्मीदवारी के अभियान को चलाने के लिए फरीदाबाद के जिन लोगों पर निर्भर हैं, उन्हें जानने/पहचानने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह है कि यह तौबा ज्यादा दिन तक बनी नहीं रह पाएगी । यह तो चलो बाद की बात है, इसे बाद में देखा जायेगा; विनय भाटिया के लिए लेकिन अभी की समस्या यह पैदा हो गई है कि अब जब वह उम्मीदवार के रूप में भले और गंभीर बनने/दिखने का प्रयास कर रहे हैं, तो लोग पूछ रहे हैं कि वह ठंडे क्यों पड़ गए हैं ? 

Sunday, March 29, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में पेट्स में दिए जाने वाले गिफ्ट को स्पॉन्सर करने के मनमाने तरीके से लिए गए फैसले को लेकर फरीदाबाद में बबाल और निशाने पर विनय भाटिया

फरीदाबाद । पेट्स में प्रतिभागियों को दी जाने वाली किट के लिए गिफ्ट स्पॉन्सर करने को लेकर फरीदाबाद में बबाल हो गया है । पेट्स में जाने वाले लोगों के बीच इस बात को लेकर गहरी नाराजगी पैदा हो गई है कि तीन-चार लोगों ने मनमाने तरीके से गिफ्ट का खर्च उनके ऊपर डाल दिया है । उल्लेखनीय है कि तीन-चार लोगों ने मनमाने तरीके से फैसला किया और पेट्स में जाने वाले लोगों को गिफ्ट के खर्च के नाम पर पंद्रह-पंद्रह हजार रुपये देने का फरमान सुना दिया गया है । इन लोगों की शिकायत है कि गिफ्ट स्पॉन्सर करने का फैसला लेते समय तो इनसे कोई सलाह नहीं ली गई; और अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए फरीदाबाद की तरफ से गिफ्ट स्पॉन्सर करने के लिए हामी भर दी । इस स्पॉन्सरशिप का पैसा कैसे इकठ्ठा हो, इसके लिए भी सभी की सलाह लेना जरूरी नहीं समझा गया - और मनमाने तरीके से स्पॉन्सरशिप के खर्चे का बोझ पेट्स में जाने वाले लोगों के सिर मढ़ दिया गया । पेट्स के गिफ्ट स्पॉन्सर करने को चूँकि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत होने वाली विनय भाटिया की उम्मीदवारी के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है, इसलिए जो बबाल पैदा हुआ है उसके निशाने पर विनय भाटिया भी आ गए हैं ।
दरअसल पिछले एक आयोजन में रवि दयाल के क्लब द्धारा गिफ्ट स्पॉन्सर करने के बाद से ही विनय भाटिया द्धारा भी अगले किसी आयोजन में गिफ्ट स्पॉन्सर करने की चर्चा थी । उल्लेखनीय है कि रवि दयाल को भी अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । ऐसे में यह स्वाभाविक रूप से जरूरी हो गया माना गया कि जो काम रवि दयाल ने किया, वही काम विनय भाटिया भी करें । इसी जरूरत के चलते पेट्स में गिफ्ट स्पॉन्सर करने की जिम्मेदारी फरीदाबाद के नाम पर ले ली गई । एक आम धारणा है कि इस तरह की स्पॉन्सरशिप से यदि किसी उम्मीदवार का नाम जुड़ा होता है तो उसका खर्च वह उम्मीदवार और या उसका क्लब ही वहन करता है । रवि दयाल के क्लब ने जो गिफ्ट स्पॉन्सर किए उसका खर्च रवि दयाल ने वहन किया या उनके क्लब ने - यह वह जानें; विनय भाटिया की तरफ से स्पॉन्सर किए जाने वाले गिफ्ट का खर्चा फरीदाबाद के लोगों के सिर पर जिस तरह से डाल दिया गया - उसे लेकर फरीदाबाद के लोगों के बीच ही नाराजगी है । नाराज लोगों का कहना है कि विनय भाटिया को अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के लिए जो उपक्रम करने हैं, उनका खर्चा उन्हें खुद ही उठाना चाहिए; और किसी काम में उन्हें यदि दूसरों की मदद चाहिए भी तो उस काम को लेकर उन्हें दूसरों से कम-से-कम बात तो करना चाहिए - खर्चा जबरदस्ती दूसरों पर थोपना तो नहीं चाहिए ।
इस बबाल के चलते फरीदाबाद में लोग अब यह कहने लगे हैं कि विनय भाटिया कुछेक ऐसे स्वयंभू नेताओं के चंगुल में फँस गए हैं, जो किसी के लिए भी कुछ भी कहने/सुनने को और फरीदाबाद के नाम पर कोई भी फैसला करने को अपना अधिकार मानते/समझते हैं । ऐसे ही लोगों के कहने में आकर विनय भाटिया ने पहले तो फरीदाबाद के लोगों से बिना विचार-विमर्श किए पेट्स में फरीदाबाद की तरफ से गिफ्ट स्पॉन्सर करने का फैसला कर लिया; और उसके बाद गिफ्ट का खर्च फरीदाबाद के लोगों के जिम्मे डालने में भी उनसे कोई विचार-विमर्श नहीं किया । लोगों का कहना है कि विनय भाटिया और उनके साथ लगे फरीदाबाद के स्वयंभू नेताओं की इस तरह की मनमानियों का विरोध हो सकता है कि लोग अभी खुल कर न करें, लेकिन विनय भाटिया को समझना चाहिए कि इस तरह की मनमानियों के चलते वह लोगों को अपने से दूर कर लेंगे - जिससे उन्हें चुनाव में समस्या होगी । विनय भाटिया के नजदीकियों को भी लगता है कि उनके सामने सचमुच में यह बड़ी चुनौती है कि फरीदाबाद में वह किसकी कितनी बात मानें और कब मानें ? विनय भाटिया की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले दिल्ली के लोगों का भी मानना और कहना है कि फरीदाबाद में अपने ही समर्थक नेताओं के मनमाने रवैये के कारण विनय भाटिया फरीदाबाद के ही दूसरे लोगों के बीच जिस तरह से निशाना बनाये जाने लगे हैं - वह अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी के संदर्भ में कोई अच्छे संकेत नहीं हैं ।

Sunday, March 15, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डॉक्टर सुब्रमणियन का रास्ता साफ करने के लिए सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को वापस कराने वाले नेताओं के बदले बदले रवैये से खुद को ठगा महसूस कर रहे सुरेश भसीन को अपने समर्थकों व शुभचिंतकों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ रहा है

नई दिल्ली । सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को उन नेताओं के रवैये से तगड़ा झटका लगा है, जिनके भरोसे पर सुरेश भसीन ने मौजूदा रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लिए था और डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए रास्ता खुला छोड़ दिया था । उल्लेखनीय है कि सुरेश भसीन ने ऐसा डॉक्टर सुब्रमणियन के समर्थक नेताओं के इस आश्वासन पर किया था कि अगले रोटरी वर्ष में वह उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने में मदद करेंगे । सुरेश भसीन को यह आश्वासन देने वाले नेता लेकिन अब सरोज जोशी और या रवि दयाल और या विनय भाटिया की उम्मीदवारी की बातें करते सुने जा रहे हैं । सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को लेकर तो वह कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखा रहे हैं । सुरेश भसीन के लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह हुई है कि वही नेता अब इस बात से ही इंकार कर रहे हैं कि उन्होंने सुरेश भसीन को किसी भी तरह का कोई आश्वासन दिया था । नेताओं के इस रवैये से सुरेश भसीन के सामने अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत की जाने वाली अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान शुरू करना मुश्किल हो गया है ।
सुरेश भसीन को दोहरी समस्या का सामना करना पड़ रहा है - एक तरफ तो जिन नेताओं से उन्हें समर्थन मिलने की उम्मीद थी वह नेता उन्हें ठेंगा दिखाते हुए दिख रहे हैं; तो दूसरी तरफ उनके लिए लोगों को यह समझाना मुसीबत बना हुआ है कि उन्होंने इस बार अपनी उम्मीदवारी को वापस क्यों ले लिया ? सुरेश भसीन ने इस वर्ष जिस तरह अचानक से अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लिया, उसके कारण उनके कई समर्थक उनसे नाराज हुए हैं और वह मानने/कहने लगे हैं कि सुरेश भसीन पर भरोसा करके तो वह अपने को ही मुसीबत में डालेंगे । कई लोगों ने उनसे भी कहा है कि हमने तो आपका समर्थन करने का फैसला लिया ही था और अपने इस फैसले से आपको अवगत भी करा दिया था, किंतु आपने हमें विश्वास में लिए बिना ही अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लिया । ऐसे में अब कैसे विश्वास करें कि अगली बार आप ऐसा नहीं करेंगे ? इस शिकायत रूपी सवाल का जबाव देना सुरेश भसीन के लिए सचमुच मुश्किल बना हुआ है ।
सुरेश भसीन ने इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी को लेकर अच्छी तैयारी की थी और अपने लिए खासा समर्थन जुटा भी लिया था । उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार डॉक्टर सुब्रमणियन का हालाँकि अच्छा ऑरा (आभामंडल) था और ज्यादातर नेताओं का खुला समर्थन भी उनके साथ था, लेकिन फील्डवर्क के मामले में चूँकि उनकी कमजोरी दिख रही थी - इसलिए सुरेश भसीन को भी मुकाबले में देखा/पहचाना जा रहा था । डिस्ट्रिक्ट में हर कोई यूँ तो डॉक्टर सुब्रमणियन का पलड़ा ही भारी मान/समझ रहा था, लेकिन फिर भी डॉक्टर सुब्रमणियन के समर्थक नेता कोई खतरा नहीं मोल लेना चाहते थे । इस सबके चलते भी सुरेश भसीन को अच्छा-खासा समर्थन मिल गया था और लोग एक दिलचस्प मुकाबले का अनुमान लगा रहे थे । सुरेश भसीन ने लेकिन गुपचुप तरीके से अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर उस अनुमान में पलीता लगा दिया । इससे उन लोगों को गहरा धक्का लगा, जो सुरेश भसीन के साथ जुड़ गए थे । वही लोग अब सुरेश भसीन के साथ दोबारा जुड़ने को तैयार होते हुए नहीं दिख रहे हैं और साफ साफ पूछ भी रहे हैं कि फिर से आप पर विश्वास क्यों करें ? इनमें से कुछेक का मानना और कहना है कि इस वर्ष जब चुनाव का परिदृश्य सुरेश भसीन के लिए खासा अनुकूल था तब वह चुनाव नहीं लड़ सके, तब फिर अगले रोटरी वर्ष में होने वाले चुनाव में वह कैसे टिके रह पायेंगे - क्योंकि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए होने वाले चुनाव के तो इस वर्ष के 'चुनाव' से ज्यादा ट्रिकी होने की संभावना बन रही है ।
अगले रोटरी वर्ष में होने वाले चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा उत्साह में विनय भाटिया और उनके समर्थक हैं । इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर रवि चौधरी को जो जीत मिली है उससे वह बम बम हैं । रवि चौधरी की उम्मीदवारी के पीछे जो नेता लोग थे, विनय भाटिया को उन नेताओं के समर्थन का भरोसा है । विनय भाटिया के समर्थकों का मानना और कहना है कि  नेताओं ने जब रवि चौधरी को चुनाव जितवा दिया है, तो फिर विनय भाटिया को जितवाने में तो इन्हें कोई मुश्किल होगी ही नहीं । रवि चौधरी की जीत से विनय भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक अभी से ही अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो गए हैं । डिस्ट्रिक्ट के दूसरे कई नेता रवि दयाल और सरोज जोशी की उम्मीदवारी में अपनी राजनीति के मौके देख रहे हैं । रवि दयाल की उम्मीदवारी को लेकर इन नेताओं में हालाँकि अभी भी बहुत आश्वस्ति का भाव नहीं है - रवि दयाल कभी तो अपनी उम्मीदवारी को लेकर सक्रिय होते से लगते/दिखते हैं, लेकिन कभी अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटते हुए नजर आते हैं, इसलिए अभी तक भी वह अपने नजदीकी लोगों को भी अपनी उम्मीदवारी के प्रति आश्वस्त नहीं कर सके हैं । सरोज जोशी जरूर अपनी उम्मीदवारी को लेकर भरोसा बनाने का प्रयास करती हुई दिखी हैं, और उनके इन्हीं प्रयासों के भरोसे उनके समर्थकों को उम्मीद है कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट के नेताओं का समर्थन भी मिल जायेगा ।
डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के विनय भाटिया, रवि दयाल और सरोज जोशी के समर्थन में बँट जाने से सुरेश भसीन के लिए मामला जहाँ का तहाँ ही रह गया दिख रहा है । सुरेश भसीन के नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि अभी भले ही सुरेश भसीन के साथ कोई न दिख रहा हो, लेकिन जल्दी ही जब बाकी तीनों उम्मीदवारों की कमजोरियाँ सामने आने लगेंगी, तब नेताओं के बीच भी एक अलग समीकरण बनेगा और तब सुरेश भसीन के लिए हालात उतने विरोधी नहीं रह जायेंगे, जितने अभी दिख रहे हैं । नेताओं के मामले में भले ही ऐसा हो जाये, लेकिन इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी को गुपचुप तरीके से वापस लेकर अपने जिन समर्थकों व शुभचिंतकों को सुरेश भसीन ने धक्का पहुँचाया है और नाराज किया है, उन्हें मनाना और अपने साथ लाना उनके लिए बड़ी चुनौती है ।

Friday, January 2, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 में अगले रोटरी वर्ष के लिए विनय भाटिया की तैयारी को देखते हुए ही रवि दयाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को रवि दयाल की उम्मीदवारी को लेकर चल रहे संशय को दूर करने के लिए काम करने की जरूरत महसूस हुई है और वह सक्रिय हुए हैं

नई दिल्ली । रवि दयाल और उनके क्लब - दिल्ली मेगापॉलिस तथा क्लब के कुछेक अन्य सदस्यों की सक्रियता और भागीदारी के अचानक से बढ़ने को अगले रोटरी वर्ष में उनकी उम्मीदवारी की प्रस्तुति की तैयारी से जोड़ कर देखा/पहचाना जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट 3010 के विभाजित डिस्ट्रिक्ट 3011 की पेम वन में रवि दयाल के क्लब के कुछेक सदस्यों की भागीदारी को जिस तरह से संभव बनाया गया तथा पेम टू में भी उनके क्लब को महत्वपूर्ण भूमिका दी जा रही है, उससे यही समझा जा रहा है कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालने जा रहे सुधीर मंगला का रवि दयाल की उम्मीदवार को सहयोग और समर्थन रहेगा । मजे की बात यह है कि रवि दयाल की उम्मीदवारी अभी संशय में है, लेकिन उनकी उम्मीदवारी की चर्चा जोरों पर है । 'मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त' वाली कहावत के अनुरूप रवि दयाल से ज्यादा उनके शुभचिंतक उनकी उम्मीदवारी को लेकर उत्सुक और सक्रिय हैं । रवि दयाल के नजदीकियों का कहना है कि रवि दयाल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की इच्छा तो भरपूर है; लेकिन इसके लिए उम्मीदवार बनने के साहस का उनमें अभाव है । यही कारण है कि उनका पक्के से पक्का शुभचिंतक भी, जो वास्तव में उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर देखना चाहता है, अभी उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने का दावा करने से बच रहा है । लेकिन हाँ, उनके शुभचिंतक उनकी उम्मीदवारी की हवा बनाने में जरूर जुटे दिखने लगे हैं ।
रवि दयाल की उम्मीदवारी के बड़े शुभचिंतकों ने उनकी उम्मीदवारी के संशय को दूर करने के उद्देश्य से उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में जिस तरह से माहौल बनाना शुरू किया है, उससे उनकी उम्मीदवारी की बात में गंभीरता आनी तो दिखना शुरू हुई है । पेम वन में रवि दयाल, उनके क्लब और उनके क्लब के कुछेक सदस्यों को जो तवज्जो मिली; तथा पेम टू में जो तवज्जो मिलने के आसार नजर आ रहे हैं, उसे उनकी उम्मीदवारी को सुनिश्चित करने की कार्रवाई के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस कार्रवाई ने विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों को सतर्क किया है । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के एक बड़े समर्थक ने बताया कि उन्होंने सुधीर मंगला को सुझाव दिया है कि उन्हें अपना गवर्नर-काल यदि ठीक से चलाना है तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के पचड़े में उन्हें नहीं पड़ना चाहिए तथा किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में नहीं दिखना चाहिए । उल्लेखनीय है कि अगले रोटरी वर्ष के लिए रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के विनय भाटिया ने अपनी उम्मीदवारी को घोषित किया हुआ है और आवश्यकतानुरूप अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम भी शुरू किया हुआ है ।
दरअसल अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली अपनी उम्मीदवारी को लेकर विनय भाटिया ने जिस तरह की तैयारी दिखाई है, उसके कारण ही रवि दयाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को यह जरूरी लगा है कि वह रवि दयाल की उम्मीदवारी को लेकर चल रहे संशय को दूर करने का काम तो करें और साथ ही ऐसा कुछ भी करें जिससे कि रवि दयाल की उम्मीदवारी की चर्चा बने और लोगों के बीच रवि दयाल की उम्मीदवारी के प्रति विश्वास बने । रवि दयाल के नजदीकियों का कहना है कि रवि दयाल अपनी उम्मीदवारी के बारे में फैसला करने के लिए मौजूदा रोटरी वर्ष की चुनावी प्रक्रिया के पूरी हो जाने का इंतजार कर रहे थे । मौजूदा रोटरी वर्ष की चुनावी प्रक्रिया के पूरी हो जाने के बाद ही चूँकि अगले रोटरी वर्ष का चुनावी परिदृश्य स्पष्ट होगा; इसलिए उस परिदृश्य के स्पष्ट हो जाने के बाद ही रवि दयाल अपनी उम्मीदवारी के बारे में फैसला करने की सोच रहे थे । रवि दयाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी यह इंतजार कर लेना ठीक ही लग रहा था । लेकिन अगले रोटरी वर्ष के लिए विनय भाटिया की सक्रियता ने उनकी इस सोच को प्रभावित किया; और रवि दयाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को लगा कि इस वर्ष की चुनावी प्रक्रिया के पूरी होने का उन्होंने यदि इंतजार किया तो विनय भाटिया तो उनसे बहुत आगे निकल जायेंगे ।
रवि दयाल के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि रवि दयाल की रोटरी में जिस तरह की सक्रियता रही है, और जिस प्रकार वह अधिकतर गवर्नर्स की गुडबुक में रहे हैं और रोटेरियंस के बीच उनकी काम करने से मतलब रखने वाली छवि है - उसके कारण उनके लिए समर्थन जुटाना मुश्किल नहीं होगा । रवि दयाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि रवि दयाल लोगों से परिचित होने की पहल करने में तथा लोगों से घुलने-मिलने के मामले में फिसड्डी रहे हैं, और उम्मीदवार के रूप में उन्हें बस अपनी इसी कमी को दूर करना है । रवि दयाल को जानने वाले लोगों में से कुछेक का कहना है कि अपनी इसी कमजोरी के कारण वह अभी तक उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की हिम्मत नहीं कर पाए हैं; जबकि अन्य कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि रवि दयाल काम से काम रखने वाले व्यक्ति हैं और वह आवश्यकतानुसार ही काम करते हैं; अब जब उम्मीदवार के रूप में उनके लिए सक्रिय होने की जरूरत होगी तो वह सक्रिय हो जायेंगे । इस मामले में उनकी तुलना संजय खन्ना से की जाती है । लोगों का कहना है कि उम्मीदवार के रूप में संजय खन्ना ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई थी, उनसे उस तरह की सक्रियता दिखा सकने की उम्मीद उनके नजदीकियों को भी नहीं थी । किंतु जब सर पर पड़ी, तो उन्होंने वह कर दिखाया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी । रवि दयाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भरोसा है कि रवि दयाल भी जब जैसी जरूरत होगी, अपनी सक्रियता दिखा देंगे ।
रवि दयाल की उम्मीदवारी को प्रस्तुत होते हुए देखने वालों ने जिस तरह अगले रोटरी वर्ष के लिए तैयारी शुरू की है, उससे अगले रोटरी वर्ष में होने वाली चुनावी लड़ाई का परिदृश्य कुछ कुछ साफ होता हुआ नजर आ रहा है । विनय भाटिया की तरफ से पहले ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि अगले रोटरी वर्ष में उनकी उम्मीदवारी तो पक्की है । कुछेक लोगों को लग रहा है कि अगले रोटरी वर्ष में विनय भाटिया और रवि दयाल के बीच चुनावी मुकाबले का सीन देखने को मिल सकता है; जबकि कुछेक अन्य रवि दयाल की उम्मीदवारी के प्रति आश्वस्त होने के लिए अभी कुछ और इंतजार कर लेना चाहते हैं ।