Saturday, July 14, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा जैसे शुभचिंतकों के होते हुए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल के मामले में भी इंस्टीट्यूट प्रशासन क्या आरएस बंसल के मामले जैसी कार्रवाई कर सकेगा क्या ?

लुधियाना । पंकज पेरिवाल के ऑफिस में इनकम टैक्स विभाग के छापे के बाद आरएस बंसल से इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों में टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में 'पकड़े' जाने वाले 'अकेले' पदाधिकारी का तमगा छिन गया है । उल्लेखनीय है कि अभी तक आरएस बंसल ही इंस्टीट्यूट के अकेले पदाधिकारी थे, जो टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में पकड़े गए हैं । यूँ तो इंस्टीट्यूट के कई पदाधिकारियों, इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के बहुत से सदस्यों पर फर्जी एंट्री के धंधे में लिप्त रहने के आरोप चर्चा में रहे हैं; लेकिन जैसा कि माना/कहा जाता है कि चोर तो वह होता है - जो 'पकड़ा' जाता है, जो पकड़ा नहीं जाता वह तो 'प्रोफेशनल' होता है; इसलिए आरएस बंसल जब 'पकड़े' गए तब उन्हें इंस्टीट्यूट के पहले और अकेले पदाधिकारी होने का खिताब मिला, जो टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में धरे गए - और इसके चलते उन पर प्रोफेशन व इंस्टीट्यूट की नाक कटवाने का दाग लगा और जिसके कारण उन्हें सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से दूर रहना पड़ रहा है । आरएस बंसल ने हालाँकि पहले उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बारे में यह सोच कर सोचा था कि इंस्टीट्यूट के चुनाव में बहुत से उम्मीदवार ऐसे हैं जो फर्जी एंट्री का काम करते हैं, इसलिए उन्हें ही क्यों चुनाव से दूर रहना चाहिए - लेकिन फिर जल्दी ही उन्हें 'पकड़े' जाने तथा 'न पकड़े' जाने का फर्क समझ में आ गया और उन्होंने अपने आपको चुनावी झमेले से दूर कर लिया । आरएस बंसल के साथ उनके एक नजदीकी रिश्तेदार अनिल अग्रवाल भी टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में पकड़े गए थे, जो नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे; पकड़े जाने के बाद जिन्होंने लालू यादव वाला फार्मूला अपना कर अपनी पत्नी रोबिना अग्रवाल को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है ।
लगता है कि हम मूल बात से भटक गए हैं जो पंकज पेरिवाल के इनकम टैक्स विभाग की जाँच-पड़ताल की चपेट में आने और इस तरह आरएस बंसल से तमगा छिनने को लेकर थी; इसलिए मूल बात पर लौटते हैं : नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन होने के नाते आरएस बंसल जब टैक्स चोरी करने/करवाने के मामले में 'पकड़े' गए थे, तब वह इंस्टीट्यूट के पहले और अकेले पदाधिकारी 'बने' थे, जो टैक्स चोरी के मामले में पकड़े गए; लेकिन आज नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे के बाद पंकज पेरिवाल भी 'क्लब' में आरएस बंसल के साथी हो गए हैं । पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पड़े छापे का मुख्य कारण आधिकारिक रूप से तो अभी सामने नहीं आ पाया है, लेकिन लोगों के बीच चर्चा यही है कि उनके यहाँ पड़े छापे का संबंध काले को सफेद करने वाले मामले से ही है । आरएस बंसल एक टेलीविजन चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में काले को सफेद करने के काम में 'पकड़े' गए थे, तो पंकज पेरिवाल कुछेक और लोगों के पकड़े जाने के मामले में इनकम टैक्स विभाग द्वारा की गई जाँच-पड़ताल में विभाग के राडार पर आ गए हैं । दोनों के मामले में एक बड़ा फर्क यह भी है कि आरएस बंसल का मामला जब सामने आया था, तब हर कोई इंस्टीट्यूट से उन्हें सजा दिलवाने पर आमादा हो गया था, लेकिन पंकज पेरिवाल के मामले में कई लोग यह तर्क देते/बताते हुए उन्हें 'बचाने' की कोशिशों में लग गए हैं कि उनके यहाँ जो छापा पड़ा है वह विभाग की रूटीन कार्रवाई है और इसे इंस्टीट्यूट और या प्रोफेशन के लिए किसी नकारात्मक भाव से नहीं देखा जाना चाहिए ।
आरएस बंसल के मामले में इंस्टीट्यूट प्रशासन ने खुद ही संज्ञान ले कर उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था और उन्हें सजा दी थी, हालाँकि सजा इतनी मामूली सी थी कि लोगों ने उसे सजा की बजाये 'प्रोत्साहन' के रूप में ही देखा/पहचाना था । लेकिन पंकज पेरिवाल के मामले में उतना भी होता हुआ नहीं दिख रहा है । दरअसल इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पंकज पेरिवाल के कई समर्थक हैं; सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा तो लुधियाना में उनके समर्थन से वोट पाने की तैयारी में हैं, इसलिए पंकज पेरिवाल के और ज्यादा मुसीबत में पड़ने से उनकी तो सारी तैयारी धरी रह जायेगी - जिस कारण राजेश शर्मा किसी भी तरह से पंकज पेरिवाल को बचाने का प्रयास करेंगे । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता भी पंकज पेरिवाल के शुभचिंतक के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं, इसलिए इस बात की किसी को भी उम्मीद नहीं है कि आरएस बंसल के मामले की तरह उनके मामले में भी इंस्टीट्यूट प्रशासन खुद से संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई करेगा । हालाँकि संभावना यह भी है कि इंस्टीट्यूट इस समय चूँकि चुनावी हवा में है, इसलिए कुछेक लोग पंकज पेरिवाल के मामले को ठंडे बस्ते में आसानी से नहीं जाने देंगे । चुनावी हवा पंकज पेरिवाल के मामले को कितना भड़कायेगी, यह देखने की बात होगी ।

Friday, July 13, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में अधिष्ठापन समारोह के पैकेज के महँगे होने के आरोप से परेशान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस ने लॉस बेगास में ही अगले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आरके अग्रवाल को 'गहरा मंत्र' दिया है कि वरिष्ठ लायन को सेक्रेटरी बनाओगे, तो मेरी ही तरह पछताओगे

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस ने पुनीत बंसल व ओंकार सिंह रेनु के व्यवहार से तंग आकर अगले लायन वर्ष के गवर्नर आरके अग्रवाल को लॉस बेगास में एक महत्त्वपूर्ण सलाह यह दी है कि अपना गवर्नर-काल यदि ठीक से चलाना है, तो भूल कर भी किसी वरिष्ठ लायन को कैबिनेट सेक्रेटरी मत बनाना । मजे की बात यह है कि वीके हंस ने आरके अग्रवाल को दी गई इस सलाह को कुछेक दूसरों तक पहुँचाने का काम भी किया है । इसके जरिये वीके हंस ने वास्तव में जाहिर किया है कि पुनीत बंसल व ओंकार सिंह रेनु को कैबिनेट सेक्रेटरी बना कर वह पछता रहे हैं । वीके हंस के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई है कि डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी के रूप में पुनीत बंसल व ओंकार सिंह रेनु के रवैये की वह किसी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से शिकायत भी करते हैं, तो उन्हें यही सुनने को मिलता है कि इन्हें सेक्रेटरी बनाने से पहले हम से सलाह की थी क्या; तुम्हीं ने तो इन्हें सेक्रेटरी बनाया है, तो तुम्हीं भुगतो - हम क्या करें ? वीके हंस को ज्यादा शिकायत करता देख/सुन लोग यहाँ तक कहने लगे हैं कि इन दोनों से अच्छी/मोटी रकम ऐंठने के चक्कर में वीके हंस ने इन्हें सेक्रेटरी बनाया है, तो अब शिकायत क्यों कर रहे हैं ? उल्लेखनीय है कि पुनीत बंसल को अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बनना है, और ओंकार सिंह रेनु इसी वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनने की 'तैयारी' में हैं - इसलिए इन्हें डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी बनने में अपना अपना राजनीतिक फायदा दिखा और वीके हंस को इन्हें बनाने में आर्थिक फायदा हुआ, तो इस दोहरे फायदे के चलते यह डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी बन गए ।
लोगों को हैरानी हालाँकि इस बात पर है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वीके हंस का कामकाज अभी शुरू भी नहीं हुआ है, तब फिर वह पुनीत बंसल व ओंकार सिंह रेनु से आखिर किस बात पर नाराज हो गए हैं और उन्हें सेक्रेटरी बनाने के अपने फैसले पर पछताने लगे हैं ? वीके हंस के नजदीकियों का कहना है कि वीके हंस इन दोनों से दरअसल इस बात पर खफा हैं कि यह दोनों उन्हें फोन करके कुछ पूछते/बताते ही नहीं हैं; इसलिए जब कुछ काम होता है, तब वीके हंस को ही इन्हें फोन करना पड़ता है । पिछले कई दिनों से अमेरिका और कनाडा में घूम रहे तथा काम कर रहे वीके हंस इस बात से भी आहत हैं कि सेक्रेटरी होने के बावजूद पुनीत बंसल और ओंकार सिंह रेनु दिल्ली लौटने के अवसर पर उनके स्वागत के लिए कोई तैयारी ही नहीं कर रहे हैं । आरके शाह के रवैये से भी वीके हंस को झटका लगा है । उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम आरके शाह तो उनके वापस लौटने के अवसर पर उनके स्वागत की तैयारी करेंगे/करवायेंगे, क्योंकि आरके शाह को इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनना' है और इसके लिए वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनके मान/सम्मान का ध्यान रखेंगे । वीके हंस ने अपने नजदीकियों से शिकायती लहजे में कहा है कि आरके शाह ने लगता है कि अपने आपको सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मान ही लिया है, और इसलिए एक उम्मीदवार के रूप में वह कुछ भी करने को तैयार नहीं दिखते हैं । पुनीत बंसल, ओंकार सिंह रेनु और आरके शाह के रवैये से निराश/हताश हो कर वीके हंस ने दिल्ली लौटने के अवसर पर अपने स्वागत की तैयारी करवाने की जिम्मेदारी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आरके अग्रवाल को सौंपी है, और आरके अग्रवाल ही वीके हंस के स्वागत में जुटने के लिए लोगों को राजी करने के काम में लगे हैं ।
पुनीत बंसल और ओंकार सिंह रेनु को लेकर वीके हंस की शिकायत यह भी है कि यह दोनों गोवा में होने वाले डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के काम में भी दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं, और जिस कारण अधिष्ठापन समारोह की तैयारी पिछड़ी हुई है । तैयारी तो पिछड़ी हुई है ही, रजिस्ट्रेशन चार्जेज को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है । गोवा में इन महीनों में ऑफ सीजन है, इसलिए दो रातों के लिए दस हजार रुपये प्रति व्यक्ति के रजिस्ट्रेशन चार्जेज लोगों को ज्यादा लग रहे हैं । कुछेक लोगों का दावा है कि वह इस सीजन में गोवा के अच्छे से अच्छे रिसॉर्ट्स में इससे काफी कम रकम में बुकिंग दिलवा सकते हैं । महँगे रजिस्ट्रेशन की शिकायत करते हुए लोगों का कहना है कि लगता है कि अधिष्ठापन समारोह के नाम पर वीके हंस ने मोटी कमाई की 'व्यवस्था' कर ली है । वास्तव में इसी तरह के आरोपों के चलते अधिष्ठापन समारोह के लिए रजिस्ट्रेशन का काम ढीला पड़ा हुआ है । अधिष्ठापन समारोह की तैयारी से जुड़े लोगों का कहना है कि वीके हंस ने एक तो महँगा पैकेज बनाया, जिसमें ज्यादा लोगों को विश्वास में भी नहीं लिया - और फिर खुद अमेरिका/कनाडा घूम रहे हैं, तथा लोगों के नाराजगी भरे सवालों का सामना हमें करना पड़ रहा है । वास्तव में, महँगे पैकेज की शिकायत करने वाले लोगों का गुस्सा यह देख/जान कर और भड़क रहा है कि पैकेज महँगा क्यों है, यह बताने वाला भी कोई नहीं है । वीके हंस की शिकायत है कि महँगे पैकेज का वास्ता देकर लोगों को भड़काने का काम डिस्ट्रिक्ट के कुछेक लोग ही कर रहे हैं; किंतु उनकी बड़ी शिकायत अपने साथ के पुनीत बंसल व ओंकार सिंह रेनु जैसे उन लोगों से है, जो बड़े बड़े पद लेकर तो बैठ गए हैं, लेकिन जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार नहीं हैं । इसीलिए लॉस बेगास में ही उन्होंने आरके अग्रवाल को 'गहरा मंत्र' दे दिया है कि वरिष्ठ लायन को सेक्रेटरी बनाओगे, तो मेरी ही तरह पछताओगे । हालाँकि दूसरे कई लोगों का कहना है कि वीके हंस को ही काम करना/लेना नहीं आता है, और वह समझ रहे हैं कि गवर्नर के रूप में उन्हें तो बस घूमना/फिरना है और तरह तरह से 'कमाई' करनी है - काम दूसरे लोग करेंगे ।

Thursday, July 12, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन को अलग-थलग करके इंटरनेशनल डायरेक्टर इलेक्ट भरत पांड्या से जुगाड़ बैठा कर पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल की रोटरी रिसोर्स ग्रुप तथा जोन इंस्टीट्यूट में प्रमुख पद पाने की हसरत सचमुच पूरी हो सकेगी क्या ?

नई दिल्ली । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल ने अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने के चक्कर में एक तरफ इंटरनेशनल डायरेक्टर इलेक्ट भरत पांड्या के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है, तो दूसरी तरफ अपने ही क्लब के प्रेसीडेंट अजय अग्रवाल के लिए फजीहत वाली स्थिति बना दी है । रमेश अग्रवाल के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के नए पदाधिकारियों के 14 जुलाई को हो रहे अधिष्ठापन समारोह में भरत पांड्या को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है । भरत पांड्या को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने का आईडिया रमेश अग्रवाल का है, जिसे क्लब के प्रेसीडेंट ने पहले तो खुशी खुशी स्वीकार कर लिया - लेकिन जब उन्हें 'पता' चला कि ऐसा करने की प्रक्रिया में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता को तो छोड़िये, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन तक को उपेक्षित व अपमानित किया गया है, तब प्रेसीडेंट अजय अग्रवाल का माथा ठनका । दरअसल भरत पांड्या का कार्यक्रम तय करने से पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन तक को विश्वास में नहीं लिया गया, ताकि सुभाष जैन को उस कार्यक्रम से दूर रखा जा सके । समझा जाता है कि यह रमेश अग्रवाल की चालबाजी रही कि वह यदि पहले से सुभाष जैन तथा अन्य दो पदाधिकारियों को 14 जुलाई के कार्यक्रम में भरत पांड्या के आने की बात बताते, तो यह लोग उस दिन और कोई कार्यक्रम तय नहीं करते; इन तीनों को 14 जुलाई के कार्यक्रम का निमंत्रण तब मिला जब यह उस दिन के लिए अपने कार्यक्रम तय कर चुके हैं । इस तरह रमेश अग्रवाल ने 'साँप भी मार दिया और लाठी को भी टूटने से बचा लिया' - रोटरी इंटरनेशनल के तीनों पदाधिकारियों को 14 जुलाई के कार्यक्रम का निमंत्रण भी दे दिया गया है, और यह भी सुनिश्चित कर लिया गया है कि यह तीनों कार्यक्रम में आ न सकें; और भरत पांड्या के साथ रमेश अग्रवाल को ज्यादा समय बिताने का मौका मिल सके ।
रमेश अग्रवाल को भरत पांड्या के साथ अकेले ज्यादा समय बिताने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि उन्हें भरत पांड्या से कई फेवर लेने हैं । इस वर्ष रोटरी रिसोर्स ग्रुप में कुछेक महत्त्वपूर्ण पद खाली होकर भरे जाने हैं, जिन पर रमेश अग्रवाल की निगाह है; वह रोटरी इंडिया विन्स के सेक्रेटरी पद से 'ऊपर' उठना चाह रहे हैं, और इस काम में भरत पांड्या उनकी मदद कर सकते हैं । इसके अलावा, भरत पांड्या को अगले कुछ दिनों में अगले रोटरी वर्ष में होने वाली जोन इंस्टीट्यूट के लिए प्रमुख पदाधिकारियों का चयन करना है - और रमेश अग्रवाल को उन प्रमुख पदाधिकारियों की सूची में भी अपना नाम लिखवाना है । यही कुछ जुगाड़ बैठाने के लिए रमेश अग्रवाल ने भरत पांड्या को अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है । समारोह में पधारे भरत पांड्या और उनके बीच कोई 'डिस्टरबेंस' न हो - इसके लिए उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन के साथ ऐसा व्यवहार किया कि सुभाष जैन कार्यक्रम में पहुँच ही न सकें । भरत पांड्या चूँकि दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता के डायरेक्टर होंगे, और इस कारण से यह दोनों भी भरत पांड्या के साथ संबंध बनाने के उनके प्रयासों को डिस्टर्ब कर सकते हैं, इसलिए इन्हें भी सम्मानपूर्वक आमंत्रण नहीं दिया गया है, ताकि यह भी कार्यक्रम से दूर ही रहें । रमेश अग्रवाल की इस चालबाजी ने लेकिन भरत पांड्या के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । रोटरी के प्रोटोकॉल के अनुसार, इंटरनेशनल डायरेक्टर इलेक्ट के रूप में भरत पांड्या को किसी भी डिस्ट्रिक्ट में उसके गवर्नर को विश्वास में लेकर ही जाना चाहिए - और कम से कम किसी ऐसे कार्यक्रम में तो शामिल नहीं ही होना चाहिए, जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व अन्य दो पदाधिकारियों की उपेक्षा व अपमान हो रहा हो । रमेश अग्रवाल की चालबाजी के कारण लेकिन भरत पांड्या रोटरी के प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने के लिए मजबूर हो गए हैं, और इससे रोटरी में उनकी छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा ही ।
रमेश अग्रवाल की यह चालबाजी भरत पांड्या के लिए ही मुसीबत का कारण नहीं बनी है, बल्कि उनके क्लब के प्रेसीडेंट अजय अग्रवाल के लिए भी परेशानी का सबब बन गई है । रमेश अग्रवाल की हरकत के चलते अजय अग्रवाल के सामने अपने प्रेसीडेंट पद का कार्यकाल शुरू होते ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की 'काली सूची' में आ जाने का खतरा पैदा हो गया है । क्लब के पिछले प्रेसीडेंट मोहित गुप्ता को भी रमेश अग्रवाल ने अपनी ऐसी ही हरकत से फँसाया था । मोहित गुप्ता के अधिष्ठापन समारोह की चाबी अपने पास रखते हुए रमेश अग्रवाल ने तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल को उक्त कार्यक्रम में उचित तरीके से आमंत्रित नहीं किया /करवाया था, जिसका बदला सतीश सिंघल ने सिर्फ मोहित गुप्ता से ही नहीं, बल्कि उनके पिता वरिष्ठ रोटेरियन सतीश गुप्ता तक से भी लिया । वह तो सतीश सिंघल चूँकि खुद फजीहत का शिकार हो गए और अपनी गवर्नरी पूरी नहीं कर सके, इसलिए सतीश सिंघल का बदला पूरा नहीं हो सका और मोहित गुप्ता व सतीश गुप्ता बच गए । सतीश सिंघल के साथ रमेश अग्रवाल का चूँकि छत्तीस का आँकड़ा था, इसलिए उनके साथ रमेश अग्रवाल ने जो व्यवहार किया, वह तो समझ में आता है; किंतु सुभाष जैन के साथ भी रमेश अग्रवाल 'दुश्मनों' जैसा व्यवहार करेंगे - यह किसी ने नहीं सोचा था । डीआरएफसी बनने में असफल रहने का ठीकरा रमेश अग्रवाल ने मुख्य तौर पर आलोक गुप्ता के सिर फोड़ा है, इसलिए भी सुभाष जैन के प्रति उनका यह व्यवहार हर किसी को चौंका ही रहा है । रमेश अग्रवाल को नजदीक से जानने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह है कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, रमेश अग्रवाल हैं ही ऐसे । रमेश अग्रवाल के बारे में किसी ने कहा भी है - 'ऐसा कोई सगा नहीं, रमेश अग्रवाल ने जिसे ठगा नहीं ।'
रमेश अग्रवाल को जानने वालों का कहना है कि रमेश अग्रवाल अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, इसलिए भरत पांड्या के सामने अकेले अपने आप को 'दिखाने' तथा भरत पांड्या की कृपा से कुछ बड़े पद पा लेने का जुगाड़ बैठाने के लिए उन्होंने अपने क्लब के नए पदाधिकारियों के एक प्रमुख कार्यक्रम में प्रोटोकॉल के लिहाज से डिस्ट्रिक्ट के तीन पदाधिकारियों का ही पत्ता काट दिया है । आगे के दिनों में यह देखना/जानना दिलचस्प होगा कि इतना कुछ करने के बाद भी भरत पांड्या से रमेश अग्रवाल कुछ पाने में कामयाब होते हैं या नहीं !

Wednesday, July 11, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए राजिंदर नारंग की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने पहले से ही मुसीबतों में घिरी चरनजोत सिंह नंदा तथा हंसराज चुग की उम्मीदवारी को और गहरी मुसीबत में धकेल दिया है

नई दिल्ली । राजिंदर नारंग द्वारा सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी को चरनजोत सिंह नंदा तथा हंसराज चुग ने अपने अपने लिए एक मुसीबत के रूप में देखा/पहचाना है, और इसीलिए इनकी तरफ से राजिंदर नारंग की उम्मीदवारी को वापस करवाने के लिए तरह तरह की कोशिशें हो रही हैं । चरनजोत सिंह नंदा और हंसराज चुग के नजदीकियों की तरफ से जो कुछ सुनने को मिल रहा है, उसके अनुसार इनके लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि राजिंदर नारंग का जो आधार क्षेत्र है - उसमें इन्होंने पिछले दिनों अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते काफी काम किया है, और इन्हें लगता है कि उक्त क्षेत्र में इन्होंने अपने अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया है । इन्हें लग रहा है कि लेकिन राजिंदर नारंग ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अचानक से उम्मीदवारी प्रस्तुत करके इनकी सारी 'मेहनत' पर पानी फेर दिया है और इनकी पूरी योजना का गुड़ गोबर कर दिया है । उल्लेखनीय है कि चरनजोत सिंह नंदा सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी के लिए जोर लगा रहे हैं, तो हंसराज चुग सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश करने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं । हंसराज चुग ने पिछली बार भी चुनाव लड़ा था, और वह थोड़े से अंतर से ही सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश करने से रह गए थे । अबकी बार उन्होंने सेंट्रल काउंसिल के लिए पहले से ही चुनावी तैयारी शुरू कर दी थी, ताकि पिछली बार रह गई कमी को पूरा किया जा सके । हंसराज चुग की तैयारी को लेकिन राजिंदर नारंग की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी से ग्रहण लगता नजर आ रहा है ।
राजिंदर नारंग इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं, और हिसार ब्रांच के सदस्य हैं । हरियाणा के वेस्टर्न हिस्से का प्रतिनिधित्व करता हिसार एक ऐतिहासिक शहर है, जो भावनात्मक रूप से एक तरफ रोहतक व भिवानी से जुड़ता है, और दूसरी तरफ सिरसा व भटिंडा तक अपनी पहुँच बनाता, तथा तीसरी तरफ जींद, कैथल, कुरुक्षेत्र के रास्ते पानीपत व सोनीपत को अपने घेरे में लेता है । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इस क्षेत्र को भारी उपेक्षा सहनी पड़ती है; दिल्ली के उम्मीदवार लोग चंडीगढ़, लुधियाना, जालंधर अमृतसर और शिमला तक के तो चक्कर लगा लेंगे, लेकिन यहाँ यदा-कदा ही झाँकने आयेंगे । हालाँकि इसका वाजिब कारण भी है - ब्रांचेज छोटी छोटी हैं, और उनके सदस्य भी आसपास के शहरों/कस्बों तक फैले हुए हैं । इस कारण न तो यहाँ से कोई उम्मीदवार बनने की हिम्मत करता है, और न दिल्ली या चंडीगढ़/लुधियाना के उम्मीदवार यहाँ समय और मेहनत खराब करना चाहते हैं । इस पूरे क्षेत्र में साढ़े तीन हजार से लेकर चार हजार के बीच चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, और जो एक बड़े क्षेत्रफल में फैले/बिखरे हुए हैं । राजिंदर नारंग पहले और अकेले चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र को इंस्टीट्यूट के राजनीतिक नक्शे पर पहचान दिलाई है । रीजनल काउंसिल के पिछले चुनाव में इसी क्षेत्र के समर्थन के भरोसे राजिंदर नारंग 58 उम्मीदवारों में 777 वोटों के साथ छठे नंबर पर रहे थे । राजिंदर नारंग की कामयाबी ने दिखाया/बताया कि सफलता सिर्फ दिल्ली या चंडीगढ़/लुधियाना जैसे बड़े इलाकों/शहरों की ही बपौती नहीं है, बल्कि तुलनात्मक रूप से एक छोटे क्षेत्र को अपना आधार-क्षेत्र बना कर भी चुनावी सफलता प्राप्त की जा सकती है । राजिंदर नारंग ने रीजनल काउंसिल के चुनाव में हिसार और आसपास के क्षेत्र को जो राजनीतिक पहचान दिलाई, उसी क्षेत्र में चरनजोत सिंह नंदा तथा हंसराज चुग ने सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए शरण पाने का प्रयास किया ।
चरनजोत सिंह नंदा तथा हंसराज चुग ने अलग अलग कारणों से पिछले दिनों हिसार और उसके आसपास के क्षेत्र को अपनी सक्रियता का केंद्र बनाया हुआ है । दरअसल, चरनजोत सिंह नंदा को सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी करने की अपनी कोशिश में दिल्ली तथा चंडीगढ़, लुधियाना, अमृतसर जैसे बड़े इलाके व शहरों में विरोध का सामना करना पड़ रहा है । सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी की उनकी कोशिश को लोग अच्छी निगाह से नहीं देख रहे हैं और मान रहे हैं कि चरनजोत सिंह नंदा इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के हित में नहीं, बल्कि अपने निजी स्वार्थ में यह पुनर्वापसी करना चाह रहे हैं । कई जगह चरनजोत सिंह नंदा को चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के तीखे विरोधभरे सवालों का सामना करना पड़ा है कि वह तमाम वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रह चुके हैं, लिहाजा ऐसा कौन सा काम है - जो वह इतने वर्षों में नहीं कर सके और जिसके लिए वह फिर से सेंट्रल काउंसिल में आना चाहते हैं ? अपनी उम्मीदवारी का इस तरह विरोध होता देख चरनजोत सिंह नंदा ने उपेक्षित हिसार और उसके आसपास के क्षेत्र पर ध्यान देना शुरू किया । हंसराज चुग ने पिछली बार के चुनाव में काफी मेहनत की थी, पिछली बार चुनाव के समय वह रीजनल काउंसिल के सदस्य थे और उसका फायदा उन्हें मिला ही था - जो अब की बार उन्हें नहीं मिल सकेगा । ऐसे में उनके सामने यह चुनौती थी कि वह अपने समर्थन को बढ़ाने के लिए नए क्षेत्र खोजें, और इसी चुनौती को पूरा करने के लिए उन्होंने भी हिसार और आसपास के क्षेत्र पर ध्यान देना शुरू किया । दिल्ली और चंडीगढ़/लुधियाना में दौड़ लगाने वाले अधिकतर उम्मीदवारों को चूँकि इस क्षेत्र पर ध्यान नहीं था, इसलिए चरनजोत सिंह नंदा और हंसराज चुग ने अपने अपने तरीके से अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए इस क्षेत्र पर जो ध्यान दिया, उसका उन्हें सुफल भी मिलता नजर आ रहा था ।
लेकिन राजिंदर नारंग के सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से चरनजोत सिंह नंदा और हंसराज चुग को अपनी सारी तैयारी पर पानी फिरता दिख रहा है । इनके नजदीकियों का कहना है कि इन्हें दरअसल उम्मीद नहीं थी कि राजिंदर नारंग सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हो जायेंगे । राजिंदर नारंग ने अचानक से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके चौंकाया तो कई लोगों को, लेकिन चरनजोत सिंह नंदा तथा हंसराज चुग की तो चुनावी व्यूह रचना को ही ध्वस्त कर दिया है । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उपेक्षा का शिकार होने/रहने वाले हिसार क्षेत्र को राजिंदर नारंग ने पहचान व प्रतिष्ठा तो दिलवाई ही है, इंस्टीट्यूट की प्रशासनिक व्यवस्था का भी ध्यान इस क्षेत्र की तरफ खींचा है । पिछले पाँच/छह वर्षों में इस क्षेत्र में जो नई नई ब्रांचेज खुली हैं तथा स्टडी सर्किल शुरू हुए हैं, उन्हें क्षेत्र के लोगों के बीच राजिंदर नारंग की उपलब्धियों के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । ऐसे में, राजिंदर नारंग के उम्मीदवार हो जाने से इन्हें अब इस क्षेत्र में कुछ मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । राजिंदर नारंग की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने पहले से ही मुसीबतों में घिरी चरनजोत सिंह नंदा तथा हंसराज चुग की उम्मीदवारी को और गहरी मुसीबत में धकेल दिया है । इनके नजदीकियों का कहना है कि इस अचानक आ टपके खतरे से निपटने के लिए इन्होंने अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हुए राजिंदर नारंग की उम्मीदवारी को वापस करवाने के लिए प्रयास शुरू किए हैं । यह देखना दिलचस्प होगा कि इनके प्रयास सफल होते हैं या राजिंदर नारंग अपनी उम्मीदवारी के जरिये इनके लिए मुसीबत बने ही रहते हैं । 

Monday, July 9, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू में वंदना निगम व श्याम निगम की 'धोखाधड़ी' से खफा दीपक राज आनंद व अजय डैंग द्वारा की जाने वाली कानूनी कार्रवाई वंदना निगम के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद को फिर से खतरे में डालेगी क्या ?

कानपुर । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी पा चुकीं वंदना निगम तथा उनके पति श्याम निगम को अब अपने ही खेमे के लोगों की तरफ से धोखेबाज होने का आरोप सुनना/झेलना पड़ रहा है और अपनी गवर्नरी को बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है । उनके ही साथियों और नजदीकियों का कहना है कि गवर्नरी पाने के लालच में इन दोनों ने दीपक राज आनंद व अजय डैंग के साथ धोखा किया है । साथियों और नजदीकियों का कहना है कि यह दोनों दीपक राज आनंद व अजय डैंग के साथ धोखा नहीं करते और इनके अधिकार व सम्मान को बचाने के लिए प्रयास करते, तो भी वंदना निगम डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद पाती हीं - लेकिन दीपक राज आनंद व अजय डैंग के सम्मान व अधिकार को अनदेखा करके इन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए वह किसी की भी बलि चढ़ा सकते हैं । उल्लेखनीय है कि वंदना निगम हालाँकि यह दावा तो पहले से ही करती रही हैं कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के नाम पर जो भी गड़बड़झाला हुआ है, उसके लिए उन्हें नाहक ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है - जबकि उसके लिए पूरी तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक राज आनंद जिम्मेदार हैं । वंदना निगम की इस बात का दीपक राज आनंद तथा दूसरे लोगों ने इसलिए बुरा नहीं माना, क्योंकि उन्हें लगा कि वंदना निगम डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपना भरोसा बनाये रखने के लिए ऐसा कह रही हैं । लोगों को लगा कि वंदना निगम को चूँकि गवर्नरी करनी है और इसके लिए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनका भरोसा बने रहना जरूरी है, इसलिए वह यदि सारा दोष दीपक राज आनंद पर मढ़ रही हैं, तो दीपक राज आनंद को इसे अनदेखा/अनसुना कर देना चाहिए; आखिर खेमे के साथियों को मुसीबत के समय एक-दूसरे के लिए इतना तो करना ही चाहिए । निगम दंपति ने लेकिन लॉस वेगास में जो रवैया दिखाया और जिस तरह से दीपक राज आनंद व अजय डैंग के सम्मान व अधिकार को चुपचाप चोट पहुँचने दी, उसके चलते दीपक राज आनंद व अजय डैंग तथा खेमे के अन्य साथियों ने अपने आप को निगम दंपति के हाथों ठगा हुआ पाया है ।
दीपक राज आनंद, अजय डैंग तथा खेमे के अन्य सदस्यों का कहना है कि लायंस इंटरनेशनल ने जो फैसला लिया है, उससे ज्यादा झटका/धक्का तो उन्हें वंदना निगम और श्याम निगम के रवैये को देख कर लगा है । इन्होंने एकबार भी लीडरशिप के सामने यह नहीं कहा कि दीपक राज आनंद या अजय डैंग के साथ 'अन्याय' क्यों किया जा रहा है ? खेमे के लोगों का कहना है कि हो सकता है कि इनकी बात न सुनी जाती, और इनके कहने के बावजूद भी फैसला वही होता, जो हुआ है - लेकिन हमें इस बात की तसल्ली तो होती कि मुश्किल समय में यह हमारे साथ खड़े थे । लेकिन वंदना निगम और श्याम निगम की चुप्पी ने यह साबित किया कि ये सिर्फ मतलब के साथी हैं, और किसी के साथ भी कभी भी धोखा कर सकते हैं ।
वंदना निगम व श्याम निगम के प्रति उनके अपने खेमे में पैदा हुई नाराजगी तथा दीपक आनंद व अजय डैंग द्वारा लायंस इंटरनेशनल के फैसले की खामियों पर कानूनी सलाह लेने और अपने सम्मान व अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने के विकल्प पर विचार करने की खबरों से संकेत मिल रहे हैं कि वंदना निगम को गवर्नरी मिल तो गई है - लेकिन वह ज्यादा दिन उनके पास रह पायेगी, इसे लेकर लेकर संदेह है । लायंस इंटरनेशनल के फैसले में कानूनी खामी यह देखी/पहचानी जा रही है कि वंदना निगम और बलविंदर सैनी को 'प्रोमोट' करने के फैसले से साबित यह हो रहा है कि लायंस इंटरनेशनल ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को वैध माना/पाया है; और यदि सचमुच डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को वैध माना/पाया गया है तो उसी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'चुने' गए अजय डैंग को उनका अधिकार क्यों नहीं दिया गया ? दरअसल डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू का झगड़ा डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के 'होने' या 'न होने' को लेकर था - एक पक्ष कह रहा था कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस हुई है, दूसरे पक्ष का दावा था कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है । लायंस इंटरनेशनल यदि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस 'होने' के दावे को सच मानता तो वंदना निगम व बलविंदर सैनी 'प्रोमोट' होते तथा अजय डैंग सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित होते; लेकिन यदि लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस 'न होने' के दावे को सच मानता, तो ये तीनों पद पाने के अयोग्य माने जाते - और फिर व्यावहारिकता के तकाजे से यह होता कि वंदना निगम व बलविंदर सैनी 'नोमीनेट' होते और अजय डैंग को कुछ नहीं मिलता । लायंस इंटरनेशनल के फैसले में पेंच लेकिन यह फँसा है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की वैधता को लेकर तो कोई निर्णय नहीं लिया/दिया गया है, तथा वंदना निगम व बलविंदर सैनी को 'प्रोमोट' किया गया है । इन दोनों को 'नोमीनेट' की बजाये 'प्रोमोट' करने के फैसले से साबित होता है कि लायंस इंटरनेशनल ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को वैध माना है - तब फिर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर उसमें हुई अजय डैंग की जीत को स्वीकार करने से क्यों इंकार कर दिया गया है ?
दीपक राज आनंद के बारे में लिए गए फैसले में तो और भी झोल देखा/पहचाना गया है । दीपक राज आनंद को लायनिज्म की छवि खराब करने के आरोप में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से बर्खास्त करने तथा उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ओहदा न देने का फैसला हुआ है । दीपक राज आनंद का कहना/पूछना है कि उन्होंने ऐसा क्या किया है, जिससे लायनिज्म की छवि खराब हुई है । उनका कहना है कि उनके खिलाफ कभी कोई आरोप ही नहीं लगा, और उन्हें 'अपराधी' घोषित करने से पहले किसी भी मामले में न उनका पक्ष लिया गया । उनका दावा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्होंने सभी काम पूरी दक्षता से किए हैं, और उनके किसी भी काम में कभी कोई शिकायत नहीं हुई; सदस्यता वृद्धि के काम में तो उन्होंने रिकॉर्ड स्थापित किया है । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के झमेले में भी उन पर जो आरोप लगे हैं, लायंस इंटरनेशनल ने उनमें भी किसी आरोप को सत्यापित नहीं किया है । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में कुछेक क्लब्स को वोटिंग अधिकार न देने का जो आरोप उन पर लगा है, उन्हें लेकर भी उनका कहना/पूछना है कि जिस आधार पर वह क्लब्स को वोटिंग अधिकार नहीं दे रहे थे, उस 'आधार' पर वोटिंग अधिकार देने से इंकार करने का अधिकार उन्हें लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानून ही देते हैं । और सौ बात की एक बात - वंदना निगम व बलविंदर सैनी को 'प्रोमोट' करने के जरिये जब लायंस इंटरनेशनल ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को वैधता दे दी, उससे यही तो साबित हुआ है कि लायंस इंटरनेशनल ने तमाम आरोपों को खारिज कर दिया है - तब फिर उन्हें किस बात की सजा ? लायंस इंटरनेशनल ने यदि आरोपों को सही पाया होता, तो वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को अवैध घोषित करता और उसमें हुए फैसलों को अमान्य करता - वंदना निगम व बलविंदर सैनी को 'प्रोमोट' न करता ।
दीपक राज आनंद व अजय डैंग के अपने सम्मान और अधिकार को बचाने के लिए कानूनी कार्रवाई के विकल्पों पर विचार किए जाने की सूचना ने वंदना निगम के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को खतरे में डालने की संभावना पैदा कर दी है । वंदना निगम को डर हुआ है कि कानूनी कार्रवाई के चलते उन्हें मिला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद कहीं उनसे छिन न जाए । इस कारण से वंदना निगम और श्याम निगम तरह तरह से दीपक राज आनंद व अजय डैंग पर दबाव बन रहे हैं कि जो हुआ उसे एक दुःस्वप्न मान कर वह नई पहल की तरफ बढ़ें । दीपक राज आनंद व अजय डैंग और खेमे के दूसरे लोग लेकिन चूँकि लॉस बेगास में निगम दंपति द्वारा दर्शाये गए मतलबी व स्वार्थी रवैये से आहत महसूस कर रहे हैं, इसलिए वह अपने सम्मान और अधिकार को बचाने के साथ-साथ निगम दंपति को सबक भी सिखाना चाहते हैं । यानि डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू में उठा-पटक अभी और चलेगी तथा सीन में मजेदार ट्विस्ट यह आया है कि वंदना निगम और श्याम निगम को अपने ही लोगों के साथ की गई 'धोखाधड़ी' का भी भुगतान भुगतना होगा ।

Sunday, July 8, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक अग्रवाल ने अपने क्लब के सदस्यों को विश्वास में लेने के साथ साथ अपनी तरफ से डिस्ट्रिक्ट के लोगों से संपर्क करने की अपनी कोशिशों को भी बढ़ाया है, जिसका डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में उन्हें अच्छा नतीजा भी मिलता दिख रहा है

गाजियाबाद । अशोक अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु न सिर्फ अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना शुरू किया है, बल्कि अपनी सक्रियता को भी बढ़ाया है, और वन-टू-वन पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अधिकतर लोग अशोक अग्रवाल की स्थिति को ही मजबूत मान रहे हैं, और अधिकतर लोगों को लग रहा है कि उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार के रूप में अमित गुप्ता के लिए उनका मुकाबला करना मुश्किल क्या, असंभव ही होगा । कई एक लोगों ने तो कहना भी शुरू कर दिया कि अमित गुप्ता जब अशोक अग्रवाल की मजबूत स्थिति को देखेंगे और पायेंगे कि डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर लोग अशोक अग्रवाल के साथ हैं, तो वह अपनी उम्मीदवारी को वापस ही ले लेंगे । अधिकतर लोगों की इस राय और समझ ने लगता है कि अशोक अग्रवाल को अति-विश्वास से भर दिया और उन्होंने खुद को विजेता मानना/समझना शुरू भी कर दिया । लेकिन अमित गुप्ता को जब चुनावी मैदान में डटे देखा/पाया गया और महसूस किया गया कि अमित गुप्ता धीरे धीरे ही सही - चुनावी लड़ाई में 'टिक' और आगे बढ़ रहे हैं, तब अशोक अग्रवाल और उनके नजदीकियों का माथा ठनका । उन्हें डर हुआ कि अमित गुप्ता के साथ होने वाली उनकी चुनावी लड़ाई कहीं कछुए व खरगोश की दौड़ वाली कहानी को न दोहरा दे - जिसमें खरगोश और उसके साथी कछुए को दौड़ में कहीं देख/मान ही नहीं रहे थे व निश्चिन्त हो गए थे; और उनकी आँख तब 'खुली', जब उन्होंने दौड़ में अपने को पिछड़ा तथा कछुए को जीता हुआ पाया ।
अशोक अग्रवाल और उनके साथियों ने लगता है कि इस बात को समझा/पहचाना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में अभी वह भले ही आगे दिख रहे हैं - लेकिन उनके और अमित गुप्ता के बीच की दूरी कम भी होती जा रही है; और उन्होंने यदि लापरवाही बरतना जारी रखा तो उन्हें पीछे होने में भी देर नहीं लगेगी । दरअसल चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवार से लोगों को - खासकर 'अपने' लोगों को कुछ अलग किस्म की उम्मीदें हो जाती हैं, और वह एक अलग तरीके से 'सेंटीमेंटल' हो जाते हैं । कई बार उम्मीदवारों को यह गलती करते देखा गया है कि वह 'अपने' लोगों पर यह सोच कर ध्यान देना कम या बंद कर देते हैं कि यह तो 'अपना' है ही; उसका यह रवैया देख कर उसका 'अपना' सोचता है कि इसमें अभी से इतनी अकड़ आ गई है और यह अभी से ही हमें तवज्जो नहीं दे रहा है, सो वही 'अपने' उसे सबक सिखाने के लिए उसकी जड़ें खोद देते हैं - फिर वह उम्मीदवार 'मुझे तो अपनों ने ही मारा. गैरों में कहाँ दम था' बुदबुदाते हुए अपने दिन काटता है । यूँ तो यह हर 'स्तर' पर होता है - जैसा कि डिस्ट्रिक्ट में सतीश सिंघल के साथ हुआ; उनके क्लब के जिन लोगों ने ब्लड बैंक बनवाने में उनका हर तरह से साथ दिया था, सतीश सिंघल के व्यवहार से अपमानित महसूस करते हुए उन्हीं लोगों ने ही सतीश सिंघल को 'तबाह' भी कर दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में अशोक अग्रवाल और उनके साथियों को खटका यह देख कर हुआ कि डिस्ट्रिक्ट में जब सभी उनके साथ हैं, तो अमित गुप्ता की उम्मीदवारी को खाद-पानी आखिर कौन दे रहा है ?
अशोक अग्रवाल ने इस बीच अलग अलग बहानों से दो एक बड़ी पार्टियाँ दीं, जिनमें लोगों की अच्छी भागीदारी भी रही; इससे अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल तो अच्छा बना, लेकिन साथ साथ ही यह महसूस भी किया गया कि इससे लोगों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर उनकी बॉन्डिंग नहीं बन रही है । कई लोग शिकायत करते हुए भी सुने गए कि अशोक अग्रवाल जब बिलकुल सामने ही पड़ जाते हैं, तब तो बड़े तपाक से मिलते हैं, लेकिन वैसे उनकी न तो कोई खोज-खबर लेते हैं और न अपनी तरफ से उनसे मिलने या बात करने की कोशिश करते हैं । इस तरह की बातों से अशोक अग्रवाल और उनके साथियों को वन-टू-वन मिलने पर ध्यान देने की जरूरत महसूस हुई । हाल-फिलहाल के दिनों में अशोक अग्रवाल ने अपने क्लब के सदस्यों पर भी ध्यान देना शुरू किया है; अभी तक वह अपने क्लब के गिने-चुने सदस्यों के साथ ही दिखाई देते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछेक दिनों में उन्होंने अपने क्लब के अधिकतर सदस्यों को विश्वास में लेना शुरू किया है और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु उन्हें सक्रिय करने का प्रयास किया है । अशोक अग्रवाल ने अपनी तरफ से लोगों से संपर्क करने की अपनी कोशिशों को भी बढ़ाया है, जिसका उन्हें अच्छा नतीजा मिलता दिख रहा है । अशोक अग्रवाल के रवैये में बदलाव आया है, तो उनके समर्थकों व शुभचिंतकों का भी उत्साह बढ़ा है - और समर्थकों व शुभचिंतकों के इस उत्साह ने अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के दावे को फिर से मजबूती देने का काम किया है ।

Saturday, July 7, 2018

रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारी गुलाम वहनवती 'भ्रष्ट आचरण के प्रति पूर्ण असहिष्णु बनें' का आह्वान तो जब तब करते रहते हैं, लेकिन जब देश और रोटरी को बदनाम करने वाले मगरमच्छों का मामला सामने आता है, तो उन्हें साँप सूँघ जाता है; उर्फ़ राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स की हरकतें

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल 'सिर मुड़ाते ओले पड़ने' वाले मुहावरे के उदाहरण बन गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी पर बैठे उन्हें अभी मुश्किल से सप्ताह भर का समय हुआ है, कि चंडीगढ़ रोटरी क्लब सर्विस ट्रस्ट द्वारा टैक्स न देने के चक्कर में ट्रस्ट की बिल्डिंग पर सील होने का खतरा मँडराने की खबरें अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई हैं, जिसके चलते आम लोगों के बीच रोटरी की खासी बदनामी हुई है । प्रवीन गोयल ने हालाँकि इस मामले पर इन पंक्तियों के लेखक से बात करते हुए दावा किया है कि एक दो दिन में सारा टैक्स जमा करवा दिया जायेगा, और बिल्डिंग को सील होने से बचा लिया जायेगा - लेकिन इस प्रकरण के अखबारों में प्रचारित हो जाने से लोगों के बीच रोटरी की जो बदनामी हो चुकी है, उसे वापस लौटा पाना तो मुश्किल ही होगा । पहली नजर में यह मामला व्यवस्थापकीय लापरवाही का लग सकता है, जिसके लिए किन्हीं छोटे पदाधिकारियों/कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहरा कर मामले से हाथ झाड़ा जा सकता है; लेकिन अभी हाल ही में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी को विभिन्न ट्रस्टों के हिसाब-किताब देने में राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स के इंकार के मामले के रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड तक पहुँचने का प्रसंग याद करें, तो टैक्स न देने का यह मामला, जिसके चलते रोटरी की साख व प्रतिष्ठा धूल में मिलती नजर आ रही है, राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स के भ्रष्ट आचरण की पोल खोलने का काम करता है । प्रवीन गोयल के लिए फजीहत की बात सिर्फ यही नहीं है कि उनके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालते ही अखबारों में रोटरी की इस तरह से बदनामी हो रही है, उनके लिए फजीहत की बात यह भी है कि उक्त ट्रस्ट उनके ही क्लब का एक प्रमुख प्रोजेक्ट है - और यह क्लब पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू तथा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधुकर मल्होत्रा का भी क्लब है ।
सर्विस सोसायटी के हिसाब-किताब पर राजा साबू और उनके साथी पूर्व गवर्नर्स कुंडली मार कर बैठे हुए हैं; निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड तक गुहार लगा ली, लेकिन इसका हिसाब-किताब उन्हें नहीं मिल सका । नियमानुसार सर्विस सोसायटी के तीन प्रमुख पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर, निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट होते हैं - लेकिन इन तीनों में से किसी के पास सर्विस सोसायटी का हिसाब-किताब नहीं है । क्लब के मौजूदा व पूर्व पदाधिकारियों का भी कहना/बताना है कि राजा साबू, मधुकर मल्होत्रा, यशपाल दास, शाजु पीटर ही हिसाब-किताब में काला-सफेद करते रहते हैं, और उन्हें कभी हिसाब-किताब देखने को नहीं मिला है । रोटरी इंटरनेशनल के एक प्रमुख पदाधिकारी गुलाम वहनवती ने अभी पिछले दिनों ही चेन्नई में आयोजित हुई रोटरी जोन 4, 5 और 6 के डिस्ट्रिक्ट्स के प्रमुख पदाधिकारियों की बैठक में बड़ी स्पष्टता के साथ इस तथ्य को रेखांकित किया कि मुट्ठी भर रोटेरियंस के भ्रष्ट आचरण की वजह से रोटरी इंटरनेशनल में भारत की छवि कलुषित हो रही है । उन्होंने इस तथ्य पर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए इसे बेहद शर्मनाक बताया । इससे पहले फरवरी में हैदराबाद में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट के ट्रेनिंग प्रोग्राम में भी गुलाम वहनवती ने इसी तरह की बातें कहीं थीं, जिसकी रिपोर्ट रोटरी समाचार व रोटरी न्यूज के अप्रैल अंक में 'भ्रष्ट आचरण के प्रति पूर्ण असहिष्णु बनें' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी । गुलाम वहनवती ने दोनों मौकों पर कहा/बताया था कि देश में करीब डेढ़ लाख रोटेरियंस हैं, और कुल करीब 50 रोटेरियंस ही ऐसे होंगे जो भ्रष्ट आचरण में लिप्त होंगे और जिनकी वजह से देश को रोटरी इंटरनेशनल में शर्मसार होना पड़ता है । गुलाम वहनवती ने बातें तो खूब कीं, लेकिन यह नहीं बताया कि भ्रष्ट आचरण में लिप्त रह कर देश और रोटरी को बदनाम करने वाले करीब 50 रोटेरियंस के खिलाफ कार्रवाई करने में रोटरी इंटरनेशनल असहाय क्यों है ?
रोटरी इंटरनेशनल ने पिछले दिनों भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहने वाले कुछेक रोटेरियंस के खिलाफ हालाँकि कार्रवाई की है, जिसके तहत डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल को बर्खास्त किया गया तथा डिस्ट्रिक्ट 3030 के एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर निखिल किबे को रोटरी से ही निकाल देने का फैसला किया गया है । इन फैसलों पर हालाँकि लोगों का कहना रहा है कि रोटरी इंटरनेशनल 'चोरों' को तो सजा दे रहा है लेकिन 'डकैती' के आरोपियों को छोड़ दे रहा है । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की इस बात के लिए आलोचना भी हुई कि वह छोटी मछलियों के खिलाफ तो कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन बड़े मगरमच्छों की लूट को अनदेखा कर रहे हैं । इसीलिए रोटरी के लुटेरों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है । गौर करने की बात यह है कि रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से जिन दिनों निखिल किबे और सतीश सिंघल के खिलाफ कार्रवाई हो रही थी; और जिन दिनों गुलाम वहनवती मुट्ठी भर लोगों के भ्रष्ट आचरण के कारण देश और रोटरी की पहचान खराब होने के तथ्य बता रहे थे; ठीक उन्हीं दिनों राजा साबू की चेयरमैनी वाले उत्तराखंड रिलीफ फंड में करीब पौने तीन करोड़ के घपले के आरोप लगे और उन्हीं दिनों 'रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3080 सर्विस' सोसायटी के अकाउंट से चोरीछिपे 21 लाख रुपए से ज्यादा उक्त रिलीफ फंड में ट्रांसफर होने की खबर मिली । जाहिर है कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स को विश्वास था कि रोटरी इंटरनेशनल भ्रष्ट आचरण में लिप्त रोटेरियंस के खिलाफ भले ही कार्रवाई कर रहा हो, गुलाम वहनवती भले ही देश और रोटरी की छवि खराब होने का रोना रो रहे हों - लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई करने का 'दम' उनमें नहीं है । एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड में अपने डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न प्रोजेक्ट्स से जुड़े हिसाब-किताब लेने के लिए पिटीशन दायर करने के लिए मजबूर हो रहा हो, और गुलाम वहनवती  'भ्रष्ट आचरण के प्रति पूर्ण असहिष्णु बनें' का आह्वान कर रहे हों - तो गुलाम वहनवती का आह्वान एक ड्रामे का सीन ही लगता है ।
राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स के भ्रष्ट आचरण की पोल खोलती निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी की रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड में दायर पिटीशन है, डिस्ट्रिक्ट के जीएमएल के मई अंक में भ्रष्ट हरकतों का ब्यौरा है, और चंडीगढ़ के अखबारों में प्रकाशित यह खबर है - लोगों का पूछना है कि गुलाम वहनवती को इससे ज्यादा और क्या सुबूत यह जानने के लिए चाहिए कि वह कौन से मुट्ठी भर लोग हैं जो अपनी भ्रष्ट हरकतों से देश और रोटरी को कलुषित कर रहे हैं ? लोगों का कहना है कि वह जानते हैं कि देश और रोटरी को बदनामी दिलवाने वाले बड़े मगरमच्छों के खिलाफ कार्रवाई करने/करवाने का 'दम' गुलाम वहनवती में नहीं है, इसलिए उनसे अनुरोध यही है कि लोगों के बीच माइक पर बोलने का जब मौका मिलता है, तो लंबी लंबी छोड़ने की जरूरत नहीं है और उससे बचो - इससे देश और रोटरी की इज्जत भले न बचा पाओ, लेकिन अपनी इज्जत जरूर बचा लोगे ।