Tuesday, April 26, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनाव में अनुपम बंसल पर प्राप्त की गई केएस लूथरा की धमाकेदार जीत ने विशाल सिन्हा के राजनीतिक मंसूबों को पूरी तरह से धूल में मिला दिया है

लखनऊ । केएस लूथरा ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनाव में अनुपम बंसल को जो जोरदार मात दी है, उसने विशाल सिन्हा के राजनीतिक मंसूबों पर पानी फेरने तथा उनके 'राजनीतिक धंधे' को पूरी तरह चौपट कर देने का काम किया है । विशाल सिन्हा अगले लायन वर्ष के अपने गवर्नर-काल में कुछेक लोगों को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए यह कहते हुए प्रेरित कर रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मेरा सहयोग/समर्थन रहेगा, तो चुनाव जीतना आसान रहेगा । लेकिन विशाल सिन्हा के तमाम समर्थन और उनकी निरंतर सक्रियता के बावजूद अनुपम बंसल जिस भारी अंतर से केएस लूथरा से चुनाव हार गए हैं, उसे देखते हुए विशाल सिन्हा के सामने संकट यह पैदा हुआ है कि ऐसे में डिस्ट्रिक्ट में कौन होगा जो उनके समर्थन पर भरोसा करेगा ? हर किसी के मन में और जुबान पर यही सवाल है कि विशाल सिन्हा जब अपने सबसे खास दोस्त अनुपम बंसल को चुनाव नहीं जितवा सके, तो फिर वह और किसे चुनाव जितवा सकेंगे ? विशाल सिन्हा के लिए मुसीबत की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों का मानना और कहना है कि अनुपम बंसल की इतनी बुरी हार के लिए वास्तव में विशाल सिन्हा ही जिम्मेदार हैं । डिस्ट्रिक्ट में अपने रवैये और व्यवहार से विशाल सिन्हा ने दरअसल अपनी एक नकारात्मक पहचान ही बनाई है - कुछेक लोगों को हालाँकि उम्मीद थी कि विशाल सिन्हा जब एक कार्यकर्ता का चोला छोड़ कर 'नेता' बनने की तरफ अग्रसर होंगे तो वह अपने रवैये व व्यवहार में सुधार करेंगे तथा सचमुच एक 'जेंटिलमैन' बनने का प्रयास करेंगे; किंतु ऐसी उम्मीद रखने वालों को निराशा ही हाथ लगी है । इसका खामियाजा हालाँकि खुद विशाल सिन्हा ने ही भुगता है । विशाल सिन्हा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का अपना पहला चुनाव, निहायत कमजोर 'दिख' रहे शिव कुमार गुप्ता से हार गए - यह केएस लूथरा की विशाल सिन्हा को पहली चोट थी । दूसरी बार में विशाल सिन्हा तब सफल हो सके, जब उन्होंने केएस लूथरा की हर रोज सुबह-शाम पूजा की और उन्हें अपने समर्थन के लिए मनाया । तीसरी बार अशोक अग्रवाल की हार के रूप में विशाल सिन्हा को केएस लूथरा ने एक बार फिर 'धोया' । अब की बार, विशाल सिन्हा ने केएस लूथरा के साथ अपना पिछला 'हिसाब-किताब' बराबर करने की भारी तैयारी की - लेकिन केएस लूथरा ने एक बार फिर उन्हें ऐसी जोरदार पटकनी दी, जिसकी चोटें ठीक होने में बहुत समय लगेगा ।
अबकी बार, केएस लूथरा से बदला ले लेने का विशाल सिन्हा को पूरा भरोसा था । वह चूँकि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, इसलिए उन्हें भरोसा रहा कि अगले लायन वर्ष की अपनी डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट के पद 'बेच' कर वह अनुपम बंसल के लिए वोट खरीद लेंगे - और केएस लूथरा से अपना पिछला सारा हिसाब-किताब बराबर कर लेंगे । उनके इस भरोसे को और भरोसा नीरज बोरा का समर्थन मिलने से मिला । अनुपम बंसल को चूँकि गुरनाम सिंह के उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा था, और नीरज बोरा को गुरनाम सिंह के विरोधी के रूप में पहचाना जाता रहा है - इसलिए नीरज बोरा को जब अनुपम बंसल के समर्थन में देखा गया, तो अनुपम बंसल का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आया । गुरनाम सिंह, नीरज बोरा और विशाल सिन्हा की तिकड़ी ने एक बड़ा काम यह किया कि कैबिनेट सेक्रेटरी लालजी वर्मा व चीफ एडवाइजर एचएन सिंह को अनुपम बंसल की उम्मीदवारी के पक्ष में सक्रिय कर/करा दिया । इन तिकड़ी का वास्तविक उद्देश्य दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता का समर्थन पाना था, जो तटस्थ भूमिका में थे - और जिनकी तटस्थ भूमिका तिकड़ी को पसंद नहीं आ रही थी । शिव कुमार गुप्ता पर दबाव बनाने लिए इस तिकड़ी ने उनके दोनों प्रमुख सहयोगियों - लालजी वर्मा व एचएन सिंह को उनके खिलाफ कर दिया । गुरनाम सिंह, नीरज बोरा व विशाल सिन्हा ने केएस लूथरा को डिस्ट्रिक्ट में अकेला व अलग-थलग कर देने के उद्देश्य से खासा पक्का और ठोस जाल बुना - लेकिन वह केएस लूथरा को जाल में कैद नहीं कर पाए । उलटे केएस लूथरा ने ही उन्हें उनके बनाए जाल में ऐसा फँसा दिया है कि उसमें से निकल पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है ।
मजे का सीन यह बना है कि अनुपम बंसल के ही कुछेक नजदीकी अनुपम बंसल की भारी हार के लिए विशाल सिन्हा को कोस रहे हैं । उनका कहना है कि अनुपम बंसल को उम्मीदवार बनाने से लेकर उन्हें जितवाने की कोशिश करने के नाम पर विशाल सिन्हा ने जो हरकतें कीं, उनने लोगों को नाराज करने का काम ही किया, जिसका फायदा केएस लूथरा ने उठाया । दरअसल अनुपम बंसल की उम्मीदवारी और उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में जो 'शिवजी की बारात' बनी, उसे एक अवसरवादी गठजोड़ के रूप में देखा/पहचाना गया - जिसके बस की केएस लूथरा तथा उनकी राजनीति से निपटना था ही नहीं । केएस लूथरा ने पिछले वर्षों में बार-बार अपने आप को आम लायन से जुड़ा हुआ साबित किया है; पिछले वर्षों में जब भी मुकाबले की स्थिति बनी है, केएस लूथरा ने हर बार साबित किया है कि वह 'जनता के आदमी' हैं और आम लायन सदस्य की नब्ज पहचानते हैं - और उन्हें तिकड़मों से नहीं हराया जा सकता । विशाल सिन्हा बार बार, कई बार केएस लूथरा से 'पिटे' हैं, पर फिर भी वह इस बात को नहीं समझ सके । विशाल सिन्हा से भी ज्यादा दिलचस्प नजारा लालजी वर्मा व एचएन सिंह ने पेश किया : डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस से छह दिन पहले तक यह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ मिल कर चुनाव की तैयारी कर/करवा रहे थे, उसके बाद इन्होंने अनुपम बंसल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया और उनके लिए वोट जुटाने/माँगने के काम पर लगे; किंतु अब जब अनुपम बंसल चुनाव बुरी तरह हार गए तो यह लोगों को ज्ञान बाँट रहे हैं कि इस चुनाव का तो कोई औचित्य ही नहीं था और यह चुनाव करा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने लोगों को गुमराह किया है । कोई इनसे पूछे कि भाई जब आपको इतना ज्ञान है, तो यह आपने चुनाव से पहले लोगों को क्यों नहीं बताया; आपने अनुपम बंसल तथा उनके समर्थक नेताओं को क्यों नहीं आगाह किया कि इस चुनाव का कोई औचित्य नहीं है, इसके चक्कर में अपनी फजीहत क्यों करवा रहे हो ? इनके अनुसार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने लोगों को गुमराह किया, पर यह इस सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं कि यह खुद गुमराह क्यों हुए ? इस सवाल का जबाव यह कभी नहीं देंगे - इन्हें दरअसल अपनी खीझ मिटानी है जो इनके समर्थन के बावजूद अनुपम बंसल के बुरी तरह हार जाने से पैदा हुई है ।
इनसे भी बुरी स्थिति लेकिन बीएन चौधरी की हुई है । बीएन चौधरी ने विशाल सिन्हा के गवर्नर-काल में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की तैयारी कर ली थी, और इस तैयारी के तहत ही उन्होंने विशाल सिन्हा के गवर्नर-काल के कैबिनेट सेक्रेटरी का पदभार भी सँभाल लिया है । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने कुछेक मौकों पर उनकी उम्मीदवारी की घोषणा भी कर दी है । लेकिन अनुपम बंसल की जो बुरी गत बनी है, उसे देख कर बीएन चौधरी का सारा जोश हवा होता हुआ नजर आ रहा है । उन्हें लग रहा है कि विशाल सिन्हा के चक्कर में वह अपनी अनुपम बंसल जैसी फजीहत क्यों करवाएँ ? बीएन चौधरी के बदले बदले मिजाज को देख कर विशाल सिन्हा ने कुछेक दूसरे संभावित उम्मीदवारों पर डोरे डालने की कोशिश की, लेकिन कोई भी विशाल सिन्हा को फँसता हुआ नहीं दिख रहा है । विशाल सिन्हा की समस्या यह है कि वह संभावित उम्मीदवारों से आखिर किस मुँह से कहें कि चिंता मत करो, मैं मदद करूँगा - क्योंकि सभी ने देख ही लिया है कि विशाल सिन्हा की मदद के बाद बेचारे अनुपम बंसल का अंततः क्या हाल हुआ है । जाहिर तौर पर इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनाव में अनुपम बंसल पर प्राप्त की गई केएस लूथरा की धमाकेदार जीत ने विशाल सिन्हा के तमाम राजनीतिक मंसूबों को फिलहाल तो धूल में मिला दिया है ।

Monday, April 25, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी मामले में जेपी सिंह की ऐतिहासिक फजीहत करने/कराने के बाद, उनके विरोधियों ने उन्हें ब्लड बैंक के मामले में घेरने की तैयारी शुरू की

नई दिल्ली । जेपी सिंह ने लायंस की चुनावी राजनीति में एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया है - इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए वह अकेले उम्मीदवार थे, लेकिन फिर भी वह चुनाव हार गए । इस तरह जेपी सिंह को किसी और ने नहीं हराया, बल्कि खुद उन्होंने ही अपने आप को हरा दिया । कुछेक लोगों का कहना है कि जेपी सिंह की खुद की हरकतों व कारस्तानियों ने ही उन्हें चुनाव में हरा दिया है । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने की जेपी सिंह की तैयारी को इस तरह से जो 'जोर का झटका' लगा है, उसने आरोपों-प्रत्यारोपों की एक नई सीरीज शुरू कर दी है : जेपी सिंह ने लायन राजनीति में हुई अपनी 'इस सबसे बड़ी दुर्गति' के लिए अपने समर्थकों व नजदीकियों को ही जिम्मेदार ठहराया है, जबकि उनके समर्थकों व नजदीकियों के अनुसार जेपी सिंह अपनी खुद की करनी तथा ब्लड बैंक की कमाई 'हड़पने' के आरोपों के कारण इस दशा को प्राप्त हुए हैं । जेपी सिंह का कहना है कि अपने विरोधियों की उन्हें पहचान थी, किंतु वह संख्या में इतने कम थे और हैं कि वह चुनावी हार का कारण नहीं हो सकते - उन्हें तो अपने समर्थकों व नजदीकियों से ही धोखा मिला है । जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के मामले में मिले झटके के लिए मुख्य रूप से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रमोद सपरा तथा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह की भूमिका को जिम्मेदार मानते हैं; उनका कहना है कि ऐन मौके पर इन दोनों ने उन्हें धोखा दिया - जिसके चलते उनके लिए हालात मुश्किल हो गए । इन दोनों की तरफ से लेकिन जेपी सिंह के इस आरोप का मजाक उड़ाया जा रहा है : इनका कहना है कि जेपी सिंह बड़े नेता हैं, वह डिस्ट्रिक्ट की और मल्टीपल की तथा उससे और ऊपर की राजनीति चलाते हैं - हमारे जैसे छोटे नेता उनकी अपनी हार का कारण भला कैसे हो सकते हैं ? दूसरे कई लोगों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के मुद्दे पर मिली हार ने जेपी सिंह को वास्तव में आईना दिखाया है, और आईने में अपनी बिगड़ी तस्वीर के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने की बजाए उन्हें अपने गिरेबान में झाँकना/देखना चाहिए । जेपी सिंह के लिए बदकिस्मती की बात यह है कि इस समय जबकि वह अपने लायन जीवन के सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं, तब उनके प्रति हमदर्दी दिखाने के लिए कोई नहीं है और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के रूप में देखे जाने वाले लोग भी उनकी दशा पर मजे ले रहे हैं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की राजनीति लगता है कि जेपी सिंह का बंटाधार करेगी । विडंबना की बात यह है कि मल्टीपल में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जेपी सिंह को सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप देखा/पहचाना जा रहा है, लेकिन अपने खुद के डिस्ट्रिक्ट में जेपी सिंह को न सिर्फ नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं, बल्कि उसके बाद भी उन्हें फजीहत का शिकार होना पड़ रहा है । अब किसी उम्मीदवार की इससे बड़ी फजीहत और क्या होगी कि वह अकेला उम्मीदवार होता है, लेकिन फिर भी वह चुनाव हार जाता है । जेपी सिंह के साथ के लोगों का ही कहना है कि इस स्थिति के लिए खुद जेपी सिंह ही जिम्मेदार हैं । दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए रमेश नांगिया की प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी से जेपी सिंह जिस बुरी तरह से डर गए - फिर वही डर उन्हें ले डूबा । रमेश नांगिया के ही कुछेक समर्थकों का कहना है कि उन्हें रमेश नांगिया के जीतने की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी, लेकिन जेपी सिंह ने रमेश नांगिया की उम्मीदवारी सामने आने पर जिस तरह की घबराहट दिखाई और जिस तरह की बेबकूफियाँ कीं - उससे जेपी सिंह ने अपने प्रति विरोध को संगठित व आक्रामक बनाने का काम किया, और जिसका नतीजा हुआ कि रमेश नांगिया को चुनावी मैदान से हटवा देने के बाद भी वह चुनाव हार गए । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को जानने/समझने वाले लोगों का मानना और कहना है कि रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को लेकर जेपी सिंह अपनी घबराहट न दिखाते, और लोगों के बीच अपना समर्थन मजबूत करने तथा बढ़ाने में जुटते तो रमेश नांगिया को हरा कर वही चुनाव जीतते - लेकिन जेपी सिंह अपनी उम्मीदवारी के लिए काम करने की बजाए रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को वापस कराने और रद्द कराने की तिकड़मों में लग गए । इससे लोगों के बीच यही संदेश गया कि वह रमेश नांगिया की उम्मीदवारी से डर गए हैं । इस संदेश का सीधा और गहरा असर यह हुआ कि जेपी सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों के हौंसले पस्त पड़े, जबकि उनके विरोधियों में खासा जोश भर गया ।
इस असर को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के पहले दिन रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को रद्द करने की कार्रवाई से और पंख लगे । जेपी सिंह ने सोचा तो यह था कि वह रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को ही रद्द करवा देंगे, तो चुनाव का झँझट ही खत्म हो जायेगा और उनकी हार का खतरा पूरी तरह टल जायेगा । जेपी सिंह ही क्या, अन्य कोई भी नहीं जानता था कि इस तिकड़म से जेपी सिंह सिर्फ अपनी हार को ही नहीं, इतिहास बनाने वाली अपनी फजीहत को भी आमंत्रित कर रहे हैं । चुनाव हो जाता, और जेपी सिंह हार जाते - तो यह चुनावी दुनिया की एक सामान्य घटना होती; लेकिन जो हुआ वह ऐतिहासिक इसलिए हुआ क्योंकि उम्मीदवार एक ही था, अकेला था - लेकिन फिर भी हार गया । अपनी स्थापना के सौंवे वर्ष में प्रवेश करने जा रहे लायंस इंटरनेशनल के इतिहास में जेपी सिंह संभवतः पहले और अकेले उम्मीदवार होंगे, जो अकेले उम्मीदवार होने के बावजूद चुनाव हार गए । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के पहले दिन रमेश नांगिया की उम्मीदवारी को रद्द करने/कराने की कार्रवाई का जो जोरदार विरोध हुआ, उससे भी जेपी सिंह ने कोई सबक नहीं लिया । जेपी सिंह ने मान लिया कि रमेश नांगिया के उम्मीदवार न रहने से उनका एंडोर्सी बनना अब सुनिश्चित ही है, और इसलिए लोगों की नाराजगी व उनके विरोध की उन्हें परवाह करने की क्या जरूरत है ? इसी विश्वास के चलते उन्होंने विरोध करने वाले लोगों की वॉयस वोट कराने की माँग को मान लेने दिया । वॉयस वोटिंग में जब उनके समर्थन में पड़े वोटों की संख्या (98) उनके विरोध में पड़े वोटों की संख्या (116) से 18 कम निकली - तो जेपी सिंह के तोते उड़ गए । इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने की जेपी सिंह की तैयारी पर जो 'वाट लगी', वह सिर्फ चुनाव हारने का मामला भर नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक किस्म की फजीहत है । जेपी सिंह की यह जो फजीहत हुई है, लायंस इंटरनेशनल के इतिहास में उनके जैसी ऐसी फजीहत शायद ही कभी किसी की हुई होगी ।
जेपी सिंह के लिए मुसीबत की बात यह है कि उनका जो यह हाल हुआ है, उससे डिस्ट्रिक्ट में उनके विरोधियों के हौंसले खासे मजबूत हुए हैं - और इन मजबूत हौंसलों के बल पर उनके विरोधी अब उन्हें ब्लड बैंक के मामले में घेरने की तैयारी कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि ब्लड बैंक में जेपी सिंह की बेईमानी तथा लूट के किस्से यूँ तो बहुत मशहूर हैं, लेकिन इन किस्सों को कहने/बताने वाले लोग इस मामले में जेपी सिंह को कभी घेर नहीं पाए । लगता है कि अब उन्हें मौका मिला है, और इस मौके का इस्तेमाल करने के लिए वह अपनी अपनी कमर कसने लगे हैं । जेपी सिंह के सामने मुसीबत यह है कि ब्लड बैंक पर अपना कब्जा यदि वह छोड़ भी देते हैं, तो यहाँ की गई गड़बड़ियों को मुद्दा बना कर उनके विरोधी उनका लायन राजनीति का कैरियर खत्म करने की कार्रवाई करेंगे; और यदि वह ब्लड बैंक पर अपना कब्जा बनाए रखने का प्रयास करते हैं - तो उनका यह प्रयास उनकी राजनीति को एक अलग तरीके से कमजोर करेगा । कई लोग मानते/कहते ही हैं कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी मामले में जेपी सिंह की हुई फजीहत की जड़ में ब्लड बैंक की राजनीति ही है । ऐसे में जेपी सिंह के लिए एक तरफ कुँआ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है - जिसे इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के चुनावी नतीजे ने और भी संगीन बना दिया है ।

Sunday, April 24, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रमोद विज के हाथों हो रही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन की 'धुलाई' को 'राजा' व उसके दुर्योधन/दुःशासन मजे ले ले कर जिस तरह से देख रहे हैं, वह डिस्ट्रिक्ट के लिए शर्मनाक स्थिति नहीं है क्या ?

देहरादून । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रमोद विज ने नए बने रोटरी क्लब पानीपत क्लासिक को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन के 'भीड़ भरे चौराहे पर कपड़े उतारने' की जो कार्रवाई की है, वह डिस्ट्रिक्ट 3080 की दशा का एक उदाहरण तो पेश करती ही है - साथ ही यह भी बताती है कि डिस्ट्रिक्ट का जो मौजूदा हाल है, उसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जैसे गरिमापूर्ण पद की हैसियत 'गुंडों के बीच फँसी रजिया' जैसी हो गई है । डेविड हिल्टन बेचारे शिक्षा जगत में काम करने वाले एक भले व्यक्ति रहे हैं । भारतीय शिक्षा जगत में उनके योगदान को बहुत ही सम्मान से देखा/पहचाना जाता है । एक शिक्षक के रूप में अपने योगदान के लिए वह देश के राष्ट्रपति द्वारा शिक्षकों के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं । इसके अलावा भी वह देश के शिक्षा क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित पुरस्कार De Rozio से भी पुरस्कृत हो चुके हैं । शिक्षा संबंधी स्थानीय व राज्यस्तरीय कमेटियों में ही नहीं - कई एक राष्ट्रीय कमेटियों में भी उनकी महत्वपूर्ण सक्रिय संलग्नता रही है - और इसी नाते से देश के शिक्षा क्षेत्र में डेविड हिल्टन का नाम खासा जाना/पहचाना है और प्रतिष्ठित है । इस प्रतिष्ठा के साथ डेविड हिल्टन जब रोटरी में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने, तो लोगों को उम्मीद बनी थी कि वह डिस्ट्रिक्ट में सदाचार व न्याय के पक्षधर बनेंगे और शिक्षा जगत में जिन वैल्यूज के समर्थक होने के नाते उन्होंने नाम कमाया है, उन्हीं वैल्यूज को वह रोटरी व डिस्ट्रिक्ट में भी स्थापित करेंगे । लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी बिलकुल उल्टी चाल ही देखने को मिली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डेविड हिल्टन ने जिस तरह से अपने आप को डिस्ट्रिक्ट के कुछेक प्रमुख पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की कठपुतली बना लिया, उससे उन्होंने डिस्ट्रिक्ट व रोटरी को तो कलंकित किया ही - साथ ही साथ अपनी साख व प्रतिष्ठा को भी धूल में मिला लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डेविड हिल्टन ने खुद ही - पता नहीं किस लालच या भय के कारण - अपनी ऐसी दशा बना ली है कि कोई भी उन्हें 'धो' देता है । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से लेकर डिस्ट्रिक्ट के आम रोटेरियंस तक विभिन्न मौकों पर उन्हें लताड़ते रहे हैं तथा उनके कान उमेठते रहे हैं; और अब पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रमोद विज ने उनकी जो दशा की है - उसके चलते तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डेविड हिल्टन के लिए बहुत ही शर्मनाक स्थिति पैदा हो गई है । प्रमोद विज दरअसल एक नए बने रोटरी क्लब पानीपत क्लासिक को लेकर उखड़े हुए हैं । रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन द्वारा स्पॉन्सर्ड इस नए क्लब को अभी दो सप्ताह पहले ही रोटरी इंटरनेशनल से चार्टर मंजूर हुआ है तथा इसके लिए नए बने क्लब के पदाधिकारियों व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की तरफ से प्रशंसा पत्र भी प्राप्त हो चुका है । जाहिर है कि नए बने क्लब को लेकर हर कोई खुश है, लेकिन एक अकेले प्रमोद विज को इसे लेकर भारी मिर्ची लगी है । उनकी शिकायत है कि इस नए क्लब को बनाने को लेकर रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का पालन नहीं हुआ है । इसके लिए प्रमोद विज ने डिस्ट्रिक्ट एक्सटेंशन चेयरमैन सुरेश गुगलानी तथा नए बने क्लब के जीएसआर एसएन गुप्ता को भी कोसा है । प्रमोद विज ने माँग की है कि डेविड हिल्टन नए क्लब का चार्टर रद्द करवाएँ । प्रमोद विज का कहना है कि डेविड हिल्टन ने यदि उनकी माँग के अनुरूप कदम नहीं उठाया, तो वह इस मामले को कॉलिज ऑफ गवर्नर्स में उठायेंगे तथा जरूरत पड़ी तो रोटरी इंटरनेशनल में भी इसकी शिकायत करेंगे । प्रमोद विज का रवैया देख कर हर कोई यह सोचने पर मजबूर हुआ है कि एक नए बने क्लब में नियमों का ऐसा कौन सा उल्लंघन हो गया है, जिस पर न तो नया क्लब बनाने के काम से जुड़े डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों का ध्यान गया - और न रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय के पदाधिकारियों ने ही गौर किया । लोगों को लग रहा है कि प्रमोद विज बात का बतंगड़ बना रहे हैं; प्रमोद विज चूँकि स्पॉन्सरिंग क्लब के सदस्य हैं, इसलिए वह इस बात से चिढ़े हुए हैं कि एक नए क्लब को स्पॉन्सर करने के लिए क्लब के पदाधिकारियों से उनसे अनुमति क्यों नहीं ली - और इसीलिए नए बने क्लब के खिलाफ बबाल मचाए हुए हैं तथा इस मामले की आड़ में डिस्ट्रिक्ट में अपनी चौधराहट दिखाने/जताने का प्रयास कर रहे हैं ।
नए बने क्लब को लेकर प्रमोद विज के आरोप यदि सचमुच 'बहुत ही' गंभीर हैं, तो यह एक ऐसे डिस्ट्रिक्ट में कामकाज होने के तरीके की भी पोल खोलते हैं - जिसमें एक 'राजा' भी है, जो बातें बड़ी ऊँची-ऊँची करता है । प्रमोद विज के आरोप यदि सचमुच बहुत गंभीर हैं, तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि ऊँची ऊँची बातें करने वाले 'राजा' ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर धृतराष्ट्र वाली भूमिका ले ली है, और डिस्ट्रिक्ट को दुर्योधनों व दुःशासनो को सौंप दिया है - जिनकी दिलचस्पी डिस्ट्रिक्ट को अपनी जाँघ पर बैठाने/बैठाये रखने तक ही सीमित हो चली है, जिसे पूरा करने के लिए वह जब तब 'रोटरी' की साड़ी खींच कर उसे नंगा करते रहते हैं । डिस्ट्रिक्ट के दुर्योधनों व दुःशासनो के ग्रुप में शामिल होने के बावजूद प्रमोद विज को चूँकि ज्यादा मौका नहीं मिल रहा था, इसलिए उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन के ही 'कपड़े उतारने' की तैयारी कर ली । डेविड हिल्टन ने चूँकि अपनी ही मर्जी से अपनी ऐसी स्थिति बना ली है कि कोई भी उन्हें दुत्कार देता है, सो प्रमोद विज को वह एक आसान शिकार भी लगे । कुछ लोगों का कहना है कि प्रमोद विज को हो सकता है कि यह भी लगा हो कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन का 'शिकार' करके वह अपने आप को 'राजा' का असली दुर्योधन साबित कर लेंगे, इसलिए उन्होंने सीधे डेविड हिल्टन पर हाथ डाल दिया । प्रमोद विज की इस कार्रवाई से डिस्ट्रिक्ट के दूसरे दुर्योधनों व दुःशासनो में हलचल मच गई है । प्रमोद विज की कार्रवाई को वह 'नौटंकी' करार दे रहे हैं और इसके पीछे एक दूसरी कहानी बताते हैं ।
उनके अनुसार, प्रमोद विज दरअसल इस बात से बुरी तरह चिढ़े हुए हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट रमन अनेजा अपने कार्यक्रमों में रंजीत भाटिया को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं, और उन्हें बिलकुल पूछ ही नहीं रहे हैं । प्रमोद विज दरअसल अपने आपको रंजीत भाटिया से बड़ा नेता समझते हैं, बड़ा इसलिए क्योंकि वह मानते/समझते हैं कि रंजीत भाटिया का समय तो निकल चुका है और आने वाला समय उनका है - इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि रमन अनेजा उन्हें ज्यादा तवज्जो देंगे, किंतु हो उल्टा रहा है । रमन अनेजा ने अभी तक के अपने कार्यक्रमों में प्रमोद विज को तो किनारे लगाए रखा, जबकि रंजीत भाटिया को उन्होंने हर जगह आगे आगे रखा । रमन अनेजा की इस हरकत ने प्रमोद विज के तन-बदन में आग तो लगा दी है, लेकिन प्रमोद विज अभी रमन अनेजा से सीधे भिड़ने को तैयार नहीं हैं । उन्हें डर है कि सीधे भिड़ने के कारण रमन अनेजा से उनकी दूरी और बढ़ जाएगी और तब उन्हें बिलकुल ही अलग-थलग कर दिया जायेगा । प्रमोद विज को लेकिन रमन अनेजा को डराना भी जरूरी लगा है, और 'इसी' जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने डेविड हिल्टन को निशाने पर ले लिया है । दुर्योधन व दुःशासन ही एक दूसरे की 'राजनीति' की तिकड़मों को अच्छे से समझ सकते हैं, इसलिए उनका ही मानना और कहना है कि प्रमोद विज ने वास्तव में रमन अनेजा को डराने व सावधान करने के लिए ही डेविड हिल्टन पर हमला बोला है । प्रमोद विज के डेविड हिल्टन पर किए गए इस हमले से रमन अनेजा सचमुच डरेंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन इस प्रकरण से डेविड हिल्टन व खुद प्रमोद विज की कलई खुल गई है ।
नए बने रोटरी क्लब पानीपत क्लासिक के मामले में नियम-कानूनों की दुहाई देने वाले प्रमोद विज से लोगों का पूछना है कि रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के पालन होने की उन्हें यदि सचमुच कोई चिंता है, तो उन्हें बताना चाहिए की डिस्ट्रिक्ट में इससे पहले जब जब रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का उल्लंघन हुआ है, और अक्सर ही हुआ है - तब तब उन्होंने आवाज कभी उठाई क्या ? डेविड हिल्टन की जब तब होने वाली फजीहत से दुखी होने वाले लोगों का कहना है कि डेविड हिल्टन को पता नहीं क्यों यह बात समझ नहीं आ रही है कि उन्होंने अपने आप को जिस तरह से आँखों पर पट्टी बाँधे 'राजा' तथा उसकी कौरव सेना की कठपुतली बना लिया है, उसके कारण अपनी इज्जत को उन्होंने खुद ही गँवा लिया है - तथा इसी का नतीजा है कि कोई भी उन्हें जैसे चाहें वैसे 'धो' देता है; और डिस्ट्रिक्ट में कोई उनके साथ हमदर्दी तक नहीं दिखाता है । प्रमोद विज ने रोटरी क्लब पानीपत क्लासिक के मामले में जैसे उन्हें धोया हुआ है, और जैसे वह 'धुल' भी रहे हैं; और जिस धोने/धुलने को 'राजा' व उसके दुर्योधन/दुःशासन मजे ले ले कर देख रहे हैं - वह किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए बहुत ही शर्मनाक स्थिति है ।
डिस्ट्रिक्ट में बहुत से लोगों को हैरानी है कि डेविड हिल्टन आखिर किस मजबूरी या किस स्वार्थ में अपनी इस शर्मनाक स्थिति को स्वीकार किए चले जा रहे हैं ?

Friday, April 22, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 को वापस पटरी पर लाने की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर संजय खन्ना को सौंप कर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने वास्तव में संजय खन्ना की प्रशासनिक क्षमताओं व लीडरशिप क्वालिटी के प्रति अपने विश्वास का इज़हार किया है

नई दिल्ली । संजय खन्ना - डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना रोटरी की उपलब्धियों के संदर्भ में इस समय बल्ले बल्ले वाली स्थिति में आ गए हैं । यूँ वह हैं तो दिल्ली के एक डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर, लेकिन इस समय उनके नाम का डंका बज रहा है मेरठ/मुरादाबाद से लेकर अमेरिका के लॉस एंजिलिस के सैन डिएगो तक में । सैन डिएगो में 28 अप्रैल से 1 मई के बीच हो रही डिस्ट्रिक्ट 5280 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में संजय खन्ना को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के प्रतिनिधि के रूप में शामिल होना है । किसी डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के प्रतिनिधि के रूप में जाने का मौका यद्यपि कई पूर्व गवर्नर्स को मिलता रहता है, लेकिन संजय खन्ना को मिला यह मौका उल्लेखनीय इसलिए है - क्योंकि डिस्ट्रिक्ट 5280 का रोटरी में बड़ा खास महत्त्व है । रोटरी के प्रमुख प्रोजेक्ट-कार्यक्रम हों या रोटरी की इंटरनेशनल स्तर की राजनीति हो, इस डिस्ट्रिक्ट की सभी में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और इस कारण से रोटरी पर 'राज करने' की इच्छा रखने वाले रोटरी नेता इस डिस्ट्रिक्ट में घुसने की और यहाँ अपने लिए 'जगह' बनाने की तिकड़मों में लगे रहते हैं । रोटरी का पुराना पाँचवा क्लब इसी डिस्ट्रिक्ट में है, और इस नाते से यह रोटरी के साथ शुरू से ही जुड़ा हुआ है । रोटरी के साथ अपनी इस ऐतिहासिक संलग्नता के कारण भी इसे रोटरी में विशेष पहचान और जगह मिली हुई है । ऐसे डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के प्रतिनिधि के रूप में शामिल होने के संजय खन्ना को मिले मौके को निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है ।
संजय खन्ना के लिए इससे भी बड़ी उपलब्धि की बात लेकिन उन्हें डिस्ट्रिक्ट 3100 का कार्यभार मिलना है । यह कार्यभार सौंप कर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने रोटरी के इतिहास में एक अनोखा अध्याय तो जोड़ा ही है, साथ ही संजय खन्ना को भी रोटरी के इतिहास में एक विलक्षण सम्मान से नवाजा है । रोटरी के 111 वर्षों के इतिहास में संभवतः यह पहला मौका होगा जब किसी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को किसी दूसरे डिस्ट्रिक्ट का - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वाला रूतबा दिया गया हो । संजय खन्ना ने पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3010 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभाला था, जिसके विभाजन के बाद वह डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर हैं - लेकिन अगले रोटरी वर्ष में वह डिस्ट्रिक्ट 3100 के निर्णायक कर्ताधर्ता - यानि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वाली हैसियत में होंगे । रोटरी इंटरनेशनल के संविधान में चूँकि किसी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को किसी दूसरे डिस्ट्रिक्ट का गवर्नर नियुक्त करने की 'व्यवस्था' नहीं है, इसलिए संजय खन्ना को डिस्ट्रिक्ट 3100 के रोटरी इंटरनेशनल के 'विशेष प्रतिनिधि' का नाम दिया गया है - जिसके तहत उनका काम डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स को उसी तरह से सपोर्ट करना होगा, जैसे एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर करता है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है - करीब ढाई महीने पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता को प्रशासनिक व आर्थिक गड़बड़ियों के आरोपों के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटा दिया गया था; और उनकी जगह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक बाबु को डिस्ट्रिक्ट का कार्यभार सौंपा गया था । दीपक बाबु लेकिन सुनील गुप्ता के भी 'गुरू' निकले । उनकी हरकतों को देख/जान कर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने समझ लिया कि डिस्ट्रिक्ट 3100 में हालात बहुत ही खराब हैं, जिन्हें ठीक करने के लिए 'एक बड़े ऑपरेशन' की जरूरत पड़ेगी । इस जरूरत को समझते हुए इंटरनेशनल बोर्ड ने अभी हाल में संपन्न हुई अपनी मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट 3100 को 'नॉन डिस्ट्रिक्टेड' स्टेटस में डाल दिया और डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स को सपोर्ट करने की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना को सौंप देने का फैसला किया है ।
संजय खन्ना को इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले  के जरिए जो जिम्मेदारी मिली है, वह रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के बीच उनकी प्रभावी पहचान और प्रतिष्ठा का सुबूत तो है ही - साथ ही उनकी प्रशासनिक क्षमताओं व लीडरशिप क्वालिटी के प्रति इंटरनेशनल पदाधिकारियों के विश्वास का इज़हार भी है ।
किंतु संजय खन्ना को डिस्ट्रिक्ट 3100 की जो जिम्मेदारी मिली है, वह उनके लिए बड़ी चुनौती भी है । दरअसल इंटरनेशनल बोर्ड ने अपनी मीटिंग में जो फैसले लिए हैं, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट में भारी बबाल पैदा हो गया है । डिस्ट्रिक्ट को 'नॉन डिस्ट्रिक्टेड' स्टेटस तो मिला ही है, साथ ही पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर अगले पाँच वर्ष तक, यानि वर्ष 2021 तक रोटरी इंटरनेशनल व रोटरी फाउंडेशन में नियुक्तियाँ पाने पर रोक लगा दी गई है । तीन वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स - बृज भूषण, वागीश स्वरूप अग्रवाल व एमएस जैन को डिस्ट्रिक्ट में प्रशासनिक व वित्तीय गड़बड़ियों में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के इस फैसले पर डिस्ट्रिक्ट के उन लोगों व पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच भारी रोष है, जो किसी भी गड़बड़ी में किसी भी स्तर पर शामिल नहीं रहे हैं और जिन पर कोई आरोप नहीं रहा है । उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पदाधिकारियों की करतूतों के लिए आखिरकार उन्हें भी सजा क्यों दी जा रही है - और उन्हें भी अपराधी की तरह क्यों ट्रीट किया जा रहा है ? डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट की बदहाली के लिए कुछ ही लोग जिम्मेदार हैं, जिन्हें सभी लोग पहचानते हैं और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन द्वारा जांच-पड़ताल के लिए भेजी गई टीम ने भी जिन्हें पहचान लिया - इसके बाद भी सजा सभी को दे दी गई है । इस बात को लेकर डिस्ट्रिक्ट के आम व खास लोगों में इस समय इंटरनेशनल पदाधिकारियों के प्रति खासी नाराजगी और विरोध का भाव है ।
मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट की बदहाली के लिए जिम्मेदार माने/बताए गए 'खास लोग', लोगों की इस नाराजगी का फायदा उठाने के लिए सक्रिय हो गए हैं । इस काम में दीपक बाबु के नजदीकी व समर्थक सबसे ज्यादा सक्रिय हैं । दरअसल इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले से सबसे बड़ा कुठाराघात दीपक बाबु और उनके नजदीकियों पर ही हुआ है । उल्लेखनीय है कि सुनील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटा कर जब दीपक बाबु को डिस्ट्रिक्ट का कार्यभार सौंपा गया था, तब दीपक बाबु और उनके नजदीकी ऐसे खुश हुए थे - जैसे उन्हें कोई गड़ा हुआ खजाना मिल गया हो । खुशी में वह ऐसे पागल हो गए थे कि ऊँचे-ऊँचे सपने देखने लगे थे और बहकी बहकी बातें करने लगे थे - अगले वर्षों में कौन कौन लोग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनेंगे, वह इसकी सूची बनाने लगे थे और उन लोगों के साथ सौदेबाजी करने लगे थे; दीपक बाबु के दो वर्षों के लिए गवर्नर 'बनने' को वह दीपक बाबु के विरोधियों पर तमाचे बताने लगे थे । पर अब जब तमाचा उन्हीं पर पड़ गया है तो वह बुरी तरह बौखला गए हैं । पहले खुशी में पगलाने पर और अब बौखलाने पर वह इस सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं कि दीपक बाबु को संभलने/सुधरने के चार चार मौके मिले थे, किंतु उन्होंने तो डिस्ट्रिक्ट को जैसे अपनी निजी जागीर समझ लिया था और मनमानी करने में इस हद तक जुटे कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के फैसलों तक की अनदेखी करने लगे । अपनी मनमानी कारस्तानियों पर पर्दा डालने की गरज से ही दीपक बाबु के समर्थकों व नजदीकियों ने डिस्ट्रिक्ट को 'नॉन डिस्ट्रिक्टेड' स्टेटस देने के रोटरी इंटरनेशनल के फैसले के खिलाफ शोर मचाया हुआ है । उन्हें लगता है कि इस मामले में उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों का समर्थन मिल जायेगा और वह इंटरनेशनल पदाधिकारियों पर फैसले को पलटने के लिए दबाव बना लेंगे ।
संजय खन्ना के लिए चुनौती की बात यह है कि उन्हें ऐसे माहौल में डिस्ट्रिक्ट 3100 में रोटरी इंटरनेशनल के 'विशेष प्रतिनिधि' की जिम्मेदारी निभानी है । संजय खन्ना को हालाँकि परस्पर विपरीत स्थितियों में काम करने का अच्छा अनुभव है - डिस्ट्रिक्ट 3010 में उम्मीदवार के रूप में उन्होंने सत्ताधारी गवर्नर्स खेमे की लंपटई का मुकाबला करते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीता था; और फिर गवर्नर के रूप में अपने विरोधियों को भी साथ लेकर काम किया था; यानि उन्हें विरोधियों से निपटना भी आता है और उन्हें साथ लेकर काम करने की तरकीब भी उन्हें पता है । संभवतः संजय खन्ना के इसी हुनर को देखते हुए रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में उन्हें डिस्ट्रिक्ट 3100 की जिम्मेदारी सौंपी है । सैन डिएगो में 28 अप्रैल से 1 मई के बीच हो रही डिस्ट्रिक्ट 5280 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के प्रतिनिधि की भूमिका निभा कर लौटने के बाद संजय खन्ना को मेरठ/मुरादाबाद में डिस्ट्रिक्ट 3100 को वापस पटरी पर लाने में जुटना है । संजय खन्ना का राजनीतिक व प्रशासनिक हुनर है, रोटरी इंटरनेशनल पदाधिकारियों का उन पर भरोसा है और डिस्ट्रिक्ट 3100 में लोगों का बबाल है - ऐसे में यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि आगे क्या होगा ?

Wednesday, April 20, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में दीपक बाबु की मनमानी, स्वार्थपूर्ण व धंधेबाजी से प्रेरित कारस्तानियाँ उनके साथ साथ अंततः डिस्ट्रिक्ट को भी ले डूबीं

मुरादाबाद । डिस्ट्रिक्ट 3100 के लिए कब्र खोदने का काम करने में सुनील गुप्ता को तो आठ महीने का समय लगा था, लेकिन दीपक बाबु ने डिस्ट्रिक्ट को कब्र में दफनाने का काम दो ढाई महीने में ही पूरा कर दिया है । सुनील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद से हटा कर जब दीपक बाबु को डिस्ट्रिक्ट का कार्यभार सौंपा था, तब दीपक बाबु और उनके संगी-साथियों ने इस बात पर जोरशोर से अहंकारभरी खुशी मनाई थी कि दीपक बाबु को तो दो वर्षों के लिए गवर्नरी करने का मौका मिल गया है - उस समय सचमुच कोई नहीं जानता था कि दो वर्षों के लिए मिले मौके को दीपक बाबु अपनी कारस्तानियों से दो महीने में ही खो देंगे । रोटरी के 111 वर्षों के इतिहास में दीपक बाबु संभवतः पहले और अकेले 'गवर्नर' हैं, जिन्हें गवर्नर का पदभार सँभालने से पहले ही गवर्नर पद के कामकाज करने से रोक दिया गया है । दीपक बाबु तो डिस्ट्रिक्ट असेम्बली करने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन उसके पाँच दिन पहले दिल्ली स्थित रोटरी इंटरनेशनल के साउथ एशिया ऑफिस में बुला कर उन्हें बता दिया गया कि वह यह असेम्बली न करें । इसके साथ ही उन्हें यह भी बता दिया गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में वह और कोई काम भी न करें । दीपक बाबु ने अपने नजदीकियों को यह भी बताया है कि अनौपचारिक रूप से उन्हें यह भी बता दिया गया है कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने डिस्ट्रिक्ट 3100 को बंद करने का फैसला कर लिया है, जिसके बारे में औपचारिक घोषणा जल्दी ही कर दी जाएगी ।
दीपक बाबु और उनके नजदीकियों ने इस स्थिति के लिए डिस्ट्रिक्ट के उन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को जिम्मेदार बताया/ठहराया है, जो रोटरी इंटरनेशनल में लगातार शिकायतें करते रहे हैं । उनका कहना है कि लगातार की जाने वाली शिकायतों के कारण रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के बीच डिस्ट्रिक्ट की पहचान और छवि खराब हुई, जिसकी परिणति यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट बंद होने के कगार पर आ पहुँचा है । बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बात किसी हद तक सच हो सकती है - किंतु पिछले दिनों के घटनाक्रम को देखें तो यह साफ समझ में आ जाता है कि यह दीपक बाबु हैं, जिनकी हरकतें डिस्ट्रिक्ट को इस कगार पर ले आईं हैं । यह बात ध्यान रखने की है कि करीब ढाई महीने पहले रोटरी इंटरनेशनल ने जब सुनील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद से हटा कर दीपक बाबु को गवर्नर पद का कार्यभार सौंपा था, तब तमाम शिकायतों तथा शिकायतों के कारण डिस्ट्रिक्ट की खराब हुई पहचान व छवि के बावजूद रोटरी इंटरनेशनल ने डिस्ट्रिक्ट को बंद करने का फैसला नहीं सुनाया था । शिकायतें और शिकायतों के कारण डिस्ट्रिक्ट की खराब हुई पहचान व छवि डिस्ट्रिक्ट के बंद होने का कारण होतीं - तो रोटरी इंटरनेशनल सुनील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटाने का फैसला करने के साथ ही डिस्ट्रिक्ट को बंद करने का भी फैसला कर लेता । रोटरी इंटरनेशनल ने उस समय यह फैसला नहीं किया था । उसने उम्मीद की थी कि सुनील गुप्ता जिस डिस्ट्रिक्ट को सँभाल नहीं पा रहे हैं, उस डिस्ट्रिक्ट को दीपक बाबु सँभाल लेंगे । लेकिन दीपक बाबु तो सुनील गुप्ता के भी 'गुरू' निकले । सुनील गुप्ता ने अपनी कारस्तानियों से सिर्फ अपने को डुबोया था, लेकिन दीपक बाबु की कारस्तानियाँ ऐसी रहीं कि वह खुद तो डूबे ही - साथ ही डिस्ट्रिक्ट को भी ले डूबे ।
दीपक बाबु दरअसल उस 'संदेश' को पढ़ने में पूरी तरह विफल रहे, जो रोटरी इंटरनेशनल ने सुनील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटा कर दिया था । यह एक बहुत ही कठोर फैसला था । रोटरी के इतिहास में शायद ही कभी इस तरह से किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को उसके पद से हटाया गया हो । जाहिर तौर पर इस फैसले का साफ संदेश था कि डिस्ट्रिक्ट 3100 की घटनाओं को रोटरी इंटरनेशनल गंभीरता से ले रहा है, तमाम घटनाओं के लिए वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को जिम्मेदार मान रहा है और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की हरकतों को वह अनदेखा करने के लिए तैयार नहीं है । दीपक बाबु को इस 'संदेश' को पढ़ना/समझना चाहिए था और जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए था - किंतु वह सुनील गुप्ता की ही तरह 'धंधेबाजी' पर उतर आए । बिडंवना की बात यह रही कि रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने जब देखा/पाया कि दीपक बाबु रोटरी इंटरनेशनल के दिए 'संदेश' को नहीं समझ रहे हैं, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव तथा डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की आड़ में राजनीति करने तथा पैसे 'बनाने' की जुगाड़ में लगे हैं - तो उन्होंने दीपक बाबु के 'कान भी उमेठे' थे; किंतु दीपक बाबु ने उससे भी कोई सबक नहीं लिया । उल्लेखनीय है कि सुनील गुप्ता की जगह डिस्ट्रिक्ट का कार्यभार मिलते ही दीपक बाबु ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव तथा डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की आड़ में जो खेल शुरू किया, उसे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने यह हिदायत देते हुए रोक दिया कि वह डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस नहीं करेंगे, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय करवायेगा । इन हिदायतों से दीपक बाबु को समझ लेना चाहिए था कि केआर रवींद्रन की निगाह उनकी हरकतों पर है, और वह उन्हें मनमानी नहीं करने देंगे । दीपक बाबु की समझ पर लेकिन लगता है कि पत्थर पड़ गए थे, और उन्होंने अपने आप को सुनील गुप्ता का 'गुरू' साबित करने की ठान ही ली थी ।
सुनील गुप्ता की तर्ज पर ही दीपक बाबु ने अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स को, उनकी सलाह को और कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के फैसले को ठेंगा दिखाने का रवैया अपनाया और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित करने की हद तक जा पहुँचे । इसी का नतीजा था कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट में घटने वाली घटनाओं के कारण डिस्ट्रिक्ट की होने वाली बदनामी का संज्ञान लेते हुए उनसे बचने के लिए जो कुछेक महत्वपूर्ण फैसले किए गए, दीपक बाबु ने उन्हें क्रियान्वित करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव कराने की जिम्मेदारी उनसे भले ही छीन ली गई थी, लेकिन उसके बावजूद उस चुनाव की आड़ में 'धंधा' करने का जुगाड़ बनाने का प्रयास दीपक बाबु ने फिर भी नहीं छोड़ा था । दीपक बाबु के इस रवैये पर डिस्ट्रिक्ट में जो तीखी प्रतिक्रिया हुई, उसके बाद सच्चाई की जाँच करने के लिए केआर रवींद्रन ने दो सदस्यीय टीम डिस्ट्रिक्ट भेजी । इस टीम के आने को दीपक बाबु एक खतरे के रूप में देखते/पहचानते तथा डिस्ट्रिक्ट के लोगों को विश्वास में लेकर इस टीम के सामने एक संगठित व सकारात्मक तस्वीर पेश करते तो आज नजारा कुछ और होता; किंतु दीपक बाबु ने इस मौके को अपनी टुच्ची व स्वार्थी राजनीति को सफल बनाने के मौके के रूप में इस्तेमाल किया - लेकिन उनकी चाल उन्हें ही उल्टी पड़ गई । उक्त टीम के सदस्यों ने दीपक बाबु सहित कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा कई अन्य रोटेरियंस से डिस्ट्रिक्ट का हाल-चाल लिया । इस जाँच में जो तथ्य सामने आए, उसने दीपक बाबु का असली चेहरा सामने ला दिया - जिसके बाद रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के सामने उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा ।
जाहिर है कि दीपक बाबु को बार बार चेतावनी 'मिली' - जिन्हें पहचान/समझ कर वह संभलने का प्रयास कर सकते थे; और अपने साथ साथ डिस्ट्रिक्ट को भी बचा सकते थे । किंतु अपने मनमाने व स्वार्थपूर्ण फैसलों तथा अहंकारभरे रवैये के चलते दीपक बाबु ने उन मौकों का कोई सदुपयोग नहीं किया - जो उन्हें बार बार मिलते रहे । दीपक बाबु की कारस्तानियाँ उन्हें तो ले ही डूबी हैं, साथ ही डिस्ट्रिक्ट को भी ले डूबी हैं ।

Monday, April 18, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में मंडी गोविंदगढ़ की मीटिंग में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रति जाहिर हुए जोरदार समर्थन को देखते हुए बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों को अपनी हार साफ साफ नजर आने लगी है

मंडी गोविंदगढ़ । गोपाल कृष्ण शर्मा की रीजन कॉन्फ्रेंस में लायन सदस्यों व पदाधिकारियों की जुटी भीड़ तथा उस भीड़ में थर्ड फ्रंट के जाने-पहचाने नेताओं की सक्रिय उपस्थिति के बीच पवन आहुजा की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के प्रति जिस तरह का समर्थन घोषित किया गया, उसे देख/सुन कर बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थकों को तगड़ा झटका लगा है तथा उनके बीच गहरी निराशा फैल गई है । बिरिंदर सिंह सोहल के कुछेक समर्थकों ने तो कहना भी शुरू कर दिया है कि 'यमन 2016' के नाम से आयोजित हुई गोपाल कृष्ण शर्मा की रीजन कॉन्फ्रेंस में शामिल लायन सदस्यों ने पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रति जिस जोश के साथ समर्थन व्यक्त किया, उसे देखने के बाद बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी के लिए कोई संभावना बची नहीं रह जाती है । बिरिंदर सिंह सोहल के कुछेक समर्थकों ने तो यह कहना भी शुरू कर दिया है कि अच्छा होगा कि बिरिंदर सिंह सोहल हार का सामना करने की बजाए प्रतिद्धंद्धी खेमे नेताओं के साथ समझौता कर अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लें, और अगले वर्ष के लिए मौका बनाएँ/बचाएँ । उनके कुछेक शुभचिंतकों ने तो इस बाबत संभावनाएँ टटोलना/देखना शुरू भी कर दिया है । खास बात यह रही कि बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थक नेताओं ने गोपाल कृष्ण शर्मा की रीजन कॉन्फ्रेंस को फेल करने की हर संभव कोशिश की थी; उन्होंने गोपाल कृष्ण शर्मा को पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रमुख समर्थक नेता हरीश दुआ का 'आदमी' बताते हुए प्रचारित किया था कि यह रीजन कॉन्फ्रेंस तो पवन आहुजा की चुनावी सभा के रूप में आयोजित हो रही है, और इसलिए लोगों को इसमें शामिल होने की जरूरत नहीं है । बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थक नेताओं के तमाम विरोधी व नकारात्मक प्रचार के बावजूद गोपाल कृष्ण शर्मा की रीजन कॉन्फ्रेंस में लोग बड़ी संख्या में न केवल शामिल हुए, बल्कि उन्होंने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रति अपना समर्थन भी खुल कर व्यक्त किया ।
मंडी गोविंदगढ़ में हुई रीजन कॉन्फ्रेंस ने बिरिंदर सिंह सोहल के लिए खतरे की घंटी सिर्फ इस कारण से ही नहीं बजाई है, कि उसमें 400 से ज्यादा लायन सदस्य व पदाधिकारी शामिल हुए और उन्होंने पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रति खुल कर समर्थन व्यक्त किया - बिरिंदर सिंह सोहल के लिए दरअसल इससे भी बड़े झटके की बात यह रही कि पवन आहुजा की उम्मीदवारी का समर्थन करने वाली भीड़ में थर्ड फ्रंट के नेताओं के रूप में पहचाने जाने वाले रजनीश ग्रोवर, राजीव अरोड़ा, सतपाल गुम्बर, एसएस गगनेजा, रवींद्र सग्गर, सुरजीत सिंह गुलयानी व अन्य कई नेताओं की सक्रिय भूमिका थी । उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मुक्तसर में बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग में गिद्दरबहा, अबोहर, फाजिल्का, जलालाबाद, फिरोजपुर, फरीदकोट, कोटकापुर, बरगरी, खरा, मुक्तसर आदि जगहों से आए व शामिल हुए लायन सदस्यों का हवाला देते हुए बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने थर्ड फ्रंट खेमे वाले क्लब्स के समर्थन का दावा किया था । हालाँकि उनके लिए इस बात का जबाव देना मुश्किल बना हुआ था कि थर्ड फ्रंट के नेताओं के रूप में पहचाने जाने वाले वरिष्ठ लायंस उक्त मीटिंग में क्यों नहीं आए थे ? बिरिंदर सिंह सोहल के समर्थक नेताओं ने इस सवाल को हमेशा ही यह कह कर टाला कि जब लोग उनके साथ आ गए हैं तो लोगों के नेता कहाँ जायेंगे, वह भी उनके साथ आने को मजबूर होंगे । इस तरह की स्थितियों व बातों के बीच डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों की निगाह थर्ड फ्रंट के नेताओं के रूप में पहचाने जाने वाले वरिष्ठ लायन सदस्यों पर थी, और हर किसी के सामने यह सवाल था कि वह किसके समर्थन में खड़े होते हैं ? मंडी गोविंदगढ़ में पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रति खासे जोश-खरोश के साथ समर्थन व्यक्त करती लायन सदस्यों व पदाधिकारियों की भीड़ के बीच थर्ड फ्रंट के नेताओं की सक्रिय मौजूदगी ने उक्त सवाल का साफ जबाव दे दिया है - और उनके इस जबाव ने बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की सारी उम्मीदों को ध्वस्त कर दिया है तथा चुनाव में उन्हें अपना तम्बू उड़ता/उखड़ता हुआ दिखने लगा है ।
बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग से खुद को दूर रखने तथा पवन आहुजा की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग में शामिल होकर थर्ड फ्रंट के नेताओं ने अपने समर्थन का जो 'ऐलान' किया है, उस तक पहुँचने में उन्हें हालाँकि खासी जद्दोजहद करना पड़ी । उल्लेखनीय है कि थर्ड फ्रंट का गठन डिस्ट्रिक्ट के विभाजन का विरोध करने के उद्देश्य से हुआ है - इसके नेताओं के सामने दुविधा व चुनौती इस तथ्य के कारण थी कि डिस्ट्रिक्ट के विभाजन का समर्थन करने वाले नेता दोनों तरफ थे : पवन आहुजा की उम्मीदवारी के एक बड़े समर्थक नेता प्रीत कँवल सिंह डिस्ट्रिक्ट के विभाजन के समर्थक रहे हैं, तो बिरिंदर सिंह सोहल के गॉड फादर एचजेएस खेड़ा डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की जोरशोर से वकालत करते रहे हैं । ऐसे में थर्ड फ्रंट के नेताओं के लिए यह फैसला करना वास्तव में मुश्किल था कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में वह किसका समर्थन करें ? थर्ड फ्रंट के नेताओं की मुश्किल को समझते हुए पवन आहुजा के समर्थक नेताओं ने लचीला रुख अपनाया और उनकी तरफ से थर्ड फ्रंट के नेताओं को भरोसा दिया गया कि डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर वह मनमानी नहीं करेंगे तथा सभी को साथ लेकर सर्वमान्य तरीके से फैसला किया जायेगा । दूसरी तरफ एचजेएस खेड़ा का रवैया लेकिन अपनी मनमानी व दादागिरी चलाने वाला रहा । दरअसल उनकी रणनीति का आधार यह समझ रही कि थर्ड फ्रंट खेमे में जो क्लब आते हैं, उनके वोटों की संख्या चूँकि कुल वोटों का चौथा हिस्सा भी नहीं है - इसलिए उनकी परवाह करने की जरूरत नहीं है । एचजेएस खेड़ा का मानना और कहना रहा कि थर्ड फ्रंट खेमे के जो वोट हैं, उनमें के सिख वोट तो हर हालत में बिरिंदर सिंह सोहल को मिलेंगे ही - इसलिए थर्ड फ्रंट के नेताओं की खुशामद करने की कोई जरूरत नहीं है । एचजेएस खेड़ा के इस रवैये के चलते थर्ड फ्रंट के नेताओं के लिए पवन आहुजा की उम्मीदवारी के समर्थन में जाने का फैसला करना आसान  हो गया - उनकी आसानी ने लेकिन बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट पैदा कर दिया है ।
मजे की बात यह है कि बिरिंदर सिंह सोहल के जो समर्थक कुछ समय पहले तक एचजेएस खेड़ा के रवैये की तारीफ करते सुने जाते थे, वही अब एचजेएस खेड़ा को कोसते हुए सुने जा रहे हैं - उनका कहना है कि एचजेएस खेड़ा की रणनीति किताबी रूप में और सैद्धांतिक रूप में भले ही ठीक लगती हो, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर उसने बिरिंदर सिंह सोहल की उम्मीदवारी का कबाड़ा ही किया है । उनका कहना है कि मंडी गोविंदगढ़ की मीटिंग में पवन आहुजा की उम्मीदवारी के प्रति जिस तरह का समर्थन देखने को मिला है, उससे जाहिर हो गया है कि बिरिंदर सिंह सोहल सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी दौड़ से बाहर हो गए हैं - और अब उनकी उम्मीदवारी के लिए कोई उम्मीद बची नहीं रह गई है ।

Sunday, April 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में प्रेम माहेश्वरी की अध्यक्षता में बने नए क्लब की संभावित गतिविधियों व सक्रियताओं की चुनौती के सामने रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारी फिलहाल प्रेसीडेंट इलेक्ट चुनने के झगड़े में उलझे

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली में निलंबन रद्द होने के तुरंत बाद ही प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर क्लब के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के बीच जो घमासान मचा है, उसने उन लोगों को बड़ा निराश किया है - जिन्हें उम्मीद थी कि क्लब के प्रमुख लोगों ने अपनी कारस्तानियों के चलते मिली बदनामियों और मुसीबतों के हाल ही के अपने अनुभव से सबक सीखा होगा और अब वह अपनी स्वार्थी व घटिया सोच को छोड़ कर गंभीरता व मैच्योरिटी का व्यवहार करेंगे । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली अपने पदाधिकारियों के आपसी झगड़ों तथा रोटरी विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण पिछले कुछेक महीनों से निलंबित था । क्लब के पदाधिकारियों तथा उनके नजदीकी सदस्यों ने क्लब के ही दूसरे सदस्यों को अपनी लंपटता व लफंगई का शिकार नहीं बनाया, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व रोटरी के अन्य बड़े पदाधिकारियों - और रोटरी के कार्यक्रमों के खिलाफ भी अशालीन व अभद्र व्यवहार प्रदर्शित किया । उनकी हरकतों पर जब चारों तरफ से बदनामी व थू थू के दाग पड़े और गहरे होने लगे - तो क्लब के पदाधिकारियों को कुछ अक्ल आई, और तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व अन्य पदाधिकारियों से उन्होंने माफी माँगना शुरू किया । माफी व खुशामद का सहारा लेकर उन्होंने अपने क्लब का निलंबन वापस करवा लिया - उनके लिए इससे भी बड़ी राहत की बात यह रही कि जिन प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के साथ वह अपना झगड़ा बता रहे थे, उन्होंने अपना एक अलग क्लब बना लिया । इससे हर किसी को उम्मीद बनी कि रोटरी क्लब वैशाली का झमेला समाप्त हो गया है, तथा यह क्लब भी अब दूसरे क्लब्स की तरह चलेगा ।
किंतु निलंबन से बाहर आए रोटरी क्लब वैशाली में अब एक नया झगड़ा सुना जा रहा है - जो प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर है । उल्लेखनीय है कि इस पद पर नरेन सेमवाल थे, जिन्होंने लेकिन पेट्स से पहले इस्तीफा दे दिया था । क्लब का निलंबन खत्म हो जाने के बाद किंतु जो फिर से प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाए जाने की माँग करने लगे हैं - क्लब के दूसरे लोग इसके लिए लेकिन राजी नहीं हैं । उनका कहना है कि मुश्किल समय में नरेन सेमवाल जिस तरह क्लब के लोगों को अँधेरे में रख कर अपनी जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए, उसे देखते हुए वह अब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने लायक नहीं रह गए हैं - और इसलिए उन्हें दोबारा से प्रेसीडेंट इलेक्ट नहीं बनाया जा सकता है । नरेन सेमवाल का कहना है कि क्लब जब निलंबित था और उसके निलंबन के वापस होने की कोई संभावना नहीं दिख रही थी, तब ऐसे क्लब के प्रेसीडेंट इलेक्ट के रूप में उन्हें फजीहत व अपमान महसूस हो रहा था - जिससे मुक्त होने के लिए उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ देना जरूरी लगा । क्लब के दूसरे प्रमुख लोगों का कहना लेकिन यह है कि क्लब में सलाह किए बिना मनमाने तरीके से नरेन सेमवाल ने जिस तरह प्रेसीडेंट इलेक्ट पद छोड़ा, वह क्लब के साथ धोखा करने जैसा मामला है - और इसे देखते हुए उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता है । मनोज भदोला की अगले रोटरी वर्ष में भी अध्यक्ष बनने की इच्छा और कोशिश को जान/देख कर क्लब के सदस्यों में अलग बेचैनी है । मनोज भदोला ने कुछेक सदस्यों से कहा है कि यह वर्ष तो झगड़े/झंझटों में ही निकल गया, और उन्हें अध्यक्ष के रूप में कुछ करने का मौका ही नहीं मिला - इसलिए वह चाहते हैं कि अगले वर्ष भी वह अध्यक्ष बनें और अध्यक्ष के रूप में कुछ अच्छे काम करके दिखाएँ, जिससे कि उन लोगों के मुँह बंद किए जा सकें जो कह रहे हैं कि अध्यक्ष के रूप में काम कर पाना मनोज भदोला के बस में है ही नहीं । मनोज भदोला की यह इच्छा और कोशिश जान/सुन कर क्लब के लोगों में घबराहट फैल गई है : उन्हें चिंता हुई है कि मनोज भदोला यदि सचमुच दोबारा अध्यक्ष बन गए तो क्लब की इज्जत बचने की जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची हुई है भी, वह भी धूल में मिल जाएगी । क्लब में अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि इस वर्ष क्लब में जो झमेला हुआ, वह अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला की अकर्मयता व नाकामी का जीता-जागता सुबूत है; इसलिए उन्हें अध्यक्ष में रूप में एक वर्ष और देना क्लब को जानबूझ कर बर्बादी की तरफ धकेलने जैसा काम होगा ।
क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों की समस्या यह है कि क्लब पर कब्जा जमाए लोगों की हरकतों से चूँकि सभी परिचित हैं, इसलिए कोई भी प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं है । हर किसी को डर दरअसल यह है कि क्लब को अपनी जागीर समझे बैठे कर्णधार अपनी अपनी मनमानी चलायेंगे और किसी को ठीक से काम ही नहीं करने देंगे - इसलिए आफत में क्यों पड़ना ? क्लब के कर्णधार 'बने' लोगों के बीच चूँकि आपस में भी विश्वास का भारी संकट है, और वह एक दूसरे की खिंचाई करने के चक्कर में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनमें से भी कोई प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने को तैयार नहीं हो रहा है । क्लब में मजेदार स्थिति यह बनी है कि नरेन सेमवाल और मनोज भदोला प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने की तिकड़में लगा रहे हैं, लेकिन उनके ही संगी-साथी उन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनाने के लिए राजी नहीं हैं - दूसरी तरफ जिन्हें प्रेसीडेंट इलेक्ट बनने के लिए कहा जा रहा है, वह बनने से बचने की कोशिश कर रहे हैं ।
अपने आप को रोटरी क्लब वैशाली का कर्णधार समझ रहे लोगों के सामने वास्तव में प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी द्वारा बनाया गया नया क्लब भी एक गंभीर चुनौती है । डर यह है कि नए क्लब के कामकाज के सामने यदि रोटरी क्लब वैशाली के कामकाज टिक नहीं सके, तो डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच भारी बदनामी होगी । यह डर दरअसल इसलिए है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई जानता है कि प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के अध्यक्ष-काल में जो काम हुए, उनसे ही रोटरी क्लब वैशाली को डिस्ट्रिक्ट में खास ऊँचाई और प्रतिष्ठा मिली थी - जो बाद के वर्षों में क्रमशः घटती गई है । उम्मीद की जा रही है कि उन्हीं प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा की मदद से नया क्लब प्रेम माहेश्वरी के अध्यक्ष-काल में कामकाज के जरिए और नए रिकॉर्ड बनायेगा । ऐसे में, रोटरी क्लब वैशाली के कर्णधारों के सामने चुनौती है कि वह भी अपनी गतिविधियों व अपनी सक्रियताओं को इस तरह से आयोजित करें ताकि प्रसून चौधरी, विकास चोपड़ा व प्रेम माहेश्वरी के नए क्लब से पीछे न दिखें । नया क्लब जिस गुपचुप तरीके से बना - रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरिटेज ने नए क्लब को स्पॉन्सर किया और वरिष्ठ रोटेरियन रवींद्र सिंह उसके जीएसआर बने; उससे साबित है कि डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के लोगों का समर्थन भी नए क्लब के साथ है । ऐसे में रोटरी क्लब वैशाली के पदाधिकारियों की चुनौती व जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है । किंतु वहाँ प्रेसीडेंट इलेक्ट पद को लेकर जो घमासान मचा हुआ है, उसे देखते/सुनते हुए वहाँ के हालात सुधरने की उम्मीद लगाए लोगों को झटका लगा है ।