Wednesday, January 27, 2016

रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने अपने एक फैसले के जरिए पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजा साबू तथा डिस्ट्रिक्ट 3080 के उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को वास्तव में चुल्लु भर पानी दिया है, जिसमें वह यदि चाहें तो अपनी बेशर्मी को डुबो सकते हैं

चंडीगढ़ । रोटरी इंटरनेशनल की इलेक्शन रिव्यु कमेटी ने राजेंद्र उर्फ राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की सारी मेहनत पर पानी फेरते हुए वर्ष 2017-18 के गवर्नर के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश पारित किया है । वर्ष 2017-18 के गवर्नर पद को लेकर राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की डिस्ट्रिक्ट के लोगों तथा रोटरी इंटरनेशनल के हाथों जो बार-बार 'पिटाई' हुई है, वह रोटरी तथा डिस्ट्रिक्ट 3080 के इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना बन गई है । यहाँ पूरे घटनाक्रम को एक बार फिर याद कर लेना प्रासंगिक होगा - सबसे पहले तो नोमीनेटिंग कमेटी में टीके रूबी के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने के जरिए डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व गवर्नर्स को उनकी 'राजनीतिक औकात' दिखाई; जिससे बौखलाकर नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को ही राजा साबू की शह पर रद्द कर दिया गया । रद्द करने के इस मनमाने फैसले को रोटरी इंटरनेशनल में चेलैंज किया गया, तो रोटरी इंटरनेशनल ने रद्द करने के फैसले को रद्द करके राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को खासा तगड़ा वाला झटका दिया तथा चुनावी प्रक्रिया को पूरा करने का आदेश दिया । इस आदेश का पालन करने पर मजबूर हुए राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने चुनावी पक्षपात का नंगा नाच किया और पूरी बेशर्मी के साथ खुल कर डीसी बंसल को चुनाव जितवाने का बीड़ा उठाया और एक बेईमान किस्म की सफलता प्राप्त की । उनकी कारस्तानियों को लेकर रोटरी इंटरनेशनल में फिर शिकायत हुई, और रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने शिकायतों को सही पाते/मानते हुए उस चुनाव को निरस्त कर दिया है तथा वर्ष 2017-18 के गवर्नर के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया है । रोटरी के कई एक बड़े नेताओं का ही कहना है कि इस फैसले के जरिए रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को वास्तव में चुल्लु भर पानी दिया है, जिसमें वह यदि चाहें तो अपनी बेशर्मी को डुबो सकते हैं ।
राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट के लोगों को ही नहीं, राजा साबू को जानने वाले रोटरी के दूसरे बड़े नेताओं को भी हालाँकि लगता नहीं है कि राजा साबू लगातार हो रही अपनी इस फजीहत से कोई सबक लेंगे । लोगों का यह विश्वास इसलिए भी बना है कि रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले को राजा साबू के कुछेक नजदीकी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'अपनी' जीत के रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं । उनका कहना है कि 'उन्हें' डर था कि रोटरी इंटरनेशनल की इलेक्शन रिव्यु कमेटी कहीं टीके रूबी को वर्ष 2017-18 के गवर्नर के रूप में स्वीकार न कर ले; ऐसा न हो जाए - इसके लिए राजा साबू ने खुद कमर कसी और इसे सुनिश्चित किया । राजा साबू के संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स लोगों को बता रहे हैं कि राजा साबू ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड में टीके रूबी के पक्ष में फैसला नहीं होने दिया । तथ्य लेकिन ठीक इसके विपरीत है और वह यह यह है कि रोटरी इंटरनेशनल की इलेक्शन रिव्यु कमेटी के सामने शिकायत चुनाव में हुई बेईमानी को लेकर की गई थी, जिसमें टीके रूबी को पराजित किया गया था । यह सारा कुछ राजा साबू की देख-रेख में हुआ था । शिकायत टीके रूबी के क्लब की तरफ से की गई थी । ऐसे में, यदि राजा साबू के प्रभाव की बात सच है तो टीके रूबी के क्लब की तरफ से हुई शिकायत को निरस्त होना चाहिए था, तथा चुनाव के नतीजे को बहाल होना चाहिए था । इलेक्शन रिव्यु कमेटी वर्ष 2017-18 के गवर्नर पद के लिए हुए चुनाव में शुरू से आखिर तक के कदम पर सवाल उठा रही है और राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की खुली मिलीभगत से हुए चुनाव को निरस्त करने का फैसला कर रही है - तो यह सीधे-सीधे राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के 'मुँह पर करारा तमाचा' है । इस तमाचे को राजा साबू के नजदीकी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स यदि 'अपनी' जीत बता रहे हैं - तो यह बेशर्मी की पराकाष्ठा का एक अनुपम उदाहरण है ।
उल्लेखनीय है कि राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने अपनी पूरी ताकत लगा कर डीसी बंसल को तब विजयी 'बनाया' था, जब डीसी बंसल की उम्मीदवारी की पात्रता ही सवालों के घेरे में थी । लोगों के बीच से उठते सवालों पर बेशर्मीभरी चुप्पी साध लेने और/या सवाल करने वाले लोगों पर अपमानजनक टिपण्णियाँ करने वाले राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने लेकिन डीसी बंसल की उम्मीदवारी की पात्रता पर उठे सवालों की भी अनदेखी ही की - लेकिन रोटरी इंटरनेशनल की जोनल-लेबल इलेक्शन कम्प्लेंट पैनल ने डीसी बंसल की उम्मीदवारी की पात्रता को अमान्य घोषित करने का फैसला सुनाते हुए राजा साबू तथा उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की पहले भी फजीहत ही की थी । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की इलेक्शन रिव्यु कमेटी ने अभी हाल ही की अपनी मीटिंग में डीसी बंसल की उम्मीदवारी की पात्रता को अमान्य घोषित करने के जोनल-लेबल इलेक्शन कम्प्लेंट पैनल के फैसले को तो हालाँकि पलट दिया, किंतु उसके बावजूद डीसी बंसल को विजयी 'बनाने' वाले चुनाव को मान्य करने में उसने कोई रियायत नहीं बरती । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की इलेक्शन रिव्यु कमेटी का यह फैसला सीधे-सीधे इस बात का सुबूत है कि राजा साबू की कारस्तानियाँ रोटरी इंटरनेशनल के शीर्ष पदाधिकारियों की निगाह में भी खटकने लगी हैं और इसलिए रोटरी इंटरनेशनल के शीर्ष पदाधिकारी भी रोटरी इंटरनेशनल के प्रेसीडेंट रह चुके राजा साबू के प्रति किसी तरह की उदारता दिखाने को तैयार नहीं हैं । पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजा साबू की बदनामियों की अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनने तथा उनके पतन का यह एक खासा फजीहतभरा दृश्य है ।

Tuesday, January 26, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के रोटरी क्लब वैशाली में मनोज भदोला व उनके संगी-साथी अब अपनी कारस्तानियों को तो 'रासलीला' समझने तथा प्रेम दास माहेश्वरी के कदम को उनके 'करेक्टर के ढीला' होने के सुबूत के तौर पर देखे जाने की माँग कर रहे हैं

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने सेक्रेटरी प्रेम दास माहेश्वरी के खिलाफ जो मोर्चा खोला है, उसके चलते न सिर्फ मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की दबी-छिपी कारस्तानियाँ सामने आ रही हैं, उनके बीच आपस में भी मनमुटाव पैदा हो रहे हैं - बल्कि रोटरी क्लब वैशाली का भविष्य और अनिश्चित होता जा रहा है । मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों के बीच रमणीक तलवार की भूमिका को लेकर भी मनमुटाव पैदा हो रहा है । रमणीक तलवार ने दरअसल दूसरे डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में जाने का फार्मूला देकर आग में घी डालने का जो काम किया है, उससे मनोज भदोला के कुछेक साथी ही खुश नहीं हैं । क्लब के कुछेक सदस्य ही अब कहने लगे हैं कि क्लब के झगड़े को अब खत्म होना/करवाना चाहिए और एक-दूसरे के प्रति आपसी शिकायतों पर खुले मन से विचार होना चाहिए । क्लब के ही सदस्यों का मानना/कहना है कि तथ्यात्मक रूप से देखें तो गलतियाँ दोनों तरफ से हुई हैं, इसलिए कोई एक पक्ष दूसरे पक्ष के लोगों को सजा देने/दिलवाने की जिद पर अड़े - तो यह उचित नहीं होगा; ऐसे में उचित यह होगा कि क्लब में ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे कि आपसी मनभेद किसी बड़े टकराव का माहौल न बना सकें । क्लब के सत्ता खेमे के कुछेक सदस्य लेकिन किसी न किसी की बलि लेकर ही मामले को खत्म करना चाहते हैं; उनका कहना है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी बहुत ही फजीहत होगी । ऐसे सदस्यों ने ही अब प्रसून चौधरी तथा विकास चोपड़ा को छोड़ कर प्रेम दास माहेश्वरी को निशाने पर ले लिया है । 
मजे की बात यह है कि मनोज भदोला और उनके संगी-साथी जब प्रसून चौधरी तथा विकास चोपड़ा से लोहा ले रहे थे, तब प्रेम दास माहेश्वरी उनके ही साथ थे; लेकिन इसके साथ साथ सच यह भी है कि यह प्रेम दास माहेश्वरी ही हैं जिनके एक 'कदम' ने मामले की दशा-दिशा ही बदल दी और मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों को ऐसी पटखनी दी कि उनसे न रोते बन रहा है, और न अपनी 'चोटों' को सहलाते बन रहा है । कुछेक लोगों को प्रेम दास माहेश्वरी के 'बदले' रवैये पर हैरानी जरूर है, लेकिन क्लब के ही सदस्यों का कहना है कि क्लब के कामकाज और फैसलों को लेकर मनोज भदोला व प्रेम दास माहेश्वरी के बीच तालमेल कभी भी नहीं बन पाया; और मनोज भदोला ने हमेशा ही प्रेम दास माहेश्वरी को अलग-थलग रखने का काम किया । प्रेम दास माहेश्वरी दरअसल नियम/व्यवस्था से काम करने और फैसले लेने की बात करते, मनोज भदोला लेकिन मनमर्जी चलाते; प्रेम दास माहेश्वरी क्लब को रोटरी भावना से चलाने की बात करते, मनोज भदोला के लिए रोटरी का मतलब लेकिन तफ़रीह व मौज़-मज़ा रहा - क्लब के ही सदस्यों का आरोप रहा कि मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने रोटरी क्लब को शराब-बाजी का अड्डा बना रख छोड़ा था । कई मामलों में मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की कारस्तानियों पर प्रेम दास माहेश्वरी की गहरी नाराजगी थी, किंतु क्लब-अनुशासन के चलते वह चुप रहे । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए कॉन्करेंस देने का फैसला जिस गुपचुप तरीके से हुआ, उससे भी प्रेम दास माहेश्वरी को ऐतराज था - किंतु क्लब अनुशासन के चलते वह इस मामले में भी चुप रहे । वह तो जब यह पोल खुली कि कॉन्करेंस के लिए मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने सौदेबाजी की है और क्लब को 'बेच' दिया है, तब प्रेम दास माहेश्वरी को लगा कि पानी अब सिर से ऊपर जा पहुँचा है - और अब चुप नहीं रहा जा सकता है । 
मनोज भदोला व उनके संगी-साथी प्रेम दास माहेश्वरी की भलमनसाहत को उनकी कमजोरी समझ बैठे थे; किंतु प्रेम दास माहेश्वरी ने जैसे भी अपने अधिकार का प्रयोग किया, वैसे ही मनोज भदोला और उनके संगी-साथी जमीन सूँघते नजर आए । दरअसल इसीलिए मनोज भदोला और उनके संगी-साथी चाहते हैं कि प्रेम दास माहेश्वरी के खिलाफ अवश्य ही कार्रवाई हो । मनोज भदोला व उनके संगी-साथी चाहते हैं कि क्लब में गड़बड़ी की शुरुआत वहाँ से देखी जाए, जहाँ से प्रेम दास माहेश्वरी ने सेक्रेटरी के रूप में अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए मनोज भदोला के खिलाफ कार्रवाई की - और उससे पहले की सारी घटनाओं को अनदेखा कर दिया जाए । मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की बातों से लगता है जैसे कि वह चाहते हैं कि उनकी कारस्तानियों को तो 'रासलीला' समझा जाए, तथा प्रेम दास माहेश्वरी के कदम को उनके 'करेक्टर के ढीला' होने का सुबूत माना जाए । क्लब के कुछेक सदस्यों का हालाँकि यह भी कहना है कि जिन तर्कों के आधार पर प्रेम दास माहेश्वरी के खिलाफ कार्रवाई करने की बात की जा रही है, उन तर्कों के आधार पर तो मनोज भदोला के खिलाफ भी कार्रवाई बनती है - इसलिए बेहतर यही होगा कि जो हुआ उसे भुलाकर मामले को ख़त्म किया जाए । 
रोटरी क्लब वैशाली में कुछेक लोगों को लेकिन लगता है कि रमणीक तलवार मामले को खत्म नहीं होने देंगे, और वह मामले को तरह-तरह से भड़काए हुए हैं । उल्लेखनीय है कि रमणीक तलवार क्लब के संस्थापक सदस्यों में हैं, लेकिन पिछले काफी समय से क्लब में अलग-थलग बने हुए थे - जिस कारण वह क्लब के कार्यक्रमों व मीटिंग्स में कम ही शामिल हो रहे थे; किंतु क्लब में झगड़ा शुरू होने के बाद से वह अचानक से खूब सक्रिय हो गए हैं । समझा जाता है कि मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों के गाइड आजकल रमणीक तलवार ही बने हुए हैं । रमणीक तलवार ने मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों में यह कहते/बताते हुए हवा भरी हुई है कि यदि डिस्ट्रिक्ट 3012 में उनकी नहीं सुनी गई, तो वह डिस्ट्रिक्ट 3011 में उनका क्लब बनवा देंगे । क्लब के कई एक सदस्यों के बीच इस बात पर नाराजगी है; उनका कहना है कि उनकी डिस्ट्रिक्ट 3011 के पदाधिकारियों से बात हुई है - जिनका कहना है कि नया क्लब तो किसी का भी बन जायेगा, उसके लिए रमणीक तलवार की सिफारिश की जरूरत थोड़े ही पड़ेगी । मुकेश अरनेजा के विरोध के बावजूद मुकेश अरनेजा के क्लब से निकले लोगों का नया क्लब यहाँ बन ही रहा है; वैशाली के भी जो भी लोग यहाँ नया क्लब बनाना चाहेंगे, उनका क्लब भी बन जायेगा; ऐसे में रमणीक तलवार नाहक ही अपनी नेतागिरी दिखा रहे हैं । क्लब के कई एक सदस्यों का कहना है कि क्लब के जिन सदस्यों को लगता है कि उनके लिए क्लब में और डिस्ट्रिक्ट 3012 में रहना संभव नहीं है, उन्हें यहाँ से निकल कर डिस्ट्रिक्ट 3011 में अपना नया क्लब बना लेना चाहिए - तथा यहाँ और गंदगी नहीं करना/फैलाना चाहिए । मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों को भी यह बात तो समझ में आने लगी है कि मामला उनके हाथ से निकल गया है, तथा उनके पास अब बहुत सीमित विकल्प ही बचे हैं - और यह भी कि मामले को वह जितना खींचेंगे, उतना ही अपनी फजीहत और ज्यादा करवायेंगे ।

Saturday, January 23, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता की पुनर्प्रस्तुत उम्मीदवारी की संभावना के कारण ललित खन्ना तथा मनोज लाम्बा के लिए मामला चुनौतीपूर्ण हुआ

नई दिल्ली/गाजियाबाद । दीपक गुप्ता और मनोज लाम्बा की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए संभावित अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए रमेश अग्रवाल के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे का समर्थन पाने के लिए की जा रही कोशिशों ने डिस्ट्रिक्ट की ठंडी पड़ी चुनावी राजनीति में कुछ कुछ गर्मी पैदा करने का काम तो शुरू किया है । रमेश अग्रवाल के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे के विरोध के कारण दीपक गुप्ता को पिछले चुनाव में जिस तरह से पराजित होना पड़ा है, उससे उन्होंने ही नहीं - बल्कि मनोज लाम्बा ने भी सबक लिया है कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल के भरोसे चुनाव जीतना तो मुश्किल ही है । मनोज लाम्बा ने सतीश सिंघल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी की हुई थी - किंतु उनकी तैयारी को दो झटके लगे हैं : एक तो यही कि सतीश सिंघल के ऐड़ी-चोटी के जोर के बावजूद दीपक गुप्ता चुनाव में बुरी तरह हार गए; और दूसरा यह कि दीपक गुप्ता फिर से उम्मीदवार होने की तैयारी करने लगे । अन्य दूसरे लोगों की तरह मनोज लाम्बा को भी लगता था कि हारने के बाद दीपक गुप्ता उम्मीदवारी की दौड़ से बाहर हो जायेंगे; दीपक गुप्ता ने लेकिन तिबारा से अपनी उम्मीदवारी के संकेत देकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अगले चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है । मनोज लाम्बा की तरफ से होशियारी यह दिखाई गई कि जैसे ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के संकेत उन्हें मिले, वैसे ही उनकी तरफ से रमेश अग्रवाल से तार जोड़ने के प्रयास शुरू हो गए । लोगों को उनके प्रयासों की भनक उनके क्लब के वरिष्ठ सदस्य सतीश गुप्ता की सक्रियता से मिली । 
दरअसल सतीश गुप्ता को सतीश सिंघल के कामकाज के तौर-तरीकों पर प्रतिकूल टिपण्णियाँ करते हुए लोगों ने जब सुना, तो लोगों को आश्चर्य हुआ और उनके कान खड़े हुए । इसका कारण यह है कि सतीश गुप्ता को सतीश सिंघल के बड़े घनघोर किस्म के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है । सतीश गुप्ता को कुछेक लोगों ने समझाया भी था कि सतीश सिंघल के ज्यादा नजदीक होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सतीश सिंघल अपने सामने किसी को कुछ समझते नहीं हैं और सामने वाले को कभी भी अपमानित कर दे सकते हैं - लेकिन सतीश गुप्ता ने किसी की नहीं सुनी/मानी । इसीलिए अब अचानक से सतीश गुप्ता को सतीश सिंघल के खिलाफ टिपण्णियाँ करते सुन लोगों का माथा ठनका । सतीश गुप्ता कभी भी किसी के भी खिलाफ बहुत नकारात्मक बात करते हुए चूँकि नहीं सुने गए हैं, इसलिए भी सतीश सिंघल को लेकर कही गयी उनकी प्रतिकूल टिपण्णियों में राजनीति - मनोज लाम्बा की उम्मीदवारी से जुड़ी राजनीति को पहचानने की कोशिश की गई है । यह कोशिश इसलिए भी हुई, क्योंकि रमेश अग्रवाल को दिल्ली में कोई उम्मीदवार खोजते हुए 'देखा/पाया' गया । रमेश अग्रवाल को कुछेक मौकों पर कहते हुए सुना गया है कि उनका अगला उम्मीदवार दिल्ली से होगा । रमेश अग्रवाल की इस कहन में मनोज लाम्बा और उनकी उम्मीदवारी के शुभचिंतकों को अपनी दाल गलती हुई दिख रही है - और इसीलिए उन्होंने सतीश सिंघल से अपनी दूरियाँ बनानी तथा 'दिखानी' शुरू कर दी है । 
रमेश अग्रवाल खेमे से हालाँकि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की चर्चा भी है - चर्चा तो जोरदार है, लेकिन ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर कोई भरोसे का माहौल नहीं बन पा रहा है । चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों व जानकारों के बीच दरअसल चुनावी राजनीति के प्रेशर को झेल पाने की ललित खन्ना की स्थितियों को लेकर संदेह बना हुआ है । ललित खन्ना की तरफ से भी चूँकि अपनी उम्मीदवारी को लेकर अभी तक कोई बहुत उत्साह नहीं दिखाया गया है, इसलिए भी उनकी उम्मीदवारी लोगों के बीच बहुत विश्वास नहीं बना पा रही है । मनोज लाम्बा और उनके शुभचिंतक इस स्थिति का फायदा उठा लेने के लिए तैयार हो गए 'दिख' रहे हैं । मनोज लाम्बा तथा उनके शुभचिंतकों को विश्वास है कि रमेश अग्रवाल के नेतृत्व वाला सत्ता खेमा चूँकि किसी भी कीमत पर दीपक गुप्ता को आगे नहीं बढ़ने देना चाहेगा; और इसके लिए दिल्ली में किसी उम्मीदवार की तलाश कर रहा है तथा ललित खन्ना की उम्मीदवारी के प्रति भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा है - इसलिए उनके लिए मौका है कि वह रमेश अग्रवाल के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे का समर्थन जुटा लें । उनके इस मौके में हालाँकि सतीश सिंघल के 'आदमी' होने की मनोज लाम्बा की पहचान बाधा बन सकती है; और इसके अलावा मनोज लाम्बा के सामने अपने आप को एक गंभीर उम्मीदवार 'दिखाने' की चुनौती भी है ही । यह चुनौती गंभीर इसलिए भी है क्योंकि दीपक गुप्ता की तरफ से भी सत्ता खेमे के नेताओं का समर्थन पाने/जुटाने के प्रयास शुरू हो गए हैं । सत्ता खेमे के दूसरी पंक्ति के कुछेक वरिष्ठ नेताओं को दीपक गुप्ता के प्रति हमदर्दी दिखाते तथा उनकी उम्मीदवारी के समर्थन की वकालत करते हुए जिस तरह से सुना/देखा जा रहा है, उससे लग रहा है कि दीपक गुप्ता ने यदि पिछली बार जैसी गलतियाँ नहीं कीं, तो इस बार वह अपने समर्थन आधार को अवश्य ही विस्तृत कर पायेंगे । जाहिर है कि सभी के अपने अपने तर्क हैं, लेकिन असली खेल तो तब शुरू होगा - जब उम्मीदवारों की तरफ से सक्रियता देखने/सुनने को मिलेगी ।

Friday, January 22, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में अरविंद संगल की पत्नी को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का ऑफर देकर अरविंद संगल को अपनी तरफ करने का शिवकुमार चौधरी का दाँव अभी तो सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है

गाजियाबाद । अरविंद संगल की पत्नी को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का लालच देकर शिवकुमार चौधरी ने अरविंद संगल को अपनी तरफ करने का जो दाँव चला है, उसने उन महिलाओं को खासा भड़का दिया है - शिवकुमार चौधरी जिन्हें पिछले कुछ समय से डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने की बात कह/कर रहे थे । इसी से भेद खुला कि शिवकुमार चौधरी तो पिछले कुछ समय से तीन-चार महिलाओं को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का झाँसा दे रहे थे । यह भेद खुलने से अरविंद संगल भी सावधान हो गए हैं, और उनके सावधान होने से शिवकुमार चौधरी का गेम-प्लान भी बिगड़ गया है । अरविंद संगल के रवैये ने दरअसल शिवकुमार चौधरी के 'मुकेश गोयल विरोधी मंच' को शुरू से ही झटका दिया हुआ है । शिवकुमार चौधरी ने उम्मीद की थी कि वह जैसे ही मुकेश गोयल विरोधी मंच की घोषणा करेंगे, वैसे ही उन्हें पहला समर्थन अरविंद संगल का मिलेगा - अरविंद संगल ने लेकिन उनके अभियान के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । अरविंद संगल के नजदीकियों के अनुसार इसके दो कारण रहे : एक यह कि शिवकुमार चौधरी ने जिस गुपचुप तरीके से रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया, उससे अरविंद संगल को लगा कि शिवकुमार चौधरी ने अपने कुछेक स्वार्थों की पूर्ति के लिए रेखा गुप्ता को मोहरा बनाया है; दूसरे, उनका आकलन है कि रेखा गुप्ता चुनाव-अभियान के प्रेशर को झेल नहीं पायेंगी और अंततः चुनावी दौड़ से बाहर ही होंगी । इसके अलावा, अरविंद संगल इस बात को लेकर शिवकुमार चौधरी से खफा भी थे कि अपने गवर्नर-काल के तमाम महत्वपूर्ण पद वह मुकेश गोयल के कहने से पहले ही बाँट चुके हैं, तथा उसके पैसे भी बसूल कर चुके हैं; और इस बारे में उन्हें पूछा तक नहीं । शिवकुमार चौधरी जिस तरह मुकेश गोयल के प्रति अपना अवसरवादी रवैया दिखाते रहे हैं - कभी उन्हें गाली देने लगते हैं, और कभी उनकी खुशामद में लगे नजर आते हैं; उससे भी अरविंद संगल ने शिवकुमार चौधरी को भरोसा करने लायक नहीं समझा ।
अरविंद संगल का भरोसा जीतने के लिए ही शिवकुमार चौधरी ने अरविंद संगल की पत्नी को डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन बनाने का ऑफर दिया । शिवकुमार चौधरी की बदकिस्मती रही कि अपने नजदीकियों के बीच अभी वह यह दावा कर ही रहे थे कि अपने इस ऑफर के जरिए वह अरविंद संगल को अपने साथ ले आयेंगे कि तभी यह भेद खुल गया कि डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन का ऑफर तो वह पहले ही तीन-चार महिलाओं को दे चुके हैं । यह भेद खुलने के बाद अरविंद संगल की तरफ से शिवकुमार चौधरी को कोई उत्साहित करने वाला जबाव नहीं मिला, और शिवकुमार चौधरी के लिए भी यह मुश्किल हुआ कि अरविंद संगल के सामने वह अपने ऑफर को विश्वसनीय रूप दे सकें । डिस्ट्रिक्ट लायनेस चेयरपरसन के मामले में ही नहीं, बल्कि अन्य कई महत्वपूर्ण पदों के मामले में शिवकुमार चौधरी के सामने यही समस्या है । अगले लायन वर्ष के अपने गवर्नर-काल के अधिकतर महत्वपूर्ण पद वह पहले ही 'बेच' चुके हैं - जिन्हें वह दोबारा दोबारा 'बेचने' के प्रयास कर रहे हैं । लायन राजनीति में पद 'बेच' कर वोट खरीदने का फार्मूला बड़ा पुराना फार्मूला है - शिवकुमार चौधरी ने भी इस फार्मूले को अपनाया; उनके सामने समस्या लेकिन यह पैदा हुई कि पदों का सौदा तो वह पहले ही कर चुके हैं । लोगों के बीच चर्चा है कि वह चार-पाँच लोगों को तो वह कैबिनेट सेक्रेटरी ही बना चुके हैं । उल्लेखनीय है कि लायंस इंटरनेशनल सिर्फ एक कैबिनेट सेक्रेटरी को ही मान्यता देता है; कुछेक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर लेकिन पैसा उगाहने के लिए एक से अधिक कैबिनेट सेक्रेटरी बना लेते/देते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'जानते' हैं कि लोग डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में अपना नाम/फोटो छपा देखने के लिए इतने उत्साहित होते हैं कि उन्हें 'शिकारपुर का' बनाना बड़ा आसान होता है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी धाक जमाने के लिए शिवकुमार चौधरी ने भी यही आसान रास्ता चुन लिया है ।
इस आसान रास्ते को अपनाने के मामले में शिवकुमार चौधरी के सामने किंतु बड़ी मुसीबत यह आ रही है कि डिस्ट्रिक्ट में लोग यह जानते हैं कि वह अपने गवर्नर-काल के अधिकतर महत्वपूर्ण पद 'बेच' चुके हैं, और पैसा भी बसूल कर चुके हैं - लिहाजा अब लोग आसानी से उनके झाँसे में नहीं आ रहे हैं । इससे भी बड़ी समस्या है कि अब जिन लोगों को जो भी और जैसे भी पद मिल भी रहे हैं, वह पद के बदले में माँगे जा रहे पैसे देने से बचने की कोशिश कर रहे हैं । लोगों का कहना है कि शिवकुमार चौधरी उनका वोट पाने/लेने के लिए उन्हें पद दे रहे हैं, इसलिए पैसे की उम्मीद क्यों कर रहे हैं ? शिवकुमार चौधरी पैसा छोड़ने को भी तैयार नहीं दिख रहे हैं । इस चक्कर में उन्हें फिलहाल पद लेने वाले लोग मिल नहीं पा रहे हैं । हालाँकि वह आश्वस्त हैं कि डिस्ट्रिक्ट में 'शिकारपुर के' लोगों की कमी नहीं है, उन्हें ऐसे लोग अवश्य ही मिलेंगे जो पद के बदले में पैसा भी देंगे और वोट भी देंगे । यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि शिवकुमार चौधरी के हाथों कौन कौन 'शिकारपुर का' बनता है ?

Monday, January 18, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सतीश सिंघल और रमणीक तलवार ने प्रसून चौधरी के खिलाफ अपनी निजी खुन्नस को निकालने के लिए मनोज भदोला का जैसा इस्तेमाल किया, उससे किरकिरी सिर्फ मनोज भदोला की ही हुई है

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला तथा उनके संगी-साथी अपनी फजीहत के लिए सतीश सिंघल और रमणीक तलवार को जिम्मेदार ठहराने लगे हैं, तथा अनौपचारिक बातचीतों में इस बात पर अफसोस व्यक्त करने लगे हैं कि नाहक ही सतीश सिंघल और रमणीक तलवार की बातों में फँस कर उन्होंने अपनी और क्लब की बेइज्जती करवाई । रोटरी क्लब वैशाली के मामले की पड़ताल कर रही डिस्ट्रिक्ट कमेटी के सदस्यों के सामने मनोज भदोला तथा उनके संगी-साथियों के तेवर काफी बदल गए हैं - पहले वह अपने 'पक्ष' को लेकर जहाँ कठोर रवैया अपनाए हुए थे, वहाँ समय बीतने के साथ साथ उनके तेवर ढीले पड़ने लगे हैं; तथा प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के प्रति उनका अब पहले जैसा विरोध नहीं रह गया है । प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा को छोड़ कर उन्होंने हालाँकि प्रेम दास माहेश्वरी को निशाने पर लिया हुआ है, लेकिन कमेटी के सदस्यों से बातचीत में वह सतीश गुप्ता और रमणीक तलवार के प्रति अपनी नाराजगी को भी जाहिर करने से नहीं चूक रहे हैं । दूसरे अन्य लोगों से भी मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों ने कहा/दोहराया है कि सतीश सिंघल व रमणीक तलवार की निजी खुंदक के चक्कर में फँस कर उन्होंने अपना काफी नुकसान किया है । मजे की और विडंबना की बात यह रही कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की मदद करने के उद्देश्य से अध्यक्षों को अधिकार दिलाने के अभियान में जुड़ने पर रोटरी क्लब वैशाली के अध्यक्ष मनोज भदोला, दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में कोई मदद करने लायक तो नहीं हो सके - बल्कि अपने कपड़े और 'उतरवा' बैठे !    
उल्लेखनीय है कि मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों के प्रसून चौधरी व विकास चोपड़ा के साथ मनमुटाव तो बने थे, लेकिन वह इतने गंभीर नहीं थे कि उनके बीच अप्रिय विवाद पैदा करते/बनाते । इस संबंध में बल्कि मनोज भदोला की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने बड़प्पन दिखाया हुआ था । यह इस तथ्य से जाहिर है कि विकास चोपड़ा काफी पहले क्लब के अपने पद से इस्तीफा दे चुके थे, जिसे लेकिन मनोज भदोला स्वीकार नहीं कर रहे थे । मनोज भदोला बल्कि उन्हें इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी करने का प्रयास कर रहे थे । मनोज भदोला चाहते तो विकास चोपड़ा का इस्तीफा स्वीकार करके उनसे पीछा छुड़ा लेते । जाहिर है कि मनोज भदोला का दिमाग तब 'बिगड़ा' जब कॉन्करेंस के बदले में सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के असिस्टेंट गवर्नर का पद उन्हें ऑफर हुआ । हालाँकि बात यदि कॉन्करेंस के लिए हुई सौदेबाजी तक ही रहती, तब भी बात इतना नहीं बिगड़ती । कॉन्करेंस देने का विरोध यदि प्रसून चौधरी और विकास चोपड़ा करते भी, तो उनके विरोध का असर नहीं होता - क्योंकि वह क्लब में अल्पमत में थे । प्रेम दास माहेश्वरी ने भी कॉन्करेंस का समर्थन किया ही था । लेकिन सतीश सिंघल और रमणीक तलवार ने अपना निजी एजेंडा खुसेड़ कर मामला बिगाड़ दिया । प्रसून चौधरी के साथ इनकी निजी खुन्नस जगजाहिर है - इन्हें जब लगा कि क्लब अध्यक्ष मनोज भदोला पूरी तरह से इनके कहे में है, तो इन्होंने प्रसून चौधरी का 'शिकार' कर लेने के लिए मनोज भदोला को राजी कर लिया । असिस्टेंट गवर्नर का पद 'पाकर' मनोज भदोला इतने जोश में आ गए थे कि उन्होंने सतीश सिंघल और रमणीक तलवार को यह 'दिखाना' शुरू कर दिया कि देखो, मैं प्रसून चौधरी की कैसी गत बनाता हूँ । 
मनोज भदोला व उनके संगी-साथियों की तरफ से प्रसून चौधरी के खिलाफ सोशल मीडिया में अभद्र व अशालीन भाषा के जरिए जो हमला हुआ, और जोश में जिसमें फिर विकास चोपड़ा को भी लपेट लिया गया - उससे सतीश सिंघल और रमणीक तलवार के कलेजे को भले ही ठंडक मिली हो, लेकिन मामला पटरी से उतर गया था । क्लब का जो माहौल था, उसमें प्रसून चौधरी और विकास चोपड़ा चुपचाप किनारे लगने को 'तैयार' हो गए दिख रहे थे; किंतु सोशल मीडिया के जरिए उन पर जब हमला हुआ तो वह भी जबाव देने के लिए तत्पर हो गए । इस मौके पर, मौके की तलाश कर रहे रमेश अग्रवाल का सहारा उन्हें मिल गया । दरअसल, रोटरी क्लब वैशाली में एक दूसरे को क्लब से डिलीट करने का जो खेल चला उसकी शुरुआत रमेश अग्रवाल की प्रेरणा और सलाह से ही हुई थी । सतीश सिंघल व मुकेश अरनेजा के संगसाथ के भरोसे मनोज भदोला व उनके संगी-साथी इस 'हमले' के लिए तैयार नहीं थे; सो जब तक वह सँभले और जबावी कार्रवाई पर उतरे, तब तक मामला लेकिन उनके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका था - और वह बस लकीर पीटते रह गए । 
मनोज भदोला व उनके संगी-साथी अब महसूस कर रहे हैं कि सतीश सिंघल व रमणीक तलवार की बातों में वह न आते और प्रसून चौधरी के खिलाफ उनके निजी एजेंडे को पूरा करने के चक्कर में न फँसते/पड़ते तो दीपक गुप्ता के अभियान को भी वह कमजोर न करते, और अपनी फजीहत भी न कराते । मनोज भदोला व उनके संगी-साथी यदि अपनी शराफत का पर्दा ओढ़े रखते और बात को कॉन्करेंस के लिए हुई सौदेबाजी तक ही रखते, तो बात फिर बिगड़ती नहीं - वह लेकिन न तो शराफत का पर्दा ओढ़े रख सके, और न रमेश अग्रवाल के दिशा-निर्देशन में हुए प्रसून चौधरी के हमले को झेल सके । जाहिर है कि सतीश सिंघल और रमणीक तलवार ने प्रसून चौधरी के खिलाफ अपनी निजी खुन्नस को निकालने के लिए मनोज भदोला का जैसा इस्तेमाल किया, उससे नुकसान और किरकिरी सिर्फ मनोज भदोला की ही हुई है । 

Saturday, January 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में 'वीटीटी कम मेडिकल मिशन' के कामकाज को तथा उसके हिसाब-किताब को छिपाए रखने में राजा साबू का स्वार्थ आखिर क्या है ?

चंडीगढ़ । राजेंद्र उर्फ राजा साबू के अपनी पत्नी के साथ मेडिकल मिशन में वॉलिंटियर बन कर जाने तथा मिशन के खर्चे से जुड़े तथ्यों को छिपाने के प्रयासों के चलते 'वीटीटी कम मेडिकल मिशन' जैसा शानदार प्रोजेक्ट संदेहों के घेरे में आ गया है । उल्लेखनीय है कि इस मिशन के तहत वीटीटी कम मेडिकल टीम अफ्रीकी देशों में जाती है, और इस टीम में जाने वाले अनुभवी डॉक्टर्स वहाँ के स्थानीय डॉक्टर्स को अलग अलग तरह की सर्जरी के लिए ट्रेंड करते हैं - और ट्रेंड करने की प्रक्रिया में वहाँ के मरीजों की सर्जरी करते हैं । टीम में शामिल डॉक्टर्स की मदद करने तथा स्थानीय रोटेरियंस के साथ मिलकर उनके काम को संयोजित करने के लिए टीम में कुछेक रोटरी वॉलिंटियर्स भी होते हैं । अभी पिछले सितंबर में मलावी तथा उसके बाद नवंबर में इथिओपिया वीटीटी कम मेडिकल टीम गई थी । अगले माह, फरवरी में एक टीम के रवांडा जाने की योजना सुनी जा रही है । इस कार्यक्रम को अपनी ही तरह के एक अनोखे कार्यक्रम के रूप में देखा/पहचाना गया तथा इसे खासी प्रशंसा भी मिली है । प्रशंसा के साथ साथ लेकिन लोगों के बीच लेकिन अब यह सवाल भी उठने लगे हैं कि टीम में वॉलिंटियर्स के रूप में राजा साबू और उनकी पत्नी क्यों जुड़ जाते हैं ? पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जैसे उनके ओहदे को तथा उनकी उम्र को देखते हुए उनके वॉलिंटियर्स बनने का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है । पहली बात तो यह भी है कि टीम के डॉक्टर्स को आखिर ऐसी क्या मदद की जरूरत पड़ती होगी, जिसके लिए वॉलिंटियर्स चाहिए होते हों - और वह भी राजा साबू व उषा साबू जैसे वॉलिंटियर्स ? इस सवाल में ही सवाल का जबाव छिपा है - जिसे 'पढ़ने' में लोगों ने कोई गलती नहीं की और मान लिया गया है कि वॉलिंटियर्स तो लगता है कि सिर्फ पिकनिक मनाने और या अपना धंधा जमाने के चक्कर में ही जाते हैं । 
टीम में जाने वाले वॉलिंटियर्स का चयन कैसे होता है, यह भी एक रहस्य है । लोगों की शिकायत है कि उन्हें तो पता ही नहीं चलता है कि कहीं जाने के लिए कोई टीम बन रही है, जिसके लिए वॉलिंटियर्स चाहिए हैं । सारा कुछ बहुत ही गोपनीय तरीके से कर लिया जाता है । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन तक को 'वीटीटी कम मेडिकल मिशन' की गतिविधियों की पूरी जानकारी नहीं है । इसके बारे में जब भी उनसे पूछा गया, पूछने वाले को यही जबाव सुनने को मिला कि इसके बारे में साबू जी से ही पूछो । डेविड हिल्टन का कहना रहा कि उन्हें तो उतना ही पता है, जितना साबू जी बताते हैं और वह उसी कार्यक्रम में शामिल हो पाते हैं - जिसमें शामिल होने के लिए साबू जी उनसे कहते हैं । डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स तो इस कार्यक्रम को लेकर पूरी तरह ही अनजान हैं । एक मधुकर मल्होत्रा जरूर इस कार्यक्रम के बारे में जानते हुए 'दिखते' हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि उनसे भी जब इसके बारे में पूछो तो वह जबाव देने से बचने लगते हैं । वीटीटी कम मेडिकल मिशन से जुड़ी बातों को - उसकी गतिविधियों की विस्तृत जानकारी तथा उसके खर्च संबंधी ब्यौरों पर जिस तरह से पर्दा डाल कर रखा जा रहा है, उससे लोगों के बीच संदेह और सवाल लगातार बढ़ते जा रहे हैं । 
वीटीटी कम मेडिकल मिशन को राजा साबू के 'मिशन' के रूप में प्रचारित किया जाता है; और इसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की जो थोड़ी सी भूमिका है भी वह सिर्फ इस कारण से है कि उनके इस मिशन के लिए जो पैसे आते हैं उसके आने को संभव करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं । इस मिशन से जुड़े सभी तथ्यों को अपने सीने से चिपकाए रखने तथा वॉलिंटियर्स टीम में अपनी पत्नी सहित अपने को शामिल कर लेने के कारण राजा साबू लोगों के निशाने पर हैं । राजा साबू ने इस मिशन को टीआरएफ से अलग रखने की जो 'होशियारी' दिखाई है, उससे भी मामला संदेहास्पद बना है । दरअसल इस मिशन के लिए टीआरएफ से पैसा मिलता तो उसका बाकायदा हिसाब देना पड़ता, राजा साबू ने इस पचड़े में पड़ने की बजाए दूसरे देशों के क्लब्स से संपर्क साध कर पैसा उगाहने को ज्यादा सुरक्षित समझा - जिसमें 'ठीक' से हिसाब देने/बताने की कोई जरूरत ही नहीं होती है । इससे ही लोगों को लग रहा है कि वीटीटी कम मेडिकल मिशन की आड़ में कहीं पैसा कमाने/बनाने, अपने काम-धंधों के लिए मौका देखने/बनाने और अपनी पिकनिक मनाने का काम तो नहीं किया जा रहा है । 
वीटीटी कम मेडिकल मिशन को लेकर लोगों के बीच पैदा हो रहे संदेहों को दूर करने का एक ही तरीका है - और वह यह कि राजा साबू इस मिशन के काम करने के तरीके को पारदर्शी बना दें, तथा इसके खर्चे के हिसाब को सबके सामने रख दें । राजा साबू लेकिन ऐसा कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । मिशन के लिए दूसरे देशों के क्लब्स से पैसा मिलने की बात की जाती है - वह कितना होता है और वह कैसे खर्च होता है, इसे पूछे जाने वाले सवालों का जबाव किसी को नहीं मिला है । राजा साबू ने अपने इस रवैये से वीटीटी कम मेडिकल मिशन जैसे एक शानदार प्रोजेक्ट को विवाद का और संदेहों का मिशन बना दिया है ।

Thursday, January 14, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी घपलेबाजियों से जुड़ीं बैंक प्रबंधन की अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का सामना कर रहे उनके पति राजेश गुप्ता के लिए दोहरी मुसीबत बन कर आई है

नई दिल्ली । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में कार्यरत उनके पति राजेश गुप्ता की मुसीबतों को और बढ़ाने का कारण बन गई है । उल्लेखनीय है कि राजेश गुप्ता पिछले कुछ समय से घपलेबाजियों से जुड़ीं अपनी कामकाजी अनिमितताओं के कारण बैंक प्रबंधन की अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं, और कई तरह की सजाएँ पा रहे हैं । सजाओं से बचने की राजेश गुप्ता की तमाम कोशिशें फेल हो जा रही हैं । अभी हाल ही में नई दिल्ली स्थित सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन ने उनकी एक एप्लीकेशन को रिजेक्ट किया है । इंफॉर्मेशन कमिश्नर शरत सभरवाल ने बैंक प्रबंधन के तर्क को सही ठहराते हुए राजेश गुप्ता की अपील को न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि उनके संदर्भित मामले में हस्तक्षेप करने से भी स्पष्ट इंकार इंकार कर दिया । कमीशन के इस फैसले ने राजेश गुप्ता के दावों तथा आरोपों व सजाओं से बचने के प्रयासों को तगड़ा झटका दिया है - तथा उनके दावों व प्रयासों को कमजोर साबित किया है । कमीशन के इस फैसले ने राजेश गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई कर रहे बैंक प्रबंधन के हाथ स्वाभाविक रूप से और मजबूत किए हैं । 
राजेश गुप्ता की पत्नी रेखा गुप्ता के लायंस इंटरनेशनल में डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी बनने के प्रयासों की खबरों ने बैंक प्रबंधन के कान और खड़े कर दिए हैं । दरअसल प्रबंधन के लोगों को पता है कि डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी बनने को लेकर होने वाले चुनाव में पचासों लाख रुपए खर्च होते हैं । उल्लेखनीय है कि राजेश गुप्ता घपलेबाजियों से जुड़ी कामकाजी अनियमितताओं में अपने फँसने के लिए बैंक प्रबंधन की टॉप मैनेजमेंट कमेटी के लोगों की आपसी प्रतिस्पर्द्धात्मक लड़ाई को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं । वह बताते/कहते रहे हैं कि टॉप मैनेजमेंट कमेटी के लोगों की लड़ाई में बलि का बकरा वह बन गए हैं, तथा उक्त कमेटी के कुछेक सदस्यों से नजदीकी की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है । समझा जाता है कि बैंक के जिन उच्चाधिकारियों का हाथ राजेश गुप्ता को फँसाने में है, उन्हीं उच्चाधिकारियों ने प्रबंधन के कान भरे हैं कि घपलेबाजी से राजेश गुप्ता ने जो पैसे बनाए हैं, उसी पैसे से वह अपनी पत्नी को लायंस इंटरनेशनल में डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी बनवा रहे हैं । इस खबर से बैंक अधिकारियों व राजेश गुप्ता के साथी-सहयोगियों में यह चर्चा भी चल पड़ी है कि राजेश गुप्ता ने घपलेबाजी से आखिर इतनी कितनी रकम बना ली है, कि वह अपनी पत्नी को एक इंटरनेशनल संगठन के डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी बनाने/बनवाने के चुनाव में पचासों लाख रुपए बहाने के लिए तैयार हो गए हैं । 
बैंक प्रबंधन में जो पदाधिकारी राजेश गुप्ता से हमदर्दी रखते हैं, तथा आरोपों से उन्हें बचाने में उनकी मदद करते रहे हैं - उनका कहना है कि राजेश गुप्ता की पत्नी के एक इंटरनेशनल संगठन के डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी बनने के प्रयासों की खबर ने राजेश गुप्ता के केस को और गंभीर बना दिया है, तथा उन पर लगे आरोपों को और मजबूती दी है; जिससे राजेश गुप्ता का बचाव करने वाले लोग भी दबाव में आए हैं । सबसे बड़ी बात यह हुई है कि जिन लोगों को राजेश गुप्ता से हमदर्दी रही है, राजेश गुप्ता के प्रति उनका विश्वास डांवाडोल हुआ है । राजेश गुप्ता की तरफ से शेयरहोल्डर डायरेक्टर्स दिनेश कुमार अग्रवाल व अशोक कुमार शर्मा से मदद मिलने का इंप्रेशन दिया जाता रहा है, किंतु अब लग रहा है कि इन दोनों को भी डर हुआ है कि राजेश गुप्ता के हमदर्दों व मददगारों के रूप में उनकी चर्चा होगी तो बदनामी के छींटे उन पर भी पड़ेंगे । रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी की खबर मिलने के बाद से घपलेबाजियों से जुड़ीं अपनी कामकाजी अनिमितताओं के कारण बैंक प्रबंधन की अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का सामना कर रहे राजेश गुप्ता पर लगे आरोपों को जिस तरह से स्वीकार्यता मिलती दिख रही है, उसे जान/पहचान कर राजेश गुप्ता से हमदर्दी रखने वाले लोगों ने जिस तरह से राजेश गुप्ता से 'बचना' शुरू कर दिया है - उससे लग रहा है कि रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी राजेश गुप्ता के लिए दोहरी मुसीबत बन कर आई है ।