Tuesday, December 8, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी बॉल की तैयारियों की ढीलमढाल के लिए विनय भाटिया और उनके नजदीकियों ने जिस तरह से नवदीप चावला को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया है, उसे देख/सुन कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला को बॉल कार्यक्रम पिटता हुआ नजर आ रहा है

फरीदाबाद । फरीदाबाद के रोटेरियंस नेताओं के बीच तालमेल की कमी के चलते रोटरी फाउंडेशन के बॉल कार्यक्रम की तैयारियाँ ढीली पड़ी हुई हैं, जिसे देख/जान कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला यह सोच सोच कर पसीने पसीने हो रहे हैं कि बॉल कार्यक्रम सफल हो पायेगा या नहीं ? 20 दिसंबर को आयोजित होने वाले बॉल कार्यक्रम के आयोजन स्थल को लेकर ही असमंजस अब जाकर खत्म हुआ है । पहले यह आयोजन महरौली स्थित झंकार बैंक्वेट में आयोजित होने की बात हो रही थी, लेकिन उसे लेकर कई तरह की शिकायतें/समस्याएँ थीं - लिहाजा फैसला नहीं हो पा रहा था । डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख पदाधिकारियों को बॉल आयोजन कमेटी के चेयरमैन नवदीप चावला तथा को-चेयरमैन विजय जिंदल का रवैया काम पूरा करने की बजाए, काम को लटकाए रखने वाला 'दिखा' है । सुधीर मंगला ने सख्ती दिखाई तो सुना गया है कि अब सूरजकुंड रोड पर स्थित होटल राजहंस को आयोजन-स्थल के रूप में फाइनल किया गया है । बॉल-आयोजन के लिए अभी तक स्पॉन्सरशिप आदि की भी कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है, जिसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला का मन अनिष्ट की आशंका में बड़ा घबराया घबराया सा हो रहा है । बॉल-आयोजन की तैयारियों की लेटलतीफी के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीम की तरफ से नवदीप चावला को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, तो नवदीप चावला इसके लिए फरीदाबाद के दूसरे रोटेरियंस नेताओं को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । नवदीप चावला का कहना है कि फरीदाबाद के रोटेरियंस नेताओं ने उन्हें चेयरमैन तो बना/बनवा दिया है, लेकिन अब उन्हें अकेला छोड़ दिया है और कोई भी उनकी मदद नहीं कर रहा है । फरीदाबाद के दूसरे रोटेरियंस नेताओं का कहना है कि नवदीप चावला चेयरमैन बने हैं, तो जो कुछ भी होना/करना है वह करने की पहल उन्हें ही करनी है और उन्हें ही दूसरों से मदद लेनी है । फरीदाबाद में कुछेक लोग यह कहते हुए भी सुने गए हैं कि नवदीप चावला को चेयरमैन बनने का शौक तो रहा, लेकिन यह समझने में उनसे चूक हो गई है कि चेयरमैन के रूप में उनकी कुछेक जिम्मेदारियाँ भी हैं - जिन्हें उन्हें निभाना है । 
बॉल की तैयारियों की लेटलतीफी को लेकर फरीदाबाद में नवदीप चावला तथा दूसरे रोटेरियंस नेताओं के बीच जो आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं, उनका ठीकरा विनय भाटिया के सिर फूट रहा है । दरअसल हर कोई विनय भाटिया को अपना गवाह बनाना चाहता है, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का उम्मीदवार होने के नाते विनय भाटिया इस पचड़े से दूर रहना चाहते हैं । किंतु चूँकि यह सारा झमेला हो उन्हीं के लिए रहा है, इसलिए ले दे कर बात उनके ही सिर आ जाती है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत विनय भाटिया की उम्मीदवारी के कारण ही फरीदाबाद के रोटेरियंस ने हर मामले में आगे से आगे रहने/दिखने का प्रयास किया है । प्रयास तो उन्होंने किया, लेकिन 'डिलीवरी' करने के मामले में हर प्रयास हमेशा ही फजीहत का शिकार हुआ । दरअसल फरीदाबाद के रोटेरियंस बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं, लेकिन सचमुच कुछ करने की बारी आती है तो ठन-ठन गोपाल साबित होते हैं । अभी पिछले दिनों ही दीवाली मेले में भी फरीदाबाद के रोटेरियंस अपने कमिटमेंट्स पूरे करने में विफल रहे । दीवाली मेले के टिकट लेने/बिकवाने को लेकर फरीदाबाद के रोटेरियंस ने पहले तो लंबे-चौड़े वायदे किए, लेकिन जब टिकटों का भुगतान करने का मौका आया तो मुँह छिपाते/बचते नजर आए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला फरीदाबाद के रोटेरियंस पर दीवाली मेले के करीब तीन लाख रुपए बकाया रहने का रोना रोते कई जगह सुने गए हैं । वास्तव में इसीलिए सुधीर मंगला को रोटरी बॉल का डर सता रहा है । उन्हें डर है कि फरीदाबाद के रोटेरियंस ने जिस तरह दीवाली मेले में उन्हें धोखा दिया है, वैसा धोखा कहीं रोटरी बॉल को लेकर भी तो नहीं देंगे ? यह डर उन्हें इसलिए भी है क्योंकि रोटरी बॉल की सारी जिम्मेदारी फरीदाबाद के रोटेरियंस ने ली तो हुई है, लेकिन वह कुछ करते हुए दिख नहीं रहे हैं; और कुछ न हो पाने के लिए एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराने में लगे हुए हैं । 
इस सारे झमेले में मुसीबत लेकिन विनय भाटिया की हो रही है । दरअसल हर कोई अपनी समस्या हल करने/करवाने के लिए विनय भाटिया को पकड़ता । हर कोई यही मानता है कि फरीदाबाद के रोटेरियंस ने जो जिम्मेदारी ली है, वह चूँकि विनय भाटिया की उम्मीदवारी को मजबूती देने/दिलाने के लिए ली है - इसलिए हर समस्या को हल करवाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है । विनय भाटिया लेकिन हर जिम्मेदारी से बचते हुए नजर आए - उन्होंने समझा तो यह कि बचने की कोशिश करके वह सचमुच बच जायेंगे, किंतु हुआ उल्टा और बचने की कोशिश में वह फँसते ज्यादा जा रहे हैं । विनय भाटिया के रवैये से फरीदाबाद के रोटेरियंस विनय भाटिया की उम्मीदवारी को बोझ समझने लगे हैं । वहाँ लोगों को लगने लगा है कि विनय भाटिया डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बनना चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदारी कुछ लेना नहीं चाहते हैं; जिम्मेदारियों का टोकरा वह दूसरों के सिर टिका देने की जुगाड़ में लगे रहते हैं । शुरू में तो फरीदाबाद के रोटेरियंस विनय भाटिया तथा उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठाए नेताओं की बातों में आ गए और खासे उत्साह के साथ उन्होंने अपनी अपनी जेबें ढीली कीं; लेकिन जल्दी ही लोगों को समझ में आ गया कि विनय भाटिया और उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठाए रखने वाले नेताओं ने उन्हें 'शिकारपुर का' समझ लिया है । इसके बाद से फरीदाबाद के लोगों ने उनके झाँसे में फँसने से बचना शुरू कर दिया है । फरीदाबाद के रोटेरियंस के इस बचने की कार्रवाई के कारण ही विनय भाटिया और उनके समर्थक दीवाली मेले के कमिटमेंट को पूरा करने में असफल रहे हैं - और इसी आधार पर बॉल का कार्यक्रम भी पिटता हुआ नजर आ रहा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला के समस्या यह आ खड़ी हुई है कि वह विनय भाटिया और उनके समर्थकों से दीवाली मेले का बकाया बसूल करें, और या बॉल को सफल करवाने की उम्मीद करें ? बॉल की तैयारियों की ढीलमढाल को लेकर विनय भाटिया और उनके नजदीकी जिस तरह नवदीप चावला को जिम्मेदार ठहराने लगे हैं, उसके कारण मामला और भी गंभीर हो गया है । 

Monday, December 7, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के सानिध्य में होने वाली इंटरसिटी राजा साबू की शह पर डिस्ट्रिक्ट के कुछेक बड़े नेताओं के लिए कमाई का जरिया बनी है क्या ?

चंडीगढ़ । रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के साथ 'मीट द प्रेसीडेंट' इंटरसिटी, रजिस्ट्रेशन चार्ज को लेकर गंभीर विवाद में फँस गई है । चंडीगढ़ ज्यूडिशियल एकेडमी में हाई टी के साथ 10 दिसंबर को होने वाली इस इंटरसिटी में भाग लेने वाले लोगों के लिए 600 रुपए का रजिस्ट्रेशन चार्ज रखा गया है, जो कई लोगों को बहुत ज्यादा लग रहा है । आपत्ति करने वाले लोगों का कहना है कि इंटरसिटी का आयोजन किसी स्टार होटल में हो रहा होता, तब तो 600 रुपए लेना समझ में आता, लेकिन चंडीगढ़ ज्यूडिशियल एकेडमी में तो चूँकि काफी कम पैसों में चाय-पानी हो जाता है - इसलिए यहाँ होने वाले कार्यक्रम के लिए इतने पैसे क्यों लिए जा रहे हैं ? कुछेक लोगों का यह भी कहना/पूछना है कि इंटरसिटी के आयोजन की जिम्मेदारी सँभालने वाले रोटरी क्लब चंडीगढ़ मिडटाउन के वरिष्ठ सदस्य बलराम गुप्ता चंडीगढ़ ज्यूडिशियल एकेडमी से जुड़े हुए हैं, इसलिए उम्मीद की जाती है कि यह और भी रियायती दरों पर उपलब्ध हो गया होगा - तब भी इंटरसिटी में भाग लेने वाले लोगों से ज्यादा पैसे क्यों लिए जा रहे हैं ? इंटरसिटी के आयोजन से जुड़े लोग लेकिन इस तरह की शिकायतों व आपत्तियों पर ध्यान देने और/या इनका जबाव देने की कोशिश करते नहीं देखे जा रहे हैं । अनौपचारिक बातचीत में उनका कहना है कि इस तरह की शिकायतें व आपत्तियाँ कार्यक्रम पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेंगी; और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के साथ फोटो खिंचवाने के लालच में लोग इस इंटरसिटी में भागे चले आयेंगे - इसलिए उन्हें इन शिकायतों व आपत्तियों की कोई परवाह नहीं है ।
कई लोगों का मानना और कहना लेकिन यह है कि रजिस्ट्रेशन चार्जेज को लेकर की जा रही शिकायतों व आपत्तियों से इंटरसिटी में भाग लेने वालों की संख्या पर भले ही कोई प्रतिकूल असर न  पड़े, लेकिन इंटरसिटी की चमक तो धुँधली पड़ ही रही है और 'मीट द प्रेसीडेंट' इंटरसिटी विवाद में फँस गई है । लोगों का खुला आरोप है कि प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की खातिरदारी में खर्च होने वाली रकम जुटाने के लिए रजिस्ट्रेशन चार्जेज बढ़ा-चढ़ा कर बसूला जा रहा है, और इस तरह लोगों के पैसे के बल पर कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने अपनी राजनीति चमकाने/दिखाने का जुगाड़ बैठाया है । इस संदर्भ में लोगों को सबसे ज्यादा निराशा पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के रवैये से हुई है । रजिस्ट्रेशन चार्जेज के बाबत जो शिकायतें व आपत्तियाँ हैं, उन्हें राजा साबू तक भी पहुँचाया गया है, किंतु राजा साबू आँखों पर पट्टी बाँध धृतराष्ट्र बने हुए हैं और रोटरी के नाम पर लूट-खसोट होने दे रहे हैं । दरअसल जब से रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के वरिष्ठ सदस्य एमपी गुप्ता ने चिट्ठियाँ लिख लिख कर डिस्ट्रिक्ट के खर्चों का हिसाब माँगना शुरू किया है, तब से डिस्ट्रिक्ट के लोगों में जागरूकता आई है और वह अपने अपने तरीके से विभिन्न आयोजनों के आय और व्यय में दिलचस्पी लेने लगे हैं । उल्लेखनीय है कि एमपी गुप्ता के विभिन्न मौकों के हिसाब माँगने के प्रयासों को कुल मिलाकर अभी तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है; किंतु उनकी असफलता की बहुत बड़ी सफलता यह है कि अब दूसरे लोग भी सवाल करने/उठाने लगे हैं - और इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट को अपनी बपौती समझने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को बेचैन व परेशान कर दिया है । 
मजे की और विडंबना की स्थिति यह है कि एमपी गुप्ता की मुहिम को कामयाब बनाने का काम खुद गवर्नर्स लोगों के रवैये ने ही किया है । शुरुआत निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दिलीप पटनायक के गवर्नर-काल के हिसाब माँगने से हुई । एमपी गुप्ता ने पिछले रोटरी वर्ष के हिसाब सार्वजनिक करने की माँग की, तो पहले तो उनकी माँग को अनसुना करके टाल दिया गया; एमपी गुप्ता जब चुप होते हुए नहीं दिखे तो हिसाब देना टालने के लिए बहानेबाजी शुरू कर दी गई । इस के बाद भी एमपी गुप्ता जब नियमों का हवाला देते हुए हिसाब माँगने की बात पर अड़े रहे, तो आधे-अधूरे हिसाब देने की कार्रवाई की गई । एमओपी के नियमों तथा दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए एमपी गुप्ता अभी भी विभिन्न सोर्सेज से जुटाए गए पैसों का, रोटरी फाउंडेशन से मिली ग्रांट्स के पैसों का, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को मिले तथा उसके जरिए खर्च हुए पैसों का जो हिसाब सार्वजनिक करने की माँग कर रहे हैं - उसे लगातार अनसुना किया जा रहा है, तथा जबाव को टाला जा रहा है । हद की बात यह है कि उत्तराखंड की त्रासदी के नाम पर जो रकम इकठ्ठा की गई, उसके खर्च के ब्यौरे को भी छिपाया जा रहा है । हिसाब-किताब संबंधी सवालों को अनसुना करने तथा जबाव टालने के मामले में राजा साबू की सहमति के संकेत मिलने से मामला और गर्मा गया है । लोगों के बीच चर्चा छिड़ी हुई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और उसे अपने इशारों पर चलाने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स आखिर रोटरी के पैसों में इतनी क्या गड़बड़ी और हेराफेरी करते हैं कि हिसाब देने में उनकी नानी मरती है ? इस तरह एमपी गुप्ता को गवर्नर-ऑफिस से अपने सवालों के उचित और पर्याप्त जबाव भले ही न मिले हों, किंतु उनके सवालों तथा उनके सवालों से बचते/छिपते दिख रहे गवर्नर्स के रवैयों ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को सावधान व जागरूक बनाने का काम अवश्य किया है । 
लोगों की इसी जागरूकता का नतीजा है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के सानिध्य में होने वाली इंटरसिटी के लिए बसूले जा रहे चार्जेज सवालों के घेरे में आ गए हैं - और इस इंटरसिटी से जुड़े बड़े पदाधिकारियों में से किसी के लिए भी बसूली जा रही 600 रुपए की रकम को जस्टिफाई करने की हिम्मत नहीं हो रही है । अनौपचारिक बातचीतों में तो बताया/समझाया जा रहा है कि किसी भी आयोजन में कई तरह के काम होते हैं, जिसमें पैसे खर्च होते हैं और यह खर्च जोड़ कर ही रजिस्ट्रेशन चार्ज तय किया जाता है; लेकिन औपचारिक रूप से यह हिसाब देने/बताने से जिस तरह से बचा जा रहा है, उससे संदेह पुष्ट होता जा रहा है कि रजिस्ट्रेशन से जुटाए गए पैसे कुछेक बड़े नेताओं की जेब गर्म करने के काम भी आयेंगे । शिकायत और आपत्ति करने वाले लोगों का कहना है कि उन्हें भी पता है कि किसी भी आयोजन में कई तरह के खर्च होते ही हैं; हम यह कहाँ कह रहे हैं कि उन खर्चों को हमसे न लिया जाए - हम तो सिर्फ यह बताने के लिए कह रहे हैं कि जो पैसा लिया जा रहा है, वह कैसे कैसे और कहाँ कहाँ खर्च हो रहा है ? 'मीट द प्रेसीडेंट' के आयोजक पदाधिकारी चूँकि यह बताने से बच रहे हैं, इसलिए लोगों को यह कहने का मौका मिला है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के नाम पर कुछेक बड़े लोगों ने अपनी अपनी जेब भरने का जुगाड़ बैठा लिया है । 

Wednesday, December 2, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ अपने ही क्लब की कॉन्करेंस जुटाने में असफल रहे मुकेश अरनेजा अब दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों से किस आधार पर और किस मुँह से कॉन्करेंस मागेंगे ?

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस देने से इंकार कर दिया है । इस तरह सुभाष जैन की अधिकृत उम्मीदवारी के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने के लिए अपनाए जा रहे मुकेश अरनेजा के 'पैर पकड़ो' अभियान को मुकेश अरनेजा के क्लब में ही मुहँकी खानी पड़ी है । मुकेश अरनेजा ने हालाँकि दावा किया था कि अपने क्लब के बोर्ड सदस्यों को उन्होंने कॉन्करेंस देने के लिए राजी कर लिया है, किंतु क्लब की बोर्ड मीटिंग में प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने जब कॉन्करेंस के लिए स्वीकृति लेने की कोशिश की तो मुकेश अरनेजा का दावा झूठा साबित हो गया । मुकेश अरनेजा के लिए मुसीबत की बात अब यह हो गई है कि अब जब वह अपने ही क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने में फेल हो गए हैं और अपने ही क्लब के संदर्भ में किया गया उनका दावा झूठा साबित हो गया है, तो दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों को वह किस मुँह से कॉन्करेंस के लिए राजी करें और जरूरी कॉन्करेंस दिलवाने/जुटाने के उनके दावे पर कौन क्यों विश्वास करे ? अपने ही क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने के मामले में मुकेश अरनेजा की जो भद्द पिटी है, उससे क्लब में मुकेश अरनेजा की बेचारगी वाली दशा की पोल एक बार फिर खुल गई है । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा की कारस्तानियों के कारण पिछले रोटरी वर्ष में उन्हें उनके क्लब से निकाल दिया गया था; निकाल दिए जाने की प्रक्रिया की खामियों में चोर-दरवाजा बना कर मुकेश अरनेजा क्लब में अपनी वापसी करवाने में तो सफल हो गए थे, लेकिन कॉन्करेंस को अपनी इज्जत का सवाल बना बैठे मुकेश अरनेजा की कॉन्करेंस देने की अपील के खारिज हो जाने से साबित हुआ है कि क्लब के सदस्यों के बीच अपनी स्वीकृति बनाने तथा सम्मान हासिल करने के मामले में वह जरा भी सफल नहीं हो सके हैं । 
क्लब की बोर्ड मीटिंग में प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने बोर्ड सदस्यों को कॉन्करेंस के लिए राजी करने के उद्देश्य से यह कहते हुए भावनात्मक कार्ड भी चला कि आज मुकेश अरनेजा का जन्मदिन है, और कॉन्करेंस के रूप में 'हम' उन्हें जन्मदिन का गिफ्ट दे सकते हैं । बोर्ड सदस्यों ने लेकिन उनकी बात पर कोई गौर ही नहीं किया और इस तरह यही जाहिर किया कि उनके लिए मुकेश अरनेजा के जन्मदिन का कोई मतलब नहीं है - गिफ्ट/विफ्ट तो उनके लिए बहुत दूर की बात है । क्लब की बोर्ड मीटिंग में प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने मुकेश अरनेजा की तथा कॉन्करेंस देने की वकालत तो खूब की, लेकिन उनकी तमाम वकालत के बावजूद बोर्ड के सदस्य कॉन्करेंस के लिए राजी नहीं हुए । मीटिंग में शामिल एक बोर्ड सदस्य ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया कि शुरू में तो प्रेसीडेंट मनीष गोयल ने कॉन्करेंस के बाबत सामान्य रूप से बात की, जिसके जबाव में बोर्ड के सदस्यों ने उन्हें रोटरी की मूल भावना से परिचित कराया और समझाया कि अधिकृत उम्मीदवार को ही विजेता के रूप में स्वीकार करने से लोगों के बीच परस्पर मान-सम्मान व सहयोग का संबंध बनता है - अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने से लोगों के बीच बेवजह के विवाद पैदा होते हैं तथा झगड़े शुरू होते हैं, जिससे रोटरी की मूल भावना आहत होती है । मनीष गोयल पर किंतु इस तरह की बातों का कोई असर नहीं हुआ । शायद मुकेश अरनेजा ने उन्हें खूब सिखा-पढ़ा कर तैयार किया था । मुकेश अरनेजा की ड्यूटी बजाने के चक्कर में मनीष गोयल कॉन्करेंस के लिए जिद पकड़ कर बैठ गए और मुकेश अरनेजा व क्लब की इज्जत की बात करने लगे । इस पर बोर्ड सदस्यों ने मनीष गोयल को हड़काना शुरू किया और उन्हें लताड़ा कि उन्होंने और मुकेश अरनेजा ने अपनी हरकतों से क्लब को बहुत बेइज्जत करवाया है । क्लब के बोर्ड सदस्यों ने मनीष गोयल को इस बात के लिए खूब लताड़ा कि मुकेश अरनेजा की कठपुतली बन कर रहने के चलते अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी का गरिमापूर्ण तरीके से निर्वाह करने में वह पूरी तरह असफल रहे हैं, और इस कारण से मुकेश अरनेजा के साथ-साथ उन्होंने भी क्लब की पहचान व प्रतिष्ठा को कलंकित किया है । 
क्लब के बोर्ड सदस्यों को कॉन्करेंस के लिए राजी करने के वास्ते मनीष गोयल ने जो भी बातें कहीं व तर्क दिए, उनसे उन्होंने न सिर्फ अपनी व मुकेश अरनेजा की खिल्ली उड़वाई बल्कि रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के प्रेसीडेंट अंकुर बाना के लिए भी अप्रिय स्थितियाँ बनाई । दरअसल मनीष गोयल ने अपने बोर्ड के सदस्यों के सामने उदाहरण पेश करते हुए उन्हें बताया कि मुकेश अरनेजा की प्रेरणा से रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के प्रेसीडेंट अंकुर बाना ने क्लब प्रेसीडेंट्स के अधिकारों व मान-सम्मान के लिए जो अभियान शुरू किया है, उसके चलते कॉन्करेंस मिलने का काम हो जायेगा और 'हमें' भी इस अभियान का हिस्सा बनना चाहिए । यह सुन कर बोर्ड सदस्य बुरी तरह उखड़ गए और उन्होंने मनीष गोयल को जोरों की फटकार लगाई कि तुम हमें क्या बेवकूफ समझते हो; हमें क्या पता नहीं है कि रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर कुल आठ सदस्यों का क्लब है, जिसकी नियमानुसार न कभी मीटिंग होती है और जिसमें न कभी कोई प्रोजेक्ट होता है; खुद मुकेश अरनेजा ने ही कई बार बताया है कि उन्होंने कई उम्मीदवारों से उसके ड्यूज दिलवाए हैं और जो वोट व कॉन्करेंस 'बेचने' के लिए ही बना हुआ है । अंकुर बाना इस वर्ष भी क्लब के प्रेसीडेंट हैं और अगले रोटरी वर्ष के भी प्रेसीडेंट हैं; लेकिन रोटरी इंटरनेशनल के मापदंडों के अनुसार प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारियों को निभाने में तथा अध्यक्ष के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा करने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है; ऐसे में उनके मुँह से प्रेसीडेंट के अधिकार व मान-सम्मान की बात सुनना मजाक जैसा लगता है । मनीष गोयल को याद दिलाया गया कि कुछेक मौकों पर आपके सामने ही तो मुकेश अरनेजा ने यह कहा/बताया है कि रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर की कॉन्करेंस व वोट प्राप्त करने की कीमत उन्हें पता है, और उसकी कॉन्करेंस तो वह जब चाहेंगे तब खरीद लेंगे । मनीष गोयल से पूछा गया कि आप क्या यह चाहते हो कि रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ जैसा प्रतिष्ठित क्लब रोटरी को धंधे के रूप में इस्तेमाल करने वाले रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के कहने में चले ? मीटिंग में लोगों का कहना रहा कि प्रेसीडेंट के रूप में अंकुर बाना ने अपनी जिम्मेदारियों व कर्तव्यों का निर्वाह किया होता और फटीचर से क्लब को सुधारने व बेहतरीन क्लब बनाने का प्रयास किया होता - और फिर प्रेसीडेंट्स के अधिकारों व मान-सम्मान की बात की होती तो वह समझ में भी आती; अभी तो ऐसा लग रहा है कि प्रेसीडेंट्स के अधिकारों व मान-सम्मान की बात करने की आड़ में उनका असल इरादा कॉन्करेंस के बदले में ज्यादा से ज्यादा रकम ऐंठना है । मनीष गोयल को अपने ही क्लब के बोर्ड सदस्यों से सुनने को मिला कि अंकुर बाना की तरह कहीं आपने भी तो कॉन्करेंस का सौदा नहीं कर लिया है ? 
मुकेश अरनेजा की ड्यूटी बजाने के तहत कॉन्करेंस के लिए बोर्ड सदस्यों को राजी करने की कोशिश में मनीष गोयल को बोर्ड सदस्यों से जैसी जैसी फटकार सुनने को मिली, उसके चलते मनीष गोयल के लिए बोर्ड सदस्यों के प्रकोप से बचना खासा मुश्किल हो गया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में भागीदारी निभाने, दूसरे क्लब्स के अध्यक्षों का समर्थन जुटाने के प्रयासों में लगने तथा चुनावी संदर्भ में खुली चिट्ठी लिखने के लिए मनीष गोयल को तगड़ी फटकार लगाई गई - जिसके चलते मनीष गोयल को माफी माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा । बोर्ड सदस्यों ने मनीष गोयल को स्पष्ट शब्दों में समझा दिया है कि यदि उन्हें क्लब के अध्यक्ष-पद पर रहना है, तो उन्हें मुकेश अरनेजा की कठपुतली के रूप में नहीं, बल्कि अध्यक्ष के रूप में काम/व्यवहार करना होगा । मनीष गोयल ने बोर्ड सदस्यों को आश्वस्त किया कि आगे उन्हें उनकी तरफ से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा । इस तरह, मुकेश अरनेजा के चक्कर में मनीष गोयल को अपने ही क्लब में जिस तरह की फजीहत का शिकार होना पड़ा है, वह इस बात का उदाहरण और सुबूत भी बन गया है कि जो कोई भी मुकेश अरनेजा के साथ जुड़ेगा उसे फजीहत का शिकार होने के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा ।
मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस जुटाने के मामले में अपने ही क्लब में जो झटका लगा है, उसके कारण कॉन्करेंस जुटाने के उनके प्रयास शुरू होते ही बुरी तरह पिट गए हैं । उनके सामने समस्या यह आ खड़ी हुई है कि अब वह दूसरे क्लब्स के पदाधिकारियों से किस आधार पर और किस मुँह से कॉन्करेंस मागेंगे ? उनके चेले के रूप में काम कर रहे मनीष गोयल ने अतिउत्साहपूर्ण बेवकूफी में रोटरी क्लब हापुड़ ग्रेटर के अध्यक्ष अंकुर बाना की मुहिम को भी एक्सपोज कर दिया है, जिसके कारण कॉन्करेंस 'खरीदना' भी अब आसान नहीं रह जायेगा । 

Tuesday, December 1, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की विभिन्न कमेटियों में फीस कम करने के मुद्दे पर विजय गुप्ता को हो सकने वाले फायदे को रोकने के लिए अतुल गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सिर पर जो बोझ डाला है, उसके कारण अतुल गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ खासा तगड़ा माहौल बना है

नई दिल्ली । विजय गुप्ता को फीस में कमी करने के मुद्दे पर मिल सकने वाले फायदे को रोकने के लिए अतुल गुप्ता ने जो चाल चली, उसी चाल ने लेकिन उल्टा असर किया और अतुल गुप्ता के चुनाव-अभियान का कबाड़ा कर दिया है । उल्लेखनीय है कि इस मामले की पोल खुलने के बाद से ही अतुल गुप्ता की मुसीबतें शुरू हुई हैं और उनके विरोधियों के स्वर तेज हुए हैं । इस मामले की पोल खुलने के बाद अतुल गुप्ता के पहले कभी नजदीकी रहे उन लोगों के हौंसले खासे बुलंद हुए हैं, जो अब उनके विरोधी बने हुए हैं तथा लोगों को यह बताना चाहते हैं कि अतुल गुप्ता कैसे अपने निजी स्वार्थ में दूसरों को तो नुकसान पहुँचाते ही हैं - अपनों को भी चोट पहुँचाने में नहीं हिचकते हैं । अतुल गुप्ता ने अपने निजी व्यवहार का जो सार्वजनिक-करण किया है, उसने इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य में कुछेक नए चैप्टर जोड़े हैं - अतुल गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि इससे होने वाले नुकसान को खुद उन्हें ही भुगतना पड़ रहा है । इंस्टीट्यूट के चुनाव की खूबसूरती यह है कि यहाँ हर उम्मीदवार दूसरे की नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी बात करता है; यहाँ हर उम्मीदवार अपनी जमीन तैयार करता है, दूसरे की जमीन कब्जाने की कोशिश नहीं करता है - यह अलग बात है कि अपनी जमीन तैयार करने की कोशिश में दूसरे की कुछ जमीन उसे मिल जाए, और इस कारण से थोड़ी-बहुत तल्खी बन जाए । अतुल गुप्ता ने लेकिन इस परंपरा/व्यवस्था को सिर के बल खड़ा कर दिया है । अतुल गुप्ता ने बाकायदा 'दुश्मन' चिन्हित किए और उन्हें निशाना बनाने का काम किया । 
अतुल गुप्ता ने अपने रीजन में विजय गुप्ता और संजय अग्रवाल को दुश्मन के रूप में चिन्हित किया और इनसे निपटने के लिए अलग अलग रणनीति बनाई । विजय गुप्ता और संजय अग्रवाल के गुण-दोषों को पहचानते/समझते हुए अतुल गुप्ता ने बड़ी होशियारी से विजय गुप्ता को मोहरा बना कर संजय अग्रवाल को निशाना बनाया । विजय गुप्ता के नजदीकियों को अब जाकर अतुल गुप्ता की चाल समझ में आई है, और उनके सामने यह तथ्य उजागर हुआ है कि संजय अग्रवाल से लड़वा कर अतुल गुप्ता वास्तव में विजय गुप्ता की जड़ें खोदने का मौका बना रहे थे । अतुल गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि अतुल गुप्ता ने विजय गुप्ता की इस कमजोरी को समझ लिया था कि विजय गुप्ता जल्दी आवेश में आ जाते हैं और फिर सोच-विचार की बजाए भावनाओं में बह जाते हैं; विजय गुप्ता की इस कमजोरी को फायदा उठाते हुए अतुल गुप्ता ने उन्हें तो संजय अग्रवाल के खिलाफ भिड़ा दिया और खुद फरीदाबाद में विजय गुप्ता की जड़ें खोदने के काम में लग गए । फरीदाबाद में अतुल गुप्ता ने धीरे-धीरे करके गुपचुप तरीके से विजय गुप्ता के कुछेक नजदीकियों को अपनी तरफ करने का काम तो किया ही, साथ ही विजय गुप्ता के खिलाफ नकारात्मक खबरें प्लांट करवाने का काम भी किया । विजय गुप्ता के नजदीकियों ने ही इस तथ्य को रेखांकित किया है कि विजय गुप्ता जिन संजय अग्रवाल को दुश्मन नंबर एक समझते रहे हैं, उन संजय अग्रवाल ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे विजय गुप्ता को किसी भी तरह की कोई चोट पड़ती हो; किंतु विजय गुप्ता जिन अतुल गुप्ता के साथ कम्फर्ट फील करते रहे हैं, उन अतुल गुप्ता ने हर स्तर पर हर वह काम किया जिससे विजय गुप्ता का काम खराब हो । 
इंस्टीट्यूट के विभिन्न कोर्सेस में फीस कम करने के मुद्दे पर अतुल गुप्ता का जो रवैया रहा, उसमें विजय गुप्ता के प्रति अतुल गुप्ता के विरोध के स्तर को समझा/पहचाना जा सकता है । इस मामले में विजय गुप्ता का विरोध करने के चक्कर में अतुल गुप्ता इस हद तक चले गए कि उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि उनके इस रवैये से विजय गुप्ता का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का लेकिन बहुत बड़ा नुकसान जरूर होगा । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की कई कमेटियाँ कुछेक ऐसे कोर्स चलाती हैं, जो युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए उपयोगी साबित होते हैं; किंतु ऊँची फीस के चलते तमाम युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, खासकर छोटे शहरों के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए उसका फायदा उठा पाना संभव नहीं होता है । इसी बात को ध्यान में रखते हुए विजय गुप्ता ने पहल की और इंस्टीट्यूट के विभिन्न कोर्सेस में फीस कम करने के लिए प्रयास शुरू किए । इंस्टीट्यूट में विजय गुप्ता के प्रस्ताव को खासे उत्साह से लिया गया, और सभी ने उनके प्रस्ताव को युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए उपयोगी माना/पाया - और विभिन्न कोर्सेस में फीस कम करने के उनके प्रस्ताव को एंडोर्स किया । एक अकेले अतुल गुप्ता ने लेकिन मामले को लटका दिया । मजे की बात यह है कि फीस कम करने के मुद्दे से अतुल गुप्ता का कोई वैचारिक विरोध नहीं है; अतुल गुप्ता फीस कम करने के पक्ष में हैं - किंतु फिर भी फीस कम करने को लेकर उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया । उनके नजदीकियों के अनुसार, इसका एकमात्र कारण अतुल गुप्ता का यह डर है कि उनके फीस कम करने से फायदा उन्हें नहीं, बल्कि विजय गुप्ता को होगा - और इसलिए उन्होंने फीस कम करने के फैसले को टाला हुआ है । 
उल्लेखनीय है कि विजय गुप्ता ने इस वर्ष जनवरी/फरवरी में इंस्टीट्यूट के विभिन्न कोर्सेस में फीस कम करने का मुद्दा प्रस्तुत किया था, और कई एक कमेटियों ने उनकी प्रस्तुति पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए अपने अपने कोर्स में फीस कम की; लेकिन अतुल गुप्ता मामले को लटकाए हुए हैं - जिसके चलते उनकी कमेटी में आने वाले कोर्स में पढ़ने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को ज्यादा फीस देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है । विजय गुप्ता को हो सकने वाले फायदे को रोकने के लिए अतुल गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सिर पर जो बोझ डाला है, उसके कारण युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अतुल गुप्ता के खिलाफ खासा तगड़ा माहौल बना है । इस प्रकरण से दरअसल लोगों के बीच यह संदेश गया है कि अतुल गुप्ता बहुत ही खुन्नसी व्यक्ति हैं, और अपनी खुन्नस के चक्कर में वह किसी के भी हितों की बलि चढ़ा सकते हैं । इस संदेश ने लोगों के बीच अतुल गुप्ता के विरोध को और तल्ख़ तथा सक्रियताभरा बना दिया है । विजय गुप्ता से निपटने के चक्कर में अतुल गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जैसा जो धोखा किया है, और उनके साथ जिस तरह की नाइंसाफी की है - उसके कारण युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अतुल गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति गहरी नाराजगी है । इसी नाराजगी का प्रताप है कि अतुल गुप्ता की चुनावी मीटिंग्स व पार्टियाँ बुरी तरह फ्लॉप जा रही हैं, और उनमें उम्मीद से बहुत कम लोग ही जुट पा रहे हैं । चुनावी मीटिंग्स व पार्टियों के फेल होने का सीधा असर अतुल गुप्ता के व्यवहार पर पड़/दिख रहा है - जिसके नतीजे के रूप में उन्हें जब-तब लोगों से अलग अलग कारणों से उलझते/झगड़ते देखा जा रहा है । विजय गुप्ता को फायदा न हो जाए - इस चक्कर में अतुल गुप्ता ने अपने आपको जैसी/जिन मुसीबतों में फँसा लिया है, उससे अतुल गुप्ता के चुनाव अभियान पर खासा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है । 

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन के खिलाफ कॉन्करेंस दिलवाने के लिए मुकेश अरनेजा के 'पैर पकड़ों' अभियान का कुल नतीजा 'मुन्नी बदनाम हुई' जैसा मिल रहा है

नई दिल्ली/गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन को दिए दीपक गुप्ता के चेलैंज को मान्य कराने के लिए जरूरी कॉन्करेंस जुटाने के लिए मुकेश अरनेजा ने अब 'पैर पकड़ो' अभियान शुरू किया है । मजे की बात यह हुई है कि मुकेश अरनेजा अभी कुछ ही दिन पहले तक चुनाव लड़वाने और जितवाने को लेकर जिन लोगों के बीच ऊँची ऊँँची हाँकने में लगे हुए थे, अब वह उन्हीं लोगों की खुशामद/मिन्नत में लगे हैं और अपनी इज्जत की दुहाई देते हुए उनके सामने गिड़गिड़ाने में लगे हुए हैं - तथा उनके पैर पकड़ने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं । कुछेक लोगों ने मुकेश अरनेजा से कहा भी कि आप तो इतने/कितने बड़े नेता हो, किसी को भी गवर्नर चुनवा/बनवा देते हो, हमारी मदद की आपको भला क्या जरूरत है - हमारे पैर क्यों पड़ रहे हो ? मुकेश अरनेजा लेकिन पूरी बेशर्मी से यही रट लगाए रहते हैं कि मेरी इज्जत अब आपके ही हाथ में है । इस पर कहीं कहीं उन्हें यह भी सुनने को मिला कि आपकी इज्जत जब हमारे ही हाथ में है, तो हमसे सलाह-मशविरा किए बिना ऊँची ऊँची फेंकते क्यों हो ? इस तरह के रिएक्शन से डिस्ट्रिक्ट में लोगों को इतना तो समझ में आ रहा है कि मुकेश अरनेजा को कॉन्करेंस तो नहीं ही मिलने वाली है, उनकी बची-खुची इज्जत और उतर जानी है । मुकेश अरनेजा को हालाँकि अपनी खुद की इज्जत की कोई परवाह सचमुच में है भी नहीं ! वास्तव में यदि उन्हें परवाह होती तो वह कॉन्करेंस जुटाने के लिए दरवाजे दरवाजे पैर पकड़ते और अपनी बेइज्जती कराते भला क्यों घूमते ? 
मुकेश अरनेजा का हालाँकि यह पुराना फार्मूला है - पहले तो वह डींगे मारते हैं, और जब कामयाब नहीं होते हैं - तो पैर पकड़ लेते हैं । इस फार्मूले से शुरू में उन्हें एक-आध बार कामयाबी मिल भी गई थी - लेकिन जैसे काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ सकती है, वैसे ही मुकेश अरनेजा का यह फार्मूला फिर कभी सफल नहीं हो सका । मुकेश अरनेजा लेकिन इस पिटे-पिटाए फार्मूले को ही बार-बार आजमाते रहते हैं और लगातार 'पिटते' रहे हैं । लोगों का मानना और कहना है कि मुकेश अरनेजा डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच इतनी बुरी तरह से एक्सपोज हो चुके हैं कि उनकी हर कारस्तानी का लोगों को पता चल चुका है और इसलिए उनका कोई भी ढोंग कामयाब नहीं हो पाता है । जैसे ज्यादा दूर या पीछे जाने की क्या जरूरत है, इस बार का ही मामला देखें तो पाते हैं कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए मुकेश अरनेजा ने जो भी हथकंडा अपनाया - वह बुरी तरह पिटा । इससे मुकेश अरनेजा ने भले ही कोई सबक न लिया हो और वह अभी भी उम्मीद कर रहे हों कि अंततः उनके जैसा खोटा सिक्का शायद चल ही जाए - किंतु डिस्ट्रिक्ट में हर किसी को, खुद मुकेश अरनेजा के नजदीकियों व समर्थकों को भी उनके सफल होने का जरा सा भी विश्वास नहीं रह गया है । 
इसी का नतीजा है कि कॉन्करेंस दिलवाने के काम में मुकेश अरनेजा को अकेले ही जुटना पड़ रहा है, और नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने के पहले तक उनके साथी/सहयोगी रहे लोग भी उनका साथ छोड़ गए हैं । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि मुकेश अरनेजा ने कोशिश की थी कि दीपक गुप्ता के चेलैंज के समर्थन में कॉन्करेंस जुटाने के उनके अभियान में सतीश सिंघल भी उनके साथ चलें, किंतु सतीश सिंघल ने इसे मानने से साफ इंकार कर दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतीश सिंघल ने मुकेश अरनेजा और दीपक गुप्ता को साफ बता दिया कि अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ कॉन्करेंस देने/दिलवाने का काम गवर्नर कैटेगरी के लोगों को तो नहीं ही करना चाहिए, क्योंकि इससे गवर्नर पद की गरिमा गिरती है । मुकेश अरनेजा और दीपक गुप्ता के नजदीकियों ने ही बताया है कि सतीश सिंघल ने दोनों को समझाने की हर संभव कोशिश की कि नोमीनेटिंग कमेटी में जिस बड़े अंतर से फैसला हुआ है, उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के मूड का पता चलता है - और इसके बाद दीपक गुप्ता को चेलैंज करने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए । मुकेश अरनेजा व दीपक गुप्ता ने लेकिन सतीश सिंघल की समझाईस पर कोई ध्यान नहीं दिया - और इसी के साथ सतीश सिंघल ने कॉन्करेंस जुटाने के उनके अभियान से दूरी बना ली । दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा ने रूपक जैन से जो मदद मिलने की उम्मीद की थी, उसे भी खासा तगड़ा झटका लगा है । रूपक जैन की तरफ से भी बता दिया गया है कि कॉन्करेंस मिलनी तो हैं नहीं, फिर अपनी पोल क्यों खुलवानी तथा इस तरह अपनी बेइज्जती क्यों करवानी ?
मुकेश अरनेजा लेकिन डटे हुए हैं - उन्हें अपनी इज्जत की तो परवाह नहीं ही है, साथ ही उन्हें इस बात की भी कोई परवाह नहीं है कि रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने गवर्नर टाइप के लोगों से चुनावी राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी न निभाने का अनुरोध किया हुआ है - और उनके इस अनुरोध को कार्यरूप देने की जिम्मेदारी इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने संभाली हुई है । इस संदर्भ में पहले जब भी बात उठी है, मुकेश अरनेजा ने केआर रवींद्रन व मनोज देसाई के प्रति बड़ी हिकारत का भाव प्रकट करते हुए प्रतिकूल किस्म की टिप्पणियाँ की हैं और साफ साफ यह जताया है जैसे उन्हें न केआर रवींद्रन का डर है और न मनोज देसाई का । मुकेश अरनेजा ने अब फिर दोहराया है कि जब राजा साबू और उनकी शह पर उनके डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स चुनावी राजनीति में हिस्सेदारी निभा सकते हैं, तो फिर वह क्यों पीछे रहें ? मुकेश अरनेजा पीछे रहने को तैयार नहीं हैं और अधिकृत उम्मीदवार सुभाष जैन को किए गए चेलैंज को स्वीकृति दिलाने के लिए जरूरी कॉन्करेंस जुटाने के लिए घर घर भटक रहे हैं । मुकेश अरनेजा जिस किसी क्लब के कार्यक्रम में जाने का जुगाड़ बैठा लेते हैं, वहाँ भी क्लब के पदाधिकारियों को कॉन्करेंस के लिए फुसलाने/पटाने के लिए 'नाटक' करते/जमाते हैं; और जहाँ उन्हें ऐसा मौका नहीं मिल पाता है वहाँ फिर वह घर या ऑफिस जा कर रोना/धोना मचाते हैं । मुकेश अरनेजा ने अभी तक जिन जिन लोगों के पैर पकड़े हैं, उनमें से जिन कुछेक लोगों से इन पँक्तियों के लेखक की बात हो सकी है, उन्होंने बताया है कि मुकेश अरनेजा बुरी तरह बौखलाए हुए हैं और बौखलाहट में वह जिस तरह की हरकतें तथा बातें कर रहे हैं उससे न सिर्फ अपनी गरिमा को खो रहे हैं, बल्कि लोगों के बीच अपने लिए निहायत शर्मनाक स्थिति भी बना रहे हैं । मुकेश अरनेजा के लिए बदकिस्मती की बात यह हुई है कि कॉन्करेंस के लिए लोगों के पैर पकड़ने के बावजूद उन्हें कॉन्करेंस मिलती हुई दिख नहीं रही है । जाहिर है कि 'मुन्नी बदनाम हुई' वाली तर्ज पर कुल नतीजा 'अरनेजा बदनाम हुआ' जैसा ही मिल रहा है । 

Monday, November 30, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए हालात के साथ-साथ हरियाणा व पंजाब की कई ब्रांचेज के पदाधिकारियों से मिल रहे समर्थन से संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को एक अलग ही मुकाम मिला है और वह बाकी सब पर भारी साबित हो रहे हैं

नई दिल्ली । अतुल गुप्ता, संजीव चौधरी, नवीन गुप्ता और विजय गुप्ता को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए जिस तरह की जद्दोजहद करना पड़ रही है - उससे लोगों को लग रहा है कि संजय अग्रवाल की तो जैसे निकल पड़ी है और रीजन में सबसे ज्यादा वोट उन्हें ही मिलेंगे । संजय अग्रवाल जिस तरह विवादों से बचने में और अपने आप को विवादों से बचाए रखने में कामयाब रहे हैं, उसके चलते एक उम्मीदवार के रूप में उनका ऑरा(आभामंडल) तो बढ़ा ही - साथ ही उनका समर्थन आधार भी फैला है । विवादों व नकारात्मकता से बचे रहने से संजय अग्रवाल को दोतरफा फायदा हुआ - एक तरफ तो उनके पहले से जो समर्थक थे, वह उनके साथ ही न सिर्फ बने रहे बल्कि उनके पक्ष में और ज्यादा सक्रिय हुए; दूसरी तरफ, यह सब देख/जान कर बहुत बड़ी संख्या में नए लोग उनके साथ जुड़े । हरियाणा व पंजाब की कई ब्रांचेज के पदाधिकारी जिस तरह खुलकर संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठाए हुए हैं, और उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के काम में दिन-रात एक किए हुए हैं - उससे इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को एक अलग ही मुकाम मिला है और वह बाकी सब पर भारी साबित हो रहे हैं । 
अपनी उम्मीदवारी के लिए एक अलग मुकाम बनाने तथा सब पर भारी साबित होने के लिए संजय अग्रवाल को किस्मत और परिस्थितियों का भी बहुत सहयोग/समर्थन मिला । यह एक दिलचस्प नजारा है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में वापसी के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों में एक संजय अग्रवाल को छोड़ कर बाकी सभी अपनी अपनी मुसीबतों में घिरे/फँसे हुए हैं, और उन्हें निहायत प्रतिकूल स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है । प्रायः सभी के मामलों में प्रतिकूल स्थितियाँ उनकी चूँकि खुद की बनाई हुई हैं, इसलिए उनसे निपटने में उन्हें जिस तरह की जद्दोजहद करना पड़ रही है - उसके कारण संजय अग्रवाल के लिए स्थितियाँ खासी अनुकूल हो उठी हैं । नवीन गुप्ता और संजीव चौधरी को अपने रूखे व्यवहार तथा लोगों से दूर दूर रहने का भुगतान भुगतना पड़ रहा है; तो अतुल गुप्ता और विजय गुप्ता ने बेमतलब की लड़ाईयाँ मोल लेकर अपने अपने विरोधी खड़े कर लिए हैं और उनके निशाने पर बने हुए हैं । नवीन गुप्ता का रवैया देख/जान कर लोगों को लगता है कि वह सार्वजनिक जीवन जीने के लायक ही नहीं हैं, और उनके पिताजी ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्हें नाहक ही यहाँ फँसा दिया है । लोगों के बीच नवीन गुप्ता की खासी बुरी हालत को देख कर उनके पिता एनडी गुप्ता को खुद मोर्चा सँभालना पड़ा है और नवीन गुप्ता के रवैये से खफा लोगों की खुशामद व मिन्नतें करते हुए नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी को अपनी इज्जत का सवाल बनाना पड़ा है । संजीव चौधरी सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में इस 'नशे' में रहे कि बिग फोर का होने के चलते उन्हें लोगों के संपर्क में रहने की कोई जरूरत ही नहीं है, लेकिन अब चुनाव के मौके पर उन्होंने जब लोगों को उनके 'जैसा' रवैया अपनाते और उनकी उम्मीदवारी के प्रति बेरुखी दिखाते/जताते पाया तो उनके तो तोते ही उड़ गए हैं । नवीन गुप्ता को तो बचाने के लिए उनके पिताजी मैदान में आ गए; बेचारे संजीव चौधरी को तो बचने के लिए खुद ही हाथ-पैर मारने पड़ रहे हैं । संजीव चौधरी के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि दूसरे लोगों को तो छोड़िए, खुद बिग फोर कंपनियों के लोगों से उन्हें उचित सहयोग/समर्थन नहीं मिल पा रहा है, जिसके चलते कई लोगों को सेंट्रल काउंसिल की उनकी सीट जाती दिख रही है । 
अतुल गुप्ता और विजय गुप्ता का मामला बिलकुल जुदा किस्म का है । दोनों लोग बहुत एनर्जेटिक हैं, बहुत महत्वाकांक्षी हैं, बड़ा विजन रखते हैं, लोगों के बीच रहना चाहते हैं और रहते भी हैं, मौका बनाने व मौकों का उपयोग करने का हुनर रखते हैं - एक बड़ा नेता 'बनने' के लिए जिन जिन खूबियों की जरूरत होती है, वह सब खूबियाँ इनमें जैसे कूट-कूट कर भरी हैं; लेकिन इन दोनों को एक बड़ा भारी 'शौक' दुश्मन बनाने व पालने का भी है, और इनका यही शौक अब इन्हें भारी पड़ रहा है । इनके बनाए और पाले दुश्मन इनके खिलाफ सक्रिय हुए पड़े हैं और इनके लिए मुसीबत खड़ी किए हुए हैं । इनमें विजय गुप्ता अनुभवी व होशियार हैं और उन्हें दुश्मनों से निपटने की कला भी आती है, लिहाजा उन्होंने तो अपने दुश्मनों को काफी हद तक काबू में कर लिया है - लेकिन अतुल गुप्ता ने अनुभवहीनता के चलते अपने भाई/भतीजों को आगे करके दबंगई से दुश्मनों से निपटने की जैसी जो कोशिश की, उससे बात सँभलने की बजाए बिगड़ और गई है । अतुल गुप्ता अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके खिलाफ लोगों ने खुले मोर्चे खोले हुए हैं और घोषित किया हुआ है कि उनकी सक्रियता का एकमात्र उद्देश्य अतुल गुप्ता को हराना है । मजे की, लेकिन साथ ही गंभीर बात यह है कि जिन लोगों ने अतुल गुप्ता के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है, उनमें ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो पीछे किसी न किसी रूप में अतुल गुप्ता के साथ जुड़े रहे हैं । इस कारण से अतुल गुप्ता के लिए चुनाव काफी टफ हो गया है । इंस्टीट्यूट के इस बार के चुनावी परिदृश्य में नाटकीय परिवर्तन यह हुआ है कि अभी कुछ दिन पहले तक जो विजय गुप्ता खतरे में देखे/पहचाने जा रहे थे, वह विजय गुप्ता तो खतरे से बाहर आते नजर आ रहे हैं; लेकिन जिन अतुल गुप्ता को सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़/दौड़ में गिना जा रहा था, लोगों को वही अतुल गुप्ता अब अपनी सीट खोते हुए नजर आ रहे हैं । 
नवीन गुप्ता, संजीव चौधरी, विजय गुप्ता व अतुल गुप्ता की जद्दोजहद ने संजय अग्रवाल के लिए हालात को अनुकूल बनाने का काम किया है । संजय अग्रवाल को सिर्फ हालात का ही फायदा नहीं मिला है, उन्होंने हालात का फायदा उठाने के लिए सुचिंतित किस्म के प्रयास भी किए - और चूँकि अपने प्रयासों में उन्होंने अपनी यूएसपी (यूनिक सेलिंग प्रोपोजीशन) को भी बचाए रखा, इसलिए उनकी स्थिति में गुणात्मक सुधार देखा गया । उनके प्रतिस्पर्द्धी दूसरे उम्मीदवारों के नजदीकियों व समर्थकों ने भी माना और कहा कि संजय अग्रवाल ने जिस तरह से पिछले छह वर्षों से काउंसिल सदस्य के रूप में लोगों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखा हुआ है और प्राथमिकता के आधार पर लोगों के साथ जुड़े रहे हैं, उसके कारण उन्होंने अपनी एक भरोसेपूर्ण फॉलोइंग बनाई है । काउंसिल सदस्य के रूप में संजय अग्रवाल ने लिखने-पढ़ने पर ज्यादा जोर दिया है, और विशेष रूप से लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी रखने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच ही अपनी पैठ बनाई है । इसमें उन्हें लोगों से न तो झूठे व बड़बोले किस्म के वायदे करने पड़े और न फिर वायदों पर खरे न उतरने के चलते आलोचना का उन्हें शिकार होना पड़ा । इससे एक फायदा उन्हें अपने आप मिला और वह यह कि वह विवादों में नहीं फँसे । कभी जहाँ कहीं विवादों वाली स्थितियाँ आईं भी, तो वह या तो उनकी अनदेखी करते हुए और या उन्हें होशियारी के साथ हैंडल करते हुए उनसे बच निकले । काउंसिल सदस्य के रूप में अपनाई गई अपनी यूएसपी का उन्होंने अपने चुनाव अभियान में भी सख्ती से पालन किया और इस कारण विवादों से बचे रह पाने में कामयाब हुए । पिछले दिनों अपनी तीन पुस्तकों को उन्होंने लोगों के बीच जिस तरह से प्रस्तुत किया, उससे उनकी लिखने-पढ़ने वाली छवि व पहचान और समृद्ध ही हुई और एक उम्मीदवार के रूप में उनकी साख व विश्वसनीयता में और इजाफा ही हुआ । पुस्तकें प्रस्तुत करके हालाँकि कुछेक और उम्मीदवारों ने लोगों के बीच पैठ बनाने के प्रयास किए, लेकिन उनके प्रयास इतने घालमेल वाले रहे कि उनके प्रयासों का कोई प्रभाव नहीं बन सका । संजय अग्रवाल की पुस्तकों की प्रस्तुति चूँकि उनकी यूएसपी के अनुरूप रही, इसलिए उनकी प्रस्तुति ने अच्छा प्रभाव जमाया । इसी प्रभाव में संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी औरों की उम्मीदवारी से आगे बढ़ गई है और माना जा रहा है कि नॉर्दर्न रीजन में उन्हें ही सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे । 

Sunday, November 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए राज चावला की सक्रियता व संलग्नता तथा विजय गुप्ता की सुरक्षित होती दिख रही स्थिति ने हंसराज चुग के लिए मुकाबले को मुश्किल बनाया

नई दिल्ली । राज चावला की चौतरफा सक्रियता और विजय गुप्ता की स्थिति को संभालने की कोशिशों ने हंसराज चुग के सामने गंभीर मुसीबत खड़ी कर दी है । हंसराज चुग के लिए परेशानी की बात यह हुई है कि उनकी इस मुसीबत के लिए उन्हें ही जिम्मेदार भी ठहराया जा रहा है । हंसराज चुग के कुछेक समर्थक ही कहने लगे हैं कि हंसराज चुग यदि कामयाब नहीं हुए तो इसके लिए कोई और नहीं, बल्कि वह खुद ही जिम्मेदार होंगे । इसमें कोई शक नहीं कि हंसराज चुग को शुरू से ही संभावित विजेताओं में गिना/पहचाना जाता रहा है । लेकिन जैसे जैसे चुनाव में गर्मी आती गई, वैसे वैसे हंसराज चुग की स्थिति को पीछे खिसकता हुआ पाया गया है । उम्मीदवारों की सक्रियता और उनके तौर-तरीकों पर नजर रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि अपनी उम्मीदवारी के अभियान में हंसराज चुग कभी भी एक लीडर वाला प्रभाव पैदा नहीं कर सके और वह सिर्फ एक कार्यकर्त्ता और एक अच्छे दोस्त की छवि ही बनाए रख पाए । एक कार्यकर्त्ता और एक अच्छे दोस्त की छवि किसी भी उम्मीदवार के लिए आधार तैयार करने और/या नींव बनाने का काम तो करती है, लेकिन इस आधार/नींव पर 'इमारत' खड़ी करने के लिए उम्मीदवार को उक्त छवि का अतिक्रमण करना होता है - हंसराज चुग जिसे नहीं कर पाए । इसी कारण से हंसराज चुग की स्थिति को डांवाडोल होते हुए देखा जा रहा है ।
हंसराज चुग और उनके समर्थक एक अच्छे कार्यकर्त्ता और एक अच्छे दोस्त की छवि के भरोसे चुनाव में जीतने की उम्मीद करते रहे, लेकिन इस छवि के मामले में उन्हें राज चावला से तगड़ी चुनौती मिली । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के जानकारों का कहना है कि जो लोग एक अच्छे कार्यकर्त्ता और एक अच्छे दोस्त के आधार पर मूल्यांकन करते हुए वोट देने का फैसला करेंगे, उनमें से ज्यादातर हंसराज चुग की बजाए राज चावला के साथ जाना चाहेंगे । लोगों के साथ संपर्क बनाए रखने तथा उनके बीच सक्रिय रहने के मामले में राज चावला का पलड़ा ज्यादा भारी है । हंसराज चुग के समर्थकों ने भी इस तथ्य को पहचाना तथा इससे निपटने के लिए प्रचारित किया कि राज चावला कभी किसी के काम नहीं आए, जबकि हंसराज चुग ने कई लोगों को बैंक ऑडिट दिलवाएँ हैं - और इस तरह से लोगों के काम आए हैं । इस प्रचार ने लेकिन उल्टा काम किया । हंसराज चुग के समर्थकों के दावे को एंडोर्स करने के लिए तो कोई भी आगे नहीं आया, कई लोगों की यह शिकायतें जरूर सामने आईं कि वायदा करने के बाद भी हंसराज चुग ने छोटे छोटे मामलों में भी उनकी कोई मदद नहीं की । इस तरह समर्थकों का प्रचार उल्टा पड़ा, और इससे भी हंसराज चुग की उम्मीदवारी को झटका लगा । राज चावला की तरफ से चूँकि किसी झूठे और/या अतिरेकी प्रचार का सहारा नहीं लिया गया, इसलिए उनकी उम्मीदवारी के अभियान को कोई झटका लगने वाली स्थिति नहीं बनी । हंसराज चुग के प्रचार अभियान की तरह राज चावला के प्रचार अभियान में भी हालाँकि आक्रामकता का अभाव रहा/दिखा, और इस तरह खूबियों व कमियों के मामले में यह दोनों एक ही धरातल पर खड़े दिखे/मिले । 
राज चावला ने सक्रियता और संलग्नता का जो स्तर प्रदर्शित किया, वह भी हंसराज चुग के लिए चुनौती बना । एक उम्मीदवार के रूप में राज चावला ने सघन अभियान चलाया और प्रत्येक ब्रांच में लोगों के बीच अपनी उपस्थिति व सक्रियता को जिस तरह से संभव बनाया, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी ने ऊँची छलाँग लगाई है - और उनकी यही ऊँची छलाँग हंसराज चुग के लिए मुसीबत बन गई है । राज चावला ने पंजाब और हरियाणा में जो काम किया है, उसके भरोसे यहाँ की ब्रांचेज में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अच्छा समर्थन जुटाया है । राज चावला की उम्मीदवारी के बारे में लोगों के बीच जोरदार चर्चा यह है कि उन्हें मिलने वाले पहली वरीयता के वोटों की गिनती को लेकर भले ही संशय हो, लेकिन दूसरी वरीयता के वोट उन्हें थोक में मिलने जा रहे हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का मानना/कहना है कि राज चावला को प्रायः प्रत्येक उम्मीदवार के दूसरी वरीयता के वोट मिल रहे हैं - और यही दूसरी वरीयता के वोट राज चावला की उम्मीदवारी की ताकत बन रहे हैं । राज चावला की उम्मीदवारी को मिलती दिख रही यह ताकत हंसराज चुग के लिए मुसीबत बन गई है । 
हंसराज चुग के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत विजय गुप्ता की सुधरती दिख रही स्थिति से भी बनी है । अभी कुछ समय पहले तक विजय गुप्ता की स्थिति को बहुत ही खराब रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । विजय गुप्ता की खराब स्थिति में हंसराज चुग के लिए अच्छा मौका बनता देखा जा रहा था, लेकिन अब जब विजय गुप्ता की स्थिति सुधरती नजर आ रही है - तो हंसराज चुग की उम्मीदवारी पर ही तलवार लटकती दिख रही है । इसे चंडीगढ़ के उदाहरण से समझा/पहचाना जा सकता है । चंडीगढ़ में पिछली बार जिन लोगों ने विजय गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन किया था, उनमें से कुछेक लोग इस बार हंसराज चुग के साथ देखे जा रहे हैं - इस आधार पर उम्मीद की गई थी कि जिन लोगों ने पिछली बार विजय गुप्ता को समर्थन और वोट दिया था, इस बार उनका समर्थन और वोट हंसराज चुग को मिलेगा । किंतु देखने में यह आया है कि हंसराज चुग उन सभी का समर्थन और वोट जुटाने में असफल रहे और कई लोगों को विजय गुप्ता के समर्थन में लौटते हुए देखा/पहचाना गया । विजय गुप्ता की राजनीति को नजदीक से देखने/जानने वाले लोगों का मानना और कहना भी है कि विजय गुप्ता चुनाव अभियान के अंतिम दौर में जो रणनीति अपनाते हैं, उससे माहौल को अपने पक्ष में कर ही लेते हैं । इस बार विजय गुप्ता  को इस बात का भी फायदा मिलता दिख रहा है कि जिन उम्मीदवारों की जीतने की उम्मीद दिख भी रही है, उनमें से किसी की भी जीत के बारे में विश्वास के साथ दावा किए जाने की स्थिति नहीं बनी है । उल्लेखनीय है कि हंसराज चुग, राज चावला, संजय वासुदेवा, सुधीर अग्रवाल, एसएस शर्मा, विशाल गर्ग आदि जिन उम्मीदवारों में संभावित विजेताओं को देखा/पहचाना जा रहा है - उनमें किसी की भी स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि उसकी जीत को सुनिश्चित माना जाए । इस तरह कोई भी नया उम्मीदवार विजय गुप्ता के लिए चुनौती बनता नहीं दिख रहा है - और यही स्थिति विजय गुप्ता की उम्मीदवारी को सुरक्षित किए दे रही है । विजय गुप्ता की स्थिति के सुरक्षित होते जाने ने नए उम्मीदवारों के लिए मुकाबले को और मुश्किल बना दिया है । मुश्किल बने मुकाबले के कारण हंसराज चुग के लिए मुसीबत और बढ़ गई है ।