Wednesday, August 31, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने अधिष्ठापन समारोह में बदइंतजामी का जो 'इंतजाम' किया, उसने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवार मधु सिंह की मुश्किलों को बढ़ाया

आगरा । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी को प्रमोट करने का कोई मौका तो हालाँकि नहीं छोड़ा गया, किंतु अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी ने सारा गुड़ - गोबर कर दिया । भूख की बात तो छोड़िए, अधिष्ठापन समारोह में पहुँचे लोगों का प्यास के मारे जो बुरा हाल हुआ, उसका नतीजा रहा कि तमाम लोग अधिष्ठापन समारोह की व्यवस्था करने वाले पदाधिकारियों को तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल को बुरी तरह कोसते नज़र आए । समारोह में पहुँची महिलाओं का तो बदइंतजामी के कारण और भी बुरा हाल हुआ - और वह तथा उनके पति बेबस नज़र आए । यूँ तो किसी भी कार्यक्रम में - जिसमें चार/पाँच सौ लोग हों, थोड़ी बहुत बदइंतजामी तो हो ही जाती है, और कुछेक लोगों को परेशानी होती ही है; किंतु क्लार्क शिराज़ में आयोजित हुए इस बार के डिस्ट्रिक्ट अधिष्ठापन समारोह में जो नज़ारा देखने को मिला - वह अभूतपूर्व है । यही कारण है कि अधिष्ठापन समारोह के भुक्तभोगियों ने वॉट्स ऐप पर अपने गुस्से का इज़हार किया है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि बदइंतजामियों की शिकायतें लायंस पदाधिकारी आपसी बातचीत में तो करते रहते हैं, लेकिन अपनी शिकायतों को रिकॉर्ड पर लाने से वह बचते रहते हैं; पहली बार देखने में आया है कि लायंस पदाधिकारी अपनी शिकायतें रिकॉर्ड पर ला रहे हैं - इससे यही जाहिर हुआ है कि इस बार लोग बहुत ही परेशान हुए हैं, और उनके लिए अपने गुस्से और अपनी नाराजगी को दबा/छिपा पाना मुश्किल हो रहा है; और वह खुल कर अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी की तथा उसके लिए जिम्मेदार लोगों की लानत-मलानत कर रहे हैं ।
लायंस पदाधिकारियों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि अधिष्ठापन समारोह में लोगों को शाम चार बजे से बुला लिया गया, लेकिन रात नौ बजे तक चले कार्यक्रम के बीच पानी की सर्विस भी नहीं होने दी गई । होटल स्टॉफ के लोगों ने पानी माँग रहे लायंस को साफ साफ कह दिया कि आयोजनकर्ताओं ने कार्यक्रम के बीच में खाने-पीने की सर्विस खोलने से मना किया है - और चेतावनी के साथ मना किया है । कार्यक्रम के बीच में प्यास से व्याकुल हो रहे लोगों को यह देख/जान कर और परेशानी हुई कि हॉल से बाहर जाने के रास्ते/दरवाजे बंद हैं, और आने व जाने के लिए सिर्फ एक ही दरवाजा खुला हुआ है । सुरक्षा कारणों से इसे और भी ज्यादा खतरनाक माना/बताया गया । अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी को लेकर लिखी गईं एक वाट्स ऐप पोस्ट्स में कहा गया है कि समारोह की व्यवस्था देख रहे पदाधिकारियों की लापरवाही से कोई छोटी सी दुर्घटना बड़े हादसे में बदल सकती थी । समारोह के मंच संचालन में कोई व्यवस्था थी ही नहीं, और वक्ता लोग फालतू की तथा बेसिरपैर की बातें करते हुए और बेहूदा व अशालीन किस्म की चुटकुलेबाजी व शायरी करते हुए कार्यक्रम को लंबा खींच रहे थे - मंच संचालन करने वाले रोटरी नेताओं ने यह सब होने दिया, और इस बात की जरा भी परवाह नहीं की कि फालतू में लंबे खिंचते कार्यक्रम से लोगों की परेशानियाँ और बढ़ रही हैं । इसी का नतीजा रहा कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब पानी और खाना खुला तो उसे लेने के लिए लोगों के बीच भारी अफरातफरी फैल गई और लोगों के बीच झगड़े तक की नौबतें आईं । डिस्ट्रिक्ट के पुराने लायन सदस्यों का कहना रहा कि बदइंतजामी से भरा इतना घटिया आयोजन डिस्ट्रिक्ट में इससे पहले कभी नहीं हुआ ।
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी की राजनीतिक चोट लेकिन मधु सिंह पर पड़ी । दरअसल डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी और उसके कारण लायन सदस्यों व पदाधिकारियों को हुई परेशानी के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सहित जो लायन नेता व पदाधिकारी जिम्मेदार हैं, वही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत मधु सिंह की उम्मीदवारी की बागडोर सँभाले हुए हैं; इसलिए अपनी अपनी परेशानी का गुस्सा उतारने तथा बदला लेने के लिए लोगों को मधु सिंह की उम्मीदवारी के रूप में एक 'निशाना' मिल गया है । बदइंतजामी और परेशानियों का शिकार हुए लायन सदस्यों व पदाधिकारियों का गुस्सा मधु सिंह की उम्मीदवारी पर इसलिए भी फूट रहा है, क्योंकि उनकी परेशानियों को बढ़ाने में मधु सिंह की उम्मीदवारी को प्रमोट करने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल की कोशिश की भी बड़ी भूमिका रही । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दूसरे उम्मीदवार सुमित गुप्ता को कार्यक्रम स्थल के नजदीक फैलोशिप स्टॉल लगाने की अनुमति नहीं दी; अनुमति तो उन्होंने इसलिए नहीं दी, ताकि सुमित गुप्ता डिस्ट्रिक्ट के लायन सदस्यों व पदाधिकारियों के बीच अपनी पहचान व पैठ न बना लें - लेकिन नतीजा उल्टा निकला । अब लोग सीपी सिंघल तथा मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक दूसरे नेताओं को कोस रहे हैं कि उनकी छोटी सोच ने लोगों को परेशानी में डाल दिया । लोगों का मानना और कहना है कि सुमित गुप्ता को फैलोशिप स्टॉल यदि लगाने दिया होता, तो कार्यक्रम में बदइंतजामी का शिकार हुए लोगों को इतनी परेशानी नहीं हुई होती ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल और मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक अन्य नेताओं की इस बेवकूफीपूर्ण हरकत से सुमित गुप्ता को बहुत फायदा हुआ - उन्होंने होटल के एक कमरे में फैलोशिप की व्यवस्था करके लोगों को यह संदेश भी दे दिया कि वह तो लोगों को सुविधा उपलब्ध करवाना चाहते थे, और लोगों की सहानुभूति भी जुटा ली । मधु सिंह की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच विरोध फैला/बढ़ा - यह सुमित गुप्ता के लिए बोनस पाने जैसा मामला रहा । इस सारे प्रकरण को देखते/समझते हुए मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं तक ने कहना शुरू कर दिया है कि मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक सीपी सिंघल तथा दूसरे नेताओं ने अधिष्ठापन समारोह को जिस तरह से अंजाम दिया है, उससे उम्मीदवार के रूप में मधु सिंह की मुश्किलें काफी बढ़ गईं हैं - और यदि आगे भी इसी तरह की बेवकूफियाँ होती रहीं, तो मधु सिंह पिछली बार तो करीब 80 वोटों से हारी थीं - अब की बार और ज्यादा वोटों से हारेंगी ।

Tuesday, August 30, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दीपक गर्ग के इस्तीफ़े से शुरू हुए नाटक के अंजाम तक पहुँचने से पहले ही आलोचना का शिकार हो जाने से पूजा बंसल का कोई फायदा हो सकेगा क्या ?

नई दिल्ली । दीपक गर्ग के इस्तीफे के कारण खाली हुए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन पद पर कब्ज़े को लेकर पॉवर ग्रुप में सुबह-शाम नए समीकरण बन/बिगड़ तो रहे हैं, लेकिन किसी समीकरण पर बात बन नहीं पा रही है - और इस स्थिति में लोगों को पूजा बंसल की दाल गलती हुई नजर आ रही है । पूजा बंसल दरअसल इस तर्क के आधार पर चेयरपरसन पद पर अपना दावा जता रही हैं कि चेयरपरसन पद के लिए चुनाव तो एक वर्ष में एक बार ही होने की परंपरा है; इसलिए दीपक गर्ग के इस्तीफे से खाली हुए पद को भरने के लिए चुनाव कराना - उस परंपरा को तोड़ने जैसा होगा; इसलिए परंपरा को तोड़ने की बजाए वाइस चेयरपरसन को ही चेयरपरसन बना देना चाहिए । वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल खुद हैं और उम्मीद करती हैं कि शांता क्लॉज उन्हें चेयरपरसन का पद का गिफ्ट दिलवा देंगे । उनके इस तर्क में दम इस कारण से और भर गया है - क्योंकि दीपक गर्ग के इस्तीफे के जरिए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा तथा रीजनल काउंसिल के उनके समर्थक लोगों ने अपनी कठपुतली बनाने का जो कांड किया है, उसकी चौतरफा निंदा ही हो रही है । इस चौतरफा निंदा ने राजेश शर्मा तथा उनके समर्थकों की भारी फजीहत की है, और उन्हें अपनी योजना में पंक्चर होता हुआ नजर आ रहा है । हालाँकि यह उनकी खुशकिस्मती है कि उनकी इस फजीहत का फायदा उठाने के लिए उनके विरोधी आपसी एकता नहीं बना पा रहे हैं । विरोधियों के बीच बने बिखराव ने पॉवर ग्रुप के सदस्यों को एकजुट बने रहने के लिए 'मजबूर' किया हुआ है ।
 रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप से बाहर के सदस्यों को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों से 'मदद' की उम्मीद थी, किंतु सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के अपने लफड़े हैं : नवीन गुप्ता कभी किसी भी काम में कोई दिलचस्पी लेते ही नहीं हैं; संजीव चौधरी और संजय वासुदेवा विवादास्पद मामलों से दूर रहने का प्रयास करते हैं; संजय अग्रवाल और विजय गुप्ता वाइस प्रेसीडेंट चुनाव के मद्देनजर मामले से दूर रहने में अपनी भलाई देख रहे है; अतुल गुप्ता को बेपेंदी के लौटे के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जिनके बारे में कोई भी आश्वस्त भाव से यह नहीं कह/बता सकता है कि वह लुढ़क कर कब किस तरफ पहुँच जायेंगे । लिहाजा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मदद के सहारे रीजनल काउंसिल में चेयरपरसन का पद पाने की योजना बनाने वाले विरोधी खेमे के लोगों को तगड़ा झटका लगा है, और राजेश शर्मा एण्ड टीम ने राहत महसूस की है ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप में अभी एकजुटता तो बनी हुई दिख रही है, लेकिन इस एकजुटता की दीवारों में से मट्ठा भी रिसता हुआ नजर आ रहा है : पॉवर ग्रुप के सदस्यों के नजदीकियों का कहना है कि पॉवर ग्रुप के सदस्यों के बीच परस्पर अविश्वास के बीज पड़ चुके हैं, और हर सदस्य दूसरे सदस्य पर शक कर रहा है । मजेदार बात यह है कि अभी तक कोई भी चेयरपरसन पद के लिए अपनी दावेदारी पेश नहीं कर रहा है, लेकिन हर कोई यह सुनिश्चित कर लेने में लगा हुआ है कि चेयरपरसन का पद किसी दूसरे को न मिल जाए । पॉवर ग्रुप का हर सदस्य उम्मीद कर रहा है कि चेयरपरसन पद के लिए दूसरा कोई उसका नाम प्रस्तावित करे और आगे बढ़ाए; पर कोई भी किसी दूसरे का नाम आगे करने में दिलचस्पी नहीं ले रहा है । इस उठापटक में सबसे ज्यादा नुकसान पंकज पेरिवाल का होता दिख रहा है । लोगों के बीच यह बात चर्चा में आई थी कि दीपक गर्ग के अचानक हुए इस्तीफे के नाटक के मास्टरमाइंड राजेश शर्मा हैं, जिन्होंने छह छह महीने के चेयरपरसन बनवाने का जिम्मा उठाया है - और जो अगला चेयरपरसन पंकज पेरिवाल को बनवायेंगे; लेकिन दीपक गर्ग के इस्तीफे से साथ ही जो बबाल पैदा हुआ है, उसके कारण राजेश शर्मा ने फिलहाल चुप्पी साध ली है । राजेश शर्मा को दबाव में देख पॉवर ग्रुप के सदस्यों के बीच भी पंकज पेरिवाल के 'भाव' एकदम से गिर गए हैं । पॉवर ग्रुप की चौकड़ी में पंकज पेरिवाल पहले भी अलग-थलग ही पड़े हुए थे । 
इस बीच एक संभावना यह भी पैदा हुई कि दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा मंजूर ही न हो और उनसे अपना इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए कह दिया जाए - और उन्हें ही चेयरपरसन बने रहने दिया जाए । दीपक गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि दीपक गर्ग खुद भी यही चाहते हैं । वास्तव में इसीलिए इस्तीफ़े के साथ ही उन्होंने अपने नजदीकियों के जरिए इस्तीफ़े के पीछे की अंतर्कथा को जगजाहिर कर दिया - जो बबाल का कारण बना । लेकिन पॉवर ग्रुप के सदस्यों का मानना है कि दीपक गर्ग ने यदि अपना इस्तीफ़ा वापस लिया, तो उनके साथ-साथ पॉवर ग्रुप की और ज्यादा फजीहत होगी । माना यही जायेगा कि दीपक गर्ग ने पॉवर ग्रुप को ब्लैकमेल कर लिया है । रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप के सदस्यों के नजदीकियों का कहना है कि दीपक गर्ग ने अपने इस्तीफ़े में इंस्टीट्यूट प्रशासन पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उनके लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन माफी माँगे तो ही दीपक गर्ग को अपना इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए तैयार होना चाहिए - अन्यथा, इस्तीफ़ा वापस लेने पर उनके साथ-साथ पॉवर ग्रुप के दूसरे सदस्यों की भी भारी किरकिरी होगी । इस तरह की बातों के जरिए, पॉवर ग्रुप के सदस्य दरअसल दीपक गर्ग की इस्तीफ़ा-वापसी की संभावना को ख़त्म करने का काम कर रहे हैं ।  
विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप के पास वास्तव में अभी भी पॉवर है, और अपनी एकजुटता के जरिए उन्होंने अपने संख्याबल को बदस्तूर बनाए रखा हुआ है; उन्हें इस बात से भी ताकत मिली है कि विरोधी खेमे में एकजुटता का नितांत अभाव है और सेंट्रल काउंसिल के सदस्य मामले को दूर से ही देखते रहने में मशगूल हैं - लेकिन फिर भी पॉवर ग्रुप के सदस्यों ने प्रोफेशन के लोगों के बीच अपनी प्रेस्टीज खो दी है । दरअसल इसीलिए जो भी सदस्य अगला चेयरपरसन बनना भी चाहता है, वह भी किसी से यह कहने का साहस नहीं कर पा रहा है । इसी स्थिति में यह सुझाव आया है कि रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप की लोगों के बीच जो फजीहत हो रही है, उसे देखते हुए चेयरपरसन पद के लिए चुनाव के पचड़े को छोड़ ही देना बेहतर होगा - और वाइस चेयरपरसन को ही चेयरपरसन बना देना चाहिए । पूजा बंसल खुद भी दबे-छिपे तरीके से तथा उनके नजदीकी भी इस तर्क के आधार पर माहौल बनाने में जुटे हुए हैं । उनका कहना है कि सिर्फ यही एक तरीका है जिसके जरिए पॉवर ग्रुप अपनी फजीहत के दागों को साफ कर सकता है । दीपक गर्ग के इस्तीफे के द्धारा जिस नाटक को अंजाम देने की तैयारी की गई थी, उस नाटक के आलोचना का शिकार हो जाने के कारण पटकथा में जो बदलाव होता नजर आ रहा है - वह बदलाव शांता क्लॉज की भूमिका निभाते हुए पूजा बंसल के लिए गिफ्ट लाने का काम सचमुच करेगा क्या; यह देखना दिलचस्प होगा ।

Sunday, August 28, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकार्यता व विश्वसनीयता मिलती देख डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सक्रिय खिलाड़ी नेताओं की मुसीबत बढ़ी

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के परिदृश्य में ललित खन्ना का यूँ तो कोई सक्रिय खेमा नहीं है - किंतु दीपक गुप्ता और अशोक जैन के खेमे के नेताओं ने जिस तरह से उन्हें अपनी अपनी तरफ खींचने की कोशिशें चलाई हुई हैं, उसके चलते ललित खन्ना की उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को असमंजसपूर्ण तथा दिलचस्प बनाया हुआ है । मजे का सीन यह है कि दोनों खेमे के नेता दिखावे के लिए तो ललित खन्ना की उम्मीदवारी को तवज्जो देने से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसके साथ साथ वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को वापस कराने तथा अपनी अपनी तरफ करने के जुगाड़ लगाते हुए भी देखे/सुने जाते है - ऐसे में, लोगों के बीच यही सवाल उठता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी में यदि सचमुच कोई दम नहीं है, तो फिर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं को उनकी उम्मीदवारी की उपस्थिति से परेशान क्यों होना पड़ रहा है ? खास बात यह है कि दोनों खेमे के नेता लोग ललित खन्ना को - दूसरे खेमे के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में भी पोर्ट्रेट करने की कोशिश करते हैं; इसका नतीजा यह निकल रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में ललित खन्ना को दोनों खेमे के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस तरह से, होता यह दिख रहा है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को 'मिटाने' की कोशिशें बूमरेंग करते हुए वास्तव में उनकी उम्मीदवारी को 'जमाने' का काम कर रही हैं ।
ललित खन्ना की उम्मीदवारी का 'शोर' जरूर कम है, लेकिन क्लब्स के अध्यक्षों के बीच उनकी पैठ जिस तरह से बनती नजर आ रही है - वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का मैदान मार लेने की कोशिशों में जुटे दोनों खेमे के नेताओं के लिए परेशानी का सबब बनी है । चुनावी राजनीति में खेमेबाजी का जो प्रभाव होता है, उस प्रभाव को जमाने/दिखाने में ललित खन्ना भले ही कमजोर पड़ रहे हों - लेकिन उम्मीदवार का जो अपना एक 'प्रभाव' होता/पड़ता है, उस मामले में ललित खन्ना किसी भी तरह से पीछे नहीं हैं । वह वर्षों मुकेश अरनेजा के अच्छे-बुरे समय के साथी/सहयोगी रहे हैं, और इस नाते से राजनीति की तरकीबें अच्छे से जानते/पहचानते भी हैं - और उन्हें इस्तेमाल करने के हुनर से भी परिचित हैं । राजनीति की तरकीबों को जानने/पहचानने की अपनी काबिलियत के चलते ही ललित खन्ना ने बिना किसी के सहयोग/समर्थन के बावजूद डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के गणित को उलझा दिया है । ललित खन्ना अकेले ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों से टक्कर ले रहे हैं, और अपनी उम्मीदवारी के लिए 'मौके' बना रहे हैं - इस बात ने भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों की उत्सुकता को बढ़ाया है; और उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ती इसी उत्सुकता ने डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों के सामने मुसीबत खड़ी कर दी है ।
इस तरह, ललित खन्ना की उम्मीदवारी पर किसी की 'छतरी' न होने के जिस तथ्य को उनकी बड़ी कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - उस तथ्य को उन्होंने अपनी ही छतरी तान कर अपनी ताकत बना लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के जाने-पहचाने सीन में हर उम्मीदवार किन्हीं दूसरों की छतरी में आगे बढ़ता दिखाई देता है; ललित खन्ना ने लेकिन इस जाने-पहचाने सीन को बदलने का प्रयास किया है - और वह किन्हीं दूसरों की नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी ही छतरी में अपने राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाना शुरू किया । इसका उन्हें सुफल भी मिलता दिखा है । वास्तव में, अधिकतर लोग - और इन अधिकतर लोगों में क्लब्स के अध्यक्ष भी आते हैं - उम्मीदवार में 'लीडर' के गुण देखते हैं और उन गुणों को पसंद करते हैं; लीडर जब 'इसके' या 'उसके' 'आदमी' के रूप में सामने आता है, तो वह लोगों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़/बना पाता है । उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना ने लोगों के बीच इस कारण से अपनी पैठ बनाई है - क्योंकि वह किसी नेता के 'आदमी' के रूप में लोगों के बीच नहीं हैं । क्लब्स के पदाधिकारी नेताओं की दखलंदाजी और लगातार पड़ते रहने वाले तरह तरह के उनके दबावों से प्रायः परेशान और दुखी रहते हैं, इसलिए भी ललित खन्ना के साथ वह अपने आप को कंफर्टेबल पाते हैं । क्लब्स के पदाधिकारियों की इस कंफर्टेबिलिटी को वोट में बदलने की चुनौती ललित खन्ना के सामने हालाँकि अभी बाकी है; किंतु ललित खन्ना की अभी तक की उपलब्धि ने ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं की परेशानी को बढ़ा दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी को उनकी पत्नी नीलू खन्ना की सक्रियता के चलते और व्यापकता व स्वीकार्यता मिल रही है । दरअसल नीलू खन्ना की पहचान सिर्फ ललित खन्ना की पत्नी के रूप में ही नहीं है; बल्कि इंटरनेशनल इनरव्हील डिस्ट्रिक्ट 301 की निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट चेयरपरसन के रूप में एक लीडर की भी है । अभी करीब दो महीने पहले तक वह इंटरनेशनल इनरव्हील डिस्ट्रिक्ट 301 की चेयरपरसन के रूप में सक्रिय थीं, और उनकी सक्रियता को चूँकि कई प्रमुख रोटेरियंस की पत्नियों ने नजदीक से देखा/पहचाना है; इसलिए जब वह ललित खन्ना के साथ क्लब्स के और डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में शामिल होती हैं - तो ललित खन्ना के अभियान को और नजदीकियत तथा विश्वसनीयता मिलती है । नीलू खन्ना रोटरी परिवार में एक बड़े पद पर रही हैं, इस कारण से क्लब्स के पदाधिकारियों तथा दूसरे लोगों के बीच उनका एक 'ऑरा' बनता/दिखता है, जिसका फायदा स्वतः ललित खन्ना के अभियान को मिलता ही है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को उनके क्लब के अध्यक्ष विजय भूषण की सक्रियता से भी मनोवैज्ञानिक फायदा मिल रहा है । विजय भूषण उनके साथ भी लोगों के बीच जाते हैं, और खुद अकेले भी अपनी सक्रियता लोगों - खासकर क्लब्स के अध्यक्षों के बीच रखते हैं । दीपक गुप्ता और अशोक जैन के क्लब के अध्यक्ष चूँकि इस तरह की सक्रियता के मामले में ढीले-ढाले दिखते हैं, इसलिए विजय भूषण की सक्रियता ललित खन्ना की उम्मीदवारी के काम भी आती है ।
ललित खन्ना की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले रोटेरियंस को उनसे बस एक बड़ी शिकायत यही है कि वह कभी भी सीन से गायब हो जाते हैं; हालाँकि उनके नजदीकियों का दावा है कि वह गायब कहीं नहीं होते - वह निरंतर सक्रिय हैं, होता सिर्फ यह है कि कभी कभी उनकी सक्रियता 'दिखना' बंद हो जाती है । जाहिर है कि सक्रिय होने के साथ साथ, सक्रिय 'दिखने' की जरूरत तथा अहमियत को उन्हें अभी समझना है । दीपक गुप्ता और अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने जिस तरह से बहला-फुसला कर और तरह तरह के ऑफर देकर उन्हें इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए राजी करने तथा अपने अपने साथ आने के लिए 'तैयार' करने का काम शुरू किया है, उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सक्रिय खिलाड़ी नेताओं के लिए भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी को इग्नोर करना संभव नहीं रह गया है; और वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को अपने लिए और अपने उम्मीदवार के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं ।

Friday, August 26, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग के अचानक से प्रस्तुत हुए इस्तीफे ने राजेश शर्मा के लिए चौतरफा मुसीबत खड़ी की

नई दिल्ली । दीपक गर्ग के नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद से अचानक से हुए इस्तीफे ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा को खासी मुसीबत में फँसा दिया है और उनके लिए फजीहत खड़ी कर दी है । दीपक गर्ग ने पाँच पृष्ठों के हाथ से लिखे अपने इस्तीफे में तो ठीकरा इंस्टीट्यूट प्रशासन के सिर फोड़ा है, लेकिन अपने नजदीकियों के जरिए अपने इस्तीफे की अंतर्कथा के मुख्य खलनायक के रूप में वह राजेश शर्मा को निशाना बना रहे हैं, और राजेश शर्मा को सारी समस्या की जड़ के रूप में पोर्ट्रेट कर रहे हैं । दीपक गर्ग के नजदीकियों के हवाले से जो सूचनाएँ लोगों को मिल रही हैं, उनमें कहा/सुना जा रहा है कि राजेश शर्मा ने दीपक गर्ग को अपने ऑफिस बुला कर तरह तरह की बातों से उन पर इस्तीफे के लिए दबाव बनाया; राजेश शर्मा ने उन्हें साफ धमकी दी कि उन्होंने यदि इस्तीफा नहीं दिया तो वह रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लगवायेंगे - और तब उन्हें चेयरमैन पद से भी हटना पड़ेगा और उनकी बदनामी भी होगी । दीपक गर्ग ने अपने आप को घिरा हुआ पाया और और समझ लिया कि इस्तीफा देने में ही उनकी भलाई है । राजेश शर्मा ने उनके इस्तीफे को जरूरी बताते हुए तर्क दिया कि चेयरमैन के रूप में उनकी परफॉर्मेंस बहुत ही खराब है, और चूँकि उन्हें चेयरमैन बनवाने में 'मेरी ही निर्णायक भूमिका थी, इसलिए तुम्हारे खराब परफॉर्मेंस के कारण मेरी भी बदनामी हो रही है ।' दीपक गर्ग अपने इस्तीफे का कारण क्या बताएँ - यह भी राजेश शर्मा ने ही उन्हें बताया । पिछले छह महीनों में नॉर्दर्न इंडिया रीजन में जो जो कबाड़ा हुआ, उसके लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन को जिम्मेदार ठहराकर दीपक गर्ग ने अपने आप को भी आरोपों से बचा लिया, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा भी इस आरोप से बच गए कि दीपक गर्ग को चेयरमैन बनवा कर उन्होंने नॉर्दर्न रीजन को गर्त में धकेल दिया है ।
दीपक गर्ग अपने नजदीकियों के बीच और उनके जरिए अपने इस्तीफे की लेकिन एक अलग कहानी बता रहे हैं । इस कहानी के अनुसार, राजेश शर्मा ने रीजनल काउंसिल के कई सदस्यों को चेयरमैन बनाने/बनवाने की गोली दे रखी है - समस्या की बात लेकिन यह है कि चेयरमैन तो तीन ही लोग बन सकेंगे; राजेश शर्मा को खतरा यह महसूस हो रहा है कि ऐसे में जो लोग चेयरमैन नहीं बन सकेंगे, वह अंतिम और तीसरे वर्ष में अपना गुस्सा निकालेंगे - जिससे उनके सामने चुनाव में मुसीबत खड़ी होगी । विवेक खुराना, राकेश मक्कड़, पंकज पेरिवाल, नितिन कँवर आदि तो राजेश शर्मा से उम्मीद लगाए हुए हैं ही; सुमित गर्ग और राजेंद्र अरोड़ा को भी लगने लगा है कि अपनी राजनीति जमाने के लिए राजेश शर्मा उनसे सहयोग/समर्थन ले रहे हैं, तो इसके बदले में वह उनके लिए क्या 'सोच' रहे हैं ? जाहिर है कि राजेश शर्मा ने इनका समर्थन जुटा तो लिया है, लेकिन इनका समर्थन अपने साथ बनाए रखना उनके लिए बड़ी चुनौती भी है । अपने अगले चुनाव को सुरक्षित बनाए रखने के लिए राजेश शर्मा को इस चुनौती से निपटना ही है । पिछली बार का चुनाव तो वह चरणजोत सिंह नंदा के समर्थन के भरोसे किसी तरह जीत गए थे; किंतु अगली बार जब चरणजोत सिंह नंदा खुद उम्मीदवार होंगे, तब राजेश शर्मा का क्या होगा - इसकी चिंता औरों के साथ-साथ खुद राजेश शर्मा को भी बहुत है । इसलिए राजेश शर्मा को दोस्तों की ज्यादा जरूरत है, दुश्मनों की संख्या यदि बढ़ी - तो अगले चुनाव में उनके लिए मुसीबत होगी । इस परिप्रेक्ष्य में, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के जिन सदस्यों को उन्होंने चेयरमैन बनवाने की गोली दे रखी है, उन्हें चेयरमैन बनवाना उन्हें जरूरी लग रहा है । दीपक गर्ग ने अपने नजदीकियों से और उनके जरिए जो मुख्य बात लोगों तक पहुँचवाई है, वह यह है कि राजेश शर्मा सभी को खुश करने/रखने की कोशिश में सभी को चेयरमैन बनवायेंगे - भले ही वह चार-चार छह-छह महीने के लिए ही चेयरमैन बने/रहें । अपनी इसी योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजेश शर्मा ने दीपक गर्ग की चेयरमैनी की बलि ली है ।
दीपक गर्ग के सूचनाओं के पिटारे से अभी जो सूचनाएँ निकल कर आ रही हैं, उनमें बताया जा रहा है कि राजेश शर्मा ने पंकज पेरिवाल को अगला चेयरमैन बनवाने का फैसला कर लिया है । पंकज पेरिवाल रीजनल काउंसिल की सत्ता चौकड़ी द्धारा उपेक्षित रहे हैं, और इस कारण अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हुए सत्ताधारी पॉवर ग्रुप से अलग-थलग रहे हैं । राजेश शर्मा को पंकज पेरिवाल के जरिए पंजाब में अपने अभियान को साधना है, इसलिए उन्हें पंकज पेरिवाल की नाराजगी के चलते हो सकने वाले नुकसान से अपने अभियान को बचाना है । पंकज पेरिवाल को राजेश शर्मा ने ही रीजनल काउंसिल के मौजूदा पॉवर ग्रुप में शामिल होने के लिए राजी किया था । पंकज पेरिवाल इस कारण से राजेश शर्मा से बुरी तरह नाराज थे कि उन्होंने पॉवर ग्रुप में शामिल करके अपना काम तो निकाल लिया, लेकिन फिर बाद में उनकी कोई सुध नहीं ली और उन्हें चौकड़ी द्धारा उपेक्षित व अपमानित होने के लिए अकेला छोड़ दिया । राजेश शर्मा अब उनकी सारी नाराजगी दूर कर देना चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने पंकज पेरिवाल को अगला चेयरमैन बनाने की तैयारी कर ली है ।
दीपक गर्ग की तरफ से हो रहे इन खुलासों ने राजेश शर्मा के लिए खासी दोतरफा मुसीबत खड़ी कर दी है । एक तरफ तो दीपक गर्ग के इस्तीफे का जो अप्रत्याशित नाटक हुआ है, उसे न तो इंस्टीट्यूट प्रशासन ने पसंद किया है और न रीजन के बाकी सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने । इस नाटक के असली सूत्रधार के रूप में राजेश शर्मा को चिन्हित करते हुए सभी ने अपने अपने तरीके से यही संकेत दिए हैं कि इंस्टीट्यूट में इस तरह की हरकतें नहीं चलने दी जायेंगी । दूसरी तरफ, रीजनल काउंसिल में जो सदस्य राजेश शर्मा के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं, वह अपने आप को अपमानित महसूस करने लगे हैं : उन्हें लग रहा है कि यह तो तमाशा हुआ है और इस तमाशे के पीछे की जो कहानियाँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे कि वह राजेश शर्मा के सहयोगी या समर्थक नहीं - बल्कि उनकी कठपुतलियाँ हैं । इंस्टीट्यूट के जीवन में शायद पहली बार कुछ ऐसा हुआ है - जिसने अलग अलग कारणों से सभी को 'शॉक' दिया है, और सभी हतप्रभ हैं, और अपने अपने कारणों से सभी महसूस कर रहे हैं कि जो हुआ है तथा उसके पीछे के जो कारण बताए/सुने जा रहे हैं - वह अच्छा नहीं है । सभी 'चुप' हैं और सिर्फ फुसफुसाहटों के रूप में ही बातें कर रहे हैं; सभी अभी देखना चाहते हैं कि यह नाटक किस दिशा में आगे बढ़ता है ? राजेश शर्मा के लिए मुसीबत की बात यह है कि दीपक गर्ग के इस्तीफे के नाटक के लिए सभी राजेश शर्मा को ही जिम्मेदार मान रहे हैं, और राजेश शर्मा की भूमिका हर किसी के लिए संदेहास्पद हो गई है - इसलिए इस नाटक को अपनी स्क्रिप्ट के अनुसार आगे बढ़ाना और अपनी 'योजना' को क्रियान्वित करना उनके लिए खासा चुनौतीपूर्ण हो गया है ।
राजेश शर्मा के नजदीकियों के अनुसार, राजेश शर्मा को दरअसल यह उम्मीद नहीं थी कि दीपक गर्ग को जितना 'अभिनय' करने के लिए कहा जायेगा - वह उससे ज्यादा अभिनय कर लेंगे । दीपक गर्ग का इस्तीफा तो राजेश शर्मा की स्क्रिप्ट के अनुसार ही हुआ, इसलिए वहाँ तक का नाटक तो ठीक चला - लेकिन इस्तीफा देने के बाद दीपक गर्ग ने स्क्रिप्ट से बाहर जाकर जो 'अभिनय' किया है, उसने राजेश शर्मा के लिए चौतरफा मुसीबत खड़ी कर दी है । उनकी यह मुसीबत नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में आगे क्या गुल खिलायेगी - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Thursday, August 25, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में झूठे तथ्यों के आधार पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी को मिली इमरजेंसी ग्रांट में नरेश अग्रवाल व नेविल मेहता की 'हिस्सेदारी' की चर्चा से ग्रांट का मामला गंभीर हुआ

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने आपदा पीड़ितों की मदद के नाम पर झूठ बोल कर एलसीआईएफ एमरजेंसी ग्रांट की पाँच हजार अमेरिकी डॉलर की जो रकम डकारने का काम किया है, उसमें नरेश अग्रवाल और नेविल मेहता जैसे बड़े नेताओं की संलिप्तता की आशंका ने मामले को खासा गंभीर बना दिया है । दरअसल शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी ग्रांट के लिए जो आवेदन किया था, उसमें ऐसी तथ्यात्मक गलतियाँ हैं कि उनके कारण पहली नजर में ही शिव कुमार चौधरी का फ्रॉड पकड़ में आ जाता है - उसके बावजूद जिस तरह से उन्हें फौरन से इमरजेंसी ग्रांट के पाँच हजार डॉलर मिल गए, उससे संदेह हुआ है कि उन्हें यह ग्रांट दिलवाने में बड़े नेताओं का हाथ है । इन बड़े नेताओं में फर्स्ट इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल तथा लायंस इंटरनेशनल के मुंबई स्थित कार्यालय के मुखिया नेविल मेहता का नाम आता है । लोगों को लगता यह है कि इमरजेंसी ग्रांट के लिए तैयार किए गए अपने आवेदन में शिव कुमार चौधरी ने जो झूठ बोला, उसके बारे में उन्हें आभास रहा होगा कि उनका यह झूठ एलसीआईएफ एमरजेंसी ग्रांट्स का काम देख रहे विदेशियों के लिए तो पकड़ पाना संभव नहीं होगा - लेकिन नेविल मेहता उनका झूठ पकड़ सकते हैं; इसलिए उन्हें नेविल मेहता को साधना जरूरी लगा होगा, और यह काम उन्होंने नरेश अग्रवाल के थ्रू किया होगा । एलसीआईएफ (लायंस क्लब्स इंटरनेशनल फाउंडेशन) से ग्रांट लेने की प्रक्रिया का जिन लोगों को पता है, उनके लिए इस बात को हजम कर पाना मुश्किल हो रहा है कि नेविल मेहता के होते हुए शिव कुमार चौधरी ने एलसीआईएफ से पाँच हजार अमेरिकी डॉलर कैसे ठग लिए ?
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी ग्रांट के लिए जो आवेदन किया, वह झूठ और फ्रॉड की तैयारी का एक पुलंदा है । कैसे ? इसे जानने/समझने के लिए पहले कृपया उनके आवेदन पत्र का पहला पैराग्राफ पढ़िए और उत्तराखंड का नक्शा देखिए :



इमरजेंसी ग्रांट के लिए दिए गए आवेदन पत्र की पहली लाइन ही इस झूठ से शुरू होती है कि पूरा उत्तराखंड राज्य लायंस डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन का हिस्सा है । सच्चाई यह है कि उत्तराखंड राज्य का बहुत छोटा सा हिस्सा ही डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में है; और राज्य का ज्यादा बड़ा भाग डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में है । इमरजेंसी ग्रांट पाने के लिए जिन पिथौरागढ़ और चमोली डिस्ट्रिक्ट्स में बादल फटने और लगातार बारिश होते रहने से हुए नुकसान को आधार बनाया गया है, नक्शे में देखा जा सकता है कि वह जिले डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन वाले देहरादून और हरिद्धार क्षेत्र से कितने दूर हैं । उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और चमोली जिले न तो डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के हिस्से में आते हैं और न यहाँ डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन का कोई क्लब है । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के हरिद्धार, कोटद्धार, ऋषिकेश, मसूरी, देहरादून, रुड़की आदि के क्लब्स के लिए पिथौरागढ़ और चमोली जिले इतने दूर हैं, कि उनके लिए वहाँ जा पाना और कुछ कर पाना संभव ही नहीं है । इमरजेंसी ग्रांट पाने के लिए शिव कुमार चौधरी ने पूरी तरह एक झूठी कहानी गढ़ी और आवेदन कर दिया ।
लायंस इंटरनेशनल में इमरजेंसी ग्रांट पाने का जो सामान्य तरीका है, वह क्लब के आवेदन से शुरू होता है । वास्तव में क्लब इमरजेंसी ग्रांट की जरूरत पहचानता है, और उसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को एप्रोच करता है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उसकी जरूरत को एलसीआईएफ तक पहुँचाता है । शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी ग्रांट के लिए जो आवेदन दिया, उसमें किसी भी क्लब की तरफ से प्रस्तुत हुई डिमांड का जिक्र तक नहीं है । क्लब की डिमांड रिपोर्ट के बिना प्रस्तुत हुए शिव कुमार चौधरी के आवेदन पर मुंबई कार्यालय से इमरजेंसी ग्रांट के पाँच हजार अमेरिकी डॉलर के समतुल्य तीन लाख चालीस हजार पचास रुपए का चेक - नेविल मेहता की मिलीभगत के बिना रिलीज हो सकता है, यह बात किसी के गले उतर नहीं रही है ।
आपदा राहत के नाम पर अपनी जेब भरने के लिए शिव कुमार चौधरी ने योजना तो हालाँकि और भी बड़ी बनाई थी : उन्होंने अपने आवेदन में कुल 17 लाख पाँच हजार रुपए यानि करीब 25 हजार अमेरिकी डॉलर की राहत योजना की 'कहानी' गढ़ी थी; अपनी कहानी को विश्वसनीय रूप देने के लिए उन्होंने एलसीआईएफ को लिखा/बताया कि इसमें से 15 हजार डॉलर तो वह डिस्ट्रिक्ट में इकट्ठा कर लेंगे, और बाकी दस हजार डॉलर आप दे दीजिए । नोट करने की बात यह है कि आपदा राहत के लिए 15 हजार अमेरिकी डॉलर की रकम डिस्ट्रिक्ट में इकट्ठी करने का दावा करने वाले शिव कुमार चौधरी ने वास्तव में इकन्नी भी इकट्ठा नहीं की है । यह कहानी तो उन्होंने दरअसल एलसीआईएफ से दस हजार अमेरिकी डॉलर ऐंठने के लिए उन्हें सुनाई/बताई । एलसीआईएफ पदाधिकारियों ने ऐसे बड़े राहत अभियान की जमीनी हकीकत की पड़ताल किए बिना - जिसमें करीब 25 हजार अमेरिकी डॉलर खर्च हो रहे हों और जिसके लिए डिस्ट्रिक्ट में 15 हजार अमेरिकी डॉलर इकट्ठे किए जा रहे हों - पाँच हजार अमेरिकी डॉलर तुरंत से रिलीज कर दिए ।
कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि एलसीआईएफ का कामकाज देख रहे पदाधिकारी इतने बड़े गधे हैं कि कोई भी उन्हें हजारों डॉलर खर्च होने की झूठी कहानी सुनायेगा, और वह उसे तुरंत से कुछ हजार डॉलर दे देंगे । जाहिर है कि शिव कुमार चौधरी को उनकी झूठी कहानी पर जो पाँच हजार अमेरिकी डॉलर की रकम मिली है, उसमें कुछेक बड़े लायन नेताओं व पदाधिकारियों का हिस्सा होगा ही ।
शिव कुमार चौधरी ने एलसीआईएफ से पाँच हजार अमेरिकी डॉलर के समतुल्य तीन लाख चालीस हजार पचास रुपए प्राप्त करने में तो सफलता हासिल कर ली; किंतु उनके सामने इस रकम को ठिकाने लगाने का 'नाटक' करने की चुनौती अभी बाकी थी । इस चुनौती से निपटने में उन्होंने 'इमरजेंसी' शब्द का ही मजाक बना कर रख दिया । गौर करने वाली बात यह है कि शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी बताते हुए राहत के लिए 9 जुलाई को आवेदन किया; एलसीआईएफ ने राहत की इमरजेंसी समझते हुए मात्र पाँच दिन में, 14 जुलाई को मल्टीसिटी चेक (नंबर 174415) रिलीज कर दिया - किंतु जरूरतमंदों को 'इमरजेंसी' राहत पहुँचाने में शिव कुमार चौधरी ने 39 दिन लगा दिए । राहत पहुँचाने का आयोजन उन्होंने 22 अगस्त को किया, और बड़े गुपचुप रूप से किया । 'इमरजेंसी' राहत पहुँचाने में इतने दिन उन्हें इसलिए लगे, क्योंकि इस राहत कार्यक्रम को वह स्थानीय पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा फर्स्ट व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से छिपा कर करना चाहते थे और उसके लिए मौका देख रहे थे । दरअसल आपदा पीड़ितों को इमरजेंसी राहत पहुँचाने की उनकी कोई नीयत या योजना थी ही नहीं, उन्हें तो इमरजेंसी राहत के नाम पर एलसीआईएफ से रुपए ऐंठने थे । उन्होंने एक मजाकभरी धोखाधड़ी और की : एलसीआईएफ इमरजेंसी ग्रांट उन्होंने पिथौरागढ़ व चमोली जिले के पीड़ितों के लिए ली थी, राहत सामग्री लेकिन उन्होंने इन जिलों से सैंकड़ों किलोमीटर दूर ऋषिकेश के नजदीक नरेंद्रनगर में बाँटी । तस्वीर में जो राहत सामग्री दिख रही है, कोई भी उसका दाम तीस-चालीस हजार रुपए से ज्यादा नहीं बता रहा है; शिव कुमार चौधरी को इसके लिए एलसीआईएफ से लेकिन तीन लाख चालीस हजार पचास रुपए मिले हैं ।
एलसीआईएफ में हुई इस लूट में नरेश अग्रवाल व नेविल मेहता की भूमिका को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उससे इस इमरजेंसी ग्रांट (EMR 15237/321C1) का मामला खासा संगीन हो गया है ।

Wednesday, August 24, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में ऑर्गेन डोनेशन को लेकर चलाई जा रही संजीव वर्मा की गतिविधियाँ और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की चुप्पी सवालों के घेरे में

नई दिल्ली । संजीव वर्मा के ट्रस्ट 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' की संदेहास्पद गतिविधियों के कारण रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ फँसा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट अपने कुछेक सदस्यों व पदाधिकारियों की कारस्तानी के चलते पिछले कुछ समय से आरोपों व विवादों में घिरा हुआ है । संजीव वर्मा की हरकत ने इस घेरे को थोड़ा और कस दिया है । संजीव वर्मा इस वर्ष क्लब के अध्यक्ष हैं - इसलिए उनकी हरकत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की भूमिका को भी लपेटे में ले लिया है । दिल्ली के प्रतिष्ठित अपोलो अस्पताल में अभी पिछले दिनों ही डॉक्टर्स की मिलीभगत से चलने वाले किडनी रैकेट का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें कुछेक लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है । इस फर्दाफाश ने मानव अंगों की तस्करी के धंधे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है । इन परिस्थितियों में, संजीव वर्मा के ट्रस्ट की गंभीर अनियमितताओं ने उनकी भूमिका को प्रश्नाकुल बना दिया है - और चूँकि संजीव वर्मा की तरफ से उन प्रश्नों को अनसुना किया जा रहा है; इसलिए उनकी भूमिका खासी संदेहास्पद हो जाती है । 
संजीव वर्मा 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' नाम से एक संस्था चलाते हैं, जिसे लोगों के बीच वह ट्रस्ट बताते हैं । इसका एक पैम्फलेट वह अक्सर रोटेरियंस के बीच बाँटते रहते हैं; और इस नाम से उन्होंने एक बेवसाइट भी बनाई हुई है । बेवसाइट में अपना परिचय उन्होंने रोटेरियन के रूप में ही दिया हुआ है और अपने आप को इसके मुख्य व अकेले कर्ता-धर्ता के रूप में दर्शाया है । उनके द्धारा वितरित किए जाने वाले पैम्फलेट में तथा बेवसाइट में उनके क्लब और या उनके डिस्ट्रिक्ट का कहीं कोई नाम नहीं है । अभी तक उपलब्ध नई डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी - सुधीर मंगला के गवर्नर काल की डायरेक्टरी में पृष्ठ 217 पर डिस्ट्रिक्ट में मान्यता प्राप्त ट्रस्ट्स व सोसायटीज की जो सूची प्रकाशित है, उसमें 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' का नाम नहीं है । इससे यही आभास मिलता है कि यह एक निजी ट्रस्ट है, जो रोटरी के नाम और उसके चिन्ह का नाजायज व गैरकानूनी तरीके से इस्तेमाल कर रहा है ।


डिस्ट्रिक्ट के नियम-कानून के अनुसार, कहीं भी किसी भी काम में रोटरी का नाम तथा उसका चिन्ह इस्तेमाल करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अनुमति जरूरी है, और यह अनुमति देने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में प्रस्ताव पास कराना भी जरूरी होता है । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के मामले में लेकिन इस नियम और प्रक्रिया का कोई पालन नहीं हुआ है । संजीव वर्मा रोटरी ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधियाँ पिछले दो-तीन वर्ष से चला रहे हैं, और खुले आम चला रहे हैं - डिस्ट्रिक्ट बायलॉज बनाने वाले 'महान' लोगों का ध्यान लेकिन उनकी इस अवैध हरकत पर नहीं गया; और यदि गया भी तो उन्हें संजीव वर्मा की हरकत पर कार्रवाई करने की जरूरत महसूस नहीं हुई ।
ऐसे में सवाल उठता है कि डिस्ट्रिक्ट बायलॉज क्या सिर्फ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में छापने के लिए बनाए जाते है ? उन्हें बनाने वालों को उन्हें लागू करवाने की जरूरत क्या सचमुच महसूस नहीं होती ? और या संजीव वर्मा के हाथ इतने लंबे हैं कि डिस्ट्रिक्ट बायलॉज लागू करवाने की जिम्मेदारी निभाने वाले लोगों की गर्दन तक पहुँचे हुए हैं, और उन बेचारों की हिम्मत ही नहीं हो पाई उन्हें रोकने की ?
रोटरी का नाम और चिन्ह इस्तेमाल करने वाले ट्रस्ट्स व सोसायटीज के लिए कानूनन यह भी जरूरी है कि वह अपनी संस्था का वार्षिक लेखा-जोखा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को दें, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पहले जिसे काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सामने रखे तथा फिर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत करे । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के मामले में लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है । संजीव वर्मा रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के सारे लेखा-जोखा को पूरी तरह से छिपाए हुए हैं - और कोई नहीं जानता कि इसके कामकाज को संभव बनाने के लिए वह कहाँ कहाँ से कितना पैसा इकट्ठा करते हैं, और उसे कैसे कैसे कहाँ कहाँ खर्च करते हैं ? रोटरी ऑर्गेन डोनेशन से संबंधित जितने रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, उन पर तो एक अकेले संजीव वर्मा का ही नाम है; लेकिन इसका काम करने में कई मौकों पर रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के वरिष्ठ सदस्य अजीत जालान को उनके साथ देखा गया है - जिन पर रोटरी के नाम पर कई तरह की घपलेबाजियों में संलग्न रहने का आरोप है । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के काम में संजीव वर्मा के साथ अजीत जालान की संलग्नता ने रोटरी ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधियों को और भी संदेहास्पद बना दिया है । 
संजीव वर्मा इस वर्ष रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के अध्यक्ष हैं; इसलिए उनकी और भी ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि वह रोटरी के नाम पर जो भी काम करें - उसमें पूरी पारदर्शिता हो, तथा नियमों का पूरी तरह से पालन हो । लोगों का कहना है कि संजीव वर्मा 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' के नाम पर जो काम कर रहे हैं, वह बहुत अच्छा और बहुत जरूरी काम है; समस्या की बात किंतु यह है कि उनका काम जितना है, 'शोर' उसकी तुलना में उसका कई गुना है; और हिसाब-किताब छिपा हुआ है, काम करने के तरीकों में नियमों का उल्लंघन है; और हिसाब-किताब के मामले में पहले से ही बदनाम चले आ रहे अजीत जालान का संगसाथ है - जिसके कारण संजीव वर्मा निशाने पर आ गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डॉक्टर सुब्रमणियम ने 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' के मनमाने तरीके से सक्रिय होने पर जो आँखें बंद की हुई हैं, उससे भी मामला गंभीर हुआ है । यह एक बहुत ही बुरा संयोग है कि डॉक्टर सुब्रमणियम जिस अपोलो अस्पताल से संबद्ध रहे हैं, उस अपोलो अस्पताल का नाम मानव अंगों की तस्करी के संबंध में चर्चा में है; और डॉक्टर सुब्रमणियम अपने एक क्लब अध्यक्ष की संदेहास्पद रूप से चलाई जा रही ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधि पर चुप्पी साधे बैठे हैं ।

Tuesday, August 23, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया

आगरा । पारस अग्रवाल ने 'दल बदल' करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को तो बदलने का काम किया ही है, साथ ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है । मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी यह समझने का प्रयास करना पड़ रहा है कि पिछले लायन वर्ष में पारस अग्रवाल के समर्थन के बावजूद मधु सिंह को जब करारी हार का सामना करना पड़ा था, तब इस वर्ष पारस अग्रवाल के विरोध के चलते उन्हें जितवा पाना कैसे संभव होगा ? कई लोगों का हालाँकि मानना और कहना है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल कोई इतने बड़े नेता नहीं हैं कि उनके समर्थन और विरोध से जीतने/हारने के फैसले होते हों, इसलिए इस बात से चुनावी राजनीति के नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पारस अग्रवाल किसके साथ हैं और किसके खिलाफ । लेकिन कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल - और पारस अग्रवाल ही क्यों, कोई भी - किसी चुनावी लड़ाई में निर्णायक फैक्टर नहीं हो सकते हैं; लेकिन समर्थन और विरोध बनाने में तो हर किसी की भूमिका होती ही है - वह भूमिका चाहें छोटी हो और या बड़ी; और इस लिहाज से पारस अग्रवाल के 'दल बदल' की भी भूमिका होगी ही, जो अभी तो मधु सिंह की उम्मीदवारी के खिलाफ जाती नजर आ रही है । यही कारण है कि पारस अग्रवाल के दल बदल से मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच निराशा पैदा हुई है, और उन्हें मधु सिंह की उम्मीदवारी पर खतरा मँडराता दिखने लगा है । उनके समर्थक कुछेक नेताओं ने तो इस बात पर भी विचार करना शुरू कर दिया है कि मधु सिंह की बजाए वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए किसी और को उम्मीदवार बनाएँ, तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उन्हें कामयाबी मिल सकती है क्या ?
मजे की बात यह है कि पारस अग्रवाल को दल बदलने के लिए मजबूर करने का आरोप मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल पर ही लगाया जा रहा है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के इशारे पर काम कर रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने कई फैसलों और मीटिंग्स आदि में पारस अग्रवाल को शामिल ही नहीं किया और उन्हें अलग-थलग करने/रखने की कोशिशें कीं, जिन्हें देख/जान कर पारस अग्रवाल के पास फिर दल बदल कर दूसरे खेमे में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह गया । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि सीपी सिंघल और दूसरे नेताओं ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए पारस अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया तथा पारस अग्रवाल पर जासूसी करने का व धोखेबाजी करने का आरोप लगा कर उन्हें अलग-थलग करने/रखने का रवैया अपनाया । ऐसे में, पारस अग्रवाल दूसरे खेमे में न जाएँ, तो क्या करें ? नजदीकियों का कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल का सुमित गुप्ता के साथ पुराना परिचय और संबंध है, लेकिन सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से उनका कोई संबंध नहीं है - यह संबंध जोड़ कर मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने दरअसल अपनी कमजोरी को ही जाहिर किया है, और अपनी कमजोरी का ठीकरा पारस अग्रवाल के सिर पर फोड़ दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले वरिष्ठ लायन सदस्यों का कहना है कि पिछले लायन वर्ष के चुनावी नतीजे ने वास्तव में पारस अग्रवाल को अपनी भूमिका के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मधु सिंह और बीके गुप्ता के बीच चुनाव में पारस अग्रवाल ने मधु सिंह का समर्थन किया था । बीके गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को समझाने की बहुत कोशिश भी की थी कि वह खुद चूँकि सभी के समर्थन से निर्विरोध सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए हैं, इसलिए अब उन्हें किसी एक उम्मीदवार के समर्थन में खुल कर सक्रिय नहीं होना/दिखना चाहिए - लेकिन पारस अग्रवाल पर उनकी समझाइस का कोई असर नहीं पड़ा । वह तो जब चुनाव का नतीजा आया, तब पारस अग्रवाल की आँखें खुलीं । मधु सिंह खुद तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में बुरी तरह से हारी हीं - उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की सजा नेगेटिव वोट के रूप में सीपी सिंघल और पारस अग्रवाल को भी मिली ।
इसी से सबक लेकर पारस अग्रवाल ने 'पक्षपाती' भूमिका निभाने से बचने की कोशिशें शुरू कीं । उनकी इन कोशिशों का ही नतीजा था कि मल्टीपल काउंसिल की चंडीगढ़ में हुई कॉन्फ्रेंस में अम्बरीष सरीन की जो फजीहत हुई और जिसके बाद अम्बरीष सरीन व सीपी सिंघल ने इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के खिलाफ जो मोर्चा खोला - पारस अग्रवाल उससे दूर रहे । सीपी सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं को पारस अग्रवाल का यह रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने पारस अग्रवाल पर धोखेबाजी करने का आरोप तो लगाया ही; साथ ही यह आरोप भी मढ़ दिया कि पारस अग्रवाल 'यहाँ' की खबरें 'वहाँ' पहुँचाते हैं । इसके बाद, लायंस क्लब आगरा आदर्श के सुमित गुप्ता की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने मधु सिंह के खेमे में पारस अग्रवाल को और भी संदेहास्पद बना दिया । मधु सिंह के खेमे में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में तथा डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों से संबंधित फैसलों  तक में पारस अग्रवाल को शामिल नहीं किया, जिसकी चर्चा वाट्स ऐप तक में हुई । इस तरह से मधु सिंह के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को पूरी तरह से प्रतिद्धंद्धी खेमे में धकेल दिया है । धकेल तो दिया है, किंतु अब वह पछता भी रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि इससे उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है ।
मधु सिंह की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को हालाँकि उम्मीद है कि पारस अग्रवाल अपने पिछले लायन वर्ष के रवैये के कारण 'उस' खेमे के लोगों के बीच भी भरोसा नहीं बना पायेंगे - और तब वह वापस 'यहीं' लौटने के लिए मजबूर होंगे । आगे क्या होगा - यह तो आगे पता चलेगा, अभी लेकिन पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया है ।