Wednesday, August 16, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की इंदौर ब्रांच में अपने मनमाने कार्य-व्यवहार को लेकर अपने खिलाफ बन रहे नाराजगी के माहौल के बावजूद केमिशा सोनी सेंट्रल काउंसिल के अगले चुनाव में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त क्यों हैं ?

इंदौर । इंदौर ब्रांच के कार्यक्रमों में चेयरमैन सोमदत्त सिंघल को किनारे लगा कर एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्य केमिशा सोनी द्वारा जिस तरह की मनमानियाँ करने की चर्चाएँ हैं, उससे इंदौर के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके प्रति नाराजगी लगातार बढ़ती और मुखर होती जा रही है - जिसे देख कर उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को भी डर हुआ है कि यह नाराजगी केमिशा सोनी को अगले चुनाव में कहीं भारी न पड़ जाए । केमिशा सोनी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को हालाँकि यह भी लगता है कि उनके विरोधी जिस तरह बिखरे पड़े हैं और निराश हैं, उसके कारण तमाम बदनामी के बाद भी केमिशा सोनी को कोई चुनावी नुकसान शायद ही हो ! इन लोगों का तर्क है इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वर्षों 'राज' करते रहे विष्णु झावर उर्फ़ काका जी और मनोज फडनिस को करीब बीस महीने पहले केमिशा सोनी की तरफ से जो तगड़ा चुनावी झटका लगा है, उससे वह अभी तक भी उबर नहीं पाए हैं - जिसका नतीजा है कि करीब पंद्रह महीने बाद होने वाले चुनाव के लिए वह इंदौर में 'अपना' कोई उम्मीदवार तक नहीं खोज पाए हैं । पिछली बार जो विकास जैन उनके भरोसे उम्मीदवार बने थे और चुनाव हार गए थे, उनके रंग-ढंग अगली बार उम्मीदवार बनने के दिख नहीं रहे हैं; विकास जैन नहीं, तो उनकी जगह कौन उम्मीदवार बनेगा - विष्णु झावर और मनोज फडनिस की तरफ से उम्मीदवार बनने को लेकर अभी तक कोई अपनी दिलचस्पी व सक्रियता दिखाता हुआ नजर नहीं आया है । इस स्थिति को विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे की राजनीतिक बदहाली के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे की इस राजनीतिक बदहाली ने केमिशा सोनी को मनमानी करने की जैसे खुली छूट दे दी है । नजारा यहाँ तक देखा/सुना जा रहा है कि ब्रांच द्वारा आयोजित सेमिनारों में आमंत्रित किए जाने वाले वक्ता यदि केमिशा सोनी को पसंद नहीं होते हैं, तो वह उनका कार्यक्रम ही रद्द करवा देती हैं । केमिशा सोनी की इस कार्रवाई के चलते इंदौर के कई वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को पिछले दिनों अपमानित होना पड़ा और इंदौर ब्रांच के चेयरमैन सोमदत्त सिंघल को उन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने शर्मिंदा होना पड़ा । ब्रांच के कामकाज और फैसलों में केमिशा सोनी का इस हद तक दखल बताया और सुना जाता है कि लोगों को सोमदत्त सिंघल तो बस एक कठपुतली चेयरमैन ही लगते हैं । मजे की बात यह देखने को मिल रही है कि जो लोग पहले विष्णु झावर और मनोज फडनिस के 'व्यवहार' से नाराज रहते/होते थे, वह अब कहने/बताने लगे हैं कि केमिशा सोनी तो उनकी भी 'गुरु' साबित हो रही हैं । उनका कहना है कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस मनमानी और पक्षपात तो करते थे, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरों को बेइज्जत नहीं करते थे; आरोप है कि केमिशा सोनी विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों तक का लिहाज नहीं करतीं हैं और वह यदि उनकी बात मानते हुए नहीं दिखते हैं तो उन्हें भी बुरी तरह झिड़क देती हैं और अपमानित करती हैं ।
केमिशा सोनी ने इंदौर ब्रांच के कामकाज और फैसलों में अपना जैसा हस्तक्षेप बना रखा है, उससे लोगों को लगा है कि जैसे इंदौर ब्रांच को वह अपना निजी ऑफिस मान रही हैं और ब्रांच के पदाधिकारियों व सदस्यों को अपने ऑफिस के कर्मचारी के रूप में देख रही हैं । पिछले वर्ष ब्रांच में चेयरपर्सन रहीं गर्जना राठौर को शुरू में केमिशा सोनी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता था, लेकिन केमिशा सोनी के निरंतर बने रहने वाले हस्तक्षेप व दबाव से वह इतनी परेशान हो उठीं कि फिर जल्दी ही वह केमिशा सोनी के विरोधियों के नजदीक दिखाई देने लगीं । सबसे दिलचस्प मामला सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में इंदौर का प्रतिनिधित्व कर रहे चर्चिल जैन और निलेश गुप्ता का है : चर्चिल जैन रीजनल काउंसिल में वाइस चेयरमैन हैं, लेकिन इंदौर ब्रांच में एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में उन्हें केमिशा सोनी की मनमानियों के सामने चुप ही बने रहना पड़ता है । उन्हें और निलेश गुप्ता को कई मौकों पर केमिशा सोनी के रवैये और व्यवहार पर इर्रीटेट होते हुए और मनमसोस कर अपमानित होते हुए देखा गया है । केमिशा सोनी के कार्य-व्यवहार को लेकर इंदौर में उनके खिलाफ नाराजगी का जो माहौल बन रहा है, उसने विष्णु झावर तथा मनोज फडनिस व उनके नजदीकियों को खासा उत्साहित तो किया हुआ है - और उन्हें उम्मीद बंध रही है कि केमिशा सोनी की जिस तेजी से लोगों के बीच बदनामी बढ़ रही है, और उनके समर्थक ही उनसे खफा और दूर होते जा रहे हैं; उससे केमिशा सोनी को अगले चुनाव में नुक्सान उठाना पड़ सकता है, और केमिशा सोनी के नुक्सान के चलते विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका मिल सकेगा । यह अभी सिर्फ उम्मीद और अनुमान भर है, क्योंकि इस उम्मीद और अनुमान के पूरा होने की कोई रूपरेखा बनती हुई अभी तो नहीं नजर आ रही है । शायद इसी कारण से केमिशा सोनी लोगों के बीच अपने प्रति बढ़ती नाराजगी को लेकर बेपरवाह बनी हुई हैं ।

Monday, August 14, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वाइस चेयरमैन विवेक खुराना को निशाना बना कर चेयरमैन राकेश मक्कड़ का समर्थन जुटाने की अविनाश गुप्ता की कोशिश से उन्हें चुनाव में सचमुच फायदा होगा क्या ?

नई दिल्ली । वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट अविनाश गुप्ता नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वाइस चेयरमैन विवेक खुराना की शिकायत करने के चलते खुद बड़े विवाद में फँस गए हैं । अविनाश गुप्ता पर गंभीर आरोप यह लग रहा है कि वह रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की अंदरूनी लड़ाई में एक मोहरा बन गए हैं और रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को खुश करने के लिए उनके कहने पर उन्होंने विवेक खुराना पर निशाना साधा है । उल्लेखनीय है कि वाइस चेयरमैन के रूप में विवेक खुराना इस समय राकेश मक्कड़ के लिए भारी परेशानी का सबब बने हुए हैं । राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत की बात यह हो रही है कि रीजनल काउंसिल में कुछेक सदस्य उन पर चालबाजियाँ रचने तथा बेईमानियाँ करने के जो आरोप लगा रहे हैं, विवेक खुराना उन्हें समर्थन देते नजर आ रहे हैं - जिसके कारण न सिर्फ आरोपों को विश्वसनीयता मिलती दिख रही है, बल्कि राकेश मक्कड़ के लिए अपना बचाव करना भी मुश्किल हो रहा है । इसके अलावा, विवेक खुराना को विरोधी खेमे के नजदीक खिसकता देख राकेश मक्कड़ को अपना पॉवर ग्रुप भी बिखरता नजर आ रहा है - जिसके चलते पॉवर ग्रुप के सदस्यों को अगले वर्ष सत्ता छिनने का डर हो गया है । अगले वर्ष भी सत्ता अपने हाथ में बनाए रखने खातिर विवेक खुराना को अपने खेमे में बनाए रखने के लिए राकेश मक्कड़ ने हर संभव तरीके आजमाना शुरू कर दिया है । इंस्टीट्यूट में शिकायत करके जाँच में फँसाने और बचाने के विकल्प देकर विवेक खुराना को ब्लैकमेल करने के प्रयास तो चर्चा में हैं ही, मीटिंग्स में भी विवेक खुराना को अपमानित किया जा रहा है । हाल ही में संपन्न हुई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में सेक्रेटरी राजिंदर अरोड़ा ने विवेक खुराना को यह कहते हुए धमकी-सी दी कि तुम चेयरमैन बनना चाहते हो न, हम देखेंगे कि कैसे बनते हो ! इसी दौरान विवेक खुराना को निशाना बनाती अविनाश गुप्ता की शिकायत सामने आयी तो लोगों को यह समझने में देर नहीं लगी कि यह शिकायत करवाने के लिए चाबी राकेश मक्कड़ ने भरी है । यह बात इसलिए चर्चा में आई - क्योंकि राकेश मक्कड़ और उनके भाई राजेश मक्कड़ के साथ अविनाश गुप्ता की नजदीकियत जगजाहिर है ।
अविनाश गुप्ता ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिखे पत्र में विवेक खुराना पर अपने राजनीतिक प्रचार के लिए जीएमसीएस क्लासेस को डिस्टर्ब करने का आरोप लगाया है । उनके आरोप को बड़े बचकाने किस्म के आरोप के रूप में देखा गया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के चुनावबाज नेताओं के द्वारा जीएमसीएस क्लासेस का दुरूपयोग करना एक बड़ी आम सी बात हो गयी है, और लोगों ने इसे एक आवश्यक बुराई के रूप में 'स्वीकार' कर लिया है । मजे की बात यह है कि जीएमसीएस क्लासेस को डिस्टर्ब करने की शिकायत फैकल्टी और या छात्रों ने नहीं की है - यानि अविनाश गुप्ता बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनने की कोशिश कर रहे हैं । लोगों का कहना है कि लेकिन फिर भी यदि अविनाश गुप्ता वास्तव में इस बुराई को दूर करना ही चाहते हैं तो उन्हें पहले रीजनल काउंसिल के चेयरमैन को तथा रीजनल काउंसिल की जीएमसीएस कमेटी को जीएमसीएस क्लासेस में व्यवस्था बनाए रखने का सुझाव देना चाहिए था; उनके कुछ न करने पर प्रेसीडेंट को लिखना चाहिए था और उनकी कार्रवाई का इंतजार करना चाहिए था । ऐसा कुछ न करके, प्रेसीडेंट को लिखी चिट्ठी सोशल मीडिया में डाल कर अविनाश गुप्ता ने यही जताया है कि उनका उद्देश्य जीएमसीएस क्लासेस में व्यवस्था बनवाना नहीं, बल्कि राजनीति करना है । इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा तक ने अविनाश गुप्ता की इस कार्रवाई पर ऐतराज जताया है । 
अविनाश गुप्ता पर आरोप लग रहा है कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने अपने भाई के जरिए इंस्टीट्यूट में जो लूट मचा रख्खी है, उस पर तो उनके मुँह से कोई शब्द नहीं फूट रहे हैं, उस पर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को पत्र लिखने की वह कोई जरूरत नहीं समझ रहे हैं - और एक बड़े मामूली से मुद्दे पर वह शोर मचाने का प्रयास कर रहे हैं; इससे जाहिर है कि वह खुद एक बड़ी टुच्ची राजनीति कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के पिछले चुनाव में सफल न हो पाने वाले अविनाश गुप्ता अगले चुनाव में फिर उम्मीदवार बनने की तैयारी करते हुए सुने जा रहे हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि अगले चुनाव में उन्हें राकेश मक्कड़ और उनके भाई का समर्थन मिलने की उम्मीद है, अपनी इस उम्मीद को और पक्का करने के लिए ही उन्होंने राकेश मक्कड़ के लिए अभी मुसीबत बने हुए विवेक खुराना को निशाने पर ले लिया है । इस कार्रवाई पर राकेश मक्कड़ और उनके भाई ने जिस तरह से उनकी पीठ थपथपाई है, उससे अविनाश गुप्ता को विश्वास हो चला है कि अगले चुनाव में इनका समर्थन उन्हें अवश्य ही मिल जाएगा और तब वह अपनी चुनावी वैतरणी आराम से पार कर लेंगे ।
अविनाश गुप्ता वैसे खुशकिस्मत भी हैं कि 'बड़े लुटेरों' को छोड़ कर छोटी-मोटी हरकतें करने वालों को निशाना बनाने की उनकी कार्रवाई को सिर्फ आलोचना का ही शिकार नहीं होना पड़ा है - बल्कि रतन सिंह यादव, गौरव गर्ग, अजय सिंघल आदि नेताओं का समर्थन भी उन्हें मिला है । मजेदार संयोग लेकिन यह है कि यह लोग भी पिछले चुनावों में हारे हुए नेता हैं, और अगले चुनाव में उम्मीदवार होने की तैयारी करते सुने जा रहे हैं; तथा इन्होंने भी राकेश मक्कड़ और उनके भाई की लूट-खसोट पर चुप्पी साधी हुई है । दरअसल यह लोग भी राकेश मक्कड़ और उनके भाई का समर्थन लेने/पाने की जुगाड़ में हैं । इसलिए विवेक खुराना को निशाना बनाती अविनाश गुप्ता की कार्रवाई पर जोर जोर से ताली बजाते हुए इन्होंने राकेश मक्कड़ और उनके भाई को खुश करने का प्रयास किया है । इन संभावित उम्मीदवारों के इस रवैये से लोगों के बीच चर्चा छिड़ी है कि यह लोग अगले चुनाव में यदि जीत भी गए तो काउंसिल में सांपनाथों की बजाए नागनाथों के आने के अलावा और क्या बदलेगा ?

Saturday, August 12, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में 'अधिकृत उम्मीदवार' नहीं, तो 'चेलैंज' का जुमला उछाल कर अशोक गुप्ता ने फुल रौनक का माहौल बनाया

जयपुर । अशोक गुप्ता की तरफ से नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार न चुने जाने की स्थिति में चेलैंज करने की बात आने से जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव का परिदृश्य खासा रोमांचक हो गया है । अशोक गुप्ता की तरफ से इस तरह की बात आने से लोगों को लगा है कि अशोक गुप्ता ने नोमीनेटिंग कमेटी में अपनी पराजय अभी से स्वीकार कर ली है, और उन्होंने उसके आगे की तैयारी शुरू कर दी है । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का हालाँकि यह भी कहना है कि चेलैंज करने की बात फैला/फैलवा कर अशोक गुप्ता ने वास्तव में नोमीनेटिंग कमेटी में अपने लिए समर्थन बनाने/बढ़ाने की चाल चली है । इन नजदीकियों का कहना है कि नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों से बात करने में मिले/हुए अनुभवों से अशोक गुप्ता को इस बात का आभास तो हो ही गया है कि नोमीनेटिंग कमेटी में उनकी दाल नहीं गलने वाली है; ऐसे में उन्हें लगा है कि चेलैंज करने की बात करके वह नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को 'प्रभावित' कर सकते हैं । अशोक गुप्ता को लगता है कि उनके द्वारा चेलैंज करने की बात सुन कर नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को अपनी अपनी निरर्थकता का अहसास होगा; उन्हें लगेगा कि उनके द्वारा चुना गया अधिकृत उम्मीदवार यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही नहीं पायेगा, तो फिर वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए किसी और की बजाए अशोक गुप्ता को ही अधिकृत उम्मीदवार क्यों न चुनें ?
अशोक गुप्ता की यह चाल सफल होगी या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - चाल के तहत अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की बात फैला/फैलवा कर अशोक गुप्ता ने लेकिन अभी चुनावी माहौल को गर्म जरूर कर दिया है । अशोक गुप्ता के कुछेक अन्य नजदीकियों का मानना/कहना यह भी है कि चेलैंज करने की बात एक झाँसापट्टी ही है, क्योंकि अपने डिस्ट्रिक्ट में वह भले ही बड़े तुर्रमखाँ हों - लेकिन दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में उनकी कोई पहचान ही नहीं है; और यह बात खुद अशोक गुप्ता को भी समझ में आ रही है । नोमीनेटिंग सदस्यों के बीच अपने लिए अजनबीपन पाकर अशोक गुप्ता को तगड़ा झटका लगा है; नोमीनेटिंग कमेटी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ही हैं - इसलिए विचार करने की बात यही है कि जब जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स ही अशोक गुप्ता को ज्यादा नहीं जानते/पहचानते हैं, तो क्लब्स के लोग ही उन्हें क्या और कितना जानते होंगे ? अशोक गुप्ता की सक्रियता व उनकी गतिविधियों से परिचित लोगों का कहना है कि अशोक गुप्ता ने रोटरी के बड़े बड़े नेताओं को डॉक्टरेट की टोपी पहना पहना कर उनके बीच तो अपने आप को परिचित करवाया है, लेकिन बाकी रोटेरियंस को उन्होंने कभी कोई तवज्जो नहीं दी; अपने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति और व्यवस्था में पकड़ बनाए रखने की चालबाजियों में तो अशोक गुप्ता ने खूब मन लगाया है, लेकिन रोटरी में वह ऐसा कोई योगदान नहीं दे/कर सके हैं - जो दूसरों को प्रभावित और प्रेरित कर सके ।
दरअसल इसीलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों में अशोक गुप्ता को सबसे कमजोर 'व्यक्तित्व' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों में सुरेंद्र सेठ जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के खास और आम लोगों के बीच एक प्रभावी वक्ता के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं; दीपक कपूर का पोलियो के काम के चलते नाम है; रंजन ढींगरा ने जल-संरक्षण के काम के जरिए तथा एक अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान और साख तो बनाई हुई है ही, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के समर्थन के चलते भी लोगों के बीच उन्हें गंभीरता से लिया जाता है; भरत पांड्या के साथ पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन - और अशोक महाजन के कारण पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू का समर्थन है । एक अकेले अशोक गुप्ता ऐसे हैं, जिनका न तो कोई 'काम' है और न जिनके समर्थन में कोई नेता है । वास्तव में यह अशोक गुप्ता के छोटे नजरिए और अव्यावहारिक रवैए का परिणाम है । अशोक गुप्ता ने यूँ तो रोटरी को अपना बहुत समय, अपनी बहुत एनर्जी और अपने बहुत 'साधन' दिए हैं - लेकिन उनका नजरिया और उनका रवैया ऐसा रहा है कि सब कुछ 'लुटाने' के बाद भी वह रोटरी समुदाय में किसी को प्रभावित नहीं कर सके हैं - और यही कारण है कि रोटरी के बड़े नेताओं के साथ-साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच उनकी न तो कोई पहचान बन सकी, और न वह अपना कोई खैरख्वाह बना सके हैं ।
इस सच्चाई से सामना होते ही अशोक गुप्ता को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी के अभियान में पैंतरा बदलने की जरूरत महसूस हुई; और लगता है कि इसी जरूरत के चलते उन्होंने 'अधिकृत उम्मीदवार' नहीं - तो 'चेलैंज' का जुमला उछाल दिया है । उनकी दशा को जानने/पहचानने वाले लोगों का कहना है कि चेलैंज करना - यानि चेलैंज करने के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाना तो अशोक गुप्ता के लिए असंभव ही होगा और यह बात वह भी जानते/समझते हैं; इसलिए लगता यही है कि चेलैंज की बात दरअसल उनकी तरफ से गीदड़ भभकी ही है - अशोक गुप्ता उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी इस गीदड़ भभकी से 'डर' कर नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य उन्हें ही अधिकृत उम्मीदवार चुन लेंगे । मजे की बात यह सुनने/देखने को मिल रही है कि अशोक गुप्ता की देखादेखी दूसरे उम्मीदवार भी चेलैंज करने की बात करने लगे हैं - यानि जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में फुल रौनक देखने को मिलेगी ।

Friday, August 11, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल पर लायनिज्म को पिकनिक मनाने का जरिया तथा दूसरों के पैसे पर अपने और अपने संगी-साथियों के मौज-मजे का इंतजाम कर लेने को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ड्यूटी समझ लेने का आरोप

आगरा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह दुबई में करने तथा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी को शह देने के मामले में डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों की आलोचना का शिकार बन रहे हैं । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि इन दोनों मामलों में पारस अग्रवाल ने जो रवैया दिखाया है, उससे लगता है कि वह भी निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल के पदचिन्हों पर हैं; उन्हें डर है कि पारस अग्रवाल कहीं सीपी सिंघल से भी गए-गुजरे न साबित हों ! इन दोनों ही मामलों में पैसों के 'घपलेबाज' इस्तेमाल को प्रेरक तत्त्व के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । मजे की बात है कि डिस्ट्रिक्ट के दो वरिष्ठ और नियम-कानून की फिक्र करने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जगदीश मेहरा और अशोक कपूर इस बात की लगातार वकालत करते रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह डिस्ट्रिक्ट की भौगोलिक सीमा में ही होना चाहिए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में पारस अग्रवाल ने उनकी बात का भी मान रखने की कोई परवाह नहीं की । पारस अग्रवाल की इस हरकत पर परिवार में उपेक्षा का शिकार होते और असहाय पड़ते बड़े-बुजुर्गों की तरह इन दोनों ने तो चुप्पी साध ली है; किंतु दूसरे कुछेक पूर्व गवर्नर्स पारस अग्रवाल की हरकत पर बुरी तरह नाराज हैं । हालाँकि पारस अग्रवाल को उनकी नाराजगी की कोई परवाह नहीं है; उनकी तरफ से सुनने को मिला है कि जिन पूर्व गवर्नर्स को मुफ़्त में दुबई जाने का मौका नहीं मिल रहा है, वही लोग दुबई में अधिष्ठापन समारोह किए जाने का विरोध कर रहे हैं ।
दुबई में हो रहे अधिष्ठापन समारोह के विवाद में फँसने का कारण दरअसल इसी तरह के आरोप-प्रत्यारोप हैं । पारस अग्रवाल ने दुबई के जिस पैकेज के लिए हरी झंडी दी, उसे महँगा बताते हुए आरोप लगाया गया है कि पारस अग्रवाल ने अपने कुछेक चहेतों को मुफ़्त में दुबई ले जाने की व्यवस्था करने के लिए ही महँगे पैकेज को स्वीकार किया और अपनाया । इस तरह की बातों के चलते दुबई में होने वाले अधिष्ठापन समारोह में जाने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भी निशाने पर आ गए हैं - उन पर आरोप लग रहे हैं कि मुफ़्त में दुबई जाने के चक्कर में उन्होंने पारस अग्रवाल को यह समझाने/बताने की जरूरत भी नहीं समझी कि पिकनिक मनाने दुबई जाना ही है तो कभी भी चले जाना और लोगों को ले जाना; लेकिन डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह ऐसी जगह पर करो, जहाँ कि डिस्ट्रिक्ट के ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हो सकें । आरोपपूर्ण चर्चाएँ हैं कि लगता है कि पारस अग्रवाल ने लायनिज्म को पिकनिक मनाने का ही जरिया मान/समझ लिया है और दूसरों के पैसे पर अपने और अपने संगी-साथियों के मौज-मजे का इंतजाम कर लेने को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की ड्यूटी समझ लिया है ।
पारस अग्रवाल को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी को शह देने के कारण भी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है । दरअसल श्याम बिहारी अग्रवाल की नजदीकियत सीपी सिंघल के साथ देखते हुए कोई भी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने को तैयार नहीं हो रहा है । हर किसी का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जिस तरह से सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट का और लायनिज्म का नाम खराब किया है, श्याम बिहारी अग्रवाल तो उनसे भी बुरे साबित होंगे । इसी कुख्याति के चलते श्याम बिहारी अग्रवाल को अपने ही शहर - हाथरस के अकेले पूर्व गवर्नर अशोक कपूर का भी समर्थन नहीं मिल पा रहा है । श्याम बिहारी अग्रवाल लेकिन खुशकिस्मत हैं कि उन्हें पारस अग्रवाल के रूप में एक समर्थक मिल गया है । पारस अग्रवाल ने अपने बॉन वॉएज में फैलोशिप का मौका श्याम बिहारी अग्रवाल को देकर उनके प्रति अपने समर्थन का सार्वजनिक प्रदर्शन पहले ही कर दिया था । इसके बाद वृन्दावन में हुई स्कूलिंग में भी लोगों को शराब पिलवाने की जिम्मेदारी पारस अग्रवाल ने श्याम बिहारी अग्रवाल को ही सौंपी । धार्मिक नगरी होने के कारण वृन्दावन में शराब पिलवाने का काम खुले में तो नहीं हो सकता था, लिहाजा पारस अग्रवाल ने श्याम बिहारी अग्रवाल को सलाह दी कि कुछेक नेताओं के गले के नीचे जब तक शराब नहीं उतरेगी तब तक उनका लायनिज्म तो पूरा नहीं होगा - इसलिए अपनी गाड़ी में शराब का पूरा पूरा इंतजाम रखो और अच्छे से लायनिज्म की सेवा करो । स्कूलिंग में शामिल हुए लोग बताते हैं कि श्याम बिहारी अग्रवाल ने सेवा में वास्तव में कोई कमी नहीं रहने दी ।
उल्लेखनीय है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अलीगढ़ के अजय सनाढ्य को कई पूर्व गवर्नर्स का खुला समर्थन मिल रहा है; और माना/समझा जा रहा था कि वह निर्विरोध ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुन लिए जायेंगे । लेकिन श्याम बिहारी अग्रवाल को शह देकर पारस अग्रवाल ने चुनावी मुकाबले की स्थिति बना दी है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि चुनाव के नजदीक आते आते हो सकता है कि पारस अग्रवाल भी अजय सनाढ्य के समर्थक बन जाएँ - अभी लेकिन वह श्याम बिहारी अग्रवाल को इसलिए शह दे रहे हैं ताकि उन्हें दोनों से ही खर्चे करवाने का मौका मिलता रहे । पारस अग्रवाल को डर है कि यदि अजय सनाढ्य अकेले उम्मीदवार रहे, तो वह उनकी परवाह नहीं करेंगे और उनकी नहीं सुनेंगे । अजय सनाढ्य की गर्दन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए ही पारस अग्रवाल ने श्याम बिहारी अग्रवाल को शह देकर उम्मीदवार बना दिया है ।
पारस अग्रवाल की इस तरह की चालबाजियों को देख कर ही लोगों को लग रहा है कि पारस अग्रवाल की भी सोच बिलकुल निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल जैसी ही है और चालाकियों व बेईमानियों में लगता है कि वह सीपी सिंघल के भी गुरु साबित होंगे ।

Thursday, August 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूजा अग्रवाल बंसल के जबावी पत्र से चेयरमैन राकेश मक्कड़ और सेक्रेटरी राजिंदर अरोड़ा की मुश्किलें और बढ़ीं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पूर्व कार्यकारी चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने अपने ऊपर लगे आरोपों का करीब 350 पृष्ठों में जो जबाव दिया है, वह मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ और सेक्रेटरी राजिंदर अरोड़ा की कारस्तानियों के साथ-साथ बेवकूफियों की भी अच्छे से पोल खोलता है । पूजा अग्रवाल बंसल ने अपने जबाव में जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं, वह काउंसिल के पदाधिकारी के रूप में राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा के निकम्मेपन का तो सुबूत पेश करते ही हैं, यह भी दिखाते हैं कि बातों और तथ्यों के मामले में यह लोग झूठ और बेवकूफी की चरमसीमा को प्राप्त हैं । पूजा अग्रवाल बंसल ने इनके द्वारा लगाए गए हर आरोप का प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव दिया है और अपने हर प्वाइंट का सुबूत प्रस्तुत किया है । उन्होंने राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा को चुनौती दी है कि वह उनके द्वारा दिए गए तथ्यों को गलत साबित करें, अन्यथा अपने आरोप वापिस लें । पूजा अग्रवाल बंसल ने साफ कहा है कि राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने यदि ऐसा नहीं किया, तो वह इनके खिलाफ उचित कार्रवाई करेंगी । 
पूजा अग्रवाल बंसल के जबावी हमले ने राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा को गिड़गिड़ाने के लिए मजबूर कर दिया है और अब वह लोगों से कहते फिर रहे हैं कि पूजा अग्रवाल बंसल ने अपने जबाव की कॉपी सेंट्रल काउंसिल और पाँचों रीजनल काउंसिल के सभी सदस्यों के साथ-साथ इंस्टीट्यूट के सभी पूर्व प्रेसीडेंट्स तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पूर्व चेयरमैन्स को भेज कर प्रोफेशन के लोगों के बीच उनकी सार्वजनिक रूप से बेइज्जती की है । इस पर पूजा अग्रवाल बंसल की तरफ से सुनने को मिला है कि इन्होंने उन पर आरोप लगाते हुए जो मेल लिखा था, उसकी कॉपी भी इन्होंने काउंसिल के कई सदस्यों को भेजी थी - इसलिए उनके लिए भी जरूरी हुआ कि वह इंस्टीट्यूट से संबद्ध सभी लोगों को सच्चाई से अवगत कराएँ और सभी लोगों को यह जानकारी उपलब्ध करवाएँ कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में आखिर हो क्या रहा है ? जाहिर है कि आरोपों के जरिए विरोधी को बदनाम करने का खेल राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा की जोड़ी ने शुरू किया था - लेकिन उन्होंने इतनी बेवकूफी से इस खेल में हाथ डाला कि पूजा अग्रवाल बंसल ने पलटवार करते हुए खेल में उनकी ही गर्दन फँसा दी है ।
राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने पूजा अग्रवाल बंसल को आरोपों की जो फेहरिस्त दी, वह इतनी बेवकूफी से तैयार की गयी थी कि उनके आरोप झूठ का पुलिंदा बन कर रह गए - इसीलिए पूजा अग्रवाल बंसल को पलटवार करने का बढ़िया मौका मिला और उन्होंने राकेश मक्कड़ व राजिंदर अरोड़ा के आरोपों की तथ्यों और सुबूतों के साथ धज्जियाँ उड़ा दीं । राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने अपने आरोप पत्र में सबसे गंभीर आरोप लगाया कि पूजा अग्रवाल बंसल बेकार की बातों को लेकर मेल लिखती रहती हैं और इस तरह नॉन-कंस्ट्रक्टिव बातों में अपना और दूसरों का समय खराब करती हैं । इसके जबाव में पूजा अग्रवाल बंसल ने सिलसिलेबार तरीके से अपनी 26 मेल्स का जिक्र किया है और पूछा है कि इनमें जिन भी विषयों पर बात की गयी है, उनमें कौन सी बात बेकार की और या नॉन-कंस्ट्रक्टिव है ? काउंसिल को समय न देने के आरोप पर पूजा अग्रवाल बंसल ने रिकॉर्ड बताते हुए दावा किया कि काउंसिल की मीटिंग्स में पिछले वर्ष उनकी नब्बे प्रतिशत और इस वर्ष अभी तक सौ प्रतिशत उपस्थिति है - जाहिर है कि काउंसिल को समय न देने का आरोप पूरी तरह झूठ है ? मीटिंग्स में देर से आने और जल्दी चले जाने के आरोप पर पूजा अग्रवाल बंसल ने दावा किया कि काउंसिल की मीटिंग्स के रिकॉर्ड देखे जा सकते हैं जिनके अनुसार अधिकतर मीटिंग्स में 'वोट ऑफ थैंक्स' उन्होंने दिया है, जो मीटिंग का अंतिम एजेंडा होता है । राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा द्वारा लगाए गए अन्य आरोपों को भी प्वाइंट टू प्वाइंट झूठा साबित करते हुए पूजा अग्रवाल बंसल ने जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं, उनसे साबित होता है कि राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी होने के बावजूद दूसरों को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक झूठ बोल सकते हैं ।
राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा की फितरत को न जानने/पहचानने वाले लोगों को हैरानी है कि यह कैसे लोग हैं; इन्हें इतनी भी अक्ल नहीं है कि काउंसिल के ही सदस्य के खिलाफ झूठे आरोप लगाओगे तो वह पलभर में ही झूठ की पोल खोल देगा । इनके नजदीकियों का कहना है कि 4 अगस्त की रीजनल काउंसिल की मीटिंग में पूजा अग्रवाल बंसल पर चुप रहने का दबाव बनाने के उद्देश्य से राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा ने एक अगस्त को उन्हें आरोप पत्र थमा दिया था । रीजनल काउंसिल के इन दोनों पदाधिकारियों ने उम्मीद की थी कि आरोप पत्र से पूजा अग्रवाल बंसल दबाव में आ जायेंगी और मीटिंग में चुप रहेंगी । लेकिन हुआ उल्टा ही । पूजा अग्रवाल बंसल ने 4 अगस्त की मीटिंग में तो राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा की कारस्तानियों को लेकर मोर्चा संभाला ही, आरोप पत्र का प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव देकर भी इनके लिए मुसीबत और बढ़ा दी है । झूठे आरोपों को लेकर पूजा अग्रवाल बंसल ने तो कार्रवाई करने की चेतावनी दी ही हुई है; दूसरे लोगों का भी कहना है कि राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा में यदि जरा सी भी शर्महया हो और उनकी औकात हो तो उन्हें जल्दी से जल्दी पूजा अग्रवाल बंसल के द्वारा प्रस्तुत तथ्यों का उन्हीं की ही तरह प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव देना चाहिए अन्यथा झूठे आरोप लगाने के लिए उनसे माफी माँगनी चाहिए । राकेश मक्कड़ और राजिंदर अरोड़ा को जानने/पहचानने वाले लोगों का मानना और कहना लेकिन यह है कि समझदारी के मामले में इनकी 'औकात' ऐसी नहीं है कि यह प्वाइंट टू प्वाइंट जबाव दे सकें; यह निहायत बेशर्म लोग हैं, इसलिए अपने झूठे आरोपों पर यह माफी भी नहीं माँगेंगे - यह तो बस अपनी हरकतों से काउंसिल, प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट को बदनाम करने के साथ-साथ अपनी खुद की फजीहत भी करवाते रहेंगे । यानि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अभी और तमाशे देखने/सुनने को मिलते रहेंगे ।

Wednesday, August 9, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल की बातों और हरकतों के प्रति क्लब्स के पदाधिकारियों के बीच बढ़ती नाराजगी के आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी पर भारी पड़ने का खतरा बढ़ता दिखा

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में उत्तर प्रदेश के क्लब्स की एकजुटता बनाने की जो कोशिश की है, उसे अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे उत्तर प्रदेश के संभावित उम्मीदवारों की तरफ से तगड़ा झटका लग रहा है । अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवारी की तैयारी करने वाले संभावित उम्मीदवारों को डर है कि इस बार यदि आलोक गुप्ता जीतते हैं तो 'हर वर्ष उत्तर प्रदेश से ही गवर्नर क्यों' की भावना के चलते उनके लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है । अगले वर्ष की अपनी मुसीबत को टालने के लिए ही अगले वर्ष उम्मीदवार होने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों और उनके समर्थकों ने आलोक गुप्ता के पक्ष में उत्तर प्रदेश के क्लब्स को एक करने के लिए चलाई जा रही सतीश सिंघल की मुहिम में पंक्चर करने का काम शुरू कर दिया है । मजे की बात यह है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए दिल्ली के कुछेक क्लब्स पहले से ही 'हर वर्ष उत्तर प्रदेश से ही गवर्नर क्यों' की मुहिम चलाए हुए थे, जिसका मुकाबला करने के लिए ही सतीश सिंघल ने उत्तर प्रदेश के क्लब्स को एकजुट करने की कोशिशें शुरू की - उनके यह कोशिशें सिरे चढ़तीं, कि उत्तर प्रदेश के ही अगले संभावित उम्मीदवारों ने उनकी कोशिशों को झटका दे दिया है ।
आलोक गुप्ता के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए सतीश सिंघल की एक अन्य तरकीब का दिल्ली के क्लब्स पहले ही कबाड़ा कर चुके हैं । उक्त तरकीब के तहत सतीश सिंघल ने क्लब्स के पदाधिकारियों को फरमान जारी किया कि अपने अधिष्ठापन कार्यक्रम में वह डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्यों को भी आमंत्रित करें और उनका स्वागत करें । आलोक गुप्ता चूँकि डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्य हैं - इसलिए उक्त फरमान के जरिए सतीश सिंघल ने क्लब्स को दरअसल आलोक गुप्ता को आमंत्रित करने तथा उनका स्वागत करने के लिए मजबूर करने का काम किया । क्लब्स ने खासकर दिल्ली के क्लब्स ने सतीश सिंघल की इस तरकीब का तोड़ यह निकाला कि उन्होंने अपने अधिष्ठापन कार्यक्रमों में आलोक गुप्ता के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार ललित खन्ना को भी आमंत्रित किया और उनका स्वागत किया - इससे सतीश सिंघल की तरकीब पूरी तरह पिट गयी ।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली के क्लब्स और उनके पदाधिकारी राजनीतिक उठापटक के खेल में ज्यादा नहीं फँसते हैं और ज्यादा राजनीति करने वालों को बड़ी नीची निगाह से देखते हैं । सतीश सिंघल ने डेढ़ महीने से भी कम के अभी तक के अपने गवर्नर-काल में 'काम कम, बातें ज्यादा' करने वाले गवर्नर की पहचान बनायी है; अपने भाषणों में वह इतनी लंबी-लंबी फेंकते हैं कि लोग उन्हें 'फेंकू' कहने लगे हैं - ऐसे में, सतीश सिंघल जब राजनीतिक चालबाजी दिखाते हैं तब क्लब्स के पदाधिकारी उनके प्रति और ज्यादा नकारात्मक भाव से भर जाते हैं । क्लब्स के पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के प्रति सीधा सीधा विरोध तो प्रकट नहीं करते हैं, इसलिए कोई भी सतीश सिंघल से सामने सामने तो विरोध और नाराजगी की बात नहीं करता है - लेकिन पीठ पीछे अधिकतर क्लब्स के पदाधिकारी सतीश सिंघल का मजाक बनाते/उड़ाते हैं ।
सतीश सिंघल के प्रति क्लब्स के पदाधिकारियों के इस रवैये को देखते/समझते हुए आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों ने डर भी व्यक्त किया है कि सतीश सिंघल की कारस्तानियाँ कहीं आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी पर भारी न पड़ें । उनका कहना है कि आलोक गुप्ता अपनी सक्रियता, अपने व्यवहार और अपने रवैये से लोगों के बीच पैठ बनाते हुए अपने लिए समर्थन का भाव बनाते हैं - लेकिन सतीश सिंघल की बेवकूफीभरी बातें और उनकी हरकतें लोगों को इर्रिटेट कर देती हैं । आलोक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाने हेतु सतीश सिंघल ने जो जो कदम उठाए हैं, उनका उल्टा ही असर देखने को मिला है । उत्तर प्रदेश के क्लब्स को आलोक गुप्ता के पक्ष में एकजुट करने की सतीश सिंघल की कोशिशों का भी नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है : जब तक आलोक गुप्ता अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयत्न कर रहे थे, तब तक उन्हें उत्तर प्रदेश के क्लब्स से अच्छा समर्थन मिलने की बातें सुनी जा रही थीं; लेकिन जैसे ही सतीश सिंघल ने उत्तर प्रदेश की एकजुटता का राग आलापना शुरू किया, वैसे ही आलोक गुप्ता के लिए मामला उल्टा पड़ने लगा ।
सतीश सिंघल ने उत्तर प्रदेश में आलोक गुप्ता के लिए समर्थन मजबूत करने/बनाने के लिए एकजुटता की जो तरकीब लगाई, उसे पहला झटका नोएडा के क्लब्स की तरफ से मिला - जिन्होंने अपने आप को उत्तर प्रदेश में 'मानने' को लेकर ऐतराज जताया । नोएडा के लोग यूँ भी अपने आप को उत्तर प्रदेश की बजाए दिल्ली के ज्यादा 'नजदीक' समझते हैं । आलोक गुप्ता अपने प्रयत्नों से नोएडा के क्लब्स में अपने लिए समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे थे, उसका सकारात्मक असर होता हुआ दिख रहा था - लेकिन सतीश सिंघल की कारस्तानी ने सब गुड़ गोबर कर दिया । सतीश सिंघल की कारस्तानी ने ही अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों को उकसाया है - उन्हें लगा है कि उत्तर प्रदेश को एकजुट करके यदि आलोक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाया गया, तो अगले वर्ष उनके लिए मुसीबत हो जाएगी । सतीश सिंघल, सुभाष जैन, दीपक गुप्ता के रूप में उत्तर प्रदेश से ही जिस तरह से गवर्नर्स की लाइन है - उसे लेकर दिल्ली के क्लब्स के लोगों में पहले ही बेचैनी है और वह डिस्ट्रिक्ट में स्वयं को उपेक्षित स्थिति में पा रहे हैं । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में की जा रही हरकतें दिल्ली के क्लब्स के पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ सदस्यों के जले पर नमक रगड़ने जैसा काम कर रही हैं । अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे उत्तर प्रदेश के संभावित उम्मीदवारों ने इस स्थिति को अपने लिए गंभीर खतरे के रूप में देखा/पहचाना है - और इस कारण से उत्तर प्रदेश को आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में एकजुट करने की सतीश सिंघल की योजना पानी फिरता नजर आ रहा है ।

Saturday, August 5, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पुलिस कार्रवाई की धमकी के बाद राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर की बदतमीजी पर विराम लगा और राकेश मक्कड़ विरोधी सदस्यों की माँगे मानने के लिए मजबूर हुए

नई दिल्ली । राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में जो निर्लज्ज किस्म का लफंगापन प्रदर्शित किया, उसे रोकने के लिए काउंसिल सदस्यों को पुलिस बुलाने की धमकी देनी पड़ी - और तब मीटिंग में शांति स्थापित हो सकी और उसमें सदस्यों को अपनी अपनी बात कहने/रखने का मौका मिल सका । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल क्या, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि पदाधिकारियों के रवैये के खिलाफ काउंसिल  सदस्यों को ही पुलिस बुलाने की जरूरत महसूस हुई । मीटिंग में राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर के व्यवहार के बारे में जिस किसी ने भी सुना, उसकी यही प्रतिक्रिया रही कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में इन्हें वोट देने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने काउंसिल के लिए सदस्य चुने हैं या लफंगे चुने हैं ? राजेंद्र अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेक्रेटरी हैं और नितिन कँवर निकासा चेयरमैन हैं; यह दोनों यूँ तो मीटिंग में चीख-चिल्लाहट के जरिए और मेजें थपथपा कर शोर-शराबा करने तथा अपशब्दों व गालियों के जरिये दूसरों को चुप करने का काम करने के लिए कुख्यात रहे हैं, लेकिन कल की मीटिंग में तो इन दोनों ने हद ही कर दी - अपने लफंगई व्यवहार से यह दूसरे सदस्यों को लगातार अपमानित करते जा रहे थे और उन्हें बोलने ही नहीं दे रहे थे; इनके व्यवहार से दो-तीन बार तो ऐसे हालात बने कि लगा कि मीटिंग में मार-पिटाई हो जाएगी ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन द्वारा मीटिंग में भेजे गए ऑब्जर्वर्स की उपस्थिति की भी इन्होंने परवाह नहीं की । इनके व्यवहार से तंग आकर काउंसिल के कुछेक सदस्यों ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर से इनकी शिकायत की, उन्होंने लेकिन यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि मीटिंग में उन्होंने ऑब्जर्वर्स भेज दिए हैं और इससे ज्यादा वह कुछ नहीं कर सकते हैं । शिकायत करने गए काउंसिल सदस्यों ने तब वी सागर को दो-टूक शब्दों में बता दिया कि आप कुछ नहीं कर सकते हैं, तो हम पुलिस में रिपोर्ट कर रहे हैं और पुलिस बुला रहे हैं । यह बात कही तो गयी थी इंस्टीयूट के सेक्रेटरी वी सागर से उनके ऑफिस में, लेकिन यह बात तुरंत राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर तक पहुँची - जिसका नतीजा यह देखने में आया कि फिर इन्होंने मीटिंग में कोई बदतमीजी नहीं की और मीटिंग में सचमुच कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले हुए । लगता है कि इनके रिंग मास्टर राजेश शर्मा, जो मीटिंग के दौरान मीटिंग-स्थल के आसपास ही बने हुए थे और इन्हें लगातार निर्देश दे रहे थे, ने इन्हें चेता दिया होगा कि पुलिस को 'बेस' पसंद है और वह 'बेस' सुजा देती है, इसलिए अब कोई ऐसी हरकत न करना कि अपने अपने 'बेस' को सुजवा लो और बैठने लायक न रहो । राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने पॉवर ग्रुप के रिंग मास्टर राजेश शर्मा की चेतावनी को गंभीरता से लिया और अपने अपने 'बेस' की चिंता करते हुए मीटिंग में अपनी बदतमीजी पर ब्रेक लगाया ।
इसके बाद मीटिंग का पूरा नजारा बदल गया । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने अपनी बेईमानीपूर्ण हरकतों के लिए बार-बार माफी माँगी; अपने भाई को काउंसिल की कोचिंग क्लास देने के लिए उन्होंने मासूम-सा तर्क दिया कि उन्हें उस नियम के बारे में पता नहीं था जिसके अनुसार वह अपने भाई को क्लास नहीं दे सकते हैं । पिछले वर्ष के एकाउंट काउंसिल सदस्यों को ही दिखाने से लगातार इंकार करते रहे राकेश मक्कड़ फिर एकाउंट दिखाने के लिए भी राजी हो गए । रीजनल काउंसिल के हर उस फैसले के पूरे विवरण देने के लिए भी उन्होंने सहमति व्यक्त की, जिसमें पैसों का लेन-देन होता है । कल हुई नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग दरअसल इसीलिए महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि उसमें पॉवर ग्रुप की बेईमानियों के हिसाब-किताब के बारे में फैसला होना था । राजेश शर्मा द्वारा नियंत्रित और राकेश मक्कड़ द्वारा संचालित काउंसिल का पॉवर ग्रुप इसीलिए काउंसिल की मीटिंग करने से बच रहा था । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को बार बार मेल लिखे जा रहे थे कि वह हस्तक्षेप करें और रीजनल काउंसिल की मीटिंग करवाएँ, लेकिन इसके बावजूद मीटिंग करने से बचा जा रहा था । रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग करवाने की माँग करते हुए प्रेसीडेंट को मेल लिखना लगातार जारी रखा और उनकी बारहवीं मेल के बाद मीटिंग करने का फैसला हुआ ।
मीटिंग के लिए मजबूर होने के बाद भी राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ की जोड़ी अपनी हरकत से बाज नहीं आई और उसने मीटिंग का एजेंडा तय नहीं होने दिया । काउंसिल के विरोधी सदस्यों को आभास था कि मीटिंग में हुड़दंगबाजी करके यह अपनी बेईमानियों के मामलों को एजेंडा नहीं बनने देंगे, इसलिए उन्होंने ऑब्जर्वर की माँग की । इंस्टीट्यूट प्रशासन ने दो ऑब्जर्वर नियुक्त कर दिए । राजेश शर्मा की शह पर राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने ऑब्जर्वर्स की मौजूदगी की भी परवाह नहीं की और अपनी बदतमीजियों से मीटिंग में कोई बात ही नहीं होने दी । अपनी बदतमीजियों का निशाना बनाने से उन्होंने अपने ग्रुप के महत्त्वपूर्ण सदस्य और वाइस चेयरमैन विवेक खुराना तक को नहीं छोड़ा; विवेक खुराना का 'कुसूर' सिर्फ इतना था कि वह लगातार नियमानुसार काम करने की वकालत कर रहे थे - जो राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने विवेक खुराना को कई बार धमकाया । उनकी हरकतों के कारण एक-डेढ़ घंटे की मीटिंग छह घंटे चली - और छह घंटे की मीटिंग में भी कई-एक फैसले तब संभव हो सके जब पुलिस कार्रवाई की धमकी के बाद राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने अपने अपने 'बेस' की चिंता करते हुए अपनी बदतमीजियों पर ब्रेक लगाया ।
चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने कल हुई मीटिंग में काउंसिल के विरोधी खेमे के सदस्यों की कई माँगों को सिद्धांततः स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन विरोधी खेमे के कुछेक सदस्यों को शक है कि उन्हें सचमुच अमल में लाने से बचने के लिए वह कोई हरकत न कर दें, इसलिए वह राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथियों की हरकतों पर नजर रखने की जरूरत भी समझ रहे हैं । राकेश मक्कड़ अपनी हरकतों से अपनी और काउंसिल की खासी फजीहत करवा चुके हैं, और अपनी हरकतों पर पर्दा डालने की उनकी हर कोशिश लगातार फेल होती जा रही है - इससे उम्मीद हालाँकि यह भी की जा रही है कि इससे सबक लेते हुए राकेश मक्कड़ अब अपनी बात पर ईमानदारी से अमल करेंगे । देखना दिलचस्प होगा कि राकेश मक्कड़ लगातार हो रही अपनी फजीहत से सचमुच सबक लेंगे या अपनी बेईमानीपूर्ण हरकतों को जारी रखेंगे ?