Saturday, December 1, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की तीन सीटों में से एक हंसराज चुग के पक्ष में तथा बाकी दो सीटों पर संजीव सिंघल, राजेश शर्मा, प्रमोद जैन व सुधीर अग्रवाल के बीच मुकाबला होता दिख रहा है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवारों की स्थिति में पिछले पंद्रह/बीस दिनों से जो 'स्थिरता' बनी हुई है, उसने चुनावी परिदृश्य को लगभग निश्चित बना दिया है और बाकी बचे पाँच-छह दिनों में किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती है । दिल्ली और पंजाब व हरियाणा के छोटे/बड़े शहरों में लोगों के रुझान तथा उनके बीच होने वाली चर्चाओं का संज्ञान यदि लें, तो साफ नजर आता है कि अतुल गुप्ता, संजय वासुदेवा व विजय गुप्ता तो निश्चित रूप से सेंट्रल काउंसिल में आसानी से वापसी कर रहे हैं; तथा बाकी तीन सीटों के लिए हंसराज चुग, संजीव सिंघल, प्रमोद जैन, राजेश शर्मा, सुधीर अग्रवाल व चरनजोत सिंह नंदा के बीच नजदीकी मुकाबला है । सेंट्रल काउंसिल में वापसी के लिए राजेश शर्मा भी प्रयासरत हैं, लेकिन उनकी पुनर्वापसी को लेकर लोगों के बीच भारी मतभेद है । मजे की बात यह है कि जो लोग सेंट्रल काउंसिल में उनकी वापसी होते हुए देख भी रहे हैं, वह भी उनकी किसी खूबी या उनके किसी समर्थन-आधार के भरोसे नहीं बल्कि उनके तिकड़मी जुगाड़ में उनके सफल होने का अनुमान लगा रहे हैं । बहुत से लोगों का मानना/कहना है कि अपनी हरकतों से राजेश शर्मा ने बार बार यह साबित किया है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में वह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए एक कलंक ही साबित हुए हैं, लेकिन सत्ता से लाभ दिलवाने का लालच देकर वह लोगों के वोट जुटा लेंगे और अपनी सीट बचा लेंगे । चुनावी राजनीति में बदनाम लोग लोगों की भावनाओं तथा उनके निजी स्वार्थों को पूरा करने का लालच देकर चुनाव जीतते रहे हैं । किसी ने उदाहरण भी दिया कि फूलन देवी भी सांसद का चुनाव जीती ही थी न, इसलिए राजेश शर्मा भी जीत जायेंगे - आप यह उम्मीद क्यों करते हैं कि सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स वोटर के रूप में समझदारी का परिचय देंगे ही और जिस राजेश शर्मा के लिए इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में 'राजेश शर्मा चोर है' जैसे नारे तक लगे/गूँजे, उसे वोट नहीं देंगे ?
संजीव सिंघल की उम्मीदवारी की सफलता को लेकर भी लोगों के बीच भारी मतभेद है । उनकी उम्मीदवारी के साथ मजे की बात यह हुई है कि जिस बिग फोर 'ब्रांड' को उनकी ताकत बनना चाहिए था, वही उनकी कमजोरी बन गया; इस कमजोरी से निपटने के लिए उन्होंने अमरजीत चोपड़ा व गिरीश आहुजा जैसे बड़े लोगों का सहारा लिया, तो उसके कारण उनकी उम्मीदवारी और भी फजीहत का शिकार हो गई । बिग फोर का उम्मीदवार होने के बावजूद संजीव सिंघल को आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट जुटाने के लिए जिस तरह से जुटना पड़ा है, उसमें उनकी उम्मीदवारी की कमजोरी के लक्षण ही देखने को मिले हैं । हालाँकि पिछले दिनों संजीव सिंघल ने बिग फोर के वोटों को पक्का करने की व्यवस्था की है । गिरीश आहुजा अपनी भारी फजीहत के बावजूद संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में जिस तरह से लगे रहे हैं, उससे भी संजीव सिंघल और उनके समर्थकों को सफलता मिलने का भरोसा है । हालाँकि बहुत से लोग उनकी सफलता को संदेह के घेरे में रखे हुए हैं । प्रमोद जैन को इस बार काफी मेहनत करते हुए देखा/पाया गया है, जिस कारण कुछेक लोग उन्हें 'दौड़' में देख रहे हैं; लेकिन उनकी उम्मीदवारी का कोई 'शोर' नहीं बन सका है - जिसे चुनावी राजनीति में सफलता पाने की एक बड़ी 'जरूरत' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता के रवैये पर अटकी/टिकी है । एनडी गुप्ता उनके कुछेक आयोजनों में उपस्थित तो हुए हैं, लेकिन एनडी गुप्ता की 'चुनावी मशीनरी' अभी सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए जुटती नजर नहीं आई है । समझा जाता है कि चुनाव के अंतिम दौर में उक्त 'मशीनरी' यदि सचमुच सक्रिय हुई, तो सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को ऊँची छलाँग मिल सकती है ।
सेंट्रल काउंसिल के दरवाजे पर दस्तक दे रहे नए उम्मीदवारों में यदि किसी की उम्मीदवारी को बेहतर स्थिति में देखा/पहचाना जा रहा है, तो वह है हंसराज चुग की उम्मीदवारी । रीजन के चुनावी परिदृश्य में दिलचस्पी रखने वाले अनुभवी लोगों का कहना है कि हंसराज चुग की उम्मीदवारी के साथ सबसे अच्छी बात यह रही कि उससे किसी और की उम्मीदवारी टकराती हुई नहीं दिखी; किसी और की उम्मीदवारी उनकी उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम करती हुई नहीं नजर आई है । और खुद हंसराज चुग ने अपनी उम्मीदवारी के अभियान को इस तरह से डिजाइन किया कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर न तो कोई नकारात्मक बात पैदा हुई और न उनकी उम्मीदवारी का अभियान किसी भी मौके पर ढीला पड़ता नजर आया । पिछली बार मामूली अंतर से सफलता पाने से वंचित रहे हंसराज चुग की उम्मीदवारी के प्रति इस बार लोगों में सहानुभूति वाला रवैया भी है; लोगों को लगता है कि पिछली बार थोड़े से वोटों की कमी के कारण उनके साथ जो 'अन्याय' हुआ, वह इस बार नहीं होना चाहिए । हंसराज चुग ने अपनी सक्रियता के जरिये विभिन्न विषयों को गहराई से समझने वाले एक अच्छे वक्ता होने के साथ-साथ प्रोफेशन व प्रोफेशन से जुड़े लोगों की समस्याओं को व्यापकता के साथ पहचानने वाले एक लीडर की जो मिलीजुली पहचान बनाई तथा 'दिखाई' है, उसके कारण लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता का दायरा खासा बढ़ा है । दिल्ली ही नहीं, पंजाब व हरियाणा के छोटे/बड़े शहरों में लोगों का दो-टूक ढंग से कहना/बताना है कि अतुल गुप्ता, संजय वासुदेवा, विजय गुप्ता के साथ हंसराज चुग को भी अगली सेंट्रल काउंसिल में पक्का समझिये । चरनजोत सिंह नंदा को भी चुनावी दौड़ में तो माना/बताया जाता है, लेकिन उनके नजदीकियों और समर्थकों की आवाजें इतनी धीमी हो गईं हैं कि लगता है कि जैसे उनके नजदीकियों व समर्थकों ने ही उनकी जीतने की उम्मीद को खो दिया है । करीब एक महीने पहले तक उनके चुनाव अभियान में जो गर्मी देखी/सुनी जा रही थी, वह धीरे धीरे करके ठंडी पड़ती गई है और अब प्रायः हर किसी ने मान लिया है कि वह वास्तव में चुनावी दौड़ से बाहर हो गए हैं । उम्मीदवारों के सामने अब जो चुनौती है, वह यह है कि वह अपने अपने समर्थकों को पोलिंग बूथ तक लाने और उनके वोट डलवाने की 'व्यवस्था' को पुख्ता करें । चुनावी नतीजा उक्त 'व्यवस्था' से भी प्रभावित तो होगा ही 

Thursday, November 29, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हो रहे चुनाव अभियान में आचारसंहिता के उल्लंघन की शिकायतों की सुनवाई के लिए सरकारी प्रतिनिधियों की सदस्यता वाले पैनल के गठन में अतुल गुप्ता के खिलाफ हुई शिकायत की भूमिका की चर्चा ने चुनावी माहौल में गर्मी पैदा की

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के लिए होने वाले चुनाव में उम्मीदवारों द्वारा चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की बढ़ती घटनाओं और शिकायतों की गूँज लगता है कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के पदाधिकारियों के कानों तक जा पहुँची है, और उनके दबाव में चुनाव के अंतिम दौर में इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को शिकायतों की सुनवाई के लिए दो सरकारी प्रतिनिधियों वाले एक तीन सदस्यीय पैनल का गठन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ । कई लोगों का कहना है कि इंस्टीट्यूट के इतिहास में इससे पहले कभी वी सागर जैसा सेक्रेटरी भी नहीं रहा है, जो तमाम शिकायतों को लगातार अनसुना करता रहे और कानों में तेल डाल कर बैठा रहे । कुछेक लोगों ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया है कि इंस्टीट्यूट के चुनावी इतिहास में अब से पहले यह नजारा भी कभी देखने को नहीं मिला कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के पिताजी ही चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की कोशिशों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हों और उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हों । यह भी पहली बार देखने में आ रहा है कि इंस्टीट्यूट के कुछेक पूर्व प्रेसीडेंट पूरी निर्लज्जता के साथ 'इस' या 'उस' उम्मीदवार के समर्थन में वोट जुटाने के अभियान में खुल्लमखुल्ला लगे हुए हैं । इस लिहाज से इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के लिए हो रहा इस बार का चुनाव कई मायनों में अनोखा है और 'अंधेर नगरी व चौपट राजा' का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है । 
उल्लेखनीय है कि यूँ तो इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के प्रत्येक चुनाव में चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन होता रहा है और आरोप लगते रहे हैं; लेकिन हर बार देखने में आया है कि आचारसंहिता का उल्लंघन करने के आरोपी बनने वाले उम्मीदवार शर्म और लिहाज का झीना सा ही सही एक पर्दा रखते रहे हैं, और छापामार कार्रवाई की तरह हरकत करके बच निकलते रहे हैं, लेकिन इस बार तो खुल्लाखेल फरुख्खावादी जैसा मामला हो गया है । आचारसंहिता की ऐसीतैसी करने वाले उम्मीदवारों को जैसे किसी की परवाह ही नहीं है । प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता और सेक्रेटरी वी सागर के नाकारापन की हद का आलम यह है कि काउंसिल के मौजूदा सदस्य तक नियमों/कानूनों का मजाक बना दे रहे हैं । मुंबई में काउंसिल के ही एक सदस्य धीरज खंडेलवाल द्वारा किए गए आयोजनों पर काउंसिल के ही सदस्यों ने सवाल उठाये, लेकिन नवीन गुप्ता और वी सागर ने उनके ही सवालों का जबाव देना तक जरूरी नहीं समझा । चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की अधिकतर शिकायतों को इलेक्शन ऑफिसर की भूमिका निभा रहे सेक्रेटरी वी सागर ने यह तर्क देते हुए खारिज कर दिया कि उनके साथ पर्याप्त सुबूत नहीं दिए गए । धीरज खंडेलवाल के मामले में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों द्वारा पूछे गए सामान्य से सवाल पर उन्होंने चुप्पी साध ली । इससे ही जाहिर है कि चुनावी आचारसंहिता के आरोपों को उन्होंने पूरी तरह अनदेखा/अनसुना करने का मन बना लिया है । समझा जाता है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी के नाकारापन की शिकायतें मिलने के बाद ही मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के पदाधिकारियों ने मामले में हस्तक्षेप करने का फैसला लिया होगा और उसी के फलस्वरूप आचारसंहिता के आरोपों की सुनवाई के लिए दो सरकारी प्रतिनिधियों वाले तीन सदस्यीय पैनल का गठन करने की घोषणा की गई है ।
मजे की बात यह है कि इस पैनल के गठन के लिए नॉर्दर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्य अतुल गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । दरअसल दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में 24 नवंबर को 'प्रोफेशनल मीट' के नाम पर आयोजित हुई अतुल गुप्ता की चुनावी सभा की शिकायत 26 नवंबर को हुई, जिसकी एक प्रति मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स को भी भेजी गई । उक्त शिकायत में ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ खासे पर्याप्त सुबूत भी दिए गए हैं । 26 नवंबर को हुई इस शिकायत के अगले ही दिन, 27 नवंबर को सरकारी प्रतिनिधियों की सदस्यता के साथ पैनल के गठन की सूचना जारी हो गई । इससे लोगों को लगा है कि अतुल गुप्ता के खिलाफ हुई शिकायत तथा उसमें दिए गए तथ्यों व सुबूतों को मिनिस्ट्री के पदाधिकारियों ने गंभीर माना/पाया है, और तुरंत ही यह फैसला कर लिया कि चुनावी आचारसंहिता के आरोपों की सुनवाई इंस्टीट्यूट के पदाधिकरियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती । उल्लेखनीय है कि अतुल गुप्ता के प्रचार अभियान का माध्यम बनने के चक्कर में नॉर्थ-एक्स सीपीई स्टडी सर्किल पीछे कई दिनों तक सस्पेंड रह चुका है; इसके बावजूद अतुल गुप्ता अपनी हरकतों से बाज नहीं आए हैं । सरकारी प्रतिनिधियों की सदस्यता के साथ पैनल के गठन की सूचना में अतुल गुप्ता की 'जिम्मेदारी' की चर्चाओं ने अतुल गुप्ता की मुसीबतों को और बढ़ा दिया है । यह देखना दिलचस्प होगा कि इस पैनल के गठन के बाद उम्मीदवारों द्वारा चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की घटनाओं और शिकायतों में सचमुच कोई कमी आती है या मामला पहले जैसा ही बना रहता है ।

Wednesday, November 28, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में विजय गुप्ता से आगे रहने की अतुल गुप्ता की अभी से की जा रही कोशिशों ने हंसराज चुग के लिए चुनावी हालात को खासा दिलचस्प व अनुकूल बनाया

नई दिल्ली । अतुल गुप्ता की इंस्टीट्यूट का वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए वोट माँगने की कार्रवाई का लोग भले ही मजाक बना रहे हों, लेकिन अपनी इस कोशिश में वह खुद बहुत गंभीर नजर आ रहे हैं । हर किसी को हैरानी है कि सेंट्रल काउंसिल के सदस्य चुने जाने के प्रचार अभियान में अतुल गुप्ता वाइस प्रेसीडेंट के नाम पर वोट क्यों माँग रहे हैं, और ऐसा करके वह वोटरों को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं, या खुद अपने आप को धोखा दे रहे हैं ? उनके शुभचिंतकों को भी डर हो चुका है कि कहीं अतुल गुप्ता सचमुच में तो यह नहीं मान बैठे हैं कि रीजन में यदि उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले तो वह वाइस प्रेसीडेंट बन जायेंगे ? उल्लेखनीय है कि अतुल गुप्ता को उनके समर्थक ही नहीं, उनके विरोधी भी एक होशियार व्यक्ति के रूप में देखते/पहचानते हैं; दरअसल इसीलिए हर कोई हैरान है कि होशियार होने के बावजूद अतुल गुप्ता बेबकूफी की बात कैसे और क्यों कर रहे हैं ? हालाँकि यह सच है कि पिछले चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में नवीन गुप्ता को सबसे ज्यादा वोट मिले थे, और वह (वाइस) प्रेसीडेंट बने; लेकिन इसके साथ यह भी ध्यान रखने की बात है कि वेस्टर्न रीजन में एसबी जावरे को सबसे ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन (वाइस) प्रेसीडेंट बने नीलेश विकमसे; और मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तो पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में 12हवें नंबर पर रहे थे । जाहिर है कि वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में एक अलग केमिस्ट्री काम करती है और उसका अपना एक अलग गणित होता है, जिसमें काउंसिल सदस्य बनने के लिए मिले वोटों की कोई भूमिका नहीं होती है । अतुल गुप्ता इतनी सामान्य सी बात तो समझते ही होंगे, लेकिन फिर भी वह सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में वाइस प्रेसीडेंट बनने के नाम पर वोट माँग रहे हैं ।
समझा जाता है कि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अतुल गुप्ता का मुकाबला विजय गुप्ता से होगा, जिन्हें वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव की केमिस्ट्री जोड़ने में अतुल गुप्ता के मुकाबले ज्यादा होशियार माना/समझा जाता रहा है । अतुल गुप्ता और विजय गुप्ता हालाँकि वाइस प्रेसीडेंट के चुनावों में अभी तक सफलता से तो दूर ही रहे हैं, लेकिन सफल होने वाले 'गणित' में अतुल गुप्ता के मुकाबले विजय गुप्ता ज्यादा नजदीक रहे हैं, इसलिए अतुल गुप्ता को डर है कि वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में विजय गुप्ता कहीं बाजी न मार ले जाएँ । काउंसिल सदस्य के रूप में ज्यादा वोट जुटाने के उनके प्रयास में काउंसिल में आने वाले नए सदस्यों को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करने की उनकी योजना को देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लगता है कि हो सकता है कि अतुल गुप्ता सोच रहे हों कि वह सबसे ज्यादा वोट पायेंगे तो काउंसिल के कुछेक सदस्य तो अवश्य ही उनसे प्रभावित हो जायेंगे और वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उनका समर्थन कर देंगे । वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में लेकिन एसबी जावरे की असफलता और प्रफुल्ल छाजेड़ की सफलता का उदाहरण लेकिन बताता है कि अतुल गुप्ता का सोचना सिर्फ उनकी खामख्याली ही है । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में चुनाव लड़ते हुए अतुल गुप्ता ने जिस तरह से वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव को अपने फोकस में रखा हुआ है, उसने हंसराज चुग के लिए चुनावी हालात को खासा दिलचस्प तथा अनुकूल बना है ।        
अतुल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, अतुल गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन से जो नए लोग प्रवेश करते हुए लग रहे हैं, उनमें वह हंसराज चुग को 'देख' रहे हैं, और इसलिए हंसराज चुग का वोट पक्का करने के लिए वह 'माहौल' बना रहे हैं । अतुल गुप्ता के नजदीकियों ने ही कहा/बताया है कि अतुल गुप्ता ने कई एक मौकों पर हंसराज चुग के कुछेक नजदीकियों/समर्थकों के सामने जानबूझ कर बोला/कहा है कि उन्होंने अपने पक्के वोटरों को दूसरी वरीयता का वोट देने के लिए कहा है । कुछेक मौकों पर अतुल गुप्ता ने यह भी कहा/बोला है कि वह जानते हैं कि दिल्ली के त्रिनगर क्षेत्र में हंसराज चुग की उम्मीदवारी के लिए अच्छा समर्थन है, और इसीलिए वह वहाँ दूसरी वरीयता के वोटों के लिए भी नहीं गए हैं ताकि कहीं कोई गलतफहमी न पैदा हो और हंसराज चुग का समर्थन-आधार डिस्टर्ब न हो । इस तरह की बातों से अतुल गुप्ता को उम्मीद है कि चुनावी नतीजा घोषित होने पर हंसराज चुग जब अधिकृत रूप से विजेता घोषित होंगे, तो उनकी जीत में वह अपने सहयोग का वास्ता देकर वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में हंसराज चुग के समर्थन के लिए प्रयास कर सकेंगे । अतुल गुप्ता ने वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इससे पहले जब भी चुनाव लड़े हैं, चुनाव को लेकर उन्होंने इतनी गंभीरता कभी नहीं दिखाई है - जितनी कि वह इस बार दिखा रहे हैं । इससे लग रहा है कि आठ दिसंबर को काउंसिल्स के लिए चुनाव हो जाने के बाद भी अतुल गुप्ता चुनावी-मूड से बाहर नहीं निकल पायेंगे और अब की बार का वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव नॉर्दर्न रीजन में ही घमासान मचायेगा ।

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक अग्रवाल के खिलाफ आचारसंहिता के उल्लंघन का आरोप लगाने में जल्दबाजी करके अमित गुप्ता के क्लब के पदाधिकारियों ने अशोक अग्रवाल के समर्थकों को हमलावर होने तथा चुनावी दौड़ में अपनी बढ़त जताने/बताने का मौका दे दिया है क्या ?

गाजियाबाद । अमित गुप्ता की तरफ से अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी को बाँधने तथा दौड़ से बाहर करने की तैयारी तो पक्की की गई थी, लेकिन अशोक अग्रवाल की तरफ से बचाव में की गई घेराबंदी ने उनकी तैयारी को उलझा दिया है । अशोक अग्रवाल की तरफ से दिखाए गए तेवर ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन को भी असमंजस में फँसा दिया है, जिस कारण उन्होंने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है । उल्लेखनीय है कि 4 नवंबर को रोटरी क्लब शिप्रा सनसिटी के एक आयोजन में अशोक अग्रवाल के शामिल होने और मंच पर बैठने को चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन करना मानते हुए अमित गुप्ता के क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को शिकायत की और जरूरी कार्रवाई करने की माँग की । शिकायत की बात सार्वजनिक होते ही अशोक अग्रवाल और उनके समर्थक सक्रिय हुए, जिनका कहना रहा कि 4 नवंबर को न तो अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी आधिकारिक रूप से प्रस्तुत हुई थी, और न ही उनके क्लब ने उनकी उम्मीदवारी को अधिकृत रूप से मंजूरी ही दी थी - इसलिए अशोक अग्रवाल उस समय चुनावी आचारसंहिता के घेरे में थे नहीं; दूसरी बात यह कि रोटरी क्लब शिप्रा सनसिटी के उस आयोजन में अशोक अग्रवाल को किसी भी रूप में प्रमोट नहीं किया गया था; मंच पर उन्हें यदि बैठाया गया था तो सिर्फ इसलिए क्योंकि यह एक नया क्लब है, जो अपने आयोजन में उपस्थित डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ रोटेरियंस को सम्मानित करना चाहता था । मंच से न तो खुद अशोक अग्रवाल ने और न अन्य किसी ने अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने का काम किया । इन तर्कों के साथ, अशोक अग्रवाल के समर्थकों ने दावा किया कि अशोक अग्रवाल की तरफ से चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन करने का कोई मामला नहीं बनता है; और यदि जबर्दस्ती मामला बनाने का प्रयास किया गया तो आधिकारिक रूप से उसका जबाव दिया जायेगा और मुकाबला किया जायेगा । अशोक अग्रवाल के समर्थकों ने यह दावा करके अमित गुप्ता और उनके समर्थकों को दबाव में और ला दिया है कि वह जब अपने आपको अशोक अग्रवाल के साथ चुनावी मुकाबले में पिछड़ता हुआ पा रहे हैं, तो झूठे मुद्दे उठा कर अशोक अग्रवाल को चुनावी दौड़ से बाहर करने की योजना बनाने लगे हैं ।  
मजे की बात यह रही कि जिस आयोजन में अशोक अग्रवाल द्वारा चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन करने की शिकायत की गई है, उसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन खुद मौजूद थे । इस तथ्य को इस्तेमाल करते हुए अशोक अग्रवाल के समर्थक दावा कर रहे हैं कि उक्त आयोजन में चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन यदि हो रहा होता, तो सुभाष जैन खुद उसका संज्ञान लेते और आवश्यक कार्रवाई करते; लेकिन सुभाष जैन का कोई कार्रवाई न करना साबित करता है कि उक्त आयोजन में कुछ भी गलत नहीं हो रहा था । अमित गुप्ता की तरफ से हुई शिकायत में बताया गया है कि 31 अक्टूबर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नामांकन माँगे जाने की ईमेल आने के बाद अशोक अग्रवाल ने 2 नवंबर को सभी प्रेसीडेंट्स को ईमेल लिख कर सूचित किया कि चूँकि उनका क्लब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित करना चाहता है, इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट के सभी पदों से इस्तीफा दे रहे हैं । इसके बाद भी, वह 4 नवंबर को एक क्लब के अधिकृत आयोजन में शामिल हुए और इसतरह उन्होंने चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन किया । अशोक अग्रवाल के समर्थकों का कहना है कि अमित गुप्ता के क्लब के पदाधिकारियों ने उतावलेपन के जोश में जल्दबाजी दिखाई और तथ्यों को जाँचे बिना शिकायत ठोक दी । 2 नवंबर को ईमेल के जरिये अशोक अग्रवाल ने सभी प्रेसीडेंट्स को डिस्ट्रिक्ट के सभी पदों से इस्तीफा देने की बात इसलिए बताई थी, ताकि कोई प्रेसीडेंट अपने क्लब के किसी आयोजन में उन्हें पदाधिकारी के रूप में आमंत्रित न करे । शिकायत करने वाले पदाधिकारी यह तो पता कर लेते कि 4 नवंबर को अशोक अग्रवाल क्या सचमुच अपने पदों से इस्तीफा दे चुके थे और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन उनका इस्तीफा कर चुके थे क्या ? अशोक अग्रवाल के समर्थकों का कहना है कि इसके अलावा सौ बात की एक बात, शिकायत करने वालों ने डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन गाइडलाइंस का जो हवाला दिया है, वह सभी गाइडलाइंस 'उम्मीदवार' पर लागू होती हैं - और 4 नवंबर को अशोक अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए आधिकारिक रूप से 'उम्मीदवार' नहीं थे ।
अमित गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक भी समझ/मान रहे हैं कि अमित गुप्ता के क्लब के पदाधिकारियों ने शिकायत करने में जल्दबाजी करके अशोक अग्रवाल और उनके समर्थकों को एक तरफ तो सावधान कर दिया, और दूसरी तरफ अशोक अग्रवाल के समर्थकों को हमलावर होने का मौका दे दिया । अशोक अग्रवाल के समर्थक जोर-शोर से इस बात को प्रचारित करने में लगे हैं कि अमित गुप्ता के समर्थकों ने लगता है कि अशोक अग्रवाल की जीत को भाँप लिया है, और इसलिए ही वह अशोक अग्रवाल से चुनावी मुकाबले में भिड़ने की बजाए झूठे आरोप लगा कर अशोक अग्रवाल को चुनावी दौड़ से बाहर करने की कोशिशों में जुट गए हैं । इस मामले में दिलचस्प नजारा यह रहा कि अशोक अग्रवाल के खिलाफ हुई शिकायत को शुरु में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल का समर्थन मिलता दिखा था, लेकिन जैसे जैसे यह स्पष्ट होता गया कि उक्त शिकायत में दम नहीं है - रमेश अग्रवाल ने भी अपने पैर पीछे लौटा लिए हैं । दरअसल, अशोक अग्रवाल के खिलाफ 18 नवंबर को शिकायत दर्ज होते ही जिस तरह से रमेश अग्रवाल सक्रिय हुए, उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यह संदेश गया कि इस शिकायत के पीछे रमेश अग्रवाल हैं । इससे मामला अमित गुप्ता के पक्ष में बनने की बजाये बिगड़ और गया । दरअसल रमेश अग्रवाल अपनी हरकतों के चलते इस समय पूरी तरह अलग-थलग बने/पड़े हुए हैं । रमेश अग्रवाल की न मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन से बन रही हैं, और न आने वाले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने वाले दीपक गुप्ता व आलोक गुप्ता से बन रही है । पिछले दिनों हालाँकि रमेश अग्रवाल ने दीपक गुप्ता व आलोक गुप्ता के साथ अपने संबंध सुधारने की कोशिश तो की, लेकिन वह चूँकि इन दोनों के बारे में इतनी बकवासबाजी कर चुके हैं कि यह दोनों अभी तो रमेश अग्रवाल को माफ करने के मूड में नहीं दिखते हैं । वास्तव में इसीलिए जैसे ही डिस्ट्रिक्ट में लोगों का आभास हुआ कि अशोक अग्रवाल के खिलाफ शिकायत करवा कर रमेश अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट में अपनी वापसी की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही लोग रमेश अग्रवाल की कोशिश के खिलाफ सक्रिय हो गए । इस चक्कर में अशोक अग्रवाल को उन लोगों का भी समर्थन मिल गया है, जिन्हें उनके खिलाफ देखा/पहचाना जा रहा था । अशोक अग्रवाल के समर्थकों की सक्रियता के चलते अशोक अग्रवाल के खिलाफ हुई शिकायत का मामला अभी तो दबता हुआ दिख रहा है, लेकिन देखने की बात यह होगी कि उनके खिलाफ शिकायत करने वाले मामले को यहीं छोड़ देते हैं या आगे बढ़ाते हैं ।

Monday, November 26, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय मित्तल और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील जैन ने जिस तरह से विनय मित्तल को फँसाने की मुकेश गोयल की चाल को फेल किया है, उसमें डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को एक बड़ी करवट लेते देखा/पहचाना जा रहा है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय मित्तल को 'काबू' में करने के लिए मुकेश गोयल ने उन्हें पंकज बिजल्वान के जरिये पुलिस में फँसाने की जो कोशिश की है, उसने हर किसी को हैरान किया है । हर किसी का यही मानना/कहना है कि मुकेश गोयल से उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि डिस्ट्रिक्ट की व्यवस्था व राजनीति में अपनी प्रमुखता बनाए रखने के लिए वह इस हद तक जायेंगे । डिस्ट्रिक्ट की व्यवस्था व राजनीति तथा उसमें मुकेश गोयल की ऊपर/नीचे होती रही स्थिति से परिचित रहे लोगों का कहना/बताना है कि एक लायन नेता के रूप में मुकेश गोयल के सामने बहुत बड़ी बड़ी चुनौतियाँ आईं हैं, लेकिन मुकेश गोयल ने अपने राजनीतिक कौशल से ही उन चुनौतियों का सामना किया है । यह पहली बार देखने में आया है कि विनय मित्तल से मिल रही चुनौती से निपटने में उन्हें जैसे अपने राजनीतिक कौशल पर भरोसा नहीं रह गया है, और उन्हें विनय मित्तल को पुलिस केस में फँसा/फँसवा कर विनय मित्तल को 'काबू' में करने का हथकंडा अपनाना पड़ा । मजे की बात यह रही कि मुकेश गोयल ने विनय मित्तल को फँसवाने के लिए जिन पंकज बिजल्वान का इस्तेमाल किया, विनय मित्तल की प्रतिउत्तर में की जाने वाली पुलिस कार्रवाई की धमकी में वह पंकज बिजल्वान भी फँसते हुए नजर आए; और तब पंकज बिजल्वान ने हापुड़ की बजाये देहरादून में ही समझौता कर लेने में अपनी खैर समझी और मुकेश गोयल की योजना फेल हो गई । मुकेश गोयल के लिए झटके की बात यह भी रही कि मामले को ज्यादा बिगड़ने से बचाने तथा मुकेश गोयल की योजना को फेल करने का श्रेय पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील जैन को मिल गया - जिन्होंने अपनी सूझबूझ व अपने प्रभाव से दोनों पक्षों को सम्मानजनक समझौते के लिए राजी कर लिया ।
मामला पंकज बिजल्वान का हस्तारक्षित एक कोरा कागज विनय मित्तल के पास होने से जुड़ा था । दरअसल डिस्ट्रिक्ट में बहुत दिनों से लोगों के बीच यह चर्चा चल ही रही थी कि विनय मित्तल, पंकज बिजल्वान को जोन चेयरमैन के पद से हटायेंगे । लोगों के बीच जारी चर्चा में कुछेक लोग पंकज बिजल्वान को जोन चेयरमैन पद से हटाने के कारण के रूप में पंकज बिजल्वान को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी से रोकने की रणनीति के रूप में देख रहे थे; तो कुछेक लोग पंकज बिजल्वान की लोगों के साथ फोन पर होने वाली बातचीत को टेप करने तथा फिर उस रिकॉर्डेड बातचीत के आधार पर लोगों को बदनाम करने तथा उनसे राजनीतिक सौदेबाजी करने की शिकायतों पर की जाने वाली कार्रवाई के रूप में देख रहे थे । कई लोगों ने विनय मित्तल से शिकायत की हुई थी कि पंकज बिजल्वान उनसे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर तथा डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों के बारे में बातेँ करते हैं, और उस बातचीत को उनकी जानकारी के बिना रिकॉर्ड कर लेते हैं - और फिर वह बातचीत मुकेश गोयल तथा शिव कुमार चौधरी को सुनाते/सुनवाते हैं । यह शिकायत करने वाले लोग विनय मित्तल से माँग कर रहे थे कि इस तरह की हरकतें करने तथा डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच वैमनस्य व झगड़ा पैदा करने वाले पंकज बिजल्वान को वह जोन चेयरमैन के पद से हटाएँ । इस तरह की चर्चाओं के बीच पंकज बिजल्वान दीवाली मिलने के बहाने गाजियाबाद में विनय मित्तल से उनके ऑफिस में मिले, जहाँ फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीवा अग्रवाल संयोगवश पहले से मौजूद थे । विनय मित्तल ने उन्हें स्पष्ट कर दिया कि फोन पर बातचीत को रिकॉर्ड करने तथा फिर उसका दुरुपयोग करने को लेकर उन पर जो आरोप हैं, उनके कारण वह अपनी टीम में उन्हें बनाए नहीं रख पायेंगे । तब पंकज बिजल्वान ने उनसे अनुरोध किया कि वह उन्हें जोन चेयरमैन पद से हटाएँ न, क्योंकि तब लोगों के बीच उनकी फजीहत होगी और वह खुद ही अपने पद से इस्तीफा दे देंगे । विनय मित्तल से एक कोरा कागज लेकर और उस पर अपने हस्ताक्षर करके पंकज बिजल्वान ने वह कागज विनय मित्तल को यह कहते हुए दे दिया कि कोई सम्मानपूर्ण सा तर्क देकर वह इस्तीफे की इबारत इस पर लिख लें । कुछ अपनी प्रोफेशनल व्यस्तता और कुछ अपने सीधे स्वभाव के कारण विनय मित्तल ने इस्तीफे की इबारत लिखने पर उस समय जोर नहीं दिया और सीधे/सरल स्वभाव में पंकज बिजल्वान द्वारा हस्ताक्षरित कागज अपने पास रख लिया ।
पंकज बिजल्वान ने लेकिन दो-तीन दिन बाद ही रंग बदल लिया । उन्होंने विनय मित्तल पर आरोप लगाया कि विनय मित्तल ने उन्हें दबाव में लेकर एक कोरे कागज पर उनसे हस्ताक्षर करवा लिए हैं और उस कागज का पता नहीं वह क्या दुरुपयोग करेंगे । समझा जाता है और लोगों के बीच चर्चा है कि पंकज बिजल्वान के इस रंग बदलने में मुकेश गोयल का हाथ है । लोगों को लगता है कि पंकज बिजल्वान ने कोरे कागज पर हस्ताक्षर करके देने की बात मुकेश गोयल को बताई होगी, और उस बात में मुकेश गोयल को विनय मित्तल को दबोच लेने का मौका नजर आया । लोगों के बीच चर्चा है कि मुकेश गोयल की सलाहानुसार ही पंकज बिजल्वान पुलिस में गए । मुकेश गोयल को लगता था कि मामला पुलिस में जायेगा, तो विनय मित्तल दौड़े हुए उनकी शरण में आ जायेंगे । पुलिस ने मामले को सुना/जाना तो यह समझ लिया कि मामला किसी आपराधिक श्रेणी में नहीं आता है, इसलिए रिपोर्ट दर्ज किए बिना उसने दोनों पक्षों को सलाह दी कि आप लोग आपस में बातचीत करके मामले को हल कर लो । पुलिस भी जानती/समझती है कि सामाजिक/राजनीतिक संस्थाओं में होने वाली उठापटक में इस्तीफे लेने/देने और फिर उन्हें वापस लेने के 'नाटक' होते रहते हैं और यह किसी आपराधिक श्रेणी में नहीं आते हैं । आपस में बातचीत करके मामले को हल करने की बात आई, तो विनय मित्तल ने साफ कहा कि पंकज बिजल्वान जो कागज उन्हें दे गए थे, वह वैसा का वैसा ही उनके पास रखा है लेकिन उक्त कागज वापस मिलने की पावती पंकज बिजल्वान को लिख कर उन्हें देनी होगी । कागज वापस करने की प्रक्रिया को लेकर काफी नाटकबाजी तो हुई, लेकिन अंततः देहरादून के कुछेक प्रमुख लायन लीडर्स के बीच कागज वापस करने की प्रक्रिया को अंजाम देना तय हुआ । देहरादून के कुछेक प्रमुख लायन लीडर्स के बीच हो रही बातचीत के दौरान मामले में मुकेश गोयल की संलग्नता खुलकर सामने आई, क्योंकि मुकेश गोयल बार बार फोन करके पंकज बिजल्वान को निर्देश दे रहे थे, जिस कारण पंकज बिजल्वान बार बार अपनी ही बात से पलट रहे थे । एक मौके पर पंकज बिजल्वान ने यह कहते हुए उस मीटिंग को निरर्थक करने का प्रयास किया कि उक्त कागज वापस करने/लेने की प्रक्रिया हापुड़ में मुकेश गोयल के घर पर होगी । इस पर विनय मित्तल उखड़ गए और उन्होंने साफ कह दिया कि उक्त कागज वापस होने की प्रक्रिया यहीं होगी और अभी होगी, अभी यह यदि नहीं हुई तो वह गाजियाबाद लौट रहे हैं और वह वहाँ एफआईआर दर्ज करवायेंगे और फिर मामला पुलिस और अदालत में ही तय होगा । विनय मित्तल के यह तेवर देख कर पंकज बिजल्वान सकपका गए और फिर बड़े आराम से वहीं उक्त कागज के वापस होने की प्रक्रिया पूरी हुई और एक नाटकीय घटनाचक्र का पटापेक्ष हुआ ।
पंकज बिजल्वान को जोन चेयरमैन के पद से हटाने की तैयारी विनय मित्तल की थी, और विनय मित्तल ने उन्हें उक्त पद से हटा ही दिया है । इस्तीफा देकर पद छोड़ने की पेशकश पंकज बिजल्वान ने ही की थी, और अपनी ही पेशकश की उन्होंने भ्रूण हत्या कर दी । मुकेश गोयल ने पंकज बिजल्वान का इस्तेमाल करके विनय मित्तल को काबू करने की कोशिश की थी, लेकिन विनय मित्तल और सुनील जैन ने उनकी कोशिश को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया । इस किस्से के सामने आने के बाद डिस्ट्रिक्ट में हर कोई पंकज बिजल्वान और मुकेश गोयल को कोस रहा है कि पुलिस में झूठी शिकायत का भय दिखा कर यह लोग अब अपनी अपनी राजनीति के स्वार्थ पूरे करेंगे क्या ? इस किस्से से कुछेक लोगों की विनय मित्तल को वह अभिमन्यु बताने की बात भी सच साबित हो गई है जिसे चक्रव्यूह में घुसना भी आता है, और उससे निकलना भी । इस मामले में विनय मित्तल ने जिस तरह से मुकेश गोयल की रणनीति को फेल किया है, सुनील जैन को विनय मित्तल का संकट मोचक बनकर हीरो बनने का मौका मिला है, और मुकेश गोयल को इस मामले में जिस तरह से हर किसी की आलोचना सुनने को मिल रही है - उसमें डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को बड़ी करवट लेते देखा/पहचाना जा रहा है ।

Sunday, November 25, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के मामले में रवि चौधरी से पीछा छुड़ाने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी संजीव राय मेहरा की कोशिशों से बिगड़ी स्थिति को सँभालने के लिए राजेश बत्रा के प्रयास सचमुच सफल हो सकेंगे क्या ?

नई दिल्ली । निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी ने वर्ष 2020-21 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए उस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी संजीव राय मेहरा को घेरना और उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि संजीव राय मेहरा के गवर्नर-वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर रवि चौधरी पहले तो आश्वस्त थे, लेकिन इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनाव में अशोक कंतूर की हुई हार के चलते बदले हालात में रवि चौधरी को संजीव राय मेहरा के तेवर बदले बदले से नजर आ रहे हैं । दरअसल अशोक कंतूर की हार के लिए, खुद अशोक कंतूर के नजदीकी व समर्थक ही रवि चौधरी की हरकतों तथा उन हरकतों के चलते डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच घर कर बैठी उनकी बदनामी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय अग्रवाल का दावा था कि अशोक कंतूर को अस्सी प्रतिशत वोट मिलेंगे; पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल बताते थे कि उम्मीदवार के रूप में अशोक कंतूर जिस ऊँचाई पर हैं, वहाँ अनूप मित्तल उन्हें छू भी नहीं सकते हैं; रवि चौधरी ही नहीं, मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया और उनकी कैबिनेट के पप्पूजीत सिंह सरना व अजीत जालान जैसे प्रमुख लोग भी अशोक कंतूर को वोट दिलवाने के लिए प्रेसीडेंट्स को फुसलाने, पटाने, डराने, धमकाने के काम में लगे थे, एक क्लब के प्रेसीडेंट का तो 'अपहरण' करके उसका वोट डलवाने का प्रयास किया गया । बड़े लोगों के खुले समर्थन और बड़ी घेराबंदी के बावजूद आशोक कंतूर के खाते में लेकिन जब पराजय दर्ज हुई, तब हर किसी ने रवि चौधरी को कोसा । अशोक कंतूर ने कई लोगों के सामने रोना रोया कि उन्होंने तो रवि चौधरी की 'छाया' से बचते हुए 'दिखने' की खूब कोशिश की, लेकिन पता नहीं कैसे वह उस छाया के प्रकोप से बच नहीं सके । इस तरह की बातों से संजीव राय मेहरा ने समझ लिया कि उन्होंने यदि रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया, तो रवि चौधरी की हरकतें व बदनामी उनका गवर्नर-वर्ष खराब कर देंगी और गवर्नर के रूप में उनका नाम खराब करेंगी ।
रवि चौधरी ने भी महसूस किया कि अशोक कंतूर की चुनावी हार के बाद बदले माहौल में संजीव राय मेहरा का उनके प्रति रवैया बदला बदला सा है । रवि चौधरी के नजदीकियों का ही बताना/कहना है कि संजीव राय मेहरा के बदले बदले से रवैये में रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद 'छिनता' हुआ दिख रहा है । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद 'बचाने' के लिए रवि चौधरी ने संजीव राय मेहरा की घेराबंदी शुरू कर दी है; तथा कुछेक लोगों से संजीव राय मेहरा पर दबाव बनवाना शुरू किया है कि उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि रवि चौधरी ने उन्हें गवर्नर नॉमिनी चुनवाने के लिए किस किस तरह की हरकतें व बेईमानियाँ कीं है, और इसलिए उन्हें रवि चौधरी को ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना चाहिए । इस मामले में, रवि चौधरी के क्लब में चल रहे एक 'खेल' से भी थोड़ा ट्विस्ट आया है - रवि चौधरी जिसके सहारे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद कब्जाने की तथा संजीव राय मेहरा जिसके पीछे 'छिपने' की कोशिश करते बताए/सुने जा रहे हैं । असल में, अशोक कंतूर के संगी/साथियों ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया है कि अशोक कंतूर की उम्मीदवारी को यदि रवि चौधरी की 'छाया' से 'सचमुच में' दूर नहीं किया गया, तो अगले रोटरी वर्ष में भी उनका चुनाव जीतना मुश्किल ही होगा । रवि चौधरी और अशोक कंतूर चूँकि एक ही क्लब के सदस्य हैं, इसलिए रवि चौधरी की छाया से अशोक कंतूर की अगले रोटरी वर्ष में प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी को बचाने के लिए एक बड़ा फार्मूला सोचा गया है । क्लब के सदस्यों के अनुसार, अशोक कंतूर के रास्ते का काँटा दूर करने के लिए फार्मूला तैयार किया गया है कि रवि चौधरी मौजूदा क्लब की सदस्यता से इस्तीफा दे कर कोई दूसरा क्लब ज्वाइन करेंगे - और इस तरह से लोगों को 'दिखाया' जायेगा कि अशोक कंतूर, रवि चौधरी के 'आदमी' नहीं हैं और उनकी उम्मीदवारी से रवि चौधरी का कोई वास्ता नहीं है । क्लब के सदस्यों का कहना है कि रवि चौधरी इस फार्मूले पर अमल करने के लिए तैयार तो हो गए हैं, लेकिन इसके लिए उन्होंने शर्त रख दी है कि संजीव राय मेहरा से उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर घोषित करवाया जाए । संजीव राय मेहरा का मानना और कहना है कि अपने क्लब से इस्तीफा देने की स्थिति में डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि चौधरी की बदनामी का दाग और गहरा होगा - और तब रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना उनके लिए तथा उनके गवर्नर-वर्ष के लिए और भी फजीहत करवाने वाला फैसला होगा । 
अशोक कंतूर की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से तैयार किए गए फार्मूले ने जिस तरह से रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से और दूर करने के हालात बनाए हैं, उससे रवि चौधरी और भड़क गए हैं । रवि चौधरी की भड़भड़ाहट को नियंत्रित करने के लिए वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजेश बत्रा को सामने आना पड़ा है । उल्लेखनीय है कि रवि चौधरी, संजीव राय मेहरा व अशोक कंतूर का कनेक्ट राजेश बत्रा से है और समझा जाता है कि राजेश बत्रा पर्दे के पीछे रहते हुए इनके हितों को बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं । तीनों के बीच लेकिन अब मामला जिस तरह से उलझ गया है, उसे सुलझाने के लिए राजेश बत्रा को अब पर्दे के पीछे से पर्दे के सामने आने के लिए मजबूर होना पड़ा है । संजीव राय मेहरा के नजदीकियों का कहना/बताना है कि राजेश बत्रा ने संजीव राय मेहरा को समझाने का प्रयास किया है कि अशोक कंतूर के फायदे के लिए उन्हें रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना लेना चाहिए । संजीव राय मेहरा का कहना लेकिन यह है कि रवि चौधरी अपनी हरकतें तो छोड़ेंगे नहीं; अगले वर्ष, आने वाले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में उन्हें चुनावी सक्रियता दिखाने का और मौका मिल जायेगा और तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में उनके लिए फजीहत की स्थिति बनेगी और अशोक कंतूर को भी कोई फायदा नहीं होगा । राजेश बत्रा को और भी कई लोगों ने सुझाव दिया है कि यदि संजीव राय मेहरा के गवर्नर-वर्ष को बदनामी व फजीहत से बचाना है तथा अशोक कंतूर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाना है - तो रवि चौधरी को इनसे दूर रखना होगा । हालाँकि यह सुझाव देने वाले भी जानते हैं, और राजेश बत्रा भी समझते हैं कि रवि चौधरी को संजीव राय मेहरा व अशोक कंतूर से दूर रखना मुश्किल काम है । मजे की बात यह है कि रवि चौधरी के साथ के लोग ही कह रहे हैं कि रवि चौधरी को समझना चाहिए कि लोगों के बीच उनकी हरकतों को लेकर बेहद नाराजगी और बदनामी है, इसलिए उनकी भलाई इसमें हैं कि वह अपने व्यवहार को सुधारें और कुछ समय सीन से दूर रहे; लेकिन किसी को भी नहीं लगता है कि रवि चौधरी इस सच्चाई को स्वीकार करेंगे - फिलहाल तो वह किसी भी तरह से संजीव राय मेहरा के गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के जुगाड़ में लगे हैं । संजीव राय मेहरा भी लेकिन जिस तरह से उनसे बचने की कोशिश कर रहे हैं, उससे मामला खासा गंभीर और दिलचस्प हो गया है । 

Friday, November 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वापसी की कोशिश कर रहे नितिन कँवर, राजिंदर अरोड़ा, सुमित गर्ग काउंसिल सदस्य के रूप में किए गए अपने ही कार्य/व्यवहार के कारण लोगों की नाराजगी का शिकार बन रहे हैं, और फरीदाबाद में प्रदीप कौशिक मुसीबत में फँसे हैं

नई दिल्ली । रीजनल काउंसिल सदस्य और पदाधिकारी के रूप में की गईं नितिन कँवर, राजिंदर अरोड़ा और सुमित गर्ग की कार्रवाईयों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अपनी अपनी सीट बचाने की खुद उनके सामने कड़ी चुनौती प्रस्तुत की हुई है । रीजनल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य पर नजर रखने वाले कई लोगों का तो मानना और कहना है ही, साथ ही इनके नजदीकियों व समर्थकों तक को भी आशंका है कि कहीं इनका हाल वैसा ही न हो, जैसा पिछली बार के चुनाव में हरित अग्रवाल का हुआ था । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल रीजनल काउंसिल में होने के बावजूद पिछली बार चुनाव हार गए थे । पिछली बार हरित अग्रवाल के साथ जो हुआ, वह इस बात का सुबूत है कि रीजनल काउंसिल का सदस्य होना चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है । काउंसिल सदस्य के सामने बड़ी समस्या यह होती है कि काउंसिल सदस्य के रूप में लोग उसके कार्य/व्यवहार को भी देखते/परखते हैं । कार्य/व्यवहार के मामले में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा का काउंसिल में रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है । नितिन कँवर के बदतमीजीपूर्ण व्यवहार ने काउंसिल की कई मीटिंग्स में बहुत ही शर्मशार करने वाली स्थितियाँ पैदा कीं । उनके गालीगलौच भरे उपद्रवी व्यवहार को लेकर काउंसिल के ही दूसरे सदस्यों ने कई बार इंस्टीट्यूट प्रशासन तक से शिकायत की और कुछेक बार तो पुलिस तक बुलाने के हालात बने । नितिन कँवर के बदतमीजीपूर्ण व्यवहार की कुख्याति आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तक है, और अधिकतर लोग काउंसिल में उनकी उपस्थिति को एक कलंक की तरह देखते/समझते हैं । इस देखने/समझने के कारण नितिन कँवर को अपने चुनाव अभियान में कई मौकों पर अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है और अपमानित होना पड़ रहा है । उनके नजदीकियों के बीच ही चर्चा है कि ऐसा कई जगह हुआ कि नितिन कँवर जिनसे मिलने गए, उन्होंने व्यस्तता का बहाना बना कर उनसे मिलने से इंकार कर दिया । नितिन कँवर ने जिन लोगों से सिफारिशें करवाईं, उनमें से कुछेक ने बताया कि उन्हें सुनने को मिला कि किस बदतमीज व्यक्ति की सिफारिश कर रहे हो । ऐसे चुनावी माहौल में नितिन कँवर के लिए नॉर्दन इंडिया रीजनल काउंसिल की अपनी सीट बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है ।
राजिंदर अरोड़ा का बदतमीजी के मामले में ग्राफ नितिन कँवर जितना ऊँचा तो नहीं है, लेकिन कई मौकों पर उन्हें नितिन कँवर के सहयोगी के रूप में जिस तरह से देखा गया है - उसके चलते कई लोगों का मानना/कहना है कि नितिन कँवर के साथ-साथ राजिंदर अरोड़ा ने भी काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा पर कालिख पोतने का काम किया है, और इनका काउंसिल में होना काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है । राजिंदर अरोड़ा के लिए इसके अलावा मुसीबत की बात जगजीत सिंह की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे गुरद्वारा प्रबंधक कमेटियों से जुड़े लोगों के समर्थन की भी है । पिछली बार राजिंदर अरोड़ा की जीत में उक्त लोगों के समर्थन की बड़ी भूमिका थी । राजिंदर अरोड़ा के नजदीकियों का ही बताना/कहना है कि दिल्ली के साथ-साथ पंजाब तक के शहरों में जिस तरह से गुरद्वारा प्रबंधक कमेटियों से जुड़े लोग जगजीत सिंह की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं, उसके कारण राजिंदर अरोड़ा की सीट खतरे में नजर आ रही है । सुमित गर्ग तीनों वर्ष नितिन कँवर व राजिंदर अरोड़ा के 'सहयोगी' बन कर तो रहे, लेकिन खुद उन पर बदतमीजी करने के आरोप नहीं लगे । उनकी सीट एक दूसरे कारण से मुश्किल में दिख रही है । पिछली बार सुमित गर्ग की उम्मीदवारी के एक बड़े समर्थक रीजनल काउंसिल के एक पूर्व चेयरमैन दुर्गादास अग्रवाल थे, किंतु जिन्होंने इस बार अपने बेटे शशांक अग्रवाल को उम्मीदवार बना दिया है । सुमित गर्ग के लिए समस्या की बात यह है कि काउंसिल में करीब ढाई वर्ष की अभी तक की अवधि में वह अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बना सके हैं, और उन्हें राकेश मक्कड़-नितिन कँवर-राजिंदर अरोड़ा की बदनाम तिकड़ी के 'पिट्ठू' के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है । इस कारण से वह अपने समर्थकों व शुभचिंतकों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं कर सके हैं; और ऐसे में दुर्गादास अग्रवाल की तरफ से मिलने वाला झटका उनके लिए कुछ ज्यादा जोर का झटका ही है । यदि बात सिर्फ इतनी ही होती कि पिछली बार की तरह दुर्गादास अग्रवाल का समर्थन उन्हें इस बार न मिल रहा होता, तो बात ज्यादा गंभीर नहीं होती - लेकिन पिछली बार उनके पक्के वाले समर्थक रहे दुर्गादास अग्रवाल इस बार अपने बेटे को उम्मीदवार के रूप में ले आये हैं - यह सुमित गर्ग के लिए खतरे की ऊँची आवाज वाली घंटी बजने जैसी बात है ।
मौजूदा काउंसिल के सदस्य दीपक गर्ग की बदनामी उनके प्रोफेशनल पार्टनर प्रदीप कौशिक की उम्मीदवारी के लिए संकट बनी हुई है । दीपक गर्ग मौजूदा काउंसिल में पहले वर्ष चेयरमैन बने थे, और छह महीने में इस्तीफा दे चुके थे ।दीपक गर्ग इस मायने में खुशकिस्मत रहे कि जब तक राकेश मक्कड़-नितिन कँवर-राजिंदर अरोड़ा की तिकड़ी की कारस्तानियाँ जगजाहिर होतीं और लोगों के बीच बदनामी कमातीं, तब तक दीपक गर्ग चेयरमैनी करके और इस्तीफा देकर सत्ता की सीधी राजनीति से अलग हो चुके थे, जिस कारण सत्ता खेमे पर लगी बदनामी की कालिख से काफी हद तक वह बचे रह सके । लेकिन चेयरमैनी से छह महीने में इस्तीफा देने की उनकी कार्रवाई ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बुरी तरह निराश व नाराज किया - और उन्हें 'भगौड़े' की संज्ञा दी । फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की निराशा व नाराजगी का कारण यह रहा कि रीजनल काउंसिल के अभी तक के इतिहास में फरीदाबाद को पहली बार चेयरमैन का पद मिला, लेकिन दीपक गर्ग ने पता नहीं किसकी और किस राजनीति की 'गुलामी' करते हुए छह महीने में उसे छोड़ दिया - और इस तरह फरीदाबाद की इच्छाओं व उम्मीदों के साथ-साथ उसकी पहचान के साथ भी विश्वासघात किया । अपने विश्वासघात की सजा पाने से दीपक गर्ग तो बच गए हैं, लेकिन उनके प्रोफेशनल पार्टनर प्रदीप कौशिक उनके किए-धरे की सजा भुगतने के लिए शिकार बन रहे हैं । फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच यह चर्चा आम है कि जिस तरह से दीपक गर्ग ने फरीदाबाद की इच्छाओं व उम्मीदों के साथ-साथ उसकी पहचान के विश्वासघात किया है, वैसा ही विश्वासघात प्रदीप कौशिक नहीं करेंगे  - और इसलिए उन्हें वोट क्यों दें ? काउंसिल सदस्यों की कारस्तानियाँ और उनके छूटते समर्थन ने जिस तरह उनकी (या उनके पार्टनर की) काउंसिल में पुनर्वापसी की राह को मुश्किल बना दिया है, उसके चलते नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है ।